‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में प्रतिष्ठित रचनाकार और स्त्रीवादी आलोचक प्रो. गरिमा श्रीवास्तव का आलेख “इंटरसेक्शनैलिटी और स्त्री आत्मकथाएँ” दिया जा रहा है, जो स्त्री विमर्श को एक बेहद ज़रूरी और विचारोत्तेजक धरातल प्रदान करता है।
यह आलेख पश्चिमी स्त्रीवाद के व्यक्ति-केंद्रित सिद्धांतों को जस का तस भारतीय समाज पर थोपने की प्रवृत्ति का कड़ा प्रतिकार करता है। लेखिका ने स्पष्ट किया है कि भारतीय संदर्भों में स्त्री अस्मिता को केवल जेंडर से नहीं, बल्कि जाति, वर्ग, वर्ण और धर्म के प्रतिच्छेदी (इंटरसेक्शनल) प्रभावों के आलोक में ही समझा जा सकता है।
इस विमर्श के लिए प्रोफेसर गरिमा श्रीवास्तव ने आत्मकथाओं को समाजवैज्ञानिक साक्ष्य के रूप में चुना है। आलेख में सारा अबूबकर की आत्मकथा के बहाने ‘इस्लामी स्त्रीवाद’ के भीतर के दमन और प्रतिरोध को रेखांकित किया गया है, तो दूसरी तरफ देश की पहली पद्मश्री सम्मानित ट्रांसजेंडर आत्मकथाकार मंजम्मा जोगती की व्यथा-कथा के ज़रिये समाज की यौनिक संवेदनहीनता पर प्रहार किया गया है।
विभिन्न आत्मकथ्यों के माध्यम से यह साबित किया गया है कि पितृसत्ता का ढाँचा भले एक हो, पर जाति, धर्म और वर्ग के अंतरफलक स्त्रियों के अनुभवों को अलग और मारक बनाते हैं।
यह आलेख एक समतावादी और समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में एक गंभीर वैचारिक हस्तक्षेप है। ‘रचना समय’ अपने सुधी पाठकों के समक्ष इस विचारोत्तेजक आलेख को प्रस्तुत करते हुए गर्व का अनुभव कर रहा है। — हरि भटनागर

आलेख:

भारत के संवैधानिक ढाँचे में ही उसके जटिल और समृद्ध इतिहास और अस्मिता मूलक राजनीति के तत्व अनुस्यूत हैं. इस ढांचे में व्यक्तिगत और मौलिक अधिकारों और सामुदायिक संरक्षण के बीच संतुलन साधने का प्रयास किया गया है. भारत में स्त्रीवादी अस्मिता को जाति, धर्म, लिंग और राष्ट्रवाद के प्रतिच्छेदी प्रभावों से जूझना पड़ता है, जिसके लिए ‘इंटरसेक्शनैलिटी’ को समझा जाना अनिवार्य है.यहाँ यह ध्यातव्य है कि पश्चिमी स्त्रीवाद जो अक्सर व्यक्ति-केंद्रित अस्मिता के आसपास घूमता है वहीं भारतीय स्त्रीवाद महिला,स्त्री,नारी जैसी व्यापक श्रेणियों के साथ सामाजिक समूहों से उनके रोज़मर्रा के संपर्कों के बिना समझा नहीं जा सकता.प्रस्तुत आलेख में भारतीय स्त्री आत्मकथाओं के हवाले से इंटरसेक्शनैलिटी को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है.
स्त्री आत्मकथ्यों पर विचार करने के लिए मोटे तौर पर चार निकष ग्रहण किये जा सकते हैं जिनमें जाति ,वर्ग,वर्ण,जेंडर के साथ संप्रदाय या धर्म को शामिल किया जा सकता है .ये सभी निकष आपस में गुंथे यानी प्रतिच्छेदी अवस्था में अपना अस्तित्व रखते हैं . यदि भारतीय समाज की सँरचना देखें तो यहाँ के विभिन्न पदानुक्रमों में सत्ता और शक्ति के केन्द्रों पर किसी वर्ग ,जाति ,जेंडर या सम्प्रदाय का आधिपत्य है.सामाजिक संरचनाओं के भीतर बहुस्तरीयता होती है जिसका आधार किसी वर्ग ,जाति,जेंडर या नस्ल का उत्पीड़न होता है .जिसमें किसी एक वर्ग या जाति के प्रभुत्व की स्थापना के लिए अन्य को दमित –उत्पीड़ित किया जाता है . एक ऐसा ढाँचा है जो यह समझने में मदद करता है कि नस्लवाद, लैंगिक भेदभाव या वर्गवाद जैसी विभिन्न प्रकार की असमानताएँ कैसे एक-दूसरे से जुड़कर कुछ लोगों के जीवन को अधिक कठिन बना देती हैं. शुरुआत में इस अवधारणा को अल्पसंख्यक अधिकारों को समझने के लिए विकसित किया गया था और बाद में यह अकादमिक जगत तथा संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं द्वारा स्वीकृत कर ली गईं लेकिन इनके व्यावहारिक पक्ष के मद्देनजर यह अनुभव किया गया कि जब इस अवधारणा को स्थानीय संदर्भों को ध्यान में रखे बिना विभिन्न संस्कृतियों में लागू किया जाता है, तो इसका अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ता. यद्यपि ‘इंटरसेक्शनैलिटी’ यह दिखाने में उपयोगी है कि भेदभाव के विभिन्न रूप कैसे आपस में जुड़े होते हैं, लेकिन इसे हर जगह एक ही तरह से लागू करने पर महत्वपूर्ण सामाजिक और ऐतिहासिक विशेषताओं को समझने में दिक्कत दरपेश हो सकती है.
समाजैतिहास में अन्तर्विभाजक पदानुक्रमिकता का निर्माण होता है .विभिन्न अस्मिताएं,जो केंद्र के आसपास मंडराती रहती हैं उनमें जाति और जेंडर को प्रवेश बिन्दुओं के तौर पर देखा जा सकता है .विभिन्न अस्मिताएं अपने दैनंदिन प्रतिरोध के तरीकों और रणनीतियों के साथ संघर्षरत रहती हैं, वहीँ दूसरी ओर सामाजिक पदानुक्रमिकता को बनाये भी रखना चाहती हैं. एक ओर जाति -व्यवस्था को तोड़ने का प्रयास भी करती हैं दूसरी ओर अपनी ही जाति के भीतर पदसोपानिकता को प्रश्रय भी देती हैं.भारत में अस्सी के दशक में हम विभिन्न सामाजिक वर्गों की आपसी आवाजाही के बीच अन्तर्विरोध को एक विश्लेषणात्मक ढाँचे के रूप में उभरता हुआ देखते हैं .यह वही दौर है जब जाति ,जेंडर और कई तरह के वर्गों के आधार पर उत्पीड़न ,वर्चस्व और भेदभाव की राजनीति को नए ढंग से समझने के प्रयास शुरू हुए .विभिन्न शोध एवं अध्ययन केन्द्रों में आत्मकथा और आत्मकथात्मक लेखन को समाजवैज्ञानिक शोध के लिए आधार – स्रोतों के रूप में शामिल किया जाने लगा. अमेरिकी नागरिक अधिकार कार्यकर्ता किम्बर्ले क्रेंशॉ ने 1989 में इंटरसेक्शनैलिटी की अवधारणा प्रस्तुत की थी, ताकि यह समझाया जा सके कि नस्ल और लिंग मिलकर किस प्रकार विशिष्ट प्रकार की चुनौतियाँ उत्पन्न करते हैं. हालाँकि, यह ढाँचा भारतीय संदर्भ हेतु अपर्याप्त है, जहाँ जाति, धर्म और राष्ट्रवाद गहराई से लैंगिक पहचान से जुड़े हुए हैं. उदाहरण के लिए, भारतीय संविधान की प्रस्तावना में राज्य को धर्मनिरपेक्ष घोषित किए जाने के बावजूद, मुस्लिम पर्सनल लॉ (MPL) आज भी विवाह, तलाक और पारिवारिक मामलों में मुस्लिम समुदाय के लिए एक अलग क़ानूनी व्यवस्था के रूप में मौजूद है. यह व्यवस्था अक्सर मुस्लिम स्त्रियों को उन स्त्रियों की तुलना में हीन अवस्था में अवस्थित कर देती है, जिन्हें भारतीय सिविल कोड के अंतर्गत अधिक सुरक्षा प्राप्त है.
