तरुण भटनागर का ‘ मामलुक ‘ उपन्यास इब्नबतूता की क़लम के ज़रिए बल्ख़ से लेकर दिल्ली के गुलाम बाज़ारों ,शाही महलों की हक़ीक़त और सत्ता संघर्ष का लेखा नहीं , बल्कि स्त्री – अस्मिता के लिए लड़ने वाले बादशाह –…
ऋतुराज के निधन का समाचार पाकर मन व्यथित है । उनका जाना केवल एक कवि का चले जाना नहीं, बल्कि उस आत्मीय और बेबाक आवाज़ का मौन हो जाना है, जो जीवन की विडम्बनाओं के बीच मनुष्य की गरिमा, संवेदना और प्रतिरोध को…
समकालीन हिंदी कविता में अरुण कमल की उपस्थिति साधारण जीवन की खुरदुरी हक़ीक़त और अनुभव की सूक्ष्म परतों को रचने वाले एक सशक्त कवि के रूप में रही है। उनके सद्य:प्रकाशित कविता संग्रह ‘किराये का घर’ में शामिल ‘धूप में नींद’ कविता…
प्रस्तुत आलेख में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन ने कुँवर नारायण की दार्शनिक कविता ‘स्वयं की अभिव्यक्तियाँ’ का एक गहन-गंभीर, बहुआयामी और सूक्ष्म पुनर्पाठ प्रस्तुत किया है। कविता का केंद्रीय प्रश्न—’क्या यही हूँ मैं!’—केवल व्यक्ति की निजी पहचान की तलाश भर नहीं है, बल्कि…
कृष्ण कल्पित को विवाद का पर्याय माना जाता है। लेकिन क्या यह विवाद एक तंज नहीं जो असंगत बातों पर चोट करता है। कृष्ण कल्पित एक ऐसे रचनाकार हैं जो मुखर रहकर अपना रचना- धर्म निभाते हैं जो आज लुप्तप्राय…
