मधुसूदन आनंद हिंदी कथा के आठवें दशक के एक महत्त्वपूर्ण नाम हैं। मिन्नी या करौंदे का पेड़ आपकी बहुचचिॅत कहानियां हैं। वैसे भी आपने जो भी कहानियां लिखीं , आकार में छोटी होने के बावजूद विचार में बड़े फलक की कहानियां हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी आपके योगदान को आदर के साथ याद किया जाता है। आप नवभारत टाइम्स और नया ज्ञानोदय के सम्पादक रहे। 18 फरवरी 2026 को आपका देहावसान होना साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया की बहुत बड़ी क्षति है। यहां हम सुधांशु गुप्त के सौजन्य से प्राप्त आनंद भाई की एक अप्रकाशित कहानी श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत कर रहे हैं।
– हरि भटनागर
कहानी:
रिश्ते में वे मेरे भाई थे। मेरे पिता के एक दूरे के भाई के बेटे। बचपन में उन्होंने मुझे खिलाया है। मैंने कभी समझा ही नहीं कि वे मेरे सगे भाई नहीं थे। उनका ज्यादातर वक्त हमारे घर ही बीतता था। उनके अपने तीन सगे भाई और एक बहन थी। सभी बड़े-बड़े शहरों में नौकरी करने चले गए थे और साल में एकाध बार अपनी माँ से मिलने आते थे। तब वे भाई भी हमारे घर ही ठहरते थे। क्योंकि उन्होंने बैठक बेचकर शेष घर किराये पर दे दिया था। उनकी बहन की भी अमृतसर के एक परिवार में शादी हो गई थी। वे अपनी माँ और अपने छोटे भाई से मिलने कभी नहीं आईं। पिता की मृत्यु के बाद भी नहीं! मुझे याद नहीं कब ताई जी विधवा हो गईं और वे अपनी माँ के साथ अपने एक बड़े भाई ओम जी के घर लखनऊ चले गए थे। उनकी चिट्ठियां जरूर बचपन में आती रहती थीं और वे मुझे और मेरे छोटे भाई को याद करते थे।
बरसों बाद एक शाम एक रिक्शा हमारे घर के बाहर आया और उसमें से वे उतरे। रिक्शेवाले को उन्होंने एक बड़ा नोट (शायद दस का) किराए के लिए दिया। वे उसमें से किराए की अठन्नी काटकर रिक्शेवाले से बाकी पैसे माँग रहे थे। रिक्शावाला किराए के पैसे 12 आने चाहता था क्योंकि उसका कहना था कि टीन का सन्दूक काफी वजनी है। काफी देरतक दोनों के बीच झैं-झैं होती रही। आखिर बात दस आने पर जाकर टिकी। पर रिक्शेवाले के पास भी एक रुपए से कम का कोई सिक्का नहीं था। उसने दस का नोट भुनाने की कोशिश की मगर खोमचेवालों से भी यह नोट नहीं भुना।
मैंने बाहर की आवाजें सुनीं तो उत्सुकता में बाहर आ गया। वे बोले ‘बब्बू जी मैं राजा हूं। रिक्शेवाले को दस आने दे दो।’ मैं झट भागकर अन्दर गया और मैंने रिक्शेवाले को पैसे दे दिये। रिक्शेवाले ने लगभग बड़बड़ाते हुए सन्दूक को सहारा दिया और राजा भाई साहब ने आहिस्ता से सन्दूक आँगन में टिका दिया। राजा भाई साहब वहीं आँगनमें बिछी खाट पर बैठ गए। अम्मा ने उन्हें पानी का गिलास दिया। भाई साहब तीन-चार गिलास फटाफट गटक गए। गर्मियों के दिन थे। उनका पसीना टपक रहा था। कमीज तो सारी भीगी ही पड़ी थी। अम्मा उन्हें पँखा झलने लगीं। चाय उन्होंने चूल्हे पर चढ़ा दी और मुझे बिस्कुट नमकीन खरीदने के लिए बाजार भेज दिया।
मैं सामान लेकर लौटा तो पता चला कि पिताजी भी घर आ गए हैं। राजा भाई साहब यू.पी. बोर्ड से हाई स्कूल की परीक्षा पास करके मेरठ में विमान संचार ऑपरेटर का कोर्स करने आए थे। उन्होंने हिसाब लगाया तो पता चला कि कोर्स में दाखिला तो मिल जाएगा मगर कोर्स के दौरान महीने भर का खर्चा चलाने के लिए पूरा इन्तज़ाम नहीं है। पिताजी ने उन्हें पूरी आस बंधाई कि उनके मकान का हर महीना मिलने वाला किराया वे निश्चित ही वसूल करके उन्हें समय पर मनीऑर्डर द्वारा भेज दिया करेंगे। उनके तीनों भाइयों को उन्होंने पत्र लिखे कि हर महीने दस पन्द्रह या जो भी बन पड़े तो उन्हें सीधे भेज दिया करो तो यह