भारत में मानसिक स्वास्थ्य को अभी भी गंभीरता से नहीं लिया जाता, जबकि सचाई यह है कि युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य की समस्या एक गंभीर रूप ले चुकी है। उनमें तनाव, अवसाद और चिंता तेजी से बढ़ रही है। एक अनुमान है कि 10-19 वर्ष के प्रत्येक 7 किशोरों में से 1 मानसिक स्वास्थ्य समस्या से ग्रस्त है। हमने अपने परिवार, पड़ोस और मित्रों के बीच ऐसे कई नौजवानों को देखा है, जिनमें इस तरह के लक्षण पाए जाते हैं। उनके मां-बाप आमतौर से इस बारे में बात करने से कतराते हैं। एक मनोचिकित्सक मित्र से बातचीत में भी इस तरह की चीज़ें सामने आईं। जिस परिवार में ऐसा कोई बच्चा होता है, उसके ऊपर क्या बीतती होगी, यही संजय कुंदन की इस कहानी का विषय है। इसमें जो कुछ भी व्यक्त हुआ है, कथाकार का जाना-पहचाना है । पाठक चाहें तो इसे एक सत्यकथा की तरह पढ़ सकते हैं।
-हरि भटनागर

कहानी:

अब इसके बाद बचता ही क्या है! उनकी जिंदगी एक दिन इस मोड़ पर आ खड़ी होगी, यह तो पारसनाथ ने सपने में नहीं सोचा था। उन्होंने बुरे से बुरे दिनों की कल्पना की थी, पर यह क्या है। यह तो…।
क्या करें वह? निकल लें कहीं भी ऐसे ही। साधु बन जाएं,लेकिन मन की टीस तो तब भी रहेगी। उनके भीतर जो हाहाकार मचा हुआ है, वह तो पीछा छोड़ेगा नहीं। फिर क्या पर्दा गिरा दें? पटाक्षेप हो इस जीवन का? सारा खेल ही खत्म हो जाए!
इस महानगर में ऊंची इमारतों से, फ्लाईओवरों से कूदकर या मेट्रो लाइन पर छलांग लगाकर कोई न कोई अपनी जान देता रहता है। दो तरह के लोग मरते हैं। या तो नौजवान जो आमतौर पर प्रेम में चोट खाए रहते हैं या फिर 40-50 के अधेड़ जो कारोबार में असफल होने या भारी-भरकम कर्ज न चुका पाने के कारण मौत को गले लगा लेते हैं। पारसनाथ की गिनती इन दोनों में नहीं होती। जब उनकी खुदकुशी की वजह सामने आएगी, तो लोग आश्चर्य करेंगे।
हालांकि आत्महत्या के खिलाफ थे वह। इसे वह कायरता मानते थे। लेकिन ऐसे जीने का भी क्या मतलब, जब जीवन का सूत्र ही हाथ से छूट जाए।
इसी ऊहापोह में पारसनाथ तेजी से चले जा रहे थे। कोई देखता तो यही सोचता कि इन्हें कहीं पहुंचने की जल्दी है। पर पहुंचना कहां है, यही तो उन्हें नहीं पता। कोई परिचित मिलता तो आश्चर्य कर सकता था कि इस वक्त रात में घर के कपड़े और हवाई चप्पल में वह कहां जा रहे हैं। तमाम लोग घरों की ओर लौट रहे थे और पारसनाथ घर से दूर चले जा रहे थे।
कौन यकीन करेगा कि अपने बेटे सत्यम की हरकतों से दुखी होकर पारसनाथ इस तरह से घर से निकल पड़े हैं। कोई सोच भी नहीं सकता कि सत्यम एक दिन ऐसी हरकत करेगा। मां-बाप से झगड़ना कोई बड़ी बात नहीं लेकिन सत्यम ने तो हदें पार कर दीं। शहर के नामी पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले और पढ़ाई में हमेशा अ्व्वल रहने वाले लड़के की भाषा ऐसी कैसे हो गई। जोर-जोर से चिल्लाना और गाली-गलौज पर उतर आना, यह सब कैसे हो गया।
पारसनाथ अब तक झोपड़पट्टी के लोगों पर हंसते थे। कुछ साल पहले तक सत्यम कभी-कभार ऊंची आवाज में बोलता तो वह उसे कहते, ‘क्या झोपड़पट्टी वालों की तरह कर रहे हो। तुम भी बन जाओ उन्हीं की तरह। वहां शाम में दारू पीकर बाप-बेटे गाली-गलौज और मारपीट करते रहते हैं। क्या अपने घर को वैसा ही बनाना चाहते हो?’ अब उनका घर वैसा ही बनता जा रहा था। पड़ोसी उन्हें लेकर खुसुर-फुसुर करने लगे थे। पिछले ही रविवार शास्त्री जी ने बात को घुमाकर कहा, ‘शर्मा जी आप लोगों के बारे में क्या अनाप-शनाप बक रहे थे। कह रहे थे कि आपके घर से देर रात लड़ने-झगड़ने की आवाज आती रहती है। मैंने उनसे साफ कह दिया कि आपको कोई गलतफहमी हो गई है। पारस बाबू का घर इस सोसाइटी में सबसे सभ्य और शांत घर है। फिर झगड़ा करेगा कौन? सत्यम जैसे शांत और सुशील लड़के तो कम ही होते हैं।’
पारसनाथ को काटो तो खून नहीं। अगर पारसनाथ बता दें कि सत्यम उन लोगों से क्या व्यवहार करता है, तो शायद सबको झटका लगेगा। या फिर हो सकता है, सबको सचाई का पता हो। मन ही मन हंसते होंगे वे। यहां तो हर किसी की नजर एक दूसरे की पराजय पर लगी रहती है। कोई नहीं चाहता अगला खुश और संतुष्ट हो या तरक्की करे।
सत्यम को लेकर पारसनाथ से जलने वाले कम नहीं रहे। आखिर किसी के बच्चे पढ़ाई और अन्य मामलों में सत्यम के आगे ठहरते नहीं थे। सत्यम स्कूल के दिनों में हमेशा अव्वल आता रहा। अन्य गतिविधियों में भी वह हमेशा आगे रहता। सोसाइटी के लोग पारसनथ से कहते, ‘आपको क्या समस्या है। आपको तो लायक बेटा मिला हुआ है। “
‘लायक बेटा!’… उस लायक बेटे ने आजकल उनका जीना हराम कर रखा था। वह समझ नहीं पा रहे थे कि इससे कैसे निपटें। जीवन की बड़ी से बड़ी उलझनें वह सुलझा लिया करते थे। अपने दायरे में उन्हें एक बड़ा रणनीतिकार माना जाता था। उनके दोस्त अपनी निजी समस्याओं में उनसे सलाह लेते थे। उनके बॉस भी खुरपेच करने वाले कर्मचारियों को रास्ते पर लाने की रणनीति उनसे पूछकर बनाया करते थे। लेकिन अब एक शैतान लड़का, जो उन्हीं का अंश था, उनके लिए चुनौती बन गया था। सत्यम के व्यवहार से पारसनाथ की पत्नी सरिता कहीं ज्यादा परेशान थी। पर वह चुपचाप सब कुछ सह रही थी।
