‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में हम वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन का एक विशद, गंभीर और शोधपूर्ण आलेख “कोलाहल से संसृति तक : कुंवर नारायण की ‘माध्यम’ कविता का सौन्दर्यशास्त्र” प्रकाशित कर रहे हैं। यह आलेख कुंवर नारायण की महत्त्वपूर्ण कविता ‘माध्यम’ के बहाने केवल एक रचना का आस्वादन भर नहीं कराता, बल्कि आधुनिक साहित्य-शास्त्र, पाश्चात्य भाषा-दर्शन और भारतीय काव्यशास्त्र की बहुआयामी कसौटियों पर एक साथ गतिमान होता है। आलोचक ने बेहद सूक्ष्मता के साथ सोस्युर के यादृच्छिक संकेतक-सिद्धांत, देरिदा के विखंडनवाद, उम्बर्टो इको और वोल्फगैंग आइज़र के ‘पाठक-अनुक्रिया सिद्धांत’ (Reader-Response Criticism), सार्त्र व कामू के अस्तित्ववादी एकांत तथा थेओडोर अडोर्नो व वाल्टर बेंजामिन के सौंदर्यशास्त्र को एक सूत्र में पिरोया है। इसके साथ ही, भारतीय दर्शन के ‘शब्द-ब्रह्म’, भर्तृहरि के ‘स्फोट सिद्धांत’ और मार्टिन बुबर के ‘आई-दाउ’ (I-Thou) संबंध के आलोक में इस बात की सांगोपांग पड़ताल की गई है कि कैसे ‘माध्यम’ कविता बाह्य यथार्थ की सतही रिपोर्टिंग से आगे बढ़कर चेतना का आंतरिक कायांतरण करती है।
आलेख का सबसे प्रखर और सामयिक पक्ष वह है जहाँ लेखक अज्ञेय के ‘मौन’, मुक्तिबोध के ‘अभिव्यक्ति-संकट’ और टी. एस. इलियट की ‘सभ्यतागत निराशा’ (The Waste Land) के साथ कुंवर नारायण की तुलना करते हुए यह सिद्ध करते हैं कि कुंवर नारायण निराशा या विध्वंस पर जाकर नहीं रुकते। वे बाह्य कोलाहल को अपने ‘आंतरिक आकाश’ में धारण करके, भाषा के जर्जर ढाँचों को तोड़ते हैं और अंततः ‘पूजा के दूभ-सी कोमल, नीहार-धुली नई संसृति’ तथा ‘बाल-मानवता के स्वाभाविक सपनों’ की सात्विक शांति तक पहुँचते हैं।
हमें पूरा विश्वास है कि ‘रचना समय’ के प्रबुद्ध पाठकों, शोधार्थियों और सुधी आलोचकों के लिए प्रो. रवि रंजन का यह आलेख अपने अकादमिक अनुशासन, विश्लेषणात्मक तटस्थता और भाषा की आत्मीय प्रौढ़ता के कारण कुंवर नारायण के काव्य-संसार को समझने के लिए एक अनिवार्य संदर्भ-सामग्री (Reference Point) का काम करेगा और एक नए वैचारिक और सौंदर्यशास्त्रीय विमर्श का द्वार खोलेगा।
— हरि भटनागर
कोलाहल से संसृति तक : कुंवर नारायण की ‘माध्यम’ कविता का सौन्दर्यशास्त्र
रवि रंजन
आधुनिकता का त्रासद अनुभव मूलतः चेतना के विखंडन और संवाद के अवसाद का अनुभव है। जिस यांत्रिक सभ्यता ने मनुष्य को बाह्य सुखों का विशाल संसार सौंपा, उसी ने उसकी आंतरिक सूक्ष्मता, संवेदनशीलता और निश्छल बाल-सुलभ विस्मय को छीनकर उसे सामाजिक-सांस्कृतिक कोलाहल के अथाह गर्त में धकेल दिया। इस कोलाहल में केवल बाह्य ध्वनियों का शोर नहीं है, बल्कि बाज़ारवाद की होड़, विचारहीन वैचारिक टकराव, हिंसक प्रतिस्पर्धा और आधुनिक जीवन का वह बिखराव शामिल है जिसे दार्शनिक युर्गन हाबरमास ‘जीवन-जगत का उपनिवेशीकरण’ और हरबर्ट मार्क्यूज़ ‘एक-आयामी अस्तित्व’ कहते हैं। ऐसे दौर में जब साहित्य और कलाएँ प्रायः इस कोलाहल से मुँह मोड़कर किसी एकांत शरणस्थली की ओर पलायन करने लगती हैं, तब कुंवर नारायण की ‘माध्यम’ कविता एक नए और प्रखर दार्शनिक विवेक के साथ उपस्थित होती है। कविता का यह दार्शनिक विवेक कोलाहल का प्रत्यक्ष अस्वीकार नहीं करता, न ही वह किसी काल्पनिक अतीत या शून्य में शरण लेता है; बल्कि वह उस कोलाहल को अपनी आत्मिक चेतना के ‘आंतरिक आकाश’ में धारण करके, उसे सृजनात्मक ऊर्जा और अर्थ-दीप्ति में बदलने का दुष्कर यत्न करता है। यह रूपांतरण ही कविता का वह सामाजिक-सांस्कृतिक सेतु है जहाँ बाह्य जगत की अशांति भाषा और सौंदर्य की भट्टी में तपाकर ‘सात्विक शांति’ में ढलने लगती है। कुंवर नारायण के यहाँ भाषा केवल विचारों के संप्रेषण का माध्यम नहीं है, बल्कि वह अस्तित्व का वह पवित्र स्थान है जहाँ विकृत हो चुके सामाजिक संबंधों का पुनर्निर्माण संभव होता है। ‘कोलाहल के रूपांतरण’ की इसी दार्शनिक प्रक्रिया से आगे बढ़कर कविता ‘संवेद्य संसृति’ की खोज की ओर अग्रसर होती है। ‘पूजा के दूभ-सी कोमल’ और ‘नीहार-धुली’ यह संसृति मशीनी जटिलताओं के बरक्स ‘बाल-मानवता के स्वाभाविक सपनों’ को पुनर्स्थापित करने का एक अहिंसक और सात्विक संकल्प है। यह संकल्प केवल सौंदर्यशास्त्रीय कौतूहल नहीं, बल्कि गांधीवादी ‘सात्विक शांति’ और हाइडेगर के ‘सत्य के अनावरण’ का वह मिला-जुला मानवीय धरातल है, जहाँ शब्द मनुष्य के सौम्य भाव को स्पर्श करते हैं और समाज अपनी गँवाई हुई मौलिक मासूमियत को पुनः प्राप्त करता है। यह आलेख कुंवर नारायण की ‘माध्यम’ कविता के इसी दार्शनिक पृष्ठभाग की पड़ताल करता है, जहाँ कविता भाषा की सीमाओं से परे जाकर एक विवेकशील, संवेदनशील और करुणापूर्ण समाज की रचना का आलेख बन जाती है।
कविता का मूल पाठ द्रष्टव्य है :
माध्यम
वस्तु और वस्तु के बीच भाषा है
जो हमें अलग करती है,
मेरे और तुम्हारे बीच एक मौन है
जो किसी अखंडता में हमको मिलाता है :
एक दृष्टि है जो संसार से अलग
असंख्य सपनों को झेलती है,
एक असन्तुष्ट चेतना है जो आवेश में पागलों की तरह
भाषा को वस्तु मान, तोड़-फोड़ कर
अपने एकांत में बिखरा लेती है
और फिर किसी सिसकते बालक की तरह कातर हो
भाषा के उन्हीं टुकड़ों को पुनः
अपने स्खलित मन में समेटती है, सँजोती है,
और जीवन को किसी नए अर्थ में प्रतिष्ठित करती है ।
जीवन से वही मेल रोज़ धीरे धीरे,
कर न दे मलिन
आत्मदर्पण अति परिचय से;
ऊब से, थकन से, बचा रहे…
रहने दो अविज्ञात बहुत कुछ….
चाँद और सूनी रातों का बूढ़ा कंकाल,
कुछ मुर्दा लकीरें
कुछ गिनी-चुनी तसवीरें,
जो मैं तुम्हें देता हूँ
पुरानी चौहद्दी की सीमा-रेखाएँ हैं,
पर मैं प्रकाश का वह अन्तःकेन्द्र हूँ
जिससे गिरने वाली वस्तुओं की छायाएँ बदल सकती हैं !
हाड़-सी बिजलियों की तरह अकस्मात
अपनी पंक्तियों में भभककर
मैं संसार को नंगा ही नहीं करता,
बल्कि अस्तित्व को दूसरे अर्थों में भी प्रकाशित करता हूँ
मेरे काव्य के इन मानस परोक्षों से
एक अपना आकाश रचो,
मेरे असन्तुष्ट शब्दों को लो
और कला के इस विदीर्ण पूर्वग्रह मात्र को
सौन्दर्य का कोई नया कलेवर दो,
(क्योंकि यही एक माध्यम है जो सदा अक्षुण्ण है)
शब्दों से घनिष्टता बढ़ने दो
कि उनकी एक अस्फुट लहक तुम्हारे सौम्य को छू ले
और तुम्हारी विशालता मेरे अदेय को समझे :
स्वयंसिद्ध आनन्द के प्रौढ़ आलिंगन में
समा जाय ऋचाओं की गूँज-सा आर्यलोक,
पूजा के दूभ-सी कोमल नीहार-धुली
दुधमुँही नई नई संसृति को
बाल-मानवता के स्वाभाविक सपनों तक आने दो …
एक सात्विक शान्ति
प्रभात के सहज वैभव में थम जाय,
असह्य सौन्दर्य विस्मय की परिधि में
अकुला दे प्राणों को मीठे मीठे …
ऐ अजान,
तुम तक यदि मेरा भावोद्वेल पहुँचे,
तो इस कोलाहल को अपने आकाशों में भरसक अपनाना;
तुम्हें आश्चर्य होगा यह जानकर
कि कवि तुम हो…
और मैं केवल कुछ निस्पृह तत्वों का एक नया समावेश,
तुम्हारी कल्पना के आसपास मँडलाता हुआ
जीवन की सम्भावनाओं का एक दृढ़ संकेत ….
–कुंवर नारायण : ‘चक्रव्यूह
‘माध्यम’ कविता भाषा, अर्थ और चेतना के अंतरसंबंधों को भाषा-दर्शन और उत्तर-संरचनावादी कसौटियों पर बेहद सूक्ष्मता से विश्लेषित करने का एक दुर्लभ अवसर देती है। फर्दिनांद द सोस्युर और जाक देरिदा जैसे विचारकों द्वारा प्रस्तावित सिद्धांतों को यदि हम इस पाठ के भीतर से समझें, तो यह कविता केवल काव्य-अनुभूति का बयान न रहकर भाषा के स्वभाव और उसकी सीमाओं पर एक गहरा आत्म-विमर्श बन जाती है। सोस्युर ने भाषा-विज्ञान में यह स्थापित किया था कि शब्द अर्थात संकेतक (Signifier) और उसका अर्थ या वस्तु अर्थात संकेतित (Signified) का संबंध पूरी तरह से यादृच्छिक होता है। शब्द कभी भी स्वयं वस्तु नहीं होता, बल्कि वह वस्तु की अनुपस्थिति को दर्ज करने वाला एक स्थानापन्न प्रतीक मात्र है। जब कुंवर नारायण कविता में लिखते हैं कि ‘वस्तु और वस्तु के बीच भाषा है जो हमें अलग करती है’, तो वे इसी भाषाई मध्यस्थता और दूरी की ओर इशारा करते हैं। भौतिक जगत में भाषा यथार्थ को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने के बजाय उसे श्रेणियों और प्रतीकों में बाँट देती है; यही विभाजन मनुष्य को वस्तु-जगत से और एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से अलग करता है। इसके ठीक बरक्स ‘मेरे और तुम्हारे बीच एक मौन है जो किसी अखंडता में हमको मिलाता है’ पंक्ति उस अवस्था को रेखांकित करती है जहाँ शब्दों का यादृच्छिक जाल पूरी तरह गिर जाता है और दो चेतनाएं बिना किसी संकेतक के सीधे आत्मिक संबंध में प्रवेश करती हैं। यह मौन भाषा की निर्मिति से परे जाकर सीधे सत्तात्मक अखंडता को छूने का प्रयास है।
आगे चलकर उत्तर-संरचनावाद और देरिदा के विखंडनवाद (Deconstruction) की छाया इस कविता के केंद्रीय सर्जनात्मक संकट में स्पष्ट दिखाई देती है। विखंडनवाद का मानना है कि भाषा में कोई भी अर्थ स्थिर, अंतिम या सार्वकालिक नहीं होता, बल्कि अर्थ निरंतर टलता रहता है। किसी भी नए और जीवंत अर्थ के निर्माण के लिए भाषा के स्थापित, रूढ़ और जड़ ढाँचों का टूटना अनिवार्य होता है। कविता में जब असंतुष्ट चेतना आवेश में आकर भाषा को ही एक ठोस वस्तु मानकर उसे तोड़ती-फोड़ती है और अपने एकांत में बिखरा देती है, तो यह वस्तुतः भाषाई संरचनाओं का विखंडन ही है। यह असंतुष्ट चेतना उस सर्जक की चेतना है जो पारंपरिक अर्थ-प्रणालियों, व्याकरणिक चौहद्दियों और सामाजिक पूर्वाग्रहों से असहमत है। वह भाषा को रूढ़ियों से मुक्त करने के लिए उसके प्रचलित रूपों का ध्वंस करती है। लेकिन यह तोड़-फोड़ केवल एक नकारात्मक प्रक्रिया नहीं है; विखंडन के तुरंत बाद एक अत्यंत कातर और सिसकते बालक जैसी भावुकता के साथ उन्हीं टुकड़ों को अपने स्खलित मन में सहेजने और समेटने की कोशिश शुरू होती है। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि सृजन दरअसल भाषा के मलबे से ही नए अर्थ को जन्म देने का नाम है। टूटे हुए संकेतों को जब नए ढंग से पिरोया जाता है, तभी जीवन किसी नए अर्थ में प्रतिष्ठित हो पाता है।
भाषा-दर्शन में जब कोई शब्द लगातार इस्तेमाल से घिस जाता है, तो वह अपना मूल रस खोकर एक निर्जीव ढाँचा बन जाता है। इस यांत्रिक जड़ता से बचने के लिए कवि जीवन में अति-परिचय को घातक मानता है। रोज़मर्रा के एकरस मेल-जोल से आत्मदर्पण के मलिन होने का डर बना रहता है, इसलिए कविता में ‘अविज्ञात रहने दो बहुत कुछ’ का आग्रह एक गहरे दार्शनिक विवेक से उपजता है। यदि सब कुछ पूरी तरह से परिभाषित और भाषा के सीमित घेरे में कैद कर दिया जाएगा, तो जीवन में ऊब और थकान का आना तय है। अर्थ का कुछ हिस्सा हमेशा अमूर्त, अनछुआ और रहस्यमय बना रहना चाहिए, क्योंकि वही अस्पष्टता और अविज्ञात का होना नए अर्थ-उत्पादन की गुंजाइश को ज़िंदा रखता है। पुरानी चौहद्दियों, सूनी रातों के कंकालों और मुर्दा लकीरों का ज़िक्र कला और भाषा के उन घिसे-पिटे बिंबों की ओर संकेत करता है जो अब अर्थ देने में असमर्थ हैं। कवि स्वयं को अर्थ-निर्माण का वह आंतरिक केंद्र स्वीकार करता है जहाँ से टकराकर पुरानी वस्तु-प्रणाली की छायाएं और उनके रूढ़ अर्थ बदलने लगते हैं।
पाठक-अनुक्रिया सिद्धांत अर्थात रीडर-रिस्पॉन्स क्रिटिसिज्म बीसवीं शताब्दी के साहित्यालोचन में आई एक ऐसी युगांतरकारी क्रांति है जिसने साहित्य के अध्ययन का केंद्र-बिंदु ही बदल दिया। वोल्फगैंग आइज़र, हंस रॉबर्ट जाउस, स्टेनली फिश और उम्बर्टो इको जैसे विचारकों ने यह स्पष्ट किया कि कोई भी पाठ अपने आप में अधूरा होता है। जब तक पाठक अपनी व्यक्तिगत संवेदना, सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और भाषाई समझ के साथ पाठ के साथ नहीं जुड़ता, तब तक वह रचना केवल कागज़ पर छपे हुए निर्जीव अक्षरों का एक ढाँचा मात्र है। वोल्फगैंग आइज़र ने इसे ‘अस्पष्टता के स्थान’ या अर्थ-छिद्र (Indeterminacies or Gaps) कहा है। साहित्यिक पाठ में हमेशा कुछ बातें अनकही छोड़ दी जाती हैं, जिन्हें पूरा करने का काम पाठक की चेतना करती है। इस प्रकार, पढ़ना एक निष्क्रिय क्रिया नहीं बल्कि अर्थ-उत्पादन की एक बेहद सक्रिय और गतिशील प्रक्रिया है, जहाँ पाठक रचना का उपभोक्ता न होकर सृजन का वास्तविक भागीदार बन जाता है। इस सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य के व्यापक फलक पर कुंवर नारायण की ‘माध्यम’ कविता को रखकर देखें, तो यह रचना न केवल पाठक-अनुक्रिया सिद्धांत की व्यावहारिक पुष्टि करती है, बल्कि स्वयं इस सिद्धांत का एक सूक्ष्म और काव्यात्मक घोषणापत्र बनकर सामने आती है।
उम्बर्टो इको की अवधारणा के अनुसार, एक ‘खुला पाठ’ (Open Text) अपने पाठक को अर्थ की बहुलता और व्याख्या की स्वतंत्रता देता है। कुंवर नारायण अपनी इस रचना में कहीं भी एकाधिकारवादी रवैया नहीं अपनाते। वे पाठक से सीधा संवाद करते हुए कहते हैं—’मेरे काव्य के इन मानस परोक्षों से एक अपना आकाश रचो, मेरे असन्तुष्ट शब्दों को लो और कला के इस विदीर्ण पूर्वग्रह मात्र को सौन्दर्य का कोई नया कलेवर दो’। यहाँ ‘असंतोष’ शब्द इस बात का स्वीकार है कि कवि का अपना शब्द-चयन अधूरा है और उसकी अपनी सीमाएं हैं। वे पाठक को अपने शब्दों का संरक्षक या मुंशी नहीं बनाते, बल्कि उसे यह अधिकार देते हैं कि वह उन शब्दों को लेकर अपना एक बिल्कुल नया आकाश रचे। कला के पुराने पड़ चुके पूर्वाग्रहों को तोड़कर उन्हें सौंदर्य का नया स्वरूप देना पाठक की कल्पना पर छोड़ दिया गया है। यह आमंत्रण दर्शाता है कि कविता का कोई एक स्थिर या अंतिम अर्थ नहीं है, बल्कि हर पाठक अपनी दृष्टि के अनुसार उसे नया कलेवर देने के लिए स्वतंत्र है।
कविता का अंतिम पड़ाव उत्तर-संरचनावादी चिंतन और पाठक-अनुक्रिया सिद्धांत के उस ऐतिहासिक बदलाव को उजागर करता है जिसे रोलां बार्थ ने ‘लेखक की मृत्यु’ (The Death of the Author) और ‘लेखक की सत्ता के विसर्जन’ की संज्ञा दी थी। उत्तर-संरचनावादी चिंतन में किसी भी रचना का अंतिम अर्थ कवि या लेखक के अधिकार क्षेत्र में नहीं होता, बल्कि वह पाठक की चेतना में निष्पन्न होता है। कविता की अंतिम पंक्तियों में कुंवर नारायण एक अप्रत्याशित और चकित कर देने वाली घोषणा करते हैं—’ऐ अजान, तुम तक यदि मेरा भावोद्वेल पहुैंचे, तो इस कोलाहल को अपने आकाशों में भरसक अपनाना; तुम्हें आश्चर्य होगा यह जानकर कि कवि तुम हो…’। यह पंक्ति इस सिद्धांत की रीढ़ है। यहाँ कवि अपने रचयिता होने के सारे दंभ को उतारकर फेंक देता है। वह पाठक से कहता है कि उसके मन से उठा भाव-उद्वेल और शब्दों का यह कोलाहल तब तक निरर्थक है जब तक पाठक इसे अपने आंतरिक आकाश में जगह न दे। जैसे ही पाठक इस कोलाहल को अपनाता है, कविता का वास्तविक सृजन पूरा हो जाता है, और उस क्षण में रचनाकार की भूमिका स्वतः पाठक के पास चली जाती है। कवि अपनी स्वयं की स्थिति को स्पष्ट करते हुए लिखता है कि वह केवल ‘निस्पृह तत्वों का एक नया समावेश’ है जो पाठक की कल्पना के इर्द-गिर्द मंडराता हुआ जीवन की संभावनाओं की ओर केवल एक दृढ़ इशारा करता है। इन पंक्तियों में कवि अपनी भूमिका को केवल एक उत्प्रेरक (Catalyst) के रूप में स्वीकार करता है।
अस्तित्ववादी दृष्टिकोण अर्थात एग्जिस्टेंशियलिज़्म modern दर्शन की वह धारा है जो मनुष्य की स्वतंत्रता, उसके अकेलेपन, अस्तित्व की प्रामाणिकता और जीवन के बुनियादी अर्थ की तलाश को केंद्र में रखती है। बीसवीं सदी के महान अस्तित्ववादी विचारकों—जैसे ज़ॉ-पॉल सार्त्र, अल्बेर कामू, सोरेन कीर्केगार्ड और मार्टिन हाइडेगर—ने यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है और उसके बाद अपने कर्मों, निर्णयों तथा चेतना के माध्यम से अपने जीवन का अर्थ स्वयं गढ़ता है। इस दार्शनिक यात्रा में मनुष्य का सामना अक्सर आंतरिक एकांत, जीवन की एकरसता, ऊब (Boredom) और अनस्तित्व के भय से होता है। अस्तित्ववाद यह मानता है कि जब मनुष्य संसार के स्थापित ढाँचों और बने-बनाये नियमों को बिना सोचे-समझे स्वीकार कर लेता है, तो वह एक अमानक या अप्रामाणिक जीवन (Inauthentic Life) जीने लगता है। प्रामाणिक जीवन जीने के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी चेतना के एकांत से आमना-सामना करे, पुरानी जड़ परिपाटियों को तोड़े और अनछुए, अनजाने धरातलों की ओर कदम बढ़ाए।
इस दार्शनिक पृष्ठभूमि के आलोक में ‘माध्यम’ कविता मानव चेतना के उसी आंतरिक संकट को टटोलती है जहाँ व्यक्ति अपनी आत्मा के प्रामाणिक अस्तित्व की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा होता है। अस्तित्ववाद में ‘ऊब’ और ‘थकान’ केवल शारीरिक या मानसिक अवस्थाएं नहीं हैं, बल्कि वे अस्तित्वगत संकट (Existential Crisis) के सूचक हैं। कामू और सार्त्र दोनों ने इस बात पर जोर दिया है कि जब जीवन एक ही ढर्रे पर लगातार चलता रहता है, तो संसार की वस्तुएं और रिश्ते अपनी अर्थवत्ता खो देते हैं। कुंवर नारायण जब लिखते हैं कि ‘जीवन से वही मेल रोज़ धीरे धीरे, कर न दे मलिन आत्मदर्पण अति परिचय से; ऊब से, थकन से, बचा रहे…’, तो वे सीधे तौर पर अस्तित्ववाद के इसी बुनियादी भय को रेखांकित कर रहे होते हैं। ‘अति-परिचय’ से आशय जीवन के उस ठहराव से है जहाँ हर चीज़ जानी-पहचानी, दोहराव से भरी और यांत्रिक हो जाती है। इस ऊब और यांत्रिकता से मुक्ति का मार्ग कविता ‘अविज्ञात’ की सार्थकता में खोजती है। कवि पुकार उठता है—’रहने दो अविज्ञात बहुत कुछ…’। यह पंक्ति अस्तित्ववादी दर्शन के उस गहरे आग्रह को व्यक्त करती है जहाँ अज्ञात, अनछुए और रहस्यमय के प्रति एक निरंतर खिंचाव बना रहता है। मार्टिन हाइडेगर के शब्दों में कहें तो मनुष्य का अस्तित्व एक निरंतर ‘होने की प्रक्रिया’ (Process of Becoming) है। यह ‘अविज्ञात’ ही है जो मनुष्य को सुरक्षा के सुरक्षित घेरों से बाहर निकलकर नए अर्थों की तलाश करने की प्रेरणा देता है।
कविता आगे चलकर अस्तित्वगत एकांत और चेतना के द्वंद्व को जिस रूप में प्रस्तुत करती है, वह अस्तित्ववादी दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जब कवि कहता है कि एक असंतुष्ट चेतना आवेश में भाषा को तोड़कर अपने एकांत में बिखरा लेती है, तो यहाँ वह ‘एकांत’ केवल अकेलापन नहीं है, बल्कि वह सृजनात्मक और अस्तित्वगत एकांत (Existential Solitude) है। उस एकांत में जब उसकी असंतुष्ट चेतना जीवन के पुराने अर्थों से संतुष्ट नहीं होती, तो वह प्रचलित ढाँचों को तोड़ती है। भाषा और स्थापित प्रतीकों का यह ध्वंस वस्तुतः समाज द्वारा थोपे गए अर्थों का अस्वीकार है। इसके बाद वही चेतना कातर होकर टुकड़ों को सहेजती है और जीवन को किसी नए अर्थ में प्रतिष्ठित करती है। यह प्रक्रिया प्रमाणित करती है कि अर्थ कहीं बाहर से तैयार नहीं मिलता, बल्कि मनुष्य को अपनी चेतना के मलबे और एकांत से स्वयं नए अर्थ की रचना करनी पड़ती है। इसके साथ ही, कविता में प्रयुक्त ‘चाँद और सूनी रातों का बूढ़ा कंकाल’ तथा ‘मुर्दा लकीरें’ अतीत के उन जड़ रूपों के प्रतीक हैं जो अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। कवि खुद को ‘प्रकाश का वह अन्तःकेंद्र’ घोषित करता है जिससे गिरने वाली छायाएं बदल जाती हैं। यहाँ ‘प्रकाश का अन्तःकेंद्र’ मनुष्य की वह आत्म-चेतना है जो परिस्थितियों की निरुद्देश्यता के सामने घुटने नहीं टेकती, बल्कि अपनी स्वतंत्र दृष्टि से संसार के अर्थ को बदल देती है। वह बिजली की तरह कौंधकर संसार को नंगा ही नहीं करती, बल्कि अस्तित्व को बिल्कुल नए अर्थों में प्रकाशित करती है।
सौंदर्यशास्त्र और कला-दर्शन की आधुनिक परंपरा में कुंवर नारायण की ‘माध्यम’ कविता एक ऐसा विलक्षण रचनात्मक धरातल निर्मित करती है जहाँ कला का अपना रूप-विधान, उसकी स्वायत्तता और उसका मानवीय दायित्व एक-दूसरे में पूरी तरह घुलकर एक हो जाते हैं। इस रचना की वास्तविक सौंदर्यशास्त्रीय गहराई को समझने के लिए थेओडोर अडोर्नो, वाल्टर बेंजामिन, आर्थर डांटो और मार्टिन हाइडेगर जैसे विचारकों की प्रमुख अवधारणाओं को समझना आवश्यक है। थेओडोर अडोर्नो ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘एस्थेटिक थ्योरी’ (Aesthetic Theory) में यह प्रतिपादित किया कि सच्चा सौंदर्य शास्त्र पारंपरिक और थोपी गई कला-शैलियों के प्रति एक नकारात्मक प्रतिक्रिया (Negative Aesthetics) से शुरू होता है। अडोर्नो के अनुसार, पूंजीवादी और बाज़ारवादी समाज में कला जब केवल एक रूपवादी उत्पाद बनकर रह जाती है, तो वह अपने क्रांतिकारी स्वरूप को खो देती है; इसलिए कला को अपनी प्रामाणिकता बचाए रखने के लिए पुरानी शैलियों और रूढ़ियों का लगातार खंडन करना पड़ता है। इसी प्रकार, वाल्टर बेंजामिन ने अपने ऐतिहासिक निबंध ‘द वर्क ऑफ आर्ट इन द एज ऑफ मैकेनिकल रिप्रोडक्टिबिलिटी’ में यह चिंता व्यक्त की कि यांत्रिक दोहराव के कारण कलाकृति का अपना विशिष्ट आभामंडल (Aura) नष्ट हो जाता है। बेंजामिन मानते हैं कि जब कला अपनी रूढ़ियों और यांत्रिक प्रयोगों से मुक्त होती है, तभी वह नई चेतना का जरिया बन सकती है।
आर्थर डांटो ने अपनी पुस्तक ‘द ट्रांसफिगरेशन ऑफ द कॉमनप्लेस’ में यह स्थापित किया कि कोई भी साधारण वस्तु केवल अपने बाह्य रूप के कारण कला नहीं बनती, बल्कि उस दार्शनिक कायांतरण के कारण कला बनती है जो कलाकार और दर्शक मिलकर उसे प्रदान करते हैं। वहीं मार्टिन हाइडेगर ने ‘द ओरिजिन ऑफ द वर्क ऑफ आर्ट’ में कला को सत्य के उद्घाटन (Unconcealment of Truth) का माध्यम माना, जो अस्तित्व के छिपे हुए सत्य और प्रामाणिक रूप को उजागर करती है।
जब ‘माध्यम’ कविता यह पुकार लगाती है कि ‘और कला के इस विदीर्ण पूर्वग्रह मात्र को सौन्दर्य का कोई नया कलेवर दो, (क्योंकि यही एक माध्यम है जो सदा अक्षुण्ण है)’, तो यहाँ अडोर्नो के ‘नकारात्मक सौंदर्यशास्त्र’ की झलक मिलती है। ‘विदीर्ण पूर्वग्रह’ शब्द कला के उसी फटे हुए, जर्जर और यांत्रिक आवरण की आंतरिक पीड़ा है। यह पंक्ति बताती है कि कला का माध्यम तभी अक्षुण्ण रह सकता है जब वह अपने अतीत के ढाँचों को तोड़कर सौंदर्य का नया कलेवर धारण करे। आगे चलकर जब कवि लिखता है कि ‘हाड़-सी बिजलियों की तरह अकस्मात अपनी पंक्तियों में भभककर मैं संसार को नंगा ही नहीं करता, बल्कि अस्तित्व को दूसरे अर्थों में भी प्रकाशित करता हूँ’, तो यहाँ हाइडेगर के ‘सत्य के अनावरण’ और डांटो के ‘साधारण के कायांतरण’ का दार्शनिक स्पर्श मिलता है। कवि की पंक्तियाँ केवल संसार की कड़वी सच्चाइयों को उघाड़ती नहीं हैं, बल्कि अस्तित्व को नए अर्थों का आलोक देती हैं।
इसी रचनात्मक आवेग से जो सौंदर्य निष्पन्न होता है, वह किसी ऊपरी सजावट का मोहताज नहीं है। कविता जब ‘एक सात्विक शान्ति प्रभात के सहज वैभव में थम जाय, असह्य सौन्दर्य विस्मय की परिधि में अकुला दे प्राणों को मीठे मीठे’ की सृष्टि करती है, तो यहाँ ‘सात्विक शांति’ और ‘मीठा विस्मय’ कला का वह गहरा आत्मिक परिष्कार बन जाता है जहाँ सौंदर्य चेतना को उद्वेलित कर शांत वैभव में स्थिर कर देता है। यह पूरी सौंदर्यशास्त्रीय यात्रा अंततः एक बहुत ही कोमल सामाजिक-मानवीय सरोकार में परिणत होती है। जब कविता कहती है—’पूजा के दूभ-सी कोमल नीहार-धुली दुधमुँही नई नई संसृति को बाल-मानवता के स्वाभाविक सपनों तक आने दो’, तो ओस से धुली दूर्वा जैसी निर्मल संस्कृति और ‘बाल-मानवता के स्वाभाविक सपने’ कला के उस परम मानवीय दायित्व को साकार करते हैं जिसकी वकालत अडोर्नो जैसे दार्शनिक मशीनी सभ्यता के विरूपीकरण के विरुद्ध करते रहे। कला का अंतिम गंतव्य मनुष्य की उसी मौलिक मासूमियत, सहजता और पवित्रता को बचाए रखना है।
कविता की सामाजिक-मानवीय महत्ता को गहराई से समझने के लिए आधुनिक समाजशास्त्र, सांस्कृतिक आलोचना और राजनीतिक दर्शन के प्रमुख विचारकों—युर्गन हाबरमास, हरबर्ट मार्क्यूज़ और महात्मा गांधी—के विचारों का अवलंब लेना भी प्रासंगिक है। जर्मन दार्शनिक युर्गन हाबरमास ने अपने ‘संवादात्मक क्रिया के सिद्धांत’ (Theory of Communicative Action) में यह प्रतिपादित किया कि किसी भी लोकतांत्रिक और स्वस्थ समाज की रीढ़ सच्चा, विकृतहीन संवाद है। जब बाज़ार और सत्ता का प्रभाव जीवन-जगत (Life-world) पर हावी हो जाता है, तो स्वाभाविक संवाद टूट जाता है। हाबरमास के अनुसार, समाज का वास्तविक परिष्कार तभी संभव है जब मनुष्य यांत्रिक दबावों से मुक्त होकर एक-दूसरे को समान चेतना के रूप में स्वीकार करे। हरबर्ट मार्क्यूज़ ने अपने ग्रंथ ‘वन-डायमेंशनल मैन’ (One-Dimensional Man) में चेतावनी दी थी कि आधुनिक औद्योगिक सभ्यता मनुष्य की आलोचनात्मक और सृजनात्मक क्षमता को छीनकर उसे ‘एक-आयामी’ बना देती है। इस यांत्रिक जाल से मुक्ति का मार्ग केवल कला और साहित्य के उस ‘महान इंकार’ (The Great Refusal) से होकर निकलता है जो मनुष्य को उसकी मौलिक स्वतंत्रता का बोध कराता है। दूसरी ओर, महात्मा गांधी का सामाजिक-सांस्कृतिक दर्शन ‘सात्विक शांति’, अहिंसा और ‘बाल-सुलभ निश्छलता’ को भावी समाज के पुननिर्माण की धुरी मानता है।
इन वैचारिक परिप्रेक्ष्यों के आलोक में, कविता में आया ‘कोलाहल’ शब्द केवल आधुनिक शहर का शोर नहीं है, बल्कि वह औद्योगिक सभ्यता के तनावों, वर्ग-द्वंद्वों, वैचारिक टकरावों और यांत्रिक जीवन का व्यापक प्रतीक है। कुंवर नारायण इस कोलाहल से भागने का पलायनवादी मार्ग नहीं चुनते; हाबरमास के सच्चे संवाद की तरह, कवि बाह्य जगत की इस अशांति को अपने ‘आंतरिक आकाश’ में समाहित करने का आह्वान करता है। सामाजिक विषमताओं और तनावों को जब चेतना के भीतर जगह दी जाती है, तब वह शोर सृजनात्मक ऊर्जा में बदल जाता है। कवि जब पाठक को ही ‘कवि’ घोषित करता है, तो वह मार्क्यूज़ के ‘एक-आयामी मनुष्य’ की जड़ता को तोड़कर पाठक की खोई हुई सृजनात्मक स्वतंत्रता को बहाल करता है। इसी प्रकार, ‘पूजा के दूभ-सी कोमल नीहार-धुली दुधमुँही नई नई संसृति’ और ‘बाल-मानवता के स्वाभाविक सपने’ का विचार उस मौलिक निश्छलता और सहजता की पुकार है जिसे तकनीकी सभ्यता ने कुचल दिया है। प्रभात के सहज वैभव में ठहरने वाली यह ‘सात्विक शांति’ गांधीवादी चिंतन के अनुरूप एक ऐसा सांस्कृतिक और मानवीय परिष्कार है जो समाज को विध्वंस से बचाकर कल्याणकारी दिशा में मोड़ता है। कवि जब कहता है कि शब्दों से घनिष्टता बढ़ने दी जाए ताकि उनकी अस्फुट लहक मनुष्य के सौम्य भाव को छू ले और ‘विशालता अदेय को समझे’, तो यह दो मानवीय चेतनाओं के बीच का वह गहरा आत्मिक संबंध है जो समाज की नैतिक रीढ़ होता है।
‘माध्यम’ कविता आधुनिक हिंदी काव्य-परंपरा का एक ऐसा विलक्षण और गहन पृष्ठभाग है जो न केवल भाषा और संवेदना के संबंधों की पड़ताल करता है, बल्कि अस्तित्व, संवाद और आत्मिक परिष्कार के गूढ़ दार्शनिक धरातल भी उघाड़ता है। यह रचना प्रगीत के एक सूक्ष्म कैनवास से अपनी यात्रा आरंभ करके भाषा के पुनर्सृजन, बाह्य कोलाहल के आंतरिक रूपांतरण और सात्विक शांति की खोज की ओर अग्रसर होती है। जब हम इस कविता का गहराई से विश्लेषण करते हैं, तो इसमें पाश्चात्य एवं भारतीय दर्शन के अनेक गंभीर आयाम स्वतः ही अनूठे ढंग से पिरोए हुए दिखाई देते हैं।
कविता का प्रारंभ ही भाषा और मौन के द्वंद्व से होता है, जहाँ कवि लिखता है कि वस्तु और वस्तु के बीच भाषा है जो हमें अलग करती है, जबकि मेरे और तुम्हारे बीच एक मौन है जो किसी अखंडता में हमको मिलाता है। यह काव्यात्मक उक्ति प्रसिद्ध यहूदी-ऑस्ट्रियाई दार्शनिक मार्टिन बुबर (Martin Buber) के ‘आई एंड दाउ’ (I and Thou) सिद्धांत का सीधा साक्षात्कार कराती है। बुबर के अनुसार मनुष्य दो प्रकार के संबंधों में जीता है—’आई-इट’ (मैं और यह) तथा ‘आई-दाउ’ (मैं और तुम)। ‘आई-इट’ का संबंध उपयोगिता, वस्तुपरकता और अलगाव का है। जब हम भाषा के माध्यम से संसार, वस्तुओं या मनुष्यों को श्रेणियों और उपयोगों में बाँटते हैं, तो वह ‘आई-इट’ का संबंध बन जाता है। कवि ठीक ही कहता है कि भाषा बाह्य जगत में भेदों और दूरियों की सृष्टि करती है। इसके विपरीत, ‘आई-दाउ’ का संबंध दो चेतनाओं के बीच का वह अखंड, पवित्र और सीधा संबंध है जहाँ कोई मध्यस्थ नहीं होता। बुबर के अनुसार यह संबंध बहुधा शब्दों की परिधि को लाँगकर मौन में घटित होता है। कविता की यह पंक्ति कि ‘मेरे और तुम्हारे बीच एक मौन है जो किसी अखंडता में हमको मिलाता है’ इसी ‘आई-दाउ’ की स्थिति को साकार करती है। जहाँ शब्द समाप्त होते हैं और भाषा का भौतिक ढाँचा गिर जाता है, वहीं से दो आत्माओं का सच्चा और अखंड संवाद प्रारंभ होता है।
इस भाषाई सीमा की समझ हमें ऑस्ट्रियाई दार्शनिक लुडविग विट्गेन्स्टाइन (Ludwig Wittgenstein) के भाषा-दर्शन से भी जोड़ती है। विट्गेन्स्टाइन का प्रसिद्ध कथन है कि मेरी भाषा की सीमाएँ ही मेरे संसार की सीमाएँ हैं। वे यह मानते थे कि जो कुछ कहा जा सकता है उसे स्पष्ट कहा जाना चाहिए, और जिसके विषय में बोला नहीं जा सकता, उस पर मौन रहना चाहिए। कुंवर नारायण ‘माध्यम’ कविता में विट्गेन्स्टाइन की इस भाषाई सीमा को पहचानते हैं, परंतु वे वहीं रुकते नहीं; बल्कि वे भाषा की इस सीमा का रचनात्मक अतिक्रमण करते हैं। कविता में जब वे लिखते हैं कि जीवन से वही मेल रोज़ धीरे-धीरे आत्मदर्पण को अति-परिचय से मलिन न कर दे, इसलिए अविज्ञात को बहुत कुछ रहने दिया जाए, तो यहाँ कवि भाषा और अति-परिचय से पैदा होने वाली यांत्रिकता, ऊब और थकान से बचने के लिए ‘अविज्ञात’ (The Unknowable) का पक्ष लेता है। यदि संसार की हर वस्तु और भावना को भाषा के सीमित घेरे में बाँध दिया जाएगा, तो जीवन अपनी अर्थवत्ता खो देगा। कवि अविज्ञात को बचाकर विट्गेन्स्टाइन द्वारा तय की गई भाषा की सीमाओं का विस्तार करता है। वह बताता है कि कविता का कार्य केवल व्यक्त का हिसाब रखना नहीं है, बल्कि उस अव्यक्त और अविज्ञात के लिए भी जगह बनाए रखना है जहाँ नए अर्थों के अंकुर फूट सकें।
पाश्चात्य दर्शन से आगे बढ़कर जब हम भारतीय काव्यशास्त्र और दर्शन के आलोक में ‘माध्यम’ का अनुशीलन करते हैं, तो महान वैयाकरण भर्तृहरि द्वारा ‘वाक्यपदीयम’ में प्रतिपादित ‘शब्द-ब्रह्म’ और ‘स्फोट सिद्धांत’ की अनुगूँजें इसमें साफ़ सुनाई देती हैं। भारतीय परंपरा में ‘शब्द’ को केवल ध्वनियों का समूह नहीं, बल्कि चेतना का सजीव रूप माना गया है। भर्तृहरि के ‘स्फोट सिद्धांत’ के अनुसार, बाह्य ध्वनियाँ तो केवल माध्यम हैं; असली अर्थ का बोध पाठक या श्रोता की चेतना में अचानक एक कौंध या आंतरिक प्रकाश की तरह घटित होता है। कविता में जब कुंवर नारायण लिखते हैं कि हाड़-सी बिजलियों की तरह अकस्मात अपनी पंक्तियों में भभककर वे संसार को नंगा ही नहीं करते, बल्कि अस्तित्व को दूसरे अर्थों में भी प्रकाशित करते हैं, तो यह ‘बिजलियों की तरह भभकना’ और ‘अस्तित्व का प्रकाशित होना’ शब्द की उसी आंतरिक अर्थ-दीप्ति (स्फोट) का काव्यात्मक साक्ष्य है। अर्थ कोई सजा-सजाया उत्पाद नहीं है, वह चेतना में अचानक कौंधने वाला प्रकाश है। आगे चलकर जब कविता में यह पंक्तियाँ आती हैं कि शब्दों से घनिष्टता बढ़ने दी जाए ताकि उनकी एक अस्फुट लहक मनुष्य के सौम्य भाव को छू ले और स्वयंसिद्ध आनंद में ऋचाओं की गूँज-सा आर्यलोक समा जाए, तो यहाँ ‘ऋचाओं की गूँज’ शब्द-ब्रह्म की उसी वैदिक पवित्रता को पुनर्जीवित करती है। ‘अस्फुट लहक’ उस स्फोट या ध्वन्यात्मक रस की ओर संकेत करती है जो स्थूल शब्दों के पार जाकर मनुष्य के सौम्य भाव और चेतना को स्पर्श कर लेती है।
कविता का एक अन्य आयाम भाषा के विखंडन और पुनर्सृजन की अत्यंत संवेदनशील और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को उघाड़ता है। कवि जब लिखता है कि एक असंतुष्ट चेतना आवेश में भाषा को तोड़-फोड़कर अपने एकांत में बिखरा लेती है और फिर किसी सिसकते बालक की तरह कातर होकर उन्हीं टुकड़ों को अपने मन में सहेजती है तथा जीवन को नए अर्थ में प्रतिष्ठित करती है, तो यहाँ जर्जर और घिसी-पिटी भाषा के प्रति असंतोष प्रकट होता है। यह असंतुष्ट चेतना प्रचलित अर्थ-प्रणालियों को तोड़ती है, परंतु यह तोड़-फोड़ केवल विध्वंस नहीं है। टूटे हुए भाषाई टुकड़ों को एक सिसकते बालक की मासूमियत के साथ पुनः समेटना यह दर्शाती है कि सृजन दरअसल भाषा के मलबे से ही नए अर्थ को जन्म देने का नाम है। टूटे हुए संकेतों को जब नए ढंग से पिरोया जाता है, तभी जीवन किसी नए अर्थ में प्रतिष्ठित हो पाता है। इसके साथ ही, कविता ‘पाठक-अनुक्रिया सिद्धांत’ और ‘लेखक के विसर्जन’ का एक अभूतपूर्व उदाहरण प्रस्तुत करती है, जहाँ कवि पाठक से कहता है कि यदि उस तक कवि का भावोद्वेल पहुँचे तो इस कोलाहल को अपने आकाश में अपनाए, क्योंकि वास्तविक कवि वही है और रचनाकार केवल निस्पृह तत्वों का एक समावेश मात्र है। यहाँ कवि स्वयं को केवल एक उत्प्रेरक स्वीकार करता है और अर्थ-सृजन की अंतिम सत्ता पाठक को सौंप देता है।
कविता का अंतिम लक्ष्य केवल दार्शनिक उहापोह में उलझे रहना नहीं है, बल्कि वह आधुनिक यांत्रिक सभ्यता के कोलाहल को आत्मिक परिष्कार की ओर ले जाना है। औद्योगिक और आधुनिक सभ्यता ने मनुष्य को जिस वैचारिक व सामाजिक शोर में ढकेला है, कवि उस शोर से पलायन नहीं करता, बल्कि उस कोलाहल को अपने आंतरिक आकाश में समाहित करके उसे सृजनात्मक ऊर्जा में बदलता है। यह रूपांतरण अंततः ‘संवेद्य संसृति’ और सात्विक शांति की पुनर्स्थापना करता है। जब कविता पूजा की दूभ-सी कोमल, नीहार-धुली नई संसृति को बाल-मानवता के स्वाभाविक सपनों तक आने देने और एक सात्विक शांति के प्रभात के सहज वैभव में थम जाने का आग्रह करती है, तो ‘दूभ-सी कोमल संसृति’ और ‘बाल-मानवता के स्वाभाविक सपने’ बाज़ारवादी जटिलताओं और यांत्रिक कोलाहल के विरुद्ध एक अहिंसक पुकार बन जाते हैं। यह गांधीवादी ‘सात्विक शांति’ और मानवीय मासूमियत को पुनः प्राप्त करने का स्वप्न है।
वस्तुत: कुंवर नारायण की ‘माध्यम’ कविता बुबर के ‘आई-दाउ’, विट्गेन्स्टाइन के भाषा-विमर्श, और भर्तृहरि के ‘स्फोट’ व ‘शब्द-ब्रह्म’ जैसे विविध दार्शनिक धरातलों पर एक साथ गतिमान होती है। यह कविता यह सिद्ध करती है कि भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का यांत्रिक साधन नहीं है, बल्कि वह अस्तित्व का वह पवित्र स्थान है जहाँ टूटे हुए संबंधों का पुननिर्माण होता है। यह रचना बाह्य कोलाहल को आत्मिक शांति में बदलने, भाषा की सीमाओं का विस्तार करने और मनुष्य की मौलिक मासूमियत व बाल-मानवता के सपनों को सुरक्षित रखने का एक कालजयी काव्यात्मक आलेख है।
‘माध्यम’ कविता आधुनिक हिंदी साहित्य का एक ऐसा विरला और सामयिक काव्यात्मक दस्तावेज़ है, जो केवल भाषाई संरचना या दार्शनिक उहापोह तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भाषा के समाजशास्त्र और बाज़ारवादी युग में उपजे संवाद-संकट पर भी अत्यंत पैना और गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत करता है। आज के पूंजीवादी, अति-बाज़ारवादी और सूचना-संचालित समाज में जहाँ भाषा केवल उपभोग, विज्ञापन और राजनीतिक दुष्प्रचार (प्रोपगैंडा) का एक औजार बनकर रह गई है, वहाँ यह कविता भाषा के इस औजारीकरण (Instrumentalization) और विरूपीकरण के विरुद्ध एक सशक्त प्रतिरोध बनकर उभरती है।
आधुनिक बाज़ारवाद ने भाषा की स्वाभाविक संवेदनशीलता और आत्म-बोध की क्षमता को छीनकर उसे केवल एक आर्थिक और रणनीतिक साधन में बदल दिया है। विज्ञापनों और बाज़ार की आक्रामक शब्दावली ने भाषा का ऐसा व्यवसायीकरण कर दिया है जहाँ हर शब्द का मूल्यांकन उसकी उपयोगिता और उपभोग-मूल्य से तय होता है। ‘माध्यम’ कविता में कुंवर नारायण इस संकट की जड़ को पहचानते हुए लिखते हैं कि वस्तु और वस्तु के बीच भाषा है जो हमें अलग करती है। यह पंक्ति बाज़ार द्वारा भाषा को ‘वस्तु’ बना दिए जाने की प्रक्रिया पर सीधा प्रहार करती है। बाज़ार जब भाषा को वस्तुपरक और औजार की तरह इस्तेमाल करता है, तो वह मनुष्यों के बीच दूरी और अलगाव को बढ़ाता है। कवि इस यांत्रिक औजारीकरण से भाषा को मुक्त कराने के लिए ‘मौन’ और ‘अखंडता’ की अवधारणा को सामने लाता है। कविता यह स्थापित करती है कि भाषा का वास्तविक लक्ष्य वस्तुओं का क्रय-विक्रय या कृत्रिम इच्छाओं का निर्माण करना नहीं, बल्कि मनुष्य को उसकी खोई हुई संवेदनशीलता, करुणा और आंतरिक स्व से जोड़ना है।
इतना ही नहीं, यद्यपि यह कविता डिजिटल क्रांति से पूर्व रची गई थी, किंतु आज के इंटरनेट, सोशल मीडिया और ‘सूचना-अतिप्रवाह’ (Information Overload) के दौर में इसकी प्रासंगिकता बहुगुणित हो जाती है। आज का समय डिजिटल कोलाहल का समय है, जहाँ हर तरफ शब्दों की अनवरत बौछार है, किंतु सच्चा संवाद पूरी तरह अनुपस्थित है। हम एक ऐसे ‘नकली संवाद’ के दौर में जी रहे हैं जहाँ प्रतिक्रियाएँ तुरंत हैं, लेकिन समझ और संवेदना का घोर अकाल है। यह डिजिटल कोलाहल मनुष्य के ‘आंतरिक आकाश’ को लगातार संकुचित कर रहा है और उसकी आत्म-चिंथन की क्षमता को छीन रहा है। ‘माध्यम’ कविता में जब कवि असंतुष्ट चेतना द्वारा भाषा को तोड़-फोड़कर पुनः सहेजने और जीवन को नए अर्थ में प्रतिष्ठित करने की बात करता है, तो वह दरअसल इसी कृत्रिम और सतही संचार-जाल से बाहर निकलने का मार्ग सुझाता है।
कविता में ‘सूनी रातों के बूढ़े कंकाल’ और बाह्य शोर के बीच जिस ‘अविज्ञात’ और ‘सात्विक शांति’ की बात की गई है, वह आज के डिजिटल युग में मनुष्य की मानसिक और आत्मिक मुक्ति की कुंजी है। कवि यह आग्रह करता है कि जीवन से वही मेल रोज़ धीरे-धीरे आत्मदर्पण को अति-परिचय और यांत्रिकता से मलिन न कर दे, इसलिए कुछ चीज़ों को अविज्ञात रहने देना चाहिए। आज का डिजिटल ढाँचा हर चीज़ को नग्न, विज्ञापित और प्रदर्शित करने पर तुला है, जबकि कुंवर नारायण ‘अविज्ञात’ और ‘मौन’ की जगह बचाकर मनुष्य की एकांतता और उसकी मानसिक स्वायत्तता की रक्षा करते हैं। वे पाठक से आह्वान करते हैं कि यदि उस तक कवि का भावोद्वेल पहुँचे, तो वह इस कोलाहल को अपने आंतरिक आकाश में भरसक अपनाए। यहाँ ‘आंतरिक आकाश’ में कोलाहल को अपनाने का अर्थ शोर से भागना नहीं, बल्कि उस बाह्य कोलाहल को अपनी संवेदनशीलता और विवेक के माध्यम से आत्मिक परिष्कार में बदल देना है।
कविता के अंतिम पंक्तियों में वर्णित ‘पूजा के दूभ-सी कोमल नीहार-धुली नई संसृति’ और ‘बाल-मानवता के स्वाभाविक सपने’ बाज़ारवादी जटिलताओं, तकनीकी यांत्रिकता और सूचनाओं के हिंसक हमले के विरुद्ध एक अहिंसक, सौंदर्यपरक और मानवीय विकल्प प्रस्तुत करते हैं। ‘माध्यम’ कविता यह स्पष्ट संदेश देती है कि जब तक भाषा को बाज़ार के औजारीकरण और डिजिटल कोलाहल से मुक्त कराकर उसमें मौन, अविज्ञात और सात्विक शांति के लिए स्थान नहीं बनाया जाएगा, तब तक सच्चा मानवीय संवाद और ‘बाल-मानवता के स्वाभाविक सपने’ साकार नहीं हो सकते। इस प्रकार, यह कविता भाषा के समाजशास्त्र को समझते हुए आधुनिक सभ्यतागत संकट से उबरने का एक अत्यंत विवेकपूर्ण और कालजयी मार्ग प्रशस्त करती है।
कुंवर नारायण की ‘माध्यम’ कविता आधुनिक हिंदी काव्य-परंपरा का एक ऐसा विलक्षण और कालजयी पृष्ठभाग है जो केवल भाषा के सौंदर्य या शिल्प तक सीमित न रहकर अस्तित्व, चेतना, अभिव्यक्ति के संकट और मानवीय सभ्यता की दशा का गहन दार्शनिक अनुशीलन प्रस्तुत करता है। जब हम इस कविता का तुलनात्मक काव्य-अनुशीलन अन्य मूर्धन्य भारतीय एवं पाश्चात्य कवियों—जैसे अज्ञेय, गजानन माधव मुक्तिबोध और टी. एस. इलियट—की रचनाओं के आलोक में करते हैं, तो कुंवर नारायण की इस कविता की वैचारिक गहराई, प्रासंगिकता और विशिष्टता और भी अधिक प्रखर होकर सामने आती है।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ और कुंवर नारायण दोनों के ही काव्य-संसार में ‘मौन’ और ‘सन्नाटे’ को एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण दार्शनिक धरातल प्राप्त है। अज्ञेय के काव्य में मौन का गहरा महत्त्व है; वे मानते हैं कि सन्नाटा केवल ध्वनियों का अभाव नहीं बल्कि स्वयं में एक दिव्य लय है। ‘असाध्य वीणा’ में अज्ञेय लिखते हैं:
“सन्नाटा भी एक राग है,
मौन भी एक संवाद है,
वीणा का हर तार जब सो जाता है,
तब एक परम संगीत जाग उठता है।”
यहाँ अज्ञेय का सन्नाटा आत्म-समर्पण, परम चेतना के आगे अहं के विसर्जन और एक अंतर्मुखी संगीतात्मक लय का प्रतीक है। इसके विपरीत, ‘माध्यम’ कविता में कुंवर नारायण जब लिखते हैं कि ‘वस्तु और वस्तु के बीच भाषा है जो हमें अलग करती है, तथा मेरे और तुम्हारे बीच एक मौन है जो किसी अखंडता में हमको मिलाता है’, तो यहाँ मौन केवल आत्म-विसर्जन का साधन नहीं, बल्कि दो चेतनाओं के बीच सीधे संबंध (आई-दाउ / I-Thou) का एक सक्रिय और अखंड सेतु है। अज्ञेय जहाँ मौन के माध्यम से व्यक्ति को परम चेतना या प्रकृति के सत्य में लीन करते हैं, वहीं कुंवर नारायण अपने ‘मौन’ के जरिए बाज़ारवादी और वस्तुपरक दूरी को मिटाकर दो मनुष्यों के बीच वास्तविक और अखंड मानवीय संबंध की पुनर्स्थापना करते हैं। यहाँ मौन भाषाई सीमाओं के पार जाकर दो आत्माओं के सीधा जुड़ने का दार्शनिक माध्यम बन जाता है।
मुक्तिबोध की कालजयी रचना ‘अंधेरे में’ और उनके संपूर्ण काव्य-दर्शन से तुलना करने पर अभिव्यक्ति के संकट और भाषाई बेचैनी की एक अनूठी धारा दिखाई देती है। मुक्तिबोध के यहाँ “अभिव्यक्ति के ख़तरे” उठाने का गहरा संकट है, जहाँ कवि सामाजिक विसंगतियों, व्यवस्था के दमन और क्रांतिकारी संघर्ष को अभिव्यक्त करने के लिए भाषा को माँजता और तराशता है। मुक्तिबोध की चेतना सामाजिक क्रांति, जन-संघर्ष और आत्म-परिष्कार के बीच भाषा का निरंतर संघर्ष रचती है। दूसरी ओर, कुंवर नारायण ‘माध्यम’ कविता में जब एक असंतुष्ट चेतना की बात करते हैं जो आवेश में आकर भाषा को वस्तु मान, उसे तोड़-फोड़ कर अपने एकांत में बिखरा लेती है और फिर किसी सिसकते बालक की तरह कातर होकर उन्हीं टुकड़ों को अपने मन में सहेजती है, तो यहाँ भी अभिव्यक्ति की छटपटाहट है। किंतु दोनों के मंतव्य में मौलिक अंतर है। जहाँ मुक्तिबोध सामाजिक संघर्ष और क्रांति के महासमर के लिए अभिव्यक्ति की राह खोजते हैं, वहीं कुंवर नारायण इस तोड़-फोड़ और पुनर्सृजन की प्रक्रिया से भाषा को जर्जर व घिसे-पिटे अर्थों से मुक्त कराकर आत्मिक परिष्कार, मौलिक मासूमियत और ‘सात्विक शांति’ की ओर ले जाते हैं। कुंवर नारायण की असंतुष्ट चेतना विध्वंस के बाद पुनः बाल-सुलभ कोमलता के साथ भाषा को समेटती है ताकि जीवन किसी नए और पवित्र अर्थ में प्रतिष्ठित हो सके।
पाश्चात्य काव्य-परंपरा के सन्दर्भ में टी. एस. एलियट (T.S. Eliot) की युगांतरकारी कविता ‘द वेस्ट लैंड’ (The Waste Land) के साथ ‘माध्यम’ की तुलना आधुनिक सभ्यता के संकट को समझने का एक विस्तृत आयाम खोलती है। इलियट ने ‘द वेस्ट लैंड’ में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद पश्चिमी समाज के आत्मिक बिखराव, बंजरपन, अर्थहीनता और नैतिक शून्यता का चित्रण करते हुए लिखा था:
“अप्रैल सबसे क्रूर महीना है, उगाता हुआ
बंजर भूमि से लेलाक के फूल, मिलाता हुआ
स्मृति और इच्छा को, झकझोरता हुआ
सुस्त जड़ों को वसंत की बारिश से।”
(April is the cruellest month, breeding
Lilacs out of the dead land, mixing
Memory and desire, stirring
Dull roots with spring rain.)
कुंवर नारायण का ‘कोलाहल’ और ‘सूनी रातों का बूढ़ा कंकाल’ इलियट की इसी सभ्यतागत निराशा और बंजरपन से मेल खाता है। दोनों ही कवि आधुनिक सभ्यता की यांत्रिकता और आत्मीयताविहीन शोर को गहराई से महसूस करते हैं। किंतु जहाँ इलियट इस सभ्यतागत बंजरपन और निराशा के बोझ से दबकर एक गहरे संकट और त्रासद स्थिति में ठहरते दिखते हैं, वहीं कुंवर नारायण उस कोलाहल और बंजरपन के बीच से ही पुनर्जन्म (Regeneration) और आशा की नई किरण जगाते हैं। कुंवर नारायण बाह्य कोलाहल को अपने आंतरिक आकाश में समाहित करके उसे सृजनात्मक ऊर्जा में रूपांतरित करते हैं। वे कविता के अंत में ‘पूजा की दूभ-सी कोमल नीहार-धुली नई संसृति’ और ‘बाल-मानवता के स्वाभाविक सपनों’ का आह्वान करते हैं। यह बाल-मानवता का स्वप्न सभ्यतागत निराशा से उबरने की एक महान और जीवंत मानवीय पुकार है।
अज्ञेय के ‘सन्नाटे’ का सामाजिक-मानवीय विस्तार करते हुए, मुक्तिबोध के ‘अभिव्यक्ति संकट’ को आत्मिक व सात्विक परिष्कार का स्वरूप देते हुए, तथा इलियट की ‘सभ्यतागत निराशा’ के बीच ‘बाल-मानवता के सपनों’ के जरिए पुनर्जीवन और आशा की ज्योति जलाते हुए, कुंवर नारायण की ‘माध्यम’ कविता एक अत्यंत गंभीर, विशद और कालजयी काव्यात्मक आलेख के रूप में हमारे सामने स्थापित होती है।
‘माध्यम’ केवल विचारों और दार्शनिक सिद्धांतों तक सीमित न रहकर अपने सूक्ष्म काव्य-शिल्प, अनूठे बिंब-विधान और अर्थगर्भित प्रतीक-योजना के माध्यम से अत्यंत प्रखर रूप से अभिव्यक्त होता है। कविता का वास्तविक सौंदर्यशास्त्र उसके कथ्य के साथ-साथ उसके रूप-विधान में निहित होता है; और ‘माध्यम’ कविता में कुंवर नारायण ने शिल्प, बिंब और प्रतीकों का ऐसा ताना-बाना बुना है जो पाठक की चेतना को भीतर तक उद्वेलित करता हुआ एक गहरे सात्विक परिष्कार की ओर ले जाता है।
कविता के शिल्पगत और बिंब-विधान के धरातल पर सबसे पहली और प्रभावशाली उपस्थिति ‘हाड़-सी बिजलियाँ’ जैसे दृश्य और आघातपरक बिंब की है। कवि जब लिखता है कि हाड़-सी बिजलियों की तरह अकस्मात अपनी पंक्तियों में भभककर वह संसार को नंगा ही नहीं करता, बल्कि अस्तित्व को दूसरे अर्थों में भी प्रकाशित करता है, तो यहाँ ‘हाड़-सी बिजलियाँ’ का बिंब बहुआयामी अर्थ-दीप्ति बिखेरता है। एक ओर जहाँ ‘हाड़’ (अस्थि) मनुष्य के भीतर छिपे नग्न यथार्थ, उसकी नश्वरता और कड़वी सच्चाई को दर्शाता है, वहीं ‘बिजली का भभकना’ चेतना में अचानक कौंधने वाले कौंधते सत्य (Inspiration / Truth) का प्रतीक है। यह बिंब एक ओर अस्तित्व के नग्न और असुविधाजनक यथार्थ का आघात प्रस्तुत करता है, तो दूसरी ओर वह अंधेरे को चीरकर सत्य का अनावरण करने वाली उस क्रांतिकारी चेतना को निरूपित करता है जो जड़ हो चुके संसार को नए आलोक में प्रकाशित कर देती है।
इसके ठीक विपरीत, कविता के अंतिम चरण में प्रयुक्त ‘पूजा की दूभ’ और ‘नीहार-धुली’ के बिंब अत्यंत कोमल, शुद्ध और सात्विक सौंदर्य की सृष्टि करते हैं। कवि जब ‘पूजा के दूभ-सी कोमल नीहार-धुली दुधमुँही नई नई संसृति’ की पुकार लगाता है, तो यहाँ ‘दूभ’ (दूर्वा) भारतीय सांस्कृतिक जीवन-दृष्टि में पवित्रता, निरंतरता और अहिंसक भाव का प्रतीक है। इसके साथ जब ‘नीहार-धुली’ (ओस की बूँदों से धुली हुई) का प्राकृतिक बिंब जुड़ता है, तो यह मशीनी सभ्यता और बाज़ारवादी जटिलताओं के विकृत प्रभाव से मुक्त एक अत्यंत ताज़ा, निर्मल और निष्पाप चेतना का साक्ष्य बनता है। यह बिंब-योजना केवल प्राकृतिक सुंदरता की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि वह आधुनिक यांत्रिक सभ्यता के हिंसक, कठोर और कृत्रिम माहौल के बरक्स एक अहिंसक, कोमल, और ‘बाल-मानवता के स्वाभाविक सपनों’ से भरी हुई नई संसृति को पुनर्स्थापित करने का संकल्प है।
कविता में अतीत और जर्जर परंपराओं को चित्रित करने के लिए कवि ने जिस प्रतीक और बिंब का प्रयोग किया है, वह है—’सूनी रातों का बूढ़ा कंकाल’ और ‘मुर्दा लकीरें’। कवि जब पुरानी चौहद्दियों और परंपराओं की बात करता है, तो ‘बूढ़ा कंकाल’ का यह दृश्य बिंब उस अतीतजीवी सोच पर सीधा प्रहार करता है जो अपना प्राण-तत्त्व खो चुकी है और केवल एक निर्जीव ढाँचा मात्र बनकर रह गई है। यह बिंब अतीत की मृत स्मृतियों, रूढ़ विचारों और जड़ सामाजिक सीमाओं की निरर्थकता को पूरी नग्नता के साथ उघाड़ता है। कवि स्पष्ट करता है कि इन मुर्दा लकीरों और पुरानी चौहद्दियों से नया अर्थ नहीं निकल सकता; नए अर्थ के लिए स्वयं को ‘प्रकाश का अंतःकेंद्र’ बनाना होगा जहाँ से गिरकर पुरानी वस्तुओं की छायाएँ भी बदल जाएँ।
शिल्प की दृष्टि से, कुंवर नारायण ने इस कविता में छंद-मुक्ति का अत्यंत सहज और आंतरिक लयबद्धता (Internal Rhythm) के साथ प्रयोग किया है। कविता किसी शास्त्रीय छंद के नियम से नहीं बँधती, बल्कि वह विचार और भावना के प्रवाह के साथ अपनी लय स्वयं निर्मित करती है। शब्दों का चयन जहाँ एक ओर ‘मानस परोक्षों’, ‘स्खलित’, ‘अविज्ञात’, और ‘संसृति’ जैसे तत्सम और गंभीर शब्दों से समृद्ध है, वहीं ‘दूभ-सी कोमल’ और ‘सिसकते बालक’ जैसे कोमल व सहज प्रयोग कविता में गहरी आत्मीयता और तरलता घोलते हैं।
इस प्रकार, ‘माध्यम’ कविता ‘हाड़-सी बिजलियों’ के तीखे यथार्थ से यात्रा शुरू करके, ‘सूनी रातों के बूढ़े कंकाल’ रूपी जर्जर परंपराओं का अतिक्रमण करती हुई अंततः ‘पूजा की दूभ-सी कोमल नीहार-धुली’ सात्विक शांति पर विश्राम लेती है। कुंवर नारायण का यह बिंब-विधान और प्रतीक-शिल्प कविता के दार्शनिक विमर्श को केवल बौद्धिक कसरत नहीं रहने देता, बल्कि उसे एक प्रत्यक्ष, दृश्यमान और संवेद्य काव्यात्मक अनुभव में बदल देता है।
‘माध्यम’ कविता केवल एक स्वतंत्र प्रगीत के रूप में ही महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उनके संपूर्ण रचना-संसार के आलोक में ‘विवेक’ और ‘करुणा’ के संतुलन को रेखांकित करने वाली एक केंद्रीय रचना है। कुंवर नारायण की आरंभिक कृतियों से लेकर उनके उत्तरवर्ती काव्य-चिंतन तक यदि उनकी मूल पहचान की तलाश की जाए, तो वह है—अत्यंत प्रखर तार्किक विवेक (Rationality) और उतनी ही गंभीर, अगाध मानवीय करुणा (Compassion) का विरल सामंजस्य। ‘माध्यम’ कविता में इस संतुलन की पराकाष्ठा दिखाई देती है, जहाँ भाषा, अस्तित्व और समाज का दार्शनिक विमर्श अंततः ‘बाल-मानवता के स्वाभाविक सपनों’ और सात्विक शांति पर आकर टिकता है।
कुंवर नारायण के काव्य-संसार में उनके प्रथम संग्रह ‘चक्रव्यूह’ (1956), तत्पश्चात आए ‘परिवेश: हम-तुम’ (1961), तथा ‘आत्मजयी’ जैसी कालजयी कृतियों से लेकर ‘अपने सामने’, ‘कोई दूसरा नहीं’ और अंतिम दौर की रचनाओं का अत्यंत गहरा वैचारिक संबंध है। ‘चक्रव्यूह’ में आधुनिक मनुष्य का जो अस्तित्वगत द्वंद्व, उलझन और ऐतिहासिक संकट प्रकट हुआ था, वह मनुष्य को एक ऐसे वैचारिक घेरे में पाता है जहाँ बाह्य परिस्थितियाँ उसे लगातार भ्रमित करती हैं। ‘माध्यम’ कविता इसी चक्रव्यूह से बाहर निकलने की चेतना का काव्यात्मक साक्ष्य है। ‘चक्रव्यूह’ में जहाँ संकट की पहचान थी, वहीं ‘माध्यम’ में उस संकट से उबरने के लिए भाषा और मौन के द्वंद्व को सुलझाया गया है। कवि स्पष्ट करता है कि बाह्य कोलाहल और वस्तुओं के बिखराव के बीच यदि कोई चीज़ मनुष्य को पुनः जोड़ सकती है, तो वह भाषा की सीमाओं से परे घटित होने वाला आत्मिक ‘मौन’ और चेतना का परिष्कार है।
इसके साथ ही, ‘परिवेश: हम-तुम’ संग्रह में कुंवर नारायण ने व्यक्ति, समाज और परिवेश के बीच के जटिल संबंधों को सहृदयता और तर्क की कसौटी पर परखा था। उस संग्रह का केंद्रीय आग्रह ‘हम’ और ‘तुम’ के बीच संवेदनात्मक दूरी को कम करना था। ‘माध्यम’ कविता इसी ‘हम-तुम’ के संबंध का दार्शनिक उत्कर्ष प्रस्तुत करती है। जब कवि लिखता है कि वस्तु और वस्तु के बीच भाषा है जो हमें अलग करती है, तथा मेरे और तुम्हारे बीच एक मौन है जो किसी अखंडता में हमको मिलाता है, तो यहाँ ‘परिवेश: हम-तुम’ का वह सामाजिक सरोकार दार्शनिक रूप से और भी परिपक्व होकर सामने आता है। यह मौन वस्तुतः दो चेतनाओं को जोड़ने वाला वह ‘आई-दाउ’ (I-Thou) संबंध है जो बाज़ारवादी अलगाव और सामाजिक दूरियों का अतिक्रमण करता है।
कुंवर नारायण के यहाँ ‘विवेक’ का अर्थ कोई शुष्क, संवेदनहीन या केवल बौद्धिक वितंडावाद नहीं है, और न ही ‘करुणा’ का अर्थ कोई भावुक, असहाय या रोनी भावुकता है। उनका विवेक अत्यंत विचारशील, तर्कनिष्ठ और आधुनिक है, जो भाषा के विखंडन, कला के जर्जर पूर्वाग्रहों और ‘सूनी रातों के बूढ़े कंकाल’ रूपी अतीतजीवी रूढ़ियों पर बिजली की तरह प्रहार करता है। ‘माध्यम’ कविता में जब एक असंतुष्ट चेतना आवेश में भाषा को तोड़ती-फोड़ती है और हाड़-सी बिजलियों की तरह भभककर अस्तित्व को नए अर्थों में प्रकाशित करती है, तो यह उनके प्रखर दार्शनिक और बौद्धिक विवेक की अभिव्यक्ति है। वे जानते हैं कि जब तक भाषा और विचारों के पुराने, निष्प्राण ढाँचों को तोड़ा नहीं जाएगा, तब तक नए अर्थ की सृष्टि संभव नहीं है।
परंतु, कुंवर नारायण के काव्य-दर्शन की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि उनका यह तीखा विवेक कभी भी विध्वंस पर जाकर समाप्त नहीं होता; वह तुरंत ही करुणा और संवेदनशीलता में रूपांतरित हो जाता है। भाषा के ढाँचों को तोड़ने के बाद, वही चेतना किसी सिसकते बालक की तरह कातर होकर भाषा के टुकड़ों को समेटती है, सँजोती है और जीवन को नए अर्थ में प्रतिष्ठित करती है। यहाँ विवेक के साथ करुणा का वह संतुलन स्थापित होता है जो कुंवर नारायण को समकालीन हिंदी कविता में विशिष्ट बनाता है। उनकी करुणा ‘पूजा के दूभ-सी कोमल नीहार-धुली संसृति’ और ‘बाल-मानवता के स्वाभाविक सपनों’ का आह्वान करती है। यह करुणा आधुनिक यांत्रिक सभ्यता और बाज़ारवादी कोलाहल के विरुद्ध एक सात्विक, अहिंसक और मानवीय विकल्प खड़ा करती है।
इस प्रकार, ‘चक्रव्यूह’ से आरंभ हुई यात्रा ‘परिवेश: हम-तुम’ के मानवीय सरोकारों से गुज़रती हुई ‘माध्यम’ कविता में अपने दार्शनिक और सौंदर्यशास्त्रीय चरम तक पहुँचती है। कुंवर नारायण का संपूर्ण रचना-संसार यह सिद्ध करता है कि सच्चा साहित्य वही है जो अपने समय के भीषण कोलाहल, वैचारिक बिखराव और यांत्रिक दबावों के बीच भी विवेक के प्रकाश को मद्धिम नहीं होने देता और करुणा की कोमलता को मरने नहीं देता। ‘माध्यम’ कविता इसी विवेक और करुणा के अमर संतुलन का एक अद्वितीय, विशद और कालजयी काव्यात्मक आलेख है।
‘माध्यम’ कविता और उनके कालजयी प्रबंध-काव्य ‘आत्मजयी’ का तुलनात्मक अनुशीलन उनके सौंदर्यशास्त्रीय सरोकारों की एक साझा धुरी को उजागर करता है। जहाँ ‘माध्यम’ एक प्रगीतात्मक और आत्मपरक रचना के रूप में भाषा, सर्जनात्मक चेतना और सामाजिक कोलाहल के आंतरिक रूपांतरण पर ध्यान केंद्रित करती है, वहीं ‘आत्मजयी’ कठोपनिषद के नचिकेता-प्रसंग पर आधारित एक वृहद् प्रबंधात्मक संरचना में मृत्यु, भौतिकतावादी यांत्रिकता और आत्म-साक्षात्कार के द्वंद्व को आधुनिक सौंदर्यबोध से जोड़ती है। दोनों ही रचनाएँ अपने-अपने शिल्पगत ढाँचे में भिन्न होते हुए भी दार्शनिक और मानवीय स्तर पर एक ही सौंदर्यशास्त्रीय स्रोत से ऊर्जा ग्रहण करती हैं।
दोनों रचनाओं का पहला महत्त्वपूर्ण सौंदर्यशास्त्रीय आयाम रूढ़ियों के विखंडन और प्रामाणिक अभिव्यक्ति की खोज से जुड़ता है। ‘माध्यम’ कविता में कवि जब ‘कला के इस विदीर्ण पूर्वग्रह मात्र को सौन्दर्य का कोई नया कलेवर दो’ का पुकार लगाता है, तो वह थेओडोर अडोर्नो के ‘नकारात्मक सौंदर्यशास्त्र’ की तर्ज़ पर कला के पुराने, फटे हुए और यांत्रिक आवरण को त्यागने का आह्वान कर रहा होता है। ठीक इसी प्रकार, ‘आत्मजयी’ में नचिकेता अपने पिता वाजश्रवा के बाह्य आडंबरयुक्त, निष्प्राण यज्ञों और बूढ़ी, अशक्त गायों के दान रूपी कर्मकांडीय रूढ़ियों के विरुद्ध विद्रोह करता है। नचिकेता का यह प्रतिवाद वास्तव में विचारहीन परंपरा के ‘विदीर्ण पूर्वग्रहों’ को तोड़कर सत्य की नई और जीवंत खोज का ही सौंदर्यशास्त्रीय विस्तार है। दोनों ही कृतियों में सौंदर्य किसी पूर्व-निर्धारित या जड़ नियम में नहीं, बल्कि स्थापित ढाँचों को चुनौती देने वाली सजीव चेतना में बसता है।
अस्तित्व के सत्य का अनावरण और साधारण का कायांतरण दोनों कृतियों की साझी धुरी है। मार्टिन हाइडेगर के ‘सत्य के अनावरण’ के दार्शनिक आलोक में देखें, तो ‘माध्यम’ कविता में कवि ‘हाड़-सी बिजलियों की तरह भभककर’ केवल संसार के कड़वे यथार्थ को नग्न नहीं करता, बल्कि अस्तित्व को बिल्कुल नए अर्थों में प्रकाशित करता है। यह कौंध ही जीवन की निरर्थकता के बीच प्रामाणिक अर्थ जगाती है। दूसरी ओर, ‘आत्मजयी’ में नचिकेता का यमराज के साथ संवाद मृत्यु जैसी अटल और भयानक भयावहता के ढके हुए यथार्थ को उघाड़ता है। नचिकेता यम से तीन वरदान माँगते हुए मृत्यु के पार छिपे जीवन के अंतिम सत्य को प्रकाशित करता है। दोनों कृतियों में सौंदर्यशास्त्र यथार्थ की केवल सतही रिपोर्टिंग करके विराम नहीं लेता, बल्कि वह अंधेरे और त्रासदी के भीतर से अस्तित्व के नए, उदात्त आलोक को बाहर खींच लाता है।
आधुनिक मशीनी सभ्यता के दबावों के बरक्स दोनों रचनाएँ एक बेहद सूक्ष्म, अहिंसक और मानवीय विकल्प प्रस्तुत करती हैं। ‘माध्यम’ कविता जहाँ औद्योगिक समाज के तनावों, यांत्रिक शोर और वर्ग-द्वंद्वों को ‘कोलाहल’ के रूप में चिन्हित करती है और उसे अपने आंतरिक आकाश में समाहित करके ‘सात्विक शांति’ तथा ‘बाल-मानवता के स्वाभाविक सपनों’ में बदलने का स्वप्न देखती है, वहीं ‘आत्मजयी’ में नचिकेता का चरित्र आधुनिक भौतिकतावादी समाज की लिप्सा के विरुद्ध आत्म-नियंत्रण और नैतिक विवेक का विकल्प बनता है। ‘माध्यम’ की ‘दूभ-सी कोमल, नीहार-धुली दुधमुँही संसृति’ का सौंदर्य ‘आत्मजयी’ में नचिकेता द्वारा अर्जित उस ज्ञान और आत्म-जय से जाकर मिलता है जो भावी पीढ़ी को मृत्यु के भय और जीवन की असारता से मुक्त कराता है।
कुल मिलाकर कुंवर नारायण ‘माध्यम’ कविता के ज़रिए प्रगीत के छोटे कैनवास पर भाषा और चेतना का जो सूक्ष्म परिष्कार घटित करते हैं, उसी को ‘आत्मजयी’ के प्रबंधात्मक कैनवास पर एक पौराणिक रूपक के माध्यम से विराट मानवीय विवेक में रूपांतरित कर देते हैं। कुंवर नारायण की ‘माध्यम’ कविता हिन्दी कविता के इतिहास में एक ऐसा अनूठा पड़ाव है जो भाषा के पुनर्सृजन, अस्तित्व के अर्थ-प्रकाशन और बाह्य कोलाहल के आंतरिक रूपांतरण के ज़रिए अंततः बाल-मानवता की रक्षा तथा सात्विक शांति पर विश्राम लेती है। यह रचना सिद्ध करती है कि सच्चा सौंदर्यशास्त्र केवल बाह्य आलंकारिकता या रूप-विधान की सजावट नहीं है, बल्कि वह कोलाहल को शांत करने, मृत्यु और भय पर विजय पाने और मनुष्य की मौलिक मासूमियत व आत्मिक संप्रभुता को बचाए रखने का एक अखंड मानवीय दायित्व है।
सन्दर्भ
बुनियादी पाठ
कुंवर नारायण. ‘माध्यम’ (कविता). प्रतिनिधि कविताएँ. राजकमल प्रकाशन. 2008
https://www.hindwi.org/kavita/madhyam-kunwar-narayan-kavita
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*प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), हिन्दी विभाग, हैदराबाद विशाविद्यालय.संपर्क: raviranjan@uohyd.ac.in
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