कुँवर नारायण के जन्मशती वर्ष के अवसर पर ‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन का, आधुनिक हिंदी कविता के शीर्ष कवियों में परिगणित कुँवर नारायण की प्रसिद्ध कविता ‘चक्रव्यूह’ पर एक गहन, बहुस्तरीय और विचारोत्तेजक अनुशीलन प्रस्तुत किया जा रहा है।
यह आलेख महाभारत के पौराणिक प्रसंग ‘अभिमन्यु-वध’ और ‘चक्रव्यूह’ को केवल एक बीती हुई पुराकथात्मक घटना के रूप में न देखकर महाभारत, मिशेल फ़ूको, लुई अल्थूसर एवं ग्राम्शी के वैचारिक परिप्रेक्ष्य में कुँवर नारायण की विशिष्ट रचना-दृष्टि को उजागर करता है। आलेख यह रेखांकित करता है कि कैसे मिथकीय पात्र अभिमन्यु कुँवर नारायण के यहाँ आधुनिक जीवन की उस त्रासद स्थिति का प्रतीक बन जाता है, जहाँ संस्थागत हिंसा, राज्य-तंत्र और युद्ध-संस्कृति मनुष्य के स्वतंत्र अस्तित्व तथा उसकी नैतिक चेतना को घेरकर नष्ट करने पर आमादा हैं।
आलोचना के दौरान इस काव्य-संरचना का विश्लेषण केवल भावुक या परंपरागत व्याख्याओं तक सीमित न रखकर इसे समकालीन वैश्विक दार्शनिक एवं समाजशास्त्रीय विमर्शों से जोड़ा गया है। ‘चक्रव्यूह’ की — “जिन्होंने पक्ष अपने सत्य से ज़्यादा बड़ा माना” और “छल के लिए उद्यत व्यूह-रक्षक वीर-कायर हैं” — पंक्तियों को केंद्र में रखकर आलेख में यह स्थापित किया गया है कि जब सत्ता या समूहगत निष्ठा नैतिक विवेक पर हावी हो जाती है, तब छल को भी धर्म या वीरता का आवरण पहना दिया जाता है।
अपने सुधी पाठकों के समक्ष इस गंभीर, अकादमिक और समय-सापेक्ष आलेख को प्रस्तुत करते हुए हमें पूर्ण विश्वास है कि यह अध्ययन कुँवर नारायण की काव्य-चेतना को समझने की एक नई खिड़की खोलेगा।
— हरि भटनागर
युद्ध-संस्कृति बनाम नैतिक विवेक: कुँवर नारायण के ‘चक्रव्यूह‘ की वैचारिक संरचना
रवि रंजन
इतिहास के किसी भी संक्रांति-काल में साहित्य केवल सामाजिक यथार्थ का प्रतिबिंब मात्र नहीं होता, बल्कि वह अपनी सभ्यता के नैतिक विवेक और सत्ता-संरचनाओं के बीच चलने वाले द्वंद्व की विचार-भूमि भी बनता है। हिंदी के मूर्धन्य कवि कुँवर नारायण का काव्य-संग्रह ‘चक्रव्यूह’ इसी नैतिक संकट और सभ्यतागत संघर्ष की एक अत्यंत सूक्ष्म, विचारोत्तेजक और दार्शनिक अभिव्यक्ति है। महाभारत के सुप्रसिद्ध ‘चक्रव्यूह’ के आख्यान को आधार बनाकर कवि ने आधुनिक जीवन की उस त्रासद स्थिति को उकेरा है, जहाँ संस्थागत हिंसा, युद्ध-संस्कृति और सत्ता-तंत्र व्यक्ति के स्वतंत्र अस्तित्व तथा उसकी नैतिक चेतना को घेरकर नष्ट करने पर आमादा हैं।
प्रस्तुत आलेख—”युद्ध-संस्कृति बनाम नैतिक विवेक: कुँवर नारायण के ‘चक्रव्यूह’ की वैचारिक संरचना”—कवि के इस ऐतिहासिक-पौराणिक रूपक (Mythic Allegory) को केवल एक पुराकथात्मक पुनर्पाठ के रूप में न देखकर, उसकी गहन राजनीतिक और दार्शनिक परतों का उद्घाटन करता है। कविता में अभिमन्यु मात्र महाभारत का एक योद्धा नहीं, बल्कि सत्ता के संवेदनहीन व्यूह में फँसे उस आधुनिक ‘विवेकशील मनुष्य’ का प्रतीक है, जो व्यवस्था द्वारा प्रायोजित हिंसा के विरुद्ध अकेले खड़े होने का साहस जुटाता है।
यह अध्ययन आधुनिक दार्शनिक विमर्शों के परिप्रेक्ष्य में ‘चक्रव्यूह’ की वैचारिक बुनावट का अनुशीलन करता है। एक ओर जहाँ मीशेल फ़ूको (Michel Foucault) का सत्ता और ज्ञान-संबध (Power/Knowledge), लुई अल्थूसर (Louis Althusser) का विचारधारामय राज्य-तंत्र (Ideological State Apparatuses) तथा ग्राम्शी (Antonio Gramsci) का ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ (Hegemony) यह स्पष्ट करता है कि कैसे युद्ध-संस्कृति सामान्य जनमानस को छल से अपनी व्यवस्था का हिस्सा बना लेती है; वहीं दूसरी ओर रेने गिरार (René Girard) का बलि-तंत्र (Scapegoating Mechanism) तथा जूडिथ बटलर (Judith Butler) का ‘असुरक्षित जीवन’ (Precarious Life) और शोक का दर्शन इस बात को रेखांकित करता है कि कैसे राज्य अपनी संप्रभुता को बनाए रखने के लिए नैतिक विवेक का बलिदान देता है।
आलेख में इस बात की गहन पड़ताल की गयी है कि कुँवर नारायण का ‘चक्रव्यूह’ युद्ध की भयावहता के बीच किस प्रकार एक ओर संवेदनहीन सत्ता-तंत्र के छद्म को उजागर करता है, और दूसरी ओर निराशा और मृत्यु के बीच भी मनुष्यता के अंतिम नैतिक विवेक को जीवित रखने की वैचारिक संरचना को प्रस्तुत करता है।
कविता का मूल पाठ दृष्टव्य है :
चक्रव्यूह
युद्ध की प्रतिध्वनि जगाकर
जो हज़ारों बार दुहराई गई,
रक्त की विरुदावली कुछ और रँगकर
लोरियों के संग जो गाई गई—
उसी इतिहास की स्मृति,
उसी संसार में लौटे हुए,
ओ योद्धा, तुम कौन हो?
मैं नवागत वह अजित अभिमन्यु हूँ
प्रारब्ध जिसका गर्भ ही से हो चुका निश्चित,
अपरिचित ज़िंदगी के व्यूह में फेंका हुआ उन्माद,
बाँधी पंक्तियों को तोड़
क्रमशः लक्ष्य तक बढ़ता हुआ जयनाद :
मेरे हाथ में टूटा हुआ पहिया,
पिघलती आग-सी संध्या,
बदन पर एक फूटा कवच,
सारी देह क्षत-विक्षत,
धरती-ख़ून में ज्यों सनी लथपथ लाश,
सिर पर गिद्ध-सा मँडरा रहा आकाश…
मैं बलिदान इस संघर्ष में
कटु व्यंग्य हूँ उस तर्क पर
जो ज़िंदगी के नाम पर हारा गया,
आहूत हर युद्धाग्नि में
वह जीव हूँ निष्पाप
जिसको पूज कर मारा गया,
वह शीश जिसका रक्त सदियों तक बहा,
वह दर्द जिसको बेगुनाहों ने सहा।
यह महासंग्राम,
युग-युग से चला आता महाभारत,
हज़ारों युद्ध, उपदेशों, उपाख्यानों, कथाओं में
छिपा वह पृष्ठ मेरा है
जहाँ सदियों पुराना व्यूह, जो दुर्भद्य था, टूटा,
जहाँ अभिमन्यु कोई भयों के आतंक से छूटा :
जहाँ उसने विजय के चंद घातक पलों में जाना
कि छल के लिए उद्यत व्यूह-रक्षक वीर-कायर हैं,
—जिन्होंने पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना—
जहाँ तक पहुँच उसने मृत्यु के निष्पक्ष, समयातीत घेरे में
घिरे अस्तित्व का हर पक्ष पहिचाना।
—कुँवर नारायण
‘चक्रव्यूह’ कविता मिथकीय स्मृति, युद्ध-इतिहास, आधुनिक मनुष्य की अस्तित्वगत स्थिति और नैतिक विवेक को एक ही काव्य-परिसर में रखकर पढ़ने का अवसर देती है। कविता का आधार महाभारत का अभिमन्यु-प्रसंग है, लेकिन इसका अभिप्राय महाभारत की कथा को दोहराना नहीं है। अभिमन्यु यहाँ किसी बीते हुए युग का अकेला योद्धा नहीं, बल्कि उन सभी मनुष्यों का रूपक बन जाता है जिन्हें इतिहास, सत्ता, युद्ध और पूर्वनिर्धारित परिस्थितियाँ ऐसे संघर्ष में धकेल देती हैं जिसका पूरा व्यूह वे जानते नहीं, फिर भी उससे निकलने के लिए संघर्ष करते हैं। इसीलिए कविता की आरम्भिक पंक्तियाँ ही इतिहास को एक जीवित, पुनरावृत्त होती हुई स्मृति के रूप में स्थापित करती हैं—‘युद्ध की प्रतिध्वनि जगाकर / जो हज़ारों बार दुहराई गई’। युद्ध यहाँ कोई समाप्त घटना नहीं है; उसकी प्रतिध्वनि पीढ़ियों के भीतर चलती रहती है।
‘रक्त की विरुदावली’ और ‘लोरियों’ का साथ-साथ आना कविता के अर्थ-संसार को एक गहरी विडम्बना प्रदान करता है। ‘विरुदावली’ सामान्यतः वीरता, विजय और यश का आख्यान है, जबकि ‘लोरी’ शिशु को सुलाने, आश्वस्त करने और अगली पीढ़ी को सांस्कृतिक स्मृति सौंपने का माध्यम है। कुँवर नारायण इन दोनों को एक साथ रखकर दिखाते हैं कि युद्ध केवल रणभूमि में नहीं लड़ा जाता; वह सांस्कृतिक स्मृति में भी पुनरुत्पादित होता है। रक्त की कथा जब लोरी बन जाती है, तब हिंसा वीरता के सौन्दर्यशास्त्र में बदल जाती है। युद्ध का वास्तविक दुःख पीछे हट जाता है और उसकी जगह विजय, पराक्रम तथा बलिदान की गौरव-कथा ले लेती है। इस प्रकार कविता युद्ध की आलोचना केवल युद्ध के परिणामों के आधार पर नहीं करती, बल्कि उस सांस्कृतिक तंत्र की भी पड़ताल करती है जो युद्ध को स्मरणीय, अनुकरणीय और कभी-कभी पवित्र बना देता है।
इसी पृष्ठभूमि में प्रश्न आता है—‘उसी इतिहास की स्मृति, / उसी संसार में लौटे हुए, / ओ योद्धा, तुम कौन हो?’ यहाँ ‘तुम’ का संबोधन विशेष ध्यान देने योग्य है। कवि सीधे अभिमन्यु से संवाद करता हुआ प्रतीत होता है, लेकिन यह संबोधन धीरे-धीरे सार्वभौमिक हो जाता है। ‘तुम कौन हो?’ केवल पहचान का प्रश्न नहीं है; यह इतिहास में मनुष्य की स्थिति का प्रश्न है। क्या योद्धा केवल युद्ध करने वाला व्यक्ति है? क्या वह किसी पक्ष का प्रतिनिधि है? क्या उसकी पहचान उसके शौर्य से बनती है या उसकी नैतिक स्थिति से? कविता आगे चलकर इन प्रश्नों को अभिमन्यु के माध्यम से खोलती है।
‘मैं नवागत वह अजित अभिमन्यु हूँ’ में ‘नवागत’ और ‘अजित’ का संयोजन उल्लेखनीय है। अभिमन्यु संसार में नया आया है, पर वह पराजित नहीं है। यहाँ ‘अजित’ का अर्थ केवल युद्ध में विजयी होने वाला नहीं है। अभिमन्यु की वास्तविक अजेयता उसकी नैतिक स्थिति में है। वह मर सकता है, पर उसकी मृत्यु उस व्यवस्था को नैतिक विजय नहीं देती जो उसे मारती है। इसीलिए कविता में मृत्यु और विजय के पारम्परिक समीकरण को उलट दिया जाता है। शारीरिक रूप से अभिमन्यु पराजित होता है, लेकिन नैतिक और ऐतिहासिक स्तर पर उसकी मृत्यु उन लोगों की व्यवस्था को प्रश्नांकित करती है जिन्होंने उसे घेरा था।
‘प्रारब्ध जिसका गर्भ ही से हो चुका निश्चित’ पंक्ति अभिमन्यु के जीवन को नियति के प्रश्न से जोड़ती है। यहाँ ‘गर्भ’ केवल जैविक जन्म का संकेत नहीं है; यह उस ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थिति का भी रूपक है जिसमें मनुष्य जन्म लेता है। व्यक्ति अपने समय, इतिहास, सामाजिक संरचनाओं और सत्ता-संबंधों को स्वयं नहीं चुनता। वह पहले से निर्मित संसार में प्रवेश करता है। इस अर्थ में ‘चक्रव्यूह’ जन्म के बाद निर्मित होने वाली परिस्थिति ही नहीं, बल्कि जन्म से पहले से मौजूद ऐतिहासिक संरचनाओं का भी संकेत बन जाता है। मनुष्य को जिस दुनिया में प्रवेश मिलता है, उसकी सीमाएँ पहले से निर्धारित होती हैं, फिर भी वह उन सीमाओं के भीतर अपनी एजेंसी , अर्थात् अपनी सक्रियता और प्रतिरोध की सम्भावना तलाशता है।
महाभारत के मूल आख्यान में भी चक्रव्यूह का निर्माण किसी आकस्मिक युद्ध-व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति के रूप में सामने आता है। द्रोण का कथन है—‘तं च व्यूहं विधास्यामि योऽभेद्यस्त्रिदशैरपि। / योगेन केनचिद् राजन्नर्जुनस्त्वपनीयताम्॥’ अर्थात् ‘मैं ऐसा व्यूह रचूँगा जो देवताओं के लिए भी अभेद्य होगा; हे राजन्, किसी उपाय से अर्जुन को रणभूमि से दूर ले जाया जाए।’ यहाँ व्यूह की शक्ति केवल उसकी सैन्य संरचना में नहीं, बल्कि उस पूर्वयोजना में है जिसके द्वारा अर्जुन को उससे अलग कर दिया जाता है। इसके बाद अभिमन्यु उस दुर्जेय संरचना में प्रवेश करता है। महाभारत का यह प्रसंग कुँवर नारायण की कविता में ‘अपरिचित ज़िंदगी के व्यूह’ की अवधारणा को एक गहरी पृष्ठभूमि प्रदान करता है। मूल आख्यान का सैन्य व्यूह यहाँ आधुनिक कविता में उन पूर्वनिर्मित संरचनाओं का रूपक बन जाता है जिनमें व्यक्ति प्रवेश तो करता है, लेकिन जिनकी सम्पूर्ण कार्यप्रणाली और परिणाम उसके नियंत्रण में नहीं होते। इसीलिए कुँवर नारायण के यहाँ चक्रव्यूह केवल एक युद्ध-तकनीक का नाम नहीं रह जाता; वह मनुष्य और उसके सामने पहले से निर्मित परिस्थितियों के बीच तनाव का काव्यात्मक रूप बन जाता है।
उल्लेखनीय है कि ‘अपरिचित ज़िंदगी के व्यूह में फेंका हुआ उन्माद’ पंक्ति कविता की अस्तित्वगत संवेदना को तीव्र करती है। जीवन स्वयं ‘व्यूह’ है और मनुष्य उसमें ‘फेंका हुआ’ है। यह स्थिति आधुनिक अस्तित्ववादी चिन्तन की उस धारणा से संवाद करती है जिसमें मनुष्य अपने चुनाव से पहले ही एक ऐसी दुनिया में उपस्थित होता है जिसकी मूल परिस्थितियाँ उसके नियंत्रण में नहीं होतीं। लेकिन कुँवर नारायण का मनुष्य निष्क्रिय नहीं है। वह ‘बाँधी पंक्तियों को तोड़ / क्रमशः लक्ष्य तक बढ़ता हुआ जयनाद’ है। इसलिए नियति और स्वतंत्रता का संबंध कविता में द्वंद्वात्मक है। परिस्थितियाँ मनुष्य के लिए निर्धारित हो सकती हैं, लेकिन उसके प्रत्युत्तर की सम्भावना पूरी तरह समाप्त नहीं होती।
‘बाँधी पंक्तियों को तोड़’ में ‘व्यूह’ का वास्तविक अर्थ सामने आता है। व्यूह केवल सैनिकों की संरचना नहीं है। वह किसी भी ऐसी व्यवस्थित शक्ति का रूपक है जो मनुष्य को घेरे रहती है और उसके विकल्पों को सीमित करती है। सामाजिक व्यवस्था, राजनीतिक सत्ता, युद्ध की विचारधारा, धार्मिक या सांस्कृतिक पूर्वाग्रह, इतिहास की निर्मित स्मृतियाँ और हिंसा को वैध ठहराने वाली भाषा—इन सबको इस ‘व्यूह’ के व्यापक अर्थ में पढ़ा जा सकता है। अभिमन्यु का संघर्ष इसलिए किसी एक युद्ध से बड़ा होकर मनुष्य और संरचना के संघर्ष में बदल जाता है।
कविता में अभिमन्यु का दृश्यात्मक चित्रण उसकी त्रासदी को अमूर्त विचार नहीं रहने देता। ‘मेरे हाथ में टूटा हुआ पहिया’ महाभारत की स्मृति से आया हुआ प्रतीक है, लेकिन यहाँ इसका अर्थ बहुस्तरीय हो जाता है। पहिया गति, यात्रा, समय और युद्ध—सभी का प्रतीक हो सकता है। जब पहिया टूट जाता है, तब गति का साधन हथियार में बदल जाता है। जो वस्तु आगे बढ़ने का माध्यम थी, वही प्रतिरोध का अंतिम उपकरण बनती है। यह परिवर्तन मनुष्य की रचनात्मक और रक्षात्मक क्षमता के संकट का भी संकेत देता है।
‘पिघलती आग-सी संध्या’ में समय और दृश्य एक-दूसरे में घुल जाते हैं। संध्या सामान्यतः दिन और रात के बीच की सीमा है। यहाँ वह ‘पिघलती आग’ है। आग युद्ध की हिंसा, विनाश और रक्त की स्मृति से जुड़ती है, जबकि संध्या दिन के समाप्त होने का संकेत देती है। इस तरह अभिमन्यु के चारों ओर उपस्थित समय भी संकटग्रस्त है। दिन का अन्त केवल एक दिन का अन्त नहीं, बल्कि जीवन के एक चरण का अन्त है। ‘फूटा कवच’, ‘सारी देह क्षत-विक्षत’ और ‘धरती-ख़ून में ज्यों सनी लथपथ लाश’ जैसे बिम्ब शरीर को इतिहास का दस्तावेज बना देते हैं। शरीर अब केवल व्यक्ति का शरीर नहीं है; उस पर युद्ध का इतिहास लिखा हुआ है।
‘सिर पर गिद्ध-सा मँडरा रहा आकाश’ कविता के सबसे सघन प्रतीकों में से एक है। सामान्यतः आकाश विस्तार, स्वतंत्रता और अनन्तता का प्रतीक माना जाता है। यहाँ आकाश ‘गिद्ध’ की तरह मंडरा रहा है। इस उलटाव से मुक्ति का प्रतीक भी मृत्यु और विनाश की छाया में आ जाता है। गिद्ध मृत शरीर की प्रतीक्षा करता है; आकाश का गिद्ध बन जाना इस बात का संकेत है कि अभिमन्यु का निजी संकट एक व्यापक सभ्यतागत संकट में बदल गया है। जिस आकाश के नीचे मनुष्य स्वतंत्रता की कल्पना करता है, वही आकाश हिंसा का साक्षी बना हुआ है।
इसके बाद कविता का स्वर और स्पष्ट रूप से नैतिक हो जाता है—‘मैं बलिदान इस संघर्ष में / कटु व्यंग्य हूँ उस तर्क पर / जो ज़िंदगी के नाम पर हारा गया।’ यहाँ ‘कटु व्यंग्य’ कविता की वैचारिक धुरी है। युद्ध को प्रायः किसी बड़े उद्देश्य, न्याय, धर्म, राष्ट्र, सभ्यता या जीवन की रक्षा के नाम पर उचित ठहराया जाता है। लेकिन कविता उस तर्क के भीतर मौजूद विरोधाभास को पकड़ती है। यदि जीवन की रक्षा के नाम पर जीवन ही नष्ट किया जा रहा है, तो उस तर्क की नैतिक विश्वसनीयता कहाँ बचती है? अभिमन्यु का बलिदान इसी विरोधाभास का ‘व्यंग्य’ बन जाता है।
‘आहूत हर युद्धाग्नि में / वह जीव हूँ निष्पाप / जिसको पूज कर मारा गया’ में ‘पूज कर मारा गया’ एक गहरी सभ्यतागत विडम्बना है। समाज अपने शहीदों का सम्मान करता है, स्मारक बनाता है, उन्हें पूजनीय बनाता है; लेकिन वही व्यवस्था उन परिस्थितियों को बदलने में असफल रह सकती है जिनमें नए मनुष्य उसी हिंसा के शिकार होते रहते हैं। अभिमन्यु इसलिए केवल मारा गया व्यक्ति नहीं है; वह उस सांस्कृतिक प्रक्रिया का प्रतिनिधि है जिसमें मनुष्य की मृत्यु को पवित्र बनाकर उसकी वास्तविक त्रासदी से दूरी बना ली जाती है।
‘वह शीश जिसका रक्त सदियों तक बहा, / वह दर्द जिसको बेगुनाहों ने सहा’ में व्यक्तिगत मृत्यु ऐतिहासिक पीड़ा में बदल जाती है। ‘सदियों तक’ समय को विस्तृत करता है। अभिमन्यु की मृत्यु महाभारत के एक दिन की घटना नहीं रह जाती; वह इतिहास में बार-बार घटने वाली हिंसा का प्रतीक बन जाती है। यहाँ कविता की स्मृति-दृष्टि महत्त्वपूर्ण है। स्मृति केवल अतीत को सुरक्षित रखने का माध्यम नहीं है; वह वर्तमान को समझने की नैतिक क्षमता भी बन सकती है। यदि इतिहास केवल वीरों की विजय-कथा के रूप में याद किया जाए तो पीड़ितों की आवाज़ दब जाती है। लेकिन यदि इतिहास को अभिमन्यु की दृष्टि से पढ़ा जाए, तो वही इतिहास हिंसा, छल और निर्दोषों की मृत्यु का दस्तावेज बन जाता है।
कविता का ‘महाभारत’ इसी कारण केवल धार्मिक या पौराणिक आख्यान नहीं है। ‘यह महासंग्राम, / युग-युग से चला आता महाभारत’ में महाभारत एक सांस्कृतिक आद्यरूप (archetype) की तरह सामने आता है। वह बार-बार घटने वाली मानवीय स्थितियों का प्रतीक बन जाता है। इतिहास में युद्ध बदलते हैं, हथियार बदलते हैं, सत्ता की भाषाएँ बदलती हैं, लेकिन मनुष्य को किसी ‘पक्ष’ में बाँटने और उस पक्ष के नाम पर हिंसा को वैध बनाने की प्रवृत्ति बनी रह सकती है। कुँवर नारायण इसी पुनरावृत्ति को मिथकीय संरचना के माध्यम से पकड़ते हैं।
