ऋतुराज के निधन का समाचार पाकर मन व्यथित है । उनका जाना केवल एक कवि का चले जाना नहीं, बल्कि उस आत्मीय और बेबाक आवाज़ का मौन हो जाना है, जो जीवन की विडम्बनाओं के बीच मनुष्य की गरिमा, संवेदना और प्रतिरोध को बचाए रखने की कोशिश करती रही। ऋतुराज की कविताएँ हमारे समय के दुखों और सच्चाइयों से आँख मिलाना सिखाती हैं। उनकी पंक्तियाँ अब भी हमारे भीतर बोलती रहेंगी।
इस अंक में प्रकाशित वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन के आलेख ‘स्मृति, जड़ता और प्रतिरोध : जीवन-मृत्यु के द्वन्द्व का काव्यशास्त्र’ में ऋतुराज की ‘मरे हुए लोग’ और ‘मरूँगा नहीं’ सहित अशोक वाजपेयी और श्रीप्रकाश शुक्ल की जीवन-मृत्यु विषयक कविताओं के माध्यम से ज़िंदगी और मौत तथा स्मृति और प्रतिरोध के सवालों पर विचार किया गया है। ऋतुराज की कविता हमें याद दिलाती है कि किसी को सच्चे अर्थों में याद करना उसके नाम का स्मरण भर नहीं, बल्कि उसके उठाए सवालों को अपने भीतर जीवित रखना है।
ऋतुराज अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कविता हमारे साथ है। उनके जाने का दुख शायद शब्दों में पूरा व्यक्त नहीं हो सकता। हम उन्हें उनकी कविताओं, उनकी बेचैनी और मनुष्य के प्रति उनकी गहरी संवेदना में याद करते रहेंगे।
‘रचना समय’ की ओर से कवि ऋतुराज को सादर नमन। इस आलेख का प्रकाशन उनके प्रति हमारी विनम्र और आत्मीय श्रद्धांजलि है।
— हरि भटनागर
स्मृति, जड़ता और प्रतिरोध : जीवन-मृत्यु के द्वन्द्व का काव्यशास्त्र
रवि रंजन
मृत्यु को हम आम तौर पर ज़िन्दगी की अंतिम सीमा मानते हैं। किसी व्यक्ति की साँसें थम जाती हैं और हम कहते हैं कि उसका जीवन समाप्त हो गया। लेकिन क्या मृत्यु का अर्थ इतना ही है? क्या कोई व्यक्ति साँस लेते हुए भी अपने जीवन से कट सकता है? क्या किसी की मृत्यु के बाद भी उसके विचार, उसके संघर्ष और उसके साथ हुए अन्याय हमारे वर्तमान को प्रभावित करते रह सकते हैं? और क्या अपने बचे हुए समय का ठीक-ठीक पता न होने पर भी मनुष्य जीवन के प्रति अपनी उम्मीद बनाए रख सकता है? ऋतुराज की ‘मरे हुए लोग’ और ‘मरूँगा नहीं’, श्रीप्रकाश शुक्ल की ‘मरे हुए लोग’ तथा अशोक वाजपेयी की ‘कितने दिन और बचे हैं?’ को साथ पढ़ने पर ऐसे ही सवाल सामने आते हैं। ये चारों कविताएँ मृत्यु को किसी एक अर्थ में बाँधकर रझने के बजाय उसके भीतर छिपे सामाजिक, राजनीतिक, नैतिक और निजी अनुभवों को सामने लाती हैं।
इन कविताओं की तुलना का आधार केवल यह समानता नहीं है कि चारों में मृत्यु का ज़िक्र आता है। इनका रिश्ता इससे कहीं गहरा है। चारों कविताएँ अलग-अलग ढंग से पूछती हैं कि मनुष्य के जीवन का अर्थ कहाँ बनता है और कहाँ टूटता है। ऋतुराज की कविताओं में यह सवाल राजनीतिक सत्ता, स्मृति और व्यक्ति की जिजीविषा से जुड़ता है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में वह रोज़मर्रा के कामकाज, सामाजिक व्यवहार और भीतर से खाली होते जीवन का रूप लेता है। अशोक वाजपेयी की कविता में यही सवाल समय की अनिश्चितता, प्रतीक्षा और जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों के बीच खुलता है। इनका तुलनात्मक अध्ययन हमें आधुनिक मनुष्य की ऐसी तस्वीर दिखाता है जिसमें जीवन और मृत्यु के बीच की सीमा हमेशा साफ़ नहीं रहती।
यहाँ एक बुनियादी बात समझनी होगी। मृत्यु को केवल जैविक घटना मानने पर हम इन कविताओं के बड़े हिस्से को समझ नहीं पाएँगे। शरीर की मृत्यु एक वास्तविक घटना है, लेकिन उसके सामाजिक अर्थ अलग-अलग हो सकते हैं। किसी की हत्या को सामान्य मृत्यु बताकर उसके साथ हुए अन्याय को छिपाया जा सकता है। कोई व्यक्ति समाज में सक्रिय दिखाई देते हुए भी अपने जीवन की दिशा तय करने की क्षमता खो सकता है। कोई मनुष्य भविष्य की अनिश्चितता के बीच अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को बचाकर जीवन से जुड़ा रह सकता है। इस तरह मृत्यु का प्रश्न शरीर के अंत से आगे बढ़कर इस बात से जुड़ता है कि व्यक्ति दुनिया में किस तरह रहता है, समाज उसके जीवन को कितना महत्त्व देता है और वह अपने अनुभवों के भीतर अर्थ कैसे खोजता है।
इन कविताओं को समझने के लिए समय और अस्तित्व की समस्या से शुरुआत करना उपयोगी होगा। हम सभी जानते हैं कि समय बीत रहा है, लेकिन हम उसे एक ही तरह से अनुभव नहीं करते। घड़ी का समय सबके लिए एक-सा हो सकता है, पर प्रतीक्षा में बीता समय, किसी संकट के बीच बीता समय और रोज़मर्रा की एकरसता में बीता समय एक-दूसरे से अलग होते हैं। कभी एक दिन बहुत लंबा लगता है, कभी कई वर्ष बिना किसी स्पष्ट बदलाव के निकल जाते हैं। कभी भविष्य की एक छोटी-सी उम्मीद हमारे वर्तमान को अर्थ दे देती है, तो कभी जीवन की तमाम गतिविधियों के बीच भी हमें लगता है कि हम कहीं नहीं पहुँच रहे हैं। इन कविताओं में समय का अनुभव इसी तरह बदलता रहता है।
अशोक वाजपेयी की ‘कितने दिन और बचे हैं?’ इस समस्या को सीधे सामने रखती है। कविता बार-बार पूछती है कि कितना समय बाकी है, लेकिन इस प्रश्न का कोई निश्चित उत्तर नहीं देती। वक्ता को नहीं मालूम कि उसके पास कितना समय है, दूसरे व्यक्ति के पास कितना समय बचा है या किसी छोटी-सी इच्छा के पूरा होने से पहले जीवन कौन-सा मोड़ ले लेगा। चिड़िया अपने घोंसले की ओर उड़ती है, कीड़ा पगडंडी पार करता है और तितली किसी डाल पर बैठी है। इन सबके अपने छोटे-छोटे काम हैं। लेकिन उनके जीवन में कोई भी अगला क्षण निश्चित नहीं है। कवि इन दृश्यों के सहारे जीवन की उस अनिश्चितता को सामने लाता है जिसे हम जानते तो हैं, पर रोज़मर्रा की व्यस्तता में अक्सर भूल जाते हैं:
कितने दिन और बचे हैं ?
कोई नहीं जानता कि
कितने दिन और बचे हैं?
चोंच में दाने दबाए
अपने घोंसले की ओर
उड़ती चिड़िया कब सुस्ताने बैठ जाएगी
बिजली के एक तार पर और
आल्हाद से झूलकर छू लेगी दूसरा तार भी।
वनखंडी में
आहिस्ता-आहिस्ता एक पगडंडी पार करता
कीड़ा आ जाएगा
सूखी लकड़ियाँ बीनती
बुढ़िया की फटी चप्पल के तले।
रेल के इंजन से निकलती
चिनगारी तेज हवा में उड़कर
चिपक जाएगी
एक डाल पर बैठी प्रसन्न तितली से।
कोई नहीं जानता कि
कितना समय और बचा है
प्रतीक्षा करने का
कि प्रेम आएगा एक पैकेट में डाक से,
कि थोड़ी देर और बाकी है
कटहल का अचार खाने लायक होने में,
कि पृथ्वी को फिर एक बार
हरा होने और आकाश को फिर दयालु और
उसे फिर विगलित होने में
अभी थोड़ा-सा समय और है।
दस्तक होगी दरवाजे पर
और वह कहेगी कि
चलो, तुम्हारा समय हो चुका।
कोई नहीं जानता कि
कितना समय और बचा है,
मेरा या तुम्हारा।
वह आएगी –
जैसे आती है धूप
जैसे बरसता है मेघ
जैसे खिलखिलाती है
एक नन्ही बच्ची
जैसे अँधेरे में भयातुर होता है
खाली घर।
वह आएगी जरूर,
पर उसके आने के लिए
कितने दिन और बचे है
कोई नहीं जानता।
-अशोक वाजपेयी
‘कितने दिन और बचे हैं?’ कविता से गुज़रते हुए दिमाग़ में अनायास अज्ञेय की एक पंक्ति कौंधती है: ‘साहित्य का निर्माण, मानो जीवित मृत्यु का आह्वान है।’ ‘कितने दिन और बचे हैं ?’ कविता की विशेषता यह है कि इसमें ऐसा कोई बिम्ब नहीं है जो पाठक के मन में नकारात्मक भाव पैदा करे। ‘बिजली के एक तार पर सुस्ताने बैठी चिड़िया का आह्लाद से दूसरा तार छूकर लटक जाना’ इसका एक बेहतर उदाहरण है। कवि को संभवतः कहना यह है कि इस भौतिक शरीर का आज न कल समाप्त होना जब तय है तो क्यों न संभावित भविष्य को सिर धुनकर या रो-पीटकर मरने के बजाय सहज मन से प्रसन्नता के साथ स्वीकार कर लिया जाय।स्पष्ट ही मनुष्य को अपनी कम या ज़्यादा उम्र के बावजूद जीवन के अंत का पता नहीं होता और यह ठीक भी है।
महर्षि व्यास ने महाभारत में यक्ष के प्रश्न –‘किमाश्चर्यम् ?’ – का उत्तर दिलवाते हुए युधिष्ठिर के मुख से कहलवाया है कि दुनिया में लोगों की रोज़ाना मौत हो रही है ,पर सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि जो जीवित हैं वे मृत्यु-भय से मुक्त हैं :
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥
(प्रतिदिन, हर दिन, इस संसार में प्राणी यमलोक की ओर जा रहे हैं, फिर भी जो शेष रह जाते हैं, वे स्वयं को अमर समझते हैं। इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है?)
व्यास कृत ही माने गये ‘श्रीमद्भागवत महापुराण’ में तो यहाँ तक कहा गया है कि यदि मनुष्य को उसकी आयु का पता चल जाय तो वह पूरा जीवन मृत्यु-भय से ग्रस्त रहेगा। इसलिए ‘गीता’ में लिखित-‘जास्तस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च’ को जानते हुए भी बेहतर है कि मनुष्य सहज भाव से अपनी शक्ति एवं सीमा में इंसानियत के हक़ में काम करता रहे।
यह कविता भी जीवन और मृत्यु के उसी पुराने पर शाश्वत प्रश्न से टकराती हुई अपने पाठक को सहज स्वाभाविक जीवन की महिमा का एहसास कराकर ज़िंदगी के अंत को ‘डाक द्वारा कहीं से पैकेट में आये हुए प्रेमपूर्ण उपहार’ की तरह खुश होकर स्वीकार करने की अहमियत बताती है। कविता के बीच में ‘प्रसन्न तितली का चिनगारी से नष्ट हो जाना’ भी इसकी ओर इंगित करता है। अंतिम हिस्से में ‘ख़ाली घर’ की भयावहता के उल्लेख के बावजूद जीवन के अवश्यमेव अंत को धूप और बादल के खिलने तथा बरसने के लिए आने, छोटी बच्ची के खिलखिलाने आदि के रूप में देखना कवि की संवेदनशीलता और ज़िंदादिली का सबूत है, जिसमें ग़ालिब की ‘एक मर्ग-ए-ना-गहानी और है’ वाली लापरवाही भी मौजूद है। वस्तुतः यह धार्मिक हुए बगैर साहित्य में आध्यात्मिकता के पुनर्वास को संभव करती एक दार्शनिक कविता है ।
इस कविता को समझने के लिए मार्टिन हाइडेगर का चिन्तन उपयोगी हो सकता है । अपनी पुस्तक ‘बीइंग एंड टाइम’ में हाइडेगर मनुष्य के अस्तित्व को उसके समय और मृत्यु की समझ से जोड़ते हैं। मनुष्य केवल वर्तमान में मौजूद रहने वाला प्राणी नहीं है। वह अपने भविष्य की कल्पना करता है, अपने बीते हुए समय को याद करता है और उन संभावनाओं के आधार पर जीवन जीता है जिन्हें वह अभी हासिल नहीं कर पाया है। मृत्यु की अनिश्चितता उसे यह समझने का अवसर देती है कि उसका जीवन असीमित नहीं है। लेकिन इस समझ का अर्थ हर समय मृत्यु के भय में जीना नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि मनुष्य अपने समय को दूसरों की अपेक्षाओं और रोज़मर्रा की आदतों के हवाले करने के बजाय अपने जीवन के अर्थ पर विचार करे।
अशोक वाजपेयी की कविता में यह विचार किसी दार्शनिक घोषणा के रूप में नहीं आता। वह साधारण दृश्यों और इच्छाओं के सहारे खुलता है। प्रेम का डाक से आने वाला पैकेट, कटहल का अचार और पृथ्वी के फिर हरे होने की प्रतीक्षा, ये सब भविष्य से जुड़े अनुभव हैं। मनुष्य नहीं जानता कि इन्हें पूरा होने में कितना समय लगेगा। फिर भी वह इनके आने की उम्मीद करता है। इस तरह भविष्य कोई खाली जगह नहीं रह जाता। वह उन इच्छाओं से बनता है जिनके सहारे मनुष्य वर्तमान में जीता है।
कविता का यही पक्ष हेनरी बर्गसाँ की समय संबंधी अवधारणा से भी जुड़ता है। बर्गसों ने समय को केवल घड़ी से मापी जाने वाली इकाई के रूप में नहीं देखा। उनके लिए मनुष्य समय को अपने अनुभव, स्मृति और चेतना के भीतर भी जीता है। प्रतीक्षा करते हुए समय का अनुभव बदल जाता है। प्रेम का इंतज़ार और अचार के तैयार होने का इंतज़ार एक जैसे नहीं हैं, फिर भी दोनों में एक अधूरी इच्छा भविष्य की ओर खुलती है। अशोक वाजपेयी इन अलग-अलग अनुभवों को एक ही कविता में रखकर दिखाते हैं कि जीवन का समय केवल बीतता नहीं, वह हमारी इच्छाओं के साथ आकार भी लेता है।
कविता में दरवाज़े पर दस्तक का प्रसंग इस अनुभव को एक दूसरी दिशा देता है। कोई आकर कहता है, ‘चलो, तुम्हारा समय हो चुका।’ यह वाक्य जीवन के अंत को एक ऐसी घटना के रूप में सामने लाता है जिसका समय मनुष्य अपने हिसाब से तय नहीं कर सकता। हम अपनी योजनाएँ बनाते हैं, भविष्य के लिए इच्छाएँ पालते हैं और सोचते हैं कि अभी कुछ समय और मिलेगा। लेकिन मृत्यु इन योजनाओं की प्रतीक्षा नहीं करती। वह अपने समय पर आती है। इसीलिए कविता में जीवन की अनिश्चितता और भविष्य की उम्मीद एक-दूसरे के विरोध में नहीं खड़ी होतीं। मनुष्य अपने अंत को नहीं जानता, फिर भी वह आने वाले समय के लिए इच्छाएँ सँजोता है। शायद इसी में उसके जीवन का एक बुनियादी विरोधाभास छिपा है।
ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ में समय का अनुभव एक अलग रूप लेता है। यहाँ वक्ता अपने जीवन की अवधि जानने की कोशिश नहीं करता। वह उन परिस्थितियों की पहचान करता है जो उसके भीतर जीवन की सक्रियता को कम कर सकती हैं। वह कहता है कि ‘बहुत अधिक सुख’, ‘अकठिन सहज यात्राविराम’ और ‘भीतर तक बैठी जड़ शांति’ उसे मार सकती है। इस कथन में मृत्यु की आशंका किसी निश्चित भविष्य से नहीं, बल्कि वर्तमान में मौजूद जीवन की एक अवस्था से जुड़ी है। वक्ता को डर है कि वह ऐसी सुविधा और ठहराव का हिस्सा बन जाए जिसमें सोचने, सवाल करने और बदलने की इच्छा ही कम हो जाए:
मरूँगा नहीं
मरूंगा नहीं
दूसरे-दूसरे कारणों से मारा जाऊँगा
बहुत अधिक सुख से
अकठिन सहज यात्राविराम से
या फिर भीतर तक बैठी
जड़ शांति से
लेकिन नहीं मरूँगा
कुशासन की कमीनी चालों से
आए दिन के मिथ्या स्पष्टीकरणों से
रेल आरक्षण की अनुपलब्धता से
पत्नी, बच्चों की लौट आने की
गुहार से तो क़तई नहीं
अनमिले मित्रों के भटकाव भरे
रास्तों पर चलने से बिल्कुल नहीं
इस सूखी धरती के
आक-धतूरे की प्यास देखकर
शायद और भी अधिक
जीवित हो रहूँगा
– ऋतुराज: ‘फेरे’, पृ.9
यहाँ सवाल खड़ा हो सकता है कि क्या मनुष्य अपने जीवन की संभावनाओं के प्रति सचेत है, या वह केवल पहले से बनी दिनचर्या के सहारे जी रहा है? लेकिन ऋतुराज की कविता इस सवाल को केवल व्यक्ति की निजी पसंद तक सीमित नहीं रखती। वक्ता जिन स्थितियों का उल्लेख करता है, वे सामाजिक और राजनीतिक जीवन से भी जुड़ी हैं। कुशासन, झूठे स्पष्टीकरण, रेल आरक्षण की अनुपलब्धता और रिश्तों के दबाव के बीच व्यक्ति को अपने जीवन की दिशा तय करनी पड़ती है। इसीलिए उसकी जिजीविषा केवल निजी साहस का मामला नहीं है। वह उन परिस्थितियों से जूझने की इच्छा भी है जो व्यक्ति के समय, स्वतंत्रता और संवेदना को सीमित करती हैं।
‘अकठिन सहज यात्राविराम’ में समय और जीवन की गति का एक दिलचस्प संबंध दिखाई देता है। यात्रा का अर्थ केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचना नहीं है। यात्रा में अनजान अनुभवों से सामना होता है और मनुष्य अपनी पहले से बनी धारणाओं को बदल सकता है। इसके विपरीत, सहज विराम में वह अपनी परिचित दुनिया के भीतर सुरक्षित रह सकता है। हर ठहराव बुरा नहीं होता, लेकिन जब ठहरना जीवन की आदत बन जाए और आगे बढ़ने की इच्छा ही समाप्त हो जाए, तब वह जड़ता का रूप ले सकता है। ऋतुराज का वक्ता इसी जड़ता से सावधान करता है। वह जानता है कि जीवन केवल समय बीतने का नाम नहीं है। उसमें अनुभव, बदलाव और अपने आसपास की दुनिया से जुड़ने की इच्छा भी होनी चाहिए।
‘मरूँगा नहीं’ कविता ज़िन्दगी और मौत के बीच के फ़र्क को एक नये ढंग से देखती है। कविता का प्रोटागोनिस्ट कहता है कि वह ‘बहुत अधिक सुख’, ‘अकठिन सहज यात्राविराम’ और ‘भीतर तक बैठी जड़ शांति’ से मारा जा सकता है। यहाँ सुख और शांति के भीतर छिपे उस ख़तरे की ओर इशारा है, जो मनुष्य को धीरे-धीरे निष्क्रिय और संवेदनहीन बना देता है। जब हम अपनी सुविधाओं में सिमट जाते हैं, सवाल करना छोड़ देते हैं और दूसरों के दुख से हमारा कोई रिश्ता नहीं रह जाता, तब जीवन अपनी गहराई खोने लगता है।
इसके बरक्स कवि कुशासन की चालों, रोज़मर्रा के झूठे स्पष्टीकरणों, रेल आरक्षण की अनुपलब्धता, पत्नी-बच्चों की लौट आने की गुहार और अनमिले मित्रों के भटकाव भरे रास्तों से मरने से इनकार करता है। इन पंक्तियों में राजनीतिक व्यवस्था के प्रति आक्रोश भी है और निजी रिश्तों की उलझनों का एहसास भी। कवि जानता है कि जीवन में परेशानियाँ कम नहीं हैं, लेकिन वह उन्हें अपनी चेतना और जीने की इच्छा पर हावी नहीं होने देना चाहता। उसका इनकार समस्याओं से मुँह मोड़ना नहीं, बल्कि उनके बीच अपनी स्वतंत्रता बचाए रखने की कोशिश है।
कविता का सबसे मार्मिक मोड़ आख़िर में आता है, जब वक्ता कहता है कि इस सूखी धरती पर आक और धतूरे की प्यास देखकर वह ‘शायद और भी अधिक / जीवित हो रहूँगा।’ यह दृश्य कविता को एक गहरी मानवीय संवेदना से जोड़ देता है। सूखी धरती पर उगे ये साधारण पौधे अभाव के बीच भी जीवन की इच्छा का संकेत देते हैं। उनकी प्यास में कवि को जीवन की वह जिद दिखाई देती है, जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद हार नहीं मानती।
यही इस कविता की ख़ासियत है। यह किसी आसान आशावाद का सहारा नहीं लेती। धरती सूखी है, प्यास बनी हुई है और जीवन के संघर्ष भी ख़त्म नहीं हुए हैं। फिर भी जीने की वजह मौजूद है। ऋतुराज हमें बताते हैं कि जीवित रहने का अर्थ केवल साँस लेते रहना नहीं है। अपने भीतर संवेदना, सवाल करने की इच्छा और दूसरों के दुख को महसूस करने की क्षमता बचाए रखना भी ज़रूरी है।
इस कविता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी भाषा है। ऋतुराज ने बड़े दार्शनिक विचारों को व्यक्त करने के लिए किसी भारी-भरकम शब्दावली का सहारा नहीं लिया। उनकी भाषा में राजनीतिक आक्रोश है, निजी रिश्तों की बेचैनी है और प्रकृति के प्रति संवेदनशील दृष्टि भी। ‘कमीनी चालों’ जैसी बोलचाल की अभिव्यक्ति और ‘जड़ शांति’ जैसे विचारपूर्ण पद एक ही कविता में साथ आते हैं। इससे कविता का स्वर बनावटी नहीं लगता। वक्ता कभी राजनीतिक व्यवस्था पर गुस्सा करता है, कभी अपने निजी जीवन के खिंचाव को पहचानता है और कभी सूखी धरती पर उगे पौधों को देखकर जीवन की संभावना खोजता है।
कविता की बनावट भी उसके अर्थ को आगे बढ़ाती है। ‘नहीं मरूँगा’ का दोहराव कविता के भीतर एक लय पैदा करता है। लेकिन यह लय किसी विजय-घोष जैसी नहीं है। वक्ता हर बार एक अलग कारण का नाम लेता है और उसके साथ अपने संबंध को स्पष्ट करता है। वह पहले बताता है कि किन स्थितियों से उसका जीवन भीतर से ख़त्म हो सकता है। फिर वह उन सामाजिक और निजी दबावों से इनकार करता है जो उसे अपने रास्ते से हटा सकते हैं। आख़िर में वह अपने जीवित रहने का कारण किसी विचारधारा या नारे में नहीं, बल्कि धरती पर मौजूद एक छोटे से दृश्य में खोजता है।
श्रीप्रकाश शुक्ल की ‘मरे हुए लोग’ इस समस्या को एक और ढंग से सामने लाती है। उनकी कविता के लोग अपने काम में लगे रहते हैं। उनके पास झोले हैं, औज़ार हैं, सूचनाएँ हैं और रोज़मर्रा की गतिविधियाँ हैं। वे सामाजिक जीवन से बाहर नहीं हैं। इसके बावजूद कवि कहता है कि वे पहले ही मर चुके हैं। इस विरोधाभास को समझने के लिए यह देखना ज़रूरी है कि कविता में समय की गति कैसी है। पात्र लगातार कुछ न कुछ करते हैं, लेकिन उनके जीवन में कोई सार्थक बदलाव दिखाई नहीं देता। उनकी दिनचर्या चलती रहती है, जबकि उनके भीतर जीवन की उम्मीद धीरे-धीरे कम होती जाती है:
मरे हुए लोग
मरे हए लोगों के इस शहर में
हर आदमी अपने पुर्नजन्म को लेकर परेशान है
मरे हुए लोग
मरे हुए लोगों में शामिल नहीं हैं
उन्हें अपने मरने से परहेज है
जबकि न जाने कितने पहले वे मर चुके हैं
मरे हुए लोगों के अपने झोले हैं
अपनी टंगारी और
अपनी तगाड़ी
सिर से पाँव तक उनके पास सूचनायें हैं
और वे खुद एक सूचना हैं
हमारे समय में डाकिये की तरह
कील जब कभी चुभती है
उनके चेहरों पर खिंचता है एक तनाव
उसे ढीला करने की वे करते हैं कोशिश
और थोड़ी देर बाद
खचिया भर मड़िया में उतराने लगते हैं
मरे हुए लोग
जीने की आशा लिए
लगातार मरते जा रहे हैं
अपनी सारी बरक्कत के बावजूद
इस पवित्र शहर में !
-श्रीप्रकाश शुक्ल
वस्तुत: यह कविता समकालीन जीवन की एक ऐसी विडंबनापूर्ण तस्वीर प्रस्तुत करती है जिसमें मृत्यु जैविक घटना न रहकर एक सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक अवस्था बन जाती है। कविता का आरंभ ही एक गहरे व्यंग्य और विरोधाभास से होता है—“मरे हए लोगों के इस शहर में / हर आदमी अपने पुर्नजन्म को लेकर परेशान है।” यहाँ ‘मरे हुए लोगों का शहर’ कोई वास्तविक नगर नहीं, बल्कि ऐसा सामाजिक संसार है जहाँ मनुष्य अपनी संवेदनशीलता, आत्मबोध और जीवंत मानवीय संबंधों से कट चुका है। विडंबना यह है कि जो पहले से ही मृतवत् जीवन जी रहे हैं, वे पुनर्जन्म की चिंता में व्यस्त हैं। इस प्रकार कविता आरंभ से ही मनुष्य की आत्मवंचना और मिथ्या चेतना को उजागर करती है।
कवि आगे कहता है कि “मरे हुए लोग / मरे हुए लोगों में शामिल नहीं हैं।” यह कथन पहली दृष्टि में विरोधाभासी प्रतीत होता है, किंतु इसी में कविता का केंद्रीय अर्थ निहित है। जिन लोगों का जीवन भीतर से निष्प्राण हो चुका है, वे स्वयं को मृत मानने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्हें “अपने मरने से परहेज है”, अर्थात् वे अपनी वास्तविक स्थिति को स्वीकार नहीं करना चाहते। यहाँ मृत्यु का अर्थ शारीरिक अंत नहीं, बल्कि संवेदना, विवेक, प्रतिरोध और आत्मिक ऊर्जा का क्षय है। “जबकि न जाने कितने पहले वे मर चुके हैं” पंक्ति इस आत्मप्रवंचना को और तीखा बनाती है। कवि का संकेत उस सामाजिक स्थिति की ओर है जहाँ मनुष्य जीवित दिखाई देता है, काम करता है, चलता-फिरता है, किंतु उसके भीतर जीवन का मूल स्पंदन समाप्त हो चुका है।
“मरे हुए लोगों के अपने झोले हैं / अपनी टंगारी और / अपनी तगाड़ी”—इन पंक्तियों में श्रम और आजीविका से जुड़े उपकरणों का उल्लेख है। झोला, टंगारी और तगाड़ी ऐसे प्रतीक हैं जो दैनिक जीवन, श्रम और सामाजिक गतिविधियों की ओर संकेत करते हैं। कवि यह दिखाता है कि ये लोग पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हैं; वे काम कर रहे हैं, जीवन के व्यवहारों में भाग ले रहे हैं, परंतु यह सक्रियता मात्र बाहरी है। उनके पास जीवन के औजार तो हैं, किंतु जीवन की चेतना नहीं। इस प्रकार कविता आधुनिक मनुष्य के यांत्रिक अस्तित्व को रेखांकित करती है, जहाँ कर्म बचा हुआ है, पर कर्म के पीछे की मानवीय ऊष्मा लुप्त होती जा रही है।
कविता का एक महत्त्वपूर्ण बिंब है—“सिर से पाँव तक उनके पास सूचनायें हैं / और वे खुद एक सूचना हैं / हमारे समय में डाकिये की तरह।” यहाँ कवि सूचना-प्रधान आधुनिक समाज की आलोचना करता है। आज मनुष्य ज्ञान, समाचार, आँकड़ों और सूचनाओं से घिरा हुआ है, किंतु इन सबके बावजूद वह जीवन के गहरे अनुभवों से दूर होता जा रहा है। “वे खुद एक सूचना हैं” कहना मनुष्य के वस्तुकरण और अमानवीकरण की ओर संकेत करता है। व्यक्ति अब अपनी विशिष्टता और व्यक्तित्व के साथ उपस्थित नहीं है; वह सूचना-तंत्र का एक हिस्सा बन गया है। “डाकिये की तरह” उपमा भी ध्यान देने योग्य है। डाकिया संदेश पहुँचाता है, पर स्वयं संदेश नहीं होता। यहाँ स्थिति उलट जाती है—मनुष्य स्वयं सूचना में बदल गया है। यह परिवर्तन आधुनिक जीवन की उस विडंबना को सामने लाता है जहाँ मनुष्य का अस्तित्व उसके मानवीय तत्त्व से नहीं, बल्कि उसकी उपयोगिता और सूचना-मूल्य से परिभाषित होने लगता है।
“कील जब कभी चुभती है / उनके चेहरों पर खिंचता है एक तनाव”—यहाँ ‘कील’ जीवन की किसी असुविधा, पीड़ा, संकट या यथार्थ के अचानक हस्तक्षेप का प्रतीक है। जब जीवन की कोई कठोर सच्चाई उन्हें छूती है, तब उनके चेहरे पर तनाव उभर आता है। किंतु यह तनाव भी स्थायी नहीं है। वे “उसे ढीला करने की कोशिश” करते हैं। अर्थात् वे समस्या या पीड़ा के वास्तविक कारणों का सामना नहीं करते, बल्कि उससे उत्पन्न बेचैनी को कम करने का प्रयास करते हैं। यह आधुनिक मनुष्य की उस प्रवृत्ति का चित्रण है जिसमें वह संकट की जड़ों तक जाने के बजाय केवल उसके प्रभावों को दबाने में लगा रहता है।
“और थोड़ी देर बाद / खचिया भर मड़िया में उतराने लगते हैं”—यह अंश लोकजीवन से लिए गए शब्दों के कारण विशेष अर्थवत्ता ग्रहण करता है। यहाँ कवि एक ऐसी स्थिति का संकेत करता है जिसमें लोग थोड़ी-सी राहत मिलते ही फिर उसी जड़, निष्क्रिय और आत्मसंतुष्ट अवस्था में लौट जाते हैं। जीवन की वास्तविक समस्याएँ बनी रहती हैं, पर उनसे जूझने का साहस या इच्छा विकसित नहीं होती। इस प्रकार कविता केवल सामाजिक आलोचना नहीं करती, बल्कि मनुष्य की मानसिक संरचना पर भी प्रश्न उठाती है।