करीब एक महीना से उन्हें सत्यम के व्यवहार में बदलाव दिखने लगा था। वह छोटी-छोटी बात पर बहुत ज्यादा नाराज हो जाता था। घर में कुछ भी उसके मन के विपरीत होता, तो वह बौखला जाता और अपने मां-बाप को कोसने लगता। कॉलेज जाते समय अगर उसे शर्ट या जूता जगह पर नहीं मिलता तो वह चिल्ला पड़ता। इसी तरह खाने-पीने में नखरे करता। कई बार खाना परोसे जाने के बाद कहता कि ये चीजें उसे पसंद नहीं। फिर बेचारी सरिता उसके लिए कुछ और बनाती। या फिर पास के रेस्टोरेंट से कुछ मंगवाया जाता।
एक दिन उसने कहा, ‘ओह। हम कितने गरीब हैं। कुछ नहीं है हमारे पास।’
पारसनाथ को यह बात चुभ गई। उन्होंने कहा, ‘कैसे होगा। हमने औकात से ज्यादा तुम पर खर्च किया। तुम्हें महंगे स्कूल में पढ़ाया। महंगी कोचिंग दिलाई। तुम्हारी हर डिमांड पूरी की? इन सबसे कुछ बचता तब तो कुछ सामान जोड़ते।’
सत्यम ने कहा, ‘क्यों पढ़ाया। नहीं पढ़ाते। कम से कम हम ढंग की सोसाइटी में तो रहते।’ पारसनाथ आश्चर्य से उसका मुंह देखते रह गए। उन्हें यकीन नहीं हो रहा हो रहा था कि इस लड़के में इतना बदलाव कैसे आ गया। पहले तो वह इस तरह की बातें नहीं किया करता था। वह जो भी खरीद देते, उसे पहन लेता और खुश होता।
एक दिन देर से आने पर उन्होंने टोका तो वह चिल्ला पड़ा ‘मैं जब चाहूं तब आऊं, तुम्हारा गुलाम हूं क्या।’
‘गुलाम की बात नहीं है।’ पारसनाथ ने उसे समझाते हुए कहा, ‘तुम्हारी चिंता लगी रहती है। एक फोन तो कर देते।’
‘मैं नहीं करूंगा फोन।’ यह कहकर वह बड़बड़ाता हुआ अपने कमरे में चला गया। सरिता उसके पीछे-पीछे कमरे में गई तो वह भड़क उठा, ‘तुम ऐसे ही चली आई मेरे कमरे में। मेरी कोई प्राइवेसी है कि नहीं।’
फिर उसने एक फरमान सुनाया, ‘मेरे कमरे में कोई ऐसे ही मुंह उठाए नहीं चला आएगा। जिसे आना होगा, वह दरवाजे पर नॉक करेगा।’ अगले दिन से उसने सबके साथ खाना भी छोड़ दिया। उसने सरिता से कहा कि उसे अपने पापा से नफरत है। उनके साथ बैठकर खाना उसे मंजूर नहीं।
उस दिन बड़े व्यथित हुए थे पारसनाथ। सत्यम उनसे नफरत करे, लेकिन वह ढंग से तो रहे। वह न जाने किस रास्ते पर चला जा रहा था। अब वह अपने बारे में ज्यादा बताता भी नहीं था। हालांकि कभी-कभार खुद ही अपने बारे में बात करने लगता लेकिन कुछ ज्यादा पूछने पर नाराज हो जाता। यह समझना मुश्किल था कि कब उसका मूड कैसा हो जाएगा।
उसे लेकर क्या-क्या सपने देखे थे उन्होंने। वह और सरिता, दोनों अपने को भूल गए थे। अपनी हर इच्छा को ताक पर रख दिया। घूमाना-फिरना छो़ड़ दिया, दोस्तों-रिश्तेदारों से मिलना लगभग छोड़ दिया। सिर्फ इसलिए कि सत्यम को उनका साथ मिले, अच्छा माहौल मिले। उसे किसी बात की तकलीफ न हो। वह खूब पढ़े और अच्छे नंबर से पास हो। फिर देश के नामी विश्वविद्यालय में पढ़े। अच्छा करियर बनाए। जो कुछ पारसनाथ खुद हासिल नहीं कर पाए, उनका बेटा हासिल करे।
कई बार तो उन्हें महसूस होता था कि वह अपने शरीर में नहीं हैं। वह बस आत्मा हैं। सत्यम का शरीर ही उनका शरीर है। उसे खाते देखते तो लगता कि खाना उनके पेट में पहुंच रहा है। जब कभी उसे दर्द होता तो वह बेचैन हो जाते। जब तक सत्यम सामान्य नहीं होता, उन्हें राहत नहीं मिलती।
जब सत्यम को बारहवीं में अपेक्षा से कम अंक मिले, तब पारसनाथ को महसूस हुआ कि जीवन कोई रासायनिक प्रक्रिया नहीं है कि निर्धारित मात्रा में विभिन्न चीजों को मिलाने से अपेक्षित वस्तु बना ली जाए। यह जरूरी नहीं कि एक बच्चे को अच्छी शिक्षा और अनुकूल माहौल देने से वह परीक्षा में बहुत ज्यादा अंक ले ही आए। इसके लिए बहुत सी बातें मायने रखती हैं। फिर संयोग या प्रारब्ध भी कोई चीज है। उन्होंने वादा किया था कि 95 प्रतिशत लाने पर वह सत्यम को बाइक खरीद कर देंगे। इससे काफी कम नंबर लाने के बावजूद उन्होंने उसे बाइक खरीद कर दी। हालांकि इसके लिए घर का बजट गड़बड़ा गया। उन्हें भरपाई के लिए दफ्तर के अलावा प्राइवेट काम करने पड़े।
सरिता का कहना था कि सारी गड़बड़ी तब शुरू हुई जब से सत्यम एक लड़की के चक्कर में पड़ा। कुछ समय पहले बहुत खुश होकर उसने अपनी मां को बताया था कि उसकी एक लड़की से दोस्ती हो गई है। फिर यह भी स्पष्ट किया था कि यह सामान्य दोस्ती नहीं है। जब सरिता ने यह बात पारसनाथ को बताई तो उन्होंने इसे सहजता से लिया। अब इस उम्र में यह सब तो होना ही है, लेकिन वह जल्दी ही इस बात से चिंतित हो गए कि कहीं उसकी पढ़ाई न गड़बड़ा जाए। वह घुमा-फिराकर उसे सुनाते रहते कि इस उम्र में यह सब करके कोई फायदा नहीं है। पहले आदमी अपने को सेटल कर ले, फिर तो इन सब के लिए पूरी उम्र पड़ी हुई है। इस तरह की बातों पर सत्यम कुछ नहीं बोलता। अब वह अपने-आप मे रहता। कभी भी घर से निकल जाता और बहुत देर से आता। समझ में नहीं आता था कि कब उसका मूड क्या हो जाएगा। कभी वह बेहद खुश रहता तो कभी बेहद उदास। एक बार उसके कॉलेज से उसके विभागाध्यक्ष का फोन आया कि सत्यम अक्सर अपने टीचरों के साथ बेवजह बहस करता है। पारसनाथ फोन पर ही गिड़गिड़ाए। उन्होंने सत्यम की ओर से माफी मांगी।
