‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन का श्रीकांत वर्मा की कविता ‘कोसल में विचारों की कमी है’ पर केन्द्रित आलेख प्रकाशित किया जा रहा है, जिसमें इस कविता को सत्ता, इतिहास और विचार के अन्तर्सम्बन्धों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित किया गया है। इस आलेख में कविता को केवल राजनीतिक व्यंग्य के रूप में सीमित न रखकर उसके भीतर सक्रिय सत्ता-भाषा, वैचारिक वर्चस्व, इतिहास-निर्माण, संवादहीनता और आलोचनात्मक विवेक के क्षय को रेखांकित किया गया है। फ़ूको, ग्राम्शी, आरेंट, हाबरमास आदि विचारकों के सन्दर्भों के माध्यम से आलेख यह स्पष्ट करता है कि कविता का ‘कोसल’ किसी एक ऐतिहासिक राज्य का नाम न रहकर ऐसी राजनीतिक व्यवस्था का रूपक बन जाता है जहाँ शक्ति विचार पर हावी होने लगती है। इसमें ‘विचारों की कमी’ को आलोचनात्मक विवेक, प्रश्न और संवाद के क्षरण से जोड़ना कविता की समकालीन प्रासंगिकता को सामने लाता है। सत्ता के वैभव के बरक्स प्रश्न और विचार की शक्ति को रेखांकित करता यह आलेख श्रीकांत वर्मा की कविता के राजनीतिक और दार्शनिक आशय पर पुनर्विचार का अवसर देता है।
—हरि भटनागर
‘कोसल में विचारों की कमी है’: सत्ता, इतिहास और विचार का आधुनिक रूपक
रवि रंजन
किसी राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए उसके संस्थागत ढाँचे के साथ उन सामाजिक सम्बन्धों को देखना भी आवश्यक है जिनमें सत्ता और नागरिक जीवन एक-दूसरे से जुड़ते हैं। राज्य की शक्ति केवल शासन करने की क्षमता में नहीं, बल्कि अपनी वैधता और सामाजिक अर्थ निर्मित करने की क्षमता में भी निहित होती है। इसलिए सत्ता की घोषित छवि और समाज के वास्तविक अनुभव के बीच का सम्बन्ध समाजशास्त्रीय विवेचन का महत्त्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है।
मैक्स वेबर (Max Weber) का सत्ता और वैधता सम्बन्धी चिन्तन तथा पियरे बोरदियू (Pierre Bourdieu) की प्रतीकात्मक शक्ति की अवधारणा इस सम्बन्ध को समझने के लिए उपयोगी आधार प्रदान करती है। वेबर सत्ता की सामाजिक स्वीकृति और वैधता पर बल देते हैं, जबकि बोरदियू यह दिखाते हैं कि शक्ति प्रतीकों, भाषा और सामाजिक मान्यताओं के स्तर पर भी कार्य करती है। इन दोनों दृष्टियों के आलोक में सत्ता को केवल संस्थागत संरचना नहीं, बल्कि सामाजिक सम्बन्धों और अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है।
हिन्दी के प्रमुख कवि, कथाकार, उपन्यासकार, आलोचक और यात्रा-वृत्तान्त लेखक श्रीकांत वर्मा (1931-1986) की रचनाओं में आधुनिक मनुष्य की बेचैनी, सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ, इतिहास-बोध, सत्ता और अस्तित्वगत संकट की अभिव्यक्ति मिलती है। उनके प्रमुख काव्य-संग्रह हैं—‘भटका मेघ’, ‘माया दर्पण’, ‘दिनारम्भ’, ‘जलसाघर’, ‘मगध’ और ‘गरुड़ किसने देखा है’। इनमें ‘मगध’ विशेष रूप से चर्चित है, जहाँ प्राचीन इतिहास के माध्यम से समकालीन सत्ता, राजनीति, हिंसा और नागरिक जीवन की विडम्बनाओं को देखा गया है।
उनके प्रमुख कहानी-संग्रह ‘झाड़ी’, ‘संवाद’, ‘घर’, ‘ठंड’ और ‘अरथी’ तथा उपन्यास ‘दूसरी बार’, ‘अश्वत्थ’ और ‘ब्यूक’ हैं। आलोचना में ‘जिरह’, यात्रा-वृत्तान्त में ‘अपोलो का रथ’ और साक्षात्कार के क्षेत्र में ‘बीसवीं शताब्दी के अंधेरे में’ उल्लेखनीय हैं। उन्होंने मुक्तिबोध के काव्य-संग्रह ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ की कविताओं के संकलन का कार्य भी किया।
उन्हें 1973 में ‘तुलसी सम्मान’, 1981 में ‘शिखर सम्मान’, 1984 में ‘आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी पुरस्कार’ और ‘कुमारन् आशान’ राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए। ‘मगध’ के लिए उन्हें 1987 में मरणोपरान्त साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया गया। हिन्दी कविता में इतिहास, सत्ता और समकालीन राजनीतिक चेतना को विशिष्ट ढंग से रूपायित करने के कारण श्रीकांत वर्मा का साहित्य आधुनिक हिन्दी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान रखता है।
श्रीकांत वर्मा की ‘कोसल में विचारों की कमी है’ सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र को काव्यात्मक रूप देती है। उनकी कविता इतिहास और मिथकीय स्मृति के सहारे सत्ता, समाज और मनुष्य के सम्बन्ध को एक ऐसे रूपक में बदलती है जिसकी अर्थवत्ता किसी एक ऐतिहासिक प्रसंग तक सीमित नहीं रहती।
इस दृष्टि से उनकी कविता का समाजशास्त्रीय पाठ उसके भीतर उपस्थित राजनीतिक प्रतीकों और सामाजिक अनुभवों के अन्तर्सम्बन्ध को समझने का प्रयास है। यहाँ इतिहास केवल अतीत की सूचना नहीं, बल्कि वर्तमान को देखने का माध्यम बनता है; और ‘कोसल’ एक ऐतिहासिक नाम से आगे बढ़कर सत्ता और समाज के सम्बन्धों को परखने वाला काव्यात्मक रूपक बन जाता है।
कविता का मूल पाठ द्रष्टव्य है:
कोसल में विचारों की कमी है
महाराज बधाई हो! महाराज की जय हो।
युद्ध नहीं हुआ—
लौट गए शत्रु।
वैसे हमारी तैयारी पूरी थी!
चार अक्षौहिणी थीं सेनाएँ,
दस सहस्त्र अश्व,
लगभग इतने ही हाथी।
कोई कसर न थी!
युद्ध होता भी तो
नतीजा यही होता।
न उनके पास अस्त्र थे,
न अश्व,
न हाथी,
युद्ध हो भी कैसे सकता था?
निहत्थे थे वे।
उनमें से हरेक अकेला था
और हरेक यह कहता था
प्रत्येक अकेला होता है!
जो भी हो,
जय यह आपकी है!
बधाई हो!
राजसूय पूरा हुआ,
आप चक्रवर्ती हुए—
वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गए हैं
जैसे कि यह—
कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता,
कोसल में विचारों की कमी है!
-श्रीकांत वर्मा : प्रतिनिधि कविताएँ
‘कोसल में विचारों की कमी है’ आधुनिक हिन्दी कविता की उन गिनी चुनी रचनाओं में है जिनमें राजनीतिक अनुभव केवल विषय नहीं रहता, बल्कि काव्य-संरचना का अंग बन जाता है। यह कविता सत्ता के किसी एक रूप, किसी एक ऐतिहासिक राज्य या किसी एक राजनीतिक प्रसंग की आलोचना नहीं करती। वह सत्ता के उस सार्वकालिक स्वभाव की पड़ताल करती है जिसके भीतर विजय का प्रदर्शन, इतिहास का निर्माण, भाषा का नियंत्रण और विचारों का क्षय एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं। इसीलिए कविता का अर्थ किसी एक कालखंड में समाप्त नहीं होता; वह प्रत्येक समय में नए राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भ अर्जित करती रहती है।
पूरी कविता का विकास एक उल्लेखनीय संरचनात्मक प्रक्रिया के अनुसार होता है। आरंभ में जो भाषा सत्ता की भाषा है, वही धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता खोने लगती है। जो विजय प्रारंभ में निर्विवाद प्रतीत होती है, वही अंत तक पहुँचते-पहुँचते प्रश्नों से घिर जाती है। जो सेना आरंभ में शक्ति का प्रतीक थी, वह अंततः विचारों की अनुपस्थिति के सामने अपर्याप्त सिद्ध होती है। जो लोग प्रारंभ में निहत्थे और नगण्य दिखाई देते हैं, वही अंत में कविता के नैतिक और वैचारिक केंद्र में आ जाते हैं। इस प्रकार कविता अपने भीतर ही अपने प्रारंभिक अर्थों का पुनर्गठन करती चलती है। यही उसका कलात्मक और वैचारिक वैशिष्ट्य है।
इस कविता का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि श्रीकांत वर्मा सत्ता की आलोचना प्रत्यक्ष राजनीतिक वक्तव्य के रूप में नहीं करते। वे सत्ता को उसकी अपनी भाषा में बोलने देते हैं। यही भाषा धीरे-धीरे अपने अंतर्विरोधों को उद्घाटित करती है। इस शिल्पगत संयम के कारण कविता किसी घोषणापत्र में परिवर्तित नहीं होती। वह पाठक को तैयार निष्कर्ष नहीं देती; वह उसे अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से सम्मिलित करती है। कविता का व्यंग्य इसी कारण अधिक प्रभावी बनता है, क्योंकि उसका स्रोत कवि की टिप्पणी नहीं, बल्कि सत्ता के अपने बयानों के भीतर मौजूद विरोधाभास हैं।
मिशेल फ़ूको (Michel Foucault) के सत्ता-विमर्श, अंतोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) के वैचारिक वर्चस्व, हन्ना आरेंट (Hannah Arendt) की शक्ति और वैधता संबंधी अवधारणाओं, कार्ल पॉपर (Karl Popper) के आलोचनात्मक विवेक, इसायाह बर्लिन (Isaiah Berlin) के बहुलतावाद, युर्गेन हाबरमास (Jürgen Habermas) के संवाद-सिद्धांत, क्लॉद लेफ़ोर (Claude Lefort) की लोकतांत्रिक सत्ता की अवधारणा और अमर्त्य सेन (Amartya Sen) के तर्कशील सार्वजनिक जीवन संबंधी विचारों के आलोक में कविता को पढ़ने से उसके अनेक आयाम खुलते हैं।
मिशेल फ़ूको (Michel Foucault) के सत्ता-विमर्श के आलोक में ‘कोसल में विचारों की कमी है’ कविता पर विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह कविता सत्ता को केवल शासन या सैन्य बल के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसे ऐसी वैचारिक संरचना के रूप में प्रस्तुत करती है जो सत्य, इतिहास और राजनीतिक वैधता का निर्माण करती है। फ़ूको ने ‘पावर/नॉलेज : सेलेक्टेड इंटरव्यूज़ ऐंड अदर राइटिंग्स’ (Power/Knowledge: Selected Interviews and Other Writings) तथा अपने अन्य लेखन में प्रतिपादित किया है कि सत्ता और ज्ञान परस्पर एक-दूसरे का निर्माण करते हैं। सत्ता पहले से विद्यमान सत्य पर आश्रित नहीं रहती; वह उन प्रक्रियाओं का निर्माण करती है जिनके माध्यम से किसी समाज में यह निर्धारित होता है कि क्या सत्य माना जाएगा और क्या असत्य। फ़ूको इसी प्रक्रिया को “सत्य की व्यवस्था” (regime of truth) कहते हैं। श्रीकांत वर्मा की कविता इसी व्यवस्था की काव्यात्मक आलोचना प्रस्तुत करती है।
विवेच्य कविता का आरंभ राजकीय अभिनंदन से होता है। शासक की प्रशंसा करने वाली आवाज़ें एक ऐसे वातावरण का निर्माण करती हैं जहाँ किसी घटना का मूल्यांकन स्वतंत्र रूप से नहीं, बल्कि सत्ता की अपेक्षाओं के अनुरूप किया जाता है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि कविता में उत्सव का वातावरण वस्तुस्थिति से नहीं, बल्कि भाषिक प्रदर्शन से निर्मित होता है। फ़ूको के अनुसार सत्ता का संचालन केवल दमन या हिंसा से नहीं होता; वह भाषा, प्रतीकों और संस्थागत व्यवहार के माध्यम से सामाजिक सहमति का निर्माण करती है। इस दृष्टि से कविता का प्रारंभ यह संकेत देता है कि राजकीय भाषा स्वयं सत्ता की सक्रिय तकनीक है।
कविता में युद्ध के अभाव के बावजूद विजय की घोषणा की जाती है। यही बिंदु फ़ूको के सत्ता-सिद्धांत से गहरे स्तर पर जुड़ता है। ‘पावर/नॉलेज : सेलेक्टेड इंटरव्यूज़ ऐंड अदर राइटिंग्स’ में फ़ूको बार-बार यह प्रतिपादित करते हैं कि सत्ता का वास्तविक प्रभाव घटनाओं पर नहीं, बल्कि उनकी व्याख्या पर नियंत्रण स्थापित करने में निहित है। यदि किसी राजनीतिक व्यवस्था के पास यह क्षमता है कि वह किसी घटना का अधिकृत अर्थ निर्धारित कर सके, तो वही अर्थ धीरे-धीरे सामाजिक सत्य का रूप ग्रहण कर लेता है। कविता में विजय की घोषणा भी इसी प्रकार की राजनीतिक अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया है। यहाँ सत्य प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं, बल्कि सत्ता-समर्थित कथन से निर्मित होता है।
फ़ूको की पुस्तक ‘द आर्कियोलॉजी ऑफ़ नॉलेज’ (The Archaeology of Knowledge) में “विमर्श” (discourse) की अवधारणा केंद्रीय है। उनके अनुसार विमर्श केवल भाषा का प्रयोग नहीं है; वह ऐसी ज्ञान-व्यवस्था है जो यह निर्धारित करती है कि कौन बोल सकता है, क्या कहा जा सकता है और किन कथनों को वैधता प्राप्त होगी। श्रीकांत वर्मा की कविता इसी विमर्श की संरचना की आलोचना करती है। कविता में मौजूद प्रशस्ति-भाषा केवल शिष्टाचार नहीं है; वह सत्ता द्वारा निर्मित वैचारिक अनुशासन का अंग है। वहाँ भाषा का उद्देश्य वास्तविकता को उद्घाटित करना नहीं, बल्कि सत्ता की प्रतिष्ठा को निर्विवाद बनाए रखना है। इस प्रकार कविता यह दिखाती है कि राजनीतिक शक्ति सबसे पहले भाषा पर अधिकार स्थापित करती है।