कविता के अंतिम हिस्से में उसका सबसे मार्मिक और तीखा कथन सामने आता है—“मरे हुए लोग / जीने की आशा लिए / लगातार मरते जा रहे हैं।” यह पंक्ति पूरी कविता का सार अपने भीतर समेटे हुए है। यहाँ एक गहरा विरोधाभास उपस्थित है। जीने की आशा सामान्यतः जीवनदायी होती है, किंतु यहाँ वही आशा मृत्यु की प्रक्रिया का हिस्सा बन गई है। इसका कारण यह है कि यह आशा सक्रिय परिवर्तन, संघर्ष और आत्मजागरण से नहीं जुड़ी, बल्कि भ्रम और प्रतीक्षा से जुड़ी हुई है। लोग जीवन की कामना तो करते हैं, पर जीवन को संभव बनाने वाले कदम नहीं उठाते। परिणामतः वे बार-बार मरते हैं, अर्थात् अपनी मनुष्यता को और अधिक खोते जाते हैं।
“अपनी सारी बरक्कत के बावजूद / इस पवित्र शहर में”—इन अंतिम पंक्तियों में कविता का व्यंग्य अपने चरम पर पहुँचता है। ‘बरक्कत’ समृद्धि, सुविधा और संसाधनों की ओर संकेत करती है, जबकि ‘पवित्र शहर’ नैतिकता, धर्म और सांस्कृतिक गौरव के दावे का प्रतीक है। कवि दिखाता है कि बाहरी समृद्धि और कथित पवित्रता के बावजूद मनुष्य का जीवन भीतर से रिक्त हो सकता है। इस प्रकार कविता उस सामाजिक यथार्थ को उद्घाटित करती है जहाँ धार्मिकता, समृद्धि और विकास के दावों के बीच मनुष्य की जीवंतता लगातार क्षीण होती जा रही है।
वस्तुत: ‘मरे हुए लोग’ एक गहन सामाजिक-आलोचनात्मक कविता है जो मृत्यु के रूपक के माध्यम से समकालीन मनुष्य की संवेदनहीनता, आत्मविस्मृति, सूचना-केंद्रित जीवन, यांत्रिक सक्रियता और आत्मप्रवंचना को उजागर करती है। कविता की भाषा में लोकजीवन के शब्द, व्यंग्यात्मक स्वर, विरोधाभास और प्रतीकात्मकता का प्रभावी प्रयोग हुआ है। कवि यह संकेत करता है कि मनुष्य का वास्तविक जीवन केवल शारीरिक अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसकी चेतना, संवेदना और आत्मबोध में निहित है। जब ये तत्त्व नष्ट हो जाते हैं, तब मनुष्य जीवित रहते हुए भी ‘मरे हुए लोगों’ की श्रेणी में आ जाता है।
इस कविता को बर्गसाँ के समय संबंधी विचारों के साथ पढ़ने पर एक अंतर सामने आता है। समय का बीतना और समय का अनुभव करना एक बात नहीं है। श्रीप्रकाश शुक्ल के पात्रों का समय गतिविधियों से भरा है, लेकिन उनके अनुभव में कोई नई संभावना खुलती हुई नहीं दिखती। उनके चेहरे पर तनाव आता है, वे उसे कम करने की कोशिश करते हैं और फिर अपने काम में लग जाते हैं। इस तरह एक ही क्रम बार-बार लौटता है। उनकी दिनचर्या में समय आगे बढ़ता है, लेकिन जीवन अपने पुराने घेरे से बाहर नहीं निकल पाता।
सवाल है कि क्या मनुष्य का सक्रिय दिखाई देना ही उसके जीवित होने का प्रमाण है? कविता इस धारणा पर संदेह करती है। काम करना, सामान ढोना, सूचनाएँ जुटाना और सामाजिक पहचान बनाए रखना अपने आप में जीवन की सार्थकता सुनिश्चित नहीं करते। मनुष्य अपने काम में लगा रह सकता है, लेकिन अगर वह अपने जीवन के अर्थ, अपनी इच्छाओं और अपनी परिस्थितियों पर विचार करने की क्षमता खो देता है, तो उसकी सक्रियता भी एक तरह की जड़ता बन सकती है। श्रीप्रकाश शुक्ल के पात्रों की त्रासदी इसी विरोधाभास में है। वे जीवन की गतिविधियों से बाहर नहीं हैं, लेकिन उन गतिविधियों के भीतर अपने लिए कोई नया रास्ता नहीं खोज पाते।
इन तीनों कविताओं के साथ ऋतुराज की ‘मरे हुए लोग’ को पढ़ने पर समय का एक और रूप सामने आता है। यहाँ मृत लोग अतीत का हिस्सा हैं, लेकिन वे वर्तमान से बाहर नहीं गए। जीवित लोग उन्हें उठाए फिरते हैं। इस तरह अतीत वर्तमान के भीतर मौजूद रहता है और वर्तमान के व्यवहार को प्रभावित करता है। मृतकों की स्मृति केवल बीती हुई घटना का रिकॉर्ड नहीं है। वह एक ऐसा सवाल है जो बार-बार लौटता है। क्या समाज उन लोगों के साथ हुए अन्याय को स्वीकार करेगा? क्या वह उनकी मृत्यु के लिए ज़िम्मेदार लोगों से जवाब माँगेगा? या वह समय बीतने के साथ उस घटना को भुला देगा?
मरे हुए लोग
मरे हुए लोग
अभी तक यहाँ से गए नहीं हैं
जीवित लोग उन्हें उठाए फिर रहे हैं
कहना बहुत आसान है
कि वे ख़ुद मरे थे
न कि उन्हें मारा गया था
कहना बहुत आसान है
कि महज़ सत्ता हासिल करने के लिए
उनका इस्तेमाल किया गया था
फिर उन्हें मारा गया था
ताकि वे भीतर न घुस पाएँ
कभी कोई बूढ़ा आता है
तो तनिक वे उठकर बैठने लगते हैं
युवाओं की भीड़ देखकर
कुछ क़दम चलने का नाटक करते हैं
कभी गालियों से गढ़ी भाषा
पढ़कर चीख़ने लगते हैं
क्या होगा ऐसे शब्दों का
अब नहीं तो तब
उन्हें फाँसी होगी?
झूठ के विराट उजाले में
कौन बचेगा उन्हें पढ़ने?
जो लोग न मरे हैं
और न जिए हैं पूरे कभी
व्यर्थताओं का अलाव सुलगाए
इसी तरह अपने भीतर पड़े
मरे हुओं को याद करते रहेंगे
-ऋतुराज : ‘फेरे’, पृष्ठ 90
इस कविता के प्रसंग में हाइडेगर और बर्गसों के साथ-साथ सामूहिक स्मृति की अवधारणा भी उपयोगी है। समय केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं है। समाज भी अतीत को अपने वर्तमान में लेकर चलता है। कुछ घटनाएँ सार्वजनिक स्मृति का हिस्सा बनती हैं, जबकि कुछ को धीरे-धीरे भुला दिया जाता है। लेकिन ऋतुराज की कविता दिखाती है कि भूलना हमेशा स्वाभाविक प्रक्रिया नहीं होती। कभी-कभी किसी मृत्यु के बारे में लगातार एक खास तरह से बोलना उसके वास्तविक अर्थ को दबा देता है। जब कहा जाता है कि लोग ‘ख़ुद मरे थे / न कि उन्हें मारा गया था’, तब अतीत का अर्थ बदलने की कोशिश होती है। इस तरह स्मृति और विस्मृति दोनों राजनीतिक क्रियाएँ बन जाती हैं।
इन कविताओं में समय और अस्तित्व का सवाल अंततः एक व्यापक समस्या तक पहुँचता है। मनुष्य केवल इसलिए जीवित नहीं है कि उसका शरीर काम कर रहा है या उसकी दिनचर्या चल रही है। उसके जीवन में स्मृति, भविष्य की संभावना, अपने अनुभवों पर विचार करने की क्षमता और दुनिया से संबंध भी ज़रूरी हैं। अशोक वाजपेयी के यहाँ भविष्य की अनिश्चितता जीवन की छोटी इच्छाओं को अर्थ देती है। ऋतुराज के यहाँ अपने भीतर की जड़ता को पहचानना जीवन बचाने की शर्त बन जाता है। श्रीप्रकाश शुक्ल के यहाँ लगातार चलती दिनचर्या जीवन के खालीपन को उजागर करती है। और ऋतुराज की दूसरी कविता में अतीत के मृत लोग वर्तमान से जवाब माँगते रहते हैं।
इसलिए इन कविताओं में जीवन और मृत्यु का अंतर किसी सरल परिभाषा से तय नहीं होता। समय बीत सकता है, लेकिन जीवन ठहर सकता है। शरीर की मृत्यु हो सकती है, लेकिन उसके साथ जुड़े सवाल वर्तमान में जीवित रह सकते हैं। भविष्य अनिश्चित हो सकता है, फिर भी उसकी प्रतीक्षा जीवन को दिशा दे सकती है। इन कविताओं का पहला साझा निष्कर्ष यही है कि मनुष्य के अस्तित्व को केवल उसकी जैविक अवधि से नहीं समझा जा सकता। उसे यह भी देखना होगा कि वह अपने समय को कैसे अनुभव करता है, अतीत से क्या संबंध बनाता है और भविष्य की किन संभावनाओं को अपने भीतर जीवित रखता है।
समय और अस्तित्व की इस चर्चा के बाद इन कविताओं का दूसरा बड़ा सवाल सत्ता और राजनीतिक स्मृति का है। यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि सत्ता का असर केवल इस बात पर नहीं पड़ता कि लोग कैसे जीते हैं। वह इस बात को भी प्रभावित करती है कि समाज किन घटनाओं को याद रखता है, किन मौतों को किस नाम से पुकारता है और किन लोगों के अनुभवों को सच मानता है। ऋतुराज की ‘मरे हुए लोग’ इसी समस्या को सीधे उठाती है। कविता में मृत लोगों की उपस्थिति इसलिए बेचैन करती है कि उनकी मृत्यु के साथ जुड़ा सच अभी पूरी तरह सामने नहीं आया है। जीवित लोग उन्हें अपने साथ लेकर चलते हैं, लेकिन उनकी स्मृति को किस अर्थ में समझा जाए, यह सवाल खुला रहता है।
‘कहना बहुत आसान है / कि वे ख़ुद मरे थे / न कि उन्हें मारा गया था।’ इन पंक्तियों में कवि मृत्यु के बारे में प्रचलित भाषा को चुनौती देता है। किसी व्यक्ति की मौत को उसकी अपनी नियति बता देना और उसकी हत्या को स्वीकार करना दो अलग बातें हैं। पहली स्थिति में मृत्यु एक ऐसी घटना बन जाती है जिसके लिए किसी से जवाब नहीं माँगा जाता। दूसरी स्थिति में सवाल उठता है कि किसने मारा, क्यों मारा और उस हिंसा को रोकने की ज़िम्मेदारी किसकी थी। इस तरह भाषा किसी घटना का केवल विवरण नहीं देती। वह यह भी तय करती है कि उसके बाद न्याय की माँग कितनी दूर तक जा सकती है।
यहाँ हन्ना आरेंट के राजनीतिक विचारों से मदद ली जा सकती है। आरेंट ने सार्वजनिक जीवन में सच और झूठ के संबंध पर विचार करते हुए दिखाया कि संगठित राजनीतिक झूठ केवल किसी एक तथ्य को छिपाने तक सीमित नहीं रहता। वह लोगों की साझा दुनिया को ही बदल सकता है। जब बार-बार किसी घटना के बारे में एक ही तरह का झूठ बोला जाता है, तो लोगों के लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि किस पर भरोसा करें। ऋतुराज की कविता में ‘झूठ के विराट उजाले’ का बिंब इसी संकट की ओर संकेत करता है। झूठ यहाँ किसी कोने में छिपा नहीं है। वह सार्वजनिक जीवन के बीचोंबीच खड़ा है और सच को पहचानने की क्षमता पर दबाव डाल रहा है।
इस बिंब में ‘उजाले’ का इस्तेमाल ख़ास ध्यान खींचता है। कवि झूठ को अँधेरे से नहीं जोड़ता, बल्कि उसे विराट उजाले के रूप में सामने लाता है। ऐसा उजाला जिसमें सब कुछ दिखाई देने का दावा तो है, लेकिन सच को पहचानना मुश्किल हो जाता है। आज के सामाजिक जीवन में भी सूचना की अधिकता और सच की उपलब्धता एक ही बात नहीं हैं। बहुत सारी बातें लगातार सामने आ सकती हैं, फिर भी उनके बीच किसी घटना की वास्तविकता छिप सकती है। कविता इस समस्या को किसी तकनीकी बहस में बदले बिना एक तीखे सवाल में समेट देती है, ‘कौन बचेगा उन्हें पढ़ने?’ यानी अगर झूठ ही सार्वजनिक समझ का आधार बन जाए, तो मृतकों की स्मृति को सही अर्थ में पढ़ने वाला कौन बचेगा?
जूडिथ बटलर की पुस्तक ‘फ्रेम्स ऑफ़ वॉर’ के मद्देनज़र इस कविता को एक और तरह से समझा जा सकता है। बटलर पूछती हैं कि समाज किन जिंदगियों को शोक के योग्य मानता है और किनकी मृत्यु को सामान्य घटना की तरह स्वीकार कर लेता है। यह सवाल ऋतुराज की कविता के सन्दर्भ में बहुत प्रासंगिक है। हर मृत व्यक्ति की मृत्यु को समान सामाजिक जगह नहीं मिलती। कुछ लोगों की मृत्यु पर सार्वजनिक शोक मनाया जता है, उनके नाम याद रखे जाते हैं और उनकी यादों को बार-बार दोहराया जाता है। कुछ लोगों की मृत्यु को जल्दी भुला दिया जाता है। कुछ के बारे में यह तक कहा जाता है कि वे अपनी मौत के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार थे।
इस दृष्टि से कविता का राजनीतिक सवाल केवल हत्या करने वालों की पहचान तक सीमित नहीं रहता। कविता इस बात की भी जाँच करती है कि समाज मृतकों के साथ कैसा व्यवहार करता है। किसी व्यक्ति को मार देना एक तरह की हिंसा है, लेकिन उसकी मृत्यु के अर्थ को बदल देना भी हिंसा का विस्तार हो सकता है। अगर समाज यह मान ले कि मृतक के साथ जो हुआ, वह स्वाभाविक था या उसके अपने कर्मों का परिणाम था, तो उसकी मृत्यु से जुड़ा अन्याय धीरे-धीरे अदृश्य हो सकता है। कविता इस अदृश्यता का विरोध करती है। वह मृतकों को फिर से वर्तमान में लाती है, ताकि उनके साथ हुए व्यवहार पर सवाल उठाया जा सके।
वाल्टर बेंजामिन के इतिहास संबंधी विचार इस पाठ को और गहरा कर सकते हैं। बेंजामिन ने इतिहास को केवल विजेताओं की उपलब्धियों के क्रम में देखने पर सवाल उठाया। इतिहास में उन लोगों के अनुभव भी शामिल हैं जो हार गए, जिनकी आवाज़ दबा दी गई या जिनके संघर्ष अधूरे रह गए। ऋतुराज की कविता में मृत लोग इसी अधूरे इतिहास का हिस्सा हैं। वे सत्ता की स्मृति में किसी उपयोगी नाम की तरह मौजूद हो सकते हैं, लेकिन उनकी अपनी माँगें और उनकी मृत्यु के वास्तविक कारण पीछे छूट सकते हैं।
ऋतुराज के यहाँ ‘महज़ सत्ता हासिल करने के लिए / उनका इस्तेमाल किया गया था’ पंक्ति में इस समस्या का एक रूप दिखाई देता है। सत्ता मृतकों की स्मृति का इस्तेमाल अपने पक्ष में कर सकती है। वह उनके नाम पर समर्थन जुटा सकती है, उनके संघर्ष को अपने राजनीतिक उद्देश्य के अनुकूल बता सकती है और फिर उन सवालों से बच सकती है जिन्हें वे अपने जीवन में उठाते थे। इस तरह मृतक सार्वजनिक स्मृति में तो बने रहते हैं, लेकिन उनकी स्मृति का अर्थ बदल जाता है। बेंजामिन की दृष्टि से कविता को पढ़ने पर सवाल उठता है कि क्या मृतकों को याद करना केवल उनके नाम को दोहराना है, या उनके अधूरे संघर्षों को समझना भी है?
