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‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन का तरुण भटनागर की कथा-संवेदना पर एक अत्यंत गंभीर और सूक्ष्म ‘उत्तर-औपनिवेशिक पाठ’ प्रस्तुत किया जा रहा है । आलेख इस बात को रेखांकित करता है कि कैसे तरुण…

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“रचना समय” की इस प्रस्तुति में हम प्रबुद्ध पाठकों के लिए वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन का महत्त्वपूर्ण आलेख “आत्मा का अंश और इतिहास का मलबा: सविता सिंह और एड्रिएन रिच का स्त्रीवादी काव्य-संवाद” पेश कर रहे हैं, जो समकालीन…

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‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में प्रोफ़ेसर रवि रंजन का विचारोत्तेजक आलेख—“आभासी दोस्ती के दौर में ‘दोस्त’: अरुण कमल की कविता का एक अंतर्पाठीय विमर्श” पेश है ।  समकालीन समय में जब मानवीय संबंधों की संरचना तीव्र गति से बदल…

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प्रेमचंद के बाद से आज तक की हिंदी कहानी के संवेदना और स्वरूप से पाठक भलीभांति परिचित हैं। कहानी आंदोलन अर्थात् किसी विचारधारा से नहीं वरन् जीवन से जन्म लेती है , वही असल कहानी होती है और सर्वमान्य। यह…

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हिंदी कविता के साठोत्तर दौर में जब अधिकांश आवाज़ें नारों और प्रत्यक्ष विद्रोह में मुखर थीं, तब वेणु गोपाल एक अलग, गहरी और शांत लेकिन अत्यंत शक्तिशाली स्वर लेकर आए। उनकी कविता न चीखती है, न नारे लगाती है, फिर…

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