प्रस्तुत आलेख में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन ने कुँवर नारायण की दार्शनिक कविता ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ का एक गहन-गंभीर, बहुआयामी और सूक्ष्म पुनर्पाठ प्रस्तुत किया है। कविता का केंद्रीय प्रश्न—’क्या यही हूँ मैं!’—केवल व्यक्ति की निजी पहचान की तलाश भर नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के भीतर निरंतर चलने वाले चेतना के मंथन, स्मृतियों और भावी संभावनाओं की एक जीवंत यात्रा को रेखांकित करता है। आलेख की विशेषता यह है कि यह कविता के काव्य-बिंबों (जैसे ‘आलोक की गंगा’, ‘मिट्टी का अँधेरा’, ‘फूल के दीपक’) और भाषिक संरचना में प्रयुक्त ‘सा’ शब्द की व्यंजना को पाश्चात्य एवं भारतीय दर्शन व आलोचना सिद्धांतों के आलोक में व्याख्यायित करता है।

गंभीर दार्शनिक पीठिका और गहन पाठ-विश्लेषण से समृद्ध यह आलेख कुँवर नारायण की कविता के नए अर्थ-आयामों को उद्घाटित करता है और पाठकों को आत्म-परीक्षण की एक नई दृष्टि प्रदान करता है। उम्मीद है कि ‘रचना समय’ के पाठकों के लिए यह आलेख चिंतन और विमर्श के नए द्वार खोलेगा।

— हरि भटनागर

चेतना, स्मृति और सम्भावना: कुँवर नारायण की ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ का पुनर्पाठ

    रवि रंजन

कुँवर नारायण की ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ कविता बाहर की दुनिया के बहाने असल में इंसान के भीतर चलने वाले मंथन को सामने लाती है। कवि बार-बार ‘क्या यही हूँ मैं!’ जैसा सवाल पूछकर सिर्फ़ अपनी पहचान की तलाश नहीं करता, बल्कि यह बतलाने की कोशिश करता है कि इंसान अपने भीतर क्या बचाकर रखता है और कौन सी समझ उसे आगे बढ़ाती है। इस कविता का ‘मैं’ कोई बंधा-बधाया रूप नहीं है, वह अनुभवों और क्रियाओं के ज़रिए खुद को टटोलता है। कभी वह अंधेरे में किसी इशारे को समझता दिखता है, कभी पुरानी बातों को आने वाले कल की उम्मीद से जोड़ता है। यहाँ अंधेरा केवल रात का नहीं, बल्कि उन उलझनों का प्रतीक है जहाँ रास्ता साफ़ नहीं दिखता, फिर भी भीतर की चेतना दिशा का अहसास कराती रहती है। कवि काले आकाश में टपकती रोशनी, सोकर भी जागती चेतना, गहरी बेहोशी में सुबह की ख़बर और मिट्टी के अंधेरे से खिलते फूल जैसे बिंबों से जीवन की अंदरूनी ताकत को उभारता है।

यह कविता बताती है कि अपने आप को जानना कोई एक झटके में मिलने वाला जवाब नहीं है, बल्कि यह पल-पल बदलती और आगे बढ़ती एक प्रक्रिया है। कवि ने जिस तरह ‘पहचानता-सा’ या ‘जागता-सा’ जैसे शब्दों को चुना है, वह दिखाता है कि इंसान ख़ुद को पूरी तरह समझकर भी थोड़ा अनसुलझा छोड़ देता है। यहाँ नींद में भी जागती चेतना मन के उस गहरे हिस्से की तरफ इशारा करती है जो जागते हुए भी साफ़-साफ़ पकड़ में नहीं आता। आखिरी पंक्तियों में एक पल की समझ से युगों को माँजने की बात आती है, जो इंसान की सोच को सीधे इतिहास और बड़े समय से जोड़ देती है। माँजने का मतलब किसी बनी-बनाई धारणा को बिना विचारे मानने के बजाय उस पर जमी पुरानी धूल को साफ़ करना है। कुल मिलाकर यह रचना ‘मैं’ को किसी एक परिभाषा में क़ैद करने के बजाय, इंसान के भीतर पल रही उम्मीदों, यादों और नई संभावनाओं को लगातार टटोलने का रास्ता खोलती है।

कविता का मूल पाठ नीचे दिया जा रहा है:

स्वयं की अभिव्यक्तियाँ

क्या यही हूँ मैं!

अँधेरे में किसी संकेत को पहिचानता-सा?

चेतना के पूर्व संबंधित किसी उद्देश्य को

भावी किसी संभावना से बाँधता-सा?

 स्याह अंबर में छिपी आलोक की गंगा कहीं

हर रात तारों से टपकती अनवरत,

नींद के परिवेश में भी सजग रहती

चेतना की, स्वप्न बन, कोई परत :

 कौन तमग्राही कठिन बेहोशियों में

भोर का संदेश भर जाता?

कौन मिट्टी का अँधेरा गुदगुदा कर

फूल के दीपक जलाता?

 क्या यही हूँ मैं!

उजागर इस क्षितिज से उस क्षितिज तक जागता-सा?

एक क्षण की सिद्ध, प्रामाणिक, परिष्कृत चेतना से

युग-युगों को माँजता-सा?

—कुँवर नारायण

‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ बाहर की दुनिया का वर्णन करते हुए भी असल में मनुष्य के भीतर चल रही एक खोज की कविता है। कवि बार बार अपने आप से पूछता है, ‘क्या यही हूँ मैं!’ यह सवाल सिर्फ़ अपनी पहचान की शिनाख्त का सवाल नहीं है। इसके पीछे यह जानने की बेचैनी भी है कि मनुष्य आखिर अपने भीतर क्या बचाए रखता है, वह अँधेरे में किस चीज़ को पहचानता है और उसके भीतर कौन सी चेतना उसे आगे बढ़ाती रहती है। कविता का ‘मैं’ कोई स्थिर और तय रूप नहीं रखता। वह लगातार अपने को पहचानने की कोशिश करता है।

कविता एक सवाल से शुरू होती है, ‘क्या यही हूँ मैं!’ इसके बाद कवि अपने बारे में सीधे कोई जवाब नहीं देता। वह ख़ुद को कुछ क्रियाओं और अनुभवों के ज़रिए पकड़ने की कोशिश करता है। वह कहता है, ‘अँधेरे में किसी संकेत को पहिचानता सा?’ यहाँ अँधेरा केवल रात का अँधेरा नहीं है। यह उस स्थिति का भी संकेत है जहाँ मनुष्य को अपने रास्ते का पूरा पता नहीं होता। फिर भी वह किसी संकेत को पहचान लेता है। यानी बाहर सब कुछ साफ़ न होने पर भी भीतर कोई ऐसी चेतना सक्रिय रहती है जो दिशा का अंदाज़ देती है।

‘चेतना के पूर्व संबंधित किसी उद्देश्य को / भावी किसी संभावना से बाँधता सा?’ इन पंक्तियों में कवि अपने भीतर की उस क्षमता को देखता है जो वर्तमान को अतीत और भविष्य से जोड़ती है। चेतना केवल वर्तमान के क्षण में नहीं रहती। वह पहले से जुड़ी किसी बात को याद करती है और उसे आने वाली किसी संभावना के साथ जोड़ देती है। इस तरह मनुष्य का जीवन सिर्फ़ वर्तमान तक सीमित  नहीं रह जाता। उसमें स्मृति भी रहती है और आगे की उम्मीद भी।

इसके बाद कविता का दृश्य अचानक फैल जाता है। ‘स्याह अंबर में छिपी आलोक की गंगा कहीं / हर रात तारों से टपकती अनवरत’ – यहाँ रात और प्रकाश का संबंध बहुत सुंदर ढंग से सामने आता है। आकाश काला है, लेकिन उसी अँधेरे में प्रकाश की एक धारा छिपी हुई है। तारे उस प्रकाश को बूंद बूंद नीचे लाते हुए दिखाई देते हैं। कवि अँधेरे को केवल नकारात्मक स्थिति की तरह नहीं देखता। उसके भीतर प्रकाश की संभावना भी मौजूद है। यह बात कविता के पूरे भाव को समझने में मदद करती है।

यहाँ ‘आलोक की गंगा’ सिर्फ़ सुंदर बिंब नहीं है। यह आदमी के भीतर की रोशनी का भी संकेत बन जाती है। रात आती है, अँधेरा फैलता है, फिर भी तारों की रोशनी बनी रहती है। इसी तरह जीवन में भ्रम, दुख और अनिश्चितता आती रहती है, लेकिन आदमी के भीतर समझने और आगे बढ़ने की इच्छा बनी रहती है। कवि इसी छोटी सी रोशनी को पकड़ना चाहता है।

अगली पंक्तियों में यह प्रकाश बाहरी दुनिया से मन के भीतर आ जाता है। ‘नींद के परिवेश में भी सजग रहती / चेतना की, स्वप्न बन, कोई परत।’ यहाँ नींद और सजगता साथ आती हैं। अमूमन नींद को हम बेख़बरी से जोड़ते हैं, लेकिन कवि बताता है कि नींद में भी चेतना पूरी तरह ग़ायब नहीं होती। उसका कोई हिस्सा स्वप्न बनकर काम करता रहता है। इसीलिए स्वप्न यहाँ केवल कल्पना नहीं है। वह मन के भीतर चल रही उस प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें मनुष्य अपने अनुभवों को नए रूप में देखता है।

‘कौन तमग्राही कठिन बेहोशियों में / भोर का संदेश भर जाता?’ यह सवाल कविता को और गहराई देता है। ‘तमग्राही’ वह है जो अँधेरे को ग्रहण करता है। लेकिन वही कठिन बेहोशी के बीच भोर का संदेश भी भर देता है। कवि यहाँ पूछ रहा है कि हमारे भीतर वह कौन सी शक्ति है जो सबसे गहरे अँधेरे में भी सुबह की ख़बर बचाए रखती है। उसका कोई निश्चित नाम नहीं है। वह चेतना हो सकती है, स्मृति हो सकती है, उम्मीद हो सकती है या जीवन को फिर से शुरू करने की मनुष्य की इच्छा हो सकती है।

इसके बाद कविता का सबसे सुंदर बिंब सामने आता है, ‘कौन मिट्टी का अँधेरा गुदगुदा कर / फूल के दीपक जलाता?’ मिट्टी के भीतर छिपा अँधेरा यहाँ किसी बंद और निष्क्रिय चीज की तरह नहीं रहता। कोई उसे ‘गुदगुदाता’ है और उसी से फूल निकलते हैं। फिर फूल ‘दीपक’ बन जाते हैं। यह बिंब जीवन की रचनात्मक शक्ति को बहुत सहज तरीके से सामने रखता है। अँधेरी मिट्टी से फूल निकलना अपने आप में एक बड़ा संकेत है। जीवन कई बार ऐसी जगह से कुछ नया पैदा करता है जहाँ हमें कुछ दिखाई नहीं देता।

‘गुदगुदाना’ शब्द भी ध्यान खींचता है। कवि ने यहाँ कोई भारी भरकम शब्द नहीं चुना। उसने एक घरेलू और शरीर से जुड़ा शब्द लिया है। इससे मिट्टी और फूल के बीच एक आत्मीय रिश्ता बनता है। जैसे कोई सोई हुई चीज़ को हल्के से छूकर जगा दे। मिट्टी के भीतर जीवन पहले से मौजूद है। कोई उसे जगाता है। यही प्रक्रिया मनुष्य की चेतना में भी चलती है। भीतर कोई अनुभव, स्मृति या उम्मीद हमें छूती है और हम फिर से जागने लगते हैं।

इसके बाद कवि फिर वही सवाल दोहराता है, ‘क्या यही हूँ मैं!’ लेकिन अब इस सवाल का अर्थ बदल चुका है। शुरुआत में कवि अँधेरे में किसी संकेत को पहचानने वाले व्यक्ति की तलाश कर रहा था। अब वह उस व्यक्ति को देख रहा है जो क्षितिज से क्षितिज तक जागता है। ‘उजागर इस क्षितिज से उस क्षितिज तक जागता सा?’ – यहाँ ‘जागना’ सिर्फ़ नींद से बाहर आने का नाम नहीं है। यह ज़िन्दगी और दुनिया के प्रति लगातार सजग रहने की स्थिति है।

क्षितिज भी यहाँ ख़ास अर्थ रखता है। एक क्षितिज के बाद दूसरा क्षितिज दिखाई देता है। मनुष्य की चेतना भी इसी तरह एक सीमा से दूसरी सीमा तक जाती रहती है। वह किसी एक जगह रुक नहीं जाती। वह लगातार नए अनुभवों, सवालों और संभावनाओं की ओर बढ़ती है। इसलिए कविता का ‘मैं’ अपने भीतर बंद व्यक्ति नहीं है। वह दुनिया से जुड़ा हुआ है और अपनी चेतना को लगातार फैलाता है।

अंतिम दो पंक्तियाँ पूरी कविता को एक बड़े समय के अनुभव से जोड़ देती हैं, – ‘एक क्षण की सिद्ध, प्रामाणिक, परिष्कृत चेतना से / युग युगों को माँजता सा?’ यहाँ एक क्षण और युग युगों के बीच संबंध बनता है। मनुष्य कभी-कभी किसी एक क्षण में ऐसी साफ़ समझ हासिल करता है जो उसकी ज़िन्दगी को बदल देती है। कवि उसी क्षण की चेतना को बहुत बड़े समय से जोड़ता है।

‘माँजना’ शब्द यहाँ ख़ास तौर पर ध्यान देने योग्य है। कवि यह नहीं कहता कि वह युगों को बदल देता है या उन्हें जीत लेता है। वह उन्हें ‘माँजता’ है। माँजने में धीरे धीरे साफ़ करने का भाव है। जैसे किसी धातु पर जमी मैल को रगड़कर हटाया जाता है। इस तरह कविता मनुष्य की चेतना को किसी बड़ी घोषणा की तरह नहीं, बल्कि लगातार चलने वाली एक सफाई की प्रक्रिया की तरह देखती है। एक साफ़ और सच्चा अनुभव पुराने समय की धूल को थोड़ा हटा सकता है।

इस पूरी कविता में अँधेरा और रोशनी बार बार एक दूसरे के सामने आते हैं। लेकिन कवि अँधेरे को पूरी तरह मिटाता नहीं है। अँधेरा बना रहता है। उसी में तारे चमकते हैं, सपने आते हैं, भोर का संदेश पहुँचता है और मिट्टी से फूल खिलते हैं। इसलिए कविता का आशावाद बहुत सीधा और सरल नहीं है। कवि यह नहीं कहता कि जीवन में अँधेरा नहीं है। उसका कहना है कि अँधेरे के भीतर भी रोशनी की कोई प्रक्रिया चलती रहती है।