इस स्थिति से कई तरह के खतरे पैदा हो जाते हैं , जिन्हें कुछ विद्वानों ने “श्रेणियों का साम्राज्यवाद” (imperialism of categories) कहा है — अर्थात पश्चिमी अवधारणाओं को ऐसे समाजों पर लागू करना जो अस्मिता मूलक पहचान को अलग ढंग से समझे जाने की माँग करते हैं. जैसे इस्लामी स्त्रीवाद (Islamic feminism) की स्थिति भारतीय समाज में वही नहीं है जो धार्मिक तौर पर कट्टरपंथी समाजों में है. ‘इंटरसेक्शनैलिटी’ एक अधिक जटिल और बहुस्तरीय दृष्टिकोण से समाज और इतिहास एवं साहित्य को समझने -समझाने का प्रयास करती है . यह दृष्टिकोण हमें औपनिवेशिक इतिहास, धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणाओं, राष्ट्रवादी विचारधाराओं, पितृसत्तात्मक क़ानूनी प्रणालियों और धार्मिक व्याख्याओं के माध्यम से निर्मित अस्मिताओं को समझने में मदद करता है. इसके माध्यम से हम सामाजिक-राजनीतिक इतिहास में गहराई से पैबस्त व्यक्तिगत अधिकारों तथा नागरिकता की पश्चिमी, व्यक्ति-केंद्रित अवधारणाओं से अलग भारतीय परिप्रेक्ष्य आगे जाकर एक अधिक सुसंगत दृष्टि प्रदान करती है.
अपने बारे में लिखकर या कहकर अपने साथ –साथ समुदाय और वर्ग के बारे में प्रामाणिक सूचनाएं देने का काम आख्यानकर्ता करता है.अपने जीवन की विभिन्न स्मृतियों को मौखिक या लिखित रूप में आख्यान का आधार बनाकर वह अगली पीढ़ी में अपने अनुभवों को अंतरित करता है.अक्सर वैयक्तिक अनुभवों की अपेक्षा सामुदायिक अनुभवों को तरजीह दी जाती है और ज्यादा प्रामाणिक भी माना जाता है ,क्योंकि लोग उसी को दुहराते हैं ,बारम्बार सुनते हैं और फिर उसी को दुहराने लगते हैं .लेकिन सत्य वही नहीं है जो समाज या समुदाय की वर्चस्वशाली शक्तियों द्वारा दुहराया और दर्ज़ किया जाता है.जिसकी तेज़ आवाज़ के शोर में हाशिये की आवाजें कमज़ोर साबित होती हैं.इन कमजोर आवाजों को आत्मकथन के माध्यम से अपनी बात कहने,‘टेस्टीमोनियो’ (सामुदायिक साक्ष्य)प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है.दरअसल ‘आत्म’ का निर्माण जाति ,लिंग, वर्ग और वर्ण के साथ यौनिकता को सुदृढ़ करने वाले परस्पर प्रतिच्छेदी (इन्टरसेक्शनल) वाहकों के द्वारा होता है. इस जटिलता के मद्देनज़र जब सामाजिक जीवन की बहुआयामी कोटियाँ विश्लेषण का आधार बनती हैं तो ऐसे में जाति ,वर्ग,वर्ण,जेंडर की कई कोटियाँ हमारे सम्मुख होती हैं जिनमें किसी एक अस्मिता या किसी एक कोटि से नहीं बल्कि परस्पर विलयित होती हुए अस्थिर स्वभाव की अस्मिताओं से हमारा सामना होता है और यहीं पर विभिन्न वर्गों,सम्प्रदायों ,जातियों की अस्मिताएं अपने तमाम अंतर्विरोधों के साथ और भी अधिक जटिल रूप में उजागर हो जाती हैं .
समाज में विभिन्न अस्मिताएं अपनी पहचान के लिए परस्पर प्रतिच्छेदी अवस्था (इन्टरसेक्शनैलिटी)में ही रहती हैं,वे स्वायत्त नहीं होतीं मसलन स्त्री और अश्वेत एक दूसरे से अलग नहीं बल्कि दोनों एक दूसरे के सूचक होते हैं.इनकी परस्पर आवाजाही से उत्पीड़न का अभिसरण होता है.सत्ता के सन्दर्भ में परस्पर प्रतिच्छेदी ,एक दूसरे को काटती हुई सरणियों को जेंडर और नस्लभेद के पारस्परिक सम्बन्ध की खोज के दौरान देखा जा सकता है .इसी तरह जाति और जेंडर को पहले समानान्तर माना जाता था परन्तु बाद के अध्ययनों ने इन्हें परस्पर अंतर्ग्रथित साबित कर दिया. पितृसत्ता का सांस्थानिक अनुभव समान होने के बावजूद जाति, वर्ग,वर्ण और धर्म के अन्तराल स्त्रियों के अनुभवों को अपेक्षाकृत ज्यादा ,जटिल ,मारक , उत्पीड़क और एक दूसरे से पृथक बनाते हैं .स्त्रियों का जीवन जाति के अंतरफलक ,धर्म ,वर्ग और संप्रदाय के वैभिन्न्य पर टिका हुआ होता है,जो पितृसत्ता से पारिभाषित होता है.इसी के आधार पर जेंडर के नियम बनाये जाते हैं और वर्तमान समय में एक अस्तित्व के लिए श्रम –विभेदी और जेंडर –विभेदी व्यवस्था का निर्माण करते हैं .वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में यदि हम इसे देखें तो यौनिकता ,श्रम और अर्थोत्पादन के स्रोत दरअसल पितृसत्ता के भीतर छिपी हिंसा और स्त्री के दैहिक ,मानसिक शोषण एवं असमानता के रूप में दिखाई देते हैं .जो असमानता पर आधारित समाज में भयंकर रूप से पद्सोपानिक व्यवस्था के परिणाम हैं .जाति आधारित समाज में, एक ढंग से एक ही जाति के भीतर अपनी ही जाति की स्त्री के ऊपर अपनी जाति के ही पुरुष के नियन्त्रण या वर्चस्व को स्थापित करने का प्रयास जेंडर सम्बन्धी शोषण का कारण बनता है.पितृसत्ता से सम्प्रदाय और धर्म के गठजोड़ को मुसलमान स्त्रियों की आत्मकथाएं अभिव्यक्त करती हैं .जितनी बेबाकी से मुसलमान स्त्रियाँ इस्लाम के भीतर के दमन और प्रतिरोध की रणनीतियों को कह डालती हैं, ठीक उसी स्तर का प्रतिरोध और आलोचना हमें हिन्दू स्त्रियों के आत्मकथ्यों में उन्नीसवीं शती के उत्तरार्ध के बाद कहीं नहीं दिखाई देता .यदि हिन्दू धर्म की आलोचना कहीं दिखाई भी पड़ती है तो वह साहस बीसवीं शती की दलित आत्मकथाकारों तक महदूद है.धर्म जहाँ इस्लाम में तगड़ी सेंसरशिप का काम करता है वहीँ हिन्दू धर्म की कट्टरता से निजात पाने के लिए ईसाई या ब्राह्मो धर्म की ओर रुख कर लेने के प्रमाण कई स्त्री आत्मकथ्य देते हैं .उधर बांगला और मलयालम में लिखने वाली अधिकाँश स्त्रियाँ आभिजात्य और मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं उनके आत्मकथ्यों को वर्ग में अंतर्ग्रथित जेंडर -विभेद और श्रम -विभेद के समीकरणों के आलोक में देखा जाना चाहिए .भारतीय समाज में पितृसत्ता जाति ,वर्ण ,वर्ग और धर्म के विभिन्न स्तरों पर अपनी जटिलता के साथ मौजूद है .पौराणिक धर्म ग्रंथों,आचार –संहिताओं में निम्न जातियों और स्त्रियों के लिए अलग प्रावधान दिए गए.वर्ण व्यवस्था को अपनाकर जाति व्यवस्था का आधार पुख्ता किया गया और इस तरह भारतीय सामाजिक सँरचना को एक जटिल बहुआयामी स्वरुप मिला.समाज की सोपानिक- व्यवस्था या जाति ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया .जाति के कारण स्त्री के शोषण की प्रक्रिया और परिणाम में बहुआयामिता का प्रवेश होता है .जहाँ ऊँची जाति की स्त्री अपने जेंडर के कारण परिवार और समाज में असमानता के अनुभवों से रु-बरु होती है.पितृसत्ता की मौजूदगी वैयक्तिक स्वतंत्रता के हनन , पर्दा और अभिव्यक्ति पर पाबन्दी लगाने जैसे अनेक मुखौटों के साथ उनकी रचनाओं में झांकती है,वहीँ निम्न जाति की स्त्री का शोषण वर्ग ,जाति और जेंडर के कारण त्रिस्तरीय हो जाता है,कहीं वह पति की मार खाती है,कहीं अपमान का शिकार होती है ,कहीं उसे विद्यालय में घुसने से रोका जाता है ,कहीं मंदिर में.आर्थिक और सामाजिक समानता के सपने देखने वाले समाज में व्याप्त लैंगिक और जाति विभेद के बहुआयामी पक्ष इन स्त्रियों की आत्मकथाओं को बहुआयामी बनाते हैं.