‘हज़ारों युद्ध, उपदेशों, उपाख्यानों, कथाओं में / छिपा वह पृष्ठ मेरा है’ में ‘पृष्ठ’ का रूपक विशेष अर्थ रखता है। इतिहास एक विशाल पुस्तक है और अभिमन्यु उस पुस्तक का एक ऐसा पृष्ठ है जो छिपा हुआ है। यह ‘छिपा हुआ पृष्ठ’ इतिहास-लेखन की समस्या की ओर संकेत करता है। इतिहास प्रायः विजेताओं, राजाओं, सेनापतियों और निर्णायक घटनाओं के इर्द-गिर्द संगठित होता है। लेकिन उन आख्यानों के भीतर दबे हुए व्यक्तिगत दुःख, असहमति और निर्दोषों की मृत्यु अक्सर हाशिए पर चली जाती है। कविता उस छिपे हुए पृष्ठ को सामने लाती है।
‘जहाँ सदियों पुराना व्यूह, जो दुर्भेद्य था, टूटा’ में पहली बार व्यूह की संरचना निर्णायक रूप से टूटती है। लेकिन यह टूटना केवल सैन्य विजय नहीं है। अभिमन्यु उस क्षण एक ऐसी चेतना तक पहुँचता है जो व्यूह की वास्तविक प्रकृति को पहचान लेती है। इसीलिए अगली पंक्ति—‘जहाँ अभिमन्यु कोई भयों के आतंक से छूटा’—को केवल शारीरिक मुक्ति की तरह पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। यहाँ ‘छूटना’ भय से मुक्त होना है। मृत्यु के सामने खड़ा व्यक्ति जब भय की संरचना को पहचान लेता है, तब सत्ता की एक बड़ी शक्ति समाप्त हो जाती है।
कविता की सबसे तीखी नैतिक पहचान इस पंक्ति में आती है—‘कि छल के लिए उद्यत व्यूह-रक्षक वीर-कायर हैं’। ‘वीर-कायर’ एक विरोधाभासी पद है। जो लोग युद्ध की सामाजिक भाषा में ‘वीर’ कहलाते हैं, वे नैतिक दृष्टि से कायर हो सकते हैं यदि उनकी वीरता छल, संख्या, घेराबंदी और असमान शक्ति पर निर्भर हो। यहाँ कुँवर नारायण वीरता की परम्परागत अवधारणा को उलटते हैं। साहस केवल युद्ध करने की क्षमता नहीं है; नैतिक साहस का अर्थ अन्यायपूर्ण संरचना का प्रतिरोध करना और सत्य के प्रति उत्तरदायी रहना भी है।
इसीलिए अगली पंक्ति इस नैतिक प्रश्न को राजनीतिक अर्थ देती है—‘जिन्होंने पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना’। ‘पक्ष’ और ‘सत्य’ का यह विरोध कविता की केंद्रीय वैचारिक संरचनाओं में से एक है। किसी पक्ष से जुड़ना मनुष्य की सामाजिक आवश्यकता हो सकती है, लेकिन जब पक्ष सत्य से बड़ा हो जाता है, तब नैतिक विवेक नष्ट होने लगता है। व्यक्ति तब यह नहीं पूछता कि सही क्या है; वह पूछता है कि मेरे पक्ष में क्या है। इस स्थिति में युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों, पहचानों और निष्ठाओं के माध्यम से भी संचालित होता है।
यहाँ कविता आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक जीवन से भी संवाद करने लगती है, बिना किसी विशिष्ट समकालीन घटना का नाम लिए। ‘पक्ष’ का अर्थ किसी भी सामूहिक पहचान, विचारधारा, सत्ता या समूह से हो सकता है। कविता की चेतावनी यह है कि जब समूहगत निष्ठा सत्य और नैतिकता पर हावी हो जाती है, तब छल को भी वीरता का नाम दिया जा सकता है और हिंसा को भी धर्म या न्याय का रूप दिया जा सकता है।
अन्तिम पंक्तियाँ कविता को अस्तित्ववादी धरातल पर ले जाती हैं—‘जहाँ तक पहुँच उसने मृत्यु के निष्पक्ष, समयातीत घेरे में / घिरे अस्तित्व का हर पक्ष पहिचाना।’ यहाँ ‘मृत्यु’ को ‘निष्पक्ष’ कहा गया है। यह शब्द कविता की समूची नैतिक संरचना को एक नए आयाम में ले जाता है। युद्ध में पक्ष होते हैं, शत्रु होते हैं, मित्र होते हैं, विजेता और पराजित होते हैं; लेकिन मृत्यु इन विभाजनों को अन्ततः निरर्थक कर देती है। मृत्यु का ‘समयातीत घेरा’ इतिहास की सभी अस्थायी पहचानों के ऊपर स्थित एक ऐसी सीमा है जहाँ मनुष्य की मूल अस्तित्वगत समानता सामने आती है।
लेकिन यह मृत्यु का महिमामंडन नहीं है। कविता मृत्यु को विजय का रोमानी माध्यम नहीं बनाती। बल्कि वह मृत्यु के सामने जीवन, हिंसा, सत्य और पक्षधरता के प्रश्नों को अधिक तीखे ढंग से रखती है। अभिमन्यु मृत्यु में जाकर जीवन के उस विरोधाभास को पहचानता है जिसमें मनुष्य जीवन के नाम पर युद्ध करता है और युद्ध के माध्यम से जीवन को नष्ट करता है। इसीलिए कविता का अन्त किसी विजय-घोषणा से नहीं, बल्कि ‘अस्तित्व का हर पक्ष’ पहचान लेने से होता है। यह पहचान ही अभिमन्यु की वास्तविक उपलब्धि है।
इस दृष्टि से ‘चक्रव्यूह’ को केवल अभिमन्यु की पुनर्कथा कहना कविता की जटिलता को सीमित कर देगा। यह स्मृति और इतिहास के बीच संबंध पर भी विचार करती है। इतिहास में युद्ध बार-बार लौटते हैं, लेकिन हर वापसी के साथ उनकी स्मृति भी पुनर्गठित होती है। कुँवर नारायण मिथक का इस्तेमाल अतीत को वर्तमान पर आरोपित करने के लिए नहीं, बल्कि वर्तमान को मिथकीय स्मृति के भीतर पुनः देखने के लिए करते हैं। अभिमन्यु इसलिए अतीत का पात्र होते हुए भी वर्तमान की नैतिक चेतना का माध्यम बन जाता है।
कविता में समय की संरचना भी रैखिक नहीं है। ‘युग-युग से’, ‘सदियों तक’, ‘हज़ारों बार’, ‘उसी इतिहास की स्मृति’ जैसे संकेत एक ऐसे समय की रचना करते हैं जिसमें अतीत वर्तमान में लौटता रहता है। यह समय स्मृति का समय है। महाभारत अतीत में समाप्त नहीं होता; उसकी संरचनाएँ, उसके प्रश्न और उसकी नैतिक दुविधाएँ अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों में पुनः उपस्थित होती हैं। इसीलिए ‘चक्रव्यूह’ का चक्र केवल युद्ध-व्यूह का चक्र नहीं, बल्कि इतिहास की पुनरावृत्ति का चक्र भी है।
इसे मॉरिस हाल्बवैक्स (Maurice Halbwachs) की सामूहिक स्मृति की अवधारणा के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है। किसी समाज की स्मृति केवल व्यक्तियों की निजी स्मृतियों का संग्रह नहीं होती; वह सामाजिक संरचनाओं द्वारा निर्मित और पुनर्गठित होती है। कविता की ‘विरुदावली’, ‘लोरियाँ’, ‘उपदेश’, ‘उपाख्यान’ और ‘कथाएँ’ इसी सामूहिक स्मृति के माध्यम हैं। वे यह तय करते हैं कि समाज युद्ध को किस रूप में याद करेगा—वीरता के रूप में, त्रासदी के रूप में या दोनों के तनाव के रूप में। कुँवर नारायण इस स्मृति में एक वैकल्पिक स्थान बनाते हैं, जहाँ विजेताओं की जगह पीड़ित अभिमन्यु बोलता है।
पॉल रिकोयर (Paul Ricoeur) की स्मृति और आख्यान की अवधारणा से भी कविता का संबंध स्पष्ट होता है। इतिहास और स्मृति हमेशा किसी कथा के माध्यम से हमारे सामने आते हैं। कौन-सा प्रसंग याद रखा जाता है और किस दृष्टिकोण से सुनाया जाता है, इससे अतीत का अर्थ बदल जाता है। ‘छिपा वह पृष्ठ मेरा है’ इसी आख्यानगत राजनीति की ओर संकेत करता है। कविता उस पृष्ठ को खोलती है जिसे पारम्परिक वीरगाथा के भीतर दबा दिया गया था।
कविता की नैतिकता को लेविनास (Emmanuel Levinas) की ‘अन्य’ के प्रति उत्तरदायित्व की अवधारणा से भी जोड़ा जा सकता है। अभिमन्यु यहाँ केवल ‘हमारे पक्ष’ का योद्धा नहीं है; उसकी पीड़ा उस नैतिक स्थिति को जन्म देती है जिसमें किसी मनुष्य के दुःख को केवल पक्षीय पहचान के आधार पर नहीं देखा जा सकता। ‘निष्पाप’ और ‘बेगुनाह’ जैसे शब्द इसी सार्वभौमिक नैतिकता को सामने लाते हैं। युद्ध में व्यक्ति को पहले किसी पक्ष का सदस्य बनाया जाता है, फिर उसके जीवन और मृत्यु का मूल्य उसी पक्ष के अनुसार निर्धारित किया जाता है। कविता इस मूल्य-व्यवस्था को अस्वीकार करती है।
‘चक्रव्यूह’ का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष भाषा है। कुँवर नारायण ने संस्कृतनिष्ठ, पौराणिक और आधुनिक शब्दावली को इस तरह जोड़ा है कि कविता न तो केवल शास्त्रीय लगती है और न केवल आधुनिक। ‘विरुदावली’, ‘प्रारब्ध’, ‘व्यूह’, ‘महासंग्राम’, ‘उपाख्यान’, ‘युद्धाग्नि’ जैसे शब्द महाभारतीय सांस्कृतिक स्मृति को सक्रिय करते हैं, जबकि ‘तर्क’, ‘ज़िंदगी’, ‘अस्तित्व’, ‘सत्य’ और ‘पक्ष’ कविता को आधुनिक नैतिक विमर्श में ले आते हैं। भाषा स्वयं अतीत और वर्तमान के बीच एक सेतु बन जाती है।
कविता की संरचना भी वृत्ताकार है। शुरुआत युद्ध की पुनरावृत्ति और इतिहास की स्मृति से होती है और अन्त मृत्यु के ‘समयातीत घेरे’ में होता है। आरम्भ में अभिमन्यु इतिहास में लौटता है; अन्त में वह इतिहास के भीतर अस्तित्व के अर्थ को पहचान लेता है। इस प्रकार ‘चक्रव्यूह’ केवल कविता का शीर्षक नहीं, बल्कि उसकी संरचनात्मक पद्धति भी है। मनुष्य व्यूह में प्रवेश करता है, संघर्ष करता है, उसकी परतों को पहचानता है और अन्ततः उसी व्यूह के भीतर अपनी अस्तित्वगत स्थिति को समझता है।
फिर भी कविता निराशा पर समाप्त नहीं होती। उसका प्रतिरोध किसी बाहरी विजय में नहीं, पहचान की प्रक्रिया में है। अभिमन्यु व्यूह को पूरी तरह नष्ट कर दे, यह आवश्यक नहीं; वह यह समझ लेता है कि व्यूह किस तर्क पर टिका है, कौन-से लोग उसे बचा रहे हैं और किस तरह ‘पक्ष’ सत्य पर भारी पड़ता है। यह पहचान स्वयं एक नैतिक प्रतिरोध है। कुँवर नारायण के यहाँ कविता का कार्य किसी सरल समाधान की घोषणा करना नहीं, बल्कि ऐसी चेतना उत्पन्न करना है जो हिंसा के सामान्यीकरण, वीरता के मिथकीकरण और पक्षधरता के अंधत्व के भीतर छिपे विरोधाभासों को देख सके।
इस अर्थ में ‘चक्रव्यूह’ का अभिमन्यु शहीद की पारम्परिक छवि से आगे जाता है। वह न तो केवल वीरगाथा का नायक है, न केवल त्रासदी का पात्र। वह इतिहास के भीतर उपस्थित विवेक की आवाज़ है। उसकी देह घायल है, लेकिन उसकी दृष्टि अन्ततः व्यूह को पहचान लेती है। उसकी मृत्यु व्यक्तिगत है, लेकिन उसका प्रश्न सामूहिक है। उसकी पराजय शारीरिक है, लेकिन उसका नैतिक प्रश्न उन लोगों की तथाकथित विजय से अधिक स्थायी है जिन्होंने ‘पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना’। इसी द्वंद्व में कुँवर नारायण की कविता अपनी काव्यात्मक और नैतिक शक्ति प्राप्त करती है। ‘चक्रव्यूह’ अन्ततः युद्ध की कथा से अधिक उस मनुष्य की कथा है जो हिंसा से निर्मित संसार में जन्म लेता है, उसके पूर्वनिर्धारित घेरे में प्रवेश करता है, उससे संघर्ष करता है और मृत्यु की सीमा पर पहुँचकर यह पहचान लेता है कि मनुष्य की वास्तविक मुक्ति किसी पक्ष की विजय में नहीं, सत्य, विवेक और दूसरे के दुःख को पहचानने की क्षमता में निहित है।
‘चक्रव्यूह’ को मिशेल फ़ूको की सत्ता, अनुशासन और ज्ञान की राजनीति की दृष्टि से पढ़ने पर कविता का ‘व्यूह’ केवल महाभारत की युद्ध-रचना या किसी सैन्य रणनीति का रूपक नहीं रह जाता। वह एक ऐसी सामाजिक-राजनीतिक संरचना में बदल जाता है जो मनुष्य की गति को निर्धारित करती है, उसकी पहचान निर्मित करती है, उसके आचरण को नियंत्रित करती है और यहाँ तक कि यह भी तय करती है कि किस कर्म को वीरता, किस मृत्यु को बलिदान, किस हिंसा को न्याय और किस प्रतिरोध को अपराध कहा जाएगा। इस दृष्टि से कविता का वास्तविक संघर्ष अभिमन्यु और उसके चारों ओर खड़े योद्धाओं के बीच जितना है, उतना ही उस ज्ञान-व्यवस्था के साथ भी है जो पहले से यह निर्धारित कर चुकी है कि कौन सही है, कौन गलत है और किसकी हत्या नैतिक रूप से स्वीकार्य मानी जाएगी।
फ़ूको के सत्ता-विमर्श की एक बुनियादी विशेषता यह है कि सत्ता को केवल किसी राजा, शासक, सेना या संस्था के हाथ में केन्द्रित शक्ति के रूप में नहीं समझा जा सकता। सत्ता विभिन्न सामाजिक सम्बन्धों, संस्थाओं, नियमों, भाषिक संरचनाओं और ज्ञान-व्यवस्थाओं के माध्यम से काम करती है। सत्ता केवल निषेध नहीं करती; वह वास्तविकता का निर्माण भी करती है। वह यह तय करने में भाग लेती है कि समाज में क्या ‘सत्य’ माना जाएगा, कौन-सा व्यवहार सामान्य समझा जाएगा और किन व्यक्तियों को विचलित या असामान्य माना जाएगा। इस अर्थ में फ़ूको के लिए सत्ता और ज्ञान अलग-अलग क्षेत्र नहीं हैं। सत्ता ज्ञान का निर्माण करती है और ज्ञान सत्ता के संचालन को सम्भव बनाता है। इसे ‘सत्ता-ज्ञान सम्बन्ध’ (Power-Knowledge) कहा जा सकता है।
‘चक्रव्यूह’ की काव्यात्मक संरचना इसी सत्ता-ज्ञान सम्बन्ध को समझने के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। व्यूह दिखाई तो एक सैनिक संरचना देता है, लेकिन उसके भीतर एक सम्पूर्ण ज्ञान-व्यवस्था सक्रिय है। उसमें प्रवेश करने वाले को यह पता होना चाहिए कि व्यूह कैसे बना है, उसकी परतें कैसे काम करती हैं, कौन-सा रास्ता कहाँ जाता है और किस बिन्दु पर कौन-सी शक्ति सक्रिय होगी। इसीलिए अभिमन्यु का संकट केवल यह नहीं है कि वह शत्रुओं से घिर गया है; उसका संकट यह भी है कि वह ऐसी संरचना में प्रवेश करता है जिसका पूरा ज्ञान उसके पास नहीं है। उसके पास प्रवेश का ज्ञान है, लेकिन निष्क्रमण का सम्पूर्ण ज्ञान नहीं। यह स्थिति फ़ूको के सत्ता-विमर्श में ज्ञान की असमानता के रूपक के रूप में पढ़ी जा सकती है।
कविता में ‘अपरिचित ज़िंदगी के व्यूह में फेंका हुआ उन्माद’ इस संदर्भ में विशेष अर्थ ग्रहण करता है। ‘अपरिचित’ शब्द केवल जीवन की अनिश्चितता का संकेत नहीं देता; वह उस ज्ञानगत स्थिति की ओर भी संकेत करता है जिसमें व्यक्ति ऐसी सामाजिक संरचनाओं में प्रवेश करता है जिनके नियम उसने बनाए नहीं हैं और जिनकी सम्पूर्ण कार्यप्रणाली से वह परिचित नहीं है। वह व्यवस्था में जन्म लेता है, उसके नियम सीखता है, उसकी भाषा ग्रहण करता है और फिर उसी व्यवस्था के भीतर अपने लिए स्थान खोजता है। फ़ूको के अनुसार आधुनिक व्यक्ति भी कुछ इसी प्रकार सत्ता-संरचनाओं के भीतर निर्मित होता है। वह सत्ता के बाहर खड़ा कोई पूर्णतः स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है; उसकी पहचान भी सामाजिक संस्थाओं और विमर्शों के माध्यम से निर्मित होती है।
इस दृष्टि से कविता का ‘योद्धा’ भी स्वाभाविक या शाश्वत पहचान नहीं है। ‘योद्धा’ होना एक सामाजिक रूप से निर्मित भूमिका है। समाज उसे वीरता की भाषा देता है, युद्ध के उद्देश्य बताता है, शत्रु की पहचान कराता है और बलिदान के अर्थ की व्याख्या करता है। इसीलिए आरम्भिक पंक्तियाँ—‘युद्ध की प्रतिध्वनि जगाकर / जो हज़ारों बार दुहराई गई, / रक्त की विरुदावली कुछ और रँगकर / लोरियों के संग जो गाई गई’—फ़ूको की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध हो जाती हैं। यहाँ सत्ता तलवार से पहले भाषा में उपस्थित है।
‘रक्त की विरुदावली’ केवल युद्ध में मारे गए लोगों की स्मृति नहीं है। वह रक्त को अर्थ देने वाली भाषा है। रक्त स्वयं केवल जैविक पदार्थ है, लेकिन जब उसे ‘वीरता’, ‘बलिदान’, ‘धर्म’, ‘राष्ट्र’, ‘गौरव’ या ‘यश’ जैसे शब्दों से जोड़ा जाता है, तो उसकी सामाजिक व्याख्या बदल जाती है। मृत्यु तब केवल मृत्यु नहीं रहती; उसे एक वैध, गौरवपूर्ण और कभी-कभी पवित्र घटना में रूपान्तरित कर दिया जाता है। फ़ूको की दृष्टि से यही वह बिन्दु है जहाँ ज्ञान और सत्ता एक-दूसरे से जुड़ते हैं। सत्ता किसी व्यक्ति को केवल मारती नहीं; वह उसकी मृत्यु का अर्थ भी निर्धारित करती है।
यहीं ‘लोरियों’ का उल्लेख विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाता है। यदि युद्ध की भाषा केवल रणभूमि में रहती, तो उसकी शक्ति सीमित रहती। लेकिन जब वही भाषा लोरी में प्रवेश करती है, तब वह अगली पीढ़ी के मानसिक संसार का हिस्सा बन जाती है। बच्चा युद्ध में भाग लेने से पहले युद्ध की कथा सुनता है। वह हिंसा का प्रत्यक्ष अनुभव किए बिना भी उसके गौरवपूर्ण अर्थों से परिचित कराया जाता है। इस प्रकार सत्ता का अनुशासन पीढ़ीगत हो जाता है। युद्ध की संस्कृति केवल सैनिकों को नहीं बनाती; वह ऐसी सामाजिक चेतना भी बनाती है जिसमें सैनिक का बलिदान सम्माननीय और शत्रु की मृत्यु स्वाभाविक प्रतीत होने लगती है।
यहाँ ‘विरुदावली’ और ‘लोरी’ के बीच का सम्बन्ध सत्ता के उस सूक्ष्म स्वरूप को उद्घाटित करता है जिसे फ़ूको दमनात्मक सत्ता से अलग करके समझते हैं। सत्ता हमेशा ‘तुम यह मत करो’ नहीं कहती। वह यह भी कहती है कि ‘यह अच्छा है’, ‘यह गौरवपूर्ण है’, ‘यह धर्म है’, ‘यह वीरता है’। इस प्रकार सत्ता इच्छा, मूल्य और नैतिकता के निर्माण में भाग लेती है। व्यक्ति केवल भय के कारण व्यवस्था का पालन नहीं करता; कई बार वह व्यवस्था के मूल्यों को स्वयं अपना लेता है।
‘उसी इतिहास की स्मृति, / उसी संसार में लौटे हुए, / ओ योद्धा, तुम कौन हो?’ इस प्रश्न को इसलिए पहचान के प्रश्न के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। यह सत्ता द्वारा निर्मित पहचान पर प्रश्न है। योद्धा स्वयं को किस भाषा में पहचानता है? क्या वह स्वयं को ‘वीर’ कहता है क्योंकि उसने ऐसा होना चुना है, या क्योंकि उसकी संस्कृति ने उसे यही बताया है कि वीरता का अर्थ क्या है? क्या वह शत्रु को इसलिए शत्रु मानता है क्योंकि वह स्वयं उस व्यक्ति को जानता है, या क्योंकि उसके समय की राजनीतिक और सैन्य भाषा ने उसे शत्रु घोषित कर दिया है?