कविता में नींद, स्वप्न, भोर, मिट्टी, फूल, दीपक, आकाश, तारे और क्षितिज जैसे बिंब मिलकर मनुष्य की चेतना का एक पूरा संसार रचते हैं। ये सभी चीजें बाहर की दुनिया से आती हैं, लेकिन कवि उन्हें भीतर के अनुभवों से जोड़ देता है। रात मन की उलझन बन जाती है। तारे भीतर की रोशनी का संकेत बन जाते हैं। स्वप्न चेतना की छिपी हुई हलचल को दिखाता है। भोर नई समझ की संभावना बनती है। मिट्टी मनुष्य की जड़ और ज़िन्दगी की शुरुआत से जुड़ती है। फूल उस जीवन का रूप लेते हैं जो अँधेरे से निकलता है।

कविता का ‘मैं’ इसलिए कोई तय पहचान नहीं है। वह सवाल करता है, पहचानता है, जोड़ता है, जागता है, स्वप्न देखता है और अँधेरे में रोशनी की तलाश करता है। वह अपने को किसी एक उत्तर में बंद नहीं करता। ‘क्या यही हूँ मैं!’ – की पुनरावृत्ति इसी वजह से ख़ास है। हर बार वही सवाल लौटता है, लेकिन हर बार उसके पीछे का अनुभव थोड़ा बदल जाता है। जैसे कवि अपने ही भीतर आगे बढ़ता जाता है और हर बार अपने बारे में कुछ नया देखता है।

इस अर्थ में ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ आत्मकथात्मक कविता होते हुए भी सिर्फ़ कवि के निजी जीवन की कविता नहीं रह जाती। यहाँ ‘मैं’ मनुष्य के व्यापक अनुभव का रूप ले लेता है। हर व्यक्ति कभी न कभी अँधेरे में किसी संकेत को खोजता है। हरेक आदमी  के भीतर स्मृति और संभावना के बीच कोई न कोई रिश्ता बनता है। नींद में भी मन चलता रहता है। कठिन समय में कोई छोटी सी उम्मीद बची रहती है। और कभी कोई ऐसा क्षण आता है जब हमें अपने बारे में या दुनिया के बारे में कुछ साफ़ दिखाई देता है।

कुँवर नारायण इस पूरी प्रक्रिया को किसी निष्कर्ष के साथ समाप्त नहीं करते। वे फिर सवाल पर लौटते हैं। यही इस कविता की ख़ूबसूरती है। अपने को जानना यहाँ किसी अंतिम उत्तर तक पहुँचना नहीं है। अपने भीतर चल रही चेतना को पहचानते रहना ही शायद स्वयं को जानने की पहली शर्त है। कविता का ‘मैं’ इसी लगातार जागते हुए अनुभव में अपना रूप पाता है।

‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ को अगर ‘मैं’ की खोज और आत्म की बनती हुई पहचान के संदर्भ में पढ़ें, तो कविता का मूल सवाल केवल इतना नहीं रह जाता कि कवि ‘मैं’ के बारे में क्या कह रहा है। असली सवाल यह बनता है कि कवि अपने ‘मैं’ को पहचानने की कोशिश किस तरह करता है। कविता की शुरुआत ही ‘क्या यही हूँ मैं!’ से होती है। यह छोटा सा सवाल पूरी कविता को अपने भीतर बाँध लेता है। कवि अपने बारे में कोई सीधा दावा नहीं करता। वह यह नहीं कहता कि ‘मैं यही हूँ।’ वह पूछता है, ‘क्या यही हूँ मैं!’ – इस फ़र्क को समझना कविता के अर्थ तक पहुँचने के लिए जरूरी है। ‘मैं’ यहाँ कोई पहले से तय पहचान नहीं है। वह एक खोज है।

यह खोज इसलिए भी दिलचस्प है कि कवि अपने ‘मैं’ को किसी एक गुण, भूमिका या परिचय से नहीं पहचानता। वह अपने को क्रियाओं के माध्यम से देखता है। वह अँधेरे में किसी संकेत को पहचानता है, किसी उद्देश्य को किसी भावी संभावना से जोड़ता है, नींद में भी सजग रहता है, भोर का संदेश पाता है, मिट्टी के अँधेरे में फूल के दीपक जलाता है, क्षितिज से क्षितिज तक जागता है और फिर एक क्षण की चेतना से युगों को माँजने की कोशिश करता है। यानी कवि का ‘मैं’ किसी एक स्थिर वस्तु की तरह सामने नहीं आता। वह अपने काम, अपनी चेतना और अपने अनुभवों में दिखाई देता है। इस अर्थ में कविता ‘मैं कौन हूँ?’ के सवाल को धीरे धीरे ‘मैं किस तरह होता हूँ?’ के सवाल में बदल देती है।

यहीं कविता का शीर्षक ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ बहुत अर्थवान हो जाता है। शीर्षक में ‘स्वयं’ और ‘अभिव्यक्तियाँ’ दो अलग शब्द नहीं हैं। दोनों शब्द मिलकर बताते हैं कि स्वयं अपने आप में बंद कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे हम एक बार पहचान लें और फिर उसके बारे में सब कुछ जान जाएँ। स्वयं अपनी अभिव्यक्तियों के ज़रिए सामने आता है। मनुष्य जैसा सोचता है, जैसा महसूस करता है, जैसा चुनता है, जिस तरह अँधेरे में संकेत पहचानता है और जिस तरह भविष्य की संभावना से अपने वर्तमान को जोड़ता है, इन सबके भीतर उसका ‘स्वयं’ दिखाई देता है। इसलिए इस कविता में आत्म की पहचान किसी आईने में अपना चेहरा देखने जैसी सीधी प्रक्रिया नहीं है। व्यक्ति अपने कामों और अनुभवों में अपने को पहचानता है।

‘वनसेल्फ़ ऐज़ अनदर’ (Oneself as Another – 1990) तथा ‘टाइम एंड नरेटिव’ (Time and Narrative – 3 खंडों में: 1983, 1984, 1985) में बहुविध विवेचित पॉल रिक्योर (Paul Ricœur) की ‘कथात्मक अस्मिता’ (Narrative Identity) की अवधारणा इस कविता को समझने में ख़ास मदद कर सकती  है। रिक्योर के अनुसार व्यक्ति अपनी पहचान को किसी एक स्थिर तथ्य के रूप में नहीं पाता। वह अपने जीवन के अनुभवों, घटनाओं, संबंधों, स्मृतियों और कर्मों को एक अर्थपूर्ण क्रम में जोड़कर अपने बारे में एक कथा बनाता है। आदमी अपनी ज़िन्दगी को समझते हुए ख़ुद को समझता है। उसके लिए पहचान केवल ‘मैं कौन हूँ’ का उत्तर नहीं है। उसमें यह भी शामिल है कि ‘मैं क्या करता हूँ’, ‘मैं किन अनुभवों से गुजरा हूँ’, ‘मैं किन चीजों को महत्त्व देता हूँ’ और ‘मैं अपने जीवन को किस अर्थ में देखता हूँ।’

कुँवर नारायण की कविता में भी ‘मैं’ अपनी कोई परिभाषा नहीं देता। वह अपने होने की अलग अलग अवस्थाएँ सामने रखता है। ‘अँधेरे में किसी संकेत को पहिचानता सा’ कहना अपने बारे में एक व्यवहार बताना है। ‘चेतना के पूर्व संबंधित किसी उद्देश्य को / भावी किसी संभावना से बाँधता सा’ कहना उसके सोचने के ढंग को सामने लाता है। ‘क्षितिज से उस क्षितिज तक जागता सा’ उसके अस्तित्व की एक और अवस्था को दिखाता है। इस तरह कविता ‘मैं’ को एक कथा की तरह बनाती है, लेकिन यह कथा घटनाओं की सीधी कहानी नहीं है। यह चेतना की कहानी है।

यहाँ एक और बात खास तौर से ध्यान देने योग्य है। कविता में ‘मैं’ अपने बारे में बोलते हुए भी ख़ुद को पूरी तरह पकड़ नहीं पाता। ‘क्या यही हूँ मैं!’ में जो ‘यही’ है, वह बहुत कुछ अपने भीतर छिपाए हुए है। सवाल है कि ‘यही’ आखिर किसकी ओर संकेत करता है? क्या वह संकेत पहचानने वाला व्यक्ति है? क्या वह भविष्य की संभावना को महसूस करने वाला व्यक्ति है? क्या वह सोते हुए भी जागता हुआ व्यक्ति है? क्या वह मिट्टी के अँधेरे में फूल का दीपक जलाने वाली रचनात्मक चेतना है? या वह व्यक्ति है जो एक क्षण की चेतना से युगों को माँजना चाहता है? कविता इन सभी को ‘मैं’ के अलग अलग रूपों की तरह सामने रखती है।

इसलिए यहाँ आत्म की पहचान एकवचन होते हुए भी बहुवचन है। ‘मैं’ एक है, लेकिन उसकी अभिव्यक्तियाँ अनेक हैं। यही बात शीर्षक में भी छिपी है। ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ में ‘अभिव्यक्तियाँ’ बहुवचन है। इसका मतलब यह हो सकता है कि ‘स्वयं’ किसी एक रूप में पूरा व्यक्त नहीं होता। वह अलग अलग अनुभवों, संवेदनाओं और चेतना की अवस्थाओं में अपने को प्रकट करता है। इसीलिए कविता में ‘मैं’ को किसी एक अंतिम पहचान में बाँधना उसके अर्थ को छोटा कर देगा।

जर्मन दार्शनिक एडमण्ड हुसर्ल (Edmund Husserl) के चेतना संबंधी चिन्तन के मद्देनज़र इस बात को और स्पष्ट किया जा सकता है। हुसर्ल के लिए चेतना हमेशा किसी चीज़ की ओर उन्मुख रहती है। चेतना अपने आप में ख़ाली नहीं रह्ती। वह किसी वस्तु, अनुभव, स्मृति, इच्छा, संभावना या अर्थ की ओर जाती है। कुँवर नारायण के यहाँ भी चेतना लगातार किसी दिशा में बढ़ती हुई दिखाई देती है। वह संकेत की ओर जाती है। उद्देश्य और संभावना के बीच संबंध बनाती है। स्वप्न के भीतर सक्रिय रहती है। भोर की ओर देखती है। क्षितिज से दूसरे क्षितिज तक जाती है।

इसलिए कविता का ‘मैं’ सिर्फ़ ‘आत्म’ तक सीमित नहीं है। वह संबंधों में बनने वाला आत्म है। उसका होना किसी अकेली आंतरिक सत्ता में बंद नहीं है। वह अपने आसपास की दुनिया के साथ संबंध बनाकर खुद को पहचानता है। अँधेरा उसे संकेत देता है। रात उसके भीतर स्वप्न जगाती है। मिट्टी उसके भीतर सृजन की संभावना पैदा करती है। क्षितिज उसकी दृष्टि को विस्तार देता है। युग उसके सामने इतिहास की तरह खड़े होते हैं। इस तरह ‘मैं’ और दुनिया एक दूसरे से अलग नहीं रहते।

यहाँ आधुनिक दर्शनशास्त्र के जनक खे जाने वाले डेकार्त (René Descartes) का ‘मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ’ वाला सूत्र भी एक उपयोगी परिप्रेक्ष्य प्रदान कर सकता है। उनकी मूल स्थापना सर्वव्यापी संदेह (Methodological Doubt) के माध्यम से एक ऐसे अंतिम सत्य की खोज की बात करती है, जिस पर कभी संदेह न किया जा सके। डेकार्त ने कहा कि हम अपनी इंद्रियों, सपनों, यहाँ तक कि गणितीय नियमों पर भी संदेह कर सकते हैं क्योंकि इंद्रियाँ हमें धोखा दे सकती हैं। लेकिन जब मैं हर चीज़ पर संदेह कर रहा होता हूँ, तब भी एक चीज़ ऐसी है जिस पर संदेह नहीं किया जा सकता—यह कि मैं संदेह कर रहा हूँ।इस प्रकार संदेह करना सोचने की एक क्रिया है। यदि मैं सोच रहा हूँ, तो मेरा अस्तित्व निश्चित रूप से होना ही चाहिए। इसी से उनका सूत्र बना: ‘मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ’ (I think, therefore I am) ।

दूसरे शब्दों में डेकार्त के यहाँ सोचने वाला ‘मैं’ परम निश्चितता का आधार बनता है—जहाँ संदेह करने वाला आत्म ही अपने अस्तित्व की पुष्टि कर देता है। इसके विपरीत, कुँवर नारायण की कविता का ‘मैं’ किसी बनी-बनाई निश्चितता को स्वीकार नहीं करता; वह आधुनिक संशयों, संबंधों और जीवन की जटिलताओं के बीच अपनी पहचान को लगातार खोजता और रचता है। वह कहता है, ‘क्या यही हूँ मैं!’ यानी सोचने और अनुभव करने के बाद भी वह अपने अस्तित्व को एक प्रश्न की तरह रखता है। इस अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है। कविता का आत्म डेकार्त के निश्चित आत्म की तरह ख़ुद को अंतिम रूप से स्थापित नहीं करता। वह अपनी पहचान को लगातार जाँचता-परखता रहता है।

यहीं से कविता आधुनिक आत्मचेतना के करीब आती है। आधुनिक मनुष्य के सामने समस्या सिर्फ़ यह नहीं है कि वह कौन है। समस्या यह भी है कि वह अपने बारे में जो मानता है, वह कितना स्थिर है। व्यक्ति की पहचान समय के साथ बदलती है। उसके अनुभव बदलते हैं। उसकी इच्छाएँ बदलती हैं। उसके संबंध बदलते हैं। उसकी दुनिया बदलती है। इसलिए उसका ‘मैं’ भी बदलता है। कुँवर नारायण इस बदलते हुए आत्म को किसी सामाजिक नारे में नहीं बदलते, बल्कि उसे एक शांत, आत्मसंवादी प्रश्न में बदल देते हैं। यह प्रक्रिया सार्त्र के अस्तित्ववाद की याद दिलाती है, जहाँ मनुष्य की अस्मिता पहले से तय न होकर उसके चयन और अस्तित्व के साथ निरंतर निर्मित होती है।

सार्त्र के अनुसार मनुष्य की कोई ऐसी पहले से तय ‘सार’ वाली पहचान नहीं है जो उसके अस्तित्व को पूरी तरह निर्धारित कर दे। व्यक्ति अपने चुनावों और कर्मों के ज़रिए अपने को बनाता है। कुँवर नारायण की कविता इससे पूरी तरह एक जैसी बात नहीं कहती, लेकिन उसमें एक समान तनाव जरूर दिखाई देता है। कवि अपने ‘मैं’ को किसी पहले से तय परिभाषा के तहत नहीं पहचानता। वह अपने अनुभवों और क्रियाओं के ज़रिए उसकी पहचान खोजता है। यानी ‘मैं’ कोई तैयार चीज़ नहीं, बनने वाली चीज़ है।

लेकिन कविता का ‘मैं’ केवल चुनाव करने वाला अस्तित्ववादी व्यक्ति भी नहीं है। उसमें भविष्य की संभावना, स्वप्न, रचनात्मकता और इतिहास भी शामिल हैं। इसलिए उसे सिर्फ़ सार्त्र के ‘अस्तित्व’ के भीतर रख देना कविता को सीमित कर देगा। कुँवर नारायण के यहाँ व्यक्ति का आत्मबोध अधिक खुला हुआ है। वह अपने निजी अस्तित्व से निकलकर व्यापक समय और मानवीय अनुभव तक जाता है।

कविता में ‘क्या यही हूँ मैं!’ की पुनरावृत्ति भी इसी बनने वाली पहचान को मजबूत करती है। पहली बार यह सवाल तब आता है जब कवि अँधेरे में संकेत पहचानने वाले अपने रूप को देखता है। बाद में वही सवाल फिर खड़ा होता है जब वह क्षितिज से क्षितिज तक जागने की स्थिति में दिखाई देता है। यानी सवाल वही है, लेकिन उसके बीच का अनुभव बदल चुका है। इस तरह कविता की संरचना खुद आत्म की विकास-यात्रा बन जाती है। हर बार ‘मैं’ अपने किसी नए रूप के सामने खड़ा होता है और पूछता है, क्या यही मैं हूँ?