जाति,लिंग ,वर्ग और नस्ल की अन्तः सम्बद्धता से चार शोषित वर्ग अस्तित्व में आते हैं –सवर्ण स्त्री ,दलित स्त्री ,दलित पुरुष और रंग और नस्लभेद के शिकार स्त्री –पुरुष .जहाँ पहले के समाजशास्त्री जाति और लिंग को अलग –अलग अवधारणाओं के तौर पर व्याख्यायित करते थे वहीँ नूतन अनुसंधान और विश्लेषण से इस पारंपरिक अवधारणा में बदलाव आया और जाति ,वर्ग ,लिंग और वर्ण के साथ धर्म को परस्पर जटिल रूप में संगुफित माना जाने लगा. उधर पश्चिमी स्त्रीवाद ने नए शोध और आलोचना के आधार पर यह पाया कि नस्लभेद/रंगभेद के अनुभवों को जीती स्त्री के अनुभव अन्य किसी भी स्त्री से अलग विशिष्ट और जटिल होते हैं ,यानी अश्वेत(ब्लैक) और गैर –अश्वेत स्त्री के अनुभव एक दूसरे से बिलकुल अलग होंगे.इसीतरह धर्म और सम्प्रदाय के नियम और सेंसरशिप स्त्री के अनुभवों को नितांत विशिष्ट बनाते हैं.पितृसत्ता धर्म के आवरण में अपने नियम स्त्रियों पर लादती है ,उनके सांस्थानिक और पारिवारिक शोषण को वैधानिक बनाती है इसे मुसलमान स्त्रियों के आत्मकथ्यों को पढ़कर जाना जा सकता है .धार्मिकता और पितृसत्ता का गठजोड़ कितना शोषक और मारक हो सकता है इसे जानने के लिए भारत में निर्वासन झेल रही बांग्लादेश की लेखिका तसलीमा नसरीन के आत्मकथ्यों (आमार मेये बेला,उत्ताल हवा ,द्विखंडितो,वे अँधेरे दिन ,नेई किच्छु नेई ,मुझे घर ले चलो ,निर्वासन -जो सन 2005-2014 के बीच सात भागों में प्रकाशित हुए )को पढ़ा जाना चाहिए. सीमंतनी उपदेश (1882) जैसी पुस्तक में हिन्दू धर्म की आलोचना करने वाली किसी रचनाकार को निर्वासन और धार्मिक मुल्लाओं द्वारा मौत के फतवों से जूझना पड़ा हो, इसके प्रमाण हमें भारत में नहीं मिलते. तहमीना दुर्रानी की आत्मकथा ‘मेरे आका’(1996)में स्त्री देह का शोषण ,कमला दास की आत्मकथा ‘एंटे कथा’(1973) में धर्म परिवर्तन कर पश्चाताप करती स्त्री का मर्म अभिव्यक्त हुआ है जहाँ धर्म उसे संवेदनात्मक सुरक्षा देने से इनकार कर देता है ,प्रेमास्पद की प्राप्ति के लिए बदला गया धर्म अंतत: उसे अकेला कर देता है .इसी तरह बामा फ्युस्टीना मेरी (करक्कू,1992)और सिस्टर जेस्मी(आमीन,2010) ईसाई धर्म अपनाकर,चर्च से जुड़ने के बाद ही जेंडर और धर्म के विध्वंसक समीकरण का कलुषित पक्ष समझ पाती हैं ,जिससे पाठक यह जान पाता है कि समानता का भ्रम और पीड़ित वर्ग के प्रति सहानुभूति समाज के संपन्न और शक्तिशाली व्यक्तियों के लिए एक आवरण है जिसके पीछे असमानता,अनुदारता और यौन शोषण के तीक्ष्ण हथियार छिपे हुए हैं.
विभिन्न वर्गों से सम्बद्ध स्त्रियाँ जेंडर विभेद के पृथक अनुभवों से रूबरू होती हैं .जेंडर एक ऐसे मुखौटे के रूप में सामने आता है जिसमें स्त्री और पुरुष का असमान नृत्य चलता रहता है .स्त्री -पुरुष का जैविकीय अंतर उच्चवर्गीय,मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय स्त्री के अनुभवों में अन्तराल उपस्थित करता है जिसे भारत में अंग्रेजी में लिखी आत्मकथाओं में देखा जा सकता है.आभिजात्य घरानों से सम्बद्ध महारानी सुनीति देवी की आत्मकथा (द ऑटोबायोग्राफी आफ़ एन इंडियन प्रिंसेस,1921) ,भोपाल की शासक नवाब सुल्तान जहाँ बेगम(एन अकाउन्ट आफ़ माई लाइफ़,1912) ,आबिदा सुल्तान (मेमोआयर्स आफ़ अ रिबेल प्रिंसेस,2004) से लेकर मृणाल पाण्डेय(डाटर्स डाटर,1993) हों या बंगाल के प्रतिष्ठित परिवार से सम्बद्ध स्वर्णकुमारी देवी या उनकी पुत्री सरलादेवी चौधरानी (जीबोनेर झरापता,1944) हों ,इनके अनुभव ठीक वही नहीं हैं जो घरेलू नौकरानी का काम करके पेट भरने का इंतजाम करने वाली बेबी हालदार (आलोआंधारि,2006) या बतौर देह श्रमिक, आजीविका कमाने वाली नलिनी जमीला (ऑटोबायोग्राफी आफ़ ए सेक्सवर्कर,2005)या सड़क पर बजरी बिछाने वाली मजदूरनी का काम कर चुकने वाली कौशल पंवार(बवंडरों के बीच,2020)के हैं .अर्थोपार्जन के लिए जद्दोजहद करती ,किसी तरह जीवनयापन करती स्त्रियों के आत्मकथ्य समृद्ध स्त्रियों के आत्मख्यानों से प्रसंगतः और स्वभावतः भिन्न होते हैं .जहाँ पितृसत्ता के दबाव पर्दा प्रथा ,नर -संतान उत्पन्न करने के दबाव,परिवार की मर्यादा को बनाए रखने के दबाव के साथ अनेक तरह की सेंसरशिप,जिसके निशाने पर वे रहती हैं,जो अपने स्वरुप में हर बार अलग होती है,उसके बारे में वे कभी खुलकर और कभी दबे स्वरों में बात करती हैं .इसके विपरीत घर चलाने के लिए ज़द्दोज़हद करती स्त्री ,पति या घर के सदस्यों की हिंसा और उत्पीड़न का शिकार स्त्री के अनुभवों को अश्वेत स्त्रियों से लेकर मुसलमान स्त्रियों के आत्मकथ्यों में अभिव्यक्ति मिली है जिनके बरक्स उत्तर- औपनिवेशिक मध्यवर्गीय स्त्री के आत्मकथ्य हमारे सामने बदलते हुए समाज की तस्वीर पेश करते हैं.कहीं वह वर्णाश्रम के नीति –नियमों में फंसी साक्षरता के लिए व्याकुल राससुंदरी देवी(आमार जीबोन,1872) है कहीं बीबी अशरफ जो चूल्हे के कोयले से लकीरें खींचकर साक्षर होने की कोशिश करती है और अंतत: अध्यापिका बनने का सपना पूरा करती है.इनके समानान्तर निस्तारिणी देवी(सेकेले कथा,1916) सरीखी ब्राह्मण स्त्रियाँ हैं जिनका पूरा जीवन कुलीनता की भेंट चढ़ गया.वर्ण के नियम ,कुलीनता के दबाव में समूचा जीवन एकादशी व्रत करती आई स्त्री के जीवन की झांकी हमें तब मिलती है जब वह जीवन के अस्सीवें वर्ष में दृष्टि-बाधित होकर, धर्मस्थान पर एकाकी जीवन बिताने के बारे में बोलकर बताती है,जिसने कभी पति का चेहरा ठीक से नहीं देखा और न कभी ससुराल गयी. अगली शताब्दी तक आते-आते यह स्त्री अपने चुनाव और व्यक्तिगत निर्णयों के साथ स्वयं के बारे में लिखने लगी है ,कहीं वह प्रेम और विवाह के निर्णय करती है और धोखे खाती है मसलन किश्वर नाहीद(बुरी औरत की कथा,1994),चन्द्रकिरण सोनेरिक्सा (पिंजरे की मैना,2008),मन्नू भंडारी(एक कहानी यह भी,2007)तसलीमा नसरीन (द्विखंडितो,2003),प्रभा खेतान (अन्या से अनन्या तक,2007)कहीं वह एकाकी रहने की चुनौतियाँ मोल लेती है ,लेकिन स्वयं को मल्लिका अमरशेख (मला उध्वस्त व्यान्चय,2014) की तरह विखंडित अनुभव करती है और कहीं रमणिका गुप्ता (हादसे,2005 ,आपहुदरी),माया एंजेलो (आई नो व्हाय द केज्ड बर्डस सिंग,1969) की तरह पितृसत्ता के उत्तर आधुनिक रूपों से टकराती दिखाई देती है.कहीं मुक्ता सर्वगोंड,(मिटलेली कवाडे 1983),रजनी तिलक(अपनी जमी अपना आसमा,2017)एंजेला डेविस(एन ऑटोबायोग्राफी,1974) की तर्ज पर पढ़ –लिखकर स्वावलंबी कार्यकर्त्ता होना चुनती है,कहीं कामकाजी बनकर कार्यस्थल पर जाति और लैंगिक विभेद के मर्म बिन्दुओं पर कल्याणी ठाकुर चांडाल (आमि चाण्डाल केनो लिखी,2016) -सी उंगली रखती है .कहीं सुशीला टाकभौरे(शिकंजे का दर्द,2011)जैसी अपना धन कमाकर भी परिवार के शोषण और पति के शिकंजे से मुक्त नहीं हो पाती,इनके अलावा हाशिये के भी हाशिये पर जीवन जी रही केरल की सरसू(माई लाइफ़ स्टोरी एंड साँग्स,2000)सी.के.जानू (मदर फारेस्ट :द अनफिनिश्ड स्टोरी ऑफ़ सी. के.जानू,2002) और सुमित्रा महरौल(टूटे पंखों से परवाज़ तक ,2021)जैसी विकलांग स्त्रियाँ हैं जो लिखना सीखने और अपनी व्यथा और संघर्ष गाथा कहने के लिए एक लम्बा सफ़र तय करती हैं.इन आत्मकथाओं में व्यक्त विकलांगता का आयाम स्त्री के अनुभवों को और अधिक मारक बनाता है.विभिन्न जाति ,वर्ग और नस्ल से जुड़ी स्त्रियाँ घर –परिवार ,सामाजिक इकाईयों के साथ अपने संबंधों ,पितृसत्ता के नानाविध अनुभवों के साथ आत्मकथ्यों में मौजूद हैं. आज जबकि स्त्रियों की सामाजिक,राजनैतिक आर्थिक स्थिति में बदलाव देखे जा रहे हैं.