इस संदर्भ में कविता की एक और पंक्ति ध्यान खींचती है, ‘कभी कोई बूढ़ा आता है / तो तनिक वे उठकर बैठने लगते हैं।’ मृत लोगों का यह उठकर बैठना किसी ऐतिहासिक स्मृति के जागने जैसा भी है। बूढ़े के साथ अनुभवों और बीते समय का रिश्ता जुड़ सकता है। युवाओं की भीड़ में भविष्य की संभावना दिखाई दे सकती है। लेकिन कवि तुरंत कहता है कि वे कुछ क़दम चलने का नाटक करते हैं। इस ‘नाटक’ को केवल मृतकों की निष्क्रियता के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। यह उस सार्वजनिक जीवन पर भी सवाल हो सकता है जिसमें पुराने संघर्षों और नये आंदोलनों की छवियाँ तो मौजूद हैं, लेकिन वे वास्तविक बदलाव में नहीं बदल पातीं।
यहीं स्मृति की नैतिकता का प्रश्न सामने आता है। मौरिस हाल्बवैक्स की सामूहिक स्मृति संबंधी अवधारणा बताती है कि हम अतीत को केवल अपनी निजी यादों के सहारे नहीं समझते। परिवार, समुदाय और राजनीतिक संस्थाएँ भी यह तय करती हैं कि हम किन घटनाओं को याद रखें और उनका क्या अर्थ निकालें। ऋतुराज की कविता इस सामूहिक स्मृति की सीमा पर सवाल उठाती है। लोग मृतकों को याद करते हैं, लेकिन याद करने की प्रक्रिया अपने आप में न्याय की गारंटी नहीं देती। स्मृति अगर केवल दुख व्यक्त करने, राजनीतिक लाभ लेने या अपनी पहचान बनाए रखने का साधन बन जाए, तो वह उस ज़िम्मेदारी से दूर हो सकती है जो मृतकों की याद हम पर डालती है।
वस्तुत: याद करना सिर्फ़ बीती हुई घटना को ताज़ा रखना नहीं है। यह भी देखना पड़ता है कि हम उसे किस रूप में याद कर रहे हैं। इसी प्रकार किसी घटना को भूल जाना हमेशा लापरवाही नहीं होता, लेकिन जब भूलने की प्रक्रिया सत्ता के हित में काम करती है, तब वह अन्याय को टिकाए रखने का साधन बन सकती है। ऋतुराज की कविता में मृत लोग इसलिए लौटते रहते हैं कि समाज उनकी मृत्यु के अर्थ पर अंतिम फैसला नहीं कर पाया है। उनकी उपस्थिति जीवित लोगों से जवाब माँगती है।
इस राजनीतिक स्मृति के बरक्स अशोक वाजपेयी की कविता मृत्यु के निजी और साझा अनुभव को सामने रखती है। वहाँ मृत्यु किसी विशेष राजनीतिक घटना का नतीजा नहीं है। वह जीवन की अनिश्चितता के बीच आने वाली एक ऐसी संभावना है जिसका समय किसी को मालूम नहीं। फिर भी दोनों कवियों के यहाँ एक साझा बात है। मृत्यु मनुष्य को अपने वर्तमान की ओर लौटाती है। ऋतुराज के यहाँ यह वापसी न्याय और स्मृति की ज़िम्मेदारी के रूप में होती है। अशोक वाजपेयी के यहाँ यह जीवन की छोटी इच्छाओं और प्रतीक्षाओं को ध्यान से देखने के रूप में सामने आती है। दोनों के बीच अंतर बनाए रखते हुए हम कह सकते हैं कि मृत्यु का विचार इन कविताओं में वर्तमान को समझने का एक रास्ता बनता है।
सत्ता और स्मृति के बाद श्रम तथा सामाजिक जड़ता का सवाल इन कविताओं की तुलना में एक नया मोड़ लाता है। श्रीप्रकाश शुक्ल की ‘मरे हुए लोग’ इस संदर्भ में ख़ास तौर पर ध्यान देने योग्य है। कविता के पात्र अपने झोले, टंगारी और तगाड़ी लेकर चलते हैं। उनके पास काम करने के औज़ार हैं और उनके जीवन में रोज़मर्रा की गतिविधियाँ जारी हैं। वे न तो किसी वीरान जगह पर पड़े हैं और न ही समाज से पूरी तरह अलग हुए हैं। इसके बावजूद कवि उन्हें मरा हुआ कहता है। यह विरोधाभास कविता का केंद्रीय तनाव बनाता है।
यहाँ कविता को समझने के लिए मार्क्स की अलगाव संबंधी अवधारणा से मदद ली जा सकती है। मार्क्स ने आधुनिक श्रम व्यवस्था में उस स्थिति की चर्चा की जिसमें मनुष्य अपने श्रम, उसके परिणाम और अपने मानवीय सामर्थ्य से अलग हो सकता है। श्रम जीवन चलाने का साधन है, लेकिन जब मनुष्य का पूरा जीवन केवल काम करने और अपनी ज़रूरतें पूरी करने तक सिमट जाए, तो उसकी गतिविधियाँ उसके लिए स्वतंत्रता या अपने विकास का रास्ता नहीं खोल पातीं। वह काम करता रहता है, पर उसके काम का अर्थ उसके अपने अनुभव से कट सकता है।
श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में यह अलगाव सीधे किसी कारखाने या श्रम संबंध की कहानी के रूप में नहीं आता। कवि पात्रों के कामकाज और उनके पास मौजूद सामान का उल्लेख करता है। उनके पास ‘सिर से पाँव तक’ सूचनाएँ हैं और वे ख़ुद भी एक सूचना हैं। इस पंक्ति में मनुष्य की सामाजिक पहचान और उसके काम के बीच का संबंध सामने आता है। वह सूचनाएँ ढोता है, उन्हें पहुँचाता है और ख़ुद भी समाज में एक सूचना की तरह दर्ज होता है। लेकिन क्या इस प्रक्रिया में उसकी अपनी आवाज़ बची रहती है? क्या वह अपने अनुभवों को व्यक्त कर सकता है, या वह केवल दूसरों तक कुछ पहुँचाने का माध्यम बनकर रह जाता है?
कविता में डाकिये की तुलना इसी प्रश्न को आगे बढ़ाती है। डाकिया संदेश लेकर चलता है, लेकिन संदेश का अर्थ उसके अपने जीवन से जुड़ा हो, यह ज़रूरी नहीं। उसी तरह कविता के पात्र भी अपने काम में लगे रहते हैं, लेकिन उनके काम और उनकी निजी इच्छाओं के बीच का संबंध स्पष्ट नहीं होता। वे समाज की गतिविधियों का हिस्सा हैं, फिर भी उनके जीवन में किसी स्वतंत्र दिशा का संकेत कम दिखाई देता है। इस स्थिति को केवल आर्थिक गरीबी से नहीं समझा जा सकता। यहाँ समस्या मनुष्य के सामाजिक अस्तित्व की भी है। वह दुनिया में अपना काम करता है, लेकिन क्या दुनिया में अपनी जगह भी तय करता है?
मार्क्सवादी आलोचना के नज़रिए से इस कविता को पढ़ते हुए ध्यान रखना ज़रूरी है की इसमें पात्रों की जड़ता को उनकी व्यक्तिगत कमजोरी न मान लिया जाय । हमें उन सामाजिक परिस्थितियों पर भी ध्यान देना होगा जिनमें वे रहते हैं। कविता उनके काम, औज़ारों और रोज़मर्रा की गतिविधियों को सामने रखती है, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति का पूरा विवरण नहीं देती। इसलिए यह दावा करना उचित नहीं होगा कि उनकी मृत्यु का कारण केवल श्रम व्यवस्था है। फिर भी कविता यह सवाल ज़रूर उठाती है कि काम करते रहने के बावजूद मनुष्य अपने जीवन की सक्रियता क्यों खो सकता है।
रेमंड विलियम्स यह समझने में मदद करते हैं कि किसी समय की सामाजिक परिस्थितियाँ केवल संस्थाओं और नियमों में ही नहीं रहतीं। वे लोगों की आदतों, भावनाओं और रोज़मर्रा के अनुभवों में भी जगह बनाती हैं। कई बार किसी समाज में निराशा, असहायता या निष्क्रियता इतनी सामान्य हो जाती है कि लोग उसे अपनी निजी समस्या मानने लगते हैं। वे अपनी स्थिति पर सवाल उठाने के बजाय उसे जीवन का स्वाभाविक हिस्सा समझ लेते हैं।
श्रीप्रकाश शुक्ल के पात्रों के चेहरे पर कील चुभने से तनाव उभरता है। वे उस तनाव को ढीला करने की कोशिश करते हैं और थोड़ी देर बाद फिर अपने काम में लग जाते हैं। इस छोटे-से दृश्य में एक पूरे सामाजिक व्यवहार की झलक मिलती है। मनुष्य असुविधा महसूस करता है, लेकिन उस असुविधा को दूर करने के लिए अपने जीवन की व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाता। वह तनाव को अस्थायी मानकर आगे बढ़ जाता है। कविता यह नहीं बताती कि हर पात्र के पास बदलाव का अवसर मौजूद है, लेकिन वह इस आदत पर सवाल उठाती है जिसमें परेशानी को महसूस करना तो संभव है, पर उसके कारणों की जाँच करना मुश्किल हो जाता है।
मिशेल फूको के सत्ता संबंधी विचार इस स्थिति को और गहराई से समझने में मदद करते हैं। सत्ता हमेशा किसी आदेश या दंड के रूप में सामने नहीं आती। वह आदतों, नियमों और सामान्य माने जाने वाले व्यवहारों के ज़रिये भी काम करती है। व्यक्ति अपने जीवन के ढर्रे को इतना स्वाभाविक मान सकता है कि उसे बदलने की संभावना ही दिखाई न दे। श्रीप्रकाश शुक्ल के पात्रों की दिनचर्या को इस नज़रिए से पढ़ने पर सवाल उठता है कि क्या उनकी निष्क्रियता केवल उनकी अपनी पसंद है, या उनके सामाजिक संसार ने भी उन्हें ऐसे जीवन का आदी बना दिया है जिसमें बदलाव की गुंजाइश कम है?
यहाँ गाय देबोर (Guy Debord) के ‘द सोसाइटी ऑफ़ द स्पेक्टेकल’ (The Society of the Spectacle) में व्यक्त विचार भी कविता को समझने में सहायक प्रतीत होते हैं जिनमें आधुनिक समाजिक जीवन में प्रदर्शन और वास्तविकता के बीच के अंतर पर सवाल खड़ा किया गया है। श्रीप्रकाश शुक्ल के पात्रों के पास सूचनाएँ हैं और वे ख़ुद भी एक सूचना बन जाते हैं। ऋतुराज की कविता में मृत लोग कुछ क़दम चलने का नाटक करते हैं। इन दोनों दृश्यों को साथ रखने पर एक नया सवाल उठता है। क्या आधुनिक सामाजिक जीवन में सक्रियता का प्रदर्शन वास्तविक भागीदारी की जगह ले सकता है? क्या कोई व्यक्ति समाज में दिखाई देते हुए भी अपनी आवाज़ और स्वतंत्रता खो सकता है?
