तरुण भटनागर का ‘ मामलुक ‘ उपन्यास इब्नबतूता की क़लम के ज़रिए बल्ख़ से लेकर दिल्ली के गुलाम बाज़ारों ,शाही महलों की हक़ीक़त और सत्ता संघर्ष का लेखा नहीं , बल्कि स्त्री – अस्मिता के लिए लड़ने वाले बादशाह – इल्तुतमिश – के सोच का स्मारक है। उपन्यास बहुत सारे क़िस्से कहानियों के बीहड़ों से गुज़रता एक स्त्री की साधारण कब्र पर ठहरता है। यह ठहराव  एक पितृसत्तात्मक सोच के ख़िलाफ़ एक आवाज़ है जिसे सुना जाना चाहिए। यह आवाज़ रज़िया सुल्तान की भी है जो सुल्ताना नहीं बनना चाहती थी।
डाॅ. कुमारी उर्वशी की क़लम को देखें, वह क्या कहती है।
– हरि भटनागर

 

इतिहास की धूल से मनुष्य की आवाज़ तक : ‘मामलुक’ ­_ डॉ. उर्वशी

तरुण भटनागर की राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित ‘मामलुक’ एक ऐसी ऐतिहासिक कृति है जिसमें सल्तनतों के उत्थान-पतन से अधिक महत्त्वपूर्ण है मनुष्य की गरिमा, सत्ता की क्रूरता, स्मृति की राजनीति और इतिहास के हाशिये पर छूट गई एक स्त्री की असाधारण उपस्थिति।

इतिहास को लिखना एक बात है और इतिहास के भीतर छूट गए मनुष्य को उसकी पूरी मानवीय जटिलता के साथ पुनः खोज निकालना दूसरी। पहली प्रक्रिया में तिथियाँ, घटनाएँ, युद्ध, वंशावलियाँ और सत्ता-परिवर्तन प्रमुख होते हैं; दूसरी प्रक्रिया में उन घटनाओं के पीछे छिपे हुए भय, अपमान, आकांक्षाएँ, मौन, प्रतिरोध और विस्मृत जीवन सामने आते हैं। ऐतिहासिक उपन्यास की वास्तविक उपलब्धि तभी सिद्ध होती है, जब वह अतीत का केवल पुनर्निर्माण न करे, बल्कि उस अतीत को देखने की हमारी दृष्टि का भी पुनर्निर्माण करे। उपन्यास ‘मामलुक’ इसी दूसरे अर्थ में एक उल्लेखनीय साहित्यिक हस्तक्षेप है।

‘मामलुक’ शब्द अपने भीतर ही एक गहरी ऐतिहासिक विडंबना समेटे हुए है। इसका संबंध गुलाम से है—उस मनुष्य से, जिसकी देह पर किसी दूसरे का अधिकार हो, जिसकी स्वतंत्र इच्छा को संपत्ति की तरह खरीदा-बेचा जा सके और जिसका जीवन किसी अन्य की सत्ता, सुविधा अथवा महत्त्वाकांक्षा के अधीन हो। लेकिन इतिहास की विडंबना देखिए कि गुलामी की इसी व्यवस्था से निकला एक व्यक्ति दिल्ली की सल्तनत का सुल्तान बनता है। वह व्यक्ति है शम्सुद्दीन इल्तुतमिश, जिसके जीवन-संघर्ष के माध्यम से यह उपन्यास सत्ता, स्वाधीनता, योग्यता और मनुष्यता के पारस्परिक संबंधों को समझने का अवसर प्रदान करता है।

लेकिन इस कृति का महत्त्व केवल इल्तुतमिश की असाधारण जीवन-यात्रा को पुनः प्रस्तुत करने में नहीं है। इसकी वास्तविक विशिष्टता इस बात में निहित है कि इल्तुतमिश के जीवन को केंद्र में रखते हुए भी यह उसके व्यक्तित्व की परिधि से बाहर निकलकर एक पूरे युग का सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और नैतिक भूगोल निर्मित करती है। बल्ख से दिल्ली तक, गुलामी के व्यापार से राजसत्ता के गलियारों तक, शाही हरम से युद्धभूमि तक और जीवित सत्ता-संरचनाओं से खंडहरों में बदल चुकी ऐतिहासिक स्मृतियों तक फैला इसका संसार पाठक को मध्यकालीन इतिहास की एक विस्तृत चित्रदीर्घा में ले जाता है।

इस चित्रदीर्घा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि यहाँ इतिहास केवल विजेताओं की उपलब्धियों का विवरण नहीं है। यहाँ पराजित भी हैं, विस्थापित भी; गुलाम भी हैं, बादशाह भी; षड्यंत्रकारी भी हैं, विवेकशील मनुष्य भी; और सबसे बढ़कर वे स्त्रियाँ भी हैं, जिनकी क्षमताओं को स्वीकार करने के बावजूद पितृसत्तात्मक सत्ता-संरचना उन्हें बराबरी का अधिकार देने से कतराती है। इस अर्थ में ‘मामलुक’ अतीत का आख्यान होने के साथ-साथ वर्तमान की सत्ता-चेतना, सामाजिक पूर्वग्रहों और मानवीय स्वतंत्रता के प्रश्नों से संवाद करती हुई कृति भी है।

उपन्यास की कथावस्तु का केंद्रीय आधार इल्तुतमिश का जीवन है, किंतु इसका विस्तार उसके जन्म, संघर्ष, सत्ता-प्राप्ति और मृत्यु तक सीमित नहीं रहता। कथा बल्ख में इलाम के परिवार से आरंभ होती है, जहाँ युद्ध को जीवन का सामान्य और अनिवार्य हिस्सा मानने वाली सामाजिक मानसिकता के बीच इलाम जैसा अमनपसंद व्यक्ति अपनी अलग मानवीय दृष्टि के कारण असहज बना रहता है। युद्ध से उसकी असहमति केवल व्यक्तिगत भय नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के प्रति एक नैतिक प्रश्न है, जिसने हिंसा को सामान्य जीवन-मूल्य में बदल दिया है।

इलाम का यह परिवेश आगे चलकर इल्तुतमिश के जीवन-संघर्ष की पृष्ठभूमि बनता है। पारिवारिक ईर्ष्या और षड्यंत्र के कारण उसे गुलामी की ओर धकेल दिया जाता है। उसका जीवन एक ऐसे कठिन सफर में प्रवेश करता है, जहाँ मनुष्य की योग्यता, स्वाभिमान और अस्तित्व लगातार परीक्षा से गुजरते हैं। वह जिस व्यवस्था में प्रवेश करता है, वहाँ मनुष्य का मूल्य उसकी स्वतंत्र सत्ता से नहीं, बल्कि उसके उपयोग, सामर्थ्य और संभावित लाभ से तय होता है।

यहीं से उपन्यास गुलामी की व्यवस्था के अनेक स्तरों को उद्घाटित करता है। गुलामों की खरीद-बिक्री, युद्धों में उजड़े परिवार, बेसहारा बच्चों और स्त्रियों का व्यापार, शक्तिशाली लोगों की आवश्यकताओं के अनुरूप मनुष्यों का वर्गीकरण—ये सभी प्रसंग बताते हैं कि गुलामी केवल किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत नियति नहीं थी, बल्कि एक संगठित आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था थी। सैफुद्दीन जैसे गुलाम-व्यापारी इस व्यवस्था के उस क्रूर व्यावसायिक चेहरे का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें युद्ध दूसरों के लिए विनाश है तो कुछ लोगों के लिए लाभ कमाने का अवसर।

इल्तुतमिश की यात्रा इसी अमानवीय व्यवस्था के बीच उसकी योग्यता और व्यक्तित्व के विकास की यात्रा है। वह अपमान और यातना के बीच टूटता नहीं, बल्कि अपने अनुभवों से अधिक सजग होता जाता है। उसकी उन्नति इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि वह अपनी जन्मगत स्थिति से ऊपर उठकर अपनी क्षमता के बल पर प्रतिष्ठा अर्जित करता है। लेकिन उपन्यास इस उपलब्धि को किसी सरल प्रेरक कथा में नहीं बदलता। यहाँ सत्ता तक पहुँचने का रास्ता संघर्ष, असुरक्षा, षड्यंत्र, हिंसा और निरंतर बदलते राजनीतिक समीकरणों से होकर गुजरता है।

दिल्ली पहुँचने के बाद कथा का संसार और अधिक विस्तृत हो जाता है। कुतुबुद्दीन ऐबक का दरबार, शाही महल, सैनिक व्यवस्था, अमीरों की प्रतिस्पर्धा, गुलामों के बीच संबंध, प्रशासनिक पदों की जटिलता और सत्ता के लिए चलने वाली गुप्त चालें—ये सब मिलकर उस समय की राजनीतिक संरचना को मूर्त करते हैं। यहाँ सत्ता किसी एक व्यक्ति की निजी उपलब्धि नहीं रह जाती; वह अनेक हितों, निष्ठाओं, भय, महत्त्वाकांक्षाओं और षड्यंत्रों के बीच लगातार निर्मित और विघटित होने वाली व्यवस्था बन जाती है।

इल्तुतमिश के सुल्तान बनने के बाद भी संघर्ष समाप्त नहीं होता। उसके सामने एक ओर राज्य को संगठित करने और अमीरों की स्वेच्छाचारिता पर नियंत्रण स्थापित करने की चुनौती है, दूसरी ओर उत्तराधिकार का प्रश्न है। इसी बिंदु पर उपन्यास का एक महत्त्वपूर्ण नैतिक और राजनीतिक केंद्र सामने आता है—रज़िया।

रज़िया का व्यक्तित्व इस उपन्यास में केवल इल्तुतमिश की पुत्री के रूप में उपस्थित नहीं है। वह एक स्वतंत्र राजनीतिक चेतना, साहस, निर्णय-क्षमता और नेतृत्व की आकांक्षा से संपन्न चरित्र है। उसका अपने लिए ‘सुल्ताना’ के बजाय ‘सुल्तान’ कहलाना पसंद करना केवल शब्द-चयन नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था के विरुद्ध एक वैचारिक घोषणा है, जो सत्ता के अधिकार को पुरुष होने की शर्त से जोड़ती है।