आज जबकि स्त्रियों की सामाजिक,राजनैतिक आर्थिक स्थिति में बदलाव देखे जा रहे हैं,सोशल मीडिया पर ‘मी टू’ की मुहिम चल रही है ऐसे में उन स्त्रियों को याद करना ज़रूरी हो जाता है जिन्होंने अभिव्यक्ति के आरंभिक ख़तरे उठाये. कर्नाटक के संदर्भ में देखें तो यह बीसवीं शती का समय था जब स्त्रियों ने अपनी जीवन -कथाओं को छपवाने का साहस किया.आज कन्नड़ स्त्री आत्मकथाओं पर बात करना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि जिन स्त्रियों ने कर्नाटक में आत्मकथ्य लिखे उनमें से अधिकांश रंगमंच और सिनेमा से संबंधित थीं. उन्होंने पितृसत्ता के विविध दबावों को न सिर्फ़ झेला बल्कि अस्तित्व के विभिन्न प्रश्नों पर विचार किया और कभी प्रत्यक्ष कभी परोक्ष ढंग से सामाजिक इकाइयों की आंतरिक व्यवस्था में पैबस्त पितृसत्ता की रणनीतियों को अनावृत्त किया. आत्मकथा लेखन ही ऐसा माध्यम था,जो लिंडा एंडरसन के अनुसार –“एक ऐसा स्थान जहाँ से वे अपनी सामाजिक रूप से स्वीकृत चुप्पी और समर्पण की स्थिति का विरोध कर सकें” . वह आगे कहती हैं कि “अंतर” वह शब्द है जिसका उपयोग लिंग पहचान की धारणा को बदलने के लिए किया जाता है, जो कि जन्मजात है, वह इस तरफ़ ध्यान दिलाता है कि कैसे ‘पुरुष ‘ और ‘स्त्री’ अर्थ भाषा के भीतर से उत्पन्न होते हैं.ये जैविक निर्माण से पृथक सामाजिक निर्माण हैं” लिज़ स्टेनली ने पाठक द्वारा आत्मकथा में रुचि के कारणों पर विचार करते हुए बताया है-…“कि एक पाठक कई जटिल कारणों से आत्मकथा पढ़ता है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारणों में से एक है, दूसरे लोगों के जीवन के बारे में जानने की इच्छा , दूसरों की जीवन कथा जानने का एक तरीक़ा है आत्मकथा पढ़ना ,इसलिए इसे जीवनी के रूप में पढ़ना वह पसंद करता है” .रंगमंच और सिनेमा में काम करने वाली स्त्रियों के अनुभव घरेलू स्त्रियों की अपेक्षा बहुआयामी होते ही हैं.उन्हें जीवन -जगत के उन अनुभवों से रू-ब-रू होना पड़ता था और है जिनकी उपलब्धता घर की चहारदीवारी में बंद स्त्री के लिये असंभव हुआ करती है.स्त्री लेखन के आरंभिक दौर में घर के भीतर रहने वाली गृहिणी ‘आदर्श स्त्री’थी और पत्रकारिता,रंगमंच,सिनेमा में काम करने वाली स्त्री को ‘वेश्या’और चरित्रहीन समझना आम बात थी. कन्नड़ की स्त्री आत्मकथाएँ इस दृष्टि से विशिष्ट हैं. उनमें मराठी स्त्री आत्मकथाओं की तरह आंदोलनकारिता नहीं है,वे अक्सर घर -परिवार और रोज़गार में तादात्म्य स्थापित करके चलने वाली स्त्रियों की कथाएँ हैं. मिखाइल बाखतिन ने ‘पाठक या ऑडियंस को महत्वपूर्ण माना था.चूँकि हमें ऐसी आत्मकथाएँ भी मिलती हैं जो बताती हैं कि स्त्री का लिखना अपने आप में राजनीतिक क्रियाकलाप है,इसलिए पाठक किस तरह की आत्मकथाओं को पढ़ना चाहता है ,यह जानना ज़रूरी हो जाता है.कई पाश्चात्य विचारकों ने माना कि राजनैतिक अंतर्दृष्टि निजी खुलासों से ज़्यादा महत्वपूर्ण होती है.परंपरा से स्त्रियों का राजनीति में दखल बहुत कम ही देखा गया है,क्योंकि स्त्रियाँ श्रमिक तो रहीं,लेकिन आर्थिक उत्पादन पर उनका कोई सांगठनिक नियंत्रण नहीं रहा.भारत में राजनीति से जुड़ी स्त्रियों की आत्मकथाएँ परिमाण में बहुत कम हैं.लेकिन निज की कथाओं, सुख -दुख से ऊपर उठकर समाज और समाज में व्याप्त अंधविश्वास,जाति -प्रथा,लिंग -भेद के समीकरणों को पाठक के सामने रखने वाली कुछ आत्मकथाकार हैं,जिन्होंने जाति- विभेद को चुनौती दी,लैंगिक समीकरणों को अच्छी तरह समझा,विपरीत परिस्थितियों में यानी धारा के विरुद्ध तैरकर अपने उद्देश्य की पूर्णता की ओर बढ़ीं साथ ही भविष्य की राह भी प्रशस्त की.जिन्हें पढ़कर पाठक जान जाता है कि आत्मकथा विधा सिर्फ़ निज के प्रेम,विवाह और कष्टों की महागाथा नहीं होती,उससे आगे बढ़कर समाज-निर्माण में इनकी रचनात्मक भूमिका होती है.वैसे भी समूचे वैश्विक परिदृश्य पर स्त्रियों की राजनैतिक दास्तानें विरल हैं -जिन स्त्रियों के आत्मकथ्यों की चर्चा यहाँ की जा रही है वे इसलिए विशिष्ट हैं क्योंकि उनमें स्त्रियाँ सिर्फ़ अपनी जीवन यात्रा का अंकन नहीं करतीं,बल्कि अपनी जिजीविषा को दोहराती हैं.यह बात भी महत्वपूर्ण है कि ऐसी अभिव्यक्तियाँ अक्सर बहुत उत्तेजनापूर्ण शैली में आती हैं.कुछ आलोचक इसका दारोमदार ‘स्त्री’के सीमित अनुभव संसार पर डाल देते हैं.वस्तुतः उत्तेजक और आवेगशील शैली का प्रभाव कई बार नकारात्मक पड़ता है. शोषण और संघर्ष के सतही यथार्थ तक पाठक सीमित रह जाता है और रचना की अन्तःसंवेदना कई बार छूट जाती है. इसीलिए एलेन शोवाल्टर ने ‘लिटरेचर ऑफ़ देयर ऑन’ और ‘टुवर्ड्स ए फेमिनिस्ट पोएटिक्स’ में स्त्रीवादी समीक्षा पर बल दिया. उसने स्त्री साहित्य के बजाय उसकी समीक्षा पर बल देते हुए स्त्री का पाठक के रूप में अध्ययन किया, कि कैसे एक स्त्री, साहित्यिक पाठ को पढ़ते हुए किसी ख़ास विचारधारा की अभिव्यक्ति करती है, साथ ही रचनाकार के रूप में स्त्री के सामने भाषा और अभिव्यक्ति संबंधी कौन-सी समस्याएं आती हैं. शोवाल्टर “स्त्रीवादी समीक्षा को सही अर्थों में स्त्री केन्द्रित, स्वतंत्र और बौद्धिक तौर पर सुसंगत होना” ज़रूरी समझती हैं. शोवाल्टर से पहले स्त्री साहित्य की समीक्षा को अन्य समीक्षा सिद्धांतों से मिलाकर अनन्य भाव से देखने की परंपरागत प्रवृत्ति प्रचलित थी.एलेन शोवाल्टर का कहना था, ‘नारीवादी समीक्षा की सबसे बड़ी खामी यह थी कि स्त्रियाँ अपने को ठीक और खुले ढंग से अभिव्यक्त नहीं कर पाती थीं.’ शोवाल्टर ने “शैलियों, विषयों, विधाओं और स्त्री लेखन की संरचनाओं के इतिहास को सामने रखा. साथ ही स्त्री की रचनाशीलता के मनोशिक्षाजगत, एकाकी और सामूहिक भविष्य और परंपरा के विकास के नियमों की पड़ताल की.”
