श्रुति कुशवाह की कविता में हमें एक anguish या यों कहें एक व्यथाजनित ग़ुस्सा दीखता है। यह ग़ुस्सा वर्तमान जीवन से उपजा है जो असंगतपूर्ण है, असमानता का पर्याय है श्रुति जिसे विट के जरिये तार – तार करती हैं। आज जहां ऐसा लेखन हो रहा है जिसमें सब कुछ भला – भला है , इसके उलट श्रुति कबीर की इस उक्ति में विश्वास रखती हैं :
सुखिया सब संसार है, खाए और सोवै
दुखिया दास कबीर है, जागे और रोवै।”

– हरि भटनागर

*मर्ज़ी*

मैं अपनी मर्ज़ी से तन्हां हुई
वो अपनी मर्ज़ी से बेवफ़ा

एक ने अपनी मर्ज़ी से उठाया पत्थर
दूसरे ने मर्ज़ी से लहराई बंदूक
इन दिनों मर्ज़ियों का शासन है
मेरा भोजन, मेरे कपड़े
मेरी आस्था पर भारी है उनकी मर्ज़ी

वो अपनी मर्ज़ी से कभी भी
मुझे घुसपैठियां साबित कर सकते हैं
मैं अपनी मर्ज़ी से केवल
उनका समर्थन कर सकती हूँ

यूँ मज़े-मज़े में चल रहा है मर्ज़ी का खेल
सारे नियम उनके सारी चालें उनकी
हम अपनी मर्ज़ी से प्यादे बने हुए हैं
हमने अपनी मर्ज़ी से मुँह सिल रखा है

यक़ीन मानिये
यहाँ कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं
सब अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं
एक दिन हम अपनी मर्ज़ी से उनके हाथों मारे जाएंगे
….

*विकास*

रंग सारे ही जा चुके थे कैनवास छोड़कर
आवाज़ें छोड़ चुकी थीं सच का साथ
सच नंगा था और शर्मिंदा भी
झूठ राष्ट्रगीत बन चुका था

जो ठीक बोल रहे थे उन्हें बाएँ कर दिया गया
दूसरी तरफ भीड़ थी और सड़कें घेरकर बैठी थीं गायें
गायों को आवारा लिखने पर मॉब लिंचिंग हो सकती है
इसलिए लिख देती हूँ गौमाता विचरण कर रही थी
हालाँकि वो भी भूखी थी और बेघर
लेकिन उन्हें बताया गया मंदिर बन गया है
बस इसी भरोसे युवाओं ने दानपेटी में डाल दिया अपना भविष्य
कुछ मुसलमानों ने भी दान वाली पर्ची फेसबुक पर डाली
उन्हें कागज़ों में साबित करनी थी देशभक्ति
टीवी पर जारी थे विश्वयुद्ध
पीढ़ियाँ खत्म करने के लिए काम पर था आईटी सेल
उन्होंने अचूक ज़हर ईजाद किया जिसकी कोई काट नहीं
दिमाग़ों को लकवा मार चुका था

हिंसक फिल्में मनोरंजन कर से मुक्त थीं
सबसे मनोरंजक थी कुर्सी दौड़
हालाँकि नतीजा पहले ही तय था
लेकिन खेल और राजनीति में सब जायज़ है
खेल-खेल में देश आगे बढ़ रहा था
यूँ कहें विकास हो रहा था
हम इतना चले कि ग्लोब से बाहर हो गए
अंतरिक्ष में गूंज रहा था नमो-नमो

हम सब हवा में उल्टे लटके थे
….

*दुनिया सुरक्षित है*

स्वर्ग से निकाल दिया गया है फरिश्तों को
धरती से खदेड़ दी गई हैं औरतें
बम विस्फोट में बचे बच्चे अब बेघर शरणार्थी हैं

सारे पेड़ कागज़ों में तब्दील हो चुके हैं
हिरण की खालें जैकेट बन टंगी है मॉल में
नदियां अपने उद्गम स्थल पर वापस लौट चुकी हैं
सारी ऑक्सीजन सिर्फ आग लगाने के काम आ रही है
गूंगे विश्वविद्यालयों में सिखाया जा रहा है संगीत
सबसे बड़े म्यूज़ियम में शीशे के जार में बंद है प्रेम के अवशेष

दुनिया अब पूरी तरह सुरक्षित है
….

