कहानी फरवरी माह…जाती हुई ठंड के दिन हैं। रोज की तरह मैं गंगा घाट के किनारे बैठी हूं। उन घाटों से बहुत दूर…जहां शाम को आरती होती है। शुरू में उत्सुकता थी, तो जाती थी दशाश्वमेध घाट गंगा आरती देखने।…
निराला ने छंद में मानीख़ेज़ कविताएं लिखीं। छंद से मुक्ति भी निराला ने की। कविता और कवि ,निराला का कर्ज़ कभी चुका नहीं सकते।सो आज पहले उनकी ग़ज़लों को याद करते हैं।दोआब की परंपरा के वे अज़ीम शायर हैं…
आख़िरी मादा -नरेंद्र प्रताप सिंह उसने फुसफुसाकर कहा – उन्होंने रेशमी को पकड़ लिया है और अपने साथ ले गए ।देखने से ही उसके चेहरे पर घबराहट और भय का ऐसा लेप था कि समोध भी उलझन में पड़…
दो गज़ की दूरी -ममता कालिया पहले उन्होंने कुछ देर इस पर बहस की थी कि खाना यहीं कमरे में मंगवा लिया जाय या डाइनिंग हॉल में चला जाय। समिधा ने कहा, ‘यहीं मंगा लो। मुझे ज्यादा भूख नहीं। मैं…
नदी का तीसरा किनारा -मूल लेखक : जोआओ गुइमारेस रोसा -अनुवाद : सुशांत सुप्रिय पिता एक ज़िम्मेदार , भरोसे के क़ाबिल और व्यावहारिक आदमी थे । बचपन से ही वे ऐसे ही थे । जब मैंने पिता को जानने वाले…
