रचना समय’ की इस प्रस्तुति में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन का कवि संतोष चतुर्वेदी की प्रसिद्ध ‘दुभाषिए’ कविता के समाजभाषावैज्ञानिक विश्लेषण पर केन्द्रित आलेख प्रकाशित किया जा रहा है, जो समकालीन साहित्यिक विमर्श में एक मूल्यवान हस्तक्षेप है। इसमें एडवर्ड सापीर, नोम चोमस्की और विवियन कुक जैसे वैश्विक भाषाशास्त्रियों के सिद्धांतों के साथ-साथ गणेश नारायण देवी और देवी प्रसन्न पट्टनायक के भारतीय भाषाई लोकतंत्र के विचारों को जिस सहजता से इस कविता के मर्म के साथ जोड़ा गया  है, वह इस आलेख को अकादमिक दृष्टि से समृद्ध और विचारोत्तेजक बनाता है। यह आलेख केवल भाषाई पारिस्थितिकी (Linguistic Ecology) के वैश्विक संकटों की पड़ताल तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भारत के जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में मातृभाषा और अंग्रेज़ी के समन्वय पर एक साहसिक व गंभीर विमर्श भी खड़ा करता है।

इस आलेख में संतोष चतुर्वेदी की ‘दुभाषिए’ कविता के शिल्प और प्रतीकों की बारीक परतों को खोलते हुए उसमें अन्तर्निहित यह संदेश भी दृढ़ता से सामने रखा गया है कि संवाद को बचाए रखना ही अंततः मनुष्यता को घोर सन्नाटे से बचाने की अंतिम रक्षा पंक्ति है।

-हरि भटनागर

लिपियों की खिलखिलाहट और बहुभाषिकता का दर्शन: ‘दुभाषिए’ का समाज – भाषावैज्ञानिक पाठ  

रवि रंजन

कवि, संपादक और आलोचक संतोष चतुर्वेदी समकालीन हिन्दी साहित्य और अकादमिक जगत के एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। लगभग 15 वर्षों तक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘कथा’ में सहायक संपादक के रूप में अपनी सेवाएँ देने के बाद वर्ष 2011 से वे ‘अनहद’ पत्रिका का संपादन-प्रकाशन के साथ-साथ अपने लोकप्रिय ब्लॉग ‘पहली बार’ का मॉडरेशन भी करते रहे हैं। सृजनात्मक अवदान की दृष्टि से वर्ष 2009 में भारतीय ज्ञानपीठ से उनका प्रथम काव्य संग्रह ‘पहली बार’ प्रकाशित हुआ, जिसके बाद वर्ष 2014 में ‘दक्खिन का भी अपना पूरब होता है’ संग्रह चर्चा में रहा। कविता के अतिरिक्त आपने आलोचना और इतिहास के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया है, जिनमें ‘भक्ति आन्दोलन का वर्तमान परिप्रेक्ष्य’, ‘मुक्तिबोध : पाठ पुनःपाठ’, ‘भोजपुरी लोकगीतों में स्वाधीनता आन्दोलन’ और ‘बोल्शेविक क्रान्ति’ जैसी पुस्तकें उल्लेखनीय हैं। आकाशवाणी इलाहाबाद से आपकी कविताओं का निरंतर प्रसारण होता रहा है और लोकभारती प्रकाशन से आपकी पुस्तक ‘भारतीय संस्कृति’ भी प्रकाशित हो चुकी है। मुख्यत: इतिहास के अध्येता और प्रोफ़ेसर संतोष चतुर्वेदी की विभिन्न वेबपोर्टलों पर मौजूद  सैकड़ों कविताएँ ,आलोचनात्मक टिप्पणियाँ आदि  उनकी साहित्यिक-सांस्कृतिक सक्रियता का साक्ष्य हैं ।

संतोष चतुर्वेदी की ‘दुभाषिए’ कविता अनुवाद और भाषाई मध्यस्थता को महज एक तकनीकी प्रक्रिया से ऊपर उठाकर उसे मानवीय संवेदना, सांस्कृतिक सेतु और अस्तित्वगत सुरक्षा के एक विराट दर्शन के रूप में प्रतिष्ठित करती है। यह कविता उस ‘तीसरे’ तत्त्व की महत्ता को रेखांकित करती है, जो दो भिन्न और अपरिचित दुनियाओं के बीच संवाद का प्रकाश फैलाकर अजनबीपन के अंधेरे को काटता है। प्रस्तुत विश्लेषण इस कविता के मर्म की शिनाख्त करने के साथ ही इसके माध्यम से न केवल भाषाई पारिस्थितिकी और बहुभाषिकता के वैश्विक संकटों की पड़ताल करता है, बल्कि भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में मातृभाषा और मुक्ति की भाषा के रूप में अंग्रेज़ी के समन्वय की अनिवार्यता पर भी एक गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है। यह आलेख इस बात की पुष्टि करता है कि भाषा का विस्तार वास्तव में मानवीय करुणा और सामाजिक न्याय का ही विस्तार है।

कविता का मूल पाठ नीचे देखा जा सकता है :

दुभाषिए

अमूमन एक पुल जैसे होते हैं ये

नदियों के दोनों किनारों को एकमेक करते हुए

इन्हीं के सहारे

दोनों किनारे

एक दूसरे को अपनी अंकवार में कस लेते हैं

और जी भर कर अक्सर बतियाते हैं

दुनिया जहान की बातें

इनके होने से हमेशा एक भरोसा रहता है

कि हमारी बातें भी समझी जा सकेंगी

उस भाषा में

जिसकी लिपि आड़ी-तिरछी-उल्टी-सीधी रेखाओं से अधिक कुछ नहीं लगती

और जिसकी वर्णमाला के एक अक्षर तक से परिचित नहीं हम

इनके होने से हमेशा एक भरोसा रहता है कि हमारी कविताएँ

दूसरी भाषाओं की हवाओं में भी खुलकर साँस ले सकेंगी कभी

बातों को उनके समूचे अर्थ के साथ

दूसरे शब्दों में रखने का हुनर जानते हैं

फूलों का खिलना सुनकर

ये खिलखिलाहट की भाषा में बात करने लगते हैं

तब इनकी बातों से सुगंध झड़ती हैं

जिसे महसूस कर सकते हैं भौंरे ही

अकाल की आहट पाकर

मुरझा जाते हैं इनके चेहरे

और तब सचमुच की जद्दोजहद दिखाई पड़ती है

इनकी बातों में

इनका होना भोर होना है

इनका होना रात का अंजोर होना है

घोर सन्नाटे में भी मानुष शोर होना है

कभी-कभी आपसी बातचीत के लिए

दो के अलावा तीसरे का होना भी ज़रूरी होता है

अलग-अलग भाषाओं की धरती के दो लोगों की बातचीत के दौरान

अहम होती है इनकी मौजूदगी

इनके बिना समझ का कोई सिरा ही नहीं बन पाता एक भी तरफ़

जबकि इनके होने पर पूरे विश्वास से हम कर सकते हैं बातें

इनके होने की उम्मीद भर से कट जाती हैं कालिमा भरी रातें

इनके होने पर बेफ़िक्र हो हम मुस्कुरा सकते हैं

इनके होने पर बेतकल्लुफ़ी से हम गा सकते हैं

जहाँ की सड़कें तक अपरिचित हों

उस जगह के रास्ते पर खड़े होकर ये ठिकाना सुझाते हैं

इनका होना अपरिचय के संसार में भी हवा, पानी और रोशनी का होना है

इनका होना बियाबान में एक भाई, बहन या फिर एक मित्र का होना है

इनका होना किसी बीज का अँखुवाया हुआ कोना है

जिस पर कायम हैं आज भी जीवन की उम्मीदें

विपत्ति की घड़ी में जब भी कोई आवाज़ लगाएगा ख़ुद को बचाने की

इनके होते नाउम्मीद नहीं रहेगा वह

उसी की भाषा में ज़ोर-ज़ोर से

बचाव की आवाज़ बोलते हुए

तत्काल ही घर से निकल पड़ेंगे ये

जब तलक दुभाषिए हैं इस संसार में

भाषाओं के अर्थ बचे रहेंगे

अपने समूचे विस्तार में

विपरीत दिशा से आती हुई राहें एक दूसरे से मिलती रहेंगी

अपनी लिखावट के वृंत पर लिपियाँ हमेशा खिलती रहेंगी

-संतोष चतुर्वेदी

‘दुभाषिए’ कविता अनुवाद और भाषाई मध्यस्थता के मानवीय पक्ष को बहुत ही संवेदनात्मक  ढंग से उकेरती है। कवि ने दुभाषियों को केवल दो भाषाओं के बीच का अनुवादक न मानकर उन्हें एक ‘पुल’ की संज्ञा दी है, जो दो अलग-अलग किनारों यानी संस्कृतियों और विचारधाराओं को आपस में जोड़ते हैं। आज के वैश्विक परिदृश्य में जहाँ वैश्वीकरण और सांस्कृतिक एकरूपता के दबाव में हज़ारों भाषाएँ दम तोड़ रही हैं, यह कविता भाषाई पर्यावरण में संतुलन की महत्ता को गहराई से रेखांकित करती है।

