रचना समयकी इस प्रस्तुति में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन द्वारा कुँवर नारायण की कविता ‘घर रहेंगेका पुनर्पाठ प्रकाशित किया जा रहा है। इसमें ‘घर रहेंगे’ को मृत्युसमय और मनुष्य के अस्तित्व के प्रश्नों के बीच रखकर पढ़ा गया है। कविता में ‘घर रहेंगेहमीं उनमें रह न पाएँगे’ से आरम्भ होने वाला स्थायित्व और नश्वरता का द्वंद्व धीरे-धीरे ‘समय’, ‘मृत्यु’, ‘स्वप्न’, ‘भीड़’, ‘प्यार’ और ‘संसृति’ जैसे बिम्बों के माध्यम से व्यापक दार्शनिक अर्थ ग्रहण करता है। आलेख की विशेषता यह है कि मृत्यु को जीवन के निषेध के रूप में देखने के बजाय उसे आत्मबोध और जीवन के आशय की तलाश का अवसर माना गया है।

आलेख में हाइडेगरसार्त्र और कामू के अस्तित्ववादी चिन्तन के साथ बर्गसाँ की ‘अवधि’, मौरिस हाल्बवाक्स की ‘सामूहिक स्मृति’, पॉल रिकोयर की समय सम्बन्धी अवधारणाओं तथा टी. एस. एलियट की समय-चेतना के सन्दर्भ में घर रहेंगेकविता की अर्थ की परतों को खोलने का प्रयास किया गया है। साथ ही ‘घर’ को स्मृति और आत्मीयता के स्थल तथा ‘प्यार’ को नश्वर जीवन के भीतर प्रामाणिक अर्थ की सम्भावना के रूप में देखा गया है।

यह आलेख कुँवर नारायण की इस कविता की दार्शनिकता को उसके मानवीय और सामाजिक सरोकारों से जोड़ते हुए उसके पाठ को एक व्यापक अस्तित्वगत परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है।

हरि भटनागर

घर रहेंगे’: कुँवर नारायण की कविता में मृत्युबोध और अर्थ की अस्तित्ववादी तलाश

रवि रंजन

कुँवर नारायण की ‘घर रहेंगे’ कविता मनुष्य के जीवन की उस सच्चाई को सामने लाती है कि संसार हमारे जाने के बाद भी बना रहता है, लेकिन हम उसमें हमेशा नहीं रह सकते। ‘घर रहेंगे, / हमीं उनमें रह न पाएँगे’ में घर मनुष्य की अस्थायी उपस्थिति और संसार की निरन्तरता का प्रतीक बन जाता है। इसी तरह ‘समय होगा, हम अचानक बीत जाएँगे’ मनुष्य को समय के भीतर जीने और एक दिन समाप्त हो जाने वाले प्राणी के रूप में प्रस्तुत करता है।

यहीं से कविता में जीवन और मृत्यु के अर्थ का प्रश्न उठता है। यदि जीवन सीमित है और मृत्यु निश्चित है, तो मनुष्य अपने जीवन को अर्थपूर्ण कैसे बनाए? ‘अनर्गल ज़िंदगी ढोते’ हुए ‘एक आशय’ तक पहुँचने की बात इसी तलाश को व्यक्त करती है। मार्टिन हाइडेगर का मानना है कि मनुष्य अपने जीवन को तब अधिक गहराई से समझता है, जब उसे यह एहसास होता है कि उसका जीवन सीमित है और एक दिन समाप्त होगा। मृत्यु का यह बोध उसे अपने जीवन, अपने चुनावों और अपने सम्बन्धों के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है। कुँवर नारायण की कविता में भी मृत्यु केवल जीवन का अन्त नहीं है; उसका बोध मनुष्य को यह सोचने के लिए बाध्य करता है कि उसने जो जीवन पाया है, उसे किस अर्थ में जिया है।

कविता में इस अर्थ की सम्भावना ‘प्यार’ के रूप में सामने आती है—‘कहीं गहरा, / कहीं सच्चा, / मैं समझता—प्यार’। लेकिन कवि प्रेम को अमरता का साधन नहीं मानता। ‘मेरी अमरता की नहीं देंगे ये दुहाई’ कहकर वह स्पष्ट करता है कि प्रेम मृत्यु को रोक नहीं सकता। फिर भी वह जीवन को अधिक सच्चा और अर्थपूर्ण बना सकता है। इसीलिए कविता का मूल प्रश्न केवल यह नहीं है कि मनुष्य क्यों मरता है, बल्कि यह भी है कि मृत्यु को जानते हुए वह कैसे जिए।

अन्त में ‘राख-सी साँझ’ और ‘बुझे दिन’ जीवन के समाप्त होने का संकेत देते हैं, जबकि ‘संसृति का अपव्यय दुहराएगी’ बताता है कि मनुष्य के चले जाने के बाद भी संसार अपनी गति से चलता रहेगा। इस प्रकार ‘घर रहेंगे’ नश्वरता को जीवन की निरर्थकता नहीं मानती। कविता का संकेत यह है कि मनुष्य अमर नहीं हो सकता, लेकिन अपने सीमित जीवन में प्रेम, आत्मीयता और अर्थ की खोज के द्वारा अपने होने को सार्थक बना सकता है। मृत्यु जीवन की सीमा है, लेकिन उसी सीमा का बोध मनुष्य को अपने जीवन के अर्थ की तलाश के लिए प्रेरित करता है।

कविता का मूल पाठ द्रष्टव्य है:

घर रहेंगे

 घर रहेंगे, हमीं उनमें रह न पाएँगे :

समय होगा, हम अचानक बीत जाएँगे :

अनर्गल ज़िंदगी ढोते किसी दिन हम

एक आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जाएँगे।

मृत्यु होगी खड़ी सम्मुख राह रोके,

हम जगेंगे यह विविधता, स्वप्न, खो के,

और चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम

अचानक जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके।

प्रकृति औ’ पाखंड के ये घने लिपटे

बँटे, ऐंठे तार—

जिनसे कहीं गहरा, कहीं सच्चा,

मैं समझता—प्यार,

मेरी अमरता की नहीं देंगे ये दुहाई,

छीन लेगा इन्हें हमसे देह-सा संसार।

राख-सी साँझ, बुझे दिन की घिर जाएगी :

वही रोज़ संसृति का अपव्यय दुहराएगी।

कुँवर नारायण

‘घर रहेंगे’ कविता अपने छोटे-से कलेवर में समय, मृत्यु, स्मृति, मनुष्य की अनुपस्थिति, प्रकृति, सामाजिक पाखंड और प्रेम की सम्भावना को एक साथ रखती है। कविता का आरम्भ ही एक ऐसी विडम्बना से होता है जिसमें ‘घर’ और ‘मनुष्य’ के अस्तित्व अलग-अलग दिशाओं में चले जाते हैं—‘घर / रहेंगे, / हमीं उनमें रह न पाएँगे।’ यहाँ ‘घर’ केवल ईंट-पत्थर की बनी हुई जगह नहीं है; वह मनुष्य की उपस्थिति, स्मृति, सम्बन्ध और जीवन-व्यवस्था का सांस्कृतिक रूपक बन जाता है। घर का बने रहना और मनुष्य का उसमें न रह पाना उस बुनियादी असमानता को सामने लाता है जिसमें वस्तुएँ मनुष्य से अधिक टिकाऊ दिखाई देती हैं। मनुष्य अपने जीवन, श्रम, प्रेम और स्मृतियों से जिन जगहों को अर्थ देता है, उन्हीं जगहों से एक दिन स्वयं अनुपस्थित हो जाता है। इस अर्थ में कविता की पहली पंक्ति ही स्थायित्व और नश्वरता के बीच एक गहरी दार्शनिक दूरी निर्मित करती है।

‘घर’ के बाद ‘समय’ का आना कविता की अर्थ-योजना को और व्यापक करता है—‘समय / होगा, हम अचानक बीत जाएँगे।’ यहाँ ‘समय होगा’ और ‘हम बीत जाएँगे’ के बीच जो व्याकरणिक सम्बन्ध है, वही कविता का दार्शनिक तनाव भी है। सामान्यतः हम कहते हैं कि समय बीतता है और मनुष्य समय में जीता है, लेकिन कुँवर नारायण इस सम्बन्ध को उलट देते हैं। समय अपनी जगह बना रहता है; बीतने वाला मनुष्य है। इससे मनुष्य की स्थायित्व-सम्बन्धी धारणा पर प्रश्न उठता है। हम अपने जीवन को निरन्तरता के रूप में अनुभव करते हैं, लेकिन व्यापक काल-परिप्रेक्ष्य में हमारा जीवन एक क्षणिक उपस्थिति भर है। ‘अचानक’ शब्द इस अनुभव को और तीखा करता है। जीवन चाहे कितना लम्बा क्यों न हो, मृत्यु के सामने पीछे मुड़कर देखने पर वह अचानक समाप्त हो गया-सा लगता है।

कविता में समय का यह अनुभव केवल मृत्यु का बोध नहीं है, बल्कि जीवन के अपव्यय का बोध भी है। ‘अनर्गल / ज़िंदगी ढोते किसी दिन हम / एक / आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जाएँगे।’ यहाँ ‘ज़िंदगी ढोना’ एक असाधारण रूपक है। जीवन को जीने के बजाय उसे ‘ढोना’ उस अस्तित्वगत थकान को व्यक्त करता है जिसमें मनुष्य अपने जीवन की सार्थकता को लगातार टालता रहता है। ‘अनर्गल’ जीवन वह जीवन है जिसमें दिशा, आशय और आत्मबोध का अभाव है। विडम्बना यह है कि मनुष्य किसी ‘आशय’ तक पहुँचता भी है तो ‘सहसा बहुत थक’ जाता है। यानी जीवन का अर्थ खोजने की प्रक्रिया स्वयं जीवन-ऊर्जा को क्षीण करती जाती है। यहाँ कविता अस्तित्ववाद के उस प्रश्न के निकट पहुँचती है कि मनुष्य जिस अर्थ की तलाश में जीवन व्यतीत करता है, क्या वह अर्थ अन्ततः जीवन को अर्थवान बनाता है या अर्थ की खोज ही जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना बन जाती है?

‘एक आशय’ का प्रयोग भी ध्यान देने योग्य है। कवि ‘सत्य’, ‘अर्थ’ या ‘मुक्ति’ जैसे किसी निश्चित और पूर्ण शब्द का इस्तेमाल नहीं करता, बल्कि ‘आशय’ कहता है। आशय किसी अन्तिम निष्कर्ष का नाम नहीं है; वह अर्थ की सम्भावना है। इसीलिए कविता किसी दार्शनिक समाधान की घोषणा नहीं करती। वह मनुष्य को उस क्षण तक ले जाती है जहाँ वह अपने जीवन को पीछे से देखने लगता है और पाता है कि जिस अर्थ की तलाश में वह चलता रहा, वहाँ पहुँचते-पहुँचते वह स्वयं थक चुका है।

इसके बाद मृत्यु का प्रवेश होता है—‘मृत्यु / होगी खड़ी सम्मुख राह रोके।’ मृत्यु यहाँ किसी दूरस्थ सम्भावना की तरह नहीं, बल्कि रास्ता रोककर खड़ी सत्ता के रूप में आती है। ‘सम्मुख’ और ‘राह रोके’ दोनों शब्द मृत्यु को सक्रिय उपस्थिति प्रदान करते हैं। जीवन जिस दिशा में आगे बढ़ रहा था, मृत्यु उसी मार्ग पर अवरोध बनकर उपस्थित है। लेकिन कविता मृत्यु को केवल अन्त के रूप में नहीं देखती। मृत्यु के सामने मनुष्य को एक ऐसा बोध प्राप्त होता है जो जीवन में सम्भवतः दबा हुआ था—‘हम / जगेंगे यह विविधता, / स्वप्न, खो के।’ यहाँ ‘जगना’ एक उलटी संरचना रचता है। मनुष्य जीवन में जागा हुआ है, लेकिन मृत्यु के निकट पहुँचकर उसे पहली बार अपने जीवन की ‘विविधता’ का बोध होता है। और यह बोध ‘स्वप्न’ खोने के बाद आता है।

‘स्वप्न’ यहाँ केवल नींद में देखी जाने वाली छवि नहीं है। यह मनुष्य की आकांक्षाओं, भविष्य की योजनाओं, उपलब्धियों और अपने लिए बनाए गए मानसिक संसार का संकेत है। जीवन में मनुष्य स्वप्नों के सहारे भविष्य की ओर बढ़ता है। मृत्यु उन स्वप्नों को एक साथ अर्थहीन कर देती है और तब उसे जीवन की वास्तविक विविधता दिखाई देती है। इस तरह कविता में जागरण और स्वप्न का सम्बन्ध उलट जाता है। स्वप्न में रहते हुए मनुष्य सोया हुआ है और स्वप्न खोने के बाद जागता है। यह जागरण मृत्यु का जागरण है, लेकिन इसका अर्थ निराशा नहीं है; यह अस्तित्व के प्रति एक देर से प्राप्त हुई सजगता है।

