रचना समयकी इस प्रस्तुति में समकालीन हिन्दी कथा-साहित्य की महत्त्वपूर्ण कथाकार सारा राय की चर्चित कहानी अबाबील की उड़ान पर केन्द्रित वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन का यह आलेख कहानी के बहुस्तरीय अर्थ-संसार को नई दृष्टि से उद्घाटित करता है। आलेख में रेशमा की बाल-दृष्टि के माध्यम से निर्मित उस संवेदनात्मक जगत का सूक्ष्म विश्लेषण किया हैजहाँ कल्पना और यथार्थभय और विस्मयस्मृति और अनुभव एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। कहानी में उपस्थित बाल-चेतनामृत्यु-बोध और आशा की अंतर्धाराओं को जिस गहनता और संवेदनशीलता के साथ पढ़ा गया हैवह पाठक को रचना के भीतरी अर्थ-स्तरों तक पहुँचने का अवसर प्रदान करता है।

यह आलेख ख़ास तौर से इसलिए उल्लेखनीय है कि यह अबाबील की उड़ान कहानी को केवल बचपन की स्मृतियों की कथा मानकर नहीं रुकताबल्कि उसकी प्रतीकात्मक संरचनाकथा-शिल्पअस्तित्वगत प्रश्नों तथा उत्तर-आधुनिक अर्थ-संभावनाओं की भी गंभीर पड़ताल करता है। चूहेसाँपगिद्धपानीआँधी और अबाबील जैसे प्रतीकों के माध्यम से कहानी में निहित जीवन-मृत्युभय-आशा और क्षय-पुनर्निर्माण के जटिल संबंधों को समझने का यह प्रयास हिन्दी आलोचना में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप है। हमें विश्वास है कि यह विवेचन पाठकों को सारा राय की कहानी-कला के नए आयामों से परिचित कराएगा और कहानी पर आगे के विमर्श को भी समृद्ध करेगा।

-हरि भटनागर

 

बाल-चेतना, मृत्यु-बोध और प्रतीकात्मक संरचना : सारा राय की अबाबील की उड़ानका पुनर्पाठ

रवि रंजन

समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में सारा राय का नाम उन रचनाकारों में लिया जाता है जिन्होंने साधारण जीवनानुभवों के भीतर छिपी हुई जटिल मानवीय संवेदनाओं को अत्यंत सूक्ष्म कलात्मकता के साथ अभिव्यक्त किया है। उनकी कहानियाँ प्रायः किसी बड़े सामाजिक या ऐतिहासिक आख्यान का निर्माण नहीं करतीं, बल्कि अनुभव के उन महीन स्तरों तक पहुँचती हैं जहाँ स्मृति, संवेदना, भय, आकांक्षा और आत्म-अनुभूति एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। अबाबील की उड़ान ऐसी ही एक महत्त्वपूर्ण कहानी है, जो पहली दृष्टि में बचपन की दुनिया, भाई-बहनों के संबंधों, खेलों और घरेलू जीवन की एक सहज कथा प्रतीत होती है, किन्तु गहरे स्तर पर यह मनुष्य के अस्तित्वगत अनुभवों से जुड़ी हुई रचना है। यह कहानी बाल-मन की उस विशिष्ट संरचना को उद्घाटित करती है जिसमें यथार्थ और कल्पना, स्वप्न और स्मृति, भय और आशा, जीवन और मृत्यु के बीच कोई कठोर विभाजन नहीं होता।

कहानी का केंद्र रेशमा नामक एक बच्ची है, जिसके अनुभवों के माध्यम से पाठक एक ऐसे संसार में प्रवेश करता है जहाँ लोकविश्वास, पारिवारिक मिथक, बच्चों के खेल, प्राकृतिक दृश्य और आकस्मिक घटनाएँ मिलकर अर्थ की एक जटिल संरचना निर्मित करते हैं। रेशमा संसार को तर्क और विवेक की स्थापित प्रणालियों के माध्यम से नहीं, बल्कि विस्मय, जिज्ञासा और कल्पना के सहारे समझती है। इसीलिए साधु का श्राप, साँप की आँख, सपनों में लौटते हुए मृत लोग, पीले गिद्धों का आगमन और आकाश में उड़ती हुई अबाबील—ये सब उसके अनुभव-जगत के समान रूप से वास्तविक तत्व हैं। कथा का सौंदर्य इसी बात में निहित है कि वह बाल-चेतना की इस विशिष्ट तर्क-प्रणाली को पूरी गंभीरता के साथ स्वीकार करती है और उसे किसी वयस्क व्याख्या के अधीन नहीं करती।

कहानी के भीतर मृत्यु-बोध की उपस्थिति विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है। मृत्यु यहाँ किसी एक घटना के रूप में नहीं आती, बल्कि धीरे-धीरे विकसित होने वाली अनुभूति के रूप में सामने आती है। बच्चों के ‘मरने’ के खेल से लेकर साँप की लाश, मृत्यु से जुड़े स्वप्न, गिद्धों की रहस्यमय उपस्थिति और अंततः भाई की दुर्घटना तक, पूरी कथा में मृत्यु एक अदृश्य लेकिन निरंतर सक्रिय उपस्थिति बनी रहती है। किंतु यह मृत्यु-बोध भय की स्थिर अनुभूति में परिणत नहीं होता; उसके भीतर जिज्ञासा, रहस्य और आशा के तत्व भी मौजूद रहते हैं। यही कारण है कि कहानी मृत्यु को केवल अनुपस्थिति या विनाश के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की अर्थवत्ता को तीव्र करने वाली अनुभूति के रूप में भी प्रस्तुत करती है।

इसके साथ ही, अबाबील की उड़ान अपनी प्रतीकात्मक संरचना के कारण भी विशेष महत्त्व रखती है। चूहे, साँप, गिद्ध, पानी, आँधी, सेमल का पेड़ और अबाबील जैसे बिंब कथा में केवल सजावटी तत्व नहीं हैं; वे पात्रों की मानसिक अवस्थाओं और कहानी की अंतर्ध्वनियों को व्यक्त करने वाले सक्रिय प्रतीक हैं। विशेष रूप से अबाबील का प्रतीक कथा के अंतिम हिस्से में आशा, मुक्ति और जीवन की अविनाशी संभावना का रूप ग्रहण कर लेता है। इसी प्रकार गिद्ध मृत्यु की छाया, पानी जीवन और विनाश की द्वैत सत्ता, तथा आँधी अस्तित्वगत अस्थिरता का संकेत बनकर उभरते हैं। इन प्रतीकों के माध्यम से कहानी अपने तात्कालिक कथानक से आगे बढ़कर व्यापक मानवीय अर्थों का अर्जन करती है।

कथाशिल्प की दृष्टि से भी यह कहानी आधुनिक हिंदी कथा-कला की उल्लेखनीय उपलब्धि है। यहाँ कोई रैखिक कथानक नहीं है, न कोई नाटकीय उत्कर्ष। कहानी की वास्तविक गति रेशमा की चेतना के भीतर घटित होती है। छोटी-छोटी घटनाएँ, स्मृतियाँ, आशंकाएँ और अनुभव मिलकर एक ऐसी भावात्मक संरचना का निर्माण करते हैं जो पाठक पर गहरा प्रभाव छोड़ती है। इस अर्थ में कहानी बाह्य यथार्थ से अधिक आंतरिक यथार्थ की कथा है। साथ ही, इसका खुला और अनिश्चित अंत इसे उत्तर-आधुनिक संवेदना से भी जोड़ता है, जहाँ किसी अंतिम सत्य की स्थापना के बजाय अर्थ की अनेक संभावनाओं को जीवित रखा जाता है।

इन सभी संदर्भों को ध्यान में रखते हुए अबाबील की उड़ान का पुनर्पाठ यह समझने का अवसर प्रदान करता है कि सारा राय किस प्रकार बाल-चेतना के माध्यम से मृत्यु, स्मृति, भय, आशा और अस्तित्व के जटिल प्रश्नों को रूपायित करती हैं। यह कहानी केवल एक बच्ची के अनुभवों की कथा नहीं है, बल्कि मनुष्य के उस आरंभिक बिंदु की भी कथा है जहाँ वह पहली बार जीवन की रहस्यमयता, मृत्यु की आहट और आशा की आवश्यकता को महसूस करना शुरू करता है। इसी कारण यह कहानी समकालीन हिंदी साहित्य की उन महत्त्वपूर्ण रचनाओं में शामिल है जो अपनी सरलता में गहरी दार्शनिक और कलात्मक जटिलता को समेटे हुए हैं।

सारा राय की कहानी अबाबील की उड़ान बचपन की चेतना, कल्पना, भय, मृत्यु-बोध और आशा की एक अत्यंत सूक्ष्म कथा है। यह कहानी किसी बड़ी घटना से नहीं, बल्कि एक बच्ची की दृष्टि से निर्मित संसार से आगे बढ़ती है। इसकी सबसे बड़ी शक्ति यही है कि लेखक ने संसार को वयस्कों की समझ से नहीं, बल्कि आठ वर्ष की रेशमा की आँखों से देखा है। इस कारण कहानी में जो कुछ घटित होता है, वह तथ्य और कल्पना, यथार्थ और जादू, भय और खेल, मृत्यु और जीवन के बीच लगातार आवाजाही करता रहता है।