जाहिर है कि किसी भाषा का लुप्त होना केवल शब्दों के एक समूह का खो जाना नहीं है, बल्कि उस भाषा में रचे-बसे अनुभवों, मुहावरों, लोक-कथाओं और एक विशिष्ट विश्व-दृष्टि का अंत है। कवि संकेत देता है कि जब एक भाषा दूसरी के लिए ‘आड़ी-तिरछी रेखाओं’ जैसी अपरिचित बन जाती है, तब दुभाषिया ही वह माध्यम बनता है जो उस अजनबीयत को आत्मीयता में बदलता है।

कविता का सूक्ष्म पाठ यह स्पष्ट करता है कि दुभाषिया होना मात्र एक कौशल नहीं, बल्कि एक मानवीय हुनर है जो ‘फूलों के खिलने’ की आहट को ‘खिलखिलाहट’ में अनूदित कर सकता है। यह भाषाई पर्यावरण के उस संवेदनशील पक्ष की ओर इशारा है जहाँ भाषा केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं, बल्कि संवेदनाओं का संवहन करती है। जब दुनिया की कोई भाषा लुप्त होती हैं, तो संवाद के वे सूक्ष्म तंतु टूट जाते हैं जिनसे उसके बोलने वाले के साथ अन्य भाषा-भाषी समुदायों की सामाजिक समरसता बनी रहती है। बहुभाषिकता यहाँ केवल बौद्धिक क्षमता के रूप में नहीं, बल्कि कवि के शब्दों में ‘भोर’ और ‘अंजोर’ (प्रकाश) के रूप में आती है, जो अज्ञानता और अलगाव की कालिमा को काटती है। कवि के अनुसार, दुभाषियों की उपस्थिति यह भरोसा दिलाती है कि हमारी कविताएँ और भावनाएँ दूसरी भाषा की हवाओं में भी सुरक्षित रूप से ‘साँस’ ले सकेंगी, जो भाषाई विविधता के संरक्षण की अनिवार्य शर्त है।

आम लोगों के लिए द्विभाषिकता या बहुभाषिकता के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए संतोष चतुर्वेदी  इसे ‘बियाबान में एक भाई या मित्र’ होने जैसा बताते हैं। अपरिचित भूगोल और अपरिचित भाषा के बीच जब इंसान अकेला महसूस करता है, तब दूसरी भाषा का ज्ञान या उसे जोड़ने वाला व्यक्तित्व ही उसे जीवन की उम्मीदों से जोड़ता है। भाषाई संतुलन का अर्थ ही यही है कि कोई भी भाषा श्रेष्ठ या हीन न मानी जाए और हर भाषा को फलने-फूलने का अवसर मिले। कविता के अंत में यह विचार प्रबल होकर उभरता है कि जब तक दुभाषिए और बहुभाषिकता जीवित है, तब तक भाषाओं के ‘अर्थ’ अपने समूचे विस्तार में बचे रहेंगे। यह बहुभाषिकता ही वह धुरी है जिस पर विपरीत दिशाओं से आने वाली राहें मिलती हैं और अलग-अलग लिपियाँ अपनी विशिष्टता बनाए रखते हुए एक-दूसरे के साथ संवाद कर पाती हैं। इस प्रकार, ‘दुभाषिए’ कविता भाषाई विविधता को बचाने और संवाद की संस्कृति को जीवित रखने का एक सशक्त मानवीय घोषणापत्र कही जा सकती है।

‘दुभाषिए’ कविता को भाषाई पारिस्थितिकी (Linguistic Ecology) की दृष्टि से देखना एक अत्यंत प्रासंगिक और गंभीर विमर्श को जन्म देता है। भाषाई पारिस्थितिकी का मूल सिद्धांत यह है कि भाषाओं का अस्तित्व किसी शून्य में नहीं, बल्कि एक जीवंत सामाजिक और सांस्कृतिक पर्यावरण में मौजूद होता है। जिस प्रकार प्रकृति में एक जीव का विलोपन पूरे खाद्य चक्र और पारिस्थितिकी को असंतुलित कर देता है, उसी प्रकार एक भाषा का अंत मनुष्यता के सामूहिक अनुभव की एक खिड़की को हमेशा के लिए बंद कर देता है। आज दुनिया में लगभग 7,100 से अधिक जीवित भाषाएँ हैं, लेकिन चिंताजनक तथ्य यह है कि इनमें से लगभग 40 प्रतिशत भाषाएँ ‘एंडेन्जर्ड’ यानी विलुप्ति की कगार पर हैं। यूनेस्को के आंकड़ों के अनुसार, हर दो सप्ताह में दुनिया की एक भाषा दम तोड़ देती है। इसके मुख्य कारणों में सांस्कृतिक साम्राज्यवाद, वैश्वीकरण की एकरुपता और आर्थिक विवशताएँ आदि शामिल हैं। जब बाज़ार और सत्ता केवल मुट्ठी भर ‘बड़ी’ भाषाओं को ही विकास का माध्यम मान लेते हैं, तो छोटी और स्थानीय भाषाएँ ‘मृतप्राय’ होने लगती हैं।

भाषाओं के लुप्त होने के इस संकट पर हुए महत्त्वपूर्ण अध्ययनों, जैसे कि ‘पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ (PLSI) और ‘एथनोलॉग’ के प्रतिवेदनों से यह स्पष्ट होता है कि भाषा केवल तब नहीं मरती जब उसे बोलने वाले नहीं रहते, बल्कि तब मरती है जब उसे बोलने वाली नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा को ‘पिछड़ा’ समझकर त्याग देती है। नोम चोमस्की ने जिस ‘स्वाभाविक सक्षमता’ (Innate Competence) की बात की है, वह बताती है कि मनुष्य का मस्तिष्क भाषा सीखने के लिए ही बना है, लेकिन जब भाषाई पर्यावरण ही प्रदूषित हो जाए—जहाँ केवल एक या दो भाषाओं का वर्चस्व हो—तो मनुष्य की वह जन्मजात सक्षमता भी संकुचित हो जाती है। विवेच्य कविता में जब कवि कहता है कि दुभाषियों के बिना लिपियाँ ‘आड़ी-तिरछी-उल्टी-सीधी रेखाओं’ से अधिक कुछ नहीं लगतीं, तो वह दरअसल उस अलगाव की ओर इशारा करता है जो भाषाई विविधता के खत्म होने से पैदा होता है। दुभाषिया यहाँ केवल एक अनुवादक नहीं है, वह उस ‘लिपि’ को ‘अर्थ’ देने वाला वह जीवंत अस्तित्व है जो मानवीय संवेदनाओं को एक किनारे से दूसरे किनारे तक पहुँचाता है।

कहने की ज़रूरत नहीं कि भारत के संदर्भ में बहुभाषिकता का महत्त्व और भी गहरा है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण राष्ट्र में राष्ट्रीय एकता का आधार ‘एक भाषा’ नहीं, बल्कि ‘सभी भाषाओं का सम्मान’ है। यहाँ बहुभाषिकता एक स्वाभाविक जीवन शैली है। राष्ट्रीय एकता के लिए यह इसलिए ज़रूरी है क्योंकि जब कोई व्यक्ति दूसरी भाषा सीखता है, तो वह केवल शब्द नहीं सीखता, बल्कि उस समुदाय के प्रति संवेदनशीलता और विश्वास भी विकसित करता है। चोमस्की के विचार को यदि ‘दुभाषिए’ कविता के संदर्भ में विस्तार दें, तो यह साफ़ होता है कि नई भाषा सीखने की कोशिश ही वह ‘पुल’ है जो समाज में ‘मानुष शोर’ को सन्नाटे में तब्दील होने से रोकता है। कवि के अनुसार, दुभाषिए का होना ‘बियाबान में एक भाई’ जैसा होना है, जो अजनबी दुनिया में सुरक्षा और आत्मीयता का भाव भरता है।

