‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में प्रमुख समकालीन कवयित्री सविता सिंह की बहुचर्चित और विचारोत्तेजक कविता ‘मैं किसकी औरत हूँ’ पर केन्द्रित वरिष्ठ आलोचक प्रोफेसर रवि रंजन का एक गंभीर, विस्तृत और बहुआयामी आलेख प्रस्तुत है। 

हिन्दी कविता में स्त्री-अस्मिता, आत्मनिर्णय और स्वायत्त अस्तित्व के प्रश्नों पर जितनी महत्त्वपूर्ण कविताएँ लिखी गई हैं, उनमें सविता सिंह की ‘मैं किसकी औरत हूँ’ कविता का विशिष्ट स्थान है। प्रस्तुत आलेख इस कविता को केवल स्त्री-विमर्श की सीमाओं में न रखकर स्वत्व, स्वतंत्रता, आत्मबोध और मानवीय अस्तित्व के व्यापक दार्शनिक प्रश्नों के संदर्भ में व्याख्यायित करता है। इस आलेख में ‘मैं किसकी औरत हूँ’ कविता का तुलनात्मक अध्ययन किश्वर नाहीद की ‘हम गुनहगार औरतें’ और अमेरिकी कवयित्री एड्रिएन रिच (Adrienne Rich) की प्रसिद्ध कविता ‘डाइविंग इन-टू द रेक’ (Diving into the Wreck)  के साथ करते हुए यह प्रतिपादित किया गया है कि भिन्न सांस्कृतिक और भाषिक पृष्ठभूमियों से आने के बावजूद ये रचनाएँ आरोपित पहचानों के विरुद्ध आत्म की खोज और स्वायत्त अस्तित्व की रचनात्मक यात्राओं का सशक्त आख्यान प्रस्तुत करती हैं। हम मानते हैं कि यह आलेख सविता सिंह की इस विख्यात कविता में अंतर्निहित तमाम अर्थ-संभावनाओं को उद्घाटित करने के साथ ही समकालीन स्त्री-विमर्श और मानवीय मुक्ति के प्रश्न पर चल रही बहस को भी नई वैचारिक ऊर्जा प्रदान करेगा।
– हरि भटनागर


 

 

 

आरोपित अस्मिताओं के पार : ‘मैं किसकी औरत हूँ’,‘हम गुनहगार औरतें’ और ‘डाइविंग इन-टू द रेक’ कविताओं में स्वत्व की खोज: रवि रंजन

समकालीन हिंदी कविता में कुछ रचनाएँ अपने तात्कालिक विषय और वैचारिक संदर्भों से आगे बढ़ जाती हैं। वे मनुष्य, स्वतंत्रता, पहचान और अस्तित्व के व्यापक प्रश्नों से जुड़ती हैं। सविता सिंह की कविता “मैं किसकी औरत हूँ” ऐसी ही एक विरल रचना है। पहली नज़र में यह कविता स्त्री-अस्मिता, पितृसत्तात्मक ढाँचे और स्त्री की स्वायत्तता को केंद्र में रखती हुई दिखती है, किंतु गहरे अध्ययन से इसका व्यापक वैचारिक क्षितिज स्पष्ट होता है। यह कविता सिर्फ़ स्त्री की सामाजिक स्थिति का प्रतिवेदन (रिपोर्ट) पेश नहीं करती, बल्कि मनुष्य की स्वतंत्र सत्ता, उसके स्वत्व (खुद के अधिकार), आत्मनिर्णय और अस्तित्वगत अधिकारों से जुड़े बुनियादी सवालों को भी सामने लाती है। इसीलिए यह अपने विशिष्ट स्त्री-अनुभव से शुरू होकर मानवीय स्वतंत्रता के एक सार्वभौमिक विमर्श तक पहुँचती है।

कविता का केंद्रीय प्रश्न—“मैं किसकी औरत हूँ”—सतही तौर पर एक सामाजिक सवाल लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह पहचान, स्वामित्व और अस्तित्व को लेकर उठाया गया एक गहरा दार्शनिक प्रश्न है। यहाँ मूल प्रश्न यह नहीं है कि स्त्री कौन है। प्रश्न यह है कि क्या किसी भी मनुष्य की पहचान किसी दूसरे के स्वामित्व के आधार पर तय की जा सकती है? कविता में “किसकी” शब्द केवल एक व्याकरणिक इकाई नहीं है। यह उस सांस्कृतिक और वैचारिक सोच को उजागर करता है, जिसमें स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि किसी अन्य से जुड़ी हुई सत्ता के रूप में देखा गया है। कविता इसी ढाँचे को चुनौती देती है। वह “मैं अपनी औरत हूँ” कहकर स्वामित्व के स्थान पर स्वत्व की स्थापना करती है। इस तरह कविता का मुख्य तनाव स्त्री और पुरुष के बीच नहीं रह जाता। यह तनाव स्वामित्व और स्वत्व, पराधीनता और आत्म-अधिकार तथा आरोपित व आत्मनिर्मित पहचान के बीच का बन जाता है।

यही कारण है कि इस कविता को किसी एक आलोचनात्मक नज़रिए तक सीमित करके नहीं पढ़ा जा सकता। स्त्रीवादी दृष्टि से यह स्त्री-अस्मिता और आत्मनिर्णय की कविता है, तो अस्तित्ववादी नज़रिए से यह मनुष्य द्वारा अपने अस्तित्व को खुद परिभाषित करने की घोषणा है। स्वत्व और स्वामित्व के दार्शनिक विमर्श की दृष्टि से यह व्यक्ति की आत्म-अधिकारिता को रेखांकित करती है। सांस्कृतिक आलोचना के स्तर पर यह उन प्रतीकों और मूल्यों की समीक्षा करती है, जिनके ज़रिए अधीनता को नैतिक और धार्मिक वैधता दी जाती रही है। भाषा और विमर्श-सिद्धांत के आलोक में यह उन भाषिक संरचनाओं को तोड़ती है, जिनमें स्त्री की पहचान को गढ़ा जाता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह चेतना के बदलाव और भीतर तक बैठे दमन से मुक्ति की प्रक्रिया को दिखाती है। वहीं, उत्तर-आधुनिक पहचान-विमर्श के संदर्भ में यह पहचान की बनी-बनाई स्थिर अवधारणाओं को नकारकर आत्मनिर्माण की एक खुली प्रक्रिया पर बल देती है।

कविता की एक और बड़ी विशेषता इसका इतिहास-बोध है। यह आज की स्वतंत्र स्त्री को अतीत की स्त्रियों से अलग नहीं करती, बल्कि दोनों के बीच एक ऐतिहासिक निरंतरता स्थापित करती है। “मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है / मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा” जैसी पंक्तियाँ साफ़ करती हैं कि मुक्ति कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है। यह पीढ़ियों में फैली हुई एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया है। इसी क्रम में कविता भविष्य की ओर भी देखती है और एक ऐसी स्त्री की कल्पना करती है, जो “पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर” है। यहाँ कविता केवल यथार्थ का विश्लेषण नहीं करती, बल्कि एक वैकल्पिक भविष्य का स्वप्न भी बुनती है। इस प्रकार इसमें आलोचना और आकांक्षा, इतिहास और संभावना तथा यथार्थ और यूटोपिया (आदर्श लोक) सब एक साथ मौजूद हैं।

रूप और शिल्प की दृष्टि से इस रचना का पूरा ताना-बाना संवादपरक  है। रेलगाड़ी में आमने-सामने बैठी दो स्त्रियों के बीच का एक साधारण सा संवाद धीरे-धीरे गहरा होने लगता है। वह स्त्री-इतिहास, सांस्कृतिक स्मृति, पहचान, स्वतंत्रता और भविष्य की संभावनाओं पर विचार करने वाले एक दार्शनिक संवाद में बदल जाता है। कविता किसी राजनीतिक घोषणापत्र की तरह बात नहीं करती। वह सवालों, प्रतिक्रियाओं, मौन, संशय और आत्मबोध की धीमी प्रक्रिया के ज़रिए अपना अर्थ खोलती है। इसमें वृद्ध स्त्री की “असहज ख़ामोशी” जितनी अर्थपूर्ण है, उतनी ही गहरी भविष्य की स्त्री की “उन्मुक्त” हँसी भी है। इस तरह कविता अपने कथ्य को किसी वैचारिक नारे में बदलने के बजाय अनुभव और संवाद की एक जीवंत प्रक्रिया में ढालती है।

 

विदित है कि स्त्रीवादी चिंतन के इतिहास में सबसे बुनियादी प्रश्नों में एक यह रहा है कि स्त्री कौन है। किंतु इस प्रश्न के भीतर ही एक और अधिक जटिल प्रश्न निहित है—क्या स्त्री को स्वयं अपनी शर्तों पर समझा गया है, या उसे सदैव किसी अन्य के संदर्भ में परिभाषित किया गया है? आधुनिक स्त्रीवादी सिद्धांत ने बार-बार यह रेखांकित किया है कि पितृसत्तात्मक समाज स्त्री को एक स्वतंत्र और स्वायत्त व्यक्तित्व के रूप में देखने के बजाय उसे संबंधों, भूमिकाओं और सांस्कृतिक अपेक्षाओं के जाल में परिभाषित करता रहा है। वह किसी की पुत्री, पत्नी, माँ, प्रेमिका या आश्रिता हो सकती है, किंतु इन भूमिकाओं के परे उसके स्वतंत्र अस्तित्व की पहचान अक्सर धूमिल कर दी जाती है। यही कारण है कि स्त्रीवादी विमर्श का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य उन आरोपित अस्मिताओं की पहचान और आलोचना करना रहा है, जिनके माध्यम से स्त्री के आत्मबोध और स्वत्व को नियंत्रित किया गया है।

सिमोन द बोउवार ने जब यह कहा कि “स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती है”, तब उन्होंने केवल सामाजिक संरचनाओं की आलोचना नहीं की थी, बल्कि उस समूची प्रक्रिया को उद्घाटित किया था जिसके माध्यम से स्त्री की पहचान निर्मित, नियंत्रित और वैध ठहराई जाती है। बाद के स्त्रीवादी चिंतन—चाहे वह उदार स्त्रीवाद हो, रेडिकल स्त्रीवाद, उत्तर-संरचनावादी स्त्रीवाद या अस्तित्ववादी स्त्रीवाद—सभी ने अपने-अपने ढंग से यह दिखाने का प्रयास किया कि स्त्री की पराधीनता का मूल कारण केवल राजनीतिक या आर्थिक असमानता नहीं है, बल्कि वह उन भाषिक, सांस्कृतिक और वैचारिक संरचनाओं में भी निहित है जो स्त्री को स्वयं से दूर ले जाकर किसी अन्य की परिभाषा के भीतर कैद कर देती हैं। इस दृष्टि से स्त्री-मुक्ति का प्रश्न केवल अधिकारों की प्राप्ति का प्रश्न नहीं रह जाता; वह आत्म-पहचान, आत्मनिर्णय और स्वत्व की पुनर्प्राप्ति का प्रश्न बन जाता है।

समकालीन हिंदी कविता में सविता सिंह की मशहूर कविता मैं किसकी औरत हूँ इसी व्यापक स्त्रीवादी परियोजना का हिस्सा हैं। किश्वर नाहीद की ‘हम गुनहगार औरतें’ और अमेरिकी कवयित्री एड्रिएन रिच (Adrienne Rich) की बहुचर्चित कविता डाइविंग इंटू द रेक’ (Diving into the Wreck) वैश्विक धरातल पर इस स्त्रीवादी परियोजना को मुकम्मल रूप देने वाली कविताएँ हैं। ये तीनों कविताएँ भिन्न सांस्कृतिक और भाषिक संदर्भों से आती हैं, किंतु उनकी वैचारिक संवेदना में एक गहरा साम्य दिखाई देता है। ये रचनाएँ उन पहचान-निर्माण की प्रक्रियाओं पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं जिनके माध्यम से स्त्री को परिभाषित किया गया है। दोनों ही कविताओं में स्त्री किसी तैयार पहचान को स्वीकार करने के बजाय अपने अस्तित्व की जड़ों तक पहुँचने का प्रयास करती है। एक ओर सविता सिंह की कविता भारतीय पितृसत्तात्मक संस्कृति के भीतर स्त्री को स्वामित्व की वस्तु के रूप में देखने वाली मानसिकता का प्रतिरोध करती है, तो दूसरी ओर किश्वर नाहीद और एड्रिएन रिच की कविताएँ इतिहास, मिथक और सांस्कृतिक स्मृतियों के मलबे में उतरकर उन संरचनाओं की खोज करती है जिन्होंने स्त्री और पुरुष दोनों की पहचान को निर्मित किया है।

 

इन  कविताओं का केंद्रीय बिंदु स्त्री की सामाजिक स्थिति मात्र नहीं है, बल्कि वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से वह अपने ऊपर आरोपित अस्मिताओं से मुक्त होकर स्वयं को पुनः प्राप्त करती है। सविता सिंह की कविता का प्रश्न—“मैं किसकी औरत हूँ”—दरअसल स्वामित्व, पहचान और अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। यहाँ “किसकी” शब्द स्त्री को किसी अन्य की संपत्ति के रूप में देखने वाली मानसिकता को उजागर करता है। इसके प्रत्युत्तर में उभरने वाला कथन—“मैं अपनी औरत हूँ”—स्त्रीवादी आत्मनिर्णय का जयघोष बन जाता है। इसी प्रकार एड्रिएन रिच की कविता में समुद्र की गहराइयों में उतरना किसी जहाज़ के मलबे की खोज नहीं, बल्कि उन ऐतिहासिक आख्यानों और सांस्कृतिक मिथकों की खोज है जिन्होंने मनुष्य की पहचान को निर्मित किया है। इन कविताओं में यात्रा बाहर की अपेक्षा भीतर की अधिक है; दोनों में खोज किसी वस्तु की नहीं, बल्कि स्वत्व की है।

 

उल्लेखनीय है कि इन कविताओं पर हुए अधिकांश विमर्शों ने उन्हें स्त्री-मुक्ति, पितृसत्ता-विरोध और स्त्री-अस्मिता की दृष्टि से पढ़ा है। निस्संदेह यह दृष्टि अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि तीनों रचनाएँ स्त्री के दमन और उसके प्रतिरोध को केंद्र में रखती हैं। किंतु इन कविताओं का अर्थ-संसार केवल यहीं तक सीमित नहीं है। इनमें उपस्थित आत्म-खोज की प्रक्रिया, आरोपित पहचान के अतिक्रमण की आकांक्षा तथा स्वतंत्र अस्तित्व की स्थापना का आग्रह इन्हें व्यापक दार्शनिक विमर्शों से भी जोड़ता है। विशेषतः अस्तित्ववादी चिंतन के आलोक में देखें तो ये कविताएँ यह प्रतिपादित करती हैं कि मनुष्य की पहचान कोई पूर्वनिर्धारित सार नहीं है; उसे अपने चुनावों, अपने अनुभवों और अपने आत्मबोध के माध्यम से स्वयं निर्मित करना पड़ता है। इस प्रकार स्त्री की मुक्ति यहाँ केवल सामाजिक बंधनों से मुक्ति नहीं रह जाती, बल्कि वह स्वयं को पुनः परिभाषित करने की रचनात्मक प्रक्रिया बन जाती है।

आरोपित अस्मिताओं के पार: सविता सिंह की ‘मैं किसकी औरत हूँ’, किश्वर नाहीद की ‘हम गुनहगार औरतें’ और एड्रिएन रिच की डाइविंग इन-टू द रेककविताओं में स्वत्व की खोज आलेख के अंतर्गत प्रस्तुत यह अध्ययन इसी वैचारिक और काव्यात्मक प्रक्रिया की पड़ताल करता है। इसका उद्देश्य दोनों कविताओं को सिर्फ़ स्त्री-प्रतिरोध के दस्तावेज़ के रूप में नहीं, बल्कि स्वत्व की खोज, आत्मनिर्माण और स्वतंत्र अस्तित्व की काव्यात्मक यात्राओं के रूप में समझना है। यह अध्ययन यह दिखाने का प्रयास करेगा कि किस प्रकार दोनों कवयित्रियाँ स्त्री पर आरोपित पहचान की संरचनाओं को विखंडित करती हैं और उसकी जगह ऐसे स्वत्व की स्थापना करती हैं जो किसी बाहरी स्वामित्व, सांस्कृतिक निर्धारण या ऐतिहासिक मिथक पर नहीं, बल्कि आत्मबोध और स्वतंत्र चेतना पर आधारित है। इसी अर्थ में ये कविताएँ स्त्री-मुक्ति की कविताएँ होने के साथ-साथ मनुष्य की स्वतंत्रता, गरिमा और आत्मनिर्माण की भी कविताएँ हैं।

 

कविता का मूल पाठ नीचे दिया जा रहा है:

 

मैं किसकी औरत हूँ

 

मैं किसकी औरत हूँ

कौन है मेरा परमेश्वर

किसके पाँव दबाती हूँ

किसका दिया खाती हूँ

किसकी मार सहती हूँ…

ऐसे ही थे सवाल उसके

बैठी थी जो मेरे सामनेवाली सीट पर रेलगाड़ी में

मेरे साथ सफ़र करती

उम्र होगी कोई सत्तर-पचहत्तर साल

आँखें धँस गई थीं उसकी

मांस शरीर से झूल रहा था

चेहरे पर थे दुख के पठार

थीं अनेक फटकारों की खाइयाँ

 

सोचकर बहुत मैंने कहा उससे

‘मैं किसी की औरत नहीं हूँ

मैं अपनी औरत हूँ

अपना खाती हूँ

जब जी चाहता है तब खाती हूँ

मैं किसी की मार नहीं सहती

और मेरा परमेश्वर कोई नहीं’

 

उसकी आँखों में भर आई एक असहज ख़ामोशी

आह! कैसे कटेगा इस औरत का जीवन!

संशय में पड़ गई वह

समझते हुए सभी कुछ

मैंने उसकी आँखों को अपने अकेलेपन के गर्व से भरना चाहा

फिर हँसकर कहा ‘मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है

मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा

लेकिन कुछ घटित हुआ जिसे तुम नहीं जानतीं—

हम सब जानते हैं अब

कि कोई किसी का नहीं होता

सब अपने होते हैं

अपने आप में लथपथ—अपने होने के हक़ से लक़दक़’

 

यात्रा लेकिन यहीं समाप्त नहीं हुई है

अभी पार करनी हैं कई और खाइयाँ फटकारों की

दुख के एक दो और समुद्र

पठार यातनाओं के अभी और दो चार

जब आख़िर आएगी वह औरत

जिसे देख तुम और भी विस्मित होओगी

भयभीत भी शायद

रोओगी उसके जीवन के लिए फिर हो सशंकित

कैसे कटेगा इस औरत का जीवन फिर से कहोगी तुम

लेकिन वह हँसेगी मेरी ही तरह

फिर कहेगी—

‘उन्मुक्त हूँ देखो,

और यह आसमान

समुद्र यह और उसकी लहरें

 

हवा यह

और इसमें बसी प्रकृति की गंध सब मेरी हैं

और मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर

पूर्णतया अपनी’

-सविता सिंह

 

“मैं किसकी औरत हूँ” समकालीन स्त्री-विमर्श की एक महत्त्वपूर्ण और वैचारिक रूप से गहन कविता है। यह केवल एक स्त्री की आत्मकथा या व्यक्तिगत अनुभव का बयान नहीं है, बल्कि स्त्री-अस्तित्व, स्वायत्तता, परंपरा, पितृसत्ता और स्वतंत्र मानवीय अस्मिता के प्रश्नों पर गंभीर चिंतन प्रस्तुत करती है। कविता का आरंभ ही उन प्रश्नों से होता है जो सदियों से स्त्री की पहचान को परिभाषित करते आए हैं। ये प्रश्न हैं—मैं किसकी औरत हूँ, कौन है मेरा परमेश्वर, किसके पाँव दबाती हूँ, किसका दिया खाती हूँ, किसकी मार सहती हूँ। इन प्रश्नों में निहित मानसिकता यह है कि स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि हमेशा किसी पुरुष के संदर्भ में समझा जाता है। उसकी पहचान उसके अपने अस्तित्व से नहीं, बल्कि उसके पति, पिता या परिवार से जुड़कर निर्मित होती है। यहाँ “परमेश्वर” शब्द भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था में पति को देवतुल्य मानने की परंपरा की ओर संकेत करता है, जबकि “मार सहती हूँ” स्त्री-जीवन में हिंसा और दमन की सामान्यीकृत स्वीकृति को उजागर करता है।

कविता का दृश्य बेहद साधारण है, जहाँ रेलगाड़ी में दो स्त्रियाँ आमने-सामने बैठी हैं। किंतु यह साधारण दृश्य दो युगों, दो चेतनाओं और दो स्त्री-अनुभवों के बीच संवाद का माध्यम बन जाता है। सामने बैठी वृद्ध स्त्री केवल एक व्यक्ति नहीं रह जाती, बल्कि वह उस पूरी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है जिसने अपना जीवन पारंपरिक स्त्री-भूमिकाओं के भीतर बिताया है। कवयित्री उसके शारीरिक रूप का जो चित्र प्रस्तुत करती हैं, वह केवल बुढ़ापे का चित्र नहीं है। आँखें धँस गई थीं उसकी, मांस शरीर से झूल रहा था, चेहरे पर थे दुख के पठार, थीं अनेक फटकारों की खाइयाँ—यह चित्रण उन असंख्य अपमान, त्याग, पीड़ा और दमनकारी अनुभवों का भौतिक रूपांतरण है जिन्हें स्त्री ने जीवन भर सहा है। “दुख के पठार” और “फटकारों की खाइयाँ” जैसे बिंब बताते हैं कि उसके चेहरे पर समय नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं द्वारा निर्मित पीड़ा अंकित है।

जब कवयित्री उत्तर देती हैं कि मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ, तो यह कविता का निर्णायक क्षण बन जाता है। यह कथन केवल वैवाहिक संबंधों का निषेध नहीं है, बल्कि स्त्री की आत्म-अधिकारिता की उद्घोषणा है। “अपनी औरत” होने का अर्थ है कि स्त्री स्वयं अपनी सत्ता का केंद्र है और उसकी पहचान किसी अन्य के स्वामित्व से निर्धारित नहीं होती। इसी क्रम में अपना खाती हूँ, जब जी चाहता है तब खाती हूँ, मैं किसी की मार नहीं सहती जैसे वाक्य साधारण दिखते हुए भी गहरे राजनीतिक अर्थ रखते हैं। स्त्री के खाने, जीने, निर्णय लेने और हिंसा को अस्वीकार करने का अधिकार यहाँ स्वतंत्रता के मूलभूत रूपों के रूप में सामने आता है। यह उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिरोध है जहाँ स्त्री के शरीर, श्रम और इच्छाओं पर दूसरों का अधिकार माना जाता रहा है।

वृद्ध स्त्री की प्रतिक्रिया अत्यंत मार्मिक है। उसकी आँखों में एक असहज ख़ामोशी भर आती है और वह सोचती है कि कैसे कटेगा इस औरत का जीवन। यह प्रतिक्रिया उसके भीतर गहरे बैठे सांस्कृतिक संस्कारों को प्रकट करती है। उसके लिए किसी पुरुष या परिवार के संरक्षण के बिना स्त्री का जीवन असंभव और भयावह प्रतीत होता है। यहाँ कवयित्री किसी पीढ़ी का उपहास नहीं करतीं, बल्कि यह दिखाती हैं कि पितृसत्ता केवल बाहरी व्यवस्था नहीं होती, वह स्त्रियों की चेतना में भी घर कर लेती है। वृद्ध स्त्री कवयित्री की स्वतंत्रता को समझने का प्रयास करती है, किंतु उसके अनुभवों की सीमाएँ उसे आशंकित बना देती हैं। इस प्रकार कविता स्त्री-मुक्ति की राह में उपस्थित मानसिक और सांस्कृतिक बाधाओं को भी रेखांकित करती है।

कवयित्री जब कहती हैं कि मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है, मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा, तो वे अपने और वृद्ध स्त्री के बीच किसी कृत्रिम विभाजन को स्वीकार नहीं करतीं। यह कथन स्त्री-अनुभवों की ऐतिहासिक निरंतरता का बोध कराता है। स्वतंत्रता की चेतना अचानक शून्य से उत्पन्न नहीं होती। वह उन्हीं स्त्रियों के संघर्षों, पीड़ाओं और अनुभवों की जमीन पर विकसित होती है जिन्होंने अपने जीवन में अनेक यातनाएँ सही हैं। इसलिए कवयित्री स्वयं को उस वृद्ध स्त्री से अलग नहीं करतीं, बल्कि उसके अनुभवों को अपनी यात्रा का हिस्सा मानती हैं। किंतु इसके साथ ही वे एक नए बोध की ओर संकेत करती हैं कि हम सब जानते हैं अब कि कोई किसी का नहीं होता, सब अपने होते हैं। यह आधुनिक मानवीय चेतना का वक्तव्य है जिसमें व्यक्ति को एक स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में स्वीकार किया जाता है। यहाँ संबंधों का निषेध नहीं है, बल्कि स्वामित्व के विचार का निषेध है। कोई किसी का मालिक नहीं है और प्रत्येक मनुष्य अपने अस्तित्व और अधिकारों के साथ स्वतंत्र है।

‘अपने आप में लथपथ—अपने होने के हक़ से लक़दक़’ पंक्ति ख़ास तौर पर ध्यान देने योग्य है। “लथपथ” और “लक़दक़” जैसे शब्द सामान्यतः अलग-अलग संदर्भों में प्रयुक्त होते हैं, किंतु यहाँ कवयित्री ने उन्हें एक नवीन अर्थवत्ता प्रदान की है। मनुष्य अपने अस्तित्व में पूरी तरह डूबा हुआ है और अपने होने के अधिकार की चमक से दमक रहा है। यह आत्मसम्मान और आत्मबोध की स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने जीवन का स्वामी स्वयं बनता है।

कविता का अंतिम हिस्सा विशेष रूप से भविष्य-दृष्टि से संपन्न है। सविता सिंह कहती हैं कि यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई है और अभी फटकारों की कई और खाइयाँ, दुख के समुद्र और यातनाओं के पठार पार करने बाकी हैं। यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण है क्योंकि स्त्री-मुक्ति को यहाँ किसी पूर्ण उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। स्वतंत्रता का संघर्ष अभी जारी है। समाज में अनेक संरचनात्मक और मानसिक अवरोध मौजूद हैं जिन्हें पार करना होगा। यह दृष्टिकोण कविता को यथार्थवादी बनाता है और उसे केवल उत्सवधर्मी घोषणा बनने से बचाता है।

इसके बाद कविता भविष्य की उस स्त्री की कल्पना करती है जिसे देखकर वर्तमान पीढ़ी की स्त्रियाँ भी विस्मित हो जाएँगी। यह स्त्री स्त्री-मुक्ति की अगली अवस्था का प्रतिनिधित्व करती है। वह न केवल सामाजिक बंधनों से मुक्त होगी, बल्कि मानसिक और सांस्कृतिक शापों से भी मुक्त होगी। जब वह कहती है कि उन्मुक्त हूँ देखो, तो यह स्वतंत्रता केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाती। यह प्रकृति और विश्व के साथ एक नए संबंध की स्थापना करती है। आसमान, समुद्र, लहरें, हवा और प्रकृति की गंध उसके अपने हैं। यहाँ स्वामित्व का अर्थ अधिकार जताना नहीं, बल्कि व्यापक अस्तित्वगत जुड़ाव है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था स्त्री की दुनिया को घर और परिवार की सीमाओं में बाँध देती है, जबकि यह नई स्त्री पूरी प्रकृति को अपने अनुभव-क्षेत्र के रूप में ग्रहण करती है। उसकी पहचान किसी संबंधसूचक शब्द से नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र सत्ता से निर्मित होती है।

कविता की अंतिम पंक्ति अत्यंत अर्थगर्भित है जहाँ वह कहती है कि ‘मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर, पूर्णतया अपनी’। यहाँ “पूर्वजों के शाप” उन रूढ़ सामाजिक मान्यताओं, परंपराओं और दमनकारी मूल्यों का संकेत हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्त्रियों पर आरोपित किए गए। “अभिलाषाएँ” उन अपेक्षाओं की ओर संकेत करती हैं जो समाज स्त्री से करता रहा है, जैसे त्यागमयी पत्नी, आदर्श बहू, समर्पित माँ आदि बनने की अपेक्षा। भविष्य की स्त्री इन दोनों से मुक्त है। वह न तो अतीत के शापों का बोझ ढोती है और न दूसरों की आकांक्षाओं का माध्यम बनती है। वह पूर्णतया अपनी है और यही कविता का केंद्रीय स्वप्न तथा वैचारिक निष्कर्ष है।

संवादात्मक शैली में रचित इस कविता में गहरी आत्मीयता और जीवंतता है। रेलयात्रा का प्रसंग प्रतीकात्मक रूप से भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यात्रा यहाँ समय, इतिहास और चेतना की यात्रा का रूप ले लेती है। कविता में प्रयुक्त बिंब जैसे दुख के पठार, फटकारों की खाइयाँ, दुख के समुद्र, यातनाओं के पठार, स्त्री-अनुभवों की गहराई और विस्तार को मूर्त रूप देते हैं। भाषा सरल होते हुए भी अत्यंत संवेदनात्मक और वैचारिक है। कवयित्री किसी आक्रामक घोषणापरकता के बजाय संवाद, आत्मचिंतन और भविष्य-दृष्टि के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त करती हैं।

 

इस प्रकार “मैं किसकी औरत हूँ” स्त्री की पराधीन पहचान से स्वतंत्र अस्मिता तक की यात्रा का काव्यात्मक आख्यान है। यह कविता पितृसत्तात्मक संरचनाओं की आलोचना करते हुए स्त्री को एक स्वायत्त, आत्मनिर्णयी और पूर्ण मानवीय सत्ता के रूप में स्थापित करती है। साथ ही यह बताती है कि स्त्री-मुक्ति केवल सामाजिक बंधनों से छुटकारा पाने का प्रश्न नहीं, बल्कि आत्मबोध, आत्मसम्मान और अपने अस्तित्व को स्वयं परिभाषित करने की प्रक्रिया है। इस दृष्टि से यह कविता समकालीन हिंदी कविता में स्त्री-अस्मिता की सबसे सशक्त और दूरदर्शी अभिव्यक्तियों में से एक मानी जा सकती है।

इस कविता की अर्थ-संभावनाएँ केवल स्त्री-विमर्श तक सीमित नहीं हैं। इसका पाठ अनेक आलोचनात्मक, सामाजिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक दृष्टियों से किया जा सकता है। कविता की शक्ति इसी में निहित है कि यह एक साधारण रेल-यात्रा के प्रसंग से आरम्भ होकर पहचान, स्वामित्व, स्वतंत्रता, इतिहास, स्मृति, सत्ता और भविष्य की कल्पना जैसे प्रश्नों तक पहुँच जाती है।

 

विदित है कि स्त्रीवादी आलोचना का मूल उद्देश्य केवल साहित्य में स्त्री-पात्रों की उपस्थिति का अध्ययन करना नहीं है। इसका उद्देश्य उन सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषिक और वैचारिक संरचनाओं की पहचान करना है जिनके भीतर स्त्री की पहचान निर्मित होती है। स्त्रीवादी चिंतन इस बात पर बल देता है कि स्त्री और पुरुष के बीच जो असमानताएँ दिखाई देती हैं, वे केवल जैविक भिन्नताओं का परिणाम नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक रूप से निर्मित सत्ता-संबंधों का परिणाम हैं। पितृसत्ता स्त्रीवादी सिद्धांत का एक केंद्रीय प्रत्यय है, जिसके अंतर्गत पुरुष-सत्ता समाज के राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों पर नियंत्रण स्थापित करती है। यही सत्ता स्त्री की भूमिका, व्यवहार और पहचान को निर्धारित करती है। स्त्रीवादी आलोचना यह प्रश्न उठाती है कि स्त्री को किस प्रकार परिभाषित किया गया है, उसकी आवाज़ को कैसे नियंत्रित किया गया है, और वह किन प्रक्रियाओं के माध्यम से अपनी स्वतंत्र अस्मिता अर्जित करती है।

सिमोन द बोउवार का प्रसिद्ध कथन है कि स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती है। इस विचार का आशय यह है कि स्त्रीत्व कोई स्वाभाविक और अपरिवर्तनीय स्थिति नहीं है। समाज विभिन्न मान्यताओं, अपेक्षाओं और भूमिकाओं के माध्यम से स्त्री की एक विशेष छवि निर्मित करता है। स्त्रीवादी चिंतन इसी निर्मित ‘स्त्रीत्व’ की आलोचना करता है। वह यह भी रेखांकित करता है कि पितृसत्तात्मक व्यवस्था स्त्री को प्रायः ‘अन्य’ के रूप में स्थापित करती है। इसमें पुरुष को मानक और केंद्र माना जाता है, जबकि स्त्री को उसकी तुलना में परिभाषित किया जाता है। इसलिए स्त्रीवादी विमर्श का एक महत्वपूर्ण लक्ष्य स्त्री को किसी अन्य के परिशिष्ट के रूप में नहीं, बल्कि स्वतंत्र और स्वायत्त व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करना है।