राजा भी रेडियो- ऑपरेटर बन जाएगा। तो संक्षेप में हुआ यह कि राजा भाई साहब को मेरठ में सम्बन्धित कोर्स में दाखिला मिल गया और मकान के किराए और तीनों भाइयों के आधे-अधूरे सहयोग से उन्होंने रेडियो ऑपरेटर का कोर्स कर ही डाला। कोर्स पूरा करके वे फिर अपनी विधवा माँ के साथ हमारे कस्बे में वापस आ गए। कह-सुनकर किराएदार ने एक कोठरी उनके लिए खाली कर दी और कस्बे में छोटी-मोटी नौकरी करते हुए वे वहीं रहने लगे। मगर रेडियो ऑपरेटर की नौकरियां निकलने का नाम तक नहीं ले रही थीं। भाई साहब अक्सर उदास हो जाते तो पिताजी उन्हें समझाते। आखिर एक दिन उनकी किस्मत खुल गई। उन्हें बाड़मेर में टिड्डियों को भगाने वाले विभाग में रेडियो ऑपरेटर की नौकरी का नियुक्ति पत्र मिल गया। वे खुश हो गए। अपनी माँ को उन्होंने बड़े भाई के पास लखनुऊ भेज दिया। एक लकड़ी की पेटी में अपनी किताबें रखकर वे हमारे घर दे गए। अब आपको कैसे बताऊं कि यह कैसा अनोखा खजाना था!
मैं उन दिनों जासूसी उपन्यास पढ़ता था। ओम प्रकाश शर्मा, कर्नल रंजीत और इब्ने सफी के उपन्यास। हर दिन औसतन एक। इनमें इब्ने सफी मुझे बहुत प्रिय थे। उनके पात्र फरीदी और हमीद या कासिम और इमरान अजब रहस्यमय संसार रचते थे। रहस्य, रोमांच, जासूसी और हास्य से भरपूर उनकी कहानियों के किरदार अमूमन आपको बांधकर रखते थे। उनका जन्म इलाहबाद के पास नोरा नामक कस्बे में हुआ था लेकिन देश के विभाजन के बाद 1952 में वे पाकिस्तान चले गए। इस बीच जासूसी उपन्यासों की दुनिया में उन्होंने काफी प्रतिष्ठा अर्जित की। हिन्दी में जिन दिनों चंद्रकांता संतति की धूम थी, उन्होंने अपने रोचक उपन्यासों से लाखों पाठकों को आकर्षित किया।
कहते हैं कि अगाथा क्रिस्टी जैसी प्रतिष्ठित अन्तर्राष्ट्रीय जासूसी उपन्यासकार ने उनकी तारीफ की थी। उनकी रचनाओँ ने अपनी तरह से पढ़ने का संस्कार मुझे दिया। सैकड़ों उपन्यास उन्होंने लिखे होंगे जिनका जीवन भले ही उनकी तरह अल्पजीवी रहा हो, लेकिन उन्होंने न केवल पाठकों का मनोरंजन किया बल्कि देशप्रेम के लिए जज्बा भी बनाया। बुराई के खिलाफ लड़ाई लड़ाई में वे अच्छाई का पक्ष लेने के लिए जाने गए। इब्ने सफी और अऩ्य जासूसी लेखकों के अलावा उन दिनों आचार्य शास्त्री और गुरुदत्त को भी मैं पढ़ा करता था। प्रेमचंद से उनकी कुछ कहानियों के मार्फत परिचय जरूर हो चुका था मगर पौष्टिक बौद्धिक खुराक के मामले में मैं कुपोषित ही था।
लकड़ी की पेटी खुली तो उसमें प्रेमचंद अपने ‘गोदान’, मोहन राकेश ‘अँधेरे बन्द कमरे’, गेर्की माँ और जैनेन्द्र कुमार जैसे बड़े और महान लेखक झाँकने लगे। राजा रवि वर्मा के चित्रों की पुस्तक देखकर तो मैं दंग ही रह गया। यों ‘कल्याण’ में ‘देवताओं और भगवानों’ के चित्र देखकर मैं विस्मय से भर जाता था, लेकिन राजा रवि वर्मा के काले सफेद चित्र देखकर तो मैं हतप्रभ और अवाक रह गया। क्या अद्भुत चित्र थे! ये सभी मायावी लगते थे लेकिन यह भी लगता था कि कैसे इस जीती जागती दुनिया के राग-विराग से, प्रेम और सौन्दर्य से कोई न कोई हाड़-मांस का अपरिभाषित रिश्ता जरूर है। सिर्फ यही एकमात्र ऐसी पुस्तक थी जिसपर दीमक का हमला हो चुका था और जिसके कुछ पन्ने फट गए थे। मुझे उस फटी हुई पुस्तक से मोह हो गया। एक साफ पुराने कपड़े से रगड़-रगड़कर मैंने उसे पहले तो साफ किया और पुस्तक को धूप में रखकर नष्ट होने से बचाने का मैं उपक्रम करने लगा। एक दिन पिता ने मुझे देख लिया तो कहने लगे ये चित्र कितने ही सुन्दर क्यों न हों मगर ‘दिव्य’ नहीं हैं। तुम्हें गीता प्रेस गोरखपुर का ‘कल्याण’ और उसमें छपे भगवानों के सुन्दर चित्र देखने चाहिए जिससे तुममें सद्गुणों के संस्कार पैदा होंगे। उन्होंने बताया कि सरस्वती पुस्तकालय में कल्याण आता है, उसे पढ़ने की आदत डालो। यह किताब मत देखा करो। गन्दी है। फेंक दो।