आज भाषाओं को बचाने के लिए जो वैश्विक प्रयास हो रहे हैं, उनमें ‘डिजिटल आर्काइविंग’ और ‘मदर टंग आधारित शिक्षा’ प्रमुख हैं। लेकिन ‘दुभाषिए’ कविता हमें याद दिलाती है कि सबसे बड़ा प्रयास है—संवाद को बचाए रखना। भाषाओं के ‘अर्थों के विस्तार’ को बचाने की चिंता असल में मनुष्यता को बचाने की चिंता है। यदि हम बहुभाषिकता को प्रोत्साहित नहीं करेंगे और दुभाषियों (मध्यस्थों) के महत्त्व को नहीं समझेंगे, तो दुनिया एक ऐसे ‘घोर सन्नाटे’ की ओर बढ़ जाएगी जहाँ लोग एक-दूसरे को देख तो सकेंगे, पर समझ नहीं सकेंगे। कविता का यह संदेश अत्यंत प्रभावी है कि जब तक दुभाषिए और संवाद की यह संस्कृति बची है, तब तक भाषाओं की लिखावट के वृंत पर लिपियाँ खिलती रहेंगी और जीवन की उम्मीदें कायम रहेंगी।

कवि संतोष चतुर्वेदी की यह रचना  सांस्कृतिक सेतु के उस जीवंत दर्शन को प्रतिपादित करती है, जहाँ द्विभाषिकता केवल दो भाषाओं का ज्ञान भर नहीं, बल्कि दो भिन्न संसारों के बीच का रागात्मक संबंध है। जब कवि कहता है कि दुभाषिए ‘नदियों के दोनों किनारों को एकमेक’ करते हैं, तो वह भौगोलिक दूरी के बजाय सांस्कृतिक अलगाव को पाटने की ओर संकेत करता है। दुनिया के इतिहास और वर्तमान परिप्रेक्ष्य में देखें तो अनुवाद और द्विभाषिकता ने ही मानवता को एक सूत्र में पिरोया है। उदाहरण के तौर पर, मध्यकाल में जब अरब विद्वानों ने भारतीय खगोलशास्त्र और गणित के ग्रंथों का अरबी में और फिर वहाँ से यूनानी ग्रंथों का अनुवाद किया, तो वह केवल शब्दों का स्थानांतरण नहीं था, बल्कि वह ‘सांस्कृतिक पुल’ था जिसने आधुनिक विज्ञान की नींव रखी। आज भी जब हम हारुकी मुराकामी जैसे जापानी लेखक  या गेब्रियल गार्सिया मार्खेज़ सरीखे लातिन अमेरिकी लेखक को अपनी भाषाओं में पढ़ते हैं, तो अनुवाद ही वह माध्यम होता है जो हमें उनकी संस्कृति की गंध, वहाँ के दुख और वहाँ की खिलखिलाहट से परिचित कराता है। इसलिए अनुवाद एक  ‘सांस्कृतिक कर्म’  है जो हमें यह समझने में मदद करता है कि मनुष्य की मूल संवेदनाएँ हर जगह एक समान हैं।

भारत के संदर्भ में द्विभाषिकता और बहुभाषिकता राष्ट्रीय अस्मिता का अनिवार्य हिस्सा रही हैं। भारत एक ऐसा देश है जहाँ भाषाओं के बीच कोई ‘दीवार’ नहीं बल्कि ‘पारगम्यता’ रही है। भक्ति काल के कवियों को देखें, तो कबीर, नामदेव या मीरा की भाषा में जो मिश्रण या ‘खिचड़ीपन’ है, वह वास्तव में उस काल की बहुभाषिकता का प्रमाण है जिसने उत्तर और दक्षिण, पूर्व और पश्चिम को सांस्कृतिक रूप से एक किया। आज भी एक भारतीय नागरिक सहज रूप से अपनी स्थानीय बोली, राज्य की भाषा, एक हद तक अपने पड़ोसी राज्य की भाषा और हिंदी या अंग्रेजी के बीच आवाजाही करता है। यह द्विभाषिकता या बहुभाषिकता उसे एक व्यापक भारतीय पहचान से जोड़ती है। जब एक उड़िया भाषी व्यक्ति दक्षिण भारत के किसी अंचल में जाकर अपनी बात कहने के लिए किसी मध्यस्थ या दुभाषिए का सहारा लेता है, तो वह केवल रास्ता नहीं पूछता, बल्कि वह उस अंचल के विश्वास और जीवन-पद्धति में प्रवेश करता है। विवेच्य कविता की यह पंक्ति कि ‘दो के अलावा तीसरे का होना भी ज़रूरी होता है’, भारत जैसे देश में सामाजिक समरसता का महामंत्र है, जहाँ भाषाएँ एक-दूसरे से टकराती नहीं बल्कि परस्पर घुल-मिलकर नया अर्थ रचती हैं।

वैश्विक स्तर पर भी द्विभाषिकता और बहुभाषिकता के महत्त्व को ‘सांस्कृतिक कूटनीति’ के रूप में देखा जाता है। यूरोपीय देशों में, जहाँ सीमाएँ बदलते ही भाषाएँ बदल जाती हैं, द्विभाषिकता ही वह सेतु है जिसने यूरोप को एक राजनीतिक और आर्थिक इकाई के रूप में जोड़कर रखा है। यदि अनुवाद और दुभाषिए न होते, तो विश्व की महान लिपियाँ हमारे लिए वैसी ही ‘आड़ी-तिरछी रेखाएँ’ होतीं जैसा कि कविता में उल्लेख किया गया है। बहुभाषिकता का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह व्यक्ति की सोच को संकीर्णता से निकालकर विस्तार देती है। चोमस्की के भाषा-अर्जन के सिद्धांत के परे, यह एक सामाजिक कौशल है जो हमें ‘अपरिचय के संसार’ में भी ‘हवा, पानी और रोशनी’ की तरह सुरक्षा प्रदान करता है।

वस्तुत: संतोष चतुर्वेदी की यह सशक्त कविता स्पष्ट करती है कि द्विभाषिकता का लोप असल में संवेदनाओं का लोप होना है। जब हम अपनी भाषा के बाहर झांकना बंद कर देते हैं, तो हम उस ‘बियाबान’ की ओर बढ़ जाते हैं जहाँ कोई ‘भाई, बहन या मित्र’ नहीं मिलता। दुनिया की विभिन्न संस्कृतियों के बीच ‘भोर’ और ‘अंजोर’ बने रहने के लिए उन दुभाषियों का होना बेहद ज़रूरी है जो शब्दों के समूचे अर्थ को उनकी सुगंध के साथ बचाए रखते हैं। ‘दुभाषिए’ कविता हमें संदेश देती है कि अपनी भाषा के प्रति प्रेम अच्छी बात है, लेकिन दूसरी भाषा का सम्मान और उसे सीखने की ललक ही कवि के शब्दों में वह ‘अँखुवाया हुआ कोना’ है जिस पर मानवता का भविष्य टिका है। इसी सांस्कृतिक लेन-देन से वह भरोसा बना रहता है कि आपदा के समय जब कोई मदद के लिए पुकारेगा, तो उसकी भाषा को समझने वाला और तत्काल मदद के लिए घर से निकल पड़ने वाला कोई न कोई ‘दुभाषिया’ ज़रूर मौजूद होगा।