अब कई बार ऐसा होता कि सत्यम की दोस्त स्कूटी से सोसाइटी के गेट पर चली आती। सत्यम गेट पर उससे घंटों बातें करता रहता। इस पर सरिता बहुत परेशान हो जाती थी क्योंकि जब तक दोनों गेट के आसपास रहते, सोसाइटी के कई लोगों की नज़र उधर ही टंगी रहती। यह मध्यवर्गीय लोगों की सोसाइटी थी, यहां इस तरह के मामलों में बात का बतंगड़ बन जाता था। पारसनाथ के परिवार की और खुद सत्यम की यहां बड़ी अछि छवि थी। पारसनाथ और सरिता नहीं चाहते थे कि सत्यम के बारे में ऐसी-वैसी बातें फैलें। पारसनाथ और सरिता ने उसे समझाया कि वह उस लड़की के साथ गेट पर इस तरह बात न करे। उसे मिलना है तो दूर कहीं चला जाए। या फिर उसे घर बुला ले।
ऐसा कहने के दो ही दिन बाद ही उसने सूचना दी कि उसकी गर्लफ्रैंड घर आने वाली है। उस दिन सत्यम बड़े तनाव में था। कभी कहता सोफा इधर से हटाकर उधर रख दो, तो कभी कहता घर के पर्दे बदल दो। सरिता ने एकाध बार आपत्ति की तो वो भड़क गया। उसने कहा कि उसकी किस्मत खराब है। वह गंवार, देहातियों के बीच पैदा हो गया है। पारसनाथ सब कुछ सुन रहे थे लेकिन उन्होंने कुछ नही नहीं कहा। वह नहीं चाहते थे कि घर मे तनाव हो। हालांकि वह समझ नहीं पा रहे थे कि सत्यम आखिर इतना परेशान क्यों है। घर का माहौल कुछ ऐसा बन गया था जैसे बारात आ रही हो या कोई वीआईपी आ रहा हो। हालांकि यह छुट्टी का दिन था फिर भी पारसनाथ ने सोचा कि वह चुपचाप निकल लें। कौन फंसे इन चक्करों में। वह यह सोच ही रहे थे कि सत्यम ने आकर एक तरह से आदेश सुनाया, ‘तुम भी रहोगे। मै उसके घर जाता हूं तो उसकी मम्मी और पापा दोनों मुझसे बाते करते हैं। और हां, तुम फिलॉसफी मत झाड़ने लगना उसके सामने या अजीब गब्दू जैसा मुंह मत बना लेना।’
पारसनाथ को लगा, वे बुरे फंसे। अब एक कठिन परीक्षा से उन्हें गुजरना होगा।
खैर, वह लड़की जिसका नाम रुचि था, आई और गई। पारसनाथ और सरिता ने अपनी ओर से पूरी कोशिश की कि उसके स्वागत-सत्कार में कोई कमी न रह जाए। सरिता शुरू से अंत तक उनकी खिदमत में लगी रही। कभी पानी लाती तो कभी नमकीन तो कभी कोल्ड ड्रिंक।
पारसनाथ को जिस बात की आशंका थी, वही हुआ। वे लोग पास नहीं हो पाए। दूसरे दिन सत्यम का मुंह लटका हुआ था। बार-बार वह भुनभना रहा था, ‘मेरी तो किस्मत खराब है।’
पारसनाथ ने पूछा, ‘ऐसा क्या हो गया कि तुम किस्मत को कोस रहे हो।’
सत्यम ने खीझकर कहा, ‘तुम लोगों ने तो बर्बाद करके रख दिया मुझे।’
‘क्या किया हमलोगों ने?’
‘तुम लोगेों को मैंने कहा था कि रुचि से ढंग से पेश आओ, लेकिन नहीं…तुम लोगों को तो लगता है कि जैसे संसार में सबसे बुद्धिमान आदमी तुम्हीं लोग हो।’
‘ऐसा क्या कर दिया हमने?’ परसनाथ ने अपना स्वर नरम बनाते हुए सवाल दोहराया।
स्त्यम फट पड़ा, ‘लगे उसको उपदेश झाड़ने।’
‘कहां उपदेश झाड़ा… यही तो कहा कि पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान दो।’
‘इसका तो यही मतलब हुआ न कि तुम्हें उसका घर आना पसंद नहीं आया।’
‘इसका यह मतलब कैसे हुआ?’
‘तुम्हारे कहने का अंदाज कुछ ऐसा था कि हमलोग पढाई-लिखाई छोड़कर केवल घूमते:फिरते रहते हैं।’
‘अरे भाई मैं और क्या कहता। मैं तो यही कह रहा था कि कम्पीटीशन बहुत है आजकल। अच्छा करियर बनाने के लिए बहुत पढ़ाई की जरूरत है।’
‘पढ़ाई के अलावा तुम कोई और बात नहीं कर सकते थे।’
‘मैं और क्या बात करता।
“यही तो तुम्हारी प्रॉब्लम है।’ यह कहकर सत्यम ने टेबल पर रखा एक ग्लास ऊपर उछाल दिया जो सीधा ट्यूबलाइट में जा लगा। ट्यबलाइट फूट गई और अंधेरा हो गया। फिर सत्यम ने अपना कमरा अंदर से बंद कर लिया और जोर-जोर से रोने लगा।
पारसनाथ और सरिता सकते में आ गए। उन्हें कोई उपाय ही नहीं सूझ रहा था। उन्हें कई तरह की आशंका सताने लगी थी। ऐसी ही हालात में बच्चे कोई खतरनाक कदम उठा लेते हैं। उन्होंने देर तक दरवाजा पीटा, पर सत्यम ने दरवाजा नहीं खोला। पारसनाथ रात भर उसके दरवाजे के आसपास टहलते रहे। न खाया-पिया, न सोये। बड़ी मुश्किल से रात बीती।
रात की घटना की छाप पारसनाथ के चेहरे पर दूसरे दिन साफ नजर आ रही थी, जिेसे उनके मित्र मेहताजी ने पढ़ लिया। पारसनाथ के दफ्तर में एक मेहता जी ही थे, जिनसे पारसनाथ कभी-कभार अपने मन की बात कर लिया करते थे। हालांकि सत्यम को लेकर आज तक कोई बात नहीं हुई थी।
मेहता जी ने जब टोका तो पारसनाथ ने पहले टालने की कोशिश की। मेहता जी ने मुस्कराकर कहा, ‘अब मुझसे मत छुपाओ। बता दो, मन हल्का हो जाएगा।’
दोनों ऑफिस से बाहर निकलकर चाय की दुकान पर आए। पारसनाथ ने चाय पीते हुए रात की सारी बात बता दी। मेहता जी बोले, ‘अरे, आजकल हर घर में यही हो रहा है। इस जेनरेशन का यार कुछ समझ में नहीं आता। मुझे लगता है कि तुम्हें किसी सायकियाट्रिस्ट से मिलना चाहिए।’
पारसनाथ चौंके, ‘क्या तुम्हें लगता है कि सत्यम पागल हो चुका है?’