 

इस बुनियादी सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि के तहत “मैं किसकी औरत हूँ” कविता को पढ़ने पर उसकी वैचारिक गहराई अधिक स्पष्ट होती है। कविता का पहला प्रश्न—मैं किसकी औरत हूँ—अपने भीतर पितृसत्तात्मक समाज की पूरी संरचना को समेटे हुए है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रश्न “मैं कौन हूँ” नहीं है, बल्कि “मैं किसकी हूँ” है। यह अंतर मामूली नहीं है। “कौन” व्यक्ति की पहचान से जुड़ा प्रश्न है, जबकि “किसकी” स्वामित्व से जुड़ा प्रश्न है। इस प्रकार कविता का आरंभ ही स्त्री की पहचान को स्वामित्व के दायरे में रखकर देखने वाली मानसिकता को उजागर करता है।

इसके बाद आने वाले प्रश्न—कौन है मेरा परमेश्वर, किसके पाँव दबाती हूँ, किसका दिया खाती हूँ, किसकी मार सहती हूँ—स्त्री-जीवन के उन प्रमुख आयामों को सामने लाते हैं जिनके माध्यम से पितृसत्ता स्वयं को पुनरुत्पादित करती है। “परमेश्वर” धार्मिक और सांस्कृतिक वैधता का संकेत है और “पाँव दबाना” सेवा और अधीनता का प्रतीक है। वहीं “किसका दिया खाती हूँ” आर्थिक निर्भरता को दर्शाता है और “मार सहती हूँ” शारीरिक तथा मानसिक हिंसा की ओर इशारा करता है। उल्लेखनीय है कि ये प्रश्न किसी असाधारण स्थिति की ओर संकेत नहीं करते, बल्कि एक ऐसी सामाजिक सामान्यता को व्यक्त करते हैं जिसे लंबे समय तक स्वाभाविक मान लिया गया था। स्त्रीवादी आलोचना का एक महत्वपूर्ण कार्य इसी सामान्यीकृत दमन को पहचानना है, और कविता यह कार्य बड़ी प्रभावशीलता के साथ करती है।

कविता में उपस्थित वृद्ध स्त्री केवल एक व्यक्ति नहीं है, वह पितृसत्तात्मक संस्कृति द्वारा निर्मित स्त्री-चेतना का प्रतिनिधि रूप बन जाती है। उसके चेहरे पर दुख के पठार और फटकारों की खाइयाँ हैं। ये बिंब स्त्री के व्यक्तिगत दुख का चित्रण भर नहीं करते, बल्कि एक सामूहिक स्त्री-अनुभव को मूर्त रूप देते हैं। यहाँ शरीर इतिहास का दस्तावेज़ बन जाता है। वृद्ध स्त्री का झुका हुआ शरीर और उसके चेहरे पर अंकित पीड़ा उन असंख्य स्त्रियों के जीवन की स्मृति को वहन करते हैं, जिन्होंने अपने अस्तित्व को दूसरों के लिए समर्पित करते हुए जीवन बिताया। स्त्रीवादी दृष्टि से यह महत्वपूर्ण है कि कविता स्त्री की पीड़ा को निजी या व्यक्तिगत समस्या के रूप में नहीं देखती, वह उसे सामाजिक संरचना से जोड़कर समझती है।

कविता में सबसे निर्णायक क्षण तब आता है जब प्रोटागोनिस्ट कहती है कि मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ। स्त्रीवादी आलोचना के लिए यह कथन विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह केवल प्रतिरोध नहीं, बल्कि आत्म की परिभाषा का क्षण है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था स्त्री को सदैव किसी संबंध के माध्यम से परिभाषित करती है, जैसे किसी की पत्नी, किसी की बेटी या किसी की माँ। लेकिन यहाँ स्त्री स्वयं अपनी परिभाषा प्रस्तुत करती है। वह अपनी पहचान का स्रोत अपने भीतर खोजती है। इस प्रकार कविता स्त्री को वस्तु से विषय में रूपांतरित करती है। वह किसी की दृष्टि का विषय नहीं रहती, बल्कि स्वयं बोलने वाली, निर्णय लेने वाली और अपने अस्तित्व को परिभाषित करने वाली सत्ता बन जाती है।

अपना खाती हूँ, जब जी चाहता है तब खाती हूँ जैसी पंक्तियाँ पहली दृष्टि में साधारण लग सकती हैं, लेकिन स्त्रीवादी परिप्रेक्ष्य में इनका महत्त्व गहरा है। स्त्रीवादी चिंतन ने बार-बार इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया है कि सत्ता केवल बड़े राजनीतिक संस्थानों में ही नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन में भी सक्रिय रहती है। खाने का समय, चलने-फिरने की स्वतंत्रता, शरीर पर अधिकार और इच्छाओं की अभिव्यक्ति ही सत्ता के असली प्रश्न हैं। इसलिए “जब जी चाहता है तब खाती हूँ” केवल भोजन की बात नहीं है, यह अपने जीवन पर नियंत्रण की घोषणा है। इसी प्रकार “मैं किसी की मार नहीं सहती” हिंसा को स्त्री-जीवन की अनिवार्य नियति मानने से इंकार करना है।

वृद्ध स्त्री की प्रतिक्रिया भी स्त्रीवादी विश्लेषण के सन्दर्भ में उल्लेखनीय है। वह कवयित्री की बात सुनकर चिंतित हो उठती है कि कैसे कटेगा इस औरत का जीवन। यहाँ कविता एक सूक्ष्म बिंदु को सामने लाती है। पितृसत्ता केवल पुरुषों द्वारा संचालित व्यवस्था नहीं है, वह स्त्रियों की चेतना में भी गहरे पैठी होती है। वृद्ध स्त्री को स्वतंत्र स्त्री का जीवन असुरक्षित और अधूरा प्रतीत होता है, क्योंकि उसकी पूरी सामाजिक समझ इस विश्वास पर आधारित रही है कि स्त्री को किसी पुरुष के संरक्षण की आवश्यकता होती है। इस प्रकार कविता यह दिखाता है कि स्त्री-मुक्ति का संघर्ष केवल बाहरी संस्थाओं से नहीं, बल्कि उन मानसिक संरचनाओं से भी है जो पीढ़ियों के अनुभवों में रच-बस गई हैं।

कविता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वक्ता स्वयं को वृद्ध स्त्री से अलग नहीं करती। वह कहती है कि मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है, मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा। स्त्रीवादी दृष्टि से यह कथन स्त्री-अनुभवों की ऐतिहासिक निरंतरता को रेखांकित करता है। आधुनिक स्त्री की स्वतंत्रता शून्य में उत्पन्न नहीं हुई। उसके पीछे उन स्त्रियों का इतिहास है जिन्होंने दमन, त्याग और संघर्ष का जीवन जिया। इसलिए कविता में पीढ़ियों के बीच टकराव नहीं, बल्कि संवाद उपस्थित है। वक्ता वृद्ध स्त्री के अनुभवों को अस्वीकार नहीं करती, वह उन्हें अपने वर्तमान की आधारभूमि के रूप में स्वीकार करती है।

जब कविता कहती है कि कोई किसी का नहीं होता, सब अपने होते हैं, तब उसका अर्थ केवल स्त्री की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रहता। यहाँ स्त्रीवादी चिंतन एक व्यापक मानवीय आयाम ग्रहण कर लेता है। स्त्री की मुक्ति का आधार यह है कि किसी भी मनुष्य को किसी दूसरे मनुष्य की संपत्ति नहीं माना जा सकता। इस प्रकार कविता स्वामित्व पर आधारित संबंधों की आलोचना करती है और समानता तथा स्वतंत्रता पर आधारित संबंधों की संभावना को उद्घाटित करती है।

कविता के अंतिम हिस्से में कल्पित भविष्य की स्त्री स्त्रीवादी स्वप्न की एक विकसित आकृति के रूप में सामने आती है। वह कहती है कि उन्मुक्त हूँ देखो और फिर आसमान, समुद्र, लहरों तथा हवा को अपने अनुभव का हिस्सा बनाती है। यह बिंबात्मक विस्तार महत्वपूर्ण है। पितृसत्तात्मक समाज स्त्री की दुनिया को घर और परिवार की सीमाओं में बाँध देता है, जबकि यहाँ उसकी दुनिया पूरे प्रकृति-विस्तार तक फैल जाती है। यह केवल भौगोलिक विस्तार नहीं, बल्कि चेतना का विस्तार है।

अंतिम पंक्तियाँ—‘मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर, पूर्णतया अपनी’—कथन स्त्रीवादी दृष्टि से कविता की सबसे दूरगामी घोषणा हैं। “शाप” उन रूढ़ियों, निषेधों और बंधनों का प्रतीक हैं जो स्त्री पर आरोपित किए गए। वहीं “अभिलाषाएँ” उन सामाजिक अपेक्षाओं का संकेत हैं जिनके अनुरूप स्त्री को ढाला गया। भविष्य की स्त्री इन दोनों से मुक्त है। वह न तो अतीत के दमन को ढोती है और न दूसरों की इच्छाओं का माध्यम बनती है। उसकी पहचान किसी बाहरी निर्धारण से नहीं, बल्कि उसके अपने अस्तित्व से निर्मित होती है।

इस प्रकार स्त्रीवादी दृष्टि से देखा जाए तो “मैं किसकी औरत हूँ” केवल प्रतिरोध की कविता नहीं है, बल्कि स्त्री-अस्मिता के पुनर्निर्माण की कविता है। यह स्त्री को स्वामित्व की वस्तु से स्वतंत्र व्यक्तित्व में रूपांतरित करती है, पितृसत्तात्मक भाषा और मूल्यों की आलोचना करती है, स्त्री-अनुभव की ऐतिहासिकता को पहचानती है, और अंततः ऐसी स्त्री की कल्पना करती है जो अपने जीवन की परिभाषा स्वयं रचती है। इसी कारण यह कविता समकालीन हिंदी स्त्रीवादी काव्य-परंपरा में एक महत्वपूर्ण वैचारिक हस्तक्षेप के रूप में देखी जा सकती है।

‘उदार स्त्रीवाद’ वस्तुत: स्त्रीवादी चिंतन की उन प्रारम्भिक और प्रभावशाली धाराओं में से है, जिसने स्त्री-मुक्ति के प्रश्न को व्यक्ति की स्वतंत्रता, समान अधिकारों, शिक्षा, नागरिकता और आत्मनिर्णय के प्रश्नों से जोड़कर देखा। इसका वैचारिक आधार आधुनिक उदारवादी राजनीतिक दर्शन में निहित है, जहाँ प्रत्येक मनुष्य को एक स्वतंत्र, विवेकशील और अधिकार-संपन्न सत्ता माना जाता है। उदार स्त्रीवाद का मूल आग्रह यह है कि स्त्री को किसी विशेष जैविक या सांस्कृतिक नियति के आधार पर पुरुष से निम्नतर नहीं माना जा सकता। यदि समाज, कानून, शिक्षा और राजनीतिक संरचनाएँ स्त्री और पुरुष को समान अवसर प्रदान करें, तो स्त्री भी अपनी क्षमताओं का विकास उसी प्रकार कर सकती है जिस प्रकार पुरुष करता है। इसलिए उदार स्त्रीवाद स्त्री-अधीनता का कारण स्त्री की प्रकृति में नहीं, बल्कि सामाजिक और संस्थागत असमानताओं में खोजता है।

उदार स्त्रीवाद की बौद्धिक परंपरा को समझने के लिए मैरी वोल्स्टनक्राफ्ट (Mary Wollstonecraft)का उल्लेख अनिवार्य है। अपनी प्रसिद्ध कृति ए विन्डिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमन (1792) में उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि स्त्रियों की तथाकथित हीनता उनकी प्राकृतिक अक्षमता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह शिक्षा और अवसरों से उनके वंचित रखे जाने का परिणाम है। वोल्स्टनक्राफ्ट के लिए स्त्री-मुक्ति का अर्थ था स्त्री को एक तर्कशील और स्वतंत्र नागरिक के रूप में स्वीकार करना। उनके चिंतन में स्त्री सबसे पहले एक मनुष्य है, और इसी आधार पर उसे समान अधिकार मिलने चाहिए।

उन्नीसवीं शताब्दी में जॉन स्टुअर्ट मिल और हैरियट टेलर मिल ने उदार स्त्रीवादी चिंतन को और विकसित किया। जॉन स्टुअर्ट मिल ने अपनी पुस्तक ‘द सब्जेक्शन ऑफ वुमन’ में स्त्री की अधीनता को मानव समाज की सबसे व्यापक असमानताओं में से एक बताया। उनका तर्क था कि स्त्री और पुरुष के बीच जो संबंध प्रभुत्व और अधीनता पर आधारित हैं, वे न्यायपूर्ण नहीं कहे जा सकते। मिल के अनुसार विवाह भी तभी मानवीय संस्था बन सकता है जब वह समानता और पारस्परिक सम्मान पर आधारित हो। हैरियट टेलर मिल ने स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में उसकी भागीदारी को उसकी स्वतंत्रता की आवश्यक शर्त माना। उनके लिए स्त्री की मुक्ति का अर्थ केवल कानूनी समानता नहीं था, बल्कि अपने जीवन के बारे में स्वयं निर्णय लेने की क्षमता भी था।

बीसवीं शताब्दी में बेटी फ़्रीडन ने ‘उदार स्त्रीवाद’ को घरेलू जीवन और स्त्री की आत्मसिद्धि के प्रश्नों से जोड़ा। अपनी चर्चित पुस्तक द फेमिनिन मिस्टिक में उन्होंने उस सांस्कृतिक आदर्श की आलोचना की जिसके अनुसार स्त्री की पूर्णता केवल पत्नी और माँ बनने में निहित मानी जाती थी। फ़्रीडन ने दिखाया कि ऐसी व्यवस्था स्त्री के व्यक्तित्व को सीमित कर देती है और उसकी स्वतंत्र आकांक्षाओं को दबा देती है। उनके चिंतन का केंद्रीय आग्रह यह था कि स्त्री को अपने जीवन की दिशा चुनने का अधिकार होना चाहिए।

इन चिंतकों के विचारों को समेकित रूप से देखें तो उदार स्त्रीवाद के कुछ मूल तत्त्व सामने आते हैं, जैसे व्यक्ति की स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय का अधिकार, समान नागरिकता, समान अवसर, कानूनी समानता, शिक्षा का अधिकार, आर्थिक स्वावलम्बन और अपनी जीवन-योजना स्वयं निर्धारित करने की क्षमता। सविता सिंह की कविता “मैं किसकी औरत हूँ” को इसी सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य में पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि कविता का वैचारिक केंद्र स्त्री की स्वायत्त पहचान और उसके आत्मनिर्णय का प्रश्न है।

कविता का आरम्भ जिन प्रश्नों से होता है, वे केवल सामाजिक जिज्ञासाएँ नहीं हैं, वे एक विशेष प्रकार की सामाजिक चेतना को अभिव्यक्त करते हैं। “मैं किसकी औरत हूँ” में प्रयुक्त “किसकी” शब्द कविता के वैचारिक तनाव का केंद्र है। यह शब्द स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति के स्वामित्व से सम्बद्ध सत्ता के रूप में देखने की मानसिकता को उजागर करता है। उदार स्त्रीवाद की दृष्टि से यह स्थिति अस्वीकार्य है, क्योंकि उसके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में एक स्वतंत्र सत्ता है। किसी मनुष्य की पहचान किसी दूसरे मनुष्य की संपत्ति के रूप में नहीं की जा सकती।

कविता में आगे आने वाले प्रश्न—कौन है मेरा परमेश्वर, किसके पाँव दबाती हूँ, किसका दिया खाती हूँ, किसकी मार सहती हूँ—स्त्री की निर्भरता के विभिन्न रूपों को उद्घाटित करते हैं। “परमेश्वर” शब्द धार्मिक-सांस्कृतिक वैधता का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय सामाजिक संरचना में पति को परमेश्वर मानने की परंपरा स्त्री की अधीनता को आध्यात्मिक और नैतिक वैधता प्रदान करती रही है। उदार स्त्रीवाद इस प्रकार की व्यवस्था का विरोध करता है, क्योंकि वह सभी मनुष्यों की समान गरिमा में विश्वास करता है। इसी प्रकार “किसके पाँव दबाती हूँ” स्त्री से अपेक्षित सेवा-भाव और समर्पण को रेखांकित करता है, जबकि “किसका दिया खाती हूँ” आर्थिक निर्भरता के प्रश्न को सामने लाता है। उदार स्त्रीवादी चिंतकों ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि आर्थिक निर्भरता स्त्री की स्वतंत्रता को सीमित करती है और उसके निर्णयों को नियंत्रित करती है।

 

“किसकी मार सहती हूँ” कविता की मार्मिक पंक्तियों में से एक है। यहाँ हिंसा को किसी अपवाद के रूप में नहीं, बल्कि स्त्री-जीवन के एक संभावित और सामान्यीकृत अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह सामान्यीकरण ही पितृसत्तात्मक संस्कृति की सबसे बड़ी सफलता है। उदार स्त्रीवाद इस धारणा का प्रतिरोध करता है कि किसी संबंध में एक पक्ष को दूसरे पर शक्ति-प्रयोग का अधिकार प्राप्त हो। इसलिए कविता में हिंसा का निषेध केवल व्यक्तिगत प्रतिरोध नहीं, बल्कि समानता पर आधारित मानवीय संबंधों की मांग भी है।

कविता का केंद्रीय मोड़ तब आता है जब वक्ता कहती है कि मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ। उदार स्त्रीवाद के मूल तत्त्वों की दृष्टि से यह कथन आत्मनिर्णय और स्वायत्तता की उद्घोषणा है। यहाँ स्त्री अपनी पहचान को बाहरी संबंधों से मुक्त कर स्वयं के आधार पर निर्मित करती है। ध्यान देने योग्य है कि वह यह नहीं कहती कि वह किसी संबंध में नहीं है, बल्कि वह यह कहती है कि उसकी पहचान किसी के स्वामित्व से निर्धारित नहीं होती। यह भेद कविता की वैचारिक सूक्ष्मता को समझने के लिए आवश्यक है। “मैं अपनी औरत हूँ” में आत्म-अधिकार की वह भावना उपस्थित है जो उदार स्त्रीवाद की आधारशिला है।

‘अपना खाती हूँ/ जब जी चाहता है तब खाती हूँ’—ये पंक्तियाँ पहली दृष्टि में साधारण लग सकती हैं, लेकिन उदार स्त्रीवादी दृष्टि से इनमें गहरे अर्थ निहित हैं। उदारवादी चिंतन में स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं होती, वह व्यक्ति के दैनिक जीवन के चुनावों में भी प्रकट होती है। कब खाना है, क्या करना है, कैसे जीना है—ये सभी प्रश्न व्यक्ति की स्वायत्तता से जुड़े हुए हैं। कविता भोजन जैसी सामान्य क्रिया को भी स्वतंत्रता के संकेतक में बदल देती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि स्त्री-मुक्ति केवल सार्वजनिक क्षेत्र का प्रश्न नहीं है, वह निजी जीवन की सूक्ष्म संरचनाओं से भी जुड़ी हुई है।

“मैं किसी की मार नहीं सहती” कथन में भी यही आत्मनिर्णय उपस्थित है। यहाँ स्त्री अपने ऊपर किसी भी प्रकार के अत्याचार को स्वीकार करने से इंकार करती है। यह केवल साहस का कथन नहीं है, बल्कि उस नैतिक सिद्धांत की स्थापना है जिसके अनुसार कोई भी मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य पर प्रभुत्व स्थापित करने का अधिकार नहीं रखता।

वृद्ध स्त्री की प्रतिक्रिया कविता को और जटिल बनाती है। वह सोचती है कि कैसे कटेगा इस औरत का जीवन। यह प्रतिक्रिया उस सामाजिक मानस का प्रतिनिधित्व करती है जो स्त्री की सुरक्षा और अस्तित्व को पुरुष-आश्रय से जोड़कर देखता है। उदार स्त्रीवाद इसी मानसिकता को चुनौती देता है। उसके अनुसार स्त्री को संरक्षण की नहीं, अधिकारों की आवश्यकता है। उसे आश्रय की नहीं, बल्कि समान नागरिकता की आवश्यकता है। वृद्ध स्त्री के लिए स्वतंत्रता भय का कारण है, जबकि वक्ता के लिए वही स्वतंत्रता जीवन की आधारशिला है। इस प्रकार कविता दो भिन्न सामाजिक चेतनाओं के बीच संवाद स्थापित करती है।

कविता का एक उल्लेखनीय पक्ष यह है कि वक्ता स्वयं को वृद्ध स्त्री से अलग नहीं करती। ‘मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है/ मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा’—इन पंक्तियों में वह स्त्री-अनुभव की ऐतिहासिक निरंतरता को स्वीकार करती है। यहाँ आधुनिक स्त्री अपनी स्वतंत्रता को पूर्ववर्ती स्त्रियों के संघर्षों से जोड़कर देखती है। वह अपने इतिहास का निषेध नहीं करती, बल्कि उसे अपने वर्तमान की आधारभूमि मानती है।

‘कोई किसी का नहीं होता/ सब अपने होते हैं’—यह कथन उदारवादी व्यक्ति-धारणा का काव्यात्मक रूप है। इसका अर्थ संबंधों का विघटन नहीं है, बल्कि संबंधों को स्वामित्व से मुक्त करना है। व्यक्ति किसी का स्वत्व नहीं है, वह स्वयं में एक स्वतंत्र सत्ता है। इस प्रकार कविता मानवीय संबंधों की एक ऐसी कल्पना प्रस्तुत करती है जो समानता, सम्मान और स्वतंत्रता पर आधारित है।

कविता के अंतिम हिस्से में भविष्य की स्त्री की जो छवि उभरती है, वह उदार स्त्रीवाद के आदर्श की विकसित अभिव्यक्ति है। वह स्वयं को “उन्मुक्त” कहती है और आसमान, समुद्र, लहरों तथा हवा के साथ अपना संबंध स्थापित करती है। यहाँ प्रकृति के बिंब केवल सौंदर्यात्मक नहीं हैं, वे संभावनाओं के विस्तार का प्रतीक हैं। जिस स्त्री की दुनिया कभी घर और परिवार की सीमाओं में बाँध दी गई थी, उसकी चेतना अब समूचे अस्तित्व तक फैल गई है।

अंतिम पंक्तियाँ—मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर, पूर्णतया अपनी—कविता के वैचारिक निष्कर्ष को व्यक्त करती हैं। “शाप” उन रूढ़ियों और बंधनों का संकेत हैं जिनके माध्यम से स्त्री को नियंत्रित किया गया, जबकि “अभिलाषाएँ” उन सामाजिक अपेक्षाओं का प्रतीक हैं जिनके अनुरूप उसे ढाला गया। इन दोनों से मुक्त होकर “पूर्णतया अपनी” होना उदार स्त्रीवाद की उस आकांक्षा का काव्यात्मक रूप है जिसमें स्त्री अपने जीवन का अर्थ स्वयं निर्धारित करती है।

इस प्रकार “मैं किसकी औरत हूँ” उदार स्त्रीवाद के मूल तत्त्वों—व्यक्तिगत स्वतंत्रता, स्वायत्तता, आत्मनिर्णय, समान गरिमा, हिंसा के निषेध, आर्थिक और मानसिक स्वतंत्रता तथा स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्थापना—को गहन काव्यात्मक संवेदना के साथ व्यक्त करती है। कविता की विशेषता यह है कि वह इन सिद्धांतों को अमूर्त वैचारिक भाषा में नहीं, बल्कि स्त्री के जीवन-जगत की ठोस स्थितियों, उसके अनुभवों और उसके आत्मबोध के माध्यम से मूर्त रूप प्रदान करती है। परिणामस्वरूप यह कविता स्त्री की स्वतंत्र पहचान की एक सशक्त और विचारोत्तेजक काव्यात्मक अभिव्यक्ति बन जाती है।

 

इस कविता पर ‘रेडिकल स्त्रीवाद’ के नज़रिए से विचार करना भी सार्थक है। विदित है कि ‘रेडिकल स्त्रीवाद’ स्त्रीवादी चिंतन की वह धारा है जिसने स्त्री-अधीनता के प्रश्न को समाज की सबसे बुनियादी सत्ता-संरचना से जोड़कर देखा। जहाँ उदार स्त्रीवाद मुख्यतः अधिकारों, अवसरों और कानूनी समानता पर बल देता है, वहीं रेडिकल स्त्रीवाद यह तर्क प्रस्तुत करता है कि स्त्री की पराधीनता का स्रोत केवल कानून, शिक्षा या राजनीतिक संस्थाएँ नहीं हैं। उसका मूल स्रोत स्वयं पितृसत्ता है। रेडिकल स्त्रीवादी चिंतकों के अनुसार पितृसत्ता एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है जिसमें पुरुष-सत्ता स्त्रियों के शरीर, श्रम, यौनिकता, प्रजनन-क्षमता, इच्छाओं और सामाजिक भूमिकाओं पर नियंत्रण स्थापित करती है। इसलिए स्त्री-मुक्ति केवल कुछ अधिकार प्राप्त कर लेने से संभव नहीं होगी, इसके लिए उन गहरी वैचारिक और सांस्कृतिक संरचनाओं को चुनौती देना आवश्यक है जो पुरुष-प्रभुत्व को स्वाभाविक और वैध बनाती हैं।

केट मिलेट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘सेक्शुअल पॉलिटिक्स’ में यह प्रतिपादित किया कि स्त्री और पुरुष के संबंध निजी नहीं, बल्कि राजनीतिक संबंध हैं। उनका प्रसिद्ध कथन था कि व्यक्तिगत जीवन भी राजनीतिक है। इसका आशय यह था कि परिवार, विवाह, प्रेम, यौन-संबंध और घरेलू जीवन जैसी संस्थाएँ केवल निजी अनुभवों का क्षेत्र नहीं हैं, इनके भीतर भी सत्ता-संबंध सक्रिय रहते हैं। मिलेट ने दिखाया कि साहित्य, संस्कृति, धर्म और सामाजिक परंपराएँ पुरुष-सत्ता को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनके अनुसार पितृसत्ता केवल बल प्रयोग से नहीं चलती, वह विचारों, मूल्यों और सांस्कृतिक प्रतीकों के माध्यम से भी स्वयं को स्थायी बनाती है।

शुलमिथ फ़ायरस्टोन (Shulamith Bath Shmuel Ben Ari Firestone) ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘द डायलेक्टिक ऑफ सेक्स में स्त्री-अधीनता को इतिहास की सबसे मूलभूत वर्गीय व्यवस्था के रूप में देखा। उनके अनुसार स्त्री और पुरुष के बीच शक्ति-असमानता समाज की अन्य असमानताओं से भी अधिक गहरी है। फ़ायरस्टोन का मानना था कि स्त्री-मुक्ति के लिए उन संरचनाओं को बदलना आवश्यक है जो स्त्री को जैविक और सामाजिक रूप से नियंत्रित करती हैं।

एंड्रिया ड्वर्किन (Andrea Dworkin) और कैथरीन मैकिनन (Catharine MacKinnon) सरीखे चिंतकों ने यह रेखांकित किया कि पितृसत्ता केवल बाहरी संस्थाओं के माध्यम से ही नहीं, बल्कि स्त्री के शरीर और यौनिकता पर नियंत्रण के माध्यम से भी कार्य करती है। मैकिनन के अनुसार समाज की अनेक मान्यताएँ पुरुष-अनुभव को सामान्य मानकर निर्मित होती हैं, जबकि स्त्री के अनुभवों को हाशिए पर रखा जाता है। इस प्रकार रेडिकल स्त्रीवाद का एक केंद्रीय आग्रह यह है कि हमें उन विचारों और मान्यताओं की भी आलोचना करनी चाहिए जिन्हें समाज सामान्य, प्राकृतिक या नैतिक मानता है।

रेडिकल स्त्रीवाद का एक महत्त्वपूर्ण सैद्धान्तिक बिंदु यह भी है कि पितृसत्ता केवल संस्थागत शक्ति नहीं है, वह स्त्रियों की चेतना के भीतर भी प्रवेश कर जाती है। स्त्रियाँ कई बार उन्हीं मूल्यों को अपना लेती हैं जो उनके दमन को वैध ठहराते हैं। इसलिए रेडिकल स्त्रीवाद के लिए मुक्ति का अर्थ केवल बाहरी परिवर्तन नहीं, बल्कि चेतना का रूपांतरण भी है।

इस सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि में अगर “मैं किसकी औरत हूँ” को पढ़ा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कविता केवल समान अधिकारों की मांग नहीं करती, बल्कि उन वैचारिक आधारों को चुनौती देती है जिन पर स्त्री-अधीनता की पूरी इमारत खड़ी है।

विवेच्य कविता का आरम्भ जिन प्रश्नों से होता है, वे देखने में साधारण लग सकते हैं, लेकिन रेडिकल स्त्रीवादी दृष्टि से वे पितृसत्ता की पूरी संरचना को उजागर कर देते हैं। “मैं किसकी औरत हूँ” प्रश्न में सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है—“किसकी”। यह शब्द बताता है कि स्त्री को एक स्वतंत्र मनुष्य के रूप में नहीं, बल्कि किसी के स्वामित्व वाली सत्ता के रूप में देखा जा रहा है। यहाँ पहचान का आधार व्यक्तित्व नहीं, बल्कि स्वामित्व है। रेडिकल स्त्रीवाद इसी मानसिकता को पितृसत्तात्मक व्यवस्था का मूल मानता है, क्योंकि इसमें स्त्री को स्वयं अपने अस्तित्व का केंद्र नहीं माना जाता।

“कौन है मेरा परमेश्वर” पंक्ति विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। रेडिकल स्त्रीवादी आलोचना धर्म और संस्कृति की उन संरचनाओं की आलोचना करती है जो पुरुष-प्रभुत्व को पवित्रता का आवरण प्रदान करती हैं। भारतीय सामाजिक परंपरा में पति को ‘परमेश्वर’ मानने की धारणा केवल सम्मान का प्रश्न नहीं है, यह एक ऐसी वैचारिक संरचना है जिसमें पुरुष को ऊँचा और स्त्री को उसके अधीन स्थापित किया जाता है। जब पति परमेश्वर बन जाता है, तब उसके अधिकारों पर प्रश्न उठाना भी कठिन हो जाता है। कविता इस सांस्कृतिक मिथक को उजागर करती है। वह दिखाती है कि स्त्री-अधीनता केवल सामाजिक नियमों का परिणाम नहीं है, उसे धार्मिक और नैतिक मान्यताओं का समर्थन भी प्राप्त है।

“किसके पाँव दबाती हूँ” पंक्ति भी इसी सत्ता-संबंध को सामने लाती है। पाँव दबाना केवल सेवा का कार्य नहीं है, यह उस सांस्कृतिक प्रशिक्षण का प्रतीक है जिसमें स्त्री को दूसरों की सेवा करने और स्वयं को गौण मानने के लिए तैयार किया जाता है। रेडिकल स्त्रीवाद का तर्क है कि पितृसत्ता केवल हिंसा से नहीं चलती, वह प्रेम, कर्तव्य, सेवा और त्याग जैसी नैतिक अवधारणाओं के माध्यम से भी स्वयं को स्थापित करती है। कविता इस छिपे हुए तंत्र को पहचानती है। “किसका दिया खाती हूँ” आर्थिक निर्भरता का संकेत है, लेकिन रेडिकल स्त्रीवादी दृष्टि से यह केवल आर्थिक प्रश्न नहीं है। यह उस व्यापक सत्ता-संबंध की ओर संकेत करता है जिसमें स्त्री की जीविका तक को पुरुष की कृपा से जोड़ दिया जाता है। परिणामतः स्त्री की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है और उसकी सामाजिक स्थिति आश्रित बन जाती है।

कविता की सबसे तीखी पंक्तियों में से एक है—‘किसकी मार सहती हूँ’। यहाँ हिंसा किसी असामान्य घटना की तरह नहीं आती, बल्कि स्त्री-जीवन की एक सामान्य संभावना के रूप में उपस्थित होती है। रेडिकल स्त्रीवाद ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि स्त्री के विरुद्ध हिंसा कोई व्यक्तिगत विचलन नहीं है, वह पितृसत्तात्मक सत्ता का एक प्रमुख उपकरण है। घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना और स्त्री पर नियंत्रण के अन्य रूप इस सत्ता-संरचना के अंग हैं। कविता जब “मार सहती हूँ” को स्त्री की पहचान से जोड़ती है, तब वह इस संरचना की भयावहता को उजागर करती है।