कहानी की शुरुआत चूहों से होती है। चूहे यहाँ केवल चूहे नहीं हैं। वे घर के उन कोनों को जीवित कर देते हैं जो पहले निष्क्रिय थे। घर में एक अदृश्य हलचल भर जाती है। वयस्कों के लिए वे बीमारी और अपशकुन के प्रतीक हैं। लेकिन रेशमा के लिए वे आकर्षण और दोस्ती का विषय हैं। यहीं से कहानी दो दृष्टियों का निर्माण करती है। एक दुनिया बड़ों की है, जहाँ हर चीज़ का निश्चित अर्थ है। दूसरी दुनिया बच्चों की है, जहाँ हर वस्तु रहस्य से भरी हुई है। रेशमा बार-बार दूसरी दुनिया की तरफ खिंचती है।

रेशमा का स्कूल न जाना भी महत्त्वपूर्ण है। वह समाज की नियमित व्यवस्था से बाहर है। उसके पास देखने, सोचने और कल्पना करने का समय है। वह दाँत टूटने जैसी साधारण घटना को भी जादुई अनुभव में बदल देती है। चूहे के बिल में दाँत डालने की लोकमान्यता उसके लिए केवल विश्वास नहीं, एक खेल भी है। बचपन यहाँ ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि संसार को अलग तरह से देखने की क्षमता है।

पूरी कहानी में लोकविश्वासों का एक घना संसार मौजूद है। कुत्तोंवाली बुढ़िया, चुड़ैल, चूहे का बिल, साँप की आँख, मरे हुए लोगों के सपने, शैतान का समय, साधू का श्राप—ये सब बातें बच्चों की दुनिया का हिस्सा हैं। लेकिन लेखक इन विश्वासों का उपहास नहीं करता। वे रेशमा की मानसिक संरचना को समझने का माध्यम बनते हैं। बच्ची हर घटना को इन्हीं संकेतों की सहायता से समझती है। उसके लिए संसार कारण और परिणाम की वैज्ञानिक व्यवस्था से नहीं चलता। वह प्रतीकों और संयोगों से अर्थ बनाती है।

नीलिमा और भाइयों का प्रसंग कहानी को एक दूसरा आयाम देता है। भाइयों का व्यवहार क्रूर भी है और खेलपूर्ण भी। वे नीलिमा को चिढ़ाते हैं, अपमानित करते हैं और कभी-कभी उसके प्रति हिंसक भी हो जाते हैं। लेकिन कहानी इसे किसी नैतिक भाषण में नहीं बदलती। बच्चों के खेलों में मौजूद शक्ति-संबंध यहाँ बहुत स्वाभाविक ढंग से उभरते हैं। रेशमा की स्थिति विशेष रूप से जटिल है। वह नीलिमा के प्रति सहानुभूति रखती है, लेकिन भाइयों के समूह से बाहर भी नहीं होना चाहती। यह बचपन की सामाजिक राजनीति है। समूह में बने रहने की इच्छा कई बार नैतिक निर्णयों से अधिक प्रभावशाली हो जाती है।

कहानी में बार-बार मृत्यु का प्रसंग आता है। बच्चे ‘मरने’ का खेल खेलते हैं। साँप की लाश दिखाई देती है। सपनों में मरने वालों के नाम पुकारे जाते हैं। बिलासी की स्मृति आती है। पहली दृष्टि में ये सब अलग-अलग घटनाएँ लगती हैं। लेकिन धीरे-धीरे ये एक गहरे मृत्यु-बोध का निर्माण करती हैं। रेशमा अभी मृत्यु को समझती नहीं है। वह उसके आसपास घूमती है। उससे डरती भी है और उसकी तरफ आकर्षित भी होती है। जब वह पानी पर तैरते हुए शव की कल्पना करती है, तब मृत्यु भयावह नहीं लगती। उसमें एक विचित्र शांति दिखाई देती है। यही बचपन की दृष्टि है जिसमें मृत्यु अभी पूरी तरह त्रासदी नहीं बनी है।

साधु का प्रसंग कहानी का निर्णायक मोड़ है। साधू कोई बड़ा पात्र नहीं है, लेकिन उसका प्रभाव बहुत गहरा है। उसके शब्द रेशमा की चेतना में बैठ जाते हैं। “दस तारीख़ को देखना” जैसी अस्पष्ट धमकी उसके मन में भय का स्थायी बीज बो देती है। यही बच्चों की मानसिकता का यथार्थ है। वयस्क लोग किसी घटना को भूल जाते हैं, लेकिन बच्चे उसे भीतर जमा लेते हैं। साधू चला जाता है, पर उसका वाक्य कहानी के अंत तक जीवित रहता है।

पीले गिद्धों का दृश्य कहानी के सबसे सुंदर और रहस्यमय अंशों में है। गिद्ध सामान्यतः मृत्यु से जुड़े पक्षी माने जाते हैं। लेकिन रेशमा उन्हें खिलौने जैसी रंगीन चिड़ियाँ कहती है। यहाँ फिर वही दो दृष्टियाँ सामने आती हैं। अम्माँ के लिए वे मनहूस हैं। रेशमा के लिए वे अद्भुत हैं। कहानी का सौंदर्य इसी टकराव से पैदा होता है। संसार जैसा है और संसार जैसा दिखाई देता है, दोनों अलग-अलग हैं।

आँधी का प्रसंग भी उल्लेखनीय है। बच्चों की दुनिया में प्राकृतिक घटनाएँ हमेशा सामान्य नहीं होतीं। आँधी उन्हें क़यामत जैसी लगती है। लेकिन आँधी बीत जाती है और उसके बाद आम बटोरने का उत्सव शुरू हो जाता है। भय और आनंद एक-दूसरे में बदल जाते हैं। जीवन की यही लय कहानी में बार-बार दिखाई देती है।

कहानी का सबसे मार्मिक हिस्सा वह है जहाँ रात में फ़ोन आता है और अम्माँ का चेहरा बदल जाता है। यहाँ पहली बार बचपन की सुरक्षित दुनिया में वास्तविक त्रासदी प्रवेश करती है। अब तक मृत्यु खेल, सपना, कहानी या अंधविश्वास थी। अब वह एक वास्तविक संभावना बनकर सामने आती है। छोटे भाई के साथ दुर्घटना की खबर आती है। लेकिन लेखक घटना का विवरण नहीं देता। वह केवल रेशमा की प्रतिक्रिया दिखाता है। यही संयम कहानी को प्रभावशाली बनाता है।

रेलयात्रा के दौरान रेशमा का अपराधबोध अत्यंत सूक्ष्म ढंग से चित्रित हुआ है। उसे लगता है कि भाई की बीमारी का कारण शायद वही है। उसने कभी उसके ऊपर से छलाँग लगाई थी। यह सोच तर्कहीन है, लेकिन बच्चों की मनोवृत्ति में ऐसी बातें सहज हैं। बच्चे अक्सर घटनाओं का केंद्र स्वयं को मान लेते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी किसी छोटी हरकत से बड़ी दुर्घटना घट सकती है। लेखक ने इस मनोवैज्ञानिक सत्य को बड़ी सादगी से पकड़ा है।

कहानी का अंतिम दृश्य हिंदी कथा-साहित्य के अत्यंत सुंदर अंतों में गिना जा सकता है। आकाश में उड़ती हुई चिड़िया दिखाई देती है। रेशमा सोचती है कि यह अबाबील है। भाई ने उसे बताया था कि अबाबील सबसे ऊँची उड़ती है और पूरी तरह मुक्त होती है। यहाँ अबाबील केवल पक्षी नहीं रह जाती। वह आशा का रूपक बन जाती है। बच्ची के मन में एक सरल तर्क बनता है—यदि यह अबाबील है तो भाई अवश्य लौटेगा। इस तर्क का कोई यथार्थ आधार नहीं है। लेकिन मनुष्य का जीवन केवल तथ्यों से नहीं चलता। वह उम्मीदों, संकेतों और विश्वासों से भी चलता है। कहानी इसी विश्वास पर समाप्त होती है।

पूरी कहानी में सारा राय ने बचपन को किसी मासूम स्वर्ग की तरह नहीं दिखाया है। यहाँ डर है, क्रूरता है, अकेलापन है, मृत्यु की आहट है। लेकिन साथ ही विस्मय है, खेल है, कल्पना है और उम्मीद भी है। रेशमा की चेतना हर वस्तु को अर्थ से भर देती है। यही कारण है कि चूहा, साँप, गिद्ध, साधू और अबाबील सब एक ही अनुभव-संसार का हिस्सा बन जाते हैं। कहानी अंततः यह बताती है कि बच्चे संसार को केवल देखते नहीं, उसे लगातार रचते भी रहते हैं। और कई बार उनकी बनाई हुई दुनिया वयस्कों की दुनिया से कहीं अधिक जटिल, रहस्यमय और मानवीय होती है।

इस कहानी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह ऊपर से एक बच्ची की स्मृतियों और अनुभवों की कहानी लगती है, लेकिन भीतर अनेक स्तरों पर खुलती है। इसलिए इस पर एक नहीं, कई आलोचनात्मक दृष्टियों से गंभीर चर्चा संभव है।