‘दुभाषिए’ कविता के केंद्र में जो सबसे मर्मस्पर्शी तत्त्व है, वह है मानवीय संवेदना की सघनता। कवि ने दुभाषिए के चरित्र को केवल एक यांत्रिक अनुवादक के रूप में नहीं, बल्कि एक भावुक सेतु के रूप में निर्मित किया है। जब कविता कहती है कि फूलों का खिलना सुनकर ये ‘खिलखिलाहट की भाषा’ में बात करने लगते हैं और अकाल की आहट पाकर इनके चेहरे ‘मुरझा’ जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर दुभाषिए की परकाया प्रवेश की क्षमता को दर्शाता है। एक सफल दुभाषिया या बहुभाषी व्यक्ति होने की पहली शर्त ही यही है कि वह शब्दों के पीछे छिपे दर्द, आनंद और आक्रोश को उसी तीव्रता से अनुभव करे जिस तीव्रता से वक्ता उसे व्यक्त कर रहा है। कविता में प्रयुक्त  ‘मुरझाहट’ और ‘सुगंध’ का बिंब इस बात का प्रमाण है कि बहुभाषिकता मनुष्य के भीतर सहानुभूति (Empathy) का विस्तार करती है। जब हम किसी दूसरी भाषा को सीखते हैं, तो हम केवल उसकी व्याकरण नहीं सीखते, बल्कि हम उस भाषा को बोलने वाले समुदाय के इतिहास, उनके संघर्षों और उनकी खुशियों को भी अपने भीतर जगह देते हैं। यह प्रक्रिया स्वभावतः मनुष्य को अधिक सहिष्णु बनाती है, क्योंकि तब ‘दूसरा’ व्यक्ति हमारे लिए केवल एक अजनबी नहीं रह जाता, बल्कि उसकी भाषा हमारे भीतर एक आत्मीय गूँज बन जाती है।

आज की रस्साकशी भरी दुनिया में, जहाँ घृणा और अविश्वास की दीवारें ऊँची होती जा रही हैं, वहाँ बहुभाषिकता से उपजी यह सहिष्णुता एक अनिवार्य औषधि की तरह है। युद्धों और वैमनस्य का एक बड़ा कारण संवादहीनता और एक-दूसरे की संस्कृति को न समझ पाना है। जब कविता कहती है कि ‘इनके होने से हमेशा एक भरोसा रहता है’, तो यह भरोसा वास्तव में मानवीय संवेदना की रक्षा का भरोसा है। एक दुभाषिया जब किसी पीड़ित की भाषा में बचाव की गुहार लगाता है, तो वह महज़ अनुवाद नहीं कर रहा होता, बल्कि वह उस पीड़ित के अस्तित्व को बचाने की जद्दोजहद में खुद को झोंक देता है। यहाँ ‘समानुभूति’ अपने उच्चतम शिखर पर होती है। मनोवैज्ञानिक शोध भी यह सिद्ध करते हैं कि जो लोग एक से अधिक भाषाएँ जानते हैं, उनमें दूसरों के प्रति संवेदनशीलता और दृष्टिकोण को समझने की क्षमता उन लोगों की तुलना में अधिक होती है जो केवल अपनी भाषा के घेरे में सिमटे रहते हैं। यह कविता इस दार्शनिक सत्य को उजागर करती है कि बहुभाषिकता मनुष्य को अपने ‘अहं’ से मुक्त कर ‘पर’ के साथ तादात्म्य बिठाना सिखाती है।

विदित है कि यह संवेदनशीलता और सहिष्णुता ही है जो कवि के शब्दों में एक अनजान जगह को भी ‘बियाबान में एक भाई, बहन या मित्र’ की मौजूदगी में बदल देती है। जिस प्रकार एक बीज अँखुवाता है और जीवन की नई उम्मीदें जगाता है, उसी प्रकार बहुभाषिकता मनुष्य के भीतर मानवीय गुणों को अंकुरित करती है। संघर्षपूर्ण परिस्थितियों में जब दो पक्ष एक-दूसरे की बात समझने को तैयार नहीं होते, तब एक संवेदनशील मध्यस्थ ही वह ‘मानुष शोर’ पैदा करता है जो घोर सन्नाटे और नफ़रत को काट सके। संतोष चतुर्वेदी की कविता का मूल संदेश यही है कि भाषा का विस्तार वास्तव में हृदय का विस्तार है। यदि हम दूसरों की भाषा के प्रति संवेदनशील हैं, तो हम उनके प्रति हिंसक नहीं हो सकते। इसलिए, बहुभाषिकता केवल करियर बनाने का साधन नहीं है, बल्कि यह एक बेहतर और अधिक मानवीय दुनिया के निर्माण का बुनियादी ढाँचा है। जब तक समाज में ऐसे ‘दुभाषिए’ मौजूद हैं जो दूसरों के आँसुओं और मुस्कुराहटों का अनुवाद करने की सक्षमता रखते हैं, तब तक दुनिया में आपसी समझ और शांति की उम्मीदें भी अपने समूचे विस्तार में बची रहेंगी।

‘दुभाषिए’ कविता अस्तित्वगत सुरक्षा (Existential Security) के उस पहलू को भी उजागर करती है, जहाँ भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम न रहकर जीवन और मृत्यु के बीच की एक अनिवार्य कड़ी बन जाती है। कविता में ‘भरोसे’ का जो उल्लेख है, वह कोई साधारण मनोवैज्ञानिक आश्वासन नहीं है, बल्कि एक अनजानी और भयावह दुनिया में मनुष्य के बने रहने की बुनियादी शर्त है। जब हम किसी ऐसे स्थान पर होते हैं जहाँ की ‘सड़कें तक अपरिचित’ हों और जहाँ की ‘लिपि’ हमारे लिए अर्थहीन रेखाओं के समान हो, तब वहाँ हमारा अस्तित्व अत्यंत असुरक्षित और निराश्रित हो जाता है। ऐसी स्थिति में दुभाषिया उस ‘प्रकाश’ की तरह प्रकट होता है जो अजनबीपन के अंधेरे को चीर देता है। वह हमें यह विश्वास दिलाता है कि हम अकेले नहीं हैं और हमारी पुकार व्यर्थ नहीं जाएगी। यह ‘भरोसा’ ही है जो ‘कालिमा भरी रातों’ को काटने की शक्ति देता है, क्योंकि मनुष्य के लिए सबसे बड़ा संकट संवादहीनता और अनसुना कर दिया जाना है।

इस कविता में विपत्ति की घड़ी में दुभाषिए की भूमिका को कवि ने एक ‘जीवन रक्षक प्रणाली’ (Life Support System) के रूप में चित्रित किया है। जब कोई व्यक्ति संकट में होता है और अपनी रक्षा के लिए आवाज़ लगाता है, तो उसकी सबसे बड़ी त्रासदी यह होती है कि उसकी मदद के लिए उपलब्ध लोग उसकी भाषा नहीं समझ पा रहे। यहाँ दुभाषिया केवल शब्दों का अनुवाद नहीं करता, बल्कि वह पीड़ित के ‘आर्तनाद’ को तत्काल क्रिया में बदल देता है। कविता में ‘उसी की भाषा में ज़ोर-ज़ोर से बचाव की आवाज़ बोलते हुए तत्काल घर से निकल पड़ना’— बिम्ब स्पष्ट करता है कि भाषाई ज्ञान एक सक्रिय मानवीय हस्तक्षेप है। यह केवल एक अकादमिक उपलब्धि या डिग्री नहीं है, बल्कि एक ऐसी सामर्थ्य है जो किसी डूबते हुए व्यक्ति को जीवनदान दे सकती है। इस दृष्टि से देखें तो बहुभाषिकता समाज के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह कार्य करती है, जहाँ संकट के समय संवाद के पुल कभी ढहते नहीं हैं।

इस अस्तित्वगत सुरक्षा का विस्तार कवि के शब्दों में  ‘बियाबान में एक भाई, बहन या मित्र’ के होने तक जाता है। यहाँ रचनाकार द्वारा भाषा के संबंध को रक्त-संबंध जैसी आत्मीयता और सुरक्षा से जोड़ दिया गया है। जब दुनिया एक ‘अपरिचय का संसार’ बन जाए, तब किसी का हमारी भाषा में बोलना हमें घर जैसा सुकून देता है। यह सुरक्षा केवल भौतिक नहीं बल्कि भावनात्मक भी है; यह हमें ‘बेफ़िक्र होकर मुस्कुराने’ और ‘बेतकल्लुफ़ी से गाने’ की आज़ादी देती है। यदि मध्यस्थ न हों, तो मनुष्य अपने ही जैसे अन्य मनुष्यों के बीच रहते हुए भी एक भयानक एकाकीपन और असुरक्षा का शिकार हो सकता है। इसलिए , कविता यह निष्कर्ष प्रस्तुत करती है कि मानवता का अस्तित्व इस बात पर टिका है कि हम एक-दूसरे के अर्थों को कितना बचा पाते हैं। दुभाषियों की मौजूदगी यह सुनिश्चित करती है कि जीवन की उम्मीदें ‘अँखुवाए हुए कोने’ की तरह हमेशा हरी रहेंगी, क्योंकि वे जानते हैं कि आपदा और सन्नाटे के समय संवाद ही वह एकमात्र ज़मीन है जिस पर मनुष्य का भविष्य सुरक्षित रह सकता है।