कविता का निर्णायक मोड़ तब आता है जब वक्ता कहती है कि मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ। रेडिकल स्त्रीवादी दृष्टि से यह केवल आत्मविश्वास का कथन नहीं है, यह पितृसत्ता के मूल तर्क का निषेध है। यदि पितृसत्ता स्त्री को किसी पुरुष की परिभाषा के भीतर बाँधती है, तो “मैं अपनी औरत हूँ” उस पूरी परिभाषा को अस्वीकार कर देता है। यहाँ स्त्री स्वयं अपने अस्तित्व का स्रोत बनती है। वह किसी की पत्नी, पुत्री या आश्रिता होने से पहले स्वयं एक स्वतंत्र सत्ता है।

 

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है कि कविता में केवल अर्थ-ग्रहण से काम नहीं चलता, बिम्ब ग्रहण आवश्यक होता है। इस कविता में भी बिम्ब-ग्रहण के लिए ‘मैं किसी की मार नहीं सहती’ और ‘मेरा परमेश्वर कोई नहीं’—इन दोनों पंक्तियों को एक साथ पढ़ना ज़रूरी है । पहली पंक्ति शारीरिक और मानसिक नियंत्रण का निषेध करती है, जबकि दूसरी वैचारिक और सांस्कृतिक नियंत्रण का। रेडिकल स्त्रीवाद का आग्रह भी यही है कि स्त्री-मुक्ति केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति नहीं है, उसे उन विचारों से भी मुक्त होना होगा जो उसकी अधीनता को स्वाभाविक बताते हैं। कविता में हिंसा और देवत्व दोनों का एक साथ अस्वीकार इसीलिए महत्त्वपूर्ण है। कवयित्री यह संकेत करती हैं कि दोनों एक ही सत्ता-संरचना के अलग-अलग रूप हैं।

वृद्ध स्त्री की प्रतिक्रिया कविता के सबसे जटिल क्षणों में से एक है। उसकी आँखों में एक असहज ख़ामोशी भर आती है और वह सोचती है कि कैसे कटेगा इस औरत का जीवन। रेडिकल स्त्रीवादी दृष्टि से यह क्षण विशेष अर्थ रखता है। यहाँ कविता दिखाती है कि पितृसत्ता केवल पुरुषों के भीतर नहीं रहती, वह स्त्रियों की चेतना में भी घर कर जाती है। वृद्ध स्त्री को स्वतंत्र स्त्री का जीवन असुरक्षित प्रतीत होता है, क्योंकि उसने पूरी उम्र यह मानकर बिताई है कि स्त्री का अस्तित्व पुरुष-संरक्षण पर निर्भर है। इस प्रकार कविता पितृसत्ता के मनोवैज्ञानिक आयाम को भी सामने लाती है।

कविता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वक्ता वृद्ध स्त्री को खारिज नहीं करती।वह कहती है कि मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है, मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा। यह कथन स्त्री-अनुभव की ऐतिहासिक निरंतरता को स्वीकार करता है। रेडिकल स्त्रीवाद के लिए भी यह आवश्यक है कि स्त्री-मुक्ति के संघर्ष को इतिहास से जोड़कर देखा जाए। वर्तमान की स्वतंत्र स्त्री अतीत की स्त्रियों से अलग कोई नई सत्ता नहीं है, बल्कि वह उन्हीं संघर्षों की अगली कड़ी है। जब कविता कहती है कि कोई किसी का नहीं होता, सब अपने होते हैं, तब वह पितृसत्तात्मक स्वामित्व की पूरी अवधारणा को चुनौती देती है। स्त्री को किसी की वस्तु, संपत्ति या निजी अधिकार मानने वाली मानसिकता का यहाँ स्पष्ट निषेध है। यह कथन केवल स्त्री के लिए नहीं, बल्कि सभी मनुष्यों के लिए स्वतंत्र अस्तित्व की स्थापना करता है।

कविता का अंतिम भाग रेडिकल स्त्रीवादी कल्पना का सबसे विकसित रूप प्रस्तुत करता है। भविष्य की स्त्री कहती है कि उन्मुक्त हूँ देखो। वह स्वयं को किसी सामाजिक परिभाषा के भीतर नहीं रखती। आसमान, समुद्र, लहरें और हवा उसके अनुभव का हिस्सा बन जाते हैं। यह विस्तार प्रतीकात्मक है। स्त्री अब केवल परिवार, विवाह या घरेलू भूमिकाओं से परिभाषित नहीं होती, बल्कि उसका अस्तित्व समूचे जीवन-जगत में फैल जाता है। अंतिम पंक्तियाँ—मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर, पूर्णतया अपनी—रेडिकल स्त्रीवादी दृष्टि से कविता का सबसे क्रांतिकारी वक्तव्य हैं। यहाँ “शाप” उन दमनकारी परंपराओं, निषेधों और सांस्कृतिक रूढ़ियों का संकेत हैं जो पीढ़ियों से स्त्रियों पर आरोपित किए गए। वहीं “अभिलाषाएँ” उन सामाजिक अपेक्षाओं का प्रतीक हैं जिनके अनुसार स्त्री को ढाला गया। भविष्य की स्त्री इन दोनों से मुक्त है। वह न केवल बाहरी नियंत्रण से मुक्त है, बल्कि उन वैचारिक संरचनाओं से भी मुक्त है जो उसके अस्तित्व को निर्धारित करती थीं।

इस प्रकार रेडिकल स्त्रीवादी दृष्टि से “मैं किसकी औरत हूँ” केवल स्त्री-अधिकारों की कविता नहीं है। यह पितृसत्ता की वैचारिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और मनोवैज्ञानिक संरचनाओं की गहरी आलोचना करती है। कविता यह दिखाती है कि स्त्री की पराधीनता केवल कानूनों या संस्थाओं से पैदा नहीं होती, बल्कि वह उन मान्यताओं से भी पैदा होती है जो पुरुष को परमेश्वर और स्त्री को उसकी आश्रिता मानती हैं। इसी कारण कविता का प्रतिरोध भी केवल सामाजिक नहीं, बल्कि वैचारिक और अस्तित्वगत प्रतिरोध है। यह स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व की ऐसी कल्पना प्रस्तुत करती है जो पितृसत्ता के मूल आधारों को ही अस्वीकार कर देती है।

टोरिल मोई ने अपनी किताब व्हाट इज अ वुमन?’ (1999) में औरत होने की परिभाषा को लेकर चल रही एक बड़ी दार्शनिक बहस के बीच का रास्ता निकाला है। एक तरफ तो वे कट्टरपंथी लोग हैं जिनका मानना है कि औरत होना सिर्फ और सिर्फ शरीर और जीव विज्ञान (बायोलॉजी) से जुड़ा मामला है। दूसरी तरफ, वे बड़े-बड़े अकादमिक विद्वान हैं जो कहते हैं कि जेंडर का कोई ठोस आधार नहीं है, यह तो बस भाषा और समाज का गढ़ा हुआ एक बदलावशील रूप है। मोई का मानना है कि ये दोनों ही पक्ष अपनी जगह से भटक गए हैं। इन उलझे हुए किताबी नियमों और शब्दों के फेर में पड़ने के बजाय, वह मशहूर फ्रांसीसी दार्शनिक सिमोन द वोउआर के उस मशहूर विचार का सहारा लेती हैं कि कोई औरत पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती है।” मोई का कहना बिल्कुल सीधा और साफ है: औरत होना न तो कोई पहले से तय डॉक्टरी सच है और ना ही हवा में तैरती बातों का कोई जाल। यह तो ‘जीती-जागती जिंदगी की सच्चाई’ है। इसका मतलब यह है कि कोई इंसान असल दुनिया में कैसे जीता है, अपने शरीर को किस तरह महसूस करता है और समाज की बंदिशों से कैसे जूझता है।

मोई ने आज के विचारकों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले एक बेहद लोकप्रिय फॉर्मूले पर भी उंगली उठाई है—और वह है ‘सेक्स’ (यानी शारीरिक संरचना) और ‘जेंडर’ (यानी सामाजिक भूमिका) को बिल्कुल अलग-अलग करके देखना। वैसे तो यह बंटवारा शुरू में इसलिए किया गया था ताकि यह साबित किया जा सके कि जीव विज्ञान ही इंसान की किस्मत तय नहीं करता, लेकिन मोई का तर्क है कि अब यह तरीका अपनी उपयोगिता खो चुका है। आज के दौर में यह बात चीजों को सुलझाने के बजाय और उलझा देती है, जिससे दिमागी बहसें आम इंसानी जिंदगी के सीधे-सादे अनुभवों से कोसों दूर चली जाती हैं। समय और स्थान से परे हटकर औरत होने की कोई एक मुकम्मल या सर्वकालिक परिभाषा ढूंढने के बजाय, मोई सलाह देती हैं कि हमें भारी-भरकम सिद्धांतों को किनारे रख देना चाहिए। हमें आम बोलचाल और असल जिंदगी की तरफ देखना चाहिए और यह व्यावहारिक सवाल पूछना चाहिए: किसी खास दौर, जगह और समाज में एक औरत के रूप में जीने का असल मतलब और अनुभव क्या है?

मोई उन आधुनिक उत्तर-आधुनिकतावादी (पोस्ट-मॉडर्न) सिद्धांतों को लेकर खासी चिंतित हैं, जो यह दावा करते हैं कि जेंडर महज एक नाटक (परफॉर्मेंस) है या हमारे बात करने के तरीके से पैदा होने वाली चीज है। उनकी यह चेतावनी राजनैतिक आंदोलनों के लिहाज से बहुत गहरी चोट करती है: अगर आप ‘औरत’ के वजूद को सिर्फ बदलते हुए शब्दों के खेल में उड़ा देंगे और हाड़-मांस की जीती-जागती महिला के अनुभवों को ही नकार देंगे, तो आप अनजाने में ही नारीवाद (फेमिनिज्म) की पूरी बुनियाद ही हिला देंगे। जरा सोचिए, अगर ‘औरत’ शब्द का असल दुनिया में कोई ठोस आधार ही नहीं रहेगा, तो महिलाएं किसी आंदोलन के लिए एकजुट कैसे होंगी? वे समान वेतन, अपने हक की लड़ाई या सुरक्षा जैसे साझा मुद्दों पर कंधे से कंधा मिलाकर कैसे लड़ेंगी? अगर आप लड़ाई लड़ने वाले इंसान के वजूद को ही गायब कर देंगे, तो आंदोलन तो अपने आप दम तोड़ देगा।

आखिर में, मोई महिलाओं को जीव विज्ञान के संकरे दायरों में कैद नहीं करना चाहतीं, लेकिन वे इस बात के भी सख्त खिलाफ हैं कि औरतों के असली और व्यावहारिक अनुभवों को किताबी बहसों की बलि चढ़ा दिया जाए। उनका सुझाया हुआ रास्ता एक व्यावहारिक बीच का रास्ता है। वह ‘औरत’ शब्द को राजनैतिक और सामाजिक बदलाव की एक मजबूत और अर्थपूर्ण ताकत के रूप में बचाए रखना चाहती हैं, बशर्ते उसे हवाई सिद्धांतों या भाषाई खेल के बजाय रोजमर्रा की जीती-जागती जिंदगी की सच्चाइयों से तौला जाए।

टोरिल मोई का यह क्रांतिकारी चिंतन कि औरत होना कोई पहले से तय जैविक या भाषाई ढांचा नहीं बल्कि एक ‘जीती-जागती जिंदगी की सच्चाई’ है, सविता सिंह की कविता “मैं किसकी औरत हूँ” में पूरी प्रखरता के साथ साकार होता है। कविता में रेलगाड़ी में मिली सत्तर-पचहत्तर साल की बुजुर्ग महिला उस पारंपरिक, रूढ़िवादी सोच का प्रतिनिधित्व करती है जो औरत के वजूद को किसी पुरुष (परमेश्वर, पति) की गुलामी, उसकी मार सहने और उसकी दी हुई रोटी खाने से ही परिभाषित मानती है। जब कवयित्री उसके सवालों के जवाब में कहती हैं कि “मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ”, तो वह मोई और सिमोन द बोवुआर के उसी विचार को जी रही होती हैं कि औरत अपनी ‘स्थिति’ को खुद चुनती और निर्मित करती है, वह किसी की मिल्कियत बनकर पैदा नहीं होती। कविता उत्तर-आधुनिकतावादियों की इस बात को भी खारिज करती है कि जेंडर सिर्फ एक अमूर्त भाषाई खेल है; यहाँ बुजुर्ग औरत के चेहरे पर ‘दुख के पठार’ और ‘फटकारों की खाइयाँ’ कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि हाड़-मांस के शरीर पर झेली गई ठोस, ऐतिहासिक और सामाजिक यातनाओं के जीवंत प्रमाण हैं, जिन्हें मोई नारीवाद की असली बुनियाद मानती हैं। कविता की यात्रा सिर्फ एक औरत के व्यक्तिगत गर्व या अकेलेपन पर आकर नहीं रुकती, बल्कि वह उस सामूहिक चेतना की ओर बढ़ती है जिसकी चिंता टोरिल मोई अपनी किताब में जताती हैं। जब कवयित्री कहती हैं कि “मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है, मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा”, तो वह तमाम औरतों के साझा संघर्षों और दुखों के बीच एक राजनैतिक एकजुटता की जमीन तैयार करती हैं। कविता के अंत में जिस ‘उन्मुक्त और पूर्णतया अपनी’ औरत का भविष्य दिखाया गया है, जो प्रकृति, आसमान और लहरों पर अपना हक जताती है और पूर्वजों के शापों से मुक्त है, वह दरअसल मोई के उसी व्यावहारिक बीच के रास्ते का चरमोत्कर्ष है—जहाँ औरत अपनी शारीरिक और सामाजिक सीमाओं को लांघकर, बिना किसी बाहरी किताबी परिभाषा के, अपनी शर्तों पर अपने वजूद को पूरी गरिमा और आज़ादी के साथ जीती है।

कहना न होगा कि अस्तित्ववाद आधुनिक चिंतन की उन प्रभावशाली दार्शनिक धाराओं में से है जिसने मनुष्य को किसी सार्वभौमिक व्यवस्था, धार्मिक नियति, सामाजिक भूमिका या पूर्वनिर्धारित सार के भीतर समझने के बजाय उसकी स्वतंत्रता, उसकी चिंता, उसके चुनावों और उसके आत्मनिर्माण के संदर्भ में समझने का प्रयास किया। यह कोई एकीकृत दर्शन नहीं है, बल्कि अनेक विचारकों और रचनाकारों के बीच फैला हुआ एक व्यापक बौद्धिक संवेदन है। इसके केंद्र में यह प्रश्न है कि मनुष्य कौन है, वह अपने जीवन का अर्थ कैसे निर्मित करता है, और ऐसी दुनिया में कैसे जीता है जहाँ अर्थ पहले से सुनिश्चित नहीं हैं।

विदित है कि अस्तित्ववादी चेतना के प्रारम्भिक सूत्र सोरेन कीर्केगार्द के विचारों में मिलते हैं। कीर्केगार्द का विरोध उन दार्शनिक प्रणालियों से था जो मनुष्य को किसी अमूर्त विचार या सार्वभौमिक नियम में विलीन कर देती थीं। उनके लिए मनुष्य सबसे पहले एक जीवित, अनुभवशील और निर्णय लेने वाला व्यक्ति है। जीवन की सच्चाई किसी सैद्धान्तिक व्यवस्था में नहीं, बल्कि व्यक्ति के जीते-जागते अनुभवों में मिलती है। कीर्केगार्द ने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि मनुष्य को अपने चुनाव स्वयं करने पड़ते हैं, और यही चुनाव उसकी वास्तविक पहचान निर्मित करते हैं। चुनाव के साथ चिंता, भय और अनिश्चितता भी जुड़ी होती है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने निर्णयों की पूरी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता।

यह प्रश्न आगे चलकर फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की के साहित्य में और जटिल रूप ग्रहण करता है। उनकी कृति ‘नोट्स फ्रॉम अंडरग्राउंड’ का नायक आधुनिक मनुष्य की उस बेचैनी का प्रतिनिधि है जो किसी तैयार व्यवस्था या तर्कसंगत प्रणाली के भीतर स्वयं को समेट नहीं पाता। वह बार-बार यह सिद्ध करना चाहता है कि मनुष्य केवल तर्क से संचालित प्राणी नहीं है, बल्कि वह अपनी स्वतंत्रता के लिए कभी-कभी अपने हितों के विरुद्ध भी जा सकता है। दोस्तोयेव्स्की के यहाँ मनुष्य की स्वतंत्रता एक बोझ भी है और एक संभावना भी। वह अपने चुनावों से बच नहीं सकता, लेकिन उन्हीं चुनावों में उसकी मनुष्यता भी निहित है।

बीसवीं शताब्दी में काफ़्का (Franz Kafka) के साहित्य ने अस्तित्वगत असुरक्षा और विस्थापन को एक नई अभिव्यक्ति दी। ‘द ट्रायल’ और ‘द मेटामॉर्फोसिस’ जैसी रचनाओं में व्यक्ति ऐसी शक्तियों के बीच फँसा दिखाई देता है जिनका स्वरूप अस्पष्ट है, लेकिन जिनका प्रभाव सर्वव्यापी है। काफ्का का मनुष्य अक्सर अपने ही जीवन में अजनबी हो जाता है। वह उन सामाजिक और संस्थागत संरचनाओं से घिरा रहता है जो उसकी पहचान को नियंत्रित करती हैं। काफ्का की दुनिया में व्यक्ति का संघर्ष केवल बाहरी शक्तियों से नहीं, बल्कि अपनी पहचान को बचाए रखने के संघर्ष से भी जुड़ा होता है।

अल्बेर कामू के यहाँ अस्तित्ववादी संवेदना ‘अब्सर्ड’ या ‘निरर्थकता’ की अवधारणा के माध्यम से सामने आती है। कामू का तर्क था कि मनुष्य अर्थ की खोज करता है, लेकिन संसार स्वयं कोई सुनिश्चित अर्थ प्रदान नहीं करता। इसी टकराव से निरर्थकता की स्थिति उत्पन्न होती है। फिर भी कामू निराशा के दार्शनिक नहीं हैं। उनकी दृष्टि में मनुष्य की गरिमा इसी में है कि वह निरर्थकता को पहचानते हुए भी जीने, चुनने और प्रतिरोध करने का साहस बनाए रखे। ‘द मिथ ऑफ सिसिफस’ में सिसिफस इसी मानवीय जिजीविषा का प्रतीक बन जाता है।

ज्याँ-पॉल सार्त्र ने अस्तित्ववाद को सबसे व्यवस्थित दार्शनिक रूप प्रदान किया। उनका प्रसिद्ध कथन था कि मनुष्य के मामले में अस्तित्व सार से पहले आता है। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य किसी पूर्वनिर्धारित प्रकृति या सार के साथ पैदा नहीं होता। वह अपने कर्मों, चुनावों और निर्णयों के माध्यम से स्वयं को निर्मित करता है। मनुष्य वही है जो वह अपने को बनाता है। इसलिए स्वतंत्रता मनुष्य की नियति है। वह स्वतंत्र होने के लिए अभिशप्त है, क्योंकि वह अपने चुनावों की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। सार्त्र के यहाँ प्रामाणिक जीवन का अर्थ है अपनी स्वतंत्रता को स्वीकार करना और दूसरों द्वारा आरोपित पहचान के भीतर कैद न हो जाना।

सिमोन द बोउवार ने इन अस्तित्ववादी अवधारणाओं को स्त्री-अनुभव के संदर्भ में विकसित किया। अपनी प्रसिद्ध कृति ‘द सेकंड सेक्स’ में उन्होंने दिखाया कि स्त्री को इतिहास भर एक स्वतंत्र विषय के रूप में नहीं, बल्कि पुरुष के सापेक्ष ‘अन्य’ के रूप में परिभाषित किया गया है। बोउवार के अनुसार स्त्री की मुक्ति का अर्थ केवल सामाजिक अधिकार प्राप्त करना नहीं है, बल्कि उसका अर्थ है अपने अस्तित्व को स्वयं परिभाषित करने की क्षमता अर्जित करना। मनुष्य होने का अर्थ है अपने जीवन की परियोजना स्वयं निर्मित करना, और यह बात स्त्री पर भी उतनी ही लागू होती है जितनी पुरुष पर।

इन विविध चिंतनों को एक साथ देखें तो अस्तित्ववाद का सार यह है कि मनुष्य की पहचान उसे तैयार रूप में नहीं मिलती, बल्कि उसे अपनी पहचान स्वयं गढ़नी होती है। समाज, धर्म, परिवार और परंपरा उसे अनेक भूमिकाएँ प्रदान करते हैं, लेकिन इन भूमिकाओं को स्वीकार करना या उनसे आगे बढ़ना अंततः उसका अपना निर्णय होता है। स्वतंत्रता, चुनाव, जिम्मेदारी, आत्मनिर्माण और प्रामाणिक अस्तित्व ही अस्तित्ववादी चिंतन के केंद्रीय तत्त्व हैं।

इस पृष्ठभूमि में सविता सिंह की “मैं किसकी औरत हूँ” को पढ़ने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि कविता का सबसे गहरा प्रश्न स्त्री की सामाजिक स्थिति का प्रश्न भर नहीं है, बल्कि यह अस्तित्व का प्रश्न भी है। कविता के आरम्भ में जो प्रश्न उपस्थित हैं—मैं किसकी औरत हूँ, कौन है मेरा परमेश्वर, किसके पाँव दबाती हूँ, किसका दिया खाती हूँ, किसकी मार सहती हूँ—वे केवल सामाजिक प्रश्न नहीं हैं। वे इस बात को प्रकट करते हैं कि स्त्री की पहचान को उसके अपने अस्तित्व से नहीं, बल्कि दूसरों के साथ उसके संबंधों से परिभाषित किया गया है। अस्तित्ववादी दृष्टि से यह स्थिति दूसरों द्वारा परिभाषित अस्तित्व की स्थिति है।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि कविता में स्त्री से यह नहीं पूछा जाता कि वह कौन है, बल्कि यह पूछा जाता है कि वह किसकी है। यह अंतर अस्तित्ववादी विश्लेषण की दृष्टि से निर्णायक है। “कौन” का प्रश्न आत्म-पहचान का प्रश्न है, जबकि “किसकी” का प्रश्न स्वामित्व का है। स्त्री का अस्तित्व उसके अपने भीतर नहीं, बल्कि किसी बाहरी सत्ता में खोजा जा रहा है। यही वह स्थिति है जिसे बोуवार स्त्री के अन्यीकरण के रूप में देखती हैं।

कविता का निर्णायक क्षण तब आता है जब वक्ता कहती है कि मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ। यह पंक्ति वस्तुतः एक अस्तित्ववादी आत्म-घोषणा है। यहाँ स्त्री अपने ऊपर आरोपित सभी बाहरी परिभाषाओं से बाहर निकलकर स्वयं को परिभाषित करती है। वह यह स्वीकार नहीं करती कि उसकी पहचान किसी पति, परिवार या सामाजिक भूमिका से निर्धारित होगी। वह अपने अस्तित्व का अर्थ स्वयं निर्धारित करती है। सार्त्र के शब्दों में कहें तो वह अपने सार को स्वयं निर्मित कर रही है।

“मैं अपनी औरत हूँ” कथन का अर्थ केवल स्वतंत्र होना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ अपने अस्तित्व की जिम्मेदारी स्वीकार करना भी है। अस्तित्ववाद में स्वतंत्रता कभी सरल स्थिति नहीं होती। वह सुरक्षा के पारंपरिक स्रोतों से दूरी भी माँगती है। इसलिए जब वृद्ध स्त्री कवयित्री को देखकर सोचती है कि कैसे कटेगा इस औरत का जीवन, तो यह प्रतिक्रिया अस्तित्ववादी अर्थ ग्रहण कर लेती है। स्वतंत्रता दूसरों को भयावह लग सकती है, क्योंकि उसमें निश्चितताओं का अभाव है। जो व्यक्ति अपनी पहचान स्वयं बनाता है, उसे अपने जीवन की जिम्मेदारी भी स्वयं उठानी पड़ती है।

कविता में उपस्थित वृद्ध स्त्री और वक्ता के बीच का संवाद अस्तित्व के दो भिन्न रूपों का संवाद बन जाता है। वृद्ध स्त्री की दुनिया संबंधों और भूमिकाओं के माध्यम से निर्मित हुई है। उसकी दृष्टि में जीवन का अर्थ उन्हीं संरचनाओं से आता है। दूसरी ओर वक्ता उन संरचनाओं से बाहर निकलकर अपने अस्तित्व को स्वयं परिभाषित कर रही है। यह वही तनाव है जिसे अस्तित्ववादी चिंतन व्यक्ति और सामाजिक नियतियों के बीच के तनाव के रूप में देखता है।

अपना खाती हूँ/ जब जी चाहता है तब खाती हूँ—इन पंक्तियों का भी अस्तित्ववादी अर्थ है। यहाँ साधारण-सी क्रिया आत्मनिर्णय का संकेत बन जाती है। अस्तित्ववाद के लिए स्वतंत्रता किसी अमूर्त विचार का नाम नहीं है, बल्कि वह जीवन की छोटी-छोटी स्थितियों में व्यक्त होती है। अपने समय, अपनी इच्छाओं और अपने निर्णयों पर अधिकार होना ही स्वतंत्र अस्तित्व का आधार है।

कविता का एक गहरा अस्तित्ववादी पक्ष तब उभरता है जब वक्ता कहती है कि कोई किसी का नहीं होता, सब अपने होते हैं। यह कथन अस्तित्ववादी व्यक्ति-बोध का सार प्रस्तुत करता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य संबंधों से मुक्त हो जाता है, बल्कि यह कि उसका अस्तित्व किसी दूसरे व्यक्ति की संपत्ति नहीं बन सकता। प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन का उत्तरदायी है और अपनी स्वतंत्रता का वाहक है।

कविता के अंतिम हिस्से में भविष्य की स्त्री की जो छवि सामने आती है, वह अस्तित्ववादी दृष्टि से विशेष रूप से अर्थवान है। वह स्वयं को “उन्मुक्त” कहती है और आसमान, समुद्र, लहरों तथा हवा के साथ अपना संबंध स्थापित करती है। यहाँ स्वतंत्रता केवल सामाजिक बंधनों से मुक्ति नहीं रह जाती, बल्कि वह अस्तित्व के विस्तार का अनुभव बन जाती है। यह वह क्षण है जहाँ व्यक्ति अपनी संभावनाओं को पूरी तरह जीने लगता है।

अंतिम पंक्तियाँ—मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर, पूर्णतया अपनी—कविता के अस्तित्ववादी अर्थ को चरम पर पहुँचा देती हैं। यहाँ पूर्वजों के शाप और अभिलाषाएँ उन तैयार परिभाषाओं का प्रतीक हैं जिन्हें समाज व्यक्ति पर आरोपित करता है। अस्तित्ववाद का आग्रह यही है कि मनुष्य इन पूर्वनिर्धारित अर्थों के भीतर कैद न रहे, बल्कि अपने जीवन का अर्थ स्वयं निर्मित करे। भविष्य की स्त्री इसी अर्थ में पूर्णतया अपनी है। वह किसी बाहरी सत्ता द्वारा परिभाषित नहीं है, बल्कि वह अपने चुनावों, अपने आत्मबोध और अपनी स्वतंत्रता के आधार पर स्वयं को रचती है।

इस प्रकार अस्तित्ववादी दृष्टि से “मैं किसकी औरत हूँ” केवल स्त्री-मुक्ति की कविता नहीं रह जाती। यह मनुष्य के आत्मनिर्माण, स्वतंत्रता और प्रामाणिक अस्तित्व की कविता बन जाती है। इसका केंद्रीय संघर्ष सामाजिक भूमिकाओं और आत्मनिर्मित पहचान के बीच का संघर्ष है। कविता की वक्ता उस स्थिति तक पहुँचती है जहाँ वह दूसरों द्वारा दी गई पहचान को अस्वीकार कर अपने अस्तित्व का अर्थ स्वयं गढ़ती है। यही वह बिंदु है जहाँ यह कविता अस्तित्ववादी चिंतन की मूल संवेदना से गहरे स्तर पर जुड़ जाती है।

अस्तित्ववाद के साथ-साथ स्त्री-संवेदना और स्त्रीवादी दर्शन से लैस सविता सिंह की इस रचना के साथ तुलना के लिए एड्रिएन रिच की कविता ‘डाइविंग इन-टू द रेक’ विशेष रूप से प्रासंगिक है। रिच की यह कविता स्त्री द्वारा अपने अस्तित्व, इतिहास और पहचान की खोज की कविता है। उसका एक संक्षिप्त अंश है—मैं जलपरी भी हूँ, मैं जलपुरुष भी हूँ (I am she: I am he)। एड्रिएन रिच की ‘डाइविंग इन-टू द रेक’ कविता का हिन्दी रूपांतरण प्रस्तुत है :

मलबे में गोताखोरी

मिथकों की पुस्तक पढ़ लेने के बाद,
कैमरा सँभालकर,
चाकू की धार परखकर,
मैंने पहन लिया
काले रबर का वह कवच,
वे विचित्र पंख-जैसे फ्लिपर,
और वह गंभीर, बोझिल मुखौटा।

मुझे यह यात्रा करनी है—

कूस्तो की तरह नहीं,
अपने परिश्रमी दल के साथ
धूप से नहाई नौका पर सवार होकर नहीं,

बल्कि अकेले।

एक सीढ़ी है।

वह हमेशा वहीं रहती है,
जहाज़ के किनारे से सटी हुई,
निर्दोष-सी झूलती हुई।

हम जानते हैं
उसका प्रयोजन क्या है—

हम, जिन्होंने कभी उसका उपयोग किया है।

अन्यथा
वह समुद्री सामान का
कोई तुच्छ-सा हिस्सा भर है।

मैं उतरती हूँ।

पायदान-दर-पायदान।

अब भी ऑक्सीजन मुझे घेरे हुए है,
नीला प्रकाश,
मानवीय वायु के
स्वच्छ कण।

मैं उतरती हूँ।

मेरे फ्लिपर मुझे असहाय बना देते हैं,
मैं किसी कीट की भाँति
सीढ़ी से नीचे रेंगती हूँ,

और वहाँ कोई नहीं
जो मुझे बता सके
कि समुद्र कहाँ से आरम्भ होता है।

पहले हवा नीली है,

फिर और अधिक नीली,

फिर हरी,

और फिर काली।

मैं अँधेरे में विलीन होने लगती हूँ,

फिर भी मेरा मुखौटा शक्तिशाली है,
वह मेरे रक्त में शक्ति भरता है।

किन्तु समुद्र एक दूसरी कथा है।

समुद्र शक्ति का प्रश्न नहीं है।

यहाँ मुझे अकेले सीखना होगा

कि इस गहन तत्त्व में
अपने शरीर को
बिना बल लगाए
कैसे मोड़ा जाता है।

और अब—

यह भूल जाना सरल है
कि मैं यहाँ क्यों आई थी,

उन असंख्य जीवों के बीच
जो सदियों से यहीं रहते आए हैं,

प्रवालों के बीच
अपने दुर्गाकार पंख लहराते हुए।

और फिर—

यहाँ साँस भी
एक अलग ढंग से ली जाती है।

मैं मलबे की खोज में आई थी।

शब्द मेरे उद्देश्य हैं।

शब्द ही मेरे मानचित्र हैं।

मैं यह देखने आई थी

कि कितना विनाश हुआ था,

और कौन-से खजाने अब भी बचे हुए हैं।

अपने दीपक की किरण को
धीरे-धीरे फेरती हूँ मैं

उस वस्तु के पार्श्व पर,

जो मछलियों और समुद्री घास से भी अधिक स्थायी है।

वही वस्तु,

जिसके लिए मैं यहाँ आई थी—

मलबा,

मलबे की कथा नहीं;

वस्तु स्वयं,

मिथक नहीं।

वह डूबा हुआ चेहरा,

जो अब भी सूर्य की ओर ताक रहा है;

विनाश का वह प्रमाण,

जिसे नमक और लहरों की गति ने

घिस-घिसकर

एक जर्जर सौन्दर्य में बदल दिया है।

विपत्ति की पसलियाँ

अब भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हुई

वक्राकार खड़ी हैं,

उन संकोची भटकनेवालों के बीच।

यही वह स्थान है।

और मैं यहाँ हूँ—

वह जलपरी,

जिसके काले बाल
जल में लहराते हैं;

वह जलपुरुष,

अपने कवचधारी शरीर में।

हम मौन हैं।

हम मलबे के चारों ओर
चक्कर लगाते हैं।

हम उसके गर्भ में उतरते हैं।

मैं स्त्री हूँ।

मैं पुरुष हूँ।

मैं वह हूँ

जिसका डूबा हुआ चेहरा
खुली आँखों के साथ सो रहा है;

मैं वह हूँ

जिसके वक्ष अब भी
दबाव और संघर्ष की स्मृति सँजोए हुए हैं;

जिसकी रजत, ताम्र और स्वर्णिम निधियाँ

पीपों के भीतर

अस्पष्ट पड़ी हैं,

आधी फँसी हुई,

सड़ने के लिए छोड़ दी गई।

हम वही आधे-नष्ट उपकरण हैं

जो कभी
एक दिशा पर अटल रहे थे;