इल्तुतमिश की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार की राजनीति, शाह तुर्कान की महत्त्वाकांक्षाएँ, रुकनुद्दीन की ताजपोशी, अमीरों के षड्यंत्र, रज़िया का संघर्ष और अंततः उसकी सत्ता-प्राप्ति कथा को एक तीव्र राजनीतिक नाटकीयता प्रदान करते हैं। लेकिन उपन्यास की दृष्टि केवल तख्त पर कौन बैठा, इस प्रश्न तक सीमित नहीं है। वह यह भी देखता है कि तख्त तक पहुँचने के लिए किसे कितनी बाधाओं से गुजरना पड़ा, किसके पक्ष में संस्थाएँ खड़ी हुईं और किसके विरुद्ध सामाजिक पूर्वग्रहों ने काम किया।

रज़िया की कथा इस प्रकार इल्तुतमिश के जीवन का परिशिष्ट नहीं, बल्कि उपन्यास के व्यापक वैचारिक आशय का विस्तार बन जाती है। गुलाम इल्तुतमिश का सुल्तान बनना और स्त्री रज़िया का सुल्तान कहलाने का अधिकार माँगना—दोनों प्रसंग जन्म, लिंग और सामाजिक स्थिति के आधार पर निर्धारित सत्ता-संबंधों पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

इस तरह ‘मामलुक’ की कथावस्तु एक व्यक्ति की उन्नति से आरंभ होकर एक पूरे युग की राजनीतिक और सामाजिक संरचना की पड़ताल करती है। इसकी कथा का वास्तविक विस्तार घटनाओं की संख्या में नहीं, बल्कि उन घटनाओं से उत्पन्न होने वाले प्रश्नों की व्यापकता में है।

‘मामलुक’ की संरचना पर विचार करते समय इसकी सात किताबों में विभाजित योजना को विशेष महत्त्व देना आवश्यक है। यह विभाजन केवल कथा को सात हिस्सों में बाँट देने की यांत्रिक व्यवस्था नहीं है। इसके भीतर एक ऐसे विस्तृत ऐतिहासिक आख्यान को क्रमबद्ध करने की चुनौती दिखाई देती है, जिसमें अनेक कालखंड, भौगोलिक स्थल, राजनीतिक घटनाएँ, पात्रों के निजी जीवन, प्रशासनिक विवरण और सांस्कृतिक संदर्भ एक-दूसरे से जुड़ते हुए आगे बढ़ते हैं।

सात किताबों की संरचना उपन्यास को एक प्रकार की बहुस्तरीयता प्रदान करती है। पाठक किसी एक पात्र के साथ लगातार चलने के बजाय कभी उसके निजी संसार में प्रवेश करता है, कभी सत्ता के गुप्त गलियारों में पहुँचता है, कभी बाजार की सामाजिक वास्तविकताओं को देखता है और कभी वर्षों बाद उन्हीं घटनाओं की स्मृति को किसी दूसरे समय में पुनः सक्रिय होते हुए अनुभव करता है। इस प्रकार प्रत्येक किताब कथा के किसी नए पक्ष को सामने लाने के साथ-साथ पूर्ववर्ती प्रसंगों के अर्थ को भी बदलने की क्षमता रखती है।

इस संरचना की एक उल्लेखनीय विशेषता इसके छोटे-छोटे उपशीर्षक हैं। ‘बल्ख’, ‘सैफुद्दीन’, ‘अशर्फियाँ, फ़क़ीर और अंगूर’, ‘पुरानी लश्करगाह की मेहराबदार निशानियाँ’, ‘शहज़ादी’, ‘हाथी, अफ़ीम और शहज़ादा’, ‘आख़िरी तीन’, ‘तीसरी मंज़िल’, ‘शिकारगाह’, ‘फ़िरोज़ी’ और ‘घात’ जैसे शीर्षक अपने भीतर किसी स्थान, पात्र, वस्तु, घटना अथवा मनःस्थिति की ओर संकेत करते हैं।

इन शीर्षकों का महत्त्व केवल पाठक को प्रसंग की जानकारी देना नहीं है। वे कथा के प्रवेश-द्वार की तरह काम करते हैं। ‘बल्ख’ भूगोल और इतिहास का द्वार खोलता है, ‘सैफुद्दीन’ गुलामी के व्यापार के पीछे सक्रिय आर्थिक क्रूरता को सामने लाता है, ‘शहज़ादी’ स्त्री की राजनीतिक उपस्थिति को केंद्र में रखता है और ‘आख़िरी तीन’ मृत्यु के निकट खड़े सुल्तान तथा उसके विश्वासपात्रों के बीच संबंधों को भावनात्मक गहराई देता है।

‘अशर्फियाँ, फ़क़ीर और अंगूर’ जैसे शीर्षक में तो एक प्रकार की कथात्मक जिज्ञासा भी निहित है। अशर्फी आर्थिक मूल्य का संकेत है, फ़क़ीर सामाजिक और आध्यात्मिक स्थिति का, जबकि अंगूर रोजमर्रा की सामान्य इच्छा का। तीनों को एक साथ रखकर शीर्षक जीवन के अलग-अलग स्तरों के बीच एक अप्रत्याशित संबंध निर्मित करता है।

इसी तरह ‘पुरानी लश्करगाह की मेहराबदार निशानियाँ’ शीर्षक इतिहास को उसके भौतिक अवशेषों में खोजने की दृष्टि प्रदान करता है। मेहराब, खंडहर, गुम्बद और पुरानी इमारतें यहाँ केवल स्थापत्य नहीं हैं; वे बीते हुए समय की मूक साक्षी हैं। उनकी टूटन में किसी सभ्यता का बीतना, सत्ता का बदलना और स्मृति का धीरे-धीरे मिटना दर्ज है।

उपन्यास में शीर्षकों की यह विविधता उसके व्यापक कथात्मक संसार के अनुकूल है। हर प्रसंग को किसी बड़ी घटना की अनिवार्य कड़ी बनाकर ही प्रस्तुत नहीं किया गया है; कुछ प्रसंग स्वतंत्र जीवन-अनुभव की तरह सामने आते हैं, लेकिन आगे चलकर उनका संबंध उपन्यास के केंद्रीय प्रश्नों से जुड़ जाता है।

इस प्रकार सात किताबों और छोटे-छोटे उपशीर्षकों की संरचना ‘मामलुक’ को एक ऐसी कथा-रचना में बदलती है, जिसमें इतिहास रैखिक गति से आगे बढ़ने के बजाय स्मृति, पुनरावृत्ति, प्रसंगांतर और दृष्टिकोण-परिवर्तन के माध्यम से अपना अर्थ अर्जित करता है।

ऐतिहासिक उपन्यास के मूल्यांकन में सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह होता है कि लेखक इतिहास का उपयोग किस प्रकार करता है। क्या वह इतिहास की घटनाओं को साहित्यिक भाषा में दोहराता है, क्या वह ऐतिहासिक तथ्यों के बीच काल्पनिक प्रसंगों को जोड़कर एक रोचक कथा बनाता है, अथवा वह इतिहास के उपलब्ध वृत्तांतों के भीतर मौजूद रिक्तियों को पहचानकर अतीत की नई व्याख्या करता है?

‘मामलुक’ की उपलब्ध सामग्री के आधार पर इसकी प्रमुख प्रवृत्ति तीसरी दिशा में दिखाई देती है। यह इल्तुतमिश और रज़िया जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को केवल राजवंशीय घटनाओं के संदर्भ में नहीं देखता, बल्कि उनके समय की सामाजिक मानसिकता, प्रशासनिक ढाँचे, आर्थिक संबंधों, धार्मिक-सांस्कृतिक वातावरण और लैंगिक असमानताओं के बीच रखकर समझने का प्रयास करता है।

बल्ख का चित्रण इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। वहाँ युद्ध को सामान्य जीवन का हिस्सा मानने वाली मानसिकता और इलाम की अमनपसंद दृष्टि के बीच टकराव है। युद्ध केवल मैदान में लड़ी जाने वाली लड़ाई नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना में गहरे पैठी हुई एक मान्यता भी है। इलाम का चरित्र इसी मान्यता के विरुद्ध खड़ा होता है। उसकी असहमति हमें यह सोचने के लिए विवश करती है कि किसी ऐतिहासिक समाज में शांति की इच्छा रखने वाला व्यक्ति भी किस प्रकार असामान्य और संदेहास्पद माना जा सकता है।

उपन्यास का ऐतिहासिक विस्तार मध्य एशिया, बल्ख, बुखारा, तूरान, लाहौर और दिल्ली जैसे स्थानों को जोड़ता है। यह भौगोलिक विस्तार इल्तुतमिश की व्यक्तिगत यात्रा को व्यापक ऐतिहासिक गतिशीलता से जोड़ता है। युद्ध, विस्थापन, गुलामी और राजनीतिक सत्ता का प्रसार किसी एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं रह जाता; वे एक-दूसरे से जुड़े हुए क्षेत्रों की साझा वास्तविकता बन जाते हैं।

गुलामों के व्यापार का चित्रण इस ऐतिहासिक संदर्भ का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष है। सैफुद्दीन जैसे व्यापारी युद्ध से तबाह हुए इलाकों में बेसहारा मनुष्यों को खोजते हैं, उन्हें आश्रय देते हैं और फिर बेच देते हैं। यहाँ आश्रय और शोषण के बीच एक भयावह संबंध उपस्थित है। जिस व्यवस्था में मनुष्य को खरीदना और बेचना संभव हो, वहाँ दया भी आर्थिक लेन-देन के अधीन हो सकती है। उपन्यास इस व्यवस्था को केवल एक ऐतिहासिक प्रथा के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्य को वस्तु में बदल देने वाली मानसिकता के रूप में प्रस्तुत करता है।

दिल्ली का चित्रण भी केवल राजधानी के वैभव तक सीमित नहीं है। शाही महलों, हाथियों, मस्जिदों, लश्करगाहों, बाजारों, सरायों, मदरसों, प्रशासनिक पदों और गुलाम बाजारों के बीच उपन्यास एक ऐसा नगर निर्मित करता है, जिसमें सत्ता का वैभव और आम जीवन की असुरक्षा साथ-साथ मौजूद हैं।

विशेष रूप से दिल्ली के गुलाम बाजार और मंगोलपुरी से संबंधित प्रसंग ऐतिहासिक शहर की सामाजिक संरचना को देखने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान करते हैं। अबू तालिब के माध्यम से यह विचार सामने आता है कि शत्रु माने जाने वाले मंगोल भी भूख, परिवार, घर और जीवन की सामान्य इच्छाओं से युक्त मनुष्य हैं। किसी समुदाय को राजनीतिक शत्रु घोषित कर देने से उसकी मानवीय आवश्यकताएँ समाप्त नहीं हो जातीं। इस दृष्टि से उपन्यास सामूहिक पहचान और व्यक्तिगत मनुष्यता के बीच एक आवश्यक अंतर स्थापित करता है।