*हड़ताल*

मैं चाहती हूँ
दुनिया की तमाम स्त्रियां
एक दिन की हड़ताल पर चली जाएं

माँएं छुट्टी लें महानता के पद से
एक दिन रोते बच्चे को पुरुष के जिम्मे छोड़
अपनी पसंद का उपन्यास पढ़ने बैठ जाएं
चार बार उठे बिना चैन से हो खाना
खाने के बीच साफ न करनी पड़े बच्चे की पॉटी
आधी रात बच्चे के रोने से न टूटे नींद
अलसुबह न उठना हो दूध पिलाने
उस एक रात बचपन की सहेली को बुला
ड्राइंग रूम में सोफे पर फैल
देर रात तक मारे गप्पे
सारी माँएं इस दिन बच्ची बन जाएं

प्रेमिकाएं सारे चुम्बन स्थगित कर
अपने बाएं पैर की छिंगली से
प्रेमी के अहंकार को परे झटक
निकल पड़े लॉन्ग ड्राइव पर
लौटकर बताए कि कितना उबाऊ है प्रेमी का लहज़ा
और प्यार का तरीक़ा बोझिल
बताए कि वो आज भी है प्रेमी से बेहतर
और शहर में अब भी हैं कई ख़ूबसूरत नौजवान
आज भी है बारिश कितनी रोमांचक
आज भी है संगीत कितना मोहक
प्रेम करने के लिये और भी अच्छी चीजें हैं दुनिया में

पत्नियों को तो हड़ताल के लिए
इतवार ही चुनना होगा
उस दिन वो सोयी रहे देर तक
और उठकर सबसे पहले
घर के सामने लगाए अपनी नेमप्लेट
ये उन्हीं का चुना हुआ नाम हो
जिसे पुकारा जाना सबसे मीठा लगे
फिर अपने घर में इत्मीनान से पसर चाय पिये
इस वाले इतवार पत्नियां पहने
अपनी पसंद का रंग
खाएं अपने स्वाद का खाना
टीवी का रिमोट हो उन्हीं के हाथ
अपनी मर्ज़ी से देखे वो दुनिया

हड़ताल वाले दिन
सारी कामकाजी औरतें
दफ़्तर की लॉबी में बैठ ताश खेलें
ज़ोर ज़ोर से करें बातें
उनके कहकहों से गूंज उठे दफ़्तर
उनकी मौजूदगी से भर जाए हर कोना
उस दिन इन्हीं का कब्ज़ा हो
रिसेप्शन, कॉरिडोर, गेस्ट रूम और लिफ़्ट पर
सारे आदमी सीढ़ियों से चढ़े-उतरें
रोज़ उन्हें घूरने वाली नज़रें
जो बचकर निकलने की कोशिश में हो
तभी कोई कोकिला गुनगुना उठे
‘हम हैं मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार की तरह
उठती है हर निगाह खरीदार की तरह’
यूं शर्म से पानी-पानी आदमी के जूते भीग जाए

दुनिया की तमाम बेटियां, सहेलियां, सहकर्मी, दोस्त
दादी नानी चाची मामी बुआ भाभी
लेस्बियन स्ट्रेट सिंगल कमिटेड
यह वह ऐसी वैसी अच्छी बुरी
संज्ञा सर्वनाम क्रिया विशेषण
जिस दिन ये सब हड़ताल पर जाएंगी
यक़ीन मानिये
उस दिन सारे पुरुष
स्त्री होना सीख जाएंगे

उसी दिन वो पुरुष से मनुष्य में तब्दील होंगे
….