जल से गल चुकी दैनंदिनी,

कीचड़ से अटका हुआ दिशासूचक यंत्र।

हम हैं—

मैं हूँ,

तुम हो—

साहस से या कायरता से,

वे लोग

जो लौट आते हैं

इस दृश्य तक,

अपने साथ लिए हुए

एक चाकू,

एक कैमरा,

एक मिथकों की पुस्तक—

जिसमें

हमारे नाम नहीं लिखे गए।

 

यह कविता अपने भीतर गहरे अस्तित्ववादी और स्त्रीवादी निहितार्थ समेटे हुए है। एड्रिएन रिच की कविता में वक्ता समुद्र की गहराइयों में किसी जहाज़ के मलबे की खोज करने नहीं जाती, बल्कि वह उन मिथकों, इतिहासों और पहचान-निर्माण की प्रक्रियाओं की खोज में उतरती है जिन्होंने मनुष्य और विशेषतः स्त्री को परिभाषित किया है। वहाँ यात्रा बाहर की कम और भीतर की अधिक है।

सविता सिंह की “मैं किसकी औरत हूँ” और एड्रिएन रिच की “डाइविंग इन-टू द रेक” दोनों कविताओं में एक समान अस्तित्ववादी बेचैनी दिखाई देती है। दोनों की वक्ताएँ तैयार पहचान को स्वीकार नहीं करतीं। वे अपने लिए निर्मित सामाजिक परिभाषाओं पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। सविता सिंह की कविता में यह प्रश्न “मैं किसकी औरत हूँ” के रूप में सामने आता है, जबकि रिच की कविता में यह प्रश्न इतिहास और मिथक के मलबे में उतरकर पूछा जाता है कि वास्तव में मैं कौन हूँ।

दोनों कविताओं के बीच एक उल्लेखनीय समानता यह है कि पहचान को वे किसी स्थिर सार के रूप में नहीं देखतीं। सार्त्र की भाषा में कहें तो दोनों कविताओं में अस्तित्व, पूर्वनिर्धारित सार से पहले उपस्थित है। सविता सिंह की वक्ता “मैं अपनी औरत हूँ” कहकर अपनी पहचान स्वयं निर्मित करती है। रिच की वक्ता भी स्त्री और पुरुष की पारंपरिक द्वैतात्मक श्रेणियों को पार करते हुए कहती है कि आई ऍम शी: आई ऍम ही (I am she: I am he)। वह अपने अस्तित्व को किसी एक सांस्कृतिक खाँचे में सीमित नहीं होने देती।

फिर भी दोनों कविताओं की संवेदना में एक उल्लेखनीय अंतर है। एड्रिएन रिच की कविता में यात्रा अधिक प्रतीकात्मक और मिथकीय है। वहाँ समुद्र, मलबा, गोताखोरी और खोज के बिंबों के माध्यम से आत्म-पहचान की प्रक्रिया व्यक्त होती है। इसके विपरीत सविता सिंह की कविता का संसार सामाजिक यथार्थ के अधिक निकट है। रेलगाड़ी में बैठी वृद्ध स्त्री, पति-परमेश्वर की अवधारणा, मार सहने की बात, खाने और जीवन जीने की स्वतंत्रता—ये सब प्रत्यक्ष सामाजिक अनुभवों से निर्मित हैं। इसलिए सविता सिंह की कविता अस्तित्ववादी प्रश्न को अधिक ठोस सामाजिक संदर्भ में रखती है।

एक और महत्त्वपूर्ण अंतर यह है कि रिच की कविता मुख्यतः इतिहास और मिथक के भीतर दबे हुए स्त्री-अनुभव की खोज करती है, जबकि सविता सिंह की कविता संवाद के माध्यम से स्त्री-चेतना के ऐतिहासिक विकास को सामने लाती है। ‘मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है/ मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा’ जैसी पंक्तियाँ स्त्री-अनुभव की पीढ़ीगत निरंतरता को रेखांकित करती हैं। रिच के यहाँ भी इतिहास उपस्थित है, लेकिन वह अधिक रूपकात्मक रूप में आता है।

अस्तित्ववादी दृष्टि से देखें तो एड्रिएन रिच (Adrienne Rich) की “डाइविंग इन-टू द रेक” (Diving into the Wreck) और सविता सिंह की “मैं किसकी औरत हूँ” दोनों ही कविताएँ मनुष्य द्वारा अपने अस्तित्व को स्वयं परिभाषित करने की प्रक्रिया की कविताएँ हैं। रिच की कविता में वक्ता मिथकों और इतिहास के मलबे में उतरकर उन आरोपित अर्थों और पहचानों की जाँच करती है जिन्होंने उसके अस्तित्व को निर्धारित किया है; वह “मलबे की कहानी नहीं, बल्कि मलबा” (“the wreck and not the story of the wreck”) की खोज करती है, अर्थात् निर्मित आख्यानों के बजाय अनुभव के वास्तविक सत्य तक पहुँचना चाहती है। दूसरी ओर सविता सिंह की कविता में वक्ता “मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ” कहकर दूसरों द्वारा आरोपित पहचान का निषेध करती है और अपने अस्तित्व का अर्थ स्वयं निर्मित करती है। दोनों कविताओं में स्वतंत्रता, आत्मनिर्णय और आत्मनिर्माण की वही अस्तित्ववादी चेतना सक्रिय है जिसे सार्त्र (Jean-Paul Sartre) ने मनुष्य की मूल नियति माना था। इस प्रकार दोनों रचनाएँ यह प्रतिपादित करती हैं कि मनुष्य का वास्तविक अस्तित्व किसी पूर्वनिर्धारित सामाजिक, सांस्कृतिक या ऐतिहासिक पहचान में नहीं, बल्कि स्वयं को स्वयं रचने की प्रक्रिया में निहित है।

स्त्री की दूसरों द्वारा परिभाषित पहचान से स्वनिर्मित पहचान की ओर बढ़ती हैं। रिच की वक्ता इतिहास के मलबे में उतरकर स्वयं को खोजती है, तो सविता सिंह की वक्ता सामाजिक संबोधनों और स्वामित्वपरक संबंधों को अस्वीकार करके स्वयं को खोजती है। दोनों ही स्थितियों में मनुष्य—और विशेष रूप से स्त्री—अपनी पहचान को बाहर से प्राप्त नहीं करती, बल्कि उसे अपने चुनाव और आत्मबोध के माध्यम से निर्मित करती है। यही कारण है कि यदि “मैं किसकी औरत हूँ” को अस्तित्ववादी स्त्रीवादी कविता के रूप में पढ़ा जाए, तो एड्रिएन रिच की “डाइविंग इंटू द रेक” उसका एक सार्थक अंतरराष्ट्रीय समांतर पाठ प्रदान करती है। दोनों कविताएँ स्त्री की उस यात्रा का आख्यान हैं जिसमें वह किसी की परिभाषित वस्तु न रहकर स्वयं अपनी अर्थ-निर्माता सत्ता बन जाती है।

 

प्रसंगवश दक्षिण एशिया और ख़ास तौर से पाकिस्तान की सुप्रसिद्ध स्त्रीवादी कवि किश्वर नाहीद की ‘हम गुनाहगार औरतें’ कविता भी देखी जा सकती है:

 

हम गुनहगार औरतें

 

ये हम गुनहगार औरतें हैं

जो अहल-ए-जुब्बा की तमकनत से न रोब खाएँ

न जान बेचें

न सर झुकाएँ

न हाथ जोड़ें

 

ये हम गुनहगार औरतें हैं

कि जिन के जिस्मों की फ़स्ल बेचें जो लोग

वो सरफ़राज़ ठहरें

नियाबत-ए-इम्तियाज़ ठहरें

वो दावर-ए-अहल-ए-साज़ ठहरें

 

ये हम गुनहगार औरतें हैं

कि सच का परचम उठा के निकलें

तो झूट से शाहराहें अटी मिले हैं

हर एक दहलीज़ पे सज़ाओं की दास्तानें रखी मिले हैं

जो बोल सकती थीं वो ज़बानें कटी मिले हैं

 

ये हम गुनहगार औरतें हैं

कि अब तआक़ुब में रात भी आए

तो ये आँखें नहीं बुझेंगी

कि अब जो दीवार गिर चुकी है

उसे उठाने की ज़िद न करना!

 

ये हम गुनहगार औरतें हैं

जो अहल-ए-जुब्बा की तमकनत से न रोब खाएँ

न जान बेचें

  • किश्वर नाहीद

‘हम गुनहगार औरतें’ दक्षिण एशियाई स्त्रीवादी कविता  का एक ऐसा मील का पत्थर है, जो महज़ व्यवस्था का विरोध नहीं करता, बल्कि भाषा, सत्ता और नैतिकता के स्थापित ढांचों को पूरी तरह उलट देता है। इस कविता की पहली पंक्ति में विरोधाभास और मारकता ध्यान खींचती है। कवयित्री स्वयं को और अपनी जैसी तमाम महिलाओं को ‘गुनहगार’ कहकर संबोधित करती हैं। यहाँ ‘गुनहगार’ शब्द का प्रयोग आत्म-ग्लानि में नहीं, बल्कि एक बेहद तीखे और मारक व्यंग्य (आयरनी) के रूप में किया गया है। पितृसत्तात्मक और रूढ़िवादी समाज ने जिन औरतों को अपनी मर्जी से जीने, सवाल उठाने और स्थापित बंधनों को तोड़ने के कारण ‘पापी’ या ‘गुनहगार’ घोषित कर दिया था, कविता की नायिकाएँ उसी तमगे को अपने गौरव का आभूषण बना लेती हैं। यह भाषा के स्तर पर सत्ता को बेदखल करने की एक सचेत कोशिश है, जहाँ शोषक द्वारा दिए गए गाली जैसे शब्द को ही विद्रोह का सबसे बड़ा प्रतीक बना दिया जाता है।

कविता की शुरुआती पंक्तियों में ‘अहल-ए-जुब्बा’ (पारंपरिक या धार्मिक चोगा पहनने वाले लोग) और उनकी ‘तमकनत’ (रौब-रुतबा या अहंकार) का ज़िक्र सीधे तौर पर उस धार्मिक और सामाजिक संस्था पर हमला है जो नैतिकता के नाम पर औरतों को नियंत्रित करती है। इन पुरुषों के सामने न झुकने, जान न बेचने और हाथ न जोड़ने का दृढ़ संकल्प यह दिखाता है कि औरतों ने अब पुरुष सत्ता के उस मनोवैज्ञानिक खौफ को अपने भीतर से पूरी तरह निकाल फेंका है। यहाँ शरीर और आत्मा की संप्रभुता का दावा है, जहाँ वे अपनी ‘जान’ (अस्तित्व) का सौदा करने से साफ इनकार कर देती हैं। ‘हाथ जोड़ना’ और ‘सर झुकाना’ पराधीनता के वे शारीरिक लक्षण हैं जिन्हें सदियों से औरतों की ‘शालीनता’ या ‘संस्कार’ कहा गया, लेकिन कविता इन गढ़े गए मूल्यों को गुलामी के रूप में चिन्हित करती है।

कविता के अगले बंद में कवयित्री समाज के एक अत्यंत घिनौने और नग्न सच को उजागर करती हैं। वे लिखती हैं, ‘कि जिन के जिस्मों की फ़स्ल बेचें जो लोग, वो सरफ़राज़ ठहरें।’ यहाँ ‘जिस्मों की फ़स्ल’ एक बेहद गहरा और बहुआयामी रूपक है। यह न केवल औरतों के शारीरिक और यौन शोषण की तरफ इशारा करता है, बल्कि उनके श्रम, उनकी प्रजनन क्षमता और उनकी पूरी जिंदगी पर पुरुषों के मालिकाना हक को भी दर्शाता है, जैसे कोई ज़मींदार किसी खेत की फसल बेचता है। सबसे बड़ी विडंबना इसके ठीक बाद आती है; जो लोग इस घिनौने कृत्य में शामिल हैं, समाज उन्हें ‘सरफ़राज़’ (आदरणीय), ‘नियाबत-ए-इम्तियाज़’ (विशेष अधिकार प्राप्त प्रतिनिधि) और ‘दावर-ए-अहल-ए-साज़’ (साज़िशकर्ताओं या न्याय की गद्दी पर बैठने वाले शासक) की उपाधियाँ देता है। यह सूक्ष्म विश्लेषण दिखाता है कि कैसे पूरी न्याय व्यवस्था, राज्य और समाज के नियम शोषकों के पक्ष में खड़े हैं। जो शोषक हैं, वही न्यायाधीश हैं। इस तरह यह कविता निजी क्षेत्र (निजी शोषण) को सीधे तौर पर सार्वजनिक और राजनीतिक सत्ता से जोड़ देती है।

इसके बाद कविता आंदोलन के धरातल पर उतरती है, जहाँ ‘सच का परचम’ (झंडा) उठाकर निकलने की बात की गई है। लेकिन यह रास्ता आसान नहीं है। कवयित्री जब बाहर की दुनिया का मुआयना करती हैं, तो पाती हैं कि ‘शाहराहें’ (मुख्य सड़कें या सार्वजनिक जीवन) झूठ से अटी पड़ी हैं। इसका अर्थ यह है कि समाज का पूरा ढांचा ही पाखंड और झूठ की बुनियाद पर टिका है। इसके बाद आने वाली पंक्तियाँ—’हर एक दहलीज़ पे सज़ाओं की दास्तानें रखी मिले हैं, जो बोल सकती थीं वो ज़बानें कटी मिले हैं’—स्त्री इतिहास के उस भयावह और अदृश्य दमन को सामने लाती हैं जो घरों के भीतर छुपाकर रखा गया है। ‘दहलीज़’ यहाँ घर की सीमा और मर्यादा का प्रतीक है, जहाँ कदम रखते ही औरतों को केवल सज़ाएँ मिलती हैं। ‘ज़बानें कटी मिले हैं’ महज़ एक रूपक नहीं है, बल्कि यह उन तमाम आवाज़ों का गला घोंटने की ओर इशारा है जिन्होंने कभी भी अपने हक के लिए बोलने का साहस किया था। यह पितृसत्ता की उस हिंसक प्रवृत्ति को दिखाता है जो असहमत स्त्री को पूरी तरह खामोश कर देना चाहती है।

कविताओं के अंतिम छंदों में प्रतिरोध का स्वर अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है, जहाँ निराशा और भय का नामोनिशान नहीं है। जब कवयित्री कहती हैं कि ‘अब तआक़ुब में रात भी आए, तो ये आँखें नहीं बुझेंगी’, तो यहाँ ‘रात’ दमन, अत्याचार, सैन्य तानाशाही या किसी भी प्रकार की दमनकारी रूढ़िवादी व्यवस्था का बिम्ब है। ‘तआक़ुब’ यानी पीछा करना; व्यवस्था चाहे कितना भी डराए, कितनी भी काली रातें औरतों के पीछे छोड़ दे, लेकिन अब जो चेतना की ‘आँखें’ खुल चुकी हैं, उन्हें दोबारा अंधकार में नहीं धकेला जा सकता। आँखों का न बुझना उस अटूट उम्मीद और जागरूकता का प्रतीक है जो एक बार आने के बाद कभी खत्म नहीं होती।

कविता का सबसे शक्तिशाली और निर्णायक मोड़ उसकी अंतिम पंक्तियों में आता है: ‘कि अब जो दीवार गिर चुकी है, उसे उठाने की ज़िद न करना!’ यह दीवार सदियों पुराने पितृसत्तात्मक बंधनों, चारदीवारी की बंदिशों और औरतों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाए रखने वाले सामाजिक नियमों की दीवार है। कवयित्री समाज के ठेकेदारों को बहुत स्पष्ट और सीधी चेतावनी दे रही हैं कि इतिहास का पहिया आगे घूम चुका है और औरतें अब आज़ाद हो चुकी हैं। ढह चुकी इस दीवार को दोबारा खड़ा करने की हर कोशिश नाकाम होगी। कविता के अंत में शुरुआती पंक्तियों का दुहराव कोई साधारण दोहराव नहीं है; बल्कि पूरी कविता की यात्रा (शोषण, सच की लड़ाई और चेतना के विस्तार) को तय करने के बाद जब ये पंक्तियाँ दोबारा आती हैं, तो इनका प्रभाव पहले से कहीं अधिक गहरा, गर्व से भरा और अंतिम विजय की घोषणा जैसा प्रतीत होता है। यह कविता शिल्प के स्तर पर बेहद कसी हुई है, जहाँ हर एक शब्द एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल हुआ है और इसका सूक्ष्म पाठ स्त्री के भीतर कभी न खत्म होने वाले आत्मसम्मान को जगाता है।

किश्वर नाहीद की ‘हम गुनाहगार औरतें’ और सविता सिंह की ‘मैं किसकी औरत हूँ’ समकालीन स्त्रीवादी कविता के इतिहास में दो अलग-अलग भाषाई, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिवेश से आने वाली ऐसी कृतियाँ हैं, जो मूलतः स्त्री की अधीनता, अस्मिता और उसकी मुक्ति के संघर्ष को केंद्र में रखती हैं। दोनों ही कविताएँ पितृसत्तात्मक ढांचे, सामाजिक रूढ़ियों और स्त्री को किसी की ‘संपत्ति’ या ‘अधीन’ समझने वाली मानसिकता पर तीखा प्रहार करती हैं। जहाँ किश्वर नाहीद की कविता एक सामूहिक, राजनीतिक और क्रांतिकारी चेतना की हुंकार है, वहीं सविता सिंह की कविता एक बेहद निजी, आत्मीय और पीढ़ीगत संवाद के माध्यम से स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व की दार्शनिक व्याख्या करती है। दोनों ही कवयित्रियाँ स्त्री को समाज द्वारा थोपे गए बंधनों से मुक्त कर उसे खुद के अस्तित्व का स्वामी बनाने का साझा स्वप्न देखती हैं।

किश्वर नाहीद की कविता में जो प्रतिरोध है, वह बहुत मुखर, सामूहिक और संस्थागत शक्तियों के खिलाफ है। वे ‘मैं’ के बजाय ‘हम’ का प्रयोग करती हैं, जो दुनिया भर की, विशेषकर दक्षिण एशियाई समाज की उन सभी औरतों का प्रतिनिधित्व करता है जो व्यवस्था के खिलाफ खड़ी हैं। नाहीद की कविता में ‘अहल-ए-जुब्बा’ यानी धार्मिक और सामाजिक ठेकेदारों के पाखंड को सीधे चुनौती दी गई है, जो औरतों के जिस्मों का व्यापार करते हैं और खुद को न्याय का मसीहा समझते हैं। इसके विपरीत, सविता सिंह की कविता एक रेलगाड़ी के डिब्बे जैसी बेहद रोज़मर्रा और साधारण पृष्ठभूमि से शुरू होती है। यहाँ संघर्ष किसी अदृश्य संस्था या धार्मिक ठेकेदार से नहीं, बल्कि सदियों की अनुकूलित मानसिकता (कंडीशनिंग) से है, जिसे रेलगाड़ी में बैठी सत्तर-पचहत्तर साल की वह बुजुर्ग महिला जी रही है। सविता सिंह की कविता में पूछे गए सवाल—’मैं किसकी औरत हूँ’, ‘कौन है मेरा परमेश्वर’, ‘किसका दिया खाती हूँ’—उस गहरे सामाजिक संस्तरण को दिखाते हैं जहाँ स्त्री की पहचान केवल किसी पुरुष के संदर्भ में ही परिभाषित हो सकती है।

इन दोनों कविताओं में स्त्री के ‘स्वामित्व’ को लेकर एक बेहद खूबसूरत वैचारिक समानता दिखाई देती है। किश्वर नाहीद की औरतें कहती हैं कि वे न तो अपनी जान बेचेंगी और न ही सिर झुकाएँगी, यानी वे किसी की जागीर बनने से साफ इनकार करती हैं। ठीक इसी भावना को और अधिक दार्शनिक और वैयक्तिक धरातल पर ले जाते हुए सविता सिंह की कविता की प्रोटागोनिस्ट कहती है, ‘मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ।’ यह ‘अपनी औरत होना’ ही वास्तव में किश्वर नाहीद की उन ‘गुनहगार औरतों’ का चरम लक्ष्य है, जिन्हें समाज विद्रोही मानता है। सविता सिंह अपनी कविता में ‘परमेश्वर’ और ‘पति’ के उस पारंपरिक त्रिकोण को तोड़ती हैं जो स्त्री को यह अहसास कराता है कि उसका भरण-पोषण और सुरक्षा किसी बाहरी सत्ता पर निर्भर है। वह ‘अपना खाने’ और ‘जब जी चाहे तब खाने’ की स्वतंत्रता की घोषणा करके स्त्री की शारीरिक और आर्थिक संप्रभुता को रेखांकित करती हैं।

दोनों कविताओं का शिल्प और स्वर एक-दूसरे से भिन्न होते हुए भी एक ही बिंदु पर जाकर जुड़ते हैं। किश्वर नाहीद की भाषा में उर्दू की रवानगी, इंकलाबी तेवर और राजनीतिक रूपक हैं, जैसे ‘सच का परचम’, ‘शाहराहें’, ‘तआक़ुब में रात’। यह भाषा सीधे मोर्चे पर डटने वाली और व्यवस्था की ढह चुकी दीवार को दोबारा न उठाने की चेतावनी देने वाली है। दूसरी ओर, सविता सिंह की भाषा बेहद सहज, बिम्बात्मक और संवादात्मक है। वे बुजुर्ग महिला के चेहरे पर ‘दुख के पठार’ और ‘फटकारों की खाइयाँ’ देखती हैं, जो सदियों से औरतों द्वारा सहे गए दमन का शारीरिक साक्ष्य हैं। यहाँ प्रतिरोध चिल्लाकर नहीं, बल्कि एक सहज मुस्कान और आत्म-गौरव के साथ दर्ज किया जाता है। जब नायिका कहती है कि ‘कोई किसी का नहीं होता, सब अपने होते हैं’, तो वह अकेलेपन को एक त्रासदी के रूप में नहीं, बल्कि एक गौरव और स्वतंत्रता के उत्सव के रूप में प्रस्तुत करती है।

पीढ़ीगत चेतना और भविष्य के प्रति दृष्टिकोण के मामले में भी दोनों कविताएँ एक मुकम्मल विमर्श तैयार करती हैं। किश्वर नाहीद की कविता यह मानती है कि जो ज़बानें काटी जा चुकी हैं, उनके बाद अब जो आँखें जाग चुकी हैं, वे रात के तआक़ुब (अंधेरे के पीछा करने) के बाद भी नहीं बुझेंगी। सविता सिंह इसी यात्रा को आगे बढ़ाती हैं। वे मानती हैं कि यह सफर अभी खत्म नहीं हुआ है, अभी दुख के कई और समुद्र और यातनाओं के पठार पार करने बाकी हैं। लेकिन इस यात्रा के अंत में वे एक ऐसी ‘भविष्य की स्त्री’ की कल्पना करती हैं जो पूरी तरह से उन्मुक्त होगी। वह स्त्री न केवल वर्तमान के बंधनों से मुक्त होगी, बल्कि अपने ‘पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर’ पूर्णतया अपनी होगी। यहाँ सविता सिंह पितृसत्ता के उस ऐतिहासिक बोझ से भी स्त्री को मुक्त कर देती हैं जो अभिलाषाओं के नाम पर उसे बांधकर रखता है।

अंततः, ये दोनों कविताएँ इस बात की तस्दीक करती हैं कि स्त्री की मुक्ति का मार्ग चाहे सामूहिक विद्रोह से होकर गुज़रे या व्यक्तिगत आत्म-बोध से, उसका अंतिम गंतव्य अपनी अस्मिता पर पूर्ण अधिकार पाना ही है। किश्वर नाहीद जहाँ व्यवस्था की आँखों में आँखें डालकर उसे डराती हैं, वहीं सविता सिंह उस डरी हुई, संशय में डूबी पारंपरिक स्त्री को अपनी मुस्कान से ढांढस बंधाती हैं और उसे आसमान, समुद्र, हवा और प्रकृति की गंध सौंपते हुए ब्रह्मांडीय स्वतंत्रता का अहसास कराती हैं। दोनों ही रचनाएँ अपने समय और समाज की सीमाओं को तोड़कर स्त्री को एक स्वायत्त, संप्रभु और स्वतंत्र इकाई के रूप में स्थापित करने का सबसे प्रखर दस्तावेज़ हैं।

सविता सिंह की “मैं किसकी औरत हूँ” को यदि स्वत्व और स्वामित्व के दार्शनिक विमर्श की दृष्टि से पढ़ा जाए, तो यह सिर्फ़ स्त्री-मुक्ति की कविता नहीं रह जाती। यह मनुष्य की स्वतंत्र सत्ता, उसकी आत्म-अधिकारिता और स्वामित्व की अवधारणा पर एक गहन चिंतन के रूप में सामने आती है। कविता का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न स्त्री की सामाजिक स्थिति का प्रश्न भर नहीं है, बल्कि यह इस मूल दार्शनिक प्रश्न को भी उठाती है कि क्या कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य का हो सकता है? क्या किसी व्यक्ति की पहचान उसके अपने अस्तित्व से निर्धारित होगी या किसी अन्य के साथ उसके संबंध और उसके ऊपर स्थापित स्वामित्व से?

कविता की आरम्भिक पंक्ति—मैं किसकी औरत हूँ—को सामान्य सामाजिक प्रश्न मानकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। इस पंक्ति का केंद्रीय शब्द “किसकी” है। यह शब्द अपने भीतर एक पूरी सामाजिक और दार्शनिक संरचना को समेटे हुए है। “किसकी” का प्रयोग सामान्यतः वस्तुओं, संपत्तियों या उन चीज़ों के संदर्भ में किया जाता है जिन पर किसी का अधिकार माना जाता है। जब यही प्रश्न किसी मनुष्य के संदर्भ में पूछा जाता है, तो वह एक जटिल अर्थ-संरचना का निर्माण करता है। यहाँ स्त्री को एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि किसी की “औरत” के रूप में समझा जा रहा है। इस प्रकार उसकी पहचान उसके अपने भीतर नहीं, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति के अधिकार-क्षेत्र में खोजी जा रही है।

कविता के अगले प्रश्न इस अर्थ-संरचना को और स्पष्ट करते हैं—कौन है मेरा परमेश्वर, किसके पाँव दबाती हूँ, किसका दिया खाती हूँ, किसकी मार सहती हूँ। इन सभी प्रश्नों का आधार एक ही है कि स्त्री का अस्तित्व स्वयं में पर्याप्त नहीं माना गया है। वह किसी सत्ता के अधीन है, किसी की कृपा पर निर्भर है, किसी की सेवा करती है और किसी की हिंसा भी सहती है। यहाँ स्वामित्व केवल कानूनी या आर्थिक अर्थ में उपस्थित नहीं है, बल्कि वह धार्मिक, नैतिक, भावनात्मक और सांस्कृतिक स्तरों पर भी कार्य कर रहा है। “परमेश्वर” शब्द उस वैचारिक संरचना की ओर संकेत करता है जिसमें पुरुष को ऊँचा और स्त्री को अधीन माना जाता है। “पाँव दबाना” सेवा के रूप में स्वीकृत अधीनता का प्रतीक है। “दिया खाती हूँ” आर्थिक आश्रय की ओर संकेत करता है और “मार सहती हूँ” उस अंतिम बिंदु को सामने लाता है जहाँ स्वामित्व हिंसा का रूप ग्रहण कर लेता है।

इस दृष्टि से कविता का पहला हिस्सा स्त्री को एक ऐसी सत्ता के रूप में प्रस्तुत करता है जिसका स्वत्व उससे छीन लिया गया है। वह अपने अस्तित्व की स्वामिनी नहीं है, बल्कि उसका जीवन किसी अन्य के अधिकार-क्षेत्र में परिभाषित किया जाता है। यहाँ “स्वत्व” और “स्वामित्व” के बीच का अंतर समझना आवश्यक है। स्वत्व का अर्थ है व्यक्ति का अपने ऊपर अधिकार, उसका आत्मबोध और उसकी स्वतंत्र सत्ता। इसके विपरीत स्वामित्व वह स्थिति है जिसमें कोई अन्य व्यक्ति उस पर अधिकार स्थापित करता है। कविता का पूरा तनाव इसी संघर्ष से निर्मित होता है।

कविता का निर्णायक क्षण तब आता है जब वक्ता उत्तर देती है कि मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ। पहली दृष्टि में यह एक साधारण प्रतिवाद लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह पूरी अर्थव्यवस्था को उलट देता है। “किसी की औरत” और “अपनी औरत” के बीच केवल एक शब्द का अंतर है, पर यही अंतर कविता की वैचारिक शक्ति का स्रोत है। पहली स्थिति में स्त्री की पहचान बाहरी स्वामित्व से निर्मित होती है, तो दूसरी स्थिति में उसका अस्तित्व उसके अपने स्वत्व से निर्मित होता है।

यहाँ “अपनी” शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। सामान्यतः स्वामित्व का संबंध किसी बाहरी वस्तु से जोड़ा जाता है, लेकिन “मैं अपनी औरत हूँ” में यह संबंध आत्म-अधिकारिता में रूपांतरित हो जाता है। स्त्री स्वयं अपनी है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपने ऊपर उसी प्रकार स्वामित्व स्थापित करती है जैसे किसी वस्तु पर किया जाता है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि वह अपने जीवन, अपने निर्णयों और अपने अस्तित्व की वैध स्वामिनी है। यह आत्म-अधिकारिता की अवधारणा है, वस्तुकरण की नहीं। कविता का यह कथन मनुष्य को संपत्ति के रूप में देखने वाली समूची मानसिकता का प्रतिरोध करता है।

‘अपना खाती हूँ/ जब जी चाहता है तब खाती हूँ’—इन पंक्तियों का अर्थ भी इसी संदर्भ में खुलता है। यहाँ भोजन केवल भोजन नहीं है, बल्कि यह अपने जीवन पर अधिकार का संकेत है। यदि कोई व्यक्ति यह तय कर सकता है कि वह कब खाएगा, कैसे जिएगा, क्या चुनेगा, तो इसका अर्थ है कि उसका जीवन उसके अपने नियंत्रण में है। कविता इन छोटे-छोटे अनुभवों के माध्यम से यह दिखाती है कि स्वत्व केवल एक अमूर्त दार्शनिक अवधारणा नहीं है, बल्कि वह दैनिक जीवन की साधारण क्रियाओं में भी व्यक्त होता है।

“मैं किसी की मार नहीं सहती” पंक्ति स्वामित्व और हिंसा के संबंध को उजागर करती है। इतिहास में जब भी किसी मनुष्य को किसी दूसरे की संपत्ति के रूप में देखा गया है, तब हिंसा को वैधता मिली है। दास-प्रथा से लेकर पितृसत्तात्मक परिवार तक अनेक व्यवस्थाओं में स्वामित्व ने नियंत्रण और दंड के अधिकार को जन्म दिया है। कविता इस संबंध को पहचानती है। इसलिए हिंसा का अस्वीकार केवल शारीरिक प्रतिरोध नहीं है, बल्कि वह उस मानसिकता का निषेध भी है जो किसी मनुष्य को दूसरे पर अधिकार रखने योग्य मानती है।

वृद्ध स्त्री की प्रतिक्रिया इस विमर्श को और जटिल बनाती है। वह कवयित्री की बात सुनकर सोचती है कि कैसे कटेगा इस औरत का जीवन। यह प्रतिक्रिया बताती है कि स्वामित्व की व्यवस्था केवल बाहरी संरचना नहीं है, बल्कि वह लोगों की चेतना का हिस्सा बन चुकी है। वृद्ध स्त्री के लिए स्त्री का किसी पुरुष से संबद्ध न होना एक संकट की स्थिति है। उसने जीवन भर यही देखा और सीखा है कि स्त्री की सुरक्षा, सम्मान और अस्तित्व किसी पुरुष के साथ उसके संबंध पर निर्भर करते हैं। इस प्रकार कविता यह दिखाती है कि स्वामित्व केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विश्वास भी है।

कविता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वक्ता इस पुरानी चेतना का उपहास नहीं करती। वह कहती है कि मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है, मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा। यह कथन बताता है कि स्वत्व की आधुनिक चेतना किसी ऐतिहासिक शून्य में उत्पन्न नहीं हुई। वह उन्हीं स्त्रियों के अनुभवों और संघर्षों की भूमि पर विकसित हुई है जिन्होंने स्वामित्व की संरचनाओं के भीतर जीवन बिताया। इसलिए कविता में पीढ़ियों के बीच केवल विरोध नहीं है, बल्कि एक गहरा संवाद भी है।

कोई किसी का नहीं होता, सब अपने होते हैं—यह पंक्ति कविता के दार्शनिक अर्थ को और स्पष्ट करती है। यहाँ स्वामित्व की पूरी अवधारणा पर प्रश्नचिह्न लगाया गया है। यह कथन केवल स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के अस्तित्व के बारे में है। किसी व्यक्ति को किसी अन्य का नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसका अस्तित्व स्वयं में स्वतंत्र है। इस प्रकार कविता संबंधों का निषेध नहीं करती, बल्कि वह स्वामित्व पर आधारित संबंधों का निषेध करती है। प्रेम, आत्मीयता और साथ होना एक बात है, जबकि किसी पर अधिकार स्थापित करना दूसरी बात है। कविता इसी भेद को रेखांकित करती है।

