पत्रकार,कहानीकार, कवि, फिल्मकार और नाटककार विवेक आसरी अपने शब्दों और छवियों के ज़रिए समाज, सत्ता और इंसानी रिश्तों की पड़ताल करते दिखाई देते हैं. इंसाफ़ एक सीधी रेखा है नाटक के बाद हाल ही में उनका नया नाटक प्रकाशित हुआ है. इस नाटक पर उन्हें दिल्ली साहित्य अकादमी द्वारा मोहन राकेश सम्मान मिल चुका है, उनके द्वारा बनाई डाक्यूमेंट्री फिल्में भारत यूरोप और अमेरिका के फिल्म समारोहों में सराही गईं हैं. फिलहाल वह जर्मनी में तो रह कर डायले वेले हिन्दी से जुड़े हैं. उनके नाटक पर कहानी कार सुधांशु गुप्त ने नाटक के पीछे छिपे विचारों को पकड़ने की कोशिश की है .

 -हरि भटनागर

 

“होली काउ का गोबर”

कहीं आप ‘सिस्टम’ में ‘मिसफिट’ तो नहीं!

 सुधांशु गुप्त

भारतीय दर्शन कहता है कि सत्य शाश्वत और अपरिवर्तनीय है यानी वह परम वास्तविकता जो भूत वर्तमान और भविष्य-तीनों कालों में समान रहती  है सत्य है। मनुष्य जीवन भर सत्य के ही पीछे भागता रहता है। निजी स्तर पर भी और सार्वजनिक स्तर पर भी। कभी वह पारिवारिक सत्य के पीछे भागता है, कभी व्यवस्था या सिस्टम के पीछे के सत्य तक पहुँचना चाहता है। निजी या दैनिक जीवन में सत्य का  सीधा-सा अर्थ है ईमानदारी, स्पष्टता और वास्तविकता को स्वीकार करना। साहित्य की दुनिया से जुड़े लोग भी सत्य को अपने-अपने तरीकों से परिभाषित करते हैं। साहित्यकार तो अपनी हर रचना में ही सत्य को उद्घाटित करते दिखाई देते हैं। या यह दावा करते हैं कि उन्होंने  सत्य को पा लिया है।  इतना ही नहीं वे अलग-अलग ढंग से सत्य को परिभाषित करने की भी कोशिश करते हैं। मिसाल के तौर पर प्रसिद्ध अंग्रेजी लेखक जेरोम के जेरोम का कहना है कि , सच बोलना सबसे अच्छी नीति है, अगर आप बहुत अच्छी तरह झूठ नहीं बोल पाते हैं तो मार्क ट्वेन कहते हैं, ए लाई कैन ट्रेवल हाफ  वे अराउंड दि वर्ल्ड  वाइल दि ट्रूथ इज़ जस्ट पुटिंग ऑन हिज़ शूज़। मार्टिन लूथर किंग का कहना है, जब आप सच के लिए लड़ने जाओ तो अपने अच्छे वाले कपड़े पहनकर मत जाओ।

सज में सिस्टम में सच के लिए कौन लड़ रहा है और कौन सच तक पहुँचना चाहता है, और जब वह सच तक पहुँचता है तब भी क्या सच वही रहता है, जो दिखाई दे रहा था, ये महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। प्रश्न और भी हैं। जब आप देखते हैं कि एक व्यक्ति अचानक पागलखाने पहुँच गया है, दूसरा व्यक्ति अनायास किसी बड़े पद तक पहुँच गया और एक अन्य व्यक्ति सिस्टम से लड़ते हुए स्वेच्छा से शहीद हो गया या किसी छोटे अफ़सर ने अपने सीनियर की  गोली मारकर हत्या कर दी…या समाज मेंं होने वाली ऐसी ही घटनाएं आपको किस सच तक पहुँचाती हैं। ऐसे ही  बहुत से सवालों के जवाब तलाशता है विवेक आसरी का प्ले होली काउ का गोबर।

विवेक आसरी कवि हैं, कहानीकार हैं, फिल्म मेकर हैं,उनकी द्वारा बनाई अनेक डॉक्यूमेंट्री फिल्में भारत, यूरोप और अमेरिका के फिल्म समारोहों में सराही गई हैं। उन्होंने रेडियो के लिए भी काम किया है, फिलहाल वह डॉयले वेले हिन्दी से जुड़े हैं। उन्हें 2009 में  इसी नाटक पर प्रष्ठित मोहन राकेश सम्मान मिल चुका है, बावज़ूद इस नाटक को प्रकाशित होने में 17वर्ष का समय लगा। संभवतः इस नाटक के विषय और विचार से सिस्टम की सहमति नहीं होगी। नाटक  में ऐसा क्या है…