इसी तरह दिल्ली की पुरानी इमारतों, उजड़े मकानों, खंडहरों और ऐतिहासिक स्थलों का वर्णन इतिहास की भौतिक स्मृति को सामने लाता है। सत्ता बदल जाती है, राजवंश समाप्त हो जाते हैं और महल खंडहर बन जाते हैं, लेकिन उन स्थानों में कभी घटित हुए जीवन की छाप पूरी तरह मिटती नहीं। पुरानी दिल्ली के बारे में अबू तालिब का कथन—कि शहर सुल्तान बसाते हैं, लेकिन उसे आबाद लोग करते हैं—उपन्यास की ऐतिहासिक दृष्टि का एक सारगर्भित सूत्र बन जाता है।

यहाँ इतिहास का केंद्र केवल शासक नहीं, बल्कि शहर में रहने वाले लोग भी हैं। उनके बाजार, दस्तरख्वान, आवाजें, मेहमाननवाजी, प्रेम, रोजमर्रा के श्रम और जीवन की छोटी-छोटी लयें भी ऐतिहासिक अनुभव का हिस्सा हैं।

हालाँकि ऐतिहासिक प्रामाणिकता के प्रश्न पर एक सावधानी आवश्यक है। प्रस्तुत अंशों में ऐतिहासिक तथ्यों, प्रचलित आख्यानों, लोकवृत्तों और लेखक की कल्पनात्मक पुनर्रचना का सम्मिश्रण दिखाई देता है। किसी उपन्यास में संवाद, निजी मनःस्थितियाँ, गुप्त षड्यंत्र और पात्रों की अंतरंग प्रतिक्रियाएँ साहित्यिक कल्पना के माध्यम से निर्मित हो सकती हैं। इसलिए हर प्रसंग को स्वतः प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य मान लेना उचित नहीं होगा। ऐतिहासिक विवरणों की अंतिम पुष्टि के लिए समकालीन स्रोतों और इतिहासकारों के शोध से तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है।

फिर भी साहित्यिक स्तर पर महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कल्पना इतिहास के मूल संदर्भों को किस प्रकार अर्थवान बनाती है। ‘मामलुक’ की विशिष्टता इस प्रयास में है कि वह ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को स्मारकीय स्थिरता से निकालकर उनके समय की जटिलताओं में रखता है और अतीत को मानवीय अनुभव की जीवित भूमि पर पुनर्स्थापित करता है।

किसी ऐतिहासिक उपन्यास की सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उसमें कितने ऐतिहासिक पात्र उपस्थित हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि वे पात्र अपने समय, अपनी परिस्थितियों और अपने अंतर्विरोधों के साथ कितने जीवंत होकर सामने आते हैं। ‘मामलुक’ की चरित्र-सृष्टि का महत्त्व इसी बिंदु पर रेखांकित किया जाना चाहिए। इसके पात्र इतिहास के पन्नों से उठाकर कथा में रख दिए गए नाम मात्र नहीं हैं; वे अलग-अलग मानसिकताओं, सामाजिक संरचनाओं, राजनीतिक आकांक्षाओं और नैतिक प्रश्नों के प्रतिनिधि बनकर उभरते हैं।

उपन्यास का केंद्रीय चरित्र इल्तुतमिश है, लेकिन लेखक उसके सुल्तान बनने की उपलब्धि को ही उसकी संपूर्ण पहचान नहीं बनाता। उसकी यात्रा के भीतर एक ऐसे मनुष्य की संघर्षगाथा है, जिसे परिस्थितियाँ बार-बार उसकी इच्छाओं के विरुद्ध धकेलती हैं, फिर भी वह अपने व्यक्तित्व को परिस्थितियों के हाथों पूरी तरह समर्पित नहीं करता।

उसकी गुलामी का प्रसंग केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि मनुष्य की स्वतंत्रता छीन लिए जाने की त्रासदी है। परिवार के भीतर ईर्ष्या और षड्यंत्र का शिकार होकर एक युवा व्यक्ति का गुलामों के बाजार तक पहुँच जाना इस तथ्य को उद्घाटित करता है कि हिंसा और अन्याय केवल बाहरी शत्रुओं से नहीं आते; कभी-कभी वे अपने ही सामाजिक और पारिवारिक परिवेश से जन्म लेते हैं।

इल्तुतमिश की उपलब्धि यह है कि वह गुलामी के अनुभव को अपनी अंतिम पहचान नहीं बनने देता। उसकी योग्यता, धैर्य, राजनीतिक समझ और नेतृत्व-क्षमता उसे आगे बढ़ाती है। लेकिन उसकी यात्रा का वास्तविक महत्त्व केवल इस बात में नहीं है कि एक गुलाम सुल्तान बन जाता है। अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि इस यात्रा के माध्यम से उपन्यास सामाजिक प्रतिष्ठा, जन्मगत श्रेष्ठता और सत्ता के अधिकार के संबंधों को प्रश्नांकित करता है।

इल्तुतमिश के व्यक्तित्व का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष उसकी राजनीतिक व्यावहारिकता है। उसे अपने समय की सत्ता-संरचना का सामना करना पड़ता है, जहाँ योग्यता के साथ-साथ षड्यंत्र, सैन्य शक्ति, व्यक्तिगत निष्ठा और राजनीतिक समझ भी निर्णायक हैं। इस कारण उसका चरित्र किसी आदर्शवादी नायक की एकरेखीय छवि ग्रहण नहीं करता, बल्कि सत्ता की कठिन वास्तविकताओं के बीच विकसित होता है।

उसके जीवन का सबसे संवेदनशील पक्ष उसके अंतिम समय में सामने आता है। जब वह अपने विश्वासपात्र गुलामों को बुलाकर रज़िया के समर्थन में लड़ने का वचन माँगता है, तब एक सुल्तान की राजनीतिक दूरदर्शिता के साथ एक पिता की चिंता भी सामने आती है। वह जानता है कि उसकी मृत्यु के बाद सत्ता का संघर्ष केवल उत्तराधिकार का प्रश्न नहीं रहेगा; उसमें उसकी पुत्री के अधिकार और उसके जीवन की सुरक्षा भी दाँव पर होगी।

यह प्रसंग इल्तुतमिश के चरित्र को एक मानवीय गहराई प्रदान करता है। वह अपनी पुत्री की योग्यता पहचानता है, लेकिन साथ ही उस व्यवस्था की कठोरता से भी परिचित है जिसमें योग्यता का स्वीकार और अधिकार का हस्तांतरण दो अलग बातें हैं।

रज़िया का चरित्र उपन्यास की वैचारिक उपलब्धियों में सबसे महत्त्वपूर्ण है। मध्यकालीन इतिहास में रज़िया सुल्तान का नाम अपने आप में एक असाधारण राजनीतिक उपस्थिति का संकेत है, लेकिन यहाँ उसका महत्त्व केवल इसलिए नहीं है कि वह दिल्ली की सत्ता पर बैठने वाली स्त्री थी। वह इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि उसके व्यक्तित्व के माध्यम से उपन्यास उस मानसिकता का सामना करता है, जो स्त्री की योग्यता को स्वीकार करने के बावजूद उसके अधिकार को सहज रूप से स्वीकार नहीं कर पाती।

रज़िया का ‘सुल्ताना’ नहीं, ‘सुल्तान’ कहलाना पसंद करना उसके आत्मबोध का प्रतीक है। वह अपने लिए ऐसी पहचान नहीं चाहती, जो सत्ता के अधिकार को पहले ही लिंग के आधार पर सीमित कर दे। वह किसी पुरुष शासक की कृपा से प्राप्त असाधारण स्थान की आकांक्षी नहीं, बल्कि अपने सामर्थ्य के आधार पर शासन करने का अधिकार चाहती है।

जुल्फिकार के साथ उसका प्रसंग इस संघर्ष को अत्यंत स्पष्ट रूप से सामने लाता है। जुल्फिकार उसके पहनावे और सैन्य सक्रियता पर आपत्ति करता है, क्योंकि उसे लगता है कि एक स्त्री का जंगजू होना दूसरी स्त्रियों के लिए भी स्थापित मर्यादाओं को चुनौती देगा। इस प्रकार रज़िया का विरोध केवल एक व्यक्ति का विरोध नहीं है; वह उस सामाजिक व्यवस्था का प्रतिरोध है, जो स्त्री के व्यवहार, वेशभूषा और सार्वजनिक उपस्थिति के लिए अलग नियम निर्धारित करती है।

रज़िया की शक्ति इस बात में है कि वह अपने समय के पुरुष-प्रधान राजनीतिक संसार में स्वयं को केवल अपवाद के रूप में प्रस्तुत नहीं करती। वह अपने अधिकार को राजनीतिक तर्क और अपनी क्षमता के आधार पर स्थापित करना चाहती है।

उसके चरित्र में साहस के साथ संशय भी है। अल्तूनिया से संवाद करते हुए जब वह पूछती है कि वह उसका साथ एक प्रेमी की तरह देगा या सल्तनत के एक सिपहसालार की तरह, तब यह प्रश्न उसकी राजनीतिक चेतना की जटिलता को प्रकट करता है। उसे मालूम है कि निजी प्रेम और सार्वजनिक निष्ठा एक ही नहीं होते। सत्ता की दुनिया में भावनाएँ भी राजनीतिक निर्णयों से अलग नहीं रह पातीं।

इस प्रकार रज़िया एक साथ स्त्री, प्रेमिका, शासक और संघर्षशील मनुष्य है। उसका व्यक्तित्व किसी एक पहचान में सीमित नहीं होता।

शाह तुर्कान का चरित्र रज़िया के चरित्र का महत्त्वपूर्ण प्रतिपक्ष निर्मित करता है। वह भी सत्ता की आकांक्षा से प्रेरित है, लेकिन उसके सत्ता-संघर्ष के साधन षड्यंत्र, अफवाह, प्रभाव-निर्माण और राजनीतिक अवसरवाद हैं।

