आरती समकालीन काव्य की अत्यंत ही महत्त्वपूर्ण नाम हैं। आरती जीवन के विद्रूप को काव्य का रूप देती हैं। आप स्त्री – जीवन की विडम्बनाओं को तात्कालिकता के रंग से इस तरह रंगती हैं कि तात्कालिकता ऐतिहासिक रूप धारण लेती है। इस रौशनी में उनका कवित्त समय के सच के साथ वैचारिकी का रूप धारण कर लेता है जो उन्हें समकालीन लेखन में विशिष्ट बनाता है। बहरहाल
हम यहां आपकी एक लम्बी कविता प्रस्तुत कर रहे हैं। विश्वास है, पाठकों को पसंद आएगी।
– हरि भटनागर

कविता:

विधवा उत्सव मनाती मेरे गाँव की औरतें

कुछ औरतें उसे जबरन सा ही लगभग घसीटते हुए आंगन की ओर ला रही हैं
बीच आंगन अमरूद के पेड़ के नीचे छोड़कर उसे
वे सब किनारे हो गई

वह वही निढाल सी बैठ गई
वह बेशब्द रोए जा रही है
कभी धीमे तो कभी तेज
वह लगातार रोए जा रही बस

उसकी आंखों में गहरे भय अपमान और याचना की मिली जुली छायायें देखी जा सकती हैं
जो आंसुओं के बीच गुम हो आंचल के एक छोर में जज्ब हो रहीं

वह दबी छिपी नजरों से अपनी कलाइयों की डिजाइनदार रंगीन चूड़ियों को निहारती है तो कभी गोटेदार साड़ी के भीतर खुद को और लपेटने की चेष्टा करती जाती है

जैसा कि तुम सोच रहे हो कि उसे मारा पीटा जाएगा
या घर से निकाला जाएगा
या कत्ल किया जाएगा
नहीं, इत्मीनान रखो, ऐसा कुछ भी नहीं होगा
उसकी जान बख्श दी जाएगी
औरतों को जिंदा मार सकने के अनगिनत तरीके समाज ने अपने विकास के साथ-साथ ईजाद कर लिए हैं
अभी इस तैयार किए गए मंच पर एक सजा को शब्दशः निभाए जाने की रस्म अदायगी करनी है

यहां सब कुछ स्क्रिप्टेड है पर यह कोई फिल्म नहीं है मंच है, सभी किरदारों को अपनी भूमिका पता है
फिर भी कोई नाटक नहीं होने वाला

हाँ यह एक नायिका प्रधान कहानी है
चारों ओर औरतें ही औरतें काली छायाओं की तरह मंडरा रही है
मूक, बिना संवाद के
संगीत भी नहीं है यहां
केवल धीमी और तेज सिसकियों की आवाजें आ रही

अठारह साल से अधिक हुये इस थ्रिलर को देखे
जिसकी गूंज अभी भी मन को किसी टूटे हुए वाद्ययंत्र की कर्कश ध्वनियों सा बेचैन कर देती है

तो देखो! आज यह औरत भीड़ में भी अकेली छोड़ दी गई है
उसकी चहेतिनें गोतिनें पड़ोसिनें सभी दूर तमाशबीन खड़ी हैं
कोई पास आकर उसके आंसू नहीं पोंछ रहा
दुख की वजह जानने की कोशिश नहीं कर रहा

वह अपरिचित नजरों से सभी की ओर देखती है
रस्सी तुड़ाकर भाग जाने के भाव उसकी आंखों में साफ दिख रहे हैं
वह सवालों से भरी नजरों से सभी की ओर और ऐसे ही धरती की ओर भी देखे जा रही
उसने भी शायद वही कहा
जैसा हजारों साल पहले एक स्त्री ने परीक्षाओं की फजीहतों से तंग आकर कहा था कि “बस, अब संमा लो मुझे खुद में”

वह एक एक कर सभी की ओर इस उम्मीद से देखती है कि शायद होने जा रहे प्रहसन का पर्दा उठने से पहले ही कोई घोषणा कर दे
कि-‘पटाक्षेप हो गया’
लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं होता

मंच अपनी गति से गतिमान रहा
दृश्य में अँधेरा भरता गया और वही सब कुछ बड़े इत्मीनान से
कर्कश संगीत के बीच संपन्न हुआ
जो पहले भी होता रहा है

इस सती प्रथा के लघु संस्करण के दृश्य मैं यहां कैसे कहूं
लेकिन जब पर्दा उठ ही गया है तो फिर कोई पर्दा कैसे और क्यूं रखा जाए
उस औरत को सजाया गया
सब कुछ नया नया सोलह श्रृंगार किया गया
और फिर…जैसे सहलाते सहलाते अचानक पीठ पर लात लगा दी हो
जैसे उधेड दिया गया हो पलस्तर
छेनी से छेद कर दिया गया हो
ऐसे ही नोंच कर फेंक दिये गए साज सिंगार
जैसे हलाल कर मुर्गी के पंख नोचकर फेंक दिए जाते हैं बिल्कुल निर्वस्त्र कर दिया गया वैसे ही

कोरस का स्वर तेज और तेज हो गया
और वह औरत बिल्कुल शांत निस्तब्ध
जैसे अब कुछ भी खोये जाने का डर न रहा हो
जैसे ठहर जाता है सब कुछ तूफान के गुजर जाने के बाद

यहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित है
अपशकुन माना जाता है उनकी सेहत के लिए
इसलिए उनकी मांयें नहीं देखने देती हैं उन्हें ऐसे दृश्य कि कहीं उनके भीतर कुछ पसीज न जाए
या जाग ही जाए उनके भीतर की सोई हुई स्त्री
और ये स्त्रियां पुरुषों के साम्राज्य को बेखटके बनाए रखने के लिए
यह क्रूर प्रहसन जारी रखती हैं

इस तरह मेरे गांव कस्बे की औरतें किसी औरत के विधवा होने का जश्न मनाती हैं
वे उसे पहले नोंचती है फिर उसके घावों को कुरेदती है और उसमें चुटकी भर भर नमक डालती जाती है
तब तक, जब तक कि वह दर्द की अभ्यस्त होकर औरों को दर्द देने की प्रक्रिया में शामिल न हो जाए
यहां किसी पुरुष की मौत अकेले नहीं होती
साथ ही मार दी जाती है उसकी औरत भी
और उसकी आंखों में बचे कुचे सपनों को जिंदा जलाकर शेष राख को गंगा में बहा आते हैं

मेरी वह पटना वाली दोस्त कहती है कि ये औरत उसके गांव में भी हैं
और वह कोरा गांव वाली कहती है कि सिर मुंडवा दो तो वह उसके गांव की हो जाएगी
इस कहानी के कुछ दृश्य अपनी मद्रासी दोस्त को सुनाया तो उसने कहा कि यह औरत उसके गांव में भी पाई जाती है
पूरब से पश्चिम तक उत्तर से दक्षिण तक मैंने जिस किसी को यह बात बताई, उन सभी ने कहा कि यह औरत उनके गांव खेड़े में भी पाई जाती है
मैं सैकड़ों आवाजों से घिरी हुई हूं
इन आवाजों में कई हमारे पड़ोसी मुल्कों की भी शामिल है
वे भी कह रही है हमारे भी… हमारे भी…

चलिए वापस दृश्य में चलते हैं-
वे बाकी की औरतें जो आंगन में झुंड बनाकर खड़ी थीं, अब अपनी अपनी भूमिकाओं में वापस लौट रही हैं
सासें बहुओं को पतिधर्म की रटी हुई पोथियां सुनाने लगीं
मांयें बेटियों को चाल चलन ठीक रखने की नसीहतें दे रही हैं
पुरुषों के बरकत को समर्पित क्रियाकलापों की नीवें और गहरी हो गईं
कलाइयों में बढ़ गई चूड़ियों की तादातें
सिंदूर का रंग अधिक गहरा हो गया
गीताप्रेस से खरीदी गई थोक में उपवासों की किताबें और मुफ्त में बांटी गईं
तीजा करवाचौथ छठ के अलावा भी कुछ उपवास ईजाद किए गए
एक औरत तीन को तीन नौ को और नौ सत्ताइस को पोथियों के साथ खीर भरी कटोरियां बांटेगी
इस तरह गांव कस्बे से होता हुआ महानगरों की ओर फैलेगा डर का सांस्कृतिक सैलाव

जैसा कि पहले ही बताया गया कि यह आंखों देखा हाल है
कोई फिल्म या नाटक का दृश्य नहीं लेकिन किसी नौटंकी से कम भी नहीं
इस क्रूर उत्सव का हिस्सा बनी थी मैं भी
कोरस के उन स्वरों में मेरा भी स्वर मिला हुआ था
नहीं, मैं चुपचाप सब कुछ नहीं चलने देना चाहती थी
मैं हाथ उठाकर उस औरत की फजीहत को रोकना चाहती थी
मैं पंक्ति भंग कर बीच आंगन खड़ी हो सबको ललकारती धिक्कारती कुछ संवाद बोलना चाहती थी
मैंने उस औरत के हाथ में भी कुछ संवाद थमाने चाहे थे
लेकिन यह मूक प्रहसन था
निर्देशक की सख्त हिदायत थी कि सदियों से चलते आ रहे दृश्यों को कोई छेड़े नहीं
स्क्रिप्ट में कुछ भी बदलाव करने का दुस्साहस न करें
मेरे हाथ पीछे बांध दिए गए थे शायद औरों के भी
जो किरदार यहां दिखाई दे रहे थे वे दरअसल नहीं थे और जो दृश्य में नहीं दिखाई दिए उनकी उपस्थिति हर क्रिया के पीछे थी

यह कटुतिक्त कार्यवाही संविधान के किसी अनुच्छेद में दर्ज नहीं है
इसे हत्या नहीं माना जा सकता क्योंकि पात्र जिंदा है और वह खुद के जिंदा होने की गवाही देगा
इसे जबरदस्ती नहीं कह सकते क्योंकि भोक्ता ने कोई निषेध नहीं किया
और तमाम उपस्थित अनुपस्थित औरतें भी इसे जबरदस्ती या जुल्म नहीं मानती
इस तरह मानवाधिकारों के प्रावधानों भीतर उनके शोषण के सवालों का औचित्य ही नहीं

पर्दा कब का गिर चुका
वह मंचन जो मैंने देखा- सुना, दिखाया और सुनाया भी, कब का खत्म हो चुका
इस कहानी की नायिका वह औरत भी बूढ़ी हो चली
नाती पोतों वाली
उसे ढलती शाम और वीरान हवाओं के साथ रहने की आदत हो चली है
शायद किन्हीं चटक रंग की सुबह की उसे याद भी नहीं शायद उसे बिना नमक मिर्च के उबले स्वाद पर यकीन हो चला

इस दृश्य में उपस्थित कुछ जोड़ी बूढ़ी आंखें जो नाटक की स्क्रिप्ट हाथों में लिए खड़ी थी और मंच को निर्देशित कर रही थीं
वे अब मर खप गईं
वह औरत जो मेरी कहानी की नायिका थी
अब निर्देशक की भूमिका में आ गई है औरण खुद पर भोगी नौटंकी को जब तक संपन्न करवाती रहती है

***
तो मेरे दोस्तों!
तुम शहरी हो या किसी महानगर में रहते हो
तुम गांव में या किसी कस्बे के रहने वाले हो
तुम कोई स्त्री हो या पुरुष
काले या गोरे
खूबसूरत या सामान्य शक्लोसूरत वाले
तुम कैसे भी हो, मुझे इससे क्या
मेरे दोस्तों! …
अभी फिलहाल मुझे तुमसे कोई बहस भी नहीं करनी है
न ही जेंडर इक्विटी पर और
न ही जेंडर जस्टिस पर
यह जो एक दृश्य मेरे हाथ में पकड़े पन्नों पर फड़फड़ा रहा है अभी हम इसके विवरणों पर किसी प्रश्न की तरह तहकीकात कर लेते हैं
आओ…

अब हम फिर अपने उसी विषय पर वापस लौटते हैं
माना कि यह छद्म प्रदर्शनों का दौर है और हमने सब कुछ जानते हुए भी उसे युगधर्म बना लिया है
फिर भी क्या दुनिया की बदसूरती को नफीस कपड़े से ढँक देने पर उसकी दुर्गंध को भी ढँका जा सकता है
वे शीर्षक मुझे हमेशा ऐसे ही लगते हैं जहां कुछ शब्दों को बोल्ड कर दोहराया जाता है
कि अब कहां होते हैं औरतों पर जुल्म
औरतें अब बड़ी मजबूत हो गई हैं….
और चुटकुलों वाला पुरुष तो डरा सहमा घर के भीतर प्रवेश करता है
दिन रात व्हाट्सएप में फॉरवर्ड किये जाने वाले मीमों ने कोई अलग ही दुनिया बना रखी है
और सीरियलों की सुपर डुपर वुमेन और त्याग की जीती जागती मूर्तियांय …..

इन सबका अभिप्राय क्या यह
कि सारी गैर बराबरियां बराबरी की लाइन में आ खड़ी हुई है
इतिहास में दर्ज शोषण की तमाम दस्तानें सिर्फ अतीत का मसला थीं
और हमारा समाज अब इतना आधुनिक और प्रगतिशील बन चुका है कि…
तब मेरा जी करता है कि मैं हाथ पकड़कर ऐसे प्रयोगकर्ताओं को
उसी अमरूद के पेड़ के नीचे तक घसीट कर ले चलूँ
जहां अभी भी किसी न किसी औरत की आत्मा पर घी छिड़क आग लगाई जा रही होगी
उसके वजूद को ही अर्थहीन घोषित किया जा रहा होगा