कविता के अंतिम हिस्से में जो भविष्य की स्त्री सामने आती है, वह स्वत्व की सबसे विकसित अवस्था का प्रतीक है। वह कहती है कि उन्मुक्त हूँ देखो और फिर आसमान, समुद्र, लहरों तथा हवा को अपने अनुभव का हिस्सा बनाती है। यहाँ “अपनापन” का अर्थ बदल जाता है। प्रारम्भ में कविता जिस “किसकी” के प्रश्न से शुरू हुई थी, वह स्वामित्व का प्रश्न था। अंत में “मेरी हैं” का अर्थ अधिकार नहीं, बल्कि अस्तित्वगत संबंध है। प्रकृति उसकी संपत्ति नहीं है, बल्कि उसके अनुभव का विस्तार है। इस प्रकार कविता स्वामित्व की संकीर्ण अवधारणा से आगे बढ़कर अस्तित्वगत सहभागिता की अवधारणा तक पहुँचती है।

अंतिम पंक्तियाँ—‘मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर/ पूर्णतया अपनी’—कविता के स्वत्व-विमर्श का चरम बिंदु हैं। यहाँ “शाप” उन परंपराओं, निषेधों और रूढ़ियों का संकेत हैं जिन्होंने स्त्री की स्वतंत्रता को सीमित किया। वहीं “अभिलाषाएँ” उन अपेक्षाओं का संकेत हैं जिनके अनुसार स्त्री को आकार दिया गया। इन दोनों से दूर होना केवल सामाजिक मुक्ति नहीं है, बल्कि यह अपने स्वत्व की पुनर्प्राप्ति है। “पूर्णतया अपनी” होना इस कविता में आत्मकेंद्रिकता नहीं, बल्कि आत्म-अधिकारिता का प्रतीक है। यह वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति अपने अस्तित्व का आधार स्वयं बनता है।

इस प्रकार स्वत्व और स्वामित्व के दार्शनिक परिप्रेक्ष्य से “मैं किसकी औरत हूँ” का पाठ हमें यह समझने में सहायता करता है कि कविता का वास्तविक संघर्ष केवल स्त्री और पुरुष के बीच नहीं है। उसका संघर्ष मनुष्य को संपत्ति की तरह देखने वाली चेतना और मनुष्य को स्वतंत्र सत्ता के रूप में स्वीकार करने वाली चेतना के बीच है। “किसकी औरत” से “अपनी औरत” तक की यात्रा वस्तुतः स्वामित्व से स्वत्व तक की यात्रा है। यही यात्रा कविता को स्त्री-विमर्श से आगे ले जाकर मानवीय स्वतंत्रता और आत्म-अधिकारिता के व्यापक दार्शनिक विमर्श से जोड़ देती है।

 

“मैं किसकी औरत हूँ” कविता को यदि पीढ़ियों के संवाद और अंतःपीढ़ीय चेतना के परिप्रेक्ष्य में पढ़ा जाए, तो कविता का अर्थ-क्षेत्र उल्लेखनीय रूप से विस्तृत हो जाता है। तब यह केवल स्त्री की स्वतंत्रता की कविता नहीं रह जाती, बल्कि स्त्री-अनुभव के ऐतिहासिक विकास, बदलती सामाजिक चेतना और विभिन्न पीढ़ियों के बीच उपस्थित संवाद, तनाव, असहमति और निरंतरता की कविता भी बन जाती है। कविता का दृश्य बहुत साधारण है—रेलगाड़ी में आमने-सामने बैठी दो स्त्रियाँ। लेकिन यही साधारण दृश्य दो अलग-अलग ऐतिहासिक अनुभवों के मिलन-बिंदु में बदल जाता है।

कविता में सामने बैठी वृद्ध स्त्री का परिचय उसके नाम, जाति, वर्ग या पारिवारिक स्थिति से नहीं दिया गया है। उसकी पहचान उसके शरीर और चेहरे पर अंकित अनुभवों के माध्यम से निर्मित होती है। आँखें धँस गई थीं उसकी, मांस शरीर से झूल रहा था, चेहरे पर थे दुख के पठार, थीं अनेक फटकारों की खाइयाँ—ये पंक्तियाँ केवल वृद्धावस्था का चित्र नहीं हैं। यहाँ शरीर इतिहास का दस्तावेज़ बन जाता है। उसके चेहरे पर समय नहीं, बल्कि जीवन-स्थितियों की छाप अंकित है। “दुख के पठार” और “फटकारों की खाइयाँ” बताती हैं कि यह स्त्री एक ऐसे सामाजिक संसार से आई है जहाँ स्त्री के हिस्से में त्याग, अपमान, श्रम और सहनशीलता को ही जीवन-मूल्य के रूप में स्थापित किया गया था।

इस वृद्ध स्त्री के प्रश्न—‘मैं किसकी औरत हूँ/ कौन है मेरा परमेश्वर/किसके पाँव दबाती हूँ/ किसका दिया खाती हूँ/किसकी मार सहती हूँ’—दरअसल उसके निजी प्रश्न नहीं हैं। वे उस पूरी पीढ़ी की चेतना को व्यक्त करते हैं जिसने स्त्री की पहचान को हमेशा किसी पुरुष से जोड़कर समझा। यहाँ विशेष ध्यान देने की बात यह है कि वृद्ध स्त्री इन प्रश्नों को किसी आलोचनात्मक दूरी से नहीं पूछ रही, बल्कि उसके लिए ये प्रश्न जीवन की सामान्य और स्वाभाविक भाषा का हिस्सा हैं। इससे स्पष्ट होता है कि पितृसत्तात्मक मूल्य केवल बाहरी नियम नहीं होते, वे चेतना के ढाँचे में समा जाते हैं और फिर व्यक्ति उन्हीं के भीतर सोचने लगता है।

यहीं से कविता दो पीढ़ियों के बीच संवाद का रूप ग्रहण करती है। वृद्ध स्त्री का संसार उस ऐतिहासिक क्षितिज का प्रतिनिधित्व करता है जहाँ स्त्री की पहचान संबंधों के माध्यम से परिभाषित होती थी। उसके लिए पत्नी होना, सेवा करना, सहना और आश्रित रहना स्त्री-अस्तित्व के स्वाभाविक अंग हैं। दूसरी ओर कविता की वक्ता एक भिन्न ऐतिहासिक क्षितिज का प्रतिनिधित्व करती है। जब वह कहती है कि मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ, तो यह केवल व्यक्तिगत उत्तर नहीं है, बल्कि यह एक नई सामाजिक चेतना का वक्तव्य है। इस उत्तर में आधुनिक स्त्री-अस्मिता, आत्मनिर्णय और स्वायत्तता का बोध उपस्थित है।

लेकिन कविता की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह इन दोनों चेतना को सरल विरोध में नहीं रखती। यदि कवयित्री चाहतीं, तो वृद्ध स्त्री को अतीत का प्रतीक और स्वयं को प्रगतिशील वर्तमान का प्रतीक बनाकर एक सीधी द्वंद्वात्मक संरचना निर्मित कर सकती थीं। किंतु कविता ऐसा नहीं करती। वह दोनों के बीच जटिल मानवीय संबंध बनाए रखती है। वृद्ध स्त्री के प्रति कहीं भी उपहास, तिरस्कार या श्रेष्ठताबोध नहीं है। इसके विपरीत कवयित्री उसके अनुभवों को गंभीरता से ग्रहण करती हैं।

यह बात विशेष रूप से तब स्पष्ट होती है जब वृद्ध स्त्री की आँखों में एक असहज ख़ामोशी भर आती है। वह सोचती है कि कैसे कटेगा इस औरत का जीवन। पहली दृष्टि में यह प्रतिक्रिया रूढ़िवादी प्रतीत हो सकती है, लेकिन कविता इसे केवल रूढ़ि के रूप में प्रस्तुत नहीं करती। इसके भीतर चिंता, भय और जीवन-अनुभव का संचय भी है। वृद्ध स्त्री ने जिस संसार में जीवन बिताया है, वहाँ पुरुष-संबंध के बिना स्त्री का अस्तित्व लगभग अकल्पनीय था। इसलिए स्वतंत्र स्त्री का विचार उसे असुरक्षित और भयावह लगता है। यह भय उसकी संकीर्णता का नहीं, बल्कि उसके ऐतिहासिक अनुभव का परिणाम है।

यहीं सविता सिंह अंतःपीढ़ीय चेतना के एक महत्त्वपूर्ण पक्ष को सामने लाती है। सामाजिक परिवर्तन केवल विचारों का परिवर्तन नहीं होता, बल्कि वह अनुभवों की दुनिया को भी बदलता है। जो बात एक पीढ़ी को स्वाभाविक लगती है, वही दूसरी पीढ़ी को अस्वीकार्य लग सकती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पहली पीढ़ी मूर्ख थी या दूसरी पीढ़ी पूर्णतः मुक्त है। दोनों अपने-अपने ऐतिहासिक संदर्भों की उपज हैं। कविता इसी जटिलता को समझती है।

‘मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है/मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा’—ये पंक्तियाँ इस संदर्भ में कविता का केंद्रीय बिंदु हैं। यहाँ वक्ता अपने और वृद्ध स्त्री के बीच किसी ऐतिहासिक खाई का निर्माण नहीं करती। वह स्वीकार करती है कि दोनों की यात्राएँ एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। यह कथन स्त्री-अनुभव की ऐतिहासिक निरंतरता का बोध कराता है। आधुनिक स्त्री की स्वतंत्रता किसी निर्वात में उत्पन्न नहीं हुई, बल्कि वह उन स्त्रियों के जीवन-संघर्षों की पृष्ठभूमि पर विकसित हुई है जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से परिवर्तन की जमीन तैयार की।

इन पंक्तियों में एक प्रकार का स्त्रीवंशीय इतिहास-बोध भी उपस्थित है। सामान्यतः इतिहास पुरुषों की उपलब्धियों और सत्ता-संरचनाओं के रूप में लिखा जाता है, लेकिन कविता स्त्रियों की यात्राओं को एक-दूसरे से जोड़कर देखने का आग्रह करती है। वृद्ध स्त्री और वक्ता अलग-अलग व्यक्ति होते हुए भी एक साझा ऐतिहासिक अनुभव की उत्तराधिकारी हैं।

कविता का एक और ख़ास पहलू यह है कि वह सामाजिक परिवर्तन को पूर्ण और अंतिम उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत नहीं करती। यात्रा लेकिन यहीं समाप्त नहीं हुई है कहकर कविता यह स्पष्ट कर देती है कि चेतना का विकास एक सतत प्रक्रिया है। वर्तमान पीढ़ी ने कुछ सीमाएँ तोड़ी हैं, लेकिन उसके सामने भी अनेक चुनौतियाँ हैं। फटकारों की कई और खाइयाँ, दुख के समुद्र और यातनाओं के पठार अभी भी शेष हैं। यह स्वीकारोक्ति कविता को आत्ममुग्ध होने से बचाती है।

यहीं से कविता का समय-बोध और विस्तृत हो जाता है। आरम्भ में केवल दो पीढ़ियाँ थीं—वृद्ध स्त्री और वर्तमान वक्ता। लेकिन अब कविता तीसरी पीढ़ी की कल्पना करती है—उस स्त्री की जो भविष्य में आएगी। यह भविष्य की स्त्री वर्तमान स्त्री के लिए वही स्थान ग्रहण करती है जो वर्तमान स्त्री वृद्ध स्त्री के लिए ग्रहण करती है। अर्थात् चेतना का विकास रुकता नहीं है और हर पीढ़ी अपने पूर्ववर्तियों की तुलना में कुछ नई संभावनाएँ अर्जित करती है।

भविष्य की स्त्री को देखकर वर्तमान की स्त्रियाँ भी विस्मित होंगी—यह विचार विशेष ध्यान देने योग्य है। इससे स्पष्ट होता है कि कविता किसी एक ऐतिहासिक क्षण को अंतिम सत्य नहीं मानती। वर्तमान की स्वतंत्र स्त्री भी भविष्य की दृष्टि से सीमित दिखाई दे सकती है। यह दृष्टिकोण सामाजिक परिवर्तन को एक गतिशील प्रक्रिया के रूप में समझता है, न कि किसी अंतिम उपलब्धि के रूप में।

 

अंतिम अंश में भविष्य की स्त्री कहती है कि उन्मुक्त हूँ देखो और फिर अपने को आसमान, समुद्र, लहरों और हवा से जोड़ती है। यह केवल स्वतंत्रता की घोषणा नहीं है, बल्कि यह चेतना के विस्तार का संकेत है। वृद्ध स्त्री की दुनिया परिवार और पति के इर्द-गिर्द संगठित थी। वर्तमान स्त्री ने अपने अस्तित्व का स्वत्व प्राप्त किया है। भविष्य की स्त्री उससे भी आगे जाकर अपने अस्तित्व को प्रकृति और विश्व के व्यापक आयामों से जोड़ रही है। इस प्रकार कविता स्त्री-चेतना के क्रमिक विस्तार का एक त्रिस्तरीय मॉडल प्रस्तुत करती है—पराधीनता, आत्म-अधिकारिता और उन्मुक्त अस्तित्व।

अंतिम पंक्तियाँ—मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर, पूर्णतया अपनी—अंतःपीढ़ीय विमर्श की दृष्टि से भी गहरी अर्थवत्ता रखती हैं। यहाँ पूर्वजों के शाप केवल दमनकारी परंपराएँ नहीं हैं, बल्कि वे मानसिक और सांस्कृतिक संरचनाएँ भी हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही हैं। वहीं अभिलाषाएँ उन अपेक्षाओं का संकेत हैं जिन्हें हर पीढ़ी अगली पीढ़ी पर आरोपित करती है। भविष्य की स्त्री इन दोनों से मुक्त है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह इतिहास-विहीन है, बल्कि यह है कि उसने इतिहास के दमनकारी तत्वों को पीछे छोड़ दिया है।

इस प्रकार पीढ़ियों के संवाद और अंतःपीढ़ीय चेतना के परिप्रेक्ष्य में “मैं किसकी औरत हूँ” एक ऐसी कविता के रूप में उभरती है जो स्त्री-अनुभव के ऐतिहासिक विकास को अत्यंत सूक्ष्मता से चित्रित करती है। रेलगाड़ी में बैठी दो स्त्रियों का संवाद धीरे-धीरे तीन कालों—अतीत, वर्तमान और भविष्य—के संवाद में बदल जाता है। कविता यह दिखाता है कि सामाजिक परिवर्तन न तो अचानक घटित होता है और न ही रैखिक ढंग से आगे बढ़ता है। वह अनुभवों, संघर्षों, आशंकाओं, असहमतियों और नई संभावनाओं से निर्मित होता है। इसी कारण यह कविता केवल स्त्री-मुक्ति का आख्यान नहीं, बल्कि बदलती हुई मानवीय चेतना का एक मानीखेज़ तहज़ीबी दस्तावेज़ बन जाती है।

 

सांस्कृतिक आलोचना की दृष्टि से “मैं किसकी औरत हूँ” को पढ़ना सार्थक है। इस दौरान यह समझना आवश्यक है कि यह कविता केवल स्त्री की सामाजिक स्थिति का वर्णन नहीं करती, बल्कि उन सांस्कृतिक प्रक्रियाओं को उजागर करती है जिनके माध्यम से स्त्री की अधीनता को स्वाभाविक, नैतिक, धार्मिक और आदर्श के रूप में स्थापित किया जाता है। सांस्कृतिक आलोचना का मूल आग्रह यह है कि सत्ता केवल राज्य, कानून या अर्थव्यवस्था में नहीं होती, बल्कि वह संस्कृति के भीतर भी कार्य करती है। परिवार, धर्म, भाषा, मिथक, लोकाचार, रीति-रिवाज, नैतिक आदर्श और सामाजिक प्रतीक—ये सभी सत्ता के ऐसे माध्यम बन सकते हैं जिनके द्वारा समाज अपनी मान्यताओं को पुनरुत्पादित करता है। इस दृष्टि से “मैं किसकी औरत हूँ” सांस्कृतिक सत्ता के उन रूपों की पहचान करने वाली कविता है जो स्त्री के जीवन को आकार देते हैं।

 

रेमंड विलियम्स ने संस्कृति को केवल कला और साहित्य तक सीमित न मानकर जीवन की समग्र पद्धति के रूप में देखा था। यदि इस अवधारणा को ध्यान में रखें तो कविता के प्रारम्भिक प्रश्न—मैं किसकी औरत हूँ, कौन है मेरा परमेश्वर, किसके पाँव दबाती हूँ, किसका दिया खाती हूँ, किसकी मार सहती हूँ—किसी एक व्यक्ति की जिज्ञासाएँ नहीं रह जातीं। वे उस संपूर्ण सांस्कृतिक व्यवस्था के संकेतक बन जाते हैं जिसके भीतर स्त्री-जीवन को अर्थ दिया जाता है। यहाँ संस्कृति किसी अमूर्त अवधारणा के रूप में नहीं, बल्कि दैनिक जीवन के व्यवहारों और विश्वासों में उपस्थित दिखाई देती है।

अंतोनियो ग्राम्शी की ‘सांस्कृतिक प्रभुत्व’ (हेजेमनी) की अवधारणा इस कविता को समझने में विशेष रूप से सहायक है। ग्राम्शी का तर्क था कि कोई भी प्रभुत्वशाली व्यवस्था केवल बल प्रयोग से कायम नहीं रहती, बल्कि वह लोगों की सहमति भी अर्जित करती है। यह सहमति शिक्षा, धर्म, परिवार और सांस्कृतिक संस्थाओं के माध्यम से निर्मित होती है। कविता में वृद्ध स्त्री द्वारा पूछे गए प्रश्न इसी प्रकार की सांस्कृतिक सहमति का परिणाम हैं। उसके लिए यह स्वाभाविक है कि किसी स्त्री की पहचान इस आधार पर निर्धारित की जाए कि वह किसकी पत्नी है, किसकी सेवा करती है और किसके संरक्षण में रहती है। उसने इन मूल्यों को बाहरी दबाव के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की सामान्य सच्चाई के रूप में आत्मसात कर लिया है। यही सांस्कृतिक प्रभुत्व की सबसे प्रभावी अवस्था है।

कौन है मेरा परमेश्वर पंक्ति का विश्लेषण करते समय लुई अल्थूसर की वैचारिक राज्य-उपकरणों की अवधारणा भी उपयोगी सिद्ध होती है। अल्थूसर के अनुसार धर्म, परिवार और शिक्षा जैसी संस्थाएँ विचारधारा को पुनरुत्पादित करती हैं और व्यक्तियों को विशिष्ट भूमिकाओं में ढालती हैं। पति को परमेश्वर मानने की धारणा इसी प्रकार की वैचारिक प्रक्रिया का परिणाम है। यह केवल धार्मिक विश्वास नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी सांस्कृतिक संरचना है जो पुरुष की श्रेष्ठता और स्त्री की अधीनता को नैतिक वैधता प्रदान करती है।

कविता इस संरचना को उजागर करती है और उसके भीतर छिपे सत्ता-संबंधों को सामने लाती है। इस बिंदु पर मिशेल फूको का सत्ता-संबंधी चिंतन भी प्रासंगिक हो उठता है। फूको ने सत्ता को केवल दमनकारी शक्ति के रूप में नहीं देखा है। उनके अनुसार सत्ता ज्ञान, भाषा और सामाजिक व्यवहारों के माध्यम से कार्य करती है। वह व्यक्तियों को केवल नियंत्रित ही नहीं करती, बल्कि उनका निर्माण भी करती है। कविता में उपस्थित प्रश्नों को इसी दृष्टि से पढ़ा जा सकता है। किसके पाँव दबाती हूँ, किसका दिया खाती हूँ, किसकी मार सहती हूँ—ये केवल सामान्य व्यवहार नहीं हैं। ये दरअसल ऐसे सांस्कृतिक वाक्य-विन्यास हैं जो स्त्री की पहचान को परिभाषित करते हैं। स्त्री स्वयं को इन्हीं श्रेणियों के भीतर समझने लगती है। कविता का प्रतिरोध इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वह इस भाषिक और सांस्कृतिक संरचना को तोड़ती है।

“किसकी मार सहती हूँ” पंक्ति पर विचार करते समय फ़्रांसीसी समाजशास्त्री पियरे बुरदियू (Pierre Bourdieu) की ‘सांकेतिक हिंसा’ की अवधारणा भी उपयोगी प्रतीत होती है। बुरदियू का तर्क था कि अनेक प्रकार की हिंसा प्रत्यक्ष नहीं होती है। वे सांस्कृतिक मान्यताओं और सामाजिक आदतों के माध्यम से कार्य करती हैं। जब कोई व्यवस्था लोगों को यह विश्वास दिला देती है कि उनकी अधीनता स्वाभाविक है, तब वह सांकेतिक हिंसा का रूप ग्रहण कर लेती है। कविता में हिंसा केवल शारीरिक आघात नहीं है। वह उस सांस्कृतिक व्यवस्था का परिणाम है जो स्त्री से सहनशीलता और समर्पण की अपेक्षा करती है। इसीलिए मार सहती हूँ केवल घरेलू हिंसा का संकेत नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सांस्कृतिक संरचना का संकेत है।

 

कविता का निर्णायक मोड़ तब आता है जब वक्ता कहती है कि मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ। सांस्कृतिक आलोचना की दृष्टि से यह केवल व्यक्तिगत घोषणा नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक पुनर्परिभाषा का क्षण है। स्टुअर्ट हॉल ने सांस्कृतिक पहचान को स्थिर और अपरिवर्तनीय नहीं माना है। उन्होंने इसे निरंतर निर्मित होने वाली प्रक्रिया के रूप में देखा था। इस दृष्टि से “मैं अपनी औरत हूँ” एक नई पहचान की रचना है। स्त्री स्वयं को उन सांस्कृतिक परिभाषाओं से मुक्त कर रही है जिनके भीतर उसकी पहचान निर्मित की गई थी। वह अपनी पहचान का केंद्र स्वयं बन रही है।

यहाँ गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक का चिंतन भी स्मरणीय है। स्पिवाक ने बार-बार यह प्रश्न उठाया था कि क्या हाशिये पर स्थित व्यक्ति स्वयं बोल सकता है, या उसकी आवाज़ हमेशा किसी प्रभुत्वशाली संरचना द्वारा ही नियंत्रित होती है। कविता में वक्ता का उत्तर इसी अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि वह स्वयं बोलती है। उसकी आवाज़ किसी पुरुष, किसी संस्था या किसी सांस्कृतिक प्राधिकार के माध्यम से नहीं आती है। वह अपनी स्थिति का अर्थ स्वयं निर्धारित करती है। इस प्रकार कविता स्त्री को प्रतिनिधित्व की वस्तु से बोलने वाले विषय में रूपांतरित करती है।

 

वृद्ध स्त्री की प्रतिक्रिया—‘कैसे कटेगा इस औरत का जीवन’—सांस्कृतिक आलोचना के लिए एक विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण क्षण है। यह प्रतिक्रिया बताती है कि सांस्कृतिक मूल्य केवल बाहरी अनुशासन नहीं हैं, बल्कि वे भावनात्मक सुरक्षा का आधार भी बन जाते हैं। वृद्ध स्त्री स्वतंत्रता से भयभीत है। इसका कारण यह है कि उसकी पूरी सांस्कृतिक दुनिया इसी विश्वास पर टिकी रही है कि स्त्री का जीवन किसी पुरुष के संरक्षण में ही सुरक्षित है। यहाँ कविता सांस्कृतिक परिवर्तन की जटिलता को समझती है। वह यह नहीं मानती कि पुरानी पीढ़ी केवल अज्ञान का प्रतिनिधित्व करती है, बल्कि वह दिखाती है कि प्रत्येक पीढ़ी अपने ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अनुभवों की ही उपज होती है।

‘मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है/ मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा’—इन पंक्तियों के माध्यम से कविता सांस्कृतिक आलोचना को ऐतिहासिक संवेदनशीलता प्रदान करती है। यह अतीत और वर्तमान के बीच कोई कठोर विभाजन नहीं खींचती है। यहाँ वाल्टर बेंजामिन की इतिहास-दृष्टि स्मरणीय है। उनके अनुसार वर्तमान अतीत से संवाद करते हुए ही अपने अर्थ ग्रहण करता है। वक्ता यह स्वीकार करती है कि उसकी स्वतंत्रता उन स्त्रियों के अनुभवों की पृष्ठभूमि पर निर्मित हुई है जिन्होंने एक भिन्न सांस्कृतिक संसार में जीवन बिताया था।

कविता के अंतिम भाग में भविष्य की स्त्री की जो छवि उभरती है, वह सांस्कृतिक पुनर्कल्पना का संकेत देती है। “उन्मुक्त हूँ देखो” कहती हुई स्त्री स्वयं को आसमान, समुद्र, लहरों और हवा से जोड़ती है। यहाँ प्रकृति केवल सौंदर्य का बिंब नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक सीमाओं के अतिक्रमण का प्रतीक है। स्त्री की पहचान अब उन भूमिकाओं से निर्धारित नहीं होती है जो समाज ने उसके लिए तय की थीं। उसकी दुनिया अब विस्तृत हो चुकी है। उल्लेखनीय है कि सविता सिंह इस रचना में उसी प्रक्रिया का कला के स्तर पर पुनर्सृजन कर रही हैं जिसे सांस्कृतिक अध्ययन के कुछ विचारक वैकल्पिक सांस्कृतिक कल्पना की रचना के रूप में देखते हैं।

यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि “वैकल्पिक सांस्कृतिक कल्पना” की अवधारणा किसी एक विचारक द्वारा प्रतिपादित कोई निश्चित सैद्धान्तिक पद नहीं है। यह सांस्कृतिक अध्ययन, उत्तर-औपनिवेशिक चिंतन और आलोचनात्मक सिद्धांत की विभिन्न धाराओं से विकसित हुई एक व्यापक बौद्धिक समझ है। रेमंड विलियम्स का मानना था कि किसी भी समाज में प्रभुत्वशाली संस्कृति के भीतर ही ऐसी उभरती हुई सांस्कृतिक शक्तियाँ मौजूद रहती हैं जो वर्तमान मूल्यों और जीवन-रूपों को चुनौती देती हैं। साथ ही वे जीवन की नई संभावनाओं का संकेत भी देती हैं। स्टुअर्ट हॉल ने सांस्कृतिक पहचान को स्थिर न मानकर निरंतर पुनर्निर्मित होने वाली प्रक्रिया माना था। इसलिए उनके यहाँ नई सांस्कृतिक आत्म-परिभाषाएँ प्रभुत्वशाली अर्थ-व्यवस्थाओं के विरुद्ध प्रतिरोध का रूप ग्रहण करती हैं।

होमी के. भाभा ने सांस्कृतिक अर्थों के बीच उपस्थित ‘मध्यवर्ती सांस्कृतिक क्षेत्र’ (थर्ड स्पेस) की चर्चा करते हुए बताया था कि नई पहचानें और नए सांस्कृतिक अर्थ प्रायः स्थापित संरचनाओं के बीच की दरारों से जन्म लेते हैं। भाभा के अनुसार संस्कृतियों के बीच निर्मित यह अंतरवर्ती सांस्कृतिक स्थल वह क्षेत्र है जहाँ प्रभुत्वशाली पहचानें स्थिर नहीं रहतीं, बल्कि वे नए अर्थों और नई आत्म-परिभाषाओं को जन्म देती हैं। अमरीकी दार्शनिक बेल हुक्स ने हाशिये के अनुभवों को केवल पीड़ा का स्थल नहीं माना है। उन्होंने इसे प्रतिरोध और नई दृष्टि के स्रोत के रूप में देखा था। इन सभी चिंतकों में एक साझा विश्वास दिखाई देता है कि संस्कृति केवल प्रभुत्व का क्षेत्र नहीं है। वह नई संभावनाओं, नए आत्मबोध और वैकल्पिक जीवन-दृष्टियों के निर्माण का क्षेत्र भी है।

इसी परिप्रेक्ष्य में सविता सिंह की कविता के अंतिम अंश को पढ़ा जा सकता है। जब भविष्य की स्त्री स्वयं को “उन्मुक्त” घोषित करते हुए आसमान, समुद्र, लहरों और हवा के साथ अपना संबंध स्थापित करती है, तथा पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर पूर्णतया अपनी होने की घोषणा करती है, तब वह केवल वर्तमान सांस्कृतिक संरचनाओं का निषेध नहीं कर रही होती है। वह स्त्री-अस्तित्व की एक नई सांस्कृतिक कल्पना भी रच रही होती है। यह वही क्षण है जहाँ कविता प्रभुत्वशाली सांस्कृतिक प्रतिमानों की आलोचना से आगे बढ़कर एक वैकल्पिक सांस्कृतिक भविष्य की रचनात्मक कल्पना का रूप ग्रहण कर लेती है।

कविता की अंतिम पंक्तियाँ—मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर, पूर्णतया अपनी—सांस्कृतिक आलोचना की दृष्टि से उसके सबसे गहरे निष्कर्ष को व्यक्त करती हैं। यहाँ “शाप” उन दमनकारी परंपराओं, निषेधों और रूढ़ियों का प्रतीक हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही हैं। वहीं “अभिलाषाएँ” उन सांस्कृतिक अपेक्षाओं का संकेत हैं जिनके अनुरूप स्त्री को ढाला जाता रहा है। भविष्य की स्त्री इन दोनों से मुक्त होकर अपने अस्तित्व का अर्थ स्वयं निर्मित करती है। यह संस्कृति से पलायन नहीं है, बल्कि यह संस्कृति के भीतर एक नई आत्मचेतना का जन्म है।

इस प्रकार सांस्कृतिक आलोचना के परिप्रेक्ष्य में “मैं किसकी औरत हूँ” केवल स्त्री की स्वतंत्रता का उद्घोष नहीं है। यह भारतीय समाज की उन सांस्कृतिक संरचनाओं का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करती है जो स्त्री-अधीनता को धार्मिक पवित्रता, नैतिक आदर्श, पारिवारिक कर्तव्य और सांस्कृतिक सामान्यता का रूप प्रदान करती हैं। ग्राम्शी के सांस्कृतिक प्रभुत्व, फूको की सत्ता-चेतना, बुरदियू की सांकेतिक हिंसा, अल्थूसर की विचारधारात्मक संरचनाओं, स्टुअर्ट हॉल की पहचान-चेतना और स्पिवाक के प्रतिनिधित्व-विमर्श के आलोक में यह कविता एक ऐसे सांस्कृतिक प्रतिरोध के पाठ के रूप में उभरती है जो सिर्फ़ दमन की पहचान नहीं करता, बल्कि स्त्री के लिए एक वैकल्पिक सांस्कृतिक आत्मबोध की भी रचना करता है। यही उसकी वैचारिक गहराई और स्थायी प्रासंगिकता का आधार है।

अगर भाषा और विमर्श (डिस्कोर्स) सिद्धांत की दृष्टि से “मैं किसकी औरत हूँ” के मूल पाठ पर गौर किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कविता केवल स्त्री की सामाजिक स्थिति का वर्णन नहीं करती है। वह उन भाषिक संरचनाओं को भी प्रश्नांकित करती है जिनके माध्यम से स्त्री की पहचान निर्मित और नियंत्रित की जाती रही है। इस दृष्टि से कविता का केंद्रीय संघर्ष केवल सामाजिक या वैचारिक नहीं है, बल्कि भाषिक भी है। कविता यह दिखाती है कि भाषा कभी निष्पक्ष माध्यम नहीं होती है। वह अपने भीतर सत्ता-संबंधों, सांस्कृतिक मान्यताओं और सामाजिक मूल्यों को वहन करती है। मनुष्य संसार को केवल अनुभव नहीं करता, बल्कि भाषा के माध्यम से उसका अर्थ भी ग्रहण करता है। इसलिए जो भाषा किसी समाज में प्रचलित होती है, वह उस समाज की सत्ता-संरचनाओं को भी व्यक्त करती है।

मिशेल फूको ने विमर्श को केवल भाषा या कथन के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान और सत्ता की ऐसी संरचना के रूप में समझा था जो यह निर्धारित करती है कि किसी विषय के बारे में क्या कहा जा सकता है, कैसे कहा जा सकता है और किसे बोलने का अधिकार प्राप्त है। फूको के अनुसार सत्ता केवल दमन नहीं करती, बल्कि वह ज्ञान और सत्य का निर्माण भी करती है। इसी अर्थ में कविता का आरम्भिक संवाद एक विमर्शात्मक संरचना का उद्घाटन करता है। वृद्ध स्त्री के प्रश्न केवल व्यक्तिगत जिज्ञासा नहीं हैं। वे उस सामाजिक विमर्श के प्रतिनिधि हैं जिसके भीतर स्त्री को समझा और परिभाषित किया जाता रहा है।