मगर ‘कल्याण’ के मुकाबले राजा रवि वर्मा की फटी-पुरानी पुस्तक की तरफ ज्यादा आकर्षित होता रहा और सोचता रहा कि राजा भाई साहब आएं तो उनसे इस अद्भुत पुस्तक और उसके चित्रकार के बारे में पूछूं। लेकिन वर्षों तक ऐसा अवसर मुझे नहीं मिला। एक बार राजा भाई साहब इतना ही बता पाए कि वे केरल के थे और यह पुस्तक उन्होंने पुरानी पुस्तकों के बाजार से खरीदी थी। मैं मन मारकर रह गया।
एक दिन मैं तिलोत्तमा वाला राजा रवि वर्मा का चित्र धूप में बैठा देख रहा था। तिलोत्तमा का सौन्दर्य देखकर मैं मुग्ध था। साड़ी नीचे ढलकी हुई और स्तन खुले हुए। एक हाथ से साड़ी थामे हुए। गले में मोतियों की माला और आभूषण। हाथ में कंगन और चूड़ियां। कानों में कुंडल। खुले बाल। दूसरा हाथ ऊपर को उठा हुआ। कामुक छवि लेकिन सौम्य चेहरा। बेशक कल्याण के चित्रों को देखकर दिव्यता का अनुभव होता था, वैसा अनुभव तो इस पौराणिक चरित्र के चित्र को देखकर न तो होना था और न हुआ। मगर तब भी यह चित्र वासना तो पैदा नहीं ही करता था।
स्तन खुले हैं, यह भाव भी अश्लीलता पैदा नहीं करता था। इसके विपरीत वह सौन्दर्यबोध के एक आयाम से ही साक्षात्कार कराता था। मैं शपथपूर्वक आज भी यह घोषणा करता हूं कि तब इस चित्र ने मुझमें कोई वासना पैदा नहीं की थी। आज सौन्दर्य वासनामय जरूर हो उठा है, लेकिन तब वह निर्दोष था। लेकिन तभी मुझे पिताजी का एक जोरदार चांटा पड़ा और मैं तिलमिलाकर रह गया। हो सकता है जिस वासनामय सौन्दर्य का बोध मुझे आज हो रहा है, उसकी कलुषित छाया पिताजी के नेत्रों पर तब पड़ी हो, लेकिन मैं तब उस क्षण पूरा तरह निर्दोष था। क्या गाय को दूहता देखकर हममें वासना का संचार होने लगता है? मुझे तो तब चिड़ियों के सम्भोग से भी कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई। सब जोर देकर दोहराना चाहता हूं। वह चित्र निश्चय ही सुन्दर था और पहली नजर में सुन्दरता ही सामने आती थी।
दरअसल समय और परिस्थितियों के साथ हमारे देखने का नजरिया-हमारा सौन्दर्य बोध-भी बदल जाता है। नागा साधुओं और दिगम्बर जैन मुनियों को देखकर हम लोग आँख तो नहीं मींच लेते। कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन कोई अनावृत है तो दूसरा उसे देखकर कामग्रस्त हो जाएगा, यह नहीं कहा जा सकता। स्त्री को देखकर भी ऐसा ही होगा यानी वासना जग ही जाएगी-नहीं कहा जा सकता। तब तो कोई माँ, बहन और बेटी घर में भी सुरक्षित नहीं रहेगी। हमारे पारिवारिक जीवन में कभी-कभी स्त्री जाति प्रेम में, मोह में या क्रोध में, हर्ष में या विषाद में या फिर हारी-बीमारी में अनावृत हो जाती है, तब हम ही आगे बढ़कर उसे ढंकते हैं।
मैंने राजा भाई साहब को बताया तो वे मुस्कराने लगे। उन्हें पिता के चरित्र के मामले में एक हल्का सा भेद मिल गया था, जो दिन रात सद्गुणों का और ईश्वर उन्मुख होने का उपदेश झाड़ते रहते थे। और हर साल बच्चे भी पैदा करते रहते थे।
वे बोलेः “बब्बू जी राजा रवि वर्मा ने ऐतिहासिक काम किया है। एक तो उन्होंने भगवानों उऔर देवताओं को सबके लिए सुलभ बना दिया। उन्होंने ‘लक्ष्मी,’ ‘सरवस्ती,’ ‘सीता,’ आदि के चित्र बनाए और लोनावाला मुम्बई में जर्मन प्रैस लगाकर उन चित्रों को छापा। जिन अछूतों को मन्दिर में प्रवेश वर्जित था, उन्होंने राजा रवि वर्मा के पौराणिक या मिथकीय चित्रों में अपने ‘भगवान’ ढूढ़ लिए। भगवान मन्दिर की कैदों से निकलकर पहले दक्षिण भारत में और फिर शेष भारत में पहुँचने लगे। है न ऐतिहासिक योगदान!