भारत में इस्लामी स्त्रीवाद के नजरिये को जानने में कर्नाटक की सारा अबूबकर की आत्मकथा एक केस स्टडी का काम कर सकती है.वे लिखती हैं -“एक बार पी.लंकेश जी ने मुझसे कहा कि तुम मुसलमान हो और हमें पता भी नहीं कि तुम्हारे समय में मुसलमान लड़कियों का जीवन कैसा था,इसके बारे में हम अंधेरे में हैं . लंकेश मुझे पत्रिका में छापते थे. मेरे मन में आत्मकथा लिखने का विचार भी लंकेश के कारण आया. मैंने यह लिखा कि मुस्लिम लड़कियाँ किन परिस्थितियों में स्कूल जाती हैं ,मैंने पाया कि दरअसल एक मुसलमान स्त्री का जीवन सरल नहीं होता,उसे अपने,धर्म,समुदाय,जाति के भीतर बहुस्तरीय संघर्ष करना पड़ता है.मेरे लिये यह बड़े आश्चर्य का विषय था कि जब मैं कहानियाँ लिखने लगी तो बहुत ही सहज भाव से मेरी नानी,मेरी माँ,बहन चरित्रों के रूप में उतरने लगी,इसी तरह मेरी आत्मकथा मेरी ही नहीं मुस्लिम औरतों की आत्मकथा के रूप में,हमारे समुदाय की कथा के रूप में लिखी गई’.अपनी रचना प्रक्रिया के विषय में बताने के बाद सारा अबूबकर आत्मकथ्य शुरू करती हैं –“मेरा जन्म चन्द्रगिरी नदी के किनारे बसे एक गाँव चमनाडु में 1936 में हुआ.मैंने बचपन से अपने तनाव और संघर्ष नदी से बाँटे,वह मेरे सुख -दुख की साथी थी. काम -काज की तलाश में मेरे गाँव से बहुत लोग सऊदी अरब के देशों की ओर चले गये,विदेशी पैसा आने से गाँव की आर्थिक स्थिति में बहुत सुधार आया,लेकिन इसका नकारात्मक प्रभाव औरतों पर पड़ा.अरब देशों का ‘इस्लामिक फ़ंडामेंटलिजिम’ पैसे के साथ हमारे समुदाय में कब चला आया हमें पता भी नहीं चला.गाँव में स्त्री -पुरुष के बीच खाई ज़्यादा गहरी होने लगी,हम देख पा रहे थे कि लड़कियों और औरतों को हिजाब और बुर्के पहले से कहीं ज़्यादा कड़ाई से पहनाये जाने लगे.ऐसा समय भी आया कि बुर्का न पहनने पर दंड का विधान तय कर दिया गया.अब बुर्के के बिना घर से निकलना मुश्किल था.बचपन की स्वतंत्रता हमसे छिन गई.मेरी नानी बी फातिमा,माँ जेना बी का दम घुटना तो मैंने ख़ुद महसूस किया क्योंकि वे गाँव में भी अपने घर से बग़ैर बुर्के के निकल नहीं सकती थीं,जुर्माने की रक़म तगड़ी थी.
मेरे घर में मैं चार भाइयों के बीच इकलौती बहन और पिता पुडियापुरा अहमद की दुलारी थी.वे मुझे ऊँची शिक्षा देना चाहते थे.उन्होंने मुझे क़ुरआन पढ़ाया.बाद में मुझे कासरगोड़ के प्राथमिक विद्यालय में भेजा जहां दुर्गाबाई नामक एक प्यारी अध्यापिका मिलीं.पूरे स्कूल में अकेली मुसलमान लड़की होने के कारण दुर्गाबाई ने बहुत सहायता की ,मेरी पढ़ाई पर विशेष ध्यान दिया.घर पर गाँव के मौलवी दुल्ला अक्सर आकर पिता को डपटते कि लड़की को स्कूल भेजना कैसे दीन के ख़िलाफ़ है और मेरे पिता चुपचाप उनके उपदेश सुन लेते,मौलवी के साथ -साथ गाँव वालों की नज़र में लड़की को क़ुरआन और घरेलू शिक्षा देकर जल्द ब्याह देना उचित था.उन दिनों मुसलमान समुदाय की लड़कियों की शादी की उम्र 9-10 साल थी.पर भला हो मेरे पिता का जिन्होंने मुझे पाठशाला से नहीं निकाला.मुझे याद है जब देश आज़ाद हुआ मैं छठी कक्षा में पढ़ रही थी.मैं तेल के लैंप की रोशनी में पढ़ती और गाँव के लोग मुझे अचंभे से स्कूल जाते देखते कि कैसे एक मुसलमान लड़की स्कूल जा रही है. गाँव वालों के दबाव से मेरी सगाई मंगलोर के अबूबकर नामक इंजीनियर से तय कर दी गई,और इससे पहले कि मेरा परीक्षा परिणाम आता1953 के अक्तूबर महीने में मेरी रूखसती हो गई.ससुराल में मायके से भी ज़्यादा पर्देदारी थी.यहाँ मैं मात्र घरेलू औरत थी जिसे घर देखना था और बच्चे जनने थे.मेरे प्रारंभिक दस वर्ष चार लड़कों के जन्म और लालन -पालन में लग गये.मुझे अख़बार पढ़ना तक मय्यसर नहीं था क्योंकि अख़बार मर्दाने में आता था,जनानखाने तक पहुँचता ही नहीं था.धीरे- धीरे पति से कहकर मैंने पुस्तकालय से किताबें मँगवानी शुरू कीं,जो अक्सर उनकी रुचि की ही होती थीं.ससुराल में स्त्री स्वाधीनता या स्त्री की किसी इच्छा के कोई मायने नहीं थे.स्त्री को कोई गंभीरता से लेता नहीं था. जबकि वह 25-30 लोगों का संयुक्त परिवार था.पति की नौकरी तबादले वाली थी.अंततः हम 1963 में अपना अलग घर बना सके,अब मैंने वुमन असोसिएशन की सदस्यता ले ली और अपनी इच्छा की किताबें पढ़नी शुरू कीं…
70 के दशक में मैंने जो भी लिखा किसी पत्रिका ने छापा नहीं.मेरी कई कहानियाँ और लेख किसी पत्र -पत्रिका के संपादक को पसंद नहीं आये.लेकिन सन् 1981 में पी. लंकेश की प्रेरणा से मेरा लेख ‘लंकेश पत्रिके’ में छपा जो सांप्रदायिक सौहार्द्र पर आधारित था.” सारा अबूबकर ने अपने लेखन में मुसलमान स्त्रियों की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया.मालाबार के इलाक़े में इस्लाम धर्म को मानने वाले लोगों और अपने समुदाय की स्त्रियों के विविध वर्णी चित्रों ने सारा को ख्याति प्रदान की.लेकिन उन्हें इस बात का दुख रहा –“मुझे अपने परिवार यानी पति-बच्चों से कभी सहयोग नहीं मिला.मुझे लगता है ये मर्द सिर्फ़ बच्चे पैदा करना जानते हैं,लेकिन बच्चों के पालन -पोषण के बारे में कुछ जानते नहीं,जानना भी नहीं चाहते.पति मेरी मदद नहीं करते थे ,वे अपनी नौकरी में व्यस्त रहते थे ख़ाली समय में क्लब और दोस्त ,घर के अंदरूनी मसलों से उन्हें कोई लेना -देना नहीं था.मैंने घर की ज़िम्मेदारियों निभाईं और लिखना भी समानांतर ढंग से जारी रखा.मैं उग्र स्त्रीवाद के समर्थन में नहीं थी पर मैंने तय कर लिया था कि मुसलमन समुदाय समेत अन्य भारतीय समुदायों में पुरुष-स्त्री समीकरणों के अनुपात के बारे में महत्वपूर्ण सवाल उठाऊँगी.लिखने का रास्ता मेरे लिये कभी आसान नहीं था.कभी पति का तबादला हो जाता,कभी बच्चों की देखभाल और घरेलू ज़िम्मेदारियाँ. छोटी -छोटी मुश्किलें बड़ी बन जातीं .हाँ एक ही बात हुई कि पति के तबादले के दौरान मैंने पूरा कर्नाटक नज़दीक से देखा.इसका लाभ मुझे यह मिला कि मैं आम आदमी के जीवन की कठिनाइयों,विभिन्न समुदायों की जीवन-शैली ,सामाजिक -आर्थिक समस्यायें ,रीति रिवाजों को रचनाकार की नज़र से देख सकी.कर्नाटक के विभिन्न तबकों में स्त्री की स्थिति को भी मैंने इसी दौरान देखा.मैंने प्रगतिशील साहित्य संघ की सदस्यता ले ली. पी. लंकेश सरीखे विद्वानों के संपर्क ने मुझे मुसलमानों की समस्याओं पर अलग से विचार करने और उनके बारे में शेष समाज को बताने की प्रेरणा दी ही,छपने के अवसर भी दिये.मलयाली लेखिका कमला दास के संपर्क से मैंने बहुत कुछ सीखा ”.