कविता में सेना, अश्वों और हाथियों आदि का विस्तृत उल्लेख केवल साम्राज्य की शक्ति का विवरण नहीं है। यह सत्ता द्वारा अपने वैभव के प्रदर्शन का भाषिक आयोजन भी है। फ़ूको के अनुसार सत्ता सदैव स्वयं को दृश्य रूपों, प्रतीकों और संस्थागत संरचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत करती है ताकि उसकी उपस्थिति स्वाभाविक और निर्विवाद प्रतीत हो। इसीलिए कविता में सैन्य संसाधनों की गणना वास्तविक युद्ध से अधिक राजनीतिक प्रदर्शन का अर्थ ग्रहण करती है। शक्ति यहाँ केवल अस्त्रों में नहीं, बल्कि उस दृश्य-व्यवस्था में निहित है जिसके माध्यम से राज्य अपनी अजेयता का बोध उत्पन्न करता है।
फ़ूको का यह भी मानना है कि सत्ता केवल निषेध नहीं करती, बल्कि उत्पादन करती है। वह ज्ञान, स्मृति, पहचान और इतिहास का उत्पादन करती है। कविता में यह तथ्य विशेष रूप से दिखाई देता है कि विजय का आख्यान स्वयं एक निर्मित आख्यान है। वह किसी निष्पक्ष इतिहास का परिणाम नहीं, बल्कि राजनीतिक वैधता अर्जित करने की प्रक्रिया का अंग है। यहाँ कविता यह संकेत करती है कि इतिहास का आधिकारिक संस्करण वस्तुगत सत्य का पर्याय नहीं होता। उसके भीतर सत्ता के हित, चयन और वर्चस्व सक्रिय रहते हैं। इस प्रकार कविता इतिहास की राजनीति को उद्घाटित करती है।
फ़ूको ने ‘डिसिप्लिन ऐंड पनिश’ (Discipline and Punish) में प्रतिपादित किया है कि आधुनिक सत्ता केवल शरीरों को नियंत्रित नहीं करती; वह व्यक्तियों की चेतना, व्यवहार और आत्मबोध को भी अनुशासित करती है। कविता में प्रत्यक्ष दमन का कोई दृश्य उपस्थित नहीं है, फिर भी पूरा वातावरण इस प्रकार निर्मित है कि शासक के अतिरिक्त किसी अन्य दृष्टिकोण की संभावना लगभग अनुपस्थित हो जाती है। यह स्थिति वैचारिक अनुशासन की है। सत्ता यहाँ भय से अधिक सहमति उत्पन्न करती है। लोग स्वयं उसी भाषा में सोचने और बोलने लगते हैं जिसे सत्ता ने वैध घोषित किया है। कविता इस अदृश्य अनुशासन की ओर संकेत करती है।
फ़ूको ने सत्ता के सूक्ष्म संचालन को समझाने के लिए “माइक्रोफिज़िक्स ऑफ़ पावर” (microphysics of power) की संकल्पना विकसित की। उनका तात्पर्य यह था कि सत्ता केवल शासक या राज्य में केंद्रित नहीं रहती; वह सामाजिक संबंधों, भाषिक व्यवहारों और सांस्कृतिक संस्थाओं के भीतर भी कार्य करती है। कविता में दरबारी स्वर इसी सूक्ष्म सत्ता-संचालन का उदाहरण है। वहाँ किसी सैनिक आदेश की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि प्रशस्ति स्वयं एक स्वाभाविक व्यवहार का रूप ले चुकी है। इस प्रकार कविता यह उद्घाटित करती है कि सत्ता की स्थिरता केवल बल प्रयोग से नहीं, बल्कि मानसिक स्वीकृति से निर्मित होती है।
कविता का वैचारिक मोड़ तब आता है जब सामने उपस्थित लोगों की वास्तविक शक्ति का स्वरूप स्पष्ट होता है। उनके पास सैन्य साधन नहीं हैं, किंतु वे अपनी उपस्थिति से राजकीय विजय-कथा को अस्थिर कर देते हैं। फ़ूको का प्रसिद्ध कथन है कि जहाँ सत्ता है, वहीं प्रतिरोध भी उपस्थित होता है। प्रतिरोध सत्ता के बाहर से नहीं आता, बल्कि उसी सत्ता-संबंध के भीतर जन्म लेता है। कविता में यह प्रतिरोध हिंसा के रूप में नहीं, बल्कि वैकल्पिक अर्थ की संभावना के रूप में उपस्थित है। यही कारण है कि सत्ता की घोषित विजय के बावजूद उसका वैचारिक आश्वासन पूर्ण नहीं हो पाता।
फ़ूको “अधीनस्थ ज्ञान” (subjugated knowledges) की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं। इससे उनका आशय उन अनुभवों, स्मृतियों और दृष्टियों से है जिन्हें प्रभुत्वशाली ज्ञान-व्यवस्था मान्यता नहीं देती। कविता में राजकीय आख्यान के समानांतर ऐसा ही एक मौन इतिहास उपस्थित है। उसे विस्तार से व्यक्त नहीं किया गया, फिर भी वही सत्ता की सीमाओं को उजागर करता है। आधिकारिक इतिहास अपनी विजय का उत्सव मना सकता है, किंतु जिन अनुभवों को वह दबा देता है, वे समाप्त नहीं होते। वे भविष्य के प्रश्नों और असहमतियों का आधार बनते हैं। इस दृष्टि से कविता इतिहास के भीतर दबे हुए स्वरों की पुनर्प्रतिष्ठा करती है।
कविता में प्रश्नों का विशेष स्थान है। वे किसी उत्तर की अपेक्षा से अधिक सत्ता की वैधता की परीक्षा का माध्यम बनते हैं। फ़ूको के अनुसार ज्ञान कभी निष्पक्ष नहीं होता; वह सत्ता-संबंधों के भीतर निर्मित होता है। इसलिए जब कोई प्रश्न स्थापित ज्ञान को चुनौती देता है, तब वह केवल बौद्धिक कार्य नहीं करता, बल्कि सत्ता-संरचना को भी चुनौती देता है। कविता में प्रश्न इसी कारण राजनीतिक प्रतिरोध का रूप ग्रहण करते हैं। वे उस अधिकृत सत्य को अंतिम मानने से इनकार करते हैं जिसे राजकीय भाषा स्थापित करना चाहती है।
विवेच्य कविता का अंतिम कथन फ़ूको की दृष्टि के तहत विशेष अर्थ ग्रहण करता है। विचारों का अभाव केवल बौद्धिक दुर्बलता का संकेत नहीं है; वह उस राजनीतिक स्थिति का सूचक है जहाँ वैकल्पिक प्रवचन, आलोचनात्मक चेतना और स्वतंत्र ज्ञान-निर्माण की प्रक्रियाएँ क्षीण हो चुकी हैं। फ़ूको के अनुसार किसी समाज में सत्ता का केंद्रीकरण तभी संभव होता है जब ज्ञान का केंद्रीकरण भी होने लगे। इसके विपरीत विचारों की बहुलता किसी भी सत्ता को निरंतर आत्मालोचन और पुनर्विचार के लिए बाध्य करती है। श्रीकांत वर्मा का संकेत इसी दिशा में है कि जिस व्यवस्था में प्रश्नों और विचारों का स्थान संकुचित होता जाता है, वहाँ बाहरी शक्ति के बावजूद भीतर वैचारिक रिक्तता विकसित होने लगती है।
वस्तुत: मिशेल फ़ूको के सत्ता-विमर्श के आलोक में यह कविता किसी विशेष ऐतिहासिक राज्य की आलोचना तक सीमित नहीं रहती। वह यह उद्घाटित करती है कि राजनीतिक सत्ता की वास्तविक शक्ति केवल सेना, प्रशासन या विजय में नहीं, बल्कि भाषा, ज्ञान, इतिहास और सत्य पर नियंत्रण स्थापित करने की क्षमता में निहित होती है। साथ ही कविता यह भी प्रतिपादित करती है कि कोई भी सत्ता विचारों, प्रश्नों और वैकल्पिक ज्ञान को पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकती। प्रतिरोध वहीं से जन्म लेता है जहाँ आधिकारिक सत्य स्वयं को अंतिम घोषित करता है। इस अर्थ में ‘कोसल में विचारों की कमी है’ फ़ूको के सत्ता-सिद्धांत का काव्यात्मक रूपांतरण नहीं, बल्कि उसके साथ गहरे वैचारिक संवाद में स्थित एक ऐसी रचना है, जो सत्ता के दृश्य रूपों के पीछे कार्यरत अदृश्य वैचारिक तंत्र को उजागर करती है
‘कोसल में विचारों की कमी है’ कविता का एक केंद्रीय वैचारिक तनाव सैन्य शक्ति और वैचारिक शक्ति के बीच उपस्थित है। कविता का आरंभ एक ऐसे राजनीतिक वातावरण से होता है जहाँ राज्य अपनी सामरिक तैयारी, राजकीय प्रतिष्ठा और विजय की घोषणा के माध्यम से अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है। दूसरी ओर वे लोग हैं जो किसी सैन्य संगठन, शस्त्र या भौतिक संसाधन के प्रतिनिधि नहीं हैं। इस विरोधाभास के माध्यम से कविता यह प्रतिपादित करती है कि राजनीतिक शक्ति का वास्तविक आधार केवल सैन्य सामर्थ्य नहीं हो सकता। यदि किसी व्यवस्था में विचारों की ऊर्जा क्षीण होने लगे, तो उसकी बाहरी शक्ति भी धीरे-धीरे खोखली सिद्ध होने लगती है।
कविता में सैन्य शक्ति का विस्तारपूर्वक उल्लेख केवल युद्ध की तैयारी का विवरण नहीं है। यह राज्य द्वारा निर्मित उस राजनीतिक आत्मविश्वास का संकेत है जो अपने अस्तित्व का आधार मुख्यतः बल, संगठन और नियंत्रण में खोजता है। सैन्य सामर्थ्य यहाँ केवल रक्षा का साधन नहीं रह जाता, बल्कि सत्ता की वैधता का प्रतीक बन जाता है। राज्य मान लेता है कि उसकी शक्ति का प्रमाण उसकी विशाल सेना है। किंतु कविता इस धारणा को धीरे-धीरे विखंडित करती है। वह यह दिखाती है कि सैन्य तैयारी अपने आप में किसी व्यवस्था की नैतिक या वैचारिक शक्ति का प्रमाण नहीं होती।
इसके विपरीत कविता उन लोगों की ओर ध्यान आकर्षित करती है जिनके पास कोई दृश्य शक्ति नहीं है। वे युद्ध की पारंपरिक परिभाषा के भीतर प्रतिद्वंद्वी दिखाई भी नहीं देते, फिर भी अंततः वही सत्ता के सामने ऐसी चुनौती उपस्थित करते हैं जिसे कोई सैन्य शक्ति समाप्त नहीं कर सकती। वे अपने पीछे प्रश्न छोड़ जाते हैं। यहाँ प्रश्न केवल बौद्धिक जिज्ञासा नहीं हैं; वे सत्ता की आत्मसंतुष्टि को भंग करने वाली ऐतिहासिक उपस्थिति हैं। कविता इस प्रकार यह प्रतिपादित करती है कि विचार और प्रश्न किसी भी अस्त्र से अधिक स्थायी राजनीतिक शक्ति रखते हैं।
इस संदर्भ में अंतोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) का चिंतन विशेष रूप से प्रासंगिक है। ग्राम्शी ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘प्रिजन नोटबुक्स’ (Prison Notebooks) में यह प्रतिपादित किया कि कोई भी राज्य केवल दमन या सैन्य शक्ति के आधार पर लंबे समय तक स्थिर नहीं रह सकता। उसके स्थायित्व का वास्तविक आधार वैचारिक सहमति (consent) होता है। राज्य को केवल लोगों के व्यवहार पर नियंत्रण नहीं रखना होता, बल्कि उनकी चेतना, विश्वासों और सामाजिक मूल्यों में भी अपनी वैधता स्थापित करनी होती है। ग्राम्शी इस प्रक्रिया को “वर्चस्व” (hegemony) कहते हैं। उनके अनुसार जहाँ केवल बल रह जाता है और वैचारिक सहमति समाप्त होने लगती है, वहाँ सत्ता का संकट आरंभ हो जाता है।
श्रीकांत वर्मा की कविता ग्राम्शी की इसी अवधारणा के साथ गहरे स्तर पर संवाद करती दिखाई देती है। कविता का संकेत यह नहीं है कि सेना अनावश्यक है, बल्कि यह है कि केवल सेना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी राज्य के भीतर स्वतंत्र विचार, आलोचनात्मक विवेक और बौद्धिक सक्रियता का क्षय होने लगे, तो उसकी राजनीतिक शक्ति का नैतिक आधार भी कमजोर होने लगता है। बाहरी अनुशासन और भीतरी वैधता दो अलग-अलग बातें हैं। सैन्य संगठन पहला उपलब्ध करा सकता है, किंतु दूसरा केवल विचारों के माध्यम से निर्मित होता है।
ग्राम्शी के अनुसार किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि वह समाज के विभिन्न वर्गों को किस सीमा तक अपने वैचारिक संसार का सहभागी बना पाती है। यदि राज्य केवल आदेश देता है और संवाद नहीं करता, केवल विजय का उत्सव मनाता है और आत्मालोचन से बचता है, तो उसके और समाज के बीच वैचारिक दूरी बढ़ने लगती है। श्रीकांत वर्मा की कविता इसी वैचारिक दूरी को रेखांकित करती है। सत्ता अपने वैभव से आश्वस्त दिखाई देती है, किंतु कविता यह संकेत करती है कि उसके भीतर विचारों का स्रोत सूख रहा है। यही वह बिंदु है जहाँ राजनीतिक संकट जन्म लेता है।
कविता में विचार किसी दार्शनिक अमूर्तता का नाम नहीं हैं। उनका संबंध जीवित सामाजिक चेतना से है। विचार का अर्थ है प्रश्न पूछने की क्षमता, स्थापित धारणाओं की परीक्षा करने का साहस और राजनीतिक निर्णयों के नैतिक पक्ष पर विचार करने की स्वतंत्रता। जब कविता विचारों की कमी की बात करती है, तब उसका आशय केवल विद्वानों या दार्शनिकों की अनुपस्थिति से नहीं है। वह उस सामाजिक स्थिति की ओर संकेत करती है जहाँ प्रश्नों के स्थान पर घोषणाएँ, संवाद के स्थान पर प्रशस्तियाँ और विवेक के स्थान पर आज्ञाकारिता प्रमुख हो जाती है।
यहाँ विचार और अस्त्र के बीच एक गहरा प्रतीकात्मक विरोध उपस्थित है। अस्त्र तत्काल प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं, किंतु विचार दीर्घकालिक ऐतिहासिक परिवर्तन का आधार बनते हैं। अस्त्र किसी विरोधी को पराजित कर सकते हैं, परंतु किसी प्रश्न को समाप्त नहीं कर सकते। युद्ध का अंत संभव है, लेकिन विचार का अंत संभव नहीं है। इसी कारण कविता में निहत्थे लोग पराजित होकर भी इतिहास से अनुपस्थित नहीं होते। वे अपनी भौतिक उपस्थिति से अधिक अपने वैचारिक हस्तक्षेप के कारण स्मरणीय बनते हैं।
कविता का यह पक्ष आधुनिक राजनीतिक चिंतन के एक व्यापक प्रश्न से भी जुड़ता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक शक्तिशाली साम्राज्य अपने विशाल सैन्य संगठन के बावजूद अधिक समय तक टिक नहीं सके। उनके पतन का कारण केवल बाहरी आक्रमण नहीं था; आंतरिक वैचारिक जड़ता, आलोचना के प्रति असहिष्णुता और सामाजिक संवाद का क्षय भी उतना ही उत्तरदायी था। श्रीकांत वर्मा इस ऐतिहासिक अनुभव को किसी विशिष्ट उदाहरण के रूप में नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक राजनीतिक सत्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
