रसखान हिन्दी साहित्य के भक्तिकाल के प्रमुख कवि थे। उनकी रचनाओं में कृष्ण के प्रति प्रेम, भक्ति, वात्सल्य और ब्रज की प्राकृतिक छटा का अत्यंत मनोहारी चित्रण मिलता है।
उनकी प्रमुख रचनाएँ ‘प्रेमवाटिका’ और ‘सुजान रसखान’ हैं। उनकी भाषा सरल, मधुर तथा भावपूर्ण ब्रजभाषा है। हिन्दी साहित्य में हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक समन्वय के प्रतीक कवियों में उनका विशेष स्थान है।
हम यहां भगवान दास मोरवाल का वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास ‘ मानुष हौं तो’ का अंश प्रकाशित कर रहे हैॅ जो रसखान के जीवन पर आधारित है।
पढ़ने पर ही ज्ञात होगा कि इसका जादू क्या है।
– हरि भटनागर
मानुष हौं तो – भगवानदास मोरवाल
जब गुसाईं विट्ठलनाथ ने रसखान को गोवर्धन में श्रीनाथजी के दर्शन कराए
बहुला श्रीहरे: पत्नी तत्र तिष्ठति सर्वदा l
(बहुला, श्रीहरि की पत्नी, हमेशा वहाँ रहती है)
बहुलावन l ब्रज के बारह वनों में से पाँचवाँ और एक सुन्दर व रमणीय वन। नटनागर श्रीकृष्ण की एक पत्नीस्वरूप भक्त गाय बहुला का निवास स्थल l राधाकुण्ड और वृन्दावन के मध्य स्थित वन, जहाँ एक बार राधिका अपने बनवारी से रूठकर एक कुंज में छिप गयी थी l गोविन्द लीलामृत में वर्णित शुक-सारी के प्रेम-कलह को सुनकर चैतन्य महाप्रभु इतने विह्ल हो गये, कि वे अपने आपको सँभाल नहीं पाये औरमूर्च्छित होकर गिर पड़े। किसी तरह उनके अनुयायी उन्हें होश में लाये, तब कहीं जाकर वे ब्रज-परिक्रमा के लिये आगे बढ़े। श्री वल्लभाचार्य की एक बैठक भी है यहाँ l
रसखान किसी ऐसी जगह की तलाश करने लगा, जहाँ वह कुछ देर आराम कर सके l इसी तलाश के दौरान उसे एक सरोवर दिखायी दिया, और वह उसी तरफ़ बढ़ गया l सबसे पहले रसखान ने सरोवर में स्नान किया l स्नान के बाद वह सरोवर से बाहर आया और एक छोटे-से चबूतरे पर बैठे बुज़ुर्ग व्यक्ति के पास आकर बोला, “बाबा, जे कौन-सो कुण्ड है ?”
“सरोबर कुण्ड l” बुज़ुर्ग व्यक्ति ने बताया l
“वैसे या वन के कनै और कौन-कौन से स्थल हैं ?”
“याँ ते थोड़ी दूर गोबर्धन है l गोबर्धन में कई कुण्ड जैसे राधा कुण्ड, गोबिन्द कुण्ड, स्याम कुण्ड, कुसुम सरोबर, रुद्र कुण्ड और चन्द्र सरोबर है l गोबर्धन के कनै ही एक छोटो-सो गाम है महमूदपुर, जामें चन्द्र सरोबर के किनारे एक छोटी-सी जगह है परसौली l ये जेई चन्द्र सरोबर है जाके के किनारे ब्रजराज ने महारास रची ही l”
“बाबा, या जगह की और ऐसी कहा खासियत है ?” रसखान ने पूछा l
“गोबर्धन में गोबिन्द कुण्ड के किनारे राधा कुण्ड और स्याम कुण्ड के कनै गोबिन्द देव जी को मन्दिर और है l बड़े-बूढ़े बताबै हैं कि गोबिन्द देव जी को ई मन्दिर पाँच हजार साल ते भी पुरानौ है, जिसे कृष्ण जी के परपोते राजा बज्रनाथ ने बनवायो हो l”
“और का-का है या गोवर्धन में ?”