” दूसरे हम विंध्याचल के नीचे बसे भारत से बिल्कुल अनजान थे। सभी दक्षिण भारतीय हमारे लिए मद्रासी हुआ करते थे और उनकी स्त्रियां काली कलूटी और थुलथुल। राजा रवि वर्मा ने उन स्त्रियों के मोहक सौन्दर्य से-रूप और लावण्य से हमारा परिचय कराया।
” तीसरे उन्होंने साड़ी को भारतीय स्त्रियों की सामान्य वेश-भूषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनके और भी कई योगदान हैं। खैर छोड़ो…. ”
मुझे लगा राजा भाई साहब सच कह रहे हैं। उन्होंने अनजाने ही मुझे ‘देखना’ सिखाया। आज वे इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन मैं शायद उन्हीं की आँखों से देख रहा हूं। पिता का दृष्टि दोष तो मैं वर्षों पहले ही पहचान चुका था, जो आज मुझे भी विरासत में मिला है।
मधुसूदन आनन्द
उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद में 20दिसम्बर 1952 को जन्म 18फरवरी 2026को राजधानी दिल्ली में मृत्यु। पत्रकारिता में बहुत छोटे स्तर से शुरू करके नवभारत टाइम्स के संपदक रहे। राजेन्द्र माथुर परम्पर के पत्रकार आनन्द ने कहानी की दुनिया में भी अपनी जगह बनाई। उनके पाँच कहानी संग्रह-करौंदे का पेड़, साधारण जीवन,बचपन, थोड़ा सा उजाला और क़ब्रिस्तान में कोयल प्रकाशित हुए। एक कविता संग्रह- पृथ्वी से करें फरमाइश भी छपा। उन्होंने राजेन्द्र माथुर संचयन का संपादन भी किया। अन्तिम समय तक वह भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक और नया ज्ञानोदय के सम्पादक रहे।
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मधुसूदन आनंद की कहानी- ‘तलवार’
दशहरे का दिन था। सुबह से ही परिवार में उत्साह था। माँ पड़ोस से गोबर ले आई थी। उससे रावण के दस सिर बनाए जाने थे। पिता पिछली शाम को ही गन्ना और लौकी ले आए थे। गन्ना दशहरे के दिन पूजा में रखा जाता है। लौकी रायते के लिए आई थी। माँ ने रात में ही दही जमा दिया था। दही के बर्तन को उन्होंने आटे के कनस्तर में रखा था ताकि थोड़ी गर्मी मिले और दही अच्छा जम जाए।
हम भाई बहनों को उठते ही उन्होंने दही के दर्शन कराए और फिर कहा, “आया जो भैया पायता, राम खिलाए रायता।” हम सब भाई बहनों ने समवेत स्वर में यह दोहराया। हल्की-सी खटास लिए मीठी दही का स्वाद हमारे मुँह में भर गया। छोटा तो सचमुच अपने नन्हें होठों पर जीभ फिराने लगा।
सर्दियाँ शुरू नहीं हुई थीं। दिन में धूप अब भी चुभती थी, लेकिन रात होते ही हल्का-सा जाड़ा बढ़ने लगता। हम लोग स्वेटर पहनकर रामलीला देखने जाते। तभी मूँगफलियों का मौसम शुरू होता। भड़भूजे रामलीला स्थल के बाहर मूँगफलियों का ढेर लगाए बैठे रहते। ढेर के बीचोबीच एक कुज्जे में हल्की आँच रहती। भड़भूजा गरम मूँगफलियाँ ग्राहकों को देता। हम मूँगफलियाँ खाते हुए रामलीला देखते। तब हमारा सोने और उठने का ढर्रा गड़बड़ा जाता और देर से उठने पर हम पिता से डाँट खाते।