अबाबील की उड़ान को बाल-चेतना के परिप्रेक्ष्य में पढ़ने पर सबसे पहले यह स्पष्ट होता है कि यह कहानी किसी बच्चे के बारे में नहीं, बल्कि बच्चे की दृष्टि से लिखी गई कहानी है। यह अंतर बहुत महत्त्वपूर्ण है। अनेक रचनाएँ बच्चों को विषय बनाती हैं, लेकिन उनकी दुनिया को वयस्क विवेक से समझाती हैं। यहाँ ऐसा नहीं है। पूरी कथा रेशमा की आँखों, उसके अनुभवों, उसके भय, उसकी जिज्ञासाओं और उसकी कल्पना के माध्यम से निर्मित होती है। पाठक संसार को वैसा नहीं देखता जैसा वह वस्तुतः है, बल्कि वैसा देखता है जैसा एक आठ वर्ष की बच्ची उसे देखती और समझती है। यही इस कहानी की सबसे बड़ी कलात्मक उपलब्धि है।

कहानी की शुरुआत से ही रेशमा की चेतना अपने विशिष्ट स्वरूप में सामने आती है। घर में चूहों की भरमार हो गई है। वयस्कों के लिए यह परेशानी की बात है। अम्माँ उन्हें बीमारी और अपशगुन से जोड़ती हैं। लेकिन रेशमा की प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग है। वह चूहों को पालना चाहती है। वह उन्हें अपने हाथ पर बैठाकर रोटी खिलाने की कल्पना करती है। यहाँ बाल-मन की एक बुनियादी विशेषता दिखाई देती है। बच्चा वस्तुओं को उनके सामाजिक अर्थों से नहीं, अपनी संवेदना से ग्रहण करता है। जहाँ बड़े खतरा देखते हैं, वहाँ बच्चा खेल और मित्रता देख सकता है। रेशमा के लिए चूहा कोई प्रतीक नहीं, एक जीवित और आकर्षक प्राणी है।

बाल-चेतना की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी असीम जिज्ञासा है। रेशमा संसार को जानना चाहती है। वह दाँत टूटने की प्रक्रिया में भी उत्साह महसूस करती है। आईने में अपने चेहरे को देखकर वह अपने बदलते शरीर का निरीक्षण करती है। उसके लिए शरीर भी एक रहस्य है। बचपन में आत्मबोध का निर्माण इसी तरह होता है। बच्चा अपने शरीर, अपने आसपास की वस्तुओं और अपने संबंधों को धीरे-धीरे पहचानता है। रेशमा का टूटे हुए दाँत पर गर्व करना इसी आत्म-खोज का हिस्सा है।

कहानी बार-बार यह दिखाती है कि बाल-चेतना तर्क से अधिक कल्पना पर आधारित होती है। रेशमा के लिए संसार दृश्यमान और अदृश्य दोनों स्तरों पर मौजूद है। उसे विश्वास है कि एक खास दरवाज़े पर सात बार दस्तक देने से वह खुल जाएगा और इच्छाएँ पूरी हो जाएँगी। उसे कुत्तोंवाली बुढ़िया की कथा पर भी यकीन है। वह चुड़ैलों, जादू और रहस्यमय शक्तियों की उपस्थिति को असंभव नहीं मानती। यहाँ कल्पना कोई अतिरिक्त तत्व नहीं है। वही उसकी वास्तविकता का हिस्सा है। बाल-मन वस्तुओं को उनके प्रत्यक्ष रूप तक सीमित नहीं रखता। वह हर चीज़ में एक छिपी हुई संभावना देखता है।

रेशमा की चेतना में खेल और यथार्थ के बीच कोई कठोर विभाजन नहीं है। भाइयों द्वारा गढ़ी गई कहानियाँ उसके लिए केवल मनोरंजन नहीं हैं। वे उसके अनुभव-संसार का हिस्सा बन जाती हैं। बच्चों की दुनिया में कल्पना और यथार्थ एक-दूसरे में घुले रहते हैं। यही कारण है कि साधु का श्राप, साँप की आँख, मरे हुए लोगों के सपने और अबाबील की उड़ान एक ही मानसिक धरातल पर मौजूद रहते हैं। वयस्क चेतना इन सबको अलग-अलग श्रेणियों में बाँटती है, लेकिन बाल-चेतना ऐसा नहीं करती।

कहानी में भय का अनुभव भी विशेष ध्यान देने योग्य है। बचपन का भय प्रायः तर्कसंगत नहीं होता, लेकिन वह अत्यंत वास्तविक होता है। रेशमा साधुओं से डरती है। उसे लगता है कि उनके पास किसी को भी कुछ से कुछ बना देने की शक्ति है। वह साँप की आँखों से डरती है। वह सपनों में मरनेवालों के नाम पुकारे जाने से डरती है। लेकिन ये भय बाहर से थोपे हुए नहीं लगते। वे उसकी चेतना के भीतर विकसित होते हैं। बाल-मनोविज्ञान बताता है कि बच्चा संसार की अनिश्चितताओं को समझने के लिए मिथकीय और जादुई व्याख्याओं का सहारा लेता है। रेशमा भी यही करती है। उसके लिए अज्ञात का अर्थ अक्सर अलौकिक होता है।

मृत्यु के प्रति रेशमा का आकर्षण और भय बाल-चेतना के अध्ययन में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। कहानी में मृत्यु का प्रसंग बार-बार आता है। बच्चे ‘मरने’ का खेल खेलते हैं। रेशमा साँप की लाश देखती है। वह मृत्यु से जुड़े सपने देखती है। लेकिन वह मृत्यु को पूरी तरह समझती नहीं। उसके भीतर एक जिज्ञासा है। जब बच्चे पानी में तैरकर ‘लाश’ बनने का खेल खेलते हैं, तब रेशमा सोचती है कि क्या मरना सचमुच इतना सुखद होता है। यह प्रश्न बहुत गहरा है। बच्ची मृत्यु को अंतिम अनुपस्थिति की तरह नहीं, एक रहस्यमय अनुभव की तरह देख रही है। यहाँ बाल-मन की वह स्थिति दिखाई देती है जहाँ मृत्यु का बोध अभी बन रहा है।

रेशमा की चेतना में सपनों का संसार भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बच्चे के लिए सपना और यथार्थ पूरी तरह अलग नहीं होते। सपनों की घटनाएँ जागृत जीवन को प्रभावित करती हैं। बिलासी का सपना हो या मरनेवालों की सूची वाला दृश्य, वे केवल रात्रिकालीन अनुभव नहीं हैं। वे रेशमा की मानसिक दुनिया का हिस्सा बन जाते हैं। उसकी आशंकाएँ, उसके प्रश्न और उसके डर इन्हीं सपनों में रूप ग्रहण करते हैं।

बाल-चेतना का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष कहानी में अपराधबोध के रूप में सामने आता है। जब भाई की दुर्घटना की खबर मिलती है, तो रेशमा तत्काल स्वयं को दोषी मानने लगती है। उसे याद आता है कि वह कभी भाई के ऊपर से कूद गई थी। उसे लगता है कि शायद उसी कारण भाई बीमार पड़ा है। यह सोच वयस्क दृष्टि से हास्यास्पद लग सकती है, लेकिन बाल-मन की दृष्टि से बिल्कुल स्वाभाविक है। बच्चे अक्सर घटनाओं का केंद्र स्वयं को मानते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी छोटी-सी क्रिया भी बड़े परिणाम पैदा कर सकती है। यह आत्म-केंद्रितता नहीं, बल्कि मानसिक विकास की एक अवस्था है। सारा राय ने इसे अत्यंत सूक्ष्मता से पकड़ा है।

रेशमा का संबंध प्रकृति से भी बाल-चेतना की एक विशेष विशेषता को उजागर करता है। वह पेड़ों, चिड़ियों, बादलों, आमों और पानी के साथ जीवित संवाद करती है। प्रकृति उसके लिए निर्जीव पृष्ठभूमि नहीं है। वह उसमें अर्थ खोजती है। सेमल के पेड़ पर बैठे पीले गिद्ध उसे किसी प्राचीन रहस्य की तरह दिखाई देते हैं। बादलों में उसे शहर और सड़कें दिखती हैं। यह कल्पनाशीलता केवल सौंदर्यबोध नहीं है। यह संसार के साथ उसके जीवंत संबंध का प्रमाण है।

कहानी का अंतिम दृश्य बाल-चेतना की संरचना को सबसे अधिक स्पष्ट करता है। आकाश में उड़ती हुई चिड़िया को देखकर रेशमा सोचती है कि वह अबाबील है। फिर वह निष्कर्ष निकालती है कि यदि वह अबाबील है तो भाई अवश्य लौटेगा। यहाँ कोई तार्किक संबंध नहीं है। लेकिन बाल-मन अर्थ का निर्माण इसी प्रकार करता है। वह संसार में संकेत खोजता है। वह आशा को किसी दृश्य वस्तु से जोड़ देता है। रेशमा के लिए अबाबील केवल पक्षी नहीं है। वह एक विश्वास है। एक संभावना है। एक आश्वासन है कि सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है।