कविता में प्रश्नों का बचा रह जाना विशेष अर्थ रखता है। प्रश्न यह प्रमाणित करते हैं कि विचारों को पराजित नहीं किया जा सकता। सत्ता यदि किसी विरोधी को समाप्त भी कर दे, तब भी उसके द्वारा उठाए गए प्रश्न सामाजिक स्मृति में जीवित रह सकते हैं। यही कारण है कि कविता की दृष्टि में वैचारिक शक्ति सैन्य शक्ति से अधिक स्थायी है। विचार मनुष्य की चेतना में कार्य करते हैं, जबकि सैन्य शक्ति मुख्यतः शरीरों पर नियंत्रण स्थापित करती है। चेतना पर विजय प्राप्त करना किसी भी राज्य के लिए कहीं अधिक जटिल कार्य है।
ग्राम्शी का यह कथन कि प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था को अपनी वैधता के लिए बौद्धिक और नैतिक नेतृत्व की आवश्यकता होती है, इस कविता की अंतिम पंक्ति को समझने में विशेष सहायता करता है। विचारों की कमी का अर्थ केवल बौद्धिक निर्धनता नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व का संकट भी है। जिस समाज में स्वतंत्र चिंतन का स्थान संकुचित होता जाता है, वहाँ राज्य अपनी शक्ति का प्रदर्शन तो कर सकता है, किंतु अपनी दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित नहीं कर सकता। स्थिरता केवल नियंत्रण से नहीं, बल्कि विश्वास, संवाद और वैचारिक सहभागिता से उत्पन्न होती है।
‘कोसल में विचारों की कमी है’ कविता सैन्य शक्ति का निषेध नहीं करती, बल्कि उसके सीमित दायरे को उद्घाटित करती है। कविता यह प्रतिपादित करती है कि राज्य की वास्तविक शक्ति उसके अस्त्रागार से नहीं, बल्कि उसके वैचारिक जीवन से मापी जानी चाहिए। जहाँ प्रश्न जीवित रहते हैं, वहाँ समाज भी जीवित रहता है; जहाँ विचारों का क्षय होने लगता है, वहाँ राजनीतिक वैभव भी धीरे-धीरे अपना आधार खोने लगता है। इसी अर्थ में श्रीकांत वर्मा की कविता राज्य, शक्ति और विचार के संबंध पर एक गहरा राजनीतिक तथा सांस्कृतिक चिंतन प्रस्तुत करती है।
यह उपयुक्त दिशा होगी। मैं इसे पुस्तक-अध्याय की तरह क्रमशः विकसित करूँगा, जहाँ प्रत्येक खंड कविता के सूक्ष्म पठन पर आधारित होगा। किसी भी दार्शनिक का उल्लेख तभी आएगा जब वह कविता के अर्थ को खोलने में वास्तविक सहायता करेगा। सिद्धांत कविता पर आरोपित नहीं होगा; कविता ही विश्लेषण का केंद्र बनी रहेगी।
‘कोसल में विचारों की कमी है’ की शुरुआत पहली नज़र में बिलकुल सरल प्रतीत होती है—“महाराज बधाई हो!/महाराज की जय हो।/युद्ध नहीं हुआ—/लौट गए शत्रु।” किन्तु यही आरंभ पूरी कविता के वैचारिक ढाँचे की आधारभूमि निर्मित करता है। पहली दृष्टि में यह किसी विजयी राज्य का उत्सव दिखाई देता है, परंतु कविता को ध्यान से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि यह विजय का नहीं, बल्कि विजय की भाषा का दृश्य है। कविता पहले युद्ध का वर्णन नहीं करती; वह पहले उस भाषा का परिचय कराती है जिसके भीतर युद्ध का अर्थ निर्मित किया जाएगा। श्रीकांत वर्मा का यह शिल्प अत्यंत सूक्ष्म है। वे घटना से पहले उसके भाषिक वातावरण को सामने लाते हैं। इस प्रकार कविता का पहला विषय युद्ध नहीं, बल्कि सत्ता की भाषा बन जाती है।
“महाराज बधाई हो!” और “महाराज की जय हो!” जैसी उद्घोषणाएँ किसी स्वतंत्र नागरिक की भाषा नहीं हैं। यह दरबार की भाषा है। इसमें संवाद नहीं है, केवल अनुमोदन है। यहाँ सूचना नहीं दी जा रही, बल्कि निष्ठा की सार्वजनिक अभिव्यक्ति की जा रही है। इसीलिए कविता का आरंभ पाठक को तुरंत उस राजनीतिक संस्कृति के भीतर पहुँचा देता है जहाँ सत्ता के सामने भाषा का पहला दायित्व सत्य कहना नहीं, बल्कि प्रशंसा करना होता है।
इसी बिंदु पर अंतोनियो ग्राम्शी ने प्रतिपादित किया है कि कोई भी सत्ता केवल बल से नहीं चलती; वह सांस्कृतिक और वैचारिक सहमति का भी निर्माण करती है। यह सहमति केवल विद्यालयों, धर्म या प्रशासन के माध्यम से नहीं बनती, बल्कि भाषा और दैनिक व्यवहार के भीतर भी निर्मित होती है। जब प्रशंसा स्वाभाविक लगने लगे और प्रश्न अस्वाभाविक प्रतीत होने लगें, तब समझना चाहिए कि सत्ता ने वैचारिक वर्चस्व स्थापित कर लिया है।
श्रीकांत वर्मा की कविता में दरबारी उद्घोषणाएँ इसी वैचारिक वर्चस्व की अभिव्यक्ति हैं। यहाँ किसी को आदेश देकर जय-घोष नहीं कराया गया है; जय-घोष सत्ता-संस्कृति का स्वाभाविक व्यवहार बन चुका है। कविता इस स्वाभाविकता को ही संदेह के घेरे में लाती है।
हन्ना आरेंट (Hannah Arendt) की पुस्तक ‘ऑन वायलेंस’ (On Violence) कविता की इस शुरुआत को एक दूसरे नज़रिए से समझने में सहायता करती है। आरेंट का आग्रह है कि राजनीतिक शक्ति का आधार केवल हिंसा या सैन्य बल नहीं होता; उसका वास्तविक आधार वैधता (legitimacy) है। जब कोई शासन स्वयं को वैध सिद्ध करना चाहता है, तो वह केवल अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं करता, बल्कि ऐसी सार्वजनिक भाषा भी निर्मित करता है जिसमें उसकी सफलता निर्विवाद प्रतीत होने लगे। श्रीकांत वर्मा की कविता में विजय का उत्सव वस्तुतः उसी वैधता-निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा है। इसलिए कविता का आरंभ युद्ध से पहले जय-घोष से होता है।
इन उद्घोषणाओं के तुरंत बाद कविता कहती है—“युद्ध नहीं हुआ—/लौट गए शत्रु।” यहीं से कविता की विडंबना आरंभ होती है। सामान्यतः विजय का अर्थ संघर्ष के बाद प्राप्त सफलता होता है। यहाँ संघर्ष का अभाव है, फिर भी विजय का वातावरण बना हुआ है। श्रीकांत वर्मा इस विरोधाभास की कोई व्याख्या नहीं करते। वे केवल दोनों तथ्यों को साथ रख देते हैं। यही उनकी काव्य-रणनीति है। कविता पाठक को स्वयं इस असंगति पर विचार करने के लिए बाध्य करती है।
कविता का आरंभ केवल एक राजकीय घोषणा से नहीं होता, बल्कि ऐसी भाषिक संरचना से होता है जिसमें सत्ता स्वयं अपने लिए सत्य का निर्माण करती दिखाई देती है। “महाराज बधाई हो! महाराज की जय हो” जैसी उद्घोषणाओं के तुरंत बाद “युद्ध नहीं हुआ— / लौट गए शत्रु” का कथन पाठक को एक गहरे अंतर्विरोध के सामने खड़ा कर देता है। युद्ध हुआ ही नहीं, फिर विजय किसकी हुई? श्रीकांत वर्मा इस प्रश्न का उत्तर नहीं देते; वे केवल इतना करते हैं कि विजय की घोषणा और युद्ध के अभाव को एक-दूसरे के निकट रख देते हैं। यही निकटता कविता में व्यंग्य और विडंबना का जन्म करती है। यहाँ युद्ध का न होना केवल एक घटना नहीं है; वह सत्ता की भाषा की विश्वसनीयता की परीक्षा भी बन जाता है। यदि संघर्ष घटित ही नहीं हुआ, तो विजय का दावा किस आधार पर किया जा रहा है? कविता इन प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत नहीं करती, क्योंकि उसका उद्देश्य किसी वैकल्पिक इतिहास का निर्माण करना नहीं है; वह उस भाषिक प्रक्रिया को उजागर करना चाहती है जिसके माध्यम से सत्ता घटनाओं से पहले उनके अर्थ निर्धारित कर देती है।
यहीं प्रसंगवश कार्ल पॉपर (Karl Popper) की पुस्तक ‘द ओपन सोसाइटी ऐंड इट्स एनिमीज़’ (The Open Society and Its Enemies) की याद स्वाभाविक है। पॉपर का आग्रह है कि किसी भी स्वस्थ समाज में प्रत्येक राजनीतिक दावे को आलोचनात्मक परीक्षण की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। जहाँ किसी घोषणा को केवल इसलिए स्वीकार कर लिया जाए कि वह सत्ता द्वारा की गई है, वहाँ समाज धीरे-धीरे बंद समाज (closed society) की दिशा में बढ़ने लगता है। विवेच्य कविता इसी प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है। यहाँ विजय की घोषणा पहले आती है, किंतु उसके परीक्षण की कोई संभावना उपस्थित नहीं है। इस प्रकार कविता सत्ता के उस स्वभाव को पहचानती है जिसमें दावा प्रमाण से अधिक प्रभावशाली बना दिया जाता है और सत्य की जगह आधिकारिक घोषणा ले लेती है।
कविता का यह आरंभ हमें यह भी समझाता है कि किसी राजनीतिक व्यवस्था का संकट हमेशा सैन्य या प्रशासनिक स्तर पर प्रकट नहीं होता; वह पहले भाषा में जन्म लेता है। जब भाषा संवाद का माध्यम न रहकर अनुमोदन का माध्यम बन जाती है, तब वह धीरे-धीरे सत्ता के वैधता-बोध का उपकरण बन जाती है। इसी संदर्भ में युर्गेन हाबरमास (Jürgen Habermas) की ‘द थ्योरी ऑफ़ कम्युनिकेटिव ऐक्शन’ (The Theory of Communicative Action) विशेष रूप से प्रासंगिक है। हाबरमास के अनुसार राजनीतिक वैधता का निर्माण एकतरफा उद्घोषणाओं से नहीं, बल्कि संवाद, तर्क और आलोचनात्मक सहमति से होता है। संवाद में प्रत्येक दावे की परीक्षा संभव होती है और असहमति को भी वैध स्थान प्राप्त होता है। श्रीकांत वर्मा की कविता इसके विपरीत ऐसी दुनिया का चित्र प्रस्तुत करती है जहाँ संवाद अनुपस्थित है। वहाँ केवल उद्घोषणा है, उसका अनुमोदन है और राजकीय भाषा की प्रतिध्वनि है। इसीलिए कविता का पहला संकट युद्ध का नहीं, संवाद का है। युद्ध की अनुपस्थिति से पहले संवाद की अनुपस्थिति दिखाई देती है।
यही संवादहीनता आगे चलकर वैचारिक एकस्वरता का रूप ग्रहण करती है। कविता के आरंभिक दृश्य में केवल एक ही आवाज़ सुनाई देती है—राजकीय आवाज़। उसके सामने कोई दूसरा स्वर उपस्थित नहीं है। इस स्थिति को इसायाह बर्लिन (Isaiah Berlin) के बहुलतावाद संबंधी चिंतन के आलोक में अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। बर्लिन का मानना है कि कोई भी राजनीतिक व्यवस्था तभी स्वस्थ रह सकती है जब उसमें अनेक दृष्टियों और अनेक स्वरों के लिए स्थान सुरक्षित हो। जहाँ केवल एक ही आवाज़ बचती है, वहाँ विचारों की विविधता धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है और समाज अपनी आलोचनात्मक क्षमता खोने लगता है। श्रीकांत वर्मा की कविता इसी वैचारिक एकस्वरता के भीतर भविष्य के संकट का बीज देखती है।
क्लॉद लेफ़ोर (Claude Lefort) की ‘डेमोक्रेसी ऐंड पॉलिटिकल थ्योरी’ (Democracy and Political Theory) इस बिंदु को एक और स्तर पर स्पष्ट करती है। लेफ़ोर के अनुसार लोकतांत्रिक राजनीति की विशेषता यह है कि सत्ता कभी अंतिम सत्य का रूप ग्रहण नहीं करती; वह निरंतर प्रश्नों, मतभेदों और सार्वजनिक बहस के लिए खुली रहती है। इसके विपरीत श्रीकांत वर्मा की कविता का आरंभ ऐसी राजनीतिक संस्कृति का चित्र प्रस्तुत करता है जहाँ निर्णय पहले ही अंतिम घोषित किया जा चुका है। विजय निर्विवाद है, जय-घोष अनिवार्य है और प्रश्नों के लिए कोई स्थान नहीं है। कविता इसी अंतिमता को सूक्ष्म ढंग से अस्थिर करती है। वह प्रत्यक्ष प्रतिवाद नहीं करती, बल्कि सत्ता की भाषा के भीतर ही ऐसे अंतर्विरोध उपस्थित करती है जो उसकी निश्चितताओं को धीरे-धीरे विघटित करने लगते हैं।
इसी क्रम में अमर्त्य सेन की पुस्तक ‘द आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन’ (The Argumentative Indian) भी कविता के अर्थ को व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रदान करती है। सेन भारतीय बौद्धिक परंपरा की उस वाद-विवादशीलता को उसकी सांस्कृतिक शक्ति मानते हैं जिसमें प्रश्न पूछना, तर्क करना और असहमति व्यक्त करना सार्वजनिक जीवन का स्वाभाविक अंग रहा है। श्रीकांत वर्मा की कविता के आरंभिक दृश्य में इस परंपरा का अभाव दिखाई देता है। वहाँ तर्क के स्थान पर अभिनंदन है, संवाद के स्थान पर जय-घोष है और विचार-विनिमय के स्थान पर सत्ता की स्वीकृति है। इसीलिए कविता के अंतिम भाग में जब प्रश्न उपस्थित होते हैं, तब वे केवल कुछ व्यक्तियों की जिज्ञासाएँ नहीं रह जाते; वे उस तर्कशील सांस्कृतिक परंपरा की पुनर्स्मृति बन जाते हैं जिसे सत्ता की एकस्वरता ने दबा दिया था।
इस प्रकार कविता का आरंभिक दृश्य केवल दरबारी वातावरण का चित्रण नहीं है। वह सत्ता की भाषा, राजनीतिक वैधता, संवादहीनता और वैचारिक एकरूपता की ऐसी संरचना को उद्घाटित करता है जिसके भीतर पूरी कविता का विकास निहित है। श्रीकांत वर्मा का रचनात्मक कौशल इस तथ्य में निहित है कि वे इन प्रश्नों पर कहीं भी प्रत्यक्ष टिप्पणी नहीं करते। वे केवल कुछ उद्घोषणाएँ, कुछ छोटे वाक्य और कुछ अर्थपूर्ण विराम पाठक के सामने रखते हैं। इन्हीं के बीच की रिक्तियों से सत्ता का मनोविज्ञान, उसकी भाषिक रणनीति और उसकी वैचारिक संरचना धीरे-धीरे उद्घाटित होने लगती है। यही कारण है कि कविता का आरंभ जितना सरल दिखाई देता है, उसका राजनीतिक और काव्यगत आशय उतना ही गहन सिद्ध होता है।
आरंभिक जय-घोष के बाद कविता का दूसरा दृश्य सत्ता के आत्मविश्वास का दृश्य है—
“वैसे हमारी तैयारी पूरी थी!