‘चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम / अचानक / जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके।’ इन पंक्तियों में व्यक्तिगत अस्तित्व और सामाजिक जीवन के बीच की दूरी उभरती है। ‘भीड़’ आधुनिक सामाजिक जीवन का प्रतीक है, जहाँ लोग लगातार एक-दूसरे के सम्पर्क में हैं, परन्तु यह सम्पर्क जरूरी नहीं कि आत्मीयता में बदल जाए। ‘कंधे रगड़ना’ शारीरिक निकटता का बिम्ब है, जबकि ‘सदियों अलग होके’ अस्तित्वगत दूरी का। एक ही शहर, एक ही समाज और एक ही समय में रहने वाले मनुष्य भीतर से एक-दूसरे से कितने दूर हो सकते हैं, कविता इसे बहुत कम शब्दों में व्यक्त करती है। यहाँ ‘सदियों’ का प्रयोग भी अर्थवान है। मृत्यु दो व्यक्तियों के बीच केवल स्थानिक दूरी नहीं बनाती; वह ऐसी कालगत दूरी पैदा करती है जिसे सामान्य मानवीय समय में पाट पाना सम्भव नहीं।

कविता का एक प्रभावी सौन्दर्य उसके शब्द-विन्यास में है। ‘घर’, ‘समय’, ‘मृत्यु’, ‘हम’, ‘और’, ‘अचानक’, ‘प्रकृति’, ‘मैं’, ‘मेरी’, ‘छीन’ आदि शब्दों को अलग-अलग पंक्तियों में रखकर कवि ने अर्थ के साथ दृश्यात्मक तनाव भी पैदा किया है। ये शब्द अकेले खड़े होकर पाठक के सामने एक-एक अस्तित्वगत संकेत की तरह आते हैं। विशेषतः ‘हम’ और ‘मैं’ के बीच क्रमिक बदलाव उल्लेखनीय है। आरम्भ में ‘हमीं’, ‘हम’ और ‘हम’ का सामूहिक अनुभव है, लेकिन आगे जाकर कविता ‘मैं’ तक पहुँचती है—‘मैं / समझता—प्यार।’ यह बदलाव सामूहिक अस्तित्व से निजी अनुभूति की ओर जाने का संकेत है। मृत्यु की सार्वभौमिकता के बीच प्रेम व्यक्तिगत पहचान और आत्मीयता का एक सम्भावित आधार बनता है।

‘प्रकृति / औ’ पाखंड के ये घने लिपटे / बँटे, ऐंठे / तार—’ कविता यहाँ एक जटिल सामाजिक-सांस्कृतिक रूपक रचती है। ‘तार’ सम्बन्धों के भी हो सकते हैं, संचार के भी और तनाव के भी। वे ‘घने लिपटे’ हैं, ‘बँटे’ हैं और ‘ऐंठे’ हैं। इन विशेषणों में आधुनिक जीवन की उलझनें दिखाई देती हैं। प्रकृति और पाखंड का एक साथ आना भी विचारोत्तेजक है। मनुष्य जिस सामाजिक संसार में रहता है, उसमें प्राकृतिक जीवन और निर्मित सामाजिक व्यवहार के बीच कोई सरल विभाजन नहीं रह गया है। प्रकृति की सहजता के ऊपर पाखंड की परतें चढ़ गई हैं। सम्बन्ध अब सीधे, पारदर्शी और आत्मीय नहीं रह गए; वे सामाजिक भूमिकाओं, स्वार्थों और दिखावे से उलझे हुए हैं।

इसीलिए ‘मैं / समझता—प्यार’ कविता में एक प्रतिरोधी अवधारणा के रूप में सामने आता है। कवि प्रेम को इन उलझे हुए तारों से ‘कहीं गहरा, / कहीं सच्चा’ मानता है। ‘गहरा’ और ‘सच्चा’ यहाँ प्रेम के दो अलग आयाम खोलते हैं। गहराई बताती है कि प्रेम सतही सामाजिक व्यवहार से नीचे उतरकर मनुष्य के अस्तित्व तक पहुँचता है; ‘सच्चा’ बताता है कि वह पाखंड और कृत्रिमता से अलग किसी प्रामाणिक सम्बन्ध की सम्भावना रखता है। लेकिन कवि प्रेम को कोई रोमानी समाधान नहीं बनाता। प्रेम भी मृत्यु और नश्वरता से मनुष्य को बचा नहीं सकता।

‘मेरी / अमरता की नहीं देंगे ये दुहाई, / छीन / लेगा इन्हें हमसे देह-सा संसार।’ इन पंक्तियों में कविता का स्वर फिर बदलता है। ‘अमरता’ की मानवीय आकांक्षा पर यहाँ व्यंग्यात्मक प्रश्न उठता है। प्रेम को भी अमरता का प्रमाण नहीं बनाया जा सकता। संसार ‘देह-सा’ है और देह की तरह नश्वर है। यह उपमा कविता की पूरी दार्शनिक संरचना को एक जगह समेट देती है। जिस तरह देह समय के अधीन है, उसी तरह संसार भी। मनुष्य संसार से अपने सम्बन्धों को अमर समझना चाहे, लेकिन संसार स्वयं नश्वर है। इसीलिए प्रेम की सच्चाई और उसकी अमरता दो अलग बातें हैं। प्रेम सच्चा हो सकता है, गहरा हो सकता है, लेकिन उसकी उपस्थिति को किसी स्थायी भौतिक रूप की गारंटी नहीं मिलती।

यहाँ ‘अमरता की नहीं देंगे ये दुहाई’ में ‘दुहाई’ शब्द भी खास अर्थ रखता है। दुहाई किसी प्रमाण या घोषणा की माँग करती है। कवि ऐसी घोषणा से बचता है। कविता मृत्यु के सामने प्रेम को रखती है, लेकिन प्रेम को मृत्यु का निषेध नहीं बनाती। यही संयम कविता को भावुकता से बचाता है। प्रेम मृत्यु को समाप्त नहीं करता; वह मृत्यु के बावजूद मनुष्य के अनुभव को अर्थ देता है।

अन्तिम दो पंक्तियाँ—‘राख-सी / साँझ, बुझे दिन की घिर जाएगी : / वही / रोज़ संसृति का अपव्यय दुहराएगी।’—पूरी कविता को फिर से समय और क्षय की ओर ले जाती हैं। ‘राख-सी साँझ’ केवल शाम का दृश्य नहीं है। राख किसी जल चुके पदार्थ का अवशेष है। इसीलिए ‘राख-सी साँझ’ बीते हुए दिन के अवशेष का बिम्ब बनती है। ‘बुझे दिन’ में प्रकाश के समाप्त होने के साथ जीवन-ऊर्जा के क्षय का संकेत है। दिन का बुझना व्यक्ति के जीवन के बुझने से जुड़ जाता है।

लेकिन अन्तिम पंक्ति में ‘संसृति’ का प्रयोग कविता को निजी मृत्यु से सामूहिक जीवन की ओर वापस ले आता है। मनुष्य चले जाते हैं, घर रहते हैं; व्यक्ति बीत जाते हैं, समय रहता है; स्वप्न खो जाते हैं, संसार चलता रहता है। यही ‘संसृति का अपव्यय’ है—जीवन का बार-बार वही चक्र दोहराना, निर्माण और विनाश, उपस्थिति और अनुपस्थिति, मिलना और बिछुड़ना। ‘दुहराएगी’ में चक्राकार समय की अनुभूति है। एक दिन समाप्त होता है, फिर दूसरा दिन आता है; एक पीढ़ी जाती है, दूसरी आती है; मनुष्य अपने जीवन को अर्थ देने की कोशिश करता है और फिर उसकी जगह कोई दूसरा मनुष्य वही प्रक्रिया दोहराता है।

इस अन्तिम बोध को बर्गसाँ (Henri Bergson) की ‘अवधि’ (Duration) की विशिष्ट अवधारणा के सन्दर्भ में भी पढ़ा जा सकता है, यद्यपि कविता को सीधे बर्गसाँ की दार्शनिक व्याख्या में सीमित करना उचित नहीं होगा। यहाँ समय घड़ी की तरह केवल आगे नहीं बढ़ता; वह अनुभवों, स्मृतियों और पुनरावृत्तियों के रूप में मनुष्य के भीतर भी चलता है। दूसरी ओर, कविता का ‘अचानक बीत जाना’ उस व्यक्तिगत समय और व्यापक काल के बीच का अन्तर दिखाता है। व्यक्ति के लिए जीवन अनुभवों से भरा हुआ है, लेकिन संसार की दृष्टि से वह एक क्षणिक घटना है।

इसी तरह मौरिस हाल्बवाक्स की ‘सामूहिक स्मृति’ की अवधारणा के आलोक में ‘घर’ को स्मृति के सामाजिक स्थल के रूप में देखा जा सकता है। मनुष्य अनुपस्थित हो सकता है, लेकिन घर उसकी उपस्थिति के चिह्नों को धारण कर सकता है। इस अर्थ में घर का ‘रहना’ वस्तुतः स्मृति का रहना भी है। घर व्यक्ति के चले जाने के बाद उसके जीवन को किसी न किसी रूप में संरक्षित रखता है। परन्तु कविता इस संरक्षण को अमरता नहीं मानती। स्मृति मनुष्य की अनुपस्थिति को दर्ज कर सकती है, उसे समाप्त नहीं कर सकती।

पॉल रिकोयर (Paul Ricoeur) के सन्दर्भ में कविता में ‘स्मृति’, ‘समय’ और ‘कथा’ के सम्बन्ध को भी समझा जा सकता है। मनुष्य अपने जीवन को एक कथा की तरह अर्थ देता है; ‘एक आशय तक पहुँचने’ की उसकी इच्छा इसी कथात्मक आत्मबोध का हिस्सा है। लेकिन मृत्यु उस कथा को अन्तिम रूप से पूरा नहीं करती, बल्कि उसे अधूरा छोड़ जाती है। पीछे रह जाने वाला संसार उस अधूरी कथा को अपने ढंग से याद करता है और फिर आगे बढ़ जाता है।

कविता का सामाजिक पक्ष भी इसी अस्तित्वगत बोध से जुड़ा है। ‘भीड़’ और ‘कंधे रगड़ने’ वाला मनुष्य आधुनिक सामाजिक जीवन की ऐसी स्थिति में है जहाँ सम्पर्क बढ़ता है लेकिन आत्मीयता कम हो सकती है। ‘प्रकृति’ और ‘पाखंड’ के ‘ऐंठे तार’ इस सामाजिक संरचना में पैदा हुए कृत्रिम सम्बन्धों का संकेत देते हैं। इसके बरक्स प्रेम कोई निजी भावुकता मात्र नहीं, बल्कि मनुष्य को उसकी निर्मित सामाजिक भूमिकाओं से बाहर निकालकर दूसरे मनुष्य के सामने उपस्थित करने वाली सम्भावना है। इसलिए ‘प्यार’ कविता में अस्तित्व का नैतिक आयाम भी ग्रहण करता है।

कविता की सबसे प्रभावी संरचनात्मक विशेषता उसका आरम्भ और अन्त है। आरम्भ में ‘घर’ रहता है और मनुष्य चला जाता है; अन्त में ‘संसृति’ चलती रहती है और मनुष्य का व्यक्तिगत जीवन उसके भीतर एक क्षण बनकर रह जाता है। इस प्रकार कविता ‘घर’ से ‘संसृति’ तक की यात्रा करती है। घर निजी संसार है, संसृति व्यापक जीवन-चक्र। इनके बीच ‘समय’, ‘मृत्यु’, ‘स्वप्न’, ‘भीड़’, ‘प्रकृति’, ‘पाखंड’ और ‘प्यार’ जैसे अनुभव आते हैं। कविता इस यात्रा में मनुष्य को न तो अमर बनाती है, न पूरी तरह निरर्थक। उसका आग्रह इतना है कि नश्वरता को स्वीकार करते हुए जीवन के भीतर मौजूद प्रामाणिक सम्बन्धों को पहचाना जाए।

इस दृष्टि से ‘घर रहेंगे’ मृत्यु-कविता होते हुए भी केवल मृत्यु की कविता नहीं है। यह मनुष्य की उस बेचैनी की कविता है जिसमें वह जानता है कि वह रहेगा नहीं, फिर भी घर बनाता है, सम्बन्ध बनाता है, प्रेम करता है, स्वप्न देखता है और किसी ‘आशय’ तक पहुँचने की कोशिश करता है। कविता इसी मानवीय विरोधाभास को उसकी पूरी जटिलता के साथ स्वीकार करती है। मनुष्य की नश्वरता संसार को निरर्थक नहीं बनाती; बल्कि नश्वरता ही प्रेम, स्मृति और आत्मीयता को अर्थवान बनाती है। ‘घर रहेंगे’ का काव्यात्मक संसार अन्ततः यही प्रश्न छोड़ता है कि जब हम नहीं रहेंगे, तब हमारे द्वारा बनाए गए घर, सम्बन्ध और स्मृतियाँ क्या बचाएँगे। कविता का उत्तर किसी अमरता के वादे में नहीं, बल्कि उस ‘कहीं गहरे, कहीं सच्चे’ प्यार में मिलता है, जो मनुष्य की अनुपस्थिति के बावजूद उसके जीवन को अर्थ देने वाली मानवीय सम्भावना बना रहता है।

हाइडेगर की  ‘मृत्यु की ओर उन्मुखता’ (being-towards-death) की अवधारणा यहाँ विशेष रूप से प्रासंगिक प्रतीत होती है। मनुष्य अपनी मृत्यु को टालता रहता है, उसे भविष्य की कोई घटना समझता है, लेकिन मृत्यु उसके अस्तित्व की संरचना में आरम्भ से ही उपस्थित रहती है। ‘घर रहेंगे’ में मृत्यु अचानक बाहर से आकर जीवन को समाप्त करने वाली शक्ति नहीं है; कविता आरम्भ से ही उसके संकेत देती चलती है। ‘हमीं उनमें रह न पाएँगे’ में मृत्यु प्रत्यक्ष नाम से उपस्थित नहीं है, लेकिन उसकी छाया मौजूद है। ‘हम अचानक बीत जाएँगे’ में वह और स्पष्ट होती है और फिर ‘मृत्यु होगी खड़ी सम्मुख राह रोके’ में उसका प्रत्यक्ष रूप सामने आ जाता है। इस क्रम को ध्यान से देखें तो कविता मृत्यु को अन्त में नहीं लाती; वह मृत्यु की सम्भावना को शुरुआत से ही मनुष्य के अस्तित्व में रखती है।