इस प्रकार अबाबील की उड़ान बाल-चेतना का असाधारण दस्तावेज़ है। इसमें बच्चा किसी आदर्श मासूम प्राणी की तरह प्रस्तुत नहीं होता। वह डरता है, भ्रमित होता है, अपराधबोध से भर जाता है, दूसरों के प्रति ईर्ष्या और सहानुभूति दोनों महसूस करता है। उसकी दुनिया में खेल भी है और मृत्यु भी। जादू भी है और दुख भी। सारा राय की उपलब्धि यह है कि उन्होंने बाल-मन को सरल नहीं बनाया। उन्होंने उसकी जटिलता, उसकी संवेदनशीलता और उसकी विशिष्ट तर्क-प्रणाली को पूरी कलात्मक ईमानदारी के साथ प्रस्तुत किया है। इसी कारण रेशमा केवल एक पात्र नहीं रह जाती; वह बचपन की उस सार्वभौमिक चेतना का प्रतिनिधित्व करने लगती है जिसमें भय और आशा, कल्पना और यथार्थ, जीवन और मृत्यु पहली बार एक-दूसरे से परिचित हो रहे होते हैं।

अबाबील की उड़ान का सबसे गहरा और मार्मिक पक्ष उसका मृत्यु-बोध है। यह कहानी मृत्यु की किसी प्रत्यक्ष घटना से आरम्भ नहीं होती, न ही उसका मुख्य विषय घोषित रूप में मृत्यु है। फिर भी पूरी कथा के भीतर मृत्यु एक अदृश्य उपस्थिति की तरह मौजूद रहती है। वह कभी खेल बनकर आती है, कभी सपना बनकर, कभी अंधविश्वास बनकर, कभी भय बनकर और अंततः एक वास्तविक संभावना बनकर। कहानी का सौंदर्य इसी बात में है कि मृत्यु यहाँ जीवन के बाहर खड़ी कोई घटना नहीं है, बल्कि बचपन की चेतना के भीतर धीरे-धीरे आकार लेती हुई अनुभूति है।

रेशमा की दुनिया पहली दृष्टि में जीवन और उल्लास से भरी हुई दिखाई देती है। वह चूहों से प्रेम करती है, तितलियों के पीछे भागती है, पानी में रंग खोजती है और जादुई रहस्यों पर विश्वास करती है। लेकिन इसी संसार के भीतर मृत्यु की हल्की छाया आरम्भ से मौजूद है। घर में चूहों के लिए ज़हर रखा जा रहा है। चूहेदानी लगी हुई है। रेशमा जिन जीवों को अपना मित्र मानती है, उनके विनाश की तैयारी साथ-साथ चल रही है। जीवन और मृत्यु का यह सह-अस्तित्व कहानी के प्रारम्भिक स्तर पर ही स्थापित हो जाता है।

बचपन में मृत्यु का बोध अक्सर प्रत्यक्ष अनुभव से नहीं, खेलों और कल्पनाओं के माध्यम से विकसित होता है। कहानी में बच्चों का ‘मरने’ वाला खेल इसी संदर्भ में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बच्चे पानी पर तैरते हुए शव बनने का अभिनय करते हैं। वे समय गिनते हैं कि कौन सबसे देर तक मृतक की तरह पड़ा रह सकता है। यहाँ मृत्यु किसी भयावह वस्तु की तरह नहीं आती। वह खेल का हिस्सा है। रेशमा को लगता है कि आँखें बन्द करके पानी पर तैरना एक विचित्र शांति का अनुभव है। वह सोचती है कि क्या मरना सचमुच इतना सुखद होता है। यह प्रश्न पूरी कहानी के मृत्यु-बोध का केंद्र है। बच्ची मृत्यु को अभी त्रासदी के रूप में नहीं जानती। वह उसे एक रहस्य की तरह देखती है।

कहानी में साँप की लाश का प्रसंग भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। साँप मर चुका है, लेकिन उसकी उपस्थिति समाप्त नहीं हुई। नीलिमा चेतावनी देती है कि उसकी आँखों में मत देखो, वरना दूसरा साँप बदला लेने आएगा। यहाँ मृत्यु के बाद भी जीवन की निरंतरता का एक लोकविश्वासी रूप उपस्थित है। मृत शरीर निष्क्रिय है, फिर भी उससे भय पैदा हो रहा है। रेशमा के मन में मृत्यु का अर्थ समाप्ति नहीं बनता। वह मृत्यु को किसी दूसरी, अदृश्य उपस्थिति से जोड़कर देखने लगती है।

इसी के बाद सपनों का संसार खुलता है। रेशमा बार-बार मृत्यु से जुड़े सपने देखती है। सबसे महत्त्वपूर्ण वह सपना है जिसमें एक काले चोगे वाला व्यक्ति मरनेवालों के नाम पढ़ रहा है। जिन लोगों की मृत्यु अभी नहीं हुई, उनके नाम के आगे मृत्यु की तारीख भी दर्ज है। यह दृश्य असाधारण है। यहाँ मृत्यु एक अराजक घटना नहीं, बल्कि पहले से लिखी हुई नियति बन जाती है। बच्ची के मन में पहली बार यह विचार जन्म लेता है कि हर मनुष्य का नाम शायद कहीं दर्ज है और एक दिन उसकी बारी भी आएगी। जब उस व्यक्ति की आवाज़ उसके नाम तक पहुँचने लगती है, वह डरकर जाग जाती है। मृत्यु का विचार यहाँ पहली बार निजी बनता है। अब केवल दूसरे लोग नहीं मरते; स्वयं उसके मरने की संभावना भी सामने आती है।

बिलासी का प्रसंग मृत्यु-बोध को और गहरा करता है। बिलासी मर चुकी है, लेकिन सपने में मुस्कुराती हुई दिखाई देती है। वह डरावनी नहीं लगती। उसका चेहरा शांत है। यहाँ मृत्यु भय का नहीं, अनुपस्थिति का अनुभव पैदा करती है। सबसे अधिक विचलित करने वाली चीज़ उसका मौन है। रेशमा को लगता है जैसे किसी फ़िल्म की आवाज़ अचानक गायब हो गई हो। यह तुलना अत्यंत अर्थपूर्ण है। मृत्यु को यहाँ शारीरिक विनाश नहीं, बल्कि ध्वनि के लोप के रूप में महसूस किया गया है। जीवन जहाँ संवाद है, वहीं मृत्यु एक गहरी ख़ामोशी है।

कहानी में साधु का प्रसंग मृत्यु-बोध को एक और दिशा देता है। साधु का श्राप स्पष्ट नहीं है। वह किसी घटना का नाम नहीं लेता। लेकिन उसका वाक्य—“दस तारीख़ को देखना”—एक अनिश्चित भय को जन्म देता है। मृत्यु का अनुभव अक्सर इसी प्रकार काम करता है। वह कभी पूरी तरह दिखाई नहीं देती, लेकिन उसकी आशंका मनुष्य के भीतर घर कर जाती है। साधु के जाने के बाद रेशमा के संसार में एक अदृश्य संकट की भावना फैल जाती है।

पीले गिद्धों का दृश्य कहानी के मृत्यु-संबंधी प्रतीकों में सबसे महत्त्वपूर्ण है। गिद्ध सामान्यतः मृत शरीरों से जुड़े पक्षी हैं। वे मृत्यु के बाद आने वाले जीव हैं। लेकिन रेशमा उन्हें विस्मय से देखती है। उसे वे सुंदर और रंगीन लगते हैं। दूसरी ओर अम्माँ उन्हें मनहूस कहती हैं। यहाँ फिर वही दो दृष्टियाँ हैं। वयस्क मृत्यु को अपशकुन की तरह देखते हैं। बच्ची उसे सौंदर्य और रहस्य के रूप में भी देख सकती है। गिद्धों की उदास आँखें, उनका स्थिर बैठना और उनका किसी पुराने युग से आए हुए पक्षियों जैसा लगना मृत्यु को एक ऐतिहासिक और कालातीत उपस्थिति में बदल देता है।

कहानी का निर्णायक क्षण तब आता है जब भाई की दुर्घटना का समाचार मिलता है। यहाँ तक मृत्यु मुख्यतः कल्पना, खेल, सपने और प्रतीकों में उपस्थित थी। अब वह पहली बार वास्तविक जीवन में प्रवेश करती है। अम्माँ के चेहरे का बदल जाना, उनकी टूटी हुई आवाज़, रात का सन्नाटा—ये सब संकेत करते हैं कि अब मृत्यु की संभावना सचमुच सामने है। कथा की पूरी संरचना मानो इसी क्षण की तैयारी कर रही थी।

इस घटना के बाद रेशमा की प्रतिक्रिया अत्यंत अर्थपूर्ण है। वह स्वयं को दोषी मानने लगती है। उसे याद आता है कि वह कभी भाई के ऊपर से कूद गई थी। यह सोच तर्कहीन है, लेकिन मृत्यु के सामने मनुष्य का मन अक्सर इसी तरह काम करता है। वह कारण खोजता है। वह संयोगों को अर्थ देता है। रेशमा भी यही करती है। बाल-चेतना मृत्यु को समझ नहीं पाती, इसलिए उसे किसी जादुई कारण से जोड़ देती है। इस प्रकार मृत्यु केवल भय नहीं पैदा करती, अपराधबोध भी पैदा करती है।

