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प्रस्तुत आलेख में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन ने कुँवर नारायण की दार्शनिक कविता ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ का एक गहन-गंभीर, बहुआयामी और सूक्ष्म पुनर्पाठ प्रस्तुत किया है। कविता का केंद्रीय प्रश्न—’क्या यही हूँ मैं!’—केवल व्यक्ति की निजी पहचान की तलाश भर नहीं है, बल्कि…

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कृष्ण कल्पित को विवाद का पर्याय माना जाता है। लेकिन क्या  यह विवाद एक तंज नहीं जो असंगत बातों पर चोट करता है। कृष्ण कल्पित एक ऐसे रचनाकार हैं जो मुखर रहकर अपना रचना- धर्म निभाते हैं जो आज लुप्तप्राय…

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कॉर्पोरेट कार्य-संस्कृति, तकनीक-संचालित निगरानी और संस्थागत दबावों के बीच पिसते आधुनिक मनुष्य के नैतिक द्वंद्व को समझना आज के समय की एक बड़ी बौद्धिक एवं सामाजिक चुनौती है। ‘रचना समय’ के पाठकों के लिए इस परिप्रेक्ष्य में वरिष्ठ आलोचक प्रो. रवि रंजन का…

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कुँवर नारायण के जन्मशती वर्ष के अवसर पर ‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन का, आधुनिक हिंदी कविता के शीर्ष कवियों में परिगणित कुँवर नारायण की प्रसिद्ध कविता ‘चक्रव्यूह’ पर एक गहन, बहुस्तरीय और विचारोत्तेजक अनुशीलन प्रस्तुत किया जा रहा है।…

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 ‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन द्वारा कुँवर नारायण की कविता ‘घर रहेंगे’ का पुनर्पाठ प्रकाशित किया जा रहा है। इसमें ‘घर रहेंगे’ को मृत्यु, समय और मनुष्य के अस्तित्व के प्रश्नों के बीच रखकर पढ़ा गया है। कविता…

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