यहाँ हाइडेगर का ‘वे लोग’ या ‘जन-सामान्य’ (Das Man) का विचार उपयोगी हो जाता है। हाइडेगर के अनुसार रोज़मर्रा के जीवन में मनुष्य अक्सर अपनी स्वतंत्र सत्ता के बजाय सामाजिक रूप से स्वीकृत ढर्रों के अनुसार जीने लगता है। वह वही करता है जो ‘लोग’ करते हैं, वही मानता है जो ‘लोग’ मानते हैं और उसी को जीवन की स्वाभाविक दिशा समझ लेता है। इस स्थिति में व्यक्ति अपने वास्तविक अस्तित्व से दूरी बना सकता है। ‘अनर्गल ज़िंदगी ढोते’ में इसी प्रकार की रोज़मर्रा की अस्तित्वगत बेहोशी की प्रतिध्वनि सुनी जा सकती है। मनुष्य जीवन में सक्रिय होने के बजाय उसके प्रवाह में बहता रहता है।

यहाँ सार्त्र का अस्तित्ववादी विचार प्रासंगिक है। उनके अनुसार मनुष्य का कोई ऐसा पूर्वनिर्धारित सार नहीं है जो उसके अस्तित्व का अर्थ पहले से तय कर दे। मनुष्य अपने चुनावों और कर्मों के माध्यम से अपने अस्तित्व को अर्थ देता है। इसी कारण स्वतंत्रता मनुष्य के लिए अवसर भी है और बोझ भी। उसे अपने चुनावों की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। ‘एक आशय तक पहुँच’ को इसी संदर्भ में पढ़ें तो प्रश्न उठता है कि वह आशय बाहर से मिला हुआ है या मनुष्य ने उसे स्वयं निर्मित किया है?

कविता इसका निश्चित उत्तर नहीं देती, और यही उसकी शक्ति है। यदि जीवन का अर्थ पहले से निर्धारित है, तो मनुष्य का जीवन उस अर्थ तक पहुँचने की यात्रा हो सकता है। लेकिन यदि अर्थ मनुष्य स्वयं बनाता है, तो ‘आशय तक पहुँचने’ की प्रक्रिया लगातार खुली हुई रहती है। कवि का ‘सहसा बहुत थक जाना’ बताता है कि अर्थ की खोज कोई सरल उपलब्धि नहीं है। जीवन का बड़ा हिस्सा अर्थ की तलाश में बीत सकता है और जब मनुष्य उस अर्थ के निकट पहुँचता है, तब उसे अपने बीत चुके समय और अपनी सीमित ऊर्जा का बोध हो सकता है।

यहीं अल्बेयर कामू का ‘अबसर्ड’ या ‘विसंगत’ जीवन-बोध कविता से संवाद करता है। कामू के लिए मनुष्य अर्थ चाहता है, लेकिन संसार उसकी अर्थ-लिप्सा का कोई निश्चित उत्तर नहीं देता। मनुष्य की अर्थ की आकांक्षा और संसार की मौनता के बीच जो अन्तर पैदा होता है, वही ‘अबसर्ड’ स्थिति है। ‘घर रहेंगे’, ‘समय होगा’, ‘हम बीत जाएँगे’, ‘संसृति का अपव्यय दुहराएगी’—इन पंक्तियों को एक साथ पढ़ने पर मनुष्य की अर्थ-खोज और संसार की उदासीन निरन्तरता के बीच यही तनाव दिखाई देता है।

यहीं सार्त्र के ‘दूसरे की निगाह’ सम्बन्धी विचार के तहत भी कविता को पढ़ा जा सकता है। मनुष्य स्वयं को केवल अपने भीतर से नहीं, बल्कि दूसरों की निगाह से भी पहचानता है। सामाजिक जीवन में वह अपने बारे में दूसरों के निर्णय, अपेक्षाओं और मूल्यांकनों से प्रभावित होता है। इससे उसकी स्वतंत्रता और प्रामाणिकता पर दबाव पड़ सकता है। कविता का ‘पाखंड’ इसी सामाजिक अभिनय का एक रूप माना जा सकता है। इसके बरक्स ‘प्यार’ एक ऐसी सम्बन्धात्मक सम्भावना है जिसमें दूसरे को सामाजिक भूमिका के रूप में नहीं, मनुष्य के रूप में स्वीकार करने की क्षमता है।

‘कहीं गहरा, / कहीं सच्चा, / मैं / समझता—प्यार’ में ‘गहरा’ और ‘सच्चा’ शब्द प्रेम को बाहरी प्रदर्शन से अलग करते हैं। पाखंड सतह पर है; प्यार ‘गहरा’ है। पाखंड विभाजन और ऐंठन पैदा करता है; प्रेम सम्बन्ध को सच्चाई की ओर ले जाता है। लेकिन कवि यहाँ भी रोमानी आश्वासन नहीं देता। अगली पंक्तियाँ इस सम्भावना को मृत्यु के सामने रख देती हैं—‘मेरी / अमरता की नहीं देंगे ये दुहाई।’

यहाँ अस्तित्ववादी चिन्तन का एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु सामने आता है। मनुष्य की प्रेम करने की क्षमता उसे अमर नहीं बनाती। कोई सम्बन्ध मृत्यु को रद्द नहीं कर सकता। कोई घर मनुष्य को हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं रख सकता। कोई स्मृति देह को वापस नहीं ला सकती। इसलिए कविता प्रेम और अमरता को अलग करती है। प्रेम की सच्चाई उसकी स्थायित्व-क्षमता में नहीं, बल्कि उसके जीए जाने की प्रामाणिकता में है।

‘छीन / लेगा इन्हें हमसे देह-सा संसार’ में ‘देह’ और ‘संसार’ का सम्बन्ध विशेष ध्यान देने योग्य है। देह मनुष्य के अस्तित्व का सबसे निकट और सबसे निजी आधार है, लेकिन देह भी नश्वर है। जब संसार को ‘देह-सा’ कहा जाता है, तो संसार भी नश्वर, परिवर्तनशील और क्षयशील बन जाता है। यहाँ मनुष्य और संसार का सम्बन्ध बाहरी नहीं रह जाता। जिस संसार में मनुष्य अर्थ खोजता है, वह स्वयं परिवर्तन के अधीन है।

इस बिन्दु पर हाइडेगर और सार्त्र के बीच का अन्तर भी कविता को समझने में सहायक हो सकता है। हाइडेगर के यहाँ मृत्यु मनुष्य को उसके ‘स्व’ और अपने वास्तविक अस्तित्व के प्रति जागरूक कर सकती है; सार्त्र के यहाँ कोई पूर्वनिर्धारित सार नहीं है, इसलिए मनुष्य अपने चुनावों के माध्यम से अर्थ निर्मित करता है। कुँवर नारायण की कविता इन दोनों सम्भावनाओं के बीच एक काव्यात्मक क्षेत्र बनाती है। मृत्यु हमें जगाती है, लेकिन जागने के बाद हमें यह तय करना पड़ता है कि जीवन को किस अर्थ से भरना है। कविता का ‘आशय’ और ‘प्यार’ इसी अर्थ-निर्माण की दिशा में संकेत करते हैं।

‘मृत्यु / होगी खड़ी सम्मुख राह रोके’ के बाद आने वाली पंक्तियाँ—‘हम / जगेंगे यह विविधता, / स्वप्न, खो के’—इस जागरण को और गहरा करती हैं। मृत्यु के निकट पहुँचकर मनुष्य अपने जीवन को पहली बार किसी दूरी से देखता है। यहाँ ‘जगना’ विडम्बनापूर्ण है क्योंकि जागरण जीवन के चरम पर नहीं, बल्कि मृत्यु के सामने होता है। मनुष्य तब जागता है जब उसके अनेक स्वप्न उससे छूट चुके होते हैं।

‘स्वप्न’ को अस्तित्ववादी दृष्टि से मनुष्य के भविष्य-प्रक्षेपण के रूप में देखा जा सकता है। मनुष्य वर्तमान में रहते हुए भविष्य की सम्भावनाओं में अपना अस्तित्व फैलाता है। वह ‘मैं आगे क्या बनूँगा’, ‘क्या प्राप्त करूँगा’, ‘कहाँ पहुँचूँगा’ जैसे प्रश्नों के माध्यम से अपने वर्तमान को भविष्य से जोड़ता है। लेकिन मृत्यु भविष्य को सीमित कर देती है। जब भविष्य की अनन्त सम्भावना समाप्त होती दिखाई देती है, तब वर्तमान का वास्तविक मूल्य सामने आता है। इसलिए ‘स्वप्न खो के’ के बाद ‘विविधता’ का बोध होता है। जीवन को केवल लक्ष्य और उपलब्धि के रूप में देखने के बजाय उसकी विविधता दिखाई देने लगती है।

यहाँ कामू के विचारों से भी संवाद स्थापित किया जा सकता है। यदि संसार किसी अंतिम अर्थ की गारंटी नहीं देता, तो मनुष्य के पास अपने वर्तमान अनुभव को पूरी सजगता से जीने के अलावा क्या बचता है? कविता का ‘जगना’ इसी सजगता की ओर संकेत करता है। यह जागरण किसी धार्मिक मोक्ष का दावा नहीं है; यह अस्तित्वगत सजगता है।

इसके बाद ‘चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम / अचानक / जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके’ कविता के अस्तित्वगत अकेलेपन को सामने लाता है। यह आधुनिक जीवन का एक गहरा विरोधाभास है। मनुष्य भीड़ में है, दूसरे मनुष्यों के बिल्कुल निकट है, लेकिन मृत्यु उसे ‘सदियों अलग’ कर देती है। यहाँ ‘कंधे रगड़ना’ भौतिक निकटता का और ‘सदियों अलग होना’ अस्तित्वगत दूरी का बिम्ब है।

इस बिम्ब को आधुनिक शहरी जीवन के सन्दर्भ में भी पढ़ा जा सकता है। महानगरों में मनुष्य हजारों लोगों के बीच रहता है, लेकिन उसके भीतर अकेलेपन का अनुभव बना रह सकता है। सामाजिक सम्पर्क और आत्मीय सम्बन्ध अलग-अलग चीज़ें हैं। कविता ‘भीड़’ को केवल जनसमूह नहीं, बल्कि उस आधुनिक अस्तित्व की स्थिति के रूप में देखती है जहाँ लोग लगातार एक-दूसरे के सम्पर्क में होते हुए भी अपने-अपने निजी संसारों में बन्द रहते हैं।

सार्त्र के अस्तित्ववाद में दूसरे मनुष्य के साथ सम्बन्ध अक्सर स्वतंत्रताओं के तनाव से जुड़ा है। मैं दूसरे को देखता हूँ और दूसरा मुझे देखता है; दोनों एक-दूसरे की स्वतंत्रता और आत्म-छवि को प्रभावित करते हैं। कुँवर नारायण के यहाँ यह संघर्ष वैचारिक भाषा में नहीं आता, बल्कि ‘कंधे रगड़ने’ के साधारण बिम्ब में आता है। मनुष्य सामाजिक रूप से एक-दूसरे के निकट हैं, पर अस्तित्व की अंतिम सीमा पर प्रत्येक अकेला है। मृत्यु का अनुभव मूलतः व्यक्तिगत है। कोई दूसरा मेरे स्थान पर मेरी मृत्यु नहीं मर सकता।

यही कारण है कि कविता में ‘हम’ होते हुए भी मृत्यु के सामने एक गहरा ‘अकेला मैं’ उपस्थित हो जाता है। सामूहिक नियति व्यक्तिगत अनुभव में बदल जाती है। हम सब मरेंगे, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति अपनी मृत्यु का सामना स्वयं करेगा। अस्तित्ववादी चिन्तन का यह विरोधाभास कविता में बिना किसी दार्शनिक शब्दावली के व्यक्त हो जाता है।

कविता का अन्तिम हिस्सा अस्तित्ववाद के एक और प्रश्न की ओर ले जाता है—व्यक्ति की मृत्यु के बाद संसार का क्या होता है? उत्तर है—संसार चलता रहता है। ‘राख-सी साँझ, बुझे दिन की घिर जाएगी : / वही रोज़ संसृति का अपव्यय दुहराएगी।’ व्यक्ति की मृत्यु संसार की गति को रोकती नहीं। दिन समाप्त होगा, साँझ आएगी, फिर नया दिन आएगा। संसार अपने चक्र में चलता रहेगा। व्यक्ति के लिए मृत्यु पूर्ण विराम है; संसार के लिए वह निरन्तरता के बीच एक क्षण।

‘अपव्यय’ शब्द इस अन्त को विशेष रूप से जटिल बना देता है। यदि कवि केवल ‘संसृति चलती रहेगी’ कहता, तो कविता में जीवन की स्वाभाविक निरन्तरता का भाव होता। लेकिन वह ‘अपव्यय’ कहता है। इसका अर्थ है कि जीवन की ऊर्जा, समय और सम्भावनाएँ बार-बार खर्च होती हैं और उनका कोई स्थायी संचय नहीं होता। मनुष्य जन्म लेता है, स्वप्न देखता है, श्रम करता है, सम्बन्ध बनाता है, अर्थ खोजता है, थकता है और चला जाता है। फिर वही क्रम किसी दूसरे मनुष्य के साथ आरम्भ हो जाता है। इस पुनरावृत्ति में जीवन की रचनात्मकता भी है और व्यर्थता की सम्भावना भी।