‘यार, सायकियाट्रिस्ट की बात सामने आते ही हमें लगता है कि मामला पागलपन का है। ऐसा नहीं है। आज के बच्चों पर मेंटल प्रेशर बहुत ज्यादा हैं। ये सब डिप्रेशन के लक्षण हैं। मनोचिकित्सक कोई रास्ता बता सकते हैं।’
‘लेकिन सत्यम को किसी मनोचिकित्सक के पास ले जाना आसान नहीं है। वह तो हमारी कोई बात मानता नहीं है। वह तो स्वीकार ही नहीं करेगा कि उसके साथ कोई समस्या है।’
मेहता जी कुछ सोचकर बोले, ‘कोई बात नहीं। तुम तो मनोचिकित्सक से मिल सकते हो। तुम उन्हें सत्यम के डिटेल्स उन्हें बता सकते हो।’
‘लेकिन किस डॉक्टर के पास जाऊं?’
‘हैं मेरे एक परिचित, डॉ. डिडवानिया। दरअसल वे मेरे फूफाजी के बैचमेट हैं। कई बड़े सरकारी अस्पतालों में रहकर रिटायर हुए हैं। काफी बुजुर्ग हैं। अब अपने घर पर ही प्रैक्टिस करते हैं। मैं उन्हें फोन कर दूंगा। तुम कल ही चले जाओ।’
दिल्ली के एक पॉश इलाके में डॉ. डिडवानिया का घर था। पारसनाथ ने उनसे मिलने के लिए आधे दिन की छुट्टी ली थी। उन्होंने सरिता को भी साथ ले लिया था क्योंकि सत्यम के बारे में ज्यादा जानकारी वही दे सकती थी।
रास्ते भर पारसनाथ काफी तनाव में रहे। करीब एक घंटे के सफर में ऑटो में बैठे हुए कई डरावने ख्याल उन्हें परेशान करते रहे। आखिर जिनका कोई बच्चा पागल हो जाता होगा, उनके ऊपर क्या गुजरती होगी। कोई सपना देखना तो दूर, वे बस यही सोचते होंगे कि बच्चा किसी तरह जीवित रहे। पारसनाथ के एक टीचर का बेटा पागल था। कई बार वह मोहल्ले में यूहीं भटकता दिखाई देता। गली के कुछ बदमाश उस पर पत्थर फेंकते थे। वह घायल हो जाता था। उसके घुटनों से खून टपकता रहता था। ऐसी हालत में जब वह घर लौटता होगा, तब उसके मां-बाप पर क्या बीतती होगी, यह सोचते ही पारसनाथ को लगा कि उनके भीतर से विस्फोट की तरह रुलाई बाहर आएगी, लेकिन उन्होंने उसे विकट खांसी में तब्दील कर दिया। सरिता ने तुरंत उन्हें पानी की बोतल निकाल कर दी। लेकिन एक बुरे ख्याल से पीछा छूटा तो दूसरी भयावह आशंका सामने आ खड़ी हुई। कहीं सत्यम ने ड्रग्स की तरफ क़दम बढ़ा दिए तो। ड्रग्स का मतलब है तिल- तिल कर मरना। फिर पारसनाथ की ज़िंदगी का यही मतलब रह जाएगा- बेटे की मौत का इंतजार। एक आदमी को अपने जवान बेटे की लाश देखकर कैसा लगता होगा? यह सोचते ही पारसनाथ को लगा कि उनका सिर फट जाएगा। वह तो गनीमत रही कि डॉक्टर की कोठी सामने दिख गई। मकान का नंबर दूर से ही झलक रहा था।
जब पारसनाथ और सरिता डॉ. डिडवानिया की कोठी के सामने पहुंचे तो उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि इस बंगले में घुसना कहां से है। उसमें लोहे के बड़े-बड़े तीन गेट दिख रहे थे। पारसनाथ अंदाजा लगाने लगे कि दिल्ली के इस महंगे इलाके में इतनी बड़ी कोठी की कीमत क्या होगी। क्या एक मनोचिकित्सक की आमदनी इतनी ज्यादा होती है। हो सकता है डॉ. डिडवानिया खानदानी रईस हों।
पारसनाथ इन्हीं सब में उलझे हुए थे कि सरिता ने विशाल दीवारों में एक छोटा सा कॉलबेल ढूंढ निकाला। उसे दबाने के कुछ ही सेकंड बाद एक फाटक धीरे-धीरे खुला। एक छोटे कद के गोरे-चिट्टे बूढ़े ने गेट खोला था। उसकी झक सफेद दाढ़ी संतों जैसी थी। उसने पायजामा और बनियान पहन रखी थी। पारसनाथ ने सोचा, क्या डॉक्टर साहब ने इतना बूढ़ा चौकीदार रखा हुआ है। या फिर शायद यह उनका कम्पाउंडर हो।
बूढ़े ने उन्हें अंदर आने का इशारा किया। कम्पाउंड में शानदार बागवानी का नजारा दिख रहा था। बीचोंबीच मखमली घास लगाई गई थी और चारों तरफ फूल खिले थे। गंदगी का नामोनिशान तक न था। पारसनाथ को यकीन नहीं हो रहा था कि दिल्ली में इतनी सुंदर जगह भी हो सकती थी। यहां परम शांति थी।
बूढ़ा आगे-आगे चल रहा था और पारसनाथ व सरिता पीछे-पीछे। वे एक सीढ़ी चढ़कर एक बड़े से कमरे में आए। उस विशाल कमरे में नक्काशी वाले शानदार फर्नीचर रखे थे। एक सोफे की तरफ इशारा कर बूढ़े ने कहा, ‘बैठिए।’
पारसनाथ ने थोड़ा सकुचाते हुए कहा, ‘जी डॉक्टर साहब से कहिए, मैं पारसनाथ….आज सुबह मेहता जी ने उन्हें फोन किया होगा।’
‘ मैं ही डॉ. डिडवानिया हूं।’ यह कहकर बूढ़ा सामने की कुर्सी पर बैठ गया। पारसनाथ जैसे आसमान से गिरे। वह कुछ और कहते उससे पहले ही डॉ. डिडवानिया ने पूछा, ‘आपका बेटा नहीं आया?’