चार अक्षौहिणी थीं सेनाएँ,
दस सहस्त्र अश्व,
लगभग इतने ही हाथी।
कोई कसर न थी!”
इन पंक्तियों में पहली नज़र में सिर्फ़ सैन्य शक्ति का विवरण दिखाई देता है, किंतु सूक्ष्म पठन करने पर स्पष्ट होता है कि कवि का रचनात्मक उद्देश्य सेना का चित्रण करना नहीं है। वह उस मानसिक संरचना का उद्घाटन कर रहा है जिसके भीतर राज्य अपनी शक्ति को समझता है। कविता में ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि युद्ध का कोई दृश्य नहीं है। न सैनिकों का संघर्ष दिखाई देता है, न रणभूमि का वर्णन। इसके विपरीत पूरी ऊर्जा तैयारी के वर्णन पर केंद्रित है। अर्थात् कविता में शक्ति अपने वास्तविक प्रयोग के रूप में नहीं, बल्कि प्रदर्शन (display) के रूप में उपस्थित होती है।
“वैसे हमारी तैयारी पूरी थी!”—इस वाक्य में प्रयुक्त “वैसे” शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। यह एक साधारण अव्यय नहीं है। यह उस मनोवैज्ञानिक असुरक्षा को ढँकने का प्रयास है जो युद्ध के अभाव के कारण उत्पन्न हुई है। यदि वास्तव में विजय निर्विवाद होती, तो तैयारी का औचित्य सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। तैयारी का उल्लेख इस कारण किया जा रहा है कि विजय को किसी संभावित परीक्षा के बिना भी विश्वसनीय बनाया जा सके। यहाँ श्रीकांत वर्मा अत्यंत सूक्ष्म ढंग से सत्ता की उस मनोवृत्ति को पकड़ते हैं जिसमें वास्तविक उपलब्धि से अधिक उसकी छवि का संरक्षण आवश्यक हो जाता है।
इसी संदर्भ में अंतोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) की ‘प्रिजन नोटबुक्स’ (Prison Notebooks) स्मरणीय हो उठती है। ग्राम्शी ने स्पष्ट किया है कि राज्य केवल दमनकारी संस्थाओं का समूह नहीं होता; वह अपनी शक्ति और वैधता का निरंतर सार्वजनिक प्रदर्शन भी करता है। यह प्रदर्शन केवल सैनिक अनुशासन या प्रशासनिक नियंत्रण तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज की सामूहिक कल्पना का निर्माण करता है। राज्य चाहता है कि लोग उसे केवल शक्तिशाली ही नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से शक्तिशाली मानें। श्रीकांत वर्मा की कविता में सेना का यह विस्तृत विवरण उसी राजनीतिक कल्पना का निर्माण करता है। यहाँ सेना केवल युद्ध के लिए नहीं, बल्कि राज्य की अजेय छवि निर्मित करने के लिए भी उपस्थित है।
“चार अक्षौहिणी थीं सेनाएँ”—यह पंक्ति इसी कारण केवल संख्या का उल्लेख नहीं करती। ‘अक्षौहिणी’ शब्द के साथ भारतीय सांस्कृतिक स्मृति का एक पूरा संसार जुड़ा हुआ है। महाभारत का स्मरण होते ही असाधारण सैन्य वैभव, विराट युद्ध और साम्राज्य की शक्ति की छवि पाठक के मन में उभर आती है। श्रीकांत वर्मा इस सांस्कृतिक स्मृति का उपयोग किसी गौरवगान के लिए नहीं करते। वे दिखाते हैं कि सत्ता अपने वर्तमान को वैध ठहराने के लिए अतीत की महिमामयी छवियों का सहारा लेती है। इस प्रकार इतिहास और मिथकीय स्मृति राजनीतिक वैधता अर्जित करने के उपकरण में बदल जाते हैं।
किन्तु कविता यहीं एक सूक्ष्म विडंबना भी रचती है। सेना जितनी विशाल होती जाती है, युद्ध उतना ही अनुपस्थित होता जाता है। परिणामस्वरूप शक्ति का यह विराट दृश्य धीरे-धीरे अपने भीतर रिक्तता का आभास उत्पन्न करने लगता है। यही वह बिंदु है जहाँ हन्ना आरेंट (Hannah Arendt) की ‘ऑन वायलेंस’ (On Violence) कविता के अर्थ को और गहरा करती है। आरेंट का तर्क है कि वास्तविक शक्ति को बार-बार अपनी शक्ति सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। शक्ति लोगों की स्वीकृति और विश्वास से निर्मित होती है; उसका निरंतर प्रदर्शन अनेक बार उसके भीतर की असुरक्षा का संकेत भी होता है। श्रीकांत वर्मा की कविता में सैन्य तैयारी पर दिया गया असाधारण बल इसी दृष्टि से अर्थवान हो उठता है। जितना अधिक राज्य अपनी तैयारी का बखान करता है, उतना ही यह प्रश्न तीखा होता जाता है कि यदि उसकी शक्ति इतनी निर्विवाद है, तो उसे बार-बार उसका प्रदर्शन करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।
“दस सहस्त्र अश्व,/लगभग इतने ही हाथी।”—इन पंक्तियों में संख्या का क्रमिक विस्तार केवल दृश्यात्मक प्रभाव पैदा नहीं करता; वह सत्ता की प्रदर्शनकारी मानसिकता को भी उजागर करता है। संख्या बढ़ती जाती है, शक्ति की छवि भी विराट होती जाती है, किंतु उसी अनुपात में विडंबना भी गहरी होती जाती है। कारण यह है कि इन समस्त संसाधनों का कोई वास्तविक उपयोग कविता में दिखाई नहीं देता। युद्ध के अभाव में यह सैन्य वैभव एक प्रकार की प्रतीकात्मक भव्यता बनकर रह जाता है। श्रीकांत वर्मा यहाँ शक्ति और संख्या के पारंपरिक संबंध को उलट देते हैं। सामान्यतः अधिक संख्या अधिक शक्ति का बोध कराती है, किंतु यहाँ वही संख्या सत्ता की आत्ममुग्धता और उसके भीतर छिपी वैचारिक रिक्तता का संकेत बन जाती है।
यही कारण है कि सेना, अश्व और हाथियों का यह विस्तृत उल्लेख केवल सैन्य संगठन का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीक-निर्माण का भी चित्र बन जाता है। क्लॉद लेफ़ोर (Claude Lefort) ने ‘डेमोक्रेसी ऐंड पॉलिटिकल थ्योरी’ (Democracy and Political Theory) में लिखा है कि राजनीतिक सत्ता अपने को स्थायी और सर्वमान्य सिद्ध करने के लिए अनेक प्रतीकों का निर्माण करती है। सेना, राजकीय समारोह, राजचिह्न और सार्वजनिक प्रदर्शन ऐसे ही प्रतीक हैं जिनके माध्यम से सत्ता अपने वैभव को दृश्य रूप देती है। श्रीकांत वर्मा की कविता इन प्रतीकों का प्रत्यक्ष निषेध नहीं करती; वह केवल यह दिखाती है कि प्रतीकों की शक्ति उनके बाहरी आकार में नहीं, बल्कि उनके पीछे उपस्थित वैचारिक विश्वास में निहित होती है। जब विचारों की ऊर्जा क्षीण होने लगती है, तब यही प्रतीक अपनी आंतरिक रिक्तता को भी उजागर करने लगते हैं।
इस प्रकार कविता का ध्यान धीरे-धीरे सैन्य शक्ति से हटकर वैधता के प्रश्न पर केंद्रित हो जाता है। राज्य अपनी तैयारी का विस्तारपूर्वक विवरण देता है, किंतु अपने निर्णयों के औचित्य पर कोई संवाद नहीं करता। वह शक्ति का दृश्य तो निर्मित करता है, पर उसके अर्थ पर विचार-विमर्श की कोई संभावना नहीं छोड़ता।
इस प्रसंग में युर्गेन हाबरमास (Jürgen Habermas) की ‘द थ्योरी ऑफ़ कम्युनिकेटिव ऐक्शन’ (The Theory of Communicative Action) स्मरणीय है। हाबरमास के अनुसार आधुनिक राजनीतिक वैधता का आधार प्रदर्शन नहीं, बल्कि संवाद है। किसी व्यवस्था की विश्वसनीयता इस बात से निर्मित होती है कि वह अपने निर्णयों को सार्वजनिक तर्क, आलोचना और उत्तरदायित्व की कसौटी पर परखने के लिए कितनी तैयार है। श्रीकांत वर्मा की कविता में इसके ठीक विपरीत स्थिति उपस्थित है। राज्य संवाद के स्थान पर अपनी तैयारी का विवरण प्रस्तुत करता है। वह तर्क के स्थान पर शक्ति का दृश्य रखता है। इस प्रकार तैयारी उत्तर का स्थान ले लेती है और प्रदर्शन संवाद का विकल्प बन जाता है। कविता इसी राजनीतिक प्रवृत्ति को सूक्ष्म, किंतु तीक्ष्ण व्यंग्य के साथ उद्घाटित करती है।
इन पंक्तियों का समग्र अर्थ यही है कि श्रीकांत वर्मा सैन्य शक्ति का विरोध नहीं कर रहे हैं; वे उस राजनीतिक मानसिकता की आलोचना कर रहे हैं जो शक्ति के प्रदर्शन को ही शक्ति का प्रमाण मान लेती है। कविता बार-बार यह संकेत करती है कि किसी राज्य की वास्तविक दृढ़ता उसके अस्त्रागार से नहीं, बल्कि उसके वैचारिक आत्मविश्वास, सार्वजनिक संवाद और आलोचनात्मक विवेक से निर्मित होती है। जब प्रदर्शन संवाद का स्थान ले लेता है, तब शक्ति का वैभव भी धीरे-धीरे अपने भीतर की असुरक्षा को प्रकट करने लगता है।
जाहिर है कि किसी भी राजनीतिक व्यवस्था की परिपक्वता का प्रमाण अपनी ताकत के प्रदर्शन के बजाय उसकी आलोचना को स्वीकार करने की क्षमता है । कविता में राज्य की तैयारी का विस्तृत उल्लेख इस आलोचनात्मक कसौटी पर खरा नहीं उतरता। वह अपनी शक्ति तो दिखाता है, किंतु उसकी परीक्षा से बचता है। इसीलिए सैन्य तैयारी आत्मविश्वास से अधिक आत्म-औचित्य का रूप ग्रहण कर लेती है। वस्तुत: किसी समाज की संपूर्ण ऊर्जा केवल शक्ति-संचय में लग जाए और विचार-विनिमय की परंपरा कमजोर पड़ जाए, तो वह समाज धीरे-धीरे अपनी आत्मालोचनात्मक क्षमता खो देता है। श्रीकांत वर्मा की कविता का संकट भी यही है। सेना जितनी विस्तृत होती जाती है, विचार उतने ही अनुपस्थित होते जाते हैं। यही अनुपस्थिति अंततः पूरी कविता का केंद्रीय राजनीतिक रूपक बन जाती है।
इसायाह बर्लिन (Isaiah Berlin) के बहुलतावादी चिंतन की दृष्टि से भी यह दृश्य अर्थपूर्ण है। बर्लिन के अनुसार जब कोई राजनीतिक व्यवस्था एक ही मूल्य—यहाँ सैन्य शक्ति—को सर्वोच्च मान लेती है, तब वह मानवीय जीवन की जटिलता को नष्ट करने लगती है। श्रीकांत वर्मा की कविता में राज्य अपनी समस्त उपलब्धियों का केंद्र सैन्य शक्ति को बना देता है। विचार, संवाद, नैतिकता और आलोचना जैसे तत्व इस दृश्य से अनुपस्थित हैं। यही अनुपस्थिति आगे चलकर कविता के अंतिम निष्कर्ष का आधार बनती है।
यदि किसी समाज की संपूर्ण ऊर्जा केवल शक्ति-संचय में लग जाए और विचार-विनिमय की परंपरा कमजोर पड़ जाए, तो वह समाज धीरे-धीरे अपनी आत्मालोचनात्मक क्षमता खो देता है। श्रीकांत वर्मा की कविता का संकट भी यही है। सेना जितनी विस्तृत होती जाती है, विचार उतने ही अनुपस्थित होते जाते हैं। यही अनुपस्थिति अंततः पूरी कविता का केंद्रीय राजनीतिक रूपक बन जाती है।
इन पंक्तियों पर गौर करने से स्पष्ट होता है कि श्रीकांत वर्मा सैन्य शक्ति के विरोध के बजाय उस राजनीतिक मानसिकता की आलोचना कर रहे हैं जो राज्य की समस्त शक्ति को सैन्य संसाधनों में समेट देती है और यह भूल जाती है कि किसी भी सभ्यता की वास्तविक दृढ़ता उसके विचारों, उसके आत्मसंवाद और उसके आलोचनात्मक विवेक से निर्मित होती है। कविता का यही अंतःप्रवाह आगे चलकर उस ऐतिहासिक निष्कर्ष तक पहुँचता है जहाँ राज्य के भविष्य का निर्णय उसकी सेना नहीं, बल्कि उसके विचार करते हैं।
कविता का अगला अंश उसके वैचारिक गठन में निर्णायक मोड़ उपस्थित करता है—
“युद्ध होता भी तो
नतीजा यही होता।
न उनके पास अस्त्र थे,
न अश्व,
न हाथी,
युद्ध हो भी कैसे सकता था?
