लीलाधर मंडलोई की प्रस्तुत कविताएँ आज के समय की बेचैनियों, विडंबनाओं और मानवीय आकांक्षाओं का दस्तावेज़ हैं। बेटी, प्रेम, कला, मातृभाषा, युद्ध, विस्थापन और बदलते सामाजिक संबंधों जैसे विषय यहां गहरी संवेदना और वैचारिक सजगता के साथ साकार हुए हैं। कवि मूलतः मनुष्य-केंद्रित है; वह हर तरह की हिंसा, संकीर्णता और अमानवीयता के विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है।

प्रस्तुत कविताओं की ख़ासियत है कि ये निजी पीड़ा से शुरू होकर सामाजिक पीड़ा में रूपांतरित होती हैं। ‘बेटी के लिए’ और ‘वादा’ जैसी कविताएँ पारिवारिक आत्मीयता के भीतर से समकालीन समाज के संकटों को उद्घाटित करती हैं जबकि ‘काला साम्राज्य’ और ‘अनुपस्थिति’ युद्ध और वैश्विक अस्थिरता के बीच मनुष्यता की रक्षा का आह्वान करती हैं। भाषा सहज, संवादधर्मी और संवेदनापूर्ण है जिसमें हिंदी-उर्दू की साझा सांस्कृतिक विरासत की अनुगूंज सुनाई देती है।ये कविताएँ केवल भावाभिव्यक्ति नहीं, बल्कि हमारे समय के नैतिक और मानवीय प्रश्नों से मुठभेड़ का रचनात्मक प्रयत्न हैं। इसलिए उनका महत्त्व साहित्यिक होने के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक भी है।

 – हरि भटनागर


लीलाधर मंडलोई की कविताएं


बेटी के लिए
**
सपने में जहां आकाशगंगा थी , मांगा हमने जो दुआ करते
एक कृष्ण परी उतर आई आंचल में
मां सरीखी एक सुगंध फैल गयी घर-आंगन
हम जो अधूरे थे दूध हंसी के बिना
हो गये दुनिया में अमीर उसके आने से
कोई मोल न था ‘सुहासिनी ‘ का

वह आग से घिरने पर मुरझाई नहीं बेइंतहा दर्द से
हम सब रो रहे थे सिसकते वह लेकिन चुप थी
उसके आंसुओं को हमने नहीं देखा, न सुनी चीख़-पुकार

हमसे ज़ियादा संभाला उसने हमारे दुखों को
और उसने ख़ुद को उन आठ मर्मांतक आपरेशन से
छूट गये जिनके निशान उसकी कोमल देह पर
उनकी जितनी हो सकती चिंता
एक लड़की को
वह समा गयी उसकी अव्यक्त ख़ामोशी में

जख़्मों को  ढांपती रही  खुले बालों में
त्याग दिया लंबे बालों से गूंथी जा सकने वाली फुलहरी चोटियां
अकेले पार करती रहीं असंभव पहाड़,हहराती नदियां और जीवन के अंधेरे समुद्र
अपनी बनायी धरती पर घूमती रहीं दायित्व धुरी पर हमारे वास्ते

मैं कह सकता हूं खुलकर अपनी बात कि वह अब एक दोस्त अधिक

बहोत हो गयी ख़ुद की अग्नि परीक्षा
निकल आओ बेरहम ज़माने के नक़ली उसूलों से
उड़ जाओ आसमान में और पा लो अपना आज़ाद नक्षत्र
कि हम देख सकें हरसिंगार का खिल कर महकना
और उसका आज़ाद फैलना प्रेम की इस दम तोड़ती धरती पर
**

सरगम के स्वर ‌
*
हमारी कलाएं अलग हैं लेकिन उनके ठिकाने
अपनी मातृभाषा में हैं
हम सरगम के सात स्वर हैं
लेकिन उन्हीं से बने हैं अपनी मातृभाषा में राग
और उनकी अपनी उपज

हम अपनी-अपनी भाषा ध्वनियों में
सृष्टि की अनूठी पुकार हैं
कलाओं की विविधता के सार के भीतर से
हमें पुकारना चाहिए छोड़ कर अपने द्वीप ,एक ही जगह से

हमें अपने घरानों के बाहर
एक ऐसे कला सक्रिय मनुष्य के जीवन के बारे में सोचना चाहिए
जो दुनिया के ऐन बीच अपनी मातृभाषा का हो
अपनी ज़मीन से सच कहता हुआ
**


यह वजूद
*
मैं कभी न मिला पिकासो,वेन गाग और डाली से
उनके रंग पिघल कर बहते रहे अवचेतन के केनवास पर

जैसे उस्ताद बड़े गुलाम अली खां , उस्ताद अमीर खां ,बेग़म अख़्तर , किशोरी अमोनकर
और पंडित जसराज के स्वर बने रहे भीतरी संसार में

कबीर,तुलसी,मीरा, मीर,ग़ालिब और जिगर मुरादाबादी
कभी न जा सके आत्मा से बाहर

कितने-कितने अदीबों की संगत से बना है यह वजूद
चाहे डाल दो इसे अब सीखचों के अंदर

कलाओं से बना एक विश्वचेता मनुष्य अब
किसी भी उन्मादी राष्ट्रवाद से बाहर खड़ा है
**


काला साम्राज्य
*
युध्दों के नामुराद समय में
हमें अपनी जगह पर मनुष्य बने रहना चाहिए
बने रहना चाहिए अपनी आवाज़
जो झुकी नहीं किसी के सामने आज तक

युद्ध नहीं , यह विनाश है
आने वाले कल के लिए भूलकर
रंगभेद,नस्ल,धर्म और उनका भुलावा
एक हो जाना चाहिए इस कठिन समय में

हमें चीटी,पत्ती,मछली ,धूप,जल और
ज़ख़्मी परिंदों के बारे में सोचना चाहिए
हमें उन बच्चों को बांहों में भर लेना चाहिए
जिनके मां-बाप खो गये

उनके धार्मिक बहकावों और साम्प्रदायिक प्रलोभनों को दरकिनार कर
दुनिया को फ़ना होने से बचाने के लिए
खोल देना चाहिए सरहदें उनके वास्ते
जिनके देश खो गये और
रोके कोई अगर रास्ता
उतर आना चाहिए सड़कों पर न्याय के पक्ष में

इतिहास गवाह है युद्ध से नहीं पाई जा सकी कभी शांति
दुनिया को फिर उपनिवेश बना डालने के उनके एकतरफ़ा जोम में
पहले उनका हर झूठा नक़्शा नाकामयाब हुआ
यह सच छिपा नहीं है,याद रहे यह युद्ध नहीं
मनुष्यता को पंगु बनाने वाला काला साम्राज्य है
**


कैफियत
*
इनकी कैफ़ियत यही है
कि ये धरती से अंतरिक्ष तक
अपने वक़्तों के चश्मदीद गवाह हैं
ये राग शुद्ध कल्याण के गायक हैं
और करुणा इनका बीज पद है

इन्हें कोई क्या ख़रीद पाएगा
कबीर के वंशज हैं ये दीवाने
हमारे वक़्त के इन पहरुओं के लिखे में जादूबयानी नहीं
सच्चे इंसानी सरोकार हैं

उनका पता आख़िरी आंख की नम सच्चाई है
ये आपकी बनायी दीवारों की दरारों से वाकिफ़ हैं

ये उस अदब के नागरिक हैं
जिनमें जन सामान्य की परमाणु आवाज़ है
जो डिगा सकती है हर सत्ता का सिंहासन

जो अष्ट प्रहर के निगहबान हैं
वे कानों से देखते हैं और आंखों में पांव लिए चलते हैं
हर दुख की वजह जानते हैं

ख़ामोशी की इनकी भाषा को समझना आसान नहीं
इनके भीतर की आग में किसी भी ख़तरनाक आयुध से बड़ी ताकत है

इस बढ़ती हुई आग से निपटना अब अकेला काम है
इस अकेले काम को ,पहले काम की तरह अंजाम तक पहुंचाने का यही समय है
**

अनुपस्थिति
*
युद्ध के जीवन विरोधी समय में
कुछ न कुछ रोज़ खो जाता है
मन की एक चाबी के कांपने से
संगीत का सपना टूट जाता है

जो छोड़कर गांव सरहद पर लड़ रहे हैं
उनकी वो सादा पहाड़ी धुनों का आलोक
संगीत का वो उन्मुक्त उजास ओर-छोर था
वह बमों के फटने की ध्वनि से धुंआ -धुंआ है

उनके लौट आने के इंतज़ार में
घरों-घर कम होती गयी मधुरा भक्ति में
बमुश्किल गुनगुनाता हूं उनकी कालजयी धुनें

कहीं कुछ लोग सरहद से छुट्टी,हारी-बीमारी और
शादी-ब्याह के लिए लौटते हैं
लोग-बाग उनसे अपने बच्चों की सलामती की ख़बर पाते ही
लौट आते हैं संगीत की निलछौंह स्मृति में