रेलयात्रा के दौरान मृत्यु की संभावना पूरे वातावरण में व्याप्त है। अम्माँ की चुप्पी, सहयात्रियों की सहानुभूति और दुर्घटना का अस्पष्ट विवरण एक ऐसे शोक की रचना करते हैं जो अभी घटित भी हुआ है और नहीं भी। भाई जीवित है या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। यही अनिश्चितता कथा को अत्यंत मार्मिक बना देती है। मृत्यु यहाँ घटना नहीं, प्रतीक्षा है।

कहानी का अंत मृत्यु-बोध को एक नए स्तर पर ले जाता है। आकाश में उड़ती हुई चिड़िया दिखाई देती है। रेशमा उसे अबाबील मान लेती है। उसके लिए अबाबील केवल पक्षी नहीं है। वह मुक्ति का प्रतीक है। भाई ने बताया था कि अबाबील इतनी ऊँचाई पर उड़ती है कि शिकारी उसे पकड़ नहीं सकता। इस कथन का गहरा प्रतीकात्मक अर्थ है। मृत्यु की संभावना के बीच अबाबील जीवन की संभावना बन जाती है। रेशमा निष्कर्ष निकालती है कि यदि यह अबाबील है तो भाई अवश्य लौटेगा। यहाँ मृत्यु पर आशा की विजय नहीं होती, बल्कि मृत्यु के भय के भीतर आशा का जन्म होता है।

यही इस कहानी की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यह मृत्यु को केवल दुख या विनाश के रूप में नहीं देखती। वह दिखाती है कि मृत्यु का पहला बोध मनुष्य को जीवन के प्रति भी अधिक सचेत बनाता है। रेशमा की चेतना में मृत्यु और जीवन विरोधी नहीं हैं। वे एक-दूसरे को अर्थ देते हैं। इसी कारण कहानी गहरे शोक में समाप्त नहीं होती। वह एक उड़ती हुई चिड़िया की छवि पर समाप्त होती है। मृत्यु की छाया बनी रहती है, लेकिन उसके साथ एक नन्हा, जिद्दी विश्वास भी बना रहता है। यही विश्वास इस कहानी को असाधारण मानवीय ऊष्मा प्रदान करता है।

इस कहानी को यदि प्रतीकात्मक संरचना की दृष्टि से पढ़ा जाए तो स्पष्ट होता है कि यह कहानी अपने कथानक से कहीं अधिक अपने बिंबों, संकेतों और प्रतीकों के माध्यम से अर्थ अर्जित करती है। कथा में कोई बड़ा नाटकीय घटनाक्रम नहीं है। घटनाएँ साधारण हैं, लेकिन उनके भीतर लगातार ऐसे प्रतीक सक्रिय रहते हैं जो रेशमा की चेतना, उसके भय, उसके मृत्यु-बोध और उसकी आशाओं को रूपायित करते हैं। कहानी का वास्तविक अर्थ इन्हीं प्रतीकों के पारस्परिक संबंधों से निर्मित होता है।

सबसे पहले चूहों के प्रतीक पर ध्यान देना चाहिए। कहानी की शुरुआत चूहों से होती है। वे घर के भूले हुए कोनों में सक्रिय हैं। उनकी उपस्थिति घर के भीतर एक अदृश्य हलचल पैदा करती है। चूहे यहाँ केवल जीव नहीं हैं। वे उस अदृश्य जीवन के प्रतीक हैं जो सतह के नीचे लगातार सक्रिय रहता है। घर के स्थिर और व्यवस्थित संसार के भीतर वे एक गुप्त ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करते हैं। अम्माँ उन्हें बीमारी और अपशकुन से जोड़ती हैं, जबकि रेशमा उन्हें स्नेह और जिज्ञासा की दृष्टि से देखती है। इस प्रकार चूहा एक ऐसा प्रतीक बन जाता है जिसके भीतर जीवन और भय दोनों निहित हैं। कहानी के आगे बढ़ने पर यही द्वंद्व मृत्यु और जीवन के बड़े प्रश्नों में विकसित होता है।

टूटता हुआ दाँत भी एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। दाँत का गिरना बचपन से किशोरावस्था की ओर बढ़ने की प्रक्रिया का संकेत है। यह परिवर्तन का प्रतीक है। पुराने दाँत का टूटना केवल शारीरिक घटना नहीं, बल्कि एक अवस्था के समाप्त होने और दूसरी के आरम्भ होने का संकेत है। चूहे के बिल में दाँत डालने की लोक-मान्यता इस परिवर्तन को और अर्थपूर्ण बना देती है। यहाँ दाँत मृत्यु और पुनर्जन्म दोनों का प्रतीक बन जाता है। कुछ समाप्त होता है ताकि कुछ नया जन्म ले सके। यही संरचना पूरी कहानी में बार-बार दिखाई देती है।

कहानी में घर स्वयं एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। यह केवल निवास-स्थान नहीं है। इसके भीतर अनेक बंद कमरे, गोदाम, कोने और रहस्य हैं। यह घर वस्तुतः रेशमा की चेतना का विस्तार प्रतीत होता है। जिस प्रकार उसके मन में अनेक अनदेखे भय, कल्पनाएँ और रहस्य भरे हैं, उसी प्रकार घर भी छिपी हुई गतिविधियों से भरा है। घर का हर कोना एक संभावित कथा को अपने भीतर छिपाए हुए है।

हौज़ का प्रतीक विशेष ध्यान देने योग्य है। कहानी में पानी बार-बार आता है। बच्चे उसमें नहाते हैं, खेलते हैं और ‘मरने’ का खेल भी उसी में खेलते हैं। साहित्य में पानी प्रायः जीवन का प्रतीक माना जाता है, लेकिन यहाँ वह जीवन और मृत्यु दोनों का प्रतीक बन जाता है। पानी में तैरना जीवन का आनंद भी है और शव की तरह तैरना मृत्यु की कल्पना भी। बाद में भाई के तैरने के दौरान दुर्घटना का संकेत मिलता है। इस प्रकार वही पानी जो खेल का स्थान था, मृत्यु की संभावना का स्थल बन जाता है। कहानी की प्रतीकात्मक संरचना में यह द्वैत अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

साँप का प्रतीक भी उल्लेखनीय है। साँप भारतीय सांस्कृतिक कल्पना में भय, रहस्य और मृत्यु से जुड़ा हुआ है। यहाँ मरा हुआ साँप दिखाई देता है। लेकिन उसकी मृत्यु भी भय को समाप्त नहीं करती। उसकी आँखों में छपी हुई तस्वीर और बदला लेने वाले दूसरे साँप की कथा मृत्यु के बाद भी जीवन की निरंतरता का संकेत देती है। साँप यहाँ उस अज्ञात शक्ति का प्रतीक है जो मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होती।

साधु का चरित्र भी प्रतीकात्मक है। वह एक यथार्थ व्यक्ति से अधिक नियति और अनिश्चित भविष्य का प्रतीक है। उसका श्राप अस्पष्ट है। वह किसी विशेष घटना का उल्लेख नहीं करता। यही उसकी शक्ति है। वह आने वाली अनहोनी की छाया बनकर उपस्थित होता है। उसके जाने के बाद भी उसका वाक्य रेशमा की चेतना में जीवित रहता है। इस दृष्टि से साधु मृत्यु की प्रत्यक्ष उपस्थिति नहीं, बल्कि उसकी आशंका का प्रतीक है।

सेमल का पेड़ कहानी के सबसे अर्थवान प्रतीकों में है। पहले उसके लाल फूलों का उल्लेख आता है। रेशमा को वे खून जैसे लगते हैं। बाद में उसी पेड़ पर पीले गिद्ध दिखाई देते हैं। यह परिवर्तन महत्त्वपूर्ण है। लाल रंग जीवन, ऊर्जा और रक्त का संकेत है। वहीं गिद्ध मृत्यु और विनाश से जुड़े हैं। इस प्रकार एक ही पेड़ पर जीवन और मृत्यु की छवियाँ एकत्र हो जाती हैं। सेमल का पेड़ समय के प्रवाह और जीवन की अस्थिरता का प्रतीक बन जाता है।

पीले गिद्ध कहानी के सबसे सशक्त प्रतीकों में हैं। वे अचानक प्रकट होते हैं और वातावरण में एक अजीब बेचैनी भर देते हैं। गिद्ध सामान्यतः मृत्यु के बाद दिखाई देते हैं। वे मृत देह के भक्षक हैं। लेकिन यहाँ उनका रंग असामान्य है। वे पीले हैं, लगभग अलौकिक। रेशमा उन्हें सुंदर मानती है, जबकि अम्माँ उन्हें मनहूस कहती हैं। यह विरोध अत्यंत अर्थपूर्ण है। गिद्ध यहाँ मृत्यु के प्रतीक तो हैं ही, साथ ही वे मृत्यु के रहस्य और उसकी अपरिचित सुंदरता का भी संकेत करते हैं। वे किसी प्राचीन, कालातीत संसार से आए हुए लगते हैं। उनके माध्यम से कहानी मृत्यु को केवल भयावह नहीं, रहस्यमय भी बनाती है।

