समकालीन हिंदी साहित्य में कवि-आलोचक प्रोफ़ेसर विजय बहादुर सिंह की पहचान एक ऐसे प्रखर आलोचक के रूप में है, जिन्होंने मध्यकाल से लेकर समकालीन साहित्य और संस्कृति के विविध आयामों पर गहराई से विचार किया है। किंतु, उन्हें सिर्फ़ एक प्रतिष्ठित आलोचक के रूप में देखना उनके बहुआयामी साहित्यिक व्यक्तित्व के साथ अधूरा न्याय होगा। उनकी कविताएँ जीवन के साधारण अनुभवों में छुपे गहरे अस्तित्वगत और दार्शनिक प्रश्नों को सहजता से उकेरती हैं।
‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में हम प्रोफ़ेसर रवि रंजन का विचारोत्तेजक और गहन पाठ-विश्लेषण पर आधारित आलेख—‘विजय बहादुर सिंह की कविता: जीवन, स्मृति और अस्तित्व का सौन्दर्यशास्त्र’ प्रकाशित कर रहे हैं।
इस आलेख में विजय बहादुर सिंह की चुनिंदा कविताओं के सूक्ष्म पाठ-विश्लेषण के ज़रिए यह स्पष्ट किया है कि किस प्रकार वे बहुत कम शब्दों में रोज़मर्रा की ज़िन्दगी के सहज बिम्बों के माध्यम से संवेदना की अनेक परतें खोलते हैं।
आलेख का एक विशेष आकर्षण श्रीमद्भागवत के ‘वेणु-गीत’ के साथ मंगलेश डबराल की बाँसुरी विषयक कविता के साथ विजय बहादुर सिंह की ‘पतझर की बाँसुरी’ का किया गया तुलनात्मक एवं अंतर-पाठीय विश्लेषण है, जो कविता के सौंदर्यशास्त्र को एक व्यापक सांस्कृतिक फलक प्रदान करता है।
— हरि भटनागर
विजय बहादुर सिंह की कविता : जीवन, स्मृति और अस्तित्व का सौन्दर्यशास्त्र
रवि रंजन
कवि-आलोचक विजय बहादुर सिंह ने अपने लेखन की शुरुआत आलोचना से की, लेकिन आगे चलकर उन्होंने काव्य-सृजन के साथ-साथ संस्मरण, जीवनी, शिक्षा तथा समाज के ज्वलंत प्रश्नों पर भी प्रचुरता से लिखा। उनकी आलोचना का दायरा मध्यकाल और छायावाद से लेकर समकालीन कविता, उपन्यास तथा साहित्य की सामाजिक भूमिका तक विस्तृत है।
उनकी प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकों में ‘छायावाद के कवि : प्रसाद, निराला और पन्त’, ‘नागार्जुन का रचना-संसार’, ‘कविता और संवेदना’, ‘उपन्यास : समय और संवेदना’, ‘मुक्तिसंघर्ष और साहित्यकार की भूमिका’, ‘कविता की स्वदेशी तेजस्विता और भवानी प्रसाद मिश्र’ तथा ‘लोकप्रिय कविता की कसौटियाँ’ शामिल हैं। वहीं ‘महादेवी की कविता का नेपथ्य’, ‘जातीय अस्मिता के प्रश्न और जयशंकर प्रसाद’, ‘आलोचना का प्रतिपक्ष’, ‘सत्ता-समाज और देश’ तथा ‘मध्यकाल के मेरे प्रिय कवि’ जैसी कृतियाँ उनके व्यापक आलोचनात्मक सरोकारों को उजागर करती हैं।
उन्होंने ‘आलोचक का स्वदेश’ शीर्षक से अपने गुरु आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की जीवनी लिखी है, साथ ही साहित्य अकादेमी के लिए ‘दुष्यन्त कुमार’ पर एक मोनोग्राफ भी तैयार किया है। उनके संवाद और संस्मरणपरक लेखन के विविध रूप ‘कवि-संवाद एवं संस्मरणात्मक आलोचना’, ‘नागार्जुन-संवाद’ और ‘समकालीनों से संवाद’ में देखने को मिलते हैं। इसके अतिरिक्त, ‘अनभिजात का सौन्दर्य’, ‘अँधेरे में मशाल : नागार्जुन रचना संचयन’ और ‘वह मणियारा साँप’ उनकी अन्य उल्लेखनीय कृतियाँ हैं।
मौसम की चिट्ठी’, ‘पृथ्वी का प्रेमगीत’, ‘पतझर की बाँसुरी’, ‘शब्द जिन्हें भूल गयी भाषा’, ‘अर्ध सत्य का संगीत’ और ‘फूल को याद थे सारे मौसम’ उनके प्रमुख कविता-संग्रह हैं। ‘भीम बैठका’ तथा ‘तुम जो सचमुच भारत भाग्य विधाता हो’ उनकी स्वतंत्र लंबी कविताएँ हैं, जबकि ‘भीम बैठका तथा अन्य कविताएँ’ में उनकी दीर्घ कविताओं का संकलन है। वहीं, ‘आपके लाये हुए दिन’ में उनके गीत और ग़ज़ल संग्रहीत हैं। इन रचनाओं में प्रकृति, समय, जीवनानुभव, सामाजिक यथार्थ और मानवीय संवेदना के विविध रूप प्रकट होते हैं।
भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता के निदेशक के रूप में पत्रिका ‘वागर्थ’ का संपादन करने के साथ-साथ उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का संपादन भी किया है। इनमें ‘अंग्रेजों से पहले का भारत और भारतीय चित्त’, ‘मानस और काल’, ‘समकालीनों की नज़र में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल’ तथा ‘संस्कृति-संवाद’ प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने भवानी प्रसाद मिश्र, दुष्यन्त कुमार और नन्ददुलारे वाजपेयी की रचनावलियों का संपादन किया है, जिनमें ‘भवानी प्रसाद मिश्र : संस्मरण और आलोचना’, ‘वसन्त पोतदार : एक असाधारण गद्य शिल्पी’ तथा ‘आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ग्रंथावली’ उनके विशिष्ट संपादकीय अवदान के उदाहरण हैं।
इस प्रकार, विजय बहादुर सिंह का साहित्यिक व्यक्तित्व आलोचना, कविता, जीवनी, संस्मरण और संपादन जैसे विविध क्षेत्रों में समाहित है। उनकी रचनात्मक और आलोचनात्मक सक्रियता हिंदी साहित्य को उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय संदर्भों में पुनर्परिभाषित करती है। हाल ही में प्रकाशित उनकी कृति ‘महाभारत कथा : वर्ण, जाति और स्त्री’ उनके इस व्यापक चिंतन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
विजय बहादुर सिंह हिंदी के ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाओं में जीवन के साधारण अनुभव भी गहरे अर्थ समेटे हुए प्रतीत होते हैं। उन्हें केवल एक प्रतिष्ठित आलोचक के रूप में देखना उनके कवि-कर्म की विशिष्टता को ओझल करना होगा। उनकी कविताएँ मनुष्य, प्रकृति, समय, स्मृति और सामाजिक यथार्थ के अंतरसंबंधों को अत्यंत सहज भाषा में उकेरती हैं। इनमें घर, फूल, गंध, तितली और साँस जैसे परिचित बिम्ब केवल दृश्य बनकर नहीं रहते, बल्कि जीवन की जटिलताओं, अकेलेपन, विस्थापन और अस्तित्व के बुनियादी प्रश्नों से जुड़ जाते हैं।
प्रस्तुत आलेख में उनकी चुनिंदा कविताओं के पाठ-विश्लेषण के माध्यम से उनकी काव्य-दृष्टि और शिल्प-सौंदर्य को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। इसमें यह देखने की कोशिश की गई है कि वे किस प्रकार कम शब्दों, संक्षिप्त पंक्तियों और सहज बिम्बों के सहारे अर्थ की बहुविध परतें खोलते हैं। साथ ही, उनकी कविता में विचार और संवेदना के अद्वैत, प्रकृति के मानवीय संबंधों तथा उपस्थिति और अनुपस्थिति के द्वंद्व पर भी विचार किया गया है। इस विवेचन का मूल उद्देश्य विजय बहादुर सिंह के कवि-व्यक्तित्व को उनकी आलोचनात्मक पहचान से इतर, उनकी अपनी स्वतंत्र रचनात्मक विशिष्टता के साथ रेखांकित करना है।
उनकी कविता का अपना एक स्वतंत्र अनुभव-संसार है, इसलिए उन्हें केवल एक प्रतिष्ठित आलोचक के रूप में देखना या पढ़ना उनके कवि-कर्म के साथ न्याय नहीं होगा। उनकी कविताओं में जीवन, समय, मनुष्य, प्रकृति, प्रेम, स्मृति, अकेलापन और सामाजिक यथार्थ से जुड़े तमाम प्रश्न अपनी विशिष्ट काव्यात्मक अभिव्यक्ति पाते हैं।
उनके कवि-कर्म का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि वे सामान्य जीवन के सूक्ष्म-से-सूक्ष्म अनुभवों में भी व्यापक मानवीय और दार्शनिक अर्थ खोज लेते हैं। उनके यहाँ तितली, फूल, गंध, साँस, घर या बंद दरवाज़ा केवल दृश्य मात्र नहीं हैं; वे मनुष्य के अस्तित्व, उसकी स्मृतियों, उसके अकेलेपन और उसके सामाजिक संबंधों की परतें खोलते हैं।
‘निष्कासन’ विजय बहादुर सिंह की सामाजिक और अस्तित्वगत चेतना को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण कविता है। इसकी शुरुआती पंक्तियाँ इस प्रकार हैं: ‘मैं ही था / उसका सबसे पहला नागरिक / मुझे ही बेदख़ल किया गया सबसे पहले’। इन पंक्तियों में एक गहरा विरोधाभास है। जिस व्यक्ति का किसी संसार के निर्माण और विकास में सबसे पहले योगदान रहा हो, उसी को उस दुनिया से बाहर कर दिया गया है। यहाँ निष्कासन का अर्थ केवल किसी स्थान से निकाल दिया जाना नहीं है। यह अपने ही संसार में अधिकारहीन और पराया बना दिए जाने की स्थिति है। ‘पहला नागरिक’ होने का दावा व्यक्ति की मूलभूत गरिमा और उसके अधिकारों की याद दिलाता है, जबकि ‘बेदख़ल’ किए जाने का अनुभव उस व्यवस्था की विसंगति को उजागर करता है जो आदमी के श्रम और योगदान का लाभ तो उठाती है, पर उसका हक़ मारने से बाज़ नहीं आती ।
इस कविता को आधुनिक सभ्यता की उस संरचना के विरुद्ध भी पढ़ा जा सकता है, जहाँ मनुष्य अपने श्रम से पूरे संसार का निर्माण तो करता है, किंतु उस पर उसका अपना अधिकार ही नहीं रह जाता। कविता का वक्ता यहाँ किसी अमूर्त या काल्पनिक अन्याय की शिकायत नहीं कर रहा, बल्कि अपने ही निर्मित संसार में स्वयं की जगह खो देने की कारुणिक विडंबना को व्यक्त कर रहा है। इस प्रकार, यह कविता नागरिकता, स्वामित्व, अधिकार और सामाजिक बहिष्कार के प्रश्नों को एक साथ रेखांकित करती है। यहाँ एक व्यक्ति का निजी अनुभव सिमटकर व्यापक सामाजिक यथार्थ में रूपांतरित हो जाता है।
‘साँवली ख़ामोशी’ में कवि की प्रकृति-दृष्टि और रंग-संवेदना सामने आती है:‘धरती साँवली है / साँवली है समुद्र की गहराई /
साँवली है नीले आसमान की मुस्कान’। इन पंक्तियों में साँवला रंग प्रकृति के अनेक रूपों को एक सूत्र में बाँधता है। धरती, समुद्र और आकाश के बीच रंग का यह सम्बन्ध केवल दृश्यात्मक समानता पैदा नहीं करता, बल्कि एक विशिष्ट संवेदनात्मक संसार भी रचता है। साँवलापन यहाँ गहराई, रहस्य, आत्मीयता और स्मृति का रंग बन जाता है। कवि इस रंग को किसी एक वस्तु की पहचान तक सीमित नहीं रखता। वह उसे ख़ामोशी और कल्पना जैसी अमूर्त अनुभूतियों से भी जोड़ता है।
यहाँ प्रकृति और मनुष्य की आन्तरिक दुनिया के बीच कोई कठोर विभाजन नहीं है। बाहर दिखाई देने वाले रंग मनुष्य की स्मृतियों और भावनाओं में भी प्रवेश करते हैं। इसीलिए ख़ामोशी का भी एक रंग हो सकता है और कल्पना भी किसी रंग में अनुभव की जा सकती है। कविता का सौंदर्य इसी बिन्दु पर विकसित होता है कि वह दृश्य और अदृश्य, बाहरी प्रकृति और भीतरी चेतना को एक-दूसरे के निकट ले आती है। साँवले रंग के माध्यम से कवि एक ऐसे सौंदर्यबोध की रचना करता है जो चमक और आकर्षण की सामान्य धारणाओं से अलग है।
‘सुबह-शाम’ में कवि बहुत कम शब्दों में समय और प्रकृति के सम्बन्ध को पकड़ता है: ‘सुबह-सुबह / तितली आई /भर दुपहर रही / शाम हुई / तितली गई’। इस कविता में एक तितली के आने और चले जाने की सामान्य-सी घटना समय के अनुभव में बदल जाती है। सुबह से शाम तक का पूरा दिन तितली की उपस्थिति और अनुपस्थिति के माध्यम से सामने आता है। कविता में न कोई बड़ी घटना है और न कोई असाधारण दृश्य। इसके बावजूद इसमें जीवन की क्षणभंगुरता का एक सहज बोध मौजूद है। तितली का आना दिन को एक सौंदर्य देता है और उसका चले जाना उस सौंदर्य के अस्थायी होने का एहसास कराता है।
कविता की संरचना भी उसके अर्थ को विकसित करती है। छोटी पंक्तियाँ समय की गति के साथ आगे बढ़ती हैं। ‘आई’, ‘रही’ और ‘गई’ जैसे सामान्य क्रियापदों के सहारे कवि एक पूरे दिन का अनुभव रच देता है। इस कविता में प्रकृति किसी सजावटी पृष्ठभूमि की तरह उपस्थित नहीं है। वह समय को समझने और जीवन की गति को महसूस करने का माध्यम बनती है। यह कविता बताती है कि कविता के लिए बड़े अनुभवों और असाधारण घटनाओं की आवश्यकता नहीं होती। कई बार जीवन का कोई छोटा-सा दृश्य भी मनुष्य को अपने अस्तित्व के बारे में सोचने के लिए प्रेरित कर सकता है।
मज़ाज की ‘ऐ ग़मे-दिल क्या करूँ, ऐ वहशते-दिल क्या करूँ’ का स्मरण कराती विजय बहादुर सिंह की ‘लगातार’ कविता में आदमी की अंदरुनी हालत, अकेलापन और घर की स्मृति एक साथ व्यक्त हुई है : ‘थक कर /लौटना चाहता हूँ /बंद हो चुके दरवाज़े/ रात अँधेरी है /कोई नहीं है साथ’। इस कविता के अंतिम पंक्ति – ‘घर याद आ रहा है/लगातार’- से गुज़रते हुए ग़ालिब की ‘दश्त को देख के घर याद आया’ की याद न आए, यह नामुमकिन है ।
यहाँ घर सिर्फ़ एक भौतिक स्थान नहीं है। वह सुरक्षा, आत्मीयता और अपनेपन का प्रतीक है। कविता का व्यक्ति थका हुआ है और लौटना चाहता है, लेकिन उसके सामने बंद दरवाज़े हैं। रात अँधेरी है और साथ देने वाला भी कोई नहीं है। इस स्थिति में घर की याद एक भावनात्मक आश्रय बन जाती है। लेकिन कविता का तनाव इस बात में है कि घर की स्मृति जितनी गहरी है, वहाँ लौटने की सम्भावना उतनी ही अनिश्चित दिखाई देती है।
‘बंद हो चुके दरवाज़े’ सिर्फ़ किसी मकान के दरवाज़े नहीं हैं। उन्हें मनुष्य के जीवन में बन्द हो चुके आत्मीय सम्बन्धों, संवादहीनता और सामाजिक दूरी के संकेत के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। घर की याद का ‘लगातार’ बने रहना बताता है कि मनुष्य के भीतर अपनेपन की तलाश समाप्त नहीं होती। वह जीवन की तमाम व्यस्तताओं और संघर्षों के बीच किसी ऐसी जगह की खोज करता रहता है जहाँ उसे अपने होने का सहज एहसास मिल सके। इस अर्थ में कविता का अकेलापन निजी अनुभव होते हुए भी आधुनिक जीवन की व्यापक समस्या से जुड़ जाता है।
‘परिदृश्य’ में कवि जीवन और मृत्यु के सम्बन्ध को एक छोटे-से दृश्य के माध्यम से व्यक्त करता है:‘फूल से लड़कर / चली गई है / गंध / साँस / साथ छोड़ गई है /देह का’। फूल और गंध का सम्बन्ध सामान्यतः सहज और अविभाज्य माना जाता है। लेकिन यहाँ गंध का फूल से अलग हो जाना एक गहरे विघटन का संकेत देता है। फूल का अस्तित्व बचा रह सकता है, लेकिन उसकी गंध चली गई है। इसी तरह देह और साँस के सम्बन्ध में भी जीवन की उपस्थिति और अनुपस्थिति का प्रश्न जुड़ता है।
कवि ने दो अलग-अलग अनुभवों को एक ही संवेदनात्मक धरातल पर रख दिया है। फूल से गंध का अलग होना और देह से साँस का सम्बन्ध टूटना दोनों अस्तित्व के भीतर घटित होने वाली रिक्तता की ओर संकेत करते हैं। कविता में प्रकृति का बिम्ब मनुष्य के जीवन की स्थिति को समझने का माध्यम बन जाता है। शीर्षक ‘परिदृश्य’ भी इस दृष्टि से अर्थपूर्ण है। कवि किसी बाहरी दृश्य का वर्णन भर नहीं करता, बल्कि उस दृश्य के भीतर छिपे विघटन और उसकी दार्शनिक अर्थवत्ता को सामने लाता है।
‘यात्रा’ में भी फूल के माध्यम से अस्तित्व और स्मृति का प्रश्न उठता है: ‘फूल / जो गिरा /नहीं है अब / दृष्टि में / सृष्टि में नहीं है /
फूल’। यहाँ फूल का गिरना केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं है। कविता दृष्टि और सृष्टि के बीच एक सम्बन्ध स्थापित करती है। कोई वस्तु हमारी दृष्टि से ओझल हो जाए तो क्या उसका अस्तित्व भी समाप्त हो जाता है? क्या किसी वस्तु का होना केवल हमारे देखने पर निर्भर करता है? कविता इन प्रश्नों को सीधे दार्शनिक भाषा में नहीं पूछती, बल्कि फूल के माध्यम से उन्हें अनुभव का हिस्सा बना देती है।
‘दृष्टि’ और ‘सृष्टि’ के बीच ध्वन्यात्मक निकटता भी कविता के अर्थ को गहरा करती है। कवि जैसे यह संकेत देता है कि मनुष्य जिस संसार को देखता और अनुभव करता है, उसकी सृष्टि में उसकी दृष्टि की भी भूमिका होती है। किसी वस्तु का हमारी स्मृति और चेतना से बाहर हो जाना उसके अस्तित्व के अनुभव को भी बदल देता है। इस तरह कविता में अनुपस्थिति, स्मृति और अस्तित्व के प्रश्न एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
इन कविताओं को एक साथ पढ़ने पर विजय बहादुर सिंह की काव्य-दृष्टि के कुछ महत्त्वपूर्ण पक्ष सामने आते हैं। उनकी कविता में सामान्य वस्तुएँ और दृश्य व्यापक अर्थ ग्रहण करते हैं। तितली, फूल, गंध, साँस, घर और दरवाज़े जैसे बिम्ब अपने सामान्य अर्थों से आगे बढ़कर जीवन की जटिलताओं को व्यक्त करने लगते हैं। वे किसी अमूर्त दार्शनिक विचार को सीधे प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि उसे किसी दृश्य अथवा अनुभूति के भीतर रखकर पाठक तक पहुँचाते हैं।
उनकी कविता में अकेलापन, स्मृति और विस्थापन के अनुभव भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ‘लगातार’ में घर की याद और ‘निष्कासन’ में अपने ही संसार से बेदख़ल किए जाने की स्थिति को साथ रखकर देखें तो मनुष्य के अपनेपन और अधिकार का प्रश्न बार-बार सामने आता है। एक कविता में व्यक्ति अपने घर लौटना चाहता है, दूसरी में उसे उसके अपने संसार से निकाल दिया गया है। दोनों स्थितियों के भीतर मनुष्य की उस मूलभूत आकांक्षा को पहचाना जा सकता है जो अपने लिए एक सुरक्षित और आत्मीय जगह चाहती है।
उनका प्रकृति-बोध भी इसी मानवीय संवेदना से जुड़ा हुआ है। प्रकृति उनकी कविता में केवल सौंदर्य का विषय नहीं है। वह मनुष्य के अनुभवों को समझने और व्यक्त करने का माध्यम है। ‘साँवली ख़ामोशी’ में रंग मनःस्थिति का रूप ग्रहण करता है, ‘सुबह-शाम’ में तितली समय की गति को व्यक्त करती है और ‘परिदृश्य’ तथा ‘यात्रा’ में फूल अस्तित्व और अनुपस्थिति के प्रश्नों से जुड़ जाता है। इस तरह प्रकृति और मनुष्य का सम्बन्ध उनकी कविता में एक जीवंत संवेदनात्मक सम्बन्ध बनकर उभरता है।
उनकी भाषा की मितव्ययिता भी ध्यान खींचती है। वे बहुत कम शब्दों में अर्थ की कई परतें खोलते हैं। छोटी पंक्तियाँ, सामान्य शब्द, सहज वाक्य-विन्यास और बिम्बों की अर्थगर्भिता उनकी काव्य-भाषा की पहचान हैं। उनकी कविताओं में विचार किसी दार्शनिक व्याख्यान की तरह नहीं आता। वह दृश्य, संकेत और अनुभव के माध्यम से विकसित होता है। इसीलिए उनकी छोटी कविताएँ भी पाठक के भीतर देर तक बनी रहती हैं।
विजय बहादुर सिंह के कवि-कर्म का समग्र मूल्यांकन करते समय उनकी उन कविताओं को भी विस्तार से देखना आवश्यक है जिनमें श्रम, सामाजिक विषमता, सामूहिक जीवन, राजनीतिक चेतना, भाषा और सृजन के प्रश्न उठते हैं। ‘काम के दलदल में’, ‘रोटियाँ’, ‘समूह-गीत’, ‘भरोसा’, ‘तेवर’, ‘विधान’, ‘उदासी, परत-दर-परत’, ‘जीवाश्म’, ‘शब्देतर’, ‘शब्द उदास हैं’, ‘कुछ सपने’, ‘देखिए पेड़ को’, ‘यह ज़िंदगी’, ‘संवाद’ और ‘सृजन’ जैसी कविताओं को भी इसी आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जाना चाहिए। इनसे उनके कवि-कर्म के सामाजिक और वैचारिक पक्षों को समझने में मदद मिलेगी।
इस शुरुआती विवेचन से इतना स्पष्ट होता है कि विजय बहादुर सिंह की कविता में मनुष्य और उसके संसार के बीच सम्बन्धों की पड़ताल लगातार चलती रहती है। वे जीवन के सामान्य दृश्यों में छिपी असामान्य स्थितियों को पहचानते हैं। उनके यहाँ सौंदर्य और विषाद, स्मृति और विस्थापन, प्रकृति और अस्तित्व, व्यक्ति और समाज एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। उनकी कविता की शक्ति इसी में है कि वह किसी अनुभव को एक निश्चित अर्थ में बाँधने के बजाय उसके भीतर छिपे दूसरे अर्थों और सम्भावनाओं को भी सामने लाती है।
इन कविताओं को एक साथ रखकर पढ़ने पर उनका कवि-कर्म मनुष्य के अस्तित्व, उसकी सामाजिक स्थिति और उसके भीतर लगातार चलने वाले आत्मसंघर्ष की पड़ताल करता दिखाई देता है। इन कविताओं की विशेषता यह है कि वे जीवन के अनुभवों को किसी एक भाव या विचार तक सीमित नहीं करतीं। यहाँ प्रकृति है, लेकिन प्रकृति का चित्रण अपने आप में लक्ष्य नहीं है। यहाँ घर और स्मृति हैं, लेकिन उनका सम्बन्ध केवल निजी भावुकता से नहीं है। यहाँ फूल, गंध, तितली, धरती और आकाश हैं, लेकिन ये बिम्ब किसी सजावटी सौंदर्यबोध का हिस्सा बनकर नहीं आते। इनके माध्यम से कवि मनुष्य के होने, उसके संसार से सम्बन्ध, उसकी असुरक्षा, उसकी आकांक्षाओं और उसके सामने उपस्थित अस्तित्वगत प्रश्नों को समझने की कोशिश करता है।
इन कविताओं का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि कवि जीवन को स्थिर और पहले से तय अर्थों में नहीं देखता । उसके यहाँ किसी वस्तु का अर्थ उसके बाहरी रूप से निर्धारित नहीं होता। वह अपने सम्बन्धों, अपनी उपस्थिति और अनुपस्थिति तथा मनुष्य की चेतना के साथ उसके संवाद से निर्मित होता है। इसीलिए उनकी कविता में सामान्य दृश्य भी विचार का आधार बन जाते हैं। वे किसी दार्शनिक निष्कर्ष को पहले से तय करके कविता नहीं लिखते, बल्कि अनुभव के भीतर उतरकर उसके अर्थ तक पहुँचते हैं। उनकी कविता की संवेदना और विचारशीलता इसी प्रक्रिया में विकसित होती है।
इन कविताओं को ध्यान से पढ़ने पर एक ऐसी आन्तरिक यात्रा का पता चलता है जो मनुष्य के अपने संसार से सम्बन्ध की पड़ताल से शुरू होकर उसके अस्तित्व, स्मृति, समय और चेतना के प्रश्नों तक पहुँचती है। इस यात्रा में बाहर की दुनिया और भीतर का संसार लगातार एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। मनुष्य जिस दुनिया में रहता है, वह दुनिया उसे केवल आश्रय नहीं देती, बल्कि कई बार उसे उसके अधिकारों से वंचित भी करती है। वह अपने परिवेश में रहते हुए भी उससे कट सकता है। वह किसी स्थान से दूर होकर भी उसे अपने भीतर बचाए रख सकता है। वह किसी वस्तु को खोकर भी उसकी अनुपस्थिति को अपने अनुभव का हिस्सा बना सकता है। विजय बहादुर सिंह इन स्थितियों को किसी एक दार्शनिक अवधारणा के सहारे नहीं समझाते। वे ऐसी काव्यात्मक परिस्थितियाँ रचते हैं जिनमें पाठक स्वयं इन प्रश्नों से मुठभेड़ करता है।
इन कविताओं की एक बड़ी विशेषता यह है कि इनमें मनुष्य की उपस्थिति हमेशा सहज और सुनिश्चित नहीं है। वह अपने संसार का केन्द्र होने का दावा करता है, लेकिन वही संसार उसे बाहर कर देता है। वह घर लौटना चाहता है, लेकिन घर तक पहुँचने के रास्ते बन्द मिलते हैं। वह प्रकृति के सौंदर्य को देखता है, लेकिन उस सौंदर्य के भीतर उसे क्षय, परिवर्तन और अनुपस्थिति के संकेत भी दिखाई देते हैं। इस तरह इन कविताओं में मनुष्य का संसार किसी स्थिर व्यवस्था का नाम नहीं है। वह लगातार बनता और बिगड़ता हुआ संसार है, जिसमें मनुष्य को अपने अस्तित्व का अर्थ भी खोजना है और अपने होने की जगह भी।
‘निष्कासन’ कविता को इस पूरे काव्य-संसार की वैचारिक प्रवेशिका की तरह पढ़ा जा सकता है। कविता में वक्ता का दावा है कि वह दुनिया का पहला नागरिक था, लेकिन उसे ही सबसे पहले बेदख़ल किया गया। इस कथन में केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं है। इसके भीतर सभ्यता के विकास और मनुष्य की वास्तविक स्थिति के बीच मौजूद विरोधाभास छिपा है। मनुष्य ने अपने श्रम, बुद्धि और कल्पना से जिस दुनिया का निर्माण किया, उसी दुनिया में उसकी स्थिति असुरक्षित हो गई। उसके योगदान और उसके अधिकार के बीच दूरी पैदा हो गई। कविता इस दूरी को बहुत तीखे ढंग से सामने लाती है।
यहाँ ‘नागरिक’ शब्द को उसके सामान्य राजनीतिक अर्थ से आगे ले जाकर देखना ज़रूरी है। नागरिक होना केवल किसी राज्य या भूभाग का सदस्य होना नहीं है। इसका सम्बन्ध उस अधिकार-बोध से भी है जिसके कारण मनुष्य अपने संसार में सम्मानपूर्वक रहने की अपेक्षा करता है। कविता का वक्ता अपने लिए इसी बुनियादी अधिकार की माँग करता दिखाई देता है। लेकिन उसकी स्थिति विडम्बनापूर्ण है। उसे दुनिया का मालिक बनाए जाने की कल्पना तो दी गई, पर वास्तविक दुनिया में उसे स्वीकार नहीं किया गया। इस प्रकार कविता मनुष्य को दिए गए आश्वासनों और उसके वास्तविक अनुभव के बीच के फ़र्क को उजागर करती है।
कविता में ‘मैं’ का बार-बार लौटना भी उल्लेखनीय है। यह ‘मैं’ आत्ममुग्ध व्यक्ति का ‘मैं’ नहीं है। यह अपनी स्थिति का हिसाब माँगने वाला ‘मैं’ है। उसकी पुनरावृत्ति में एक तरह का प्रतिवाद है। जैसे वह अपने निष्कासन के बावजूद अपनी उपस्थिति को मिटने नहीं देना चाहता। उसे बाहर कर देने से उसका दावा समाप्त नहीं होता। इस दृष्टि से कविता निष्कासन के विरुद्ध स्मृति और आत्मस्वीकृति की कविता भी बन जाती है। व्यवस्था किसी व्यक्ति को हाशिये पर डाल सकती है, लेकिन उसके अनुभव और उसकी चेतना को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती। यहाँ प्रतिरोध का आधार अपनी पहचान को बचाए रखना है।
इस कविता का एक और अर्थ आधुनिक मनुष्य की बेदखली से जुड़ता है। विकास की प्रचलित धारणाएँ अक्सर यह मानकर चलती हैं कि मनुष्य की प्रगति और उसके संसार की प्रगति एक ही बात है। लेकिन कविता इस विश्वास पर सवाल उठाती है। संसार विकसित हो सकता है, उसके साधन बढ़ सकते हैं, उसकी संरचनाएँ अधिक जटिल हो सकती हैं, फिर भी उसमें रहने वाला मनुष्य अपने अधिकार और आत्मीयता से वंचित हो सकता है। इसीलिए ‘निष्कासन’ को केवल किसी एक व्यक्ति की शिकायत की तरह पढ़ना उसके अर्थ को सीमित करना होगा। यह आधुनिक सभ्यता के भीतर मौजूद उस संकट की ओर संकेत करती है जिसमें मनुष्य अपने ही बनाए संसार में अजनबी होता जा रहा है।
‘साँवली ख़ामोशी’ कविता इस सामाजिक और अस्तित्वगत संकट से एक अलग रास्ते पर चलते हुए सम्बन्धों की दूसरी दुनिया रचती है। यहाँ कवि रंग को केवल दृश्य का गुण नहीं रहने देता। वह उसे अनुभव की ऐसी संवेदना में बदल देता है जो प्रकृति, मनःस्थिति और स्मृति को एक साथ जोड़ती है। धरती और समुद्र से शुरू होने वाला साँवलापन धीरे-धीरे उलझन, मौन, कल्पना और याद तक पहुँचता है। यह विस्तार कविता की मूल रचनात्मक प्रक्रिया है। बाहरी संसार का एक गुण मनुष्य की आन्तरिक दुनिया का गुण बन जाता है।
इस रचना में साँवले रंग की पुनरावृत्ति को केवल अलंकारिक युक्ति मानना पर्याप्त नहीं होगा। यह रंग एक संवेदनात्मक एकता बनाता है। धरती की साँवली उपस्थिति, समुद्र की गहराई और आकाश की मुस्कान अलग-अलग दृश्य हैं, लेकिन कवि उन्हें एक ही भावभूमि में ले आता है। इसके बाद जब यही रंग उलझन और ख़ामोशी से जुड़ता है तो प्रकृति का अनुभव मनुष्य की मानसिक स्थिति में प्रवेश कर जाता है। इस प्रक्रिया में रंग का अर्थ भी बदलता है। वह केवल आँख से देखा जाने वाला गुण नहीं रहता, बल्कि मन से महसूस की जाने वाली स्थिति बन जाता है।
यहाँ ख़ामोशी का साँवला होना विशेष ध्यान देने योग्य है। सामान्यतः मौन को ध्वनि के अभाव के रूप में समझा जाता है, लेकिन कविता उसे एक सकारात्मक संवेदनात्मक उपस्थिति देती है। मौन के भीतर भी रंग, गहराई और अर्थ हो सकते हैं। मनुष्य के अनुभव का बहुत कुछ हिस्सा ऐसा होता है जिसे वह भाषा में व्यक्त नहीं कर पाता। उसकी उलझनें, स्मृतियाँ और कल्पनाएँ हमेशा स्पष्ट कथनों का रूप नहीं लेतीं। कविता उस अव्यक्त संसार को पहचानती है। इसीलिए इसमें ख़ामोशी रिक्तता नहीं, बल्कि अनुभव की एक समृद्ध अवस्था है।
स्मृति का साँवलेपन से जुड़ना भी अर्थपूर्ण है। स्मृति अतीत की घटनाओं को जस का तस सुरक्षित नहीं रखती। समय बीतने के साथ अनुभवों के रंग बदलते रहते हैं। कुछ बातें स्पष्ट बनी रहती हैं, कुछ धुँधली पड़ जाती हैं और कुछ का अर्थ बाद में समझ में आता है। कविता स्मृति को इसी बदलते हुए अनुभव के रूप में देखती है। साँवलापन यहाँ न पूरी रोशनी है, न पूरा अँधेरा। वह दोनों के बीच की ऐसी स्थिति है जिसमें अनेक अर्थ एक साथ बने रहते हैं। इस तरह कविता का रंग-बोध जीवन की जटिलता को स्वीकार करने वाला रंग-बोध है।
‘सुबह-शाम’ में यही संवेदना समय के अनुभव के रूप में सामने आती है। कविता का पूरा संसार एक तितली की दिनभर की उपस्थिति से निर्मित होता है। लेकिन इसकी अर्थवत्ता केवल प्रकृति के किसी सुन्दर दृश्य को दर्ज करने में नहीं है। तितली का आना, ठहरना और चले जाना समय की उस प्रक्रिया को सामने लाता है जिसमें हर उपस्थिति अपने भीतर अनुपस्थिति की सम्भावना भी लिए रहती है।
कविता में समय को घड़ी या कैलेंडर की इकाइयों से नहीं मापा गया। उसे एक जीवित उपस्थिति के माध्यम से अनुभव किया गया है। तितली के आने से सुबह केवल दिन का एक हिस्सा नहीं रहती। वह किसी नई घटना के आरम्भ का संकेत बन जाती है। उसका दिनभर बने रहना समय को एक ठहराव देता है और शाम को उसका चले जाना उस ठहराव को समाप्त कर देता है। इस छोटी-सी घटना में समय का पूरा चक्र समा जाता है।
यहाँ एक बात और गौर करने लायक है। तितली कविता में मनुष्य की तरह कोई विचार व्यक्त नहीं करती, फिर भी उसकी उपस्थिति एक अनुभव पैदा करती है। कवि प्रकृति को मनुष्य की भावनाओं का केवल प्रतिबिम्ब नहीं बनाता, बल्कि उसे अपनी स्वतंत्र गति और अस्तित्व के साथ उपस्थित करता है। तितली आती है, रहती है और चली जाती है। उसका अपना समय है। मनुष्य उस समय का साक्षी है। इस सम्बन्ध में मनुष्य का स्थान भी बदलता है। वह प्रकृति का स्वामी या नियंत्रक नहीं, बल्कि उसकी गति को देखने और महसूस करने वाला एक संवेदनशील प्राणी है।
कविता की लघुता उसके अर्थ को कम नहीं करती, बल्कि उसे अधिक खुला बनाती है। यहाँ किसी घटना पर टिप्पणी नहीं की गई। पाठक को यह नहीं बताया गया कि तितली का चले जाना दुखद है या उसका आना सुखद। कवि अनुभव को उसकी सहजता में रहने देता है। इसी कारण कविता में क्षणभंगुरता का बोध किसी उपदेश में नहीं बदलता। जीवन के बीतने का एहसास अपने आप पैदा होता है। यह एक ऐसी काव्य-दृष्टि है जो अनुभव पर अनावश्यक भावनात्मक दबाव नहीं डालती।
‘लगातार’ कविता में समय का अनुभव अत्यंत निजी और बेचैन रूप ग्रहण कर लेता है, जहाँ व्यक्ति की थकान, वापसी की इच्छा और घर की स्मृतियाँ एक साथ उपस्थित होकर एक जटिल संवेदना का निर्माण करती हैं। लौटने की तीव्र उत्कंठा के सामने खड़ा अवरुद्ध संसार—बंद दरवाज़े, अँधेरी रात और सहचरों का अभाव—यह स्पष्ट करता है कि यहाँ घर मात्र एक भौतिक स्थान न होकर सुरक्षा, स्वीकृति और आत्मीयता की मानवीय आवश्यकता का प्रतीक है। आधुनिक जीवन में घर की बदलती अवधारणा के संदर्भ में देखें तो कविता घर की स्मृति और वहाँ तक पहुँचने की अनिश्चितता के बीच छिपी मूल संवेदना को उजागर करती है, जिसे शहरयार का यह शेर भी रेखांकित करता है:
घर की तामीर तसव्वुर में ही हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है।
इस प्रक्रिया में ‘बेतरतीब परछाइयों’ की उपस्थिति अकेलेपन को और गहरा बनाती है; क्योंकि परछाईं उपस्थिति का आभास तो देती है, पर स्वयं पूर्ण अस्तित्व नहीं होती। इसे कार्ल जुंग के ‘शैडो’ और ‘मिरर’ सिद्धांत के आलोक में भी व्याख्यायित किया जा सकता है, जहाँ ये बेतरतीब परछाइयाँ केवल बाहरी दृश्य न रहकर व्यक्ति के अचेतन मन का वह दर्पण बन जाती हैं, जो उसके आंतरिक भय, विस्थापन और अस्तित्वगत अकेलेपन को प्रतिबिंबित करती हैं; फलस्वरूप, व्यक्ति के आसपास का संसार आकार में भरा हुआ दिखने के बावजूद वास्तविक संबंधों और आत्मीयता से पूरी तरह ख़ाली और शून्यता से भरा प्रतीत होता है।
इस कविता में स्मृति की भूमिका भी इसी वजह से उल्लेखनीय है। घर की याद किसी बीते हुए समय का साधारण स्मरण नहीं है। वह वर्तमान की कमी को पहचानने का ज़रिया है। आदमी को घर इसलिए याद नहीं आता कि वह सिर्फ़ अतीत में जीना चाहता है, बल्कि इसलिए कि वर्तमान में उसे जिस आत्मीयता की ज़रूरत है, वह मौजूद नहीं है। इस अर्थ में स्मृति वर्तमान की आलोचना करती है। वह बताती है कि मनुष्य का जीवन केवल आगे बढ़ने और उपलब्धियाँ अर्जित करने से पूरा नहीं होता। उसे लौटने, ठहरने और किसी के द्वारा स्वीकार किए जाने की भी आवश्यकता होती है।
‘लगातार’ शब्द कविता के अन्त में केवल याद की निरन्तरता नहीं बताता। वह उस मानसिक स्थिति को भी व्यक्त करता है जिसमें व्यक्ति अपनी कमी से छुटकारा नहीं पा रहा। उसकी थकान समाप्त हो सकती है, रात बीत सकती है, लेकिन अपनेपन की तलाश बनी रहती है। कविता इस तलाश को किसी समाधान तक नहीं पहुँचाती। शायद यही उसका यथार्थ है। मनुष्य की कुछ आवश्यकताएँ ऐसी होती हैं जिनका कोई तात्कालिक विकल्प नहीं होता।हिन्दवी
‘परिदृश्य’ में कवि एक ऐसी स्थिति को पकड़ता है जहाँ किसी वस्तु का बाहरी अस्तित्व और उसकी आन्तरिक पहचान अलग-अलग हो जाते हैं। फूल और गंध का सम्बन्ध इस कविता का केन्द्रीय आधार है। फूल दिखाई देता है, लेकिन उसकी गंध उससे अलग हो चुकी है। इसके बाद कवि साँस और देह के सम्बन्ध को सामने रखता है। इन दोनों स्थितियों को एक साथ रखने से कविता में जीवन और अस्तित्व का प्रश्न पैदा होता है।
यहाँ फूल और गंध के बीच का सम्बन्ध केवल प्रकृति का सामान्य सम्बन्ध नहीं है। गंध फूल की ऐसी विशेषता है जिसे आँख से नहीं देखा जा सकता, लेकिन उसके बिना फूल का अनुभव अधूरा हो जाता है। जायसी की पंक्ति “फूल मरै पै मरे न बासू” की तर्ज़ पर कहा जा सकता है कि फूल का दृश्य रूप बचा रह सकता है, पर उसकी गंध के चले जाने से उसकी पहचान का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा समाप्त हो जाता है। इसी तरह देह का भौतिक अस्तित्व और उसमें जीवन की उपस्थिति दो अलग बातें हैं। कवि इन दोनों के बीच सम्बन्ध स्थापित करके यह प्रश्न उठाता है कि किसी वस्तु या व्यक्ति का वास्तविक अस्तित्व किससे बनता है? क्या केवल उसका दिखाई देना पर्याप्त है, या उसकी पहचान उन अदृश्य तत्त्वों से भी बनती है जो उसे जीवन और अर्थ प्रदान करते हैं?
इस कविता में ‘लड़कर’ शब्द विशेष अर्थ रखता है। गंध का फूल से अलग होना किसी सहज प्राकृतिक परिवर्तन की तरह नहीं बताया गया है। कवि इस सम्बन्ध-विच्छेद को संघर्ष का रूप देता है। इससे फूल और गंध के बीच का सम्बन्ध भी बदल जाता है। जो दोनों एक-दूसरे के स्वाभाविक सहचर दिखाई देते हैं, उनके बीच अब तनाव और अलगाव की स्थिति है। इस तरह कविता सम्बन्धों के भीतर छिपे संघर्ष की ओर भी संकेत करती है।
कविता का शीर्षक ‘परिदृश्य’ इस नज़रिए से एक ख़ास अर्थ ग्रहण करता है। परिदृश्य सामान्यतः किसी दृश्य की समग्रता का बोध कराता है, लेकिन यहाँ दृश्य की समग्रता टूट चुकी है। जो चीज़ें एक-दूसरे के साथ मिलकर अपना अर्थ बनाती थीं, वे अलग हो गई हैं। फूल और गंध का सम्बन्ध हो या देह और साँस का, दोनों में एक आन्तरिक एकता के विघटन का अनुभव है। इसीलिए यह कविता केवल मृत्यु का संकेत नहीं देती, बल्कि जीवन को सम्भव बनाने वाले सम्बन्धों की नश्वरता और उनकी अनिवार्यता को भी समझाती है।
‘यात्रा’ में कवि इसी प्रश्न को एक दूसरे धरातल पर ले जाता है। यहाँ फूल की अनुपस्थिति के माध्यम से दृष्टि, स्मृति और अस्तित्व के सम्बन्ध की पड़ताल है। कविता में फूल का गिरना एक सामान्य प्राकृतिक घटना हो सकती है, लेकिन कवि की दिलचस्पी उसके गिरने में नहीं, बल्कि उसके बाद पैदा होने वाली स्थिति में है। फूल अब दृष्टि में नहीं है और इस अनुपस्थिति को कवि सृष्टि से उसके बाहर हो जाने के रूप में व्यक्त करता है।
यहाँ एक बुनियादी दार्शनिक प्रश्न सामने आता है। किसी वस्तु का अस्तित्व क्या हमारी दृष्टि से स्वतंत्र है, या उसके अस्तित्व का हमारा अनुभव हमारी दृष्टि पर भी निर्भर करता है? निश्चित रूप से फूल का भौतिक अस्तित्व हमारी दृष्टि से समाप्त नहीं होता, लेकिन कविता इस वैज्ञानिक या भौतिक तथ्य की चर्चा नहीं करती। उसका सम्बन्ध उस संसार से है जो मनुष्य की चेतना में निर्मित होता है। हमारे लिए किसी वस्तु का अर्थ केवल उसके भौतिक होने से नहीं बनता। वह हमारे देखने, पहचानने, याद रखने और उससे सम्बन्ध बनाने की प्रक्रिया से भी बनता है।
इस नज़रिए से ‘दृष्टि’ और ‘सृष्टि’ का सम्बन्ध कविता की सबसे महत्त्वपूर्ण अर्थ-सम्भावनाओं में से एक है। मनुष्य संसार को सिर्फ़ देखता नहीं है, वह अपनी चेतना के माध्यम से उसका अर्थ भी निर्मित करता है। जिस वस्तु का उसकी दृष्टि से सम्बन्ध टूट जाता है, वह उसके अनुभव-जगत में भी अपना स्थान खोने लगती है। इसका अर्थ यह नहीं कि वस्तु का वास्तविक अस्तित्व समाप्त हो गया, बल्कि यह कि मनुष्य के लिए उसका अनुभव बदल गया है। कविता इसी अन्तर को बहुत कम शब्दों में सामने रखती है।
कविता के शीर्षक को भी इसी संदर्भ में समझना ज़रूरी है । यात्रा का सामान्य अर्थ एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना है, लेकिन इस कविता में यात्रा किसी भौगोलिक गति का विवरण नहीं है। यह उपस्थिति से अनुपस्थिति, दृश्य से अदृश्य और अनुभव से स्मृति की ओर जाने वाली यात्रा है। फूल का गिरना एक क्षण है, लेकिन उस क्षण के बाद मनुष्य के अनुभव में जो परिवर्तन आता है, वही कविता का विषय बनता है। इस तरह यात्रा बाहरी संसार की अपेक्षा चेतना के भीतर घटित होती है।
इस कविता को ‘परिदृश्य’ के साथ रखकर पढ़ने पर एक दिलचस्प सम्बन्ध सामने आता है। दोनों में फूल है, लेकिन दोनों का अर्थ अलग है। ‘परिदृश्य’ में फूल के साथ जुड़ी गंध का अलग होना सम्बन्ध-विच्छेद का बोध कराता है, जबकि ‘यात्रा’ में फूल का दृष्टि से ओझल होना अनुपस्थिति और अनुभव के बदलने का प्रश्न उठाता है। पहली कविता में किसी वस्तु की आन्तरिक पहचान उससे अलग हो रही है, दूसरी में वह वस्तु ही मनुष्य की दृष्टि से बाहर हो गई है। दोनों कविताएँ मिलकर यह समझने में मदद करती हैं कि आदमी की दुनिया सिर्फ़ वस्तुओं की मौजूदगी से नहीं बनती। उनके बीच के सम्बन्ध और मनुष्य की चेतना में उनकी जगह भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है।
इन कविताओं का समग्र अध्ययन कुछ ऐसी विशेषताओं की ओर ध्यान खींचता है जिन्हें अलग-अलग रचनाओं को पढ़ते हुए शायद पूरी तरह नहीं पहचाना जा सकता।
सबसे पहले, विजय बहादुर सिंह के यहाँ ‘अस्तित्व’ का सवाल सिर्फ़ आदमी के ज़िंदा होने का सवाल नहीं है। उसका सम्बन्ध इस बात से है कि व्यक्ति अपने संसार में किस स्थिति में है, उसे वहाँ कितना अधिकार प्राप्त है और उसके आसपास की वस्तुओं तथा मनुष्यों के साथ उसके सम्बन्ध किस तरह के हैं। ‘निष्कासन’ में यह प्रश्न सामाजिक और राजनीतिक रूप ग्रहण करता है। ‘लगातार’ में वह आत्मीयता और घर की तलाश से जुड़ता है। ‘परिदृश्य’ और ‘यात्रा’ में यही प्रश्न जीवन, अनुपस्थिति और चेतना के स्तर पर सामने आता है। इस प्रकार इन कविताओं में अस्तित्व कोई अमूर्त दार्शनिक अवधारणा नहीं, बल्कि मनुष्य के रोज़मर्रा के अनुभवों से पैदा होने वाला प्रश्न है।
दूसरी विशेषता यह है कि कवि की नज़र में संसार और मनुष्य के बीच सम्बन्ध एकतरफ़ा नहीं है। मनुष्य अपने परिवेश को देखता और समझता है, लेकिन परिवेश भी उसकी मानसिक स्थिति को प्रभावित करता है। प्रकृति के रंग उसके भीतर उतरते हैं। समय की गति उसकी स्मृतियों को प्रभावित करती है। घर की भौतिक अनुपस्थिति उसकी मानसिक उपस्थिति को और गहरा करती है। इस तरह बाहरी संसार और आन्तरिक चेतना एक-दूसरे से अलग नहीं रहते। यह सम्बन्ध इन कविताओं के सौंदर्यबोध का आधार है।
तीसरी विशेषता अनुपस्थिति की काव्यात्मक पहचान है। सामान्यतः कविता में किसी वस्तु की उपस्थिति, उसकी सुन्दरता और उसके प्रभाव का वर्णन अधिक दिखाई देता है। विजय बहादुर सिंह की इन कविताओं में अनुपस्थिति भी उतनी ही सक्रिय है। किसी का चला जाना, किसी वस्तु का दिखाई न देना, किसी सम्बन्ध का टूटना या किसी स्थान तक न पहुँच पाना, ये सब ऐसी स्थितियाँ हैं जिनसे कविता का अर्थ बनता है। यहाँ अनुपस्थिति केवल किसी चीज़ की कमी नहीं है। वह अपने पीछे एक अनुभव, एक स्मृति और एक प्रश्न छोड़ जाती है।
इस सन्दर्भ में उनकी कविता को स्मृति के अध्ययन की दृष्टि से भी देखा जा सकता है। स्मृति यहाँ अतीत को सुरक्षित रखने का साधन मात्र नहीं है। वह वर्तमान के अनुभव को भी प्रभावित करती है। घर की याद वर्तमान की अकेली स्थिति को अधिक स्पष्ट करती है। साँवली स्मृति अतीत को किसी निश्चित और स्पष्ट चित्र में नहीं बदलती, बल्कि उसके भीतर मौजूद अस्पष्टता और भावनात्मक गहराई को बनाए रखती है। इस तरह स्मृति इन कविताओं में एक सक्रिय मानसिक प्रक्रिया है। वह मनुष्य के वर्तमान और अतीत के बीच सम्बन्ध बनाती है।
चौथी विशेषता इन कविताओं में प्रकृति की भूमिका से जुड़ी है। कवि प्रकृति को केवल मनुष्य के सुख-दुख का प्रतिबिम्ब नहीं बनाता। तितली, फूल, धरती, समुद्र और आकाश अपने स्वतंत्र दृश्यात्मक अस्तित्व के साथ आते हैं। लेकिन मनुष्य की चेतना उन्हें अपने अनुभव का हिस्सा भी बनाती है। इस सम्बन्ध में प्रकृति और मनुष्य के बीच एक संवाद बनता है। प्रकृति मनुष्य को जीवन की गति, परिवर्तन और नश्वरता का अनुभव कराती है। मनुष्य अपनी चेतना से प्रकृति के इन अनुभवों को अर्थ देता है। इसीलिए इन कविताओं में प्रकृति का सौंदर्य और उसका दार्शनिक अर्थ एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
पाँचवीं विशेषता इन कविताओं की भाषिक संरचना है। विजय बहादुर सिंह की कविता में कम शब्दों का इस्तेमाल केवल संक्षिप्तता का मामला नहीं है। यह अर्थ रचने की एक विशेष पद्धति है। वे किसी दृश्य या स्थिति की लम्बी व्याख्या नहीं करते। कुछ शब्दों और उनके बीच के सम्बन्धों से ऐसी स्थिति पैदा करते हैं जिसमें पाठक को स्वयं अर्थ तक पहुँचना पड़ता है। ‘मैं’, ‘दृष्टि’, ‘सृष्टि’, ‘गंध’, ‘साँस’, ‘घर’ और ‘स्मृति’ जैसे सामान्य शब्द अपने प्रसंग में व्यापक अर्थ ग्रहण कर लेते हैं।
उनकी पंक्ति की संरचना भी इसी अर्थ-निर्माण में योगदान देती है। कई बार एक शब्द को अलग पंक्ति में रखकर अल्पांग वाक्य बना देने से उसका अर्थ और अधिक उभर आता है। कविता का पाठ एक निश्चित गति से आगे बढ़ता है और बीच-बीच में पैदा होने वाले विराम पाठक को सोचने का अवसर देते हैं। यह शिल्प कविता के विषय से अलग नहीं है। जहाँ सम्बन्ध टूट रहे हों, जहाँ कोई वस्तु अनुपस्थित हो रही हो या जहाँ समय किसी क्षण को समाप्त कर रहा हो, वहाँ पंक्तियों के बीच का खाली स्थान भी अर्थपूर्ण हो जाता है।
इन कविताओं में विचार और संवेदना का सम्बन्ध भी ख़ास तौर से उल्लेखनीय है। विजय बहादुर सिंह की कविताएँ विचार को संवेदना से अलग करके प्रस्तुत नहीं करतीं। ‘निष्कासन’ कविता में अधिकार और नागरिकता का सवाल एक व्यक्ति की पीड़ा के माध्यम से सामने आता है। ‘साँवली ख़ामोशी’ में स्मृति और मौन का अनुभव रंग के माध्यम से व्यक्त होता है। ‘लगातार’ में अकेलेपन का प्रश्न घर की याद में बदल जाता है। इस तरह विचार कविता के भीतर से निकलता है। वह बाहर से आरोपित नहीं होता। यही कारण है कि इन कविताओं को किसी एक वैचारिक खाँचे में रखकर समझना उचित नहीं होगा।
एक और उल्लेखनीय पहलू यह है कि इनमें भावुकता और विचारशीलता के बीच संतुलन बना रहता है। घर की याद, फूल का गिरना, तितली का चले जाना या साँस का देह से अलग होना अपने आप में भावनात्मक स्थितियाँ हैं। लेकिन कवि इन स्थितियों को अनावश्यक करुणा या नाटकीयता से नहीं भरता। वह पाठक को भावुक करने के बजाय उसे अनुभव की जटिलता से परिचित कराता है। उनकी कविता में संवेदना की गहराई का आधार संयम है। वे किसी निष्कर्ष को पाठक पर थोपते नहीं, बल्कि उसे अर्थ की सम्भावनाओं तक पहुँचने देते हैं।
इन कविताओं को एक क्रम में रखकर देखें तो इनमें एक विशेष वैचारिक यात्रा भी घटित होती हुई दिखाई देती है। ‘निष्कासन’ में मनुष्य अपने संसार से अधिकार खोता है। ‘लगातार’ में वह उसी संसार के भीतर अपनेपन की तलाश करता है। ‘साँवली ख़ामोशी’ में उसका भीतरी संसार प्रकृति और स्मृति के रंगों से निर्मित होता है। ‘सुबह-शाम’ में वह समय की गति और जीवन के अस्थायी सौंदर्य को देखता है। ‘परिदृश्य’ और ‘यात्रा’ कविताओं में वह उपस्थिति, अनुपस्थिति और अस्तित्व के सम्बन्धों पर विचार करता है। यह क्रम कवि की किसी घोषित योजना का प्रमाण नहीं है, लेकिन इन कविताओं को एक साथ पढ़ने पर इनके बीच ऐसा अर्थपूर्ण संवाद अवश्य दिखाई देता है।
वस्तुत: विजय बहादुर सिंह की इन कविताओं का सारतत्त्व मनुष्य और उसके संसार के बीच सम्बन्धों की गहरी पड़ताल में निहित है। वे यह देखना चाहते हैं कि मनुष्य जिस दुनिया को अपना कहता है, उसमें उसकी वास्तविक जगह कहाँ है; जिन सम्बन्धों को वह अपना समझता है, उनकी स्थिरता कितनी है; जिन वस्तुओं को वह देखता है, उनका अर्थ उसकी चेतना में किस तरह बनता है; और जिन अनुभवों को वह खो चुका है, वे उसकी स्मृति में किस रूप में बचे रहते हैं। इन प्रश्नों के माध्यम से उनकी कविता जीवन के ऐसे पक्षों तक पहुँचती है जो सामान्यतः रोज़मर्रा की व्यस्तता में अनदेखे रह जाते हैं।
इन कविताओं की उपलब्धि किसी बड़े दार्शनिक निष्कर्ष या सामाजिक घोषणा में नहीं है। उनकी उपलब्धि इस बात में है कि वे सामान्य अनुभवों को नये सिरे से देखने का नज़रिया देती हैं। वे बताती हैं कि मनुष्य का संसार केवल उन चीज़ों से नहीं बनता जिन्हें वह देख और छू सकता है। उसमें वे सम्बन्ध भी शामिल हैं जो टूट चुके हैं, वे स्मृतियाँ भी हैं जो लगातार लौटती हैं, वे इच्छाएँ भी हैं जो पूरी नहीं हुईं और वे अनुपस्थितियाँ भी हैं जो जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं। इस अर्थ में विजय बहादुर सिंह की ये कविताएँ कम शब्दों में जीवन के व्यापक अनुभव को समेटने वाली रचनाएँ हैं। उनकी संवेदना की गहराई और विचार की सघनता ही इन्हें विशिष्ट बनाती है।
विजय बहादुर सिंह की कविताओं का शिल्प-सौन्दर्य उनकी भाषा की सहजता, बिम्बों की अर्थगर्भिता, कथन की मितव्ययिता और अर्थ की बहुस्तरीयता में निहित है। इन कविताओं को पढ़ते हुए महसूस होता है कि कवि के लिए शिल्प केवल अपनी बात कहने का माध्यम भर नहीं है, बल्कि वह अनुभव को एक विशिष्ट रूप देने की प्रक्रिया भी है। वे जीवन के सामान्य दृश्यों और परिचित वस्तुओं को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि उनके भीतर छिपे हुए अर्थ सामने आने लगते हैं। उनकी कविता में शब्द केवल सूचना नहीं देते, वे एक वातावरण बनाते हैं, संवेदना जगाते हैं और पाठक को अपने अनुभवों के आधार पर अर्थ की नयी सम्भावनाएँ खोजने के लिए प्रेरित करते हैं।
उनकी कविताओं की पहली विशेषता यह है कि कवि बहुत सामान्य शब्दावली के माध्यम से असामान्य अर्थ-संसार रचता है। उनकी भाषा में न तो शब्दों का अनावश्यक आडम्बर है और न ही विचारों को गम्भीर दिखाने के लिए कठिन शब्दों का सहारा लिया गया है। ‘घर’, ‘फूल’, ‘गंध’, ‘साँस’, ‘तितली’, ‘धरती’, ‘दृष्टि’ और ‘स्मृति’ जैसे शब्द सामान्य जीवन के परिचित अनुभवों से जुड़े हैं। लेकिन कविता में आते ही ये अपने सीमित अर्थों से आगे बढ़ने लगते हैं। घर केवल निवास का स्थान नहीं रहता, फूल केवल प्रकृति की सुन्दर वस्तु नहीं रहता और साँस केवल शारीरिक क्रिया नहीं रह जाती। इन शब्दों के अर्थ उनके प्रसंग और दूसरे शब्दों के साथ बने सम्बन्धों से विकसित होते हैं।
यहाँ कवि की रचनात्मकता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। वह किसी वस्तु को उसके सामान्य परिचय के आधार पर स्वीकार नहीं करता । वह उसके भीतर छिपी हुई अर्थ-सम्भावनाओं को खोजता है । इसीलिए उनकी कविता में परिचित वस्तुएँ भी नये ढंग से दिखाई देने लगती हैं। पाठक फूल को केवल फूल की तरह नहीं देखता, बल्कि उसके साथ जुड़ी गंध, उसकी अनुपस्थिति और उसके अस्तित्व के प्रश्न पर विचार करने लगता है। इसी तरह घर का सामान्य अर्थ बदलकर आत्मीयता, सुरक्षा और स्मृति के व्यापक अनुभव में फैल जाता है। परिचित वस्तुओं को नये अनुभव में बदलने की यह क्षमता उनकी काव्य-भाषा की बड़ी उपलब्धि है।
‘निष्कासन’ का शिल्प उसकी कथन-भंगिमा और शब्दों के बीच निर्मित तनाव से विकसित होता है। कविता में ‘पहला नागरिक’ और ‘बेदख़ल’ जैसे पदों को आमने-सामने रखकर कवि एक ऐसी स्थिति पैदा करता है जिसमें कथन के भीतर ही उसका विरोध उपस्थित हो जाता है। नागरिक होने का अर्थ अधिकार और स्वीकृति से जुड़ता है, जबकि बेदख़ल होना इन दोनों से वंचित हो जाना है। इन दोनों स्थितियों को एक साथ रख देने से कविता में विडम्बना पैदा होती है। कवि को किसी लम्बी व्याख्या की आवश्यकता नहीं पड़ती। शब्दों का यह विरोध ही पूरी सामाजिक स्थिति को उजागर कर देता है।
इस कविता की भाषा में एक तरह की सीधी और दृढ़ घोषणा का स्वर है। यहाँ बिम्बों की अधिकता नहीं है। कवि अपने अनुभव को अपेक्षाकृत सीधे कथन में प्रस्तुत करता है। लेकिन यह सीधापन कविता को सपाट नहीं बनाता। इसके विपरीत, कथन की सादगी उसके भीतर मौजूद अन्याय की तीव्रता को और बढ़ा देती है। कविता में ‘मैं’ का प्रयोग भी इसी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। यह केवल निजी अनुभव का संकेत नहीं है। इसके माध्यम से एक ऐसा व्यक्ति बोलता है जिसकी स्थिति व्यापक सामाजिक अनुभव का प्रतिनिधित्व करती है। व्यक्तिगत स्वर सामूहिक पीड़ा और प्रतिरोध की आवाज़ में बदल जाता है।
यहाँ भाषा की एक और ख़ासियत दिखाई देती है। कवि किसी व्यवस्था का नाम लेकर उसकी आलोचना नहीं करता। वह एक ऐसी परिस्थिति सामने रखता है जिसमें नाइंसाफ़ी अपने आप प्रकट हो जाती है। पाठक को किसी निश्चित राजनीतिक निष्कर्ष तक पहुँचने का निर्देश नहीं दिया जाता। उसे उस विरोधाभास को महसूस करने और उसके सामाजिक अर्थ पर विचार करने की जगह दी जाती है। इस तरह कविता का शिल्प अपने कथ्य को नारे में बदलने से बचाता है।
‘साँवली ख़ामोशी’ कविता का शिल्प मुख्यतः रंग-बिम्ब और पुनरावृत्ति पर आधारित है। कविता में साँवलेपन का विस्तार धरती, समुद्र और आकाश से होता हुआ मनुष्य की आन्तरिक अनुभूतियों तक पहुँचता है। इस विस्तार में रंग केवल दृश्यात्मक विशेषता नहीं रहता। वह एक भावात्मक वातावरण का निर्माण करने लगता है। कविता का शिल्प इसी क्रमिक विस्तार से विकसित होता है।
इस कविता में एक ही भाषिक संरचना की पुनरावृत्ति विशेष रूप से ध्यान खींचती है। ‘साँवली है’ का बार-बार आना कविता में लय और एकरूपता पैदा करता है। लेकिन यह पुनरावृत्ति अर्थ को स्थिर नहीं करती। हर बार नया प्रसंग जुड़ने से साँवलेपन का अर्थ भी बदलता और विस्तृत होता जाता है। धरती के सन्दर्भ में वह प्रकृति का रंग है, समुद्र के सन्दर्भ में गहराई का संकेत है और ख़ामोशी के सन्दर्भ में एक मानसिक अनुभव बन जाता है। इस तरह एक ही शब्द अलग-अलग प्रसंगों में नये अर्थ ग्रहण करता है।
कविता में रंग और मौन का सम्बन्ध विशेष रूप से कलात्मक है। रंग को सामान्यतः आँख से देखने की वस्तु माना जाता है, जबकि मौन का सम्बन्ध सुनने और न सुनने से है। कवि इन दोनों अलग-अलग इन्द्रियगत अनुभवों को एक साथ रखकर एक नया संवेदनात्मक सम्बन्ध बनाता है। इससे पाठक ख़ामोशी को केवल आवाज़ की अनुपस्थिति के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी आन्तरिक स्थिति के रूप में अनुभव करने लगता है जिसमें अनेक अनकहे भाव मौजूद हैं। यह प्रयोग कविता की संवेदना को अधिक गहरा बनाता है।
यहाँ रंग का इस्तेमाल सिर्फ़ रूपक या अलंकार का काम नहीं करता। वह कविता के पूरे वातावरण को निर्धारित करता है। साँवलेपन के माध्यम से कवि एक ऐसे सौंदर्यबोध की रचना करता है जो चमक, उजास और बाहरी आकर्षण पर निर्भर नहीं है। उसमें गहराई, अस्पष्टता, स्मृति और मौन के लिए भी जगह है। इस तरह कविता का रंग-विधान उसके भाव-विधान में बदल जाता है।
‘सुबह-शाम’ का शिल्प अपनी असाधारण संक्षिप्तता के कारण उल्लेखनीय है। कविता में एक तितली के आने, दिनभर रहने और शाम को चले जाने का दृश्य है। इस दृश्य को व्यक्त करने के लिए कवि ने न कोई विस्तृत प्रकृति-वर्णन किया है और न ही तितली की विशेषताओं का विवरण दिया है। कुछ छोटे वाक्यों में पूरा दिन उपस्थित हो जाता है। यह संक्षिप्तता केवल शब्दों की बचत नहीं है। यह कविता की रचनात्मक आवश्यकता है।
कविता की संरचना में समय का क्रम ही उसका शिल्प बन जाता है। सुबह, दुपहर और शाम के तीन पड़ावों से दिन की गति सामने आती है। तितली की उपस्थिति इन तीनों पड़ावों को एक सूत्र में जोड़ती है। वह कविता के भीतर एक केन्द्रीय बिम्ब की तरह काम करती है। उसके आने से दृश्य शुरू होता है, उसके बने रहने से दृश्य में स्थिरता आती है और उसके चले जाने से दृश्य समाप्त हो जाता है। इस तरह कविता की संरचना एक छोटी-सी घटना के आरम्भ, विस्तार और समाप्ति पर आधारित है।
इस कविता की कलात्मकता इस बात में भी है कि कवि किसी भाव का नाम नहीं लेता। वह यह नहीं कहता कि तितली के चले जाने से उदासी पैदा हुई या दिन के बीतने का दुख हुआ। पाठक स्वयं इस अनुभव तक पहुँचता है। कविता भाव को सीधे व्यक्त करने के बजाय ऐसी स्थिति रचती है जिसमें भाव अपने आप पैदा होता है। इससे कविता में अनावश्यक भावुकता नहीं आती। उसकी संवेदना सहज बनी रहती है।
‘लगातार’ का शिल्प ‘सुबह-शाम’ से अलग है। यहाँ कविता का आधार किसी बाहरी प्राकृतिक घटना के बजाय एक मानसिक और भावात्मक स्थिति है। थकान, लौटने की इच्छा, अँधेरी रात, बन्द दरवाज़े और घर की स्मृति मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें अकेलापन धीरे-धीरे गहराता है। कविता का शिल्प इसी वातावरण के क्रमिक निर्माण पर आधारित है।
इस कविता में स्थान और मनःस्थिति का सम्बन्ध विशेष महत्त्व रखता है। रात का अँधेरा केवल बाहरी दृश्य नहीं है। वह व्यक्ति के भीतर मौजूद अनिश्चितता और असुरक्षा को भी व्यक्त करता है। बन्द दरवाज़े केवल घर की भौतिक स्थिति नहीं बताते, बल्कि उस अवरोध का भी संकेत देते हैं जो व्यक्ति और उसके आत्मीय संसार के बीच पैदा हो गया है। इस तरह बाहरी दृश्य आन्तरिक अनुभव का रूप ग्रहण कर लेता है।
इस कविता की एक विशेषता यह भी है कि इसमें घर का पूरा विवरण नहीं दिया गया। कवि घर के किसी कमरे, आँगन, खिड़की या परिचित व्यक्ति का चित्र नहीं बनाता। वह केवल घर की याद को सामने रखता है। इस अधूरेपन में ही कविता की अर्थवत्ता है। घर का वास्तविक रूप पाठक की कल्पना पर छोड़ दिया गया है। प्रत्येक पाठक अपने अनुभवों के आधार पर उस घर की कल्पना कर सकता है। इस तरह कविता एक निजी स्मृति को व्यापक मानवीय अनुभव में बदल देती है।
इस कविता में पंक्तियों का क्रम भी अर्थ के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आरम्भ में थकान और लौटने की इच्छा है। इसके बाद रास्ते की कठिनाई और अकेलेपन का वातावरण बनता है। अन्ततः घर की स्मृति सामने आती है। इस क्रम में कविता का भाव धीरे-धीरे एक केन्द्र प्राप्त करता है। घर की याद अन्त में आकर पूरे पूर्ववर्ती अनुभव को नया अर्थ देती है। पाठक समझता है कि थकान केवल शारीरिक नहीं थी। उसके पीछे आत्मीयता और अपनेपन की गहरी आवश्यकता थी।
‘परिदृश्य’ में शिल्प की सबसे बड़ी विशेषता दो अलग-अलग अनुभवों को एक ही संरचना में रखकर उनके बीच अर्थगत सम्बन्ध स्थापित करना है। फूल और गंध का सम्बन्ध तथा देह और साँस का सम्बन्ध अलग-अलग स्तरों के अनुभव हैं। लेकिन कवि इन्हें जिस तरह एक के बाद एक रखता है, उससे दोनों के बीच एक आन्तरिक समानता पैदा होती है। फूल का गंध से अलग होना और देह का साँस से अलग होना दो स्थितियों को एक साझा भावभूमि पर ले आते हैं।
इस कविता में मानवीकरण का प्रयोग भी ध्यान देने योग्य है। गंध का फूल से लड़कर जाना एक असामान्य प्रयोग है। गंध को किसी व्यक्ति की तरह व्यवहार करते हुए दिखाया गया है। इस प्रयोग से एक सामान्य प्राकृतिक घटना में संघर्ष का भाव जुड़ जाता है। कविता में सम्बन्ध-विच्छेद की स्थिति अधिक तीव्र हो जाती है। यहाँ अलंकार केवल सजावट नहीं है। वह अनुभव की प्रकृति को बदल देता है।
कविता का शिल्प इस बात पर भी निर्भर करता है कि कवि ने दोनों स्थितियों के बीच कोई व्याख्यात्मक सम्बन्ध नहीं बनाया। उसने फूल और गंध के बाद सीधे देह और साँस की स्थिति रख दी। पाठक स्वयं इनके बीच सम्बन्ध स्थापित करता है। यह पाठकीय सहभागिता कविता को अधिक प्रभावशाली बनाती है। यदि कवि इन दोनों स्थितियों का अर्थ विस्तार से समझाने लगता, तो कविता की व्यंजना सीमित हो जाती। उसने अर्थ के लिए आवश्यक संकेत दिए हैं, लेकिन उसकी अन्तिम व्याख्या पाठक पर छोड़ दी है।
‘यात्रा’ में भी अर्थ की रचना संकेतों और शब्दों के बीच सम्बन्ध से होती है। इस कविता में फूल का दृष्टि से ओझल होना एक सामान्य दृश्य से आगे बढ़कर अस्तित्व और अनुभूति का प्रश्न बन जाता है। यहाँ ‘दृष्टि’ और ‘सृष्टि’ के बीच ध्वन्यात्मक समानता विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। दोनों शब्दों में ध्वनि का साम्य है, लेकिन अर्थ का अन्तर भी है। इस साम्य के कारण कविता में एक ऐसा भाषिक सम्बन्ध बनता है जो उसके दार्शनिक अर्थ को गहरा करता है।
कविता में पंक्ति-विभाजन भी अर्थ को नियंत्रित करता है। फूल के गिरने, दृष्टि से बाहर होने और सृष्टि में न रहने की स्थिति को अलग-अलग चरणों में प्रस्तुत किया गया है। पाठक पहले फूल की अनुपस्थिति को देखता है, फिर उस अनुपस्थिति के अर्थ पर विचार करता है। इस क्रम में कविता का कथन धीरे-धीरे एक दार्शनिक प्रश्न में बदल जाता है। शब्दों की संख्या कम है, लेकिन उनके बीच का सम्बन्ध व्यापक अर्थ पैदा करता है।
इस कविता का शीर्षक भी उसके अर्थ-विस्तार में योगदान देता है। यात्रा सामान्यतः गति, परिवर्तन और एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने का बोध कराती है। लेकिन यहाँ यात्रा का कोई प्रत्यक्ष विवरण नहीं है। फूल का गिरना और दृष्टि से बाहर होना ही एक प्रकार की यात्रा का संकेत बन जाता है। इस तरह शीर्षक कविता के भीतर एक अतिरिक्त अर्थ-स्तर जोड़ता है। यात्रा बाहरी स्थान की नहीं, बल्कि उपस्थिति से अनुपस्थिति और दृश्य से स्मृति की ओर जाने वाली प्रक्रिया की भी हो सकती है।
इन कविताओं में बिम्ब-विधान की दृष्टि से भी एक उल्लेखनीय एकरूपता दिखाई देती है। कवि बड़े और जटिल बिम्बों के बजाय छोटे, परिचित और सहज बिम्बों का चयन करता है। लेकिन इनका प्रयोग केवल दृश्यात्मक प्रभाव पैदा करने के लिए नहीं किया गया है। हर बिम्ब अपने भीतर किसी व्यापक अनुभव की सम्भावना रखता है। तितली समय के अनुभव को मूर्त करती है। घर आत्मीयता की आवश्यकता को व्यक्त करता है। फूल और गंध सम्बन्धों की एकता तथा उनके विघटन की ओर संकेत करते हैं। धरती, समुद्र और आकाश के माध्यम से रंग का अनुभव मानसिक संसार तक पहुँचता है।
इन बिम्बों की एक विशेषता यह है कि वे एक ही अर्थ में स्थिर नहीं रहते। फूल को केवल जीवन का प्रतीक कहना पर्याप्त नहीं होगा। वह सौंदर्य, नश्वरता, अनुपस्थिति और स्मृति के अर्थ भी ग्रहण करता है। घर केवल सुरक्षा का प्रतीक नहीं है। वह दूरी, विछोह और अपूर्ण आकांक्षा का संकेत भी बन जाता है। इस प्रकार कवि के बिम्ब अर्थ की अनेक परतों में विकसित होते हैं। उनकी व्यंजना इसी बहुअर्थकता से बनती है।
आचार्य शुक्ल की शब्दावली में कहें तो इन कविताओं में ‘विरुद्धों का सामंजस्य’ भी शिल्प का एक महत्त्वपूर्ण आधार है। नागरिकता और बेदखली, उपस्थिति और अनुपस्थिति, घर और बाहर, जीवन और मृत्यु, दृश्य और अदृश्य जैसे पदों के बीच तनाव लगातार बना रहता है। लेकिन कवि इन विरोधों को किसी एक अन्तिम निष्कर्ष में समाप्त नहीं करता। वह उनके बीच की जटिलता को बनाए रखता है। यही कारण है कि कविताएँ पाठक के सामने प्रश्न छोड़ती हैं। उनके अर्थ पढ़ने के बाद भी विकसित होते रहते हैं।
भाषा के स्तर पर देखें तो इन कविताओं में सहजता और अर्थ-सघनता का अच्छा मेल है। कवि बोलचाल की भाषा का प्रयोग करता है, लेकिन उसकी संरचना सामान्य बातचीत से अलग है। पंक्तियों का विभाजन, शब्दों का क्रम, विराम और पुनरावृत्ति भाषा को काव्यात्मक बनाते हैं। विशेष रूप से छोटे वाक्यों और अलग-अलग पंक्तियों में रखे गए शब्दों से पाठ की गति नियंत्रित होती है। पाठक को हर पंक्ति पर ठहरने और उसके अर्थ को आगे की पंक्तियों के साथ जोड़ने का अवसर मिलता है।
इन कविताओं की भाषा में मौन की भूमिका भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। कवि बहुत कुछ कहने के बजाय कई बार संकेत देकर रुक जाता है। वह पाठक को हर बात समझाने की कोशिश नहीं करता। कविता में जो खाली जगहें बची रहती हैं, वे अर्थहीन नहीं हैं। वे पाठक की कल्पना और अनुभव के लिए जगह बनाती हैं। ‘साँवली ख़ामोशी’ में मौन ख़ुद कविता के अनुभव का हिस्सा बन जाता है, जबकि ‘लगातार’ में घर की अनुपस्थिति उसकी स्मृति को अधिक गहरा करती है। इस तरह मौन केवल कथन का अभाव नहीं, बल्कि अर्थ-निर्माण की एक सक्रिय प्रक्रिया है।
एक और बात ध्यान देने योग्य है कि इन कविताओं में शिल्प और कथ्य के बीच कोई अलगाव नहीं है। ‘निष्कासन’ की सीधी और दृढ़ भाषा उसके प्रतिरोधी स्वर के अनुकूल है। ‘साँवली ख़ामोशी’ की पुनरावृत्तिमूलक संरचना रंग और संवेदना के विस्तार के लिए उपयुक्त है। ‘सुबह-शाम’ की संक्षिप्तता समय के छोटे-से अनुभव को व्यक्त करती है। ‘लगातार’ में दृश्य और स्मृति का क्रमिक संयोजन अकेलेपन की अनुभूति को विकसित करता है। ‘परिदृश्य’ में बिम्बों का समानान्तर विन्यास सम्बन्ध-विच्छेद का अर्थ पैदा करता है और ‘यात्रा’ में ध्वनि तथा अर्थ का साम्य अस्तित्व के प्रश्न को गहरा करता है।
इस प्रकार प्रत्येक कविता का शिल्प उसकी अपनी आन्तरिक आवश्यकता से विकसित होता है। कवि किसी एक शैली या संरचना को सभी कविताओं पर लागू नहीं करता। वह विषय और अनुभव के अनुसार भाषा का रूप बदलता है। कहीं कथन अधिक सीधा है, कहीं बिम्ब अधिक प्रभावशाली हैं, कहीं पुनरावृत्ति अर्थ को विस्तार देती है और कहीं पंक्ति-विभाजन पाठक के अनुभव को नियंत्रित करता है। इस विविधता के बावजूद इन कविताओं में एक साझा शिल्पगत चेतना दिखाई देती है। वह चेतना भाषा को मितव्ययी रखते हुए अर्थ को व्यापक बनाने की है।
‘पतझर की बाँसुरी’ कविता प्रकृति के एक परिचित दृश्य को नये संवेदनात्मक और दार्शनिक अर्थों में देखने की कोशिश करती है। कविता का आकार छोटा है, लेकिन इसके भीतर जीवन, सृजन, परिवर्तन, प्रतीक्षा और भविष्य की सम्भावनाओं से जुड़ा एक व्यापक अनुभव मौजूद है। इसकी सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि कवि पतझर को केवल अवसान, उदासी, रिक्तता और क्षय की ऋतु मानकर नहीं चलता। याद रहे कि ओड टू द वेस्ट विंड (Ode to the West Wind) में शेली ने पश्चिमी हवा को एक ऐसी शक्ति के रूप में चित्रित किया है जो पतझड़ में पेड़ों से सूखे पत्तों को गिराती है और साथ ही धरती में दबे बीजों को सर्दियों की नींद में पहुँचा देती है। यहाँ सूखे पत्ते मृत्यु, विनाश और पुराने जीवन के अन्त के प्रतीक हैं, जबकि बीज भविष्य में आने वाले वसन्त, नयी शुरुआत और पुनर्जन्म की सम्भावना को व्यक्त करते हैं। इस तरह कविता में पतझड़ और वसन्त एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। पतझड़ का विनाश ही वसन्त के सृजन की भूमिका तैयार करता है। शेली के लिए प्रकृति का यह चक्र मानवीय जीवन, सामाजिक परिवर्तन और क्रान्तिकारी चेतना का भी रूपक बन जाता है।
विजय बहादुर सिंह का कवि भी इसी ऋतु के भीतर ज़िन्दगी की एक नयी लय सुनता है। जिस समय प्रकृति अपनी बाहरी हरियाली खोती हुई दिखाई देती है, उसी समय उसके भीतर सृजन की कोई प्रक्रिया आकार ले रही होती है। कवि की दृष्टि इसी अदृश्य प्रक्रिया को पहचानती है:
पतझर
की रग-रग में
बज रही है बाँसुरी
हवा में तैरने लगी है
नर्म पँखुरियों की मुस्कान
कोई फूल
पैदा होने की कोशिश में है कहीं।
कविता की शुरुआत ही एक ऐसे कथन से होती है जो प्रकृति के प्रति हमारी सामान्य समझ को बदल देता है। पतझर के भीतर बाँसुरी का बजना एक असामान्य कल्पना है। सामान्यतः बाँसुरी की ध्वनि को माधुर्य, उल्लास, प्रेम और जीवन की लय से जोड़ा जाता है, जबकि पतझर को पत्तियों के झरने, वृक्षों के सूनेपन और प्रकृति की उदासी का मौसम माना जाता है। कवि इन दोनों को एक साथ रखकर एक नया अर्थ-संसार रचता है। वह पतझर के भीतर संगीत की उपस्थिति का अनुभव करता है। इस तरह कविता अपने आरम्भ में ही प्रकृति के बारे में बनी हुई रूढ़ धारणाओं को चुनौती देती है।
पतझर को बाँसुरी बजाते हुए देखना सिर्फ़ एक सुन्दर कल्पना नहीं है। इसके पीछे ज़िन्दगी को देखने का एक अलग नज़रिया है। प्रकृति में परिवर्तन का अर्थ हमेशा विनाश नहीं होता। कई बार पुरानी संरचनाओं का टूटना नयी संरचनाओं के बनने की प्रक्रिया का हिस्सा होता है। पत्तियों का झरना वृक्ष के जीवन का अन्त नहीं है। वह उसकी जीवन-यात्रा का एक चरण है। जिस वृक्ष को हम पतझर में सूना और निष्प्राण समझते हैं, उसके भीतर जीवन की प्रक्रियाएँ जारी रहती हैं। कवि इसी आन्तरिक सक्रियता को बाँसुरी के संगीत के माध्यम से व्यक्त करता है। यहाँ संगीत जीवन की निरन्तरता और प्रकृति की अदृश्य रचनात्मक ऊर्जा का प्रतीक बन जाता है।
कविता में ‘रग-रग’ का प्रयोग इसकी अर्थ-रचना में विशेष महत्त्व रखता है। सामान्यतः रग-रग का सम्बन्ध किसी जीवित शरीर की आन्तरिक संरचना और उसमें प्रवाहित जीवन से होता है। कवि इस शब्द को पतझर के साथ जोड़कर प्रकृति का मानवीकरण करता है। अब पतझर केवल एक ऋतु नहीं रह जाता, बल्कि वह एक जीवित सत्ता का रूप ग्रहण कर लेता है। उसकी भी अपनी देह है, अपनी संवेदना है और उसके भीतर जीवन का संगीत प्रवाहित हो रहा है। इस प्रयोग से प्रकृति और मनुष्य के बीच की दूरी कम होती है। कवि प्रकृति को बाहर से देखने वाली वस्तु नहीं मानता, बल्कि उसे एक जीवित और संवेदनशील उपस्थिति के रूप में अनुभव करता है।
यहाँ ‘रग-रग’ और ‘बाँसुरी’ का सम्बन्ध भी ध्यान देने योग्य है। रग-रग में जीवन का प्रवाह है और बाँसुरी में उस प्रवाह की संगीतात्मक अभिव्यक्ति। इस प्रकार कवि ने जीवन और संगीत के बीच एक आन्तरिक सम्बन्ध स्थापित किया है। बाँसुरी बाहर से बजाई जाने वाली वस्तु है, लेकिन कविता में उसका संगीत पतझर की अपनी आन्तरिक संरचना से निकल रहा है। यह कल्पना प्रकृति के भीतर छिपी रचनात्मक शक्ति की ओर संकेत करती है। जीवन की लय हमेशा बाहर दिखाई नहीं देती। कई बार वह उस समय भी सक्रिय रहती है जब बाहरी दृश्य में स्थिरता, सूखापन और रिक्तता दिखाई देती है।
कविता का दूसरा दृश्य इस आन्तरिक संगीत को एक नयी संवेदनात्मक दिशा देता है :‘हवा में तैरने लगी है /नर्म पँखुरियों की मुस्कान’। पहले दृश्य में पतझर के भीतर संगीत था, अब वह संगीत हवा में फैलता हुआ दिखाई देता है। इस क्रम में कविता का संसार भीतर से बाहर की ओर विस्तार पाता है। पतझर की रग-रग में बजती बाँसुरी का असर अब पूरे परिवेश में अनुभव होने लगता है। हवा में पंखुरियों की मुस्कान तैरने लगती है। यहाँ हवा केवल प्रकृति का एक तत्त्व नहीं है। वह एक ऐसी माध्यम-शक्ति बन जाती है जो अदृश्य अनुभूति को दृश्य और संवेदनात्मक अनुभव में बदलती है।
‘नर्म पँखुरियों की मुस्कान’ एक विशेष प्रकार का बिम्ब है। पंखुड़ियाँ कोमल होती हैं और मुस्कान का सम्बन्ध मानवीय भावनाओं से होता है। कवि इन दोनों को मिलाकर फूलों के खिलने की सम्भावना को एक मानवीय आत्मीयता प्रदान करता है। यहाँ फूल अभी पूरी तरह खिले नहीं हैं, लेकिन उनकी मुस्कान हवा में तैरने लगी है। इस तरह कविता में सृजन का अनुभव किसी पूर्ण हो चुकी घटना के रूप में नहीं, बल्कि एक सम्भावना के रूप में सामने आता है।
इस बिम्ब में एक और सूक्ष्म बात है। मुस्कान चेहरे पर दिखाई देती है, जबकि पंखुड़ियाँ प्रकृति का हिस्सा हैं। कवि इन दोनों के बीच सम्बन्ध बनाकर प्रकृति को मानवीय भाव-जगत के निकट ले आता है। लेकिन वह प्रकृति को मनुष्य की भावनाओं का निष्क्रिय प्रतिबिम्ब नहीं बनाता। पंखुड़ियों की अपनी कोमलता और हवा की अपनी गति है। उनके संयोग से एक ऐसा दृश्य बनता है जिसमें प्रकृति की स्वतंत्र सक्रियता और मनुष्य की संवेदना एक-दूसरे में घुल जाती हैं।
‘तैरने लगी है’ पदबंध भी कविता के अर्थ-विस्तार में महत्त्वपूर्ण है। हवा में किसी वस्तु का तैरना उसके भारहीन और मुक्त होने का अनुभव कराता है। यहाँ पंखुड़ियों की मुस्कान किसी निश्चित स्थान पर स्थिर नहीं है। वह पूरे वातावरण में फैल रही है। इस तरह कविता में सृजन की सम्भावना किसी एक फूल तक सीमित नहीं रहती। वह पूरे परिवेश में व्याप्त होने लगती है। पतझर के भीतर जो संगीत था, वह अब हवा में एक व्यापक संवेदना का रूप ग्रहण कर रहा है। कविता का अन्तिम अंश इसके पूरे अर्थ-संसार को एक नया आयाम देता है : ‘कोई फूल / पैदा होने की कोशिश में है कहीं’। यहाँ कवि अचानक एक ऐसे फूल की ओर ध्यान ले जाता है जो अभी अस्तित्व में नहीं आया है। वह कहीं जन्म लेने की कोशिश कर रहा है। कविता का सबसे गहरा अर्थ इसी स्थिति में निहित है। पहले बाँसुरी बजती है, फिर पंखुरियों की मुस्कान हवा में तैरती है और अन्त में किसी फूल के जन्म लेने की सम्भावना सामने आती है। यह क्रम केवल प्राकृतिक दृश्य का क्रम नहीं है। यह सृजन की पूरी प्रक्रिया का संकेत देता है। पहले एक अदृश्य हलचल होती है, फिर उसके संकेत परिवेश में दिखाई देने लगते हैं और अन्ततः कोई नया रूप आकार लेने की कोशिश करता है।
यहाँ ‘कोई फूल’ कहना भी अर्थपूर्ण है। कवि ने किसी निश्चित फूल का नाम नहीं लिया। उसने गुलाब, कमल, चमेली या किसी दूसरे पहचाने जाने वाले फूल का उल्लेख नहीं किया। यह अनिश्चितता कविता के अर्थ को व्यापक बनाती है। फूल कोई भी हो सकता है। वह किसी विशेष रंग, आकार या प्रजाति तक सीमित नहीं है। इसीलिए वह सृजन की सामान्य और सार्वभौमिक सम्भावना का प्रतीक बन जाता है। वह प्रकृति में पैदा होने वाला फूल भी है और जीवन में जन्म लेने वाली किसी नयी संवेदना, विचार, आकांक्षा अथवा रचनात्मक ऊर्जा का संकेत भी।
‘पैदा होने की कोशिश’ पदबंध कविता की संभवत: सबसे महत्त्वपूर्ण अर्थगत विशेषताओं में से एक है। अमूमन जन्म को एक घटना के रूप में देखा जाता है। कोई वस्तु पैदा होती है और फिर उसका अस्तित्व सामने आता है। लेकिन कवि जन्म से पहले की प्रक्रिया पर ध्यान देता है। फूल अभी पैदा नहीं हुआ है, वह पैदा होने की कोशिश कर रहा है। इस तरह सृजन को किसी तैयार उपलब्धि के रूप में नहीं, बल्कि संघर्ष और प्रयत्न की प्रक्रिया के रूप में देखा गया है।
इसमें जीवन के प्रति एक गहरी आस्था है, लेकिन यह आस्था किसी सरल आशावाद पर आधारित नहीं है। कवि यह नहीं कहता कि पतझर के बाद वसंत ज़रूर आएगा और सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा। वह केवल एक सम्भावना की ओर संकेत करता है। फूल का जन्म अभी सुनिश्चित नहीं है। वह कोशिश कर रहा है। इस कोशिश में असफलता की सम्भावना भी है और सफलता की आकांक्षा भी। यही बात कविता को भावुक आश्वासन बनने से बचाती है। यहाँ आशा किसी निश्चित परिणाम में नहीं, बल्कि जीवन की निरन्तर सक्रिय रहने वाली रचनात्मक शक्ति में है।
इस कविता को सिर्फ़ ऋतु-परिवर्तन की कविता मानना भी इसके अर्थ को सीमित करना होगा। पतझर यहाँ एक व्यापक जीवन-स्थिति का रूप ग्रहण करता है। मनुष्य के जीवन में भी ऐसे दौर आते हैं जब पुरानी मान्यताएँ टूटती हैं, सम्बन्ध बदलते हैं, उपलब्धियाँ अर्थहीन लगने लगती हैं और भविष्य अनिश्चित दिखाई देता है। ऐसे समय में बाहरी दुनिया में कोई उत्साह दिखाई नहीं देता। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि जीवन की रचनात्मक सम्भावनाएँ समाप्त हो गई हैं। कई बार परिवर्तन की सबसे महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया उसी समय शुरू होती है जब सब कुछ समाप्त होता हुआ दिखाई देता है।
इस अर्थ में कविता का पतझर सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की स्थितियों से भी जुड़ सकता है। किसी समाज की पुरानी संरचनाएँ जब टूटती हैं तो उनके स्थान पर नयी चेतना और नये मूल्यों के जन्म की सम्भावना पैदा होती है। लेकिन नया समाज अपने आप नहीं बनता। उसके लिए संघर्ष, प्रतीक्षा और रचनात्मक प्रयत्न की आवश्यकता होती है। फूल का पैदा होने की कोशिश करना इसी प्रक्रिया का रूपक बन सकता है। कवि किसी राजनीतिक नारे के माध्यम से परिवर्तन की बात नहीं करता। वह प्रकृति के एक छोटे-से दृश्य में परिवर्तन की पूरी सम्भावना को समेट देता है।
इस दृष्टि से ‘पतझर’ और ‘फूल’ के बीच का सम्बन्ध विशेष महत्त्व रखता है। सामान्य प्रकृति-बोध में पतझर और फूलों का खिलना दो अलग-अलग ऋतुओं से जुड़े अनुभव हैं। कवि इन दोनों के बीच की दूरी को खत्म कर देता है। फूल के जन्म की सम्भावना पतझर के भीतर ही मौजूद है। इसका अर्थ है कि जीवन और क्षय को एक-दूसरे के पूर्ण विरोधी रूप में नहीं देखा जा सकता। क्षय के भीतर भी सृजन की भूमिका हो सकती है। पुराने का समाप्त होना नये के लिए जगह तैयार कर सकता है। कविता जीवन को इसी परिवर्तनशीलता के साथ स्वीकार करती है।
यहाँ प्रकृति का चित्रण किसी स्थिर सौंदर्यबोध पर आधारित नहीं है। सामान्यतः प्रकृति-कविता में वसंत, फूल, हरियाली, पक्षियों की आवाज़ और उजली धूप को सौंदर्य के प्रमुख आधार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। विजय बहादुर सिंह इस रूढ़ सौंदर्यबोध को बदलते हैं। वे पतझर में भी संगीत सुनते हैं और सूनेपन में भी फूल के जन्म की आहट पहचानते हैं। उनके लिए सौंदर्य केवल पूर्णता में नहीं है। वह बनने की प्रक्रिया में भी मौजूद है। अधूरेपन और प्रतीक्षा में भी सौंदर्य हो सकता है। इसीलिए कविता का सौंदर्यबोध जीवन की गतिशीलता से जुड़ता है।
कविता में समय की अवधारणा भी इसी गतिशीलता से निर्मित होती है। यहाँ अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच एक सूक्ष्म सम्बन्ध है। पतझर उस समय का संकेत है जिसमें पुराना रूप टूट रहा है। हवा में तैरती पंखुरियों की मुस्कान वर्तमान में जन्म ले रही नयी संवेदना का संकेत है। और कहीं पैदा होने की कोशिश करता फूल भविष्य की सम्भावना को सामने लाता है। इस प्रकार कविता समय को केवल बीतने वाली प्रक्रिया के रूप में नहीं देखती। समय यहाँ निर्माण की प्रक्रिया है। वर्तमान अपने भीतर भविष्य को जन्म देने की क्षमता रखता है।
इस कविता की एक उल्लेखनीय उपलब्धि यह है कि इसमें भविष्य को किसी निश्चित दृश्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया। फूल अभी सामने नहीं आया है। वह केवल कहीं जन्म लेने की कोशिश कर रहा है। इस अनिश्चितता में कविता की कलात्मकता भी है और उसका जीवन-दर्शन भी। भविष्य की सम्भावना को खुला छोड़ देने से पाठक अपनी कल्पना के अनुसार उस फूल को अर्थ दे सकता है। वह फूल प्रकृति का हो सकता है, मनुष्य के जीवन में किसी नयी शुरुआत का हो सकता है अथवा किसी सामाजिक बदलाव का। कविता किसी एक अर्थ को अन्तिम नहीं बनाती।
शिल्प की दृष्टि से कविता में बिम्बों का क्रमिक विकास बहुत महत्त्वपूर्ण है। तीन छोटे दृश्य हैं, लेकिन वे एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए हैं। पहला दृश्य आन्तरिक संगीत का है, दूसरा वातावरण में फैलती कोमल अनुभूति का और तीसरा सृजन की सम्भावना का। इस क्रम में कविता का अर्थ धीरे-धीरे विकसित होता है। पहले पाठक को एक असामान्य कल्पना दिखाई देती है, फिर वह एक संवेदनात्मक दृश्य में बदलती है और अन्ततः जीवन तथा सृजन के व्यापक अर्थ तक पहुँचती है।
कविता की भाषा भी इसी अर्थ-विकास के अनुकूल है। इसमें बहुत कम शब्दों का प्रयोग हुआ है। लेकिन प्रत्येक शब्द अपने स्थान पर अर्थ की विशेष भूमिका निभाता है। ‘रग-रग’ से आन्तरिक जीवन का बोध होता है। ‘बाँसुरी’ संगीत और लय का अनुभव कराती है। ‘हवा’ उस अनुभूति को फैलाती है। ‘नर्म पँखुरियों’ में कोमलता और सृजन की तैयारी है। ‘मुस्कान’ उस तैयारी को मानवीय आत्मीयता देती है। अन्त में ‘पैदा होने की कोशिश’ पूरी कविता को एक गतिशील प्रक्रिया में बदल देता है।
पंक्तियों का विभाजन भी अर्थ को गहरा करता है। आरम्भ में पतझर और बाँसुरी के सम्बन्ध को अलग-अलग पंक्तियों में रखकर कवि पाठक का ध्यान इस असामान्य सम्बन्ध की ओर खींचता है। दूसरे हिस्से में हवा और पंखुरियों का दृश्य एक अपेक्षाकृत विस्तृत संवेदनात्मक अनुभव बनाता है। अन्त में ‘कोई फूल’ को अलग पंक्ति में रखकर कवि उसके जन्म की सम्भावना पर विशेष ध्यान केन्द्रित करता है। इसके बाद ‘पैदा होने की कोशिश में है कहीं’ कथन उस सम्भावना को गति और दिशा देता है।
कविता का अन्त भी विशेष ध्यान देने योग्य है। सामान्यतः प्रकृति-कविता में फूल के खिलने या वसंत के आगमन के साथ एक पूर्णता का अनुभव मिलता है। लेकिन यहाँ कविता फूल के खिलने से पहले ही समाप्त हो जाती है। कवि उस क्षण को पकड़ता है जब फूल अभी जन्म लेने की प्रक्रिया में है। यह अन्त कविता को एक खुली संरचना प्रदान करता है। पाठक के सामने फूल का दृश्य नहीं आता, बल्कि उसके जन्म की कल्पना सक्रिय होती है। इस तरह कविता समाप्त होकर भी अपनी अर्थ-प्रक्रिया को जारी रखती है।
भारतीय काव्यशास्त्र की शब्दावली में कहें तो इस कविता की शक्ति उसके व्यंजित अर्थ में है। प्रत्यक्ष रूप से इसमें पतझर, हवा, पंखुड़ियों और फूल का वर्णन है, लेकिन इसके भीतर जीवन की निरन्तरता, परिवर्तन की अनिवार्यता और सृजन की सम्भावना का व्यापक अर्थ सक्रिय है। कविता का भाव भी केवल प्रकृति के प्रति अनुराग तक सीमित नहीं है। उसमें आशा, विस्मय, कोमलता और एक आन्तरिक उल्लास का सम्मिश्रण है। यह भाव किसी सीधे उपदेश से नहीं, बल्कि बिम्बों के क्रम और उनके पारस्परिक सम्बन्ध से पैदा होता है।
इसी तरह कविता की भाषिक संरचना में अर्थ का निर्माण विरोधी स्थितियों के मेल से होता है। पतझर और बाँसुरी, सूखापन और कोमलता, अवसान और जन्म, रिक्तता और मुस्कान—ये सभी ऐसे पद हैं जिन्हें सामान्यतः अलग-अलग अनुभवों से जोड़ा जाता है। कवि इन्हें एक ही संरचना में रखता है। इससे पाठक की पहले से बनी हुई धारणाएँ बदलती हैं। पतझर अब केवल समाप्ति का संकेत नहीं रह जाता और फूल केवल पूर्ण सौंदर्य का प्रतीक नहीं रहता। दोनों एक ही जीवन-प्रक्रिया के अलग-अलग चरण बन जाते हैं।
इस कविता में मानवीकरण, रूपक और बिम्बात्मकता का प्रयोग भी स्वाभाविक ढंग से हुआ है। पतझर की रग-रग में बाँसुरी बजना प्रकृति को जीवित शरीर का रूप देता है। पंखुरियों की मुस्कान प्रकृति के भीतर मानवीय भावों की उपस्थिति का अनुभव कराती है। फूल का पैदा होने की कोशिश करना सृजन को एक सक्रिय और संघर्षशील प्रक्रिया में बदल देता है। इन प्रयोगों की विशेषता यह है कि वे अलग-अलग अलंकारों की तरह दिखाई नहीं देते। वे मिलकर कविता की पूरी संवेदना का निर्माण करते हैं।
‘पतझर की बाँसुरी’ का एक गौरतलब पहलू यह भी है कि इसमें प्रकृति और मनुष्य के बीच सम्बन्ध को एक नयी दृष्टि से देखा गया है। कवि प्रकृति को सिर्फ़ आदमी के सुख-दुख का प्रतिबिम्ब नहीं बनाता। वह उसके भीतर चलने वाली स्वतंत्र जीवन-प्रक्रिया को पहचानता है। मनुष्य उस प्रक्रिया का साक्षी बनता है और उसके माध्यम से अपने जीवन को समझने की कोशिश करता है। इस दृष्टि से कविता में एक पर्यावरणीय संवेदना भी मौजूद है। प्रकृति को केवल उपयोग की वस्तु या मनुष्य के मनोरंजन का साधन मानने के बजाय उसे अपनी आन्तरिक लय और जीवन-शक्ति वाली सत्ता के रूप में देखा गया है।
आज के समय में इस कविता का अर्थ और भी व्यापक हो जाता है। मनुष्य ने विकास के नाम पर प्रकृति के साथ अपने सम्बन्धों को जिस तरह बदला है, उसमें ऋतुओं और प्राकृतिक चक्रों की सहजता लगातार प्रभावित हुई है। ऐसे समय में पतझर के भीतर जीवन का संगीत सुनना हमें प्रकृति को उसके अपने समय और प्रक्रिया के साथ समझने की प्रेरणा देता है। हर सूखापन मृत्यु का संकेत नहीं होता और हर हरियाली जीवन की सम्पूर्णता का प्रमाण नहीं होती। प्रकृति में परिवर्तन की अपनी लय है। उसे समझने के लिए केवल बाहरी दृश्य पर्याप्त नहीं हैं। उसके भीतर चलने वाली प्रक्रियाओं के प्रति संवेदनशील होना भी ज़रूरी है।
इस कविता को सृजनात्मक कर्म के रूपक के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। एक कवि के भीतर भी कई बार ऐसा समय आता है जब कोई रचना आकार नहीं ले पाती। पुराने विचार और अभिव्यक्ति के तरीके अपना असर खोने लगते हैं। बाहर से देखने पर लगता है कि सृजन की प्रक्रिया ठहर गई है। लेकिन इसी ठहराव के भीतर कोई नया अनुभव, नया विचार और नयी भाषा जन्म लेने की कोशिश कर सकती है। इस अर्थ में पतझर कवि की रचनात्मक बेचैनी का और बाँसुरी उसकी आन्तरिक सृजनात्मक लय का प्रतीक बन जाती है। फूल वह रचना है जो अभी पूरी तरह सामने नहीं आई है, लेकिन जिसका जन्म भीतर ही भीतर चल रहा है।
इस तरह ‘पतझर की बाँसुरी’ को केवल आशावादी कविता कहना भी पर्याप्त नहीं होगा। इसकी आशा का आधार ज़िन्दगी की कठिनाइयों से आँखें चुराना नहीं है। कवि पतझर को हटाकर सीधे वसंत की कल्पना नहीं करता। वह पतझर के भीतर ही जीवन की सम्भावना खोजता है। यह अन्तर महत्त्वपूर्ण है। यहाँ आशा किसी बाहरी चमत्कार से पैदा नहीं होती, बल्कि जीवन की आन्तरिक रचनात्मक शक्ति से जन्म लेती है। फूल के पैदा होने की कोशिश में एक ऐसी जिजीविषा है जो परिस्थितियों के प्रतिकूल होने पर भी समाप्त नहीं होती।
वस्तुत:‘पतझर की बाँसुरी’ विजय बहादुर सिंह की प्रकृति-दृष्टि, बिम्ब-निर्माण की क्षमता और जीवन के प्रति उनकी रचनात्मक आस्था को व्यक्त करने वाली एक श्रेष्ठ कविता है। इसकी कलात्मक उपलब्धि इस बात में है कि कवि ने एक परिचित ऋतु को नये अर्थ में देखा है। पतझर के भीतर संगीत, हवा में पंखुरियों की मुस्कान और कहीं जन्म लेने की कोशिश करता फूल—ये तीनों दृश्य मिलकर जीवन की एक ऐसी तस्वीर बनाते हैं जिसमें अवसान और सृजन एक-दूसरे के विरोधी नहीं रह जाते।
कविता का सबसे गहरा संकेत शायद यही है कि जीवन की सम्भावनाएँ हमेशा अपने पूर्ण और विकसित रूप में दिखाई नहीं देतीं। कई बार वे किसी अनदेखी जगह पर, किसी अस्पष्ट हलचल में और किसी अधूरे प्रयत्न में मौजूद रहती हैं। उन्हें पहचानने के लिए केवल आँखों की नहीं, संवेदना की भी आवश्यकता होती है। विजय बहादुर सिंह की यह कविता हमें उसी संवेदना से सम्पन्न करती है। वह पतझर को देखकर केवल झरती पत्तियों का हिसाब नहीं लगाती, बल्कि उसके भीतर बजती उस बाँसुरी को सुनने की कोशिश करती है जो आने वाले जीवन का संगीत रच रही है।
मंगलेश डबराल की बांसुरी विषयक कविता और विजय बहादुर सिंह की ‘पतझर में बाँसुरी’ को साथ रखकर पढ़ना दो अलग-अलग काव्य-दृष्टियों के बीच एक दिलचस्प संवाद की सम्भावना पैदा करता है। दोनों कविताओं में बाँसुरी सिर्फ़ संगीत पैदा करने वाला वाद्ययंत्र नहीं है। वह जीवन की आन्तरिक लय, मनुष्य की संवेदना, मौन, स्मृति और अस्तित्व की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है। लेकिन दोनों कवियों के यहाँ बाँसुरी की अर्थ-भूमि अलग है। मंगलेश डबराल की कविता में बाँसुरी का सम्बन्ध मनुष्य के भीतर मौजूद उस संगीत से है जो धीरे-धीरे मौन, पीड़ा और अन्ततः विनाश के अनुभव में बदल जाता है। इसके विपरीत विजय बहादुर सिंह की ‘पतझर की बाँसुरी’ में बाँसुरी जीवन की उस आन्तरिक रचनात्मक शक्ति का प्रतीक है जो क्षय और अवसान के बीच भी नये सृजन की सम्भावना बनाए रखती है।
दोनों कविताओं में बाँसुरी को केन्द्र में रखकर कवियों ने जीवन के उन पक्षों को अभिव्यक्त किया है जो सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देते। एक कविता भीतर की आवाज़ के खो जाने की त्रासदी को सामने लाती है, जबकि दूसरी प्रकृति के भीतर छिपी उस आवाज़ को सुनती है जो नये जीवन के जन्म की सूचना देती है। इस तरह दोनों कविताओं में बाँसुरी एक साझा बिम्ब होते हुए भी दो अलग-अलग जीवन-दृष्टियों और संवेदनात्मक अनुभवों की वाहक बन जाती है।
मंगलेश डबराल की कविता का आरम्भ बाहर सुनाई देने वाली बाँसुरी से होता है, लेकिन कवि शीघ्र ही पाठक का ध्यान एक दूसरी बाँसुरी की ओर ले जाता है, जो मनुष्य के भीतर बजती है और जिसे बाहर से सुना नहीं जा सकता। कविता की ये पंक्तियाँ उसके मूल संवेदनात्मक द्वन्द्व को सामने रखती हैं : ‘बाहर एक बाँसुरी सुनाई देती है / एक और बाँसुरी है /जो तुम्हारे भीतर बजती है
और सुनाई नहीं देती’। इसके बाद कविता भीतर की बाँसुरी के धीरे-धीरे चुप हो जाने, उसके विलाप और अन्ततः उसके छेदों से राख़ गिरने की स्थिति तक पहुँचती है: एक दिन बहुत वह चुप हो जाती है / तब सुनाई देता है उसका विलाप /उसके छेदों से गिरती है राख़’ ।
इस पूरी कविता के बिम्ब-विधान और अर्थ-संरचना का विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है कि कविता में बाहर और भीतर का विभाजन केवल स्थान का विभाजन नहीं है। यह मनुष्य के दो अलग-अलग अनुभव-जगत का अन्तर है। बाहर का संसार दृश्य और श्रव्य है। वहाँ जो कुछ घटित होता है, उसे दूसरे लोग भी देख और सुन सकते हैं। लेकिन आदमी के भीतर एक दूसरी दुनिया भी है, जिसकी अनुभूति हमेशा दूसरों तक नहीं पहुँचतीं। उसमें स्मृति, इच्छा, पीड़ा, आकांक्षा और ऐसी अनेक संवेदनाएँ मौजूद रहती हैं जिन्हें सामान्य भाषा में व्यक्त करना कई बार सम्भव नहीं होता। मंगलेश डबराल इस भीतरी दुनिया को बाँसुरी के रूपक में प्रस्तुत करते हैं।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि जब भीतर की बाँसुरी बज रही है, तब वह सुनाई क्यों नहीं देती? इसका उत्तर केवल इस बात में नहीं है कि आन्तरिक अनुभव अदृश्य होते हैं। इसके पीछे मनुष्य की उस स्थिति का भी संकेत है जिसमें उसके भीतर बहुत कुछ घटित होता रहता है, लेकिन बाहरी दुनिया उसकी अनुभूतियों को पहचानने में असमर्थ रहती है। व्यक्ति सामाजिक रूप से सक्रिय दिखाई दे सकता है, बातचीत कर सकता है, अपने दायित्व निभा सकता है, लेकिन उसके भीतर कोई ऐसा संगीत भी हो सकता है जिसे सुनने वाला कोई नहीं है।
इस अर्थ में कविता आधुनिक मनुष्य के अकेलेपन की भी कविता है। यहाँ अकेलापन केवल किसी के साथ न होने की स्थिति नहीं है। यह अपनी आन्तरिक अनुभूति को दूसरे तक न पहुँचा पाने की स्थिति है। बाहर की बाँसुरी सुनाई देती है, लेकिन भीतर की बाँसुरी का संगीत किसी सार्वजनिक अनुभव का हिस्सा नहीं बन पाता। मनुष्य की आन्तरिक दुनिया और बाहरी सामाजिक संसार के बीच एक दूरी बनी रहती है।
विजय बहादुर सिंह की ‘पतझर की बाँसुरी’ में भी बाँसुरी की ध्वनि भीतर से ही पैदा होती है। लेकिन यहाँ उसका अर्थ बिल्कुल अलग दिशा में विकसित होता है। कवि पतझर की रग-रग में बाँसुरी बजते हुए सुनता है। इस कल्पना में प्रकृति एक जीवित देह का रूप ग्रहण कर लेती है। पतझर के भीतर संगीत का होना इस बात का संकेत है कि जीवन की सक्रियता केवल उसके बाहरी रूप से निर्धारित नहीं होती। पत्तियों के झर जाने और वृक्षों के सूने दिखाई देने के बावजूद प्रकृति के भीतर कोई रचनात्मक प्रक्रिया जारी रहती है।
दोनों कविताओं में बाँसुरी का संगीत अदृश्य और आन्तरिक है। लेकिन मंगलेश डबराल की कविता में भीतर का संगीत धीरे-धीरे समाप्ति की ओर जाता है, जबकि विजय बहादुर सिंह की कविता में आन्तरिक संगीत नये जीवन के जन्म की तैयारी करता है। यह अन्तर दोनों कविताओं की मूल संवेदना को निर्धारित करता है।
मंगलेश डबराल की कविता में भीतर की बाँसुरी का चुप हो जाना एक निर्णायक घटना है। यहाँ मौन केवल ध्वनि का अभाव नहीं है। वह उस संवेदनात्मक संसार के संकट का संकेत है जो अब तक मनुष्य के भीतर जीवित था। कविता की सबसे मार्मिक स्थिति तब बनती है जब बाँसुरी की चुप्पी के बाद उसका विलाप सुनाई देने लगता है। सामान्यतः हम मानते हैं कि ध्वनि की अनुपस्थिति मौन पैदा करती है, लेकिन यहाँ मौन स्वयं एक नयी ध्वनि में बदल जाता है। भीतर की बाँसुरी जब तक बजती है, उसका संगीत दूसरों तक नहीं पहुँचता; लेकिन जब वह चुप हो जाती है, तब उसका विलाप सुनाई देने लगता है।
इस विपर्यय में कविता की गहरी विडम्बना छिपी है। मनुष्य की जीवित संवेदना को पहचानने के लिए संसार के पास समय और नहीं है, लेकिन जब वह संवेदना टूटने लगती है, तब उसकी पीड़ा सुनाई देने लगती है। इसे इस रूप में भी समझा जा सकता है कि समाज कई बार किसी व्यक्ति के जीवित अनुभवों और उसकी आन्तरिक आकांक्षाओं की उपेक्षा करता है, लेकिन उसके संकट और विघटन के बाद उसकी पीड़ा को पहचानता है। कविता इस स्थिति को सीधे सामाजिक टिप्पणी में नहीं बदलती। वह बाँसुरी की चुप्पी और विलाप के माध्यम से इसे अधिक मार्मिक बना देती है।
इसके विपरीत विजय बहादुर सिंह की कविता में मौन और अदृश्यता का सम्बन्ध किसी संकट से नहीं, बल्कि सृजन की तैयारी से है। यहाँ पतझर के भीतर बजती बाँसुरी धीरे-धीरे हवा में फैलती हुई एक नयी संवेदना का रूप ग्रहण करती है। नर्म पंखुरियों की मुस्कान और किसी फूल का पैदा होने की कोशिश करना इस बात की ओर संकेत करता है कि जीवन की रचनात्मक प्रक्रिया अभी जारी है। वह अपने पूर्ण रूप में सामने नहीं आई है, लेकिन उसकी उपस्थिति के संकेत मिलने लगे हैं।
इस अन्तर को दोनों कविताओं के अन्तिम बिम्बों के माध्यम से भी समझा जा सकता है। मंगलेश डबराल की कविता का अन्त राख़ की छवि पर होता है। राख़ किसी ऐसी वस्तु का अवशेष है जो जल चुकी है। वह अपने भीतर किसी पूर्ववर्ती अस्तित्व की स्मृति तो रखती है, लेकिन उस अस्तित्व की जीवित सक्रियता अब समाप्त हो चुकी है। बाँसुरी के छेदों से राख़ गिरना एक विचलित करने वाला दृश्य है। जिस बाँसुरी के छेद कभी संगीत पैदा करने का माध्यम थे, वे अब राख़ के बाहर निकलने का रास्ता बन गए हैं। इस तरह सृजन और विनाश के बीच का सम्बन्ध एक असाधारण बिम्ब में बदल जाता है।
विजय बहादुर सिंह की कविता का अन्त इसके ठीक विपरीत एक ऐसे फूल की सम्भावना पर होता है जो अभी पैदा नहीं हुआ है। यहाँ कोई अवशेष नहीं है, बल्कि भविष्य की ओर बढ़ती हुई एक प्रक्रिया है। फूल का जन्म अभी अनिश्चित है, लेकिन उसकी कोशिश जारी है। इसीलिए दोनों कविताओं के अन्त में दो अलग-अलग समय-बोध दिखाई देते हैं। एक में अतीत के जल जाने का अवशेष है, दूसरे में भविष्य के जन्म लेने की सम्भावना।
यहाँ एक और दिलचस्प समानता दिखाई देती है। दोनों कवियों ने अपने अनुभव को किसी बड़े दृश्य या विस्तृत प्रकृति-वर्णन के सहारे व्यक्त नहीं किया है। दोनों ने एक ही बिम्ब को अर्थ के कई स्तरों तक पहुँचाया है। मंगलेश डबराल की कविता में बाँसुरी, उसके छेद और राख़ मिलकर एक ऐसा दृश्य बनाते हैं जिसमें ध्वनि, मौन, विलाप और विनाश एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। विजय बहादुर सिंह की कविता में पतझर, बाँसुरी, हवा, पंखुरियाँ और फूल एक ऐसी संरचना बनाते हैं जिसमें आन्तरिक संगीत, प्रकृति की कोमलता और सृजन की सम्भावना एक-दूसरे से सम्बन्ध स्थापित करते हैं।
इस दृष्टि से दोनों कवियों की बिम्ब-रचना अत्यन्त सघन है। वे बिम्ब को केवल किसी भाव की सजावट के लिए इस्तेमाल नहीं करते। बिम्ब ही उनके विचार और अनुभव का आधार बन जाता है। पाठक को किसी दार्शनिक निष्कर्ष तक पहुँचाने के लिए कवि को अलग से व्याख्या नहीं करनी पड़ती। वस्तुओं के बीच बने सम्बन्ध ही अर्थ की रचना करते हैं।
संरचनावादी दृष्टि से इन दोनों कविताओं को पढ़ने पर उनके भीतर सक्रिय द्वन्द्वात्मक संरचनाएँ स्पष्ट होती हैं। मंगलेश डबराल की कविता में बाहर/भीतर, ध्वनि/मौन, उपस्थिति/अनुपस्थिति और जीवन/मृत्यु के द्वन्द्व हैं। विजय बहादुर सिंह की कविता में पतझर/वसंत, अवसान/सृजन, सूखापन/कोमलता और वर्तमान/भविष्य के बीच सम्बन्ध बनते हैं।
लेकिन इन विरोधी पदों की ख़ासियत यह है कि वे एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं हैं। मंगलेश की कविता में मौन के भीतर विलाप की ध्वनि मौजूद है। राख़ उस बाँसुरी का अवशेष है जो कभी संगीत पैदा करती थी। इस तरह मृत्यु के भीतर भी जीवन की स्मृति बनी रहती है। विजय बहादुर सिंह की कविता में पतझर के भीतर ही नये फूल की सम्भावना मौजूद है। इस प्रकार दोनों कविताएँ अपने-अपने ढंग से यह बताती हैं कि जीवन और मृत्यु, उपस्थिति और अनुपस्थिति अथवा क्षय और सृजन को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग करके नहीं समझा जा सकता।
अर्थ की यह संरचना उत्तर-संरचनावादी दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। मंगलेश डबराल की कविता में बाहर की बाँसुरी को सामान्यतः वास्तविक और भीतर की बाँसुरी को अदृश्य माना जा सकता है। लेकिन कविता धीरे-धीरे इस व्यवस्था को उलट देती है। भीतर की बाँसुरी भले ही सुनाई नहीं देती, लेकिन कविता का पूरा भाव-जगत उसी के इर्द-गिर्द निर्मित होता है। बाहर की बाँसुरी शुरू में मौजूद है, पर वह कविता के गहरे अर्थ का केन्द्र नहीं बनती। इस प्रकार जो दिखाई देता है, वह अनिवार्यतः ज़्यादा महत्त्वपूर्ण और जो अनुपस्थित है, वह अर्थ की दृष्टि से गौण नहीं होता।
इसी तरह विजय बहादुर सिंह की कविता में पतझर और फूल के पारम्परिक अर्थ भी बदल जाते हैं। पतझर को केवल क्षय और फूल को केवल पूर्ण सौंदर्य का संकेत मानने की धारणा टूटती है। फूल अभी अस्तित्व में नहीं आया है, लेकिन उसकी सम्भावना पतझर के भीतर ही सक्रिय है। इस तरह दोनों कविताएँ पाठक की पहले से बनी हुई अर्थ-व्यवस्था को बदल देती हैं।
मंगलेश डबराल की कविता में ‘छेद’ और ‘राख़’ के सम्बन्ध पर गौर करना ज़रूरी है । बाँसुरी के छेद संगीत के निर्माण की अनिवार्य शर्त हैं। उन्हीं से हवा गुजरती है और ध्वनि पैदा होती है। लेकिन कविता के अन्त में वही छेद राख़ के गिरने का माध्यम बन जाते हैं। जो संरचना कभी संगीत की सम्भावना पैदा करती थी, वही अब विनाश का दृश्य प्रस्तुत करती है। इस बिम्ब में गहरा कलात्मक विरोधाभास है। यहाँ किसी वस्तु का अर्थ स्थायी नहीं रहता। उसकी भूमिका बदलते ही उसका अर्थ भी बदल जाता है।
विजय बहादुर सिंह की कविता में भी बाँसुरी का अर्थ उसके प्रसंग से बनता है। वह किसी व्यक्ति के हाथ में बजाया जाने वाला वाद्ययंत्र नहीं है। वह पतझर की आन्तरिक जीवन-लय है। इसीलिए यहाँ बाँसुरी का सम्बन्ध प्रकृति की रचनात्मकता से जुड़ जाता है। दोनों कविताओं में बाँसुरी का अर्थ उसके सामान्य सांस्कृतिक परिचय से आगे निकल जाता है। मंगलेश जी के यहाँ वह मनुष्य के भीतर की संवेदना का रूपक बनती है और विजय बहादुर सिंह के यहाँ प्रकृति के भीतर सक्रिय सृजन-ऊर्जा का।
भारतीय काव्यशास्त्र की दृष्टि से दोनों कविताओं की व्यंजना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। दोनों में प्रत्यक्ष कथन की अपेक्षा व्यंग्यार्थ अधिक व्यापक है। मंगलेश डबराल की कविता में बाँसुरी का विलाप किसी एक व्यक्ति के दुख तक सीमित नहीं रहता। वह उन सभी अनुभवों की ओर संकेत करता है जिन्हें मनुष्य अपने भीतर दबाए रखता है और जिनकी पहचान अक्सर बहुत देर से होती है। राख़ का बिम्ब इस पीड़ा को और गहरा करता है। यहाँ करुणा का भाव किसी सीधे भावुक कथन से नहीं, बल्कि दृश्य की आन्तरिक संरचना से पैदा होता है।
विजय बहादुर सिंह की कविता में भी व्यंजना का विस्तार है। पतझर और बाँसुरी का सम्बन्ध प्रत्यक्ष रूप से प्रकृति का एक दृश्य बनाता है, लेकिन उसके भीतर जीवन की निरन्तरता और सृजन की सम्भावना का अर्थ सक्रिय है। यहाँ आशा का भाव किसी उत्सवधर्मी उल्लास से नहीं बनता। वह एक धीमी, कोमल और अनिश्चित प्रक्रिया से पैदा होता है। इसीलिए दोनों कविताओं में भावात्मक प्रभाव अलग-अलग होते हुए भी उनकी व्यंजना की गहराई समान रूप से महत्त्वपूर्ण है।
दोनों कविताओं का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष उनका भाषिक संयम है। मंगलेश डबराल की कविता में बहुत कम शब्दों में भीतर की संवेदना का पूरा जीवन-क्रम प्रस्तुत हो जाता है। आरम्भ में बाँसुरी का संगीत है, फिर उसका मौन है, उसके बाद विलाप है और अन्ततः राख़ का दृश्य। यह क्रम किसी कथा की तरह आगे बढ़ता है, लेकिन इसमें कथा का विस्तार नहीं है। कुछ बिम्बों के सहारे ही जीवन की एक त्रासद स्थिति सामने आ जाती है।
विजय बहादुर सिंह की कविता में भी भाषा का यही संयम दिखाई देता है। यहाँ भी कुछ छोटे दृश्य हैं, लेकिन उनके बीच अर्थ का क्रमिक विस्तार होता है। पतझर की आन्तरिक लय से शुरू होकर कविता हवा में तैरती पंखुरियों तक पहुँचती है और अन्ततः नये फूल के जन्म की सम्भावना पर ठहरती है। दोनों कविताओं में संक्षिप्तता अर्थ को सीमित नहीं करती, बल्कि उसे अधिक सघन बनाती है।
महर्षि व्यास कृत माने गये श्रीमद्भागवत के ‘वेणु-गीत’ में आए बाँसुरी के प्रसंग को मंगलेश डबराल और विजय बहादुर सिंह की कविताओं के साथ रखकर देखने पर बाँसुरी के अर्थ का एक ऐसा पक्ष सामने आता है जिस पर अलग से विचार किया जाना चाहिए। भागवत में बाँसुरी किसी स्वतंत्र संगीतात्मक वस्तु के रूप में उपस्थित नहीं है। उसका सम्बन्ध कृष्ण के शरीर, उनके अधरों, श्वास और उनकी लीलात्मक उपस्थिति से है। श्लोक का आरम्भ भी बाँसुरी से नहीं, बल्कि कृष्ण के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के दृश्यात्मक चित्रण से होता है। उनके सिर पर मोरपंख, कानों में कर्णिकार के फूल, शरीर पर सुनहरे पीले वस्त्र और गले में वैजयन्ती माला है। इसके बाद बाँसुरी का उल्लेख आता है:
बर्हापीडं नटवरवपुः कर्णयोः कर्णिकारम्।
विभ्रदवासः कनककपिशं वैजयन्तीं च मालाम्॥
रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दैः।
वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्राविशद् गीतकीर्तिः॥
(जिनके सिर पर मोरपंख का मुकुट सुशोभित है, जिनका शरीर नटों में श्रेष्ठ और लीलामय है, जिनके दोनों कानों में कर्णिकार के पुष्प सजे हैं, जो सुनहरे पीले वस्त्र धारण किए हुए हैं और वैजयन्ती माला पहने हुए हैं, वे श्रीकृष्ण अपने अधरों के अमृतमय रस से बाँसुरी के छिद्रों को भरते हुए, गोपों के समूह के साथ उस वृन्दावन में प्रवेश कर रहे हैं जिसे उनके चरणों ने रमणीय बना दिया है और जहाँ उनकी कीर्ति का गान हो रहा है।)
इस छंद में ‘अधर-सुधा’ का इस्तेमाल उल्लेखनीय है। ‘रन्ध्रान् वेणोरधरसुधया पूरयन् गोपवृन्दैः’ को अगर ख़ास तौर पर ध्यान में रखें तो भागवतकार की बाँसुरी में संगीत केवल हवा के प्रवेश से पैदा नहीं होता। कवि उसकी ध्वनि को कृष्ण के अधरों से निकलने वाले अमृत के रूप में देखता है। यहाँ संगीत का स्रोत शारीरिक उपस्थिति और आध्यात्मिक अनुभूति के बीच स्थित है। बाँसुरी कृष्ण के शरीर से अलग एक वस्तु है, लेकिन उसका संगीत उनके स्पर्श और श्वास के बिना सम्भव नहीं है। इस प्रकार वादक और वाद्य के बीच एक ऐसा सम्बन्ध बनता है जिसमें दोनों की पहचान एक-दूसरे से जुड़ जाती है।
मंगलेश डबराल की कविता में इस सम्बन्ध का एक अलग रूप दिखाई देता है। वहाँ बाँसुरी का कोई वादक उपस्थित नहीं है। बाहर सुनाई देने वाली बाँसुरी के बाद कवि जिस दूसरी बाँसुरी की चर्चा करता है, वह मनुष्य के भीतर बजती है। उसका कोई प्रत्यक्ष वादक नहीं है। वह मनुष्य की अपनी आन्तरिक संरचना का हिस्सा है। भागवत में बाँसुरी को स्वर देने वाली सत्ता स्पष्ट है, जबकि मंगलेश डबराल के यहाँ संगीत का स्रोत मनुष्य की चेतना के भीतर छिपा हुआ है। इस अन्तर से दोनों कविताओं में संगीत की उत्पत्ति के दो अलग आधार सामने आते हैं। एक में संगीत किसी दिव्य उपस्थिति के सम्पर्क से पैदा होता है, दूसरे में वह व्यक्ति के अपने अस्तित्व का हिस्सा है। विजय बहादुर सिंह के यहाँ इस सम्बन्ध में तीसरी स्थिति दिखाई देती है। वहाँ बाँसुरी किसी बाहरी वादक की प्रतीक्षा नहीं करती। उसका संगीत पतझर की अपनी रगों में बज रहा है। इस तरह तीनों रचनाओं में संगीत के स्रोत का प्रश्न तीन अलग-अलग उत्तर प्राप्त करता है।
भागवत के छंद में एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कृष्ण बाँसुरी बजाते हुए अकेले नहीं हैं। उनके साथ गोपवृंद है और वे वृन्दावन में प्रवेश कर रहे हैं। बाँसुरी का संगीत एक सामूहिक सांस्कृतिक अनुभव का हिस्सा बनता है। यहाँ ध्वनि का सम्बन्ध सुनने वालों से भी है। संगीत तभी अपनी व्यापकता प्राप्त करता है जब वह किसी समुदाय के अनुभव में प्रवेश करता है। ‘गीतकीर्तिः’ पद इस प्रसंग को और अर्थपूर्ण बना देता है। कृष्ण की कीर्ति का गान और उनकी बाँसुरी की ध्वनि एक ही सांस्कृतिक वातावरण में उपस्थित हैं। बाँसुरी यहाँ केवल निजी आनन्द का साधन नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान का माध्यम भी है।
मंगलेश डबराल की कविता में इसके ठीक विपरीत एक ऐसी स्थिति है जहाँ भीतर की बाँसुरी का संगीत सुनने वाला कोई नहीं है। यहाँ समस्या केवल यह नहीं कि संगीत अदृश्य है, बल्कि यह भी है कि मनुष्य की आन्तरिक अनुभूति सामूहिक अनुभव का हिस्सा नहीं बन पाती। भागवत का गोपवृंद और मंगलेश की कविता का अनसुना भीतरी संगीत इस दृष्टि से दो अलग सांस्कृतिक स्थितियों को सामने रखते हैं। एक में संगीत समुदाय को जोड़ता है, दूसरे में व्यक्ति की अनुभूति और बाहरी संसार के बीच दूरी बनी रहती है। इस तुलना से मंगलेश की कविता का एक सामाजिक पक्ष भी खुलता है। वह इस प्रश्न की ओर संकेत करती है कि किसी व्यक्ति के भीतर घटित अनुभव को सामाजिक रूप से मान्यता और श्रवण कब मिलता है।
बाँसुरी के छिद्रों का प्रसंग भी इन तीनों रचनाओं को जोड़ने वाला एक विशिष्ट तुलनात्मक आधार प्रस्तुत करता है। भागवत में कृष्ण बाँसुरी के छिद्रों को अधर-सुधा से भरते हैं। यहाँ छिद्र रिक्तता के ऐसे स्थान हैं जिनमें दिव्य श्वास प्रवेश करके संगीत पैदा करती है। मंगलेश डबराल की कविता में उन्हीं छिद्रों से राख़ गिरती है। इस परिवर्तन को केवल संगीत और विनाश के विरोध के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। दोनों कवियों के यहाँ बाँसुरी के छिद्रों का कार्य ही बदल जाता है। भागवत में वे ध्वनि के बाहर आने का माध्यम हैं, जबकि मंगलेश के यहाँ वे राख़ के बाहर आने का रास्ता बन जाते हैं। एक में रिक्त स्थान भरने से संगीत पैदा होता है, दूसरे में उन्हीं रिक्त स्थानों से किसी समाप्त हो चुकी प्रक्रिया का अवशेष बाहर आता है।
विजय बहादुर सिंह की कविता में बाँसुरी के छिद्रों का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है। यह अनुपस्थिति भी ध्यान देने योग्य है। उनकी कविता बाँसुरी की आन्तरिक बनावट या उसे बजाने की प्रक्रिया में नहीं जाती। वहाँ बाँसुरी अपने वाद्यगत रूप से आगे बढ़कर पतझर के भीतर मौजूद एक अदृश्य ध्वनि बन जाती है। इसीलिए भागवत के श्लोक और विजय बहादुर सिंह की कविता के बीच एक अन्तर यह भी है कि भागवत बाँसुरी के संगीत की उत्पत्ति का दृश्य प्रस्तुत करता है, जबकि विजय बहादुर सिंह उस संगीत को प्रकृति के भीतर पहले से सक्रिय मानते हैं। उनके यहाँ संगीत को पैदा करने वाली कोई अलग सत्ता दिखाई नहीं देती। वह प्रकृति के अपने अस्तित्व का हिस्सा है।
भागवत के इस श्लोक की दृश्यात्मक संरचना पर भी ध्यान देना ज़रूरी है । कृष्ण की वेशभूषा, मोरपंख, कर्णिकार के फूल और वैजयन्ती माला एक ऐसा दृश्य रचते हैं जो बाँसुरी की ध्वनि के साथ मिलकर पूर्ण होता है। यहाँ आँख और कान के अनुभव अलग-अलग नहीं रहते। कृष्ण का सौन्दर्य केवल देखने की वस्तु नहीं है। बाँसुरी का संगीत उस दृश्य को एक ऐसी अनुभूति में बदल देता है जिसमें दृश्य और श्रव्य दोनों शामिल हैं। यह भारतीय काव्य परम्परा की उस विशेषता की ओर संकेत करता है जिसमें एक इन्द्रिय का अनुभव दूसरी इन्द्रिय के अनुभव को भी प्रभावित करता है।
मंगलेश डबराल की कविता में भी ध्वनि और दृश्य के बीच ऐसा ही एक सम्बन्ध बनता है, लेकिन उसका परिणाम अलग है। वहाँ बाँसुरी की ध्वनि के स्थान पर अन्ततः राख़ का दृश्य उपस्थित होता है। ध्वनि का अनुभव एक दृश्यात्मक अवशेष में बदल जाता है। विजय बहादुर सिंह के यहाँ यह प्रक्रिया दूसरी दिशा में चलती है। बाँसुरी की अदृश्य ध्वनि हवा में तैरती पंखुरियों की मुस्कान के रूप में दृश्यात्मक अनुभव प्राप्त करती है। इस प्रकार भागवत में दृश्य से ध्वनि की ओर, मंगलेश के यहाँ ध्वनि से राख़ के दृश्य की ओर और विजय बहादुर सिंह के यहाँ ध्वनि से प्रकृति के दृश्यात्मक विस्तार की ओर गति दिखाई देती है। यह तीनों कविताओं के बीच एक नया कलात्मक सम्बन्ध स्थापित करता है।
इन रचनाओं के सांस्कृतिक सन्दर्भ को भी ध्यान में रखना होगा । भागवत का वेणु-गीत कृष्ण-भक्ति की उस परम्परा से जुड़ा है जिसमें बाँसुरी का संगीत आकर्षण, आत्मीयता और ईश्वरीय उपस्थिति का माध्यम बनता है। यहाँ बाँसुरी का संगीत अपने श्रोताओं को एक विशेष भाव-जगत में प्रवेश कराता है। आधुनिक हिन्दी कविता में यह सांस्कृतिक संकेत जस का तस नहीं बना रहता। मंगलेश डबराल बाँसुरी को किसी धार्मिक या आध्यात्मिक आश्वस्ति से नहीं जोड़ते। उनके यहाँ वह मनुष्य के भीतर की ऐसी अनुभूति का रूपक है जिसे बाहरी संसार सुन नहीं पाता। विजय बहादुर सिंह भी बाँसुरी को कृष्ण-लीला के प्रसंग से बाहर लाकर प्रकृति की अपनी ध्वनि में बदल देते हैं।
इस बदलाव को भारतीय काव्य-संस्कृति में बिम्बों की अर्थ-यात्रा के रूप में देखना उपयोगी होगा। कोई बिम्ब अपनी परम्परागत अर्थवत्ता को पूरी तरह खोए बिना भी नये अनुभवों के अनुसार बदल सकता है। बाँसुरी का सांस्कृतिक सम्बन्ध माधुर्य और आकर्षण से रहा है, लेकिन आधुनिक कवि उसे पीड़ा, मौन, प्रकृति और सृजन के अलग-अलग अनुभवों से जोड़ते हैं। इस अर्थ में मंगलेश डबराल और विजय बहादुर सिंह की कविताएँ भागवत के वेणु-गीत की पुनरावृत्ति नहीं करतीं। वे बाँसुरी के परिचित सांस्कृतिक संकेत को अपने समय और अनुभव के अनुरूप नये अर्थ देती हैं।
इस तुलना का एक और निष्कर्ष यह है कि बाँसुरी का अर्थ केवल उसके संगीत में नहीं, बल्कि इस बात में भी निहित है कि वह किसके शरीर से जुड़ी है, किसके लिए बजती है और कौन उसकी ध्वनि सुन पाता है। भागवत में कृष्ण, बाँसुरी और गोपवृंद के बीच एक ऐसा सम्बन्ध है जिसमें संगीत दिव्य उपस्थिति और सामूहिक श्रवण का माध्यम बनता है। मंगलेश डबराल के यहाँ भीतर की बाँसुरी का संगीत सार्वजनिक श्रवण से बाहर रह जाता है। विजय बहादुर सिंह के यहाँ वही संगीत किसी एक व्यक्ति या समुदाय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि प्रकृति के व्यापक जीवन में अपनी जगह बनाता है।
इस प्रकार भागवत के वेणु-गीत को इन दोनों आधुनिक कविताओं के साथ पढ़ने पर बाँसुरी की अर्थ-यात्रा के कुछ नये आयाम खुलते हैं। वह एक ओर दिव्य श्वास और सामूहिक श्रवण से जुड़ी है, दूसरी ओर व्यक्ति की अनसुनी आन्तरिक अनुभूति से और तीसरी ओर प्रकृति की स्वतंत्र सांगीतिक सत्ता से। इस यात्रा में बाँसुरी का सांस्कृतिक अर्थ समाप्त नहीं होता, बल्कि नये अनुभवों के साथ उसका विस्तार होता है। यही इन रचनाओं के बीच बनने वाले संवाद की विशिष्टता है।
मंगलेश डबराल और विजय बहादुर सिंह की इन कविताओं को स्त्रीवादी नज़रिए से देखने पर एक अतिरिक्त अर्थ-सम्भावना सामने आती है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि मंगलेश डबराल की कविता में स्त्री का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है। इसलिए इसे सीधे स्त्री-अनुभव की कविता घोषित करना उचित नहीं होगा। फिर भी इसके भीतर मौजूद मौन, अदृश्यता और अनसुनी संवेदना को उन सामाजिक स्थितियों के रूपक के रूप में पढ़ा जा सकता है जिनमें स्त्रियों की आवाज़ और अनुभवों को पर्याप्त जगह नहीं मिलती।
स्त्रीवादी आलोचना का एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि समाज में किसकी आवाज़ सुनी जाती है और किसकी आवाज़ को अनसुना कर दिया जाता है। सार्वजनिक जीवन में कुछ आवाज़ें अधिक मान्यता प्राप्त करती हैं, जबकि अनेक अनुभव निजी दायरे में सीमित रह जाते हैं। मंगलेश की कविता में बाहर की बाँसुरी का सुनाई देना और भीतर की बाँसुरी का अनसुना रहना इस अन्तर को समझने का एक आधार प्रदान करता है।
यहाँ भीतर की बाँसुरी को उन स्त्रियों के अनुभवों के रूपक के रूप में भी पढ़ा जा सकता है जिनकी इच्छाएँ, पीड़ाएँ और आकांक्षाएँ परिवार तथा समाज की स्वीकृत भाषा में जगह नहीं बना पातीं। वे अपने भीतर बहुत कुछ अनुभव करती हैं, लेकिन उनकी आवाज़ को सार्वजनिक मान्यता नहीं मिलती। उनकी चुप्पी को कई बार उनकी सहमति समझ लिया जाता है, जबकि उसके भीतर असहमति, पीड़ा और प्रतिरोध की अनेक परतें मौजूद हो सकती हैं।
कविता में बाँसुरी के चुप हो जाने के बाद उसका विलाप सुनाई देना इस दृष्टि से विशेष अर्थ रखता है। यह उस स्थिति की ओर संकेत कर सकता है जिसमें किसी व्यक्ति की पीड़ा तब पहचानी जाती है जब वह अपनी बात कहने की क्षमता या अवसर खो चुका होता है। स्त्रीवादी आलोचना इसी व्यवस्था पर सवाल उठाती है। उसका आग्रह है कि किसी की आवाज़ को सुनने के लिए उसके संकट के चरम तक पहुँचने की प्रतीक्षा नहीं की जानी चाहिए।
विजय बहादुर सिंह की कविता में स्त्रीवादी अर्थ की सम्भावना एक अलग रूप में विकसित होती है। यहाँ प्रकृति की कोमलता और सृजनशीलता के बिम्ब उपस्थित हैं। पंखुरियों की मुस्कान और नये फूल के जन्म की कोशिश को जीवन की रचनात्मक शक्ति के रूप में पढ़ा जा सकता है। इसे स्त्री की सृजनात्मक क्षमता और उसकी स्वतंत्र आकांक्षाओं के रूपक के रूप में भी समझना सम्भव है। लेकिन इस पाठ में प्रकृति को स्त्री के साथ पूरी तरह समान मान लेने से बचना चाहिए। कविता का फूल किसी एक लैंगिक पहचान तक सीमित नहीं है। उसकी व्यापकता ही उसे अलग-अलग मानवीय अनुभवों से जोड़ने की सम्भावना देती है।
इस दृष्टि से दोनों कविताओं के बीच एक अर्थपूर्ण अन्तर सामने आता है। मंगलेश जी की कविता में भीतर का संगीत अनसुना रहकर अन्ततः विलाप में बदल जाता है, जबकि विजय बहादुर सिंह की कविता में भीतर की रचनात्मक ऊर्जा बाहर की दुनिया में नये फूल की सम्भावना पैदा करती है। एक कविता उन आवाज़ों की त्रासदी को सामने लाती है जिन्हें समय रहते नहीं सुना गया, दूसरी उन सम्भावनाओं की ओर संकेत करती है जिन्हें अनुकूल परिस्थितियों की प्रतीक्षा किए बिना भी अपने भीतर विकसित होना है।
दोनों कविताओं को सृजन और कला के प्रश्न से जोड़कर देखना भी सार्थक होगा। बाँसुरी स्वयं कला का एक वाद्ययंत्र है। उसका संगीत हवा, श्वास और छेदों के विशेष सम्बन्ध से पैदा होता है। मंगलेश की कविता में यही वाद्ययंत्र अन्ततः राख़ के बिम्ब में बदल जाता है। इसे कलाकार की आन्तरिक संवेदना के क्षरण और अभिव्यक्ति की सम्भावनाओं के समाप्त होने के रूपक की तरह भी पढ़ा जा सकता है। कलाकार के भीतर एक ऐसा संसार होता है जो हमेशा सार्वजनिक नहीं होता। उसकी रचनात्मकता का वास्तविक स्रोत कई बार उसी आन्तरिक संसार में छिपा रहता है। यदि वह संसार टूटता है, तो कला की ध्वनि भी विलाप में बदल सकती है।
विजय बहादुर सिंह की कविता में कला का यही प्रश्न दूसरी दिशा में जाता है। पतझर की बाँसुरी किसी समाप्त होती हुई रचनात्मकता का नहीं, बल्कि उस रचनात्मक ऊर्जा का संकेत है जो नयी अभिव्यक्ति की तैयारी कर रही है। फूल का पैदा होने की कोशिश करना किसी नयी कविता, नयी संवेदना या नये कलात्मक रूप के जन्म का रूपक भी हो सकता है। इस अर्थ में दोनों कविताएँ सृजन के दो अलग-अलग अनुभव सामने रखती हैं—एक में सृजन का स्रोत क्षीण होता हुआ दिखाई देता है, दूसरी में वह नये रूप की तलाश में सक्रिय है।
कुल मिलाकर मंगलेश डबराल और विजय बहादुर सिंह की बाँसुरी-विषयक कविताएँ एक ही बिम्ब के माध्यम से जीवन के दो अलग-अलग अनुभवों को सामने लाती हैं। मंगलेश की कविता मनुष्य के भीतर मौजूद उस संगीत की त्रासदी को व्यक्त करती है जो कभी सुनाई नहीं देता और अन्ततः अपने विलाप में बदल जाता है। विजय बहादुर सिंह की कविता प्रकृति के भीतर मौजूद उस संगीत को पहचानती है जो अवसान के समय भी जीवन और सृजन की सम्भावना बनाए रखता है।
इन दोनों कविताओं का तुलनात्मक अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि कविता में किसी एक बिम्ब का अर्थ पहले से तय नहीं होता। उसका अर्थ उस पूरी संरचना से बनता है जिसमें वह उपस्थित होता है। मंगलेश की बाँसुरी भीतर की संवेदना, मौन, पीड़ा और विनाश के अनुभव से अर्थ ग्रहण करती है। विजय बहादुर सिंह की बाँसुरी पतझर, हवा, पंखुरियों और फूल के जन्म की सम्भावना से अपना अर्थ प्राप्त करती है। एक ही वाद्ययंत्र दो अलग-अलग काव्य-संसारों में प्रवेश करके दो भिन्न जीवन-दृष्टियों का वाहक बन जाता है।
दोनों कविताओं की तुलना का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि दोनों कवि अदृश्य जीवन को सुनने की कोशिश करते हैं। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि मंगलेश डबराल उस आन्तरिक संगीत के खो जाने की पीड़ा को दर्ज करते हैं, जबकि विजय बहादुर सिंह उस संगीत में भविष्य के जन्म की आहट सुनते हैं। एक कविता हमें उन आवाज़ों के प्रति सचेत करती है जिन्हें हमने सुनना छोड़ दिया है, दूसरी हमें उन सम्भावनाओं को पहचानने की दृष्टि देती है जो अभी पूरी तरह प्रकट नहीं हुई हैं। इस तरह दोनों कविताएँ मिलकर बाँसुरी को केवल संगीत का नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के भीतर सक्रिय जीवन-चेतना का एक व्यापक काव्यात्मक प्रतीक बना देती हैं।
कुल मिलाकर विजय बहादुर सिंह की इन कविताओं का शिल्प-सौन्दर्य इस बात में है कि वे साधारण जीवन के अनुभवों को एक नयी संवेदनात्मक और वैचारिक अर्थवत्ता प्रदान करती हैं। उनकी भाषा में दिखावटी जटिलता नहीं है, लेकिन अर्थ की जटिलता मौजूद है। उनके बिम्ब परिचित हैं, लेकिन उनके सम्बन्ध नये हैं। उनकी पंक्तियाँ छोटी हैं, लेकिन उनके बीच खुलने वाला अर्थ-संसार व्यापक है। वे पाठक को तैयार निष्कर्ष नहीं देतीं, बल्कि उसे अर्थ की खोज में सहभागी बनाती हैं। इसीलिए इन कविताओं की कलात्मकता केवल उनके कहे हुए में नहीं, बल्कि उनके कहने के ढंग, उनके मौन, उनके विराम और उनके भीतर लगातार खुलती अर्थ-सम्भावनाओं में भी निहित है।
*प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय.संपर्क: raviranjan@uohyd.ac.in
Discover more from रचना समय
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