यहाँ ‘यही’ शब्द भी उल्लेखनीय है। अगर कवि कहता, ‘मैं कौन हूँ?’ तो सवाल अधिक खुला होता। लेकिन वह कहता है, ‘क्या यही हूँ मैं!’ यानी वह अपने सामने किसी एक दिखाई पड़ते रूप को रखकर पूछता है कि क्या मेरी पहचान इतनी ही है। यह सवाल आत्म की सीमाओं को पहचानने का सवाल भी बन जाता है। जो कुछ अभी दिखाई दे रहा है, क्या मैं केवल उतना ही हूँ? शायद नहीं। कविता हर बार ‘मैं’ को एक रूप देती है और फिर उसे अगले रूप की ओर ले जाती है।

यहीं शीर्षक और कविता का रिश्ता और स्पष्ट होता है। ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ कहने का अर्थ यह नहीं कि कवि स्वयं को पूरी तरह व्यक्त कर चुका है। बल्कि अर्थ इसके उलट भी हो सकता है। स्वयं जितनी बार व्यक्त होता है, उतने ही नए रूप सामने आते हैं। एक अभिव्यक्ति दूसरी अभिव्यक्ति को जन्म देती है। एक अनुभव अगले अनुभव की ओर ले जाता है। इसलिए कविता स्वयं की पूर्ण परिभाषा नहीं देती। वह स्वयं के खुलते जाने की प्रक्रिया को व्यक्त करती है।

इस संदर्भ में रिक्योर की ‘कथात्मक अस्मिता’के साथ ‘हर्मेन्युटिक्स’ यानी व्याख्याशास्त्र भी जोड़ा जा सकता है। व्यक्ति अपने जीवन को समझते हुए अपने को समझता है, लेकिन जीवन का अर्थ भी वह बाद में जाकर समझ पाता है। किसी अनुभव का अर्थ उस समय कुछ और हो सकता है और बाद में उसे देखने पर कुछ और खुल सकता है। कुँवर नारायण की कविता में भी ‘मैं’ अपने वर्तमान को किसी भविष्य की संभावना से जोड़ता है। इसका मतलब है कि वर्तमान का अर्थ भविष्य की ओर खुला हुआ है। व्यक्ति अपने को पूरी तरह अभी नहीं जान सकता।

इस दृष्टि से ‘स्वयं’ एक खुली हुई प्रक्रिया है। उसमें स्मृति है, लेकिन सिर्फ़ स्मृति नहीं है। उसमें वर्तमान है, लेकिन केवल वर्तमान नहीं है। उसमें भविष्य की संभावना भी है। इसीलिए कविता का ‘मैं’ समय के तीनों स्तरों के बीच चलता है। वह पीछे से कुछ ग्रहण करता है, वर्तमान में उसे पहचानता है और भविष्य की ओर किसी संभावना से जोड़ता है। आत्म की पहचान इस पूरे समयगत अनुभव से बनती है।

यहीं कविता का दार्शनिक स्वर सामाजिक अर्थ भी ग्रहण करता है। यदि ‘मैं’ लगातार बनता है, तो व्यक्ति की पहचान केवल निजी और जन्म से मिली हुई चीज़ नहीं रह जाती। समाज, इतिहास, भाषा और अनुभव भी उसे आकार देते हैं। कविता में समाज का सीधा चित्र नहीं है, लेकिन ‘युग युगों’ तक पहुँचने वाला ‘मैं’ अपने को इतिहास से अलग नहीं रख सकता। वह अपने समय का अनुभव लेकर ही व्यापक समय की ओर जाता है।

इसलिए ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ को केवल आत्मकेंद्रित कविता मानना ठीक नहीं होगा। यहाँ आत्म की खोज धीरे धीरे मनुष्य की स्थिति की खोज बन जाती है। कवि अपने बारे में पूछते हुए उस हर व्यक्ति की ओर पहुँचता है जो अपने अस्तित्व को किसी अंतिम उत्तर में बंद नहीं करना चाहता।

कविता की सबसे बड़ी ख़ासियत शायद यही है कि यह ‘मैं’ को किसी निष्कर्ष में बंद नहीं करती। शुरुआत में सवाल है और अंत में भी सवाल की छाया बनी रहती है। कवि अपने बारे में कोई प्रमाणपत्र नहीं देता। वह अपने भीतर चल रही प्रक्रिया को सामने रखता है। इसीलिए यहाँ आत्मज्ञान का अर्थ अपने बारे में अंतिम सत्य जान लेने के बजाय अपने भीतर चल रहे बदलाव, सवाल, संभावना और चेतना को पहचानते रहना है।

इस तरह ‘क्या यही हूँ मैं!’ कविता का केवल एक प्रश्न नहीं रह जाता। वह पूरी कविता की रचना पद्धति बन जाता है। कवि अपने ‘मैं’ को देखता है, उस पर संदेह करता है, उसके अलग अलग रूपों को पहचानता है और फिर भी उसे पूरी तरह निश्चित नहीं करता। यही अनिश्चितता कविता की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत है। इससे ‘स्वयं’ किसी जड़ पहचान की जगह एक जीवित प्रक्रिया बन जाता है।

वस्तुत: कुँवर नारायण के यहाँ ‘मैं’ न तो पूरी तरह भीतर बंद कोई निजी आत्म है, न ही कोई ऐसा स्थिर व्यक्तित्व जिसे एक परिभाषा में बाँधा जा सके। वह अनुभव, चेतना, भाषा, स्मृति, संभावना और समय के बीच लगातार बनता हुआ आत्म है। ‘स्वयं’ अपनी अभिव्यक्तियों में सामने आता है और हर अभिव्यक्ति के बाद फिर कुछ अनकहा बच जाता है। इसलिए ‘क्या यही हूँ मैं!’ का सबसे अर्थवान उत्तर शायद कोई निश्चित ‘हाँ’ या ‘नहीं’ नहीं है। कविता ख़ुद इस सवाल को ज़िन्दा रखती है। यही जीवित सवाल उसके ‘स्वयं’ को लगातार बनने और अभिव्यक्त होने की जगह देता है।

विवेच्य कविता को समझने का एक दूसरा रास्ता कविता की भाषा और चेतना के उस हिस्से से होकर जाता है जो हमेशा साफ़ दिखाई नहीं देता। इस दृष्टि से ‘सा’ का बार बार आना और ‘चेतना के पूर्व संबंधित किसी उद्देश्य’ जैसी पंक्ति एक दूसरे से जुड़ जाती हैं। एक ओर भाषा ‘मैं’ को लेकर पूरी निश्चितता से बचती है। दूसरी ओर कविता यह संकेत देती है कि मनुष्य के भीतर कुछ ऐसी प्रक्रियाएँ चलती रहती हैं जिन्हें वह खुद भी पूरी तरह नहीं पकड़ पाता। इस तरह कविता अपने ‘मैं’ को न तो पूरी तरह निश्चित करती है और न ही पूरी तरह अनजाना छोड़ देती है।

‘पहिचानता सा’, ‘बाँधता सा’, ‘जागता सा’ और ‘माँजता सा’ में ‘सा’ को सिर्फ़ भाषा की सजावट मानना ठीक न होगा। यह छोटा सा शब्द कविता के पूरे आत्मबोध को बदल देता है। अगर कवि कहता, ‘मैं अँधेरे में किसी संकेत को पहचानता हूँ’, तो कथन सीधा और निश्चित होता। उसमें अपने अनुभव को लेकर कोई झिझक नहीं रहती। लेकिन कवि कहता है, ‘पहिचानता सा’। यहाँ अनुभव और उसके बारे में कवि की समझ के बीच थोड़ी दूरी बन जाती है। कवि जैसे अपने ही भीतर चल रही किसी क्रिया को बाहर से देख रहा हो।

यही बात ‘बाँधता सा’ में भी है। कवि यह नहीं कहता कि वह किसी उद्देश्य को किसी भावी संभावना से निश्चित रूप से बाँध देता है। वह कहता है, ‘बाँधता सा’। यानी उसे ऐसा लगता है कि चेतना शायद ऐसा करती है। इसी तरह ‘जागता सा’ में जागना भी पूरी तरह निश्चित स्थिति नहीं है। और ‘माँजता सा’ में तो यह अनिश्चितता और गहरी हो जाती है। क्या एक क्षण की चेतना सचमुच युगों को माँज सकती है? कवि इसका दावा नहीं करता। वह सिर्फ़ ख़ुद को उस दिशा में जाता हुआ महसूस करता है।

इस ‘सा’ में एक तरह की विनम्रता भी है। कवि अपने अनुभव को अंतिम सत्य की तरह सामने नहीं रखता। वह अपने बारे में फ़ैसला सुनाने के बजाय संभावना खुली रखता है। यही वजह है कि ‘क्या यही हूँ मैं!’ का सवाल और ‘सा’ का इस्तेमाल एक दूसरे को मजबूत करते हैं। सवाल कहता है कि कवि अपने ‘मैं’ को पूरी तरह निश्चित नहीं मानता और ‘सा’ उसी अनिश्चितता को भाषा में जगह देता है।

यहाँ कविता की भाषा उसके विचार को केवल बताती नहीं, बल्कि उसे निभाती भी है। अगर कविता आत्म की अनिश्चितता की बात करती और भाषा में हर बात को पक्के ढंग से कहती, तो दोनों के बीच दूरी बन जाती। लेकिन यहाँ व्याकरण और विचार एक साथ चलते हैं। कवि अपने ‘मैं’ के बारे में बोलता भी है और बोलते हुए उससे थोड़ा पीछे भी हटता है। यही पीछे हटना उसे अपने को देखने की जगह देता है।

इस बात को शैलीविज्ञान के स्तर पर देखें तो ‘सा’ कविता में एक ख़ास तरह की अर्थगत ढील पैदा करता है। वह कथन को पूरी तरह नकारता नहीं, लेकिन उसे अंतिम भी नहीं होने देता। ‘पहिचानता सा’ का अर्थ यह नहीं कि कवि पहचानता ही नहीं। बल्कि वह पहचानने की प्रक्रिया में है और उसे पूरी तरह निश्चित रूप में पकड़ नहीं पा रहा। इसी तरह ‘जागता सा’ का अर्थ यह नहीं कि वह सो रहा है। वह जागने और जागे होने के बीच की किसी स्थिति में है। ‘माँजता सा’ भी किसी पूरे हो चुके काम की घोषणा नहीं करता। वह एक चलती हुई कोशिश का संकेत देता है।

इस तरह ‘सा’ कविता में प्रक्रिया का भाव पैदा करता है। ‘मैं’ कोई तैयार अवस्था नहीं है। वह कुछ करता हुआ, कुछ समझता हुआ, कुछ खोजता हुआ ‘मैं’ है। यह बात कविता के शीर्षक ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ से भी जुड़ती है। ‘स्वयं’ एक बार में पूरी तरह व्यक्त नहीं होता। वह अपनी अलग अलग अवस्थाओं में सामने आता है। कभी वह संकेत पहचानता है, कभी भविष्य से जुड़ता है, कभी नींद में जागता है और कभी इतिहास को माँजने की कोशिश करता है।

यहीं से कविता चेतना के दूसरे, कम दिखाई देने वाले हिस्से की ओर जाती है। ‘चेतना के पूर्व संबंधित किसी उद्देश्य को / भावी किसी संभावना से बाँधता सा?’ – पंक्ति को ध्यान से पढ़ें तो कवि चेतना को केवल उस चीज़ के रूप में नहीं देखता जिसे हम इस समय साफ़ साफ़ सोच रहे हैं। वह चेतना के भीतर पहले से मौजूद किसी उद्देश्य की बात करता है और उसे भविष्य की संभावना से जोड़ता है। यानी मनुष्य के भीतर कुछ ऐसा भी रहता है जो अभी पूरी तरह सामने नहीं आया, लेकिन उसके सोचने और आगे बढ़ने को प्रभावित करता है।

यहाँ ‘पूर्व संबंधित’ शब्द भी गौर करने लायक है। इसका संकेत यह हो सकता है कि चेतना में किसी उद्देश्य का संबंध पहले से मौजूद है। व्यक्ति जब किसी भविष्य की संभावना के बारे में सोचता है, तो वह शून्य से शुरू नहीं करता। उसके भीतर पहले से जमा अनुभव, इच्छाएँ, संस्कार, स्मृतियाँ और अधूरे काम उस संभावना को आकार देते हैं। इस तरह वर्तमान चेतना के पीछे एक ऐसा मानसिक संसार काम करता रहता है जिसे व्यक्ति हमेशा साफ़ शब्दों में पहचान नहीं पाता।