लेकिन रात में रामलीला देखकर देर से सोने के बावजूद हम दशहरे के दिन जल्दी उठ गए थे। घर में सचमुच उत्साह था। हमारे नए कपड़े और जूते रात में ही आ गए थे। हर दशहरे पर हमारे नए कपड़े बनते। पिता जूते बनाने वाले के पास हमें ले जाते। वह हमारे पैरों की नाप लेता। दशहरे से पहले हमारे नये कपड़े सिलकर और जूते बनकर आ जाते। हम झूठ-मूठ उन्हें पहनने का प्रदर्शन करते और खुश होते। माँ और पिता हमें खुश देखकर और भी खुश हो जाते। नहा-धोकर जब हम नए कपड़े और जूते पहनकर मटकते तो माँ कहतीं, ‘यह रंग बब्बू पर खूब फबा है। दर्ज़ी ने इसकी निक्कर और बुशर्ट अच्छी सिली है पर जूते वाले ने बूट की नोक ठीक नहीं बनाई है।’ पिता तब समझाते कि यह चालू फ़ैशन के अनुसार उन्हीं के निर्देश पर मोची ने बनाई है। ऐसे ही माँ अगर किसी बच्चे के कपड़े की सिलाई में कोई कमी निकालतीं तो पिता फ़ैशन का तर्क़ देकर उन्हें चुप करा देते। हमें वे बेहद साधारण कपड़े और जूते तब बेहद अच्छे लगा करते। हम अपने को शहज़ादा समझते।
मोहल्ले के दूसरे घरों में भी कुछ बच्चे अपने नए कपड़े और जूते एक-दूसरे को दिखाते और हर अपनी चीज़ को ज़्यादा कीमती और आकर्षक मानता। पर किसी को भी हीन भावना नहीं होती थी। पूरा मोहल्ला ही प्राय: निम्नमध्यवर्गीय परिवारों वाला था। एकाध जो रईस परिवार था भी उनके बच्चों के कपड़ों और जूतों से उसकी अमीरी नहीं टपकती थी। उन घरों में प्राय: गाय या भैंस होती। एक-दो नौकर-चाकर होते। उनके बच्चे मौसमी फलों के अलावा सेव और संतरे जैसे उन दिनों के महँगे फल खाते। कई बार वे अपनी जेबों में भरे सूखे मेवों से हमें चिढ़ाते और फिर थोड़े अकड़वाले भाव से काजू और चिलगोज़े, बादाम और किशमिश हमें चखा देते। इसके बावजूद हमें अपनी साधारणता को लेकर किसी भी तरह का कोई कांप्लेक्स नहीं होता। हम उन रईस बच्चों के साथ उसी तरह खेलते और उनको पीट भी देते। कई बार हमारी भी पिटाई हो जाती। कई बार उन बच्चों के पास क्रिकेट का बल्ला, कैरम या बैडमिंटन का रैकेट होता, तब हमें वाकई ईर्ष्या होती और हम मां और पिता से उन्हें दिलाने की मांग करते। अमीरों के बच्चे हमें अपने साथ जब ये खेल भी खिलाते तो हमारी मांग धीरे-धीरे कम हो जाती। हम बचपन के उस तमाम सादेपन में भी खुश रहते। दशहरे जैसे त्योहारों पर वह खुशी बढ़ जाती और कई-कई दिनों तक बनी रहती। हमें कभी लगा ही नहीं कि हमारे पास अच्छे कपड़े या खिलौने नहीं हैं। जो भी हमारे पास था, उसे ही हम बहुत ज़्यादा समझते थे और खुश रहते थे। उत्सव और मेले हममें उत्साह और प्रसन्नता उँडेलते।
माँ और पिता के पास तो पहनने के लिए भी कपड़े नहीं थे, जितने हमारे पास थे। पर उनकी खुशी हमसे कहीं ज़्यादा थी। माँ कम से कम पैसों में घर का खर्च चलातीं और पिता चार वक्त की हमारी दाल-रोटी के साथ एक बार के दूध के लिए टयूशन करते। पर हाय-हाय उन्हें नहीं थी। वे हर त्योहार को खुशी से मनाते थे और बिल्कुल साधारण-सी चीज़ें भी हमारी खुशी का सामान बन जातीं। हमारा कच्ची छत और लखौरी इंटों के फ़र्श वाला छोटा-सा घर उस खुशी में दीप्त हो उठता। माँ एक ढिबरी में खाना पकातीं और हम भाई-बहन पिता के साथ लालटेन के चारों ओर बैठे पढ़ते रहते। हमें खिलाने के बाद ही माँ खातीं। अक्सर सब्ज़ी या दाल बहुत कम होती। माँ अचार से उसे बिना किसी असुविधा के – बल्कि पूरे स्वाद से खातीं। त्योहारों पर मीठी पूरियाँ, पूड़े, चिल्ले, जैसी चीज़ें बनतीं। ये त्योहार बार-बार आते और पूरे घर को उत्साह से भर देते। इन साधारण घरेलू पकवानों का स्वाद एक अलग ही उत्सुकता रचता था।