आँधी का दृश्य भी प्रतीकात्मक है। आँधी अचानक आती है और पूरे संसार को अस्त-व्यस्त कर देती है। रेशमा को लगता है जैसे दुनिया समाप्त होने वाली है। यह केवल प्राकृतिक घटना नहीं है। यह उस आंतरिक उथल-पुथल का भी प्रतीक है जो आगे आने वाली त्रासदी की पूर्वछाया बनकर उपस्थित है। आँधी के बाद टूटे हुए पत्ते, बिखरे हुए आम और बदला हुआ वातावरण एक ऐसे संसार का संकेत देते हैं जो पहले जैसा नहीं रहा।

आमों का गिरना भी केवल एक दृश्य नहीं है। वे जीवन की प्रचुरता और क्षणभंगुरता दोनों के प्रतीक हैं। पेड़ पर लगे फल सुरक्षित हैं, लेकिन आँधी आते ही वे धरती पर बिखर जाते हैं। जीवन की उपलब्धियाँ कितनी अस्थायी हैं, यह बिंब बहुत सहज ढंग से व्यक्त करता है। बच्चों का उन्हें लूट लेना जीवन की उस सहज प्रवृत्ति का संकेत है जो विनाश के बाद भी आनंद खोज लेती है।

रेलयात्रा कहानी में एक संक्रमण का प्रतीक है। यह केवल स्थान-परिवर्तन नहीं है। यह बचपन की सुरक्षित दुनिया से मृत्यु की वास्तविक संभावना की ओर यात्रा है। रेलगाड़ी में बैठी रेशमा पहली बार उस संसार में प्रवेश कर रही है जहाँ खेल और कल्पना पर्याप्त नहीं रह जाते। यात्रा का पूरा दृश्य जीवन की अनिश्चितता और समय की निरंतर गति का प्रतीक बन जाता है।

और अंततः कहानी का केंद्रीय प्रतीक है—अबाबील। शीर्षक में उपस्थित यह पक्षी पूरी कथा के अर्थ को अपने भीतर समेट लेता है। अबाबील सामान्य चिड़िया नहीं है। भाई ने बताया था कि वह सबसे ऊँची उड़ती है और उस ऊँचाई तक पहुँच जाती है जहाँ शिकरा उसे पकड़ नहीं सकता। यह विवरण अत्यंत अर्थपूर्ण है। शिकरा यहाँ मृत्यु, भय और विनाश का प्रतीक माना जा सकता है। अबाबील उनसे परे उड़ने वाली स्वतंत्र आत्मा का प्रतीक है। वह मुक्ति का प्रतीक है। वह आशा का प्रतीक है। वह उस संभावना का प्रतीक है जो मृत्यु की छाया के भीतर भी जीवित रहती है।

कहानी का अंतिम दृश्य इसी कारण अत्यंत मार्मिक है। रेशमा यह नहीं जानती कि भाई बचेगा या नहीं। उसके पास कोई निश्चित जानकारी नहीं है। लेकिन वह आकाश में उड़ती चिड़िया को अबाबील मान लेती है। यहाँ प्रतीक यथार्थ से अधिक शक्तिशाली हो जाता है। अबाबील एक मानसिक सहारा बन जाती है। वह उस विश्वास का रूप धारण कर लेती है कि जीवन अभी समाप्त नहीं हुआ है।

इस प्रकार अबाबील की उड़ान की प्रतीकात्मक संरचना जीवन और मृत्यु, भय और आशा, क्षय और पुनर्निर्माण के बीच एक जटिल संबंध रचती है। चूहों से लेकर अबाबील तक, साँप से लेकर गिद्ध तक, पानी से लेकर आँधी तक—कहानी का प्रत्येक प्रमुख बिंब किसी न किसी गहरे मानवीय अनुभव का वाहक बन जाता है। यही कारण है कि यह कहानी केवल एक बच्ची की स्मृति नहीं रह जाती, बल्कि जीवन के उन रहस्यमय आयामों की कथा बन जाती है जिन्हें मनुष्य सबसे पहले बचपन में अनुभव करना शुरू करता है।

उत्तर-आधुनिक परिप्रेक्ष्य मेंअबाबील की उड़ान को  पढ़ने पर सबसे पहले यह दिखाई देता है कि कहानी किसी एक स्थिर यथार्थ पर आधारित नहीं है। यहाँ यथार्थ, स्मृति, लोकविश्वास, स्वप्न, भय और कल्पना एक-दूसरे के भीतर इस तरह प्रविष्ट हैं कि उनके बीच कोई स्पष्ट सीमा-रेखा नहीं बचती। यही वह बिंदु है जहाँ यह कहानी आधुनिक यथार्थवादी कथा-परंपरा से अलग दिखाई देने लगती है। आधुनिक यथार्थवाद दुनिया को एक सुव्यवस्थित और व्याख्येय संरचना के रूप में देखने की प्रवृत्ति रखता है, जबकि यहाँ संसार अनुभवों के अनेक स्तरों से निर्मित होता है।

ज्याँ-फ़्राँस्वा ल्योतार ने उत्तर-आधुनिकता को “महाआख्यानों के प्रति अविश्वास” (incredulity toward metanarratives) के रूप में परिभाषित किया था। अबाबील की उड़ान को इसी संदर्भ में देखें तो यह कहानी किसी एक केंद्रीय सत्य या सार्वभौमिक व्याख्या की ओर नहीं बढ़ती। साधु का श्राप, पीले गिद्धों का आगमन, भाई की दुर्घटना और रेशमा के भय—इन सबके बीच एक संबंध अवश्य महसूस होता है, लेकिन कहानी उसे प्रमाणित नहीं करती। पाठक चाहे तो इन्हें संयोग कह सकता है, चाहे तो नियति का संकेत, चाहे तो बाल-मन की कल्पनात्मक संरचना। कथा इनमें से किसी एक अर्थ को अंतिम मान्यता नहीं देती।

कहानी की संरचना पर विचार करते हुए रोलाँ बार्थ की वह धारणा याद आती है कि साहित्यिक पाठ एक बंद अर्थ-व्यवस्था नहीं, बल्कि अनेक अर्थ-संभावनाओं का क्षेत्र होता है। बार्थ ने “लेखक की मृत्यु” की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए कहा था कि अर्थ लेखक के आशय में नहीं, बल्कि पाठ और पाठक के संवाद में निर्मित होता है। अबाबील की उड़ान में यह बात विशेष रूप से दिखाई देती है। उदाहरण के लिए पीले गिद्धों का दृश्य। कथा यह नहीं बताती कि उनका अर्थ क्या है। वे मृत्यु का संकेत हैं, समय का प्रतीक हैं, या केवल एक दुर्लभ प्राकृतिक दृश्य—यह निर्णय पाठक पर छोड़ दिया जाता है।

कहानी का पूरा संसार बाल-चेतना के माध्यम से निर्मित है। लेकिन यह बाल-चेतना किसी सरल मासूमियत का पर्याय नहीं है। इसमें लोककथाएँ, मिथकीय विश्वास, स्वप्न और यथार्थ एक-दूसरे में घुलते रहते हैं। यहाँ जाक देरिदा की “डिफ़ेरांस” (différance) की अवधारणा प्रासंगिक लगती है। देरिदा के अनुसार अर्थ कभी पूरी तरह उपस्थित नहीं होता; वह लगातार स्थगित होता रहता है और दूसरे संकेतों की ओर सरकता रहता है। अबाबील की उड़ान में भी कोई घटना अपने आप में पूर्ण अर्थ नहीं देती। साधु का श्राप गिद्धों की ओर संकेत करता है, गिद्ध मृत्यु की ओर, मृत्यु भाई की दुर्घटना की ओर, और दुर्घटना फिर अबाबील की ओर। अर्थ लगातार टलता रहता है। वह कभी अंतिम रूप से स्थिर नहीं होता।

यथार्थ और कल्पना के इस अंतर्गुंथन को देखते हुए त्ज़्वेतान तोदोरोव की “फैंटास्टिक” की अवधारणा भी याद आती है। तोदोरोव के अनुसार फैंटास्टिक वहाँ जन्म लेता है जहाँ पाठक यह तय नहीं कर पाता कि किसी घटना की व्याख्या प्राकृतिक नियमों से की जाए या अलौकिक शक्तियों से। अबाबील की उड़ान में कई क्षण ऐसे हैं। साधु का श्राप क्या वास्तव में प्रभावी है? क्या गिद्धों का आगमन किसी अनहोनी का संकेत है? क्या अबाबील का दिखाई देना मात्र संयोग है? कथा इन प्रश्नों का समाधान नहीं करती। यह अनिश्चितता ही उसके सौंदर्य का स्रोत बन जाती है।