“और तो कहा है भिया, चन्द्र सरोबर के किनारे परसौली में सूरबाबा की कुटिया है l”
“सूSSSर बाबा…!” रसखान को लगा यह नाम उसने पहले भी सुना है l
“मेरौ मतलब है सूरदास जी महाराज l बिचारे अन्धे हैं…गऊ घाट पर बस दिन-रात अपने बीना और खरताल के संग कीर्तन गाते रहबे हैं l”
“ये कहीं वेई सूरदास जी तो न हैं, जो वल्लभाचार्य जी के शिष्य थे और गोवर्धन पर्वत के मन्दिर में श्रीनाथजी की कीर्तन-सेवा करे हैं ?” रसखान को कुमुदवन के सेवायत द्वारा बतायी गयी बात याद आ गयी l
“हाँ, बेई सूरदास जी हैं l याही स्थान पे उनकी बल्लभाचार्य जी से भेंट भयी ही…और बल्लभाचार्य जी ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्छित कर, कृष्णलीला के पद गाने के आदेस दिए हे।”
“छमा चाहता हूँ, एक बात पूछनी है कि सूर बाबा अभी जिन्दा हैं ?” रसखान ने हिचकते हुए बोला l
“बिलकुल जिन्दा और भले-चंगे है महाराज l जभई तो वा दिन ते आज तलक बल्लभाचार्य जी की आज्ञा ते वे श्रीनाथजी के कीर्तन गारे हैं l”
रसखान ने देखा कि जिस समय बुज़ुर्ग हुलसते हुए अपने सूरदास के ज़िन्दा और भला-चंगा होने की बात कर रहा था, उसके चेहरे की ख़ुशी देखते ही बन रही थी l इसके बाद रसखान ने बहुलावन के बारे में और जानकारी हासिल नहीं की l उसने जैसे ही सूरदास के पूरी तरह स्वस्थ होने की सूचना सुनी, लगा उसे इस वन की सारी जानकारी मिल गयी है l
रसखान ने बुज़ुर्ग का बड़े ही भीगे मन से आभार व्यक्त किया, और पूरे उत्साह के साथ गोवर्धन की ओर चल दिया l
बुज़ुर्ग ने जिस तरह गोवर्धन के राधा कुण्ड और श्याम कुण्ड के निकट गोविन्द कुण्ड के किनारे बने पाँच हजार साल पुराने, और कृष्ण के पड़पोते वज्रनाथ द्वारा निर्मित गोविन्ददेव मन्दिर के महात्म्य का बखान किया, रसखान ने सबसे पहले उसी मन्दिर में जाने का निर्णय लिया l सोचा कि जब यहाँ आ ही गया हूँ, तो श्रीनाथजी के दर्शन करने का इससे अच्छा अवसर और क्या हो सकता है l
गिरधारी गिरी गोवर्धन को देखने की हौंस लिये रसखान जैसे ही गोविन्ददेव मन्दिर की सीढ़ियों से होते हुए मन्दिर में घुसने लगा, बाहर मुख्य द्वार पर तैनात सेवक को इस अजनबी के गले में पड़े ताबीज़ को देख कुछ सन्देह हुआ l
सन्देह होते ही सेवायत ने रसखान को यह कहते हुए अन्दर जाने से रोक दिया, “अरे भिया, ऐसे कहाँ घुसो जारो है ?”
“श्रीनाथजी के दरसन करबै जारो हूँ l” रसखान ने सहज भाव से उत्तर दिया l
“पर तू ना जा सके जा मन्दिर में l” सेवक ने रसखान के गले में लटके ताबीज़ पर निगाह गड़ाते हुए बोला l
“पर महाराज क्यों ना जा सकूँ ?”
“या मारे कि हमारे मन्दिर में दूसरे धरम को आदमी प्रबेस ना कर सके l”
“पर तोहे कैसे पतौ कि मैं दूसरे धरम को हूँ ?” रसखान ने सेवक से प्रश्न किया l
“ई जो तेरे गरे में ताबीज लटकौ परो है और जो तेरी बेसभूसा है, याते साफ पतौ चलरी है कि तू काई दूसरौ धरम को आदमी है l”
“पर मेरे ताबीज और या बेसभूसा ते दरसन और भक्ति को कहा लेनो-देनो है ?”