नाटक फौज की एक टुकड़ी से शुरू होता है। नाटक के किरदारों में अनेक मेजर हैं, कैप्टन हैं, हवलदार हैं, ब्रिगेडियर है, और एक 50-55 साल का व्यक्ति- सुब्बू का  बाप- है जो सेना में नौकरी के दौरान अपने साथियों की प्रताड़ना के कारण मानसिक संतुलन खो बैठा था और अब भी हर वक्त सेना की बातें दोहराता रहता है। उसके हावभाव में अब अब भी एक सैन्य अफ़सर सा नज़र आता है। नाटक के शुरू में वह अथ श्री महाभारत के द्रोण वर्व में अभिमन्यु वध से नाटक की शुरुआत करता है…वह कहता है-

बहुमतों ने लिख दिया

जो बुतोे ने लिख दिया

बस वही तो सत्य है

वध्य है…वध्य है…

17वर्ष का वह बालक महान योद्धाओं  के इस मृत्युगान से लेषमात्र भी  डरता नहीं है…

धर्म पर अड़ा हुआ

मैं अभी खड़ा यहाँ

यही तो मेरा सत्य है

क्या तुम्हारा कथ्य है

सत्य के पीछे भागते नाटक का कथ्य धीरे-धीरे दर्शकों के सामने आने लगता है। एकदम सहजता से बिना किसी नाटकीयता के। दर्शकों को पता चलता है कि सेना के अफसर और जवान अपने सैनिक जीवन की चर्चा कर रहे हैं। अधिकांश अफसर और जवान भ्रष्टाचार मेंं डूबे हुए हैंं। कोई एम्यूनेशन बेचकर पैसा कमा रहा है तो किसी पर रेप के आरोप लगे हैं, कोई  मुस्लमान है और वह भी अन्य सैैनिकों के साथ भ्रष्टाचार में लिप्त है और यदि कोई ईमानदार अनुशासित मेजर है, तो उससे सब चिढ़ते हैं। इसलिए कि वह सेना में काम करने वाले सभी भ्रष्ट लोगों के लूपहोल्स जानता है। एक किरदार कैप्टन खान का भी है। वह करप्ट है लेकिन समझदार नहीं है। उसके अन्दर अपरिपक्वता है। एक मुसलमान के रूप मेंं वह अपनी पहचान को लेकर ज़्यादा सचेत और उलझन में रहता है। वह थोड़ा लापरवाह भी है।

सामान्य-सी बातचीत से नाटक आगे बढ़ता है। दर्शकोंं के मन में यह सवाल भी आता है कि सेना मेंं महाभारत का अभिमन्यु, इस नाटक में कौन है, कौन है जिसका वध सभी महारथी मिलकर करेंगे? नाटक में एक तरफ़ सेना में फिट और मिसफिट लोगों का जीवन दिखाई देता है और दूसरी तरफ पागलखाने में सुब्बू के पिता का अनर्गल प्रलाप दर्शक सुनते रहते हैं। सुब्बू के पिता रियल में घटी बहुत सी घटनाओं का ज़िक्र करता है। मसलन बीएसएफ के एक जवान ने अपने दो सीनियर अफसरोंं की गोली मारकर हत्या कर दी…49 वर्ष के एक सिपाही ने अपने साथियों पर गोलियांं चला दीं, उसके दो साथी मारे गए और दो घायल हो गए…भारतीय सेना के एक जवान ने अपने पाँच साथियों की हत्या करने के बाद जान दे दी। सुब्बू के पिता इस तरह के समाचारों से दरअसल वे सवाल पूछ रहे हैं  कि क्योंं  कोई जवान अपने सीनियर अफसरों की हत्या कर देता है, क्यों एक सिपाही अपनें ही साथियों पर गोलियाँ चला देता है, क्यों कोई अपने ही साथियों की हत्या करके खुद को भी गोली मार लेता है। सुब्बू के पिता स्वयं  एक सवाल हैं। ऐसा सवाल जिससे सिस्टम  में मिसफिट होने के कारण उन्हें पागलखाने आना पड़ा-टोबा टेक सिंंह की तरह। क्या टोबा टेक सिंह भी सिस्टम के साथ नहीं था?