‘नहीं, वो कॉलेज गया है। फिर वो आने के लिए…।’
‘मैं समझ गया। क्या वह ड्रग्स लेता है?’
डॉ. डिडवानिया के अचानक इस तरह मुद्दे पर आने से पारसनाथ को झटका लगा। उन्होंने हड़बड़ा कर कहा, ‘नहीं, नहीं।’
‘आर यो श्योर?’ डॉ. डिडवानिया के चेहरे पर कोई भाव न था। वह निर्विकार लग रहे थे। वह बहुत-बहुत धीमे-धीमे बोल रहे थे, जैसे किसी फिल्म में कोई शातिर खलनायक बोलता है।
‘क्या वह गाली-गलौज भी करता है?’
‘हां, थोड़ा-बहुत इधर करने लगा है। पहले जरा भी नहीं करता था।’
तभी सरिता ने मोर्चा संभाला। उसने कुछ इस अंदाज में सब कुछ बताना शुरू किया जैसे सब कुछ रट कर आई हो। यह सुनने के बाद डॉ. डिडवानिया कुछ देर खामोश रहे। फिर गला खखारकर बोले, ‘बच्चों पर बहुत प्रेशर है।’
‘लेकिन मैंने तो आज तक कोई प्रेशर सत्यम पर नहीं डाला।’ पारसनाथ ने कहा।
डॉ. डिडवानिया ने दाढ़ी खुजाते हुए कहा, ‘आप डालिए चाहे मत डालिए। प्रेशर तो उन पर आ ही जाता है। अपने दोस्तों से समाज से।’
यह बात पारसनाथ को बहुत जंची नहीं। क्योंकि इस तरह की भाषणबाजी तो वह सुनते ही रहे थे या लेख में पढ़ते ही रहे थे। उन्होंने आपत्ति की, ‘लेकिन डॉक्टर साहब, इसी समाज में और लड़के भी रहते हैं। उन पर भी दबाव होता होगा। मगर वे सब तो हमारे बेटे की तरह हरकत नहीं करते।’
डॉ. डिडवानिया चुप होकर पारसनाथ का मुंह ताकने लगे। पारसनाथ ने अपनी बात जारी रखी, ‘इसी माहौल में रहने वाले लड़के पढ़ाई में अच्छा करते हैं। मां-बाप की बात सुनते हैं। अच्छे से रहते हैं। आखिर हमारी परवरिश में क्या गड़बड़ी हो गई कि…।’
डॉ. डिडवनिया पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ा। वह अपनी रौ में कहने लगे, ‘आपने उसकी हर इच्छा पूरी की। उसे लगने लगा सब कुछ उसी के अनुसार चलेगा। अब जब वह घर से बाहर निकला है, कुछ भी उसके अनुसार नहीं हो रहा। इससे वह चिढ़ जा रहा है।’
‘अच्छा।’ पारसनाथ ने फिर टोका, ‘आप कह रहे हैं कि हमने उसे प्यार दिया, उसकी हर ख्वाहिश पूरी की, तो गलत किया। जबकि उसका कहना है कि मैंने उसके लिए अब तक कुछ किया ही नहीं। ….आखिर एक बाप क्या करे। अपने बच्चे से प्यार करना भी गुनाह हो गया। उसका ख्याल रखो तो कहा जाता है कि आप हेलिकॉप्टर पैरंट हो। हर समय उसके पीछे लगे रहते हो। न रखो तो कहा जाता है कि आप बच्चों से डॉयलॉग नहीं रखते, इसलिए बच्चा अपने को अकेला महसूस कर रहा है। अरे भाई, क्या करे मां-बाप। कैसे पाले बच्चे को। क्या प्रेम और ममता को इंच टेप से नापा जा सकता है।’ पारसनाथ की झुंझलाहट बढ़ गई थी। उनकी आवाज तेज हो गई थी। सरिता ने उनकी तरहत्थी कस कर दबाई। वैसे डॉ. डिडवानिया पर उनकी बातों का कोई असर नहीं हो रहा था। उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा, ‘…..अभी उसमें काफी एनर्जी है। वह निकल रही है। इसलिए वह थोड़ा वॉयलेंट हैं। एकाध-दो साल बाद आक्रामकता कम हो जाएगी। अठारह की उम्र होती ही ऐसी है। बहुत गुस्सा आता है। उसे बताइए कि जब गुस्सा आए तो यह एक्सरसाइज करे।’
यह कहकर वे खुद आंख बंद कर बैठ गए और सांस लेने और छोड़ने का तरीका बताने लगे। पारसनाथ ने सोचा कि सत्यम भला उनकी बात मानकर व्यायाम क्यों करेगा।
थोड़ी देर बाद डॉ. डिडवानिया ने आंखें खोलीं और कहा, ‘घर में पॉजिटिव माहौल रखिए। उसे नहीं लगना चाहिए कि आप लोग उससे नाराज हैं। उसके अनुसार बात करिए। ….उसका मनपसंद खाना बनवाइए। ऐसी कोई बात मत कीजिए, जो उसे पसंद न हो।’
‘उसे कोई दवा वगैरह देने की जरूरत है?’ सरिता ने सवाल किया। डॉ. डिडवानिया बोले, ‘उसका मामला कोई ऐसा नहीं कि मेडिसिन दिया जाए। वो ऐसे ही ठीक हो जाएगा। थोड़ा सबर रखिए।’
पारसनाथ और सरिता उठ गए। डॉ. डिडवानिया उन्हें छोड़ने गेट तक आए। पारसनाथ संतुष्ट नहीं थे। वह कुछ ज्यादा उम्मीद लेकर आए थे। उन्हें लग रहा था कि डॉक्टर साहब कोई ठोस बात बताएंगे। पर उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा जो पारसनाथ को पता न हो। वह सत्यम के व्यवहार में आए बदलाव के बाद गूगल पर किशोर मनोविज्ञान को लेकर बहुत कुछ पढ़ चुके थे। लेकिन काफी कुछ पढ़ने और डॉ. डिडवानिया से मिलने के बाद भी उन्हें कोई रास्ता नहीं मिला था। उनके भीतर सवाल उठा कि सायकियाट्री में वाकई कोई दम है या यह एक बौद्धिक कवायद भर है? हां, डिडवानिया से मिलकर सरिता बेहद संतुष्ट थी। इस बात से पारसनाथ को राहत मिली।