“देख भिया, जादा तीन दो पाँच तो करे मत ! जब कह दी तो कह दी कि मैं तोहे भीतर ना जान दूँगो !”
“ऐसो मत कर महाराज…बड़ी उम्मीद लगाके आयो हूँ…और फिर मैं भी तेरी तरह आदमी हूँ l मैंने भी तेरी तरह उसी औरत की कोख से जनम लियो है जातै तैने लियो है l” तर्क के साथ-साथ रसखान मनुहार करते हुए बोला l
“देख भिया, या दलील ए कहीं और जाके सुनइयो ! पर मैं एक विधर्मी ए अपने मन्दिर में ना घुसने दूँगो !”
“ऐसो मत कर ! मैं तेरे हाथ जोडूँ मोहे मेरे श्रीनाथजी के दर्शन कर लेने दे !” रसखान इस बार सचमुच हाथ जोड़ते हुए रिरियाया l
“लगे है तू ऐसे ना मानेगो !” इतना कह सेवक ने रसखान को सीढियों से धक्का दे दिया l
रसखान को इसकी बिलकुल उम्मीद नहीं थी l वह सेवक के इस व्यवहार पर व्यथित तो बहुत हुआ, किन्तु कहा कुछ नहीं l मगर उसने जैसे दृढ़ निश्चय कर लिया कि कुछ भी हो जाए, वह श्रीनाथ के दर्शन ज़रूर करेगा l उसने उसी समय अपने आपको कृष्ण सखा के हवाले कर अन्न-जल त्याग दिया l
रसखान जैसे ही जल-अन्न त्याग कर, गोविन्ददेव मन्दिर की सीढ़ियों पर बैठा, मन्दिर का सेवायत घबरा गया l उसने उसी समय सेवक को बुलाया और इसके बारे में पूछा l
सेवक ने रसखान को मन्दिर में प्रवेश करने से रोकने का कारण बताते हुए कहा, “सेवायत जी, ई तो मन्दिर चलाने बारौन को ही आदेस है कि दूसरे धरम के आदमी ए परबेस ना देनो है…और फिर ई तो मलेच्छ मेरौ मतलब है तुरक है l”
“तुरक है ! तोहे कैसे पतौ ?” सेवायत ने हैरानी के साथ पूछा l
“याने गरे में ताबीज जो पहन राखो है l”
“चल झूठे !” सेवायत ने सेवक को हल्के-से डाँटते हुए कहा l
“मइया की सौं सेवायत जी, मैं काई कू झूठ बोलूँगो l मेरे ऊपर भरोसा ना है तो खुदई जाके देख लेओ l”
लेकिन सेवायत को अपने सेवक के कहे पर यक़ीन नहीं हुआ l इसीलिए पास खड़े एक कर्मचारी से बोला, “हरिराम, भिया तू जाके देख ! मोहे ना है यापे तनिक भी अकीन…मेरौ ससुर चारूँ पहर तो भाँग के अंटा में चूर रहबे है l”
अपने सेवायत का आदेश सुन, कर्मचारी बाहर जाने लगा तो जाते-जाते सेवायत उसे हिदायत देते हुए बोला, “और सुन, वाकै गरे ए जरूर ध्यान ते देखके अइयो !”