सारा अबूबकर आज हमारे बीच नहीं रहीं लेकिन उन्हें अपने लेखन और सामाजिक सरोकारों के लिए जाना जाएगा.उन्होंने हिंदू मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगों और इस बीच में पिसते निर्धनों की असुरक्षा की समस्या को अपनी रचनाओं में उठाया .सारा ने ज़्यादातर लेखन आत्मकथात्मक किया क्योंकि वे अपने आसपास के चरित्रों को समाज से उठाती हैं.उन्होंने स्त्रियों,विशेषकर मुसलमान स्त्रियों को केंद्र बनाया और तटीय कर्नाटक में पुलिस द्वारा हिंदू स्त्रियों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित किए जाने की नीतियों का विरोध डटकर किया और कहा – “नैतिक पुलिसिंग को महिलाओं के लिए दिशानिर्देश निर्धारित करने का कोई अधिकार नहीं है.”जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में विवाह के अनिवार्य पंजीकरण का प्रावधान किया, तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “यह एक अच्छा फैसला है। मैं वर्षों से इस मांग की वकालत करती रही हूं. कानून के बावजूद, खासकर निचले तबके की स्त्रियों का शोषण होता है। अब वे कम से कम कोर्ट तो जा सकती हैं.”
इस प्रसंग में रेमंड विलियम्स को याद किया जा सकता है जिन्होंने संस्कृति की अवधारणा पर विचार करते हुए संस्कृति को अवशिष्ट, प्रभुत्वशाली और आविर्भावी तत्त्वों की गतिकी में देखने की वकालत की थी.उनका मानना था कि किसी भी युग की कृति में हाशियाकृत या विध्वंसकारी तत्त्वों की पहचान के साथ ही उस संस्कृति को उसकी समग्रता में समझा जा सकता है.इससे यह समझा जा सकता है कि हर पराधीनता के इतिहास में प्रतिरोध का इतिहास भी निहित होता है.यह भी कि प्रतिरोध सदैव पराधीनता का चिह्न या प्रमाण ही नहीं होता बल्कि यह ‘भिन्‍नता’ का अमिट चिह्न भी होता है जो सत्ता को परिवर्तन का दरवाजा बन्द करने से सदा बरजता है. ट्रांसजेंडर के प्रति हमारा समाज अभी तक ठीक धन से संवेदनशील नहीं हो सका है,ऐसे में कर्नाटक की मंजम्मा जोगती के बारे में उनकी अपनी ज़ुबानी जानना दिलचस्प ही नहीं आँखें खोलने वाला भी है.मंजम्मा को कन्नड़ की पहली ट्रांसज़ेंडर आत्मकथाकार होने का श्रेय को जाता है. वे भारत की पहली ट्रांसज़ेंडर हैं जिन्हें 2021 में पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया.समाज यौनिकता की पहचान के विषय में कितना अल्पज्ञ है और यह अल्पज्ञता हमें किसी एक ख़ास समुदाय के प्रति कितना निर्मम बना देती है, यह तब जान पाते हैं जब मंजम्मा के रूप में पहचानी गई मंजूनाथ शेट्टी की आत्मकथा से रूबरू होते हैं , यह आईने में अपना ही चेहरा देखने जैसा है.यह आत्मकथा ट्रांसजेंडर के प्रति हमारी समझ का विस्तार करती है.हम जान पाते हैं कि वे भी हमारी तरह ही मनुष्य हैं ,जो समाज के सदस्य के रूप में पहचाने जाने के मुंतज़िर हैं.यह आत्मकथा इस समुदाय की आदतों और प्रवृत्तियों के बारे में हमें गहन जानकारी देती है .आत्मकथा ‘नाडुवे सुलिवा हेन्नू’ को मंजम्मा ने अरुण जोड़द कुल्दगी से कन्नड़ में लिखवाया.मंजम्मा जोगती ने अपने समाज में प्रचलित बहुत-सी रीतियों के बारे में आत्मकथा में कहा है.प्रचलन के अनुसार मंजम्मा का विवाह देवता जोगप्पा से कर दिया गया,जिसके बाद परिवार ने उसे वापस स्वीकार ही नहीं किया. मंजम्मा के तृतीय लिंगी होने के बारे में पता चलते ही परिवार का रवैया उनके प्रति बदल गया.उसकी आत्मकथा भारतीय समाज में अपनी यौनिकता से जूझते व्यक्तित्व के ‘आत्म’ की खोज की कथा है–“मैं मंजम्मा जोगती के नाम से जानी जाती हूँ,मैंने पंद्रह वर्ष की उम्र में घर छोड़ दिया था,मैं कक्षा दस तक पढ़ी हूँ.घर छोड़ने के बाद मैंने भिक्षा माँगी,बलात्कार और यौन-शोषण का शिकार कई बार हुई.एक परिवार ने मुझे शरण दी और ‘जोगती’ नृत्य सीखने में मैंने अपनी जान लगा दी,मैंने अपने नृत्य -गुरु से दीक्षा ली और कर्नाटक समेत देश के विभिन्न भागों में नृत्य प्रदर्शन के लिए जाने लगी.जोगती नृत्य के बारे में लोग धीरे -धीरे जानने लगे,बाद में मैंने अपना नृत्य -समूह बना लिया…बचपन के बारे में क्या कहूँ,हमारे देश और कन्नड़ समाज में स्त्री -पुरुष के अलावा तृतीय लिंगी या किन्नर को बहुत हेय दृष्टि से देखा जाता है.मेरे माता -पिता भी मुझे नहीं समझते थे,घर में बेहद घुटन थी,मैंने अपने प्राण लेने की कोशिश की,लेकिन बच गई,अस्पताल में रही पर मुझे देखने कोई नहीं आया वहाँ.ठीक होकर मैं घर के अलावा कहीं भी और चली जाना चाहती थी,पर डाक्टर ने मुझे घर के आश्रय में लौटने के लिए समझाया क्योंकि मैं अभी किशोरी थी.पिता और माँ ने मुझसे कहा कि तुम्हारे कारण हमारी बदनामी होती है इसलिए तुम चली जाओ और हिजड़ों के साथ ही रहो.मैं त्रावणगिरि चली गई वहाँ हिजड़ों के समूह में रही ,पेट भरने के लिए भीख माँगती,साड़ी पहन कर नाचती.नाचकर कमाए हुए पैसों से मैंने नाश्ते का ठेला लगा लिया जहां मैं इडली -सांबर बेचा करती.मुझे भीख माँगना पसंद नहीं था,क्या आप सोच सकते हैं कि भीख के लिए हाथ फैलाते ही हमारी आत्मा कैसे मर जाती है.कालव्वा जोगती से एक सहेली ने परिचय करवाया जिसने अपने नृत्य -समूह में मुझे नाचने के लिए रख लिया.मुझे धन कमाना था इसलिए मैंने देर शाम छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया.इस तरह मैंने नाचकर,नाश्ता बेचकर,ट्यूशन पढ़ाकर जीवन -यापन किया.मेरे परिवार से किसी ने मेरी सुध नहीं ली,वे समझ गये थे कि मैं हिजड़ा हूँ और मुझसे उन्होंने पीछा छुड़ा लिया है.मैं अपनी कहानी क्या बताऊँ,युवावस्था में मैं एक बार अपने गाँव ‘कुडलगी’गई, रास्ते में हरिहर पर उतरी.शाम ढल रही थी मैं बस स्टैंड पर उतरी,मेरे हाथ में सामान था,मुझे अपने माता -पिता बहुत याद आते थे,पर वे तो मुझे भुला चुके थे.बस से उतरते देख कुछ गुंडों ने घेर लिया और मेरा सामूहिक बलात्कार किया,मेरी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था,मेरे पैसे और सामान छीन लिये ,कपड़े तार -तार कर दिये.मैं रोते -रोते लौट गई,मैं अकेली और अबला थी इसलिए मेरे मन में आत्महत्या का विचार आया.दूसरी बार अपनी जान लेने की कोशिश की,पर भाग्य को कुछ और मंज़ूर था,इस बार भी बच गई.