इल्तुतमिश की बीमारी और उत्तराधिकार को लेकर अफवाहें फैलवाने के प्रसंग में उसकी राजनीतिक समझ सामने आती है। वह जानती है कि सत्ता केवल तलवार से नहीं, बल्कि लोगों की धारणाओं को प्रभावित करके भी प्राप्त की जा सकती है। इस कारण उसका चरित्र केवल क्रूरता का पर्याय नहीं है; वह उस राजनीति का प्रतिनिधित्व करता है, जो जनमत, भय और सूचना को अपने हित में इस्तेमाल करती है।

शाह तुर्कान का रज़िया से संघर्ष एक स्त्री बनाम पुरुष का संघर्ष नहीं, बल्कि दो भिन्न राजनीतिक दृष्टियों का संघर्ष भी है। इससे उपन्यास स्त्री-पात्रों को किसी एक नैतिक श्रेणी में रखने से बचता है। स्त्री होना अपने आप में न्यायप्रिय होने की गारंटी नहीं है, ठीक उसी तरह जैसे पुरुष होना अपने आप में राजनीतिक योग्यता का प्रमाण नहीं है।

यहाँ लेखक की चरित्र-दृष्टि उल्लेखनीय है। स्त्री-सत्ता की चर्चा करते हुए भी वह स्त्रियों को एकसमान चरित्र के रूप में प्रस्तुत नहीं करता। उनमें महत्त्वाकांक्षा, साहस, छल, विवेक और प्रतिरोध की अलग-अलग संभावनाएँ मौजूद हैं।

इलाम उपन्यास के आरंभ में उपस्थित होकर भी अपनी वैचारिक उपस्थिति को व्यापक अर्थ प्रदान करता है। वह ऐसे समय का व्यक्ति है, जब युद्ध को पुरुषार्थ, राष्ट्रनिष्ठा और सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है। उसके लिए युद्ध की मुखालफत करना इसलिए कठिन है कि समाज उसकी असहमति को नैतिक दृष्टि से समझने के बजाय कमजोरी मानता है।

इलाम का चरित्र उपन्यास की युद्ध-विरोधी चेतना का आधार है। वह बताता है कि किसी समाज में प्रचलित मान्यता और नैतिक सत्य हमेशा एक नहीं होते। कोई विचार बहुसंख्यक लोगों द्वारा स्वीकार कर लिया जाए, इससे उसकी मानवीय वैधता स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती।

सैफुद्दीन गुलामी की व्यवस्था को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण पात्र है। युद्ध से उजड़े परिवारों, बेसहारा बच्चों और विस्थापित लोगों को खोजकर उन्हें बेचने वाला यह व्यापारी उस आर्थिक तंत्र का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें मानवीय विपत्ति भी व्यापार का अवसर बन जाती है।

उसके चरित्र के माध्यम से उपन्यास यह दिखाता है कि किसी अमानवीय व्यवस्था को केवल व्यक्तिगत क्रूरता के सहारे नहीं समझा जा सकता। उसके पीछे बाजार, माँग, खरीदार, सत्ता और लाभ का एक पूरा ढाँचा होता है।

उपन्यास में अबू तालिब, इब्न बतूता और इब्न जुजाय्यु जैसे पात्रों की उपस्थिति कथा को एक अतिरिक्त बौद्धिक स्तर प्रदान करती है।

इब्न बतूता का दिल्ली में आना और वर्षों बाद मोरक्को में उसके यात्रा-वृत्तांत का लिखा जाना कथा के भीतर एक ऐसा समयगत विस्तार पैदा करता है, जिसमें घटना और उसके लेखन के बीच दूरी दिखाई देती है। इब्न जुजाय्यु के माध्यम से यह प्रश्न भी उभरता है कि इतिहास किसके कहने पर लिखा जाता है, किसकी बातें दर्ज होती हैं और किसका नाम जानबूझकर छिपा लिया जाता है।

अबू तालिब पुरानी दिल्ली के खंडहरों, बाजारों और जीवन की स्मृतियों को सामने लाने वाला पात्र है। वह शहर को केवल शासकों की निर्मिति नहीं मानता। उसके लिए शहर की असली पहचान वहाँ के लोगों, उनकी आवाजों, उनकी आजीविका और उनके संबंधों में निहित है।

इन पात्रों के माध्यम से उपन्यास का ऐतिहासिक संसार एक अधिक जटिल अर्थ ग्रहण करता है। इतिहास केवल वह नहीं है जो घटित हुआ; वह भी है जिसे याद रखा गया, जिसे सुनाया गया और जिसे लिखते समय छिपा लिया गया।

कुतुबुद्दीन ऐबक, बलबन, कबीर खान, अल्तूनिया, याकूत, जुल्फिकार, जुनैदी और अन्य अमीरों, गुलामों, सैनिकों तथा दरबारी अधिकारियों की उपस्थिति कथा को बहुस्तरीय बनाती है। इनमें से प्रत्येक पात्र सत्ता के किसी न किसी संबंध को उजागर करता है—निष्ठा, अवसरवाद, वर्चस्व, प्रतिरोध, व्यक्तिगत संबंध अथवा संस्थागत शक्ति।

इन सभी पात्रों का महत्त्व समान स्तर पर नहीं है, लेकिन सामूहिक रूप से वे उपन्यास के संसार को एकल नायक की कथा से आगे ले जाते हैं। वे बताते हैं कि इतिहास कुछ असाधारण व्यक्तियों के कार्यों से अवश्य प्रभावित होता है, लेकिन उसका निर्माण अनेक ऐसे लोगों के श्रम, भय, विश्वास और संघर्ष से भी होता है, जिनके नाम इतिहास में सुरक्षित नहीं रह पाते।

‘मामलुक’ की समीक्षा में स्त्री-विमर्श को अलग से रेखांकित करना आवश्यक है, क्योंकि रज़िया का चरित्र केवल उपन्यास की कथात्मक आवश्यकता नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक संरचना का केंद्रीय आधार भी है।

इतिहास में स्त्रियों की उपस्थिति अक्सर दो विरोधी रूपों में दिखाई देती है—या तो वे सत्ता की परिधि में स्थित निष्क्रिय पात्र होती हैं, या फिर असाधारण परिस्थितियों में सत्ता प्राप्त करने वाली ऐसी महिलाएँ, जिन्हें उनकी असाधारणता के कारण सामान्य सामाजिक संरचना से अलग रखकर देखा जाता है। ‘मामलुक’ इस प्रश्न को अधिक जटिल बनाता है।

रज़िया के लिए समस्या केवल तख्त प्राप्त करना नहीं है। समस्या यह भी है कि उसके तख्त पर बैठने की संभावना को समाज किस रूप में देखता है। पुरुष शासक का युद्ध में जाना उसकी राजनीतिक भूमिका का हिस्सा माना जाता है, लेकिन रज़िया का युद्धभूमि से जुड़ना सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन समझा जाता है। पुरुष का सार्वजनिक जीवन उसकी सत्ता का प्रमाण बनता है, जबकि स्त्री की सार्वजनिक सक्रियता उसके चरित्र और पहनावे पर बहस का विषय बन जाती है।

जुल्फिकार का रज़िया को जनाना कपड़ों में लौट जाने के लिए कहना इसी दोहरे मानदंड का प्रतिनिधित्व करता है। उसका तर्क यह है कि रज़िया की स्वतंत्रता दूसरी स्त्रियों पर बुरा प्रभाव डालेगी। यह कथन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ स्त्री की स्वतंत्रता का विरोध केवल उसके अपने व्यवहार तक सीमित नहीं रहता; उसे सामाजिक अनुशासन बनाए रखने के नाम पर नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है।

उपन्यास का स्त्री-विमर्श इसी नियंत्रणकारी मानसिकता को उजागर करता है। वह यह प्रश्न उठाता है कि क्या स्त्री की योग्यता को मान्यता देने के लिए उसे पहले स्त्री होने की सामाजिक अपेक्षाओं से मुक्त होना आवश्यक है? और यदि कोई स्त्री इन अपेक्षाओं को स्वीकार नहीं करती, तो क्या उसका राजनीतिक अधिकार समाप्त हो जाता है?

इल्तुतमिश का रज़िया को उत्तराधिकारी के रूप में देखने का निर्णय इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है। वह अपनी पुत्री की योग्यता पहचानता है, लेकिन उसके बाद की राजनीतिक घटनाएँ बताती हैं कि किसी व्यक्ति की योग्यता को स्वीकार करना और सामाजिक व्यवस्था द्वारा उसके अधिकार को स्वीकार किया जाना अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।

इस दृष्टि से रज़िया की कथा मध्यकालीन संदर्भ में स्थित होते हुए भी आधुनिक स्त्री-अस्मिता के प्रश्नों से संवाद करती है। यह समकालीन विचारों को अतीत पर यांत्रिक ढंग से आरोपित करने के बजाय उस ऐतिहासिक परिस्थिति के भीतर स्त्री के अधिकार की कठिनाइयों को समझने का प्रयास करती है।

यहाँ एक और उल्लेखनीय पक्ष है। उपन्यास में स्त्रियों को केवल पीड़ित अथवा करुणा की पात्र के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। शाह तुर्कान जैसी स्त्री सत्ता के षड्यंत्रों में सक्रिय है; रज़िया राजनीतिक नेतृत्व और प्रतिरोध का प्रतिनिधित्व करती है; अन्य स्त्रियाँ सामाजिक संरचनाओं के भीतर अपने-अपने ढंग से जीवन जीती हैं। इससे स्त्री-पात्रों की विविधता सामने आती है।

रज़िया की कब्र का प्रसंग इस विमर्श को एक गहरी ऐतिहासिक विडंबना तक ले जाता है। उपन्यास के अंत में जब उसकी कब्र को दूसरे शासकों की भव्य कब्रों के बरक्स देखा जाता है, तब प्रश्न केवल स्मारक का नहीं रह जाता। प्रश्न यह है कि इतिहास किन्हें स्मारकीय प्रतिष्ठा देता है और किन्हें अपनी स्मृति के हाशिये पर छोड़ देता है।

एक स्त्री, जिसने सत्ता के लिए संघर्ष किया, शासन किया और अपने समय की स्थापित धारणाओं को चुनौती दी, उसके लिए वैसी ही स्मृति-स्थली का अभाव अपने आप में अर्थवान बन जाता है। यहाँ कब्र की अनुपस्थिति भी एक प्रकार की ऐतिहासिक उपस्थिति है—वह उस भेदभाव का प्रमाण बन जाती है, जिसे सत्ता की आधिकारिक स्मृति अक्सर छिपा लेती है।