‘दुभाषिए’ कविता को यदि दार्शनिक और आध्यात्मिक चश्मे से देखा जाए, तो यह केवल मानवीय भाषा के अनुवाद की प्रक्रिया नहीं, बल्कि ‘द्वैत’ के बीच ‘अद्वैत’ की स्थापना का एक आध्यात्मिक उपक्रम बन जाती है। कविता की अत्यंत मर्मस्पर्शी पंक्ति – ‘दो के अलावा तीसरे का होना भी ज़रूरी होता है’ – एक गहरा दार्शनिक संकेत देती है। जीवन के अधिकांश द्वंद्व ‘दो’ के बीच होते हैं—मैं और तुम, मेरा और तुम्हारा, मेरी भाषा और तुम्हारी भाषा। यह ‘दो’ का होना अक्सर अहंकार और भिन्नता की दीवारें खड़ी करता है, जहाँ संवादहीनता का ‘घोर सन्नाटा’ एक आध्यात्मिक मृत्यु की भाँति पसर जाता है। यहाँ दुभाषिया वह ‘तीसरा’ तत्त्व है जो समन्वय की धुरी बनता है। वह मध्यस्थता की ऐसी  शक्ति है जो दो अलग-अलग सत्ताओं के बीच के शून्य को भरती है। भारतीय दर्शन के परिप्रेक्ष्य में यह ‘अद्वैत’ की वह अवस्था है जहाँ दो भिन्न संस्कृतियाँ और पहचानें एक-दूसरे में विलीन न होते हुए भी एक-दूसरे को ‘अंकवार’ (आलिंगन) में कस लेती हैं। यह तीसरा तत्त्व वस्तुतः वह प्रेम और बोध है जो टकराते हुए दो पक्षों को एक साझा सत्य की ओर ले जाता है।

दार्शनिक स्तर पर यह कविता स्पष्ट करती है कि संवादहीनता केवल मौन नहीं, बल्कि जड़ता और मृत्यु है। जब हम दूसरे की भाषा के ‘अर्थ’ को नहीं समझ पाते, तो वह हमारे लिए केवल एक वस्तु बन जाता है, ‘मानुष’ नहीं। दुभाषिया उस सन्नाटे को ‘मानुष शोर’ में बदलकर मृतप्राय संबंधों में जीवन का संचार करता है। कवि द्वारा प्रयुक्त ‘मानुष शोर’ यहाँ आध्यात्मिक स्पंदन का प्रतीक है, जो यह सिद्ध करता है कि आत्माएँ केवल तभी संवाद कर पाती हैं जब उनके बीच समझ का कोई साझा धरातल हो। यह ‘तीसरे’ का अस्तित्व वह आध्यात्मिक प्रकाश है जिसे कवि ‘रात का अंजोर’ (अंजोर—प्रकाश) कहता है। जैसे बिना प्रकाश के वस्तुएँ होते हुए भी दिखाई नहीं देतीं, वैसे ही बिना भाषाई मध्यस्थता के मनुष्य एक-दूसरे के सम्मुख होते हुए भी अदृश्य बने रहते हैं। यह दृष्टि इस निष्कर्ष पर पहुँचाती है कि संवाद ही वह ‘अँखुवाया हुआ कोना’ है जहाँ जीवन की उम्मीदें सुरक्षित रहती हैं, क्योंकि जहाँ संवाद है, वहीं विकास और शांति की संभावना है।

अध्यात्मिक दृष्टि से यह कविता ‘परकाया प्रवेश’ की उस साधना का चित्रण करती है जहाँ एक व्यक्ति अपनी मूल पहचान को क्षण भर के लिए गौण कर दूसरे के दुखों को ‘मुरझाए चेहरे’ और खुशियों को ‘सुगंध’ की तरह आत्मसात करता है। यह निस्वार्थ सेवा और समर्पण का भाव है। अनुवाद यहाँ केवल शब्दों का हेर-फेर नहीं, बल्कि एक आत्मा का दूसरी आत्मा के लिए किया गया ‘सांस्कृतिक यज्ञ’ है। वैश्विक भाईचारे का विमर्श यहाँ इसी आध्यात्मिक धरातल पर खड़ा होता है कि पूरी दुनिया एक भाषाई परिवार है। जब दुभाषिया विपरीत दिशाओं से आती राहों को मिलाता है, तो वह वास्तव में विश्व-कल्याण की उस कामना को साकार करता है जहाँ ‘स्व’ और ‘पर’ का भेद मिट जाता है। इस प्रकार, यह कविता अनुवाद के शिल्प से ऊपर उठकर एक विराट दार्शनिक सत्य की घोषणा करती है कि संसार का अस्तित्व केवल ‘होने’ में नहीं, बल्कि ‘जुड़ने’ और ‘समझने’ में है। जब तक यह भाषाई और भावनात्मक सेतु बना हुआ है, तब तक मानवता अपने समूचे विस्तार में बची रहेगी और लिपियाँ अपनी लिखावट के वृंत पर फूलों की तरह निरंतर खिलती रहेंगी।

संतोष चतुर्वेदी की यह कविता अपने शिल्प-सौन्दर्य में जितनी सरल और पारदर्शी दिखाई देती है, अर्थ की परतों में उतनी ही सघन और सुगठित है। इस कविता का शिल्प पारंपरिक छंदबद्धता के बजाय मुक्त छंद की उस लय पर आधारित है, जो बोलचाल की भाषा के करीब रहकर भी एक गहरा कवित्व उत्पन्न करता है। कविता की भाषा में तत्सम, तद्भव और देशज शब्दों का एक ऐसा सुंदर मिश्रण है जो भाषाई पारिस्थितिकी के विषय को भाषाई विविधता के माध्यम से ही पुष्ट करता है। ‘अंकवार’, ‘अंजोर’, ‘अँखुवाया’ और ‘बियाबान’ जैसे शब्द कविता में एक मिट्टी की सोंधी महक और आत्मीयता भर देते हैं, जो दुभाषिए के मानवीय चरित्र को और अधिक विश्वसनीय बनाते हैं। कविता की संरचना में छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग और शब्दों का दोहराव एक विशेष प्रकार का नाद-सौंदर्य पैदा करता है, जिससे ‘भरोसे’ और ‘जुड़ाव’ का भाव प्रगाढ़ होता है।

शिल्प की दृष्टि से इस कविता की सबसे बड़ी शक्ति इसके बिंब विधान में निहित है। कवि ने अमूर्त भावों को मूर्त रूप देने के लिए प्राकृतिक और मानवीय बिंबों का सहारा लिया है। ‘नदियों के दोनों किनारों’ का बिंब इस कविता का केंद्रीय और सबसे सशक्त प्रतीक है। प्रतीकात्मक अर्थ में, ये दो किनारे दो ऐसी संस्कृतियों या समुदायों के प्रतीक हैं जो एक-दूसरे के सम्मुख तो हैं, लेकिन बीच में बहती ‘अजनबीयत की धारा’ के कारण एक-दूसरे से कटे हुए हैं। नदी यहाँ समय और अलगाव की प्रतीक है, जिसे बिना किसी सहारे के पार करना संभव नहीं है। दुभाषिया यहाँ ‘पुल’ के रूप में उभरता है, जो न केवल भौतिक दूरी मिटाता है, बल्कि दो तटों को एक-दूसरे की ‘अंकवार’ (बाँहों) में समेटने का माध्यम बनता है। यह बिंब दर्शाता है कि भाषा का वास्तविक कार्य केवल सूचना पहुँचाना नहीं, बल्कि दो अजनबियों के बीच एक भावनात्मक एकता और आत्मीयता स्थापित करना है।