इस तुलना में ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ एक अलग संभावना प्रस्तुत करती है। यहाँ वक्ता अपनी निष्क्रियता को पहचानने के बाद उसके सामने झुकने से इनकार करता है। वह कुशासन की चालों और झूठे स्पष्टीकरणों को अपने जीवन की अंतिम सच्चाई नहीं मानता। इस अर्थ में उसका इनकार सामाजिक जड़ता के विरुद्ध एक कोशिश है। लेकिन इस कोशिश को केवल व्यक्तिगत इच्छाशक्ति का परिणाम मानना भी ठीक नहीं होगा। वक्ता की स्वतंत्रता उन सामाजिक और राजनीतिक स्थितियों से जुड़ी है जिनके भीतर उसे अपने रास्ते चुनने पड़ते हैं। वह न तो दुनिया से अलग हो सकता है और न ही अपनी सारी परेशानियों को अकेले समाप्त कर सकता है। फिर भी वह यह तय करना चाहता है कि वे परेशानियाँ उसकी चेतना पर कितना अधिकार रखेंगी।
यहाँ ऋतुराज और श्रीप्रकाश शुक्ल के बीच का अंतर साफ़ होता है। श्रीप्रकाश शुक्ल के पात्र अपने पुराने ढर्रे में लौटते रहते हैं। ऋतुराज का वक्ता अपने जीवन को जड़ होने से बचाना चाहता है। लेकिन दोनों कविताएँ किसी आसान नैतिक फैसले तक नहीं पहुँचतीं। एक ओर हम देखते हैं कि मनुष्य की दिनचर्या उसे भीतर से खाली कर सकती है। दूसरी ओर हम यह भी समझते हैं कि रोज़मर्रा की मजबूरियों से बाहर निकलना हमेशा सरल नहीं होता। इसीलिए इन कविताओं का मूल्य केवल निष्क्रियता की आलोचना में नहीं, बल्कि उस सामाजिक परिस्थिति को समझने में है जिसमें मनुष्य अपनी सक्रियता खोता है या उसे बचाने की कोशिश करता है।
इन सभी सवालों के बीच प्रकृति और भविष्य की उम्मीद का पक्ष चारों कविताओं को एक दूसरी दिशा में ले जाता है। ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ में सूखी धरती पर आक और धतूरे की प्यास वक्ता के भीतर जीवन की इच्छा बढ़ाती है। अशोक वाजपेयी की ‘कितने दिन और बचे हैं?’ में चिड़िया, कीड़ा, तितली, धूप, मेघ और हरी होती पृथ्वी जीवन की अनिश्चितता के बीच मौजूद संभावनाओं को सामने लाते हैं। इन दोनों कविताओं में प्रकृति मनुष्य के अनुभव से जुड़ी है, लेकिन उसे केवल मनुष्य की भावनाओं का सजावटी रूपक मान लेना पर्याप्त नहीं होगा।
ऋतुराज की कविता में आक और धतूरा सूखी धरती पर उगते हैं। वे ऐसे पौधे हैं जिन्हें हम अक्सर उपेक्षित जगहों पर देखते हैं। कवि उनकी प्यास को देखता है और अपने भीतर जीवन की इच्छा महसूस करता है। इस दृश्य में अभाव और जीवन की संभावना साथ-साथ मौजूद हैं। धरती की सूखापन मिटा नहीं है। पौधों की प्यास भी समाप्त नहीं हुई। फिर भी वे वहाँ मौजूद हैं और वक्ता के लिए जीवन का अर्थ खोलते हैं। यह कोई ऐसा आशावाद नहीं है जो कठिनाइयों को नकार देता हो। यहाँ आशा का आधार कठिन परिस्थिति के भीतर जीवन की उपस्थिति को पहचानना है।
अर्न्स्ट ब्लॉख (Ernst Bloch) की ‘द प्रिंसिपल ऑफ़ होप’ (The Principle of Hope) इस बिंदु को समझने में मदद करती है। ब्लॉख के लिए उम्मीद केवल भविष्य में किसी सुखद घटना के घटने का भरोसा नहीं है। वह वर्तमान में मौजूद उन संभावनाओं को पहचानने से भी पैदा होती है जो अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुई हैं। ऋतुराज की कविता में सूखी धरती पर उगे पौधे ऐसी ही संभावना का संकेत देते हैं। वे यह साबित नहीं करते कि धरती जल्द हरी हो जाएगी, लेकिन उनकी मौजूदगी जीवन की संभावना को पूरी तरह समाप्त नहीं होने देती।
अशोक वाजपेयी की कविता में उम्मीद का स्वर कुछ अलग है। वहाँ जीवन की छोटी इच्छाएँ और भविष्य की प्रतीक्षाएँ सामने आती हैं। प्रेम का आना, अचार का तैयार होना और पृथ्वी का फिर हरा होना तीन अलग-अलग स्तरों पर भविष्य की इच्छा को व्यक्त करते हैं। कवि यह नहीं कहता कि ये सब इच्छाएँ ज़रूर पूरी होंगी। वह केवल यह दिखाता है कि मनुष्य अपने जीवन को उन संभावनाओं से जोड़कर रखता है जिन्हें वह अभी हासिल नहीं कर पाया है। उम्मीद का अर्थ यहाँ निश्चित परिणाम नहीं, बल्कि भविष्य की ओर खुला रहना है।
दोनों कविताओं में प्रकृति और भविष्य का संबंध एक जैसा नहीं है। ऋतुराज की कविता में प्रकृति का दृश्य वक्ता की जिजीविषा को तेज करता है। अशोक वाजपेयी की कविता में प्रकृति जीवन की नाज़ुकता और अनिश्चितता को भी सामने लाती है। चिड़िया का उड़ना, कीड़े का रास्ता पार करना और तितली का डाल पर बैठना जीवन के सामान्य दृश्य हैं, लेकिन इनमें किसी अनपेक्षित घटना से सब कुछ बदल जाने की संभावना भी मौजूद है। इसीलिए प्रकृति यहाँ केवल आशा का स्रोत नहीं है। वह मनुष्य को यह भी याद दिलाती है कि जीवन किसी के नियंत्रण में पूरी तरह नहीं है।
पर्यावरणीय आलोचना इन दृश्यों को मनुष्य के अनुभव से आगे ले जाने में मदद करती है। लॉरेंस बुएल (Lawrence Buell) की पर्यावरणीय आलोचना के सहारे पूछा जा सकता है कि कविता में प्रकृति केवल मनुष्य के भावों का प्रतीक बनती है या उसका अपना अस्तित्व भी महत्त्व रखता है। ऋतुराज की कविता में आक और धतूरे की प्यास वास्तविक प्यास भी है। अशोक वाजपेयी की कविता में चिड़िया, कीड़ा और तितली ऐसे जीव हैं जिनका अपना जीवन है। वे केवल मनुष्य को कोई सबक सिखाने के लिए वहाँ मौजूद नहीं हैं।
ब्रूनो लातूर के मंतव्य के तहत भी इस चर्चा को और आगे बढ़ाया जा सकता है। लातूर मनुष्य और गैर-मानवीय जीवन के बीच बने कठोर विभाजन को कटघरे में खड़ा करते हैं । इन कविताओं में मनुष्य की दुनिया प्रकृति से अलग नहीं है। पौधों की प्यास, पक्षियों की उड़ान और धरती के हरे होने की संभावना मनुष्य के अनुभव को प्रभावित करती है। इससे यह समझने का अवसर मिलता है कि मनुष्य अपने जीवन का अर्थ केवल अपने हितों के आधार पर तय नहीं कर सकता। उसे उस व्यापक दुनिया के प्रति भी संवेदनशील होना होगा जिसमें दूसरे जीव भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हैं।
यहाँ एक आलोचनात्मक सावधानी ज़रूरी है। प्रकृति को मनुष्य की उम्मीद का प्रतीक बनाते समय उसके अपने संकट को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। सूखी धरती पर आक और धतूरे का उगना जीवन की क्षमता का संकेत हो सकता है, लेकिन इससे धरती के सूखने की समस्या समाप्त नहीं हो जाती। इसी तरह तितली का किसी डाल पर बैठना सुंदर दृश्य है, लेकिन उसकी उपस्थिति को केवल क्षणभंगुरता के रूपक में बदल देने से उसके वास्तविक जीवन का अर्थ छूट सकता है। इन कविताओं का पर्यावरणीय पाठ तभी सार्थक होगा जब हम प्रकृति की प्रतीकात्मक भूमिका और उसके वास्तविक अस्तित्व, दोनों को साथ लेकर चलें।
इन चारों कविताओं के बीच उम्मीद का सवाल भी अलग-अलग रूप लेता है। ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ में उम्मीद प्रतिरोध से जुड़ी है। वक्ता अपने भीतर की जड़ता और सामाजिक परिस्थितियों के दबाव के सामने हार नहीं मानना चाहता। श्रीप्रकाश शुक्ल की ‘मरे हुए लोग’ में उम्मीद का संकट सामने आता है। पात्र जीने की आशा रखते हैं, लेकिन उनका जीवन लगातार उसी ढर्रे में घूमता रहता है। अशोक वाजपेयी की कविता में उम्मीद भविष्य की छोटी इच्छाओं और प्रतीक्षाओं में रहती है। ऋतुराज की ‘मरे हुए लोग’ में मृतकों की स्मृति के भीतर न्याय की एक अधूरी संभावना बची रहती है। इस तरह उम्मीद हमेशा खुशी या सफलता का नाम नहीं है। कभी वह विरोध की इच्छा है, कभी अधूरे न्याय की माँग, कभी जीवन की जड़ता को पहचानने की क्षमता और कभी आने वाले समय के लिए बची हुई छोटी-सी प्रतीक्षा।
इन कविताओं की तुलना हमें इस निष्कर्ष तक लाती है कि मृत्यु, समय, सत्ता, श्रम और प्रकृति को अलग-अलग विषय मानकर पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं। सत्ता किसी व्यक्ति की मृत्यु के अर्थ को बदल सकती है। सामाजिक परिस्थितियाँ मनुष्य के जीवन को ऐसी दिनचर्या में बाँध सकती हैं जिसमें वह अपनी स्वतंत्रता खोने लगे। समय की अनिश्चितता मनुष्य को अपनी इच्छाओं और संबंधों पर फिर से विचार करने के लिए प्रेरित कर सकती है। प्रकृति का कोई छोटा-सा दृश्य उसे जीवन की संभावना का एहसास करा सकता है। इस तरह जीवन का अर्थ किसी एक उपलब्धि या विचार में नहीं, बल्कि उन संबंधों में बनता है जिनके भीतर मनुष्य अपना समय जीता है।
इन्हें साथ पढ़ने से यह भी स्पष्ट होता है कि जीवन की रक्षा केवल मृत्यु से बचने का सवाल नहीं है। यह सच को पहचानने, स्मृति के प्रति ज़िम्मेदार रहने, अपने श्रम और दिनचर्या के अर्थ पर विचार करने तथा अपने से बाहर की दुनिया के प्रति संवेदनशील बने रहने का सवाल भी है। ऋतुराज के यहाँ मृतकों की स्मृति वर्तमान को चुनौती देती है। श्रीप्रकाश शुक्ल के यहाँ रोज़मर्रा का जीवन अपनी ही जड़ता के कारण प्रश्नों के घेरे में आता है। अशोक वाजपेयी के यहाँ भविष्य की अनिश्चितता जीवन की छोटी इच्छाओं और प्रतीक्षाओं को नया अर्थ देती है। इन अलग-अलग दृष्टियों के बीच संवाद स्थापित करने से हम आधुनिक जीवन के उस संकट को समझ सकते हैं जिसमें मनुष्य के पास काम, सूचना और गतिविधियाँ तो बहुत हैं, लेकिन अपने जीवन का अर्थ पहचानने के अवसर कम होते जा सकते हैं।
बावजूद इसके, इन रचनाओं को किसी सिद्धांत का उदाहरण मानकर पढ़ना उनके साथ रचनात्मक नाइंसाफ़ी होगी । हाइडेगर की अस्तित्व संबंधी अवधारणाएँ अशोक वाजपेयी की कविता के कुछ पक्ष खोलती हैं, लेकिन वे ऋतुराज की राजनीतिक आलोचना की पूरी व्याख्या नहीं कर सकतीं। मार्क्स की अलगाव संबंधी अवधारणा श्रीप्रकाश शुक्ल के पात्रों की सामाजिक स्थिति को समझने में मदद करती है, लेकिन कविता में मौजूद हर भाव को केवल आर्थिक संबंधों के तहत नहीं समझा जा सकता। बटलर और बेंजामिन ऋतुराज की कविता में स्मृति और सत्ता से संबंधित सवाल उठाते हैं, जबकि ब्लॉख और पर्यावरणीय आलोचना जीवन की संभावना तथा प्रकृति के साथ संबंध पर रोशनी डालते हैं। आलोचना का काम इन सिद्धांतों को कविताओं पर आरोपित करने के बजाय इनके सहारे उन सवालों की शिनाख्त करना है जिन्हें कविता अपनी भाषा, बिंब और संरचना से सामने लाती है।
इसलिए इन चारों कविताओं का तुलनात्मक अध्ययन किसी एक अंतिम उत्तर देने के बजाय कई स्तरों पर सोचने का अवसर देता है। मनुष्य अपने समय को कैसे जीता है? समाज मृतकों की स्मृति के साथ क्या करता है? श्रम और दिनचर्या किस बिंदु पर जीवन को सहारा देने के बजाय उसे जड़ बनाने लगते हैं? और क्या प्रकृति के साथ हमारा संबंध हमें अपने से बाहर की दुनिया के प्रति अधिक ज़िम्मेदार बना सकता है? इन सवालों के बीच चारों कविताएँ एक-दूसरे से जुड़ती हैं, लेकिन वे अपनी अलग आवाज़ भी बनाए रखती हैं। उनकी यही समानता और भिन्नता उन्हें साथ पढ़ने का आधार देती है।
ऋतुराज, श्रीप्रकाश शुक्ल और अशोक वाजपेयी की इन चार कविताओं को साथ पढ़ने पर जीवन और मृत्यु के बीच का सम्बन्ध किसी स्थिर विभाजन के रूप में सामने नहीं आता। ‘मरे हुए लोग’ की दोनों कविताएँ, ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ और अशोक वाजपेयी की ‘कितने दिन और बचे हैं?’ अलग-अलग स्थितियों से शुरू होती हैं, लेकिन उनके भीतर एक साझा प्रश्न सक्रिय है: मनुष्य के जीवित होने का अर्थ क्या है? क्या साँस लेते रहना ही जीवन है, या जीवन के लिए अपनी स्मृति, संवेदना, स्वतंत्रता और भविष्य की सम्भावनाओं को बचाए रखना भी ज़रूरी है? इन कविताओं की विशेषता यह है कि वे इस प्रश्न का कोई एक उत्तर नहीं देतीं। वे जीवन और मृत्यु के बीच ऐसी जटिल स्थितियाँ रचती हैं जिनमें जैविक अस्तित्व, सामाजिक सक्रियता और आत्मबोध एक-दूसरे से अलग भी होते हैं और एक-दूसरे को प्रभावित भी करते हैं।
ऋतुराज और श्रीप्रकाश शुक्ल की ‘मरे हुए लोग’ शीर्षक वाली कविताएँ इस सन्दर्भ में ख़ास तौर से उल्लेखनीय हैं। एक ही शीर्षक के बावजूद दोनों कविताओं की दृष्टि और काव्य-संरचना में अन्तर है। ऋतुराज के यहाँ मृत लोग अब भी वर्तमान में सक्रिय हैं। वे ख़ुद कुछ नहीं कर रहे, लेकिन जीवित लोग उन्हें उठाए फिर रहे हैं। उनकी उपस्थिति जीवित समाज की राजनीति, भाषा और व्यवहार को प्रभावित करती है। इसके विपरीत, श्रीप्रकाश शुक्ल के यहाँ मृत लोगों का शहर ऐसी सामूहिक स्थिति का चित्र बनता है जिसमें लोग अपनी मौत को स्वीकार नहीं करना चाहते। वे पुनर्जन्म की उम्मीद में जीते हैं, अपने काम में लगे रहते हैं और अपनी स्थिति के बारे में उपलब्ध जानकारी के बावजूद उससे पैदा होने वाले प्रश्नों का सामना नहीं करते। इस तरह एक कविता में मृतकों की उपस्थिति वर्तमान को बेचैन करती है, जबकि दूसरी में मृत्यु का निषेध वर्तमान को जड़ बनाता है।
ऋतुराज की कविता में मृतकों का जीवित लोगों द्वारा उठाया जाना एक अर्थपूर्ण बिम्ब है। इसे केवल स्मृति के बने रहने के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। मृतक यहाँ जीवित लोगों के कन्धों पर रखे हुए अतीत का भार भी हैं और वर्तमान की राजनीति में इस्तेमाल होने वाली उपस्थिति भी। जीवित लोग मृतकों को अपने साथ लेकर चलते हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में यह सवाल पैदा होता है कि वे वास्तव में किसे याद कर रहे हैं। क्या वे मृतकों के जीवन, संघर्ष और आकांक्षाओं को अपने वर्तमान का हिस्सा बना रहे हैं, या उनके नामों का इस्तेमाल अपने हितों के लिए कर रहे हैं? कविता इस विरोधाभास को सामने लाती है कि मृतकों की स्मृति अपने आप में नैतिकता की गारंटी नहीं है। कोई समाज अपने मृतकों को याद करते हुए भी उनके जीवन से जुड़े सवालों को दबा सकता है। स्मरण कभी प्रतिरोध का आधार बनता है, तो कभी सत्ता को वैधता देने का साधन।