‘मामलुक’ की भाषा इस उपन्यास की सबसे पहचानने योग्य विशेषताओं में है। इसमें हिंदी के साथ उर्दू-फ़ारसी शब्दावली का व्यापक प्रयोग मिलता है। ‘सल्तनत’, ‘रहनुमाई’, ‘मंसूबाबंदी’, ‘साज़िश’, ‘तख़्त’, ‘फ़रमान’, ‘अमीर’, ‘मलिक’, ‘सिपहसालार’, ‘दीवान’, ‘क़ैदखाना’, ‘ताजपोशी’, ‘बरीद’, ‘दस्तरख़्वान’, ‘क़ाज़ी-उल-कुज़ात’ और ‘लश्करकश’ जैसे शब्द केवल ऐतिहासिक वातावरण निर्मित करने के लिए नहीं आते। वे उस सामाजिक-सांस्कृतिक संसार की आंतरिक शब्दावली हैं, जिसमें उपन्यास की कथा साँस लेती है।

यह भाषा इतिहास को किसी बाहर से लगाए गए आवरण की तरह प्रस्तुत नहीं करती। शब्दों के माध्यम से सत्ता की संरचना, दरबारी व्यवहार, सामाजिक संबंध और सांस्कृतिक परिवेश कथा के भीतर स्वाभाविक रूप से प्रवेश करते हैं। इस कारण भाषा का अपना एक ऐतिहासिक भूगोल बनता है।

उपन्यास की भाषा की दूसरी विशेषता उसका दृश्यात्मक और संवेदनात्मक विस्तार है। उदाहरण के लिए, मस्जिद के हौज में शाम का सिन्दूरी रंग, पानी में पड़ता गुम्बद का अक्स, शाखा को छूती रोशनी, कोने में टँका हुआ शाम का तारा और फिर अँधेरे में लैंप का धीरे-धीरे जल उठना—यह दृश्य किसी ऐतिहासिक सूचना की तरह नहीं, बल्कि एक जीवित अनुभव की तरह सामने आता है।

यहाँ लेखक केवल यह नहीं बताता कि इल्तुतमिश बाजार की ओर जा रहा था। वह उस समय की रोशनी, पानी, रंग, ध्वनि और गति को शब्दों में इस तरह रचता है कि पाठक उस वातावरण का सहभागी बन सके।

इसी प्रकार हाथियों की गर्दनों में लोहे की जंजीरें, पैरों में भारी कड़ियाँ, हवेली के विशाल दरवाजे, ऊँची छत पर उड़ते कबूतर और लाल पत्थरों से बना अहाता—ये विवरण दृश्य को ठोस बनाते हैं। इतिहास यहाँ अमूर्त अवधारणा न रहकर स्थापत्य, पदार्थ, देह और परिवेश का अनुभव बन जाता है।

उपन्यास की एक प्रमुख शैलीगत विशेषता लंबी, विस्तारपूर्ण वाक्य-रचना है। कई स्थानों पर लेखक एक दृश्य से दूसरे दृश्य, एक विचार से दूसरे विचार और एक पात्र की गतिविधि से व्यापक सामाजिक संदर्भ की ओर बढ़ता है। इससे कथन में एक प्रकार का निरंतर प्रवाह पैदा होता है।

उदाहरण के लिए, सुल्तान शाह के कैदखाने का वर्णन केवल कैदियों की सूची प्रस्तुत नहीं करता। उसमें सुल्तान की मानसिकता, दंड-व्यवस्था, सत्ता का भय और समाज के विभिन्न वर्गों पर नियंत्रण की प्रवृत्ति एक साथ उभरती है। वाक्य की विस्तारशीलता उस दमनकारी व्यवस्था के फैलाव का भाषिक रूप बन जाती है।

इसी तरह दिल्ली के बाजारों और पुराने नगर के जीवन का वर्णन अनेक आवाजों, वस्तुओं, गंधों और गतिविधियों को एक ही कथात्मक प्रवाह में समेटता है। इस शैली में विवरण स्वयं एक प्रकार का सामाजिक मानचित्र बन जाता है।

‘कहते हैं’, ‘लोग बताते हैं’, ‘उसने कहा’, ‘वह देखता है’, ‘एक रोज़’ और ‘उस वक़्त’ जैसे वाक्यांशों की पुनरावृत्ति उपन्यास में बार-बार दिखाई देती है। पहली दृष्टि में यह दोहराव लग सकता है, लेकिन इसके कई स्थानों पर विशिष्ट कथात्मक प्रयोजन हैं।

‘कहते हैं’ जैसे पद इतिहास और लोकस्मृति के बीच की दूरी को बनाए रखते हैं। वे संकेत करते हैं कि कथाकार किसी प्रसंग को प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह नहीं, बल्कि सुनी-सुनाई स्मृति, प्रचलित वृत्तांत या किसी पात्र के कथन के रूप में सामने ला रहा है। इससे कथा में मौखिक इतिहास का आभास उत्पन्न होता है।

इसी तरह किसी पात्र की गतिविधि या किसी दृश्य के विवरण की पुनरावृत्ति कभी-कभी उसकी मनःस्थिति पर पाठक का ध्यान केंद्रित करती है। लेकिन यह भी स्वीकार करना होगा कि लंबे कथात्मक विस्तार और बार-बार लौटने वाले वाक्यांश कुछ पाठकों के लिए गति को धीमा कर सकते हैं। जहाँ पुनरावृत्ति वातावरण या अर्थ को गहरा करती है, वहाँ वह शैलीगत उपलब्धि है; जहाँ वह पहले से स्पष्ट सूचना को अनावश्यक रूप से दोहराती है, वहाँ संपादकीय कसावट की आवश्यकता अनुभव हो सकती है।

इस प्रकार भाषा की शक्ति और उसकी सीमाओं, दोनों को पहचानना इस उपन्यास के न्यायपूर्ण मूल्यांकन के लिए आवश्यक है।

उपन्यास के संवाद पात्रों की सामाजिक स्थिति और मानसिकता के अनुरूप निर्मित होते हैं। इलाम के साथ होने वाली बातचीत में युद्ध और शांति का वैचारिक संघर्ष है। जुल्फिकार और रज़िया के बीच संवाद में स्त्री की स्वतंत्रता तथा पुरुष-प्रधान सामाजिक अनुशासन का संघर्ष है। शाह तुर्कान और वज़ीर जुनैदी की बातचीत में राजनीतिक रणनीति, धार्मिक-सामाजिक प्रभाव और सत्ता के समीकरण सामने आते हैं।

संवाद केवल कथानक को आगे बढ़ाने का माध्यम नहीं हैं; वे विचारों के टकराव का क्षेत्र भी हैं। उनके भीतर लेखक कई बार अपना वैचारिक प्रश्न पात्रों के बीच रख देता है, लेकिन उसे सीधे व्याख्यात्मक टिप्पणी में बदलने से बचता है।

फिर भी ऐतिहासिक उपन्यास की भाषा का मूल्यांकन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि आधुनिक हिंदी-उर्दू मिश्रित गद्य को मध्यकालीन पात्रों की हूबहू ऐतिहासिक वाणी नहीं माना जा सकता। यह लेखक द्वारा निर्मित साहित्यिक भाषा है, जो उस युग का वातावरण और मानसिक संसार पुनर्सृजित करने का प्रयास करती है।

यही भेद इस कृति की भाषा को अधिक गंभीरता से समझने में सहायक है।

‘मामलुक’ का शिल्प केवल उसके विस्तृत वर्णनों में नहीं, बल्कि इस बात में भी निहित है कि वह इतिहास को पाठक तक पहुँचाने के लिए किन-किन कथन-स्तरों का सहारा लेता है।

उपन्यास में एक ओर इल्तुतमिश और रज़िया का कालखंड है, दूसरी ओर इब्न बतूता की यात्रा और उससे भी आगे इब्न जुजाय्यु द्वारा उसके कथनों को लिखे जाने का समय। इस प्रकार कथा में अतीत के भीतर एक और अतीत तथा उस अतीत को दर्ज करने की प्रक्रिया मौजूद है।

यह तकनीक इतिहास के बारे में एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाती है—क्या इतिहास केवल घटनाओं का संकलन है, या वह किसी व्यक्ति द्वारा किसी दूसरे व्यक्ति से सुनी गई बातों, चुनी गई स्मृतियों और लिखित वृत्तांतों का परिणाम भी है?

इब्न बतूता के कथन को लिखते हुए इब्न जुजाय्यु का उस अनाम व्यक्ति के बारे में पूछना, और उसका नाम लिखने से इनकार कर दिया जाना, इसी प्रश्न को सामने लाता है। उस व्यक्ति के पास ऐसी जानकारियाँ हैं, जिनका सार्वजनिक होना उसके लिए खतरनाक हो सकता है। इस प्रकार मौन केवल सूचना का अभाव नहीं रहता; वह भय, सत्ता और आत्मरक्षा से निर्मित राजनीतिक व्यवहार बन जाता है।

यहाँ लेखक एक तरह से इतिहास-लेखन की प्रक्रिया को भी कथा का विषय बना देता है। जो दर्ज किया गया, वह क्यों दर्ज किया गया? जो नाम छिपाया गया, वह क्यों छिपाया गया? किसी घटना के पीछे मौजूद वास्तविक संबंधों को लिखित इतिहास किस हद तक सामने ला सकता है? ऐसे प्रश्न उपन्यास को साधारण ऐतिहासिक पुनर्कथन से अलग करते हैं।

उपन्यास में समय सीधी रेखा में नहीं चलता। वर्तमान दृश्य से अतीत की ओर जाना, फिर किसी दूसरे समय में उसी अतीत को याद करना और फिर किसी ऐतिहासिक स्थल पर लौट आना—ये प्रक्रियाएँ कथा को एक बहुस्तरीय संरचना देती हैं।

इब्न बतूता का दिल्ली में आना, पुरानी कब्रों और इमारतों को देखना तथा उन स्थानों से जुड़ी स्मृतियों का खुलना अतीत को किसी बंद अध्याय की तरह नहीं रहने देता। वह वर्तमान में मौजूद खंडहरों, कब्रों और लोककथाओं के भीतर फिर से सक्रिय हो उठता है।