फ़ूको के यहाँ ‘विमर्श’ (Discourse) केवल भाषा या भाषण नहीं है। विमर्श वह व्यवस्थित ज्ञान-व्यवस्था है जो किसी विषय के बारे में यह निर्धारित करती है कि क्या कहा जा सकता है, किस प्रकार कहा जा सकता है और क्या सत्य माना जाएगा। ‘चक्रव्यूह’ में युद्ध का विमर्श इसी तरह काम करता है। ‘वीर’, ‘कायर’, ‘बलिदान’, ‘पक्ष’, ‘सत्य’, ‘युद्ध’, ‘महासंग्राम’—ये शब्द केवल वर्णन नहीं करते; वे मूल्य निर्धारित करते हैं।
इस संदर्भ में ‘व्यूह-रक्षक वीर-कायर हैं’ कविता की निर्णायक पंक्तियों में से एक बन जाती है। सामान्य युद्ध-विमर्श में व्यूह-रक्षक ‘वीर’ हैं, क्योंकि वे युद्ध कर रहे हैं, व्यवस्था की रक्षा कर रहे हैं और अपने पक्ष के लिए लड़ रहे हैं। लेकिन कवि उसी शब्दावली को भीतर से उलट देता है। ‘वीर’ और ‘कायर’ को एक साथ रखकर वह उस भाषिक व्यवस्था को अस्थिर करता है जो वीरता को केवल युद्ध-कौशल और पक्ष-निष्ठा से परिभाषित करती है।
यहाँ कविता सत्ता की भाषा के भीतर प्रवेश करके उसकी शब्दावली को ही उसके विरुद्ध इस्तेमाल करती है। यही इसकी आलोचनात्मक शक्ति है। वह बाहर से यह नहीं कहती कि ‘ये लोग कायर हैं’; वह ‘वीर’ की स्थापित संकल्पना को ऐसी स्थिति में रखती है जहाँ उसका अन्तर्विरोध स्वयं दिखाई देने लगता है। यदि किसी व्यक्ति की वीरता छल, घेराबंदी और असमान शक्ति पर निर्भर है, तो क्या उसे नैतिक अर्थ में वीर कहा जा सकता है? कविता इसका सीधा दार्शनिक उत्तर देने के बजाय ‘वीर-कायर’ जैसे विरोधाभासी पद के माध्यम से पाठक को निर्णय की उस प्रक्रिया पर विचार करने के लिए बाध्य करती है।
इसी क्रम में ‘जिन्होंने पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना’ सत्ता-विमर्श का सबसे सघन सूत्र बन जाता है। सत्ता को टिके रहने के लिए केवल बल की आवश्यकता नहीं होती; उसे सत्य के किसी रूप की आवश्यकता होती है। जब कोई पक्ष स्वयं को सत्य का पर्याय घोषित कर देता है, तब विरोधी केवल असहमत व्यक्ति नहीं रहता; वह असत्य, अधर्मी, देशद्रोही, शत्रु या विनाशकारी के रूप में निर्मित किया जा सकता है। इस प्रकार ‘पक्ष’ एक राजनीतिक पहचान से बढ़कर सत्य का मानदण्ड बन जाता है।
फ़ूको के ‘सत्य-निर्माण की व्यवस्था’ (Regime of Truth) की अवधारणा यहाँ उपयोगी है। किसी समाज में कुछ कथन इसलिए सत्य नहीं माने जाते कि वे स्वतः या सार्वभौमिक रूप से सत्य हैं; संस्थाएँ, विशेषज्ञता, परम्पराएँ, सत्ता-संबंध और सामाजिक स्वीकृति मिलकर एक ऐसा तंत्र बनाते हैं जिसमें कुछ कथन ‘सत्य’ की प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। ‘चक्रव्यूह’ का युद्ध-विमर्श इसी प्रकार का सत्य-शासन निर्मित करता है। कौन न्याय के लिए लड़ रहा है और कौन अन्याय के लिए—यह प्रश्न युद्ध में अक्सर पहले से तय कर दिया जाता है। कविता इस पूर्वनिर्धारित सत्य पर संदेह करती है।
यहाँ ‘पक्ष’ और ‘सत्य’ का अन्तर विशेष महत्त्व रखता है। पक्ष सत्य का दावा कर सकता है, लेकिन कविता पक्ष को सत्य से अलग करती है। यही विभाजन अभिमन्यु के नैतिक संकट को समझने की कुंजी है। वह किसी पक्ष का योद्धा है, लेकिन उसकी पीड़ा किसी एक पक्ष की संपत्ति नहीं रह जाती। वह युद्ध के भीतर उपस्थित उस जीवन का प्रतिनिधि बन जाता है जिसकी हत्या को कोई पक्षीय तर्क पूरी तरह न्यायसंगत नहीं बना सकता।
फ़ूको की ‘अनुशासनात्मक सत्ता’ (Disciplinary Power) की अवधारणा से कविता का व्यूह और भी गहराई से समझा जा सकता है। अनुशासनात्मक सत्ता शरीर को नियंत्रित करती है। वह शरीर को प्रशिक्षित करती है, उसकी गति निर्धारित करती है, उसे व्यवस्थित करती है और उसे किसी निश्चित कार्य के योग्य बनाती है। सेना इसका स्पष्ट उदाहरण है। सैनिक शरीर केवल जैविक शरीर नहीं रहता; उसे आदेश, पंक्ति, गति, अनुशासन और आज्ञापालन के माध्यम से एक ‘अनुशासित शरीर’ में बदला जाता है।
‘बाँधी पंक्तियों को तोड़ / क्रमशः लक्ष्य तक बढ़ता हुआ’ में ‘पंक्तियाँ’ इस दृष्टि से केवल सैनिक पंक्तियाँ नहीं हैं। वे अनुशासन की दृश्य आकृति हैं। पंक्ति में खड़ा शरीर अपनी व्यक्तिगत गति खो देता है और सामूहिक व्यवस्था का अंग बन जाता है। अभिमन्यु जब ‘पंक्तियों को तोड़ता’ है, तो उसका संघर्ष इस अनुशासित व्यवस्था से भी है। उसका प्रतिरोध इसलिए केवल शत्रु के शरीरों के विरुद्ध नहीं, बल्कि उन शरीरों को नियंत्रित करने वाली संरचना के विरुद्ध है।
यहाँ कविता में शरीर का बार-बार सामने आना भी अर्थपूर्ण है—‘मेरे हाथ में टूटा हुआ पहिया’, ‘बदन पर एक फूटा कवच’, ‘सारी देह क्षत-विक्षत’, ‘वह शीश जिसका रक्त सदियों तक बहा’। फ़ूको के यहाँ सत्ता का एक प्रमुख क्षेत्र शरीर है। सत्ता शरीर को नियंत्रित करती है, लेकिन शरीर ही प्रतिरोध का स्थल भी बन सकता है। अभिमन्यु की देह इसी द्वंद्व को मूर्त रूप देती है। उसे घेरा गया, घायल किया गया और अन्ततः मारा गया; फिर भी वही देह सत्ता की हिंसा का प्रमाण बन जाती है।
अर्थात् देह पर सत्ता की अन्तिम मुहर नहीं लगती। घायल शरीर स्वयं एक साक्ष्य बन जाता है। कवि उस शरीर को छिपाता नहीं; उसे दृश्य बनाता है। ‘फूटा कवच’, ‘क्षत-विक्षत’, ‘रक्त’, ‘शीश’—ये सभी संकेत पाठक को युद्ध की अमूर्त भाषा से निकालकर भौतिक पीड़ा की वास्तविकता में ले आते हैं। युद्ध यदि केवल ‘धर्मयुद्ध’, ‘महासंग्राम’ या ‘बलिदान’ की भाषा में वर्णित हो, तो शरीर का दुःख गायब हो सकता है। कविता उस गायब किए गए शरीर को वापस लाती है।
यहीं फ़ूको का ‘दृश्यता’ (Visibility) सम्बन्धी विचार भी उपयोगी है। आधुनिक अनुशासन में जिसे देखा जा सकता है, उसे नियंत्रित करना आसान होता है। लेकिन ‘चक्रव्यूह’ में एक उलटा दृश्य बनता है। सत्ता अभिमन्यु को घेरकर उसे देखने योग्य बनाती है, लेकिन कवि उसी दृश्यता को सत्ता के विरुद्ध साक्ष्य में बदल देता है। अभिमन्यु का घायल शरीर अब केवल युद्ध की वस्तु नहीं है; वह उस व्यवस्था को देखने का माध्यम है जिसने उसे घायल किया।
कविता में ‘आकाश’ का ‘गिद्ध’ बन जाना भी सत्ता की सर्वव्यापक दृष्टि की एक प्रतीकात्मक छवि के रूप में पढ़ा जा सकता है। आकाश सामान्यतः खुलापन और विस्तार देता है, लेकिन यहाँ वह मृत शरीर के ऊपर मंडराता हुआ गिद्ध है। इस बिम्ब में एक ऐसी दुनिया दिखाई देती है जिसमें मनुष्य की मृत्यु भी किसी बड़ी संरचना के लिए केवल एक दृश्य या संसाधन बन सकती है। युद्ध की व्यवस्था मनुष्य के शरीर को उसकी व्यक्तिगतता से अलग करके सामूहिक युद्ध-तर्क का हिस्सा बना देती है।
फ़ूको की दृष्टि से ‘इतिहास’ भी निष्पक्ष और पारदर्शी भंडार नहीं है। इतिहास लिखने, वर्गीकृत करने और व्यवस्थित करने की प्रक्रियाएँ स्वयं सत्ता-संबंधों से जुड़ी होती हैं। ‘हज़ारों युद्ध, उपदेशों, उपाख्यानों, कथाओं में / छिपा वह पृष्ठ मेरा है’ को इसीलिए ‘प्रतिइतिहास’ (Counter-History) की सम्भावना के रूप में पढ़ा जा सकता है। आधिकारिक इतिहास किसी युद्ध को विजय, धर्म या वीरता के रूप में याद रख सकता है; कविता उसी इतिहास में छिपे हुए पीड़ित के पृष्ठ को सामने लाती है।
यहाँ कविता का कार्य इतिहास को नकारना नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी हुई आवाज़ों को सुनना है। अभिमन्यु कहता है—‘वह शीश जिसका रक्त सदियों तक बहा, / वह दर्द जिसको बेगुनाहों ने सहा।’ यह ‘शीश’ किसी एक व्यक्ति का सिर होते हुए भी इतिहास में दबे हुए असंख्य सिरों का प्रतीक बन जाता है। इतिहास की आधिकारिक भाषा में वे ‘हानि’, ‘बलिदान’ या ‘युद्ध-क्षति’ हो सकते हैं; कविता उन्हें पीड़ा और मनुष्य के रूप में पुनः स्थापित करती है।
इस बिन्दु पर फ़ूको के ‘विषम वंशावली’ (Genealogy) की अवधारणा को भी जोड़ा जा सकता है। वंशावली किसी एक महान, निरन्तर और गौरवपूर्ण इतिहास की खोज नहीं करती; वह सत्ता, संघर्ष, टूटन और दबे हुए अनुभवों की छोटी-छोटी रेखाओं को सामने लाती है। ‘चक्रव्यूह’ का छिपा हुआ पृष्ठ इसी तरह का वंशावलीगत क्षण है। कवि महाभारत की विराट कथा के भीतर से उस एक अनुभव को चुनता है जो आधिकारिक वीरगाथा में दब सकता था—एक युवा योद्धा का घिर जाना, छल से लड़ना और मारा जाना।
इस प्रकार मिथक स्वयं एक प्रकार का ‘संग्रहित ज्ञान’ बन जाता है। लेकिन कुँवर नारायण मिथक को ज्यों का त्यों स्वीकार नहीं करते। वे उसके भीतर जाकर उसकी शक्ति-संरचना को पुनः पढ़ते हैं। महाभारत में अभिमन्यु की कथा पहले से उपलब्ध है; कविता उसका अर्थ बदलती है। अब प्रश्न यह नहीं है कि अभिमन्यु कितने वीर थे, बल्कि यह है कि वह जिस व्यवस्था में घिरा, वह नैतिक रूप से कैसी व्यवस्था थी। इस परिवर्तन से मिथक की सत्ता-आलोचनात्मक क्षमता खुलती है।
‘आहूत हर युद्धाग्नि में / वह जीव हूँ निष्पाप / जिसको पूज कर मारा गया’ को फ़ूको के दृष्टिकोण से पढ़ने पर ‘पूजा’ और ‘हत्या’ का सम्बन्ध भी गहरा हो जाता है। सत्ता केवल दमन नहीं करती; वह कभी-कभी मृत व्यक्ति को प्रतीक में बदलकर उसकी मृत्यु को अपने पक्ष में भी इस्तेमाल कर सकती है। शहीद की पूजा और युद्ध की पुनरावृत्ति के बीच यही विडम्बनापूर्ण सम्बन्ध है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु को इतना पवित्र बना दिया जाए कि उसकी मृत्यु के कारणों पर प्रश्न करना अनुचित लगने लगे, तो स्मृति स्वयं सत्ता की सहयोगी बन सकती है।
इसलिए कविता केवल यह नहीं कहती कि अभिमन्यु मारा गया; वह पूछती है कि उसे किस अर्थ में याद किया गया। स्मृति का राजनीतिक प्रश्न यहाँ सामने आता है। क्या हम अभिमन्यु को इसलिए याद करते हैं कि वह मर गया, या इसलिए कि उसकी मृत्यु हमें उस व्यवस्था पर प्रश्न करने के लिए बाध्य करती है जिसने उसे मारा? दोनों स्मृतियों में अन्तर है। पहली स्मृति बलिदान को गौरव में बदल सकती है; दूसरी स्मृति बलिदान के पीछे की हिंसक संरचना को उजागर करती है।
फ़ूको के विमर्श में सत्ता का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है—प्रतिरोध। जहाँ सत्ता है, वहाँ प्रतिरोध की सम्भावनाएँ भी होती हैं। अभिमन्यु का ‘पंक्तियों को तोड़’ आगे बढ़ना इसी प्रतिरोध को मूर्त रूप देता है। उसका प्रतिरोध सफल सैन्य रणनीति के अर्थ में नहीं है। वह अन्ततः जीवित नहीं बचता। फिर भी उसकी गति व्यवस्था के लिए एक व्यवधान बनती है। वह व्यूह के भीतर प्रवेश करके उसके भीतर की संरचना को उजागर करता है। उसकी मृत्यु के बाद भी उसका अनुभव उस व्यवस्था की आलोचना सम्भव बनाता है।
इस अर्थ में ‘टूटा हुआ पहिया’ प्रतिरोध का महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध के लिए हमेशा पूर्ण संसाधन उपलब्ध नहीं होते। कभी-कभी प्रतिरोध उसी वस्तु को हथियार में बदल देता है जिसे व्यवस्था ने अनुपयोगी बना दिया है। टूटा हुआ पहिया इसलिए असहायता का प्रतीक होने के साथ-साथ प्रतिरोध की रचनात्मकता का भी प्रतीक है। सत्ता के पास व्यवस्थित व्यूह है; अभिमन्यु के पास टूटा हुआ पहिया। फिर भी वही टूटा हुआ पहिया सत्ता की नैतिक पूर्णता के भ्रम को तोड़ देता है।
कविता के अन्त में ‘मृत्यु के निष्पक्ष, समयातीत घेरे’ का उल्लेख फ़ूको के सत्ता-विमर्श से एक रोचक तनाव पैदा करता है। सत्ता ऐतिहासिक होती है; वह विशिष्ट संस्थाओं, व्यवस्थाओं और विमर्शों में काम करती है। मृत्यु उससे व्यापक और अन्ततः अपरिहार्य मानवीय सीमा है। अभिमन्यु इसी सीमा पर पहुँचकर ‘अस्तित्व का हर पक्ष’ पहचानता है। यहाँ सत्ता का व्यूह और मृत्यु का घेरा दो अलग प्रकार की सीमाएँ बन जाते हैं। पहला मनुष्य द्वारा निर्मित है; दूसरा अस्तित्व की सीमा है। कविता का नैतिक विवेक इन दोनों को एक-दूसरे से अलग पहचानने की क्षमता में निहित है।
इस प्रकार फ़ूको की दृष्टि से ‘चक्रव्यूह’ का सबसे गहरा प्रश्न शायद यह नहीं है कि अभिमन्यु को किसने मारा। उससे भी पहले का प्रश्न है कि ऐसी कौन-सी सत्ता-व्यवस्था थी जिसने कुछ लोगों को मारने की अनुमति दी, कुछ लोगों को मारने को वीरता कहा, कुछ लोगों को मरने को बलिदान बनाया और पूरे समाज को इस भाषा को स्वीकार करने के लिए तैयार किया। कविता का व्यूह इसलिए तलवारों से निर्मित होने से पहले शब्दों से निर्मित होता है।
यही कारण है कि ‘पक्ष’, ‘सत्य’, ‘वीर’, ‘कायर’, ‘बलिदान’, ‘युद्ध’, ‘इतिहास’ और ‘स्मृति’ जैसे शब्द कविता में केवल अर्थ वहन नहीं करते; वे अर्थ-निर्माण की सत्ता को उजागर करते हैं। ‘चक्रव्यूह’ इन शब्दों को उनके सामान्य अर्थों में स्वीकार करने के बजाय उनके भीतर छिपी सत्ता-संरचनाओं को सामने लाती है। वह दिखाती है कि सत्ता का सबसे स्थायी रूप वह हो सकता है जो स्वयं को सत्ता के रूप में प्रस्तुत ही न करे, बल्कि परम्परा, धर्म, वीरता, स्मृति, कर्तव्य और सत्य के रूप में दिखाई दे।
इस दृष्टि से अभिमन्यु की वास्तविक चुनौती केवल व्यूह से बाहर निकलने की नहीं है। उसकी चुनौती उस ज्ञान-व्यवस्था को भेदने की है जिसने व्यूह को वैध बनाया है। वह युद्ध की उस भाषा को चुनौती देता है जिसमें रक्त ‘विरुदावली’ बन जाता है, मृत्यु ‘बलिदान’ और पक्ष ‘सत्य’ बन जाता है। इसीलिए कविता में अभिमन्यु का संघर्ष एक ज्ञानात्मक और नैतिक संघर्ष भी है। वह यह उजागर करता है कि सत्ता मनुष्य को केवल घेरती नहीं; वह उसे यह विश्वास भी दिलाती है कि घेरा न्यायपूर्ण है।
यहीं ‘चक्रव्यूह’ की आधुनिकता स्थित है। महाभारत का व्यूह ऐतिहासिक या मिथकीय युद्ध की एक विशिष्ट संरचना है, लेकिन कविता उसे मनुष्य की उन सभी सामाजिक स्थितियों का रूपक बना देती है जहाँ संस्थागत शक्ति, स्थापित ज्ञान, सामूहिक विश्वास और राजनीतिक भाषा मिलकर व्यक्ति की सम्भावनाओं को सीमित करते हैं। फ़ूको के आलोक में अभिमन्यु उस व्यक्ति का रूपक बन जाता है जो सत्ता के बाहर खड़ा कोई निर्दोष और पूर्णतः स्वतंत्र मनुष्य नहीं, बल्कि सत्ता द्वारा निर्मित संसार का ही उत्पाद है—फिर भी उसी संसार की दरारों में प्रतिरोध की सम्भावना खोजता है।
इसलिए ‘चक्रव्यूह’ का व्यूह जितना बाहर है, उतना ही भीतर भी है। वह रणभूमि में सैनिकों की पंक्तियों में है, लेकिन भाषा में भी है; इतिहास में है, लेकिन स्मृति में भी है; संस्थाओं में है, लेकिन मनुष्य की चेतना में भी है। फ़ूको की दृष्टि कविता को यह देखने की क्षमता देती है कि मनुष्य को नियंत्रित करने वाली सबसे प्रभावी शक्ति वह नहीं जो केवल उसके शरीर को बाँधती है, बल्कि वह है जो उसकी दृष्टि, उसकी भाषा और उसके ‘सत्य’ को निर्मित करती है।
और इसी बिन्दु पर कुँवर नारायण की कविता का प्रतिरोध सबसे सूक्ष्म रूप ग्रहण करता है। अभिमन्यु व्यूह को केवल अपनी देह से नहीं भेदता; वह उस विमर्श को भी भेदता है जिसमें व्यूह स्वयं को न्यायपूर्ण सिद्ध करता है। ‘जिन्होंने पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना’ इसलिए केवल युद्धरत योद्धाओं पर टिप्पणी नहीं है; यह उस समूची सत्ता-व्यवस्था पर प्रश्न है जिसमें किसी सामूहिक पक्ष की पहचान सत्य, नैतिकता और मनुष्य के जीवन से ऊपर स्थापित कर दी जाती है। कविता इस व्यवस्था के सामने अभिमन्यु की घायल देह, उसकी मृत्यु और उसकी स्मृति को एक वैकल्पिक ज्ञान के रूप में उपस्थित करती है। यहाँ पराजित शरीर विजेता इतिहास से अधिक बोलने लगता है। यही ‘चक्रव्यूह’ को फ़ूको की सत्ता, अनुशासन और ज्ञान की राजनीति के आलोक में पढ़ने की सबसे उत्पादक सम्भावना है।
कुँवर नारायण की ‘चक्रव्यूह’ को लुई अल्थूसर (Louis Althusser) की विचारधारा, विचारधारात्मक राज्य-तंत्र और विषय-निर्माण (Ideological State Apparatuses & subject formation) की अवधारणाओं के आलोक में पढ़ने पर कविता का केन्द्र अभिमन्यु की व्यक्तिगत वीरता से हटकर उस सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया पर आ जाता है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति को ‘योद्धा’ बनाया जाता है। इस दृष्टि से प्रश्न यह नहीं रह जाता कि अभिमन्यु ने युद्ध में कितना साहस दिखाया, बल्कि यह बन जाता है कि वह युद्धभूमि तक पहुँचा कैसे, उसने युद्ध को अपना कर्तव्य क्यों माना, ‘पक्ष’ से उसकी पहचान कैसे बनी और ऐसी कौन-सी सांस्कृतिक शक्तियाँ थीं जिन्होंने युद्ध, रक्त, बलिदान और मृत्यु को उसके लिए अर्थपूर्ण बना दिया। अल्थूसर की दृष्टि से कविता की वास्तविक त्रासदी केवल अभिमन्यु की मृत्यु नहीं है; त्रासदी यह भी है कि जिस वैचारिक संसार ने उसे युद्ध के लिए तैयार किया, वही संसार उसकी मृत्यु को बाद में गौरव और बलिदान की भाषा में अर्थ प्रदान कर सकता है।
अल्थूसर के विचार में विचारधारा (Ideology) को केवल झूठे विचारों या भ्रमों का समूह मानना पर्याप्त नहीं है। विचारधारा मनुष्यों के अपने सामाजिक अस्तित्व से सम्बन्धित उस कल्पित सम्बन्ध को व्यवस्थित करती है जिसके भीतर वे स्वयं को और अपनी दुनिया को समझते हैं। व्यक्ति केवल बाहर से किसी सत्ता द्वारा नियंत्रित नहीं होता; वह स्वयं को एक ऐसे सामाजिक विषय के रूप में पहचानने लगता है जिसकी भूमिकाएँ, कर्तव्य, निष्ठाएँ और सीमाएँ पहले से निर्धारित सामाजिक संरचनाओं से जुड़ी होती हैं। इसी कारण अल्थूसर का ‘विषय-निर्माण’ (Subject Formation) ‘चक्रव्यूह’ को समझने के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।
कविता का ‘योद्धा’ इस दृष्टि से जन्मजात पहचान नहीं है। वह एक निर्मित पहचान है। अभिमन्यु के सामने युद्ध केवल एक बाहरी परिस्थिति नहीं है; युद्ध उसके सांस्कृतिक संसार का हिस्सा है। वह ऐसे इतिहास में जन्म लेता है जहाँ युद्ध की स्मृतियाँ पहले से उपलब्ध हैं, जहाँ वीरता के आख्यान मौजूद हैं और जहाँ रक्त को ‘विरुदावली’ में बदलने वाली सांस्कृतिक भाषा सक्रिय है। इसीलिए कविता की आरम्भिक पंक्तियाँ अल्थूसर की विचारधारा की अवधारणा को समझने के लिए विशेष महत्त्व रखती हैं—“‘युद्ध की प्रतिध्वनि जगाकर/जो हज़ारों बार दुहराई गई,/रक्त की विरुदावली कुछ और रँगकर/लोरियों के संग जो गाई गई”—यहाँ युद्ध का संस्कार किसी एक क्षण में उत्पन्न नहीं होता। वह ‘हज़ारों बार दुहराया’ जाता है। यह पुनरावृत्ति ही विचारधारा की शक्ति को समझने की कुंजी है। कोई विचार केवल इसलिए सामाजिक रूप से प्रभावी नहीं होता कि उसे एक बार कहा गया; वह तब प्रभावी होता है जब उसे परिवार, शिक्षा, परम्परा, धर्म, साहित्य, स्मृति और दैनिक जीवन में बार-बार दोहराया जाता है। जब कोई मूल्य असंख्य बार दोहराया जाता है, तो वह विचारधारा के रूप में दिखाई देना भी बन्द कर सकता है। वह ‘स्वाभाविक’ लगने लगता है।
इसीलिए ‘लोरियों’ का बिम्ब यहाँ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। लोरी सामान्यतः बच्चे के जीवन में सुरक्षा, स्नेह और आत्मीयता से जुड़ी होती है। लेकिन जब उसमें ‘रक्त की विरुदावली’ गाई जाती है, तब युद्ध की विचारधारा सबसे निजी और कोमल सांस्कृतिक क्षेत्र में प्रवेश कर जाती है। युद्ध अब केवल रणभूमि का विषय नहीं है; वह बच्चे के सांस्कृतिक संस्कार का हिस्सा बन जाता है। अल्थूसर के अनुसार विचारधारा इसी प्रकार काम करती है—वह केवल सार्वजनिक राजनीतिक भाषणों में नहीं रहती; वह रोजमर्रा के जीवन, परिवार, शिक्षा और सांस्कृतिक व्यवहारों में प्रवेश करती है।