उत्तर-आधुनिक साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि वह ज्ञान के विभिन्न स्रोतों के बीच किसी कठोर पदानुक्रम को स्वीकार नहीं करता। मिशेल फूको ने दिखाया था कि हर ज्ञान-व्यवस्था सत्ता-संबंधों से निर्मित होती है और कोई भी ज्ञान पूर्णतः निष्पक्ष नहीं होता। अबाबील की उड़ान में वैज्ञानिक तर्क, लोकविश्वास, बच्चों की कल्पना और निजी अनुभव समान स्तर पर उपस्थित हैं। अम्माँ की समझ, भाइयों की कहानियाँ, नीलिमा के विश्वास और रेशमा की कल्पना—इनमें से किसी को भी अंतिम सत्य का दर्जा नहीं मिलता। कथा एक बहुवाची संसार रचती है जहाँ अनेक प्रकार के ज्ञान एक साथ अस्तित्व में रहते हैं।

कहानी का स्मृतिमूलक विन्यास भी उल्लेखनीय है। घटनाएँ किसी कठोर कारण-कार्य संबंध में नहीं बँधी हैं। वे स्मृति की तरह आती हैं और एक-दूसरे से जुड़ती जाती हैं। इस संदर्भ में वाल्टर बेंजामिन की स्मृति-संबंधी अवधारणाएँ उपयोगी लगती हैं। बेंजामिन के अनुसार स्मृति रैखिक नहीं होती; वह समय के अलग-अलग क्षणों को नए अर्थ-संबंधों में जोड़ती है। अबाबील की उड़ान में भी कथा का प्रवाह ऐसा ही है। चूहों से लेकर साधु तक, साँप से लेकर अबाबील तक—सब कुछ एक स्मृतिशील चेतना के भीतर पुनर्संगठित होता है।

कहानी का सबसे उत्तर-आधुनिक पक्ष उसका अंत है। पारंपरिक कथा-संरचनाएँ प्रायः किसी निष्कर्ष, समाधान या सत्य तक पहुँचती हैं। यहाँ ऐसा नहीं होता। भाई जीवित रहेगा या नहीं, इसका उत्तर पाठक को नहीं मिलता। कथा किसी निश्चित सूचना पर नहीं, बल्कि एक विश्वास पर समाप्त होती है। आकाश में उड़ती हुई चिड़िया को देखकर रेशमा उसे अबाबील मान लेती है और उसी से भाई की वापसी की संभावना जोड़ देती है।

उम्बेर्तो इको ने “ओपन वर्क” की अवधारणा देते हुए कहा था कि कुछ कलाकृतियाँ अपने अर्थ को जानबूझकर खुला छोड़ देती हैं, ताकि पाठक उनकी रचना-प्रक्रिया में सहभागी बन सके। अबाबील की उड़ान का अंत इसी अर्थ में एक खुला अंत है। यह पाठक से अपेक्षा करता है कि वह स्वयं तय करे कि अबाबील आशा का प्रतीक है, संयोग का, या केवल रेशमा की बाल-सुलभ सांत्वना का।

इस प्रकार अबाबील की उड़ान उत्तर-आधुनिक कथा-दृष्टि के कई महत्त्वपूर्ण तत्वों को अपने भीतर समेटे हुए है—यथार्थ की बहुलता, अर्थ की अनिश्चितता, लोक और आधुनिक के बीच संवाद, स्मृति की विखंडित संरचना, तथा अंतिम सत्य के स्थान पर संभावना का आग्रह। यह कहानी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती; बल्कि पाठक को उस अनुभव-क्षेत्र में छोड़ देती है जहाँ जीवन, मृत्यु, भय, स्मृति और आशा एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं। शायद यही इसकी सबसे बड़ी कलात्मक उपलब्धि है कि यह हमें किसी उत्तर तक नहीं, बल्कि प्रश्नों और संभावनाओं की एक खुली दुनिया तक ले जाती है।

अबाबील की उड़ान का सबसे उल्लेखनीय पक्ष उसका कथा-शिल्प है। यह कहानी उन रचनाओं में नहीं है जो किसी बड़े कथानक, नाटकीय मोड़ या घटनाओं की तीव्र गति के सहारे अपना प्रभाव पैदा करती हैं। इसके विपरीत, इसका शिल्प अत्यंत संयमित, सूक्ष्म और आंतरिक है। कहानी को पढ़ते हुए कई बार लगता है कि इसमें कुछ “घट” ही नहीं रहा है। चूहे हैं, बच्चों के खेल हैं, टूटता हुआ दाँत है, सपने हैं, साधु का आना है, गिद्धों का दिखाई देना है, आँधी है और फिर अंत में भाई की दुर्घटना का समाचार। लेकिन यही बिखरी हुई और मामूली प्रतीत होने वाली घटनाएँ धीरे-धीरे मिलकर एक गहरी भावात्मक संरचना निर्मित करती हैं। यही आधुनिक कहानी-कला की एक विशिष्ट उपलब्धि है।

यदि प्रेमचंद की कहानी-कला का एक महत्त्वपूर्ण आधार सामाजिक घटना और उसका नैतिक या मानवीय निष्कर्ष था, तो निर्मल वर्मा के बाद हिंदी कहानी का एक बड़ा हिस्सा बाहरी घटनाओं से अधिक आंतरिक अनुभवों की ओर उन्मुख हुआ। अबाबील की उड़ान इसी परंपरा में रखी जा सकती है। यहाँ कथा का वास्तविक तनाव किसी बाहरी संघर्ष से उत्पन्न नहीं होता। तनाव रेशमा की चेतना में बनता है। पाठक लगातार उसके अनुभवों, आशंकाओं, कल्पनाओं और भय के भीतर प्रवेश करता है। इसलिए कहानी की गति घटनाओं की नहीं, संवेदनाओं की गति है।

कहानी की संरचना पर ध्यान दें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इसका संगठन पारंपरिक कथानक-विधान से अलग है। अरस्तू ने कथा के लिए आरम्भ, मध्य और अंत की एक सुव्यवस्थित संरचना की कल्पना की थी, जहाँ प्रत्येक घटना अगले परिणाम की ओर बढ़ती है। अबाबील की उड़ान में यह क्रम बहुत ढीला है। यहाँ घटनाएँ कारण-कार्य संबंधों की कठोर श्रृंखला में नहीं जुड़ी हैं। चूहों से कथा शुरू होती है, फिर दाँत टूटने की घटना आती है, फिर भाइयों के खेल, फिर साँप, सपने, साधु, गिद्ध, आँधी और अंततः दुर्घटना का समाचार। पहली दृष्टि में ये घटनाएँ परस्पर असंबद्ध लग सकती हैं। लेकिन कथा की वास्तविक एकता घटनाओं में नहीं, रेशमा की चेतना में स्थित है। वही सबको जोड़ती है।

यहीं पर कहानी का शिल्प आधुनिकतावादी कथा-लेखन के निकट पहुँचता है। वर्जीनिया वूल्फ ने एक बार कहा था कि जीवन कोई सममित दीपमाला नहीं है, बल्कि चेतना पर लगातार गिरते रहने वाले प्रभावों का एक प्रवाह है। अबाबील की उड़ान को पढ़ते हुए यही अनुभव होता है। कथा घटनाओं की श्रृंखला नहीं, बल्कि चेतना की धारा के रूप में विकसित होती है। एक अनुभव दूसरे अनुभव को जन्म देता है। एक भय दूसरे भय से जुड़ता है। एक स्मृति दूसरी स्मृति को खोलती है।

कहानी का दृष्टिकोण भी उसके शिल्प का अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्व है। पूरा संसार रेशमा की दृष्टि से देखा गया है। लेखक कहीं भी ऊपर से हस्तक्षेप नहीं करता। वह यह नहीं बताता कि रेशमा की धारणाएँ सही हैं या गलत। साधु का श्राप सच है या नहीं, इस पर कोई टिप्पणी नहीं की जाती। साँप की आँखों में तस्वीर छपती है या नहीं, इसका भी कोई निर्णय नहीं दिया जाता। लेखक रेशमा की चेतना के भीतर ही बना रहता है। इस तकनीक से कहानी में एक अद्भुत प्रामाणिकता आती है। पाठक संसार को उसी तरह अनुभव करने लगता है जैसे रेशमा करती है।

आधुनिक कथा-शिल्प की एक और महत्त्वपूर्ण विशेषता है—संकेत और मौन का प्रयोग। अबाबील की उड़ान में बहुत-सी बातें कही नहीं जातीं, केवल संकेतित होती हैं। उदाहरण के लिए भाई की दुर्घटना का समाचार। हमें दुर्घटना का पूरा विवरण नहीं मिलता। यह भी स्पष्ट नहीं बताया जाता कि उसकी स्थिति कितनी गंभीर है। कथा केवल अम्माँ की टूटी हुई आवाज़, उनकी चुप्पी और रेलयात्रा के दृश्य प्रस्तुत करती है। इसी तरह साधु का श्राप भी अस्पष्ट है। गिद्धों का अर्थ भी स्पष्ट नहीं किया गया। इस प्रकार कहानी अपने अर्थ को प्रत्यक्ष कथन में नहीं, बल्कि संकेतों और रिक्तियों में निर्मित करती है।