इस शिल्प का सबसे प्रभावशाली पक्ष यह है कि ऐतिहासिक स्थल केवल दृश्य की पृष्ठभूमि नहीं रहते। वे कथा के अर्थ-निर्माण में भाग लेते हैं। पुरानी दिल्ली का खंडहर हो चुका स्थापत्य, अधूरी मीनार और रज़िया की कब्र—ये सब मिलकर उस समय की राजनीतिक स्मृति पर विचार करने के माध्यम बन जाते हैं।

उपन्यास में वस्तुओं का विस्तार विशेष रूप से उल्लेखनीय है। अशर्फी, फ़रमान, पीतल का चपरास, दस्तारचा, लैंप, तलवार, जंजीर, मेहराब, कब्र और मीनार जैसी वस्तुएँ केवल दृश्यात्मक विवरण नहीं हैं। वे अपने साथ सामाजिक संबंधों और सत्ता की अर्थव्यवस्था को लेकर आती हैं।

गुलाम की देह पर किसी दूसरे का अधिकार गुलामी की व्यवस्था का भौतिक रूप है। कमर में बँधा चपरास प्रशासनिक पहचान और सत्ता से संबंध का संकेत देता है। फ़रमान शासन की आज्ञा, अधिकार और वैधता का प्रतीक बनता है। अधूरी मीनार राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा के अपूर्ण रह जाने का बिंब बन सकती है, जबकि रज़िया की कब्र स्मृति में असमानता और ऐतिहासिक उपेक्षा का संकेत देती है।

इस प्रकार उपन्यास में इतिहास केवल मनुष्यों के माध्यम से नहीं, बल्कि वस्तुओं और स्थानों के माध्यम से भी बोलता है।

इतने विस्तृत ऐतिहासिक उपन्यास को रचने के लिए केवल किसी ऐतिहासिक घटना का ज्ञान पर्याप्त नहीं होता। लेखक को उस घटना के आसपास मौजूद समाज, भूगोल, स्थापत्य, प्रशासन, सैन्य व्यवस्था, व्यापार, धार्मिक-सांस्कृतिक व्यवहार और दैनिक जीवन की अनेक परतों को एक-दूसरे से जोड़ना पड़ता है।

‘मामलुक’ के रचनाकार तरुण भटनागर ने ऐतिहासिक संसार के सूक्ष्म विवरणों पर पर्याप्त ध्यान दिया है। यह ध्यान केवल सुल्तानों और युद्धों तक सीमित नहीं है। इसमें गुलाम बाजार की खरीद-बिक्री, बरीदों के माध्यम से संदेश पहुँचाने की व्यवस्था, महल के विभिन्न हिस्से, शाही हरम की आंतरिक संरचना, दरबारी पदों की प्रकृति, लश्करगाहों का वातावरण, बाजारों में बिकने वाली वस्तुएँ, सरायों की गतिविधियाँ, क़लम बनाने की प्रक्रिया और पुराने नगरों के स्थापत्य अवशेष तक शामिल हैं।

इन विवरणों को कथा में समाहित करना एक बड़ी रचनात्मक चुनौती है। ऐतिहासिक उपन्यास में जानकारी का अत्यधिक बोझ कथानक को इतिहास की पाठ्यपुस्तक में बदल सकता है, जबकि विवरणों की कमी पात्रों और घटनाओं को अपने समय से काट सकती है। लेखक को इन दोनों अतियों के बीच संतुलन स्थापित करना होता है।

‘मामलुक’ में अनेक स्थानों पर यह संतुलन उल्लेखनीय ढंग से बनता दिखाई देता है।

उदाहरण के लिए, बरीद व्यवस्था का वर्णन केवल प्रशासनिक सूचना नहीं है। वह एक ऐसे साम्राज्य की कल्पना को मूर्त करता है, जहाँ दूर-दराज़ के इलाकों से राजधानी तक संदेश पहुँचाने के लिए एक क्रमबद्ध व्यवस्था काम करती है। इसी तरह गुलाम बाजार का विवरण केवल आर्थिक आँकड़ा नहीं देता, बल्कि मनुष्य के मूल्य और वस्तु के मूल्य के बीच स्थापित अमानवीय संबंध को उजागर करता है।

दिल्ली के पुराने स्थापत्य का वर्णन भी लेखक के श्रम का प्रमाण है। वह महलों और इमारतों को केवल वैभव के प्रतीक के रूप में नहीं देखता; वह उनके टूटने, वीरान होने, दरारों में पेड़ों की जड़ों के फैलने और पुरानी बावड़ियों के धँसने तक पर ध्यान देता है। इस प्रकार इतिहास को उसकी निर्मिति और विनाश, दोनों अवस्थाओं में देखने की दृष्टि सामने आती है।

लेकिन यहाँ लेखक के श्रम की चर्चा करते समय एक आवश्यक अंतर बनाए रखना चाहिए। किसी उपन्यास में ऐतिहासिक विवरणों की बहुलता शोध के व्यापक प्रयत्न का संकेत अवश्य देती है, किंतु केवल विवरणों के आधार पर प्रत्येक तथ्य की ऐतिहासिक पुष्टि नहीं की जा सकती। लेखक के वास्तविक शोध-स्रोतों, संदर्भ-ग्रंथों और अभिलेखीय सामग्री की जानकारी के बिना उसके शोध की सीमा या प्रामाणिकता पर अंतिम निर्णय देना उचित नहीं होगा।

साहित्यिक स्तर पर, फिर भी, यह कहा जा सकता है कि कृति में इतिहास को केवल सूचना के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय उसे दृश्य, वस्तु, व्यवहार और मानवीय अनुभव में रूपांतरित करने का गंभीर प्रयास है।

यही प्रयास ‘मामलुक’ को एक सामान्य ऐतिहासिक आख्यान से आगे ले जाता है। लेखक पाठक से केवल यह नहीं चाहता कि वह इल्तुतमिश के बारे में कुछ नई बातें जाने; वह चाहता है कि पाठक उस समय के सामाजिक संसार में प्रवेश करे और वहाँ के जीवन को उसकी जटिलताओं के साथ अनुभव करे।

‘मामलुक’ का एक महत्त्वपूर्ण वैचारिक पक्ष युद्ध और सत्ता के संबंधों की पड़ताल है। बल्ख में इलाम की युद्ध-विरोधी दृष्टि से लेकर दिल्ली के शाही महलों में चलने वाले षड्यंत्रों और सत्ता-संघर्षों तक हिंसा अनेक रूपों में उपस्थित है।

युद्ध केवल दो सेनाओं के बीच का संघर्ष नहीं है। वह समाज के भीतर पुरुषत्व की परिभाषा बनाता है, परिवारों में प्रतिस्पर्धा को जन्म देता है, बच्चों को विस्थापित करता है, गुलामी के बाजार को सक्रिय करता है और राजनीतिक सत्ता को वैधता प्रदान करने का माध्यम बनता है।

इलाम के चरित्र के माध्यम से उपन्यास युद्ध के सामान्यीकरण पर प्रश्न उठाता है। यदि कोई समाज युद्ध को अपनी पहचान और प्रतिष्ठा का अनिवार्य अंग मान ले, तो शांति की इच्छा रखने वाला व्यक्ति भी संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगता है। यह स्थिति केवल मध्यकाल की समस्या नहीं है; युद्ध के महिमामंडन की प्रवृत्ति आज भी अनेक समाजों में देखी जा सकती है।

सुल्तान शाह के कैदखाने का प्रसंग हिंसा के एक दूसरे रूप को सामने लाता है। यहाँ सत्ता का भय केवल शारीरिक दंड में नहीं, बल्कि कैद की अनिश्चितता और अपमान में भी निहित है। किसे कैद किया जाएगा और किसे मृत्युदंड दिया जाएगा, यह निर्णय शासक के क्रोध और इच्छा से जुड़ा हुआ है। कानून और न्याय की जगह शासक की मनमानी ले लेती है।

इस प्रसंग की विशेषता यह है कि लेखक सत्ता की क्रूरता को किसी एक असाधारण घटना तक सीमित नहीं रखता। वह बताता है कि कैसे सामान्य मनुष्य, अपराध सिद्ध होने से पहले ही, सत्ता के भय का शिकार हो सकते हैं; कैसे रिश्तेदारों तक को दंडित किया जा सकता है; और कैसे दंड-व्यवस्था राजनीतिक नियंत्रण का माध्यम बन जाती है।

यहाँ उपन्यास का प्रश्न अत्यंत स्पष्ट है—यदि राज्य की शक्ति नागरिक की सुरक्षा के बजाय उसके भय को सुनिश्चित करने लगे, तो शासन और अत्याचार के बीच की सीमा कहाँ रह जाती है?

इसी प्रकार रज़िया के विरुद्ध चलने वाले षड्यंत्र यह बताते हैं कि सत्ता का संकट केवल सैन्य शक्ति का संकट नहीं होता। वह वैचारिक स्वीकार्यता का भी संकट होता है। रज़िया को अपने अधिकार के लिए केवल प्रतिद्वंद्वी सेनाओं से नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता से भी संघर्ष करना पड़ता है, जो स्त्री के शासन को सहज रूप से स्वीकार नहीं करती।

इस दृष्टि से उपन्यास सत्ता की तीन परस्पर संबंधित परतों को सामने लाता है—हिंसा की शक्ति, संस्थागत नियंत्रण और सामाजिक मान्यताओं की शक्ति। किसी शासक का शासन तभी टिकता है, जब वह इन तीनों स्तरों पर अपना प्रभाव स्थापित कर सके; और जब इन स्तरों पर उसका नियंत्रण कमजोर होता है, तो उसके विरुद्ध प्रतिरोध की संभावनाएँ बढ़ने लगती हैं।

उपन्यास की सबसे उल्लेखनीय मानवीय विशेषताओं में से एक यह है कि वह गुलामों को केवल इल्तुतमिश की जीवन-यात्रा का साधन नहीं बनाता। गुलामी की व्यवस्था के भीतर अनेक ऐसे लोग दिखाई देते हैं, जिनका अपना इतिहास है, अपनी विवशताएँ हैं और अपनी मानवीय आवश्यकताएँ हैं।

सैफुद्दीन द्वारा युद्धग्रस्त इलाकों से लोगों को खोजकर लाने का प्रसंग बताता है कि इतिहास की बड़ी राजनीतिक घटनाओं का सबसे गहरा आघात अक्सर उन लोगों पर पड़ता है, जिनका सत्ता-संघर्षों में कोई प्रत्यक्ष हित नहीं होता। युद्ध में किसी शासक की विजय या पराजय का विवरण इतिहास में सुरक्षित रह सकता है, लेकिन उसी युद्ध में अपना परिवार खो देने वाले बच्चे का जीवन अक्सर दर्ज नहीं होता।