यहीं ‘लोरी’ और ‘विरुदावली’ का विरोधाभास कविता की गहरी राजनीतिक विडम्बना बन जाता है। लोरी जीवन को सुलाती है, जबकि विरुदावली मृत्यु को गौरव देती है। दोनों का मिलन इस बात का संकेत है कि हिंसा की संस्कृति स्वयं को स्नेह और परम्परा की भाषा में भी पुनरुत्पादित कर सकती है। बच्चा जब वीरता की कहानी सुनता है, तो वह केवल अतीत नहीं सीख रहा होता; वह भविष्य के सामाजिक आचरण के लिए एक सांस्कृतिक ढाँचा भी ग्रहण कर रहा होता है।
अल्थूसर के ‘विचारधारात्मक राज्य-तंत्र’ की अवधारणा यहाँ विशेष रूप से उपयोगी है। अल्थूसर ने राज्य के उन संस्थानों और सामाजिक संरचनाओं की ओर ध्यान दिलाया जो मुख्यतः विचारधारा के माध्यम से व्यक्तियों को सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप ढालते हैं। परिवार, शिक्षा, धार्मिक संस्थाएँ, सांस्कृतिक संस्थाएँ, संचार माध्यम और अन्य सामाजिक संरचनाएँ व्यक्ति को यह सिखाती हैं कि समाज में उसका स्थान क्या है और उससे किस प्रकार के आचरण की अपेक्षा की जाती है।
‘चक्रव्यूह’ में इन सभी संस्थानों के नाम प्रत्यक्ष रूप से नहीं आते, लेकिन ‘लोरियाँ’, ‘इतिहास’, ‘उपदेश’, ‘उपाख्यान’ और ‘कथाएँ’ ऐसे ही सांस्कृतिक माध्यमों का संकेत देती हैं। कविता में विचारधारा किसी एक शासक की घोषणा के रूप में नहीं आती; वह कथा और स्मृति के माध्यम से आती है। यही उसे अधिक प्रभावशाली बनाती है।
इस संदर्भ में ‘हज़ारों युद्ध, उपदेशों, उपाख्यानों, कथाओं में’ विशेष ध्यान देने योग्य पंक्ति है। ‘युद्ध’ प्रत्यक्ष हिंसा का क्षेत्र है, लेकिन ‘उपदेश’, ‘उपाख्यान’ और ‘कथाएँ’ उसके सांस्कृतिक पुनरुत्पादन के क्षेत्र हैं। युद्ध समाप्त हो सकता है, पर उसकी विचारधारा कथाओं में जीवित रह सकती है। एक पीढ़ी युद्ध करती है; अगली पीढ़ी उस युद्ध की कथा सुनती है; तीसरी पीढ़ी उसी कथा के भीतर अपने अतीत की पहचान खोजती है। इस प्रकार हिंसा की स्मृति स्वयं सामाजिक पुनरुत्पादन का साधन बन सकती है।
यहाँ ‘विचारधारात्मक पुनरुत्पादन’ की अवधारणा उपयोगी होगी। किसी सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए केवल भौतिक उत्पादन पर्याप्त नहीं होता; उसके मूल्यों, भूमिकाओं और सम्बन्धों का भी पुनरुत्पादन आवश्यक होता है। यदि समाज को योद्धाओं की आवश्यकता है, तो उसे केवल हथियार नहीं चाहिए; उसे ऐसे मनुष्य भी चाहिए जो युद्ध को वैध, गौरवपूर्ण या आवश्यक मानें। कविता की ‘रक्त की विरुदावली’ इसी वैचारिक पुनरुत्पादन का काव्यात्मक संकेत है।
इस दृष्टि से अभिमन्यु को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पढ़ा जा सकता है जो विचारधारा से बाहर नहीं, बल्कि उसके भीतर निर्मित हुआ है। वह उस व्यवस्था का विरोधी प्रतीत होता है, लेकिन उसी व्यवस्था द्वारा निर्मित भाषा और मूल्यों को लेकर युद्धभूमि में प्रवेश करता है। यह बात कविता की जटिलता को बढ़ाती है, क्योंकि अभिमन्यु को केवल ‘सत्ता के विरुद्ध स्वतंत्र व्यक्ति’ मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। वह सत्ता और विचारधारा की संरचना से निर्मित भी है और अन्ततः उसी संरचना के भीतर उसका प्रतिरोध करने वाला भी।
अल्थूसर की दृष्टि में व्यक्ति ‘विषय’ (Subject) तभी बनता है जब वह किसी सामाजिक पुकार को पहचानता है और स्वयं को उस पुकार से सम्बद्ध करता है। अल्थूसर इस प्रक्रिया को ‘आह्वान’ या ‘पुकार’ (Interpellation) कहते हैं। सरल शब्दों में, समाज व्यक्ति से कहता है—‘तुम कौन हो?’ और व्यक्ति उत्तर देता है—‘मैं वही हूँ।’ इस पहचान के माध्यम से व्यक्ति स्वयं को सामाजिक व्यवस्था में स्थापित करता है।
‘ओ योद्धा, तुम कौन हो?’ कविता का प्रश्न इसलिए एक गहरे अर्थ में विचारधारात्मक प्रश्न भी है। यह केवल अभिमन्यु की पहचान नहीं पूछता; यह पूछता है कि उसे ‘योद्धा’ किसने बनाया। जब व्यक्ति स्वयं को योद्धा के रूप में पहचानता है, तब वह केवल एक नाम स्वीकार नहीं करता; वह उस नाम से जुड़े कर्तव्यों, अपेक्षाओं और नैतिकताओं को भी स्वीकार करता है। ‘योद्धा’ होना युद्ध में भाग लेना, अपने पक्ष के लिए लड़ना और आवश्यकता पड़ने पर मरना भी हो सकता है।
लेकिन कविता इसी पहचान को अन्ततः अस्थिर करती है। अभिमन्यु की आवाज़ कहती है—‘मैं नवागत वह अजित अभिमन्यु हूँ’। यह ‘मैं’ विचारधारा द्वारा निर्मित ‘योद्धा’ से अधिक जटिल है। उसमें व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत पहचान पुनः प्राप्त करता है। वह केवल किसी सेना का अंग नहीं है; वह स्वयं बोलने वाला व्यक्ति है। यही वह क्षण है जहाँ विषय-निर्माण और आत्म-पहचान के बीच तनाव पैदा होता है।
अभिमन्यु का ‘मैं’ इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह सामूहिक युद्ध-भाषा के बीच व्यक्तिगत अनुभव की आवाज़ है। सेना व्यक्ति को संख्या, भूमिका या सैनिक में बदल सकती है; कविता उसे फिर से ‘मैं’ बनाती है। ‘मेरे हाथ में टूटा हुआ पहिया’, ‘बदन पर एक फूटा कवच’, ‘सारी देह क्षत-विक्षत’—इन पंक्तियों में ‘मेरे’ और ‘देह’ की उपस्थिति उस व्यक्तिगत अनुभव को पुनः स्थापित करती है जिसे सामूहिक युद्ध-विमर्श मिटा देता है।
यहीं कविता विचारधारा की एक सीमा को भी उद्घाटित करती है। विचारधारा व्यक्ति को एक भूमिका देती है, लेकिन अनुभव उस भूमिका की सीमाओं को उजागर कर सकता है। अभिमन्यु युद्ध का योद्धा है, लेकिन उसकी घायल देह उसे युद्ध के वास्तविक अर्थ से परिचित कराती है। जिस युद्ध को वीरता की भाषा में प्रस्तुत किया गया था, वह उसके शरीर पर पीड़ा बनकर उपस्थित होता है। इस प्रकार देह विचारधारा के विरुद्ध साक्ष्य बन जाती है।
‘वह जीव हूँ निष्पाप / जिसको पूज कर मारा गया’ इस सन्दर्भ में अत्यन्त जटिल पंक्तियाँ हैं। यहाँ विचारधारा की दोहरी शक्ति दिखाई देती है। पहले वह व्यक्ति को ‘योद्धा’ बनाती है; फिर उसकी मृत्यु को ‘बलिदान’ में बदल देती है। व्यक्ति की वास्तविक मृत्यु को एक महिमामय अर्थ दे दिया जाता है। इस प्रकार विचारधारा मृत्यु के बाद भी सक्रिय रहती है।
‘पूज कर मारा गया’ में ‘पूजा’ और ‘हत्या’ का संयोजन इस प्रक्रिया को उजागर करता है। यदि समाज किसी मृत व्यक्ति को पूजनीय बना देता है, तो उसके वास्तविक अनुभव और पीड़ा के बारे में प्रश्न करना कठिन हो सकता है। उसकी मृत्यु को एक आदर्श कथा में बदल दिया जाता है। इस प्रकार स्मृति भी विचारधारा का माध्यम बन सकती है।
यहाँ अल्थूसर की विचारधारा को केवल राज्य की प्रत्यक्ष राजनीतिक मशीनरी तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा। कविता में विचारधारा सांस्कृतिक रूप में उपस्थित है। वह मिथक, इतिहास, लोरी, कथा और वीरगाथा में काम करती है। यही कारण है कि ‘चक्रव्यूह’ में विचारधारा की शक्ति दिखाई देने वाली सैन्य शक्ति से कहीं अधिक सूक्ष्म है। व्यूह बाहर से दिखाई देता है; विचारधारा भीतर से काम करती है।
‘रक्त की विरुदावली’ इस प्रक्रिया का उत्कृष्ट उदाहरण है। रक्त को ‘विरुदावली’ में बदलना वास्तव में अर्थ का रूपान्तरण है। हत्या को बलिदान, मृत्यु को गौरव और हिंसा को धर्म या कर्तव्य में बदल देना एक वैचारिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में भाषा निष्क्रिय माध्यम नहीं रहती; वह सामाजिक वास्तविकता को अर्थ देती है।
यहीं कविता का ‘विरुदावली’ शब्द भी आलोचनात्मक बन जाता है। यदि कवि केवल अभिमन्यु की वीरता का वर्णन करना चाहते, तो वे वीरगाथात्मक भाषा को स्वीकार कर सकते थे। लेकिन ‘रक्त की विरुदावली’ में एक सूक्ष्म व्यंग्य है। रक्त स्वयं बोलता नहीं; उसके लिए विरुदावली बनाई जाती है। अर्थात् कोई सामाजिक शक्ति रक्त को अर्थ देती है। यही विचारधारा का काम है—वह अनुभवों को ऐसे अर्थ प्रदान करती है जिनके माध्यम से सामाजिक व्यवस्था स्वयं को वैध ठहरा सके।
‘लोरियों के संग’ इस वैधता को निजी जीवन तक ले जाता है। विचारधारा का सबसे स्थायी रूप वह हो सकता है जो व्यक्ति को विचारधारा के रूप में दिखाई न दे। बच्चा यदि युद्ध की कथा को स्नेह और सुरक्षा के वातावरण में सुनता है, तो वह उसके नैतिक विरोधाभासों को प्रश्न करने की अवस्था में नहीं होता। युद्ध का सांस्कृतिक अर्थ उसके भावनात्मक संसार का हिस्सा बन जाता है। इसीलिए कविता में लोरी एक राजनीतिक रूपक बन जाती है।
इस दृष्टि से परिवार को एक विचारधारात्मक क्षेत्र के रूप में पढ़ना सम्भव है। परिवार केवल जैविक पुनरुत्पादन का स्थान नहीं; वह सामाजिक मूल्यों के पुनरुत्पादन का भी स्थल है। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को केवल भाषा और व्यवहार नहीं देती; वह यह भी देती है कि किसे सम्मान देना है, किसे शत्रु समझना है, किस कथा पर गर्व करना है और किस मृत्यु को गौरवपूर्ण मानना है। ‘चक्रव्यूह’ की लोरियाँ इसी सांस्कृतिक उत्तराधिकार का संकेत हैं।
शिक्षा की भूमिका भी यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से सामने आती है। ‘उपदेशों’ और ‘कथाओं’ का उल्लेख यह संकेत करता है कि ज्ञान का प्रसार निष्पक्ष प्रक्रिया नहीं है। समाज अपने अतीत को जिस प्रकार पढ़ाता है, उसी से भविष्य की राजनीतिक और नैतिक चेतना प्रभावित होती है। यदि इतिहास केवल विजेताओं की वीरगाथा बनकर पढ़ाया जाए, तो पराजित और पीड़ितों का अनुभव गौण हो सकता है। कविता ‘छिपा वह पृष्ठ मेरा है’ कहकर इसी शैक्षिक और सांस्कृतिक चयन को चुनौती देती है।
इस पंक्ति को अल्थूसर के विचारधारात्मक राज्य-तंत्र की दृष्टि से पढ़ना विशेष रूप से उपयोगी है। यदि किसी समाज में इतिहास-ज्ञान संस्थागत रूप से प्रसारित होता है, तो यह प्रश्न उठता है कि कौन-से पृष्ठ पढ़ाए जाते हैं और कौन-से छिपे रहते हैं। कविता उस ‘छिपे हुए पृष्ठ’ को सामने लाकर ज्ञान के चयन की राजनीति को उद्घाटित करती है।
यहाँ ‘मेरा’ शब्द भी महत्त्वपूर्ण है। अभिमन्यु कहता है कि विशाल महाभारत में ‘छिपा वह पृष्ठ मेरा है’। इतिहास की विराट कथा में उसका निजी अनुभव दब गया है। इस प्रकार व्यक्तिगत पीड़ा इतिहास के आधिकारिक आख्यान से अपना स्थान माँगती है। यह केवल स्मृति का प्रश्न नहीं; यह सामाजिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न है।
अल्थूसर की अवधारणा के भीतर विचारधारा और दमन के बीच भेद भी महत्त्वपूर्ण है। दमनकारी राज्य-तंत्र (Repressive State Apparatus) बल, कानून, सेना और पुलिस जैसी संस्थाओं के माध्यम से काम करता है, जबकि विचारधारात्मक राज्य-तंत्र मुख्यतः विचारधारा के माध्यम से। ‘चक्रव्यूह’ में दोनों स्तरों को अलग-अलग देखा जा सकता है। व्यूह की सैन्य शक्ति प्रत्यक्ष दमन का रूप है, जबकि ‘रक्त की विरुदावली’, ‘लोरियाँ’, ‘उपदेश’, ‘उपाख्यान’ और ‘कथाएँ’ उस दमन को अर्थ और वैधता प्रदान करने वाली विचारधारात्मक संरचनाओं के रूप में पढ़ी जा सकती हैं।
यानी तलवार व्यक्ति को मार सकती है, लेकिन कथा यह तय कर सकती है कि उसकी मृत्यु को समाज किस अर्थ में याद करेगा। यही दोनों तंत्रों का अन्तर है। दमन शरीर को नियंत्रित करता है; विचारधारा उस नियंत्रण के अर्थ को नियंत्रित करती है।
इस दृष्टि से ‘वह जीव हूँ निष्पाप / जिसको पूज कर मारा गया’ कविता का ऐसा बिन्दु है जहाँ दमन और विचारधारा एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। शरीर की हत्या दमन का कार्य है; उसकी पूजा विचारधारात्मक पुनर्व्याख्या है। इस द्वंद्व में व्यक्ति की वास्तविक पीड़ा और उसके सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व के बीच दूरी पैदा होती है।
कविता इस दूरी को समाप्त करने का प्रयास करती है। वह अभिमन्यु को फिर से बोलने देती है। वह उसे केवल इतिहास की मूर्ति नहीं बनाती; उसे बोलता हुआ ‘मैं’ बनाती है। यह काव्यात्मक रणनीति वैचारिक रूप से महत्त्वपूर्ण है। जिस व्यक्ति को इतिहास ने प्रतीक में बदल दिया था, कविता उसे फिर से अनुभवशील मनुष्य में बदल देती है।
‘मैं बलिदान इस संघर्ष में / कटु व्यंग्य हूँ उस तर्क पर / जो ज़िंदगी के नाम पर हारा गया’ में यही पुनर्स्थापन दिखाई देता है। अभिमन्यु अब केवल ‘बलिदान’ नहीं है; वह उस तर्क पर प्रश्न करने वाली चेतना है जिसके भीतर उसका बलिदान अर्थपूर्ण बनाया गया था। वह विचारधारा के भीतर निर्मित कर्ता (subject) होते हुए भी उसके विरुद्ध बोलने वाला कर्ता (subject) बन जाता है।
यहाँ ‘ज़िंदगी के नाम पर’ विशेष ध्यान माँगता है। विचारधारा प्रायः अपने हिंसक कार्यों को किसी उच्चतर उद्देश्य के नाम पर वैध करती है। जीवन, धर्म, राष्ट्र, न्याय, समुदाय या भविष्य—इनमें से किसी भी महान उद्देश्य का नाम लेकर वर्तमान में हिंसा को उचित ठहराया जा सकता है। कविता इस वैधता की संरचना को उलटती है। यदि जीवन की रक्षा के नाम पर जीवन नष्ट हो रहा है, तो उद्देश्य और साधन के बीच का सम्बन्ध टूट जाता है।
अल्थूसर की दृष्टि से इसे विचारधारात्मक विरोधाभास कहा जा सकता है। विचारधारा स्वयं को ऐसी भाषा में प्रस्तुत करती है जिसमें उसकी अपनी हिंसा दिखाई नहीं देती। लेकिन जब अभिमन्यु का घायल शरीर सामने आता है, तब विचारधारा की अमूर्त भाषा टूटती है। ‘ज़िंदगी’ एक अमूर्त आदर्श नहीं रह जाती; वह रक्तस्रवित शरीर बन जाती है।
इस प्रकार कविता में शरीर और विचारधारा के बीच संघर्ष दिखाई देता है। विचारधारा कहती है—‘बलिदान’; शरीर कहता है—‘दर्द’। विचारधारा कहती है—‘वीरता’; शरीर कहता है—‘क्षत-विक्षत’। विचारधारा कहती है—‘महासंग्राम’; शरीर कहता है—‘रक्त’। विचारधारा कहती है—‘विजय’; शरीर मृत्यु की वास्तविकता को सामने रखता है। कुँवर नारायण की काव्य-दृष्टि इस टकराव को नैतिक और सौन्दर्यात्मक दोनों स्तरों पर निर्मित करती है।
अभिमन्यु का प्रतिरोध इसलिए वैचारिक भी है। वह केवल व्यूह की पंक्तियों को नहीं तोड़ता; वह उस विचारधारात्मक भाषा की पंक्तियों को भी तोड़ता है जो युद्ध को स्वतः नैतिक मानती है। उसका ‘टूटा हुआ पहिया’ इस अर्थ में विचारधारा के विरुद्ध एक छोटी लेकिन निर्णायक दरार है।
अल्थूसर के लिए विचारधारा व्यक्ति को पूरी तरह निष्क्रिय नहीं बनाती; वह उसे एक सक्रिय सामाजिक विषयी भी बनाती है। व्यक्ति अपने सामाजिक संसार में कार्य करता है। अभिमन्यु इसी सक्रियता का उदाहरण है। वह केवल व्यवस्था का उत्पाद नहीं है; वह उसके भीतर क्रिया करता है। लेकिन उसकी क्रिया उस व्यवस्था की सीमाओं से मुक्त नहीं है। यही द्वंद्व कविता को सरल सत्ता-विरोधी कविता बनने से बचाता है।
अभिमन्यु की त्रासदी इसीलिए दोहरी है। पहली त्रासदी यह है कि वह हिंसक व्यवस्था का शिकार होता है। दूसरी यह कि उसका अपना अस्तित्व भी उसी सांस्कृतिक व्यवस्था से निर्मित है जो युद्ध को अर्थ देती है। वह उस व्यवस्था के भीतर पैदा हुआ है, उसके मूल्य ग्रहण करता है और उसी में लड़ता है। लेकिन उसकी मृत्यु उस व्यवस्था की नैतिक सीमाओं को उजागर कर देती है।
इस बिन्दु पर ‘प्रारब्ध जिसका गर्भ ही से हो चुका निश्चित’ पंक्ति का एक नया अर्थ खुलता है। ‘गर्भ’ केवल जैविक जन्म का स्थल नहीं, बल्कि विचारधारात्मक जन्म का भी रूपक बन सकता है। व्यक्ति किसी शून्य में पैदा नहीं होता। वह पहले से निर्मित भाषा, मिथक, धर्म, इतिहास, परिवार और सामाजिक भूमिकाओं के संसार में जन्म लेता है। उसका कर्ता बनने की प्रक्रिया जन्म के बाद आरम्भ होती है, लेकिन उसके सांस्कृतिक संसाधन उससे पहले मौजूद होते हैं।
इसीलिए ‘नवागत’ और ‘प्रारब्ध’ के बीच तनाव उल्लेखनीय है। अभिमन्यु नया है, लेकिन जिस संसार में वह आया है वह पुराना है। उसकी व्यक्तिगत उपस्थिति नई है, पर उसकी भूमिका के नियम पुराने हैं। यही विचारधारा की शक्ति है—वह नए व्यक्ति को पुराने सामाजिक ढाँचे में पहचान देती है।
कविता का अन्त इस वैचारिक संरचना के भीतर एक निर्णायक परिवर्तन प्रस्तुत करता है। ‘जहाँ तक पहुँच उसने मृत्यु के निष्पक्ष, समयातीत घेरे में / घिरे अस्तित्व का हर पक्ष पहिचाना।’ यहाँ अभिमन्यु केवल योद्धा नहीं रह जाता; वह अपने अस्तित्व की शर्तों को पहचानने वाला विषय (subject) बन जाता है। वह उस ‘पक्ष’ से आगे देखने लगता है जिसने उसकी पहचान निर्धारित की थी। अब वह युद्ध के किसी एक पक्ष से अधिक व्यापक मानवीय स्थिति को देखता है।
इसलिए कविता में वास्तविक मुक्ति शारीरिक बचाव नहीं है। अभिमन्यु व्यूह से जीवित बाहर नहीं निकलता, लेकिन वह उस विचारधारात्मक व्यूह को पहचान लेता है जिसमें ‘पक्ष’ को ‘सत्य’ से बड़ा बनाया गया था। उसकी मृत्यु इस अर्थ में एक विडम्बनापूर्ण ज्ञान-क्षण बन जाती है। जिस व्यक्ति को विचारधारा ने एक ‘योद्धा’ के रूप में निर्मित किया था, वही अन्ततः उस विचारधारा की नैतिक संरचना को पहचानने लगता है।
इस दृष्टि से ‘चक्रव्यूह’ का सबसे गहरा तनाव ‘विचारधारा और चेतना’ के बीच है। व्यक्ति विचारधारा से निर्मित होता है, लेकिन उसी विचारधारा के भीतर से उसके विरुद्ध प्रश्न भी पैदा हो सकता है। अभिमन्यु इस सम्भावना का रूपक है। वह व्यवस्था के बाहर का मनुष्य नहीं; वह व्यवस्था के भीतर से उसकी आलोचना करने वाला मनुष्य है।
यही कारण है कि कविता में ‘पक्ष’ के सामने ‘सत्य’ को रखा गया है। विचारधारा व्यक्ति को पक्ष देती है; आलोचनात्मक चेतना उससे पूछती है कि क्या पक्ष ही सत्य है। विचारधारा व्यक्ति को भूमिका देती है; आत्मचेतना पूछती है कि क्या भूमिका ही उसकी सम्पूर्ण पहचान है। विचारधारा मृत्यु को बलिदान बनाती है; कविता पूछती है कि क्या उस बलिदान के पीछे छिपे दर्द को भी सुना गया।
इस प्रकार अल्थूसर के आलोक में ‘चक्रव्यूह’ को पढ़ने पर कविता का केन्द्र ‘वीर अभिमन्यु’ से हटकर ‘निर्मित योद्धा’ और ‘जाग्रत मनुष्य’ के बीच के द्वंद्व पर आ जाता है। कविता दिखाती है कि युद्ध केवल रणभूमि में नहीं बनाया जाता; वह स्मृति, कथा, लोरी, इतिहास, उपदेश और सांस्कृतिक गौरव के माध्यम से भी तैयार होता है। व्यक्ति को पहले युद्ध के लिए तैयार किया जाता है, फिर युद्ध में भेजा जाता है और अन्ततः उसकी मृत्यु को ऐसी कथा में बदल दिया जाता है जो अगली पीढ़ी को फिर वही भूमिका स्वीकार करने के लिए तैयार करती है।
इसीलिए ‘चक्रव्यूह’ का वास्तविक व्यूह केवल अभिमन्यु को घेरे हुए सैनिकों का व्यूह नहीं है। वह विचारधारात्मक व्यूह भी है—ऐसा व्यूह जिसमें व्यक्ति को उसकी सामाजिक पहचान, कर्तव्य, पक्ष और इतिहास के माध्यम से घेरा जाता है। इस व्यूह की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि इसकी दीवारें हमेशा दिखाई नहीं देतीं। वे कभी लोरी होती हैं, कभी वीरगाथा, कभी उपदेश, कभी इतिहास और कभी गौरव की सामूहिक स्मृति।
कुँवर नारायण की कविता इस अदृश्य व्यूह को दृश्य बनाती है। वह ‘रक्त की विरुदावली’ के भीतर छिपी विचारधारा को, ‘लोरियों’ में छिपी सांस्कृतिक शिक्षा को, ‘उपदेशों’ में छिपे मूल्य-निर्माण को और ‘पक्ष’ में छिपे सत्य के दावे को सामने लाती है। इसीलिए अभिमन्यु की मृत्यु कविता का अन्तिम अर्थ नहीं है। उसका वास्तविक काव्यात्मक कार्य उस प्रक्रिया को उजागर करना है जिसके द्वारा किसी मनुष्य को योद्धा बनाया जाता है, उसकी मृत्यु को अर्थ दिया जाता है और उस अर्थ को अगली पीढ़ी तक पहुँचाया जाता है।