बहरहाल डॉ. डिडवानिया के निर्देशों पर दूसरे ही दिन से अमल शुरू हो गया। सत्यम की हर इच्छा पूरी की जाने लगी। वह पहले की तरह चिढ़ से भरा रहता। छोटी-छोटी बातों पर चिल्ला उठता। जैसे पारसनाथ बाथरूम में देर लगाते तो वह चिल्लाकर कहता- ‘अरे निकलो यार।’ पारसनाथ कुछ नहीं कहते, चुपचाप निकल आते। ऐसा लग रहा था जैसे सत्यम मालिक हो और पारसनाथ व सरिता उसके कर्मचारी। लेकिन कई बार वह एकदम मासूम बन जाता जैसे अपने बचपन में हुआ करता था। वह पारसनाथ और सरिता के बीच आकर लेट जाता और भविष्य की बातें करना लगता। मां से कहता, ‘ जब मेरी नौकरी लग जाएगी तब में तुम्हारे लिए खूब सारे कपडे खरीदूंगा। मुझे पता है तुम बहुत कुछ खरीदना चाहती हो पर खरीदती नहीं। और हां यह मकान भी बदलना है। किसी अच्छे इलाके में चलकर रहना है।’
पहले इस तरह की बातों से पति-पत्नी खुश हुआ करते थे पर अब सतर्क हो जाया करते थे कि पता नहीं कब ज्वालामुखी फट पड़े। कई बार जब पारसनाथ ऑफिस से लौटकर आते सत्यम कहता चलो मॉल चलते हैं। थके मांदे होने के बावजूद पारसनाथ तैयार हो जाते। उन्हें डॉक्टर डिडवानिया की बात याद आ जाती। इसी बीच उसके कॉलेज का रिजल्ट आया। सत्यम अच्छे नम्बरों से पास हुआ था। उन्हें थोड़ी हैरानी भी हुई। वह तो उम्मीद छोड़ बैठे थे।
सत्यम कुछ-कुछ पहेली बन गया था। उन्हें पहले लगता था कि वह अपने बेटे को जानते हैं, लेकिन अब लग रहा था कि वह अपने बेटे को जरा भी नहीं जानते। यह बात उन्हें अजीब लगती थी कि जिसे उन्होंने पैदा किया और जिसे एक पौधे की तरह सींचा, जिसकी एक-एक गतिविधि पर नजर रखी, वह एकदम उनके लिए अजनबी और अनजान बन गया।
अब बाप-बेटे का रिश्ता बदल गया था। ऐसा लग रहा था जैसे सत्यम नामक किसी ल़ड़के को, जो कि उनका बेटा नहीं है, कहीं से लाकर पारसनाथ को सौंप दिया गया है। पारसनाथ उसके केयर टेकर हैं। उन्हें उसकी हर हरकत बर्दाश्त करनी है क्योंकि यह उनकी ड्यूटी है।

लेकिन आज पारसनाथ का संयम जवाब दे गया था। आखिर वह भी एक मनुष्य हैं। ऐसा तो हो नहीं सकता कि एक शख्स हर समय बाप बना रहे। अरे सारी जवानी तो बेटे के नाम कर ही दी, अब क्या जान दे दें?
आज दफ्तर से लौटने पर पारसनाथ ने दरवाजे पर दस्तक दी ही थी कि सत्यम की जोर-जोर से बोलने की आवाज आई। पारसनाथ का दिल धड़का कि पता नहीं आज क्या होगा। सरिता ने दरवाजा खोला और इशारे से बताया कि आज फिर उसका नाटक शुरू हो गया है। पारसनाथ तेजी से अपने कमरे में चले आए। पीछे-पीछे सरिता भी आई। कुछ देर बाद सत्यम के कमरे से कोई सामान पटकने की आवाज आई। पारसनाथ से रहा नहीं गया। उन्होंने सत्यम के कमरे में पहुंचकर पूछा, ‘आखिर प्रॉब्लम क्या है।’
सत्यम ने मुंह बनाकर कहा, ‘क्या करोगे जानकर । कोई सॉल्यूशन है तुम्हारे पास? सारा प्रॉब्लम ही तुम लोगों का पैदा किया हुआ है?’
‘वो कैसे?’ पारसनाथ ने पूछा।
सत्यम ने कहा, ‘ पूछो मम्मी से।’
सरिता ने बताया, ‘इसकी दोस्त इससे अलग हो गई है।’
‘और इसके लिए तुम लोग जिम्मेदार हो।’ सत्यम चीखा।
‘लेकिन हमने तो उसे कुछ नहीं कहा।’ पारसनाथ बोले।
‘अरे तुम लोग हो ही ऐसे। गए-गुजरे। साला कहां पैदा हो गया मैं।’ सत्यम भुनभुनाया।
‘तो हमलोगों ने ऐसा किया क्या?’ फट पड़े पारसनाथ।
मामले को संभालते हुए सरिता ने कहा, ‘उसका कहना है कि उसका स्टैंडर्ड हमलोगों से अलग है इसलिए सत्यम से उसकी नहीं बनेगी।’
‘यानी उसको तुमसे लगाव नहीं है, तुम्हारे स्टैंडर्ड से लगाव है। वह इंसान को उसके कैरेक्टर से नहीं रुपये-पैसे से पहचानती है।’ पारसनाथ ने कहा।
‘बड़े कैरेक्टर वाले बनते हो। चाटो कैरेक्चर को लेकर।’ यह कहकर उसने दीवार पर टंगी फैमिली फोटो पर एक लात जमाई। फोटो नीचे गिर पड़ी और उसके कांच पर तीन-चार बेतरतीब रेखाएं खिंच गईं। पारसनाथ ने बड़ी मुश्किल से क्रोध पर काबू किया। तभी सरिता ने सत्यम से कहा, ‘अच्छा ही हुआ, जो तुम्हारी दोस्ती टूट गई। तुम्हारा नेचर उससे मिलता भी नहीं है।’
यह सुनते ही सत्यम आक्रामक हो कर सरिता की तरफ बढ़ा और उसने सरिता की गर्दन पकड़ ली। पारसनाथ से रहा नहीं गया। उन्होंने उसके दोनों हाथ पकड़े और सरिता की गर्दन से हटाया। फिर सत्यम और पारसनाथ में कुछ देर जोर आजमाइश होती रही। पारसनाथ ने कहा, ‘तुम क्या समझते हो, मैं बूढ़ा हो गया हूं। एक अनजान सी लड़की के लिए तुम उस औरत पर हाथ उठा रहे हो जिसने तुम्हारे लिए अपना सुख-चैन और करियर तक दांव पर लगा दिया। उसे कुछ कहने से पहले हमसे निपटो।’ यह कहकर पारसनाथ ने पूरा जोर लगाकर सत्यम का हाथ उमेठ दिया और बिछावन पर गिरा दिया। फिर वह सरिता का हाथ पकड़कर वहां से ले गए। तभी सत्यम के रोने की आवाज कानों में पड़ी। सरिता उधर बढ़ने लगी तो पारसनाथ ने रोक दिया, ‘छोड़ दो उसको। उस पर बहुत ज्यादा ध्यान देने का ही नतीजा है यह सब। हमलोग भी और गार्जियन की तरह रहते न, तो दिमाग ठिकाने पर रहता इनका।’
पारसनाथ ने अपने भीतर बेचैनी महसूस की। वह कभी कमरे में चक्कर लगाते तो कभी बालकनी में टहलते। पर उनका मन शांत नहीं हो पा रहा था। उन्हें महसूस हुआ, अब वह यहां नहीं रह पाएंगे। वह दरवाजा खोलकर जाने लगे। तभी सरिता दौड़ती आई, ‘अरे, कहां जा रहे हैं?’