यहीं कविता का अस्तित्ववादी प्रश्न अपने गहरे रूप में सामने आता है। यदि संसार मनुष्य की मृत्यु के बाद भी चलता रहेगा, तो व्यक्ति के जीवन का अर्थ क्या है? कविता इसका उत्तर अमरता में नहीं देती। वह यह नहीं कहती कि मनुष्य अपने कर्मों से हमेशा के लिए संसार में बना रहेगा। वह प्रेम की ओर लौटती है। ‘प्यार’ को अमरता का प्रमाण नहीं, बल्कि नश्वर जीवन के भीतर प्रामाणिक अनुभव की सम्भावना के रूप में रखा गया है। यही इस कविता की दार्शनिक परिपक्वता है।

इस दृष्टि से ‘घर रहेंगे’ को अस्तित्ववादी निराशा की कविता कहना अधूरा होगा। इसमें मृत्यु का बोध है, लेकिन मृत्यु-आसक्ति नहीं; नश्वरता का स्वीकार है, लेकिन जीवन-निषेध नहीं; अर्थ की समस्या है, लेकिन पूर्ण निरर्थकता की घोषणा नहीं। कविता मनुष्य को एक सीमित, नश्वर और थकने वाली सत्ता के रूप में देखती है, फिर भी उसके भीतर प्रेम, आत्मबोध और प्रामाणिक सम्बन्ध की सम्भावना को बचाए रखती है।

कविता में ‘घर’, ‘समय’, ‘मृत्यु’ और ‘संसृति’ चार व्यापक अस्तित्वगत वृत्त बनाते हैं। ‘घर’ मनुष्य के संसार में होने का संकेत है; ‘समय’ उसके बीतने का; ‘मृत्यु’ उसकी सीमा का; और ‘संसृति’ उसके बाद भी जारी रहने वाले संसार का। इनके बीच ‘आशय’, ‘स्वप्न’ और ‘प्यार’ मनुष्य द्वारा निर्मित अर्थ के क्षेत्र हैं। इस प्रकार कविता की आन्तरिक संरचना कुछ इस तरह विकसित होती है: मनुष्य संसार में आता है, घर बनाता है, समय में जीता है, अर्थ खोजता है, स्वप्न देखता है, सम्बन्ध बनाता है, मृत्यु से सामना करता है और अन्ततः संसार से चला जाता है; संसार फिर भी बना रहता है। लेकिन इस समूची प्रक्रिया में प्रेम उस मानवीय अनुभव के रूप में उभरता है जो जीवन को उसके सीमित होने के बावजूद प्रामाणिक बना सकता है।

कुँवर नारायण की काव्य-दृष्टि की विशेषता यह है कि वे इस प्रश्न को किसी एक दार्शनिक मत के हवाले नहीं करते। हाइडेगर के ‘मृत्यु की ओर अस्तित्व’, सार्त्र की ‘स्वतंत्रता और अर्थ-निर्माण’ तथा कामू की ‘अबसर्ड स्थिति’ के साथ कविता का संवाद स्थापित किया जा सकता है, लेकिन कविता इनमें से किसी की प्रतिलिपि नहीं बनती। उसका अपना निष्कर्ष अधिक मानवीय और कम घोषणात्मक है। मनुष्य नश्वर है, उसका संसार स्थायी नहीं, उसके स्वप्न टूटेंगे, उसकी देह जाएगी और उसके बनाए घर भी एक दिन दूसरे लोगों के घर बन जाएँगे; फिर भी जब तक वह उपस्थित है, उसके पास अपने अस्तित्व को प्रामाणिक बनाने के लिए प्रेम, आत्मबोध और सजग जीवन की सम्भावना है।

इसलिए ‘घर रहेंगे’ का मूल अस्तित्ववादी तनाव ‘रहने’ और ‘बीत जाने’ के बीच है। घर रहेगा, मनुष्य नहीं; समय रहेगा, मनुष्य बीत जाएगा; संसार रहेगा, देह नहीं रहेगी; संसृति अपनी गति दोहराएगी, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति उस गति में केवल एक सीमित उपस्थिति होगा। अपने अस्तित्व की सीमाओं को पहचान लेना ही कविता में ‘जगने’ की शुरुआत है। और जब मनुष्य इस जागरण में अपने जीवन को देखता है, तब उसके सामने प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि ‘मैं कब तक रहूँगा’, बल्कि यह हो जाता है कि ‘जब तक हूँ, किस तरह रहूँ?’ कविता का ‘प्यार’ इसी प्रश्न का कोई अन्तिम दार्शनिक उत्तर नहीं, बल्कि एक मानवीय सम्भावना है—ऐसी सम्भावना जो अमरता का दावा किए बिना भी नश्वर जीवन को गहराई, आत्मीयता और आशय प्रदान कर सकती है।

यहीं हेनरी बर्गसाँ की ‘अवधि’ की अवधारणा उपयोगी होती है। बर्गसाँ के अनुसार वास्तविक समय को केवल अलग-अलग क्षणों में बाँटकर नहीं समझा जा सकता। चेतना में अतीत और वर्तमान एक-दूसरे से पृथक डिब्बे नहीं हैं। अतीत हमारी वर्तमान अनुभूति में लगातार उपस्थित रहता है। हम प्रत्येक क्षण में केवल वर्तमान नहीं जीते; हम अपने साथ अपना बीता हुआ जीवन भी लेकर चलते हैं। इस दृष्टि से ‘हम अचानक बीत जाएँगे’ का ‘बीतना’ केवल जैविक समाप्ति नहीं है। इसमें उन अनुभवों, स्मृतियों और सम्भावनाओं का भी अन्तर्निहित प्रश्न है जो हमारे भीतर समय के साथ जमा होती रही हैं।

पॉल रिकोयर के समय और कथा सम्बन्धी चिन्तन के आलोक में यह बात और स्पष्ट होती है। मनुष्य अपने जीवन को केवल घटनाओं के क्रम के रूप में नहीं जीता; वह उन घटनाओं को जोड़कर अपने अस्तित्व की कथा बनाता है। ‘मैं कौन हूँ?’ का उत्तर केवल ‘मेरे साथ क्या-क्या हुआ’ में नहीं होता, बल्कि इस बात में होता है कि मैं उन घटनाओं को किस प्रकार अर्थ देता हूँ। कुँवर नारायण की पंक्ति ‘एक / आशय तक पहुँच’ इसी कथात्मक आत्मबोध से जुड़ सकती है। मनुष्य चाहता है कि उसके जीवन की घटनाएँ किसी आशय में संगठित हों, कि उसकी यात्रा का कोई अर्थ हो।

लेकिन कविता इस आशय को सहज उपलब्ध नहीं मानती—‘एक / आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जाएँगे।’ यहाँ ‘आशय’ तक पहुँचना जीवन की अर्थ-खोज है और ‘थक जाना’ उस खोज की मानवीय सीमा। मनुष्य अपने जीवन की कथा को पूरा अर्थ देना चाहता है, लेकिन जीवन के समाप्त होने से पहले वह अपने अर्थ को पूर्ण रूप से पकड़ पाए, यह निश्चित नहीं। इसीलिए कविता में ‘आशय’ कोई निश्चित दार्शनिक सूत्र नहीं है; वह एक खोज है।

टी. एस. एलियट की ‘बर्न्ट नॉर्टन’ (Burnt Norton) इस बिन्दु पर कुँवर नारायण की कविता के साथ एक रोचक तुलनात्मक संवाद स्थापित करती है। ‘बर्न्ट नॉर्टन’ की शुरुआत में एलियट वर्तमान, अतीत और भविष्य के सम्बन्ध को रैखिक समय की सामान्य धारणा से अलग ढंग से देखते हैं। उनकी पंक्तियाँ हैं:

वर्तमान समय और बीता हुआ समय
शायद दोनों भविष्य के समय में उपस्थित हैं,

और भविष्य का समय अतीत के समय में समाहित है।

(Time present and time past
Are both perhaps present in time future,
And time future contained in time past.)

इसके बाद एलियट लिखते हैं:

‘यदि समूचा समय शाश्वत रूप से वर्तमान है,
तो समूचा समय अप्रतिपूरणीय है।’

(If all time is eternally present
All time is unredeemable.)

यहाँ ‘अप्रतिपूरणीय’ का आशय है कि बीते हुए समय को वापस प्राप्त नहीं किया जा सकता। एलियट के लिए समय केवल अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य की सीधी यात्रा नहीं है। अतीत भविष्य में किसी सम्भावना की तरह उपस्थित हो सकता है और भविष्य भी अतीत में किसी रूप में निहित हो सकता है। ‘Burnt Norton’ में यह समय-चिन्तन स्मृति, सम्भावना और ‘जो हो सकता था’ की अनुभूति से जुड़ जाता है। मूल कविता में आगे ‘व्हाट माइ्ट हैव बीन’ अर्थात् ‘जो हो सकता था’ की सम्भावना भी समय की इसी जटिल संरचना का हिस्सा बनती है। कुँवर नारायण की ‘घर रहेंगे’ में ऐसा दार्शनिक विस्तार प्रत्यक्ष रूप से नहीं है, लेकिन दोनों कविताओं में समय को केवल रैखिक प्रवाह मानने से इनकार करने वाली एक गहरी संवेदना मिलती है। एलियट के यहाँ अतीत, वर्तमान और भविष्य एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं; कुँवर नारायण के यहाँ मनुष्य बीत जाता है, लेकिन समय बना रहता है। एलियट पूछते हैं कि जो बीत चुका है और जो हो सकता था, वे वर्तमान से किस प्रकार सम्बन्धित हैं; कुँवर नारायण पूछते हैं कि जब मनुष्य स्वयं समय में बीत जाएगा, तब उसके द्वारा निर्मित घर, सम्बन्ध और संसार किस तरह बने रहेंगे।

यहाँ दोनों कवियों के बीच एक सूक्ष्म अन्तर भी है। एलियट का समय आत्मचेतना, स्मृति और आध्यात्मिक खोज की ओर जाता है, जबकि कुँवर नारायण का समय सामाजिक और मानवीय जीवन की ठोस स्थितियों से अधिक गहरे जुड़ा है। एलियट की बर्न्ट नॉर्टन’ (Burnt Norton) में समय के पार किसी ऐसी स्थिति की तलाश है जहाँ समय के विभाजन क्षीण पड़ते हैं; ‘घर रहेंगे’ में समय की निरन्तरता मनुष्य की नश्वरता को और स्पष्ट करती है। इसलिए कुँवर नारायण के यहाँ समय किसी मुक्ति की ओर ले जाने वाला मार्ग नहीं बनता; वह मनुष्य की सीमितता को पहचानने का माध्यम बनता है।

एलियट की एक और प्रसिद्ध पंक्ति इस तुलना को और अर्थवान बना सकती है—

जो हो सकता था और जो हो चुका है,

दोनों एक ही अन्त की ओर संकेत करते हैं, जो हमेशा वर्तमान है।

(What might have been and what has been

Point to one end, which is always present.)

यहाँ ‘अंत’ का अर्थ केवल अन्तिम घटना नहीं, बल्कि एक ऐसे बिन्दु से भी है जहाँ अतीत की वास्तविक घटनाएँ और सम्भावनाएँ वर्तमान चेतना में आकर एकत्रित होती हैं। कुँवर नारायण की कविता में ‘मृत्यु’ भी इसी तरह वर्तमान के भीतर उपस्थित एक अन्तिम सीमा बन जाती है।

इस दृष्टि से ‘मृत्यु / होगी खड़ी सम्मुख राह रोके’ को एलियट की समय-चेतना के साथ पढ़ना विशेष रूप से फलदायी है। मृत्यु भविष्य में आने वाली घटना है, लेकिन उसका बोध वर्तमान को पहले से प्रभावित करता है। मनुष्य जानता है कि उसका जीवन सीमित है; इसलिए वह अपने वर्तमान को भविष्य की उस निश्चित सीमा की रोशनी में अनुभव करता है। हाइडेगर के यहाँ मृत्यु की ओर उन्मुख अस्तित्व और एलियट के यहाँ समय की जटिल उपस्थिति, दोनों मिलकर यह समझने में सहायता करते हैं कि मृत्यु भविष्य की घटना होकर भी वर्तमान जीवन का हिस्सा कैसे बन जाती है।

यहीं ‘स्वप्न’ की पंक्ति—‘हम / जगेंगे यह विविधता, / स्वप्न, खो के’—विशेष अर्थ ग्रहण करती है। मनुष्य वर्तमान को भविष्य के स्वप्नों से भरता है। वह भविष्य में स्वयं की एक सम्भावित छवि बनाता है। लेकिन मृत्यु उस भविष्य की सीमा निर्धारित कर देती है। स्वप्न खोने के बाद जो ‘जगना’ है, वह दरअसल वर्तमान की वास्तविकता के प्रति एक देर से प्राप्त सजगता है। एलियट के ‘व्हाट माइ्ट हैव बीन’ और कुँवर नारायण के ‘स्वप्न’ को एक साथ रखकर देखें तो दोनों में सम्भावित जीवन की एक छाया उपस्थित है—एक ऐसा जीवन जो घटित हो सकता था, लेकिन जो वास्तविक जीवन की सीमा और समय की गति के कारण अनिवार्य रूप से वर्तमान में नहीं उतरता।

इस अर्थ में ‘घर रहेंगे’ केवल ‘जो हुआ’ की कविता नहीं है; यह ‘जो हो सकता था’ की अनकही छाया से भी जुड़ी है। मनुष्य जब पीछे मुड़कर अपने जीवन को देखता है, तब उसे केवल जीए हुए क्षण ही याद नहीं आते; उसे वे रास्ते भी दिखाई देते हैं जिन पर वह नहीं गया। अस्तित्वगत आत्मबोध का एक हिस्सा यही है कि जीवन हमेशा चयन की प्रक्रिया है। एक रास्ता चुनना दूसरे सम्भावित रास्तों को पीछे छोड़ देना भी है। इसलिए ‘आशय’ तक पहुँचने की यात्रा में थकान केवल शारीरिक नहीं; वह छूट गई सम्भावनाओं की थकान भी हो सकती है।

इसीलिए एलियट और कुँवर नारायण के बीच ‘स्मृति’ एक महत्त्वपूर्ण सेतु बनती है। एलियट के यहाँ अतीत वर्तमान चेतना में प्रतिध्वनित होता है; कुँवर नारायण के यहाँ घर, समय और मनुष्य का सम्बन्ध बताता है कि अनुपस्थिति भी किसी न किसी रूप में उपस्थिति को बनाए रख सकती है। व्यक्ति नहीं रहेगा, लेकिन उसका घर रहेगा; देह नहीं रहेगी, लेकिन उसके अनुभवों के चिह्न रह सकते हैं। यहाँ स्मृति समय के विरुद्ध कोई पूर्ण विजय नहीं है, बल्कि समय द्वारा निर्मित अनुपस्थिति के भीतर बची हुई एक मानवीय प्रतिध्वनि है।

कविता का अन्त—‘राख-सी / साँझ, बुझे दिन की घिर जाएगी : / वही / रोज़ संसृति का अपव्यय दुहराएगी’—इस पूरे समय-दर्शन को एक चक्राकार संरचना देता है। यहाँ ‘रोज़’ शब्द विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। मृत्यु एक व्यक्ति के लिए एक बार घटती है, लेकिन संसृति का चक्र प्रतिदिन चलता रहता है। एक व्यक्ति की शाम आती है, लेकिन संसार की सुबह फिर आती है। इस प्रकार व्यक्तिगत समय और सामूहिक समय अलग-अलग स्तरों पर चलते हैं।

‘संसृति का अपव्यय’ में समय के प्रति कवि की दृष्टि और जटिल हो जाती है। ‘अपव्यय’ का अर्थ केवल व्यर्थता नहीं, बल्कि जीवन की सम्भावनाओं का खर्च होते जाना भी है। प्रत्येक दिन अपनी सम्भावनाएँ लेकर आता है और समाप्त होकर बीते हुए समय में चला जाता है। अगला दिन फिर आता है और मनुष्य उसी प्रकार जीवन को अर्थ देने की कोशिश करता है। इसीलिए ‘दुहराएगी’ में समय की चक्रीयता है, जबकि ‘अचानक बीत जाएँगे’ में व्यक्तिगत समय की सीमितता। दोनों को साथ रखकर देखें तो कविता में एक ओर व्यक्ति का समय रेखीय और सीमित है, दूसरी ओर संसृति का समय पुनरावर्ती और निरन्तर।

यहीं बर्गसाँ और एलियट की समय-दृष्टि को कुँवर नारायण की कविता से जोड़ने का उपजाऊ बिन्दु मिलता है। बर्गसाँ का समय चेतना में बहता है और अतीत को वर्तमान में साथ लेकर चलता है। एलियट का समय अतीत, वर्तमान और भविष्य की पारस्परिक उपस्थिति की जटिलता खोलता है। हाइडेगर का समय मनुष्य के अस्तित्व और मृत्यु की ओर उन्मुखता से जुड़ता है। रिकोयर समय को कथा और स्मृति के माध्यम से मानवीय अनुभव में व्यवस्थित होते हुए देखते हैं। कुँवर नारायण इन दार्शनिक अवधारणाओं को सीधे सिद्धान्त के रूप में नहीं प्रस्तुत करते, बल्कि कुछ साधारण शब्दों—‘घर’, ‘समय’, ‘बीत’, ‘आशय’, ‘मृत्यु’, ‘स्वप्न’, ‘प्यार’, ‘साँझ’, ‘रोज़’ और ‘दुहराएगी’—के माध्यम से इन्हीं प्रश्नों का काव्यात्मक रूप निर्मित करते हैं।

विशेष रूप से ‘समय होगा, हम अचानक बीत जाएँगे’ और एलियट के ‘टाइम प्रेज़ेण्ट ऐण्ड टाइम पास्ट…’ को साथ रखकर देखें तो दोनों में समय और मनुष्य के सम्बन्ध का पुनर्विचार मिलता है। एलियट समय की आन्तरिक जटिलता को उद्घाटित करते हैं; कुँवर नारायण मनुष्य की सीमितता को उसके सामने रखते हैं। एलियट के यहाँ प्रश्न है कि समय को क्या वास्तव में अतीत, वर्तमान और भविष्य में अलग-अलग बाँटा जा सकता है; कुँवर नारायण के यहाँ प्रश्न है कि यदि मनुष्य स्वयं समय की धारा में बीतने वाला है, तो वह अपने वर्तमान को किस प्रकार अर्थवान बनाए।

इसलिए ‘घर रहेंगे’ का मृत्यु-दर्शन नकारात्मक निष्कर्ष तक नहीं पहुँचता। मृत्यु मनुष्य की सीमा है, लेकिन वही सीमा वर्तमान की कीमत भी बताती है। समय मनुष्य को बहाकर ले जाता है, लेकिन वही समय अनुभव, स्मृति और प्रेम को सम्भव बनाता है। घर स्थायी प्रतीत होता है, लेकिन उसकी वास्तविक अर्थवत्ता मनुष्य की उपस्थिति से आती है। और प्रेम अमरता का आश्वासन नहीं देता, फिर भी वह नश्वर जीवन को प्रामाणिक बना सकता है।

कविता में इसीलिए ‘मैं / समझता—प्यार’ का क्षण निर्णायक है। मृत्यु, समय और संसृति के विशाल परिप्रेक्ष्य के बीच कवि किसी दार्शनिक विजय की घोषणा नहीं करता। वह केवल अपनी समझ व्यक्त करता है कि प्रकृति और पाखंड के ‘घने लिपटे, बँटे, ऐंठे तारों’ से कहीं गहरा और सच्चा कुछ है—प्यार। लेकिन यह प्यार भी ‘अमरता की दुहाई’ नहीं देता। इस तरह कविता प्रेम को मृत्यु का प्रतिरोध नहीं, बल्कि नश्वरता को अर्थ देने वाली मानवीय अनुभूति के रूप में देखती है।

अन्ततः ‘घर रहेंगे’ में मृत्यु और समय एक-दूसरे से अलग विषय नहीं हैं। मृत्यु समय की सीमा को दृश्य बनाती है और समय मृत्यु की अनिवार्यता को व्यापक परिप्रेक्ष्य देता है। हाइडेगर के यहाँ मृत्यु की ओर उन्मुख अस्तित्व मनुष्य को अपने वास्तविक होने की ओर लौटाता है; बर्गसाँ की ‘अवधि’ हमें बताती है कि समय केवल बाहरी माप नहीं, चेतना का जीवित प्रवाह है; रिकोयर हमें दिखाते हैं कि मनुष्य अपने जीवन को कथा और स्मृति के माध्यम से अर्थ देता है; एलियट अतीत, वर्तमान और भविष्य की परस्पर अन्तर्निहितता के माध्यम से समय की रैखिक धारणा को जटिल बनाते हैं। कुँवर नारायण की कविता इन सभी प्रश्नों के बीच अपनी विशिष्ट मानवीय आवाज़ में यह कहती है कि मनुष्य रहेगा नहीं, लेकिन जब तक वह है, तब तक उसके पास अपने होने को अर्थ देने का अवसर है।

इसलिए ‘घर रहेंगे’ को केवल मृत्यु की कविता कहना उसके अर्थ को सीमित कर देना होगा। यह उस क्षण की कविता है जब मनुष्य पहली बार समझता है कि वह समय का स्वामी नहीं, समय के भीतर एक सीमित यात्री है; कि उसका घर उससे अधिक देर तक रह सकता है; कि उसके स्वप्न उसके जीवन से बड़े हो सकते हैं, लेकिन उसका जीवन उन सभी स्वप्नों को पूरा करने जितना लम्बा नहीं; कि मृत्यु सामने खड़ी है; कि संसार उसके बाद भी चलता रहेगा; और फिर भी, इसी सीमितता के भीतर प्रेम, स्मृति और सजग उपस्थिति जीवन को उसका ‘आशय’ दे सकती है। इस अर्थ में कविता का सबसे गहरा प्रश्न ‘हम कब तक रहेंगे?’ नहीं, बल्कि ‘समय के भीतर रहते हुए हम अपने होने को किस प्रकार अर्थवान बनाएँ?’ है। यही प्रश्न उसे हाइडेगर, बर्गसाँ, रिकोयर और एलियट की समय तथा मृत्यु सम्बन्धी चिन्तन-परम्पराओं के साथ एक सार्थक संवाद में ले जाता है।

‘स्मृति-अध्ययन’ की दृष्टि से कुँवर नारायण की ‘घर रहेंगे’ में ‘घर’ केवल निवास की भौतिक संरचना नहीं, बल्कि मनुष्य की अनुपस्थिति के बाद उसकी उपस्थिति के चिह्नों को सँजोए रखने वाला स्मृति-स्थल बन जाता है। कविता की आरम्भिक पंक्तियाँ—‘घर / रहेंगे, / हमीं उनमें रह न पाएँगे’—इसी उपस्थिति और अनुपस्थिति के द्वंद्व पर टिकी हैं। मनुष्य चला जाएगा, लेकिन जिस घर में उसने जीवन बिताया, वह उसके जीए हुए समय, सम्बन्धों और अनुभवों के निशान अपने भीतर बचाए रख सकता है। इस अर्थ में व्यक्ति की जैविक अनुपस्थिति स्मृति की पूर्ण अनुपस्थिति नहीं बनती। घर स्वयं उस व्यक्ति के बीते हुए जीवन की एक भौतिक स्मृति बन जाता है।

मौरिस हाल्बवाक्स (Maurice Halbwachs) की ‘सामूहिक स्मृति’ की अवधारणा इस अर्थ को समझने में सहायक है। हाल्बवाक्स के अनुसार स्मृति केवल व्यक्ति के मस्तिष्क में सुरक्षित निजी संचय नहीं होती; वह परिवार, समुदाय, सम्बन्धों और सामाजिक परिवेश के भीतर निर्मित और पुनर्गठित होती है। घर इसी सामाजिक स्मृति का निकटतम स्थान है। किसी व्यक्ति के चले जाने के बाद उसका कमरा, उसके इस्तेमाल की वस्तुएँ और घर के परिचित कोने परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए स्मरण के माध्यम बन सकते हैं। इसलिए ‘घर रहेंगे’ में ‘रहना’ केवल वास्तु का बने रहना नहीं, स्मृति की सम्भावना का बने रहना भी है।

‘समय / होगा, हम अचानक बीत जाएँगे’ इस स्मृति-बोध को समय से जोड़ती है। मनुष्य स्वयं ‘बीत’ जाता है, लेकिन बीत जाने का अर्थ उसका पूर्णतः लुप्त हो जाना नहीं है। पॉल रिकोयर की ‘स्मृति, इतिहास, विस्मरण’ (Memory, History, Forgetting) सम्बन्धी चिन्तन-दृष्टि से देखें तो अनुपस्थित व्यक्ति स्मृति के माध्यम से वर्तमान में फिर उपस्थित होता रहता है। स्मृति अतीत को ज्यों-का-त्यों वापस नहीं लाती; वह वर्तमान से अतीत की ओर किया गया पुनर्सम्बन्ध है। इसीलिए घर में बची हुई वस्तुएँ व्यक्ति को वापस नहीं लातीं, बल्कि उसकी अनुपस्थिति का बोध और गहरा कर सकती हैं। घर इसलिए स्मरण का स्थल होने के साथ-साथ वियोग का स्थल भी है।

‘हम / जगेंगे यह विविधता, / स्वप्न, खो के’ को भी स्मृति के इसी द्वंद्व में पढ़ा जा सकता है। ‘स्वप्न’ भविष्य की ओर उन्मुख है, जबकि स्मृति अतीत की ओर। मृत्यु भविष्य की सम्भावनाओं को समाप्त करती है और मनुष्य को उसके बीते हुए जीवन की ‘विविधता’ के सामने खड़ा कर देती है। जो जीवन वर्तमान में बिखरे हुए अनुभवों की तरह जीया गया था, वह अन्त की चेतना में स्मृति के रूप में एक समग्रता ग्रहण करने लगता है। यहाँ ‘जगना’ अपने बीत चुके जीवन को नए ढंग से पहचानने का भी संकेत बन जाता है।