इसी क्रम में ‘फूलों की सुगंध’ और ‘अकाल की आहट’ के बिंब ‘दुभाषिए’ की संवेदनशीलता को पराकाष्ठा पर ले जाते हैं। ‘फूलों का खिलना सुनकर’—सरीखा काव्यांश इंद्रिय-विपर्यय (Synesthesia) का एक अद्भुत उदाहरण है, जहाँ ‘खिलने’ जैसी दृश्यात्मकता को ‘सुनने’ के माध्यम से व्यक्त किया गया है। इसका प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि दुभाषिया किसी भाषा में व्यक्त सूक्ष्म से सूक्ष्म प्रसन्नता की अनुभूति और उसके पीछे छिपे सांस्कृतिक उल्लास को भी महसूस कर सकता है। जब वह संवाद करता है, तो उसकी बातों से ‘सुगंध’ झड़ती है, जिसे केवल ‘भौंरे’ यानी वे लोग ही महसूस कर सकते हैं जो उस भाषा की गहराई और मिठास के प्रेमी हैं। इसके विपरीत,कवि द्वारा प्रयुक्त  ‘अकाल की आहट’ दुभाषिए के सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। यह बिंब संकेत करता है कि जब दो संस्कृतियों के बीच संवाद टूटता है या भाषाई संकट आता है, तो दुभाषिया सबसे पहले उस अभाव को अपने चेहरे पर महसूस करता है।

कविता के अंत में ‘बीज का अँखुवाया हुआ कोना’ एक अत्यंत अर्थवान प्रतीक है। यह प्रतीक विकास, संभावना और जीवन की निरंतरता को दर्शाता है। जैसे एक छोटे से अंकुर में पूरे वृक्ष का भविष्य छिपा होता है, वैसे ही संवाद की एक छोटी सी शुरुआत में पूरे समाज की सुरक्षा और उम्मीदें छिपी होती हैं। संतोष चतुर्वेदी ने दृश्य, श्रव्य और घ्राण बिंबों के माध्यम से एक ऐसा शिल्प रचा है जो पाठक को केवल विचार नहीं देता, बल्कि उसे उस ‘बियाबान’ और ‘भोर’ के अनुभव से भी गुजारता है। इस प्रकार, ‘दुभाषिए’ कविता अपने प्रतीकों और बिंबों के माध्यम से अनुवाद को एक यांत्रिक प्रक्रिया के बजाय एक सृजनात्मक और जीवंत गतिविधि के रूप में स्थापित करने में सफल है।

वस्तुत:  ‘दुभाषिए’ उस भाषाई दर्शन की काव्यात्मक पुष्टि करने वाली कविता है जिसे दुनिया के बड़े भाषाशास्त्रियों ने दशकों के शोध के बाद प्रतिपादित किया है। भाषाविज्ञान के क्षेत्र में लंबे समय तक यह भ्रांति रही कि ‘एक-भाषिकता’ ही बौद्धिक स्पष्टता का मानक है, किंतु आधुनिक विमर्श ने इसे सिरे से नकार दिया है। एडवर्ड सापीर और बेंजामिन ली व्होर्फ के ‘भाषाई सापेक्षता’ के सिद्धांत के आलोक में देखें तो हर भाषा संसार को देखने का एक विशिष्ट नजरिया देती है। ‘दुभाषिए’ कविता जब ‘आड़ी-तिरछी रेखाओं’ के अर्थवान होने की बात करती है, तो वह इसी विचार को पुष्ट करती है कि एक से अधिक भाषा जानने वाला व्यक्ति वास्तव में एक से अधिक संसारों में जीवित रहता है।

उल्लेखनीय है कि एडवर्ड सापीर (Edward Sapir) और उनके शिष्य बेंजामिन ली व्होर्फ (Benjamin Lee Whorf) द्वारा प्रतिपादित ‘भाषाई सापेक्षता का सिद्धांत’ Linguistic Relativity) या ‘सापीर- व्होर्फ  हाइपोथीसिस’ ( ‘Sapir-Whorf Hypothesis’) कहा जाता है, इस विचार पर आधारित है कि हमारी भाषा केवल विचारों को व्यक्त करने का साधन मात्र नहीं है, बल्कि वह हमारे सोचने के ढंग और विश्वदृष्टि को भी आकार देती है। इस अवधारणा के अनुसार, किसी व्यक्ति की मातृभाषा की संरचना यह निर्धारित करती है कि वह दुनिया का अनुभव और बोध किस प्रकार करता है; अर्थात भिन्न-भिन्न भाषाओं को बोलने वाले लोग वास्तविकता को भी भिन्न दृष्टिकोण से देखते हैं। व्होर्फ ने तर्क दिया कि भाषा हमारे लिए मानसिक श्रेणियों का निर्माण करती है, जिससे समय, स्थान और पदार्थों का हमारा वर्गीकरण प्रभावित होता है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी भाषा में रंग या समय के लिए विशिष्ट शब्द अधिक हैं, तो उस भाषा के बोलने वाले उन सूक्ष्म अंतरों को अधिक स्पष्टता से पहचान पाते हैं जो दूसरी भाषा के बोलने वालों के लिए गौण हो सकते हैं। संक्षेप में, यह सिद्धांत यह प्रतिपादित करता है कि भाषा मानव संज्ञान (cognition) का आधार है और हमारी वैचारिक सीमाओं को हमारी भाषाई सीमाएं तय करती हैं।

आधुनिक भाषाशास्त्री विवियन कुक (Vivian Cook) ने ‘मल्टी-कॉम्पिटेंस’ का सिद्धांत दिया है , जो बताता है कि बहुभाषी व्यक्ति का मस्तिष्क एक-भाषी व्यक्ति की तुलना में अधिक लचीला और रचनात्मक होता है। कविता में ‘भोर होना’ और ‘अंजोर होना’ इसी बौद्धिक और चेतनागत विस्तार के प्रतीक हैं। ‘मल्टी-कॉम्पिटेंस’ (Multi-competence) का सिद्धांत इस पारंपरिक धारणा को सिरे से खारिज करता है कि एक बहुभाषी व्यक्ति के मस्तिष्क में दो भाषाएँ अलग-अलग खानों में बंद रहती हैं। कुक का तर्क है कि एक बहुभाषी व्यक्ति का मन केवल दो एक-भाषियों (two monolinguals) का जोड़ मात्र नहीं है, बल्कि वह एक एकीकृत और जटिल मानसिक तंत्र है जहाँ सभी भाषाएँ एक-दूसरे के साथ निरंतर संवाद करती हैं। इस ‘समग्र मानसिक अवस्था’ के कारण बहुभाषी मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार का लचीलापन विकसित हो जाता है, जिसे कुक संज्ञानात्मक लाभ (cognitive advantages) के रूप में देखते हैं। चूँकि बहुभाषी व्यक्ति को लगातार दो भिन्न भाषा-प्रणालियों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है और संदर्भ के अनुसार एक को दबाकर दूसरी को चुनना पड़ता है, इसलिए उसका मस्तिष्क एक-भाषी (मोनोलिन्गुअल) की तुलना में सूचनाओं को संसाधित (process) करने में अधिक सक्षम हो जाता है। विवियन कुक के अनुसार, यह प्रक्रिया बहुभाषियों को ‘मेटा-लिंग्विस्टिक अवेयरनेस’ यानी भाषा की संरचना को समझने की गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान करती है, जिससे उनकी सोचने की क्षमता अधिक मौलिक और रचनात्मक बनती है। वे किसी भी समस्या को देखने के लिए केवल एक भाषाई चश्मे तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनके पास अवधारणाओं को समझने के लिए एक व्यापक और अधिक लचीला फलक होता है।