कविता की पहली पंक्ति—मैं किसकी औरत हूँ—इस संदर्भ में ख़ास महत्त्व रखती है। यहाँ प्रश्न “मैं कौन हूँ” नहीं है, बल्कि “मैं किसकी हूँ” है। यह अंतर केवल व्याकरणिक नहीं है, बल्कि यह एक पूरे विमर्श की ओर संकेत करता है। “कौन” व्यक्ति की पहचान से जुड़ा प्रश्न है, जबकि “किसकी” स्वामित्व से जुड़ा हुआ है। इस प्रकार भाषा का एक साधारण-सा शब्द स्त्री की स्थिति को परिभाषित करने लगता है। स्त्री यहाँ स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, बल्कि वह किसी की “औरत” है। इस एक शब्द के भीतर वह पूरी सांस्कृतिक और सामाजिक व्यवस्था समाहित है जिसमें स्त्री की पहचान उसके अपने व्यक्तित्व से नहीं, बल्कि किसी पुरुष के साथ उसके संबंध से निर्मित होती है।

विमर्श-सिद्धांत का एक विशेष आग्रह यह है कि शब्द केवल वस्तुओं का नामकरण नहीं करते हैं, बल्कि वे सामाजिक यथार्थ का निर्माण भी करते हैं। इस दृष्टि से देखें तो “औरत” शब्द कविता में एक स्थिर अर्थ लेकर उपस्थित नहीं होता है। आरम्भ में यह शब्द स्वामित्व, आश्रय और अधीनता के अर्थों से घिरा हुआ है। वृद्ध स्त्री जब पूछती है कि मैं किसकी औरत हूँ, तो उसके लिए औरत होने का अर्थ किसी पुरुष से संबद्ध होना है। यहाँ शब्द का अर्थ सामाजिक विमर्श द्वारा पहले से ही निर्धारित है।

कविता के अगले प्रश्न—कौन है मेरा परमेश्वर, किसके पाँव दबाती हूँ, किसका दिया खाती हूँ, किसकी मार सहती हूँ—एक विशेष भाषिक संरचना निर्मित करते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन सभी प्रश्नों में “किसके” और “किसका” की पुनरावृत्ति होती है। यह पुनरावृत्ति आकस्मिक नहीं है। यह उस भाषिक संसार को प्रकट करती है जिसमें स्त्री का जीवन लगातार किसी दूसरे व्यक्ति के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है। यहाँ भाषा स्वयं संबंधों की ऐसी संरचना निर्मित कर रही है जिसमें स्त्री केंद्र में नहीं, बल्कि परिधि में स्थित है। उसका अस्तित्व हमेशा किसी अन्य सत्ता की ओर संकेत करता है।

फूको के अतिरिक्त ‘आलोचनात्मक विमर्श-विश्लेषण’ (क्रिटिकल डिस्कोर्स एनालिसिस) के लिए दुनिया भर में मशहूर नॉर्मन फ़ेयरक्लफ़ (Norman Fairclough) जैसे आलोचकों का मूल तर्क यह है कि भाषा केवल संप्रेषण का तटस्थ माध्यम नहीं होती है। वह सामाजिक सत्ता-संबंधों, वैचारिक संरचनाओं और असमानताओं के निर्माण तथा पुनरुत्पादन में सक्रिय भूमिका निभाती है। उन्होंने अपनी चर्चित कृतियों ‘लैंग्वेज एंड पॉवर’ तथा ‘डिस्कोर्स एंड सोशल चेंज’ में दिखाया था कि किसी समाज में प्रचलित भाषिक व्यवहार, शब्दावली, अभिव्यक्ति-पद्धतियाँ और विमर्श सामाजिक यथार्थ को केवल प्रतिबिंबित नहीं करते, बल्कि उसे निर्मित भी करते हैं।

उनके अनुसार किसी पाठ का अध्ययन केवल उसके भाषिक रूप तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे उन सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक संदर्भों में भी समझना चाहिए जिनमें वह उत्पन्न होता है। इस प्रकार फ़ेयरक्लफ़ ने भाषा, विचारधारा और सत्ता के संबंधों को समझने के लिए एक प्रभावशाली विश्लेषण-पद्धति विकसित की। इसका व्यापक उपयोग साहित्यिक आलोचना, मीडिया अध्ययन, सांस्कृतिक अध्ययन, शिक्षा और समाजशास्त्र में किया जाता है।

“मैं किसकी औरत हूँ” जैसी कविता के संदर्भ में फ़ेयरक्लफ़ का चिंतन इसलिए उपयोगी है क्योंकि यह कविता दिखाती है कि “किसकी”, “परमेश्वर”, “मार सहती हूँ” और “अपनी” जैसे शब्द केवल अर्थ नहीं व्यक्त करते हैं। वे स्त्री की सामाजिक स्थिति से जुड़े सत्ता-संबंधों और वैचारिक संरचनाओं को भी निर्मित तथा चुनौती देते हैं। यह सिद्धांत बताता है कि भाषा सामाजिक संबंधों को केवल प्रतिबिंबित नहीं करती, बल्कि उन्हें पुनरुत्पादित भी करती है। कविता में उपस्थित प्रश्न इसी प्रकार के पुनरुत्पादन का उदाहरण हैं। वे ऐसे प्रश्न हैं जिन्हें समाज ने इतना स्वाभाविक बना दिया है कि वे प्रश्न कम और सामान्य ज्ञान अधिक प्रतीत होते हैं। वृद्ध स्त्री उन्हें किसी आलोचनात्मक भाव से नहीं पूछती है। वह यह मानकर चलती है कि किसी स्त्री के जीवन के बारे में जानने का यही स्वाभाविक तरीका है।

कविता का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह इस भाषिक संरचना का प्रतिरोध भी भाषा के भीतर रहकर ही करती है। कवयित्री कोई नई शब्दावली नहीं गढ़ती हैं। वे उन्हीं शब्दों को उठाती हैं जो प्रभुत्वशाली विमर्श का हिस्सा हैं, लेकिन वे उनके अर्थ बदल देती हैं। यही कविता का सबसे सशक्त भाषिक हस्तक्षेप है। “मैं किसी की औरत नहीं हूँ / मैं अपनी औरत हूँ”—यहाँ औरत शब्द वही है, लेकिन उसका अर्थ पूरी तरह बदल जाता है। पहले औरत का अर्थ किसी के स्वामित्व में स्थित व्यक्ति था, पर अब उसका अर्थ अपने अस्तित्व की स्वामिनी व्यक्ति है। भाषा का वही शब्द अब प्रतिरोध का माध्यम बन जाता है। यह अर्थ-परिवर्तन आकस्मिक नहीं है, बल्कि यह विमर्श के स्तर पर किया गया हस्तक्षेप है। कवयित्री प्रभुत्वशाली अर्थ को अस्वीकार करके उसी शब्द के भीतर एक नया अर्थ स्थापित करती हैं।

देरिदा के विखंडनवादी चिंतन को ध्यान में रखें तो कहा जा सकता है कि कविता शब्दों के स्थिर अर्थों को अस्थिर करती है। औरत का अर्थ कोई स्थायी और अंतिम अर्थ नहीं रह जाता है। कविता दिखाती है कि भाषा में अर्थ हमेशा संघर्ष का क्षेत्र होते हैं। प्रभुत्वशाली विमर्श किसी शब्द को एक निश्चित अर्थ देता है, लेकिन वही शब्द किसी वैकल्पिक चेतना में नया अर्थ ग्रहण कर सकता है। औरत शब्द का रूपांतरण इसी प्रक्रिया का उदाहरण है।

“मेरा परमेश्वर कोई नहीं”—यह पंक्ति भी इसी भाषिक पुनर्निर्माण का हिस्सा है। परमेश्वर शब्द सामान्यतः श्रद्धा, अधिकार और सर्वोच्च सत्ता के अर्थों से जुड़ा हुआ है। लेकिन कविता इस शब्द को उसके पारंपरिक सांस्कृतिक संदर्भ से पूरी तरह अलग कर देती है। वह उस भाषिक संरचना को तोड़ती है जिसके भीतर पति और परमेश्वर को एक-दूसरे से जोड़ा गया था। इस प्रकार कविता केवल विचारों का प्रतिरोध नहीं करती है, बल्कि वह उन शब्दों के अर्थ-क्षेत्रों को भी बदल देती है जिनके माध्यम से विचार निर्मित होते हैं।

वृद्ध स्त्री की “असहज ख़ामोशी” भी भाषा और विमर्श के स्तर पर बेहद अर्थपूर्ण है। यह वह क्षण है जहाँ प्रभुत्वशाली विमर्श पहली बार बाधित होता है। उसके पास उन शब्दों और अवधारणाओं को समझने की भाषा नहीं है जिनके माध्यम से कवयित्री अपने अस्तित्व को परिभाषित कर रही है। उसकी चुप्पी केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि वह दो भिन्न विमर्शों के टकराव का परिणाम है। एक ओर वह भाषा है जिसमें स्त्री की पहचान संबंधों और स्वामित्व के माध्यम से निर्मित होती है, तो दूसरी ओर वह भाषा है जिसमें स्त्री स्वयं अपनी पहचान का स्रोत है।

कविता का एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इसमें प्रश्न और उत्तर की संरचना मौजूद है। पूरी कविता एक प्रकार के संवाद के रूप में विकसित होती है। लेकिन यह संवाद केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं है, बल्कि यह दो भाषिक संसारों के बीच का संवाद है। वृद्ध स्त्री के प्रश्न एक पुराने सामाजिक विमर्श का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि कवयित्री के उत्तर एक नए विमर्श की रचना करते हैं। इस प्रकार कविता स्वयं एक विमर्शात्मक संघर्ष का मंच बन जाती है।

“कोई किसी का नहीं होता / सब अपने होते हैं”—यह कथन भाषा के स्तर पर भी एक गहरा हस्तक्षेप है। यहाँ “अपना” शब्द नए अर्थ में प्रयुक्त होता है। सामान्यतः अपना का प्रयोग स्वामित्व के अर्थ में किया जाता है, लेकिन कविता उसे आत्म-अधिकारिता और स्वतंत्र अस्तित्व के अर्थ में रूपांतरित कर देती है। इस प्रकार कविता लगातार शब्दों के अर्थ-संसार को पुनर्गठित करती चलती है।

अंतिम अंश में भविष्य की स्त्री की आवाज़ भाषा के एक और रूपांतरण की ओर संकेत करती है। अब उसकी पहचान किसी सामाजिक संबोधन से निर्मित नहीं होती है। वह स्वयं को आसमान, समुद्र, लहरों और हवा से जोड़ती है। यहाँ भाषा का संसार भी विस्तृत हो जाता है। आरम्भ में भाषा संबंधों, स्वामित्व और अधीनता के इर्द-गिर्द घूम रही थी, पर अंत में वही भाषा स्वतंत्रता, विस्तार और आत्म-अनुभूति की भाषा में बदल जाती है। यह परिवर्तन केवल विषय-वस्तु का परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह पूरे विमर्श का परिवर्तन है।

“मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर / पूर्णतया अपनी”—इन अंतिम पंक्तियों में भाषा एक नए आत्मबोध की वाहक बन जाती है। “पूर्णतया अपनी” होना केवल एक साधारण कथन नहीं है, बल्कि यह एक वैकल्पिक भाषिक और वैचारिक स्थिति की स्थापना है। यहाँ स्त्री स्वयं को उन शब्दों, प्रतीकों और अर्थों से पूरी तरह मुक्त कर चुकी है जिनके भीतर उसका अस्तित्व पहले परिभाषित किया जाता था।

इस प्रकार भाषा और विमर्श-सिद्धांत की दृष्टि से “मैं किसकी औरत हूँ” एक ऐसी कविता है जो केवल स्त्री की स्वतंत्रता की बात नहीं करती है। वह यह भी दिखाती है कि स्वतंत्रता की लड़ाई भाषा के भीतर भी लड़ी जाती है। कविता यह उद्घाटित करती है कि शब्द कभी निष्क्रिय नहीं होते हैं। वे सत्ता के वाहक भी हो सकते हैं और प्रतिरोध का माध्यम भी बन सकते हैं। वृद्ध स्त्री के प्रश्नों में जो भाषा बोलती है, वह पितृसत्तात्मक विमर्श की भाषा है। कवयित्री के उत्तर उसी भाषा के भीतर एक वैकल्पिक अर्थ-व्यवस्था का निर्माण करते हैं। परिणामस्वरूप कविता भाषा के भीतर चल रहे उस गहरे सत्ता-संघर्ष को दृश्यमान बना देती है जिसमें अर्थ, पहचान और अस्तित्व लगातार पुनर्परिभाषित होते रहते हैं।

“मैं किसकी औरत हूँ” कविता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष उसमें अंतर्निहित इतिहास-बोध भी है। सामान्यतः इस कविता की चर्चा स्त्री-अस्मिता, स्वायत्तता और पितृसत्तात्मक संरचनाओं के प्रतिरोध के संदर्भ में अधिक होती है। किंतु इसे ध्यान से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि यह केवल वर्तमान की स्वतंत्र स्त्री की घोषणा भर नहीं है। इसके भीतर इतिहास की एक गहरी चेतना सक्रिय है। यह इतिहास किसी राजनैतिक घटना-क्रम, शासकों या सामाजिक संस्थाओं का इतिहास नहीं है, बल्कि यह स्त्रियों के अनुभवों, उनकी पीड़ाओं, उनके मौन संघर्षों और उनकी चेतना के क्रमिक विकास का इतिहास है। कविता का वर्तमान अपने अतीत से कटा हुआ नहीं है, बल्कि वह उसी से निर्मित हुआ है। इसी कारण यह कविता स्त्री-मुक्ति को किसी आकस्मिक उपलब्धि के रूप में नहीं देखती, बल्कि इसे एक दीर्घ ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में समझती है।

कविता का पूरा दृश्य एक रेलयात्रा के भीतर घटित होता है। यात्रा का यह रूपक अपने आप में इतिहास-बोध का संकेतक है। यात्रा का अर्थ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचना नहीं होता है, बल्कि वह समय के भीतर गति का भी बोध कराता है। रेलगाड़ी में आमने-सामने बैठी दो स्त्रियाँ वस्तुतः दो ऐतिहासिक कालखंडों की प्रतिनिधि बन जाती हैं। वृद्ध स्त्री उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है जिसने अपना जीवन उन सांस्कृतिक और सामाजिक संरचनाओं के भीतर बिताया जिनमें स्त्री की पहचान पति, परिवार और सेवा-धर्म के माध्यम से निर्धारित होती थी। दूसरी ओर कविता की वक्ता उस चेतना की प्रतिनिधि है जिसने स्त्री को एक स्वतंत्र और स्वायत्त व्यक्ति के रूप में सोचना आरम्भ किया है। इस प्रकार कविता का दृश्य वर्तमान और अतीत के बीच एक जीवंत संवाद का रूप ग्रहण कर लेता है।

वृद्ध स्त्री का चित्रण केवल उसके शारीरिक क्षरण का चित्रण नहीं है। आँखें धँस गई थीं उसकी, मांस शरीर से झूल रहा था, चेहरे पर थे दुख के पठार, थीं अनेक फटकारों की खाइयाँ—इन पंक्तियों में उसका शरीर इतिहास का अभिलेख बन जाता है। उसके चेहरे पर अंकित रेखाएँ केवल उम्र की रेखाएँ नहीं हैं, बल्कि वे एक विशेष सामाजिक व्यवस्था के भीतर जिए गए स्त्री-अनुभवों की रेखाएँ हैं। इतिहास यहाँ दस्तावेज़ों या सरकारी अभिलेखों में नहीं, बल्कि स्त्री के शरीर और उसकी स्मृति में दर्ज है। इस दृष्टि से कविता इतिहास को मानवीय अनुभवों के स्तर पर पुनर्परिभाषित करती है।

इतिहास-बोध का सबसे स्पष्ट और गहरा रूप उस समय सामने आता है जब वक्ता वृद्ध स्त्री से कहती है कि मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है, मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा। ये पंक्तियाँ कविता की वैचारिक संरचना में केंद्रीय स्थान रखती हैं। यहाँ वर्तमान स्त्री अपने और अतीत की स्त्री के बीच कोई कठोर विभाजन नहीं खींचती है। वह यह नहीं कहती कि उसका जीवन पूरी तरह भिन्न है या वह अतीत से पूरी तरह मुक्त हो चुकी है। इसके विपरीत वह अपने जीवन को उसी ऐतिहासिक यात्रा की अगली कड़ी के रूप में देखती है। यह कथन इतिहास को निरंतरता के रूप में देखने का संकेत देता है। वर्तमान की स्वतंत्रता अतीत से संघर्ष करके ही प्राप्त हुई है। वह अतीत का पूर्ण निषेध नहीं, बल्कि उसका रूपांतरण है।

इस संदर्भ में कविता का इतिहास-बोध उन दृष्टियों से भिन्न है जो इतिहास को केवल प्रगति की एक रैखिक कथा के रूप में देखती हैं। कविता यह नहीं कहती कि अतीत पूरी तरह अंधकारमय था और वर्तमान पूर्णतः मुक्त है। यदि ऐसा होता तो वक्ता वृद्ध स्त्री से अपने संबंध को पूरी तरह अस्वीकार कर देती, लेकिन वह ऐसा नहीं करती है। वह वृद्ध स्त्री की दुनिया की सीमाओं को पहचानते हुए भी उसे अपनी यात्रा का हिस्सा मानती है। इससे स्पष्ट होता है कि सविता सिंह के यहाँ इतिहास अंध-विरोध का नहीं, बल्कि एक जटिल उत्तराधिकार का विषय है।

कविता में इतिहास का एक और महत्त्वपूर्ण आयाम स्त्री-अनुभव की सामूहिकता से भी जुड़ा हुआ है। “मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है” का अर्थ यह नहीं है कि दोनों स्त्रियों के व्यक्तिगत जीवन बिल्कुल एक जैसे हैं, बल्कि इसका अर्थ यह है कि दोनों एक साझा ऐतिहासिक प्रक्रिया की भागीदार हैं। यहाँ व्यक्तिगत जीवन सामूहिक इतिहास से जुड़ जाता है। स्त्री का अनुभव केवल एक निजी अनुभव नहीं रह जाता, बल्कि वह एक व्यापक ऐतिहासिक अनुभव का हिस्सा बन जाता है। इस प्रकार कविता स्त्री के व्यक्तिगत जीवन को इतिहास के व्यापक दायरे में ले आती है।

 

इतिहास-बोध का यह स्वरूप स्त्रीवादी इतिहास-लेखन की उन प्रवृत्तियों से भी जुड़ता है जिन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि इतिहास केवल राजनैतिक और सार्वजनिक घटनाओं का ही नहीं होता है। घरेलू जीवन, श्रम, मौन, पीड़ा और प्रतिरोध भी इतिहास के अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटक हैं। कविता में वृद्ध स्त्री का चेहरा, उसकी भाषा और उसकी चिंता स्त्री-इतिहास के इन्हीं अदृश्य पक्षों को दृश्यमान बनाते हैं।

कविता में इतिहास-बोध केवल अतीत और वर्तमान के संबंध तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वह भविष्य की ओर भी उन्मुख है। यात्रा लेकिन यहीं समाप्त नहीं हुई है—यह पंक्ति विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। यदि कविता केवल वर्तमान की उपलब्धि का उत्सव मनाना चाहती, तो वह यहीं समाप्त हो सकती थी। लेकिन कवयित्री ऐसा नहीं करती हैं। वे स्वीकार करती हैं कि अभी फटकारों की कई और खाइयाँ, दुख के समुद्र और यातनाओं के पठार शेष हैं। इससे स्पष्ट होता है कि इतिहास को यहाँ एक अधूरी प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। वर्तमान कोई अंतिम उपलब्धि नहीं है, बल्कि वह आगे की संभावनाओं और संघर्षों का आधार है।

इतिहास-बोध की दृष्टि से कविता का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इसमें तीन कालखंड एक साथ उपस्थित हैं। पहला अतीत है, जिसका प्रतिनिधित्व वृद्ध स्त्री करती है। दूसरा वर्तमान है, जिसका प्रतिनिधित्व वक्ता करती है। तीसरा भविष्य है, जिसकी कल्पना कविता के अंतिम भाग में की गई है। इस प्रकार कविता केवल स्मृति की ओर नहीं देखती, बल्कि वह भविष्य की रचना भी करती है। इतिहास यहाँ केवल अतीत का अध्ययन भर नहीं है, बल्कि वह भविष्य की संभावनाओं की कल्पना भी है।

जब कवयित्री कहती हैं कि एक दिन ऐसी स्त्री आएगी जिसे देखकर तुम और भी विस्मित होओगी, तब वे इतिहास को एक गतिशील प्रक्रिया के रूप में देख रही होती हैं। वर्तमान की स्वतंत्र स्त्री स्वयं भविष्य की दृष्टि से सीमित सिद्ध हो सकती है। यह विचार कविता को आत्ममुग्धता से बचाता है। वह किसी ऐतिहासिक क्षण को अंतिम सत्य नहीं मानती है। प्रत्येक पीढ़ी अपने पूर्ववर्तियों से कुछ प्राप्त करती है और अगली पीढ़ियों के लिए नई संभावनाएँ निर्मित करती है।

कविता के अंतिम अंश में भविष्य की स्त्री का कथन—मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर, पूर्णतया अपनी—इतिहास-बोध के संदर्भ में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। यहाँ “पूर्वजों के शाप” केवल दमनकारी परंपराओं का संकेत नहीं हैं, बल्कि वे इतिहास के उस बोझ का भी संकेत हैं जिसे प्रत्येक पीढ़ी अपने साथ लेकर चलती है। इसी प्रकार “अभिलाषाएँ” उन अपेक्षाओं और आकांक्षाओं का प्रतीक हैं जो एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी पर आरोपित करती है। भविष्य की स्त्री इन दोनों से दूरी बनाती है। इसका अर्थ इतिहास का निषेध करना नहीं है, बल्कि इतिहास के साथ एक आलोचनात्मक संबंध स्थापित करना है। वह इतिहास की उत्तराधिकारी तो है, लेकिन उसकी बंदी नहीं है।

सविता सिंह के इतिहास-बोध की एक उल्लेखनीय विशेषता यह भी है कि उसमें न तो अतीत का कोई रोमानीकरण है और न ही उसका पूर्ण निषेध किया गया है। वृद्ध स्त्री के प्रति कविता में करुणा, सम्मान और आत्मीयता का भाव है, लेकिन उसके संसार को आदर्श नहीं बनाया गया है। इसी प्रकार वर्तमान की चेतना को महत्त्व दिया गया है, लेकिन उसे अंतिम उपलब्धि भी नहीं माना गया है। यह संतुलन कविता को इतिहास के प्रति एक आलोचनात्मक और संवेदनशील दृष्टि प्रदान करता है।

अगर समग्र रूप से देखें तो “मैं किसकी औरत हूँ” में इतिहास कोई बाहरी पृष्ठभूमि मात्र नहीं है, बल्कि वह कविता की संरचना के भीतर एक सक्रिय तत्त्व है। वृद्ध स्त्री, वर्तमान वक्ता और भविष्य की स्त्री मिलकर इतिहास की एक त्रिस्तरीय संरचना निर्मित करती हैं। अतीत के अनुभव, वर्तमान की चेतना और भविष्य की संभावना—ये तीनों परस्पर गहरे जुड़े हुए हैं। कविता यह दिखाती है कि स्त्री-मुक्ति कोई एक अकेली घटना नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों में फैली हुई एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है। वर्तमान की स्वतंत्र स्त्री अपने पूर्ववर्तियों के संघर्षों की उत्तराधिकारी है और वह भविष्य की स्त्री के लिए एक नई राह भी तैयार कर रही है। इसी कारण सविता सिंह का इतिहास-बोध स्मृति, आलोचना, उत्तराधिकार और संभावना—इन सभी को एक साथ समेटे हुए दिखाई देता है। यह इतिहास को केवल बीते हुए समय के रूप में नहीं, बल्कि जीवित मानवीय अनुभव और सतत परिवर्तनशील चेतना के रूप में देखने की दृष्टि है।

यूटोपियाई अथवा भविष्य-दृष्टि के परिप्रेक्ष्य से “मैं किसकी औरत हूँ” को पढ़ना केवल उसके अंतिम अंश की व्याख्या करना नहीं है, बल्कि उसकी समूची वैचारिक संरचना को समझना है। यह कविता वर्तमान सामाजिक यथार्थ के विश्लेषण के साथ-साथ भविष्य की एक वैकल्पिक संभावना का भी सृजन करती है। इस दृष्टि से यह कविता केवल प्रतिरोध का पाठ नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे भविष्य की कल्पना भी करती है जो अभी पूर्णतः अस्तित्व में नहीं आया है, लेकिन जिसकी संभावना वर्तमान के भीतर सक्रिय है। यूटोपियाई चिंतन का मूल प्रश्न भी यही है कि क्या मनुष्य वर्तमान की सीमाओं के भीतर कैद है, या वह उन सीमाओं से परे किसी अन्य जीवन-संभावना की कल्पना कर सकता है? सविता सिंह की कविता इसी प्रश्न के भीतर अपना वास्तविक अर्थ प्राप्त करती है।

यूटोपिया की आधुनिक अवधारणा को समझने के लिए बीसवीं शताब्दी के जर्मन मार्क्सवादी दार्शनिक अर्न्स्ट ब्लोख (Ernst Bloch) का स्मरण आवश्यक है। अपनी प्रसिद्ध कृति ‘द प्रिंसिपल ऑफ होप’ में ब्लोख ने मनुष्य को मूलतः एक आशावान और भविष्योन्मुख प्राणी के रूप में देखा है । उनके अनुसार मनुष्य केवल जो है उसी में नहीं जीता है, बल्कि जो अभी नहीं है, उसकी संभावना में भी जीता है। उन्होंने इसे “नॉट-येट-कॉन्शस” अर्थात् “अभी-अपूर्ण चेतना” कहा था। यह वह चेतना है जो वर्तमान के भीतर भविष्य की संभावनाओं को पहचानती है। सविता सिंह की कविता का अंतिम भाग इसी अर्थ में पढ़ा जा सकता है। भविष्य की स्त्री कोई काल्पनिक चरित्र नहीं है, बल्कि वह वर्तमान स्त्री-चेतना के भीतर छिपी हुई संभावनाओं का ही विस्तार है।

विवेच्य कविता की आरम्भिक संरचना एक ऐसे संसार का चित्र प्रस्तुत करती है जिसमें स्त्री की पहचान संबंधों और स्वामित्व के माध्यम से निर्धारित होती है। ‘मैं किसकी औरत हूँ,/कौन है मेरा परमेश्वर/किसकी मार सहती हूँ’—ये प्रश्न केवल सामाजिक यथार्थ का विवरण नहीं हैं। वे उस ऐतिहासिक संरचना को सामने लाते हैं जिसके भीतर स्त्री का अस्तित्व परिभाषित किया गया है। लेकिन यूटोपियाई साहित्य की एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि वह यथार्थ का चित्रण करते हुए भी केवल उसी तक सीमित नहीं रहता है। फ़्रेडरिक जेम्सन ने अपनी पुस्तक ‘आर्कियोलॉजीज़ ऑफ द फ्यूचर’ में लिखा है कि यूटोपिया का कार्य भविष्य का कोई रेडीमेड खाका तैयार करना नहीं है, बल्कि वर्तमान की सीमाओं को दृश्यमान बनाना है। जब हम किसी वैकल्पिक संसार की कल्पना करते हैं, तब वास्तव में हम अपने वर्तमान की ऐतिहासिक सीमाओं को पहचान रहे होते हैं। सविता सिंह की कविता भी यही करती है। वह पहले वर्तमान की संरचना को उद्घाटित करती है और फिर उससे परे एक अन्य संभावना की ओर संकेत करती है।

“मैं किसी की औरत नहीं हूँ / मैं अपनी औरत हूँ”—यह पंक्ति यूटोपियाई चेतना का प्रारम्भिक बिंदु है। यहाँ भविष्य अभी पूर्णतः उपस्थित नहीं हुआ है, लेकिन उसका संकेत अवश्य प्रकट हो गया है। ब्लोख की भाषा में कहें तो यह “अभी नहीं” की चेतना का उद्घाटन है। स्त्री अपने वर्तमान को अस्वीकार कर रही है, लेकिन उसके पास केवल नकार नहीं है, बल्कि उसके पास एक वैकल्पिक आत्मबोध भी है। यही यूटोपियाई चेतना की पहली शर्त होती है।

फिर भी कविता यहाँ नहीं रुकती है। “यात्रा लेकिन यहीं समाप्त नहीं हुई है”—यह पंक्ति विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह वर्तमान उपलब्धि को अंतिम उपलब्धि मानने से साफ़ इंकार करती है। यूटोपियाई चिंतन का एक केंद्रीय तत्त्व यह है कि इतिहास को कभी पूर्ण नहीं माना जा सकता है। हर उपलब्धि के भीतर नई संभावनाएँ और नई सीमाएँ मौजूद रहती हैं। इस अर्थ में कविता किसी आसान विजय-घोषणा के बजाय एक सतत ऐतिहासिक प्रक्रिया का बोध कराती है।

यहीं से कविता भविष्य की ओर बढ़ती है। वह एक ऐसी स्त्री की कल्पना करती है जो अभी नहीं आई है, लेकिन वह अवश्य आएगी। इस कल्पना को समझने के लिए वाल्टर बेंजामिन का इतिहास-संबंधी चिंतन भी उपयोगी है। बेंजामिन के अनुसार इतिहास केवल अतीत की सूखी स्मृति नहीं है, बल्कि उसमें भविष्य की मुक्ति-संभावनाएँ भी निहित रहती हैं। वर्तमान का मुख्य कार्य उन संभावनाओं को पहचानना है। सविता सिंह की कविता भी अतीत और वर्तमान के बीच खड़ी होकर भविष्य की स्त्री की कल्पना करती है। यह कल्पना इतिहास से बाहर नहीं, बल्कि इतिहास की निरंतरता के भीतर ही जन्म लेती है।

भविष्य की स्त्री का कथन—‘उन्मुक्त हूँ देखो’—यूटोपियाई कल्पना का केंद्रीय क्षण है। यहाँ “उन्मुक्ति” केवल कानूनी या सामाजिक अधिकारों की प्राप्ति नहीं है। यह चेतना की ऐसी अवस्था है जहाँ व्यक्ति स्वयं को आरोपित पहचानों से पूरी तरह मुक्त कर चुका है। इस संदर्भ में हर्बर्ट मार्क्यूज़ का चिंतन स्मरणीय है। अपनी पुस्तक ‘वन-डायमेंशनल मैन’ तथा अन्य लेखनों में मार्क्यूज़ ने इस बात पर बल दिया था कि मुक्ति केवल संस्थागत परिवर्तन का प्रश्न नहीं है। वह संवेदनशीलता, कल्पना और मानवीय इच्छाओं के रूपांतरण का भी प्रश्न है। भविष्य की स्त्री जब स्वयं को आसमान, समुद्र, लहरों और हवा से जोड़ती है, तब उसकी स्वतंत्रता केवल सामाजिक नहीं रह जाती है। वह संवेदनात्मक और अस्तित्वगत विस्तार का रूप ले लेती है।

“और यह आसमान / समुद्र यह और उसकी लहरें / हवा यह / और इसमें बसी प्रकृति की गंध सब मेरी हैं”—इन पंक्तियों में यूटोपियाई कल्पना का एक विशिष्ट रूप उपस्थित है। यहाँ “मेरी” शब्द का अर्थ किसी प्रकार का स्वामित्व नहीं है। यह आधुनिक पूँजीवादी अर्थ में अधिकार का दावा भी नहीं है। इसके विपरीत यह उस अस्तित्वगत सहभागिता का संकेत है, जिसमें मनुष्य स्वयं को विश्व से पृथक नहीं, बल्कि उससे जुड़ा हुआ अनुभव करता है। अर्न्स्ट ब्लोख ने यूटोपिया को मनुष्य और संसार के बीच अधिक मानवीय संबंध की आकांक्षा के रूप में देखा था। कविता की ये पंक्तियाँ उसी आकांक्षा की काव्यात्मक अभिव्यक्ति प्रतीत होती हैं।

यूटोपियाई चिंतन के संदर्भ में समकालीन ब्रिटिश समाजशास्त्री और यूटोपिया-अध्ययन की प्रमुख सिद्धांतकार रूथ लेविटास (Ruth Levitas) का उल्लेख भी प्रासंगिक है। अपनी पुस्तक ‘यूटोपिया ऐज़ मेथड’ में उन्होंने तर्क दिया था कि यूटोपिया को किसी तैयार आदर्शलोक के रूप में नहीं, बल्कि एक आलोचनात्मक पद्धति के रूप में समझना चाहिए। यूटोपिया हमें यह पूछने के लिए प्रेरित करता है कि समाज और जीवन की वर्तमान व्यवस्था के अतिरिक्त और क्या संभव है। सविता सिंह की यह रचना इसी अर्थ में यूटोपियाई है। वह भविष्य की स्त्री का कोई विस्तृत सामाजिक मॉडल प्रस्तुत नहीं करती हैं। वह केवल इतना करती हैं कि वर्तमान के सीमित स्त्री-अस्तित्व के बरक्स एक नई संभावना से लैस कल्पना के द्वार खोल देती है।

कविता की अंतिम पंक्तियाँ—“मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर / पूर्णतया अपनी”—इस भविष्य-दृष्टि का सबसे सघन रूप हैं। यहाँ “शाप” और “अभिलाषाएँ” दोनों समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। “शाप” उन दमनकारी संरचनाओं का संकेत हैं जिन्होंने स्त्री को नियंत्रित किया था। वहीं “अभिलाषाएँ” उन आदर्शीकृत अपेक्षाओं का संकेत हैं जिनके भीतर स्त्री को बाँधा गया था। भविष्य की स्त्री इन दोनों से मुक्त है। इस मुक्ति का अर्थ इतिहास को भूल जाना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ इतिहास की आलोचनात्मक पुनर्व्याख्या करना है।

इस बिंदु पर फ्रांसीसी दार्शनिक पॉल रिकोर (Paul Ricoeur) की “सामाजिक कल्पना” संबंधी अवधारणा भी उपयोगी हो सकती है। रिकोर का मानना था कि यूटोपिया समाज को अपने बारे में नए ढंग से सोचने की क्षमता प्रदान करता है। वह वर्तमान व्यवस्था को स्वाभाविक और अपरिवर्तनीय मानने से साफ़ इंकार करता है। सविता सिंह की कविता भी यही करती है। वह स्त्री-अधीनता को किसी शाश्वत सत्य की तरह स्वीकार नहीं करती, बल्कि यह दिखाती है कि एक दूसरी दुनिया की कल्पना पूरी तरह संभव है।

इस प्रकार “मैं किसकी औरत हूँ” का यूटोपियाई पक्ष केवल भविष्य का कोई सुंदर स्वप्न नहीं है। यह वर्तमान की आलोचना, इतिहास की पुनर्व्याख्या और नई सामाजिक संभावनाओं की रचना—इन तीनों का संयुक्त रूप है। ब्लोख की आशा-चेतना, जेम्सन की भविष्य-पुरातत्त्व दृष्टि, बेंजामिन की मुक्ति-संभावना, मार्क्यूज़ की मुक्त संवेदनशीलता, लेविटास की यूटोपिया-पद्धति और रिकोर की सामाजिक कल्पना—इन सबके आलोक में यह कविता एक ऐसी रचना के रूप में दिखाई देती है जो केवल यह नहीं पूछती कि स्त्री आज कहाँ खड़ी है, बल्कि यह भी पूछती है कि वह भविष्य में क्या हो सकती है। यही प्रश्न कविता को प्रतिरोध के साधारण पाठ से आगे ले जाकर एक गहन यूटोपियाई काव्य-दृष्टि में रूपांतरित कर देता है।

 

“मैं किसकी औरत हूँ” कविता का मनोवैज्ञानिक अध्ययन हमें यह समझने का अवसर देता है कि स्त्री-अधीनता केवल बाहरी सामाजिक संरचनाओं का परिणाम नहीं होती है। वह व्यक्ति की चेतना, आत्मबोध और मानसिक संरचना के भीतर भी गहरे स्तर पर काम करती है। इस कविता की एक बड़ी विशेषता यह है कि यह प्रत्यक्ष रूप से किसी मनोवैज्ञानिक शब्दावली का उपयोग नहीं करती है। फिर भी इसके भीतर स्त्री-मन, आत्म-पहचान, आंतरिकीकृत दमन, भय, असुरक्षा, आत्मनिर्माण और चेतना-परिवर्तन की जटिल प्रक्रियाएँ पूरी तरह सक्रिय हैं। कविता सामाजिक यथार्थ का वर्णन करते हुए भी मनुष्य के भीतरी संसार तक पहुँचती है। वह यह दिखाती है कि मुक्ति का संघर्ष केवल सामाजिक संस्थाओं से नहीं, बल्कि मन के भीतर स्थापित संरचनाओं से भी होता है।

मनोविश्लेषणात्मक चिंतन का एक केंद्रीय आग्रह यह रहा है कि मनुष्य का व्यवहार केवल उसकी सचेत इच्छाओं द्वारा संचालित नहीं होता है। उसके भीतर अनेक ऐसी मानसिक संरचनाएँ सक्रिय रहती हैं जिन्हें वह स्वयं भी पूरी तरह नहीं पहचानता। सिग्मंड फ़्रायड ने दिखाया था कि सामाजिक नियम और निषेध धीरे-धीरे व्यक्ति के मानस का हिस्सा बन जाते हैं। बाद में विभिन्न मनोविश्लेषकों ने इस बात को और आगे बढ़ाया। उन्होंने बताया कि संस्कृति, परिवार और सामाजिक संबंध व्यक्ति की पहचान के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इस दृष्टि से “मैं किसकी औरत हूँ” केवल एक सामाजिक प्रश्न नहीं है, बल्कि यह उस मानसिक संसार का प्रश्न भी है जिसमें स्त्री स्वयं को समझती है।

 

कविता की शुरुआत में वृद्ध स्त्री जिन प्रश्नों को उठाती है—मैं किसकी औरत हूँ, कौन है मेरा परमेश्वर, किसके पाँव दबाती हूँ, किसका दिया खाती हूँ, किसकी मार सहती हूँ—वे केवल बाहरी जिज्ञासाएँ नहीं हैं। ये प्रश्न उसकी चेतना की आंतरिक संरचना को प्रकट करते हैं। उसने अपने जीवन को हमेशा इन्हीं श्रेणियों के भीतर समझा है। उसकी दृष्टि में स्त्री का अस्तित्व किसी पुरुष से संबद्ध हुए बिना कल्पनीय ही नहीं है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह स्थिति सामाजिक मूल्यों के आंतरिकीकरण का परिणाम है। जो व्यवस्था बाहर समाज में मौजूद थी, वह धीरे-धीरे उसके मन का हिस्सा बन चुकी है। इसलिए वह इन प्रश्नों को किसी आलोचनात्मक भाव से नहीं पूछती, बल्कि जीवन की एक स्वाभाविक भाषा के रूप में प्रस्तुत करती है।

यहीं कविता एक महत्त्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक तथ्य को सामने लाती है कि दमन केवल बाहरी नियंत्रण नहीं होता है। वह धीरे-धीरे आत्म-समझ का हिस्सा बन जाता है। व्यक्ति उन मूल्यों और विश्वासों को अपना लेता है जो वास्तव में उसके ऊपर प्रभुत्व स्थापित करते हैं। यही कारण है कि वृद्ध स्त्री को अपने प्रश्नों में कोई समस्या दिखाई नहीं देती है। उसके लिए यही एक सामान्य जीवन है।

कविता का निर्णायक क्षण तब आता है जब वक्ता उत्तर देती है कि मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह आत्म-पहचान के पुनर्गठन का क्षण है। यहाँ स्त्री अपनी पहचान को उन मानसिक श्रेणियों से मुक्त कर रही है जिनके भीतर उसे अब तक समझाया गया था। वह स्वयं को किसी बाहरी संबंध के माध्यम से नहीं, बल्कि अपने स्वतंत्र अस्तित्व के आधार पर परिभाषित करती है। यह केवल एक वैचारिक प्रतिरोध नहीं है, बल्कि यह आत्मबोध का पुनर्निर्माण है।

ज़ाक लाकाँ के सिद्धांतों की सहायता से इस स्थिति को और गहराई से समझा जा सकता है। लाकाँ का मानना था कि व्यक्ति की पहचान भाषा और प्रतीकात्मक संरचनाओं के भीतर निर्मित होती है। मनुष्य स्वयं को वैसे नहीं समझता जैसा वह वास्तव में है, बल्कि वह उन प्रतीकों, संबोधनों और भाषिक संरचनाओं के माध्यम से समझता है जो समाज उसे प्रदान करता है। लाकाँ के “प्रतीकात्मक व्यवस्था” (सिम्बोलिक ऑर्डर) के सिद्धांत को ध्यान में रखें तो वृद्ध स्त्री के प्रश्न उसी प्रतीकात्मक व्यवस्था का हिस्सा हैं जिसमें स्त्री की पहचान “किसकी औरत” होने से निर्धारित होती है। यह व्यवस्था केवल बाहरी नहीं है, बल्कि इसने व्यक्ति की आंतरिक आत्म-छवि को भी निर्मित किया है।

कविता की वक्ता इसी प्रतीकात्मक व्यवस्था में हस्तक्षेप करती है। “मैं अपनी औरत हूँ” कहकर वह उस भाषिक और मानसिक संरचना को तोड़ती है जिसके भीतर स्त्री की पहचान सदैव किसी दूसरे के संदर्भ में निर्मित होती रही थी। लाकाँ के शब्दों में कहें तो वह उस संबोधन को अस्वीकार कर रही है जिसके भीतर उसे एक विशेष प्रकार का ‘विषय’ (सब्जेक्ट) बनाया गया था।

वृद्ध स्त्री की प्रतिक्रिया—“उनकी आँखों में भर आई एक असहज ख़ामोशी”—कविता का सबसे गहरा मनोवैज्ञानिक क्षण है। यह असहजता केवल एक आश्चर्य नहीं है। यह उस मानसिक संरचना के हिल जाने का संकेत है जिस पर उसकी पूरी जीवन-दृष्टि आधारित रही है। मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से जब कोई व्यक्ति ऐसे विचार से सामना करता है जो उसकी गहरी स्थापित मान्यताओं को चुनौती देता है, तो उसके भीतर असुरक्षा और अस्थिरता पैदा होती है। वृद्ध स्त्री की चुप्पी उसी मानसिक अस्थिरता का रूप है।

इसके बाद उसका विचार—“कैसे कटेगा इस औरत का जीवन!”—और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यहाँ वह स्वतंत्रता को मुक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक गहरे संकट के रूप में देखती है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर यह समझना आवश्यक है कि मनुष्य केवल दमन से ही नहीं, बल्कि दमन द्वारा निर्मित सुरक्षा-बोध से भी जुड़ा रहता है। यदि किसी ने पूरी उम्र यह मानकर बिताई हो कि जीवन का अर्थ पति, परिवार और आश्रय से आता है, तो उन संरचनाओं से बाहर की दुनिया उसे भयावह प्रतीत हो सकती है। इस प्रकार कविता यह दिखाती है कि स्वतंत्रता का विचार कई बार सबसे पहले भय उत्पन्न करता है।

एरिख फ़्रॉम ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘एस्केप फ्रॉम फ़्रीडम’ में लिखा था कि स्वतंत्रता मनुष्य को केवल अवसर ही नहीं देती, बल्कि अकेलेपन और जिम्मेदारी का अनुभव भी कराती है। इसलिए अनेक लोग स्वतंत्रता से डरते हैं और सुरक्षा देने वाली पुरानी संरचनाओं की ओर लौट जाना चाहते हैं। वृद्ध स्त्री की प्रतिक्रिया को इस परिप्रेक्ष्य में भी समझा जा सकता है। उसके लिए स्वतंत्रता कोई आश्वस्ति नहीं, बल्कि अनिश्चितता का पर्याय है।

कविता की वक्ता इस मनोवैज्ञानिक जटिलता को अच्छी तरह समझती है। इसलिए वह वृद्ध स्त्री का उपहास नहीं करती है। “मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है / मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा”—इन पंक्तियों में सहानुभूति और ऐतिहासिक समझ दोनों मौजूद हैं। वह यह स्वीकार करती है कि उसकी चेतना किसी शून्य में निर्मित नहीं हुई है। वह उसी ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया की उत्तराधिकारी है जिससे होकर वृद्ध स्त्री गुज़री है। यह स्वीकारोक्ति कविता को केवल एक शुष्क वैचारिक वक्तव्य बनने से बचाती है।

लाकाँ के बाद की मनोविश्लेषणात्मक परंपरा, विशेष रूप से जूलिया क्रिस्तेवा और जेसिका बेंजामिन जैसे विचारकों ने पहचान और आत्मनिर्माण की प्रक्रियाओं को संबंधों के संदर्भ में समझने का प्रयास किया। जेसिका बेंजामिन का तर्क था कि स्वस्थ आत्मबोध तब विकसित होता है जब व्यक्ति स्वयं को और दूसरे को स्वतंत्र अस्तित्वों के रूप में स्वीकार कर सके। कविता की पंक्ति—“कोई किसी का नहीं होता / सब अपने होते हैं”—इस दृष्टि से उल्लेखनीय है। यह संबंधों का पूर्ण निषेध नहीं करती, बल्कि यह संबंधों को स्वामित्व से मुक्त करती है। यहाँ आत्म और अन्य के बीच ऐसा संबंध प्रस्तावित है जिसमें दोनों की स्वतंत्रता बराबर बनी रहती है।

कविता का अंतिम भाग मनोवैज्ञानिक रूपांतरण की एक और अवस्था को सामने लाता है। भविष्य की स्त्री स्वयं को “उन्मुक्त” कहती है और आसमान, समुद्र, लहरों तथा हवा के साथ अपना संबंध स्थापित करती है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर यह केवल बाहरी विस्तार नहीं है, बल्कि यह आत्म की विस्तृत अनुभूति का संकेत है। अब उसकी पहचान सीमित सामाजिक भूमिकाओं से बंधी नहीं है। उसका आत्मबोध अब व्यापक और खुला हो गया है।

“मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर / पूर्णतया अपनी”—इन अंतिम पंक्तियों का मनोवैज्ञानिक अर्थ विशेष रूप से गहरा है। “पूर्वजों के शाप” केवल सामाजिक निषेध नहीं हैं, बल्कि वे वे मानसिक संरचनाएँ भी हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती हैं। आधुनिक मनोविश्लेषण में इसे कई बार अंतरपीढ़ीय मानसिक विरासत (इंटरजनरेशनल साइकिक इनहेरिटेंस) के रूप में समझा गया है। व्यक्ति केवल जैविक गुण ही प्राप्त नहीं करता, बल्कि वह भय, आकांक्षाएँ, निषेध और सांस्कृतिक स्मृतियाँ भी विरासत में पाता है। कविता की भविष्य की स्त्री इन मानसिक विरासतों के दमनकारी पक्ष से पूरी तरह मुक्त हो चुकी है।

इस प्रकार मनोवैज्ञानिक दृष्टि से “मैं किसकी औरत हूँ” स्त्री-चेतना के क्रमिक रूपांतरण की कविता है। यह दिखाती है कि पितृसत्ता केवल एक सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि एक मानसिक संरचना भी है। इसके अनुसार अधीनता केवल बाहरी नियंत्रण नहीं, बल्कि आत्म-समझ का हिस्सा बन सकती है। साथ ही मुक्ति केवल अधिकारों की प्राप्ति नहीं, बल्कि आत्मबोध के पुनर्निर्माण की एक सतत प्रक्रिया भी है। वृद्ध स्त्री की असहज चुप्पी, उनका भय, वक्ता की आत्म-घोषणा और भविष्य की स्त्री की उन्मुक्तता—ये सब मिलकर चेतना के विकास की एक जटिल मनोवैज्ञानिक यात्रा का निर्माण करते हैं। इस अर्थ में कविता सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ मनुष्य के भीतरी रूपांतरण की भी कविता बन जाती है।

उत्तर-आधुनिक पहचान-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में “मैं किसकी औरत हूँ” को पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि कविता केवल स्त्री की स्वतंत्रता या पितृसत्तात्मक संरचनाओं के प्रतिरोध की कविता नहीं है। वह पहचान (आइडेंटिटी) की मूल प्रकृति पर भी गहरा विचार करती है। यह कविता उस धारणा को चुनौती देती है कि मनुष्य की कोई एक स्थिर, अंतिम, शाश्वत और अपरिवर्तनीय पहचान होती है। इसके विपरीत, कविता यह संकेत करती है कि पहचान एक सतत निर्माणशील प्रक्रिया है। यह सामाजिक संबंधों, भाषिक संरचनाओं, सांस्कृतिक मान्यताओं और आत्मबोध के बीच निरंतर पुनर्गठित होती रहती है। इस दृष्टि से कविता को उत्तर-आधुनिक पहचान-विमर्श के साथ संवाद करती हुई रचना के रूप में पढ़ा जा सकता है।

आधुनिकता के अनेक विमर्शों में पहचान को अपेक्षाकृत स्थिर और एकरेखीय रूप में देखा गया था। व्यक्ति की पहचान प्रायः उसके वर्ग, जाति, लिंग, धर्म, राष्ट्र या पारिवारिक स्थिति जैसी श्रेणियों के माध्यम से निर्धारित की जाती थी। किंतु उत्तर-आधुनिक चिंतन ने इन स्थिर पहचानों पर गहरा प्रश्नचिह्न लगाया। स्टुअर्ट हॉल ने तर्क दिया था कि पहचान कोई पूर्ण और समाप्त वस्तु नहीं है। वह हमेशा “होने” (बीइंग) के साथ-साथ “बनने” (बकमिंग) की प्रक्रिया भी है। व्यक्ति की पहचान निरंतर पुनर्निर्मित होती रहती है और उसे किसी अंतिम रूप में स्थिर नहीं किया जा सकता है। इसी प्रकार ज़िग्मुंट बाउमन ने उत्तर-आधुनिक समाज को “तरल आधुनिकता” (लिक्विड मॉडर्निटी) का समाज कहा, जहाँ पहचानें पहले की तुलना में अधिक गतिशील, अस्थिर और परिवर्तनशील हो गई हैं।

कविता का केंद्रीय प्रश्न—“मैं किसकी औरत हूँ”—पहली दृष्टि में पहचान का प्रश्न प्रतीत होता है, किंतु गहराई से देखने पर यह पहचान की निर्मिति की प्रक्रिया पर एक बड़ा प्रश्न है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रश्न “मैं कौन हूँ” नहीं है, बल्कि “मैं किसकी हूँ” है। इसका अर्थ है कि स्त्री की पहचान उसके अपने अस्तित्व के आधार पर नहीं, बल्कि किसी अन्य के साथ उसके संबंध के आधार पर निर्धारित की जा रही है। उत्तर-आधुनिक पहचान-विमर्श इसी प्रकार की पूर्वनिर्धारित पहचान-श्रेणियों की आलोचना करता है। वह पूछता है कि क्या व्यक्ति की पहचान वास्तव में उतनी स्थिर है जितनी समाज उसे मानता है, या वह निरंतर बदलने और पुनर्परिभाषित होने वाली प्रक्रिया है।

कविता की वृद्ध स्त्री एक ऐसी पहचान-व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें स्त्री की पहचान पहले से निर्धारित है। “कौन है मेरा परमेश्वर”, “किसके पाँव दबाती हूँ”, “किसका दिया खाती हूँ”, “किसकी मार सहती हूँ”—इन प्रश्नों के भीतर यह मान्यता छिपी हुई है कि स्त्री की पहचान उसके संबंधों के माध्यम से ही समझी जा सकती है। यहाँ स्त्री स्वयं में एक स्वतंत्र सत्ता नहीं है। वह किसी पत्नी, किसी आश्रिता, किसी सेविका या किसी सहनशील स्त्री की भूमिका के भीतर परिभाषित होती है। यह पहचान स्थिर है, क्योंकि इसके अर्थ पहले से ही तय हैं।

कविता की वक्ता इसी स्थिरता को चुनौती देती है। जब वह कहती है कि मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ, तो वह केवल एक सामाजिक संबंध का निषेध नहीं कर रही होती है। वह पहचान की उस पूरी व्यवस्था का प्रतिरोध कर रही होती है जो व्यक्ति को किसी निश्चित श्रेणी में बाँध देना चाहती है। यहाँ “मैं अपनी औरत हूँ” का अर्थ किसी नई स्थिर पहचान को स्वीकार करना नहीं है। इसका अर्थ यह है कि पहचान का स्रोत बाहरी सामाजिक परिभाषाएँ नहीं, बल्कि स्वयं व्यक्ति का आत्मनिर्णय है। पहचान अब आरोपित नहीं है, बल्कि वह स्वयं निर्मित है।

स्टुअर्ट हॉल का यह विचार कि पहचान सदैव “स्थिति ग्रहण” (पोजीशनिंग) की प्रक्रिया है, इस कविता पर विशेष रूप से लागू होता है। वक्ता अपनी पहचान को तैयार रूप में प्राप्त नहीं करती है, वह उसे सक्रिय रूप से निर्मित करती है। वह उन स्थानों से हटती है जहाँ समाज ने उसे रखा था और अपने लिए एक नया स्थान निर्मित करती है। इस प्रकार पहचान यहाँ कोई दी हुई वस्तु नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है।

 

जूडिथ बटलर के विचार भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं। बटलर ने लिंग-परिचय को किसी प्राकृतिक और स्थिर तत्त्व के रूप में देखने का विरोध किया था। उनके अनुसार स्त्री और पुरुष की पहचानें सामाजिक व्यवहारों, सांस्कृतिक दोहरावों और प्रदर्शनात्मक प्रक्रियाओं (परफॉर्मेटिविटी) के माध्यम से निर्मित होती हैं। यदि इस दृष्टि से कविता को पढ़ें, तो “पत्नी”, “परमेश्वर”, “पाँव दबाना”, “मार सहना” जैसी भूमिकाएँ केवल सामान्य सामाजिक व्यवहार नहीं रह जाती हैं। वे स्त्रीत्व की एक विशेष परिभाषा को निर्मित करने वाले सांस्कृतिक प्रदर्शन बन जाती हैं। कविता की वक्ता इन प्रदर्शनात्मक भूमिकाओं को पूरी तरह अस्वीकार करती है और इस प्रकार स्त्रीत्व के एक वैकल्पिक रूप की संभावना प्रस्तुत करती है।

कविता में उपस्थित वृद्ध स्त्री और वक्ता के बीच का संवाद पहचान के दो भिन्न प्रतिमानों के बीच का संवाद है। वृद्ध स्त्री के लिए पहचान स्थिर और संबंध-निर्धारित है। वक्ता के लिए पहचान खुली, निर्माणशील और परिवर्तनशील है। लेकिन कविता इन दोनों को पूर्णतः विरोधी ध्रुवों के रूप में नहीं रखती है। “मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है / मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा”—इन पंक्तियों में पहचान की ऐतिहासिक निरंतरता को स्वीकार किया गया है। यहाँ उत्तर-आधुनिकता का अर्थ इतिहास को भूल जाना नहीं है। वक्ता यह स्वीकार करती है कि उसकी वर्तमान पहचान अतीत की स्त्रियों के अनुभवों से ही निर्मित हुई है। पहचान इसलिए तरल है, क्योंकि वह समय के साथ बदलती है; लेकिन वह कभी शून्य में उत्पन्न नहीं होती।

उत्तर-आधुनिक चिंतन में “महावृत्तांतों” (ग्रैंड नैरेटिव्स) के प्रति संदेह एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। जाँ-फ़्राँस्वा ल्योतार ने बताया था कि आधुनिक समाज जिन सार्वभौमिक और अंतिम सच्चाइयों पर विश्वास करता था, उत्तर-आधुनिकता उन्हें प्रश्नांकित करती है। कविता भी किसी एक अंतिम स्त्री-पहचान की स्थापना नहीं करती है। वह यह नहीं कहती कि अब “स्वतंत्र स्त्री” ही स्त्रीत्व का अंतिम और सार्वभौमिक रूप है। इसके विपरीत, वह स्वयं अपनी सीमाओं को पहचानती है और भविष्य की एक और स्त्री की कल्पना करती है जो वर्तमान स्त्री से भी आगे होगी।

“यात्रा लेकिन यहीं समाप्त नहीं हुई है”—यह पंक्ति पहचान की इसी अनंत प्रक्रिया की ओर संकेत करती है। यदि पहचान स्थिर होती, तो यात्रा यहीं समाप्त हो जाती। लेकिन कविता यह स्वीकार करती है कि पहचान लगातार बदलती रहती है। वर्तमान की स्त्री भी एक अंतिम बिंदु नहीं है, बल्कि वह एक संक्रमण है।

कविता का अंतिम भाग उत्तर-आधुनिक पहचान-विमर्श के संदर्भ में विशेष रूप से अर्थपूर्ण हो उठता है। भविष्य की स्त्री कहती है कि उन्मुक्त हूँ देखो। यह उन्मुक्ति किसी एक सामाजिक भूमिका से जुड़ी हुई नहीं है। वह स्वयं को पत्नी, माँ, बेटी या किसी अन्य पारंपरिक श्रेणी में परिभाषित नहीं करती है। इसके बजाय वह अपने को आसमान, समुद्र, लहरों और हवा के साथ जोड़ती है। यहाँ पहचान किसी निश्चित सामाजिक श्रेणी की सीमा से बाहर निकल जाती है। वह संबंधों और भूमिकाओं के संकुचित ढाँचे को पार करके अनुभव और अस्तित्व के व्यापक क्षेत्र में प्रवेश करती है।

“मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर / पूर्णतया अपनी”—इन अंतिम पंक्तियों को भी उत्तर-आधुनिक संदर्भ में भली-भाँति समझा जा सकता है। “पूर्वजों के शाप” और “अभिलाषाएँ” वे तैयार अर्थ-संरचनाएँ हैं जिनके भीतर व्यक्ति की पहचान को निर्धारित किया जाता है। भविष्य की स्त्री इन पूर्वनिर्धारित अर्थों से दूरी बनाती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसकी कोई पहचान ही नहीं है, बल्कि इसका अर्थ यह है कि उसकी पहचान किसी एक स्थिर सूत्र में बाँधी नहीं जा सकती।

ज़िग्मुंट बाउमन ने लिखा है कि उत्तर-आधुनिक समाज में पहचान कोई खोजे जाने वाली वस्तु नहीं है, बल्कि वह निर्मित की जाने वाली एक परियोजना है। सविता सिंह की ‘मैं किसकी औरत हूँ’ कविता इसी अर्थ में पढ़ी जा सकती है। यहाँ पहचान तैयारशुदा या रेडीमेड प्राप्त नहीं होती, बल्कि वह निर्मित होती है। वह एक निश्चित सामाजिक भूमिका में कैद नहीं रहती, वह लगातार पुनर्गठित होती रहती है। इस प्रकार उत्तर-आधुनिक पहचान-विमर्श की दृष्टि से “मैं किसकी औरत हूँ” पहचान की स्थिर अवधारणाओं के विरुद्ध एक सशक्त काव्यात्मक हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। कविता यह दिखाती है कि पहचान किसी बाहरी सत्ता द्वारा दी गई अंतिम परिभाषा नहीं है, बल्कि आत्मनिर्माण की सतत प्रक्रिया है। वृद्ध स्त्री के प्रश्नों से लेकर भविष्य की स्त्री की उन्मुक्त घोषणा तक की यात्रा वस्तुतः स्थिर पहचान से तरल पहचान, आरोपित अस्तित्व से आत्मनिर्मित अस्तित्व और पूर्वनिर्धारित भूमिका से खुली संभावना की ओर बढ़ती हुई यात्रा है। यही यात्रा कविता को उत्तर-आधुनिक पहचान-विमर्श के संदर्भ में विशेष रूप से अर्थवान बनाती है।

अमूमन साहित्यिक हलकों में “मैं किसकी औरत हूँ” को केवल एक स्त्रीवादी कविता के रूप में पढ़ा और व्याख्यायित किया जाता है, और निस्संदेह यह पाठ उचित भी है। किंतु यदि इसे मानवतावादी दृष्टि से पढ़ा जाए, तो कविता का अर्थ-क्षेत्र और अधिक व्यापक हो जाता है। तब यह केवल स्त्री की स्वतंत्रता, स्वायत्तता और अस्मिता की कविता के बजाय मनुष्य-मात्र की स्वतंत्र सत्ता, उसकी गरिमा, उसके आत्म-अधिकार और उसके अस्तित्वगत मूल्य की कविता बन जाती है। इस दृष्टि से कविता का संघर्ष केवल स्त्री और पुरुष के बीच का संघर्ष नहीं रह जाता है। वह मनुष्य को किसी दूसरे मनुष्य की संपत्ति, अधीनस्थता या आश्रित अस्तित्व के रूप में देखने वाली समूची मानसिकता के खिलाफ़ खड़ी नज़र आती है। कविता स्त्री के अनुभव से आरम्भ होकर अंततः मनुष्य की स्वतंत्रता के एक सार्वभौमिक सिद्धांत तक पहुँचती है।

मानवतावादी चिंतन की मूल धारणा यह रही है कि प्रत्येक मनुष्य अपने आप में मूल्यवान है। उसका मूल्य किसी बाहरी सत्ता, धार्मिक व्यवस्था,

सामाजिक पदानुक्रम या संबंध-विशेष से निर्धारित नहीं होता है। पुनर्जागरणकालीन मानववाद से लेकर आधुनिक मानवीय चिंतन तक यह विश्वास बार-बार व्यक्त किया गया कि मनुष्य को साधन नहीं, बल्कि साध्य के रूप में देखा जाना चाहिए। इमानुएल कांट ने इसी विचार को अपने नैतिक दर्शन में इस रूप में व्यक्त किया था कि किसी भी मनुष्य के साथ कभी केवल साधन की तरह व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। उसे हमेशा अपने आप में एक लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। सविता सिंह की कविता इसी मानवीय आग्रह को स्त्री-अनुभव के माध्यम से व्यक्त करती है।

कविता की आरम्भिक पंक्तियाँ—मैं किसकी औरत हूँ, कौन है मेरा परमेश्वर, किसके पाँव दबाती हूँ, किसका दिया खाती हूँ, किसकी मार सहती हूँ—एक ऐसे संसार का उद्घाटन करती हैं जहाँ मनुष्य को स्वयं में पूर्ण सत्ता के रूप में नहीं देखा जाता है। यहाँ स्त्री की पहचान उसके अपने अस्तित्व से नहीं, बल्कि किसी अन्य व्यक्ति के साथ उसके संबंध से निर्धारित होती है। मानवतावादी दृष्टि से यह स्थिति समस्या पैदा करती है, क्योंकि यहाँ व्यक्ति का मूल्य उसकी मनुष्यता में नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक भूमिका में निहित माना जा रहा है। स्त्री स्वयं में कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है, वह किसी की पत्नी, किसी की आश्रिता, किसी की सेविका या किसी की अधीनस्थ है। इस प्रकार उसकी मनुष्यता एक द्वितीयक स्थिति में चली जाती है।

कविता की रचनात्मक शक्ति इस बात में निहित है कि वह इस व्यवस्था की आलोचना केवल स्त्री-अधिकारों के स्तर पर नहीं करती, बल्कि व्यक्ति की गरिमा के स्तर पर करती है। जब वक्ता कहती है कि मैं किसी की औरत नहीं हूँ, मैं अपनी औरत हूँ, तो यह कथन स्त्री की स्वतंत्रता की घोषणा अवश्य है, किंतु इसके भीतर एक व्यापक मानवीय सिद्धांत भी सक्रिय है। यहाँ व्यक्ति अपने अस्तित्व का केंद्र स्वयं बनता है। वह किसी दूसरे की परिभाषा का विस्तार नहीं है। उसकी सत्ता का आधार उसके स्वयं के भीतर है। यही वह बिंदु है जहाँ कविता स्त्री-विमर्श से आगे बढ़कर मानवतावादी विमर्श में प्रवेश करती है।

मानवतावादी चिंतन का एक केंद्रीय तत्त्व मनुष्य की स्वायत्तता है। रूसो से लेकर आधुनिक उदारवादी और अस्तित्ववादी विचारकों तक यह आग्रह लगातार मिलता है कि मनुष्य को अपने जीवन का निर्धारण स्वयं करने का अधिकार होना चाहिए। कविता में “अपना खाती हूँ / जब जी चाहता है तब खाती हूँ” जैसी पंक्तियाँ पहली दृष्टि में साधारण लग सकती हैं, लेकिन मानवतावादी संदर्भ में वे व्यक्ति की स्वायत्तता की घोषणा हैं। यहाँ जीवन के छोटे-छोटे निर्णय भी मानवीय गरिमा से जुड़े हुए हैं। मनुष्य तब तक पूर्णतः स्वतंत्र नहीं हो सकता जब तक उसके दैनिक जीवन पर उसका अपना अधिकार न हो।

कविता में “मैं किसी की मार नहीं सहती” कथन का भी एक व्यापक मानवीय अर्थ है। यह केवल स्त्री पर होने वाली हिंसा के प्रतिरोध के बजाय उस मानसिकता और विचार का प्रतिरोध है जिसके तहत किसी मनुष्य को दूसरे मनुष्य पर दंडात्मक अधिकार प्राप्त हो जाता है। मानवतावादी चिंतन में हिंसा का विरोध केवल इसलिए नहीं किया जाता कि वह पीड़ा पहुँचाती है, बल्कि इसलिए भी किया जाता है क्योंकि वह मनुष्य की गरिमा का उल्लंघन करती है। इस दृष्टि से कविता का यह कथन मनुष्य की अविभाज्य गरिमा की स्थापना करता है।

कविता के मध्य में आने वाली पंक्ति—“कोई किसी का नहीं होता / सब अपने होते हैं”—मानवतावादी व्याख्या की दृष्टि से उसका केंद्रीय सूत्र-वाक्य प्रतीत होती है। इस पंक्ति को केवल वैवाहिक संबंधों या स्त्री-पुरुष संबंधों के संदर्भ में सीमित करके नहीं पढ़ा जाना चाहिए। यहाँ एक व्यापक मानवीय दर्शन उपस्थित है। “कोई किसी का नहीं होता” का अर्थ संबंधों का पूर्ण निषेध करना नहीं है। इसका अर्थ यह भी नहीं है कि मनुष्य एक अकेला और आत्मकेंद्रित प्राणी है। इसका आशय यह है कि कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य का स्वामी नहीं हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति का अस्तित्व स्वयं में स्वतंत्र और सम्माननीय है।

बीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध यहूदी दार्शनिक, धर्मचिंतक और संवाद-दर्शन (philosophy of dialogue) के प्रमुख सिद्धांतकार मार्टिन बूबर (Martin Buber) के संवाद-दर्शन को ध्यान में रखें तो कविता का यह कथन और भी अर्थवान हो उठता है। बूबर ने “मैं-तुम” (आई-दाऊ) और “मैं-वह” (आई-इट) संबंधों के बीच अंतर किया था। उनके अनुसार वास्तविक मानवीय संबंध वह है जिसमें दूसरे व्यक्ति को कोई वस्तु या साधन की तरह नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र सत्ता की तरह स्वीकार किया जाए। कविता का कथन “सब अपने होते हैं” इसी प्रकार की मानवीय स्वीकृति की ओर संकेत करता है। यहाँ संबंध स्वामित्व पर आधारित नहीं हैं, बल्कि वे पारस्परिक सम्मान पर आधारित हैं।

कविता का मानवतावादी पक्ष वृद्ध स्त्री और वक्ता के संबंध में भी साफ़ दिखाई देता है। यदि यह कविता केवल एक शुष्क विचारधारात्मक घोषणा होती, तो वह वृद्ध स्त्री को अतीत की प्रतिनिधि मानकर उसका पूर्ण खंडन कर देती। लेकिन यहाँ ऐसा नहीं होता है। वक्ता कहती है कि मेरा जीवन तुम्हारा ही जीवन है, मेरी यात्रा तुम्हारी ही यात्रा। यह कथन मानवीय सहानुभूति और ऐतिहासिक संवेदनशीलता का परिचायक है। वह अपने से भिन्न चेतना रखने वाली वृद्ध स्त्री को भी पूरा सम्मान देती है। मानवतावाद का एक प्रमुख तत्त्व यही है कि वह मनुष्य को उसके विचारों या भूमिकाओं से पहले एक मनुष्य के रूप में स्वीकार करता है।

बीसवीं शताब्दी के जर्मन मूल के प्रसिद्ध मनोविश्लेषक, समाजशास्त्री और मानवतावादी दार्शनिक एरिख फ़्रॉम (Erich Fromm) ने अपने मानवतावादी मनोविश्लेषण में बार-बार इस बात पर बल दिया था कि मनुष्य की वास्तविक परिपक्वता तभी संभव है जब वह स्वतंत्रता और प्रेम को एक साथ जी सके। स्वतंत्रता यदि केवल अलगाव बन जाए तो वह अधूरी है, और प्रेम यदि स्वामित्व में बदल जाए तो वह भी अधूरा है। कविता का संसार इसी सुंदर संतुलन की खोज करता दिखाई देता है। वह स्वामित्व का विरोध करती है, लेकिन संबंधों का नहीं। वह आत्मनिर्णय की बात करती है, लेकिन सहानुभूति और साझे अनुभवों को भी स्वीकार करती है।

‘मैं किसकी औरत हूँ’ कविता का अंतिम भाग मानवतावादी अर्थों को और अधिक व्यापक बना देता है। भविष्य की स्त्री स्वयं को “उन्मुक्त” कहती है और आसमान, समुद्र, लहरों तथा हवा से अपना संबंध स्थापित करती है। यहाँ स्वतंत्रता केवल सामाजिक बंधनों से मुक्ति नहीं रह जाती है, वह अस्तित्व के विस्तार का अनुभव बन जाती है। मनुष्य अब किसी संकीर्ण पहचान में सीमित नहीं है, उसका संबंध अब व्यापक जगत से स्थापित हो चुका है।

“और यह आसमान / समुद्र यह और उसकी लहरें / हवा यह / और इसमें बसी प्रकृति की गंध सब मेरी हैं”—इन पंक्तियों में एक गहरा मानवीय विस्तार निहित है। यहाँ “मेरी” का अर्थ अधिकार नहीं, बल्कि आत्मीयता है। यह वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति स्वयं को दुनिया से जुड़ा हुआ अनुभव करता है। एरिख फ़्रॉम ने जिस “बीइंग” (होने) की चेतना की बात की थी, यह उसी प्रकार का अनुभव प्रतीत होता है, जिसमें मनुष्य अपने अस्तित्व को स्वामित्व के आधार पर नहीं, बल्कि सहभागिता और आत्मीयता के आधार पर समझता है।

कविता की अंतिम पंक्तियाँ—“मैं हूँ अपने पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर / पूर्णतया अपनी”—मानवतावादी दृष्टि से व्यक्ति की आत्मनिर्भर सत्ता की घोषणा हैं। यहाँ व्यक्ति न तो परंपरा का दास है और न ही सामाजिक अपेक्षाओं का बंदी है। वह अपनी मनुष्यता को स्वयं स्वतंत्र रूप से जी रहा है। यह आत्मनिर्णय का वह रूप है जो दूसरों को नकारकर नहीं, बल्कि स्वयं को स्वीकार करके प्राप्त होता है।

अगर इस कविता को समग्र रूप से देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि इसका केंद्रीय प्रश्न अंततः “स्त्री क्या है?” से भी आगे जाकर “मनुष्य क्या है?” का प्रश्न बन जाता है। कविता स्त्री के अनुभव से आरम्भ करती है, क्योंकि इतिहास में स्त्री ने स्वामित्व, अधीनता और असमानता को सबसे तीव्र रूप में झेला है। लेकिन इसी अनुभव के माध्यम से वह मनुष्य की स्वतंत्र सत्ता का एक सार्वभौमिक सिद्धांत विकसित करती है। “कोई किसी का नहीं होता / सब अपने होते हैं” केवल स्त्री-मुक्ति का सूत्र नहीं है। यह मनुष्य की गरिमा, स्वायत्तता और आत्म-अधिकार का सूत्र भी है। इसी कारण यह कविता स्त्रीवादी होते हुए भी केवल स्त्रीवादी नहीं रह जाती है। वह मनुष्य की स्वतंत्रता और उसकी अविभाज्य गरिमा के पक्ष में एक गहरा मानवतावादी वक्तव्य बन जाती है।

कुल मिलाकर सविता सिंह की “मैं किसकी औरत हूँ” समकालीन हिंदी कविता की उन विरल रचनाओं में है, जो अपने विशिष्ट अनुभव-संसार से उठकर व्यापक दार्शनिक अर्थवत्ता अर्जित करती हैं। कविता का आरम्भ स्त्री की सामाजिक स्थिति से होता है, किंतु उसकी वैचारिक यात्रा क्रमशः पहचान, स्वत्व, स्वतंत्रता, इतिहास, स्मृति, भाषा, संस्कृति और मानवीय गरिमा जैसे प्रश्नों तक फैल जाती है। यही कारण है कि यह कविता किसी एक आलोचनात्मक पद्धति में पूरी तरह समाहित नहीं होती है, बल्कि प्रत्येक दृष्टिकोण इसके अर्थ-संसार का एक नया आयाम उद्घाटित करता है।

कविता का सबसे बड़ा हस्तक्षेप इस बात में निहित है कि वह स्त्री को किसी संबंध-निर्धारित सत्ता के रूप में देखने से साफ़ इंकार करती है। वह उस सांस्कृतिक और भाषिक संरचना को चुनौती देती है, जिसके भीतर स्त्री की पहचान सदियों से किसी अन्य के संदर्भ में परिभाषित की जाती रही है। इसके स्थान पर कविता आत्म-अधिकारिता की एक ऐसी अवधारणा प्रस्तुत करती है, जिसमें व्यक्ति अपने अस्तित्व का केंद्र स्वयं बनता है। इस प्रकार यहाँ मुक्ति का अर्थ केवल सामाजिक बंधनों से छुटकारा पाना नहीं है, बल्कि आत्मबोध की पुनर्संरचना करना भी है।

 

कविता की एक उल्लेखनीय उपलब्धि यह है कि वह अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक ही वैचारिक परिप्रेक्ष्य में जोड़ती है। वृद्ध स्त्री, वर्तमान वक्ता और भविष्य की उन्मुक्त स्त्री मिलकर स्त्री-चेतना के विकास की एक त्रिआयामी संरचना निर्मित करती हैं। इस संरचना के माध्यम से कविता यह संकेत करती है कि परिवर्तन किसी एक क्षण में घटित होने वाली घटना नहीं है। यह अनुभवों, संघर्षों और नई संभावनाओं से निर्मित होने वाली एक दीर्घ प्रक्रिया है। इसीलिए इसमें स्मृति और आकांक्षा परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक शक्तियाँ बन जाती हैं।

भाषा के स्तर पर भी कविता एक सृजनात्मक प्रतिरोध रचती है। वह प्रभुत्वशाली अर्थों को अस्वीकार कर शब्दों को नए अर्थ-क्षेत्र प्रदान करती है। परिणामतः वही भाषा, जो कभी अधीनता को व्यक्त करती थी, अब आत्मनिर्णय और स्वतंत्र अस्तित्व की भाषा में रूपांतरित हो जाती है। इसी प्रक्रिया में कविता यह भी प्रमाणित करती है कि अर्थ कभी स्थिर नहीं होते हैं। वे सामाजिक संघर्षों और चेतना के परिवर्तन के साथ निरंतर पुनर्गठित होते रहते हैं।

कविता की भविष्य-दृष्टि उसे केवल आलोचनात्मक नहीं, बल्कि रचनात्मक भी बनाती है। वह वर्तमान की सीमाओं को पहचानते हुए एक ऐसे जीवन की कल्पना करती है, जहाँ मनुष्य आरोपित भूमिकाओं और दमनकारी विरासतों से मुक्त होकर अपनी संभावनाओं का विस्तार कर सके। यह कल्पना किसी काल्पनिक आदर्शलोक की रचना नहीं करती, बल्कि मानवीय स्वतंत्रता के क्षितिज को और व्यापक बनाती है।

 

अंततः “मैं किसकी औरत हूँ” का स्थायी महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि वह स्त्री-मुक्ति के प्रश्न को मनुष्य की स्वतंत्र सत्ता के प्रश्न से जोड़ देती है। कविता यह प्रतिपादित करती है कि किसी भी प्रकार की वास्तविक मुक्ति का आधार व्यक्ति की गरिमा, उसकी स्वायत्तता और उसके आत्मनिर्णय के अधिकार की स्वीकृति में निहित है। इस अर्थ में यह रचना केवल स्त्री-अनुभव का काव्यात्मक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि स्वतंत्र मनुष्य की अवधारणा पर एक गहन चिंतन भी है। यही विशेषता इसे समकालीन हिंदी कविता के सबसे विचारोत्तेजक और बहुआयामी पाठों में शामिल करती है।

 

संस्कृत साहित्य में ‘मैं किसकी औरत हूँ’ का सबसे निकट का उदाहरण ‘महाभारत’ की द्रौपदी का प्रश्नाकुल स्वर है। द्यूतसभा में जब युधिष्ठिर उसे दाँव पर हार जाते हैं, तब द्रौपदी दूत के माध्यम से प्रश्न भेजती है—

 

गच्छ त्वं कितवं गत्वा सभायां पृच्छ सूतज ।

किं नु पूर्वं पराजैषीरात्मानमथवा नु माम् ॥

एतज्ज्ञात्वा समागच्छ ततो मां नय सूतज ।

ज्ञात्वा चिकीर्षितमहं राज्ञो यास्यामि दुःखिता ॥

 

(हे सूतपुत्र (संदेशवाहक)! तुम जुआ खेलने वालों की उस सभा में जाओ और उस जुआरी (युधिष्ठिर) से जाकर यह पूछो कि— “आपने पहले स्वयं को हारा था या मुझे?” इस बात का पता लगाकर तुम वापस आओ, उसके बाद ही मुझे यहाँ से ले जाना। राजा (युधिष्ठिर) के इस कृत्य या इच्छा को जानकर ही मैं अत्यंत दुखी मन से वहाँ चलूँगी।)

 

महर्षि व्यास की द्रौपदी का यह प्रश्न बेहद महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसके भीतर वही मूल दार्शनिक समस्या निहित है जिसे सहस्राब्दियों बाद इक्कीसवीं शताब्दी की भारतीय स्त्री-कवि सविता सिंह आधुनिक संदर्भ में उठाती हैं। ‘महाभारत’ में द्रौपदी का आशय है कि यदि कोई व्यक्ति स्वयं ही अपना स्वत्व खो चुका है, तो वह किसी अन्य मनुष्य को दाँव पर लगाने का अधिकार कैसे रखता है? यहाँ स्त्री को संपत्ति मानने की धारणा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न उपस्थित होता है। यद्यपि यह आधुनिक स्त्रीवादी अभिव्यक्ति नहीं है, फिर भी स्वामित्व और व्यक्तित्व के प्रश्न की दृष्टि से यह उल्लेखनीय है।

 

संस्कृत साहित्य में सीता, शकुंतला, दमयंती और सावित्री जैसे पात्रों में भी आत्मनिर्णय और नैतिक स्वायत्तता के स्वर मिलते हैं। लेकिन वे स्वर प्रायः धर्म, प्रेम, निष्ठा या न्याय के संदर्भ में व्यक्त होते हैं। तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ में  जब पार्वती का विवाह शिव से होता है और उनकी विदाई का समय आता है, तब माता मैना अत्यंत दुखी होकर उन्हें स्त्री-धर्म समझाती हुई स्त्री के पराधीन (पति के अधीन) होने की पीड़ा का बयान करती हुई कहती हैं – ‘कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं॥'( विधाता (ब्रह्मा) ने संसार में स्त्री जाति को क्यों बनाया है, क्योंकि पराधीन व्यक्ति को सपने में भी सुख नहीं मिल सकता) ।

बावजूद इसके, आधुनिक अर्थ में “मैं अपनी हूँ” जैसी स्पष्ट उद्घोषणा स्वभावत: वहाँ दिखाई नहीं पड़ती है। वास्तव में “मैं किसी की औरत नहीं हूँ/ मैं अपनी औरत हूँ” जैसा कथन आधुनिक स्त्रीवादी चेतना, व्यक्ति-स्वातंत्र्य और आत्म-अधिकार की अवधारणाओं से ही निर्मित है। संस्कृत साहित्य का अधिकांश भाग ऐसे सामाजिक-दार्शनिक क्षितिज में रचा गया था, जहाँ व्यक्ति की पहचान प्रायः धर्म, कुल, संबंध और सामाजिक दायित्वों के संदर्भ में ही समझी जाती थी। इसलिए सविता सिंह की रचना का यह स्वर अपने आधुनिक बौद्धिक संदर्भ में बिल्कुल विशिष्ट है।

यदि किसी संस्कृत पाठ को ‘मैं किसकी औरत हूँ’ कविता की वैचारिक पूर्वपीठिका के रूप में देखना हो, तो द्रौपदी का उपर्युक्त प्रश्न सबसे अधिक सार्थक प्रतीत होता है। वहाँ पहली बार यह बुनियादी समस्या उभरती है कि क्या एक मनुष्य दूसरे मनुष्य पर स्वामित्व का दावा कर सकता है? यही प्रश्न हमारे समय में “मैं किसकी औरत हूँ” कविता में और अधिक विकसित और आत्मसजग रूप में उपस्थित होता है।

 

वैश्विक स्त्रीवादी काव्यधारा के क्षितिज पर एड्रिएन रिच की कालजयी रचना ”डाइविंग इन-टू द रेक’  (Diving into the Wreck) और सविता सिंह की कविता ‘मैं किसकी औरत हूँ’ का एक साथ आना स्त्री-अस्मिता के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण वैचारिक घटना है। स्त्रीवादी चेतना का मूल संघर्ष केवल अधिकारों की प्राप्ति नहीं, बल्कि उस ‘आरोपित आत्म’ से मुक्ति है जिसे सदियों की पितृसत्तात्मक संरचनाओं ने निर्मित किया है। जब सविता सिंह अपनी कविता में पूछती हैं—”मैं किसकी औरत हूँ?” तो यह प्रश्न भारतीय उपमहाद्वीप की सामाजिक-सांस्कृतिक सीमाओं को लांघकर एक वैश्विक गूँज बन जाता है। दोनों कविताएँ अलग-अलग कालखंड, भाषा और भौगोलिक परिवेश से उपजी हैं, किंतु दोनों का अंतिम गंतव्य एक ही है—स्त्री की स्वायत्तता, स्वतंत्र अस्तित्व और निर्मित इतिहास का विखंडन। यह केवल स्त्री-अनुभव का दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि यह पहचान, स्मृति, सत्ता और आत्मनिर्माण के उन बुनियादी अस्तित्ववादी प्रश्नों को उठाती है जिससे मनुष्य की संपूर्ण अस्तित्वगत स्थिति जुड़ी हुई है।

 

इन दोनों कविताओं का प्रस्थान-बिंदु एक खोज-यात्रा से होता है, परंतु दोनों के औजार और धरातल भिन्न हैं। रिच की कविता में वक्ता इतिहास के उस ‘मलबे’ को तलाशने समुद्र की अगाध गहराइयों में उतरती है, जिसे आधिकारिक, पुरुष-केंद्रित आख्यानों ने या तो विकृत कर दिया है या पूरी तरह छुपा दिया है। रिच अकेले उतरती हैं, उनके पास ‘बुक्स ऑफ़ मिथ्स’ (मिथकों की किताब), ‘कैमरा’ और ‘चाकू’ है, जो सत्य को दर्ज करने और झूठे आख्यानों को काटने के प्रतीक हैं। यहाँ प्रश्न मुख्य रूप से इतिहास और प्रतिनिधित्व का है। इसके विपरीत, सविता सिंह के यहाँ यात्रा समुद्र की नहीं, बल्कि ‘समय और चेतना’ की है, जो एक रेलगाड़ी के डिब्बे में दो स्त्रियों के संवाद से शुरू होती है। एक वृद्ध स्त्री का यह बार-बार पूछना कि “मैं किसकी औरत हूँ?”, उस गहरे संकट को दर्शाता है जहाँ स्त्री का अस्तित्व किसी पुरुष के सापेक्ष ही परिभाषित होता आया है। रिच जहाँ इतिहास की विकृति से अपनी बात शुरू करती हैं, वहीं सविता सिंह पहचान से शुरुआत करती हैं, किंतु अंततः दोनों का मूल प्रश्न इस बात से जुड़ता है कि व्यक्ति को किसने परिभाषित किया है और वह स्वयं को कैसे पुनर्परिभाषित कर सकता है।

इस यात्रा का सबसे क्रांतिकारी मोड़ वह है जहाँ ये दोनों रचनाएँ समाज द्वारा तैयार और आरोपित पहचान को स्वीकार करने से स्पष्ट मना कर देती हैं। रिच की गोताखोर कहती है कि वह ‘मलबे की खोज में है, मलबे की कहानी की नहीं’ (‘the wreck and not the story of the wreck’) में रुचि रखती है। यहाँ ‘कहानी’ सामाजिक आख्यानों, मिथकों और निर्मित इतिहास का प्रतीक है, जबकि ‘मलबा’ वास्तविक अनुभव और दबी हुई स्मृति का। दोनों कविताएँ निर्मित कथाओं के विरुद्ध अनुभव के सत्य को स्थापित करती हैं। इसी प्रकार, सविता सिंह की कविता का निर्णायक क्षण तब आता है जब वक्ता इस पितृसत्तात्मक व्याकरण को ही उलटते हुए कहती है—”मैं किसी की औरत नहीं हूँ / मैं अपनी औरत हूँ।” यह कथन स्त्रीवादी स्वायत्तता की उद्घोषणा है। ‘अपनी औरत होना’ उस संप्रभुता का प्रतीक है जहाँ वह स्वयं की नियंता है। यहाँ सिमोन द बोउवार की वह स्थापना ध्वस्त होती है जिसमें उन्होंने कहा था कि स्त्री को हमेशा ‘अन्य’ (Other) के रूप में निर्मित किया गया है। सविता सिंह “मेरा परमेश्वर कोई नहीं” कहकर उस धार्मिक-सांस्कृतिक वैधता पर प्रहार करती हैं जो स्त्री की अधीनता को पवित्र रूप प्रदान करती रही है।

दोनों कविताओं में यात्रा का रूपक केंद्रीय है, परंतु उनका भूगोल एक-दूसरे से काफी अलग है। रिच की कविता में समुद्र एक गहन रूपक है, जहाँ समुद्र की गहराई स्त्री के दमन किए गए इतिहास, स्मृति और अवचेतन का प्रतीक बन जाती है। यहाँ गोताखोर बिल्कुल अकेला है, उसका कोई मार्गदर्शक नहीं है और वह स्वयं अपने जोखिम पर नीचे उतरता है। यह अवरोह वस्तुतः आत्म-अन्वेषण की एक एकांत प्रक्रिया है। इसके विपरीत, सविता सिंह की कविता में रेलयात्रा समय, इतिहास और पीढ़ीगत स्त्री-अनुभव की यात्रा में रूपांतरित हो जाती है। यहाँ वृद्ध स्त्री अतीत का प्रतिनिधित्व करती है, वर्तमान की वक्ता परिवर्तनशील स्त्री-चेतना का, और कविता के अंत में उपस्थित कल्पित स्त्री भविष्य की संभावना का निर्माण करती है। इस प्रकार रिच का अन्वेषण जहाँ व्यक्तिगत जोखिम और आंतरिक गहराई का है, वहीं सविता सिंह का विमर्श सामूहिक और पीढ़ीगत संवाद के रूप में सामने आता है।

यह स्त्रीवादी विमर्श इन दोनों रचनाओं में संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठकर एक व्यापक मानवीय स्वतंत्रता के प्रश्न तक पहुँचता है। रिच की कविता में लिंग-सीमाओं का अतिक्रमण विशेष रूप से दिखाई देता है जब वक्ता कहती है—मैं स्त्री हूँ: मैं पुरुष हूँ (I am she: I am he)। रिच यहाँ किसी सतही समन्वय की बात नहीं कर रही हैं, बल्कि वे लैंगिक द्वैत की सीमाओं को तोड़ रही हैं। यह कथन स्त्री और पुरुष के पार जाकर एक ऐसी अखंड मानवीय सत्ता की घोषणा है जो इतिहास के मलबे में दबे हुए समूचे अनुभव को अपने भीतर समेटती है। सविता सिंह के यहाँ ऐसा प्रत्यक्ष वक्तव्य नहीं मिलता, लेकिन वहाँ भी पहचान का प्रश्न अंततः स्त्री-पुरुष के द्वंद्व से आगे बढ़ जाता है। उनका यह कथन कि “कोई किसी का नहीं होता / सब अपने होते हैं”, केवल स्त्री की मुक्ति का नहीं, बल्कि मनुष्य की स्वतंत्रता का सार्वभौमिक आख्यान बन जाता है।

‘डाइविंग इन-टू द रेक’ में वक्ता इतिहास के उस ‘मलबे’ को तलाशने समुद्र की अगाध गहराइयों में उतरती है, जिसे आधिकारिक, पुरुष-केंद्रित आख्यानों ने या तो विकृत कर दिया है या पूरी तरह छुपा दिया है। रिच अकेले उतरती हैं, उनके पास ‘बुक्स ऑफ़ मिथ्स’ (मिथकों की किताब), ‘कैमरा’ और ‘चाकू’ है। यह उपकरण सत्य को दर्ज करने और झूठे आख्यानों को काटने के प्रतीक हैं। यहाँ प्रश्न इतिहास और प्रतिनिधित्व (Representation) का है।

‘मैं किसकी औरत हूँ’ (सविता सिंह): यहाँ यात्रा समुद्र की नहीं, बल्कि ‘समय और चेतना’ की है, जो एक रेलगाड़ी के डिब्बे में दो स्त्रियों के संवाद से शुरू होती है। एक वृद्ध स्त्री का यह बार-बार पूछना कि “मैं किसकी औरत हूँ?”, पहली नज़र में साधारण लग सकता है, लेकिन यह उस गहरे संकट को दर्शाता है जहाँ स्त्री का अस्तित्व किसी पुरुष (पति, पिता या पुत्र) के सापेक्ष ही परिभाषित होता आया है। यहाँ प्रश्न पहचान और स्वामित्व का है।

वस्तुत: रिच जहाँ इतिहास की विकृति से अपनी बात शुरू करती हैं, वहीं सविता सिंह पहचान से शुरुआत करती हैं। अंततः दोनों को समझ आता है कि यह पहचान भी इसी विकृत इतिहास की ही देन है। रिच का अवरोह (Descent) व्यक्तिगत जोखिम और एकांत साधना का है, जबकि सविता सिंह का विमर्श सामूहिक और पीढ़ीगत (Generational) है, जहाँ स्त्रियाँ इतिहास की त्रिस्तरीय संरचना के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ती हैं।

 

दोनों कविताओं का एक अनिवार्य पहलू भाषा की राजनीति और विमर्श की आलोचना करना है। रिच की कविता आधिकारिक कथाओं की भाषा पर गहरा अविश्वास प्रकट करती है। वह बार-बार ‘बुक्स ऑफ़ मिथ्स’ का उल्लेख करती हैं, जो उन कहानियों का प्रतीक है जिनके माध्यम से वास्तविकता को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। कविता की अंतिम पंक्तियाँ — “मिथकों की एक पुस्तक लिए हुए / जिसमें / हमारे नाम कहीं दर्ज नहीं” (“a book of myths / in which / our names do not appear”)—यह दर्शाती हैं कि किस तरह स्त्री के वास्तविक अनुभव को इतिहास के आधिकारिक आख्यानों से बाहर रखा गया है। सविता सिंह की कविता में भाषा का संघर्ष दूसरे रूप में सामने आता है। यहाँ ‘किसकी औरत’, ‘परमेश्वर’, ‘मार सहती हूँ’ जैसे शब्द पितृसत्तात्मक विमर्श के वाहक हैं, और कवयित्री उन्हीं शब्दों के अर्थ बदल देती हैं। “मैं अपनी औरत हूँ” कहकर वह भाषा के भीतर मौजूद सत्ता-संबंधों को पूरी तरह विखंडित करती हैं। इस प्रकार, रिच का केंद्र जहाँ मिथकीय आख्यान हैं, वहीं सविता सिंह का केंद्र सामाजिक संबोधन है।

यूटोपियाई या भविष्य-दृष्टि के स्तर पर भी दोनों रचनाएँ उल्लेखनीय हैं  परंतु वे भिन्न मार्ग अपनाती हैं। ‘डाइविंग इंटू द रेक’ में भविष्य किसी स्पष्ट सामाजिक स्वप्न या कल्पित समाज (Utopia) के रूप में उपस्थित नहीं है। रिच के यहाँ सत्य की खोज की प्रक्रिया और उस यात्रा का जोखिम ही सबसे मुख्य है; वहाँ वर्तमान के संकट को समझना और मलबे की असलियत तक पहुँचना ही कविता का चरम है। इसके विपरीत, ‘मैं किसकी औरत हूँ’ में एक स्पष्ट और बेहद सुंदर यूटोपियाई चेतना दिखाई देती है। कविता केवल अतीत के दुखों का रुदन या वर्तमान का विश्लेषण नहीं करती, बल्कि वह आगे बढ़कर एक वैकल्पिक भविष्य की आकांक्षा व्यक्त करती है। कविता के अंतिम छोर पर एक ऐसी भविष्य की स्त्री की ठोस कल्पना की गई है, जो “पूर्वजों के शाप और अभिलाषाओं से दूर” उन्मुक्त आकाश के नीचे खड़ी है। सविता सिंह की यह यूटोपियाई कवि-दृष्टि स्त्री को इतिहास की जकड़न से निकालकर एक सर्वथा मुक्त और स्वतंत्र स्पेस प्रदान करती है, जो रिच की कविता की तुलना में अधिक मुखर और आशावादी है।

 

शिल्प के स्तर पर दोनों कविताओं में गहरी समानता के बावजूद एक बुनियादी और तात्विक अंतर दिखाई देता है, जिसे समझना दोनों के मूल्यांकन के लिए आवश्यक है। रिच की कविता का संसार अत्यधिक प्रतीकात्मक और रूपकप्रधान है। समुद्र, गोताखोरी, जहाज़ का मलबा, नक्शा, पुस्तक, जलपरी और जलपुरुष जैसे बिंब लगातार बहुस्तरीय अर्थ उत्पन्न करते हैं, जिससे पाठक को अर्थ ग्रहण करने के लिए उन रूपकों के भीतर गहरे उतरना पड़ता है। इसकी शक्ति इसकी काव्यात्मक सघनता और रूपकात्मक गहराई में है। इसके विपरीत, सविता सिंह की कविता का आधार एक अत्यंत ठोस सामाजिक स्थिति है। रेलगाड़ी में बैठी वृद्ध स्त्री, उसके प्रश्न, उसकी असहज चुप्पी, वक्ता के उत्तर और भविष्य की स्त्री की कल्पना—ये सभी जीवन-जगत से सीधे जुड़े हुए दृश्य हैं। इसलिए जहाँ रिच की कविता रूपकात्मक गहराई के माध्यम से अपने अर्थ अर्जित करती है, वहीं सविता सिंह की कविता संवादात्मक यथार्थ और सामाजिक दृश्यावली के माध्यम से अपनी वैचारिक शक्ति प्राप्त करती है।

अंततः दोनों कविताएँ इस बुनियादी निष्कर्ष पर पहुँचती हैं कि मुक्ति केवल बाहरी बंधनों से मुक्त होने का नाम नहीं है, बल्कि वह स्वयं को पुनः खोजने और अपनी पहचान को स्वयं निर्मित करने की प्रक्रिया है। रिच की वक्ता समुद्र की गहराइयों में उतरकर उस इतिहास की खोज करती है जिसमें उसका नाम अनुपस्थित है, और सविता सिंह की वक्ता उन सामाजिक परिभाषाओं को अस्वीकार करती है जो उसे किसी और के स्वामित्व में बाँधती हैं। दोनों ही अपने-अपने ढंग से यह घोषित करती हैं कि मनुष्य का वास्तविक अस्तित्व किसी आरोपित पहचान में नहीं, बल्कि उसके स्वत्व में निहित है। इस प्रकार ‘डाइविंग इनटू द रेक’ और ‘मैं किसकी औरत हूँ’ स्त्रीवादी कविता की दो भिन्न सांस्कृतिक अभिव्यक्तियाँ होते हुए भी स्वत्व, आत्मनिर्माण और मुक्ति की एक साझा परियोजना से जुड़ी हुई हैं, जो स्त्रीवादी साहित्य की सीमाओं का अतिक्रमण कर आधुनिक मानवीय स्वतंत्रता का महत्त्वपूर्ण तहज़ीबी दस्तावेज़ बन जाती हैं। इत्यलम्।


सन्दर्भ

अन्य ग्रन्थ

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  • Wollstonecraft, Mary. A Vindication of the Rights of Woman. J. Johnson, 1792.
  • Eisenstein, Zillah R., editor. Capitalist Patriarchy and the Case for Socialist Feminism. Monthly Review Press, 1979.
  • Hooks, Bell. Feminist Theory: From Margin to Center. South End Press, 1984.
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  • Moi, Toril. Sexual/Textual Politics: Feminist Literary Theory. Routledge, 1985.
  • Tong, Rosemarie Putnam. Feminist Thought: A More Comprehensive Introduction. 4th ed., Westview Press, 2014.
  • Walby, Sylvia. Theorizing Patriarchy. Basil Blackwell, 1990.
  • Vyasa. The Mahabharata. Translated by Bibek Debroy, Penguin Random House India, 2010–2014.

रवि रंजन

जन्म :  1962, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार

शिक्षा :   पी-एच.डी.

रूचि के क्षेत्र :  भक्तिकाव्य,  आधुनिक हिन्दी कविता,  आलोचना,  साहित्य का समाजशास्त्र,

प्रकाशित कृतियाँ :   ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’,  ‘सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन,दिल्ली (2011),  ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’ (2012),वाणी प्रकाशन, ‘वारसा डायरी’(2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’(2026), वाणी प्रकाशन, दिल्ली

विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में सौ से अधिक आलेख प्रकाशित.

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भागीदारी.

‘वारसा डायरी’ के लिए ‘जयपुर साहित्य सम्मान  (2023)

प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय,बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा स्थापित पीठ (चेयर ) पर विजिटिंग प्रोफ़ेसर

प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवा निवृत्त), हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद

ई.मेल. :  raviranjan@uohyd.ac.in मो.9000606742


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