*चुटकुला*

औरतों का बोलना हमेशा से चुटकुला रहा है
‘दो औरतें खामोश बैठी थी’ इसपर ठठाकर हँस पड़ते हैं आदमी
ये वही आदमी हैं जिनके घरों में औरतें चूं तक नहीं करती
वो इसे बड़े फख्र से बताते हैं

बुखार हरारत में औरत ने कभी नहीं कहा तबियत ख़राब है
हाथ जल जाने पर भी उसने परोसी गर्म रोटियां
कटे छिले हाथों से धोए घर भर के कपड़े
नींद उसने मरने तक मुल्तवी कर दी
बचपन से ही मिली थी नसीहत
लड़कियां चपर चपर नहीं करती
औरतों की ज़बान बोलने और स्वाद लेने के लिये नहीं होती
औरतों की ज़बान हामी भरने तक महदूद रही
कभी जो उसने कोशिश की बोलने की
तो ज़बान खींच लेने की धमकी मिली
इस तरह औरतों ने सिल ली अपनी ज़बान

औरतों को चुटकुलों में बेतरह बोलते हँसते बताया गया
वो करती रही ढेर शॉपिंग, उनकी आँखें नहीं नल थे
वार्डरोब भरा होने पर भी उनके पास पहनने को कपड़े नहीं होते
सारे पति अपने घर में भीगी बिल्ली बने रहते हैं
खाने में क्या बनेगा ये औरतों की वैश्विक समस्या है
चुटकुलों में औरतें पतियों को बेलन दिखाती हैं
चुटकुलों में आदमी चुपचाप खा लेता है टिंडे की सब्जी

आदमी के लिये औरतों की हँसी और आँसू सनातन चुटकुले हैं
आदमी इनपर पर पेट पकड़ हँस रहा है
औरतें रो रही हैं चुटकुलों पर
….

*चाँद के पैर*

चाँद
मैं अरसे से तलाश रही हूँ तुम्हारे पैर
एक बार देखना है
जिसका चेहरा चाँद है
उसके पैर क्या होंगे

सदियों से चक्कर काटते
क्या कभी छू जाते होंगे तुम्हारे पैर
पृथ्वी की देह से
क्या कोई स्पर्श का रिश्ता जुड़ता है
धरती और चाँद के बीच
या तुम्हें भी दी है किसी ने नसीहत
रात में पैर मत मारना
नींद में ख़लल पड़ता है
तुम्हें तो रात में चलने की आदत भी है

कल्पना करती हूँ
रोशनी से जगमग होंगे तुम्हारे पैर
या फिर मोर की तरह
अपने रंग से एकदम उलट
इसीलिये छिपा रखे हैं
मगर सुनो
सुंदरता तो देखने वाली आँखों में होती है
और धरती कितने मोह से देखती है तुम्हें

थोड़ी फटी भी हो एड़ियाँ
या पड़ी हो दरारें
नाखून टेढ़े हों
जम गई हो गर्द
या थक के हो गए हों पत्थर
मैं तुम्हारे पैरों को
अपनी गोद में रख
सहलाना चाहती हूँ
तलुवों में तेल लगाना चाहती हूँ
तुम्हारे पैरों को लोरी सुनाना चाहती हूँ

तुम सदियों से चक्कर काट रहे हो
और सिर्फ मुँह दिखा के चले जाते हो
एक बार चलकर आओ मेरे पास

मैं तुम्हारे पाँव पखारना चाहती हूँ मेरे चाँद
….

*झुमका गिरा रे*

बरेली के बाज़ार में झुमका गिराने वाली
इतनी बावरी है सच

उस रोज़ रुमाल छोड़ आई रक़ीब के पास
सौदा लेने गई तो छुट्टे छोड़ दिए
दर्ज़ी के पास नाप छोड़ा चलो माना
क्या ही ज़रूरी था खिलखिलाहट छोड़ना
चौक में कैस के पास छोड़ आई चेहरे का थोड़ा गुलाब
हद्द ये कि एक चाय और सरसरी सी मुलाक़ात पर
किसी दफ्तर में छोड़ आई अपना दिल

झुमका गिरा तभी सहेलियों ने समझाया
भाभी ने टोका अम्मा ने तरेरी आँखें
यहाँ तक कि पड़ोसन ने भी कसा तंज
ये लच्छन अच्छे नहीं
भरे बाज़ार चीज़ लानी होती है कि लुटानी
हर कहीं कुछ न कुछ छोड़ आने वाली कैसे संभालेगी गिरहस्थी
लड़कियों को तो सहेजना आना चाहिए
होना चाहिए चम्मचों कटोरियों का हिसाब
आख़िर लड़कियों के ही तो पल्लू से तो बंधे हैं सब नाते
और ये दीवानी सरे बाज़ार गिरा आती है झुमका
दीवानी लड़कियाँ खानदान के लिये खतरा होती हैं

बात भला बरेली तक ही क्या रहती
आग की तरह दिल्ली जा पहुँची खबर
बल्ली मारां की किसी गली में शोर उठा फिर सन्नाटा पसर गया
ये झुमके चढ़ावे में गए थे
लड़की के ससुराल होते घर ने लौटा दिया रिश्ता
झुमका खोने वाली क्या ही संभालेगी भंडार की चाबियां
जबसे नाउन संदेसा लाई घर भर में मातम है
अम्मा ने सिर पीटा अब्बा खखार रहे बार बार
छोटा भाई फिर निकला है झुमका खोजने बाज़ार

इधर छत पर बेपरवाह लड़की गुनगुना रही है
मैंने तुझसे मोहब्बत की है गुलामी नहीं की बलमा
….

*बचपन*

उन दिनों हमारी सबसे गुलाबी हसरत
पोंड्स पाउडर का टीन वाला डब्बा था

जब मोहल्ले में सफेद-लाल मारुति दिखती थी दो चार
स्कूटर भी बड़े घरों की निशानी हुआ करते थे
टेलीफोन मिलने में लग जाते तीन-चार साल
रेडियो पर रात नौ बजे आता था हवा महल
और ब्लैक एंड व्हाइट टीवी पर चिपकाई जाती रंगीन स्क्रीन
उस समय भेल में सोमवार होता था साप्ताहिक अवकाश
रविवार की छुट्टी करने हमसे स्कूल में भरवाया गया था फॉर्म

जब किसी नेता की मृत्यु पर
तीन दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया जाता
और टीवी एक मनहूस डिब्बे में बदल जाता
तब कृषि दर्शन की बोरियत मिटाने
हम पोंड्स पाउडर को हथेली से फूँ करके उड़ा देते
और अचानक से सब महक उठता
कभी-कभी मैं और दीदी
पाउडर को अपनी हथेली पर लेकर
तीन-चार बूँद पानी मिलाते
और हमारी क्रीम तैयार
उस समय घर में कहाँ आती थी क्रीम-व्रीम
कभी-कभी उस क्रीम से हम
मम्मी की तरह माँग भरने की नकल भी किया करते

उन्हीं दिनों एक शाम
संडे को जब टीवी पर आ रही थी ‘पार्टी’
पापा और सारे अंकल इमरजेंसी की बातों में बिज़ी थे
मम्मी किचन में आंटी के साथ चिप्स और फ्रायम्स तल रही थीं
अचानक फिल्म में रोहिणी हट्टंगड़ी ने उतार दी अपनी मैक्सी
किसी आदमी से लिपट वो बार-बार कह रही थी
‘मैं अब भी सुंदर हूँ..
..मैं अब भी सुंदर हूँ’
उस दृश्य में इतना रुदन भरा था
मेरा बालमन दहल गया
ज़्यादा समझ तो नहीं आया
लेकिन मैं अचानक भागकर आईने के सामने गई
और चेहरे पर पोत लिया ढेर सारा पाउडर
थोड़ी देर पहले ही एक आंटी ने मम्मी से कहा था
‘आपकी बड़ी वाली तो बहुत सुंदर है..लेकिन छोटी का रंग काला है’