प्रसंगवश फ्रायड की मदद से एक और रास्ता खुलता प्रतीत होता है। फ्रायड ने मन को केवल चेतन हिस्से तक सीमित नहीं माना। उनके अनुसार हमारी इच्छाओं, स्मृतियों और दबे हुए अनुभवों का एक हिस्सा ऐसा भी रहता है जो सीधे चेतना में मौजूद नहीं होता, फिर भी हमारे व्यवहार और सोच पर असर डाल सकता है। कविता को फ्रायड के ज़रिए पढ़ते समय यह पूछा जा सकता है कि क्या ‘चेतना के पूर्व’ वाला क्षेत्र मन के उसी छिपे हुए हिस्से की ओर संकेत करता है।

लेकिन यहाँ सावधानी जरूरी है। कविता को फ्रायड की किसी अवधारणा का उदाहरण बना देना ठीक नहीं होगा। कुँवर नारायण ने कविता में मनोविश्लेषण की कोई वैज्ञानिक या मनोवैज्ञानिक व्याख्या का उदाहरण देने की कोशिश नहीं की है। कविता का क्षेत्र अलग है। फिर भी फ्रायड की अवधारणा हमें यह समझने में मदद कर सकती हैं कि मनुष्य अपने ही भीतर चलने वाली हर प्रक्रिया से परिचित नहीं होता। कुछ चीजें हमारे सोचने से पहले ही हमारे सोचने को दिशा दे सकती हैं।

युंग (Carl Gustav Jung) की ओर जाएँ तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। युंग के सामूहिक अवचेतन में मनुष्य के भीतर ऐसे गहरे मानसिक ढाँचे होते हैं जो केवल व्यक्तिगत अनुभव से नहीं बनते। मिथक, प्रतीक और आदिम छवियाँ इस स्तर पर काम करती हैं। कुँवर नारायण की कविता में ‘भोर’, ‘मिट्टी’, ‘फूल’, ‘दीपक’, ‘आकाश’ और ‘क्षितिज’ जैसे बिंब मौजूद हैं। इन्हें युंग के चिन्तन के तहत पढ़ते हुए यह देखा जा सकता है कि कुछ प्रतीक व्यक्ति के निजी अनुभव से आगे जाकर व्यापक मानवीय अनुभव से जुड़ सकते हैं।

फिर भी युंग और कविता के बीच सीधा संबंध बिठाना उचित नहीं होगा। कविता में ‘मिट्टी’ या ‘भोर’ का अर्थ केवल सामूहिक अचेतन से तय नहीं होता। उनका अर्थ कविता के पूरे संदर्भ से बनता है। युंग का चितन यहाँ एक आलोचनात्मक औजार की तरह काम कर सकता है, अंतिम उत्तर की तरह नहीं।

हुसर्ल (Edmund Husserl) का रास्ता इन दोनों से अलग है। उनका ज़ोर अचेतन पर नहीं, चेतना और उसके अनुभव पर है। हुसर्ल के अनुसार चेतना हमेशा किसी चीज़ की ओर उन्मुख रहती है। वह किसी वस्तु, विचार, स्मृति, इच्छा या संभावना से जुड़ी होती है। कुँवर नारायण की कविता में भी चेतना लगातार किसी दिशा में जाती है। वह संकेत को पहचानती है। किसी उद्देश्य को संभावना से जोड़ती है। स्वप्न में कोई परत बनाती है। फिर क्षितिज से क्षितिज तक जागती हुई दिखाई देती है।

इसलिए हुसर्ल की मदद से कविता में चेतना को एक सक्रिय प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है। चेतना केवल भीतर बैठी हुई कोई चीज़ नहीं है। वह लगातार दुनिया से रिश्ता बनाती है। अँधेरा हो या आकाश, सपना हो या क्षितिज, चेतना किसी न किसी चीज़ की ओर जाती रहती है। इसीलिए कविता का ‘मैं’ सीमित आत्म नहीं है। वह अपने आसपास की दुनिया के साथ संबंध बनाते हुए ख़ुद को पहचानता है।

फ्रायड, युंग और हुसर्ल को साथ रखते हुए कविता का एक दिलचस्प तनाव सामने आता है। फ्रायड हमें मन के उस हिस्से की ओर ले जाते हैं जिसे व्यक्ति पूरी तरह नहीं जानता। युंग व्यक्तिगत मन से आगे जाकर सामूहिक मानसिक संरचनाओं और प्रतीकों की ओर देखते हैं। हुसर्ल हमें वापस अनुभव की जागरूक चेतना की ओर लाते हैं। कुँवर नारायण की कविता इन तीनों में से किसी एक को पूरी तरह स्वीकार नहीं करती। वह इतना ज़रूर दिखाती है कि मनुष्य का ‘मैं’ दिखाई देने वाले और छिपे हुए दोनों स्तरों से बनता है।

कविता में नींद और जागरण का साथ आना इसी वजह से ख़ास है। ‘नींद के परिवेश में भी सजग रहती / चेतना की, स्वप्न बन, कोई परत’ –  में कवि चेतना को केवल जागती हुई अवस्था तक सीमित नहीं रखता। नींद के भीतर भी कोई परत काम करती है। वह स्वप्न बन सकती है। वह किसी अनकहे अनुभव को सामने ला सकती है। यहाँ कविता मन के उस इलाक़े की ओर इशारा करती है जहाँ अनुभव सीधे विचार का रूप नहीं लेते, बल्कि स्वप्न, छवि या संकेत के रूप में सामने आते हैं।

यही बात ‘कौन तमग्राही कठिन बेहोशियों में / भोर का संदेश भर जाता?’ में और आगे बढ़ती है। ‘बेहोशी’ यहाँ पूरी तरह होश खो देना नहीं है। यह ऐसी अवस्था भी हो सकती है जहाँ व्यक्ति बाहर से निष्क्रिय दिखाई दे, लेकिन भीतर कोई प्रक्रिया चलती रहे। कविता पूछती है कि उस गहरी अवस्था में भोर का संदेश कौन भरता है। कवि कोई निश्चित उत्तर नहीं देता। इसीलिए यहाँ मनोविश्लेषण की संभावना खुलती है, लेकिन कविता किसी एक मनोवैज्ञानिक सिद्धांत का नमूना बन कर नहीं रह जाती।

इस पंक्ति को आत्म की गहरी रचनात्मक क्षमता के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। मनुष्य कभी-कभी तब भी किसी संभावना को बचाए रखता है जब उसकी जागती हुई चेतना उसे साफ़ तौर पर व्यक्त नहीं कर पाती। कोई सपना, कोई छवि या कोई हल्की सी इच्छा भीतर बनी रहती है। बाद में वही किसी नए विचार या काम का रूप ले सकती है। कविता इसी छिपी हुई प्रक्रिया को ‘भोर का संदेश’ कहती है।

‘मिट्टी का अँधेरा गुदगुदा कर / फूल के दीपक जलाता’ – इसी प्रक्रिया का अगला रूप है। मिट्टी के भीतर कुछ छिपा हुआ है। ऊपर से वह अँधेरी दिखाई देती है। लेकिन उसी के भीतर फूल की संभावना है। यह बिंब मनुष्य के भीतर छिपी रचनात्मक शक्ति को समझने का रास्ता खोलता है। चेतना हर चीज़ को सीधे और साफ़ रूप में नहीं जानती। कभी वह किसी गहरे, अनकहे अनुभव को छूती है और उससे कुछ नया अर्थ पैदा होता है।

इस पूरे संदर्भ में ‘सा’ का प्रयोग फिर अर्थवान हो जाता है। कवि इन मानसिक प्रक्रियाओं के बारे में भी कोई अंतिम दावा नहीं करता। वह यह नहीं कहता कि ‘मैं अपने भीतर यह सब पूरी तरह जानता हूँ।’ वह कहता है, ‘पहिचानता सा’, ‘बाँधता सा’, ‘जागता सा’। यानी आत्म अपने ही भीतर की प्रक्रिया को देखते हुए भी उसके बारे में पूरी तरह आश्वस्त नहीं है।

यही कविता की आधुनिकता है। आधुनिक आत्म अपने बारे में सब कुछ जानने का दावा नहीं करता। वह अपने भीतर की जटिलता को स्वीकार करता है। वह समझता है कि चेतना के भीतर भी कुछ ऐसा है जिसे वह पूरी तरह शब्दों में नहीं पकड़ सकता। कुँवर नारायण इस जटिलता को किसी भारी-भरकम दार्शनिक भाषा में नहीं व्यक्त करते। वे कुछ छोटे शब्दों से काम लेते हैं। ‘सा’ उन्हीं में से एक है।

यहाँ भाषा और मन के बीच का संबंध भी सामने आता है। मन में जो अनुभव होता है, भाषा उसे पूरी तरह पकड़ नहीं पाती। कवि इसी दूरी को बनाए रखता है। ‘सा’ उस दूरी का भाषिक चिह्न बन जाता है। अनुभव कुछ है, लेकिन शब्द उसे पूरी तरह पकड़ने के बजाय उसके आसपास घूमता है। इसीलिए कविता में आत्म की खोज किसी अंतिम परिभाषा तक नहीं पहुँचती।

बीसवीं सदी के सबसे प्रभावशाली दार्शनिकों में एक लुडविग विट्गेंश्टाइन (Ludwig Wittgenstein) के भाषा दर्शन से इसे एक अलग ढंग से समझा जा सकता है जिनका कहना था कि भाषा दुनिया का एक चित्र प्रस्तुत करती है। जो तथ्य हैं, उन्हें भाषा में कहा जा सकता है। लेकिन जीवन के सबसे गहरे सवाल—जैसे नैतिकता, सौंदर्य, ईश्वर, और ‘मैं‘ का असली अर्थ—इन्हें भाषा के तार्किक तर्कों में ‘कहा‘ (Say) नहीं जा सकता, इन्हें केवल ‘दर्शाया‘ (Show) जा सकता है। कहना न होगा कि कुँवर नारायण जैसे गंभीर कवि विट्गेंश्टाइन के इस विचार के बहुत करीब हैं। वे जानते हैं कि ‘आत्म’ को किसी सीधे सामाजिक नारे या फॉर्मूले में नहीं बाँधा जा सकता, उसे केवल शांत, अप्रत्यक्ष और आत्मसंवादी कविता के माध्यम से ‘दर्शाया’ जा सकता है। निवेदन यह है कि हम अपने अनुभव को उसी सीमा तक व्यक्त कर पाते हैं जिस सीमा तक हमारी भाषा उसे रूप दे सकती है। भाषा केवल विचार को बाहर निकालने का माध्यम नहीं है। वह यह भी तय करती है कि हम अपने अनुभव को किस तरह समझ सकते हैं। कुँवर नारायण की कविता में ‘सा’ इसी सीमा और संभावना दोनों को सामने लाता है। वह कथन को खुला रखता है। वह कहता है कि अनुभव है, लेकिन उसका पूरा अर्थ अभी तय नहीं हुआ।

इसलिए कविता का ‘मैं’ अपने ही अनुभव का अंतिम व्याख्याकार नहीं है। वह अपने को समझने की कोशिश करता है। इस प्रक्रिया में भाषा उसका साधन भी है और उसकी सीमा भी। वह जितना कहता है, उतना ही कुछ अनकहा छोड़ देता है। फैज़ के शब्दों में ‘अनकही ही रह गयी वह बात सब बातों के बाद’।

यहीं ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ शीर्षक फिर सामने आता है। ‘स्वयं’ जब अभिव्यक्त होता है तो वह पूरा समाप्त नहीं हो जाता। एक अभिव्यक्ति के बाद दूसरी अभिव्यक्ति की ज़रूरत पड़ती है। व्यक्ति अपने को बार बार नए ढंग से पहचानता है। इसीलिए कविता में ‘मैं’ बार बार अलग रूप में आता है और हर बार उसके साथ ‘सा’ जुड़ जाता है।

इस दृष्टि से ‘सा’ केवल अनिश्चितता का संकेत नहीं है। वह खुलेपन का भी संकेत है। अगर कवि हर जगह निश्चित भाषा का इस्तेमाल करता, तो ‘मैं’ एक बंद पहचान बन जाता। ‘सा’ उसे खुला रखता है। इससे आत्म अपने भविष्य के लिए जगह बचाए रखता है। वह बदल सकता है। अपने बारे में नया जान सकता है। अपने पुराने अनुभव को नए अर्थ में देख सकता है।

इस तरह कविता में चेतना का संबंध भविष्य से भी जुड़ जाता है। मनुष्य अपने भीतर चल रही अस्पष्ट प्रक्रियाओं के साथ ही भविष्य की ओर बढ़ता है। वह अभी पूरी तरह नहीं जानता कि वह क्या बनेगा। फिर भी उसके भीतर कोई उद्देश्य, कोई इच्छा या कोई संभावना काम करती रहती है। इसलिए ‘मैं’ केवल वर्तमान का ‘मैं’ नहीं है। वह बनने वाला ‘मैं’ भी है।

इस परिप्रेक्ष्य में कविता का अस्तित्ववादी पक्ष भी उभरता है। अस्तित्ववादी चिंतन में व्यक्ति को अपने अस्तित्व का अर्थ खुद तलाशना पड़ता है। उसे कोई पूरी तरह तैयार उत्तर नहीं मिलता। कुँवर नारायण का ‘मैं’ भी तैयार उत्तर स्वीकार नहीं करता। वह अपने बारे में पूछता है और अपनी चेतना की अलग अलग परतों को पहचानता है। लेकिन उनका स्वर सार्त्र की बेचैनी से अलग है। यहाँ संघर्ष के साथ एक शांत जिज्ञासा भी है। कवि अपने भीतर झाँकता है, लेकिन अपने को किसी अंतिम निष्कर्ष में नहीं बाँधता।

इस पूरे पठन से एक बात साफ होती है कि कुँवर नारायण के यहाँ चेतना केवल जागरूक विचार नहीं है। वह अनुभव, स्मृति, स्वप्न, संकेत, संभावना और भाषा से मिलकर बनती है। उसका एक हिस्सा साफ दिखाई देता है। दूसरा हिस्सा धुँधला रहता है। तीसरा शायद अभी बना ही नहीं है। फिर भी ये सभी हिस्से मिलकर ‘मैं’ को आकार देते हैं।

इसलिए ‘पहिचानता सा’, ‘बाँधता सा’, ‘जागता सा’ और ‘माँजता सा’ को अलग अलग शब्दों की तरह देखने के बजाय उन्हें एक ही आत्मबोध की चार अवस्थाओं के रूप में पढ़ना अधिक सार्थक होगा। पहले ‘मैं’ किसी संकेत को पहचानने की कोशिश करता है। फिर वह अपने उद्देश्य को भविष्य से जोड़ता है। फिर वह अपनी चेतना की छिपी परतों के बीच जागता रहता है। अंत में वह अपने छोटे से अनुभव को बड़े समय से जोड़ने की कोशिश करता है। हर जगह ‘सा’ यह याद दिलाता रहता है कि यह यात्रा पूरी नहीं हुई है।