जान अस्मान (Jan Assmann) की ‘सांस्कृतिक स्मृति’ और पियरे नोरा (Pierre Nora) के ‘स्मृति-स्थल’ की अवधारणाओं के आलोक में कविता के ‘घर’ का अर्थ और विस्तृत होता है। घर व्यक्ति और परिवार की स्मृतियों को स्थान से बाँध देता है। समय बीतता रहता है, पीढ़ियाँ बदलती हैं, लेकिन कुछ स्थान बीते हुए जीवन की स्मृतियों को अपने साथ जोड़कर रखते हैं। इस दृष्टि से ‘घर रहेंगे’ में घर एक प्रकार का अनौपचारिक स्मृति-अभिलेख है—ऐसा अभिलेख जो दस्तावेज़ों से नहीं, बल्कि स्थान, वस्तुओं, सम्बन्धों और उनसे जुड़ी स्मृतियों से निर्मित होता है।

लेकिन कुँवर नारायण स्मृति को अमरता का सरल विकल्प नहीं बनाते। ‘मेरी / अमरता की नहीं देंगे ये दुहाई’ इस भ्रम को तोड़ देती है कि स्मृति मनुष्य को मृत्यु से बचा सकती है। घर रह सकता है, स्मृतियाँ रह सकती हैं, प्रेम के चिह्न रह सकते हैं, लेकिन ये व्यक्ति की ‘अमरता’ प्रमाणित नहीं करते। स्मृति की सार्थकता मृत्यु को पराजित करने में नहीं, बल्कि अनुपस्थित मनुष्य और वर्तमान के बीच सम्बन्ध बनाए रखने में है। इसी कारण ‘छीन / लेगा इन्हें हमसे देह-सा संसार’ स्मृति की भी सीमा का संकेत करता है। जिस संसार में स्मृतियाँ संरक्षित होती हैं, वह संसार स्वयं ‘देह-सा’ परिवर्तनशील और नश्वर है।

अन्त की ‘राख-सी / साँझ, बुझे दिन की घिर जाएगी’ स्मृति का एक सूक्ष्म बिम्ब भी बन जाती है। ‘राख’ उस चीज़ का अवशेष है जो कभी उपस्थित थी, लेकिन अब अपने पुराने रूप में नहीं है। इसी प्रकार स्मृति भी बीते हुए अनुभव की पुनरावृत्ति नहीं, उसका बचा हुआ मानसिक और सांस्कृतिक चिह्न है। ‘बुझा दिन’ वापस नहीं आता, पर उसकी ‘राख-सी साँझ’ शेष रहती है। इस प्रकार कविता में घर, राख और साँझ तीनों अनुपस्थिति के भीतर बची हुई उपस्थिति के रूपक बन जाते हैं।

इस दृष्टि से कविता का आरम्भ और अन्त एक-दूसरे को अर्थ देते हैं। आरम्भ में ‘घर’ मनुष्य के बाद बचता है और अन्त में ‘राख-सी साँझ’ बुझे हुए दिन के बाद। घर जीवन का स्थानिक अवशेष है, साँझ बीते दिन का कालगत अवशेष और राख नष्ट हो चुकी उपस्थिति का दृश्य अवशेष। इनके बीच स्मृति वह मानवीय प्रक्रिया है जो अनुपस्थिति को मिटाती नहीं, बल्कि उसके चिह्नों को पहचानती है। इसीलिए ‘घर रहेंगे’ में स्मृति अमरता का आश्वासन न होकर मनुष्य के बीत जाने और उसके कुछ निशानों के रह जाने के बीच का संवेदनात्मक सेतु बनती है।

‘घर रहेंगे’ को स्थान-दर्शन, अनुभूतिविज्ञान और समाजशास्त्रीय दृष्टि से पढ़ने पर ‘घर’ एक साधारण भौतिक संरचना न रहकर मनुष्य के अस्तित्व, स्मृति और आत्मीयता का विस्तार बन जाता है। ‘घर / रहेंगे, / हमीं उनमें रह न पाएँगे’ में घर का स्थायित्व और मनुष्य की अनुपस्थिति एक ऐसा द्वंद्व रचते हैं जिसमें घर मनुष्य के जीवन का साक्षी दिखाई देता है। एडमंड हुसर्ल (Edmund Husserl) की अनुभूतिविज्ञान सम्बन्धी दृष्टि में वस्तु का अर्थ उसके प्रति चेतना के अनुभव से निर्मित होता है; इस दृष्टि से घर केवल दीवारों, कमरों और छत का समुच्चय नहीं, बल्कि मनुष्य के जीए हुए अनुभवों से अर्थ प्राप्त करने वाला स्थान है। मॉरिस मर्लो-पोंती (Maurice Merleau-Ponty) के देहधर्मी अनुभव के सन्दर्भ में घर वह स्थान है जहाँ देह संसार के साथ अपना निकट सम्बन्ध स्थापित करती है। गैस्तों बाशलार (Gaston Bachelard) की ‘द पोएटिक्स ऑफ़ स्पेश’ की रोशनी में तो घर स्मृति, स्वप्न, आत्मीयता और कल्पना का ऐसा आन्तरिक भूगोल बन जाता है जहाँ भौतिक स्थान मनुष्य के निजी संसार में रूपान्तरित होता है। इसलिए मनुष्य के चले जाने पर घर पूरी तरह रिक्त नहीं होता; उसमें उसके अनुभवों और स्मृतियों की प्रतिध्वनियाँ बनी रह सकती हैं।

कविता में ‘हम’ से ‘मैं’ की ओर गति भी इसी अनुभवात्मक संरचना को गहरा करती है। आरम्भ का ‘हमीं’ और बार-बार आता ‘हम’ मनुष्य की सामूहिक नियति—समय, मृत्यु और नश्वरता—को व्यक्त करता है, जबकि ‘मैं / समझता—प्यार’ पर पहुँचकर कविता व्यक्तिगत आत्मबोध की ओर मुड़ती है। जॉर्ज हर्बर्ट मीड (George Herbert Mead) की दृष्टि से ‘मैं’ और ‘हम’ अलग-अलग नहीं, बल्कि सामाजिक सम्बन्धों के भीतर निर्मित होते हैं। एर्विंग गॉफमैन (Erving Goffman) के सामाजिक अभिनय की अवधारणा से देखें तो मनुष्य सामाजिक जीवन में अनेक भूमिकाएँ निभाता है, जबकि ‘मैं’ का यह क्षण उस बाहरी अभिनय से हटकर किसी अधिक निजी और प्रामाणिक अनुभूति की खोज करता है। पियरे बोरदियू (Pierre Bourdieu) के विचारों के सहारे इसे सामाजिक संरचनाओं और व्यक्ति की चेतना के पारस्परिक सम्बन्ध के रूप में भी समझा जा सकता है।

‘चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम / अचानक / जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके’ कविता में आधुनिक सामाजिक जीवन की विडम्बना को तीखे ढंग से सामने लाती है। जॉर्ज ज़िमेल (Georg Simmel) के महानगरीय जीवन सम्बन्धी विचारों की रोशनी में ‘भीड़’ भौतिक निकटता के बावजूद मानसिक दूरी का संकेत बनती है। रिचर्ड सेनेट (Richard Sennett) और ज़िग्मुंट बाउमन (Zygmunt Bauman) के सन्दर्भ में भी इसे ऐसे आधुनिक सामाजिक संसार के रूप में देखा जा सकता है जहाँ सम्पर्क बढ़ते हुए भी स्थायी आत्मीय सम्बन्ध कमजोर हो सकते हैं। ‘कंधे रगड़ना’ शरीरों की निकटता है, जबकि ‘सदियों अलग होके’ अस्तित्वगत और भावनात्मक दूरी। इस विरोधाभास से कविता आधुनिक मनुष्य के अकेलेपन को रेखांकित करती है।

‘प्रकृति औ’ पाखंड’ तथा ‘बँटे, ऐंठे तार’ सामाजिक जीवन में सहजता और कृत्रिमता के तनाव को सामने लाते हैं। यहाँ ‘तार’ सम्बन्धों के ऐसे रूपक हैं जो मनुष्यों को जोड़ते भी हैं और अपनी ऐंठन तथा विभाजन के कारण उन्हें दूर भी करते हैं। गॉफमैन की दृष्टि से देखें तो सामाजिक जीवन एक मंच की तरह है जहाँ व्यक्ति अपनी भूमिकाएँ निभाता है; इस प्रक्रिया में सहज आत्म और सामाजिक प्रदर्शन के बीच दूरी पैदा हो सकती है। कविता इसी दूरी के बरक्स ‘कहीं गहरा, कहीं सच्चा’ प्यार रखती है। इसीलिए प्रेम यहाँ केवल भावनात्मक अनुभूति नहीं, बल्कि सामाजिक पाखंड के विरुद्ध प्रामाणिक सम्बन्ध की सम्भावना बन जाता है।

इस प्रकार ‘घर रहेंगे’ में स्थान निजी अनुभव का, ‘हम’ सामूहिक नियति का, ‘मैं’ आत्मबोध का, ‘भीड़’ सामाजिक अलगाव का और ‘प्यार’ प्रामाणिक मानवीय सम्बन्ध का संकेत बन जाता है। कविता की शक्ति इस बात में है कि वह घर और संसार को मनुष्य से अलग नहीं करती, बल्कि उन्हें उसकी स्मृति, देह, सामाजिकता और आत्मीय अनुभव के साथ जोड़कर देखती है। मनुष्य चला जाता है, लेकिन उसके द्वारा अर्थवान बनाया गया स्थान कुछ समय तक उसकी उपस्थिति के चिह्न सँजोए रह सकता है। इसी तरह भीड़ में रहने वाला मनुष्य सामाजिक रूप से जुड़ा हुआ दिखाई दे सकता है, फिर भी भीतर से अकेला हो सकता है। इन दोनों स्तरों—घर की आत्मीय निकटता और भीड़ की अस्तित्वगत दूरी—के बीच ‘घर रहेंगे’ आधुनिक मनुष्य के होने की विडम्बना और उसकी प्रामाणिक सम्बन्ध की आकांक्षा को संक्षेप में, लेकिन गहरे ढंग से अभिव्यक्त करती है।

‘घर रहेंगे’ में ‘प्यार’ को कविता के नैतिक केन्द्र के रूप में पढ़ना विशेष रूप से सार्थक है। ‘प्रकृति / औ’ पाखंड के ये घने लिपटे / बँटे, ऐंठे / तार—’ के बाद कवि कहता है—‘जिनसे / कहीं गहरा, / कहीं सच्चा, / मैं / समझता—प्यार।’ यहाँ ‘प्यार’ उन सामाजिक सम्बन्धों के बरक्स उपस्थित होता है जो पाखंड, विभाजन और कृत्रिमता से उलझे हुए हैं। इमैनुएल लेविनास (Emmanuel Levinas) की ‘दूसरे की नैतिकता’ (Ethics of the Other) के सन्दर्भ में प्रेम को केवल निजी भावना न मानकर दूसरे मनुष्य के प्रति उत्तरदायित्व और उसकी उपस्थिति को स्वीकार करने वाली नैतिक संवेदना के रूप में देखा जा सकता है। कविता का ‘गहरा’ और ‘सच्चा’ प्यार इसी अर्थ में सम्बन्ध को सामाजिक व्यवहार की सतह से उठाकर मानवीय आत्मीयता के स्तर पर ले जाता है।

मार्था नुसबाम (Martha Nussbaum) की ‘सक्षमता’ (Capabilities) सम्बन्धी अवधारणा के आलोक में भी प्रेम को मनुष्य की गरिमा, संवेदनशीलता और दूसरे के दुःख-सुख के प्रति प्रत्युत्तर देने की क्षमता से जोड़ा जा सकता है। कविता में प्रेम मृत्यु को रोकने या मनुष्य को अमर बनाने का दावा नहीं करता—‘मेरी / अमरता की नहीं देंगे ये दुहाई।’ उसकी नैतिक सार्थकता अमरता में नहीं, बल्कि नश्वर जीवन को मानवीय बनाने में है। इसीलिए प्रेम यहाँ किसी भावुक आश्वासन की जगह मनुष्य की प्रामाणिक और उत्तरदायी उपस्थिति का संकेत बन जाता है।

वाल्टर बेंजामिन (Walter Benjamin) की आधुनिकता, इतिहास और स्मृति की दृष्टि से कविता की अन्तिम पंक्तियाँ—‘राख-सी / साँझ, बुझे दिन की घिर जाएगी’—विशेष अर्थ ग्रहण करती हैं। ‘राख’ किसी बीती हुई उपस्थिति का अवशेष है और ‘बुझा दिन’ उस समय का संकेत है जो अब लौटकर नहीं आएगा। बेंजामिन के यहाँ इतिहास को केवल निरन्तर प्रगति की कथा के रूप में नहीं, बल्कि टूटे हुए अनुभवों, खोई हुई सम्भावनाओं और बचे हुए अवशेषों के रूप में भी देखा जा सकता है। इसी दृष्टि से ‘घर’ और ‘राख’ व्यक्ति के चले जाने के बाद बची हुई स्मृति के दो रूपक बन जाते हैं। घर जीवन के भौतिक अवशेष को धारण करता है और राख उसके क्षय तथा अनुपस्थिति को।

इस प्रकार कविता में ‘प्यार’ और ‘राख’ एक सार्थक विरोध रचते हैं। ‘राख’ नश्वरता और क्षय का संकेत है, जबकि ‘प्यार’ उस नश्वरता के भीतर मनुष्य द्वारा निर्मित नैतिक और आत्मीय सम्बन्ध की सम्भावना। संसार मनुष्य से उसकी देह, उसके स्वप्न और अन्ततः उसकी उपस्थिति छीन सकता है, लेकिन उसके द्वारा जिया गया सच्चा सम्बन्ध स्मृति और मानवीय संवेदना में प्रतिध्वनित हो सकता है। फिर भी कवि इसे अमरता नहीं कहता। यही संयम कविता को दार्शनिक गहराई देता है।