इन सब सवालों के बीच पता चलता है कि सेना के मेजर अभिमन्यु को जानकारी मिलती है कि मेजर सुब्रमण्यम एक सर्च ऑपरेशन के दौरान शहीद हो गए। मेजर अभिमन्यु सुब्रमण्यम का अच्छा दोस्त है और हमेशा सच की खोज में रहता है। वह इस बात की तहकीकात करता है कि ऑपरेशन को लीड करने के लिए मेजर सुब्रमण्यम को ही क्यों भेजा गया। पता चलता है कि सुब्रमण्यम की ईमानदारी और अनुशासनप्रियता से बुहत से अफसर नाखुश थे। वह करप्ट अफसरों के भी हमेशा खिलाफ रहा करता था। मेजर अभिमन्यु सेना के मेजर, कैप्टन और हवलदारो से सामान्य बातचीत के  ज़रिए ही सच को तलाश करता है। मेजर अभिमन्यु मेजर सुब्रमण्यम की शहादत के सच तक पहुँँच जाता है। लेकिन एक और क्रूर सच मेजर की प्रतीक्षा करता हुआ मिलता है। एक ऐसा खौफनाक सच जिसका शिकार शायद हर वो आदमी हो रहा है जो सिस्टम के साथ नहीं है या सिस्टम का विरोध कर रहा है।

विवेक ने सेना को सिस्टम के प्रतीक के रूप में चित्रित किया है। यहाँ सेना होली काउ है और उसका गोबर वह करप्शन है जिसमें अधिकांश लोग डूबे हुए हैं। कृत्रिम विषयोें में डूबे समाज में विवेक एक गैरपरम्परागत और मौलिक विषय को उठाते हैं। यही इस नाटक की सफलता  है, जिस सहजता और सरलता से विवेक ने इसे लिखा है, वह कहीं न कहीं समाज के मिसफिट लोगों को इंसाफ दिलाता दिखाई देता है। इस नाटक को निर्देशक मंच पर भी सफलतापूर्वक मंचित कर सकता है और पाठक भी किसी कहानी की तरह इसे पढ़ सकता है।

 

विवेक आसरी

पत्रकार, कहानीकार, कवि और डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर विवेक के पास भारत, आस्ट्रेलिया और जर्मनी- तीन देशों, तीन भाषाओे और तीन  संस्कृतियों से बुनी गई दृष्टि है। वह हिन्दी के साथ-साथ विदेशी साहित्य और कथेतर के गंभीर अध्ययेता हैं। उन्हें पढ़ना पाठको को भी नया विज़न देता है।

पुस्तकः होली काउ का गोबर, लेखकः विवेक आसरी, प्रकाशकः हिन्दी युग्म, मूल्य़ः 199


 

  सुधांशु गुप्त

सहारनपुर में जन्म। दिल्ली में शिक्षा-दीक्षा। दिनमान टाइम्स, दैनिक हिन्दुस्तान और कई अन्य संस्थानों में नौकरियाँ कीं। लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं और अनेक अख़बारों में कहानियाँ प्रकाशित, रेडियो के विभिन्न चैनलों से कहानियाँ प्रसारित। रेडियो के लिए असमी, गुजराती, राजस्थानी, मराठी, सिंधी और त्रिपुरा के लेखकों की अनेक रचनाओं का रेडियो रूपांतरण। मोपासां, मैक्सिम गोर्की की कहानियों और रोम्यां रोला व अनातोले फ्रांस के उपन्यासों का रेडियो रूपांतरण। चार कहानी संग्रह-खाली कॉफ़ी हाउस, उसके साथ चाय का आख़िरी कप, स्माइल प्लीज़ और तेरहवाँ महीना प्रकाशित। पाँचवां संग्रह तैयार उसको फ़ोन करना है प्रकाशनार्थ। कुछ किताबें कुछ बातें-नेपथ्य में विमर्श, आलोचनात्मक पुस्तक प्रकाशित। योगेश गुप्त समग्र (चार खण्डों में) का महेश दर्पण के साथ संपादन। फ़िलहाल एक उपन्यास पर काम। लेखन उनके लिए खोज है, स्वयं की, जीवन की और जीवन दर्शन की।

फोन नंबरः 9810936423

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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