कर्मचारी ने अधिक समय नहीं लिया l वह लगभग हाँफ़ते हुए वापस आया और हाँफते हुए बताया, “सेवायत जी, सही बात है l याने तो गरे में सच्ची में ताबीज पहन राखौ है l”
“जाकौ मतलब है ई सचमुच तुरक ही है l” अपने कर्मचारी से सहमत होते हुए सेवायत बोला l
पूरे गोवर्धन में हड़कम्प मच गया l देखते-देखते मन्दिर के बाहर लोग एकत्रित हो गये l ऐसे कृष्ण प्रेमी को देखकर जिसने श्रीनाथजी के दर्शन के लिये अन्न-जल त्याग दिया, सारा गोवर्धन स्तब्ध रह गया l मन्दिर के सेवायत ने सोचा कि यह दर्शनाभिलाषी ऐसे ही प्रभावित करने के लिये यह स्वांग रच रहा है l मगर जब भूखे-प्यासे रसखान ने एक दिन और एक रात निकाल दी, तो मन्दिर के सेवायतों में बेचैनी व्याप गयी l तुरन्त मन्दिर के सारे सेवायत-कर्मचारी इकट्ठा हुए, और इस समस्या का उपाय सोचने लगे l
मन्दिर के सेवायत ने पहले एक लम्बी साँस ली, और फिर हुंकार भर माथे पर चू आये पसीने को पोंछते हुए बोला, “फिर तो जा बात की इत्तिला प्रभु विट्टलनाथ जी कू देनी बहोत जरूरी है, बरना ऐसो ना होए कि हमारी जान कू कोई आफत खड़ी हे जाए l” इसके बाद एक हल्की-सी साँस लेते हुए वह अपने उसी कर्मचारी की तरफ़ पलटा, “हरिराम, भिया ऐसोकर तू अभई गोकुल कू निकस और प्रभु जी कू सारी बात जाकै बता दे l फिर वे जो आज्ञा देंगे हम वोई करेंगे l जा फटाफट तैयार होके निकस जा देर मत कर ! और हाँ, संझा तलक हर हालत में लौट आनो है बरना ऐसो ना हो कि मेरी जान कू कोई नयो बखेरा खड़ो हे जाए !”
अपने सेवायत का आदेश सुन हरिराम उसी समय गोकुल के लिये रवाना हो गया l इसके बाद सारे लोग उठकरबाहर आये और गोकुल से मिलने वाले आदेश से पहले वे रसखान को मनाने का प्रयत्न करने लगे l लेकिन रसखान अपनी ज़िद पर अड़ा रहा, कि वह अपने गोपाल के दर्शन किये बिना यहाँ से हिलेगा तक नहीं, चाहे उसे गोविन्ददेव मन्दिर के दर पर अपने प्राण ही क्यों न त्यागने पड़ें l रसखान की इस ज़िद को सुन सब निराश हो वापस लौट आये, और इन्तज़ार करने लगे हरिराम का गोकुल से लौटने का l
पूरा मन्दिर बेसब्री से हरिराम की प्रतीक्षा करने लगा l जैसे-जैसे साँझ होने लगी, वैसे-वैसे सभी की व्यग्रता और बेचैनी बढ़ने लगी l आँखें गोकुल से आने वाले रास्ते पर टिक गयीं l सेवायत ने कब संध्या आरती की और कब शयन आरती का समय हो गया, हरिराम के आने की प्रतीक्षा में उसे पता ही नहीं चला l शयन आरती के बाद तो सभी मन्दिर के बाहर सीढ़ियों पर आकर बैठ गये, और इन्तज़ार करने लगे हरिराम का l रह-रह कर सभी की आँखें कभी गोकुल से आने वाले अँधेरे रास्ते से गुज़रते साये को टटोलतीं, तो कभी सबसे नीचे वाली सीढ़ी के एक तरफ लगभग बेसुध पड़े रसखान पर आकर टिक जातीं l जब-जब सेवायत की नज़र मन्दिर के बाहर जलते दीयों की रोशनी में भीगे रसखान पर पड़ती, उसकी बेचैनी बढ़ जाती l इस बीच एक-एक कर मन्दिर के अधिकतर सेवक और कर्मचारी वहाँ से चले आये l जब लगा कि रात बहुत हो गयी है और हरिराम के आने की अब कोई उम्मीद नहीं है, तो सेवायत भी उठकरसोने के लिये चला आया l