पिता कहते थे हमारे शास्त्रों के अनुसार हिंदुओं के चार वर्ण हैं। रक्षाबंधन ब्राह्मणों का, दशहरा क्षत्रियों का, दीपावली वैश्यों का और होली शूद्रों का त्योहार है लेकिन इनके मनाने में कोई विभाजन नहीं है। सब सभी त्योहारों को समान रूप से मनाते हैं। लेकिन होली पर हम शूद्रों से गले नहीं मिलते थे और दीपावली पर तमाम दलितों को हम खील-बताशे और मिठाई देते थे। तभी बचपन में यह समझ बनी कि हम हिंदू अपने सभी त्योहारों में शूद्रों को शामिल नहीं करते। हम सिखों के गुरु पूरब और लोहड़ी तथा जैनों के जलसे-जुलूसों में ज़रूर शामिल हो जाते थे पर मुस्लिम छात्रों के साथ पढ़ने और खेलने के बावजूद ईद हमने कभी नहीं मनाई। हम बचपन में गुरुद्वारों और जैन मंदिरों में गए हैं, लेकिन मस्जिद में हम कभी नहीं गए। और तो और, वाल्मीकि मंदिर में भी हमारा कभी जाना नहीं हुआ। मुसलमानों और शूद्रों के साथ हमने त्योहार नहीं मनाए और जाने-अनजाने उनसे निष्क्रिय घृणा की। लेकिन यह भी सही है कि हमने कभी उनका बुरा भी नहीं किया और न ही ऐसा सोचा कि उनका बुरा हो। पता नहीं यह कैसे हुआ कि हमारे बचपन के वाटर टाइट कंपार्टमेंट में सिर्फ़ सवर्णों का ही प्रवेश हुआ। हमें उनकी तमाम भावनाओं और संवेदनाओं में अपनी से एक रिश्ता लगता था, पर शूद्र और मुसलमान हमें अपने से अलग लगते थे।
वैसे तब भी हमें थोड़ा अजीब-सा लगता था, जब पिता वर्ण-विभाजन बताते हुए कहते थे हम खत्री हैं और हमारा त्योहार दशहरा है, पर जब हम देखते थे कि दूसरे सवर्ण भी हमारी तरह ही दशहरा मना रहे हैं और हमारा परिवार भी उनकी तरह दीपावली, होली और रक्षाबंधन मनाता है, तो हमारी जिज्ञासा मिटने लगती। मगर हम देखते थे कि ब्राह्मण परिवारों में पुस्तक और कलम-दवात की, वैश्य परिवारों में तराजू और बही-खातों की तथा क्षत्रिय परिवारों में प्राय: तलवार और कटार की पूजा ज़रूर होती है। कुछ परिवारों में ये सारी चीज़ें पूजा में रखी जाती थीं, लेकिन अपने वर्ण को दर्शाने वाली चीज़ें वहाँ ज़रूर होती थी। हम कल्पना करते कि दशहरे को शूद्र कैसे मनाते होंगे। क्या उनके यहाँ भी गोबर के दस सिरों वाला रावण बनता होगा। पर जब हम इन त्योहारों पर इन्हें त्योहारी या तिवहारी माँगते देखते तो हमें लगता कि हमारे कस्बे में तो दलित जातियाँ हमारी तरह ये त्योहार नहीं ही मनाते। हम पिता से पूछते कि ब्राह्मण का प्रतीक चिह्न तिलक, वैश्य का तराजू और क्षत्रिय का तलवार है तो शूद्र का क्या हुआ। वे कोई एक प्रतीक न बता पाते और तब हमारे घर हर सुबह कमाने आने वाली मेहतरानी ही हमारे लिए प्रतीक बन जाती, जिससे बचपन से ही हमारा रिश्ता एक कमीनी उपेक्षा का बनता गया।