अन्ततः अल्थूसर की दृष्टि से ‘चक्रव्यूह’ एक ऐसी कविता बन जाती है जो पूछती है कि मनुष्य वास्तव में किस क्षण अपना होता है और किस क्षण किसी सामाजिक विचारधारा का ‘विषय’ बन जाता है। अभिमन्यु का संघर्ष इस प्रश्न को जटिल बनाता है, क्योंकि वह न तो विचारधारा से पूरी तरह मुक्त है और न उसका निष्क्रिय उत्पाद। वह उसके भीतर निर्मित होता है, उसी के नाम पर युद्ध करता है, उसी के व्यूह में फँसता है और अन्ततः उसी अनुभव के भीतर से उसकी नैतिक आलोचना सम्भव करता है। ‘टूटा हुआ पहिया’ इसलिए केवल एक घायल योद्धा का अंतिम हथियार नहीं रह जाता; वह उस विचारधारात्मक संरचना में पैदा हुई दरार का प्रतीक बन जाता है जो मनुष्य को पहले योद्धा में और फिर बलिदान में बदल देती है। कुँवर नारायण की कविता इसी दरार को पहचानने, उसे भाषा देने और उसके भीतर दबे मनुष्य को फिर से बोलने की जगह देने का काव्यात्मक प्रयास है।
कुँवर नारायण की ‘चक्रव्यूह’ को अन्तोनियो ग्राम्शी की सांस्कृतिक वर्चस्व और सहमति की अवधारणाओं के आलोक में पढ़ने पर कविता का युद्ध केवल दो पक्षों के बीच होने वाला प्रत्यक्ष संघर्ष नहीं रह जाता। वह एक ऐसी सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था का परिणाम दिखाई देता है जिसमें किसी विशेष प्रकार की हिंसा, वीरता, बलिदान और पक्षधरता को इतना सामान्य और स्वाभाविक बना दिया जाता है कि उनके औचित्य पर प्रश्न करना कठिन हो जाता है। ग्राम्शी की दृष्टि कविता को यह समझने में सहायता देती है कि किसी सत्ता की स्थायित्व-क्षमता केवल उसके पास उपलब्ध सैन्य या दमनकारी शक्ति से निर्धारित नहीं होती; वह इस बात पर भी निर्भर करती है कि समाज के कितने लोग उसके मूल्यों को स्वाभाविक, उचित और सामान्य मानने लगते हैं। ‘चक्रव्यूह’ इसी निर्मित सामान्य-बोध के भीतर छिपी हुई हिंसा को उजागर करती है।
ग्राम्शी के लिए ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ (Cultural Hegemony) का अर्थ केवल यह नहीं है कि शासक वर्ग अपनी संस्कृति दूसरों पर थोप देता है। अधिक सूक्ष्म स्थिति यह है कि प्रभुत्वशाली सामाजिक शक्तियाँ अपने मूल्यों और दृष्टिकोणों को समाज के सामान्य-बोध का हिस्सा बना देती हैं। तब जो मूल्य ऐतिहासिक रूप से निर्मित होते हैं, वे प्राकृतिक और स्वाभाविक प्रतीत होने लगते हैं। लोग उन्हें बाहरी आदेश के कारण ही नहीं मानते, बल्कि अनेक बार स्वयं भी उन्हें सही मानते हैं। इसीलिए वर्चस्व केवल बल का परिणाम नहीं है; वह सहमति (Consent) के निर्माण पर भी निर्भर करता है।
‘चक्रव्यूह’ की आरम्भिक पंक्तियाँ इसी सांस्कृतिक सहमति के निर्माण की प्रक्रिया को समझने का आधार प्रदान करती हैं—
‘युद्ध की प्रतिध्वनि जगाकर
जो हज़ारों बार दुहराई गई,
रक्त की विरुदावली कुछ और रँगकर
लोरियों के संग जो गाई गई—’
यहाँ ‘हज़ारों बार दुहराई गई’ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। किसी युद्ध की हिंसा यदि एक बार घटित होकर समाप्त हो जाए, तो उसका सामाजिक प्रभाव सीमित रह सकता है; लेकिन जब उसकी कथा बार-बार दोहराई जाती है, तब वह सामूहिक स्मृति का हिस्सा बनती है। पुनरावृत्ति के माध्यम से युद्ध घटना से संस्कृति में परिवर्तित होता है। वह इतिहास से लोक-स्मृति में, लोक-स्मृति से कथा में और कथा से सामान्य-बोध में प्रवेश करता है।
यही वह बिन्दु है जहाँ ग्राम्शी की सांस्कृतिक वर्चस्व की अवधारणा कविता के भीतर एक नई व्याख्यात्मक सम्भावना खोलती है। युद्ध के लिए हमेशा तलवारों की आवश्यकता नहीं होती; उसके लिए ऐसी सांस्कृतिक भाषा भी आवश्यक होती है जो तलवार को उचित ठहराए। ‘रक्त की विरुदावली’ इसी भाषा का संकेत है। रक्त का वास्तविक अर्थ पीड़ा, मृत्यु और विनाश है, लेकिन ‘विरुदावली’ उसे गौरव, यश और वीरता के अर्थों से भर देती है। इस प्रकार हिंसा के वास्तविक अनुभव और उसके सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व के बीच दूरी पैदा होती है।
‘रक्त’ और ‘विरुदावली’ का संयोजन कविता की वैचारिक विडम्बना है। रक्त अपने आप में किसी वीरता का प्रमाण नहीं है। किसी व्यक्ति का रक्त बहना यह सिद्ध नहीं करता कि जिस उद्देश्य के लिए वह मरा वह नैतिक रूप से उचित था। लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्व ऐसी व्याख्या सम्भव बनाता है जिसमें मृत्यु स्वयं उद्देश्य की वैधता का प्रमाण बन जाती है। जो मारा गया, वह ‘शहीद’ है; जिसने मारा, वह ‘वीर’ है; और जिस युद्ध में दोनों शामिल हैं, वह ‘धर्म’, ‘न्याय’ या ‘गौरव’ का युद्ध घोषित किया जा सकता है। कविता इस अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया को उजागर करती है।
‘लोरियों’ का प्रयोग इस संदर्भ में और भी गहरा अर्थ ग्रहण करता है। लोरी परिवार और बचपन से जुड़ी होती है। यदि युद्ध की कथा लोरी में प्रवेश करती है, तो उसका अर्थ यह है कि हिंसा की सांस्कृतिक स्वीकृति केवल युद्धक्षेत्र में निर्मित नहीं हो रही; वह अगली पीढ़ी के भावनात्मक संस्कार का हिस्सा बन रही है। बच्चा अभी युद्ध को समझने की स्थिति में नहीं है, लेकिन उसे युद्ध की गौरव-कथा सुनाई जा रही है। इस प्रकार हिंसा का सांस्कृतिक अर्थ बचपन से ही परिचित कराया जाता है।
ग्राम्शी के ‘सहमति’ की अवधारणा को समझने के लिए यह बिन्दु निर्णायक है। यदि युद्ध के लिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्यक्ष बलपूर्वक तैयार करना पड़े, तो सत्ता का नियंत्रण अस्थिर हो सकता है। लेकिन यदि समाज स्वयं युद्ध की भाषा को स्वीकार कर ले, यदि परिवार उसे गौरव की कथा के रूप में सुनाए, यदि सांस्कृतिक परम्परा उसे वीरता से जोड़े और यदि सामूहिक स्मृति उसकी आलोचना के बजाय उसका उत्सव मनाए, तो सत्ता को लगातार प्रत्यक्ष बल प्रयोग की आवश्यकता कम हो जाती है। लोग व्यवस्था के भीतर अपनी भूमिका को स्वयं स्वीकार करने लगते हैं।
इस प्रकार ‘लोरी’ एक सांस्कृतिक अनुशासन का रूपक बन जाती है। वह किसी सैनिक को आदेश नहीं देती, फिर भी उसके भीतर एक ऐसा भावनात्मक संसार निर्मित कर सकती है जिसमें वीरता और युद्ध परस्पर सम्बद्ध प्रतीत हों। यही वर्चस्व की सूक्ष्म शक्ति है—वह आदेश की तरह नहीं, विश्वास की तरह काम करता है।
इस दृष्टि से ‘उसी इतिहास की स्मृति, / उसी संसार में लौटे हुए, / ओ योद्धा, तुम कौन हो?’ में ‘इतिहास’ और ‘संसार’ दो अलग-अलग स्तरों पर काम करते हैं। इतिहास केवल अतीत की घटनाओं का संग्रह नहीं है; वह वर्तमान के सामाजिक बोध को भी प्रभावित करता है। जिस इतिहास को समाज अपने बारे में बताता है, उसी से उसकी सामूहिक पहचान निर्मित होती है। यदि इतिहास मुख्यतः युद्ध, विजय और वीरता की कथा है, तो हिंसा भी सामाजिक गौरव का हिस्सा बन सकती है।
ग्राम्शी के अनुसार प्रभुत्वशाली विचार सामाजिक संस्थाओं और सांस्कृतिक व्यवहारों के माध्यम से इस प्रकार फैलते हैं कि वे ‘सामान्य-बोध’ का हिस्सा बन जाते हैं। कविता में ‘इतिहास’, ‘उपदेश’, ‘उपाख्यान’ और ‘कथाएँ’ इसी सांस्कृतिक संसार की ओर संकेत करते हैं। ये केवल साहित्यिक रूप नहीं हैं; ये समाज के नैतिक और राजनीतिक ज्ञान को पीढ़ियों तक पहुँचाने वाले माध्यम भी हैं।
‘हज़ारों युद्ध, उपदेशों, उपाख्यानों, कथाओं में’ इसलिए एक महत्त्वपूर्ण संरचना है। युद्ध स्वयं एक घटना है, लेकिन ‘उपदेश’, ‘उपाख्यान’ और ‘कथा’ उस घटना की सामाजिक व्याख्या तैयार करते हैं। कौन वीर था? कौन धर्म के पक्ष में था? किसकी मृत्यु सार्थक थी? किसकी हत्या न्यायसंगत थी? इन प्रश्नों के उत्तर कथा-परम्परा के माध्यम से तय किए जा सकते हैं। इसीलिए संस्कृति सत्ता की सहयोगी संरचना बन सकती है।
लेकिन ग्राम्शी के यहाँ संस्कृति केवल प्रभुत्व का माध्यम नहीं है। यही वह बिन्दु है जहाँ ‘चक्रव्यूह’ का काव्यात्मक प्रतिरोध सामने आता है। जिस सांस्कृतिक परम्परा ने अभिमन्यु की कथा को वीरगाथा बनाया, उसी परम्परा के भीतर कुँवर नारायण उस कथा को पुनः लिखते हैं। वे महाभारत के मिथक को स्वीकार करके भी उसकी स्थापित व्याख्या को स्वीकार नहीं करते। वे उसी सांस्कृतिक सामग्री के भीतर से एक वैकल्पिक दृष्टि निर्मित करते हैं।
इसे ‘प्रतिवर्चस्व’ (Counter-Hegemony) की सम्भावना के रूप में पढ़ा जा सकता है। ग्राम्शी के लिए वर्चस्व कभी पूर्ण और स्थिर नहीं होता। प्रभुत्वशाली विचारों के भीतर हमेशा ऐसे स्थान होते हैं जहाँ वैकल्पिक अर्थ, वैकल्पिक स्मृतियाँ और वैकल्पिक सामाजिक कल्पनाएँ जन्म ले सकती हैं। कविता स्वयं ऐसा प्रतिवर्चस्वकारी हस्तक्षेप बन सकती है।
‘छिपा वह पृष्ठ मेरा है’ इस दृष्टि से अत्यन्त अर्थपूर्ण हो जाता है। महाभारत की विशाल सांस्कृतिक कथा में अभिमन्यु का पृष्ठ पहले से मौजूद है, लेकिन कवि कहता है कि वह पृष्ठ ‘छिपा’ हुआ है। यहाँ ‘छिपा’ केवल भौतिक अर्थ में नहीं है। वह सांस्कृतिक अर्थ में दबा हुआ है। वीरगाथा का प्रभुत्व उस व्यक्तिगत पीड़ा को पीछे कर देता है जो युद्ध के भीतर मौजूद थी।
कविता उस दबे हुए पृष्ठ को सामने लाती है। यही प्रतिवर्चस्व की प्रक्रिया है। वह स्थापित कथा को नष्ट नहीं करती; वह उसके भीतर से एक ऐसा अर्थ निकालती है जो स्थापित सामान्य-बोध को चुनौती देता है। महाभारत अब केवल धर्मयुद्ध और वीरता का आख्यान नहीं रह जाता; वह सत्ता, छल, पक्षधरता और निर्दोष जीवन की हत्या पर प्रश्न करने वाला आख्यान बन जाता है।
‘वह जीव हूँ निष्पाप / जिसको पूज कर मारा गया’ इस प्रतिवर्चस्वकारी पुनर्पाठ को और तीखा करता है। यहाँ ‘पूजा’ स्वयं प्रश्न के घेरे में है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी पूजा की जाती है, लेकिन उसके मारे जाने की सामाजिक संरचना को प्रश्न नहीं किया जाता, तो पूजा कहीं न कहीं उस संरचना की आलोचना को निष्क्रिय कर सकती है। शहीद की पूजा उसकी मृत्यु के कारणों को भुला सकती है। कविता इस सम्भावना को अस्वीकार करती है।
ग्राम्शी के सन्दर्भ में इसे ‘सहमति के निर्माण’ की आलोचना कहा जा सकता है। सत्ता समाज को केवल भयभीत करके नहीं चलाती; वह लोगों को विश्वास दिलाती है कि व्यवस्था उचित है। युद्ध में मरने वाला व्यक्ति यदि ‘बलिदानी’ है और उसे मारने वाला यदि ‘वीर’ है, तो हिंसा के लिए नैतिक सहमति निर्मित हो जाती है। कविता इसी सहमति को अस्थिर करती है।
यहाँ ‘पक्ष’ की अवधारणा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है—‘जिन्होंने पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना’। ग्राम्शी की दृष्टि से ‘पक्ष’ केवल राजनीतिक समूह नहीं है; वह एक व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण है। व्यक्ति अपने वर्ग, समुदाय, राष्ट्र, धर्म, संस्था या विचारधारा से जुड़कर दुनिया को देखता है। यदि यह जुड़ाव इतना गहरा हो जाए कि व्यक्ति अपने पक्ष के दावों को स्वाभाविक सत्य मानने लगे, तो आलोचनात्मक विवेक सीमित हो सकता है।
यहीं ‘सत्य’ और ‘सहमति’ के बीच सम्बन्ध दिखाई देता है। किसी समाज में जो बात व्यापक रूप से स्वीकार कर ली जाती है, वह आवश्यक नहीं कि स्वतः सत्य हो। लेकिन सामाजिक स्वीकृति उसे सत्य का रूप दे सकती है। ग्राम्शी का ‘सामान्य-बोध’ इसी प्रक्रिया को समझने का साधन है। सामान्य-बोध एकसमान दार्शनिक प्रणाली नहीं होता; उसमें अनेक ऐतिहासिक धारणाएँ, धार्मिक विश्वास, लोककथाएँ, नैतिक नियम और राजनीतिक पूर्वाग्रह एक साथ मौजूद होते हैं। व्यक्ति इन्हें अक्सर प्रश्न किए बिना स्वीकार करता है।
‘चक्रव्यूह’ इसी सामान्य-बोध के भीतर हस्तक्षेप करती है। वह पाठक से पूछती है कि जिसे तुम ‘वीरता’ कहते हो, क्या वह वास्तव में वीरता है? जिसे तुम ‘बलिदान’ कहते हो, क्या उसमें हत्या की वास्तविकता भी दिखाई देती है? जिसे तुम ‘पक्ष’ कहते हो, क्या वह ‘सत्य’ से बड़ा हो सकता है? इस प्रकार कविता सामान्य-बोध को आलोचनात्मक चेतना में बदलने की कोशिश करती है।
ग्राम्शी के यहाँ ‘सामान्य-बोध’ के बरक्स ‘अच्छी समझ’ या आलोचनात्मक विवेक की सम्भावना भी रहती है। साहित्य इसी परिवर्तन में योगदान दे सकता है। ‘चक्रव्यूह’ पाठक को तैयार उत्तर नहीं देती; वह उसे स्थापित नैतिक श्रेणियों पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करती है। ‘वीर-कायर’ जैसे पद इसी आलोचनात्मक विवेक की रचना करते हैं।
‘व्यूह-रक्षक वीर-कायर हैं’ को इस दृष्टि से पढ़ना विशेष रूप से सार्थक है। सामान्य-बोध कहता है कि जो अपने पक्ष की रक्षा करता है वह वीर है। कविता पूछती है कि यदि वह रक्षा छल पर आधारित है तो क्या वह वीरता है? इस प्रश्न के माध्यम से कविता उस सांस्कृतिक सहमति को तोड़ती है जिसने ‘वीरता’ को एक निश्चित सामाजिक अर्थ दे दिया था।
इसी प्रकार ‘कटु व्यंग्य हूँ उस तर्क पर / जो ज़िंदगी के नाम पर हारा गया’ एक ऐसी वैचारिक संरचना को चुनौती देता है जिसमें युद्ध को जीवन की रक्षा के नाम पर उचित ठहराया जाता है। यहाँ कविता किसी विशेष राजनीतिक पक्ष का समर्थन नहीं करती; वह उस तर्क की संरचना पर प्रश्न करती है जिसमें साधन और उद्देश्य के बीच का विरोधाभास छिपा दिया जाता है।
ग्राम्शी की दृष्टि से यह ‘सांस्कृतिक संघर्ष’ का क्षेत्र है। सत्ता को चुनौती देने का अर्थ केवल सत्ता-केन्द्र पर आक्रमण करना नहीं है। यह भी आवश्यक है कि समाज उन शब्दों और प्रतीकों को नए अर्थ दे जिनके माध्यम से प्रभुत्व कायम रहता है। कुँवर नारायण अभिमन्यु, व्यूह, वीरता, बलिदान और इतिहास जैसे प्रतीकों का पुनर्पाठ करके ऐसा ही करते हैं।
इस पुनर्पाठ में कवि की भूमिका एक ‘जैविक बुद्धिजीवी’ (Organic Intellectual) की अवधारणा से भी जोड़ी जा सकती है, यद्यपि इसे सावधानी से उपयोग करना चाहिए। ग्राम्शी का ‘जैविक बुद्धिजीवी’ किसी सामाजिक अनुभव को केवल बौद्धिक रूप से समझाने वाला व्यक्ति नहीं है; वह समाज के अनुभवों और संघर्षों को ऐसी वैचारिक भाषा देता है जो प्रभुत्वशाली सामान्य-बोध को चुनौती दे सके। कुँवर नारायण की कविता मिथकीय कथा के भीतर छिपे हुए अनुभव को ऐसी भाषा देती है जो युद्ध की गौरव-कथा के बरक्स पीड़ा और नैतिक प्रश्न को सामने लाती है।
इस अर्थ में कविता सांस्कृतिक राजनीति का हस्तक्षेप है। वह युद्ध के विरुद्ध केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है; वह यह पूछती है कि युद्ध को स्वीकार करने वाली संस्कृति कैसे बनती है। यह प्रश्न युद्ध के दृश्य से पहले की दुनिया में जाता है—उस परिवार में जहाँ लोरी गाई जाती है, उस इतिहास में जहाँ वीरगाथाएँ लिखी जाती हैं, उस सामाजिक स्मृति में जहाँ रक्त को गौरव में बदला जाता है और उस सामूहिक चेतना में जहाँ पक्ष सत्य का पर्याय बन जाता है।
ग्राम्शी के वर्चस्व-विमर्श में ‘सहमति’ का अर्थ पूर्ण स्वेच्छा नहीं है। सामाजिक सम्बन्धों में शक्ति असमान होती है। इसलिए सहमति स्वयं सत्ता-संबंधों से निर्मित हो सकती है। ‘चक्रव्यूह’ में भी युद्ध के पक्ष में दिखाई देने वाली सहमति को पूरी तरह स्वतन्त्र व्यक्तिगत चुनाव नहीं माना जा सकता। व्यक्ति पहले से उपलब्ध सांस्कृतिक श्रेणियों के भीतर चुनाव करता है। यदि वीरता का अर्थ ही युद्ध में मरना सिखाया गया है, तो उस व्यक्ति के पास युद्ध के अर्थ को समझने के वैकल्पिक साधन सीमित हो सकते हैं।
यहीं अभिमन्यु का ‘नवागत’ होना फिर से अर्थपूर्ण हो जाता है। वह एक नई पीढ़ी का प्रतिनिधि हो सकता है जो पुराने सांस्कृतिक संसार में प्रवेश करती है। लेकिन नई पीढ़ी के सामने पुराने संघर्ष पहले से मौजूद हैं। उसे पुराने युद्ध की विरासत मिलती है, जबकि उसे अपना जीवन जीना है। इस प्रकार कविता पीढ़ियों के बीच हिंसा के सांस्कृतिक हस्तान्तरण का प्रश्न भी उठाती है।
‘प्रारब्ध जिसका गर्भ ही से हो चुका निश्चित’ को ग्राम्शी की दृष्टि से पढ़ने पर ‘गर्भ’ सामाजिक इतिहास और सांस्कृतिक उत्तराधिकार का रूपक बन सकता है। मनुष्य जिस संसार में जन्म लेता है, उसमें सत्ता और वर्चस्व पहले से सक्रिय होते हैं। वह अपनी चेतना का निर्माण शून्य से नहीं करता। वह पहले से मौजूद सामान्य-बोध, भाषा और सांस्कृतिक मूल्यों के भीतर सोचता है।
लेकिन यही नियति पूर्ण नहीं है। ग्राम्शी के यहाँ वर्चस्व के भीतर संघर्ष की सम्भावना हमेशा रहती है। कोई संस्कृति पूरी तरह बन्द नहीं होती। उसके भीतर विरोधी अर्थों के लिए स्थान बन सकते हैं। ‘चक्रव्यूह’ इसी सम्भावना का उदाहरण है। महाभारत का वही अभिमन्यु जिसे वीरगाथा में एक महान योद्धा के रूप में याद किया जा सकता है, कुँवर नारायण के यहाँ युद्ध की नैतिक आलोचना का माध्यम बन जाता है।
यह परिवर्तन केवल साहित्यिक शैली का परिवर्तन नहीं है; यह सांस्कृतिक अर्थ के पुनर्वितरण की प्रक्रिया है। मिथक पहले से मौजूद है, लेकिन उसकी व्याख्या बदलने पर उसका सामाजिक कार्य भी बदल सकता है। एक कथा जो पहले युद्ध को गौरवपूर्ण बना सकती थी, वही कथा अब युद्ध की हिंसा और छल को उजागर कर सकती है। यही प्रतिवर्चस्वकारी साहित्य की शक्ति है।
‘सारी देह क्षत-विक्षत’ का बिम्ब इस सांस्कृतिक संघर्ष में निर्णायक है। वर्चस्व अमूर्त भाषा में काम करता है; कविता शरीर को सामने लाकर उस अमूर्तता को तोड़ती है। ‘महासंग्राम’ एक महान ऐतिहासिक शब्द है, लेकिन उसके भीतर ‘क्षत-विक्षत देह’ भी है। ‘विजय’ के भीतर रक्त है। ‘बलिदान’ के भीतर दर्द है। ‘वीरता’ के भीतर मृत्यु है। कविता इन दोनों स्तरों को एक साथ उपस्थित करती है।
इस प्रकार कुँवर नारायण की काव्य-भाषा स्वयं वर्चस्व-विरोधी भाषा बन जाती है। वह बड़े ऐतिहासिक शब्दों को छोटे मानवीय अनुभवों से टकराती है। ‘महासंग्राम’ के सामने ‘लथपथ लाश’ रखी जाती है। ‘विरुदावली’ के सामने ‘रक्त’ आता है। ‘बलिदान’ के सामने ‘निष्पाप जीव’ आता है। ‘पक्ष’ के सामने ‘सत्य’ आता है। यह टकराव पाठक के सामान्य-बोध को अस्थिर करता है।
यहीं ‘प्रतिवर्चस्व’ की सबसे प्रभावी प्रक्रिया दिखाई देती है। कवि किसी बाहरी राजनीतिक नारे के माध्यम से नहीं, बल्कि स्थापित सांस्कृतिक प्रतीकों के पुनर्पाठ से अपना प्रतिरोध निर्मित करता है। अभिमन्यु पहले से सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है; कवि उसी स्मृति के भीतर नया नैतिक अर्थ पैदा करता है।
इस दृष्टि से कविता का अन्त भी विशेष अर्थ ग्रहण करता है—‘जहाँ उसने विजय के चंद घातक पलों में जाना/कि छल के लिए उद्यत व्यूह-रक्षक वीर-कायर हैं,/—जिन्होंने पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना—’ । यहाँ ‘विजय’ का अर्थ उलट जाता है। अभिमन्यु की शारीरिक विजय नहीं होती, फिर भी वह एक प्रकार की वैचारिक विजय प्राप्त करता है। वह समझ लेता है कि व्यूह की वास्तविक शक्ति केवल उसकी सैन्य संरचना में नहीं, बल्कि उसके नैतिक औचित्य के दावे में है। जब वह उस दावे की असलियत पहचान लेता है, तो वर्चस्व की एक परत टूट जाती है।
ग्राम्शी के अनुसार वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष का एक महत्त्वपूर्ण चरण ‘सहमति’ को वापस लेना है। अर्थात् जो सामान्य और स्वाभाविक प्रतीत होता है, उसे फिर से प्रश्न के घेरे में लाना। ‘चक्रव्यूह’ पाठक से यही करवाती है। वह पूछती है कि क्या हर ऐतिहासिक वीरगाथा को वीरगाथा ही माना जाना चाहिए? क्या शहीद की पूजा उसके दुःख को समझने के बराबर है? क्या किसी पक्ष से जुड़ जाना सत्य के पक्ष में होना है? क्या परम्परा किसी हिंसक व्यवस्था को नैतिक वैधता दे सकती है?