श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में स्मृति की समस्या एक अलग रूप ग्रहण करती है। वहाँ लोग अपनी स्थिति को पहचानने से बचते हैं। उनकी गतिविधियाँ जारी हैं, उनके पास औज़ार हैं, सूचनाएँ हैं और अपने काम के लिए आवश्यक साधन भी हैं, लेकिन यह सब उन्हें अपने अस्तित्व के प्रति सचेत नहीं करता। वे पुनर्जन्म की आशा में वर्तमान को स्वीकार करने से इनकार करते हैं। यहाँ मृत्यु का निषेध जीवन के प्रति गहरे लगाव का प्रमाण नहीं, बल्कि अपनी वास्तविक स्थिति से बचने का तरीका बन जाता है। ऋतुराज की कविता में मृतकों की उपस्थिति जीवित लोगों को उनके वर्तमान से जोड़ती है, जबकि श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में पुनर्जन्म की आशा लोगों को वर्तमान से दूर ले जाती है। यही दोनों कविताओं के बीच का बुनियादी अन्तर है।
ऋतुराज की कविता अतीत केवल बीती हुई घटनाओं का संग्रह नहीं है। समाज अपने वर्तमान सम्बन्धों और आवश्यकताओं के अनुसार अतीत को याद करता है। इस दृष्टि से मृतकों की उपस्थिति का अर्थ उनके बारे में जानकारी बनाए रखना भर नहीं है। असली सवाल यह है कि उनकी स्मृति वर्तमान में क्या करती है। यदि मृतकों के नाम पर राजनीति होती है, लेकिन उनके अनुभवों से पैदा होने वाले सवालों को दबा दिया जाता है, तो स्मृति अपने नैतिक आधार से कट जाती है। वह अतीत को समझने के बजाय उसका इस्तेमाल करने लगती है। ज़ाहिर है कि स्मरण का सम्बन्ध केवल अतीत को सुरक्षित रखने से नहीं, बल्कि उसके प्रति अपने उत्तरदायित्व को पहचानने से है। ऋतुराज की कविता इस उत्तरदायित्व के अभाव को राजनीतिक और नैतिक समस्या के रूप में सामने लाती है।
श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में विस्मरण का अर्थ बीती हुई घटनाओं को भूल जाना नहीं, बल्कि वर्तमान की वास्तविकता से आँख चुराना है। लोग अपने जीवन की सूचना रखते हैं, फिर भी अपने अस्तित्व के अर्थ तक नहीं पहुँच पाते। कविता में यह विडम्बना तब गहरी हो जाती है जब लोग स्वयं सूचना की तरह दिखाई देते हैं। वे सूचना को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने वाले माध्यम बन जाते हैं, लेकिन सूचना के अर्थ और परिणाम से उनका सम्बन्ध कमज़ोर रहता है। इस बिम्ब में मनुष्य के वस्तुकरण की सम्भावना निहित है। वह अपने अनुभवों और निर्णयों वाला व्यक्ति होने के बजाय किसी व्यवस्था के भीतर काम करने वाली इकाई बन जाता है। इस तरह कविता सूचना की उपलब्धता और आत्मबोध के बीच के अन्तर को उजागर करती है। जानना और समझना एक ही बात नहीं हैं; इसी तरह व्यस्त रहना और सचमुच जीना भी एक ही बात नहीं है।
मार्क्स के श्रम और अलगाव सम्बन्धी विचारों के सहारे इस स्थिति को और स्पष्ट किया जा सकता है। श्रम मनुष्य की रचनात्मक क्षमता की अभिव्यक्ति हो सकता है, लेकिन सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ उसे ऐसी गतिविधि में भी बदल सकती हैं जिसमें व्यक्ति अपने काम, उसके परिणाम और अपनी मानवीय सम्भावनाओं से दूर हो जाता है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता को किसी एक आर्थिक व्यवस्था का सीधा चित्र मानना उचित नहीं होगा, फिर भी उसमें श्रम और जीवंतता के बीच पैदा हुई दूरी को पहचाना जा सकता है। मृत शहर के लोग लगातार काम कर रहे हैं, लेकिन उनकी गतिविधियों से जीवन में कोई नया अर्थ पैदा नहीं होता। काम उनके समय को भरता है, पर उनकी स्थिति नहीं बदलता। इसीलिए कविता का मृत शहर केवल मृत्यु का स्थान नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था का संकेत भी है जिसमें गतिविधि तो बनी रहती है, पर परिवर्तन की सम्भावना सिकुड़ जाती है।
फूको की सत्ता सम्बन्धी अवधारणाएँ इस जड़ता को समझने में मदद करती हैं। सत्ता केवल किसी शासक, संस्था या आदेश के रूप में काम नहीं करती; वह रोज़मर्रा के व्यवहारों, नियमों और आदतों के भीतर भी सक्रिय रहती है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में किसी एक दमनकारी शक्ति का स्पष्ट चित्र नहीं है, फिर भी लोगों की दिनचर्या में ऐसी जड़ता दिखाई देती है जो उन्हें अपनी स्थिति पर सवाल उठाने से रोकती है। वे अपनी गतिविधियों में इतने उलझे हैं कि उनकी व्यस्तता ही उनके जीवन का स्वाभाविक रूप बन जाती है। इस तरह कविता बाहरी दमन के साथ-साथ उस आन्तरिक निष्क्रियता पर भी सवाल उठाती है जो धीरे-धीरे सामान्य जीवन का हिस्सा बन जाती है।
ऋतुराज की ‘मरे हुए लोग’ में सत्ता का प्रश्न भाषा और राजनीतिक स्मृति से जुड़ता है। कविता में झूठ का विराट उजाला एक विरोधाभासी बिम्ब है। उजाला सामान्यतः देखने और समझने में मदद करता है, लेकिन यहाँ वह सच को ढँकने का माध्यम बन जाता है। यह बिम्ब उस स्थिति की ओर संकेत करता है जिसमें सार्वजनिक भाषा वास्तविकता को स्पष्ट करने के बजाय उसे विकृत करती है। हन्ना आरेंट के राजनीतिक चिन्तन में तथ्यात्मक सत्य और संगठित झूठ का सवाल इसी वजह से उल्लेखनीय है। जब सार्वजनिक जीवन में तथ्यों को लगातार बदला जाता है, तो लोगों के लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि वे किस वास्तविकता के आधार पर निर्णय लें। ऋतुराज की कविता में मृतकों की स्मृति और झूठ की भाषा का सम्बन्ध इसी संकट को गहरा करता है। मृतकों के नाम वर्तमान की राजनीति में बने रहते हैं, लेकिन उनके वास्तविक जीवन और अनुभवों का अर्थ सत्ता की ज़रूरतों के अनुसार बदल सकता है।
‘मरे हुए लोग’ शीर्षक दोनों कविताओं के साथ ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ को पढ़ने पर मृत्यु और जीवन के बीच एक नया सम्बन्ध खुलता है। यहाँ प्रोटागोनिस्ट ज़िन्दगी को सिर्फ़ जैविक अस्तित्व के रूप में नहीं देखता। वह कुछ परिस्थितियों में मर सकने की बात करता है, लेकिन कुप्रबन्ध, रोज़मर्रा के झूठे स्पष्टीकरणों, यात्रा की बाधाओं और अपनों की वापसी की पुकार के सामने अपनी मौत क़ुबूल करने से इनकार करता है। यह कथन किसी आसान आशावाद से नहीं निकलता। वक्ता उन परिस्थितियों को पहचानता है जो मनुष्य को थका सकती हैं, उसकी गति रोक सकती हैं और उसे निरर्थकता का अनुभव करा सकती हैं। फिर भी वह उनके सामने पूरी तरह पराजित होने को तैयार नहीं है।
इस कविता में ‘मरना’ और ‘जीना’ एक-दूसरे के सीधे विरोधी नहीं रह जाते। मनुष्य जैविक रूप से जीवित रहकर भी अपनी स्वतंत्रता, संवेदना और प्रतिरोध की क्षमता खो सकता है। इसके विपरीत, प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच भी वह अपने भीतर जीवन की सम्भावना बचाए रख सकता है। वक्ता का ‘मरूँगा नहीं’ कहना इसी सम्भावना की घोषणा है। उसका प्रतिरोध किसी बड़े राजनीतिक कार्यक्रम या निश्चित सफलता से नहीं जुड़ा। वह जीवन के छोटे अनुभवों और अपने आसपास की दुनिया में ऐसे संकेत खोजता है जो उसे आगे बढ़ने का आधार देते हैं। सूखी धरती पर आक-धतूरे की प्यास को देखना इसी क्रम में अर्थ ग्रहण करता है। यह दृश्य कठिन परिस्थितियों में भी जीवन की उपस्थिति का बोध कराता है। प्रकृति यहाँ केवल मनुष्य की मनःस्थिति का रूपक नहीं बनती, बल्कि उसके सामने जीवन के ऐसे रूप रखती है जो प्रतिकूलता के बावजूद बने रहते हैं।
अशोक वाजपेयी की ‘कितने दिन और बचे हैं?’ कविता भी जीवन की अनिश्चितता से शुरू होती है, लेकिन उसकी काव्यात्मक प्रतिक्रिया ऋतुराज से अलग है। ऋतुराज का वक्ता प्रतिरोध के माध्यम से अपनी जीवित रहने की इच्छा व्यक्त करता है, जबकि अशोक वाजपेयी का वक्ता यह नहीं जानता कि उसके पास कितना समय बचा है। वह इस अनिश्चितता के बीच चिड़िया के घोंसले की ओर लौटने, किसी कीड़े के चलने, रेल की चिनगारी, तितली, प्रेम के पत्र और कटहल के अचार के पकने जैसी घटनाओं को देखता है। धरती के हरे होने और आकाश के मेहरबान होने की प्रतीक्षा भी इसी जीवन-दृष्टि का हिस्सा है। इन गतिविधियों का महत्त्व किसी बड़े उद्देश्य या उपलब्धि से तय नहीं होता। वे जीवन को उसकी साधारण गति में अर्थ देती हैं।
हाइडेगर के अस्तित्ववादी चिन्तन के सहारे अशोक वाजपेयी की कविता में मृत्यु-बोध को समझा जा सकता है। अपनी सीमा की पहचान मनुष्य को जीवन से विमुख कर सकती है, लेकिन वह उसे अपने वर्तमान और चुनावों के प्रति अधिक सजग भी बना सकती है। कविता में समय की अनिश्चितता जीवन की छोटी गतिविधियों को अधिक अर्थवान बनाती है। वक्ता जानता है कि किसी भी समय उसके सामने अन्तिम दस्तक आ सकती है, फिर भी वह प्रेम, प्रकृति और प्रतीक्षा से अपना सम्बन्ध नहीं तोड़ता। मृत्यु का विचार यहाँ जीवन के अनुभवों को निरर्थक नहीं बनाता, बल्कि उनकी क्षणभंगुरता के प्रति सजग करता है।
ऋतुराज और अशोक वाजपेयी की कविताओं में इसीलिए एक समानता और अन्तर दोनों दिखाई देते हैं। दोनों जीवन को निश्चित और सुरक्षित वस्तु की तरह नहीं देखते। ऋतुराज के यहाँ अनिश्चितता के बीच प्रतिरोध की सम्भावना उभरती है, जबकि अशोक वाजपेयी के यहाँ वही अनिश्चितता साधारण अनुभवों के प्रति सजगता पैदा करती है। एक कविता में वक्ता उन स्थितियों को अस्वीकार करता है जो उसे भीतर से पराजित कर सकती हैं। दूसरी में वक्ता यह स्वीकार करता है कि जीवन का समय उसके नियन्त्रण में नहीं है, लेकिन वह इस अज्ञान के बीच भी जीवन से जुड़ी छोटी प्रतीक्षाओं को महत्त्व देता है। दोनों कविताएँ अलग-अलग ढंग से बताती हैं कि जीवन का अर्थ केवल समय की अवधि से तय नहीं होता; उसका सम्बन्ध इस बात से भी है कि मनुष्य उस समय को कैसे अनुभव करता है।
हेनरी बर्गसाँ की समय सम्बन्धी अवधारणा यहाँ एक और रास्ता खोलती है। घड़ी से मापा जाने वाला समय और मनुष्य द्वारा अनुभव किया जाने वाला समय एक जैसे नहीं होते। कोई छोटा-सा क्षण भावनात्मक रूप से बहुत गहरा हो सकता है, जबकि लम्बा समय अनुभवहीन और दोहरावपूर्ण लग सकता है। अशोक वाजपेयी की कविता में अचार का पकना, पत्र की प्रतीक्षा और धरती का हरा होना समय को अनुभव के रूप में सामने लाते हैं। ये घटनाएँ अपने आप में साधारण हैं, लेकिन इनके भीतर प्रतीक्षा, आशा और परिवर्तन की गति मौजूद है। इसके विपरीत, श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में समय की निरन्तरता एक ऐसी दिनचर्या बन जाती है जिसमें गतिविधियाँ दोहराई जाती हैं, पर जीवन का अनुभव विस्तार नहीं पाता। इस तुलना से स्पष्ट होता है कि समय का बीतना और समय को जीना अलग-अलग अनुभव हैं।
चारों कविताओं में भविष्य की कल्पना भी अलग-अलग भूमिका निभाती है। अशोक वाजपेयी के यहाँ भविष्य खुली सम्भावना है। प्रेम का पत्र आ सकता है, अचार पक सकता है, धरती हरी हो सकती है और आकाश का व्यवहार बदल सकता है। इन घटनाओं की कोई गारंटी नहीं, फिर भी उनकी प्रतीक्षा जीवन को आगे की ओर खुला रखती है। ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ में भविष्य प्रतिरोध की सम्भावना से जुड़ता है। वक्ता यह दावा नहीं करता कि परिस्थितियाँ ज़रूर बदलेंगी; वह केवल यह कहता है कि वे उसे पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकतीं। इसके विपरीत, श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में पुनर्जन्म की आशा वर्तमान से बचने का साधन बन सकती है। वहाँ भविष्य की कल्पना लोगों को वर्तमान बदलने के लिए प्रेरित नहीं करती, बल्कि उन्हें उसी स्थिति में बने रहने का आधार देती है।
अर्न्स्ट ब्लोख की आशा सम्बन्धी अवधारणा इन अन्तर को समझने में मदद करती है। आशा केवल भविष्य के प्रति भावुक विश्वास नहीं है। वह उन सम्भावनाओं से जुड़ी होती है जो वर्तमान में पूरी तरह विकसित नहीं हुई हैं, लेकिन जिनके संकेत अनुभव में मौजूद हैं। अशोक वाजपेयी की कविता में ये संकेत प्रकृति, प्रेम और दैनिक जीवन की छोटी गतिविधियों में दिखाई देते हैं। ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ में वे प्रतिरोध और जीवनी-शक्ति के रूप में उभरते हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता इस धारणा को जटिल बनाती है, क्योंकि वहाँ पुनर्जन्म की उम्मीद लोगों को अपनी वास्तविक स्थिति का सामना करने से रोकती है। इस प्रकार हर आशा परिवर्तनकारी नहीं होती। कुछ उम्मीदें मनुष्य को आगे बढ़ने की ताकत देती हैं, जबकि कुछ उसे वर्तमान की जड़ता में बनाए रखती हैं।
प्रकृति के बिम्ब इन कविताओं में इसी कारण अलग-अलग अर्थ ग्रहण करते हैं। अशोक वाजपेयी के यहाँ चिड़िया, कीड़ा, चिनगारी, तितली और हरी होती धरती समय की विविध गतियों की ओर ध्यान खींचते हैं। ज़िन्दगी सिर्फ़ मनुष्य की इच्छाओं और योजनाओं से नहीं बनता। उसके भीतर ऐसे अनेक रूप और गतिविधियाँ हैं जो अपनी गति से चलते रहते हैं। ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ में आक-धतूरे की प्यास सूखी धरती के बीच जीवन की सम्भावना को सामने लाती है। दोनों कविताएँ प्रकृति के माध्यम से जीवन के बारे में सोचती हैं, लेकिन अशोक वाजपेयी के यहाँ विविधता और क्षणभंगुरता का बोध अधिक है, जबकि ऋतुराज के यहाँ प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच जीवित रहने की क्षमता पर पर विचार किया गया है।
फिर भी प्रकृति को सिर्फ़ मनुष्य की मनःस्थिति का रूपक मान लेना उचित नहीं होगा। चिड़िया, तितली या आक-धतूरा केवल इसलिए अर्थवान नहीं हैं कि वे मनुष्य को जीवन के बारे में कोई सीख देते हैं। वे अपने पर्यावरण में रहने वाले जीव और वनस्पति भी हैं। पारिस्थितिक आलोचना की दृष्टि से इन बिम्बों को पढ़ने का अर्थ उनके मानवीय अर्थों के साथ-साथ उस प्राकृतिक दुनिया को पहचानना भी है जिसका अस्तित्व मनुष्य की इच्छाओं से स्वतंत्र है। इस तरह प्रकृति का अनुभव मनुष्य को अपने से बाहर की दुनिया के प्रति अधिक सजग बना सकता है। यह सजगता जीवन के अर्थ को केवल व्यक्तिगत अस्तित्व तक सीमित नहीं रहने देती।