सच पूछो तो किसी भी किस्म की क्रूरता की शुरुआत ऐसे ही किसी अमरूद के पेड़ के नीचे से होती है
और ये पेड़ केवल गांव कस्बे के किसी आंगन में ही नहीं होते
उनकी जड़ें दुनिया की पूरी जमीनों को अपने कब्जे में ले लेती हैं
कहीं कुलरीति तो कहीं लोकरीति
कभी परंपरा- नैतिकता के बहानों से
सुनो, कानों को थोड़ा चौड़ा कर सुनो
चारों तरफ घुटे हुए गलों से निकली चीखें तुम्हारे कानों को सुन्न कर देंगी

यहाँ से शुरू सिलसिला यहीं थमता नहीं
इनका रूपांतरण महानगरों में गैंगरेप के रूप में सामने आता है
तो कभी पौरुष दंभ किसी लड़की को गाड़ी से रौंदकर गुजर जाता है
मैं रेड लाइट एरिया की कहानियों को भी यहीं से लिंक करती हूं
हत्याओं- आत्महत्याओं जैसे अनगिनत किस्से तो सब सुनते ही रहते हैं
इन कहानियों को और कुरेदती हूं तो इतिहास की परतें उधड़कर चूने की तरह झड़ने लगती हैं
संपत्तियों को हथियाने के पीछे काम कर रहीं राजनीतिक साजिशें
थोड़ा और नाखून से खुरचते ही धर्म की दलालियां पूरी बेशर्मी से सामने आकर अट्टहास करने लगती हैं
कि तभी हमारे समय का एक कवि पूरे जोर से टेबल ठोंक कर कहता है-
“इतिहास में पहली स्त्री हत्या एक पुत्र ने अपने पिता के कहने पर अपनी मां की की”
और हमारा इतिहास उन सभी पुरुषों के नाम के आगे वीर लगाता है
उनके नाम के आगे भी जो एक औरत को नंगा करते समय चुपचाप खड़े रहे
और हमारे नागरिक समाज को औरतों को घर से निकालने वाला वह रामराज्य आज भी चाहिये

जाहिर है कि औरतों पर होने वाले जुल्मों को कभी जुल्म भी नहीं माना गया
उन्हें न्याय संगत ठहराने के लिए हर धर्म के पास धर्मग्रन्थ हैं
लाखों-करोड़ों परंपराओं की विशाल वैतरणी है
इतने मजबूत मिथक कि विज्ञान के तर्क और ज्ञान की तमाम धाराएं झूठी लगने लगती हैं

हमारे एक हाथ में मनुस्मृति और दूसरे में संविधान है संविधान सबके लिए है
मनुस्मृति स्त्रियों के लिए सुरक्षित रखी है ….


 

आरती

रीवा जिले के एक कस्बे गोविंदगढ़ में 15 अक्टूबर 1977 को जन्म हुआ।
एम. ए. (हिंदी साहित्य)।
‘समकालीन हिंदी कविता में स्त्री जीवन की विविध छवियां’ विषय पर डाक्टरेट।
“समय के साखी” साहित्यिक पत्रिका का 2008 से। निरंतर संपादन और केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, डॉ रामविलास शर्मा, फिदेल कास्त्रो, रविंद्रनाथ टैगोर, लेव तोलस्तोय व रसूल हमजातोव की विश्व प्रसिद्ध पुस्तक मेरा दागिस्तान पर विशेषांकों का संपादन।
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं ‘मीडिया मीमांसा’ एवं ‘मीडिया नवचिंतन’ के कई अंको का संपादन।
रविंद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित वृहद कथाकोश “कथादेश”में के संपादन से संबद्ध।
कविता संग्रह “मायालोक से बाहर” (2014 में “रचना समय” से प्रकाशित) और “मूक बिम्बों से बाहर” अभी हाल ही में “राधाकृष्ण प्रकाशन” से प्रकाशित।
“इस सदी के सामने” (2000 के बाद की कविताओं का संकलन) का संपादन और “राजपाल एंड सन्स” से प्रकाशित। मणिपुर की त्रासदी के बाद की गई यात्रा का संस्मरण “मणिपुर डायरी” अभी हाल ही में ‘संजना बुक्स’ से प्रकाशित।
साहित्य के विभिन्न पहलुओं, स्त्री चिंतन के विभिन्न आयामों एवं तमाम समकालीन बिंदुओं पर लेखन और समकालीन पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन।
संपर्क- 403, अन्नपूर्णा कॉन्प्लेक्स, पी एन टी चौराहा के पास, भोपाल, मध्यप्रदेश- 462003
मो- 9713035330
Email- samaysakhi@gmail.com

 


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