इसलिए कविता में सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रतिरोध सांस्कृतिक स्मृति को नष्ट करके नहीं, बल्कि उसकी पुनर्व्याख्या करके होता है। महाभारत को छोड़ना नहीं है; उसे फिर से पढ़ना है। अभिमन्यु को भूलना नहीं है; उसे नए प्रश्नों के साथ याद करना है। युद्ध की कथा को मिटाना नहीं है; उसके भीतर दबे हुए दर्द को सुनना है।
यहाँ साहित्य का कार्य भी ग्राम्शी की दृष्टि से नया अर्थ प्राप्त करता है। साहित्य केवल मनोरंजन या सौन्दर्य का क्षेत्र नहीं है; वह सामाजिक अर्थों के संघर्ष का क्षेत्र भी हो सकता है। कौन-सा प्रतीक किस अर्थ में इस्तेमाल होगा, कौन-सी स्मृति किस रूप में सुरक्षित रहेगी और कौन-सा अनुभव सामूहिक चेतना में स्थान पाएगा—ये सभी सांस्कृतिक प्रश्न हैं।
‘चक्रव्यूह’ इसी अर्थ में एक वैकल्पिक सांस्कृतिक स्मृति निर्मित करती है। वह अभिमन्यु को केवल ‘महान योद्धा’ के रूप में नहीं, बल्कि उस मनुष्य के रूप में प्रस्तुत करती है जो युद्ध की विचारधारा के भीतर जन्म लेकर अन्ततः उसकी नैतिक संरचना को पहचानता है। उसकी मृत्यु एक गौरवपूर्ण कथा में समा जाने के बजाय उस व्यवस्था पर प्रश्न बन जाती है जिसने उसे मारा।
इसलिए ग्राम्शी के आलोक में ‘चक्रव्यूह’ की सबसे गहरी संरचना ‘बल बनाम बल’ की नहीं, बल्कि ‘वर्चस्व बनाम प्रतिवर्चस्व’ की संरचना है। एक ओर युद्ध, वीरता, रक्त, पक्ष और गौरव की स्थापित सांस्कृतिक भाषा है; दूसरी ओर अभिमन्यु की देह, उसकी पीड़ा, उसका प्रश्न और उसकी अन्तर्दृष्टि है। एक ओर वह सामान्य-बोध है जो कहता है कि पक्ष के लिए मरना स्वाभाविक है; दूसरी ओर वह आलोचनात्मक चेतना है जो पूछती है कि यदि पक्ष सत्य से बड़ा हो जाए तो उस पक्ष की नैतिक वैधता क्या रह जाती है।
इस तरह ‘चक्रव्यूह’ में सांस्कृतिक वर्चस्व तलवार से पहले कथा में निर्मित होता है। वह युद्धभूमि से पहले स्मृति में बनता है। वह सैनिक की भुजा से पहले समाज की भाषा में सक्रिय होता है। ‘रक्त की विरुदावली’ और ‘लोरियों’ का सम्बन्ध इस प्रक्रिया का सबसे सघन रूपक है। रक्त को गौरव में बदलना और उस गौरव को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना ही वह सांस्कृतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा हिंसा को सामाजिक सहमति प्राप्त होती है।
लेकिन कविता उसी प्रक्रिया को उलट देती है। वह रक्त को फिर से रक्त, मृत्यु को फिर से मृत्यु और पीड़ा को फिर से पीड़ा के रूप में सामने लाती है। वह ‘वीर-कायर’ जैसे विरोधाभासी पदों के माध्यम से स्थापित मूल्य-व्यवस्था में दरार पैदा करती है। वह ‘पक्ष’ को ‘सत्य’ से अलग करती है। और वह इतिहास के ‘छिपे हुए पृष्ठ’ को सामने लाकर उन अनुभवों को आवाज़ देती है जिन्हें विजयी सांस्कृतिक स्मृति दबा सकती थी।
अन्ततः ग्राम्शी की दृष्टि से ‘चक्रव्यूह’ इस प्रश्न की कविता बन जाती है कि किसी समाज को युद्ध के लिए केवल हथियार कौन देता है, यह पूछना पर्याप्त नहीं; यह भी पूछना होगा कि वह समाज युद्ध को उचित मानने वाली चेतना कहाँ से प्राप्त करता है। उत्तर कविता की अपनी पंक्तियों में बिखरा हुआ है—इतिहास में, लोरियों में, विरुदावलियों में, उपदेशों में, उपाख्यानों में और कथाओं में। यहीं सांस्कृतिक वर्चस्व काम करता है। लेकिन इन्हीं कथाओं के भीतर प्रतिरोध की सम्भावना भी जन्म लेती है। कुँवर नारायण का काव्य उसी सम्भावना को सक्रिय करता है। वह महाभारत की पुरानी कथा को इस तरह पुनर्स्थापित करता है कि अभिमन्यु की मृत्यु केवल अतीत की घटना न रहकर वर्तमान के सामान्य-बोध पर प्रश्न बन जाती है। इस अर्थ में ‘चक्रव्यूह’ युद्ध की कथा से अधिक उस संस्कृति की आलोचना है जो युद्ध को सम्भव, स्वीकार्य और गौरवपूर्ण बनाती है—और साथ ही उस काव्यात्मक विवेक की स्थापना भी है जो उसी संस्कृति के भीतर से उसके वर्चस्व को चुनौती दे सकता है।
कुँवर नारायण की ‘चक्रव्यूह’ को रेने गिरार (René Girard) की हिंसा, अनुकरणात्मक इच्छा, प्रतिद्वंद्विता और बलि-तंत्र की अवधारणाओं के आलोक में पढ़ने पर कविता में उपस्थित अभिमन्यु की त्रासदी एक नए और अधिक जटिल सामाजिक-मानवशास्त्रीय अर्थ में खुलती है। यहाँ अभिमन्यु केवल युद्धभूमि में मारा गया एक वीर योद्धा नहीं रह जाता; वह उस सामूहिक हिंसा की संरचना का केन्द्र बन जाता है जिसमें समुदाय के भीतर मौजूद तनाव, प्रतिस्पर्धा, प्रतिद्वंद्विता और अस्थिरता किसी एक व्यक्ति पर केन्द्रित होकर हिंसा का रूप ले सकती है। गिरार की दृष्टि से कविता को पढ़ने का अर्थ यह देखना है कि हिंसा केवल दो विरोधी व्यक्तियों के बीच नहीं होती; वह पूरे सामूहिक जीवन को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया है और कई बार किसी एक व्यक्ति की बलि के माध्यम से सामूहिक व्यवस्था को फिर से स्थिर करने का प्रयास करती है।
गिरार के विचार का एक महत्त्वपूर्ण आधार ‘अनुकरणात्मक इच्छा’ (Mimetic Desire) है। मनुष्य की इच्छाएँ हमेशा पूरी तरह स्वतन्त्र नहीं होतीं। हम यह भी सीखते हैं कि हमें क्या चाहना चाहिए, किसे आदर्श मानना चाहिए और किस वस्तु, प्रतिष्ठा या स्थान को मूल्यवान समझना चाहिए। इस प्रक्रिया में कोई तीसरा व्यक्ति या समूह हमारे लिए इच्छा का मॉडल बन सकता है। लेकिन जब दो या अधिक लोग एक ही वस्तु, प्रतिष्ठा, सत्ता या मान्यता की आकांक्षा करने लगते हैं, तो अनुकरण प्रतिस्पर्धा में बदल सकता है। प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे प्रतिद्वंद्विता को जन्म देती है और प्रतिद्वंद्विता सामाजिक तनाव को बढ़ा सकती है।
‘चक्रव्यूह’ में यह प्रक्रिया प्रत्यक्ष रूप से इच्छा की वस्तु के रूप में नहीं दिखाई देती, क्योंकि कविता का विषय आधुनिक अर्थ में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा नहीं है। लेकिन ‘पक्ष’, ‘सत्य’, ‘विजय’ और ‘वीरता’ जैसी श्रेणियों को गिरार की दृष्टि से पढ़ने पर एक व्यापक सामूहिक प्रतिद्वंद्विता दिखाई देती है। युद्ध में प्रत्येक पक्ष केवल दूसरे पक्ष से नहीं लड़ता; वह अपने पक्ष की प्रतिष्ठा, सत्य और नैतिक श्रेष्ठता को भी स्थापित करना चाहता है। इस प्रकार संघर्ष केवल संसाधनों या क्षेत्र का संघर्ष नहीं रहता; वह मान-सम्मान, पहचान और वैधता का संघर्ष भी बन जाता है।
कविता की पंक्ति ‘जिन्होंने पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना’ इस सन्दर्भ में विशेष रूप से अर्थपूर्ण है। यहाँ ‘पक्ष’ केवल राजनीतिक या सैन्य पक्ष नहीं है; वह ऐसी सामूहिक पहचान है जिसके भीतर व्यक्ति अपनी नैतिक श्रेष्ठता देखता है। जब किसी समूह के लिए अपना पक्ष ही सत्य का पर्याय बन जाता है, तब दूसरे पक्ष को केवल प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि असत्य या अनैतिक के रूप में देखने की सम्भावना बढ़ जाती है। इससे हिंसा के लिए नैतिक अवरोध कम हो सकते हैं।
गिरार की दृष्टि से सामूहिक हिंसा की एक विशेषता यह है कि प्रतिद्वंद्विता धीरे-धीरे अपनी वास्तविक सीमाओं को खो सकती है। आरम्भ में दो पक्षों के बीच भेद स्पष्ट होता है, लेकिन हिंसा बढ़ने पर विरोधी एक-दूसरे की तरह ही व्यवहार करने लगते हैं। दोनों पक्ष एक ही भाषा में वीरता, प्रतिशोध, सम्मान और विजय की बात करते हैं। दोनों एक-दूसरे की रणनीतियों की नकल करते हैं। परिणामतः भेद धुँधले होते जाते हैं और हिंसा स्वयं अपने विस्तार का कारण बनती है।
‘यह महासंग्राम, / युग-युग से चला आता महाभारत’ को इस संदर्भ में पढ़ना विशेष उपयोगी है। महाभारत यहाँ केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक युद्ध नहीं है; वह पुनरावृत्त होती सामूहिक हिंसा का रूपक बन सकता है। संघर्ष समाप्त होने के बाद भी उसकी स्मृति, उसकी प्रतिद्वंद्विता और उसके नैतिक औचित्य की कथाएँ आगे चलती रहती हैं। इस प्रकार हिंसा केवल घटना नहीं रहती; वह सांस्कृतिक संरचना बन जाती है।
गिरार के विचार में जब समुदाय के भीतर प्रतिद्वंद्विता और हिंसा इस सीमा तक बढ़ जाती है कि सामूहिक व्यवस्था के टूटने का खतरा पैदा होने लगता है, तब समुदाय अक्सर किसी एक व्यक्ति या समूह को हिंसा का केन्द्र बना सकता है। यही ‘बलि का बकरा तंत्र’ (Scapegoat Mechanism) है। सामूहिक तनाव का वास्तविक कारण बहुत जटिल हो सकता है, लेकिन समुदाय उसे किसी एक लक्ष्य पर केन्द्रित करके सरल बना देता है। उस व्यक्ति को दोषी, अपवित्र, खतरनाक या संकट का कारण घोषित किया जा सकता है। फिर उसके विरुद्ध सामूहिक हिंसा समुदाय को एक क्षणिक एकता प्रदान कर सकती है।
अभिमन्यु को इस अवधारणा के आलोक में पढ़ना कविता की संरचना को नए ढंग से खोलता है। वह युद्ध का एक पक्ष है, लेकिन उसकी स्थिति धीरे-धीरे ऐसी बन जाती है जहाँ अनेक शक्तियाँ एक साथ उसके विरुद्ध सक्रिय दिखाई देती हैं। वह एक अकेला व्यक्ति है और उसके सामने संगठित शक्ति है। उसका ‘टूटा हुआ पहिया’ और ‘फूटा कवच’ उस असमानता को दृश्य बनाते हैं। यहाँ सामूहिकता और अकेले व्यक्ति का विरोध केवल सैन्य शक्ति का विरोध नहीं है; यह सामूहिक हिंसा और व्यक्तिगत जीवन के बीच का तनाव है।
बिम्ब विधान की दृष्टि से विवेच्य कविता का एक अंश ख़ास तौर पर ध्यान देने योग्य है :
‘मेरे हाथ में टूटा हुआ पहिया,
पिघलती आग-सी संध्या,
बदन पर एक फूटा कवच,
सारी देह क्षत-विक्षत’
इन बिम्बों को रेने गिरार (René Girard) के चिन्तन के सन्दर्भ में पढ़ने पर अभिमन्यु की देह सामूहिक हिंसा का केन्द्र बन जाती है। रेने गिरार के ‘बलि-तंत्र’ (Scapegoating Mechanism) और ‘सामूहिक हिंसा’ (Collective Violence) के सिद्धांत के अनुसार, जब कोई समाज या व्यवस्था आन्तरिक संकट, तनाव अथवा वर्चस्व की होड़ से गुज़रती है, तो वह अपनी आंतरिक हिंसा को एकीकृत करके किसी एक निहत्थे और असुरक्षित लक्ष्य पर केंद्रित कर देती है।
कविता की इन पंक्तियों—‘टूटा हुआ पहिया’, ‘फूटा कवच’ और ‘क्षत-विक्षत देह’—में अभिमन्यु का शरीर उसी व्यवस्था-प्रायोजित हिंसा का शिकार बनता है। गिरार के चिंतन के आलोक में, चक्रव्यूह में अकेला पड़ा अभिमन्यु का यह घायल शरीर कोई साधारण योद्धा नहीं, बल्कि उस संस्थागत ‘बलि के बकरे’ (Scapegoat) का प्रतीक है, जिस पर पूरी सत्ता-संरचना (संगठित शक्ति) टूट पड़ती है। व्यवस्था अपने नियमों का उल्लंघन करके भी इस सामूहिक हिंसा को धर्म, न्याय या युद्ध-नीति का छद्म आवरण पहनाकर वैध (Legitimize) ठहराती है, ताकि स्वयं को निष्कलंक दिखाते हुए अपने आधिपत्य को बनाए रख सके।
अभिमन्यु अब एक सम्पूर्ण सैन्य शक्ति नहीं है; वह घायल, असुरक्षित और लगभग अकेला शरीर है। दूसरी ओर उसके चारों ओर संगठित शक्ति है। यह संरचना उस प्रक्रिया की याद दिलाती है जिसमें सामूहिक हिंसा किसी एक लक्ष्य पर केन्द्रित होकर स्वयं को वैध ठहराती है।
बावजूद इसके अभिमन्यु को साधारण अर्थ में ‘बलि का बकरा’ कहना पर्याप्त नहीं होगा। गिरार के सिद्धान्त में बलि का बकरा सामान्यतः समुदाय के भीतर की हिंसा और तनाव को अपने ऊपर खींच लेता है, और उसके निष्कासन या विनाश के बाद समुदाय को अस्थायी शान्ति मिलती है। अभिमन्यु का प्रसंग एक युद्धरत समाज के भीतर घटित होता है। इसलिए यहाँ गिरार की अवधारणा को यांत्रिक रूप से लागू करने के बजाय यह देखना अधिक उपयोगी होगा कि कविता सामूहिक हिंसा की उस मानसिक संरचना को कैसे उजागर करती है जिसमें अनेक लोग एक व्यक्ति के विरुद्ध अपनी हिंसा को नैतिक रूप से वैध समझने लगते हैं।
इस सन्दर्भ में ‘छल के लिए उद्यत व्यूह-रक्षक वीर-कायर हैं’ निर्णायक पंक्ति है। यदि अनेक योद्धा एक अकेले योद्धा के विरुद्ध संगठित होते हैं और फिर भी स्वयं को ‘वीर’ मानते हैं, तो सामूहिक हिंसा ने नैतिक आत्म-समीक्षा की आवश्यकता को दबा दिया है। सामूहिकता व्यक्ति को यह विश्वास दिला सकती है कि उसकी अपनी हिंसा दोषपूर्ण नहीं है, क्योंकि वही हिंसा अनेक लोग मिलकर कर रहे हैं। इस तरह सामूहिक सहभागिता हिंसा को सामान्य बना सकती है।
गिरार की अवधारणा में ‘एक के विरुद्ध अनेक’ की संरचना इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि उसमें हिंसा की जिम्मेदारी व्यक्तिगत नहीं रहती। जब अनेक व्यक्ति किसी एक लक्ष्य पर हिंसा करते हैं, तो प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को सामूहिकता में बाँट सकता है। ‘मैंने नहीं, हमने किया’ जैसी मानसिक संरचना हिंसा के नैतिक बोझ को कम कर सकती है। ‘चक्रव्यूह’ का व्यूह इसी सामूहिक उत्तरदायित्व के प्रश्न को तीखा बनाता है।
लेकिन कविता इस सामूहिकता को गौरव में बदलने से रोकती है। वह व्यूह-रक्षकों को ‘वीर-कायर’ कहती है। इस पद में सामूहिक हिंसा की नैतिक विडम्बना पकड़ी गई है। समूह में शामिल होना साहस का प्रमाण नहीं है। यदि समूह की शक्ति किसी एक असुरक्षित व्यक्ति के विरुद्ध केन्द्रित हो जाए, तो संख्या नैतिकता का प्रमाण नहीं बनती।
गिरार की दृष्टि से ‘निष्पाप’ शब्द और भी अर्थपूर्ण हो जाता है—‘वह जीव हूँ निष्पाप/जिसको पूज कर मारा गया’। ‘निष्पाप’ यहाँ केवल व्यक्तिगत निर्दोषता नहीं है। यह उस प्रक्रिया को चुनौती देता है जिसमें बलि के लक्ष्य को पहले किसी संकट या संघर्ष का प्रतीक बनाया जाता है और फिर उसकी हत्या को उचित ठहराया जाता है। यदि वह वास्तव में ‘निष्पाप’ है, तो सामूहिक हिंसा के लिए कोई वैध नैतिक कारण शेष नहीं रहता। तब हिंसा अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई देने लगती है।
यहीं ‘पूज कर मारा गया’ का विरोधाभास गिरार के बलि-तंत्र से जुड़ता है। गिरार के यहाँ बलि का शिकार व्यक्ति सामूहिक हिंसा का लक्ष्य बनने के बाद विचित्र विरोधाभास के साथ पवित्र भी हो सकता है। समुदाय उसके माध्यम से अपने संकट से बाहर निकलता है और बाद में उसी बलि को पवित्र अर्थ दे सकता है। इस प्रकार पीड़ित व्यक्ति एक साथ अपराधी और पवित्र, दोषी और पूजनीय बनाया जा सकता है।
कुँवर नारायण की पंक्ति इसी विरोधाभास को अत्यन्त संक्षिप्त रूप में पकड़ती है—‘पूज कर मारा गया’। यह केवल स्मृति की विडम्बना नहीं है; यह बलि की सांस्कृतिक राजनीति की ओर संकेत करता है। जिस व्यक्ति की मृत्यु के लिए सामूहिक हिंसा जिम्मेदार है, उसी व्यक्ति को बाद में पूजनीय बनाकर समुदाय अपने हिंसक कर्म को नैतिक अर्थ दे सकता है।
इससे ‘बलिदान’ शब्द का भी पुनर्पाठ सम्भव होता है। सामान्यतः बलिदान में स्वेच्छा, उच्च उद्देश्य और नैतिक गरिमा का भाव जुड़ा होता है। लेकिन यदि किसी व्यक्ति को सामूहिक हिंसा के माध्यम से मारा गया और बाद में उसकी मृत्यु को ‘बलिदान’ कहा गया, तो यह शब्द हत्या की वास्तविकता को ढँक सकता है। कविता इसीलिए ‘बलिदान’ को सरल गौरव के रूप में नहीं स्वीकारती। वह कहती है—‘मैं बलिदान इस संघर्ष में / कटु व्यंग्य हूँ उस तर्क पर / जो ज़िंदगी के नाम पर हारा गया।’ यहाँ ‘बलिदान’ स्वयं आलोचना का विषय बन जाता है।
गिरार के संदर्भ में ‘बलिदान’ को एक सामाजिक कार्य के रूप में पढ़ा जा सकता है। बलि की कथा समुदाय को अपनी हिंसा को किसी उच्चतर उद्देश्य से जोड़ने का अवसर देती है। व्यक्ति की मृत्यु को पवित्र बनाकर सामूहिक हिंसा को अर्थपूर्ण बनाया जाता है। लेकिन कविता उस प्रक्रिया में छिपे नैतिक विरोधाभास को उजागर करती है। यदि ‘ज़िंदगी के नाम पर’ कोई निर्दोष जीवन नष्ट होता है, तो बलिदान की भाषा उस मृत्यु को समझने के बजाय उसे वैध ठहरा सकती है।
‘रक्त की विरुदावली’ और ‘जिसको पूज कर मारा गया’ के बीच भी एक गहरा सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। गिरार के अनुसार बलि-तंत्र केवल हिंसा की घटना नहीं है; वह उसके बाद बनने वाली सामूहिक कथा से भी जुड़ा है। समुदाय अपनी हिंसा को एक पवित्र कथा में रूपान्तरित कर सकता है। कुँवर नारायण की कविता में रक्त की ‘विरुदावली’ इसी सांस्कृतिक रूपान्तरण का संकेत बन सकती है।
लेकिन कविता इस मिथकीकरण को स्वीकार नहीं करती। वह रक्त को फिर से पीड़ा के रूप में प्रस्तुत करती है—‘वह शीश जिसका रक्त सदियों तक बहा,/वह दर्द जिसको बेगुनाहों ने सहा।’ यहाँ ‘रक्त’ फिर से ‘विरुदावली’ के बाहर आ जाता है। वह गौरव का प्रतीक नहीं, दर्द का अनुभव बन जाता है। इस प्रकार कविता बलि-तंत्र की उस प्रक्रिया को तोड़ती है जिसमें हिंसा को पवित्र अर्थ देकर उसकी वास्तविकता से दूरी बनाई जाती है।
गिरार के सिद्धान्त का एक और पक्ष ‘पवित्रीकरण’ (Sacralisation) है। सामूहिक हिंसा के बाद बलि का शिकार व्यक्ति या घटना धार्मिक या पवित्र अर्थ ग्रहण कर सकती है। यह पवित्रीकरण समुदाय को यह विश्वास दिला सकता है कि हिंसा किसी आवश्यक या उच्चतर उद्देश्य का हिस्सा थी। ‘पूज कर मारा गया’ में ‘पूजा’ इसी paradox को पकड़ती है। हत्या और पवित्रता एक ही संरचना में आ जाती हैं।
कविता इस विरोधाभास को हल नहीं करती; वह उसे खुला रखती है। यही उसकी नैतिक शक्ति है। वह पाठक को यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि किसी मृत व्यक्ति की पूजा करना और उसकी मृत्यु की सामाजिक परिस्थितियों पर प्रश्न करना दो अलग बातें हैं। यदि पूजा प्रश्न को रोक देती है, तो वह स्मृति का नैतिक रूप नहीं रह जाती; वह हिंसा की सांस्कृतिक निरन्तरता बन सकती है।