वोल्फगैंग आइज़र ने साहित्यिक पाठ की “रिक्तियों” (gaps) की चर्चा करते हुए कहा था कि पाठक इन्हीं रिक्त स्थानों को भरते हुए अर्थ का निर्माण करता है। अबाबील की उड़ान का शिल्प इसी प्रकार कार्य करता है। कहानी पाठक को लगातार सक्रिय बनाए रखती है। वह हर संकेत का अर्थ स्वयं खोजता है। गिद्धों और दुर्घटना के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं बताया गया, लेकिन पाठक स्वयं उनके बीच संबंध स्थापित करने लगता है।

कहानी का समय-विन्यास भी उल्लेखनीय है। यहाँ समय घड़ी के अनुसार नहीं चलता, बल्कि स्मृति और अनुभव के अनुसार चलता है। कई घटनाएँ वर्तमान में घट रही हैं, लेकिन उनके बीच बार-बार पुराने प्रसंग, सपने और यादें आ जाती हैं। इससे कथा का समय मनोवैज्ञानिक समय में बदल जाता है। हेनरी बर्गसों ने इसे “ड्यूरे” (durée) कहा था जिसका सामान्य फ्रांसीसी अर्थ अवधि या कालावधि (duration)  ही है, लेकिन हेनरी बर्गसों के दर्शन में ‘ड्यूरे’ (durée) का अर्थ साधारण अवधि (duration) से कहीं अधिक विशिष्ट और गहरा है।

बर्गसों घड़ी या कैलेंडर द्वारा मापे जाने वाले समय (clock time) की बात नहीं करते। वे जीए गए समय (lived time) या अनुभूत समय (experienced time) की बात करते हैं।

उदाहरण के लिए, घड़ी के हिसाब से एक घंटा हमेशा साठ मिनट का होता है। लेकिन हमारे अनुभव में ऐसा नहीं होता। प्रिय व्यक्ति के साथ बिताया हुआ एक घंटा पलभर में बीत जाता है, जबकि किसी अस्पताल के बाहर चिंता में बिताया गया एक घंटा बहुत लंबा लग सकता है। घड़ी का समय दोनों स्थितियों में समान है, लेकिन अनुभव का समय अलग है। बर्गसों इसी अनुभवगत समय को ‘ड्यूरेशन’ (duré) कहते हैं। अनुभव के जीवित समय का एक रूप इस कहानी में  दिखाई देता है। रेशमा के लिए साधु की बात वर्तमान में भी उतनी ही जीवित है जितनी उस दिन थी जब उसने उसे सुना था।

प्रकृति का उपयोग भी कथा-शिल्प का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। सेमल का पेड़, पीले गिद्ध, आँधी, आम, पानी और अंत की उड़ती हुई चिड़िया केवल दृश्य-सज्जा नहीं हैं। वे कथा की भावात्मक संरचना को आगे बढ़ाते हैं। जब गिद्ध दिखाई देते हैं तो वातावरण में अनिष्ट की आहट भर जाती है। आँधी आती है तो एक आंतरिक अस्थिरता का बोध पैदा होता है। अंत में अबाबील दिखाई देती है तो वही वातावरण आशा से भर उठता है। इस प्रकार प्रकृति कथा के भीतर सक्रिय अर्थ-निर्माता की भूमिका निभाती है।

कहानी का अंत उसके शिल्प की सबसे बड़ी उपलब्धियों में है। आधुनिक कहानी प्रायः निर्णायक निष्कर्षों से बचती है। फ्रैंक ओ’कॉनर ने कहानी को ऐसे रूप के रूप में देखा था जो जीवन के किसी निर्णायक समाधान की नहीं, बल्कि किसी विशेष मानवीय अनुभव की अभिव्यक्ति करता है। अबाबील की उड़ान इसी अर्थ में एक विशुद्ध आधुनिक कहानी है। यहाँ अंत में कोई समाधान नहीं है। भाई जीवित रहेगा या नहीं, यह पाठक नहीं जानता। कथा उस बिंदु पर समाप्त होती है जहाँ रेशमा एक चिड़िया को अबाबील मानकर विश्वास करती है कि भाई लौट आएगा। यह तथ्य नहीं, विश्वास है। निष्कर्ष नहीं, संभावना है।

यही खुलापन कहानी को दीर्घजीवी बनाता है। यदि लेखक अंत में भाई के बच जाने या मर जाने की सूचना दे देता, तो कथा का अर्थ सीमित हो जाता। लेकिन अबाबील की उड़ान पर समाप्त होकर कहानी एक प्रतीकात्मक और भावात्मक विस्तार प्राप्त कर लेती है। पाठक लंबे समय तक उसी दृश्य में ठहरा रहता है—एक बच्ची, एक अनिश्चित भविष्य, और आकाश में उड़ती हुई एक चिड़िया।

इसलिए कहा जा सकता है कि अबाबील की उड़ान का कथा-शिल्प घटनाओं की अपेक्षा अनुभवों पर, कथानक की अपेक्षा चेतना पर, और निष्कर्ष की अपेक्षा संभावना पर आधारित है। इसकी शक्ति किसी बड़े सामाजिक प्रसंग या नाटकीय मोड़ में नहीं, बल्कि उन सूक्ष्म संवेदनात्मक तंतुओं में निहित है जिनसे रेशमा की दुनिया बुनी गई है। यही कारण है कि यह कहानी पढ़ने के बाद किसी घटना की नहीं, बल्कि एक मनःस्थिति की स्मृति बनकर हमारे भीतर रह जाती है।

अबाबील की उड़ान को केवल बचपन की स्मृतियों या पारिवारिक जीवन की कथा मानना उसके रचनात्मक वैभव को सीमित कर देना होगा। यह कहानी उस नाजुक क्षण को पकड़ती है जहाँ एक बच्चा पहली बार संसार की जटिलताओं से सामना करता है और उन्हें समझने के लिए अपनी निजी अर्थ-व्यवस्था का निर्माण करता है। रेशमा के लिए दुनिया घटनाओं का क्रम नहीं, संकेतों का एक जीवित ताना-बाना है; इसलिए उसके अनुभव में एक पक्षी, एक सपना, एक लोकविश्वास, एक दुर्घटना और एक स्मृति समान रूप से अर्थवान हो उठते हैं। यही कारण है कि कहानी का वास्तविक केंद्र किसी एक घटना में नहीं, बल्कि अर्थ-निर्माण की उस प्रक्रिया में निहित है जिसके माध्यम से मनुष्य अपने चारों ओर फैली अनिश्चितता को समझने का प्रयास करता है।

 

कहानीकार की कलात्मक सफलता इस बात में है कि वे जीवन के सबसे गंभीर प्रश्नों को किसी दार्शनिक घोषणा या वैचारिक आग्रह के माध्यम से नहीं, बल्कि एक बालिका की संवेदनशील दृष्टि के भीतर घटित करती हैं। यहाँ भय निराशा में नहीं बदलता, मृत्यु केवल अंत का पर्याय नहीं बनती, और आशा किसी कृत्रिम सांत्वना का रूप ग्रहण नहीं करती। कहानी का संसार निरंतर बदलते अर्थों, अधूरी समझों और संभावित व्याख्याओं से निर्मित है। इसी कारण यह रचना पाठक को कोई निश्चित उत्तर नहीं देती, बल्कि उसे उन अनुभवों के साथ अकेला छोड़ देती है जिनसे होकर मनुष्य अपने अस्तित्व की पहली और शायद सबसे गहरी पहचान अर्जित करता है।

वस्तुतः अबाबील की उड़ान की स्थायी शक्ति इसी में निहित है कि यह जीवन के रहस्य को सुलझाने का दावा नहीं करती, बल्कि उसकी जटिलता को उसकी पूरी संवेदनात्मक गहराई के साथ स्वीकार करती है। रेशमा की आँखों से देखा गया संसार हमें यह याद दिलाता है कि मनुष्य का अनुभव केवल तथ्यों से निर्मित नहीं होता; वह स्मृतियों, आशंकाओं, प्रतीकों, विश्वासों और प्रतीक्षाओं से भी आकार ग्रहण करता है। इस अर्थ में यह कहानी बचपन की कथा होते हुए भी मनुष्य की सार्वभौमिक नियति की कथा बन जाती है—एक ऐसी नियति जिसमें अज्ञात के भय के साथ-साथ अर्थ की खोज और भविष्य की ओर देखती हुई उम्मीद हमेशा बनी रहती है।


 

रवि रंजन

जन्म :  1962, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार

शिक्षा :   पी-एच.डी.

रूचि के क्षेत्र :  भक्तिकाव्य,  आधुनिक हिन्दी कविता,  आलोचना,  साहित्य का समाजशास्त्र,

प्रकाशित कृतियाँ :   ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’,  ‘सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन,दिल्ली (2011),  ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’ (2012),वाणी प्रकाशन, ‘वारसा डायरी’(2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’(2026), वाणी प्रकाशन, दिल्ली

विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में सौ से अधिक आलेख प्रकाशित.

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भागीदारी.

‘वारसा डायरी’ के लिए ‘जयपुर साहित्य सम्मान  (2023)

प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय,बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा स्थापित पीठ (चेयर ) पर विजिटिंग प्रोफ़ेसर

प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवा निवृत्त), हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद

ई.मेल. :  raviranjan@uohyd.ac.in मो.9000606742

 


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