वे दिन
जब टीन का एक गोल लंबा डब्बा
प्लास्टिक का छोटा सा ढक्कन
इतनी खुशबू और कोमलता से भरा हुआ था
दो चोटी गूँथकर मम्मी जब कभी लगा देती पाउडर
मैं एकदम खिल उठती
फिर किसी किताब में मखमली नीले रैपर वाला कैडबरी का विज्ञापन देख
सपनों में खो जाती
उस समय मैं अपने ही सपनों की राजकुमारी थी

पोंड्स ड्रीमफ्लॉवर टैल्क
सिर्फ पाउडर नहीं
सपनों से भरा डब्बा था
हमारे हिस्से कभी-कभी चुटकी भर सपनें आते
जिन्हें हम अपने गालों पर मल लिया करते

हमारा बचपन ऐसे ही जादुई सपनों का पिटारा था
….

*लौटना*

लौट आना वहाँ से
जहाँ से लौटना मुश्किल है

मोड़ के उस मुहाने से
जहाँ चेहरे धुँधला जाए
दूरी की उस पगडंडी से
जहाँ आवाज़ खो जाए
दिल के उस हिस्से से
जहाँ कुछ न हो महसूस

लौट आना
कि एक उम्र बाद सबको लौटना ही है
अच्छा है वक़्त रहते लौटना
देर से आना दुरूस्त हो ज़रूरी नहीं
देर होने पर अंधेरा घिरने का भय रहता
अंधेरे में राह भूलने का खतरा
ग़लत पते पर पहुँचने से पहले लौट आना

लौट आना
कि लौटना हमेशा पहला विकल्प होता है
बाक़ी विकल्प मिलने के बाद
पहला अक्सर छूट जाता
पहला विकल्प जैसे पहला प्यार
जो आखिर में सालता है सबसे ज़्यादा
उस अंतिम से पहले लौट आना

लौट आना इससे पहले कि
लिखा मिले
आगे जाने के सभी रास्ते बंद हैं
यहाँ प्रवेश निषेध है
ये सड़क कहीं नहीं पहुँचाती
सड़कें जब पहुँचाना बंद कर दें
उस राह से पहले लौट आना

लौट आना
इससे पहले कि मैं कहूँ
अब तुम्हारे लौटने न लौटने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता
….

*प्रेम से बाहर*

प्रेम से बाहर
जब मिलेंगे हम

एक खुला आसमान होगा
खूब ताज़ा हवा
रंग बिरंगे फूल
और सारे ही बेअसर
तब कोई रंग नहीं होगा मन पर
कोई खुशबू नहीं महकेगी हमारे बीच

प्रेम के बाहर जब मिलेंगे हम
पहली मुलाक़ात से भी ज़्यादा अजनबी
कैसे हैं क्या चल रहा है
रस्मन सवालों के साथ
सारे विगत पर धूल उड़ाते
आँखों में भर जाएगी गर्द
जहाँ खामोशी भी बातें करती थी
वहाँ फिज़ूल झड़ेंगे लफ़्ज़
सारी उदासियों की तौहीन करते
बेमतलब ही मुस्कुराएँगे

प्रेम से बाहर
जब मिलेंगे हम
क्या स्मृतियों से भी बाहर होंगे
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*श्रुति कुशवाहा*

जन्म 13 फरवरी को भोपाल, मध्यप्रदेश में हुआ। पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल, वर्ष 2001)।

वर्ष 2025 में दूसरा कविता संग्रह ‘सुख को भी दुख होता है’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।

पहला कविता संग्रह ‘कशमकश’ वर्ष 2016 में मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के सहयोग से प्रकाशित हुआ। संग्रह को मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा वर्ष 2016 ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ प्राप्त, वर्ष 2007 कादंबिनी युवा कहानी प्रतियोगिता में कहानी पुरस्कृत, पत्रकारिता हेतु वर्ष 2022 में ‘अचला सम्मान’ से सम्मानित। हिंदी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ निरंतर प्रकाशित होती रही हैं।

हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई, भोपाल में विभिन्न न्यूज़ चैनल में काम करने के बाद अब गृहनगर भोपाल में डिजिटल मीडिया में कार्यरत।

ई-मेल : shrutyindia@gmail.com

 


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