भाषा और काव्य-शिल्प के स्तर पर भी इन कविताओं के बीच अर्थपूर्ण अन्तर है। ऋतुराज की ‘मरे हुए लोग’ में भाषा राजनीतिक टकराव और विडम्बना का माध्यम बनती है। मृतकों की उपस्थिति, उन्हें उठाए फिरते जीवित लोग और झूठ का विराट उजाला, ये बिम्ब सार्वजनिक जीवन की नैतिक उलझनों को सामने लाते हैं। ‘मरूँगा नहीं’ में वक्ता का कथन प्रतिरोध की दृढ़ता ग्रहण करता है। इसके विपरीत, श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में औज़ारों, सूचनाओं और लगातार दोहराए जाने वाले कामों का संसार एक ऐसी स्थिति रचता है जहाँ सक्रियता के भीतर निष्क्रियता छिपी हुई है। अशोक वाजपेयी की कविता का स्वर अपेक्षाकृत आत्मचिन्तनशील है। वहाँ प्रश्न, प्रतीक्षा और छोटी घटनाएँ मिलकर समय की अनिश्चितता का अनुभव कराती हैं।
इस अन्तर से स्पष्ट होता है कि कविता की भाषा केवल विचारों को व्यक्त करने का साधन नहीं है। वह विचार और अनुभव के सम्बन्ध को भी रचती है। ऋतुराज की भाषा राजनीतिक स्मृति और व्यक्तिगत प्रतिरोध को तीखा बनाती है। श्रीप्रकाश शुक्ल की भाषा व्यस्तता और जड़ता के विरोधाभास को सामने लाती है। अशोक वाजपेयी की भाषा जीवन की साधारण घटनाओं में छिपे अर्थ को पहचानने का अवसर देती है। इसलिए इन कविताओं की तुलना केवल इस आधार पर नहीं की जा सकती कि वे मृत्यु, जीवन, समय या आशा जैसे विषयों पर बात करती हैं। उनके बिम्ब, कथन-शैली और भाषा की गति भी उनके वैचारिक अन्तर को निर्मित करते हैं।
इन कविताओं में व्यक्ति और समुदाय का सम्बन्ध भी अलग-अलग रूपों में उभरता है। ऋतुराज की ‘मरे हुए लोग’ में व्यक्ति का वर्तमान सामूहिक इतिहास और राजनीतिक स्मृति से घिरा हुआ है। वह जिन मृतकों को उठाए फिरता है, वे केवल निजी सम्बन्धों का हिस्सा नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन के अर्थों को भी प्रभावित करते हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में समुदाय एक ऐसे शहर के रूप में सामने आता है जहाँ लोगों की समान स्थिति उन्हें जोड़ती तो है, लेकिन यह जुड़ाव उन्हें परिवर्तन की दिशा नहीं देता। अशोक वाजपेयी की कविता में व्यक्ति अपने अनुभवों के सहारे समय से सम्बन्ध बनाता है। उसकी प्रतीक्षाएँ निजी हैं, फिर भी वे जीवन के ऐसे अनुभव हैं जिनसे दूसरे लोग भी जुड़ सकते हैं। ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ में व्यक्तिगत प्रतिरोध का स्वर है, लेकिन उस प्रतिरोध को जन्म देने वाली परिस्थितियाँ सामाजिक हैं। इस तरह व्यक्ति और समाज का सम्बन्ध किसी एक कविता में भी पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता।
इन चारों कविताओं को एक साथ पढ़ने पर यह भी स्पष्ट होता है कि मृत्यु का अर्थ केवल जीवन का अन्त नहीं है। वह कभी अतीत के राजनीतिक इस्तेमाल का संकेत बनती है, कभी ऐसी सामाजिक जड़ता का जिसमें मनुष्य अपनी स्थिति को पहचानने से बचता है, कभी उस सीमा का बोध कराती है जिसके कारण जीवन के साधारण क्षण मूल्यवान हो उठते हैं, और कभी उस पराजय के विरुद्ध प्रतिरोध का आधार बनती है जो मनुष्य की स्वतंत्रता तथा संवेदना को समाप्त करना चाहती है। इसी तरह जीवन भी केवल जैविक सक्रियता नहीं है। वह स्मृति के प्रति उत्तरदायित्व, अपनी स्थिति को पहचानने की क्षमता, प्रतिरोध की सम्भावना और भविष्य के प्रति खुलापन भी है।
इन कविताओं की तुलनात्मक सार्थकता इसी में है कि वे जीवन और मृत्यु के किसी एक दार्शनिक निष्कर्ष पर सहमत नहीं होतीं। ऋतुराज मृतकों की राजनीतिक उपस्थिति और जीवित मनुष्य के प्रतिरोध के बीच सम्बन्ध बनाते हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल ऐसी सक्रियता का चित्र प्रस्तुत करते हैं जिसमें जीवन का आभास तो है, लेकिन आत्मबोध और परिवर्तन की सम्भावना कमज़ोर पड़ गई है। अशोक वाजपेयी समय की अनिश्चितता के बीच साधारण अनुभवों, सम्बन्धों और प्रतीक्षाओं को महत्त्व देते हैं। इन कविताओं के बीच का संवाद हमें यह समझने में मदद करता है कि मनुष्य का अस्तित्व केवल इस बात से तय नहीं होता कि वह कितने समय तक जीवित रहता है। यह भी उतना ही ज़रूरी है कि वह अपने अतीत से कैसा सम्बन्ध बनाता है, वर्तमान को कितनी सजगता से पहचानता है और भविष्य की सम्भावनाओं के प्रति कितना खुला रहता है।
इन चारों कविताओं के बीच तुलनात्मक सम्बन्ध को और गहराई से समझने के लिए यह देखना ज़रूरी है कि इनमें मनुष्य की स्वतंत्रता, उसकी निर्णय लेने की क्षमता और अपनी परिस्थितियों को बदलने की सम्भावना किस रूप में सामने आती है। मृत्यु और जीवन, स्मृति और विस्मृति, श्रम और जड़ता तथा आशा और निराशा के प्रश्न अन्ततः मनुष्य की इसी क्षमता से जुड़ते हैं। कोई व्यक्ति अपने जीवन में सक्रिय दिखाई दे सकता है, लेकिन क्या वह अपने निर्णय स्वयं ले रहा है? क्या उसकी गतिविधियाँ उसे अपनी स्थिति समझने और बदलने में मदद करती हैं? क्या वह अपने अतीत को केवल ढोता है, या उससे संवाद भी करता है? इन प्रश्नों के सहारे चारों कविताओं के बीच एक ऐसा आलोचनात्मक सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है जो उनके विषयों से आगे बढ़कर मनुष्य की कर्तृत्व-क्षमता और उसके सामने मौजूद सीमाओं पर विचार करे।
श्रीप्रकाश शुक्ल की ‘मरे हुए लोग’ में मनुष्य की कर्तृत्व-क्षमता का संकट सबसे स्पष्ट रूप में दिखाई देता है। कविता के पात्र अपनी दिनचर्या में लगे हुए हैं। उनके पास काम करने के साधन हैं और वे सूचनाओं के आदान-प्रदान में भी शामिल हैं, लेकिन उनकी गतिविधियों से कोई नया अर्थ पैदा नहीं होता। वे अपनी स्थिति के भीतर ही घूमते रहते हैं। इस तरह कविता एक ऐसे समाज का चित्र बनाती है जिसमें काम करना और अपने जीवन को दिशा देना अलग-अलग बातें हो गई हैं। व्यक्ति के पास गतिविधि है, लेकिन गतिविधि पर उसका नियन्त्रण सीमित है; उसके पास सूचना है, लेकिन सूचना से आत्मबोध पैदा नहीं होता; उसके पास भविष्य की आशा है, लेकिन वह आशा वर्तमान को बदलने का आधार नहीं बनती।
इस स्थिति को गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक के प्रतिनिधित्व सम्बन्धी प्रश्नों के साथ सावधानीपूर्वक पढ़ा जा सकता है। स्पिवाक का चिन्तन यह समझने में मदद करता है कि किसी व्यक्ति या समूह की उपस्थिति और उसकी अपनी आवाज़ में अन्तर हो सकता है। किसी समूह के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है, उसकी समस्याओं का विवरण भी दिया जा सकता है, लेकिन इससे यह सुनिश्चित नहीं होता कि वह समूह स्वयं अपनी स्थिति को व्यक्त करने और बदलने की क्षमता रखता है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में सूचना के रूप में मनुष्य की उपस्थिति इसी अन्तर की याद दिलाती है। लोग व्यवस्था के भीतर मौजूद हैं, लेकिन क्या वे अपनी उपस्थिति का अर्थ स्वयं तय कर सकते हैं? क्या उनकी पहचान उनके अपने अनुभवों से बनती है, या वे उन भूमिकाओं तक सीमित हो जाते हैं जो सामाजिक व्यवस्था उन्हें सौंपती है?
यहाँ कविता को किसी विशेष वर्ग या समुदाय की स्थिति का सीधा प्रतिनिधित्व मानने के बजाय उसके बिम्बों की सम्भावनाओं पर ध्यान देना विवेकसम्मत होगा। कविता का मृत शहर उन परिस्थितियों का संकेत बन सकता है जिनमें मनुष्य की आवाज़ और उसकी कर्तृत्व-क्षमता कमज़ोर पड़ जाती है। इस दृष्टि से मृत्यु का अर्थ केवल निष्क्रिय हो जाना नहीं है। वह अपनी स्थिति को समझने, अपने अनुभव को भाषा देने और अपने जीवन की दिशा तय करने की क्षमता खोने का भी संकेत है।
ऋतुराज की ‘मरे हुए लोग’ में यही प्रश्न राजनीतिक स्मृति के स्तर पर उभरता है। वहाँ मृतकों की उपस्थिति बनी हुई है, लेकिन उनकी उपस्थिति का अर्थ जीवित लोग तय करते हैं। मृतकों के नाम पर बोलना और उनके अनुभवों को समझना दो अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं। कोई व्यक्ति मृतकों की स्मृति का प्रतिनिधि होने का दावा कर सकता है, लेकिन उसके दावे की वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि वह स्मृति के साथ कैसा व्यवहार करता है। क्या वह मृतकों के संघर्षों को वर्तमान में जीवित रखता है, या उनके नामों को अपनी राजनीतिक ज़रूरत के अनुसार इस्तेमाल करता है? कविता इस अन्तर को उजागर करती है। मृतक यहाँ स्वयं अपनी बात नहीं कह सकते; उनकी उपस्थिति जीवित लोगों की भाषा और गतिविधियों के माध्यम से सामने आती है। इसीलिए कविता का प्रश्न स्मरण से आगे बढ़कर प्रतिनिधित्व और अधिकार का प्रश्न बन जाता है।
दोनों कविताओं में मनुष्य की आवाज़ का संकट अलग-अलग ढंग से सामने आता है। श्रीप्रकाश शुक्ल के यहाँ लोग सूचना के प्रवाह में शामिल होकर अपनी विशिष्टता खोते दिखाई देते हैं। ऋतुराज के यहाँ मृतकों की स्मृति राजनीतिक भाषा में समाहित होकर अपना मूल अर्थ खोने का जोखिम उठाती है। एक ओर मनुष्य स्वयं सूचना में बदल सकता है, दूसरी ओर उसका अतीत दूसरों के राजनीतिक वक्तव्य का हिस्सा बन सकता है। दोनों स्थितियों में अनुभव और उसके अर्थ के बीच दूरी पैदा होती है। इस तुलना से स्पष्ट होता है कि मनुष्य की स्वतंत्रता केवल बाहरी प्रतिबन्धों से मुक्त होने में नहीं है। अपनी स्थिति का अर्थ तय करने, अपनी स्मृति को समझने और अपनी आवाज़ को पहचानने की क्षमता भी स्वतंत्रता का हिस्सा है।
ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ इस संकट के सामने प्रतिरोध की सम्भावना प्रस्तुत करती है। कविता का वक्ता अपने जीवन की परिस्थितियों से अनजान नहीं है। वह कुप्रबन्ध, झूठे स्पष्टीकरणों, यात्रा की बाधाओं और निजी सम्बन्धों के दबाव को पहचानता है। फिर भी वह इन परिस्थितियों को अपने अस्तित्व का अन्तिम अर्थ तय नहीं करने देता। उसका प्रतिरोध इस बात में है कि वह अपने अनुभवों के आधार पर स्वयं को परिभाषित करने की कोशिश करता है। वह केवल परिस्थितियों का शिकार बनकर नहीं रहना चाहता। उसकी घोषणा में स्वतंत्रता का अर्थ अपनी स्थिति से बाहर निकलने की पूरी क्षमता हासिल कर लेना नहीं, बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद अपने निर्णय और अपनी जीवित रहने की इच्छा को बचाए रखना है।
इस बिंदु पर सार्त्र के स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व सम्बन्धी विचार कविता को समझने में सहायक हो सकते हैं। सार्त्र के अनुसार मनुष्य अपनी परिस्थितियों से पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होता, लेकिन वह उन परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया के माध्यम से अपने अस्तित्व का अर्थ भी बनाता है। इस दृष्टि से ऋतुराज की कविता में वक्ता का प्रतिरोध किसी सरल विजय का चित्र नहीं है। वह अपनी सीमाओं को पहचानते हुए भी उनके सामने पूरी तरह समर्पण नहीं करता। उसकी स्वतंत्रता परिस्थितियों को समाप्त कर देने में नहीं, बल्कि उनके भीतर अपने चुनाव की सम्भावना बचाए रखने में दिखाई देती है।
फिर भी इस कविता को केवल व्यक्तिगत इच्छाशक्ति की प्रशंसा के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा। वक्ता जिन परिस्थितियों का सामना करता है, वे सामाजिक जीवन की अव्यवस्थाओं और सम्बन्धों के दबाव से जुड़ी हैं। यदि आलोचना केवल व्यक्ति के साहस पर ध्यान दे, तो उन संरचनात्मक कारणों की उपेक्षा हो सकती है जो उसके जीवन को कठिन बनाते हैं। कविता का प्रतिरोध तभी अपना पूरा अर्थ ग्रहण करता है जब हम व्यक्ति की आन्तरिक दृढ़ता और उसके सामने मौजूद सामाजिक बाधाओं, दोनों को साथ रखकर देखते हैं। इस तरह ‘मरूँगा नहीं’ न तो परिस्थितियों के सामने असहाय समर्पण की कविता है, न ही ऐसी आशावादी घोषणा जिसमें संघर्ष की वास्तविकता मिट जाती है। वह जीवन की सम्भावना और सामाजिक सीमाओं के बीच तनाव बनाए रखती है।
अशोक वाजपेयी की ‘कितने दिन और बचे हैं?’ में स्वतंत्रता का प्रश्न अपेक्षाकृत सूक्ष्म रूप में सामने आता है। वक्ता अपने जीवन की अवधि नहीं जानता। उसे यह भी मालूम नहीं कि अन्तिम दस्तक कब आ जाएगी। वह समय को अपने नियन्त्रण में नहीं रख सकता, लेकिन उसके पास यह क्षमता है कि वह अपने आसपास की दुनिया को किस तरह देखे और अनुभव करे। चिड़िया, कीड़ा, चिनगारी, तितली, प्रेम का पत्र और पकते हुए अचार की प्रतीक्षा, ये सब जीवन के ऐसे प्रसंग हैं जिनका परिणाम निश्चित नहीं है। फिर भी वक्ता उनके प्रति सजग बना रहता है। उसकी स्वतंत्रता समय को रोकने में नहीं, बल्कि अनिश्चित समय के भीतर अपने अनुभवों के प्रति खुला रहने में है।
इस बिन्दु पर अशोक वाजपेयी और ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ के बीच एक महत्त्वपूर्ण अन्तर उभरता है। ऋतुराज का वक्ता उन परिस्थितियों का प्रतिरोध करता है जो उसके जीवन को सीमित करती हैं, जबकि अशोक वाजपेयी का वक्ता उस सीमा के साथ जीने का तरीका खोजता है जिसे मनुष्य पूरी तरह बदल नहीं सकता। दोनों कविताएँ जीवन की अनिश्चितता को स्वीकार करती हैं, लेकिन उनकी प्रतिक्रियाएँ अलग हैं। ऋतुराज के यहाँ प्रतिरोध का स्वर अधिक मुखर है। अशोक वाजपेयी के यहाँ सजगता, प्रतीक्षा और जीवन की साधारण गतिविधियों के प्रति लगाव अधिक महत्त्व रखता है। इन दोनों दृष्टियों को एक-दूसरे का विकल्प मानना उचित नहीं होगा। जीवन में कुछ सीमाएँ सामाजिक परिस्थितियों से पैदा होती हैं, जिनका प्रतिरोध किया जा सकता है; कुछ सीमाएँ मानवीय अस्तित्व की प्रकृति से जुड़ी होती हैं, जिनके साथ जीने की समझ विकसित करनी पड़ती है।
इस अन्तर को समझने के लिए हाइडेगर की मृत्यु-बोध सम्बन्धी अवधारणा के साथ-साथ बर्गसाँ के समय सम्बन्धी विचार भी उपयोगी हैं। मृत्यु की अनिवार्यता मनुष्य को यह सोचने के लिए प्रेरित कर सकती है कि वह अपने सीमित समय का अनुभव कैसे करता है। बर्गसाँ की दृष्टि में समय केवल मापी जाने वाली अवधि नहीं, बल्कि अनुभव की निरन्तरता भी है। अशोक वाजपेयी की कविता में प्रतीक्षा के छोटे-छोटे प्रसंग इसी अनुभवात्मक समय को सामने लाते हैं। किसी पत्र का इन्तज़ार करना या अचार के पकने की प्रतीक्षा करना केवल समय बिताना नहीं है। इन गतिविधियों के भीतर इच्छा, स्मृति और भविष्य की कल्पना जुड़ी रहती है। जीवन का अर्थ इसीलिए केवल उसकी अवधि में नहीं, बल्कि उन अनुभवों में भी है जिनके माध्यम से मनुष्य समय से सम्बन्ध बनाता है।
श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में समय का अनुभव इससे अलग है। वहाँ दिनचर्या का दोहराव जीवन को आगे बढ़ाता हुआ दिखाई देता है, लेकिन वह किसी नये अनुभव या आत्मबोध की ओर नहीं ले जाता। अशोक वाजपेयी के यहाँ प्रतीक्षा भविष्य के लिए जगह बनाती है, जबकि श्रीप्रकाश शुक्ल के यहाँ पुनर्जन्म की उम्मीद वर्तमान से बचने का माध्यम बन सकती है। दोनों कविताओं में भविष्य की ओर देखने की प्रवृत्ति है, लेकिन उसका परिणाम अलग है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भविष्य की कल्पना अपने आप में जीवनदायी नहीं होती। उसका अर्थ इस बात से तय होता है कि वह वर्तमान के साथ कैसा सम्बन्ध बनाती है। यदि भविष्य की आशा वर्तमान को समझने और बदलने की प्रेरणा देती है, तो वह सक्रिय सम्भावना है। यदि वह वर्तमान से बचने का बहाना बन जाती है, तो वह जड़ता को बनाए रख सकती है।
अर्न्स्ट ब्लोख के अनुसार आशा सिर्फ़ किसी अनुकूल परिणाम की इच्छा नहीं है । वह उन सम्भावनाओं को पहचानने की क्षमता भी है जो वर्तमान में पूरी तरह साकार नहीं हुई हैं। ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ में आशा प्रतिरोध की सम्भावना के रूप में उभरती है। अशोक वाजपेयी की कविता में वह जीवन की साधारण गतिविधियों और सम्बन्धों से जुड़ी है। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता इन दोनों के सामने एक प्रश्न रखती है: क्या आशा मनुष्य को अपनी वास्तविक स्थिति का सामना करने में मदद करती है, या उसे उससे दूर ले जाती है? इस प्रश्न के कारण चारों कविताओं में आशा का अर्थ एक जैसा नहीं रहता। वह कभी संघर्ष की ऊर्जा है, कभी जीवन के प्रति सजगता, तो कभी निष्क्रियता को ढँकने वाला आवरण।
इन कविताओं के बीच भाषा और मौन का सम्बन्ध भी विचारणीय है। ऋतुराज की ‘मरे हुए लोग’ में राजनीतिक भाषा का संकट सामने आता है। मृतकों के नाम पर कही जाने वाली बातें सच को स्पष्ट करने के बजाय उसे ढँक सकती हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता में सूचना का विस्तार है, लेकिन सूचना के बीच आत्मबोध का अभाव दिखाई देता है। एक ओर भाषा झूठ को वैधता देने का माध्यम बन सकती है, दूसरी ओर सूचना मनुष्य को उसके अनुभव से दूर कर सकती है। इन दोनों स्थितियों में शब्दों की उपस्थिति और अर्थ की अनुपस्थिति का विरोधाभास है।
इसके विपरीत, अशोक वाजपेयी की कविता में प्रश्नवाचकता एक ऐसी जगह बनाती है जहाँ कोई निश्चित उत्तर पहले से मौजूद नहीं है। शीर्षक में पूछा गया सवाल—कितने दिन और बचे हैं?—पूरी कविता में अनिश्चितता का भाव बनाए रखता है। वक्ता अपने समय के बारे में कोई निर्णायक ज्ञान हासिल नहीं कर सकता। वह केवल उन संकेतों और अनुभवों पर ध्यान दे सकता है जो उसके सामने आते हैं। इस तरह प्रश्न कविता की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी आलोचनात्मक और दार्शनिक शक्ति बन जाता है। वह पाठक को किसी तय निष्कर्ष तक पहुँचाने के बजाय उसे अपने जीवन, समय और सम्बन्धों के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है।
ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ का कथन इसके विपरीत एक दृढ़ निषेध से शुरू होता है। फिर भी इस दृढ़ता को पूर्ण निश्चितता नहीं समझना चाहिए। वक्ता अपने भविष्य का पूरा ज्ञान नहीं रखता। वह केवल उन परिस्थितियों के सामने अपनी असहमति व्यक्त करता है जो उसे समाप्त कर सकती हैं। इस तरह एक कविता प्रश्न के माध्यम से अनिश्चितता को स्वीकार करती है, जबकि दूसरी निषेध के माध्यम से उस अनिश्चितता के भीतर अपना प्रतिरोध स्थापित करती है। दोनों ही स्थितियों में भाषा अनुभव को किसी एक सरल निष्कर्ष में बन्द नहीं करती। वह जीवन की जटिलता को बनाए रखती है।
यहाँ आलोचनात्मक विवेचन के दौरान एक और सावधानी आवश्यक है। इन कविताओं को किसी एक दार्शनिक सिद्धान्त का उदाहरण मान लेना उनके काव्यात्मक वैभव को सीमित कर देगा। हाइडेगर, सार्त्र, मार्क्स, फूको, हाल्बवैक्स, रिकोयेर और ब्लोख जैसे विचारकों की अवधारणाएँ इन कविताओं में मौजूद अर्थों को समझने में मदद कर सकती हैं, लेकिन कविताओं का अर्थ इन सिद्धान्तों से पहले से तय नहीं होता। ऋतुराज के मृतकों को केवल राजनीतिक स्मृति की अवधारणा में सीमित नहीं किया जा सकता; श्रीप्रकाश शुक्ल के मृत शहर को केवल अलगाव का उदाहरण मानना पर्याप्त नहीं है; अशोक वाजपेयी की प्रतीक्षा को केवल मृत्यु-बोध की अभिव्यक्ति समझना भी उनकी कविता की ख़ासियत को कम कर देगा। सिद्धान्त का उपयोग तभी सार्थक है जब वह कविता के भीतर मौजूद विरोधाभासों, बिम्बों और अनुभवों को अधिक स्पष्ट करे, न कि उन्हें किसी तैयार निष्कर्ष में बदल दे।
चारों कविताओं के बीच यह भी ध्यान देने योग्य है कि वे पाठक से अलग-अलग प्रकार की नैतिक प्रतिक्रिया की अपेक्षा करती हैं। ऋतुराज की ‘मरे हुए लोग’ पाठक को राजनीतिक स्मृति और सार्वजनिक भाषा के प्रति सजग बनाती है। वह पूछती है कि मृतकों को याद करने का दावा करने वाले लोग वास्तव में किसकी सेवा कर रहे हैं। श्रीप्रकाश शुक्ल की कविता पाठक को अपनी दिनचर्या और व्यस्तता पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। क्या लगातार काम करते रहना ही सक्रिय जीवन का प्रमाण है, या कभी-कभी यही व्यस्तता आत्मबोध से बचने का तरीका बन जाती है? ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ पाठक को प्रतिरोध की सम्भावना के बारे में सोचने का अवसर देती है, जबकि अशोक वाजपेयी की कविता उसे समय की अनिश्चितता के बीच जीवन की साधारण गतिविधियों के प्रति सजग करती है।
इन नैतिक प्रतिक्रियाओं के बीच कोई सरल विभाजन नहीं है। राजनीतिक स्मृति के प्रति सजगता के लिए भी व्यक्तिगत उत्तरदायित्व चाहिए; अपनी दिनचर्या पर सवाल उठाने के लिए सामाजिक परिस्थितियों को समझना आवश्यक है; प्रतिरोध को सार्थक बनाने के लिए उन संरचनाओं की पहचान ज़रूरी है जिनका वह विरोध करता है; और जीवन की साधारण गतिविधियों का मूल्य पहचानने के लिए यह समझना भी ज़रूरी है कि हर व्यक्ति को उन्हें अनुभव करने के समान अवसर नहीं मिलते। इस प्रकार कविताएँ व्यक्ति और समाज, अनुभव और संरचना, आशा और प्रतिरोध के बीच सम्बन्ध स्थापित करती हैं।
निष्कर्षतः, ऋतुराज, श्रीप्रकाश शुक्ल और अशोक वाजपेयी की इन चार कविताओं का तुलनात्मक अध्ययन जीवन और मृत्यु की सामान्य अवधारणाओं को अधिक जटिल बनाता है। ऋतुराज की ‘मरे हुए लोग’ में मृत्यु के बाद भी अतीत की राजनीतिक उपस्थिति बनी रहती है, लेकिन यह उपस्थिति स्मृति के नैतिक इस्तेमाल की गारंटी नहीं देती। श्रीप्रकाश शुक्ल की ‘मरे हुए लोग’ में मृत्यु का निषेध ऐसी सामाजिक जड़ता का संकेत बनता है जिसमें काम, सूचना और आशा के बावजूद मनुष्य अपनी स्थिति को पहचानने से बचता है। ऋतुराज की ‘मरूँगा नहीं’ प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच अपनी जीवित रहने की इच्छा और प्रतिरोध की क्षमता को बचाए रखने की घोषणा है। अशोक वाजपेयी की ‘कितने दिन और बचे हैं?’ जीवन की अनिश्चित अवधि के भीतर प्रेम, प्रतीक्षा, प्रकृति और साधारण गतिविधियों के अर्थ को पहचानती है।
इन कविताओं की समानता उनके विषयों में ही नहीं, बल्कि उन सवालों में भी है जो वे मनुष्य के सामने रखती हैं। क्या स्मृति हमें अपने अतीत के प्रति उत्तरदायी बनाती है? क्या सूचना हमें अपनी स्थिति समझने में मदद करती है? क्या आशा परिवर्तन की सम्भावना खोलती है, या कभी-कभी वर्तमान से बचने का माध्यम बन जाती है? क्या प्रतिरोध केवल बाहरी परिस्थितियों को बदलने का नाम है, या अपनी संवेदना और निर्णय की क्षमता बचाए रखना भी प्रतिरोध का हिस्सा है? और क्या जीवन का अर्थ उसकी अवधि से अधिक उन अनुभवों में है जिनके माध्यम से हम समय, प्रकृति और दूसरे मनुष्यों से सम्बन्ध बनाते हैं?
इन प्रश्नों का कोई एक उत्तर इन कविताओं में नहीं मिलता। उनकी आलोचनात्मक शक्ति इसी में है कि वे पाठक को तैयार निष्कर्ष देने के बजाय अपनी स्थिति और अपने सामाजिक संसार पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। चारों कविताएँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि जीवित होना और जीवन को सचेत रूप से जीना एक ही बात नहीं है। स्मृति के बिना वर्तमान अपनी ऐतिहासिक समझ खो सकता है, आत्मबोध के बिना सक्रियता जड़ता में बदल सकती है, प्रतिरोध के बिना मनुष्य परिस्थितियों के सामने असहाय हो सकता है और भविष्य के प्रति खुलापन न हो तो जीवन अपनी सम्भावनाएँ खो सकता है। दूसरी ओर, स्मृति तभी सार्थक है जब वह वर्तमान को समझने में मदद करे; आशा तभी जीवनदायी है जब वह वास्तविकता से मुँह न मोड़े; प्रतिरोध तभी अर्थवान है जब वह मनुष्य की स्वतंत्रता और संवेदना की रक्षा करे; और समय की सीमितता का बोध तभी गहरा अनुभव बनता है जब वह हमें जीवन के प्रति अधिक सजग करे।
इस अर्थ में इन कविताओं का साझा आलोचनात्मक निष्कर्ष किसी एक जीवन-दर्शन की स्थापना नहीं, बल्कि ज़िन्दगी को पहचानने की हमारी आदतों पर सवाल उठाना है। वे बताती हैं कि मृत्यु केवल अन्तिम घटना नहीं, बल्कि सामाजिक विस्मृति, राजनीतिक इस्तेमाल और आत्मबोध के क्षरण के रूप में भी उपस्थित हो सकती है। इसी तरह जीवन केवल निरन्तर गतिविधि नहीं, बल्कि स्मरण करने, समझने, चुनाव करने, प्रतिरोध करने और प्रतीक्षा करने की क्षमता भी है। ऋतुराज, श्रीप्रकाश शुक्ल और अशोक वाजपेयी की काव्य-दृष्टियाँ इन प्रश्नों के अलग-अलग उत्तर प्रस्तुत करती हैं, लेकिन एक साझा बिन्दु पर मिलती हैं: मनुष्य का अस्तित्व तभी पूरी तरह अर्थवान हो सकता है जब वह अपनी वास्तविक परिस्थितियों से सम्बन्ध बनाए रखते हुए उनके भीतर मौजूद सम्भावनाओं को पहचान सके। यही इन कविताओं की दार्शनिक गहराई और उनकी सामाजिक आलोचना का आधार है।
सन्दर्भ
ऋतुराज. ‘मरे हुए लोग’ (कविता)
https://www.hindwi.org/kavita/mare-hue-log-rituraj-kavita?sort=popularity-desc
ऋतुराज. ‘मरुंगा नहीं’ (कविता)
https://www.hindwi.org/kavita/marunga-nahin-rituraj-kavita?sort=popularity-desc
वाजपेयी.अशोक. ‘कितने दिन और बचे हैं’. कविता कोश. https://www.google.com/goto?url=CAES1AIB6zswFaI-WgrXSwDIbdXdojtNfzBvpZmGSW63IPWJegfgerNpgrelM05NMHiOmE5VK-
शुक्ल,श्रीप्रकाश. ‘मरे हुए लोग’. कविता कोश. https://www.google.com/goto?url=CAEStAIB6zswFYkRRTJIPok66MNIxaR4e3QDrSkym6GyhhqC9tdQgu5s5Ln-
अन्य ग्रन्थ
Arendt, Hannah. Between Past and Future: Eight Exercises in Political Thought. Penguin Classics, 2006.
Benjamin, Walter. Illuminations: Essays and Reflections. Edited by Hannah Arendt, translated by Harry Zohn, Schocken Books, 1968.
Bergson, Henri. Time and Free Will: An Essay on the Immediate Data of Consciousness. Translated by F. L. Pogson, George Allen & Co., 1910.
Bloch, Ernst. The Principle of Hope. Translated by Neville Plaice, Stephen Plaice, and Paul Knight, 3 vols., MIT Press, 1986.
Buell, Lawrence. The Environmental Imagination: Thoreau, Nature Writing, and the Formation of American Culture. Harvard University Press, 1995.
Butler, Judith. Frames of War: When Is Life Grievable? Verso, 2009.
Debord, Guy. The Society of the Spectacle. Translated by Donald Nicholson-Smith, Zone Books, 1994.
Foucault, Michel. Discipline and Punish: The Birth of the Prison. Translated by Alan Sheridan, Vintage Books, 1995. Originally published in English in 1977.
Halbwachs, Maurice. On Collective Memory. Edited and translated by Lewis A. Coser, University of Chicago Press, 1992.
Heidegger, Martin. Being and Time. Translated by John Macquarrie and Edward Robinson, Basil Blackwell, 1962.
Latour, Bruno. We Have Never Been Modern. Translated by Catherine Porter, Harvard University Press, 1993.
Marx, Karl. Economic and Philosophic Manuscripts of 1844. Translated by Martin Milligan, Progress Publishers, 1959.
Ricoeur, Paul. Memory, History, Forgetting. Translated by Kathleen Blamey and David Pellauer, University of Chicago Press, 2004.
Sartre, Jean-Paul. Existentialism Is a Humanism. Translated by Philip Mairet, Yale University Press, 2007.
Spivak, Gayatri Chakravorty. A Critique of Postcolonial Reason: Toward a History of the Vanishing Present. Harvard University Press, 1999.
Williams, Raymond. Marxism and Literature. Oxford University Press, 1977.
प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय.संपर्क: raviranjan@uohyd.ac.in
Discover more from रचना समय
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