‘बस कहीं भी।’ पारसनाथ से और कोई जवाब नहीं सूझा।
सरिता बोली, ‘अब ऐसे में कहीं मत जाइए।’
पारसनाथ ने कहा, ‘आते हैं थोड़ा टहल के।’
‘जल्दी आ जाइएगा।’ यह कहकर सरिता ने दरवाजा बंद कर लिया।

टहलने के नाम पर वह निकले थे पर बिना कुछ सोचे-समझे चलते रहे, चलते रहे। जहां सड़क मुड़ी, मुड़ते गए। इस तरह तीन-चार किलोमीटर दूर चले आए थे। रात के साढ़े दस बज गए थे। सड़क पर गाड़ियां कम होने लगी थीं। बीच-बीच में पुलिस की गाड़ी या कोई एंबुलेंस भांय-भांय करती हुई तेजी से गुजरती तो पारसनाथ ऊपर से नीचे तक कांप उठते थे। ऐसा पिछले कुछ समय से ही हो रहा था। जब भी वह पुलिस वैन या एंबुलेंस का सायरन सुनते तो डर जाते।
लेकिन नहीं….अब डर-डरकर जीने का कोई अर्थ नहीं है। अब वह जीवन की दिशा बदल लेंगे। अभी बहुत जीवन जीना है उन्हें। अपने को नष्ट नहीं करना है। अपनी इच्छाओं को उन्होंने अपने मन की किसी खोखल में छुपा दिया था। वे उन्हें निकाल बाहर करेंगे।
उन्हें समाधान मिल गया था। उन्होंने कुछ ही क्षणों में भविष्य की योजना बना डाली। और अब वह तेजी से अपने घर की ओर लौटने लगे। इस वक्त कोई रिक्शा या टैंपू का मिलना मुश्किल था। पैदल ही लौटना था। तेज चलने से पैरों में दर्द महसूस हो रहा था।
पारसनाथ जब घर पहुंचे तो देखा कि सरिता बदहवास सी सोसाइटी के गेट पर खड़ी थी। पारसनाथ ने सोचा कि कहीं इस बीच कोई और कांड तो नहीं हो गया। हालांकि वह मजबूत होकर लौटे थे और यह सोचकर भी उन्हें कोई घबराहट नहीं हुई।
‘कहां चले गए थे?’ सरिता ने रुआंसे स्वर में पूछा।
‘अरे यहीं पास में ही।’ पारसनाथ ने उसे समान्य बनाने की कोशिश की। दोनों साथ चले। पारसनाथ इधर-उधर देख रहे थे कि कहीं उनके पड़ोसी उन्हें देख तो नहीं रहे। घर के हंगामे का पता तो उन्हें चल ही गया होगा। तभी उनकी नजर अपने प्लैट पर गई। सत्यम अपने कमरे की खिड़की से नीचे झांक रहा था। ज्यों ही उसने पारसनाथ को आते देखा, झट खिड़की बंद कर ली।
उस रात भी घर के लोगों ने खाना नहीं खाया। पारसनाथ बिस्तर पर बड़ी देर तक करवटें बदलते रहे और भुनभुनाते रहे, ‘इस घर को आग लग गई घर के चिराग से…।’
अगले दिन जब पारसनाथ दफ्तर के लिए निकले तो अजीब धुकधुकी सी हो रही थी उनके भीतर । सोच रहे थे, काल रात जो फैसला उन्होंने किया था क्या वह उस पर अमल कर पाएंगे? और क्या ऐसा करना ठीक रहेगा? फिर उनके भीतर से ही जवाब भी मिला, नहीं कभी तो ऐसा करना ही होगा। अब तक वह दूसरों के न्याय-अन्याय की परवाह करते रहे। लेकिन अपने साथ अन्याय करने का भी उन्हें कोई हक नहीं। अब बहुत हुआ। अब अपने साथ वह अन्याय नहीं करेंगे। दफ्तर पहुंचते ही वह अपने बॉस के कमरे की ओर भागे। अपने काम और अपने स्वभाव से उन्होंने अपने बॉस के दिल मे एक खास जगह बना ली थी। उन्हें उम्मीद थी कि बॉस उनकी मांग जरूर पूरी करेंगे। पारसनाथ को देख बॉस थोड़ा चौंके, ‘क्या भाई, सब ठीक है ना।’
‘ सर कल आप कह रहे थे न कि कानपुर ब्रांच में यहां से कुछ लोगों को भेजना है।’
‘हाँ।’
‘मेरा नाम भी जोड़ दीजिए।’ ‘
‘अरे, आपको नहीं छोड़ सकता मैं’।’
‘सर प्लीज, कुछ पर्सनल जरूरत है। बॉस हैरत से उनकी ओर देखते हुए बोले,‘ ठीक है।’
रात में पारसनाथ ने सत्यम के कमरे में पहुंचकर अपना फैसला सुनाया, ‘मेरा ट्रांसफर कानपुर हो गया है। एक-दो दिन में जाना है। तुम्हारी मां भी जाएगी। तुम यहां आराम से रहना। घर के काम और खाना बनाने के लिए कामवाली रहेगी। पैसा तुम्हारे एकाउंट में ट्रांसफर होता रहेगा।’ फिर थोड़ा ठहरकर पारसनाथ ने कहा, ‘तुम यही चाहते थे न। हमलोग तुम्हारी जिंदगी में अब कोई दखल नहीं देंगे।’
पारसनाथ सत्यम की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किये बगैर लौट आए। सरिता इससे खुश नहीं थी। उसने कहा, ‘आपको जाना है जाइए, मैं नही जा सकती उसको छोड़कर।’
पारसनाथ फट पड़े, ‘करती रहो उसकी चाकरी। कुछ नहीं मिलने वाला है इससे। सोओ उसके हिसाब से, खाओ उसकी मर्जी से। उसके कारण न कहीं आ- जा सकते हैं न अपने मनमुताबिक कुछ काम कर सकते हैं। और बदले में मिल क्या रहा है गाली, जूता लात।’ अपना स्वर धीमा करते हुए उन्होंने सरिता को समझाया, ‘जरूरत से ज्यादा ध्यान देने का ही नतीजा है यह सब। इसी में हम सब की भलाई है। वो भी खुश हम भी खुश।’