गिरार की ‘अनुकरणात्मक इच्छा’ को कविता की ‘विजय’ की अवधारणा से भी जोड़ा जा सकता है। युद्ध में प्रत्येक पक्ष दूसरे की शक्ति, प्रतिष्ठा और विजय की आकांक्षा का अनुकरण करता है। शत्रु की विजय स्वयं हमारे लिए उसकी शक्ति का प्रमाण बनती है और इसलिए उसे हराना आवश्यक हो जाता है। इस तरह विरोधी एक-दूसरे की इच्छाओं और व्यवहारों को बढ़ाते हैं। प्रतिद्वंद्विता बढ़ती जाती है और अन्ततः हिंसा स्वयं उद्देश्य बन सकती है।
‘क्रमशः लक्ष्य तक बढ़ता हुआ जयनाद’ में ‘लक्ष्य’ और ‘जयनाद’ को इस पृष्ठभूमि में पढ़ा जा सकता है। युद्ध की भाषा में लक्ष्य केवल किसी सैन्य उपलब्धि का नाम नहीं है; वह विजय की सामूहिक इच्छा का केन्द्र है। जब विजय सामूहिक प्रतिष्ठा से जुड़ जाती है, तब व्यक्ति की मृत्यु उस लक्ष्य के सामने गौण हो सकती है।
इसीलिए कविता ‘ज़िंदगी के नाम पर’ की भाषा को चुनौती देती है। युद्ध का लक्ष्य यदि जीवन की रक्षा बताया जाता है, तो उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया में जीवन का नष्ट होना विरोधाभास पैदा करता है। गिरार के यहाँ हिंसा की नकल हिंसा को बढ़ाती है; कुँवर नारायण के यहाँ युद्ध का ‘जयनाद’ उस हिंसा की मानवीय कीमत को ढँकने का काम करता दिखाई देता है।
‘व्यूह’ स्वयं गिरार की दृष्टि से एक सामूहिक संरचना है। व्यक्ति अकेला नहीं है; वह सामूहिक हिंसा के बीच है। लेकिन अभिमन्यु की स्थिति उसे भीड़ से अलग करती है। वह सामूहिक हिंसा का लक्ष्य बनता है और उसी कारण कविता का नैतिक केन्द्र बन जाता है। यहाँ एक दिलचस्प उलटाव होता है—समूह संख्या में शक्तिशाली है, लेकिन नैतिक दृष्टि से अभिमन्यु की अकेली देह अधिक प्रभावशाली हो जाती है।
यह उलटाव गिरार के बलि-तंत्र की आलोचनात्मक सम्भावना को भी खोलता है। समुदाय जिस व्यक्ति को अपने संकट के समाधान के रूप में नष्ट करता है, वही व्यक्ति बाद में उस समुदाय की हिंसा का प्रतीक बन सकता है। अभिमन्यु की मृत्यु से युद्ध की समस्या समाप्त नहीं होती। बल्कि उसकी स्मृति आने वाली पीढ़ियों के सामने एक प्रश्न बनकर उपस्थित होती है। इस अर्थ में बलि स्थायी समाधान नहीं देती; वह केवल अस्थायी व्यवस्था उत्पन्न करती है।
कविता का ‘युग-युग से चला आता महाभारत’ इसी असफलता को रेखांकित करता है। यदि बलि-तंत्र वास्तव में संकट का स्थायी समाधान होता, तो इतिहास में हिंसा बार-बार क्यों लौटती? अभिमन्यु मारा जाता है, उसकी कथा सुनाई जाती है, उसकी पूजा होती है, लेकिन ‘महाभारत’ समाप्त नहीं होता। इस पुनरावृत्ति से स्पष्ट होता है कि बलि के माध्यम से हिंसा को समाप्त करने का दावा स्वयं एक भ्रम हो सकता है।
इस बिन्दु पर गिरार की अवधारणा और कविता का इतिहास-दर्शन एक-दूसरे से जुड़ते हैं। सामूहिक हिंसा किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराकर संकट को सरल बना सकती है, लेकिन वह हिंसा की मूल संरचनाओं को समाप्त नहीं करती। परिणामतः इतिहास नए रूपों में उसी संरचना को दोहरा सकता है। ‘हज़ारों युद्ध’ इसी पुनरावृत्ति का संकेत है।
कविता में अभिमन्यु इसलिए केवल एक पीड़ित व्यक्ति नहीं, बल्कि हिंसा के पुनरुत्पादन की स्मृति भी है। उसका रक्त ‘सदियों तक’ बहता है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि बलि के बाद भी हिंसा समाप्त नहीं होती; उसका नैतिक ऋण और उसकी स्मृति इतिहास में बनी रहती है।
गिरार की दृष्टि से यह भी पूछा जा सकता है कि समुदाय को बलि के लिए व्यक्ति कैसे मिलता है। बलि का शिकार अक्सर ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो समुदाय के भीतर या उसकी सीमा पर ऐसी स्थिति में हो कि उसे आसानी से अलग किया जा सके। अभिमन्यु की युवा आयु, उसकी अपेक्षाकृत अकेली स्थिति और व्यूह के भीतर उसका अलग पड़ जाना उसे इस संरचना के लिए उपयुक्त बनाते हैं। वह सामूहिक शक्ति के बीच एक अकेली दृश्य आकृति बन जाता है।
लेकिन कविता उसे कमजोर पहचान तक सीमित नहीं करती। ‘अजित अभिमन्यु’ कहकर वह उसकी नैतिक शक्ति को पुनर्स्थापित करती है। इस प्रकार बलि का शिकार व्यक्ति अपनी हत्या के बाद भी केवल पीड़ित नहीं रहता; वह उस हिंसा को देखने की दृष्टि बन जाता है जिसने उसे नष्ट किया।
यही ‘अजित’ शब्द गिरार के संदर्भ में विशेष अर्थ रखता है। सामूहिक हिंसा का उद्देश्य किसी लक्ष्य को समाप्त करना होता है, लेकिन यदि वह लक्ष्य स्मृति में जीवित रहता है और हिंसा की नैतिक आलोचना का आधार बन जाता है, तो उसका पूर्ण विनाश सम्भव नहीं होता। अभिमन्यु की देह नष्ट होती है, लेकिन उसका अनुभव इतिहास में प्रश्न बनकर लौटता रहता है।
‘उसी इतिहास की स्मृति’ इसलिए केवल अतीत का पुनर्स्मरण नहीं है। वह बलि के शिकार की वापसी है। जिस व्यक्ति को सामूहिक हिंसा ने समाप्त करना चाहा था, वह स्मृति में वापस आता है और पूछता है—मैं कौन हूँ? मुझे क्यों मारा गया? मेरी मृत्यु को किस अर्थ में याद किया गया? यही स्मृति बलि-तंत्र की नैतिक स्थिरता को चुनौती देती है।
यहाँ कविता और गिरार के बीच एक महत्त्वपूर्ण तनाव भी है। गिरार का सिद्धान्त सामूहिक हिंसा की संरचना को समझने में शक्तिशाली है, लेकिन ‘चक्रव्यूह’ को केवल ‘बलि का बकरा’ सिद्धान्त तक सीमित कर देना कविता की जटिलता को कम कर देगा। अभिमन्यु किसी समुदाय के आन्तरिक संकट को समाप्त करने के लिए चुना गया व्यक्ति मात्र नहीं है। वह युद्धरत राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा भी है। इसलिए गिरार की अवधारणा को यहाँ एक व्याख्यात्मक उपकरण के रूप में उपयोग करना अधिक उचित होगा, न कि कविता की सम्पूर्ण व्याख्या के रूप में।
कविता की विशिष्टता इस बात में है कि वह बलि और युद्ध को एक व्यापक नैतिक संरचना से जोड़ती है। अभिमन्यु की हत्या केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं है; वह उस संस्कृति की विफलता का प्रमाण है जो वीरता और न्याय की भाषा में हिंसा को स्वीकार कर सकती है। इसीलिए ‘कटु व्यंग्य’ शब्द इतना महत्त्वपूर्ण है। अभिमन्यु स्वयं उस विचारधारा पर व्यंग्य बन जाता है जो जीवन की रक्षा के नाम पर जीवन का विनाश करती है।
गिरार की दृष्टि से ‘पूज कर मारा गया’ का विरोधाभास और ‘कटु व्यंग्य’ का प्रयोग एक-दूसरे को प्रकाशित करते हैं। जिस व्यक्ति की बलि देकर समुदाय अपनी व्यवस्था को स्थिर करता है, उसी व्यक्ति को बाद में पूजना उस सामूहिक हिंसा को पवित्र बनाता है। लेकिन कविता उस पवित्रीकरण के भीतर छिपे अपराध-बोध और विरोधाभास को उजागर करती है।
यहाँ ‘पवित्र’ और ‘हिंसक’ के बीच की सीमा धुँधली होती है। जिस व्यक्ति को पूजनीय बनाया गया, उसे मारने वाली व्यवस्था स्वयं को नैतिक कैसे समझती है? कविता का प्रश्न यही है। वह पवित्रता को हिंसा से अलग नहीं करती; वह दिखाती है कि कभी-कभी पवित्रता की भाषा हिंसा को वैध बनाने का माध्यम बन सकती है।
‘मृत्यु के निष्पक्ष, समयातीत घेरे’ की अन्तिम छवि इस पूरे गिरारवादी पाठ को एक और गहराई देती है। सामूहिक हिंसा किसी व्यक्ति को ‘हम’ और ‘वे’ के बीच बाँटती है। मृत्यु इन विभाजनों को अन्ततः निरस्त कर देती है। मृत्यु के सामने व्यूह-रक्षक और अभिमन्यु, विजेता और पराजित, पक्ष और विपक्ष—सभी मनुष्य हैं। अभिमन्यु ‘घिरे अस्तित्व का हर पक्ष’ पहचानता है। यह पहचान उस सामूहिक द्वंद्व से आगे जाने की सम्भावना खोलती है जिसमें मनुष्य एक-दूसरे को केवल प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखते हैं।
इस प्रकार गिरार की दृष्टि से कविता का नैतिक प्रतिपक्ष केवल युद्ध नहीं, बल्कि वह सामूहिक मनोविज्ञान है जो हिंसा को किसी एक व्यक्ति पर केन्द्रित करके स्वयं को निर्दोष समझने लगता है। अभिमन्यु की मृत्यु उस निर्दोषता के दावे को असम्भव बनाती है। उसकी देह सामूहिक हिंसा का प्रमाण है और उसकी स्मृति उस हिंसा की पुनरावृत्ति के विरुद्ध चेतावनी।
अन्ततः ‘चक्रव्यूह’ में अभिमन्यु को गिरार के ‘बलि-तंत्र’ की रोशनी में पढ़ना कविता को एक ऐसे विमर्श में ले जाता है जहाँ युद्ध, सामूहिकता, पवित्रता, हिंसा और स्मृति एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। ‘रक्त की विरुदावली’ हिंसा को गौरव में बदलने वाली सांस्कृतिक प्रक्रिया है; ‘लोरियों’ में उसका प्रवेश पीढ़ीगत पुनरुत्पादन का संकेत है; ‘व्यूह’ सामूहिक हिंसा की संगठित संरचना है; ‘निष्पाप’ अभिमन्यु उस हिंसा के नैतिक औचित्य को चुनौती देता है; ‘पूज कर मारा गया’ बलि और पवित्रीकरण के विरोधाभास को उद्घाटित करता है; और ‘सदियों तक बहता रक्त’ बताता है कि बलि के बाद भी हिंसा का प्रश्न समाप्त नहीं होता।
इस अर्थ में अभिमन्यु की मृत्यु किसी सामूहिक संकट का समाधान नहीं बनती; वह स्वयं उस संकट की स्मृति बन जाती है। उसे मारकर व्यवस्था क्षणिक रूप से अपनी शक्ति सिद्ध कर सकती है, लेकिन कविता उस मृत्यु को वापस इतिहास में ले आती है और उससे प्रश्न करवाती है। इसीलिए अभिमन्यु ‘बलि का बकरा’ होकर भी केवल बलि का शिकार नहीं रह जाता। वह उस सामाजिक तंत्र का साक्षी बन जाता है जिसने बलि को आवश्यक समझा था। उसकी आवाज़ उस तंत्र की नैतिक विफलता को उजागर करती है।
कुँवर नारायण की ‘चक्रव्यूह’ की शक्ति यहीं है कि वह अभिमन्यु की मृत्यु को महिमामंडित करके समाप्त नहीं होती। वह पूछती है कि ऐसी मृत्यु की आवश्यकता क्यों पैदा हुई, किस सामूहिक तर्क ने उसे उचित बनाया, किस सांस्कृतिक भाषा ने उसे गौरव में बदला और क्यों इतिहास बार-बार उसी संरचना में लौटता रहा। रेने गिरार के आलोक में यह कविता इसलिए सामूहिक हिंसा की आलोचना बनती है—ऐसी हिंसा की, जो अपने लिए एक लक्ष्य चुनती है, उसे दोष और संकट का केन्द्र बनाती है, उसकी हत्या को पवित्र अर्थ देती है और फिर भी अपनी मूल प्रतिद्वंद्विताओं को समाप्त नहीं कर पाती। अभिमन्यु की स्मृति इस चक्र को तोड़ने वाली नैतिक चेतना बन जाती है। वह पूछती है कि किसी समुदाय की एकता यदि किसी निष्पाप जीवन की बलि पर आधारित है, तो ऐसी एकता की कीमत क्या है और उसकी नैतिक वैधता कहाँ तक स्वीकार की जा सकती है। ‘चक्रव्यूह’ का अभिमन्यु इसी प्रश्न का जीवित, घायल और अन्ततः समयातीत प्रतीक है।
जूडिथ बटलर (Judith Butler) की ‘असुरक्षित जीवन’ (Precarious Life) और “मृत्यु पर शोक की सामाजिक मान्यता”(Grievability) की अवधारणाओं के आलोक में कुँवर नारायण की ‘चक्रव्यूह’ का पाठ कविता के युद्ध-विरोधी और नैतिक आयाम को एक अलग दिशा में खोलता है। इस दृष्टि से प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि अभिमन्यु क्यों मारा गया, किसने उसे मारा या उसकी मृत्यु किस युद्ध का परिणाम थी; प्रश्न यह बन जाता है कि किसी समाज में किन जीवनों को ऐसा जीवन माना जाता है जिसकी मृत्यु को वास्तविक क्षति समझा जाए, किस मृत्यु पर सार्वजनिक शोक सम्भव हो और किन मनुष्यों की मृत्यु को युद्ध, इतिहास, धर्म, राष्ट्र, कर्तव्य या विजय की भाषा में इस तरह समाहित कर दिया जाए कि उनकी व्यक्तिगत पीड़ा दिखाई ही न दे। ‘चक्रव्यूह’ इसी असमान नैतिक मान्यता को उजागर करने वाली कविता के रूप में पढ़ी जा सकती है।
बटलर के यहाँ ‘असुरक्षित जीवन’ का आशय केवल इस तथ्य से नहीं है कि हर मनुष्य मर सकता है। जीवन की असुरक्षा सामाजिक और राजनीतिक रूप से असमान रूप से वितरित होती है। कुछ जीवनों को संरक्षित करने के लिए संस्थाएँ, कानून, नैतिकता और सामूहिक संवेदना सक्रिय होती हैं, जबकि कुछ जीवन ऐसे बनाए जाते हैं जिनकी असुरक्षा सामान्य या स्वीकार्य मान ली जाती है। इसीलिए किसी मनुष्य का जीवित होना और उसका सामाजिक रूप से ‘जीने योग्य’ या ‘शोक के योग्य’ माना जाना एक ही बात नहीं है। बटलर का प्रश्न इसी अन्तर को उजागर करता है।
‘चक्रव्यूह’ में यह अन्तर अभिमन्यु के शरीर और उसकी सांस्कृतिक छवि के बीच दिखाई देता है। कविता एक ओर उसे ‘अजित अभिमन्यु’ के रूप में स्थापित करती है, दूसरी ओर उसकी देह को ‘सारी देह क्षत-विक्षत’ और ‘लथपथ लाश’ के रूप में प्रस्तुत करती है। इन दोनों छवियों के बीच तनाव इस बात को खोलता है कि समाज किसी व्यक्ति को किस तरह प्रतीक में बदल सकता है और उस प्रतीकीकरण में उसकी वास्तविक देह और पीड़ा कैसे छिप सकती है।
कविता की आरम्भिक पंक्तियाँ इस संदर्भ में निर्णायक हैं—
‘युद्ध की प्रतिध्वनि जगाकर
जो हज़ारों बार दुहराई गई,
रक्त की विरुदावली कुछ और रँगकर
लोरियों के संग जो गाई गई—’
यदि बटलर की दृष्टि से इसे पढ़ें, तो यहाँ केवल युद्ध की स्मृति नहीं बन रही; जीवन और मृत्यु के मूल्य की एक सामाजिक व्यवस्था भी निर्मित हो रही है। ‘रक्त की विरुदावली’ किसी मृत शरीर को उसके व्यक्तिगत जीवन से हटाकर एक सामूहिक गौरव-कथा का हिस्सा बना देती है। रक्त अब किसी व्यक्ति का रक्त नहीं रहता; वह वीरता, बलिदान और ऐतिहासिक यश का प्रतीक बन जाता है।
इस रूपान्तरण में व्यक्ति की विशिष्टता दब सकती है। उसका नाम, उसका भय, उसकी आकांक्षाएँ, उसका भविष्य और उसके सम्बन्ध—सब युद्ध की महान कथा के भीतर गौण हो जाते हैं। बटलर की दृष्टि से यही वह बिन्दु है जहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या उस व्यक्ति की मृत्यु को वास्तव में ‘हानि’ के रूप में देखा गया या उसे केवल किसी बड़े ऐतिहासिक उद्देश्य की कीमत मान लिया गया।
‘जिसको पूज कर मारा गया’ इस पूरी समस्या को एक तीखे विरोधाभास में बदल देता है। पूजा और हत्या एक ही वाक्य में आ जाती हैं। किसी व्यक्ति को मारने के बाद उसे पूजनीय बना देना यह सुनिश्चित नहीं करता कि उसकी वास्तविक पीड़ा समझी गई है। कभी-कभी पूजनीयता स्वयं उस हिंसा को ढँक सकती है जिसने उसे मारा। मृत व्यक्ति को महान प्रतीक में बदल देना और उसके जीवन की नश्वरता, असुरक्षा और व्यक्तिगत अनुभव को स्वीकार करना दो अलग प्रक्रियाएँ हैं।
बटलर की “मृत्यु पर शोक की सामाजिक मान्यता”(Grievability) की अवधारणा इसी अन्तर को समझने में सहायता करती है। कोई जीवन तभी पूरी तरह सामाजिक जीवन के रूप में मान्यता प्राप्त करता है जब उसकी मृत्यु को ऐसी क्षति माना जाए जिसकी भरपाई सम्भव नहीं है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु को केवल युद्ध की स्वाभाविक कीमत, सामूहिक उद्देश्य की आवश्यकता या इतिहास की अनिवार्यता मान लिया जाए, तो वह जीवन सामाजिक रूप से कम शोकयोग्य बना दिया जाता है।
‘चक्रव्यूह’ का अभिमन्यु इस व्यवस्था के भीतर एक जटिल स्थिति में है। वह पूजनीय भी है और मारा जाने योग्य भी। वह वीर भी है और युद्ध की हिंसा का शरीर भी। उसका सम्मान किया जाता है, लेकिन उसकी हत्या पर प्रश्न नहीं किया जाता। इसी विरोधाभास में कविता की नैतिक तीव्रता है।
इस कविता की एक उल्लेखनीय पंक्ति— ‘वह जीव हूँ निष्पाप/जिसको पूज कर मारा गया’— में ‘निष्पाप’ शब्द सिर्फ़ चरित्र की निर्दोषता का संकेत नहीं है। यह उस नैतिक असमानता पर प्रश्न है जिसमें कुछ जीवनों की मृत्यु को स्वाभाविक मान लिया जाता है। यदि अभिमन्यु ‘निष्पाप’ है, तो उसकी हत्या के लिए किस प्रकार का नैतिक औचित्य प्रस्तुत किया जा सकता है? यदि कोई उत्तर ‘युद्ध’ है, तो कविता पूछती है कि क्या ‘युद्ध’ अपने आप में हत्या को नैतिक बना देता है।
बटलर की दृष्टि से यहाँ ‘जीवन की असमान मान्यता’ का सवाल उठता है। युद्ध के समय राजनीतिक समुदाय अपने और दूसरे के जीवन का मूल्य समान रूप से नहीं देखता। ‘हमारे’ लोगों की मृत्यु शोक, स्मारक और राष्ट्रीय स्मृति का विषय बन सकती है, जबकि ‘दूसरे’ की मृत्यु आँकड़े, क्षति या सैन्य उपलब्धि बन सकती है। कविता इस विभाजन को चुनौती देती है क्योंकि अभिमन्यु का ‘मैं’ अपने पक्ष से बाहर जाकर भी मानवीय पीड़ा की भाषा बन जाता है।
इसी प्रकार ‘वह शीश जिसका रक्त सदियों तक बहा,/वह दर्द जिसको बेगुनाहों ने सहा।’ —में ‘बेगुनाहों’ का बहुवचन कविता को एक व्यक्ति से आगे ले जाता है। अभिमन्यु अब केवल एक पौराणिक पात्र नहीं रह जाता; वह उन असंख्य जीवनों का प्रतिनिधि बन जाता है जिन्हें युद्ध ने ऐसी स्थिति में पहुँचा दिया जहाँ उनकी मृत्यु को किसी बड़े उद्देश्य की भाषा में सामान्य बना दिया गया। ‘सदियों तक’ का विस्तार यह संकेत देता है कि शोक की समस्या केवल एक ऐतिहासिक घटना तक सीमित नहीं है। युद्ध बदलते हैं, लेकिन जीवन की असमान मान्यता की संरचनाएँ दोहराई जा सकती हैं।
इस दृष्टि से कविता का ‘इतिहास’ भी पुनर्पाठ माँगता है। इतिहास प्रायः युद्धों को सेनापतियों, राजाओं, विजय और पराजय की दृष्टि से दर्ज करता है। लेकिन बटलर का प्रश्न हमें इतिहास के उस हिस्से की ओर ले जाता है जहाँ यह पूछा जाए कि उन युद्धों में मरने वालों के जीवन का मूल्य कैसे निर्धारित किया गया। कौन-सी मृत्यु को वीरता मिली और कौन-सी मृत्यु को केवल संख्या में बदल दिया गया?