…इस घटना के बाद मैंने फिर से जीने का फ़ैसला किया सोचा कि मैंने इतना सब तो झेल ही लिया है अब तो जीना ही है मुझे हर हाल में .”
मंजम्मा बताती हैं कि शुरुआत के पंद्रह वर्ष जब वे अपने माता -पिता के साथ रहीं,उनकी पहचान एक लड़के की थी,जब उनकी देह भाषा और स्वभाव के साथ अभिरुचियों में भी परिवर्तन लक्षित होने लगे तो पिता और सगे -संबंधी उनकी उपेक्षा करने लगे,उनपर ताने कसने लगे.मंजम्मा का प्रश्न है कि ऐसे लोग -जिनकी यौनिकता स्त्री या पुरुष के रूप में स्पष्ट नहीं है उनके प्रति समाज का रवैया इतना क्रूर क्यों है?वे कहती है कि हम भी आपकी तरह समाज का हिस्सा हैं,आप हमें ऐसा नहीं समझते,ऐसा न होने पर ही ट्रांसज़ेंडर्स ने अपना एक समाज बना लिया है.वे किसी को भी अपने निजी दायरे में तब तक नहीं आने देते, जब तक वह उनके अपने समुदाय से न हो. वे मानते हैं कि उनकी मुख्य पहचान उनका लिंग है,और वे अपने जीवन भर अपने लिंग को साबित करने के लिए संघर्ष करते हैं.सार्वजनिक स्थानों पर ट्रांसजेंडर इस तरह से व्यवहार करते हैं कि अन्य लिंग के लोग उनसे डर जाते हैं. वे इसका उपयोग एक सुरक्षा तंत्र के रूप में करते हैं, ताकि वे मारपीट और दुर्व्यवहार से खुद को बचा सकें. समाज में ट्रांसजेंडरों को सभी क्षेत्रों में उपेक्षित किया जाता है. अधिकांश साक्षात्कारों में, ट्रांसजेंडर लोगों के चेहरे भी दिखाने की ज़रूरत भी नहीं समझी जाती.यह उन ट्रांसजेंडरों के लिए विशेष रूप से होता है जो अपने जीवन में संघर्ष कर रहे होते हैं, अक्सर यह यौनकर्मियों के साथ अधिक होता है. सोशल मीडिया में ट्रांसजेंडरों का उपयोग अधिक दृश्यता, मज़ाक़ और वितृष्णा उत्पन्न करने के लिए बतौर उपकरण किया जाता है. हमें उनकी जरूरतों की ओर ध्यान देना चाहिए, जैसे कि लिंग-निरपेक्ष शौचालय, पहचान पत्र देना.सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनमें और समाज में उनके प्रति जागरूकता पैदा करनी चाहिए.इसके लिए हमें ट्रांसजेंडरों को समझना और स्वीकार करना होगा.सरकार को उनपर विशेष ध्यान देना होगा और उन्हें शिक्षित करने के लिए प्रयास करने होंगे.
मंजम्मा जोगती जैसे अनेक ट्रांसज़ेंडर हैं ,जिनकी कहानियाँ अनकही ही रह गई हैं.हालाँकि अनेक भारतीय भाषाओं में अब, अनेक ट्रांसज़ेंडर अपनी कथाओं के साथ,कभी -कभी अनुवाद के माध्यम से भी सामने आ रहे हैं.ये आत्मकथाएँ हमें उनके विषय में समझने और समाज में इन यौनिक अल्पसंख्यकों को सामान्य बनाने का मार्ग प्रशस्त करने में मदद करती हैं. ये स्वानुभूत कथाएँ हैं जो हमारे समाज और सामाजिक इतिहास की दरारों की ओर इशारा करती हैं.यह ऐसा यथार्थ है जिसे कोई और नहीं बता सकता.ट्रांसज़ेंडर अपनी व्यथा और गाथा स्वयं ही बता सकते हैं. मंजम्मा जोगती अपने अनुभवों को कहती हैं जिसमें बतौर ट्रांसजेंडर उन्होंने घर और बाहर दोनों जगह उपहास, उत्पीड़न और हिंसा का सामना किया, वे सहती रहीं सबकुछ क्योंकि उन्हें मालूम था कि पुरुष के शरीर में उन्हें स्त्री की आत्मा मिली है,लेकिन यह और लोगों को समझाना लगभग असंभव होता है.बतौर ट्रांसज़ेंडर उनके सामने कई तरह की मानसिक और भौतिक चुनौतियाँ रहीं. शरीर और आत्मा का विश्रृंखलित तारतम्य ,शरीर के भीतर हार्मोन के असंतुलन और तन के साथ मन की असंबद्धता ऐसे लोगों को दोहरे व्यक्तित्व के साथ जीने के लिए विवश कर देती है.इन सबके साथ वे समाज में उपहास ,उपेक्षा और प्रताड़ना के पात्र बन जाते हैं.पूरे विश्व में होने वाली आत्महत्याओं में ट्रांसज़ेंडर समुदाय के सदस्यों की संख्या सबसे बड़ी है. लंदन विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया कि 41% ट्रांस-स्त्रियाँ और 46% ट्रांस-पुरुष आत्महत्या करते हैं.इस के कई कारण होते हैं जैसे गलत समझी गई पहचान, सामाजिक दबाव, मानसिक आघात, अपनी पहचान को व्यक्त करने में कठिनाई और सामाजिक स्वीकृति की कमी. आँकड़े यह भी बताते हैं कि ट्रांसजेंडर आमतौर पर जीवन के कठोर सत्य का सामना करने के लिए नशा,शराब इत्यादि का सेवन करते हैं.उनके साथ यौन हिंसा भी बड़े पैमाने पर होती है.उनकी बस्तियाँ हमेशा ही पुलिस के निशाने पर रहती हैं.वे बहुत से यौन रोगों का शिकार बन जाते हैं और अपनी ज़िंदगी किसी चौराहे पर भीख माँगते हुए,लोगों को गाली -गलौज से डराकर धन उगाहकर,पुलिस की पिटाई-शोषण का शिकार होकर गुमनामी में मर जाने के लिए अभिशप्त होते हैं.उनमें से बहुत कम ऐसे होते हैं जिनकी जिजीविषा लक्ष्मी त्रिपाठी या मंजम्मा जोगती जैसी प्रबल होती है.