निहत्थे थे वे।”
यहाँ कवि सिर्फ़ एक विडंबनापूर्ण स्थिति का चित्रण नहीं करता; वह सत्ता द्वारा इतिहास के निर्माण की प्रक्रिया को बारीकी से उद्घाटित करता है। कविता का आरंभ युद्ध के न होने की सूचना से हुआ था, किंतु अब सत्ता एक ऐसे युद्ध का परिणाम भी घोषित कर रही है जो कभी हुआ ही नहीं। अर्थात् सत्ता केवल अतीत की व्याख्या नहीं कर रही; वह उस अतीत का भी निर्माण कर रही है जो घटित नहीं हुआ। कविता का यह बिंदु असाधारण है, क्योंकि यहाँ इतिहास का स्थान कल्पना लेती है, और कल्पना का उपयोग सत्य की खोज के लिए नहीं, बल्कि सत्ता की वैधता को पुष्ट करने के लिए किया जाता है।
“युद्ध होता भी तो / नतीजा यही होता”—यह वाक्य देखने में साधारण प्रतीत होता है, किंतु इसके भीतर सत्ता का पूरा तर्कशास्त्र छिपा हुआ है। यहाँ प्रमाण का स्थान अनुमान ने ले लिया है। घटना की अनुपस्थिति को संभावना के माध्यम से भर दिया गया है। इस प्रकार सत्ता यह स्थापित करना चाहती है कि वास्तविक युद्ध की आवश्यकता ही नहीं थी; उसकी विजय पहले से निश्चित थी। श्रीकांत वर्मा इस कथन की कोई प्रत्यक्ष आलोचना नहीं करते। वे केवल उसे उसके अपने स्वरूप में प्रस्तुत कर देते हैं। यही उनकी व्यंग्यात्मक रणनीति है। कविता का व्यंग्य आरोपित नहीं है; वह कथन के भीतर से ही जन्म लेता है।
कार्ल पॉपर (Karl Popper) ने ‘द ओपन सोसाइटी ऐंड इट्स एनिमीज़’ (The Open Society and Its Enemies) में प्रतिपादित किया है कि किसी भी दावे का मूल्य उसकी आलोचनात्मक परीक्षा में निहित होता है। जो दावा परीक्षण से बच निकलता है और स्वयं को पहले से सत्य घोषित कर देता है, वह ज्ञान का नहीं, विचारधारा का हिस्सा बन जाता है। कविता में भी यही स्थिति उपस्थित है। युद्ध हुआ नहीं, इसलिए विजय की कोई परीक्षा संभव नहीं है। फिर भी विजय को निर्विवाद घोषित कर दिया जाता है। इस प्रकार कविता सत्ता की उस प्रवृत्ति को पहचानती है जिसमें अपरीक्षित निष्कर्षों को भी ऐतिहासिक सत्य का रूप दे दिया जाता है।
इसी प्रकार हन्ना आरेंट भी ‘द ओरिजिन्स ऑफ़ टोटैलिटेरियनिज़्म’ (The Origins of Totalitarianism) में इस बात पर विचार किया है कि कैसे सर्वाधिकारवादी प्रवृत्तियाँ केवल तथ्यों को छिपाती ही नहीं, बल्कि एक ऐसी काल्पनिक वास्तविकता भी निर्मित करती हैं जिसमें राजनीतिक दावे स्वयं तथ्य का स्थान ग्रहण कर लेते हैं। यद्यपि श्रीकांत वर्मा की कविता किसी विशिष्ट राजनीतिक व्यवस्था का चित्रण नहीं करती, फिर भी उसका यह अंश आरेंट की इस अंतर्दृष्टि के अत्यंत निकट पहुँचता है। सत्ता केवल यह नहीं कहती कि वह विजयी है; वह यह भी निश्चित कर देती है कि यदि कोई दूसरी संभावना होती, तब भी परिणाम वही रहता। इस प्रकार भविष्य की संभावना और अतीत की स्मृति—दोनों पर उसका अधिकार स्थापित हो जाता है।
कविता की अगली पंक्तियाँ इस निर्मित वैधता को एक नया आधार देती हैं—“न उनके पास अस्त्र थे,/न अश्व,/न हाथी…” ध्यान देने योग्य बात यह है कि सत्ता विरोधी की पराजय को उसके अभावों के आधार पर सिद्ध करती है। विरोधी के पास क्या नहीं था, इसका विस्तारपूर्वक उल्लेख किया जाता है; उसके पास क्या था, इस पर मौन साध लिया जाता है। श्रीकांत वर्मा का यह चयन अत्यंत अर्थगर्भित है। सत्ता विरोधी की पहचान उसके अभाव से करती है, क्योंकि इससे अपनी शक्ति और अधिक विराट प्रतीत होती है। इस प्रकार विरोधी का चित्रण भी सत्ता की आत्म-छवि के निर्माण का उपकरण बन जाता है।
अंतोनियो ग्राम्शी कहते हैं कि प्रभुत्वशाली सत्ता अपने विरोधी की छवि भी स्वयं गढ़ती है। वह यह निर्धारित करती है कि विरोधी को किस रूप में देखा जाएगा। यदि विरोधी को कमजोर, असंगठित या अक्षम सिद्ध कर दिया जाए, तो सत्ता की श्रेष्ठता स्वतः प्रमाणित प्रतीत होने लगती है। श्रीकांत वर्मा की कविता इस वैचारिक प्रक्रिया को अत्यंत संक्षिप्त, किंतु प्रभावी ढंग से पकड़ती है। विरोधी के अस्त्रहीन होने का उल्लेख वस्तुतः सत्ता के आत्मप्रशस्ति-गान का हिस्सा बन जाता है।
किन्तु कविता यहीं नहीं रुकती। वह तत्काल एक ऐसा सवाल खड़ा करती है जो पूरे तर्क को उलट देता है—“युद्ध हो भी कैसे सकता था?”
यह सवाल कविता में किसी विरोधी पात्र द्वारा नहीं पूछा गया है; वह उसी कथन के भीतर से निकलता है जो अभी तक विजय का औचित्य सिद्ध कर रहा था। यही कविता की संरचनात्मक शक्ति है। श्रीकांत वर्मा सत्ता के भाषण को इस प्रकार रचते हैं कि उसके भीतर से ही उसका अंतर्विरोध प्रकट होने लगे। यदि सामने निहत्थे लोग थे, तो युद्ध की संभावना ही कहाँ थी? और यदि युद्ध संभव नहीं था, तो विजय की घोषणा का अर्थ क्या है? कविता इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देती, क्योंकि उसका उद्देश्य निष्कर्ष देना नहीं, बल्कि सत्ता की भाषा में छिपे विरोधाभासों को उजागर करना है।
‘द थ्योरी ऑफ़ कम्युनिकेटिव ऐक्शन’ में युर्गेन हाबरमास ने लिखा है कि किसी भी कथन की वैधता तभी बनती है जब वह तर्कपूर्ण परीक्षण के लिए खुला हो। कविता में सत्ता का कथन इस कसौटी पर टिक नहीं पाता। जैसे ही उसके भीतर प्रश्न उपस्थित होता है, उसकी संपूर्ण तार्किक संरचना डगमगाने लगती है। श्रीकांत वर्मा यहाँ यह संकेत करते हैं कि प्रश्न सत्ता का शत्रु इसलिए नहीं है कि वह विरोध करता है, बल्कि इसलिए कि वह भाषा के भीतर छिपे अंतर्विरोधों को दृश्य बना देता है।
अब कविता उस निष्कर्ष तक पहुँचती है जिसकी तैयारी पहले से चल रही थी—“निहत्थे थे वे।” यह पंक्ति कविता के सबसे गहरे व्यंग्यों में से एक है। पहली दृष्टि में यह विरोधी की कमजोरी का वर्णन प्रतीत होती है, किंतु वास्तव में यही पंक्ति सत्ता की नैतिक समस्या को उद्घाटित करती है। यदि विरोधी वास्तव में निहत्था था, तो इतनी विराट सैन्य तैयारी किसके विरुद्ध थी? यदि सामने युद्ध की स्थिति ही नहीं थी, तो विजय का नैतिक आधार क्या है? इस प्रकार कविता सैन्य शक्ति की आलोचना नहीं करती; वह शक्ति के नैतिक औचित्य पर प्रश्न उठाती है।
इसायाह बर्लिन के बहुलतावादी चिंतन के आलोक में देखें तो यह पंक्ति एक और अर्थ ग्रहण करती है। बर्लिन का आग्रह था कि राजनीतिक जीवन में शक्ति के अनेक स्रोत होते हैं। केवल भौतिक शक्ति ही शक्ति नहीं होती। विचार, नैतिक साहस, स्वतंत्र विवेक और असहमति भी सामाजिक शक्ति के रूप हैं। श्रीकांत वर्मा की कविता धीरे-धीरे पाठक को इसी निष्कर्ष की ओर ले जाती है। जिन लोगों को सत्ता निहत्था समझ रही है, वे वास्तव में किसी दूसरी प्रकार की शक्ति के वाहक हैं। यह शक्ति अभी दृश्य नहीं हुई है, किंतु कविता उसके लिए आधारभूमि तैयार कर रही है।
क्लॉद लेफ़ोर (Claude Lefort) ने भी राजनीतिक सत्ता की प्रतीकात्मक प्रकृति पर विचार करते हुए कहा है कि जब कोई व्यवस्था स्वयं को पूर्ण और निर्विवाद सिद्ध करने लगती है, तब वह अपने भीतर उपस्थित रिक्तता को छिपाने का प्रयास करती है। श्रीकांत वर्मा की कविता में बार-बार दिया जा रहा औचित्य इसी छिपी हुई रिक्तता का संकेत है। जिसे अपने औचित्य पर पूरा विश्वास होता है, उसे बार-बार अपने पक्ष में तर्क गढ़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
इस अंश का सूक्ष्म पठन यह स्पष्ट करता है कि श्रीकांत वर्मा का उद्देश्य किसी युद्ध का चित्रण करना नहीं है। उनका उद्देश्य उस मानसिकता का विश्लेषण करना है जिसमें राजनीतिक सत्ता अपने लिए इतिहास गढ़ती है, संभावनाओं को उपलब्धियों में बदल देती है, विरोधी की छवि स्वयं निर्मित करती है और अपने नैतिक औचित्य को भाषिक रणनीतियों के माध्यम से सुरक्षित रखना चाहती है। किंतु कविता यह भी दिखाती है कि भाषा के भीतर छिपे छोटे-से अंतर्विरोध से यह पूरा निर्माण अस्थिर हो सकता है।
यहीं से कविता का केंद्र सैन्य शक्ति से हटकर वैचारिक शक्ति की ओर स्थानांतरित होने लगता है, जिसका पूर्ण उद्घाटन आगे “प्रत्येक अकेला होता है” और “वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गए हैं” जैसी पंक्तियों में होगा।कविता अब उस बिंदु पर पहुँचती है जहाँ उसका पूरा वैचारिक परिदृश्य बदल जाता है—“उनमें से हरेक अकेला था/और हरेक यह कहता था/प्रत्येक अकेला होता है!”
यह कविता का केंद्रीय खंड है। यहीं पहली बार कविता सत्ता और प्रतिरोध के संबंध को पूरी तरह उलट देती है। इससे पहले तक सत्ता बोल रही थी; अब कविता उन लोगों की ओर मुड़ती है जिनके पास कोई दृश्य शक्ति नहीं है। यहीं से कविता का नैतिक और दार्शनिक केंद्र निर्मित होता है। दूसरे शब्दों में इन पंक्तियों के साथ कविता का स्वर बदल जाता है। अभी तक राज्य की शक्ति का वर्णन था; अब मनुष्य की उपस्थिति सामने आती है। अभी तक सेनाएँ, अश्व, हाथी और विजय की घोषणाएँ थीं; अब केवल एक अकेला मनुष्य है। श्रीकांत वर्मा की रचना-दृष्टि का यह बड़ा कलात्मक गुण है कि वे विराटता के बाद लघुता को रखते हैं और अंततः वही लघुता अधिक अर्थपूर्ण सिद्ध होती है। कविता यहाँ यह स्थापित करती है कि इतिहास की निर्णायक शक्ति हमेशा संगठित सैन्य बल में नहीं, बल्कि स्वतंत्र चेतना से संपन्न मनुष्य में भी निहित होती है।
“उनमें से हरेक अकेला था”—यह कथन पहली दृष्टि में विरोधी पक्ष की कमजोरी का वर्णन प्रतीत हो सकता है, किंतु कविता इसे तुरंत उलट देती है। यदि यह केवल असंगठन का संकेत होता, तो अगली पंक्ति की आवश्यकता नहीं थी। किंतु श्रीकांत वर्मा लिखते हैं—“और हरेक यह कहता था / प्रत्येक अकेला होता है।” अर्थात् अकेलापन यहाँ परिस्थितिजन्य नहीं, बल्कि एक विचार है; एक दार्शनिक और नैतिक स्थिति है। यह अकेलापन पराजय का परिणाम नहीं, बल्कि आत्मबोध का परिणाम है।
इस पंक्ति का पहला अर्थ यह है कि मनुष्य अपने नैतिक निर्णयों में अंततः अकेला होता है। सत्ता सामूहिक हो सकती है, सेना संगठित हो सकती है, राज्य विशाल हो सकता है, किंतु सत्य का निर्णय मनुष्य को अपने विवेक से करना पड़ता है। श्रीकांत वर्मा इसीलिए भीड़ के सामने व्यक्ति को खड़ा करते हैं। कविता यह संकेत करती है कि इतिहास में निर्णायक परिवर्तन अनेक बार संगठित शक्ति से नहीं, बल्कि अकेले मनुष्य की नैतिक दृढ़ता से आरंभ हुए हैं।
‘द ह्यूमन कंडीशन’ (The Human Condition) में हन्ना आरेंट ने मनुष्य की राजनीतिक उपस्थिति को उसकी स्वतंत्र क्रियाशीलता और विचार-क्षमता से जोड़ा है। आरेंट के अनुसार राजनीति का वास्तविक आधार यह है कि प्रत्येक मनुष्य स्वतंत्र रूप से विचार कर सके और सार्वजनिक जीवन में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सके। श्रीकांत वर्मा की कविता में अकेला मनुष्य इसी स्वतंत्र उपस्थिति का प्रतिनिधि है। वह किसी भीड़ का हिस्सा होकर नहीं बोलता; वह अपने विवेक की ओर से बोलता है। इसीलिए उसका अकेलापन उसकी शक्ति बन जाता है।
“प्रत्येक अकेला होता है”—इस वाक्य में श्रीकांत वर्मा एक सार्वभौमिक सत्य की स्थापना करते हैं। कविता यहाँ किसी विशेष राजनीतिक संघर्ष का वर्णन नहीं कर रही। वह मनुष्य की उस अस्तित्वगत स्थिति को व्यक्त कर रही है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को अंततः अपने विवेक के साथ खड़ा होना पड़ता है। यही कारण है कि यह कथन तत्कालीन राजनीति से आगे बढ़कर दार्शनिक अर्थ ग्रहण कर लेता है।
‘फोर एसेज़ ऑन लिबर्टी’ (Four Essays on Liberty) तथा ‘टू कॉन्सेप्ट्स ऑफ़ लिबर्टी’ (Two Concepts of Liberty) में इसायाह बर्लिन बार-बार इस बात पर बल देते हैं कि मनुष्य की स्वतंत्रता उसकी वैयक्तिकता से जुड़ी हुई है। यदि व्यक्ति को केवल किसी सामूहिक पहचान में विलीन कर दिया जाए, तो उसकी नैतिक स्वतंत्रता नष्ट हो जाती है। श्रीकांत वर्मा की कविता में प्रत्येक व्यक्ति का अकेला होना इसी वैयक्तिक स्वतंत्रता की घोषणा है। वह भीड़ की स्वीकृति से नहीं, अपने विवेक से संचालित होता है।
यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि कविता में इन लोगों का कोई नाम नहीं है। वे किसी जाति, वर्ग, समुदाय या संगठन के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत नहीं किए गए। वे केवल मनुष्य हैं। श्रीकांत वर्मा इस अनामता के माध्यम से उन्हें सार्वभौमिक बना देते हैं। अब वे केवल कोसल के विरोधी नहीं रह जाते; वे हर उस व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं जो सत्ता के सामने अपने विवेक के साथ खड़ा होता है।
इन पंक्तियों का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि यहाँ पहली बार कविता सैन्य शक्ति की परिभाषा को पूरी तरह उलट देती है। अभी तक शक्ति का अर्थ सेना, अस्त्र और संगठन था। अब शक्ति का अर्थ विवेक, आत्मनिर्णय और नैतिक साहस हो जाता है। यह परिवर्तन किसी नारे के रूप में नहीं आता; वह केवल तीन छोटी पंक्तियों के माध्यम से घटित होता है। यही श्रीकांत वर्मा की काव्य-कला का वैशिष्ट्य है।
विवेच्य कविता का यह अंश अंततः इस विचार को स्थापित करता है कि इतिहास में निर्णायक भूमिका हमेशा संगठित शक्ति नहीं निभाती। अनेक बार एक अकेला मनुष्य, यदि वह अपने विवेक और प्रश्नों के साथ खड़ा हो सके, किसी भी साम्राज्य से अधिक स्थायी प्रभाव छोड़ सकता है। यही कारण है कि कविता आगे चलकर यह नहीं कहती कि वे लोग कोई युद्ध जीत गए; वह कहती है कि वे प्रश्न छोड़ गए। इस प्रकार “प्रत्येक अकेला होता है” वास्तव में उस वैचारिक शक्ति की प्रस्तावना है जो अगले अंश में प्रश्नों के रूप में सामने आएगी और जो अंततः पूरे राज्य की वैचारिक दरिद्रता को उद्घाटित करेगी।
यह कविता का चरम बिंदु है। पिछले खंड में श्रीकांत वर्मा ने स्वतंत्र विवेक वाले मनुष्य की उपस्थिति स्थापित की थी और इस खंड में वे यह दिखाते हैं कि इतिहास में अंततः क्या बचता है—विजय या प्रश्न? यही वह स्थान है जहाँ कविता अपने समय से आगे निकलकर सत्ता, इतिहास और विचार के संबंध पर स्थायी टिप्पणी बन जाती है।कविता के अंतिम चरण में श्रीकांत वर्मा लिखते हैं—
“जो भी हो,
जय यह आपकी है!