इस दृष्टि से ‘घर रहेंगे’ मृत्यु और अनुपस्थिति की कविता होते हुए भी अन्ततः मानवीय सम्बन्ध की कविता है। मनुष्य चला जाता है, घर और संसार कुछ समय तक बने रहते हैं, दिन बुझते हैं और ‘संसृति’ अपने क्रम को दोहराती है; लेकिन इस निरन्तर क्षय के बीच ‘कहीं गहरा, कहीं सच्चा’ प्यार मनुष्य के अस्तित्व को नैतिक अर्थ प्रदान करता है। बेंजामिन की दृष्टि से बची हुई स्मृति और लेविनास की दृष्टि से दूसरे के प्रति उत्तरदायित्व—ये दोनों मिलकर कविता के उस मानवीय आशय को उजागर करते हैं जिसमें नश्वरता के बीच भी संवेदना और आत्मीयता को बचाए रखने की आकांक्षा मौजूद है।

भारतीय दार्शनिक परम्परा के आलोक में ‘घर रहेंगे’ कविता को पढ़ने पर जीवन, देह, संसार, नश्वरता और मनुष्य की अर्थ-खोज के प्रश्न एक व्यापक दार्शनिक परिप्रेक्ष्य ग्रहण करते हैं। कविता की आरम्भिक पंक्तियाँ—‘घर / रहेंगे, / हमीं उनमें रह न पाएँगे’—मनुष्य की अस्थायित्वपूर्ण उपस्थिति और संसार की अपेक्षाकृत दीर्घ निरन्तरता के बीच एक गहरी विडम्बना रचती हैं। मनुष्य घर बनाता है, उसमें अपने जीवन के अनुभव और स्मृतियाँ संचित करता है, लेकिन स्वयं उस घर में हमेशा रहने वाला नहीं है। यहाँ ‘घर’ केवल भौतिक संरचना नहीं, बल्कि उस संसार का प्रतीक है जिसमें मनुष्य अपने अस्तित्व को अर्थ देता है। मनुष्य और उसके द्वारा निर्मित संसार के बीच यही सम्बन्ध भारतीय दर्शन में देह, जगत् और आत्म-अस्तित्व के प्रश्नों के साथ संवाद स्थापित करता है।

भगवद्गीता के दूसरे अध्याय का प्रसिद्ध श्लोक इस सन्दर्भ में विशेष रूप से ध्यातव्य है—

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि
संयाति नवानि देही॥

गीता में कहा गया है कि जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार देही पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करता है। यहाँ गीता देह को परिवर्तनशील और आत्मतत्त्व को उससे भिन्न मानती है। कुँवर नारायण की कविता का आग्रह इससे अलग है, क्योंकि वे आत्मा के पुनर्जन्म या देह से परे किसी स्थायी सत्ता की स्थापना नहीं करते; फिर भी ‘घर रहेंगे, हमीं उनमें रह न पाएँगे’ में देह और संसार की अस्थायित्वपूर्ण स्थिति को लेकर जो प्रश्न उठता है, वह गीता के देह-विषयक चिन्तन के साथ एक सार्थक संवाद बना सकता है। गीता में देह परिवर्तनशील है; कविता में मनुष्य की देह और उसकी उपस्थिति संसार में स्थायी नहीं है। दोनों के बीच सम्बन्ध समानता का नहीं, प्रश्नों का है।

कविता की पंक्ति ‘समय / होगा, हम अचानक बीत जाएँगे’ इस दार्शनिक संवाद को और गहरा करती है। यहाँ मनुष्य स्वयं ‘बीत’ जाता है, जबकि समय बना रहता है। भारतीय चिन्तन में संसार को निरन्तर परिवर्तनशील और गतिशील माना गया है। भगवद्गीता में भी जन्म और मृत्यु को संसार की अनिवार्य प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया गया है—

जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

इस छंद में कहा गया है कि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है और जिसकी मृत्यु हुई है उसका जन्म निश्चित है; इसलिए जो अपरिहार्य है, उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए। कुँवर नारायण इस दार्शनिक स्थिति को किसी उपदेश या समाधान में नहीं बदलते। उनके यहाँ मृत्यु के प्रति सजगता जीवन की विडम्बना और अर्थ की खोज को अधिक तीखा बनाती है। ‘हम अचानक बीत जाएँगे’ में मृत्यु की निश्चितता के साथ यह बोध जुड़ा है कि मनुष्य अपने जीवन को जितना दीर्घ और निरन्तर अनुभव करता है, मृत्यु के सामने वह उतना ही क्षणिक दिखाई पड़ सकता है।

इसी बिन्दु पर उपनिषद के एक छंद के साथ कविता का सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। कठोपनिषद् में आत्मा के सम्बन्ध में कहा गया है—

न जायते म्रियते वा विपश्चिन्
नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

अर्थात ज्ञानी आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है; वह अजन्मा, नित्य और शाश्वत है तथा शरीर के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती। इस दृष्टि से ‘घर रहेंगे’ की कविता के साथ एक दिलचस्प दार्शनिक तनाव पैदा होता है। उपनिषद् शरीर के विनाश के पार आत्मा की नित्यता का प्रश्न उठाता है, जबकि कुँवर नारायण की कविता मनुष्य की सांसारिक उपस्थिति, घर, देह, समय और स्मृति के स्तर पर नश्वरता का अनुभव करती है। इसलिए कविता को कठोपनिषद् के कथन का आधुनिक काव्यात्मक रूप मानना उचित नहीं होगा। दोनों के बीच अधिक सार्थक सम्बन्ध उस प्रश्न में है कि मनुष्य के नश्वर देहधारी अस्तित्व का अर्थ क्या है और मृत्यु के सामने उसके ‘होने’ की वास्तविकता किस प्रकार समझी जाए।

इसी कारण कविता की पंक्ति ‘मृत्यु / होगी खड़ी सम्मुख राह रोके’ विशेष अर्थ ग्रहण करती है। मृत्यु यहाँ केवल जैविक अन्त नहीं, बल्कि जीवन को उसके वास्तविक परिप्रेक्ष्य में देखने वाली सीमा है। भारतीय दार्शनिक परम्परा में मृत्यु को जीवन के विचार से अलग नहीं किया गया। नचिकेता और यम का संवाद इसी अर्थ में मृत्यु के माध्यम से अस्तित्व के रहस्य को समझने का प्रयास है। ‘घर रहेंगे’ में भी मृत्यु के सामने पहुँचकर मनुष्य अपने जीवन को नए ढंग से देखने लगता है—‘हम / जगेंगे यह विविधता, / स्वप्न, खो के।’ यहाँ ‘जगना’ मृत्यु के बाद की किसी आध्यात्मिक अवस्था का संकेत नहीं, बल्कि मृत्यु-बोध के कारण जीवन के प्रति उत्पन्न होने वाली नई सजगता है।

‘स्वप्न, खो के’ को भारतीय दार्शनिक परम्परा के ‘माया’ सम्बन्धी विचार से भी जोड़ा जा सकता है, लेकिन यहाँ सावधानी आवश्यक है। कविता संसार को मिथ्या नहीं कहती। वह मनुष्य की उन धारणाओं पर प्रश्न उठाती है जिनके आधार पर वह अपने जीवन, सम्बन्धों और भविष्य को स्थायी मान लेता है। स्वप्न मनुष्य की आकांक्षाओं का संसार है; वह भविष्य को वर्तमान में उपस्थित करता है। मृत्यु इस भविष्य की निश्चितता को तोड़ देती है। तब मनुष्य ‘विविधता’ को देखता है—अर्थात् वह जीवन को केवल उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं के रूप में नहीं, बल्कि उसके जीए हुए अनुभवों की बहुलता के रूप में पहचानने लगता है।

बौद्ध दर्शन का अनित्यत्व-बोध इस स्तर पर कविता से और निकटता से संवाद करता है। बौद्ध चिन्तन में कोई भी उत्पन्न वस्तु स्थायी नहीं है; वह परिवर्तन, क्षय और विनाश के अधीन है। ‘राख-सी / साँझ, बुझे दिन’ कविता में इसी परिवर्तनशीलता का सघन दृश्यात्मक रूप है। दिन प्रकाश और जीवन का संकेत है, जबकि ‘बुझा दिन’ उसके क्षय का। ‘राख’ उस वस्तु का अवशेष है जो कभी अपने पूर्ण रूप में उपस्थित थी। इस प्रकार राख केवल मृत्यु का बिम्ब नहीं, बल्कि अनित्यत्व का बिम्ब है—रूप का अवशेष में बदल जाना।

कविता के अन्त में ‘वही / रोज़ संसृति का अपव्यय दुहराएगी’ इस अनित्यत्व को चक्राकार जीवन-गति से जोड़ता है। व्यक्ति समाप्त होता है, लेकिन संसृति चलती रहती है। एक दिन बुझता है और दूसरा दिन आता है; एक जीवन समाप्त होता है और दूसरा जीवन आरम्भ होता है। यहाँ व्यक्तिगत समय और व्यापक संसार-समय के बीच अन्तर स्पष्ट होता है। व्यक्ति के लिए मृत्यु अन्तिम है, लेकिन संसार के लिए वह निरन्तरता के भीतर घटित होने वाली एक घटना है। ‘अपव्यय’ शब्द इस निरन्तरता को उत्सवपूर्ण नहीं रहने देता; वह संकेत करता है कि जीवन की ऊर्जा, समय और सम्भावनाएँ लगातार खर्च होती रहती हैं।

फिर भी कविता का संसार केवल क्षय और नश्वरता का संसार नहीं है। ‘प्रकृति औ’ पाखंड के ये घने लिपटे / बँटे, ऐंठे / तार—’ के बाद कवि कहता है—‘जिनसे / कहीं गहरा, / कहीं सच्चा, / मैं / समझता—प्यार।’ यहाँ प्रेम नश्वर संसार के भीतर मानवीय प्रामाणिकता की सम्भावना बनकर उभरता है। भारतीय दार्शनिक परम्परा के सन्दर्भ में इसे संसार से पलायन के रूप में नहीं, बल्कि संसार के भीतर रहते हुए सम्बन्धों को अधिक सजगता और आत्मीयता के साथ जीने की सम्भावना के रूप में समझना अधिक उचित होगा।

इस दृष्टि से ‘मेरी / अमरता की नहीं देंगे ये दुहाई’ पंक्ति भी निर्णायक है। कवि प्रेम को अमरता का साधन नहीं बनाता। वह यह दावा नहीं करता कि प्रेम मृत्यु को पराजित कर देगा। भारतीय दर्शन जहाँ देह की नश्वरता के पार आत्मा की नित्यता की सम्भावना पर विचार करता है, वहीं कुँवर नारायण का काव्यात्मक वक्ता अपनी अनुभूति को सांसारिक धरातल पर रखता है। उसके लिए प्रेम की सार्थकता इस बात में नहीं कि वह मनुष्य को अमर कर दे, बल्कि इस बात में है कि वह नश्वर जीवन को ‘गहरा’ और ‘सच्चा’ बना सके।

‘छीन / लेगा इन्हें हमसे देह-सा संसार’ में संसार को देह के समान बताना भी इसी नश्वरता-बोध को सघन करता है। देह की तरह संसार भी परिवर्तनशील है; वह किसी वस्तु, सम्बन्ध या अनुभव को स्थायी रूप से सुरक्षित नहीं रख सकता। यहाँ गीता और कविता के बीच एक अर्थपूर्ण अन्तरसंवाद दिखाई देता है। गीता देह के परिवर्तन के भीतर देही की नित्यता की बात करती है, जबकि कुँवर नारायण सांसारिक जीवन के स्तर पर इस परिवर्तनशीलता को स्वीकार करते हुए भी उसके भीतर प्रेम और आशय की खोज जारी रखते हैं।

इस प्रकार भारतीय दार्शनिक परम्परा के साथ ‘घर रहेंगे’ का सम्बन्ध प्रत्यक्ष अनुकरण का नहीं, बल्कि प्रश्नों और संवेदनाओं के संवाद का है। उपनिषद् मृत्यु के पार आत्मा की सम्भावना पर विचार करता है; गीता देह के परिवर्तन और जीवन-मृत्यु की अनिवार्यता को समझाती है; बौद्ध दर्शन अनित्यत्व के माध्यम से स्थायित्व की धारणा को प्रश्नांकित करता है। कुँवर नारायण की कविता इन दार्शनिक प्रश्नों को आधुनिक मनुष्य के घरेलू, सामाजिक और आत्मीय जीवन में पुनः उपस्थित करती है। ‘घर’ में रहने वाला मनुष्य चला जाता है, समय बना रहता है, स्वप्न खो जाते हैं, देह नष्ट होती है और ‘संसृति’ अपना क्रम दोहराती रहती है। फिर भी मनुष्य के पास अपने सीमित जीवन को अर्थवान बनाने के लिए ‘प्यार’ की सम्भावना बची रहती है।

इसलिए कविता का दार्शनिक आशय न तो केवल मृत्यु है, न केवल अनित्यत्व और न ही अमरता की खोज। इसका केन्द्र उस मानवीय चेतना में है जो अपनी नश्वरता को पहचान लेने के बाद भी जीवन से विमुख नहीं होती। ‘घर रहेंगे’ भारतीय दर्शन के अनित्य-बोध को आधुनिक अस्तित्वगत संवेदना से जोड़ते हुए यह प्रश्न सामने रखती है कि जब मनुष्य जानता है कि उसे ‘अचानक बीत’ जाना है, तब वह अपने वर्तमान को किस प्रकार जीए। कविता का उत्तर किसी सिद्धान्त में नहीं, बल्कि ‘कहीं गहरे, कहीं सच्चे’ प्यार में निहित है। इस अर्थ में नश्वरता यहाँ जीवन के निषेध का कारण नहीं बनती; वह जीवन, सम्बन्ध और आत्मीयता के प्रति अधिक सजग होने का आधार बन जाती है।