उपन्यास उन विस्थापित लोगों को सामने लाकर इतिहास की इस चुप्पी को तोड़ने का प्रयास करता है।

इसी संदर्भ में दिल्ली के गुलाम बाजार का वर्णन विशेष महत्त्व रखता है। जब एक घोड़े की कीमत और एक मनुष्य की कीमत की तुलना सामने आती है, तब बाजार की अर्थव्यवस्था अपनी अमानवीयता के साथ दिखाई देती है। मनुष्य का मूल्य उसकी संवेदना, स्मृति, संबंधों और संभावनाओं से नहीं, बल्कि बाजार में उसकी उपयोगिता से निर्धारित किया जा रहा है।

यहाँ इल्तुतमिश की जीवन-यात्रा एक व्यापक विडंबना का प्रतीक बन जाती है। वह स्वयं एक ऐसी व्यवस्था से ऊपर उठता है, जिसमें मनुष्य को वस्तु बना दिया जाता है; लेकिन उसका सुल्तान बन जाना इस बात का प्रमाण नहीं है कि व्यवस्था बदल गई। अन्य मनुष्य अब भी उसी बाजार में बिक रहे हैं।

इसलिए उपन्यास की दृष्टि में व्यक्तिगत सफलता और सामाजिक मुक्ति एक ही बात नहीं हैं। किसी गुलाम का सुल्तान बन जाना ऐतिहासिक रूप से असाधारण घटना है, लेकिन उससे गुलामी की पूरी व्यवस्था स्वतः समाप्त नहीं हो जाती।

यही बिंदु ‘मामलुक’ को केवल संघर्ष और सफलता की प्रेरक कथा बनने से रोकता है। वह पाठक को व्यक्ति की उपलब्धि के साथ-साथ उस व्यवस्था पर भी विचार करने के लिए प्रेरित करता है, जिसमें ऐसी उपलब्धि संभव तो होती है, लेकिन असंख्य अन्य लोगों की स्वतंत्रता अब भी छीन ली जाती है।

हिंदी साहित्य में ऐतिहासिक उपन्यासों की एक समृद्ध परंपरा रही है। इस परंपरा में इतिहास को राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक गौरव, सामाजिक परिवर्तन, राजनीतिक संघर्ष और मानवीय मूल्यों की अभिव्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया है। विभिन्न रचनाकारों ने अलग-अलग ऐतिहासिक कालखंडों को अपने समय की वैचारिक आवश्यकताओं के अनुरूप पुनर्सृजित किया है।

इस परंपरा की पृष्ठभूमि में ‘मामलुक’ की विशिष्टता को समझने के लिए इसे कुछ व्यापक साहित्यिक प्रवृत्तियों के संदर्भ में देखना उपयोगी होगा। वृंदावनलाल वर्मा की रचनाओं में ऐतिहासिक व्यक्तित्वों, राजनीतिक संघर्षों और वीरता के प्रसंगों के माध्यम से अतीत की पुनर्रचना दिखाई देती है। ‘मामलुक’ भी ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को केंद्र में रखता है, लेकिन इसकी विशेष रुचि राजकीय वीरता के साथ-साथ गुलामी, विस्थापन, प्रशासनिक जीवन, सामाजिक पूर्वग्रह और ऐतिहासिक स्मृति की उपेक्षित परतों में है।

आचार्य चतुरसेन की ऐतिहासिक रचनाओं में प्राचीन समाज, धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताओं और सत्ता-संबंधों का व्यापक चित्रण मिलता है। ‘मामलुक’ भी ऐतिहासिक संसार का विस्तृत सामाजिक पुनर्निर्माण करता है, लेकिन इसमें इतिहास के लेखन, मौखिक स्मृति, भूले हुए पात्रों और सत्ता द्वारा निर्मित मौन पर विशेष बल दिखाई देता है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी की ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ जैसी कृति इतिहास को सांस्कृतिक वातावरण और मानवीय अनुभव के माध्यम से जीवंत बनाती है। ‘मामलुक’ में भी वातावरण, भाषा, वस्तुओं और सामाजिक व्यवहार का विस्तार है। इसका विशिष्ट आग्रह मध्यकालीन सल्तनत की सत्ता-संरचना तथा उसके भीतर गुलामी और स्त्री-अधिकार के प्रश्नों को केंद्र में लाना है।

यह तुलना किसी कृति को दूसरी से श्रेष्ठ या निम्न सिद्ध करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी साहित्यिक स्थिति को समझने के लिए है। इन उपन्यासों के ऐतिहासिक कालखंड, कथात्मक उद्देश्य और भाषा-शिल्प अलग हैं; इसलिए उनका मूल्यांकन एक ही कसौटी पर नहीं किया जा सकता।

‘मामलुक’ की विशिष्टता को कुछ प्रमुख बिंदुओं में समझा जा सकता है।

परंपरागत ऐतिहासिक आख्यानों में राजवंश, युद्ध, उत्तराधिकार और विजय की घटनाएँ प्रमुख हो सकती हैं। ‘मामलुक’ इन घटनाओं को महत्त्व देता है, लेकिन उनका अर्थ मनुष्य के जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों से निर्धारित करता है।

गुलामी की व्यवस्था, युद्ध से उजड़े परिवार, बाजार में बिकते लोग और सत्ता के भय से जीते नागरिक इतिहास के परिधीय पात्र नहीं हैं। वे उस व्यवस्था को समझने की कुंजी बनते हैं, जिसमें सुल्तान का उदय और पतन संभव होता है।

इस उपन्यास में ऐतिहासिकता केवल तिथियों और प्रसिद्ध घटनाओं से नहीं आती। वह स्थापत्य, वस्तुओं, कपड़ों, प्रशासनिक पदों, संदेश-व्यवस्था, बाजारों, महलों, दस्तरख्वानों और रोजमर्रा की गतिविधियों से निर्मित होती है।

इससे पाठक को उस समय के जीवन का एक ठोस अनुभव मिलता है। इतिहास किसी दूरस्थ काल का अमूर्त विवरण नहीं रह जाता; वह वस्तुओं और स्थानों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।

इब्न बतूता और इब्न जुजाय्यु की उपस्थिति उपन्यास को एक अतिरिक्त वैचारिक आयाम देती है। यहाँ केवल अतीत की घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि उन्हें सुनने, याद रखने, लिखने और कुछ बातों को छिपा लेने की प्रक्रियाएँ भी हैं।

इससे पाठक इतिहास की निर्मिति पर विचार करने लगता है। यह एक महत्त्वपूर्ण शिल्पगत अंतर है, क्योंकि इतिहास अब केवल कथा की विषयवस्तु नहीं रहता; वह कथा के भीतर स्वयं प्रश्नांकित होने लगता है।

रज़िया का चरित्र इस उपन्यास को एक स्पष्ट वैचारिक पहचान प्रदान करता है। वह केवल किसी पुरुष शासक की उत्तराधिकारी नहीं है; वह अपने अधिकार, पहचान और राजनीतिक स्वायत्तता के लिए संघर्ष करने वाली शासक है।

उसकी कब्र का प्रसंग इस संघर्ष को ऐतिहासिक स्मृति के प्रश्न से जोड़ देता है। इस प्रकार स्त्री का अधिकार केवल सत्ता प्राप्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह प्रश्न भी बन जाता है कि आने वाला इतिहास उसे किस रूप में याद रखेगा।

दिल्ली के बाजार, सराय, पुराने मकान, हवेलियाँ, मस्जिदें और खंडहर उपन्यास के भीतर एक स्वतंत्र सामाजिक संसार रचते हैं। शहर केवल शासकों की राजनीतिक राजधानी नहीं है। वह लोगों की आजीविका, स्मृति, संबंधों, आवाजों और जीवन की निरंतरता का स्थल है।

अबू तालिब का यह विचार कि सुल्तान शहर बसाते हैं, लेकिन उसे आबाद लोग करते हैं, उपन्यास की ऐतिहासिक दृष्टि को सार रूप में व्यक्त करता है।

इन विशेषताओं के आधार पर ‘मामलुक’ को ऐतिहासिक उपन्यास की परंपरा में एक उल्लेखनीय पुनर्पाठ के रूप में देखा जा सकता है। यह कहना कि पहले के सभी ऐतिहासिक उपन्यासों से यह हर दृष्टि में अलग अथवा श्रेष्ठ है, साहित्यिक आलोचना की दृष्टि से अतिशयोक्ति होगी। अधिक उचित यह कहना है कि इसकी विशिष्टता इतिहास के उन क्षेत्रों को केंद्र में लाने में है, जिन्हें केवल राजकीय उपलब्धियों के वृत्तांत से समझना संभव नहीं है।

किसी साहित्यिक कृति की गंभीर समीक्षा का उद्देश्य केवल उसकी प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उसकी उपलब्धियों के साथ उसकी सीमाओं को भी पहचानना है। ‘मामलुक’ की व्यापकता और विषयगत महत्त्व को स्वीकार करते हुए उसके शिल्प के कुछ विचारणीय पक्षों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

उपन्यास में ऐतिहासिक परिवेश, वस्तुओं, प्रशासनिक व्यवस्थाओं और सामाजिक जीवन का इतना विस्तार है कि कुछ स्थानों पर कथा की गति धीमी पड़ जाती है। ऐतिहासिक वातावरण की निर्मिति के लिए विवरण आवश्यक हैं, लेकिन उनका प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करता है कि वे कथानक और चरित्र-विकास से कितने स्वाभाविक रूप से जुड़े हैं। जहाँ विवरण कथा के अर्थ को गहरा करते हैं, वहाँ वे शक्ति हैं; जहाँ वे पहले से स्थापित वातावरण को अनावश्यक रूप से दोहराते हैं, वहाँ संक्षेप उपयोगी हो सकता है।

लंबे वाक्य, एक ही भाव के आसपास बार-बार लौटना और कुछ कथन-शैलियों का लगातार प्रयोग उपन्यास की मौखिकता तथा लय को निर्मित करते हैं। लेकिन यही शैली कुछ पाठकों के लिए पठनीयता की चुनौती भी बन सकती है। अधिक सघन संपादन कुछ प्रसंगों की प्रभावशीलता बढ़ा सकता है, बशर्ते उससे कृति की विशिष्ट भाषिक लय नष्ट न हो।

कुछ संवादों में पात्र अपने समय से आगे जाते हुए ऐसे प्रश्न उठाते हैं, जो आधुनिक सामाजिक और राजनीतिक विमर्श से भी जुड़ते हैं। ऐतिहासिक उपन्यास में यह एक वैध और आवश्यक रचनात्मक स्वतंत्रता है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि संवाद पात्र के अनुभव और परिस्थिति से कितनी स्वाभाविकता के साथ निकलते हैं। जहाँ विचार चरित्र के भीतर से उभरता है, वहाँ वह प्रभावशाली बनता है; जहाँ वह केवल लेखक के विचार का वाहक बनता है, वहाँ पात्र की स्वतंत्रता कुछ कम हो सकती है। इन सीमाओं का उल्लेख उपन्यास की उपलब्धियों को कम करने के लिए नहीं, बल्कि उसकी कलात्मक संरचना को अधिक संतुलित ढंग से समझने के लिए है।

उपन्यास का अंतिम प्रसंग इसकी समग्र वैचारिक संरचना को एक गहरी संवेदनात्मक परिणति प्रदान करता है। धूल-भरे तूफान के बीच इब्न बतूता का रज़िया की कब्र तक पहुँचना केवल किसी ऐतिहासिक स्थल का दृश्य नहीं है। यह उस पूरे आख्यान की स्मृति को एक स्थान पर केंद्रित कर देता है, जिसमें गुलामी, सत्ता, युद्ध, स्त्री-अधिकार और ऐतिहासिक विस्मृति के प्रश्न लगातार उपस्थित रहे हैं।

इब्न बतूता जब सुल्तानगढ़ी में इल्तुतमिश के पुत्रों की शानदार कब्रों और रज़िया के लिए वैसी कब्र के अभाव की ओर संकेत करता है, तब उपन्यास एक ऐसी विडंबना सामने लाता है, जो इतिहास की आधिकारिक स्मृति पर प्रश्न उठाती है।

जिस रज़िया ने राजनीतिक अधिकार के लिए संघर्ष किया, जिसने स्त्री होने के कारण निर्धारित सीमाओं को चुनौती दी और जिसने शासन की जिम्मेदारी संभाली, उसकी स्मृति को वह स्थान क्यों नहीं मिला, जो दूसरे शासकों को मिला?

यह प्रश्न केवल स्थापत्य का नहीं है। यह उस सांस्कृतिक व्यवस्था का प्रश्न है, जो कुछ व्यक्तियों को भव्य स्मारकों के माध्यम से अमर बनाती है और कुछ को स्मृति के किनारे छोड़ देती है।

यहाँ कब्र एक ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह काम करती है। उसकी भव्यता या साधारणता, उसका होना या न होना, सत्ता की स्मृति और समाज की स्मृति के बीच के अंतर को सामने लाता है।

इसी प्रसंग में इल्तुतमिश की विरासत का अर्थ भी बदल जाता है। उसकी अनेक संतानों और उत्तराधिकारियों के बीच रज़िया वह पात्र बनकर उभरती है, जिसे आने वाले समय में उसकी असाधारणता के कारण याद किया जाएगा। लेकिन यह याद किया जाना अपने आप में पूर्ण न्याय नहीं है। किसी को असाधारण कहकर याद रखना और उसे उसके अधिकार के अनुरूप ऐतिहासिक स्थान देना दो अलग बातें हैं।

उपन्यास का अंत इसी अंतर को रेखांकित करता है। इतिहास किसी व्यक्ति को प्रसिद्ध बना सकता है, लेकिन उसकी स्मृति को न्यायपूर्ण स्थान देना समाज की नैतिक जिम्मेदारी है।

यहाँ रज़िया की कब्र उस पूरी कृति का प्रतीक बन जाती है। गुलाम इल्तुतमिश का सुल्तान बनना सामाजिक व्यवस्था की सीमाओं को पार करने की संभावना है; रज़िया

का सुल्तान कहलाना उन सीमाओं को लिंग के स्तर पर चुनौती देना है; और उसकी कब्र का प्रसंग उस चुनौती के बाद भी बनी रहने वाली ऐतिहासिक असमानता की ओर संकेत करता है।

इस प्रकार उपन्यास का अंत केवल एक ऐतिहासिक कथा का समापन नहीं, बल्कि उसके केंद्रीय प्रश्नों की पुनर्प्रतिष्ठा है।

‘मामलुक’ का मूल्यांकन करते हुए अंततः यह स्वीकार करना होगा कि इसकी महत्त्वाकांक्षा एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक व्यक्तित्व की जीवनगाथा सुनाने से कहीं अधिक व्यापक है। यह उपन्यास इल्तुतमिश के माध्यम से गुलामी और सत्ता के संबंधों की पड़ताल करता है, इलाम के माध्यम से युद्ध और शांति के प्रश्न को उठाता है, सैफुद्दीन के माध्यम से मनुष्य के व्यापार की अमानवीयता को सामने लाता है, शाह तुर्कान के माध्यम से सत्ता के षड्यंत्रकारी स्वरूप को उद्घाटित करता है और रज़िया के माध्यम से स्त्री के राजनीतिक अधिकार तथा ऐतिहासिक स्मृति में उसकी स्थिति पर विचार करता है।

इसकी भाषा ऐतिहासिक वातावरण को शब्दों, ध्वनियों, वस्तुओं और दृश्यों के माध्यम से मूर्त करती है। इसकी संरचना सात किताबों और छोटे-छोटे उपशीर्षकों के सहारे एक विस्तृत ऐतिहासिक संसार को क्रमबद्ध करती है। इसकी कथन-तकनीक अतीत, स्मृति और इतिहास-लेखन को एक-दूसरे से जोड़ती है। इसकी चरित्र-सृष्टि इतिहास के प्रसिद्ध नामों के साथ उन मनुष्यों को भी स्थान देती है, जिनकी उपस्थिति के बिना उस समय की वास्तविकता को समझना संभव नहीं है।

इस उपन्यास की एक बड़ी उपलब्धि यह भी है कि वह सत्ता के वैभव से प्रभावित होकर उसकी नैतिकता को स्वतः स्वीकार नहीं कर लेता। उसके यहाँ सुल्तान होना महानता की गारंटी नहीं है, गुलाम होना अयोग्यता का प्रमाण नहीं है, स्त्री होना राजनीतिक अक्षमता का संकेत नहीं है और किसी समुदाय का शत्रु घोषित हो जाना उसकी मानवीयता का अंत नहीं है।

यही वह दृष्टि है, जो ‘मामलुक’ को केवल अतीत की कथा से आगे ले जाती है।

किसी ऐतिहासिक उपन्यास का सबसे बड़ा दायित्व अतीत को वर्तमान की भाषा में दोहराना नहीं, बल्कि वर्तमान को अतीत के अनुभवों के सामने खड़ा करना है। ‘मामलुक’ इस अर्थ में पाठक से लगातार प्रश्न करता है—मनुष्य की स्वतंत्रता का वास्तविक आधार क्या है? सत्ता किसे बोलने का अधिकार देती है? इतिहास किनकी स्मृतियों को सुरक्षित रखता है? और जिनके जीवन ने अपने समय की स्थापित व्यवस्थाओं को चुनौती दी, उन्हें आने वाली पीढ़ियाँ किस तरह याद करती हैं?

इन प्रश्नों का कोई सरल उत्तर नहीं है। लेकिन साहित्य का काम हमेशा उत्तर देना ही नहीं होता; कई बार उसका अधिक महत्त्वपूर्ण काम ऐसे प्रश्नों को जीवित रखना होता है, जिन्हें समाज सुविधापूर्वक भुला देना चाहता है।

‘मामलुक’ की सार्थकता इसी में है कि वह सल्तनतों के उत्थान-पतन के बीच मनुष्य की उस आवाज को सुनने का आग्रह करता है, जो सत्ता के शोर में दब जाती है। वह इतिहास के महलों को दिखाते हुए उनके पीछे छूट गए बाजारों को भी देखता है, सुल्तानों के संघर्ष को दर्ज करते हुए गुलामों की नियति को भी सामने लाता है और विजेताओं की स्मृति के बीच उस स्त्री की कब्र पर ठहरता है, जिसे इतिहास ने उसके अधिकार के अनुरूप स्थान नहीं दिया।

इस दृष्टि से ‘मामलुक’ को एक विस्तृत ऐतिहासिक उपन्यास, सामाजिक-सांस्कृतिक पुनर्निर्माण और सत्ता की नैतिक समीक्षा—इन तीनों के संगम पर स्थित कृति के रूप में पढ़ा जा सकता है।

‘मामलुक’ इतिहास के उस बंद दरवाजे पर दस्तक देता है, जिसके भीतर केवल सुल्तानों की आवाजें सुनाई देती रही हैं। वह उस दरवाजे को खोलकर हमें बताता है कि इतिहास की वास्तविक धड़कन उन असंख्य मनुष्यों में भी बसती है, जिनकी आवाजें कभी दर्ज नहीं की गईं। और शायद इसी कारण इस उपन्यास की सबसे स्थायी छवि कोई तख्त, कोई तलवार या कोई विजयी मीनार नहीं, बल्कि धूल और विस्मृति के बीच खड़ी रज़िया की वह कब्र है, जो आज भी इतिहास से एक असुविधाजनक प्रश्न पूछती है—जिसने अपने समय को चुनौती दी, क्या हमने उसे उसकी स्मृति में भी बराबरी का स्थान दिया?

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पुस्तक  :- ‘मामलुक’

लेखक :- तरुण भटनागर

प्रकाशक :- राजकमल प्रकाशन,नयी दिल्ली

मूल्य :- 599 रुपए

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डॉ. कुमारी उर्वशी राँची विमेंस कॉलेज, राँची विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की सहायक प्राध्यापिका हैं। वे 1 मार्च 2008 से अध्यापन कार्य से जुड़ी हैं तथा उन्होंने राँची विश्वविद्यालय से एम.ए., पीएच.डी. एवं डी.लिट. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। हिंदी साहित्य, भाषा, स्त्री एवं दलित विमर्श तथा समकालीन साहित्य पर उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं। हंस, कथाक्रम, परिकथा, वनमाली कथा, लमही, पाखी, आजकल एवं साखी जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में उनके आलेख एवं समीक्षाएँ नियमित रूप से प्रकाशित होती रही हैं।

मोबाईल नम्बर 9955354365


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