बधाई हो!
राजसूय पूरा हुआ,
आप चक्रवर्ती हुए—
वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गए हैं
जैसे कि यह—
कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता,
कोसल में विचारों की कमी है!”
यहाँ कविता पहली नज़र में अपनी आरंभिक स्थिति पर लौटती हुई प्रतीत होती है। फिर से जय-घोष है, फिर बधाई है, फिर राजकीय उपलब्धियों का उल्लेख है। किंतु यह वापसी केवल संरचनात्मक है; अर्थ की दृष्टि से कविता अब पूरी तरह बदल चुकी है। प्रारंभ में जय-घोष सत्ता की भाषा था, जबकि यहाँ वही जय-घोष अपने भीतर विडंबना का भार लेकर उपस्थित होता है। पाठक अब जान चुका है कि यह विजय निर्विवाद नहीं है। इसलिए “जय यह आपकी है” कथन अब प्रशंसा से अधिक आत्म-व्यंग्य का रूप ग्रहण कर लेता है।
इस प्रसंग में ख़ास टूर पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि कविता की शुरुआत “जो भी हो” से होती है। यह छोटा-सा वाक्यांश पूरी राजकीय मानसिकता को उद्घाटित कर देता है। “जो भी हो” का अर्थ है कि वास्तविकता चाहे जैसी रही हो, निष्कर्ष पहले से निश्चित है। अर्थात् सत्य को घटना से नहीं, सत्ता की सुविधा से निर्धारित किया जा रहा है। श्रीकांत वर्मा अत्यंत संयम के साथ यह दिखाते हैं कि जब राजनीतिक व्यवस्था निष्कर्ष पहले तय कर लेती है, तब तथ्य केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं।
कोई भी समाज तभी खुला समाज बनता है जब उसके निष्कर्ष निरंतर आलोचना और संशोधन के लिए खुले रहें। इसके विपरीत बंद समाज अपने निर्णयों को अंतिम सत्य घोषित कर देता है। श्रीकांत वर्मा की कविता में “जो भी हो” इसी बंद राजनीतिक मानसिकता का संकेत है। यहाँ निष्कर्ष आलोचना से पहले ही निश्चित कर दिया गया है। इस प्रकार कविता सत्ता के ज्ञानमीमांसात्मक अहंकार की आलोचना करती है; वह केवल राजनीतिक प्रभुत्व की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की आलोचना करती है जो ख़ुद को त्रुटिहीन मानने लगती है।
“राजसूय पूरा हुआ,/आप चक्रवर्ती हुए।” इन पंक्तियों में प्रयुक्त ‘राजसूय’ और ‘चक्रवर्ती’ शब्द सिर्फ़ ऐतिहासिक संकेत नहीं हैं। श्रीकांत वर्मा इनका प्रयोग सांस्कृतिक स्मृति को सक्रिय करने के लिए करते हैं। भारतीय परंपरा में राजसूय केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था; वह सार्वभौम सत्ता की सार्वजनिक स्वीकृति का प्रतीक भी था। इसी प्रकार ‘चक्रवर्ती’ केवल एक शासक नहीं, बल्कि समस्त दिशाओं पर अधिकार रखने वाले सम्राट का द्योतक है। कविता इन शब्दों का उपयोग गौरव की पुनर्स्थापना के लिए नहीं करती; वह यह दिखाती है कि राजनीतिक सत्ता अपने वैभव को वैध सिद्ध करने के लिए सांस्कृतिक प्रतीकों का सहारा लेती है। किंतु यही प्रतीक उस समय विडंबना में बदल जाते हैं जब उनके पीछे वैचारिक दृढ़ता का अभाव हो।
क्लॉद लेफ़ोर का कहना है कि जब सत्ता स्वयं को पूर्ण और अंतिम रूप में प्रस्तुत करने लगती है, तब वह अपने चारों ओर ऐसे प्रतीकों का निर्माण करती है जो उसकी सार्वभौमिकता का आभास उत्पन्न करें। किंतु लोकतांत्रिक चेतना की दृष्टि से कोई भी सत्ता अंतिम नहीं होती। श्रीकांत वर्मा की कविता इसी को अस्वीकार करती है। राजसूय पूरा हो सकता है, चक्रवर्ती की उपाधि मिल सकती है, किंतु इससे इतिहास का निर्णय समाप्त नहीं हो जाता। इतिहास का निर्णय अभी शेष है, क्योंकि प्रश्न अभी शेष हैं।
इसी बिंदु पर कविता का सबसे बड़ा मोड़ आता है—“वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गए हैं।” पूरी कविता में पहली बार ‘प्रश्न’ केंद्रीय शब्द बनकर सामने आता है। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि श्रीकांत वर्मा यह नहीं कहते कि वे कोई सेना छोड़ गए, कोई आंदोलन छोड़ गए या कोई वैकल्पिक राज्य छोड़ गए। वे केवल प्रश्न छोड़ गए। अर्थात् कविता के अनुसार इतिहास में विचार की सबसे स्थायी अभिव्यक्ति प्रश्न है। प्रश्न किसी उत्तर का अभाव नहीं है; वह विवेक की सक्रियता का प्रमाण है। जहाँ प्रश्न जीवित हैं, वहाँ विचार अभी समाप्त नहीं हुए हैं।
हाबरमास बताते हैं कि किसी राजनीतिक व्यवस्था की वैधता तभी बनी रह सकती है जब वह प्रश्नों और आलोचनाओं के प्रति खुली रहे। श्रीकांत वर्मा की कविता इसी कसौटी पर कोसल की परीक्षा करती है। समस्या यह नहीं है कि राज्य शक्तिशाली है; समस्या यह है कि उसके पास प्रश्नों के लिए कोई स्थान नहीं है। इसलिए प्रश्न सत्ता के लिए संकट बन जाते हैं।
इसके बाद कविता अपना अंतिम और निर्णायक कथन प्रस्तुत करती है—“कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता,/कोसल में विचारों की कमी है!”
यहाँ ‘कोसल’ का अर्थ किसी एक ऐतिहासिक राज्य तक सीमित नहीं रह जाता। वह हर उस राजनीतिक व्यवस्था का रूपक बन जाता है जो अपने सैन्य और राजकीय वैभव पर तो गर्व करती है, किंतु विचारों की स्वतंत्रता को गौण मानती है। श्रीकांत वर्मा की दृष्टि में किसी राज्य का वास्तविक संकट सीमाओं पर नहीं, बल्कि उसकी बौद्धिक संस्कृति के भीतर आरंभ होता है।
अंतोनियो ग्राम्शी के अनुसार अगर कोई व्यवस्था समाज की बौद्धिक ऊर्जा से कट जाती है, तो उसका प्रभुत्व धीरे-धीरे खोखला होने लगता है। श्रीकांत वर्मा की अंतिम पंक्ति ग्राम्शी की इसी अंतर्दृष्टि का काव्यात्मक रूप प्रतीत होती है। विचारों का अभाव वस्तुतः वैचारिक नेतृत्व का अभाव है। जहाँ स्वतंत्र चिंतन समाप्त होता है, वहाँ राजनीतिक शक्ति भी धीरे-धीरे अपनी वैधता खोने लगती है।
कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में राजधर्म और प्रजाहित का सम्बन्ध इस श्लोक में स्पष्ट रूप से व्यक्त हुआ है—
‘प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥’
अर्थात् प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा के हित में ही राजा का हित है। राजा के लिए अपना निजी प्रिय या स्वार्थ हितकर नहीं है; प्रजा को जो प्रिय और हितकर है, वही राजा के लिए भी प्रिय और हितकर होना चाहिए।
इसके ठीक बरक्स श्रीकांत वर्मा के ‘मगध’ में संकलित ‘कोसल गणराज्य’ कविता में ‘गणराज्य’ की राजनीतिक कल्पना और प्रजा की वास्तविक स्थिति के बीच एक गहरी विडम्बना दिखाई देती है—
कोसल मेरी कल्पना में एक गणराज्य है
कोसल में प्रजा सुखी नहीं
क्योंकि कोसल सिर्फ़ कल्पना में गणराज्य है।
इन दोनों पाठों को साथ रखने पर भारतीय राजकीय चिन्तन की एक दिलचस्प यात्रा सामने आती है। कौटिल्य के यहाँ राज्य की सार्थकता उसकी संस्थागत संरचना मात्र में नहीं, बल्कि प्रजा के सुख और हित में निहित है। राजा का निजी हित प्रजा के हित से अलग कोई स्वतन्त्र मूल्य नहीं रखता। इसीलिए ‘प्रजासुखे सुखं राज्ञः’ केवल शासन-व्यवस्था का व्यावहारिक सूत्र नहीं, बल्कि सत्ता की नैतिक वैधता का सिद्धान्त है। राजा का सुख तभी वास्तविक है जब वह प्रजा के सुख में रूपान्तरित होता है।
श्रीकांत वर्मा की कविता इसी नैतिक कसौटी को आधुनिक राजनीतिक यथार्थ के सामने रखती हुई दिखाई देती है। ‘कोसल मेरी कल्पना में एक गणराज्य है’ में ‘गणराज्य’ पहले एक राजनीतिक वास्तविकता के रूप में नहीं, ‘कल्पना’ के रूप में उपस्थित होता है। ‘मेरी कल्पना में’ और ‘सिर्फ़ कल्पना में’—इन दोनों अभिव्यक्तियों के बीच कविता का पूरा राजनीतिक व्यंग्य विकसित होता है। आरम्भ में गणराज्य एक सम्भावना है, लेकिन अन्त तक पहुँचते-पहुँचते वही सम्भावना एक विडम्बना में बदल जाती है।
कविता की सबसे मारक पंक्ति है—‘कोसल में प्रजा सुखी नहीं।’ यहाँ ‘प्रजा’ शब्द को कौटिल्य के श्लोक के सन्दर्भ में पढ़ना विशेष अर्थपूर्ण हो जाता है। कौटिल्य के यहाँ प्रजा राज्य के अस्तित्व का केन्द्र है; श्रीकांत वर्मा के यहाँ वही प्रजा राज्य की घोषित राजनीतिक संरचना के बावजूद सुखी नहीं है। इस तरह दोनों पाठों के बीच लगभग दो सहस्राब्दियों का अन्तर होते हुए भी एक ही प्रश्न उपस्थित होता है—राज्य किसके लिए है?
कौटिल्य का उत्तर है—प्रजा के लिए। श्रीकांत वर्मा की कविता इस उत्तर को एक प्रश्न में बदल देती है—यदि प्रजा सुखी नहीं है, तो उस राज्य के ‘गणराज्य’ होने का अर्थ क्या है?
यहीं ‘गणराज्य’ शब्द अपनी संवैधानिक या संस्थागत अर्थवत्ता से आगे बढ़कर एक नैतिक कसौटी बन जाता है। कोई राज्य अपने को गणराज्य कह सकता है, उसकी संस्थाएँ लोकतांत्रिक दिखाई दे सकती हैं, सत्ता परिवर्तन की व्यवस्थाएँ मौजूद हो सकती हैं, लेकिन यदि उसकी प्रजा सुखी नहीं है, तो कविता उसके राजनीतिक दावे और सामाजिक वास्तविकता के बीच की दूरी को उजागर करती है। इसलिए श्रीकांत वर्मा का ‘कोसल’ केवल अतीत का कोई काल्पनिक भूगोल नहीं रह जाता; वह सत्ता और नागरिक के सम्बन्ध की जाँच करने वाला रूपक बन जाता है।
इस दृष्टि से कौटिल्य और श्रीकांत वर्मा को आमने-सामने रखने पर ‘नाम’ और ‘अनुभव’ का अन्तर सामने आता है। कौटिल्य के यहाँ राज्य की नैतिकता का परीक्षण प्रजा के सुख से होता है। श्रीकांत वर्मा के यहाँ राज्य की घोषित पहचान और प्रजा के अनुभव के बीच असंगति ही राजनीतिक विडम्बना का आधार बनती है। वहाँ ‘प्रजासुख’ राजधर्म का प्रमाण है; यहाँ ‘प्रजा का असुख’ गणराज्य की खोखली कल्पना का प्रमाण बन जाता है।
इस तुलना में ‘कल्पना’ शब्द भी विशेष ध्यान देने योग्य है। कविता यह नहीं कहती कि कोसल में गणराज्य की कोई कल्पना ही नहीं है; बल्कि वह कहती है कि गणराज्य केवल कल्पना में है। यानी राजनीतिक आदर्श मौजूद है, पर उसका सामाजिक यथार्थ अनुपस्थित है। यही वह बिन्दु है जहाँ कविता राजनीतिक आदर्शवाद और वास्तविक जीवन के बीच की दूरी को पकड़ती है। ‘गणराज्य’ एक विचार के रूप में मौजूद है, लेकिन प्रजा के जीवन में उसकी परिणति दिखाई नहीं देती।
कौटिल्य के श्लोक का ‘नात्मप्रियं हितं राज्ञः’ इस सन्दर्भ में और भी अर्थपूर्ण हो उठता है। यहाँ शासक को अपने निजी हित से ऊपर उठकर प्रजा के हित को अपना हित मानने की अपेक्षा की गई है। श्रीकांत वर्मा का ‘कोसल’ मानो इसी कसौटी पर विफल शासन की तस्वीर प्रस्तुत करता है। यदि सत्ता का अपना हित और प्रजा का हित अलग-अलग हो जाएँ, तो ‘गणराज्य’ शब्द केवल राजनीतिक नाम रह जाता है; वह जीवन-सत्य नहीं बन पाता।
इसलिए कौटिल्य और श्रीकांत वर्मा को एक साथ पढ़ना केवल प्राचीन और आधुनिक राजनीतिक चिन्तन की तुलना करना नहीं है। यह ‘राज्य’ की नैतिक अवधारणा और ‘राज्य’ के नागरिक अनुभव के बीच सम्बन्ध की पड़ताल है। कौटिल्य सत्ता को प्रजा के सुख से वैधता प्रदान करते हैं, जबकि श्रीकांत वर्मा सत्ता के उस दावे पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं जिसमें ‘गणराज्य’ तो है, लेकिन ‘प्रजा सुखी’ नहीं है। एक ओर ‘प्रजासुख’ राजकीय धर्म का आधार है, दूसरी ओर ‘प्रजाअसुख’ राजनीतिक दावे की विडम्बना को उजागर करता है।
यही कारण है कि ‘कोसल’ को केवल अतीत की स्मृति के रूप में पढ़ना इस कविता की राजनीतिक शक्ति को सीमित कर देगा। वह वर्तमान को देखने का एक दर्पण बन जाता है। श्रीकांत वर्मा इतिहास की ओर लौटकर इतिहास का पुनर्निर्माण नहीं करते; वे इतिहास के नाम, पात्रों और राजनीतिक प्रतीकों के माध्यम से वर्तमान सत्ता-व्यवस्था की नैतिक परीक्षा करते हैं। ‘कोसल’ इसीलिए एक ऐतिहासिक स्थान से अधिक एक राजनीतिक रूपक है और ‘गणराज्य’ एक शासन-प्रणाली से अधिक एक अधूरा वादा।
इस तुलना का निष्कर्ष एक वाक्य में इस प्रकार कहा जा सकता है: कौटिल्य के यहाँ ‘प्रजासुख’ से राज्य की सार्थकता सिद्ध होती है, जबकि श्रीकांत वर्मा के ‘कोसल’ में ‘प्रजासुख’ से ‘गणराज्य’ के दावे की विडम्बना सिद्ध होती है। इस अर्थ में श्रीकांत वर्मा की कविता कौटिल्य के राजधर्म का प्रत्यक्ष अनुकरण नहीं करती, बल्कि उनकी कसौटी को आधुनिक राजनीतिक यथार्थ के सामने रखकर पूछती है कि जब प्रजा सुखी नहीं है, तब ‘गणराज्य’ आखिर कहाँ है?
भारतीय सभ्यता की जिस वाद-विवाद-संवाद परंपरा की चर्चा की जाती है, उसके मद्देनज़र ‘कोसल में विचारों की कमी है’ कविता की अंतिम पंक्ति और अधिक अर्थवान हो उठती है। विचारों का अर्थ यहाँ केवल दार्शनिक चिंतन नहीं है; उसका अर्थ सार्वजनिक तर्क, असहमति, बहस और आत्मालोचन की जीवित परंपरा है। जिस समाज में यह परंपरा समाप्त होने लगती है, वहाँ बाहरी समृद्धि भी अंततः उसे स्थायित्व नहीं दे सकती।
कविता का अंतिम कथन किसी भविष्यवाणी की तरह नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक सिद्धांत की तरह सामने आता है। श्रीकांत वर्मा यह नहीं कहते कि कोसल इसलिए नहीं टिकेगा क्योंकि उसकी सेना दुर्बल है, उसका कोष रिक्त है या उसके शत्रु अधिक शक्तिशाली हैं। वे राज्य के संकट का कारण उसके भीतर खोजते हैं। विचारों की कमी का अर्थ है—आलोचनात्मक विवेक का क्षय, प्रश्नों के प्रति असहिष्णुता, संवाद का लोप और आत्मपरीक्षण की समाप्ति। यही वे स्थितियाँ हैं जिनसे किसी भी राजनीतिक व्यवस्था का आंतरिक क्षरण आरंभ होता है।
इस प्रकार कविता का निष्कर्ष सैन्य शक्ति और वैचारिक शक्ति के पूरे द्वंद्व का समाधान प्रस्तुत करता है। सेना राज्य की रक्षा कर सकती है, परंतु विचार ही उसके भविष्य की रक्षा करते हैं। विजय की घोषणा इतिहास में दर्ज हो सकती है, किंतु इतिहास का अंतिम निर्णय उन प्रश्नों से निर्मित होता है जो सत्ता के उत्सव के बीच भी जीवित रह जाते हैं। श्रीकांत वर्मा की दृष्टि में किसी राज्य की वास्तविक दीर्घायु उसके अस्त्रों से नहीं, बल्कि उसके विचारों से निर्धारित होती है। यही कारण है कि कविता का अंतिम वाक्य केवल कोसल का नहीं, बल्कि प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था का आत्मपरीक्षण बन जाता है।
गौरतलब है कि समाजवैज्ञानिक विश्लेषण कविता को समझने में मदद करते है, पर यह भी उतना ही सत्य है कि कविता का अर्थ इन सिद्धांतों से उत्पन्न नहीं होता। उसका अर्थ पहले से ही उसके अपने काव्य-विन्यास में उपस्थित है। ये सभी चिंतन-परंपराएँ केवल उन अर्थों को अधिक स्पष्ट और अधिक सूक्ष्म रूप से देखने में सहायता करती हैं। इसलिए इस कविता को किसी एक वैचारिक ढाँचे में सीमित करना उसके बहुआयामी स्वरूप के साथ न्याय नहीं होगा।
कविता का केंद्रीय प्रतिपाद्य यह नहीं है कि सैन्य शक्ति निरर्थक है। उसका आग्रह इससे कहीं अधिक सूक्ष्म है। वह यह दिखाती है कि सैन्य शक्ति किसी राज्य के अस्तित्व की एक शर्त हो सकती है, किंतु उसकी दीर्घजीविता की शर्त नहीं। कोई भी व्यवस्था केवल बाहरी संगठन, अनुशासन और संसाधनों के आधार पर लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकती। उसकी वास्तविक शक्ति उसके वैचारिक जीवन, उसके आत्मालोचन, उसके सार्वजनिक संवाद और उसके भीतर सक्रिय प्रश्नाकुलता पर निर्भर करती है। इसीलिए कविता के अंतिम शब्द किसी राजनीतिक पराजय की घोषणा नहीं करते; वे एक वैचारिक निदान प्रस्तुत करते हैं। राज्य का संकट उसकी सीमाओं से पहले उसकी चेतना में जन्म लेता है।
यहाँ ‘विचार’ शब्द पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। कविता में विचार का अर्थ किसी अमूर्त दार्शनिक चिंतन से नहीं है। विचार का अर्थ है—स्वतंत्र विवेक, आलोचनात्मक दृष्टि, प्रश्न करने का साहस, असहमति का सम्मान, संवाद की संस्कृति और आत्मपरीक्षण की क्षमता। इसी प्रकार ‘विचारों की कमी’ का अर्थ केवल विद्वानों या पुस्तकों का अभाव नहीं है। उसका अर्थ है ऐसी सार्वजनिक संस्कृति का क्षरण जिसमें भिन्न मतों को सुनने, स्थापित धारणाओं की परीक्षा करने और सत्ता से उत्तर माँगने की परंपरा जीवित रहती है। इस दृष्टि से कविता राजनीतिक होने के साथ-साथ सांस्कृतिक और नैतिक भी है।
कविता का एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि वह इतिहास की अवधारणा का पुनर्मूल्यांकन करती है। सामान्यतः इतिहास विजयों, साम्राज्यों और राजकीय उपलब्धियों का इतिहास माना जाता है। श्रीकांत वर्मा इस दृष्टि को उलट देते हैं। उनके यहाँ इतिहास का निर्णायक तत्व विजय नहीं, बल्कि प्रश्न है। विजय तत्कालीन राजनीतिक यथार्थ का हिस्सा हो सकती है, किंतु प्रश्न भविष्य की ऐतिहासिक चेतना का आधार बनते हैं। इसी कारण कविता में शासक के पास राज्य है, सेना है, प्रतिष्ठा है, किंतु अंततः स्मृति उन लोगों के साथ चली जाती है जो प्रश्न छोड़ गए। यह इतिहास की एक वैकल्पिक अवधारणा है, जिसमें सत्ता की अपेक्षा विचार अधिक स्थायी सिद्ध होते हैं।
‘मगध’ काव्य-संग्रह के व्यापक संदर्भ में भी इस कविता का विशिष्ट स्थान है। इस संग्रह की अनेक कविताओं की तरह यहाँ भी अतीत वर्तमान का रूपक बन जाता है। श्रीकांत वर्मा इतिहास का पुनर्निर्माण नहीं करते; वे इतिहास का पुनर्पाठ करते हैं। कोसल, मगध, अवंती, कौशाम्बी या अन्य ऐतिहासिक संकेत उनके यहाँ पुरातात्त्विक रुचि के विषय नहीं हैं। वे आधुनिक राजनीतिक अनुभव की व्याख्या करने वाले सांस्कृतिक रूपक हैं। इसीलिए कविता का ऐतिहासिक परिवेश जितना प्राचीन दिखाई देता है, उसका राजनीतिक आशय उतना ही समकालीन प्रतीत होता है।
इस विचार-विहीन परिवेश के मद्देनज़र एक अन्य कविता में कवि का आक्रोश इन शब्दों में व्यक्त हुआ है : ‘चेचक और हैज़े से मरती है हस्तियां,/कैंसर से हस्तियां,/वकील रक्तचाप से/कोई नहीं मरता अपने पाप से… तुम जाओ अपने बहिश्त में मैं जाता हूँ अपने जहन्नुम में’।
आधुनिक हिन्दी कविता की परंपरा में श्रीकांत वर्मा की कविता इसलिए भी ख़ास है कि यह प्रतिरोध को नारे या सीधे संघर्ष में नहीं, बल्कि विचार की सक्रियता में खोजती है। यहाँ प्रतिरोध का सबसे प्रखर रूप प्रश्न है। यह प्रश्न केवल सत्ता से नहीं, बल्कि समाज से, इतिहास से और स्वयं पाठक से भी संवाद करता है। इस प्रकार कविता आलोचना को केवल राजनीतिक क्रिया नहीं रहने देती; वह उसे बौद्धिक और नैतिक उत्तरदायित्व में रूपांतरित कर देती है।
यदि विश्व-साहित्य की राजनीतिक कविता की परंपरा के संदर्भ में देखा जाए, तो भी यह रचना अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखती है। इसका कारण यह है कि श्रीकांत वर्मा किसी वैचारिक ध्रुवीकरण का सहारा नहीं लेते। वे किसी वैकल्पिक विचारधारा का प्रचार नहीं करते और न ही किसी आदर्श राज्य की कल्पना प्रस्तुत करते हैं। उनका ध्यान उस मूलभूत प्रश्न पर केंद्रित है जो हर राजनीतिक व्यवस्था के सामने उपस्थित रहता है—क्या शक्ति विचार का स्थान ले सकती है? कविता का उत्तर स्पष्ट है। शक्ति विचार के बिना टिकाऊ नहीं हो सकती। बाहरी विजय यदि आंतरिक वैचारिक दरिद्रता को ढँकने लगे, तो वही विजय भविष्य के संकट का प्रारंभ बन जाती है।
इस प्रकार ‘कोसल में विचारों की कमी है’ आधुनिक हिन्दी कविता में सत्ता, इतिहास और विचार के संबंध पर रचित एक गहन कविता है। इसकी स्थायी प्रासंगिकता इस तथ्य में निहित है कि यह किसी एक युग की राजनीति का दस्तावेज़ नहीं बनती, बल्कि राजनीति की उस स्थायी प्रवृत्ति का विश्लेषण करती है जिसमें शक्ति स्वयं को अंतिम मानने लगती है और विचारों की आवश्यकता को गौण समझ बैठती है। श्रीकांत वर्मा इस प्रवृत्ति के विरुद्ध किसी घोषणापत्र के साथ नहीं आते। वे केवल एक प्रश्न छोड़ते हैं—यदि किसी राज्य में विचारों की कमी हो जाए, तो क्या उसकी कोई भी विजय वास्तव में सुरक्षित रह सकती है? यही प्रश्न इस कविता को उसके ऐतिहासिक संदर्भ से आगे ले जाकर आधुनिक राजनीतिक संवेदना की एक दीर्घजीवी और गहन काव्य-अभिव्यक्ति बना देता है।