उत्तर-संरचनावादी दृष्टि से ‘घर रहेंगे’ का पाठ उन द्वैतों को पहचानने से शुरू किया जा सकता है जिनके सहारे कविता अपना अर्थ निर्मित करती है और फिर उन्हीं द्वैतों को अस्थिर भी करती है। जाक देरिदा (Jacques Derrida) की उपस्थिति/अनुपस्थिति, स्थायित्व/अस्थायित्व और अर्थ के स्थगन सम्बन्धी अवधारणाओं के आलोक में पहली ही पंक्ति—‘घर / रहेंगे, / हमीं उनमें रह न पाएँगे’—एक बुनियादी द्वंद्व स्थापित करती है। ‘घर’ उपस्थिति, स्थायित्व और निरन्तरता का संकेत बनता है, जबकि ‘हम’ अनुपस्थिति और नश्वरता के। लेकिन कविता जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, यह स्पष्ट होता है कि घर की उपस्थिति भी पूर्ण और स्वतन्त्र उपस्थिति नहीं है; उसका अर्थ उस मनुष्य की स्मृति से बनता है जो वहाँ अब मौजूद नहीं है। इस प्रकार उपस्थिति अपने भीतर अनुपस्थिति को धारण करती है।

यही संरचना ‘समय / होगा, हम अचानक बीत जाएँगे’ में भी दिखाई देती है। समय स्थायी प्रतीत होता है और मनुष्य बीत जाने वाली सत्ता के रूप में सामने आता है, लेकिन ‘समय’ भी मनुष्य के अनुभव से अलग कोई पूर्ण अर्थ नहीं रखता। समय को हम स्मृति, अनुभव और जीवन की घटनाओं के माध्यम से ही अर्थ देते हैं। इस प्रकार स्थायित्व और अस्थायित्व का द्वैत स्थिर नहीं रहता। जो स्थायी दिखाई देता है, उसमें भी परिवर्तन निहित है और जो बीत जाता है, उसकी स्मृति में किसी प्रकार की उपस्थिति बनी रह सकती है।

देरिदा की ‘अर्थ के अन्तर और स्थगन’ या डिफरांस (difference) की अवधारणा के संदर्भ में कविता का ‘आशय’ भी ध्यान देने योग्य है—‘एक / आशय तक पहुँच सहसा बहुत थक जाएँगे।’ मनुष्य किसी अन्तिम अर्थ या निश्चित आशय तक पहुँचना चाहता है, लेकिन कविता उस आशय को स्पष्ट और अन्तिम रूप में परिभाषित नहीं करती। ‘आशय’ एक खुला हुआ संकेत बना रहता है। पाठक जितना उसके निकट जाता है, उतना ही वह नए अर्थों की ओर खुलता जाता है। इसलिए कविता किसी एक अन्तिम अर्थ पर समाप्त नहीं होती; उसका अर्थ लगातार स्थगित और पुनर्निर्मित होता रहता है।

‘मृत्यु / होगी खड़ी सम्मुख राह रोके’ में भी जीवन और मृत्यु का द्वैत सरल नहीं रहता। सामान्यतः जीवन को उपस्थिति और मृत्यु को अनुपस्थिति माना जा सकता है, लेकिन कविता मृत्यु को जीवन के भीतर ही उपस्थित कर देती है। मृत्यु की सम्भावना के कारण जीवन अपने अर्थ को पहचानता है। इस प्रकार अनुपस्थिति ही उपस्थिति को अर्थ प्रदान करने लगती है। ‘हम / जगेंगे यह विविधता, / स्वप्न, खो के’ में भी खोना और पाना, स्वप्न और जागरण, अनुपस्थिति और उपस्थिति एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं। स्वप्न के खोने के बाद ही एक नए प्रकार का जागरण सम्भव होता है।

कविता में ‘प्यार’ भी इसी तरह किसी स्थिर अर्थ में बँधा नहीं रहता। ‘प्रकृति / औ’ पाखंड के ये घने लिपटे / बँटे, ऐंठे / तार’ के बरक्स ‘कहीं गहरा, / कहीं सच्चा, / मैं / समझता—प्यार’ आता है। यहाँ प्रेम पाखंड के विपरीत दिखाई देता है, लेकिन कवि उसे कोई पूर्ण या शाश्वत समाधान नहीं बनाता। अगली ही पंक्तियाँ कहती हैं—‘मेरी / अमरता की नहीं देंगे ये दुहाई।’ अर्थात् प्रेम है, लेकिन अमरता नहीं; सम्बन्ध है, लेकिन स्थायित्व की गारंटी नहीं। इस प्रकार कविता प्रेम को भी उस द्वैत से मुक्त कर देती है जिसमें उसे सामान्यतः मृत्यु के प्रतिरोध या अमरता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। प्रेम की सार्थकता उसकी स्थायित्व-क्षमता में नहीं, बल्कि उसकी गहराई और सच्चाई में है।

रोलाँ बार्थ की संकेत-विज्ञान की दृष्टि से ‘घर’ एक सांस्कृतिक संकेत के रूप में विशेष महत्त्व रखता है। सामान्य सांस्कृतिक अर्थ-व्यवस्था में घर सुरक्षा, परिवार, अपनत्व, स्थायित्व और ‘बिलोंगिंग (belonging) का संकेत है। लेकिन कविता इस स्थापित सांस्कृतिक अर्थ को उलट देती है। ‘घर रहेंगे’ सुनते ही स्थायित्व की छवि बनती है, लेकिन तुरन्त ‘हमीं उनमें रह न पाएँगे’ उस छवि को विखण्डित कर देता है। घर का रहना मनुष्य के रहने की गारंटी नहीं है। इस प्रकार कविता ‘घर’ के सांस्कृतिक मिथक को उसके भीतर छिपी नश्वरता से जोड़ देती है।

इसी प्रकार ‘घर’ का संकेत केवल भौतिक भवन तक सीमित नहीं रहता। वह स्मृति, अनुपस्थिति और बीते हुए जीवन का संकेत भी बन जाता है। मनुष्य के चले जाने के बाद घर में उसकी उपस्थिति नहीं, बल्कि उसकी अनुपस्थिति के चिह्न रह जाते हैं। इसलिए ‘घर’ एक ऐसा संकेत है जिसका अर्थ लगातार बदलता है—वह कभी आश्रय है, कभी स्मृति, कभी वियोग और कभी नश्वरता का बोध।

‘भीड़’ भी इसी संकेत-परिवर्तन का उदाहरण है। सामान्यतः भीड़ सामाजिकता और सामूहिक उपस्थिति का संकेत हो सकती है, लेकिन ‘चलते भीड़ में कंधे रगड़ कर हम / अचानक / जा रहे होंगे कहीं सदियों अलग होके’ में भीड़ सामूहिक निकटता के भीतर छिपे अकेलेपन का संकेत बन जाती है। ‘कंधे रगड़ना’ शारीरिक निकटता है, लेकिन ‘सदियों अलग होके’ अस्तित्वगत दूरी। इस प्रकार कविता ‘भीड़’ के सामान्य अर्थ को उलटकर उसे अलगाव और अकेलेपन की ओर ले जाती है।

अन्ततः ‘राख-सी / साँझ, बुझे दिन’ कविता के संकेत-तंत्र को और जटिल बनाते हैं। ‘साँझ’ दिन और रात के बीच की अवस्था है; ‘राख’ उपस्थिति और अनुपस्थिति के बीच बचा हुआ अवशेष। ये दोनों स्पष्ट सीमाओं के बजाय संक्रमण की अवस्थाएँ हैं। यही कविता की अर्थ-प्रक्रिया का भी स्वभाव है। जीवन और मृत्यु, उपस्थिति और अनुपस्थिति, स्थायित्व और अस्थायित्व, स्वप्न और जागरण, भीड़ और अकेलापन—इनमें से कोई भी द्वैत पूरी तरह स्थिर नहीं रहता। प्रत्येक अपने विपरीत को भीतर धारण करता है।

इस प्रकार उत्तर-संरचनावादी पाठ में ‘घर रहेंगे’ का अर्थ किसी एक निश्चित निष्कर्ष में बन्द नहीं होता। ‘घर’ में अनुपस्थिति है, ‘मृत्यु’ में जीवन का बोध है, ‘स्वप्न’ में जागरण की सम्भावना है, ‘भीड़’ में अकेलापन है और ‘प्यार’ में आत्मीयता के साथ नश्वरता भी। देरिदा की दृष्टि से कविता का अर्थ इन्हीं लगातार बदलते अन्तरों और स्थगनों में निर्मित होता है, जबकि बार्थ की संकेत-विज्ञान हमें दिखाती है कि ‘घर’, ‘भीड़’, ‘स्वप्न’, ‘राख’ और ‘प्यार’ जैसे शब्द अपने सांस्कृतिक अर्थों को ग्रहण करके कविता में नए अर्थ पैदा करते हैं। इसीलिए ‘घर रहेंगे’ का काव्य-संसार स्थिर अर्थों का संसार नहीं, बल्कि अर्थों के निरन्तर पुनर्गठन का संसार है—जहाँ मनुष्य की अनुपस्थिति ही घर की उपस्थिति को अर्थ देती है और नश्वरता ही प्रेम की ‘गहराई’ और ‘सच्चाई’ को अधिक स्पष्ट करती है।

‘नश्वरता और अर्थ’ के द्वंद्व के रूप में ‘घर रहेंगे’ कविता को पढ़ने पर उसकी विभिन्न दार्शनिक, अस्तित्ववादी और सामाजिक दृष्टियाँ एक साझा केन्द्र में आ जाती हैं। कविता का आरम्भ ही मनुष्य और संसार की असमान गति को सामने रखता है—‘घर रहेंगे, / हमीं उनमें रह न पाएँगे’। घर यहाँ केवल भौतिक संरचना नहीं, बल्कि स्थायित्व, स्मृति और संसार का प्रतीक है; इसके विपरीत मनुष्य अपनी सीमित देह और जीवन के कारण नश्वर है। इसी तरह ‘समय होगा, हम अचानक बीत जाएँगे’ में समय के बने रहने और मनुष्य के बीत जाने का बोध उसकी अस्तित्वगत सीमितता को रेखांकित करता है।

‘अनर्गल ज़िंदगी ढोते’ हुए ‘एक आशय’ तक पहुँचने और वहाँ ‘बहुत थक’ जाने की स्थिति मनुष्य की उस तलाश को व्यक्त करती है जिसमें वह अपने अस्तित्व को कोई अर्थ देना चाहता है। लेकिन मृत्यु ‘सम्मुख राह रोके’ खड़ी है। उसके सामने मनुष्य को अपने स्वप्न, अपनी बनाई हुई निश्चितताओं और जीवन की विविधता का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ता है। भीड़ में कंधे रगड़ते हुए भी ‘सदियों अलग होके’ चले जाना इस विडम्बना को व्यक्त करता है कि सामाजिक निकटता मनुष्य की अस्तित्वगत अकेलेपन को समाप्त नहीं करती।

कविता का एक निर्णायक मोड़ ‘प्रकृति’ और ‘पाखंड’ के ‘घने लिपटे’ तारों के बीच ‘कहीं गहरा, कहीं सच्चा’ प्यार की पहचान में आता है। यहाँ प्यार कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो मृत्यु को पराजित कर दे। कवि स्पष्ट करता है कि वह ‘मेरी अमरता की नहीं देंगे ये दुहाई’। अर्थात् प्रेम मनुष्य को अमर बनाने का दावा नहीं करता; उसका मूल्य इस बात में है कि वह नश्वर जीवन को अधिक सच्चा, आत्मीय और अर्थवान बनाता है। इसीलिए प्रेम अमरता का विकल्प नहीं, बल्कि नश्वरता के भीतर अर्थ की सम्भावना है।

अन्तिम बिम्ब—‘राख-सी साँझ, बुझे दिन की’—जीवन के क्षय और मृत्यु की ओर लौटते समय का संकेत देता है। फिर भी ‘संसृति का अपव्यय’ रोज़ दोहराया जाता है। व्यक्ति समाप्त हो जाता है, लेकिन संसार, समय और जीवन-चक्र चलता रहता है। इस प्रकार कविता नश्वरता को केवल निराशा के रूप में प्रस्तुत नहीं करती। उसका मूल प्रश्न यह है कि जब मनुष्य, सम्बन्ध, देह और स्वप्न सभी क्षणभंगुर हैं, तब जीवन को अर्थ कहाँ से मिले। कुँवर नारायण का उत्तर ‘प्यार’ में दिखाई देता है—ऐसा प्यार जो अमरता का भ्रम नहीं देता, बल्कि मृत्यु और नश्वरता की सच्चाई को स्वीकार करते हुए जीवन में प्रामाणिकता, आत्मीयता और अर्थ की सम्भावना पैदा करता है।

सन्दर्भ

बुनियादी पाठ

कुँवर नारायण. ‘घर रहेंगे’. https://www.hindwi.org/kavita/ghar-rahenge-kunwar-narayan-kavita?sort=popularity-desc

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*प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय.संपर्क. raviranjan@uohyd.ac.in


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