तीसरे दिन प्रातः काल की धूप आरती से निवृत्त हो सेवायत जैसे ही किसी काम से बाहर निकला, तो देखा धूल के गुबार में लिपटा छोटा-सा समूह मन्दिर की ओर बढ़ा आ रहा है l उसके बीच चल रहे घोड़े पर बैठे व्यक्ति के चरणों में लेटते लोगों को देख उसे एक पल नहीं लगा समझने में l वह उसी समय गिरता-पड़ता समूह के बीच चल रहे घोड़े के पास पहुँच गया l
जैसे-जैसे घोड़े की सवारी और उसके पीछे चला आ रहा समूह गोविन्ददेव मन्दिर के समीप आने लगा, वैसे-वैसे मन्दिर के भीतर और बाहर यह ख़बर आग की तरह फ़ैल गयी कि गोकुल से विट्ठलनाथ जी चले आ रहे हैं l गोवर्धनवासियों को लगा कि वे जतिपुरा श्रीजी की राजभोग सेवा के लिये जा रहे हैं l क्योंकि गोकुल ही नहीं पूरा गोवर्धन जानता है कि वे जतिपुरा में गिरिराजजी के यहाँ श्रीजी की सेवा करना कभी नहीं भूलते। सेवायत को विश्वास नहीं हो रहा है कि हरिराम के साथ ख़ुद विट्ठलनाथ जी भी चले आएँगे l
गोविन्ददेव मन्दिर से कुछ क़दम पहले धूल के गुबार में लिपटा समूह रुक गया l समूह के बीच चल रहे घोड़े की लगाम अब सेवायत ने थाम ली, और घोड़े को लेकर वह मन्दिर के ठीक सामने आ गया l विट्ठलनाथ जी घोड़े से उतरे तो सेवायत उन्हें, मन्दिर की उस अन्तिम सीढ़ी के पास ले आया, जहाँ रसखान अब भी बेसुध-सा पड़ा हुआ है l
“प्रभु, जे है ऊ आदमी !” सेवायत विट्ठलनाथ जी को रसखान के पास लाते हुए बोला l
विट्ठलनाथ जी देर तक मन्दिर की सीढ़ियों पर बेसुध पड़े व्यक्ति को देखते रहे l पपड़ाए होंठ, अन्दर धँसी आँखें और निर्जीव देह को देख वे समझ गये कि जैसा हरिराम ने बताया था, वह बिलकुल सत्य है l नीचे बेसुध पड़े रसखान को उन्होंने धीरे-से जैसे ही छुआ, स्पर्श पाते ही रसखान की देह में हल्की-सी जुम्बिश हुई l गुसाईं विट्ठलनाथ जी इसके बाद रसखान के पास बैठ गये, और उसे दोनों हाथों से पकड़ यह कहते हुए सीधा किया, “भिया उठ !”
कानों में इन शब्दों के पड़ते ही रसखान ने धीरे-से अपनी आँखें खोलीं, और फिर विट्ठलनाथ जी की तरफ़ बड़ी निरीहिता के साथ देख, फीकी हँसी हँसते हुए बोला-
देस बिदेस के देखे नरेसन रीझि की कोऊ न बूझ करैगो ,
तातें तिन्है तजि जान गिर् यो गुन सौ गुन औगुन गाँठि परैगो l
बाँसुरीवारो बड़ो रिसवार है स्याम जो नैकु सुढ़ार ढरैगो ,
लाड़लो छैल वही तौ अहीर को पीर हमारे हिये की हरैगो ll
विट्ठलनाथ जी ने जैसे ही एक अजनबी, वह भी ताबीज़ धारण करने वाले विधर्मी के मुँह से ये शब्द सुने, वे अवाक् उसकी तरफ़ ताकते रह गये l वे तो यहाँ आने से पहले यही समझते रहे कि यह विधर्मी कोई मामूली व्यक्ति है l लेकिन यह तो वैसा नहीं है l
“भिया का नाम है तेरौ ?” विट्ठलनाथ जी ने सहजता के साथ पूछा l
“प्रभु, नाम तो मेरौ सैयद इब्राहीम है, पर सारे ब्रजवासी मोहे रसखान कहके बुलाबै हैं l”
“और आयो कहाँ ते है ?”
इस सवाल को सुन रसखान एक बार तो चुप हो गया l फिर न जाने क्या सोचकर बोला, “प्रभु दिल्ली ते आयो हूँ l”
“नाम ते तो ऐसो लगे है जैसे काई अच्छे पठान खानदान ते तेरो रिस्तो होए ?”
“कछु भी समझ लो प्रभु l”
“तो भिया, तेरे ऊपर ऐसी कहा मजबूरी आ पड़ी, जो ऐसी अच्छी-खासी जिन्दगी ए छोड़के या ब्रज में धक्का खातो डोलरो है ?”
रसखान ने इस बार अपनी आँखें पूरी खोलीं, और फिर निढ़ाल देह को सीधा कर एक वक्र मुस्कान बिखेरते हुए बोला-
देखि गदर हित साहिबी, दिल्ली नगर मसान।
छिनहिं बादसा-बंस की, ठसक छाँड़ि रसखान ॥
इस दोहे को सुन विट्ठलनाथ जी रसखान की विद्गधता को देखते रह गये l अब उन्हें पूरा विश्वास हो गया कि निश्चित ही यह कोई मामूली व्यक्ति नहीं है l उन्होंने रसखान को सहारा देते हुए खड़ा किया, “चल ठाढ़ो हो ! चिन्ता मती कर l जे बाँसुरीवारो साँची में बड़ो रिसवार है l जेई तेरे हिये की पीर हरैगो l”
इसके बाद विट्ठलनाथ जी ने रसखान को सबसे पहले गोविन्द कुण्ड में स्नान कराया l स्नान के बाद वे उसे लेकर वापस मन्दिर के पास लाये और उससे आग्रह किया, “रसखान, अब ऐसो है कछु खा-पी ले ! सुनी है तू कई दिनाँ ते एकदम निराहार है !”
“ना, प्रभु सबते पहले मैं गोबिन्द देवजी के मन्दिर में अपने वा नन्दकुमार के दरसन करुंगो, जाके दरसन कू मेरे ये नैना तरस रह्ये हैं l”
“ठीक है जैसी तेरी इच्छा l चल, पहले तू वाकै दरसन ही कर ले !” इसके बाद विट्ठलनाथ जी सेवायत की ओर मुड़े और उसे आदेश देते हुए बोले, “सेवायत जी, आप जरा याकै संग चले जाओ !”
रसखान को श्रीजी के दर्शन कराने के बाद विट्ठलनाथ जी ने स्वयं रसखान के साथ बैठकर भोजन किया l भोजन के उपरान्त जब विट्ठलनाथ जी वहाँ से प्रस्थान करने लगे, तो जाते-जाते बोले, “रसखान, मन्दिर के या द्वारपाल ते जाने-अनजाने में जो बेअदबी भई है, बाकी तरफ ते मैं छमा माँगरो हूँ l” इसके बाद विट्ठलनाथ जी के दोनों हाथ आपसे में जुड़ते चले गये l
इतना सुनते ही रसखान विट्ठलनाथ जी के चरणों में गिर पड़ा, और रोते हुए बोला, “प्रभु, मोहे अपने इन चरणन की धूल बना लो !”
“ऐसो है जब तेरो मन करे गोकुल चलो अइयो !”
रसखान कुछ नहीं बोला l भाव-विभोर स्नेहिल नेत्रों से वह घोड़े पर सवार होने के बाद गोविन्ददेव मन्दिर से दूर जाते विट्ठलनाथ जी को अपलक निहारता रहा l
इधर विट्ठलनाथ जी ने मन्दिर से प्रस्थान किया, उधर रसखान भी यह कहते हुए वहाँ से चल पड़ा-
प्रेम निकेतन श्रीबनहिं, आइ गोवर्धन धाम।
लह्यौं सरन जित चाहिं कै, जुगल-सरूप ललाम।।

भगवानदास मोरवाल
दिल्ली, राजस्थान व उत्तर प्रदेश की सीमाओं में बँटे और हरियाणा के काला पानी कहे जानेवाले मेवात के जिला नूँह के क़स्बे नगीना में 23 जनवरी, 1960 को जन्मे समकालीन कथा-साहित्य का एक चर्चित नाम lकाला पहाड़, रेत,नरक मसीहा, हलाला सुर बंजारन, वंचना, ख़ानज़ादा सहित अबतक बारह उपन्यास प्रकाशित lहिन्दी अकादमी विशिष्ट योगदान सम्मान,अज्ञेय शब्द सृजन सम्मान, कर्तृत्व समग्र सम्मान,वनमाली कथा सम्मान, स्पन्दन कृति सम्मान, अन्तर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान,कथाक्रम सम्मानसहित कई सम्मान / पुरस्कारों से सम्मानित.
सम्पर्क: WZ-745G, दादा देव रोड, नजदीक बाटा चौक, गली नं. 2, पालम, नयी दिल्ली-110045मो.: 9971817173; ई-मेल: bdmorwal@gmail.com
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