यही अधूरापन कविता को जीवंत रखता है। कवि अपने ‘मैं’ को पूरी तरह जान लेने का दावा नहीं करता। वह उसके बनने की प्रक्रिया को देखता है। चेतना के दिखाई देने वाले हिस्से और उसके भीतर छिपी हलचलों के बीच वह एक खुली जगह छोड़ता है। उसी जगह में कविता जन्म लेती है।

इस अर्थ में ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ आत्म की निश्चित परिभाषा की कविता नहीं, आत्म की खोज की कविता है। ‘सा’ इस खोज की भाषा है और ‘चेतना के पूर्व’ उसका गहरा मानसिक क्षेत्र। एक शब्द भाषा में अनिश्चितता पैदा करता है और दूसरी ओर कविता मन के उस हिस्से की ओर जाती है जहाँ अनुभव अभी पूरी तरह विचार नहीं बना। इन दोनों को साथ पढ़ने पर कुँवर नारायण का ‘मैं’ कहीं अधिक जटिल और मानवीय रूप में सामने आता है। वह ख़ुद को जानता भी है और ख़ुद से अनजान भी है। वह जागता भी है और अपने भीतर छिपी चीजों को स्वप्न में महसूस भी करता है। वह वर्तमान में रहता है, लेकिन उसके भीतर भविष्य की कोई संभावना पहले से काम करती रहती है। यही बनता हुआ, खुला और पूरी तरह तय न हुआ ‘मैं’ इस कविता की आत्मचेतना का मूल आधार है।

‘अँधेरे में किसी संकेत को पहिचानता सा?’ काव्य-पंक्ति पर गौर करने से कविता को समझने का एक और नया रास्ता खुलता है। यहाँ ‘संकेत’ को सिर्फ़ किसी छिपे हुए अर्थ की ओर इशारा करने वाली चीज मानना पर्याप्त नहीं होगा। इस पंक्ति में कवि यह भी पूछता है कि मनुष्य अँधेरे में अर्थ तक पहुँचता कैसे है। जब सामने की चीजें साफ़ नहीं हैं, तब वह किस आधार पर किसी छोटी सी आहट, छवि, रोशनी या अनुभव को अर्थपूर्ण मान लेता है? इस सवाल से कविता भाषा, अनुभव और अर्थ के रिश्ते की ओर जाती है।

यहाँ ‘अँधेरा’ भी केवल एक दृश्य स्थिति नहीं रह जाता। लेकिन पहले किए गए अँधेरे और प्रकाश के अर्थों को दोहराने के बजाय इस बार उसे ‘अर्थ की अनिश्चित जमीन’ की तरह देखना अधिक उपयोगी होगा। मनुष्य जिस दुनिया में रहता है, उसमें हर चीज़ का अर्थ पहले से साफ़ नहीं होता। वह संकेतों के बीच रहता है और उन्हें पढ़ता है। कई बार वह सही पढ़ता है, कई बार उसका अर्थ बदल जाता है और कई बार वह किसी ऐसी चीज में अर्थ देख लेता है जहाँ शायद कोई निश्चित अर्थ था ही नहीं। कविता इसी मानवीय स्थिति को बहुत कम शब्दों में सामने रखती है।

कविता में ‘किसी संकेत’ का इस्तेमाल भी ध्यान खींचता है। कवि ‘संकेत’ तो कहता है, लेकिन यह नहीं बताता कि वह संकेत किसका है। न उसका कोई रूप बताता है, न स्रोत। यही अनिश्चितता कविता को खुला रखती है। अगर कवि कह देता कि वह किसी तारे, किसी आवाज़ या किसी व्यक्ति के संकेत को पहचान रहा है, तो अर्थ की दिशा पहले ही तय हो जाती। लेकिन ‘किसी’ शब्द उस जगह को ख़ाली छोड़ देता है। पाठक उस रिक्त स्थान में अपने अर्थ भर सकता है।

यहीं सॉस्यूर के ‘संकेत सिद्धांत’ के तहत एक उपयोगी सवाल उठता है। सॉस्यूर के अनुसार संकेतक और संकेतित के बीच संबंध स्वाभाविक नहीं होता। किसी शब्द या ध्वनि का अर्थ अपने आप उसमें मौजूद नहीं रहता। उसका अर्थ भाषा की व्यवस्था और दूसरे संकेतों के साथ उसके संबंध से बनता है। विवेच्य कविता में ‘संकेत’ इसी तरह किसी एक तय अर्थ की ओर सीधे नहीं ले जाता। उसका अर्थ उसके आसपास के शब्दों और पूरे काव्य संदर्भ से बनता है।

‘अँधेरा’, ‘संकेत’, ‘चेतना’, ‘उद्देश्य’ और ‘संभावना’ को अलग अलग पढ़ने पर जितना अर्थ मिलता है, उन्हें साथ पढ़ने पर उससे अलग अर्थ बनता है। इसका मतलब है कि कविता में अर्थ किसी एक शब्द के भीतर बंद नहीं है। वह शब्दों के बीच बनता है। ‘संकेत’ तभी संकेत बनता है जब कोई चेतना उसे पहचानती है। यानी संकेत और उसे पढ़ने वाले व्यक्ति के बीच संबंध भी अर्थ निर्माण का हिस्सा है।

यहीं चार्ल्स सैंडर्स पियर्स (Charles Sanders Peirce) का संकेतशास्त्र कविता को समझने –समझाने के लिए उपयोगी हो सकता है। पियर्स के यहाँ ‘संकेत’ को समझने के लिए यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि कोई संकेत अपने आप में पूरा अर्थ नहीं रखता। वह किसी वस्तु, घटना, विचार या अनुभव की ओर हमारा ध्यान ले जाता है, लेकिन उसका अर्थ तब खुलता है जब कोई व्यक्ति उसे पहचानता और समझता है। मसलन, आकाश में काले बादल का दिखाई देना अपने आप में एक दृश्य है, लेकिन कोई व्यक्ति उसे देखकर बारिश की सम्भावना समझ सकता है। यहाँ बादल एक संकेत की तरह काम करता है और उससे ‘बारिश आने वाली है’ का अर्थ निकलता है। लेकिन अर्थ की प्रक्रिया यहीं समाप्त नहीं होती। बारिश की सम्भावना से व्यक्ति छाता लेने, घर लौटने या किसी यात्रा को रोकने के बारे में सोच सकता है। इस तरह एक संकेत से पैदा हुआ अर्थ आगे किसी नए विचार या संकेत से जुड़ जाता है। पियर्स इसी निरन्तर अर्थ-निर्माण की ओर ध्यान दिलाते हैं। हमारे सामने कोई संकेत आता है, हम उसकी व्याख्या करते हैं, और हमारी वह व्याख्या आगे किसी दूसरे अर्थ की सम्भावना खोल देती है। इसलिए संकेत का अर्थ किसी शब्दकोश में पहले से बन्द और स्थिर अर्थ की तरह नहीं रहता। वह व्यक्ति के अनुभव, परिस्थिति और समझ के साथ विकसित होता रहता है। इस दृष्टि से अर्थ कोई ऐसी चीज नहीं जिसे संकेत के भीतर से एक बार निकाल लिया जाए और फिर प्रक्रिया समाप्त हो जाए। अर्थ बनना, समझा जाना और आगे नए अर्थों से जुड़ना एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। यही कारण है कि चार्ल्स पियर्स के यहाँ संकेत को समझना केवल यह पूछना नहीं है कि ‘संकेत किस चीज की ओर इशारा करता है’, बल्कि यह देखना भी है कि वह संकेत हमारी चेतना में कौन-सा अर्थ पैदा करता है और वह अर्थ आगे किन नए अर्थों की सम्भावना खोलता है।

विवेच्य कविता में ‘किसी संकेत को पहचानना’ इसी तरह की प्रक्रिया की ओर संकेत करता हुआ पढ़ा जा सकता है। कवि को कोई चीज दिखाई देती है, लेकिन उसका अर्थ उसी क्षण पूरी तरह बंद नहीं हो जाता। पहचानना यहाँ केवल देख लेना नहीं है। पहचानना अर्थ बनाना भी है। इसलिए ‘संकेत’ और ‘चेतना’ को अलग करके नहीं समझा जा सकता।

यहाँ एक बारीक फ़र्क भी सामने आता है। क्या संकेत अपने भीतर अर्थ लेकर आता है और चेतना केवल उसे पहचानती है? या चेतना ही किसी अनुभव को संकेत का रूप देती है? कविता इस सवाल का कोई सीधा जवाब नहीं देती। यही उसकी ताकत है। वह दोनों संभावनाएँ खुली रखती है।

मान लीजिए रात में कोई दूर की रोशनी दिखाई देती है। वह सिर्फ़ रोशनी है। लेकिन किसी व्यक्ति के लिए वह घर लौटने का संकेत हो सकती है, किसी दूसरे के लिए ख़तरे का, और किसी तीसरे के लिए केवल एक दृश्य। वस्तु एक ही है, लेकिन उसका अर्थ देखने वाले के अनुभव से बदल जाता है। कविता का ‘संकेत’ इसी तरह अनुभव और अर्थ के बीच की दूरी को सामने लाता है।

इस नज़रिए से कविता को केवल ‘अर्थ की खोज’ की कविता कहना भी थोड़ा सीमित होगा। यह ‘अर्थ कैसे बनता है’ की कविता भी है। यह अंतर महत्वपूर्ण है। अर्थ कहीं बाहर रखा हुआ कोई तैयार उत्तर नहीं है जिसे कवि जाकर खोज ले। वह अनुभव, चेतना और भाषा के बीच बनता है।

ऐसे में कविता का सवालिया अंदाज़  महत्वपूर्ण हो जाता है। ‘क्या यही हूँ मैं!’ और ‘कौन तमग्राही कठिन बेहोशियों में / भोर का संदेश भर जाता?’ जैसे सवाल केवल जानकारी नहीं माँगते। वे अर्थ की प्रक्रिया को खुला रखते हैं। कविता उत्तर रोकती है ताकि पाठक खुद संबंध बनाए। वह पाठक को एक निश्चित निष्कर्ष तक नहीं ले जाती।

यहाँ पाठक की भूमिका को वोल्फगैंग आइज़र (Wolfgang Iser) की पाठक केंद्रित आलोचना के सहारे देखा जा सकता है। आइज़र के अनुसार साहित्यिक पाठ में कुछ ‘ख़ाली जगहें’ रहती हैं। पाठक उन्हें अपनी कल्पना और अनुभव के आधार पर भरता है। कुँवर नारायण की कविता में ‘किसी संकेत’ ऐसी ही एक ख़ाली जगह बनाता है। कवि संकेत की प्रकृति नहीं बताता। पाठक को उसे कल्पना में पूरा करना पड़ता है।

लेकिन यह ख़ाली जगह पूरी तरह मनमानी भी नहीं है। पाठक जो चाहे अर्थ नहीं निकाल सकता। कविता में मौजूद शब्द और बिंब उसकी व्याख्या की सीमा तय करते हैं। ‘अँधेरा’, ‘संकेत’, ‘चेतना’, ‘उद्देश्य’ और ‘संभावना’ पाठक को कुछ दिशाएँ देते हैं। इसलिए पाठक अर्थ का अकेला निर्माता नहीं है। वह पाठ और अपनी संवेदना के बीच संवाद से अर्थ बनाता है।

यहीं कविता का एक महत्वपूर्ण सौंदर्यशास्त्रीय पक्ष सामने आता है—कवि अपने शब्दों में सूत्र छोड़ देता है और पाठक अपनी कल्पना व संवेदना से उन सूक्ष्मतम अर्थों का विस्तार करता है। रचनाकार संकेत का विवरण नहीं देता। वह केवल उसके होने की संभावना रखता है। पाठक को उस संभावना को अनुभव में बदलना पड़ता है। इस तरह कविता की अर्थवत्ता उसकी कही हुई बातों के साथ साथ उसकी अनकही जगहों में भी बनती है।

‘पहिचानता सा’ में ‘सा’ का प्रयोग भी इस संदर्भ में फिर एक नई भूमिका ग्रहण करता है। पहले इसे आत्म की अनिश्चितता के संदर्भ में देखा जा सकता है, लेकिन यहाँ यह अर्थ की अनिश्चितता को भी बढ़ाता है। कवि यह नहीं कहता कि उसने संकेत को पूरी तरह पहचान लिया। वह ‘पहिचानता सा’ है। यानी संकेत का अर्थ भी पूरा बंद नहीं हुआ है। पहचानने की प्रक्रिया चल रही है।

इस तरह ‘सा’ और ‘किसी’ दो छोटे शब्द मिलकर कविता के अर्थ की संभवना को खुला रखते हैं। ‘किसी’ शब्द संकेत को अनाम रखता है और ‘सा’ पहचान को अपूर्ण रखता है। एक तरफ़ वस्तु स्पष्ट नहीं है, दूसरी तरफ उसे समझने वाला व्यक्ति भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं है। अर्थ इन दोनों के बीच बनता है।

यहाँ सॉस्यूर और पियर्स से आगे जाकर भाषा की सामाजिक प्रकृति पर भी विचार किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि कोई भी भाषिक संकेत निजी दुनिया में पैदा नहीं होता। हम संकेतों को भाषा, संस्कृति और सामाजिक अनुभव से सीखते हैं। किसी ध्वनि, रंग, वस्तु या घटना को अर्थपूर्ण समझना हमारे सामाजिक अनुभव से जुड़ा होता है। इसलिए कविता में ‘संकेत’ का सवाल अंततः व्यक्ति और संस्कृति के संबंध का सवाल भी बन सकता है।

उदाहरण के लिए ‘भोर’ केवल दिन का एक समय नहीं है। भारतीय सांस्कृतिक अनुभव में भोर का संबंध नई शुरुआत, जागरण और उम्मीद से जुड़ सकता है। लेकिन इसका अर्थ केवल सांस्कृतिक परंपरा से तय नहीं होता। विवेच्य कविता में ‘भोर का संदेश’ जिस तरह ‘कठिन बेहोशियों’ के बीच आता है, उससे उसका अर्थ और बदल जाता है। यहाँ भोर समय की सूचना से अधिक किसी बदलाव की ख़बर बन जाती है।

इसी तरह ‘फूल के दीपक’ को भी एक निश्चित प्रतीक मान लेना कविता के साथ न्याय नहीं करेगा। फूल और दीपक अलग अलग सांस्कृतिक अर्थ रखते हैं। कवि उन्हें एक साथ रखकर एक नया बिंब बनाता है। फूल का जीवन और दीपक का प्रकाश एक ही छवि में आ जाते हैं। इससे पाठक को अर्थ की एक ऐसी जगह मिलती है जहाँ प्रकृति, सौन्दर्य और चेतना एक दूसरे से जुड़ते हैं।

इस तरह कविता संकेतों को केवल सजावटी प्रतीकों की तरह इस्तेमाल नहीं करती। वह संकेतों के ज़रिए अर्थ की एक खुली व्यवस्था बनाती है। एक बिंब दूसरे बिंब को खोलता है। एक सवाल दूसरे सवाल को पैदा करता है। कोई भी अर्थ पूरी तरह बंद नहीं होता।

इसी वजह से इस कविता को उत्तर-आधुनिक संकेतशास्त्र से जोड़ते समय भी सावधानी रखनी होगी। कविता में अर्थ की बहुलता ज़रूर है, लेकिन वह अर्थहीनता की ओर नहीं जाती। कवि यह नहीं कहता कि कोई अर्थ संभव ही नहीं। वह केवल यह दिखाता है कि अर्थ तक पहुँचने की प्रक्रिया सीधी नहीं है। अर्थ बनता है, बदलता है और पाठक के अनुभव में नए रूप ले सकता है।

यहाँ कुँवर नारायण की काव्य दृष्टि की एक ख़ास विशेषता सामने आती है। वे रहस्य पैदा करने के लिए अर्थ को छिपाने के बजाय अर्थ को खुला रखते हैं ताकि पाठक उसके साथ चल सके। उनके यहाँ अस्पष्टता केवल अस्पष्टता नहीं है। वह विचार करने की जगह बनाती है। याद आ सकते हैं ‘अस्पष्टता के सात प्रकार’ (Seven Types of Ambiguity’,1930) ) के लेखक विलियम आम्प्सन, जिनका मानना है कि अस्पष्टता‘ (Ambiguity) कोई दोष या कमी नहीं है, बल्कि वह कविता की समृद्धि (Richness) और अर्थ की परतों का सबसे बड़ा स्रोत है। एम्पसन के अनुसार, जब कोई काव्यात्मक शब्द, पंक्ति या बिंब पाठक के दिमाग में एक साथ कई संभावित अर्थ जगाता है, तो वह ‘अस्पष्टता’ कहलाती है।

यह वही बात है जिसकी चर्चा अभी की गयी है — कवि शब्द कम खर्च करता है, लेकिन पाठक के भीतर अर्थ की अनंत संभावनाएँ छोड़ देता है।

इस दृष्टि से ‘संकेत’ कविता के भीतर केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि पढ़ने की एक विधि बन जाता है। कवि अपने जीवन और संसार को संकेतों के रूप में देखता है। पाठक कविता को संकेतों के रूप में पढ़ता है। दोनों प्रक्रियाएँ एक दूसरे का प्रतिबिंब बन जाती हैं। कवि अपने ‘मैं’ को समझने के लिए संकेत पहचानता है और पाठक कविता को समझने के लिए उन संकेतों को पढ़ता है।

यहाँ कविता और पाठक के बीच एक ख़ास रिश्ता बनता है। पाठक बाहर खड़ा होकर कविता का अर्थ निकालने वाला व्यक्ति नहीं रहता। वह कविता की अर्थ निर्माण प्रक्रिया में शामिल हो जाता है। जब वह पूछता है कि ‘किसी संकेत’ से कवि का आशय क्या है, तो वह खुद भी उसी खोज में प्रवेश कर चुका होता है जिसमें कविता का ‘मैं’ चल रहा है।

इस तरह कविता में ‘मैं’ और ‘पाठक’ के बीच एक अप्रत्यक्ष समानता बनती है। कवि अपने अस्तित्व का संकेत खोज रहा है और पाठक कविता के अर्थ का संकेत खोज रहा है। दोनों के सामने कोई पूरा उत्तर पहले से नहीं रखा है। दोनों को अर्थ की ओर बढ़ना है।

यहाँ कविता का सामाजिक अर्थ भी निकल सकता है। मनुष्य अकेले अर्थ नहीं बनाता। वह संकेतों को एक सांस्कृतिक संसार से ग्रहण करता है। लेकिन वह उन्हें जस का तस स्वीकार नहीं करता। अपने अनुभव के आधार पर वह उनका अर्थ बदलता है। इसलिए अर्थ-निर्माण व्यक्ति और समाज के बीच लगातार चलने वाली प्रक्रिया है।

इस अर्थ में ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ केवल आत्म की कविता नहीं रह जाती। यह मनुष्य के अर्थ बनाने वाले अस्तित्व की कविता बन जाती है। मनुष्य अँधेरे में भी संकेत खोजता है। वह संकेतों को पहचानता है, उनके अर्थ परखता है और उनसे अपने वर्तमान तथा भविष्य को समझने की कोशिश करता है। विवेच्य कविता इसी मानवीय प्रक्रिया को बहुत कम शब्दों में पकड़ लेती है।

इसलिए ‘अँधेरे में किसी संकेत को पहिचानता सा?’ काव्य-पंक्ति को कविता की आरंभिक पंक्ति भर मानना उसके महत्व को कम करना होगा। यह पूरी कविता को पढ़ने की कुंजी भी बन सकती है। कवि अपने ‘मैं’ को किसी सीधे बयान में नहीं पकड़ता। वह संकेतों के सहारे उसके करीब जाता है। और पाठक भी कविता को सीधे किसी एक अर्थ में बंद नहीं करता। वह संकेतों के बीच से उसके अर्थ तक पहुँचता है।

इसलिए इस कविता में संकेत केवल अर्थ की ओर जाने वाला रास्ता नहीं है। संकेत स्वयं खोज की प्रक्रिया है। ‘किसी’ उसे खुला रखता है, ‘सा’ उसे अनिश्चित रखता है और प्रश्नवाचक वाक्य उसे लगातार गतिशील रखता है। इन तीनों के कारण कविता पाठक से कहती हुई लगती है कि अर्थ तुम्हारे सामने तैयार नहीं रखा गया है। उसे पढ़ते हुए, जोड़ते हुए और अपने अनुभव से मिलाते हुए समझना होगा। यही वह जगह है जहाँ कुँवर नारायण की कविता अपने छोटे से कथन को एक बड़े मानवीय अनुभव में बदल देती है।

‘नींद के परिवेश में भी सजग रहती / चेतना की, स्वप्न बन, कोई परत’ – कविता की एक जटिल पंक्ति है। यहाँ जागरण और नींद को विरोधी नहीं बनाया गया। कवि कहता है कि नींद के भीतर भी चेतना की कोई परत सक्रिय रहती है। दूसरे शब्दों में कुँवर नारायण चेतन और अचेतन के बीच कोई कठोर दीवार नहीं खींचते। सामान्यतः नींद को जाग्रत चेतना की अनुपस्थिति माना जाता है, लेकिन कविता के अनुसार नींद में भी चेतना की कोई सूक्ष्म परत सक्रिय रहती है और स्वप्न उसका एक रूप बनकर सामने आता है। इसीलिए यहाँ स्वप्न को केवल जाग्रत अवस्था से बाहर की मानसिक घटना मानना पर्याप्त नहीं होगा। वह मनुष्य के उस भीतरी संसार की अभिव्यक्ति है जो जागते हुए पूरी तरह दिखाई नहीं देता, लेकिन नींद में संकेतों, छवियों और अनुभूतियों के रूप में उभर सकता है।

पहले खा जा चुका है  कि एडमंड हुसर्ल (Edmund Husserl) के अनुसार चेतना हमेशा किसी न किसी वस्तु, अनुभव या अर्थ की ओर उन्मुख रहती है। इस दृष्टि से देखें तो स्वप्न में भी चेतना पूरी तरह समाप्त नहीं होती, बल्कि उसकी दिशा और अनुभव का स्वरूप बदल जाता है। स्वप्न में दिखाई देने वाली छवियाँ भी किसी तरह की अनुभूति और अर्थ-निर्माण से जुड़ी होती हैं। दूसरी ओर, फ्रायड के यहाँ स्वप्न मन के उन दबे हुए अनुभवों, इच्छाओं और मानसिक प्रक्रियाओं तक पहुँचने का माध्यम बन सकता है जो जाग्रत चेतना में सीधे सामने नहीं आते। कविता में ‘चेतना की कोई परत’ का विचार इस छिपे हुए मानसिक संसार की सम्भावना को खोलता है, लेकिन कविता को केवल फ्रायड के अचेतन की व्याख्या मानना उचित नहीं होगा। कार्ल युंग की दृष्टि से स्वप्न मन की गहरी प्रतीकात्मक संरचनाओं को भी सामने ला सकता है। इस कारण कविता में स्वप्न केवल व्यक्तिगत स्मृतियों या इच्छाओं का परिणाम नहीं रह जाता, बल्कि वह मनुष्य के भीतर सक्रिय किसी व्यापक प्रतीकात्मक संसार की ओर भी संकेत कर सकता है।

इस तरह हुसर्ल, फ्रायड और युंग को अलग-अलग रखते हुए देखा जाए तो तीन अलग दिशाएँ सामने आती हैं। हुसर्ल हमें चेतना की सक्रियता और उसकी अनुभव की ओर उन्मुखता को समझने में मदद करते हैं, फ्रायड जाग्रत चेतना के पीछे काम कर रही दबाई हुई मानसिक प्रक्रियाओं की ओर ध्यान दिलाते हैं, और युंग स्वप्न की प्रतीकात्मक गहराई को समझने का रास्ता खोलते हैं। कुँवर नारायण की कविता इन तीनों में से किसी एक सिद्धान्त को दोहराती नहीं, बल्कि यह सवाल उठाती है कि मनुष्य का ‘मैं’ केवल उतना ही है जितना उसे जागते हुए दिखाई देता है, या उसके भीतर कुछ ऐसी परतें भी हैं जो नींद, स्वप्न और अर्धचेतन अवस्थाओं में अपना अस्तित्व प्रकट करती हैं। इस अर्थ में ‘स्वप्न’ यहाँ चेतना का विलोम नहीं, बल्कि उसकी एक दूसरी सम्भावित अवस्था बन जाता है। कविता का आत्मबोध इसलिए केवल जाग्रत मन की खोज नहीं है, बल्कि उस अदृश्य मानसिक संसार की खोज भी है जहाँ से कभी-कभी जागरण का अर्थ और दिशा दोनों निर्मित होते हैं।

कविता की अंतिम पंक्तियाँ, ‘एक क्षण की सिद्ध, प्रामाणिक, परिष्कृत चेतना से / युग युगों को माँजता सा?’ – कवि के समय, चेतना और इतिहास संबंधी विचार को एक व्यापक धरातल पर ले जाती है। यहाँ ‘एक क्षण’ और ‘युग युगों’ का सम्बन्ध केवल छोटे और बड़े समय का सम्बन्ध नहीं है। कवि यह पूछता है कि क्या चेतना का कोई एक गहरा और प्रामाणिक क्षण अपने समय की सीमाओं से बाहर जाकर अतीत और भविष्य को देखने की क्षमता रख सकता है। ‘क्या यही हूँ मैं!’ से शुरू हुई आत्म-खोज यहाँ व्यक्ति की निजी सीमा से निकलकर इतिहास के विशाल विस्तार तक पहुँचती है। ‘मैं’ अब केवल अपने वर्तमान अनुभव को पहचानने वाला व्यक्ति नहीं रह जाता, बल्कि वह उस चेतना का वाहक बन जाता है जो अपने समय को समझते हुए बीते हुए युगों को भी नए ढंग से देखने की कोशिश करती है।

बर्गसाँ (Henri Bergson) की ‘अवधि’ (Duration) की अवधारणा इस सम्बन्ध को समझने में विशेष रूप से उपयोगी है। बर्गसाँ के लिए वास्तविक समय घड़ी की तरह अलग-अलग क्षणों में बँटा हुआ नहीं होता। हमारी चेतना में अतीत और वर्तमान लगातार एक-दूसरे में मिलते रहते हैं। वर्तमान क्षण अपने भीतर पिछले अनुभवों को लेकर चलता है। इसलिए ‘एक क्षण’ को केवल एक छोटी काल-इकाई मानना इस कविता के अर्थ को सीमित कर देगा। कविता में ‘एक क्षण’ उस गहरी चेतना का क्षण हो सकता है जिसमें व्यक्ति अपने वर्तमान के साथ अपने अतीत को भी अनुभव करता है। वह क्षण समय में छोटा है, लेकिन अनुभव की दृष्टि से उसमें बहुत कुछ समाया हुआ है। इसीलिए उससे ‘युग युगों’ को ‘माँजने’ की सम्भावना पैदा होती है। यहाँ समय की मात्रा नहीं, चेतना की गहराई निर्णायक बनती है।

इसे पॉल रिक्योर (Paul Ricoeur) के समय और स्मृति संबंधी विचारों से भी जोड़ा जा सकता है। रिक्योर के लिए मनुष्य समय को केवल बाहर घटती हुई घटनाओं के रूप में नहीं जीता। वह स्मृति, अनुभव, कथा और व्याख्या के माध्यम से समय को अर्थ देता है। अतीत हमारे लिए केवल बीत चुकी चीज नहीं है। वह वर्तमान में लौटता है और वर्तमान की समझ को प्रभावित करता है। इस दृष्टि से कविता का ‘एक क्षण’ वर्तमान का ऐसा बिन्दु बन जाता है जहाँ अतीत की अनेक परतें सक्रिय हो सकती हैं। जब कवि ‘युग युगों’ की बात करता है, तो वह केवल बहुत पुराने समय की ओर नहीं देख रहा। वह इस बात की ओर संकेत कर रहा है कि मनुष्य की वर्तमान चेतना के भीतर इतिहास की अनेक स्मृतियाँ और अनुभव जीवित रह सकते हैं। एक प्रामाणिक वर्तमान चेतना अतीत को केवल याद नहीं करती, बल्कि उसे फिर से समझने का अवसर भी देती है।

ऐसे में ‘माँजना’ शब्द का अर्थ गहरा हो जाता है। कवि यह नहीं कहता कि वह ‘युग युगों को बदलता’ है या ‘युग युगों को बनाता’ है। वह कहता है, ‘माँजता सा’। माँजने का सामान्य अर्थ है किसी वस्तु पर जमी हुई धूल, मैल या पुरानी परत को हटाकर उसकी वास्तविक चमक को सामने लाना। कविता में यह शब्द इतिहास के लिए एक सूक्ष्म रूपक बन जाता है। इतिहास में भी अनुभवों, पूर्वाग्रहों, हिंसा, विस्मृति, रूढ़ धारणाओं और सत्ता द्वारा बनाए गए अर्थों की परतें जम सकती हैं। चेतना का काम उन्हें बिना सोचे स्वीकार करना नहीं, बल्कि उन परतों को हटाकर उन्हें नए ढंग से देखना हो सकता है। इस अर्थ में ‘माँजना’ केवल बौद्धिक क्रिया नहीं है। इसमें आत्मालोचन और नैतिक जिम्मेदारी दोनों शामिल हैं।

वाल्टर बेंजामिन का इतिहास संबंधी चिंतन इस बिन्दु को और स्पष्ट कर सकता है। बेंजामिन इतिहास को सिर्फ़ अतीत की घटनाओं की क्रमबद्ध सूची की तरह नहीं देखते। उनके यहाँ वर्तमान किसी बीते हुए क्षण को नए ढंग से देखने की सम्भावना पैदा करता है। इतिहास को याद करना इसलिए केवल पीछे लौटना नहीं है। वर्तमान की चेतना अतीत में दबे हुए अनुभवों और भूली हुई आवाज़ों को फिर से दिखाई देने योग्य बना सकती है। कविता का ‘माँजना’ इसी अर्थ में इतिहास के साथ सक्रिय सम्बन्ध की ओर संकेत करता है। एक सजग चेतना इतिहास को जस का तस स्वीकार नहीं करती। वह पूछती है कि इतिहास में क्या दिखाई देता है, क्या छिपा रह गया है और किन अनुभवों पर समय की धूल जम गई है। इस दृष्टि से ‘युग युगों को माँजना’ इतिहास को मिटाना नहीं, बल्कि उसे अधिक साफ़ और आलोचनात्मक दृष्टि से देखना है।

यहाँ रेमंड विलियम्स (Raymond Williams) की ‘अनुभूति की संरचना’ (Structure of Feeling) की अवधारणा भी उपयोगी हो सकती है। विलियम्स के अनुसार किसी युग को केवल उसकी राजनीतिक घटनाओं, संस्थाओं या स्थापित विचारों से नहीं समझा जा सकता। हर समय में जीवन जीने के कुछ ऐसे अनुभव, भाव और संवेदनाएँ भी होती हैं जो पूरी तरह किसी स्थापित विचारधारा या सामाजिक संरचना में दर्ज नहीं होतीं। कविता की ‘सिद्ध, प्रामाणिक, परिष्कृत चेतना’ को इस संदर्भ में उस जीवित अनुभव की चेतना के रूप में पढ़ा जा सकता है जो अपने समय की अनकही अनुभूतियों को पहचानती है। ‘एक क्षण’ का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि कभी-कभी किसी व्यक्ति का एक गहरा अनुभव अपने पूरे समय की ऐसी संवेदना को पकड़ लेता है जिसे सामान्य भाषा अभी पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाती। वह निजी अनुभव होते हुए भी सामाजिक अनुभव की ओर खुल सकता है।

इस तरह ‘एक क्षण’ और ‘युग युगों’ के बीच सम्बन्ध केवल व्यक्तिगत और सामूहिक समय का सम्बन्ध नहीं है। यह अनुभव और इतिहास के बीच सम्बन्ध भी है। व्यक्ति एक क्षण में जो देखता या अनुभव करता है, वह केवल उसका निजी अनुभव नहीं रह जाता, यदि उसमें अपने समय और समाज को समझने की क्षमता पैदा हो जाए। कविता में ‘प्रामाणिक’ और ‘परिष्कृत’ जैसे शब्द इसी बात की ओर संकेत करते हैं। हर क्षण इतिहास को नहीं बदलता और हर व्यक्तिगत अनुभव सार्वभौमिक अर्थ नहीं ग्रहण करता। लेकिन जब चेतना किसी अनुभव को गहराई से पहचानती है, उसे आत्मालोचन से गुजरती है और उसे व्यापक मानवीय संदर्भ में देखती है, तब वह अनुभव अपने समय की सीमाओं को पार कर सकता है।

‘सिद्ध, प्रामाणिक, परिष्कृत चेतना’ को भी इसी क्रम में समझना चाहिए। ‘सिद्ध’ यहाँ किसी पूर्ण या त्रुटिहीन अवस्था का सरल पर्याय नहीं है। इसे ऐसी चेतना के रूप में पढ़ना अधिक उचित होगा जो अनुभव से गुजरकर अधिक स्पष्ट हुई है। ‘प्रामाणिक’ उसे बनावटी या उधार की चेतना से अलग करता है। और ‘परिष्कृत’ बताता है कि चेतना ने अपने अनुभवों, भ्रमों और सीमाओं पर विचार किया है। इसलिए कवि के लिए चेतना केवल जागरूक होने का नाम नहीं है। चेतना को अपने भीतर भी काम करना पड़ता है। उसे अपने अनुभव को परखना, साफ़ करना और अधिक व्यापक अर्थों से जोड़ना पड़ता है। इसी प्रक्रिया के बाद वह इतिहास की ओर देख सकती है।

इस क्रम में  ग्राम्शी का मंतव्य एक उपयोगी सामाजिक संदर्भ प्रदान करता है। ग्राम्शी ने बताया कि सामाजिक चेतना केवल व्यक्ति के निजी अनुभव से नहीं बनती। समाज में प्रभुत्वशाली विचार और मूल्य इस तरह सामान्य जीवन का हिस्सा बन जाते हैं कि वे स्वाभाविक और सामान्य दिखाई देने लगते हैं। ऐसी स्थिति में आलोचनात्मक चेतना का काम उन धारणाओं को पहचानना है जिन्हें हम बिना सवाल किए स्वीकार करते रहे हैं। कविता का ‘माँजना’ शब्द इस अर्थ में चेतना की आलोचनात्मक क्रिया बन सकता है। युगों से चली आती धारणाओं को केवल इसलिए स्वीकार न करना कि वे पुरानी हैं, बल्कि उन्हें वर्तमान अनुभव और विवेक की कसौटी पर देखना  इतिहास को ‘माँजने’ का एक अर्थ हो सकता है।

यहाँ ‘माँजना’ का सम्बन्ध भविष्य से भी जुड़ता है। यदि अतीत केवल धूल से ढकी हुई स्मृति के बजाय वर्तमान में लगातार सक्रिय है, तो उसे नए ढंग से समझना भविष्य की सम्भावनाओं को भी बदल सकता है। अर्न्स्ट ब्लॉक (Ernst Bloch) के विचारों की सहायता से इसे समझें तो वर्तमान में हमेशा ऐसी सम्भावनाएँ मौजूद रहती हैं जो अभी पूरी तरह वास्तविक नहीं हुई हैं। कविता में पहले ही ‘भावी किसी संभावना’ की बात आती है। बाद में वही चेतना ‘एक क्षण’ से ‘युग युगों’ तक पहुँचती है। इस प्रकार कविता में भविष्य कोई दूर की वस्तु नहीं है। वह वर्तमान चेतना के भीतर मौजूद एक सम्भावना है। जो चेतना अतीत को आलोचनात्मक ढंग से समझ सकती है, वही भविष्य को भी केवल पहले से तय रास्ते के रूप में नहीं देखती।

इस क्रम में कविता की आन्तरिक संरचना भी ध्यान देने योग्य है। शुरुआत में कवि पूछता है, ‘क्या यही हूँ मैं!’ फिर वह अँधेरे में संकेत पहचानने की कोशिश करता है, चेतना के पूर्व किसी उद्देश्य को भविष्य की सम्भावना से जोड़ता है, नींद में सक्रिय चेतना की परत को महसूस करता है और अन्त में पूछता है कि क्या वह ‘एक क्षण की सिद्ध, प्रामाणिक, परिष्कृत चेतना से / युग युगों को माँजता सा’ है। यानी आत्म की खोज धीरे-धीरे समय और इतिहास की खोज में बदल जाती है। ‘मैं’ अपने भीतर से शुरू होता है, लेकिन अपने भीतर समाप्त नहीं होता। उसकी चेतना अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच सम्बन्ध बनाने लगती है।

इस दृष्टि से ‘माँजना’ कविता का एक ऐसा क्रियापद है जो आत्मबोध को सामाजिक और ऐतिहासिक जिम्मेदारी से जोड़ देता है। इसलिए सिर्फ़ स्वयं को पहचानना पर्याप्त नहीं है। अपने समय को पहचानना भी ज़रूरी है। और अपने समय को पहचानने के लिए उसके भीतर जमा हुई ऐतिहासिक परतों को देखना पड़ता है। इसलिए ‘माँजना’ आत्म की सफाई के साथ-साथ इतिहास की सफाई का भी रूपक बन जाता है। इसमें इतिहास को मिटाने का नहीं, उसे अधिक साफ दिखाई देने योग्य बनाने का भाव है।

अन्ततः ‘एक क्षण’ और ‘युग युगों’ का सम्बन्ध कविता में समय की मात्रा से अधिक चेतना की गुणवत्ता का सम्बन्ध है। एक गहरा क्षण अपने भीतर स्मृति, अनुभव, इतिहास और भविष्य की सम्भावना को समेट सकता है। बर्गसाँ हमें इस क्षण की ‘आन्तरिक अवधि’ समझने में मदद करते हैं, रिक्योर यह दिखाते हैं कि मनुष्य समय को स्मृति और अर्थ के माध्यम से जीता है, बेंजामिन वर्तमान की रोशनी में अतीत को फिर से देखने की सम्भावना खोलते हैं, रेमंड विलियम्स व्यक्तिगत अनुभूति को किसी युग की सामाजिक संवेदना से जोड़ते हैं, ग्राम्शी आलोचनात्मक चेतना के सामाजिक अर्थ को स्पष्ट करते हैं और ब्लोख वर्तमान के भीतर भविष्य की सम्भावना को देखने का रास्ता देते हैं। इन सबको साथ रखकर देखें तो कुँवर नारायण की कविता में चेतना केवल अपने ‘मैं’ को पहचानने की प्रक्रिया नहीं रह जाती। वह समय को समझने, इतिहास की जमी हुई परतों को हटाने और भविष्य की सम्भावनाओं को पहचानने वाली सक्रिय मानवीय शक्ति बन जाती है। यही ‘माँजता सा’ में छिपा हुआ नैतिक और ऐतिहासिक अर्थ है।

‘चेतना के पूर्व संबंधित किसी उद्देश्य को / भावी किसी संभावना से बाँधता सा’ – कुँवर नारायण की इस कविता की उन पंक्तियों में से है जहाँ आत्म की खोज सीधे भविष्य की ओर मुड़ जाती है। यहाँ मनुष्य को केवल अपने अतीत की स्मृतियों और वर्तमान अनुभवों से बना हुआ नहीं माना गया है। उसके भीतर आगे की ओर देखने, किसी उद्देश्य की कल्पना करने और अभी उपस्थित न हुई किसी सम्भावना से अपने वर्तमान को जोड़ने की क्षमता भी सक्रिय रहती है। इसीलिए कविता में भविष्य कोई खाली कालखंड नहीं है, जो वर्तमान के बाद आएगा। वह वर्तमान चेतना के भीतर पहले से काम कर रही एक सम्भावना है। ‘बाँधता सा’ में इसी मानसिक प्रक्रिया का संकेत मिलता है। मनुष्य किसी अभी-अनदेखे भविष्य को ध्यान में रखकर वर्तमान को अर्थ देता है और अपने वर्तमान अनुभवों को किसी उद्देश्य से जोड़ता है।

यहाँ ‘उद्देश्य’ और ‘संभावना’ के बीच का सम्बन्ध विशेष ध्यान देने योग्य है। कवि यह नहीं कहता कि मनुष्य किसी निश्चित भविष्य को जानता है। वह केवल ‘भावी किसी संभावना’ की बात करता है। ‘किसी’ शब्द भविष्य को खुला रखता है और ‘संभावना’ उसे निश्चित परिणाम में बदलने से रोकती है। भविष्य यहाँ पहले से तय नहीं है। वह अनेक सम्भावनाओं का क्षेत्र है। मनुष्य उन सम्भावनाओं में से किसी एक की ओर उन्मुख हो सकता है, लेकिन उसे पहले से पूरी तरह जान नहीं सकता। इसीलिए ‘बाँधता सा’ में निश्चितता के बजाय प्रयास और सम्भावना का भाव है। व्यक्ति अपने वर्तमान उद्देश्य को भविष्य की किसी सम्भावना से जोड़ने की कोशिश करता हुआ दिखाई देता है।

यहीं अर्न्स्ट ब्लॉक की ‘होप’ और ‘नॉट-येट’ (Not-Yet) की अवधारणाएँ कविता को समझने में मदद करती हैं । ब्लॉक के लिए मनुष्य केवल उस दुनिया में नहीं रहता जो अभी मौजूद है। मनुष्य के भीतर ऐसी दुनिया की कल्पना करने की क्षमता भी होती है जो अभी पूरी तरह अस्तित्व में नहीं आई है। इसी को वे ‘नॉट-येट’ के विचार से समझाते हैं। इसका अर्थ केवल इतना नहीं कि कोई चीज भविष्य में होगी। इसका अर्थ है कि वर्तमान के भीतर ही ऐसी सम्भावनाएँ मौजूद हैं जो अभी पूरी तरह वास्तविक नहीं हुई हैं। भविष्य वर्तमान से बाहर पड़ा हुआ कोई ख़ाली स्थान नहीं है। वह वर्तमान के भीतर छिपी हुई सम्भावनाओं का क्षेत्र है।

कुँवर नारायण की कविता में ‘भावी किसी संभावना’ को इसी अर्थ में पढ़ा जा सकता है। कवि का ‘मैं’ किसी निश्चित भविष्यवाणी की घोषणा नहीं करता। वह भविष्य की ओर खुलता है। उसके भीतर यह विश्वास है कि वर्तमान चेतना में ऐसी सम्भावनाएँ मौजूद हैं जिन्हें अभी पूरी तरह देखा या जिया नहीं गया है। इसलिए भविष्य यहाँ समय की अगली सीढ़ी नहीं, बल्कि चेतना की एक सक्रिय दिशा है। मनुष्य वर्तमान में रहते हुए भी उस चीज़ की ओर देख सकता है जो अभी नहीं है। उसकी चेतना केवल ‘जो है’ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि ‘जो हो सकता है’ तक पहुँचती है।

कविता की शुरुआत से इस भविष्यबोध की तैयारी होती रहती है। ‘क्या यही हूँ मैं!’ एक ऐसा प्रश्न है जो आत्म की वर्तमान स्थिति को लेकर निश्चित नहीं है। उसके बाद कवि ‘अँधेरे में किसी संकेत को पहिचानता सा’ दिखाई देता है। फिर वह ‘किसी उद्देश्य’ को ‘भावी किसी संभावना’ से जोड़ने की कोशिश करता है। इस क्रम को देखें तो आत्मबोध धीरे-धीरे वर्तमान की सीमाओं से आगे बढ़ता है। पहले व्यक्ति अपने अस्तित्व को पहचानना चाहता है, फिर वह किसी संकेत को समझता है, फिर किसी उद्देश्य और भविष्य की सम्भावना के बीच सम्बन्ध स्थापित करता है। यानी ‘मैं’ अपने वर्तमान रूप में बंद नहीं है। वह बनने की प्रक्रिया में है।

यहाँ ‘सा’ का प्रयोग भी पहले से चर्चा किए गए अर्थ को आगे बढ़ाता है। ‘बाँधता हूँ’ कहने पर कथन अधिक निश्चित हो जाता, लेकिन ‘बाँधता सा’ कहने से प्रक्रिया खुली रहती है। कवि यह दावा नहीं करता कि उसने उद्देश्य और भविष्य के बीच कोई पूर्ण सम्बन्ध स्थापित कर लिया है। वह केवल उस दिशा में बढ़ता हुआ दिखाई देता है। इससे कविता में भविष्य की चेतना के साथ विनम्रता और अनिश्चितता दोनों जुड़ जाते हैं। भविष्य को जान लेने का दावा नहीं है। उसके साथ सम्बन्ध बनाने की कोशिश है।

ब्लोख की ‘होप’ को भी इसी संदर्भ में समझना चाहिए। आशा उनके यहाँ केवल व्यक्तिगत आशावाद या किसी सुखद परिणाम की इच्छा नहीं है। आशा मनुष्य की उस सक्रिय क्षमता का नाम है जिसके कारण वह वर्तमान वास्तविकता को अंतिम और अपरिवर्तनीय नहीं मानता। वर्तमान में जो दिखाई देता है, उसके भीतर भी कुछ ऐसा हो सकता है जो अभी विकसित नहीं हुआ है। इसलिए आशा भविष्य की कल्पना मात्र नहीं करती, बल्कि वर्तमान में परिवर्तन की सम्भावना पहचानती है। कुँवर नारायण की कविता में ‘भावी किसी संभावना’ इसी सक्रिय भविष्यबोध की ओर संकेत करती है।

इस दृष्टि से कविता का भविष्यबोध किसी रोमानी कल्पना से अलग है। कवि यह नहीं कहता कि भविष्य अपने आप बेहतर होगा। वह केवल यह मानता है कि भविष्य खुला है और मनुष्य की चेतना उसमें हस्तक्षेप कर सकती है। ‘किसी उद्देश्य’ को ‘भावी किसी संभावना’ से जोड़ना एक मानसिक और नैतिक क्रिया है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति अपने वर्तमान को किसी ऐसी दिशा में ले जाना चाहता है जिसकी वास्तविकता अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है। इसीलिए यहाँ भविष्य निष्क्रिय प्रतीक्षा नहीं, सक्रिय कल्पना और अर्थ-निर्माण का क्षेत्र है।

कविता में भविष्य की यह सम्भावना अतीत से अलग नहीं है। पहले की पंक्तियों में ‘चेतना के पूर्व संबंधित’ का उल्लेख है और बाद में ‘युग युगों को माँजता सा’ आता है। इसलिए कविता में समय एक सीधी रेखा की तरह नहीं चलता। अतीत, वर्तमान और भविष्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अतीत चेतना को अनुभव देता है, वर्तमान उसे पहचानने और समझने का अवसर देता है और भविष्य उसी चेतना में नई सम्भावना के रूप में उभरता है। इस तरह मनुष्य का समय केवल पीछे से आगे जाने वाला क्रम नहीं है। वह स्मृति, अनुभव, उद्देश्य और सम्भावना के बीच लगातार बनने वाला सम्बन्ध है।

यहीं कविता को हेनरी बर्गसाँ की ‘ड्यूरेशन’ और ब्लोख की ‘नॉट-येट’ के साथ पढ़ना उपयोगी हो सकता है, हालांकि दोनों की अवधारणाएँ एक जैसी नहीं हैं। बर्गसाँ हमें यह समझने में मदद करते हैं कि वर्तमान अपने भीतर अतीत को लेकर चलता है, जबकि ब्लोक यह देखने का रास्ता खोलते हैं कि वर्तमान अपने भीतर भविष्य की सम्भावनाएँ भी रखता है। कुँवर नारायण की कविता में दोनों दिशाएँ एक साथ सक्रिय दिखाई देती हैं। चेतना अतीत से बनी है, वर्तमान में सक्रिय है और भविष्य की ओर खुली हुई है। इसीलिए कविता का ‘मैं’ किसी स्थिर पहचान का नाम नहीं रह जाता। वह स्मृति और सम्भावना के बीच निरन्तर बनता हुआ अस्तित्व है।

‘भावी किसी संभावना’ में भविष्य के साथ अनिश्चितता भी जुड़ी हुई है। यह अनिश्चितता कविता की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी दार्शनिक शक्ति है। यदि कवि कहता कि भविष्य निश्चित रूप से ऐसा ही होगा, तो उसकी दृष्टि सम्भावना से भविष्यवाणी में बदल जाती। लेकिन ‘किसी संभावना’ भविष्य को खुला रखता है। यह खुलापन मनुष्य की स्वतंत्रता से भी जुड़ता है। यदि भविष्य पहले से पूरी तरह तय नहीं है, तो वर्तमान में किए गए निर्णयों, अनुभवों और कल्पनाओं का महत्त्व बना रहता है। मनुष्य केवल भविष्य का इंतज़ार नहीं करता, वह अपनी चेतना और कर्म के माध्यम से उसकी सम्भावनाओं को आकार देने की कोशिश करता है।

यहाँ ब्लोख की आशा का नैतिक पक्ष भी सामने आता है। आशा तभी अर्थपूर्ण होती है जब वह वर्तमान की सीमाओं को पहचानते हुए भी उनसे आगे जाने की सम्भावना बनाए रखे। कविता का ‘मैं’ अँधेरे में है, फिर भी संकेत पहचानने की कोशिश करता है। वह नींद के भीतर भी चेतना की किसी परत को महसूस करता है। वह मिट्टी के अँधेरे में फूल के दीपक जलने की सम्भावना देखता है। ये सारे बिम्ब एक ही मानसिक गति से जुड़े हुए हैं। अँधेरा अंतिम स्थिति नहीं है। उसके भीतर किसी प्रकाश की सम्भावना मौजूद है। लेकिन वह प्रकाश अपने आप नहीं आता। उसे पहचानने वाली चेतना चाहिए।

‘मिट्टी का अँधेरा गुदगुदा कर / फूल के दीपक जलाता’ पंक्तियाँ इस भविष्यबोध को एक दृश्यात्मक रूप देती हैं। मिट्टी का अँधेरा यहाँ केवल प्रकाश का अभाव नहीं है। उसी अँधेरे के भीतर से फूल का प्रकाश निकलता है। इसे ब्लोख के ‘नॉट-येट’ के साथ पढ़ें तो वर्तमान की अपूर्णता के भीतर भविष्य की सम्भावना दिखाई देती है। जो अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है, वह वर्तमान में किसी बीज, संकेत या हलचल की तरह मौजूद हो सकता है। चेतना का काम उस सम्भावना को पहचानना है। इसीलिए कविता में भविष्य कोई अचानक बाहर से आने वाली चीज नहीं है। वह वर्तमान की गहराई में पहले से मौजूद है।

यह भविष्यबोध सामाजिक अर्थ भी ग्रहण कर सकता है। यदि मनुष्य वर्तमान को अंतिम सत्य नहीं मानता, तो वह अपने समाज और इतिहास को भी अपरिवर्तनीय नहीं मानेगा। यहीं ब्लोक़ की सम्भावना की धारणा कविता को व्यापक सामाजिक विचार से जोड़ती है। वर्तमान में मौजूद व्यवस्था, मान्यताएँ और जीवन-स्थितियाँ हमेशा वैसी ही रहें, यह आवश्यक नहीं। उनके भीतर परिवर्तन की सम्भावना हो सकती है। कविता का ‘मैं’ जब किसी उद्देश्य को किसी भावी सम्भावना से जोड़ता है, तो वह केवल अपने निजी जीवन की योजना नहीं बना रहा। वह मनुष्य की उस क्षमता का प्रतिनिधित्व भी करता है जिसके कारण वह ‘जो है’ और ‘जो हो सकता है’ के बीच अन्तर पहचानता है।

फिर भी कविता किसी राजनीतिक कार्यक्रम या सामाजिक परिवर्तन का प्रत्यक्ष घोषणापत्र नहीं बनती। उसका क्षेत्र अधिक सूक्ष्म है। वह पहले चेतना के स्तर पर सम्भावना पैदा करती है। परिवर्तन की शुरुआत इस बात से होती है कि व्यक्ति वर्तमान को अंतिम और अपरिवर्तनीय मानने से इनकार करे। कविता का ‘सा’ इसी खुलेपन को बनाए रखता है। ‘बाँधता सा’ में प्रयास है, लेकिन अंतिम दावा नहीं। यही उसकी संवेदनात्मक ईमानदारी है।

इस पूरी प्रक्रिया में ‘मैं’ की पहचान भी भविष्य की ओर खुलती है। कविता का शीर्षक ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ है, ‘स्वयं की परिभाषा’ नहीं। यह फ़र्क उल्लेखनीय है। ज़ाहिर है कि परिभाषा किसी वस्तु की स्थिर सीमा तय करती है, जबकि अभिव्यक्ति किसी भीतर की चीज़ के लगातार प्रकट होने की प्रक्रिया है। इसलिए कविता का ‘मैं’ भी एक बार में पूरा दिखाई नहीं देता। वह संकेतों, स्वप्नों, उद्देश्यों और सम्भावनाओं के माध्यम से धीरे-धीरे अपनी अभिव्यक्तियाँ सामने लाता है। भविष्य की सम्भावना इस ‘स्वयं’ को खुला रखती है।

इस दृष्टि से कविता में आशा और आत्मबोध एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। स्वयं को पहचानना केवल यह जानना नहीं कि ‘मैं कौन हूँ’, बल्कि यह भी समझना है कि ‘मैं क्या बन सकता हूँ’। कविता का पहला प्रश्न, ‘क्या यही हूँ मैं!’, अन्त तक पहुँचते-पहुँचते एक दूसरी सम्भावना खोलता है। शायद ‘मैं’ केवल वह नहीं हूँ जो इस क्षण दिखाई दे रहा है। मेरे भीतर किसी भविष्य की सम्भावना भी सक्रिय है। यही सम्भावना आत्म की सीमा को विस्तार देती है।

‘भावी किसी संभावना’ कविता के समयबोध को भविष्य की ओर खोलती है। यहाँ भविष्य कोई खाली समय नहीं, बल्कि वर्तमान चेतना में सक्रिय ‘अभी-अनहुआ’ क्षेत्र है। कविता का ‘मैं’ वर्तमान को अंतिम सत्य नहीं मानता। वह उसके भीतर छिपी सम्भावनाओं को पहचानने की कोशिश करता है। अँधेरे में संकेत की खोज, नींद में चेतना की परत, मिट्टी के अँधेरे से फूल का दीपक और उद्देश्य को भावी सम्भावना से जोड़ना, ये सभी एक ही दिशा में जाते हैं। कुँवर नारायण के यहाँ चेतना केवल यह देखने की शक्ति नहीं है कि अभी क्या है। वह यह महसूस करने की क्षमता भी है कि अभी जो नहीं है, उसकी सम्भावना कहाँ और किस रूप में मौजूद है। इसी कारण कविता का आत्मबोध स्थिर नहीं रहता। वह स्मृति से वर्तमान और वर्तमान से सम्भावित भविष्य की ओर लगातार खुलता जाता है।

कुल मिलाकर ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ को आत्म की खोज से आगे चेतना की जिम्मेदारी की कविता के रूप में पढ़ा जा सकता है। इसकी विशिष्टता इस बात में है कि यहाँ आत्मबोध किसी निजी उपलब्धि पर समाप्त नहीं होता, बल्कि वह अपने से बाहर की दुनिया को देखने की एक नैतिक दृष्टि में बदल जाता है। कविता का ‘मैं’ अपने अनुभवों को अंतिम सत्य नहीं मानता, बल्कि उन्हें लगातार परखता है और इस प्रक्रिया में अपने समय, इतिहास और मानवीय अस्तित्व के साथ अपना सम्बन्ध पुनर्गठित करता है। इसी कारण ‘एक क्षण’ का अनुभव ‘युग युगों’ तक फैलता है। एक सजग क्षण तब ऐतिहासिक अर्थ ग्रहण करता है जब वह अपने समय की जमी हुई धारणाओं को देखने, परखने और नए अर्थ देने की क्षमता पैदा करता है। ‘माँजना’ इसी सक्रिय चेतना का संकेत है। यह अतीत को मिटाना नहीं, बल्कि उसकी धूल हटाकर उसमें दबे अनुभवों और सम्भावनाओं को फिर से देखने का प्रयत्न है। इस अर्थ में कविता का आत्म अपने भीतर सिमटा हुआ आत्म नहीं, बल्कि स्मृति, इतिहास, सामाजिक अनुभव और भविष्य की सम्भावना के बीच सम्बन्ध बनाने वाला आत्म है। कुँवर नारायण की काव्य-दृष्टि इस प्रकार मनुष्य को किसी पूर्ण और स्थिर पहचान में नहीं बाँधती; वह उसे निरन्तर आत्मपरीक्षण, अर्थ-निर्माण और सम्भावना की ओर खुली हुई चेतना के रूप में देखती है। यही खुलापन कविता को अपने समय से आगे भी प्रासंगिक बनाता है, क्योंकि वह किसी तैयार उत्तर की जगह ऐसी चेतना की तलाश करती है जो बदलती दुनिया में अपने प्रश्नों को जीवित रख सके।

सन्दर्भ

बुनियादी पाठ

नारायण,कुँवर.‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ (कविता). प्रतिनिधि कविताएँ. राजकमल प्रकाशन. 2008 https://www.hindwi.org/kavita/swayan-ki-abhiwyaktiyan-kunwar-narayan-kavita?sort=popularity-desc

अन्य ग्रन्थ

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प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय. संपर्क: raviranjan@uohyd.ac.in

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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