और ख़ैरियत की पुष्ट-अपुष्ट सूचनाओं पर
वही बिल्कुल वही सुर
एक बार फिर चमक जाता है जीवन के अंधेरों में


दीदावरी
*
हादिसों में ज़ियादा नहीं

इतना तो बचा है

ख़्वाब हैं
और ख़्वाब में

अब भी दीदावरी है
**

वादा
*

मां ने कहा और बार-बार कहा बग़ैर यह जाने
कि उसके कहे  का परिणाम क्या होगा
उसका अपना गांव,अपना लोक और समाज था
और उसके निजी सामाजिक अनुभव थे

वह पढ़-लिख नहीं सकती थी लेकिन
उसने देखी थीं अनेक चोटों से पिरातीं
कोमल गेहुंआ और काली देहें
उसने हल्दी चूने के लेप लगाने का काम
अपने जिम्मे ले रखा था

वह हर रूलाई और चीख़ को दूर से सुनकर
गरियाते-रोते हुए दौड़ पड़ती थी पिटती हुई औरतें के घर

उसने हमें कहा बारंबार
कि एक स्त्री आजीवन लुटाती है बच्चों और परिवार पर प्रेम
और ख़ुद तरसती रहती है उसी के वास्ते रोज़ पिटती हुई

हर स्त्री को मिले स्नेह,प्रेम,सम्मान और भरोसा
यही एक वादा लिया था उसने हम सब से
नहीं जानती थी वह कि आधुनिक होती दुनिया में
कितना कठिन होता जाएगा निश्छल प्रेम

प्रेम को तारे की तरह अपने अर्थों में हस्बमामूल चमकते रहना था
लेकिन तारों से झर रही है धूल और धरती बदल रही है प्रेम की
प्रेम के सेलफोन कोल्टन के घातक तत्वों से बने हैं
उनमें जीवन विरोधी आधुनिक रेडिएशन सक्रिय हैं

सोशल मीडिया के घटाटोप में प्रेम का सच छिपा दिया गया है
उसकी मांग बाज़ार की शर्तों पर बदल रही है
बेरोज़गारी और कम तनख्वाह में विवाह की शर्तें नामुमकिन होती गयीं
इतने तलाक़,इतनी लिव इन रिलेशनशिप,और छह माहा अनुबंध प्रेम पहले कहां थे

शहर में लकवाग्रस्त प्रेमियों की संख्या में लगातार इज़ाफ़ा है
अब सम्मान और भरोसा शब्द अपनी विश्वसनीयता खो चुके हैं
मैं मां की बातों में अब भी भरोसा करता हूं
यह जानते हुए कि दिल की जगह
अब नये दिमाग़ बाज़ार की भाषा के एजेंट हैं

वह मुनरो से मीनाकुमारी ,परवीन बाबी और रेखा में फ़र्क नहीं करते
प्रेम के लिए आधुनिक आकर्षक फ़िल्मी मांगों को न जुटा पाने
या दीगर आधुनिक कारणों से उत्पन्न विफलता के बाद
अब वो निभाने वाला ग़रीब का प्रेम एक ख़्वाब बनकर रह गया है

नींद की गोलियां,शराब और ड्रग के विविध सार्वभौमिक उत्पाद हैं
बच्चों को अवसाद के अन्धकार में फेंकते
मां नहीं जानती थी कि आधुनिक से उतर आधुनिक होते समय में
स्त्री -पुरुष संबंधों की नियति
हो सकती है एक ही अंत की तरफ़ बढ़ती हुई करुण सच्चाई

उसे नहीं मालूम था नये दाम्पत्य में प्रेम के मानक
युवा पीढ़ी में इतने बदल जाएंगे कि वह बेमानी हो उठेगा
विवाह व्यवसाय के रास्ते युध्द के शिल्प में होगा
और  बहुराष्ट्रीय कंपनियां प्रेम के स्वयंवर का बाज़ार रचने लगेंगी

जो कुछ भी किया प्रेम को निभाने के लिए नयी पीढ़ी ने
उसमें कुछ न कम जुटा पाने का संकट बना रहा
प्रेम करने वाले शहरों में बेरोज़गार अधिक है
और रोज़गार के लिए जो चाहिए
वो सब बाज़ार की कृपा पर है यहां तक सरकार

फिर कैसे बचेगा प्रेम में सम्मान और भरोसा
मैं ऐसी धरती पर हूं जो अपनी प्रेम धुरी पर घूम रही है
मुझे संदेह है कि सूरज और चांद पहले वाले हैं
और कुंडलियों का भाष्य तो माशाअल्लाह

हिमालय धंसक रहा है और एक दिन अचानक भरभरा कर गिर पड़ेगा
मुझे लगता है कि समुद्री जल स्तर के बढ़ने से
धरती का बड़ा हिस्सा एक दिन प्रेम की कमी से डूब जाएगा
ये सब भी प्रेम में आ रहे क्षरण के संकेत हैं

दो के बीच नहीं है वह ठोस पहले सरीखा
सिर्फ़ अपने-अपने स्वार्थवश जोड़-तोड़ और भविष्य के समीकरण में
वह अब पालिश किया हुआ ,नक़ली आभूषण की चमक का भ्रम है
वह प्रतियोगी परीक्षा की तरह है और अव्वल होने के संघर्ष में मुब्तिला है
और दोनों तरफ़ का ग़रीब उम्मीदवार अब प्रेम का उदाहरण नहीं हो सकता

गांव -क़स्बे अब स्मार्ट शहर के अंग हैं
जिनमें स्मार्टफोन की तरह प्रेम का स्मार्ट दिखना और होना ज़रूरी है
कई देशों को घूमने और देखने के बाद
मैं कविता में प्रेम की सृष्टि के बचाने का अंतिम उपाय लिखता हूं
जो निजी उम्मीद की इबारत से अधिक कुछ नहीं

यह अपनी ही सरहद पर टूटे-बिखरे लोगों का शदीद हासिल है
औरों की क्या कहूं समझ नहीं पाता मेरे बच्चे
उम्र की चार दहाई पार कर
बिचकते हैं शादी-ब्याह से कि ऐसा अदृश्य भय
मुहब्बत को भी देखते हैं संदेह की नज़र से

उनके दोस्तों की महफ़िल में कभी-कभार बुला लिया जाता हूं
इस एक वजह से कि मैं उन्हें उनके मां बाप से अधिक उदार लगता हूं
कि अपने बच्चों पर किसी तरह का दबाव नहीं डालता
उनके दोस्तो में जो किसी भरोसे में शादी कर बैठे
सुनाते हैं अपनी कारुणिक वैवाहिक कहानियां

उनमें से पचास प्रतिशत को तलाक इस शर्त पर मिला
कि कितना अधिक हर्जाना वसूल कर लड़की अपनी मनपसंद दूसरी दुनिया बसा सके
कहने में हिचकती नहीं कि शादी उसने इसी सोच-विचार से की थी
मैं यह सुन सनाके में डूब जाता हूं

मैं भरोसा नहीं कर पाता लेकिन लड़के को  जिस तरह देखा था हंसता खेलता
वह अब इतना मुरझा गया कि जवानी में बूढ़ा होता हुआ दिखता है
यही बात इधर लड़कियों का भी निर्मम सत्य है
उनके एक दोस्त ने तंग आकर आत्महत्या कर ली
और एक लापता हैं महीनों से

वे एक ही बात करते हैं मुझसे कि जब तक पूरी जांच-पड़ताल न हो जाए
बच्चों की शादी न हो यह जीवन के लिए बेहतर है
यह कैसा अविश्वास का भाव है ,मैं समझ नहीं पाता
क्या मैं इस ज़माने के बारे में इतना अज्ञानी हूं

वे ख़ुश होकर कहते हैं
अंकल !अभी कम से कम बच्चे  हंसते हुए मां-बाप के साथ हैं
मैं सचमुच बूझ नहीं पाता इस पीढ़ी का सच
और उनकी बातों से डरा हुआ सिमट जाता हूं अपने भीतर

हाल ही का वाकिआ है जब मुझे जाना पड़ा
इन्हीं बच्चों में से एक के संदर्भ में मध्यस्थता करने
और वहां लड़की की तरफ़ से पूरा परिवार था
तलाक के लिए नयी-नयी मांग करता

जो संभव नहीं था कि मैं अपने दोस्त की माली हालत से वाकिफ़ था
मैं सिर्फ़ परास्त ही नहीं हुआ,बेतरह डर गया नये समाज को देखकर
प्रेम, दया-मया ,करुणा वहां सिरे से ग़ायब थी
पुलिस की बार-बार धमकी और दहेज का मामला दर्ज़ कराने की चेतावनी
वकील से सलाह मांगने गया तो किसी राहत की राह न  मिली कि क़ानून ऐसा

समझौते का कोई विकल्प न था सिवाय इसके
कि कोई असामाजिक दमदार बीच में हस्तक्षेप करे
मैंने मध्यस्थता छोड़ दी कि मैं वैसा न था

पराजित घर पहुंचा तो बच्चों ने सुलह कराने की कामयाबी के बारे में पूछा
मेरी चुप्पी को देखकर वे अपने कमरों में चले गये और मैं अपने कमरे में
यह सोचता कि यह एक अलग उदाहरण हो सकता है पूरे समाज का शायद न हो
पर कह नहीं पाता बच्चों से कि बंधन में बंध जाओ

मैं उनके बुढ़ापे के बारे में सोचता हूं और प्रगतिशील होकर भी
उनसे कह नहीं पाता कि मां क्या चाहती रही जीते जी
किसी के साथ का होने का महत्व बुढ़ाते वक़्त में
अब जबकि मां नहीं है, इसे मैं एक राहत की सोचता शर्मसार हूं

जाने क्यूं मुझे ऐसा लगता है कि  मेरे बच्चों के साथ वह सब नहीं हो सकता
लेकिन दुविधा यह कि मैं आज के समय को देखता कुछ तय नहीं कर पाता
बेटी को लेकर चिंता अधिक होती है
कि समाज का चेहरा सचमुच पहले जैसा तो नहीं रहा

तिस पर दुनिया में मंदी, मंहगाई और चौतरफ़ लूट -खसोट और गुंडे मवाली
सचमुच सोच नहीं पाता अमंगल सोचने की बेवजह बीमारी की वजह से
किसी तरह संभाल कर ख़ुद को लौटता हूं बच्चों के पास
और कहता हूं आओ ‘ लेमन बकार्डी ‘ की बोतल खोलते हैं

वे कुछ नहीं पूछते और हम चुपचाप पीते हुए पुरानी ‘देवदास’ देखने बैठ जाते हैं
बावजूद पराजित अनुभव करता हुआ
मेरा भरोसा तिस पर दरकती दीवारों के बीच बना हुआ है

मैं उस वादे को अपनी तरह से अब भी
किसी तरह निभाने की जुगत में घिरा पाता हूं
और झिझक के साथ यह मन ही मन कहता हूं

मां!मैं अब भी तुम्हारे रास्ते प्रेम में भरोसा करता हुआ उम्र के इस  पड़ाव पर
भूले-बिसरे प्रेम गीतों को उम्मीद में सुनते हुए
अभी तक बेसुरा-बेहूदा नहीं हुआ हूं

फिर इस बेतुके ख़याल पर फीकी हंसी हंस पड़ता हूं
दोनों देखते हैं मेरी तरफ़ और मैं उनसे आंखें न मिला कर
एक लंबे घूंट में डूब कर अधूरी फ़िल्म देखने लगता हूं

लीलाधर मंडलोई

अन्य : फ़िल्म निर्माण, निर्देशन, पटकथा लेखन, मीडिया कर्म (टेलीविज़न व रेडियो)।

सम्पर्क : B 253, sarita vihar, new delhi 76

दूरभाष : 26258277 (निवास)।पता:
ए-2492, नेताजी नगर, नई दिल्ली 110023
Email: leeladharmandloi@gmail.com 

जन्म : छिंदवाड़ा जिले के एक छोटे-से गाँव गुढ़ी में जन्माष्टमी के दिन। जन्म वर्ष : 1953।

कृतियाँ : काव्य-संग्रह : घर-घर घूमा, रात-बिरात, मगर एक आवाज़, काल-बाँका तिरछा, क्षमायाचना तथा देखा-अदेखा व कवि ने कहा (चयन)।

गद्य : कविता का तिर्यक (आलोचना), दिल का क़िस्‍सा तथा अर्थ जल (निबन्ध), काला पानी (वृत्तान्त), दाना पानी (डायरी), पहाड़ और परी का सपना (अंदमान-निकोबार की लोककथाएँ)। पेड़ भी चलते हैं और चाँद का धब्बा (बाल कहानियाँ), इनसाइड लाइव (मीडिया)।

अनुवाद : शकेब जलाली की ग़ज़लों का लिप्यंतरण मंज़ूर एहतेशाम के साथ। अनातोली पारपरा की रूसी कविताओं के अनुवाद अनिल जनविजय के साथ।

सम्पादन/प्रस्तुति : कविता के सौ बरस (आलोचना), स्त्री मुक्ति का स्वप्न (विमर्श : अरविंद जैन के साथ), कवि एकादश (अनिल जनविजय के साथ) और सुदीप बॅनर्जी की प्रतिनिधि कविताएँ (विष्णु नागर के साथ) तथा उनके अंतिम संग्रह ‘उसे लौट आना चाहिए’ का संयोजन विष्णु नागर के साथ।

सम्मान : पुश्किन, रज़ा, शमशेर, नागार्जुन, दुष्यन्त, रामविलास शर्मा तथा कृति सम्मान।

Phone: 9315305643

 


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