दशहरे के दिन पिता में वाकई उत्साह होता। वे बुखारी से पुरानी तलवार को निकालते। उसके कटे-फटे म्यान को सँभालकर एक ओर रखते और फिर काफ़ी देर तक ईंट के टुकड़े से उसे चमकाते। वे बताते यह हमारे पूर्वजों की तलवार है। हम क्षत्रिय हैं और हमारा काम लड़ना है। तलवार की चमचमाहट वर्षों पहले गा़यब हो गई होगी। पर पिता उस दिन उसकी रूह निकाल देते। हम कल्पना करते कि हमारा कोई पुरखा घोड़े पर बैठा है। उसने पगड़ी बाँधी हुई है। उसके लंबी सफ़ेद दाढ़ी है। वह कोई योद्धा है। हमें वह महाराणा प्रताप और शिवाजी जैसा लगता। एक रोमांच और गर्व से हम फूल उठते। पिता तलवार को तौलिये से पोंछकर और चमकाते और फिर ईंटों वाले उस ऊबड़-खाबड़ आँगन में तलवार चलाकर हमें दिखाते। पतले-दुबले पिता तलवार चलाते हुए हमें वीर योद्धा लगते। वे बड़ी फ़ुर्ती से वार करते और हवा में वार रोकने का प्रदर्शन करते। पिता आँगन में ईंट से लाइन खींचकर चार घेरे बनाते और हमें पैंतरों का ज्ञान कराते।
तलवार बिल्कुल सीधी और लंबी थी। उसकी नोक कुछ नुकीली थी और चमकाने पर भोथरी धार निखर आती थी। पिता उस पर सावधानी से उँगली फिराते थे और फिर कहते थे कि इसकी धार लगवानी पड़ेगी। गोबर के सिर बनाने के बाद आटे से रावण और उसकी अगल-बगल राम, लक्ष्मण बनाती माँ के तब कान खड़े हो जाते और वह कहती, “धार का क्या करना है? हमें कौन-सा युद्ध लड़ना है।”
पिता का क्षत्रिय होने का अहसास तब ज़ोर मारने लगता। वे कहते, “घर में हथियार हो तो बुराई का क्या है।”
माँ पूछती, “हमारा दुश्मन कौन है?”
पिता कहते, “कोई नहीं है पर कोई लुटेरा घर में आ जाए तो हथियार ही काम आते हैं।”
माँ प्रश्न करती, “चोर क्या तुम्हें ख़बर देकर आएगा और तुम बुखारी से पहले ही तलवार निकाल लोगे?” फिर माँ अंतिम फ़ैसला सुना देती कि बच्चों वाले घर में मैं तलवार जैसा हथियार बाहर निकालने के पक्ष में नहीं हूँ। पिताजी निरुत्तर हो जाते। वे रावण के पास तलवार खड़ी करके अपने काम में लग जाते। ऐसा प्राय: हर दशहरे पर होता। दशहरा पूजने के बाद जब माँ रावण को उठाती और हम सबको घर से बाहर जाना होता, तो माँ सबसे पहले तलवार को उसकी म्यान में डालकर बुखारी में रख आती। फिर एक साल तक तलवार की घर में कोई चर्चा नहीं होती। अलबत्ता जब घर में सफ़ेदी वगैरह होती तो वह म्यान सहित निकलती और हम उसे म्यान से निकालकर चलाना चाहते। लेकिन हमारा प्रयास तत्काल विफल कर दिया जाता और हम मन मसोसकर रह जाते।
इस बार दशहरे पर पता नहीं पिता को क्या सूझा, उन्होंने हम बच्चों से कहा कि जो भी तलवार चलाकर दिखाएगा, उसे इनाम मिलेगा। उन्होंने पहले पैंतरे सिखाए और फिर तलवार छोटू के हाथ में थमा दी। तलवार उसकी छाती तक आती थी। उसे हाथ में लेते ही, वह उत्साह और रोमांच से भर उठा। वह पिता की तरह तलवार चलाने लगा। पिता उसे देखकर मुग्ध हो रहे थे। उधर माँ ज़ोर-ज़ोर से उससे तलवार रख देने को कह रही थीं। मगर उसमें पता नहीं कहाँ से स्फ़ूर्ति और ताकत आ गई थी। वह और दुगने वेग से तलवार चलाने लगा। माँ और पिता के रोकते-रोकते वह घर से बाहर को भागा। हम भी पीछे-पीछे भागे। उसने शायद बाहर उस कुत्ते को देख लिया था जो मेहतरानी रोटी के लिए दरवाज़े के बाहर फसकड़ा मारकर बैठ जाती और कुत्ते से बात करती रहती। कुत्ता शांत और एकाग्र होकर सुनता। रोटी मिलने पर मेहतरानी उसे रोटी नहीं देती, तभी वह भौंकता। छोटू ने हमारे देखते ही देखते कुत्ते की तरफ़ तलवार कर दी। यह देखकर कुत्ता ज़ोर-ज़ोर से भौंकने लगा। कुत्ते के भौंकने पर छोटू अक्सर दुम दबाकर भाग जाया करता था। पर आज तो उसके हाथ में लंबी तलवार थी। उसने उसकी नोक कुत्ते को चुभो दी। कुत्ता दर्द से चिल्लाने लगा और मेहतरानी ‘राम-राम क्या ज़माना आ गया है’, कहती हुई, कुत्ते को सहलाने लगी। हमारे देखते-देखते वह भोथरी तलवार कुत्ते को गहरा घाव दे गई। एक मनोवैज्ञानिक घाव पिता को भी लगा लेकिन माँ को कहीं अधिक। वह कुत्ते को हुई पीड़ा से बेहद दुखी हुई। वह छोटू को डाँटने लगीं। उससे तलवार छीन ली गई। त्योहार के दिन घर में हल्का-सा विषाद उतर आया। जो चुभते कोलाहल के ऊपर तैर रहा था।
माँ ने कहा, “मैं कहती हूँ इस तलवार को किसी को दे दो। हथियार अपने पराये में भेद नहीं करता।”
“क्या बात करती हो, पुरखों की तलवार किसी को दे दूँ,’ पिता ने कहा।
“यह हमारे किसी काम की नहीं।” माँ ने कहा।
“क्या पुरानी है तो बेकार हो गई? कभी यह हमारे पुरखों के काम आई थी।” पिता ने कहा।
“पर अब यह बेकार है। कौन चोर तलवार लेकर आता है। आजकल चोर-लुटेरे देसी कट्टा रखते हैं।” माँ ने कहा और फिर गुस्से में फ़ैसला दे दिया कि मैं इस ख़तरनाक चीज़ को घर में हरगिज़ नहीं रखूँगी।
पिता को समझ नहीं आ रहा था कि वह इस तलवार पर गर्व करें या अभी जो हुआ है उस पर लज्जित हों। उनके पास कोई जवाब नहीं था।
माँ पिता की भावनाओं को समझ रही थीं। उन्होंने तलवार पर कलावे से नौरते बाँधे गए जो पहले नवरात्र को कनस्तर में बोये जाते थे और जो दशहरे पर लंबे-लंबे उग आते थे। फिर तलवार को रोष और निष्ठुर उपेक्षा के साथ रावण के पास पूजने के लिए रख दिया गया। उस दिन सारे परिवार को वह तलवार रावण की तरह लगने लगी।
यूँ तो मधुसूदन आनंद जी के लेखन से बहुत पहले ही परिचित और प्रभावित हो चुकी, कहानी कहने की शैली सुंदर लगती है। आज उनकी कहानी “देखना” पढ़ी।
देखना सुधार जाए तो सच में स्त्री पुरुष के बीच की खाई खत्म हो भी जाए वरना स्त्री-पुरुष के बीच बातचीत भी सहज और सामान्य नहीं रहती। कोई हँसकर बात कर ले, तो भी मतलब निकाल लिए जाते हैं। खैर!
यह कहानी पढ़ते हुए गहरे से और बार-बार लगा कि “देखना” सच में सिर्फ आँखों का काम नहीं होता, उसमें हमारा मन, हमारे संस्कार भी शामिल होते हैं। शुरुआत में जो बात कही—देखना यानी दृष्टि और नज़र यानी देखने की क्रिया—मधुसूदन आनंद जी की इस कहानी में वही बात धीरे-धीरे खुलती चलती है।
राजा भाई साहब नामक किरदार का आना सिर्फ एक घटना नहीं है, उनके जरिए जैसे एक नई दुनिया खुलती है—किताबों की भी और सोचने-देखने की भी। दूसरी तरफ पिता हैं, जिनकी अपनी एक तयशुदा दृष्टि है, जिसमें हर चीज़ को तुरंत सही-गलत के खांचे में डाल दिया जाता है।
तिलोत्तमा वाला प्रसंग बहुत देर तक साथ चलता है।
बचपन में जो बस सुंदर लगता है, वही बाद में जाकर कुछ और अर्थ लेने लगता है। तब समझ में आता है कि चीज़ें उतनी नहीं बदलतीं, जितना हमारा देखने का तरीका बदल जाता है। कहानी पढ़कर सच में लगा कि जैसे मेरे मन की कोई बात किसी और ने कह दी हो। हम जैसा भीतर होते हैं, वैसा ही बाहर देखने लगते हैं।
कल्पना मनोरमा