‘कोसल में विचारों की कमी है’ को केवल सत्ता-विरोधी कविता या राजनीतिक व्यंग्य के रूप में पढ़ना उसके अर्थ-संसार को सीमित कर देना होगा। यह कविता वस्तुतः इस प्रश्न की पड़ताल करती है कि किसी राज्य की वास्तविक शक्ति किसमें निहित होती है। क्या वह सेना, शस्त्र, विजय और राजकीय वैभव में निहित है, या फिर विचार, प्रश्न, संवाद और आत्मालोचन में? श्रीकांत वर्मा इस प्रश्न का उत्तर किसी प्रत्यक्ष राजनीतिक वक्तव्य के रूप में नहीं देते; वे एक ऐसी काव्य-स्थितियों का निर्माण करते हैं जिनमें स्वयं सत्ता की भाषा अपने अंतर्विरोधों को उद्घाटित करने लगती है। इसी कारण यह कविता केवल सत्ता की आलोचना नहीं करती, बल्कि सत्ता की ज्ञान-व्यवस्था, उसकी भाषिक संरचना और उसके आत्मबोध का भी विश्लेषण करती है।
पूरी कविता में दो संसार समानांतर चलते हैं। पहला संसार दृश्य है—राजा, सेना, विजय, राजसूय, चक्रवर्ती और जय-घोष का संसार। दूसरा संसार अदृश्य है—अकेले मनुष्यों, प्रश्नों और विचारों का संसार। श्रीकांत वर्मा की काव्य-रणनीति का वैशिष्ट्य यह है कि वे पहले संसार को अत्यंत विस्तृत रूप में सामने रखते हैं और दूसरे संसार को बहुत कम शब्दों में व्यक्त करते हैं। किंतु अर्थ की दृष्टि से यही दूसरा संसार पहले संसार को निरस्त कर देता है। इस प्रकार कविता दृश्य शक्ति और अदृश्य शक्ति के बीच का अंतर उद्घाटित करती है।
विभिन्न भारतीय एवं पाश्चात्य चिंतकों के संदर्भ कविता को समझने में सहायक हैं, किंतु कविता का वैचारिक वैभव किसी एक सिद्धांत में समाहित नहीं हो जाता। उसका वास्तविक वैशिष्ट्य इस बात में है कि वह एक अत्यंत सीमित काव्य-परिस्थिति के माध्यम से सत्ता, इतिहास, विचार और मनुष्य के संबंधों पर व्यापक चिंतन प्रस्तुत करती है। श्रीकांत वर्मा किसी वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था का प्रस्ताव नहीं रखते; वे केवल यह दिखाते हैं कि जहाँ विचार समाप्त होते हैं, वहाँ शक्ति भी अंततः अपना आधार खो देती है। यही कारण है कि कविता में सेना की तुलना में प्रश्न अधिक स्थायी सिद्ध होते हैं और विजय की तुलना में विचार अधिक निर्णायक।
इस दृष्टि से ‘कोसल में विचारों की कमी है’ आधुनिक हिन्दी कविता में सत्ता-विमर्श की एक विशिष्ट उपलब्धि है। यह कविता न तो केवल ऐतिहासिक रूपक है, न केवल राजनीतिक व्यंग्य और न ही मात्र नैतिक चेतावनी। यह उन प्रक्रियाओं का काव्यात्मक विश्लेषण है जिनके माध्यम से सत्ता स्वयं को वैध सिद्ध करती है, इतिहास का निर्माण करती है, भाषा को नियंत्रित करती है और अंततः अपने ही भीतर विचारों के क्षय का शिकार हो जाती है। श्रीकांत वर्मा का मूल आग्रह यह है कि किसी राज्य की दीर्घजीविता उसकी सीमाओं की सुरक्षा से पहले उसकी चेतना की सक्रियता पर निर्भर करती है। सेना राज्य की रक्षा कर सकती है, किंतु विचार ही उसकी आत्मा की रक्षा करते हैं। इसी कारण कविता का अंतिम कथन केवल कोसल का भविष्य नहीं बताता; वह प्रत्येक युग और प्रत्येक राजनीतिक व्यवस्था के सामने एक स्थायी आत्मालोचनात्मक प्रश्न रख देता है।
हिन्दी में कविता के शिल्प को उसके राजनीतिक अर्थ से जोड़कर बहुत कम पढ़ा गया है। जबकि श्रीकांत वर्मा की कविता में शिल्प और विचार अलग-अलग नहीं हैं; शिल्प ही विचार का निर्माण करता है। श्रीकांत वर्मा की कविता ‘कोसल में विचारों की कमी है’ की ख़ासियत सिर्फ़ उसके राजनीतिक कथ्य में नहीं, बल्कि उसकी काव्य-रचना की पद्धति में भी निहित है। इस कविता में शिल्प और कथ्य एक-दूसरे से पृथक नहीं हैं। सत्ता, इतिहास, विचार और प्रतिरोध जैसे प्रश्न किसी वैचारिक वक्तव्य के रूप में नहीं आते; वे भाषा की संरचना, वाक्यों के क्रम, विरामों, पुनरावृत्तियों और मौन के माध्यम से निर्मित होते हैं। इसीलिए कविता का सूक्ष्म पठन यह स्पष्ट करता है कि उसका राजनीतिक अर्थ उसके शिल्प से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
कविता की पहली शिल्पगत विशेषता उसकी संवादात्मक संरचना है। पूरी कविता ऐसा आभास देती है मानो कोई दरबारी शासक के सामने निवेदन कर रहा हो। किंतु यह वास्तविक संवाद नहीं है। यहाँ केवल एक ही पक्ष बोल रहा है। दूसरा पक्ष मौन है। शासक स्वयं भी कुछ नहीं बोलता। जिन लोगों को शत्रु कहा गया है, उनकी आवाज़ भी बहुत देर तक अनुपस्थित रहती है। इस प्रकार कविता एक विचित्र भाषिक संरचना निर्मित करती है जिसमें संवाद का रूप उपस्थित है, किंतु संवाद का लोकतांत्रिक स्वरूप अनुपस्थित है। श्रीकांत वर्मा इस तकनीक के माध्यम से यह दिखाते हैं कि सत्ता सबसे पहले संवाद को एकालाप में बदल देती है। इसलिए कविता का आरंभ राजनीतिक संघर्ष से पहले भाषिक संघर्ष का दृश्य बन जाता है।
दूसरी विशेषता उसकी कथन-रणनीति है। कविता में कवि कहीं भी प्रत्यक्ष टिप्पणी नहीं करता। वह यह नहीं कहता कि सत्ता झूठ बोल रही है, या विजय संदिग्ध है। इसके स्थान पर वह सत्ता की भाषा को उसी के रूप में प्रस्तुत करता है। यही प्रस्तुति धीरे-धीरे अपना व्यंग्य स्वयं उत्पन्न करती है। उदाहरण के लिए युद्ध का न होना और विजय की घोषणा एक-दूसरे के ठीक पास रख दिए जाते हैं। कवि इनमें कोई व्याख्यात्मक टिप्पणी नहीं जोड़ता। परिणाम यह होता है कि दोनों कथनों का अंतर्विरोध पाठक स्वयं अनुभव करता है। श्रीकांत वर्मा का यह शिल्प पाठक को निष्क्रिय ग्रहणकर्ता नहीं रहने देता; वह उसे अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बना देता है।
कविता की तीसरी विशेषता उसकी विडंबनात्मक संरचना है। यहाँ विडंबना किसी व्यंग्यात्मक टिप्पणी से नहीं बनती, बल्कि कथनों के परस्पर संबंध से बनती है। पहले विजय का उत्सव है, फिर युद्ध का अभाव; पहले विशाल सेना का उल्लेख है, फिर निहत्थे लोगों का चित्र; पहले चक्रवर्ती सम्राट की प्रतिष्ठा है, फिर विचारों की कमी का उद्घाटन। प्रत्येक नया कथन पिछले कथन का अर्थ बदल देता है। इस प्रकार कविता रैखिक न होकर आत्म-परिवर्तित संरचना ग्रहण करती है। पाठक जितना आगे बढ़ता है, उतना ही प्रारंभ का अर्थ बदलता जाता है। यही कारण है कि कविता को एक बार पढ़ने और अंत तक पहुँचने के बाद पुनः आरंभ से पढ़ने पर उसके अर्थ अधिक गहरे हो जाते हैं।
श्रीकांत वर्मा की भाषा की एक और विशेषता उसका असाधारण संयम है। कविता में बड़े राजनीतिक निष्कर्ष अत्यंत साधारण वाक्यों के भीतर छिपे हुए हैं। कहीं भी भावनात्मक उग्रता नहीं है। भाषा शांत है, किंतु उसी शांति के भीतर गहरी बेचैनी काम करती रहती है। यही संयम कविता के व्यंग्य को अधिक प्रभावशाली बनाता है। यदि कवि प्रत्यक्ष आक्रोश व्यक्त करते, तो कविता तत्कालीन राजनीतिक वक्तव्य बन सकती थी। इसके विपरीत संयत भाषा उसे दीर्घजीवी काव्यात्मक अर्थ प्रदान करती है।
कविता में पुनरावृत्ति का प्रयोग भी सार्थक है। “बधाई हो”, “जय”, “महाराज”, “आप”, “युद्ध”, “न” जैसे शब्द बार-बार लौटते हैं। यह पुनरावृत्ति केवल लय उत्पन्न नहीं करती; वह सत्ता की भाषिक संरचना को मूर्त रूप देती है। सत्ता का भाषण प्रायः दोहराव पर टिका होता है। किसी दावे को बार-बार दोहराकर उसे स्वाभाविक बना दिया जाता है। श्रीकांत वर्मा इसी प्रक्रिया को काव्यात्मक स्तर पर पकड़ते हैं। किंतु कविता का अंत आते-आते यही पुनरावृत्ति अपना प्रभाव खोने लगती है, क्योंकि उसके सामने पहली बार “प्रश्न” उपस्थित हो जाता है। एक प्रश्न अनेक घोषणाओं पर भारी पड़ जाता है। यही कविता का शिल्पगत उत्कर्ष है।
विराम-चिह्नों का प्रयोग भी इस कविता में अत्यंत अर्थपूर्ण है। छोटे-छोटे वाक्य, विस्मयादिबोधक चिह्न, डैश और पंक्ति-विभाजन केवल दृश्य विन्यास नहीं हैं। वे अर्थ के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए “युद्ध नहीं हुआ—” के बाद उपस्थित विराम पाठक को ठहरने के लिए बाध्य करता है। उसके बाद “लौट गए शत्रु” आता है। इस क्रम से अर्थ की जो आकस्मिकता उत्पन्न होती है, वह साधारण गद्य-वाक्य में संभव नहीं थी। इसी प्रकार “वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गए हैं / जैसे कि यह—” में प्रयुक्त डैश पाठक को उस अंतिम वाक्य के लिए मानसिक रूप से तैयार करता है जो पूरी कविता का निष्कर्ष है। इस प्रकार विराम भी अर्थ-सृजन का उपकरण बन जाता है।
कविता में संख्या का इस्तेमाल भी केवल सूचनात्मक नहीं है। “चार अक्षौहिणी”, “दस सहस्त्र अश्व”, “लगभग इतने ही हाथी”—ये संख्याएँ शक्ति की दृश्यता निर्मित करती हैं। इसके विपरीत “हरेक”, “प्रत्येक”, “कुछ प्रश्न” जैसी अभिव्यक्तियाँ संख्या को गुणात्मक अर्थ देती हैं। कविता की शुरुआत में शक्ति संख्या में दिखाई देती है, जबकि अंत में शक्ति विचार में दिखाई देती है। यह परिवर्तन केवल कथ्य का नहीं, भाषा की संरचना का भी परिवर्तन है।
श्रीकांत वर्मा की सबसे प्रभावशाली शिल्पगत तकनीकों में से एक है—‘मौन’ का प्रयोग। कविता में जितना कहा गया है, उससे कम नहीं, बल्कि कहीं अधिक वह है जो नहीं कहा गया। युद्ध क्यों नहीं हुआ? शत्रु क्यों लौट गए? वे कौन लोग थे? उन्होंने कौन-से प्रश्न उठाए? कोसल में विचारों की कमी कैसे उत्पन्न हुई? कविता इनमें से किसी प्रश्न का उत्तर नहीं देती। यह मौन किसी कमी का परिणाम नहीं है; यह काव्य-रणनीति है। इन रिक्त स्थानों को पाठक अपने अनुभव, इतिहास-बोध और राजनीतिक चेतना से भरता है। इस प्रकार कविता अपने पाठक को अर्थ का सह-निर्माता बना देती है।
मिथकीय संकेतों का प्रयोग भी इसी रणनीति का हिस्सा है। ‘कोसल’, ‘राजसूय’ और ‘चक्रवर्ती’ जैसे शब्द किसी विशिष्ट ऐतिहासिक प्रसंग को पुनर्जीवित करने के लिए नहीं आए हैं। वे सांस्कृतिक स्मृति के संकेत हैं। श्रीकांत वर्मा उन्हें रूपक में रूपांतरित कर देते हैं। परिणामस्वरूप कोसल एक ऐतिहासिक राज्य न रहकर प्रत्येक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था का प्रतीक बन जाता है जहाँ शक्ति विचार से बड़ी मान ली जाती है। मिथक यहाँ अतीत का पुनर्निर्माण नहीं करता; वह वर्तमान की आलोचना का माध्यम बनता है।
कविता का समूचा विन्यास एक क्रमिक विपर्यय पर आधारित है। आरंभ में शक्ति दृश्य है और विचार अदृश्य। अंत तक पहुँचते-पहुँचते विचार दृश्य हो जाते हैं और शक्ति का वैभव संदिग्ध। आरंभ में सेना बड़ी है और मनुष्य छोटा। अंत में मनुष्य का प्रश्न बड़ा हो जाता है और सेना का आकार अप्रासंगिक। आरंभ में राज्य बोलता है और प्रश्न अनुपस्थित हैं। अंत में प्रश्न बोलते हैं और राज्य मौन हो जाता है। यही संरचनात्मक उलटाव कविता का गहन राजनीतिक अर्थ निर्मित करता है।
कुल मिलाकर ‘कोसल में विचारों की कमी है’ को सिर्फ़ राजनीतिक कविता कहना पर्याप्त नहीं है। यह भाषा की राजनीति पर लिखी गई कविता भी है। यह दिखाती है कि सत्ता पहले भाषा पर अधिकार स्थापित करती है, फिर इतिहास पर, और अंततः विचारों पर। किंतु कविता यह भी बतलाती है कि भाषा के भीतर ही ऐसे रिक्त स्थान और ऐसे प्रश्न बने रहते हैं जिनसे सत्ता का एकरूपी आख्यान टूटने लगता है। श्रीकांत वर्मा की काव्य-कला की यही ख़ासियत है कि वे किसी राजनीतिक सिद्धांत को कविता में रूपांतरित नहीं करते; वे कविता की संरचना के भीतर ही राजनीति की संरचना को उद्घाटित कर देते हैं। इस प्रकार उनकी काव्य-भाषा ख़ुद एक आलोचनात्मक क्रिया बन जाती है, और शिल्प ही कविता का सबसे विश्वसनीय राजनीतिक वक्तव्य सिद्ध होता है।
सन्दर्भ
बुनियादी पाठ
वर्मा, श्रीकांत. ‘कोसल में विचारों की कमी है’ (कविता). प्रतिनिधि कविताएँ. राजकमल प्रकाशन.दिल्ली
अन्य पुस्तकें
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*प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), हिन्दी विभाग. हैदराबाद विश्वविद्यालय. संपर्क: raviranjan@uohyd.ac.in
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