भारत के संदर्भ में इस मुद्दे पर सबसे गंभीर और प्रामाणिक कार्य गणेश नारायण देवी और देवी प्रसन्न पट्टनायक का है। देवी प्रसन्न पट्टनायक (D.P. Pattanayak) ने निरंतर यह तर्क दिया कि भारत में बहुभाषिकता शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का आधार है। उनके अनुसार, पश्चिमी देशों के लिए ‘एक राष्ट्र, एक भाषा’ का मॉडल हो सकता है, लेकिन भारत के लिए ‘बहुभाषिकता’ ही राष्ट्रीय एकता का वास्तविक सूत्र है। कविता में ‘नदियों के दोनों किनारों को एकमेक करने’ का बिंब भारत की इसी साझी और पारगम्य संस्कृति का चित्रण है जिसे पट्टनायक जी ने ‘भाषाई लोकतंत्र’ के रूप में परिभाषित किया। वहीं गणेश नारायण देवी (G.N. Devy) के ‘पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया’ ने यह उजागर किया कि भारत में बहुभाषिकता केवल एक कौशल नहीं, बल्कि एक ‘विश्व-दृष्टि’ है। गणेश देवी का अध्ययन स्पष्ट करता है कि जब कोई भाषा मरती है, तो उस समुदाय का पूरा ज्ञान-तंत्र भी मरता है। ‘दुभाषिए’ कविता में ‘अकाल की आहट’ पाकर दुभाषिए का चेहरा मुरझा जाना, दरअसल गणेश देवी द्वारा रेखांकित उसी भाषाई क्षरण की त्रासदी की कलात्मक पुनर्रचना है ।

फ्रांस्वा ग्रोजीन (François Grosjean) और एलन बियालीस्टोक (Ellen Bialystok) जैसे विद्वानों के शोध भी बताते हैं कि बहुभाषिकता मस्तिष्क को उम्र के साथ होने वाले क्षरण से बचाती है और उस ‘भरोसे’ को सुदृढ़ करती है जिसका उल्लेख कविता में है। वस्तुत: ये दोनों विद्वान मानते हैं कि बहुभाषिकता केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि मस्तिष्क के लिए एक उत्कृष्ट व्यायाम भी है। एलन बियालीस्टोक का शोध मुख्य रूप से ‘संज्ञानात्मक आरक्षित निधि’ (Cognitive Reserve) की अवधारणा पर केंद्रित है, जो यह बताता है कि दो या दो से अधिक भाषाओं का निरंतर उपयोग मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को इतना सुदृढ़ कर देता है कि वह बुढ़ापे में होने वाले मानसिक क्षरण और डिमेंशिया या अल्जाइमर जैसी बीमारियों के लक्षणों को चार से पांच साल तक टाल सकता है। यह सुरक्षा कवच इसलिए निर्मित होता है क्योंकि एक बहुभाषी व्यक्ति का मस्तिष्क लगातार एक भाषा से दूसरी भाषा में स्विच करने और अप्रासंगिक भाषा को रोकने (Inhibition) की जटिल प्रक्रिया में लगा रहता है, जिससे मस्तिष्क की ‘कार्यकारी नियंत्रण प्रणाली’ (‘एग्जीक्यूटिव कंट्रोल सिस्टम’) अधिक लचीली और शक्तिशाली हो जाती है। दूसरी ओर, फ्रांस्वा ग्रोजीन ने बहुभाषिकता के ‘समग्र दृष्टिकोण’ (Holistic View) पर बल देते हुए यह स्पष्ट किया है कि बहुभाषी व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के अनुसार अपनी भाषाओं को सक्रिय या निष्क्रिय करने की अद्भुत क्षमता रखते हैं, जो उन्हें मानसिक रूप से अधिक सुग्राह्य बनाता है। इन विद्वानों के निष्कर्ष उस ‘भरोसे’ या ‘विश्वास’ को पुख्ता करते हैं जो ‘दुभाषिए’ कविता में रेखांकित है—कि भाषाएँ आपस में टकराती नहीं बल्कि एक-दूसरे को सहारा देती हैं। यह वैज्ञानिक प्रमाण सिद्ध करता है कि एक से अधिक भाषाओं का ज्ञान मनुष्य को न केवल सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करता है, बल्कि शारीरिक और संज्ञानात्मक स्तर पर भी एक प्रकार की आंतरिक सुरक्षा और जीवंतता प्रदान करता है, जो समय की मार के विरुद्ध मस्तिष्क को अधिक टिकाऊ और भरोसेमंद बनाती है।

‘दुभाषिए’ कविता में जब कवि कहता है कि ‘इनके होने से हमेशा एक भरोसा रहता है’, तो प्रकारांतर से वह भाषाई बाधाओं के टूटने से पैदा होने वाली सामाजिक सुरक्षा की ओर संकेत करता है। गणेश देवी और डी.पी.पट्टनायक, दोनों के चिंतन का साझा बिंदु यही है कि भारत की भाषाई शक्ति ‘सह-अस्तित्व’ में है, न कि ‘एकरूपता’ में। उनके अनुसार, भारत एक ऐसा देश है जहाँ एक व्यक्ति अपनी पहचान बदले बिना कई भाषाओं में निवास करता है। यहाँ दुभाषिया केवल वह नहीं जो दफ्तरों में बैठता है, बल्कि हर वह नागरिक है जो बाज़ार, तीर्थस्थलों और उत्सवों में एक भाषा के अर्थ को दूसरी संस्कृति तक लगातार पहुँचाता रहता है।

इतना ही नहीं, यह कविता चोमस्की की ‘सहज सक्षमता’ और भारतीय विद्वानों के ‘भाषाई विमर्श’ को भी अपने भीतर समेटे हुए है। यह रचना चेतावनी देती है कि यदि हमने बहुभाषिकता के इस ‘सांस्कृतिक सेतु’ को खो दिया, तो हम उस ‘बियाबान’ में अकेले रह जाएंगे जहाँ संवाद की हर खिड़की बंद होगी। भारत के लिए बहुभाषिकता राष्ट्रीय एकता का वह ‘अँखुवाया हुआ कोना’ है, जो यह सुनिश्चित करता है कि अलग-अलग लिपियों के बावजूद हमारी ‘लिखावट के वृंत’ एक ही जीवन-रस से सिंचित होते रहें। संतोष चतुर्वेदी की यह रचना वैश्विक भाषाशास्त्र और पट्टनायक व गणेश देवी जैसे विचारकों के उन गंभीर निष्कर्षों का सरल मानवीय कवित्वपूर्ण पुनर्संयोजन है, जो संवाद को ही मनुष्यता की अंतिम रक्षा पंक्ति मानते हैं।

‘दुभाषिए’ कविता जिस ‘पुल’ और ‘अँखुवाए हुए कोने’ की बात करती है, वह आधुनिक भारत के संदर्भ में अंग्रेज़ी भाषा की भूमिका पर एक नई बहस छेड़ती है। जहाँ मातृभाषा व्यक्ति की जड़ों और उसकी प्राथमिक संवेदनाओं को सींचती है, वहीं अंग्रेज़ी भाषा ने भारत में एक ऐसे सशक्त माध्यम की भूमिका निभाई है जिसने सामाजिक और आर्थिक गतिशीलता के बंद दरवाजों को खोलने का काम किया है। भाषाशास्त्रीय अध्ययनों और विशेषकर भारत के दलित व वंचित वर्गों के विमर्श के आलोक में देखें, तो अंग्रेज़ी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक राजनैतिक और सामाजिक हथियार के रूप में उभरी है।

चंद्रभान प्रसाद एवं कांचा इल्लैया जैसे अंबेडकरवादी विद्वान बार-बार इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि अंग्रेज़ी भारत के निचले तबके और दलितों के लिए ‘मुक्ति की भाषा’ (Language of Emancipation) है। इल्लैया का तर्क है कि जहाँ पारंपरिक भारतीय भाषाएँ और उनकी लिपियाँ कई बार जातिगत सोपानों और ऐतिहासिक पूर्वाग्रहों से बोझिल रही हैं, वहीं अंग्रेज़ी एक ‘तटस्थ’ धरातल प्रदान करती है। उनके अनुसार, दलित और पिछड़े वर्ग के बच्चों के लिए अंग्रेज़ी का ज्ञान उन्हें उस वैश्विक ज्ञान-परंपरा और रोज़गार के अवसरों से जोड़ता है जहाँ उनकी जाति नहीं, बल्कि उनकी योग्यता की पहचान होती है। यह कविता के उस ‘भरोसे’ और ‘सुरक्षा’ के बिंब जैसा ही है, जो व्यक्ति को अजनबी और असुरक्षित परिवेश में भी खड़ा होने का साहस देता है।

देवी प्रसन्न पट्टनायक और गणेश नारायण देवी के बहुभाषिकता के सिद्धांतों को यदि ज़मीनी हक़ीक़त से जोड़कर लागू किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि बच्चों को मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा देना उनके संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development) के लिए अपरिहार्य है। मातृभाषा वह ‘अँखुवाया हुआ कोना’ है जहाँ बच्चा सबसे पहले सोचना और महसूस करना सीखता है। किंतु, एक ख़ास उम्र के बाद—जब बच्चा अपनी मातृभाषाई जड़ों में मज़बूत हो जाए—उसके लिए गुणवत्तापूर्ण अंग्रेज़ी शिक्षा की अनिवार्य उपलब्धता सामाजिक न्याय का प्रश्न बन जाती है। आज के डिजिटल और वैश्वीकृत युग में अगर ग़रीब तबके के बच्चों को अंग्रेज़ी से वंचित रखा जाता है, तो यह उन्हें भाषाई रूप से ‘अक्षम’ बनाकर एक नए प्रकार के ‘औपनिवेशिक विभाजन’ को जन्म देता है।

अंग्रेज़ी की सकारात्मक भूमिका इस अर्थ में भी है कि इसने भारत के अलग-अलग भाषाई क्षेत्रों के बीच एक सम्पर्क भाषा या ‘लिंक लैंग्वेज’ का काम किया है। डॉ. बी.आर. अंबेडकर स्वयं अंग्रेज़ी के प्रबल समर्थक थे, क्योंकि वे जानते थे कि यह भाषा वैश्विक विमर्श, आधुनिक विज्ञान और मानवाधिकारों के कानूनी ढाँचे तक पहुँचने का सबसे तेज़ रास्ता है। निम्न वर्ग और ग़रीब तबके के लिए अंग्रेज़ी शिक्षा की अनिवार्यता इसलिए भी ज़रूरी है ताकि ज्ञान का लोकतंत्र केवल विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग तक सीमित न रहे। जब एक ग़रीब परिवार का बच्चा अच्छी अंग्रेज़ी सीखता है, तो वह कविता के उस ‘दुभाषिए’ की तरह बन जाता है जो अपनी वंचित पृष्ठभूमि के दुखों और ‘अकाल की आहटों’ को वैश्विक मंच पर प्रभावी ढंग से अनूदित कर सकता है।

‘दुभाषिए’ कविता में जिस ‘पुल’ और ‘भरोसे’ की बात की गई है, वह ऐतिहासिक रूप से भारत की ज्ञान-परंपरा और सामाजिक संरचना का आधार रहा है। प्राचीन काल में जिस प्रकार संस्कृत ने विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों और दार्शनिकों के बीच एक साझा संवाद तंत्र विकसित किया और मध्यकाल में फ़ारसी ने प्रशासनिक एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान की सम्पर्क भाषा या ‘लिंक लैंग्वेज’ की भूमिका निभाई, उसी भाषाई सातत्य में आज अंग्रेज़ी की भूमिका को देखा जाना चाहिए। कविता जब कहती है कि ‘दो के अलावा तीसरे का होना भी ज़रूरी होता है’, तो यह कहीं न कहीं आधुनिक भारत के संदर्भ में एक सर्वमान्य संपर्क भाषा की उस अनिवार्य उपस्थिति की ओर संकेत करता है जो विभिन्न भाषा-भाषी राज्यों की शिक्षित जनता को एक सूत्र में जोड़ सके और कहना न होगा कि मौजूदा स्थिति में यह भाषा अंग्रेज़ी ही हो सकती है। अंग्रेज़ी भाषा  इस भूमिका को नकार देना न केवल अकादमिक अदूरदर्शिता होगी, बल्कि यह उन सामाजिक और वैश्विक अवसरों के दरवाज़े को बंद करने जैसा होगा जो संवाद के अभाव में ‘घोर सन्नाटे’ में बदल सकते हैं।

इस भाषाई विमर्श में कांचा इल्लैया जैसे अंबेडकरवादी विचारक इसी आधार पर अंग्रेज़ी को ‘मुक्ति की भाषा’ कहते हैं, क्योंकि यह भाषा जातिगत और क्षेत्रीय संकीर्णताओं के बीच एक ऐसा ‘सांस्कृतिक सेतु’ निर्मित करती है जो दलितों और पिछड़ों को वैश्विक विमर्श के बराबर खड़ा करता है। कविता में उल्लेखित ‘अँखुवाया हुआ कोना’ तभी मज़बूत होगा जब एक ग़रीब छात्र की अपनी पहचान (मातृभाषा) सुरक्षित रहे और साथ ही उसके पास वह ‘भाषा’ भी हो जिससे वह दुनिया के ‘अपरिचय के संसार’ में रास्ता खोज सके।

यदि समाज के सभी तबकों के लिए गुणवत्तापूर्ण अंग्रेज़ी शिक्षा की समान उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की जाती, तो यह कविता के उस ‘बियाबान’ की तरह होगा जहाँ ज्ञान और सत्ता केवल एक खास वर्ग तक सीमित रह जाएगी। मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा बच्चे के मानसिक और संवेदनात्मक विकास के लिए अपरिहार्य है, ताकि उसके अनुभवों की ‘सुगंध’ और ‘खिलखिलाहट’ बनी रहे, किंतु एक निश्चित आयु के बाद अच्छी अंग्रेज़ी शिक्षा उसे वह ‘मानुष शोर’ और ‘अंजोर’ प्रदान करती है जिससे वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात कह सके।

‘दुभाषिए’ कविता की यह चिंता कि ‘हमारी बातें भी समझी जा सकेंगी’, तभी फलीभूत होगी जब हम अंग्रेज़ी को एक औपनिवेशिक बोझ के बजाय एक ऐसी ‘जीवन रक्षक प्रणाली’ और ‘सेतु’ के रूप में स्वीकार करेंगे जो भारत की भाषाई विविधता को वैश्विक विस्तार देने की सामर्थ्य रखती है। यही वह संतुलन है जिस पर आज जीवन और विकास की उम्मीदें कायम हैं।

कुल मिलाकर, संतोष चतुर्वेदी की ‘दुभाषिए’ कविता की यह चिंता कि ‘हमारी बातें भी समझी जा सकेंगी उस भाषा में जिसकी लिपि आड़ी-तिरछी लगती है’, मातृभाषा के साथ साथ गुणवत्तापूर्ण अंग्रेज़ी शिक्षा के माध्यम से ही सार्थक हो सकती है। राजनीतिक या मनोवैज्ञानिक कारणों से यह बात भले ही कुछ लोगों को पसंद न आए  ,पर सचाई यही है कि मातृभाषा और अंग्रेज़ी का समन्वय ही वह ‘पुल’ है जो भारत के निम्न वर्ग को अपनी पहचान बचाए रखते हुए आधुनिक दुनिया के साथ ‘अंकवार’ भरने की सक्षमता प्रदान करेगा। यह भाषाई संतुलन ही वास्तविक राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समता का आधार बन सकता है। हमारे देश की एक विशेष प्रकार की ऐतिहासिक- सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति के मद्देनज़र नागरिकों के लिए उनकी मातृभाषा और अंग्रेज़ी के अलावा किसी अन्य भाषा की जानकारी का अनिवार्य के बजाए ऐच्छिक होना देश में शान्ति, सुव्यवस्था और राजनीतिक स्थिरता के हित में है ।


संदर्भ

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Ethnologue. ‘Ethnologue: Languages of the World’. SIL International, annual editions.


रवि रंजन

जन्म :  1962, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार

शिक्षा :   पी-एच.डी.

रूचि के क्षेत्र :  भक्तिकाव्य,  आधुनिक हिन्दी कविता,  आलोचना,  साहित्य का समाजशास्त्र,

प्रकाशित कृतियाँ :   ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’,  ‘सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन,दिल्ली (2011),  ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’ (2012),वाणी प्रकाशन, ‘वारसा डायरी’(2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’(2026), वाणी प्रकाशन, दिल्ली

विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में सौ से अधिक आलेख प्रकाशित.

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भागीदारी.

‘वारसा डायरी’ के लिए ‘जयपुर साहित्य सम्मान  (2023)

प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय,बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा स्थापित पीठ (चेयर) पर विजिटिंग प्रोफ़ेसर

प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवा निवृत्त), हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद  ई.मेल. :  raviranjan@uohyd.ac.in मो.9000606742

 

 

 

 


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