सरिता ने इस पर कुछ नहीं कहा। वह सहमत नहीं लग रही थी। पर पारसनाथ को विश्वास था कि वह उनके साथ जाएगी जरूर। अगले एक-दो दिन तक तैयारियां होती रहीं। पारसनाथ पर दफ्तर के कामकाज निपटाने का दबाव था। वह जल्दी निकलते और देर से आते। सत्यम बस एकाध बार ही सामने पड़ा। उसके रुख से लगा जैसे वह कुछ कहना चाहता हो पर कह नहीं पा रहा हो। आखिरकार प्रस्थान का समय आ गया। दोपहर को निकलना था। सरिता ने सत्यम से पूछा था कि क्या वह उन्हें विदा करने स्टेशन तक जाएगा या घर से ही विदा करेगा। उसने मुंह बनकर कहा कि उसके कॉलेज में फंक्शन है। वह घर पर नहीं रह पाएगा। घर की चाबी उसके पास है ही। सरिता इस बात से दुखी हुई पर पारसनाथ को अच्छा ही लगा। वह जाते समय उसका सामना करने से बचना चाहते थे।
निश्चित समय पर पति- पत्नी तैयार हो गए। अभी वे कुछ जरूरी चीजें ही लेकर जा रहे थे। फिर भी कई सामान हो गए थे। पारसनाथ ने एक-एक कर सारे समान ड्राइंग रूम के एक कोने में रख दिए ताकि निकलने में सुविधा हो। सरिता बार-बार सोच रही थी कि कुछ छूट तो नहीं गया। पारसनाथ बालकनी में जाकर देख रहे थे कि टैक्सी वाला आ रहा है कि नहीं। वह मोबाइल में उसका नंबर ढूंढने लगे। तभी कॉलबेल बजी। उन्हें लगा टैक्सी वाला आ गया। पारसनाथ और सरिता एक साथ दरवाजे की तरफ बढ़े। सरिता ने दरवाजा खोला। सामने सत्यम खड़ा था। उसका चेहर लाल था। उसकी सांसें तेज थीं। लग रहा था जैसे वह दौड़कर आया हो।
पारसनाथ ने पूछा,‘ फंक्शन खत्म हो गया क्या?’
लगा कि सत्यम ने उनकी बात नहीं सुनी। अचानक सत्यम ने हाथ जोड़े और कहा, ‘पापा मत जाओ प्लीज। मैं अकेला नहीं रह पाऊंगा। मुझे अकेले डर लगता है। मेरा अब कोई फ्रेंड भी नहीं है। प्लीज मुझे अकेला मत छोड़ो।’
यह कहकर वह फफक-फफक कर रोने लगा। पारसनाथ को सत्यम का वह मासूम चेहरा याद आया, जब वह चार-पांच साल का था। तब उसकी एक मामूली सी आह से उनके भीतर बहुत कुछ दरकने लगता था। अभी तो उनके भीतर एक साथ कई बांध भहराकर गिर पड़े। उन्होंने उसे सीने से लगा लिया। बचपन में जब वह रोता था,तो पारसनाथ इसी तरह उसे चिपका लेते और सत्यम चुप हो जाता था।
अपने बेटे को सीने से लगाए खुद को मन ही मन धिक्कारने लगे पारसनाथ- ‘यह क्या कर रहे हो तुम। जब तुम्हारे बेटे को तुम्हारी सबसे ज्यादा जरूरत है, तुम उसे अकेला छोड़ रहे हो। तुम्हारी अपनी जिंदगी तुम्हारे बेटे के बगैर संभव है क्या?..’
तभी कॉलबेल बजी। टैक्सी वाला खड़ा था। उसने कहा, ‘लाइए, समान दीजिए।’
पारसनाथ आगे बढ़े। उन्होंने अपनी जेब से कुछ नोट निकाले और टैक्सी वाले की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘यह लो अपना भाड़ा। हमें कहीं नहीं जाना है।’
——————————————————————————————————————————————————————————-

संजय कुंदन
जन्म: 7 दिसंबर, 1969, पटना
शिक्षाः पटना विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए।
संप्रति: वाम प्रकाशन, नई दिल्ली में संपादक।
प्रकाशित कृतियां:
कागज के प्रदेश में (कविता संग्रह)
चुप्पी का शोर (कविता संग्रह)
योजनाओं का शहर (कविता संग्रह)
तनी हुई रस्सी पर (कविता संग्रह)
बॉस की पार्टी (कहानी संग्रह)
श्यामलाल का अकेलापन (कहानी संग्रह)
टूटने के बाद (उपन्यास)
तीन ताल (उपन्यास)
ज़ीरो माइल पटना (संस्मरण)
नेहरू द स्टेट्समैन (नाटक)
अनेक नुक्कड़ नाटकों का भी लेखन। अनेक नाटकों में अभिनय और निर्देशन।
लघु फिल्म ‘इट्स डिवेलपमेंट स्टुपिड’ की पटकथा का लेखन।
संपादनः
कँटीले तार की तरह (कविता संकलन)
कितने यातना शिविर( कहानी संकलन)
कुछ और अलगू, कुछ और जुम्मन (प्रेमचंद की सांप्रदायिकता विरोधी कहानियाँ)

अनुवाद : आवर हिस्ट्री, देयर हिस्ट्री, हूज हिस्ट्री( रोमिला थापर) एनिमल फार्म (जॉर्ज ऑरवेल), लेटर्स ऑन सेज़ां (रिल्के), पैशन इंडिया (जेवियर मोरो) और वॉशिंगटन बुलेट्स (विजय प्रशाद) का हिंदी में अनुवाद।

पुरस्कार/सम्मान:
भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार
हेमंत स्मृति सम्मान
विद्यापति पुरस्कार
बनारसी प्रसाद भोजपुरी पुरस्कार
रचनाएं अंग्रेजी, गुजराती पंजाबी, मराठी, असमिया और नेपाली में अनूदित।
संपर्कः ए-701, जनसत्ता अपार्टमेंट, सेक्टर-9, वसुंधरा, गाजियाबाद-201012 (उप्र)
मोबाइलः 9910257915
ईमेलः sanjaykundan2@gmail.com

 

 

 


Discover more from रचना समय

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Categorized in: