ब्रज श्रीवास्तव समकालीन कविता के स्वर हैं। आपने अपनी कविताओं के माध्यम से आज के समय की आलोचना की है। इस आलोचना का स्वर रचनात्मक है। आपमें ह्यूमर है ,चिढ़ाने वाला नहीं वरन् गहरे पैथाज़ में डुबाने वाला।
रचना समय ने पिछले माह ब्रज की चुनी कविताओं की पुस्तिका प्रकाशित की थी। महत्त्वपूर्ण लेखिका दीप्ति कुशवाह ने इस पुस्तिका पर टिप्पणी की है जो ब्रज के कवि को समझने में सहायक है।
– हरि भटनागर
मनुष्यता की धीमी लेकिन दीर्घ प्रतिध्वनि : दीप्ति कुशवाह
समकालीन हिंदी कविता के इस तीव्र, शोरग्रस्त और त्वरित प्रतिक्रियाओं वालेसमय में कुछ कविताएँ ऐसी भी आती हैं जो कोई वैचारिक उद्घोष नहीं करतीं, कोई चमत्कृत कर देने वाला भाषिक स्थापत्य नहीं रचतीं। वे बस मनुष्य के पास बैठ जाती हैं।धीरे से उसका कंधा छूती हैं और उसके भीतर बची हुई करुणा, स्मृति, थकान, उम्मीद औरआत्मीयता को जगाती हैं। “रचना समय” के सौजन्य से आई, ब्रज श्रीवास्तव कीकविताओं की पुस्तिका इसी तरह की कविताओं का संग्रह है। यह संग्रह पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि कविता यहाँ किसी प्रदर्शन की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन के ताप से निकली हुई वह साँस है जो मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के लिए अब भी संघर्षरत है।संपादक हरि भटनागर और बृजनारायण शर्मा ने इस पुस्तिका को जिस आत्मीयगंभीरता के साथ तैयार किया है, वह इसे एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ में बदल देता है। ऐसेसमय में जब साहित्यिक संसार भी तात्कालिक चर्चाओं, पुरस्कारों, प्रचारों और दृश्यउपस्थिति की बेचैनियों में उलझा दिखाई देता है, किसी कवि के रचना-संसार को केंद्र मेंरखकर इस प्रकार की पुस्तिका निकालना साहित्य के प्रति गहरी प्रतिबद्धता कापरिचायक है।
ब्रज श्रीवास्तव की कविताओं का सबसे बड़ा गुण उनका जीवन से सीधा रिश्ता है।वे जीवन को दूर खड़े होकर नहीं देखते, उसके भीतर चलते हैं। उनकी कविताओं में बड़े विमर्शों की जगह छोटे दृश्य हैं, मामूली लोग हैं, घर-परिवार की टूटती-बनती ऊष्माएँ हैं,श्रम है, स्मृतियाँ हैं, लोक की धीमी गंध है और समय की बेचैनियाँ भी हैं। वे कविता को जटिल बनाने के बजाय अनुभव को सघन बनाते हैं। यही कारण है कि उनकी कविताएँ पढ़ते हुए पाठक को कहीं भी कृत्रिमता का अनुभव नहीं होता। उनमें एक स्वाभाविक बहाव है, जैसे कोई परिचित व्यक्ति बहुत धीमे स्वर में अपने समय का सच कह रहा हो।कविता “कार ड्राइवर” इसका अत्यंत प्रभावशाली उदाहरण है। वह कविता उस व्यक्ति कोदृश्य में लाती है जो हमारे जीवन का अनिवार्य हिस्सा है, पर हमारे सामाजिक दृष्टिक्षेत्र से लगभग अनुपस्थित रहता है। ब्रज श्रीवास्तव किसी वैचारिक नारे के सहारे नहीं, बल्कि ड्राइवर की थकान, उसकी चुप्पी, उसके सीमित सपनों और श्रम की साधारण उपस्थिति केमाध्यम से सामाजिक विषमता को उजागर करते हैं। यही उनकी शक्ति है। ब्रज श्रीवास्तव प्रतिरोध को भी मानवीय बनाते हैं।इसी तरह “आजादी” जैसी छोटी कविता अपने संक्षिप्त आकार में व्यापक अर्थवत्ता समेटे हुए है। बादल से टूटती बूँद, मिट्टी से फूटता बीज, कंठ से निकलती आवाज़; इन बिंबों के माध्यम से कवि स्वतंत्रता को किसी राजनीतिक अवधारणा तक सीमित नहीं रहने देता।
वह उसे प्रकृति, अभिव्यक्ति और मनुष्य की मूल आकांक्षा से जोड़ देता है। कविता का स्वर संयत है, पर उसकी ध्वनि बहुत दूर तक जाती है। ब्रज श्रीवास्तव की कविताओं में स्मृति एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, किंतु वह केवल अतीत जीविता नहीं बनती। “माँ की ढोलक” कविता इसका सुंदर उदाहरण है। यह कविता एक वाद्ययंत्र को याद करते हुए, उस सांस्कृतिक संसार को पुनर्जीवित करती है जहाँ जीवन और लय अलग-अलग चीज़ें नहीं थे। जब कवि लिखता है, “तब लोग लय में जीते थे”- तो यह पंक्ति अतीत का स्मरण और वर्तमान जीवन की विखंडित और असंगत होती लयों पर एक मार्मिक टिप्पणी बन जाती है।
यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि ब्रज की कविता लोक और आधुनिकता के बीच कोई कृत्रिम द्वंद्व नहीं रचती। वे गाँव को किसी रोमानी स्वर्ग की तरह नहीं देखते,न शहर को मात्र अमानवीय घोषित करते हैं। उनकी दृष्टि संतुलित और मानवीय है।
“उसने दी थी छाँव” कविता में गाँव का पुराना घर केवल स्थापत्य नहीं रह जाता; वह स्मृतियों,संस्कारों और जीवन-ऊर्जा का जीवित पात्र बन उठता है। घर का बिक जाना यहाँ संपत्ति के हस्तांतरण रूप में ही दर्ज नहीं होता, वह सांस्कृतिक विरासत का धीरे-धीरे हाथ से फिसल जाना भी है। कविता का अंत भीतर तक उदास कर देता है- “हम आश्वस्त हैं कि /नये रहवासी नहीं होने देंगे उसे और बूढ़ा अब।” यह पंक्ति अपने भीतर पूरे समय का विस्थापन समेटे हुए है।
ये कविताएँ साधारण मनुष्यों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती हैं। “ज़्यादा लोग” कवितामें कवि उन्हीं लोगों के साथ अपनी पहचान निर्मित करता है जो भीड़ में हैं, प्रतीक्षालयों में हैं,समझौतों में हैं, संघर्षों में हैं। यह कविता किसी राजनीतिक घोषणा की तरह नहीं आती, लेकिन उसकी मानवीय पक्षधरता बहुत स्पष्ट है। इसी तरह “काम वाली बाई” कविता दो स्त्रियों के बीच उपस्थित सहकार और संवेदना का ऐसा दृश्य रचती है, जो आज के कठोर होते सामाजिक वातावरण में मनुष्यता की छोटी लेकिन दीप्त बची हुई जगहों को रेखांकित करता है।
ब्रज की कविताओं में पारिवारिक संबंधों की ऊष्मा भी अत्यंत मार्मिक ढंग सेउपस्थित होती है। “बहनों का होना” बदलते पारिवारिक ढाँचों, दूर होती आत्मीयताओं औररिश्तों की बदलती परिधियों का सूक्ष्म दस्तावेज़ बन जाती है। इसी तरह “पिता के बाद माँ”कविता शोक को बहुत धीमे स्वर में व्यक्त करती है। वहाँ कोई विलाप नहीं, केवल एक वृद्ध होतीमाँ की बदलती आदतें हैं… भीड़ में बेटे की उँगली कसकर पकड़ लेना, तस्वीर पर हाथ रखकर चुपचाप कुछ कहना। यही साधारण दृश्य कविता को असाधारण बना देते हैं।कवि, समय की राजनीतिक और सामाजिक विडंबनाओं को भी कविता में शामिल करते हैं, लेकिन बिना भाषाई आक्रामकता के। “विरोध” कविता लोकतंत्र की आत्मा को बहुत सरल शब्दों में व्यक्त करती है। वहीं “नाम छिपाना” पूँजी और बाजार की बढ़ती सत्ता पर तीखी टिप्पणी करती है। “उसका आत्मकथन” आधुनिक कॉर्पोरेट जीवन की विडंबनाओं को बेहद प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है; एक ऐसा मनुष्य जो आर्थिक रूप से सफल है पर अपने ही माता-पिता से कट गया है, प्रकृति से दूर हो गया है और भीतर से अस्थिर है। यह कविता समकालीन शहरी जीवन का आत्मस्वीकृत शोक है।संकलित कविताओं में युद्ध, विस्थापन और वैश्विक हिंसा की चिंता भी उपस्थित है। “युद्ध” और “हम गवाह हैं” जैसी कविताएँ किसी समाचार-रिपोर्ट की तरह नहीं, बल्कि मानवीय त्रासदी की तरह सामने आती हैं। वहाँ बमों और हथियारों के बीच भी कवि मनुष्य की कराह सुनता है। वह देखता है कि “विध्वंस का अजगर खूबसूरती को सरे आमलील रहा है।” यह पंक्ति केवल युद्ध की नहीं, पूरे समय की भयावहता की व्याख्या बन जातीहै।
यहाँ भाषा विशेष ध्यान आकर्षित करती है। कवि की भाषा सहज है लेकिन सपाट नहीं। उसमें बोलचाल की आत्मीयता है, लोक की लय है और साथ है एक सूक्ष्मकाव्यात्मक चमक भी। वे कठिन शब्दों या जटिल संरचनाओं से प्रभाव नहीं पैदा करते;अनुभव की सच्चाई से कविता को अर्थवान बनाते हैं। उनकी कविताओं में मौन का भी बहुत महत्व है। कई बार वे जितना कहते हैं, उससे अधिक अनकहा छोड़ देते हैं और वही अनकहा देर तक पाठक के भीतर गूँजता रहता है।“सब्ज़ी मंडी की पुकारें” जैसी कविता ब्रज श्रीवास्तव की दृष्टि का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। आज जब बाज़ार का अर्थ लगभग पूरी तरह कॉर्पोरेट चमक, पैकेजिंग औरउपभोगवादी सौंदर्य में सीमित होता जा रहा है, तब कवि सब्ज़ी मंडी के उस जीवंत लोक को सामने लाता है जहाँ अब भी मनुष्य बचा हुआ है। वहाँ आवाज़ें हैं, ठेलों की खड़खड़ाहट है, सब्ज़ियों के रंग हैं, मेहनतकश हाथ हैं, छोटे सिक्कों की खनक है, और जीवन की वहसहज साझेदारी है जो सुपरमार्केटों की कृत्रिम विनम्रता में अनुपस्थित है। कविता का यहकथन- “सब्जियाँ बेचते ये मज़दूर / किसी को ठगकर / अमीर होने नहीं आए हैं” -दरअसल पूरे बाजारवादी समय पर एक गहरी टिप्पणी बन जाता है। ब्रज यहाँ केवल मंडी का दृश्य नहीं रचते, वे श्रम की नैतिक गरिमा को पुनर्स्थापित करते हैं।
इसी तरह “कामना” कविता अपनी सरल संरचना में अत्यंत मार्मिक दार्शनिक अर्थवत्ता समेटे हुए है। आम, गौरैया, हिरन, कविता… इन सब बनने की इच्छाओं के बीच जब कवि अंततः कहता है, “फिर से फूल मत बनाना मुझे / कुचल को बहुत भोग चुका हूँ” तो कविता अचानक एक गहरी मानवीय पीड़ा का रूप ले लेती है। यहाँ फूल केवल कोमलता का प्रतीक नहीं रह जाता, वह संवेदनशील मनुष्य की नियति बन जाता है जिसे बार-बार रौंदा गया है। और फिर पत्थर बनने की इच्छा, “काम तो आऊँगा / लोगों के / हर मकाम पर”, कविता को करुणा और उपयोगिता के एक विलक्षण बिंदु पर ले आती है। यह कविता अपनी सादगी में जितनी सहज दिखती है, भीतर से उतनी ही दार्शनिक है।
“तमाम गुम हुई चीज़ें” कविता स्मृति और खो जाने की अनुभूति का अत्यंत मानवीय आख्यान है। ब्रज श्रीवास्तव यहाँ किसी बड़े शोक का निर्माण नहीं करते; वे जीवन से धीरे-धीरे छूटती हुई छोटी चीज़ों को दर्ज करते हैं… पुराने पत्र, दोस्तों की विदाइयाँ, बच्चों के तोतले बोल, जेब से गायब हो जाते सिक्के। कविता पढ़ते हुए लगता है कि जीवन वास्तव में उन चीज़ों से बनता है जिन्हें हम अक्सर महत्वहीन समझकर भूल जाते हैं। ब्रज की संवेदना इन्हीं छूटे हुए अंशों को कविता का केंद्र बनाती है।
“अच्छी ख़बर” जैसी अत्यंत लघु कविता भी उल्लेखनीय है। केवल कुछ पंक्तियों में कवि अपने समय की भयावहता और आशा दोनों को एक साथ उपस्थित कर देता है- “दरवाज़ा तोड़कर आने में / नाकाम हो रही है / बुरी ख़बर।” यह कविता बताती है कि ब्रज श्रीवास्तव बहुत कम शब्दों में भी समय की बेचैनी और मनुष्य की जिजीविषा को व्यक्त कर सकते हैं। यही उनकी काव्य-दृष्टि की परिपक्वता है।
“पंक्तियाँ थकी नहीं हैं” कविता दरअसल स्वयं कविता और उसकी भूमिका पर कवि का विश्वास भी है। जब वे लिखते हैं कि “अभी पंक्तियाँ थकी नहीं हैं”, तब यह केवल साहित्यिक आश्वासन नहीं रहता, बल्कि मनुष्य और संवेदना के पक्ष में उच्चारित एक गहरा विश्वास बन जाता है। यही विश्वास उनकी अनेक कविताओं में दिखाई देता है, चाहे वह “अच्छी ख़बर” की छोटी-सी चमक हो, “एम्बुलेंस” की दौड़ती हुई आशा हो, या “ऐसे कुछ दृश्य हों” जैसी कविता की मानवीय आकांक्षा।
इस पुस्तिका में संकलित आलेख भी महत्त्वपूर्ण हैं। विजय कुमार, लीलाधर मंडलोई, प्रियदर्शन और बोधिसत्व जैसे साहित्यकारों ने ब्रज श्रीवास्तव की कविताओं को विभिन्न दृष्टियों से समझने का प्रयास किया है। इन आलेखों से यह स्पष्ट होता है कि ब्रज की कविता किसी भाषाई चमत्कार पर नहीं, बल्कि मनुष्य के पक्ष में खड़ी रहने वाली संवेदना पर आधारित है। उनकी कविता सजावटी नहीं, जीवन-सापेक्ष है।
“रचना समय” की यह पुस्तिका समकालीन हिंदी कविता के एक महत्त्वपूर्ण स्वर को समझने का सुंदर अवसर देती है। यह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से मूल्यवान है जो कविता में जीवन की गंध, श्रम की थकान, संबंधों की ऊष्मा, स्मृति की धूप और मनुष्यता की धीमीलेकिन दीर्घ प्रतिध्वनि को महसूस करना चाहते हैं। ब्रज श्रीवास्तव की कविताएँ हमें यह भरोसा दिलाती हैं कि तमाम विडंबनाओं, विखंडनों और बाज़ारू शोर के बावजूद मनुष्य की संवेदना अब भी जीवित है और कविता अब भी उसकी सबसे विश्वसनीय शरणस्थली बन सकती है।
पुणे निवासी दीप्ति कुशवाह की विभिन्न विधाओं में पाँच पुस्तकें प्रकाशित हैं| भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की ओर से लोककला में सीनियर फेलोशिप, कई एकल कला प्रदर्शनियाँ की हैं| दैनिक भास्कर, नागपुर से संलग्न रही हैं|
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