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कॉर्पोरेट कार्य-संस्कृति, तकनीक-संचालित निगरानी और संस्थागत दबावों के बीच पिसते आधुनिक मनुष्य के नैतिक द्वंद्व को समझना आज के समय की एक बड़ी बौद्धिक एवं सामाजिक चुनौती है। ‘रचना समय’ के पाठकों के लिए इस परिप्रेक्ष्य में वरिष्ठ आलोचक प्रो. रवि रंजन का…

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कुँवर नारायण के जन्मशती वर्ष के अवसर पर ‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन का, आधुनिक हिंदी कविता के शीर्ष कवियों में परिगणित कुँवर नारायण की प्रसिद्ध कविता ‘चक्रव्यूह’ पर एक गहन, बहुस्तरीय और विचारोत्तेजक अनुशीलन प्रस्तुत किया जा रहा है।…

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 ‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन द्वारा कुँवर नारायण की कविता ‘घर रहेंगे’ का पुनर्पाठ प्रकाशित किया जा रहा है। इसमें ‘घर रहेंगे’ को मृत्यु, समय और मनुष्य के अस्तित्व के प्रश्नों के बीच रखकर पढ़ा गया है। कविता…

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‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन का श्रीकांत वर्मा की कविता ‘कोसल में विचारों की कमी है’ पर केन्द्रित आलेख प्रकाशित किया जा रहा है, जिसमें इस कविता को सत्ता, इतिहास और विचार के अन्तर्सम्बन्धों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में…

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‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन द्वारा रघुवीर सहाय की सुप्रसिद्ध कविता ‘आपकी हँसी’ का पुनर्पाठ प्रकाशित किया जा रहा है जिसमें इस कविता के सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक आशयों की पड़ताल है। कविता में शोषण, लोकतंत्र, भ्रष्टाचार और लाचारी जैसे…

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