मंजम्मा जोगती अपने समुदाय के रीति -रिवाजों पर भी प्रकाश डालती हैं.ट्रांसजेंडर कुछ विशेष अनुष्ठानों का पालन करते हैं, और यह उनकी परंपरा में शामिल है. अपने धर्म और आस्था की परवाह किए बिना, वे सभी अनुष्ठानों और त्यौहार में भाग लेते हैं.ये अनुष्ठान हैं – रीट (चेलों को अपनाना), रोटी (सामुदायिक सभा), थूतदार (नपुंसकता के बाद का अनुष्ठान), चालीस और राउंडप्पा (दाह संस्कार अनुष्ठान) . उपरोक्त अनुष्ठानों और त्योहारों के अलावा उर्स का त्योहार हर साल अजमेर में रजब के महीने में मनाया जाता है, जो ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की मृत्यु की याद में होता है. ऐसा माना जाता है कि ख्वाजा की सेवा करने वाले ट्रांसजेंडर को उस दिन गर्भवती होने का आशीर्वाद मिलता है. ट्रांसजेंडर वहां प्रार्थना के लिए एकत्र होते हैं और लोगों के लिए भोजन परोसते हैं. एक और प्रसिद्ध त्यौहार कूवगम के बारे में वे बताती हैं , जो तमिलनाडु के विल्लुपुरम जिले के एक गाँव चिथिरई (तमिल का पहला महीना) में मनाया जाता है ,इस त्यौहार के केंद्र में ट्रांसजेंडर का विवाह है. अठारहवें दिन के अंत में, वे अपने प्रिय पति भगवान अरावन की मृत्यु पर शोक मनाने की प्रथा है ,जो महाभारत के युद्ध के प्रसंग पर आधारित है. तमिल महाभारत में अरावन अर्जुन और उलूपी के पुत्र के रूप में चित्रित है. उसने पांडवों की जीत के लिए युद्ध स्थल पर अपने जीवन का बलिदान दिया अरावन की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए, भगवान कृष्ण ने मोहिनी का रूप लिया और अरावन ने अपने जीवन की अंतिम रात मोहिनी के साथ बिताई. अगले दिन, युद्ध शुरू होने से पहले अरावन का बलिदान कर दिया गया. महाभारत की इस घटना का अनुसरण करते हुए कूवगम का त्योहार हर साल आयोजित होता है.
भारत के दक्षिण प्रांतों में, देवी येल्लम्मा ट्रांसजेंडरों की मुख्य देवी मानी जाती है. उन्हें विभिन्न नामों से पुकारा जाता है जैसे जोगम्मा, रेणुका, होलिम्मा, आदि. रेणुका का मंदिर कर्नाटक में स्थित है। ट्रांसजेंडर बहुचरा माता को भी अपनी मुख्य देवियों में से एक मानते हैं.उनका मानना है कि यह देवी उनकी संरक्षिका हैं और वे गुजरात में स्थित उनके मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं.उनका यह भी मानना है कि देवी के आशीर्वाद से उन्हें एक स्पष्ट लिंग प्राप्त होता है, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री.
मंजम्मा जोगती की आत्मकथा इतिहास,वर्तमान के विविध पड़ावों से होकर गुज़रती है.मंजम्मा ने जीवन में बहुत कुछ सहा,लेकिन अथक परिश्रम भी किया.आज ‘जोगती’ नृत्य शैली का जो स्वरूप हमारे सामने है उसके विकास में मंजम्मा का योगदान ऐतिहासिक है.मंजम्मा ने जोगती नृत्य में अपने -आप को खो दिया,वह दिन -रात नृत्य का अभ्यास करती,उसमें प्रयोग करती, उसकी नृत्य मंडली ने जल्द ही उसने कर्नाटक सरकार का ध्यान आकृष्ट कर लिया.जोगती नृत्य को येलम्मा के मेले की सीमा से निकाल कर उसे अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्रदान करने में मंजम्मा ने दिन -रात एक कर दिये.उनकी मंडली को सरकारी आमंत्रण मिलने लगे.मंजम्मा पूरे भारत में अपनी नृत्य मंडली के साथ ‘जोगती’ नृत्य का प्रदर्शन करतीं,प्रत्येक प्रदर्शन,पहले से कहीं और बेहतर होता जाता, मंजम्मा के जीवन का यह सबसे आश्वस्तिकारक दौर था .नृत्य और मंजम्मा,मंजम्मा और नृत्य,जोगती शैली फल -फूल रही थी.मंजम्मा को कई संस्थाएँ सम्मानित करतीं,अब समूह को किसी तरह की आर्थिक कठिनाई नहीं थी.रहने को आसरा और पहनने -ओढ़ने को पर्याप्त था.नृत्य शैली में तरह तरह के नये प्रयोगों ने विशेषज्ञों का ध्यान आकृष्ट किया.ऐसे में जोगप्पा ने मंजम्मा जोगती से विवाह का प्रस्ताव किया.पुरुष देह में बिंधी स्त्री की आत्मा के अब तक दबे -कुचले अरमान जाग उठे.विवाह हो गया.मंजम्मा ने जोगप्पा से प्रेम किया और जोगप्पा ने मंजम्मा की कमाई से. मंजम्मा ने आत्मकथा में बताया है कि कैसे उसके भीतर के प्रेम को यथार्थ की ठोस ज़मीन से टकराकर शेष हो जाने की नियति को स्वीकार करना पड़ा.जोगप्पा ने उससे नहीं, उसके पैसे के लालच में विवाह किया है,यह जानते ही देवी रेणुका की मूर्ति के सामने गिरकर मंजम्मा रोने लगी.लेकिन जल्द ही वह इस आडंबरपूर्ण संबंध के क्षीण तंतुओं को तोड़ कर आगे बढ़ गई.उसने तय कर लिया कि सहजीवन का भ्रम भी वह अब कभी नहीं पालेगी. स्त्री तभी तक विवश होती है जबतक भावना के वशीभूत होती है.मंजम्मा ने अब बुद्धि से सोचा , इस संबंध से बाहर निकल कर लोक कलाओं के विकास के लिए प्रयत्नशील कर्नाटक जनपद अकादमी की अध्यक्ष बनी.मंजम्मा को सामाजिक योगदान और जोगती नृत्य के विकास के लिए पद्मश्री पुरस्कार से नवाज़ा गया.अब वे नृत्य प्रशिक्षण का केंद्र चलाती हैं और अपने जैसे ट्रांसज़ेंडर लोगों की समस्याओं को सुलझाने एवं उनकी जीवन शैली में सुधार लाने के प्रयास करती हैं.
भारतीय स्त्री आत्मकथाओं के इन उदाहरणों से यह समझा जा सकता है कि हर पराधीनता के इतिहास में प्रतिरोध का इतिहास भी निहित होता है.यह भी कि प्रतिरोध सदैव पराधीनता का चिह्न या प्रमाण ही नहीं होता बल्कि यह‘भिन्‍नता’ का अमिट चिह्न भी होता है जो सत्ता को परिवर्तन का दरवाजा बन्द करने से सदा बरजता है. ज़रूरत है समाज और साहित्येतिहास की मुख्यधारा के बरक्स उनकी आवाजों को सुनने की ,उनके लिखे की दरारों के भीतर झाँककर समाज और समुदाय का यथार्थ चेहरा पहचानकर एक नए सिरे से समतावादी परिवार और समुदाय बनाने की ,जहाँ वे निर्भीकता से अपने अनुभव दूसरों के साथ साझा कर समाज के सांस्कृतिकरण की प्रक्रिया को बेहतर और परिष्कृत बना सकें . इन चुनौतियों से निपटने के लिए इंटरसेक्शनैलिटी के एक ऐसे प्रयोग की आवश्यकता है, जो सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों का सम्मान करे. भारत की पहचान राजनीति — जो व्यक्तिगत और सामूहिक अधिकारों के अंतर्संबंधों में निहित है — ऐसे ढाँचों की माँग करती है जो विविधता को समाहित करें, न कि स्थानीय वास्तविकताओं को मिटाएँ. इस प्रकार का दृष्टिकोण पश्चिमी सिद्धांतों के यांत्रिक प्रयोग से आगे बढ़कर, विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्यों के अनुरूप अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में सहायक हो सकता है.
……………………………………………………………………………………………………………………………………………………..

 

गरिमा श्रीवास्तव

शिक्षा: स्नातकोत्तर हिंदी साहित्य (हिन्दू कॉलेज) एम. फिल. एवं पीएच.डी.(दिल्ली विश्वविद्यालय)

रुचि अथवा विशेषज्ञता के क्षेत्र: स्त्रीवादी आलोचना, औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक भारतीय साहित्य
स्त्री-आत्मकथा लेखन, मौलिक लेखन -कथा एवं कथेतर गद्य

प्रकाशित पुस्तकें – ‘आउशवित्ज़: एक प्रेम कथा’ (उपन्यास), ‘देह ही देश : क्रोएशिया प्रवास डायरी’, नवजागरण और स्त्री प्रश्न , उपन्यास का समाजशास्त्र (संपादित) समेत लगभग बीस पुस्तकें और प्रतिमान, आलोचना, तद्भव, कथादेश, समालोचन, पहली बार आदि पत्रिकाओं में सौ से ज्यादा आलेख प्रकाशित.

सम्प्रति: प्रोफ़ेसर ,भारतीय भाषा केंद्र, भाषा साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
संपर्क: drsgarima@gmail.com

 

 


Discover more from रचना समय

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Categorized in: