समकालीन हिंदी कविता में अरुण कमल की उपस्थिति साधारण जीवन की खुरदुरी हक़ीक़त और अनुभव की सूक्ष्म परतों को रचने वाले एक सशक्त कवि के रूप में रही है। उनके सद्य:प्रकाशित कविता संग्रह ‘किराये का घर’ में शामिल ‘धूप में नींद’ कविता यथार्थ, भाषा और मानवीय चेतना के बीच घटित होने वाले एक अनूठे द्वंद्व का आख्यान है।

‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन का यह आलेख अरुण कमल की इस कविता का एक सुचिंतित, बहुआयामी और गंभीर अनुशीलन प्रस्तुत करता है। लेखक ने केवल पारंपरिक समीक्षा पद्धतियों तक स्वयं को सीमित न रखते हुए पश्चिमी दर्शन और भाषा-चिंतन के आधुनिकतम अनुशासनों—जैसे एडमंड हुसर्ल और मर्लो-पोंती की प्रातिभासिकता (Phenomenology), देरिदा के विखंडनवाद, ग्राहम हरमन और करेन बैरड के नव-पदार्थवाद (New Materialism), सॉस्यूर एवं रोलाँ बार्थ के भाषा-विज्ञान, तथा हेनरी बर्गसों और टी.एस. एलियट के समय-बोध—के आलोक में कविता के बिंबों की गहराई से पड़ताल की है।

यह आलेख हिंदी आलोचना को नए सैद्धांतिक उपकरणों के साथ कविता के करीब ले जाने का एक सराहनीय और विचारोत्तेजक प्रयास है। हमें विश्वास है कि यह विश्लेषण ‘रचना समय’ के सुधी पाठकों और शोधार्थियों के लिए कविता को नए ढंग से देखने और महसूस करने की खिड़कियाँ खोलेगा।

 —हरि भटनागर

‘धूप में नींद’: अरुण कमल की कविता में अनुभव, भाषा और दुनिया का बदलता एहसास

   रवि रंजन

अरुण कमल की ‘धूप में नींद’ कविता एक ऐसे गहरे अनुभव से साक्षात्कार कराती है जहाँ बाहरी यथार्थ और आंतरिक चेतना एक-दूसरे में घुलमिल जाते हैं। सौंदर्यशास्त्रीय और समाजशास्त्रीय दोनों नज़रिए से यह कविता साधारण जीवन की वस्तुओं और अनुभूतियों के माध्यम से एक सूक्ष्म संसार रचती है। एक तरफ़ यह कविता समाज के बदलते ढाँचे, बढ़ते अकेलेपन और अनाम दबावों की ओर इशारा करती है जहाँ इंसान भीड़ के बीच रहते हुए भी एक अनजानी बेचैनी और ख़ालीपन को झेलता है; वहीं दूसरी तरफ यह स्थूल सुंदरता का वर्णन करने के बजाय ‘प्रकट होने की प्रक्रिया’ और संवेदनात्मक अनुभूतियों को अपना मुख्य आधार बनाती है। कविता की शुरुआत ही एक गहन तनाव से होती है—’कोई भी तो नहीं / पर कोई है तो ज़रूर’। यह पंक्ति समाजशास्त्र के उस पहलू को छूती है जहाँ अदृश्य सामाजिक व्यवस्थाएँ और मान्यताएँ हमारे जीवन को तय करती हैं, वहीं सौंदर्यशास्त्र के स्तर पर यह उपस्थिति और अनुपस्थिति के बीच बने संवेदनात्मक आभास को उजागर करती है। कविता के बिंब—पानी में हवा की आवाज़, धूल बनती रोशनी, आकाश का बोझ उठाए नीचे गिरती चिड़िया, लटाई से खुलती हवा और रेशम का गरारा बना पेड़—हमारी परिचित धारणाओं को बदल देते हैं। ये बिंब दिखाते हैं कि दुनिया का सच और सौंदर्य केवल वही नहीं है जो आँखों से दिखता है, बल्कि वह भी है जिसे मनुष्य अपनी स्मृतियों, आकांक्षाओं और संवेदनाओं के साथ महसूस करता है। अंततः, ‘धूप में नींद’ तीखी धूप की वास्तविक कड़वाहट और बारिश के स्वप्निल अहसास के द्वंद्व को साधकर यथार्थ और सौंदर्यबोध का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करती है।

कविता का मूल पाठ द्रष्टव्य है:

धूप में नींद

कोई भी तो नहीं

पर कोई है तो ज़रूर

जो मेरी सांस भर से चुप हो जाता है—

पानी में घड़ा डुबोने जैसी जो आवाज़ आ रही है

पानी में हवा की

एक रौशनी जो मेरे ताकते-ताकते

धूर बन जाती है

एक चिड़िया जो धेले सी गिरी आ रही

नभ का सारा बोझ लिये

एक हवा जो डोर सी खुल रही लटाई से

एक पेड़ जो गरारा है रेशम का—

लगा जैसे बारिश हो रही है बाहर

पर धूप थी धूप और धाह

कोई तो नही कोई भी

धूप में नींद

    —अरुण कमल:  किराये का घर, पृ 77

‘धूप में नींद’ कविता को पढ़ते हुए सबसे पहले एक ऐसे अनुभव से सामना होता है, जिसमें कुछ भी दिखाई नहीं देता, फिर भी किसी की मौजूदगी का एहसास बना रहता है। कवि कहता है, ‘कोई भी तो नहीं / पर कोई है तो ज़रूर।’ इन दो पंक्तियों के बीच ही कविता का पूरा तनाव छिपा है। एक तरफ़ आँखों के सामने ख़ालीपन है, दूसरी तरफ़ मन उस ख़ालीपन को स्वीकार नहीं कर पा रहा। कवि को लगता है कि कोई है, कोई ऐसा जो दिखाई नहीं देता, लेकिन जिसकी मौजूदगी आसपास की चीज़ों में महसूस होती है। यह कौन है, इसका जवाब कविता नहीं देती। शायद कवि खुद भी नहीं जानता। वह बस उस अनुभव को पकड़ने की कोशिश करता है, जो किसी नाम या पहचान में बँधने से पहले ही उसके भीतर जाग उठा है।

कविता की शुरुआत में कवि का यह कहना कि ‘मेरी सांस भर से चुप हो जाता है’ इस अनुभव को और गहरा बनाता है। यहाँ किसी की मौजूदगी का पता उसकी आवाज़ से नहीं, बल्कि उसके अचानक चुप हो जाने से चलता है। कवि की साँस जैसे ही उस अनदेखी दुनिया को छूती है, वहाँ का सारा शोर थम जाता है। इस चुप्पी को केवल बाहर की ख़ामोशी मानना ठीक नहीं होगा। ऐसा लगता है कि कवि अपने आसपास की दुनिया को इतनी तन्मयता से देख रहा है कि उसकी अपनी साँस भी उस अनुभव में बाधा बन सकती है। वह कुछ बोलना नहीं चाहता। उसे डर है कि कहीं उसकी आवाज़ उस नाज़ुक अनुभव को तोड़ न दे।

यहाँ एक दिलचस्प बात और है। कवि किसी भूत, देवता या रहस्यमय शक्ति का नाम नहीं लेता। वह अपने अनुभव को किसी निश्चित अर्थ में बाँधने से बचता है। यही वजह है कि कविता में रहस्य बना रहता है। पाठक को किसी अनदेखी सत्ता पर विश्वास करने के लिए नहीं कहा जाता। वह केवल उस बेचैनी को महसूस करता है, जो किसी के होने और न होने के बीच पैदा होती है।

इसके बाद कविता में पानी और घड़े का दृश्य आता है। कवि सुनता है, ‘पानी में घड़ा डुबोने जैसी जो आवाज़ आ रही है / पानी में हवा की।’ इन पंक्तियों में ध्वनि और दृश्य एक दूसरे में घुलने लगते हैं। पानी में घड़ा डुबोने पर एक खास तरह की आवाज़ पैदा होती है। उस आवाज़ में पानी का भरना, हवा का बाहर निकलना और किसी खाली जगह का भर जाना, सब कुछ शामिल होता है। लेकिन कवि को पानी में हवा की आवाज़ सुनाई देती है। यह अनुभव सामान्य तर्क से थोड़ा अलग है। पानी और हवा को हम अक्सर एक दूसरे के विपरीत रखते हैं। पानी दिखाई देता है, जबकि हवा का पता उसके असर से चलता है। यहाँ कवि पानी के भीतर हवा की मौजूदगी सुनता है।

इस बिंब को ध्यान से देखें तो लगता है कि कवि उस चीज़ को पकड़ना चाहता है, जो दिखाई नहीं देती, लेकिन किसी दूसरी चीज़ के भीतर अपनी जगह बना लेती है। हवा पानी में है, पर उसकी आवाज़ को अलग से पहचानना आसान नहीं। इसी तरह कविता की शुरुआत में जिस अनदेखी मौजूदगी का ज़िक्र हुआ है, वह भी आसपास की चीज़ों से अलग नहीं है। वह पानी की आवाज़ में है, रोशनी में है, चिड़िया की गति में है और हवा के फैलने में भी। कवि उसे किसी एक जगह खोजने के बजाय पूरी दुनिया में महसूस करता है।

पानी में हवा की आवाज़ का यह बिंब हमें अपने अनुभवों की सीमाओं के बारे में भी सोचने को कहता है। हम अक्सर मान लेते हैं कि जो आँखों से दिखाई देता है, वही सच है। लेकिन हमारे रोज़मर्रा के जीवन में भी कई अनुभव ऐसे होते हैं, जिन्हें हम साफ़-साफ़ देख नहीं सकते। किसी कमरे में प्रवेश करते ही वहाँ के माहौल का बदल जाना, किसी के आने पर बातचीत का अचानक रुक जाना या किसी पुराने घर में पहुँचकर बीते दिनों की याद लौट आना, इन सबमें किसी ऐसी चीज़ का एहसास होता है, जिसे हम आसानी से नाम नहीं दे सकते। अरुण कमल की कविता इसी तरह के अनुभव को भाषा देती है।

इसके बाद कवि एक रोशनी को देखता है। वह कहता है, ‘एक रोशनी जो मेरे ताकते-ताकते / धूर बन जाती है।’ यहाँ ‘ताकते-ताकते’ शब्द पर ध्यान देना चाहिए। कवि एक झलक पाकर आगे नहीं बढ़ जाता। वह लगातार देखता रहता है। उसकी नज़र उस रोशनी पर टिकी हुई है। लेकिन देखने की यह कोशिश रोशनी को और साफ़ नहीं करती। उलटे, रोशनी धूल बन जाती है।

आम तौर पर हम मानते हैं कि किसी चीज़ को जितना ध्यान से देखेंगे, वह उतनी ही साफ़ समझ में आएगी। इस कविता में ऐसा नहीं होता। कवि की निगाह जिस चीज़ को पकड़ना चाहती है, वह देखते-देखते अपना रूप बदल लेती है। रोशनी का धूल बन जाना इसी बदलाव को सामने लाता है। रोशनी में चमक है, जबकि धूल में धुँधलापन है। रोशनी हमें चीज़ों को देखने में मदद करती है, लेकिन धूल हमारी नज़र को रोकती है। इस तरह कविता का बिंब देखने और समझने के बीच एक दूरी पैदा करता है।

यह दूरी केवल आँखों की सीमा नहीं है। कभी-कभी हम किसी व्यक्ति, घटना या स्मृति को बहुत ध्यान से समझने की कोशिश करते हैं, लेकिन जितना उसके करीब जाते हैं, उतने ही नए सवाल सामने आते हैं। जो बात पहले साफ़ लगती थी, वह उलझने लगती है। कवि का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है। वह किसी मौजूदगी को पहचानना चाहता है, लेकिन उसकी निगाह के सामने वह मौजूदगी स्थिर नहीं रहती। वह रोशनी से धूल बन जाती है। कविता इस बदलाव को समझाने के लिए कोई दार्शनिक कथन नहीं देती। वह बस एक दृश्य रचती है और पाठक को उसके भीतर छोड़ देती है।

यहाँ धूल का एक दूसरा अर्थ भी खुलता है। धूल हवा में तैरती है, रोशनी में चमकती है और किसी भी सतह पर जम सकती है। वह हमारे आसपास हमेशा मौजूद रहती है, लेकिन हम अक्सर उस पर ध्यान नहीं देते। रोशनी का धूल बन जाना इस ओर भी इशारा करता है कि जिसे हम किसी दूर की, रहस्यमय या असाधारण चीज़ की तरह देख रहे थे, वह शायद हमारे आसपास की साधारण दुनिया का ही हिस्सा है। रहस्य कहीं बाहर नहीं, इसी दुनिया के भीतर है।

इसके बाद चिड़िया का बिंब आता है। कवि कहता है, ‘एक चिड़िया जो धेले सी गिरी आ रही / नभ का सारा बोझ लिये।’ चिड़िया का आकार छोटा है। धेला भी एक छोटी और मामूली चीज़ का बोध कराता है। लेकिन इस छोटी सी चिड़िया के साथ कवि पूरे आकाश का बोझ जोड़ देता है। यहाँ आकार और भार के बीच एक अजीब विरोध पैदा होता है। जो जीव हल्का होना चाहिए, वह इतना भारी लगता है कि उसके साथ पूरा नभ चला आ रहा है।

चिड़िया का ‘गिरी आना’ भी ध्यान देने लायक है। हम आम तौर पर चिड़िया को उड़ते हुए देखते हैं। उड़ान में हल्कापन, आज़ादी और गति का भाव होता है। लेकिन यहाँ वह उड़ती हुई नहीं, गिरती हुई आती है। उसकी गति में सहजता के बजाय किसी अनजाने भार का एहसास है। आकाश, जो खुली जगह और विस्तार का प्रतीक माना जाता है, उसी का बोझ चिड़िया अपने साथ लिए हुए है।

इस बिंब में एक छोटी सी जीवित चीज़ और उसके चारों ओर फैली विशाल दुनिया के बीच का रिश्ता बदल जाता है। चिड़िया केवल चिड़िया नहीं रह जाती। उसकी छोटी सी देह में पूरा आकाश उतर आता है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या किसी छोटी चीज़ को सचमुच छोटा कहा जा सकता है? किसी पत्ती पर ठहरी बूँद, किसी बच्चे की आँखों में दिखाई देता डर या किसी बूढ़े के चेहरे पर उभरती याद, अपने आकार से कहीं बड़ा अर्थ रख सकती है। अरुण कमल की निगाह साधारण चीज़ों में छिपे इसी फैलाव को पहचानती है।

चिड़िया का बिंब कविता में एक हल्की उदासी भी लाता है। आकाश का बोझ लिए आती हुई चिड़िया अपनी सहज उड़ान खोती हुई लगती है। लेकिन कवि इस उदासी को किसी कहानी में नहीं बदलता। वह यह नहीं बताता कि चिड़िया कहाँ से आ रही है या उसके ऊपर इतना बोझ क्यों है। वह केवल उसके आने का दृश्य सामने रखता है। इस अधूरेपन में ही कविता की ताकत है। पाठक उस चिड़िया को देखता है और उसके साथ अपने अर्थ जोड़ने लगता है।

इसके बाद हवा का बिंब आता है, ‘एक हवा जो डोर सी खुल रही लटाई से।’ इस पंक्ति में हवा को डोर की तरह खुलते हुए देखा गया है। आम तौर पर हवा को हम बहते हुए महसूस करते हैं। वह अपने पीछे कोई दिखाई देने वाली लकीर नहीं छोड़ती। डोर का अपना आकार होता है और उसे आँखों से देखा जा सकता है। कवि हवा को डोर की तरह खुलते हुए देखता है, मानो हवा के बहने से कोई बँधन खुल रहा हो।

लटाई से खुलती डोर का दृश्य अपने भीतर एक खास तरह की गति रखता है। डोर जितनी खुलती है, उतनी दूर तक जा सकती है। उसके खुलने में विस्तार है, लेकिन उसके साथ एक अनिश्चितता भी है। डोर कहाँ तक जाएगी, यह पहले से तय नहीं होता। हवा का इस तरह खुलना किसी ऐसी चीज़ के फैलने का एहसास कराता है, जिसे हम रोक नहीं सकते। हवा को मुट्ठी में नहीं बाँधा जा सकता। वह अपना रास्ता खुद बनाती है।

इस बिंब को कविता के पहले हिस्से से जोड़कर देखें तो अनदेखी मौजूदगी का अनुभव एक और रूप लेता है। पहले वह साँस से चुप हो जाती थी, फिर पानी में हवा की आवाज़ बनकर सामने आई, उसके बाद रोशनी धूल में बदली और चिड़िया आकाश का बोझ लेकर आई। अब हवा डोर की तरह खुल रही है। हर बार कवि किसी ऐसी चीज़ को देखता है, जो एक रूप में टिकती नहीं। उसका अनुभव लगातार बदलता रहता है।

कविता का अगला बिंब और भी चौंकाने वाला है, ‘एक पेड़ जो गरारा है रेशम का।’ पेड़ और रेशम को साथ रखने से एक अजीब दृश्य बनता है। पेड़ की अपनी ठोस बनावट है। उसका तना, शाखाएँ और पत्तियाँ हमें प्रकृति की एक परिचित छवि देते हैं। रेशम इसके उलट मुलायम, महीन और छूने में हल्का होता है। कवि पेड़ को रेशम का गरारा कहता है। इससे पेड़ की कठोर और स्थिर छवि बदल जाती है। वह किसी कपड़े की तरह फैलता, लहराता या हवा के साथ हिलता हुआ दिखाई देने लगता है।

गरारे का बिंब इस दृश्य को और घरेलू बनाता है। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं, जिसे देखने के लिए हमें किसी दूर की दुनिया में जाना पड़े। वह हमारे जीवन और रोज़मर्रा के पहनावे से जुड़ा शब्द है। कवि प्रकृति को देखने के लिए किसी भारी भरकम भाषा का सहारा नहीं लेता। वह अपने आसपास की चीज़ों से ही ऐसे बिंब रचता है, जिनमें पेड़ एक नए रूप में सामने आता है।

यहाँ पेड़ का रेशम का गरारा होना केवल कल्पना की उड़ान नहीं है। इसमें देखने वाले की मनःस्थिति भी शामिल है। जब हम किसी चीज़ को सामान्य नज़र से देखते हैं, तो उसका एक तय रूप हमारे सामने रहता है। लेकिन कभी-कभी मन की स्थिति बदलते ही वही चीज़ अलग दिखने लगती है। पेड़ तब पेड़ भर नहीं रहता। वह कपड़े की तरह लहराता है, किसी आकृति की तरह बदलता है और हमारे अनुभव में एक नया अर्थ ग्रहण करता है। कविता इसी बदलती हुई नज़र को पकड़ती है।

अब तक कविता में पानी, हवा, रोशनी, धूल, चिड़िया और पेड़ जैसे बिंब आ चुके हैं। इन सबमें एक बात साझा है। कोई भी चीज़ अपने सामान्य रूप में स्थिर नहीं रहती। पानी में हवा सुनाई देती है। रोशनी धूल बन जाती है। चिड़िया आकाश का बोझ लेकर आती है। हवा डोर की तरह खुलती है और पेड़ रेशम का गरारा बन जाता है। कवि की निगाह दुनिया को उसके रोज़ के रूप में स्वीकार नहीं करती। वह हर चीज़ में कुछ ऐसा देखती है, जो सामान्य पहचान से बाहर निकल जाता है।

लेकिन यह बदलाव किसी सपने की दुनिया में नहीं घट रहा। कविता का आख़िरी हिस्सा हमें फिर धूप के बीच ले आता है। कवि कहता है, ‘लगा जैसे बारिश हो रही है बाहर / पर धूप थी धूप और धाह।’ यह कविता का निर्णायक मोड़ है। अभी तक जो दृश्य सामने आए, उनमें बारिश का एहसास मौजूद था। हवा, पानी, पेड़ और बदलती रोशनी मिलकर एक ऐसे मौसम का आभास देते हैं, जिसमें ठंडक और नमी हो सकती है। कवि को लगता है कि बाहर बारिश हो रही है। लेकिन जब वह इस अनुभव को पहचानने की कोशिश करता है, तो उसे पता चलता है कि धूप ही धूप है। उसके साथ धाह भी है।

धूप और धाह के बीच का फर्क कविता को एक अलग दिशा देता है। धूप का अर्थ केवल रोशनी नहीं है। उसमें गर्मी भी शामिल है। धाह उस गर्मी को और तीखा बना देती है, जिसे शरीर सीधे महसूस करता है। बारिश की कल्पना और धूप की सच्चाई के बीच जो दूरी है, वही इस कविता का अनुभव है। कवि का मन एक ऐसा मौसम रचता है, जिसमें पानी और हवा की आवाज़ है, पेड़ रेशम की तरह लहराता है और चिड़िया आकाश का बोझ लेकर आती है। लेकिन बाहर की दुनिया में गर्म धूप फैली हुई है।

यहाँ कविता एक साधारण विरोध को सामने लाती है। एक ओर मन का अनुभव है, दूसरी ओर बाहर की स्थिति। दोनों एक दूसरे से पूरी तरह अलग भी नहीं हैं और पूरी तरह एक जैसे भी नहीं। कवि बारिश को सचमुच होते हुए नहीं देखता। उसे बारिश का एहसास होता है। यह एहसास इतना गहरा है कि वह बाहर के मौसम की पहचान को कुछ देर के लिए बदल देता है। लेकिन अंत में धूप अपनी मौजूदगी दर्ज कराती है। वह केवल दिखाई नहीं देती, बल्कि अपनी गर्मी से शरीर को भी छूती है।

इस अनुभव को केवल भ्रम कहकर छोड़ देना कविता के साथ न्याय नहीं होगा। मनुष्य की दुनिया में अनुभव और बाहरी सच के बीच हमेशा सीधा रिश्ता नहीं होता। कभी किसी जगह की ख़ामोशी हमें बारिश की याद दिलाती है। कभी किसी चेहरे को देखकर बीते समय का कोई दृश्य सामने आ जाता है। कभी धूप में बैठे हुए भी मन को ठंडक का एहसास होता है। ऐसे अनुभवों को झूठा कहना आसान है, लेकिन वे हमारे जीवन का हिस्सा हैं। अरुण कमल की कविता इसी बात को सामने लाती है कि मनुष्य केवल बाहर की चीज़ों को नहीं देखता। वह अपने भीतर की स्मृतियों, इच्छाओं और आशंकाओं के साथ उन्हें महसूस करता है।

कविता के शीर्षक ‘धूप में नींद’ को भी इसी संदर्भ में पढ़ना चाहिए। धूप और नींद के बीच एक सहज विरोध दिखाई देता है। धूप जागने, देखने और बाहर की दुनिया से जुड़ने का एहसास कराती है। नींद हमें अपने भीतर की दुनिया में ले जाती है। लेकिन कविता दोनों को एक साथ रखती है। धूप में नींद का अर्थ केवल गर्मी में सो जाना नहीं है। यह उस स्थिति की ओर भी इशारा करता है, जिसमें मनुष्य जागते हुए भी किसी स्वप्न जैसी दुनिया में प्रवेश कर जाता है।

कवि की आँखें खुली हैं। वह पानी की आवाज़ सुनता है, रोशनी को देखता है, चिड़िया को आते हुए देखता है और पेड़ की आकृति पहचानता है। फिर भी उसका अनुभव किसी सपने की तरह बदलता रहता है। वह बाहर की दुनिया से कटा हुआ नहीं है। बल्कि वह उसी दुनिया को इतनी गहराई से देख रहा है कि उसकी सामान्य पहचानें टूटने लगती हैं। धूप में नींद इसी अनुभव का नाम है। यह जागने और सोने के बीच की ऐसी स्थिति है, जिसमें दोनों के अनुभव एक दूसरे में घुल जाते हैं।

शीर्षक में धूप का होना इसलिए भी ज़रूरी है कि कविता अंत में हमें उसी के पास लौटाती है। अगर कविता केवल नींद या सपने की दुनिया में रहती, तो उसके बिंबों को मन की उड़ान कहकर समझा जा सकता था। लेकिन धूप की गर्मी इस अनुभव को शरीर से जोड़ देती है। कवि किसी बंद कमरे में बैठकर कल्पना नहीं कर रहा। उसके अनुभव के पीछे बाहर का मौसम है, उसकी रोशनी है और उसकी गर्मी है। सपने जैसी अनुभूति इसी वास्तविक दुनिया के भीतर जन्म लेती है।

कविता के अंत में कवि फिर कहता है, ‘कोई तो नहीं कोई भी / धूप में नींद।’ शुरुआत में वह कहता है, ‘कोई भी तो नहीं / पर कोई है तो ज़रूर।’ दोनों जगह ‘कोई’ का लौटना कविता को एक गोलाई देता है। शुरुआत में कवि किसी की मौजूदगी का एहसास करता है। अंत में वह जैसे उस मौजूदगी को नकारता हुआ दिखाई देता है। लेकिन इस नकार में भी सवाल बचा रहता है। अगर कोई नहीं है, तो इतनी देर तक यह अनुभव किसका था? और अगर कोई है, तो वह दिखाई क्यों नहीं देता?

इन पंक्तियों में कवि किसी तय जवाब तक नहीं पहुँचता। वह अपनी उलझन को जस का तस रहने देता है। यही कविता का स्वभाव है। वह रहस्य को खोलकर खत्म नहीं करती, बल्कि उसे अनुभव का हिस्सा बना देती है। ‘कोई तो नहीं कोई भी’ में एक तरह की थकान भी सुनाई देती है। कवि जैसे अपने देखे और सुने हुए दृश्यों के बाद फिर उसी ख़ालीपन में लौट आया है, जहाँ से उसने शुरुआत की थी। लेकिन यह वही ख़ालीपन नहीं है। अब उसमें पानी की आवाज़, रोशनी की धूल, चिड़िया का बोझ, खुलती डोर और रेशम का पेड़ शामिल हैं।

इस तरह कविता का ख़ालीपन भी भरा हुआ है। कोई दिखाई नहीं देता, लेकिन दुनिया की हर चीज़ किसी अनजानी मौजूदगी का संकेत देने लगती है। यह मौजूदगी किसी एक व्यक्ति की हो सकती है, किसी स्मृति की, किसी दबे हुए एहसास की या केवल उस क्षण की, जब मनुष्य अपने आसपास की दुनिया को नए ढंग से देखने लगता है। कविता इनमें से किसी एक अर्थ पर मुहर नहीं लगाती।

अरुण कमल की भाषा की सहजता इस अनुभव को और असरदार बनाती है। वे किसी कठिन दार्शनिक शब्दावली का सहारा नहीं लेते। पानी में डूबता घड़ा, धूल बनती रोशनी, धेले जैसी चिड़िया, लटाई से खुलती डोर और रेशम का गरारा, ये सब हमारे जाने-पहचाने जीवन से आए हैं। फिर भी कवि इन्हें इस तरह रखता है कि इनके बीच के संबंध बदल जाते हैं। परिचित चीज़ें अनजानी लगने लगती हैं। यही कविता की भाषा का काम है। वह दुनिया को हमारे सामने पहली बार देखने जैसी स्थिति पैदा करती है।

कविता में कोई लंबी कहानी नहीं है। कोई पात्र अपना परिचय नहीं देता। घटनाओं का भी कोई तय क्रम नहीं बनता। फिर भी एक अनुभव शुरू से अंत तक पाठक के साथ चलता है। कवि किसी अनदेखी मौजूदगी को महसूस करता है और उसे पहचानने के लिए आसपास की दुनिया को देखता है। हर दृश्य उसे कुछ बताता है, लेकिन कोई भी दृश्य उसका सवाल हल नहीं करता। अंत में वह फिर धूप में लौट आता है। उसके पास कोई जवाब नहीं, केवल अनुभव बचा है।

‘धूप में नींद’ की खूबी यही है कि यह साधारण दुनिया को रहस्यमय बनाती है, लेकिन उसे हमसे दूर नहीं ले जाती। कविता पढ़ते हुए हमें लगता है कि शायद हम भी कभी ऐसे किसी क्षण से गुज़रे हैं, जब कोई दिखाई नहीं देता था, फिर भी किसी के होने का एहसास था। जब बाहर का मौसम कुछ और था, लेकिन मन के भीतर कोई दूसरा मौसम चल रहा था। जब किसी मामूली चीज़ को देखते हुए अचानक लगा कि उसके भीतर हमारी समझ से कहीं ज़्यादा कुछ छिपा है।

आख़िर में कविता किसी अनदेखी सत्ता की खोज से ज़्यादा देखने के हमारे ढंग की कविता बन जाती है। वह पूछती है कि क्या दुनिया हमेशा वैसी ही होती है, जैसी हमें दिखाई देती है? या हमारे देखने, सुनने और महसूस करने से उसका रूप बदलता रहता है? अरुण कमल इस सवाल का जवाब नहीं देते। वे हमें धूप में बैठा छोड़ देते हैं, जहाँ नींद भी आ सकती है, बारिश का एहसास भी हो सकता है और धूप की धाह भी महसूस हो सकती है। शायद इसी बीच, किसी के न होते हुए भी, किसी के होने का एहसास जन्म लेता है।

‘धूप में नींद’ में अरुण कमल बाहरी दुनिया को केवल उसके पहचाने हुए रूपों में नहीं देखते, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि मनुष्य के अनुभव में चीज़ें किस तरह प्रकट होती हैं और अपना परिचित अर्थ बदलती हैं। कविता में पानी, हवा, रोशनी, चिड़िया और पेड़ हमारे आसपास की साधारण चीज़ें हैं, लेकिन कवि की निगाह उन्हें एक नए अनुभव से जोड़ देती है। पानी में हवा की आवाज़ सुनाई देती है, रोशनी देखते-देखते धूल बन जाती है और पेड़ रेशम के गरारे जैसा दिखाई देने लगता है। इन बिंबों में कविता किसी असाधारण दुनिया की रचना नहीं करती। वह इसी दुनिया को देखने का एक अलग ढंग सामने लाती है।

उल्लेखनीय है कि प्रातिभासिकता और प्रकट होने की प्रक्रिया (Phenomenology of Appearance) पर विचार करने वाले एडमंड हुसर्ल (Edmund Husserl)  की दृष्टि सिर्फ़ इस बात पर गौर नहीं करती कि कवि क्या देखता है, बल्कि इस पर भी विचार करती है कि कोई चीज़ उसके सामने किस तरह प्रकट होती है।

हुसर्ल की के अनुसार किसी वस्तु को समझने के लिए केवल उसके बाहरी रूप का वर्णन पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना पड़ता है कि वह हमारे अनुभव में किस तरह सामने आती है। इस नज़रिए से ‘एक रोशनी जो मेरे ताकते-ताकते / धूर बन जाती है’ पंक्तियाँ ख़ास तौर पर ध्यान खींचती हैं। कवि रोशनी को लगातार देखता है, लेकिन उसका ध्यान उसे किसी स्थिर पहचान तक नहीं पहुँचाता। रोशनी धूल बन जाती है। यहाँ देखने की क्रिया केवल किसी वस्तु को पहचानने का माध्यम नहीं रहती, बल्कि उसी वस्तु के अनुभव को बदलने लगती है। कविता इस तरह दिखाती है कि दुनिया हमारे सामने हमेशा एक ही रूप में नहीं खुलती।

मार्टिन हाइडेगर (Martin Heidegger) के विचारों के तहत इस बात को समझा जा सकता है कि मनुष्य दुनिया से अलग खड़ा होकर उसे नहीं देखता। वह पहले से ही अपने आसपास की चीज़ों, परिस्थितियों और संबंधों के बीच रहता है। कविता की पंक्ति ‘कोई भी तो नहीं / पर कोई है तो ज़रूर’ इसी जुड़ाव को एक अनिश्चित अनुभव के रूप में सामने लाती है। कवि किसी की मौजूदगी का प्रमाण नहीं देता, फिर भी उसे किसी के होने का एहसास होता है। यह एहसास किसी अलग, पहचानी जा सकने वाली वस्तु से नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवेश से पैदा होता है। पानी की आवाज़, हवा की गति और बदलते दृश्य इस अनदेखी मौजूदगी को महसूस करने के माध्यम बन जाते हैं। इस तरह कविता में दुनिया केवल वस्तुओं का समूह नहीं रहती, बल्कि ऐसे संबंधों का क्षेत्र बनती है जिनके भीतर मनुष्य अपने होने का अनुभव करता है।

मर्लो पोंती (Maurice Merleau-Ponty) की देहधर्मी प्रातिभासिकता (Embodied Phenomenology)  इस कविता को एक और कोण से समझने में मदद करती है। उनके अनुसार, शरीर दुनिया को जानने का केवल साधन नहीं है, बल्कि दुनिया के साथ हमारे संबंध का बुनियादी आधार है। हम आँखों से देखते हैं, कानों से सुनते हैं और साँस तथा दूसरी शारीरिक संवेदनाओं के सहारे अपने परिवेश को महसूस करते हैं। कविता में ‘मेरी सांस भर से चुप हो जाता है’ पंक्ति इसी अनुभव की ओर संकेत करती है। कवि की साँस अनदेखी मौजूदगी के साथ उसके संबंध का हिस्सा बन जाती है। इसी तरह पानी में घड़ा डुबोने जैसी आवाज़ सुनना और चिड़िया को ‘नभ का सारा बोझ लिये’ आते देखना बताता है कि कवि की अनुभूति केवल दृश्य तक सीमित नहीं रहती। वह ध्वनि, गति, भार और शारीरिक संवेदना को एक साथ ग्रहण करती है।

‘धूप में नींद’ की ख़ासियत यह है कि कविता दुनिया को किसी एक निश्चित अर्थ में बाँधने के बजाय उसके प्रकट होने की बदलती प्रक्रिया को पकड़ती है। कवि जो देखता और सुनता है, वह उसके अनुभव में नए संबंध बनाता है। इसलिए पेड़ का रेशम का गरारा बन जाना केवल कल्पना का खेल नहीं है। यह उस क्षण का अनुभव है जब परिचित वस्तु अपनी पुरानी पहचान से आगे बढ़कर कुछ नया अर्थ ग्रहण करती है। कविता के अंत में बारिश का एहसास होने के बावजूद ‘धूप थी धूप और धाह’ का कथन इस अनुभव को बाहरी वास्तविकता से फिर जोड़ देता है। मन का अनुभव और बाहर का मौसम एक दूसरे से अलग होते हुए भी कविता में साथ बने रहते हैं। इस तरह विवेच्य कविता हमें यह सोचने का अवसर देती है कि दुनिया सिर्फ़ वह नहीं है जो हमें दिखाई देती है, बल्कि वह भी है जो हमारे देखने, सुनने और महसूस करने की प्रक्रिया में लगातार प्रकट होती रहती है।

‘धूप में नींद’ को भाषा, अर्थ और संकेतों की अस्थिरता की दृष्टि से पढ़ने पर सबसे पहले यह बात सामने आती है कि कविता परिचित वस्तुओं को उनके तयशुदा अर्थों से अलग करके देखती है। दूसरे शब्दों में यहाँ भाषा सिर्फ़ पहले से पहचानी गई दुनिया को व्यक्त करने के बजाय उसके अर्थों को नए सिरे से गढ़ती है। रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में पेड़, चिड़िया, रोशनी, पानी और धूप हमारे अनुभव के पहचाने हुए हिस्से हैं। हम इनके नाम लेते हैं और इनके अर्थ को लगभग निश्चित मानकर चलते हैं। लेकिन कविता में आते ही ये वस्तुएँ अपने परिचित रूप में नहीं रहतीं। पेड़ रेशम के गरारे से जुड़ जाता है, चिड़िया धेले जैसी दिखाई देती है और रोशनी देखते-देखते धूल बन जाती है। इन बिंबों में कवि केवल एक वस्तु की तुलना दूसरी वस्तु से नहीं करता, बल्कि उन संबंधों को भी बदल देता है जिनके सहारे हम दुनिया को पहचानते हैं। कविता की भाषा इस तरह अर्थ को व्यक्त करने के साथ-साथ उसके बनने की प्रक्रिया को भी हमारे सामने रखती है।

सॉस्यूर के भाषा संबंधी विचार इस प्रक्रिया को समझने का एक आधार देते हैं। उनके अनुसार भाषिक संकेत का अर्थ किसी वस्तु के साथ उसके स्वाभाविक और अनिवार्य संबंध से तय नहीं होता। शब्द और अर्थ के बीच संबंध सामाजिक परंपरा से बनता है। ‘पेड़’ शब्द सुनते ही हमारे मन में एक परिचित आकृति उभरती है, लेकिन यह संबंध प्रकृति द्वारा पहले से तय नहीं किया गया है। भाषा ने हमें वस्तुओं को पहचानने और उनके बारे में सोचने का एक ढंग दिया है। कविता इसी परिचित व्यवस्था के भीतर काम करती है, लेकिन वह उसके नियमों को नए ढंग से बरतती है। ‘एक पेड़ जो गरारा है रेशम का’ में पेड़ को गरारे से जोड़ते ही दोनों शब्दों के सामान्य अर्थों के बीच हलचल पैदा होती है। पेड़ अपनी जगह पेड़ है, गरारा अपनी जगह कपड़ा, लेकिन कविता उन्हें एक ही बिंब में रखकर एक ऐसा संबंध बनाती है जो सामान्य भाषा में मौजूद नहीं था।

इस बिंब की ख़ासियत यह है कि इसमें तुलना का आधार पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया गया। पेड़ की डालियाँ, पत्तियाँ, उसका फैलाव या हवा में उसका हिलना हमें किसी वस्त्र की याद दिला सकता है, लेकिन कविता किसी एक समानता पर मुहर नहीं लगाती। ‘रेशम का गरारा’ पेड़ को एक नया दृश्य रूप देता है। पेड़ अब केवल प्रकृति की वस्तु नहीं रहता, वह एक ऐसे रूप में दिखाई देता है जिसमें गति, लचक, फैलाव और कोमलता की संभावनाएँ खुलती हैं। साथ ही, गरारे का अर्थ भी बदलता है। वह केवल पहनने की वस्तु नहीं रह जाता, बल्कि पेड़ को देखने का एक नया तरीका बन जाता है। इस तरह दोनों शब्द एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। कविता अर्थ को किसी एक शब्द में बंद नहीं करती, बल्कि उनके बीच बने संबंध में उसे जन्म देती है।

यहाँ सॉस्यूर के विचारों की एक सीमा भी समझनी ज़रूरी है। भाषा-विज्ञान से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि अर्थ संकेतों और उनके पारस्परिक संबंधों से बनता है, लेकिन कविता में अर्थ का बदलना केवल शब्दों के बीच संबंधों का मामला नहीं है। पाठक का अनुभव, उसकी कल्पना और बिंबों का क्रम भी इसमें हिस्सा लेते हैं। ‘एक चिड़िया जो धेले सी गिरी आ रही / नभ का सारा बोझ लिये’ को पढ़ते हुए हम केवल ‘चिड़िया’ और ‘धेला’ शब्दों के संबंध पर ध्यान नहीं देते। हम उस दृश्य की कल्पना भी करते हैं जिसमें एक छोटी-सी चिड़िया आकाश का सारा बोझ उठाए नीचे आती हुई दिखाई देती है। चिड़िया का छोटा आकार और नभ का विराट विस्तार एक-दूसरे के सामने आ जाते हैं। इस टकराव से ऐसा अर्थ पैदा होता है जिसे किसी एक शब्द का अर्थ बताकर पूरा नहीं किया जा सकता।

रोलाँ बार्थ (Roland Barthes) के विचार इस बिंदु पर कविता की दूसरी परत खोलते हैं। बार्थ ने दिखाया कि संकेत केवल अपने सीधे अर्थ तक सीमित नहीं रहते। वे सांस्कृतिक धारणाओं, स्मृतियों और दूसरे अर्थों को भी अपने साथ ला सकते हैं। कविता में भी कोई बिंब अपने शाब्दिक अर्थ से आगे बढ़ता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर बिंब के पीछे कोई छिपा हुआ संदेश अवश्य है। उसके अर्थ की परतें कविता के भीतर मौजूद शब्दों, उनके संबंधों और पाठक के अनुभव से बनती हैं।

‘एक चिड़िया जो धेले सी गिरी आ रही / नभ का सारा बोझ लिये’ में चिड़िया को केवल स्वतंत्रता, मासूमियत या किसी दूसरे परिचित प्रतीक का प्रतिनिधि मान लेना कविता की जटिलता को कम कर देगा। यहाँ चिड़िया की उपस्थिति एक असामान्य दृश्य रचती है। वह छोटी है, लगभग किसी मामूली सिक्के जैसी, लेकिन उसके साथ आकाश का सारा बोझ जुड़ा हुआ है। आकार और भार के बीच का यह अंतर दृश्य को असंभव-सा बना देता है। चिड़िया वास्तव में आकाश का भार उठा सकती है या नहीं, यह सवाल कविता के अनुभव को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है। कविता उस असंगति को हमारे सामने रखती है जिसमें छोटी वस्तु विराट विस्तार से जुड़ जाती है। पाठक को चिड़िया और नभ के संबंध को नए सिरे से महसूस करना पड़ता है।

यहाँ अर्थ किसी एक प्रतीकात्मक व्याख्या में समाप्त नहीं होता। चिड़िया का गिरना, उसका धेले जैसा दिखाई देना और नभ का बोझ उठाना, ये तीनों बातें मिलकर दृश्य को बनाती हैं। यदि हम चिड़िया को केवल मनुष्य की विवशता का प्रतीक घोषित कर दें, तो एक संभावित अर्थ तो सामने आएगा, लेकिन कविता में मौजूद दृश्यात्मक और भाषिक तनाव का बड़ा हिस्सा छूट जाएगा। बार्थ की दृष्टि से कहें तो बिंब के अर्थ को एक ही संदेश में समेटने के बजाय उसके भीतर काम कर रहे अर्थ-संबंधों को देखना अधिक उपयोगी है। कविता पाठक को अर्थ देती है, लेकिन उसके लिए एक ही रास्ता तय नहीं करती।

‘एक रोशनी जो मेरे ताकते-ताकते / धूर बन जाती है’ में यह प्रक्रिया और भी दिलचस्प रूप लेती है। सामान्य अनुभव में रोशनी किसी वस्तु को दिखाई देने योग्य बनाती है। यहाँ रोशनी को लगातार देखने पर वह धूल बन जाती है। देखने की क्रिया वस्तु को स्पष्ट करने के बजाय उसके रूप को बदल देती है। रोशनी और धूल के बीच का अंतर केवल दो वस्तुओं का अंतर नहीं रह जाता; वह देखने और दिखाई देने के संबंध को भी उलट देता है। जिस रोशनी से दुनिया खुलनी चाहिए, वही धीरे-धीरे किसी दूसरे रूप में बदल जाती है। पाठक के सामने सवाल उठता है कि क्या वस्तु का रूप स्थिर रहता है और देखने वाला केवल उसे पहचानता है, या देखने की प्रक्रिया में उसका अर्थ भी बदलता रहता है?

इस बिंब को केवल भ्रम या कल्पना कहकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। कविता यह नहीं बताती कि रोशनी सचमुच धूल में बदल गई है। वह ‘ताकते-ताकते’ कहकर देखने की अवधि को भी सामने लाती है। एक क्षण में दिखाई देने वाली रोशनी और लगातार देखते रहने पर बदलती हुई रोशनी के बीच समय का अंतर है। इस अंतर के कारण अनुभव स्थिर नहीं रहता। पाठक को रोशनी का कोई अंतिम रूप नहीं मिलता। बिंब का अर्थ उस परिवर्तन में है जो देखने के साथ घटित होता है। इस तरह कविता किसी वस्तु का वर्णन करने के बजाय देखने की प्रक्रिया को ही कविता का विषय बना देती है।

देरिदा (Jacques Derrida) के विचारों के तहत इस कविता को पढ़ने पर अर्थ की अस्थिरता और गहरे रूप में सामने आती है। देरिदा के लिए भाषा में अर्थ किसी एक संकेत के भीतर पूरी तरह उपस्थित नहीं रहता। कोई शब्द अपना अर्थ दूसरे शब्दों से अंतर के जरिए ग्रहण करता है और उसका अर्थ उन संबंधों पर निर्भर करता है जो लगातार बदल सकते हैं। किसी शब्द का अर्थ समझने के लिए हम दूसरे शब्दों, धारणाओं और संदर्भों की ओर बढ़ते हैं। लेकिन वे संदर्भ भी अपने आप में अंतिम और पूरी तरह स्थिर नहीं होते। इसीलिए अर्थ को किसी एक जगह पर पूरी तरह बंद कर देना मुश्किल है। देरिदा की यह सोच कविता को केवल अस्पष्ट या रहस्यमय कहने के बजाय यह पूछने का अवसर देती है कि उसके शब्द अर्थ को स्थिर करने की कोशिश कैसे करते हैं और फिर उसी स्थिरता को कैसे चुनौती देते हैं।

कविता की शुरुआती पंक्तियाँ हैं, ‘कोई भी तो नहीं / पर कोई है तो ज़रूर’। यहाँ ‘कोई’ की उपस्थिति किसी निश्चित व्यक्ति या वस्तु के रूप में सामने नहीं आती। पहली पंक्ति नकार के जरिए कहती है कि कोई नहीं है। दूसरी पंक्ति उसी नकार को स्वीकार नहीं करती और किसी की मौजूदगी पर ज़ोर देती है। लेकिन वह यह नहीं बताती कि वह कौन है। इस तरह कविता उपस्थिति को स्थापित भी करती है और उसे पहचानने का आधार भी नहीं देती। यदि कोई व्यक्ति उपस्थित है, तो उसे पहचाना जा सकना चाहिए। यदि कोई नहीं है, तो उसकी उपस्थिति का यह आग्रह कहाँ से आता है? कविता इन दोनों संभावनाओं में से किसी एक को चुनकर दूसरी को ख़ारिज  नहीं करती।

देरिदा की दृष्टि से यहाँ नकार और स्वीकार को दो ऐसे विरोधी पक्षों के रूप में नहीं देखना चाहिए जिनमें से एक को सही और दूसरे को गलत ठहराया जा सके। दोनों पंक्तियाँ एक-दूसरे के अर्थ को प्रभावित करती हैं। ‘कोई भी तो नहीं’ के बिना ‘कोई है तो ज़रूर’ का आग्रह इस रूप में सामने नहीं आता। दूसरी पंक्ति पहली पंक्ति को मिटाती नहीं, बल्कि उसके भीतर एक कमी या प्रश्न पैदा करती है। इसी तरह पहली पंक्ति दूसरी पंक्ति को पूरी तरह स्वीकार नहीं करने देती। पाठक न तो अनुपस्थिति पर टिक सकता है और न ही उपस्थिति को किसी निश्चित पहचान में बदल सकता है। कविता की शुरुआत में अर्थ इसी तनाव से बनता है।

यहाँ एक सावधानी ज़रूरी है। ‘कोई’ को अनिवार्य रूप से ईश्वर, स्मृति, प्रेम, मृत्यु या किसी अदृश्य सत्ता का संकेत मानना उचित नहीं होगा, जब तक कविता के भीतर से उस अर्थ को पुष्ट करने वाले पर्याप्त आधार न मिलें। ऐसी व्याख्याएँ संभव हो सकती हैं, लेकिन उन्हें कविता का अंतिम अर्थ घोषित नहीं किया जा सकता। देरिदा के विचारों का इस्तेमाल करने का आशय हर अनिश्चितता के पीछे कोई रहस्य खोज लेना नहीं है। असल सवाल यह है कि कविता ‘कोई’ को एक निश्चित पहचान देने से कैसे बचती है और उस पहचान की अनुपस्थिति पाठक के अनुभव को किस तरह प्रभावित करती है। ‘कोई’ का अर्थ खुला है, लेकिन वह बिल्कुल निराधार भी नहीं। वह कविता की शुरुआत, उसके बाद आने वाले बिंबों और अंत में लौटने वाले नकार से अपना अर्थ ग्रहण करता है।

कविता के बीच में आने वाले बिंब इस शुरुआती अस्थिरता को आगे बढ़ाते हैं। पानी में घड़ा डुबोने जैसी आवाज़, पानी में हवा, रोशनी का धूल बन जाना, चिड़िया का नभ का बोझ उठाना और हवा का खुलती हुई लटाई से डोर जैसा होना, इन सबमें वस्तुओं के बीच ऐसे संबंध बनते हैं जो सामान्य भाषा में पहले से तय नहीं हैं। कविता किसी वस्तु को उसके परिचित अर्थ से पूरी तरह मुक्त नहीं करती, क्योंकि पाठक को अर्थ बनाने के लिए उन परिचित अर्थों की जरूरत होती है। लेकिन वह उन्हें जस का तस भी नहीं रहने देती। पेड़ को गरारे से जोड़ने के लिए हमें पेड़ और गरारे दोनों की पहचान होनी चाहिए। उसी पहचान के कारण यह संबंध चौंकाता है। यदि दोनों शब्दों के सामान्य अर्थ ही मिट जाएँ, तो बिंब का असर भी समाप्त हो जाएगा।

यहीं देरिदा के नज़रिए से कविता का एक ख़ास पहलू समझ में आता है। अर्थ की अस्थिरता का मतलब यह नहीं कि शब्द कुछ भी अर्थ दे सकते हैं। कविता में अर्थ का खुलना उसके भाषिक संबंधों से बँधा रहता है। ‘पेड़’ और ‘गरारा’ के बीच बना संबंध मनमाना नहीं है; वह एक दृश्य की कल्पना कराता है। ‘रोशनी’ और ‘धूर’ के बीच का संबंध भी किसी साधारण समानता पर आधारित नहीं है, बल्कि देखने की प्रक्रिया में हुए बदलाव से पैदा होता है। कविता परिचित अर्थों को पूरी तरह नष्ट नहीं करती, बल्कि उन्हें एक-दूसरे के सामने रखकर उनके बीच तनाव पैदा करती है। यही तनाव नए अर्थ की संभावना बनाता है।

इस संदर्भ में ‘एक हवा जो डोर सी खुल रही लटाई से’ पर ध्यान देना चाहिए। सामान्यतः लटाई से डोर खुलती है और हवा में पतंग उड़ती है। कविता इस परिचित दृश्य को उलटकर हवा को डोर के साथ जोड़ देती है। हवा अब केवल आसपास बहने वाली चीज़ नहीं रह जाती; वह खुलती हुई डोर की तरह दिखाई देने लगती है। यहाँ तुलना का संबंध हवा की अदृश्यता, उसकी गति या उसके फैलाव से बन सकता है, लेकिन कविता किसी एक कारण को स्पष्ट नहीं करती। बिंब का असर इसी बात में है कि हवा को समझने के लिए पाठक को एक दूसरी वस्तु की ओर जाना पड़ता है। वह हवा को सीधे नहीं पकड़ सकता, इसलिए भाषा उसे डोर के दृश्य के जरिए महसूस कराती है। लेकिन डोर भी हवा के अनुभव को पूरी तरह समझा नहीं देती। दोनों के बीच का अंतर बना रहता है। अर्थ इसी समानता और अंतर के बीच पैदा होता है।

कविता के अंतिम हिस्से में यह अस्थिरता एक नए रूप में दिखाई देती है: ‘लगा जैसे बारिश हो रही है बाहर / पर धूप थी धूप और धाह’। पहली पंक्ति एक अनुभव प्रस्तुत करती है। बाहर बारिश होने का आभास पैदा होता है, लेकिन अगली पंक्ति उसे वास्तविक मौसम के स्तर पर स्वीकार नहीं करती। धूप मौजूद है, और उसके साथ ‘धाह’ भी। कविता इस विरोध को किसी एक निष्कर्ष से हल नहीं करती। क्या बारिश का अनुभव केवल भ्रम था? क्या यह पहले के बिंबों की तरह एक संवेदनात्मक स्थिति थी? क्या बाहर की धूप और भीतर उठने वाला अनुभव अलग-अलग दिशाओं में चल रहे हैं? ये सवाल कविता में मौजूद हैं, लेकिन वह उनका सीधा उत्तर नहीं देती।

देरिदा के विचारों की रोशनी में इस हिस्से को पढ़ते हुए यह देखना ज़रूरी है कि कविता ‘बारिश’ और ‘धूप’ को केवल विरोधी अर्थों के रूप में नहीं रखती। बारिश का आभास धूप की वास्तविक उपस्थिति के साथ आता है। एक अनुभव दूसरे को पूरी तरह मिटा नहीं पाता। धूप है, लेकिन उससे बारिश का अनुभव असंभव नहीं हो जाता। इसी तरह बारिश का आभास धूप और धाह को झूठा नहीं बना देता। कविता दोनों को एक ही अनुभव में रखती है, जहाँ उनके बीच का अंतर बना रहता है। अर्थ किसी एक पक्ष की जीत से नहीं, बल्कि दोनों के साथ उपस्थित रहने से पैदा होता है।

अंतिम पंक्तियाँ, ‘कोई तो नहीं कोई भी’, कविता की शुरुआत को याद दिलाती हैं। लेकिन लौटने पर वही शब्द बिल्कुल उसी अर्थ में नहीं आते। शुरुआत में ‘कोई भी तो नहीं’ के तुरंत बाद ‘पर कोई है तो ज़रूर’ आता है। अंत में यह आग्रह मौजूद नहीं है। अब नकार के साथ वह प्रत्यक्ष स्वीकार नहीं जुड़ता जो शुरुआत में पाठक को उलझाता था। फिर भी बीच में आए बिंबों के बाद ‘कोई’ का अर्थ पहले जैसा नहीं रह सकता। पाठक ने पानी, हवा, रोशनी, चिड़िया, पेड़, बारिश और धूप के बदलते रूप देखे हैं। इसलिए अंतिम नकार में भी किसी अदृश्य उपस्थिति की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती। कविता एक प्रश्न से शुरू होती है और उसी प्रश्न के आसपास लौटती है, लेकिन पाठक का अनुभव बदल चुका होता है।

उल्लेखनीय है कि देरिदा के चिंतन में अर्थ का स्थगन का तात्पर्य यह नहीं कि अर्थ कभी बनता ही नहीं। अर्थ बनता है, लेकिन वह किसी एक अंतिम व्याख्या में पूरी तरह समा नहीं जाता। ‘धूप में नींद’ में भी बिंबों के अर्थ पाठक के लिए खुलते हैं। हम पेड़ और गरारे का संबंध समझने की कोशिश करते हैं, चिड़िया और नभ के बीच का तनाव महसूस करते हैं, रोशनी के धूल बन जाने पर ठहरते हैं और बारिश के आभास तथा धूप की उपस्थिति को एक साथ समझना चाहते हैं। लेकिन हर अर्थ के साथ कोई दूसरा संबंध भी सामने आ जाता है, जो पहले अर्थ को बदल देता है। कविता अर्थहीन नहीं होती; वह अर्थ को एक जगह स्थिर नहीं होने देती।

इसलिए ‘धूप में नींद’ को केवल कल्पनाशील बिंबों की कविता कहना पर्याप्त नहीं होगा। इसकी भाषा हमारी अर्थ ग्रहण करने की आदत को भी चुनौती देती है। हम सामान्यतः मान लेते हैं कि किसी वस्तु का नाम उसके अर्थ को स्पष्ट कर देता है, कि उपस्थिति और अनुपस्थिति एक-दूसरे के विपरीत हैं और किसी अनुभव को अंततः एक निश्चित पहचान दी जा सकती है। अरुण कमल की कविता इन धारणाओं को सीधे ख़ारिज नहीं करती। वह उन्हें ऐसे दृश्य और भाषिक संबंधों के सामने रखती है जिनमें उनका स्थायित्व डगमगाने लगता है। पेड़ गरारे में बदलता है, रोशनी धूल बन जाती है, चिड़िया आकाश का बोझ उठाती है और बारिश का आभास धूप के बीच जन्म लेता है। हर बार परिचित वस्तु बनी रहती है, लेकिन उसका अर्थ बदल जाता है।

कविता की गहरी उपलब्धि यही है कि वह अर्थ की अस्थिरता को किसी अमूर्त सिद्धांत के रूप में नहीं रखती। वह उसे देखने, सुनने और महसूस करने के अनुभव में बदल देती है। देरिदा की दृष्टि से पढ़ने पर कविता का अर्थ किसी छिपे हुए संदेश को खोज लेने में नहीं, बल्कि उन भाषिक प्रक्रियाओं को समझने में है जिनके जरिए अर्थ बनता है, बदलता है और फिर किसी एक निष्कर्ष में बंद होने से बच निकलता है। ‘कोई भी तो नहीं / पर कोई है तो ज़रूर’ से लेकर ‘कोई तो नहीं कोई भी’ तक कविता इसी खुली जगह में चलती है। वह उपस्थिति का अनुभव कराती है, लेकिन उसे किसी निश्चित नाम में नहीं बाँधती। वह दुनिया को पहचानने देती है, लेकिन उसकी पहचानी हुई सीमाओं को स्थिर नहीं रहने देती। यही इसकी भाषा की शक्ति है और यही इसके अर्थ की अस्थिरता का काव्यात्मक रूप।

‘धूप में नींद’ को वस्तु-केंद्रित अस्तित्व-दर्शन (Object-Oriented Ontology) और नव पदार्थवाद (New Materialism) की दृष्टि से पढ़ने पर कविता में आये प्रकृति के बिंबों के अर्थ की एक नई परत खुलती है। इस दृष्टि में पानी, हवा, चिड़िया और पेड़ को केवल कवि की भावनाओं या मनःस्थितियों को व्यक्त करने वाले प्रतीकों के रूप में नहीं देखा जाता। उन्हें ऐसी भौतिक सत्ताओं के रूप में समझा जाता है, जिनके अपने गुण, गतियाँ और दूसरे पदार्थों के साथ संबंध हैं। कविता में ये वस्तुएँ केवल किसी मानवीय अनुभव का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि अपने आपसी संबंधों से उस अनुभव को जन्म देने में भी हिस्सा लेती हैं। इस तरह कविता का प्राकृतिक संसार मनुष्य की चेतना की पृष्ठभूमि भर नहीं रहता। वह अपनी सक्रिय उपस्थिति के साथ कविता के अर्थ को गढ़ता है।

ग्राहम हरमन (Graham Harman) के वस्तु-केंद्रित अस्तित्व-दर्शन के अनुसार किसी वस्तु का अस्तित्व उस अर्थ तक सीमित नहीं होता, जो मनुष्य उसके बारे में बनाता है। वस्तु में हमेशा कुछ ऐसा बचा रहता है, जिसे हमारी जानकारी, भाषा या अनुभव पूरी तरह अपने भीतर नहीं समेट सकते। इस विचार के सहारे ‘धूप में नींद’ के बिंबों को देखें तो पानी केवल किसी स्मृति या भावना का प्रतीक नहीं है। उसकी अपनी भौतिक प्रकृति है, उसकी ध्वनि है और हवा के साथ उसका संबंध है। कवि कहता है, ‘पानी में घड़ा डुबोने जैसी जो आवाज़ आ रही है / पानी में हवा की।’ यहाँ पानी और हवा का संबंध किसी एक वस्तु की पहचान तक सीमित नहीं रहता। घड़े के डूबने, पानी के हिलने और हवा की मौजूदगी से एक ऐसी ध्वनि पैदा होती है, जिसे कवि अपने अनुभव में ग्रहण करता है। इस ध्वनि को केवल कवि की मनःस्थिति का परिणाम मान लेने से पानी और हवा की अपनी भौतिक भूमिका ओझल हो जाएगी। कविता का अनुभव इन पदार्थों की विशेषताओं और उनके आपसी संबंधों से भी बनता है।

हरमन की दृष्टि से पेड़ का बिंब भी ध्यान देने योग्य है। कवि कहता है, ‘एक पेड़ जो गरारा है रेशम का।’ सामान्य रूप से पेड़ को उसकी जड़ों, तने, शाखाओं और पत्तियों के आधार पर पहचानते हैं। लेकिन कविता में पेड़ की परिचित पहचान बदल जाती है। वह रेशम के गरारे जैसा दिखाई देता है। इसे केवल कवि की कल्पना का खेल मानने के बजाय पेड़ की आकृति, हवा में उसकी गति और रेशम की लहराती बनावट के बीच बने संबंध के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। पेड़ इस उपमा के भीतर पूरी तरह समा नहीं जाता। उसकी भौतिक उपस्थिति बनी रहती है, लेकिन वह पाठक को अपनी परिचित पहचान से आगे देखने के लिए प्रेरित करता है। इस तरह वस्तु का अर्थ किसी एक नाम या उपमा में बंद नहीं होता।

करेन बैरड (Karen Barad) का नव पदार्थवादी चिंतन इस कविता को समझने का एक दूसरा रास्ता खोलता है। बैरड के अनुसार, वस्तुओं और घटनाओं को हमेशा पहले से बनी हुई, एक दूसरे से पूरी तरह अलग इकाइयों के रूप में नहीं समझना चाहिए। उनके बीच होने वाली अंतःक्रियाएँ भी यह तय करती हैं कि वे किस तरह सामने आएँगी और उनके गुण किस तरह पहचाने जाएँगे। उनकी अवधारणा ‘एजेंशियल रियलिज़्म’ (Agential Realism) में पदार्थ निष्क्रिय नहीं है। वह संबंधों और घटनाओं के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाता है।

इस नज़रिए से कविता में पानी और हवा के रिश्ते को ख़ास तौर पर समझा जा सकता है। पानी में हवा की आवाज़ का अनुभव दोनों को अलग-अलग पहचानकर समाप्त नहीं हो जाता। यहाँ ध्वनि किसी एक पदार्थ की अकेली विशेषता नहीं है। वह पानी, हवा, घड़े और कवि के सुनने की क्रिया के बीच बनती है। कविता इन सभी को एक ही अनुभव के भीतर ले आती है। पानी में घड़ा डुबोने का बिंब इस तरह पदार्थों के आपसी संबंध को सामने लाता है। जो आवाज़ सुनाई देती है, वह केवल पानी की नहीं और न ही केवल हवा की। वह उनके बीच घटने वाली क्रिया का परिणाम है। कविता में अनुभव किसी अकेली वस्तु से नहीं, बल्कि वस्तुओं और संवेदनाओं के मेल से पैदा होता है।

हवा का बिंब भी महत्त्वपूर्ण है। ‘एक हवा जो डोर सी खुल रही लटाई से’ पंक्ति में हवा को ऐसी गति के साथ देखा गया है, जो किसी लटाई से खुलती डोर की याद दिलाती है। हवा दिखाई नहीं देती, लेकिन उसकी गति को महसूस किया जा सकता है। वह पेड़ की आकृति और पत्तियों की गति को प्रभावित करती है। इस तरह हवा केवल किसी अदृश्य शक्ति का प्रतीक नहीं रहती। वह पेड़ और उसके परिवेश के बीच संबंध बनाने वाली भौतिक उपस्थिति है। कविता में हवा का अर्थ उसकी गति, उसके प्रभाव और दूसरी वस्तुओं के साथ उसके जुड़ाव से बनता है।

पानी और हवा के इन बिंबों को पेड़ के साथ रखकर देखने पर कविता का प्राकृतिक संसार एक दूसरे से जुड़ी हुई गतियों का संसार बन जाता है। हवा पेड़ को हिलाती है, पेड़ की आकृति बदलती हुई दिखाई देती है और उसकी गति कवि की निगाह को एक नया दृश्य देती है। पानी और हवा के संबंध से ध्वनि पैदा होती है, जबकि पेड़ और हवा के संबंध से गति का अनुभव बनता है। इन दृश्यों में प्रकृति केवल मनुष्य की कल्पना के लिए सामग्री नहीं देती। उसकी भौतिक प्रक्रियाएँ स्वयं कविता की दुनिया को आकार देती हैं।

चिड़िया का बिंब इस दृष्टि को और व्यापक बनाता है। कवि कहता है, ‘एक चिड़िया जो धेले सी गिरी आ रही / नभ का सारा बोझ लिये।’ चिड़िया की छोटी देह और आकाश का विशाल विस्तार एक दूसरे के सामने आते हैं। इसे मनुष्य के दुख या किसी मानसिक बोझ का प्रतीक मानकर पढ़ा जा सकता है, लेकिन ऐसा करने पर चिड़िया का अपना अस्तित्व पीछे छूट सकता है। चिड़िया एक जीवित प्राणी है, जिसकी अपनी गति, देह और उड़ने की क्षमता है। कविता में उसका ‘गिरी आना’ उसकी सामान्य उड़ान से अलग गति का अनुभव कराता है। उसके साथ आकाश का बोझ जोड़ने से पाठक उसके छोटे आकार और विशाल परिवेश के बीच संबंध को नए ढंग से देखता है।

वस्तु-केंद्रित अस्तित्व-दर्शन की दृष्टि से चिड़िया का अर्थ केवल इस बात में नहीं है कि वह किस मानवीय भावना को व्यक्त करती है। वह अपनी स्वतंत्र जीवित सत्ता के साथ कविता में मौजूद है। उसका शरीर और उसकी गति उसे आकाश से जोड़ते हैं, लेकिन आकाश को भी केवल पृष्ठभूमि नहीं रहने देते। चिड़िया के आने से आकाश का विस्तार और उसका भार एक नए ढंग से अनुभव में आता है। इस प्रकार चिड़िया और आकाश का संबंध दोनों के अर्थ को प्रभावित करता है। कविता में कोई एक वस्तु दूसरी वस्तु के लिए केवल सजावटी दृश्य नहीं बनती। दोनों मिलकर एक ऐसा अनुभव रचते हैं, जिसे किसी एक बिंब में सीमित नहीं किया जा सकता।

नव पदार्थवादी दृष्टि से इस दृश्य में यह भी देखा जा सकता है कि चिड़िया की गति और आकाश का विस्तार एक दूसरे से अलग करके पूरी तरह नहीं समझे जा सकते। चिड़िया की छोटी देह, उसकी उड़ान और उसके चारों ओर फैला आकाश मिलकर उसके आने का दृश्य बनाते हैं। कवि का अनुभव इस दृश्य को भाषा में बदलता है, लेकिन दृश्य की भौतिक विशेषताएँ भी कविता के अर्थ को दिशा देती हैं। इस तरह कविता में प्रकृति का संसार मानवीय चेतना के भीतर समा जाने वाली निष्क्रिय वस्तुओं का संसार नहीं है। वह अपने गुणों और संबंधों के साथ उपस्थित रहता है।

कविता की शुरुआत में कवि कहता है, ‘कोई भी तो नहीं / पर कोई है तो ज़रूर।’ वस्तु-केंद्रित नज़रिए  से इस कथन को किसी अदृश्य व्यक्ति या सत्ता की खोज तक सीमित रखना ज़रूरी नहीं है। कविता में ऐसी कई वस्तुएँ और प्रक्रियाएँ हैं, जो दिखाई तो देती हैं, लेकिन अपनी पूरी पहचान नहीं खोलतीं। हवा का अनुभव उसकी गति से होता है, पानी की मौजूदगी उसकी ध्वनि में सामने आती है और रोशनी देखते-देखते धूल बन जाती है। इन घटनाओं में वस्तुओं का अस्तित्व केवल उनके दृश्य रूप तक सीमित नहीं रहता। वे अपने प्रभावों और संबंधों के माध्यम से भी सामने आती हैं। कवि को किसी की मौजूदगी का एहसास इसी व्यापक अनुभव के भीतर होता है।

इसका मतलब यह नहीं कि कविता में ‘कोई’ निश्चित रूप से पानी, हवा या किसी दूसरी प्राकृतिक वस्तु का नाम है। ऐसा निष्कर्ष कविता के खुले अर्थ को सीमित कर देगा। अधिक उपयोगी यह देखना है कि अनदेखी मौजूदगी का एहसास उन भौतिक घटनाओं के बीच पैदा होता है, जिन्हें कवि देखता और सुनता है। कविता में मौजूदगी का अनुभव किसी एक वस्तु की पहचान से नहीं, बल्कि पूरे परिवेश की हलचल से बनता है। इस तरह प्रकृति का संसार उस अनिश्चितता को जन्म देने में सक्रिय भूमिका निभाता है, जिसे कवि अपनी भाषा में व्यक्त करता है।

‘एक रोशनी जो मेरे ताकते-ताकते / धूर बन जाती है’ जैसी पंक्तियों को भी वस्तुओं की सक्रियता के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है। रोशनी सामान्यतः देखने की सम्भावना पैदा करती है। लेकिन यहाँ वह धूल में बदल जाती है। इस बिंब में कवि की निगाह के साथ-साथ उस दृश्य की बदलती प्रकृति भी महत्त्वपूर्ण है। रोशनी और धूल के बीच का अंतर कविता में देखने की प्रक्रिया को अनिश्चित बना देता है। कवि किसी वस्तु को जितना अधिक ध्यान से देखता है, उसका रूप उतना ही स्थिर होने के बजाय बदलता हुआ दिखाई देता है। इस बदलाव को केवल मन की उलझन कहने के बजाय दृश्य के भीतर घटने वाली अर्थगत हलचल के रूप में भी समझा जा सकता है।

कविता का अंतिम हिस्सा इस पूरे अनुभव को एक दूसरी दिशा देता है। कवि कहता है, ‘लगा जैसे बारिश हो रही है बाहर / पर धूप थी धूप और धाह।’ यहाँ बारिश का एहसास और धूप की वास्तविक उपस्थिति एक दूसरे के सामने आते हैं। इस विरोध को केवल कवि की कल्पना और बाहरी यथार्थ के बीच का संघर्ष मानना पर्याप्त नहीं होगा। धूप की गर्मी, हवा की गति, पानी की ध्वनि और पेड़ की बदलती आकृति मिलकर एक ऐसा अनुभव बनाते हैं, जिसमें बारिश का एहसास पैदा हो सकता है, भले ही बाहर बारिश न हो। लेकिन धूप की भौतिक गर्मी अपनी जगह बनी रहती है। कविता इस तरह अनुभव और पदार्थ के बीच एक जटिल संबंध सामने लाती है। मनुष्य दुनिया को अपने ढंग से महसूस करता है, लेकिन बाहरी जगत केवल उसकी अनुभूति के अनुसार नहीं बदल जाता।

यही बिंदु ‘वस्तु-केंद्रित अस्तित्व-दर्शन’ और ‘नव पदार्थवाद’ के बीच एक उपयोगी संबंध बनाता है। एक ओर वस्तुओं का अस्तित्व मनुष्य द्वारा दिए गए अर्थ से बड़ा है, दूसरी ओर उनके संबंधों और अंतःक्रियाओं से अनुभव के नए रूप पैदा होते हैं। ‘धूप में नींद’ में पानी, हवा, चिड़िया और पेड़ अपने परिचित अर्थों से आगे बढ़ते हैं, लेकिन वे अपनी भौतिक विशेषताओं से पूरी तरह अलग भी नहीं होते। कविता उनकी गतियों, ध्वनियों और आकृतियों के सहारे एक ऐसी दुनिया रचती है, जिसमें मनुष्य और प्रकृति एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, फिर भी एक दूसरे में पूरी तरह समा नहीं जाते।

‘धूप में नींद’ का प्राकृतिक संसार केवल मानवीय भावनाओं का प्रतिबिंब नहीं है। पानी की ध्वनि, हवा की गति, चिड़िया की देह और पेड़ की आकृति कविता में अपने अलग-अलग ढंग से सक्रिय हैं। वे कवि के अनुभव को आकार देते हैं और पाठक को वस्तुओं के बीच नए संबंध देखने का अवसर देते हैं। कविता का अर्थ इन्हीं संबंधों में विकसित होता है। अरुण कमल की विशेषता यह है कि वे प्रकृति को किसी तय संदेश का वाहक नहीं बनाते। वे उसके पदार्थों और गतियों को इस तरह भाषा में रखते हैं कि दुनिया अपनी परिचित पहचान से आगे खुलने लगती है। इस तरह कविता मनुष्य को प्रकृति का एकमात्र अर्थ-निर्माता मानने के बजाय उसे एक ऐसे जगत का सहभागी बनाती है, जहाँ वस्तुएँ, जीव और भौतिक प्रक्रियाएँ भी अनुभव तथा अर्थ के निर्माण में अपनी भूमिका निभाते हैं।

विवेच्य कविता को समय के अनुभव की दृष्टि से पढ़ने पर पता चलता है कि यहाँ समय केवल क्षणों के बीतने का नाम नहीं है। वह देखने, सुनने और महसूस करने के साथ अपना रूप बदलता है। कविता में कोई कहानी नहीं चलती, जिसमें एक घटना के बाद दूसरी घटना घटे और अंत में कोई समाधान सामने आए। इसके बजाय कुछ दृश्य आते हैं और एक दूसरे से जुड़ते जाते हैं। पानी में घड़ा डुबोने जैसी आवाज़ सुनाई देती है, रोशनी धूल बन जाती है, चिड़िया आकाश का बोझ लिए आती है, हवा लटाई से खुलती डोर जैसी लगती है और पेड़ रेशम का गरारा बन जाता है। इन दृश्यों को जोड़ने वाला सूत्र कोई बाहरी घटना नहीं, बल्कि कवि का अनुभव है। हर दृश्य पिछले दृश्य से कुछ लेकर आगे बढ़ता है। इसीलिए कविता का समय घड़ी से मापे जाने वाले समय से अलग है। वह हमारी चेतना में घटता है और अपने साथ दुनिया को देखने का ढंग भी बदलता चलता है।

हेनरी बर्गसों (Henri Bergson) ने समय को समझने के लिए घड़ी के समय और मनुष्य के भीतर अनुभव किए जाने वाले समय के बीच फ़र्क किया था। घड़ी का समय बराबर इकाइयों में बँटा होता है। एक मिनट के बाद दूसरा मिनट आता है। लेकिन हमारे अनुभव में समय हमेशा इस तरह नहीं चलता। किसी का इंतज़ार करते हुए कुछ मिनट भी बहुत लंबे लग सकते हैं, जबकि किसी सुखद अनुभव में कई घंटे जल्दी बीत जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि हम समय को केवल गिनते नहीं, उसे जीते भी हैं। बीते हुए क्षण हमारे भीतर बने रहते हैं और वर्तमान अनुभव को प्रभावित करते हैं।

बर्गसों ने इस भीतरी प्रवाह को ‘अवधि’ (Durée) कहा है। पर यह सामान्य अर्थ में प्रयुक्त अवधि (Duration) से भिन्न अनुभूत काल या अनुभव की निरंतर अवधि  है। इसका अर्थ यह है कि हमारे अनुभव में क्षण एक दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं होते। वे एक दूसरे में घुलते हुए आगे बढ़ते हैं। संगीत सुनते समय हम किसी धुन को अलग-अलग स्वरों के रूप में नहीं सुनते। हर स्वर के साथ पिछले स्वर की स्मृति भी बनी रहती है। इसी तरह ‘धूप में नींद’ में पानी की आवाज़, रोशनी का बदलना, चिड़िया का आना और पेड़ का दूसरी आकृति में दिखाई देना अलग-अलग दृश्य होते हुए भी एक साझा अनुभव बनाते हैं। कविता का समय इसी जुड़ाव में पैदा होता है।

पानी में हवा की आवाज़ से शुरू हुआ अनुभव रोशनी तक पहुँचता है। फिर चिड़िया, हवा और पेड़ के बिंब सामने आते हैं। इन दृश्यों के बीच कोई सीधा कथात्मक संबंध नहीं है, फिर भी वे एक दूसरे से कटे हुए नहीं लगते। हर नया बिंब पहले से बने अनुभव में कुछ जोड़ता है। पानी की आवाज़ से जो अनिश्चितता पैदा होती है, वह रोशनी के धूल बन जाने में एक नया रूप लेती है। इसके बाद चिड़िया का छोटा शरीर और आकाश का विशाल विस्तार उसी अनुभव को दूसरी दिशा में ले जाते हैं। इस तरह कविता में समय किसी घटना को आगे बढ़ाने के बजाय संवेदनाओं को एक दूसरे से जोड़ता है।

कविता की पंक्ति ‘एक रोशनी जो मेरे ताकते-ताकते / धूर बन जाती है’ इस संदर्भ में खास ध्यान खींचती है। यहाँ ‘ताकते-ताकते’ केवल देखने की क्रिया नहीं बताता। यह उस अवधि को भी सामने लाता है, जिसमें कवि की निगाह किसी दृश्य पर टिकी रहती है। वह रोशनी को एक क्षण देखकर आगे नहीं बढ़ जाता। लगातार देखते रहने के दौरान रोशनी धूल बन जाती है। जो चीज़ देखने में मदद करती है, वही देखने की प्रक्रिया में अपना रूप बदल लेती है।

इस बिंब में समय और अनुभव का रिश्ता साफ़ दिखाई देता है। यदि कवि केवल इतना कहता कि रोशनी धूल बन गई, तो देखने की अवधि का संकेत नहीं मिलता। ‘ताकते-ताकते’ शब्द बताता है कि बदलाव उसी समय घटता है, जब कवि दृश्य को लगातार देख रहा है। यहाँ समय बाहर से गुजरने वाली अवधि भर नहीं है। वह देखने और वस्तु के बदलते रूप के बीच संबंध बनाता है। कवि इस बात को किसी सिद्धांत के रूप में नहीं समझाता। वह एक छोटे से शब्द के सहारे पाठक को इसका अनुभव करा देता है।

एडमंड हुसर्ल (Edmund Husserl) की कालचेतना संबंधी अवधारणा इस अनुभव को एक दूसरे ढंग से समझने में मदद करती है। हुसर्ल के अनुसार, हम वर्तमान क्षण को किसी ऐसी इकाई की तरह नहीं जीते, जिसका अतीत से कोई संबंध न हो। वर्तमान में बीते हुए क्षण की छाप बनी रहती है और आने वाले क्षण की सम्भावना भी हमारे अनुभव का हिस्सा होती है। उन्होंने बीते हुए क्षण की इस मौजूदगी को ‘प्रतिधारण’ (Retention) और अगले क्षण की ओर बढ़ती अपेक्षा को ‘प्रत्याशा’ (Protention) कहा।

इस विचार को कविता पर लागू करें तो पता चलता है कि पाठक हर नए बिंब को बिल्कुल नए सिरे से नहीं देखता। जब रोशनी धूल बनती है, तब तक वह पानी में हवा की आवाज़ सुन चुका होता है। जब चिड़िया आकाश का बोझ लिए आती है, तब तक रोशनी के बदलते रूप का अनुभव उसके भीतर मौजूद रहता है। इस कारण हर नया दृश्य पिछले दृश्यों की छाप के साथ सामने आता है। पाठक एक बिंब से दूसरे बिंब की ओर बढ़ता है, लेकिन पहले के अनुभवों को पीछे छोड़कर नहीं। वे उसके वर्तमान अनुभव का हिस्सा बने रहते हैं।

यही बात कविता की संरचना को समझने में भी मदद करती है। पहली नज़र में इसके बिंब एक दूसरे से अलग दिखाई दे सकते हैं। लेकिन जब हम पूरी कविता पढ़ते हैं, तो उनके बीच एक भीतरी लय महसूस होने लगती है। यह लय किसी कहानी के घटनाक्रम से नहीं बनती। वह कवि की निगाह और संवेदना की गति से बनती है। एक दृश्य दूसरे दृश्य के लिए जगह तैयार करता है। पाठक को हर बार कोई नया अनुभव मिलता है, लेकिन वह अनुभव पहले से बनी संवेदना से जुड़ा रहता है।

कविता के शीर्षक ‘धूप में नींद’ को भी समय के इसी अनुभव से जोड़कर देखना चाहिए। धूप और नींद दो अलग अवस्थाओं की याद दिलाते हैं। धूप में बाहर की दुनिया की रोशनी और गर्मी है, जबकि नींद हमें भीतर की दुनिया में ले जाती है। लेकिन कविता इन दोनों को एक साथ रखती है। इससे एक ऐसी स्थिति बनती है, जिसमें मनुष्य बाहर की दुनिया को देख तो रहा है, लेकिन उसका अनुभव किसी स्वप्न की तरह बदलता रहता है। वह जाग रहा है, फिर भी उसकी अनुभूति सामान्य जाग्रत अवस्था जैसी नहीं है।

नींद में समय का अनुभव कई बार घड़ी के समय से अलग होता है। कोई सपना कुछ ही क्षणों में घटता हुआ भी बहुत लंबा लग सकता है। इसी तरह जागते हुए भी कभी हम किसी दृश्य में इतने डूब जाते हैं कि समय बीतने का सामान्य एहसास पीछे छूट जाता है। ‘धूप में नींद’ में कवि के साथ कुछ ऐसा ही होता है। वह बाहर की दुनिया से अलग नहीं है। पानी, हवा, चिड़िया और पेड़ उसके सामने मौजूद हैं। लेकिन वह उन्हें इस तरह देखता है कि उनके परिचित रूप बदलने लगते हैं। इस अनुभव में बाहर का समय और भीतर का समय एक दूसरे से अलग भी हैं और जुड़े हुए भी।

यहाँ टी. एस. एलियट (T. S. Eliot) की कविता ‘बर्न्ट नॉर्टन’ (Burnt Norton) की कुछ पंक्तियाँ याद आती हैं। एलियट अतीत, वर्तमान और भविष्य के संबंध पर विचार करते हुए लिखते हैं:

‘वर्तमान और अतीत का समय

शायद दोनों भविष्य के समय में उपस्थित हैं,

और भविष्य का समय अतीत में समाया हुआ है।’

(“Time present and time past

Are both perhaps present in time future,

And time future contained in time past.”)

इन पंक्तियों में एलियट समय के तीनों आयामों को एक दूसरे से जुड़ा हुआ देखते हैं। अतीत केवल बीत चुका समय नहीं है। वह वर्तमान की चेतना में बना रहता है। इसी तरह भविष्य भी वर्तमान से पूरी तरह अलग नहीं है, क्योंकि आने वाली सम्भावनाएँ हमारे वर्तमान अनुभव को प्रभावित करती हैं। एलियट इस संबंध को किसी निश्चित नियम की तरह नहीं, बल्कि एक सम्भावना के रूप में रखते हैं। उनके लिए समय का अनुभव केवल क्षणों के आगे बढ़ने तक सीमित नहीं है।

‘धूप में नींद’ और ‘बर्न्ट नॉर्टन’ के बीच एक समानता यह है कि दोनों में वर्तमान को अतीत से पूरी तरह अलग करके नहीं समझा जा सकता। लेकिन दोनों कविताओं की अभिव्यक्ति का ढंग अलग है। एलियट समय के संबंध को सीधे दार्शनिक कथन के रूप में सामने रखते हैं। अरुण कमल समय के बारे में कोई सिद्धांत नहीं देते। वे पानी की आवाज़, रोशनी, चिड़िया, हवा और पेड़ के बिंबों के सहारे अनुभव की निरंतरता को सामने लाते हैं। एलियट के यहाँ समय का प्रश्न विचार के रूप में खुलता है, जबकि अरुण कमल के यहाँ वह संवेदना के भीतर घटता है।

इस तुलना को आगे बढ़ाएँ तो ‘धूप में नींद’ में वर्तमान क्षण अपने भीतर पहले के दृश्यों की छाप लिए हुए है। हर नया बिंब पिछले बिंबों से कुछ ग्रहण करता है और आगे किसी नए अनुभव की सम्भावना खोलता है। इस अर्थ में कविता का वर्तमान बंद और अकेला क्षण नहीं है। वह बीते हुए अनुभवों से बनता है और आगे बढ़ता रहता है। फिर भी यह कहना ठीक नहीं होगा कि अरुण कमल की कविता सीधे अतीत, वर्तमान और भविष्य के दार्शनिक संबंध को व्यक्त करती है। यहाँ भविष्य का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। भविष्य की सम्भावना केवल इस रूप में सामने आती है कि पाठक अगले दृश्य की प्रतीक्षा करता है और पिछली संवेदनाओं के आधार पर उसे ग्रहण करने के लिए तैयार होता है।

कविता के अंतिम हिस्से में समय और अनुभव का यह संबंध एक नया मोड़ लेता है। कवि कहता है, ‘लगा जैसे बारिश हो रही है बाहर / पर धूप थी धूप और धाह।’ उसे बारिश का एहसास होता है, लेकिन बाहर धूप है। यहाँ मन का अनुभव और बाहरी स्थिति एक दूसरे से अलग दिखाई देते हैं। कविता के पहले बिंबों में पानी, हवा और पेड़ की जो दुनिया बनी थी, वह पाठक के भीतर अब भी मौजूद है। इसी वजह से बारिश का एहसास अचानक पैदा नहीं होता। वह पहले से बने संवेदनात्मक अनुभव का हिस्सा है।

लेकिन धूप की वापसी इस अनुभव को एक ही अर्थ में ठहरने नहीं देती। बाहर का मौसम कवि की अनुभूति के अनुसार नहीं बदल जाता। धूप अपनी गर्मी के साथ मौजूद है। इस तरह कविता यह दिखाती है कि मनुष्य का अनुभव स्मृति और संवेदना से बनता है, लेकिन बाहरी दुनिया की अपनी स्थितियाँ भी हैं। दोनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं, फिर भी एक जैसे नहीं हो जाते। बारिश का एहसास और धूप की वास्तविकता कविता में साथ रहते हैं। इसी तनाव से उसका समयबोध गहरा होता है।

कविता की शुरुआत और अंत में ‘कोई’ का लौटना भी इस संदर्भ में ध्यान देने योग्य है। शुरुआत में कवि कहता है, ‘कोई भी तो नहीं / पर कोई है तो ज़रूर।’ अंत में वह फिर कहता है, ‘कोई तो नहीं कोई भी।’ पहली नज़र में लगता है कि कविता उसी सवाल पर लौट आई है, जहाँ से उसने शुरुआत की थी। लेकिन इन दोनों कथनों के बीच बहुत कुछ घट चुका है। पानी की आवाज़, रोशनी का बदलना, चिड़िया, हवा और पेड़ के बिंब पाठक के अनुभव का हिस्सा बन चुके हैं। इसलिए अंत में लौटने वाला ‘कोई’ आरम्भ के ‘कोई’ से पूरी तरह एक जैसा नहीं रह जाता।

यह लौटना किसी स्थिर वृत्त की तरह नहीं है। कविता अपने आरम्भ पर लौटती है, लेकिन अनुभव बदल चुका है। इसी तरह हम भी किसी पुराने अनुभव को याद करते हैं तो उसे ठीक उसी तरह नहीं पाते, जैसा पहली बार महसूस किया था। समय बीतने के साथ स्मृति उस अनुभव को नया अर्थ देती है। ‘धूप में नींद’ का अंत इसी बदलाव की ओर संकेत करता है। प्रश्न वही रहता है, लेकिन उसके भीतर अब कई नए दृश्य और संवेदनाएँ शामिल हो चुकी हैं।

कविता में समय का एक और पहलू यह है कि वह वस्तुओं के अर्थ को बदलने में सक्रिय भूमिका निभाता है। रोशनी देखते-देखते धूल बन जाती है। हवा डोर की तरह खुलती है। पेड़ रेशम के गरारे जैसा दिखाई देता है। इन परिवर्तनों के लिए किसी लंबी घटना की जरूरत नहीं है। वे देखने और महसूस करने की अवधि के भीतर घटते हैं। समय यहाँ केवल उन घटनाओं की पृष्ठभूमि नहीं है, जिनका कवि वर्णन करता है। वह उस प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसमें वस्तुएँ नए अर्थ ग्रहण करती हैं।

‘धूप में नींद’ का कवि समय को किसी सीधी रेखा की तरह नहीं देखता। नतीजतन कविता में घटनाओं का स्पष्ट क्रम नहीं है, लेकिन संवेदनाओं की निरंतरता है। बिंब एक दूसरे के बाद आते हैं, पिछले अनुभवों की छाप अपने भीतर रखते हैं और आगे के अनुभव के लिए जगह बनाते हैं। बर्गसों की ‘द्यूरे’ इस भीतरी प्रवाह को समझने में मदद करती है, जबकि हुसर्ल की कालचेतना यह स्पष्ट करती है कि वर्तमान अनुभव में अतीत की छाप और आने वाले क्षण की सम्भावना दोनों मौजूद रहते हैं। एलियट की ‘बर्न्ट नॉर्टन’ इस चर्चा को एक व्यापक दार्शनिक संदर्भ देती है, जहाँ समय के अलग-अलग आयामों के बीच संबंध पर विचार किया जाता है।

वस्तुत: ‘धूप में नींद’ उस अनुभव की कविता है, जिसमें बाहरी दुनिया और भीतर की चेतना एक दूसरे को लगातार प्रभावित करते हैं। कवि कोई कहानी नहीं सुनाता, बल्कि अनुभव के बदलते क्षणों को सामने रखता है। हर नया दृश्य पिछले दृश्य की छाप लिए हुए आता है। इसीलिए कविता का अंत किसी निश्चित समाधान तक नहीं पहुँचता। कवि फिर उसी सवाल के पास लौटता है, जहाँ से उसने शुरुआत की थी, लेकिन अब उस सवाल के पीछे पूरा अनुभव मौजूद है। कविता हमें यह महसूस कराती है कि समय केवल बीतता नहीं है। वह हमारे भीतर ठहरता है, स्मृति में बना रहता है और हर बार वर्तमान को एक नया अर्थ देता है।

सन्दर्भ

बुनियादी पाठ

कमल.अरुण. ‘धूप में नींद’.(कविता). ‘किराये का घर’. सेतु प्रकाशन.2026

अन्य ग्रन्थ

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प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय.संपर्क: raviranjan@uohyd.ac.in

 

 

 

 

 

 

 

 


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