‘हज़ारों युद्ध, उपदेशों, उपाख्यानों, कथाओं में/छिपा वह पृष्ठ मेरा है’—में ‘छिपे हुए पृष्ठ’ को शोक-योग्य जीवन की मान्यता के दृष्टिकोण से पढ़ना विशेष रूप से फलदायी है। यदि कोई जीवन इतिहास के मुख्य आख्यान से बाहर है, तो उसकी मृत्यु भी सार्वजनिक स्मृति के बाहर जा सकती है। कविता उस छिपे हुए पृष्ठ को सामने लाती है। इस अर्थ में काव्य स्वयं एक स्मृति-न्याय (Memory Justice) की प्रक्रिया बन जाता है।
कविता का ‘मेरा’ यहाँ विशेष महत्त्व रखता है। इतिहास का विशाल आख्यान अभिमन्यु को एक पात्र, योद्धा या शहीद के रूप में पहचान सकता है; लेकिन ‘मेरा’ उसके निजी अनुभव को पुनः स्थापित करता है। वह कहता है कि उस इतिहास में मेरा भी एक पृष्ठ है—मेरा शरीर, मेरा दर्द, मेरी मृत्यु और मेरा अनुभव। यह निजी स्वर युद्ध की सामूहिक भाषा के सामने एक वैकल्पिक नैतिक आवाज़ बन जाता है।
बटलर के लिए शरीर का प्रश्न भी केंद्रीय है। शरीर केवल निजी अस्तित्व नहीं है; वह सामाजिक और राजनीतिक सम्बन्धों में स्थित होता है। शरीर निर्भर है, असुरक्षित है और दूसरे मनुष्यों तथा सामाजिक संरचनाओं से जुड़ा है। इसीलिए ‘देह’ की असुरक्षा केवल व्यक्तिगत कमजोरी नहीं होती; वह राजनीतिक परिस्थितियों से निर्मित भी हो सकती है।
‘बदन पर एक फूटा कवच,/सारी देह क्षत-विक्षत’—इन पंक्तियों में युद्ध की राजनीति शरीर पर दिखाई देती है। कवि युद्ध को किसी अमूर्त ‘महासंग्राम’ के रूप में छोड़ नहीं देता। वह उसे शरीर पर लिखता है। कवच का फूटना उस सुरक्षा-व्यवस्था के विफल होने का बिम्ब है जो शरीर को बचाने के लिए बनाई गई थी। जब कवच टूटता है, तो मनुष्य की असुरक्षा प्रत्यक्ष हो जाती है।
यहाँ ‘कवच’ को राजनीतिक सुरक्षा के रूपक की तरह भी पढ़ा जा सकता है। कोई भी समाज अपने सदस्यों को सुरक्षा, अधिकार और संरक्षण देने का दावा कर सकता है, लेकिन युद्ध जैसी परिस्थितियाँ दिखाती हैं कि यह संरक्षण सभी के लिए समान नहीं होता। कुछ शरीर अधिक सुरक्षित होते हैं और कुछ शरीर पहले से ही जोखिम में रखे जाते हैं। बटलर का विमर्श इसी असमान असुरक्षा को समझने में मदद करता है।
‘मेरे हाथ में टूटा हुआ पहिया’ भी इस सन्दर्भ में केवल हथियार का बिम्ब नहीं है। वह सुरक्षा के साधनों की कमी का संकेत बन सकता है। अभिमन्यु के पास एक टूटा हुआ पहिया है, जबकि उसके चारों ओर संगठित शक्ति है। यह असमानता बताती है कि राजनीतिक हिंसा में सभी जीवन समान संसाधनों और सुरक्षा के साथ प्रवेश नहीं करते।
इस असमानता को ‘पूर्वनिर्धारित असुरक्षा’ (Differential Precarity) के रूप में समझा जा सकता है। कुछ मनुष्य ऐसी परिस्थितियों में रखे जाते हैं जहाँ उनके घायल होने, विस्थापित होने या मारे जाने की सम्भावना अधिक होती है। युद्ध इस असमानता को चरम रूप देता है। कविता का अभिमन्यु ऐसी ही असमान स्थिति में है—वह अकेला है, उसका कवच टूटा है और उसकी देह सामूहिक शक्ति के सामने खुली हुई है।
बटलर के यहाँ ‘जीवन’ को केवल जैविक अस्तित्व के रूप में नहीं देखा जाता। किसी जीवन को जीवन के रूप में पहचानने के लिए सामाजिक परिस्थितियाँ भी आवश्यक हैं। भोजन, आश्रय, सुरक्षा, सम्बन्ध, मान्यता और राजनीतिक संरक्षण—ये सभी जीवन की सम्भावना से जुड़े हैं। इसलिए ‘जीवन’ स्वयं सामाजिक रूप से निर्मित और संरक्षित होता है।
‘जो ज़िंदगी के नाम पर हारा गया’ में ‘ज़िंदगी’ शब्द इसी व्यापक अर्थ में पढ़ा जा सकता है। युद्ध अपने औचित्य के लिए जीवन की भाषा का उपयोग करता है, लेकिन उसी प्रक्रिया में जीवन को नष्ट करता है। यह विरोधाभास कविता की नैतिक संरचना को निर्धारित करता है। जीवन का नाम लेकर जीवन का विनाश करना उस राजनीतिक तर्क को प्रश्नांकित करता है जो कुछ जीवनों को बचाने के लिए कुछ अन्य जीवनों की मृत्यु को स्वीकार्य मान लेता है।
यहीं “मृत्यु पर शोक की सामाजिक मान्यता”का प्रश्न फिर सामने आता है। यदि युद्ध की नैतिक भाषा कुछ जीवनों को ‘बचाने योग्य’ और कुछ को ‘त्यागने योग्य’ मानती है, तो शोक भी असमान रूप से वितरित होगा। कुछ मृतकों के लिए स्मारक बनेंगे, गीत लिखे जाएँगे और उनकी वीरता का उत्सव होगा; अन्य मृतक केवल युद्ध की ‘क्षति’ बनकर रह जाएँगे। ‘चक्रव्यूह’ इस असमानता को एक सार्वभौमिक मानवीय प्रश्न में बदलती है।
कविता में ‘बेगुनाहों’ का प्रयोग इसीलिए महत्वपूर्ण है। ‘बेगुनाह’ व्यक्ति को किसी पक्षीय पहचान से मुक्त करता है। वह यह नहीं पूछता कि वह किस पक्ष से था; वह पूछता है कि उसने क्या अपराध किया था। इस प्रकार कविता ‘पक्ष’ की राजनीति के सामने ‘मानव जीवन’ की नैतिकता को रखती है।
‘जिन्होंने पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना’ को बटलर की दृष्टि से पढ़ने पर यह प्रश्न सामने आता है कि क्या किसी पक्ष की पहचान किसी मनुष्य के जीवन के मूल्य को निर्धारित कर सकती है। यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु केवल इसलिए कम शोकयोग्य हो जाए कि वह ‘दूसरे पक्ष’ का सदस्य है, तो राजनीतिक पहचान मानवीय पहचान पर हावी हो जाती है।
बटलर की अवधारणा यहाँ हमें ‘दूसरे’ की शोक-योग्य जीवन की मान्यता पर विचार करने के लिए बाध्य करती है। क्या हम उस व्यक्ति के लिए शोक कर सकते हैं जिसे हमारी राजनीतिक भाषा ‘शत्रु’ कहती है? यदि नहीं, तो क्या हमारा शोक नैतिक रूप से सार्वभौमिक है? ‘चक्रव्यूह’ अभिमन्यु की आवाज़ के माध्यम से इस सीमा को चुनौती देती है। उसका दर्द किसी एक पक्ष के भीतर सीमित नहीं रहता।
यही कारण है कि कविता का अन्त ‘मृत्यु के निष्पक्ष, समयातीत घेरे’ में होता है। ‘निष्पक्ष’ मृत्यु का अर्थ यह नहीं कि जीवन में सभी समान थे; बल्कि यह कि मृत्यु अन्ततः उन कृत्रिम विभाजनों को समाप्त कर देती है जिन्हें युद्ध ने निर्मित किया था। लेकिन कविता की नैतिक चुनौती यह है कि हमें उस समानता को मृत्यु के बाद नहीं, जीवन के दौरान पहचानना चाहिए।
यदि मृत्यु ही सभी को समान बनाती है, तो जीवन में असमान मान्यता क्यों? यही प्रश्न बटलर की दृष्टि से कविता का एक गहरा नैतिक प्रश्न बन जाता है।
अभिमन्यु की मृत्यु को इस प्रकार पढ़ने पर ‘शहादत’ का पारम्परिक अर्थ भी जटिल हो जाता है। शहीद की स्मृति सामान्यतः सम्मान और गौरव से जुड़ी होती है। लेकिन बटलर हमें यह पूछने की दिशा देती हैं कि सम्मान के साथ-साथ क्या शोक भी उपस्थित है? क्या मृत व्यक्ति को केवल वीर प्रतीक बना देने से उसकी नश्वरता और उसकी व्यक्तिगत पीड़ा का अनुभव गायब नहीं हो जाता?
‘जिसको पूज कर मारा गया’ इसी द्वंद्व को सामने रखता है। पूजा और शोक एक ही चीज़ नहीं हैं। पूजा मृत व्यक्ति को आदर्श प्रतीक में बदल सकती है; शोक उसकी अनुपस्थिति को स्वीकार करता है। पूजा में मृत्यु का महिमामंडन सम्भव है; शोक में मृत्यु की अपरिवर्तनीय क्षति का बोध अधिक तीव्र हो सकता है।
इसलिए कविता में ‘पूजा’ के बजाय ‘दर्द’ अधिक नैतिक श्रेणी बनकर उभरता है—‘वह दर्द जिसको बेगुनाहों ने सहा।’‘दर्द’ किसी विचारधारा का गौरवपूर्ण प्रतीक नहीं है। वह शरीर और अनुभव की वास्तविकता है। उसे किसी बड़े उद्देश्य में पूरी तरह समाहित नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि कविता की नैतिकता ‘दर्द’ को दृश्य और श्रव्य बनाने में निहित है।
इस दृष्टि से ‘चक्रव्यूह’ युद्ध की ‘दृश्य राजनीति’ की भी आलोचना करती है। युद्ध को अक्सर झंडे, सेनाएँ, शस्त्र, विजय और वीरता के दृश्य में प्रस्तुत किया जाता है। कविता उस दृश्य को बदल देती है। वह फूटा कवच, टूटा पहिया, क्षत-विक्षत देह और रक्त दिखाती है। अर्थात् वह युद्ध के आधिकारिक दृश्य के स्थान पर घायल शरीर का दृश्य रखती है।
यह परिवर्तन बटलर के ‘शोक-योग्य शरीर’ की अवधारणा से जोड़ा जा सकता है। किसी शरीर को शोक के योग्य बनाने के लिए पहले उसे दृश्य और मानवीय बनाना आवश्यक है। यदि शरीर केवल ‘शत्रु’ है, तो उसकी मृत्यु आसानी से अमूर्त हो सकती है। यदि वह ‘निष्पाप जीव’ है, तो उसकी मृत्यु नैतिक प्रश्न बन जाती है।
कविता अभिमन्यु को इसी प्रकार दृश्य बनाती है। वह कोई अमूर्त योद्धा नहीं; वह एक शरीर है, एक आवाज़ है, एक ‘मैं’ है। इसीलिए उसकी मृत्यु को केवल सैन्य घटना की तरह नहीं पढ़ा जा सकता।
‘मैं नवागत वह अजित अभिमन्यु हूँ’ में ‘मैं’ की उपस्थिति भी शोक-योग्य जीवन की मान्यता की राजनीति से जुड़ती है। युद्ध सामूहिक संज्ञाओं में बोलता है—सेना, पक्ष, शत्रु, विजय, पराजय। कविता व्यक्ति को ‘मैं’ कहने का अधिकार देती है। यह ‘मैं’ उसे भीड़ और संख्या से अलग करता है। वह कहता है कि मेरे पास अपना शरीर है, मेरा दर्द है और मेरी मृत्यु है।
यही ‘मैं’ युद्ध की अमानवीकरण प्रक्रिया के विरुद्ध खड़ा होता है। युद्ध में व्यक्ति को सैनिक, शत्रु या लक्ष्य में बदलना आसान है। कविता उसे फिर से मनुष्य बनाती है। यह मानवीकरण शोक-योग्य जीवन की मान्यता की पूर्वशर्त है।
लेकिन कविता केवल अभिमन्यु के लिए शोक नहीं करती। वह ‘बेगुनाहों’ के बहुवचन तक पहुँचती है। इस प्रकार निजी शोक सामूहिक नैतिकता में बदल जाता है। अभिमन्यु एक व्यक्ति है, लेकिन उसके भीतर अनेक जीवनों की असुरक्षा और मृत्यु की स्मृति समाहित हो जाती है।
‘सदियों तक बहता रक्त’ समय के साथ शोक की निरन्तरता का भी संकेत है। यदि किसी समाज में हिंसा की स्मृति बार-बार दबा दी जाती है, तो शोक पूरा नहीं हो पाता। मृतकों को गौरव में बदल दिया जाता है और उनके जीवन की वास्तविक हानि का सामना नहीं किया जाता। कविता उस अधूरे शोक को आवाज़ देती है।
यहाँ ‘इतिहास’ और ‘शोक’ का सम्बन्ध भी महत्त्वपूर्ण है। इतिहास यदि केवल विजय का अभिलेख है, तो वह शोक को सीमित करता है। लेकिन यदि इतिहास मृतकों की पीड़ा को भी दर्ज करता है, तो वह नैतिक स्मृति का रूप ग्रहण करता है। ‘छिपा वह पृष्ठ मेरा है’ इसी नैतिक इतिहास की माँग है।
बटलर के आलोक में यह भी पूछा जा सकता है कि कौन बोल सकता है और किसकी आवाज़ सुनी जाती है। कविता अभिमन्यु को स्वयं बोलने देती है। यह एक महत्त्वपूर्ण काव्यात्मक निर्णय है। यदि कवि केवल बाहर से अभिमन्यु के बारे में लिखते, तो अभिमन्यु फिर से एक वस्तु बन सकता था। ‘मैं’ के माध्यम से वह स्वयं अनुभव का विषय बनता है।
इस ‘मैं’ के भीतर व्यक्तिगत और सामूहिक का सम्बन्ध भी बदलता है। अभिमन्यु कहता है ‘मैं’, लेकिन उसकी आवाज़ ‘बेगुनाहों’ तक जाती है। इस तरह निजी देह सामूहिक पीड़ा की भाषा बन जाती है। बटलर के लिए भी असुरक्षा (vulnerability) केवल निजी अवस्था नहीं है; वह सामाजिक सम्बन्धों में निर्मित होती है। मनुष्य इसलिए असुरक्षित है क्योंकि वह दूसरों पर निर्भर है और उसकी रक्षा सामाजिक संस्थाओं पर निर्भर करती है।
‘चक्रव्यूह’ में यह निर्भरता टूटती दिखाई देती है। जिस सामाजिक व्यवस्था को जीवन की रक्षा करनी चाहिए, वही युद्ध की व्यवस्था में जीवन को खतरे में डाल देती है। कवच फूट जाता है, व्यूह घेर लेता है और सामूहिक शक्ति व्यक्ति के शरीर पर टूट पड़ती है। इस अर्थ में कविता सामाजिक संरक्षण की विफलता का भी आख्यान है।
अभिमन्यु की स्थिति यह प्रश्न उठाती है कि क्या किसी समाज का नैतिक मूल्यांकन केवल इस आधार पर किया जा सकता है कि वह अपने नायकों का सम्मान करता है। यदि वही समाज उन्हें ऐसी युद्ध-व्यवस्था में भेजता है जहाँ उनकी मृत्यु पहले से सम्भावित है, तो स्मारक और सम्मान क्या पर्याप्त हैं? कविता का उत्तर अप्रत्यक्ष है—सम्मान के साथ जीवन की रक्षा और मृत्यु की नैतिक समीक्षा भी आवश्यक है।
यहीं ‘बलिदान’ और ‘उत्तरदायित्व’ का सम्बन्ध सामने आता है। किसी मृत व्यक्ति को बलिदानी कह देना जीवित समाज को उसकी मृत्यु के लिए जिम्मेदारी से मुक्त नहीं करता। बल्कि यदि मृत्यु सामाजिक संरचनाओं का परिणाम है, तो उस मृत्यु को केवल वीरता के रूप में याद करना उस संरचना की आलोचना को रोक सकता है। ‘चक्रव्यूह’ इसी खतरे के प्रति सजग है।
इसलिए कविता का नैतिक आग्रह केवल शोक करने का आग्रह नहीं है; वह शोक की राजनीति पर प्रश्न करने का आग्रह है। किसके लिए शोक किया जाता है? किसकी मृत्यु स्मृति में रखी जाती है? किसकी मृत्यु को गौरव में बदल दिया जाता है? और किसकी मृत्यु को सामान्य युद्ध-क्षति कहकर भुला दिया जाता है? ये प्रश्न कविता को व्यापक राजनीतिक नैतिकता से जोड़ते हैं।
‘मृत्यु के निष्पक्ष, समयातीत घेरे’ में ‘निष्पक्षता’ को भी सावधानी से समझना चाहिए। मृत्यु स्वयं न्याय नहीं करती; वह केवल जीवन और मृत्यु के बीच अन्तिम सीमा बनाती है। वास्तविक न्याय का प्रश्न जीवन के भीतर है—जब मनुष्य जीवित है, तब उसके जीवन का मूल्य कैसे निर्धारित किया जाता है। बटलर की दृष्टि से कविता का नैतिक आग्रह इसी ओर लौटता है: जीवन को शोकयोग्य मानने की क्षमता जीवन के रहते विकसित होनी चाहिए।
अन्ततः जूडिथ बटलर की ‘असुरक्षित जीवन’ और “मृत्यु पर शोक की सामाजिक मान्यता”की अवधारणाओं के आलोक में ‘चक्रव्यूह’ अभिमन्यु की मृत्यु को एक व्यापक नैतिक और राजनीतिक प्रश्न में बदल देती है। ‘फूटा कवच’, ‘क्षत-विक्षत देह’, ‘लथपथ लाश’, ‘रक्त’, ‘शीश’ और ‘दर्द’ जैसे बिम्ब यह सुनिश्चित करते हैं कि युद्ध अमूर्त इतिहास न बन जाए। ‘निष्पाप’, ‘बेगुनाहों’ और ‘ज़िंदगी’ जैसे शब्द यह प्रश्न उठाते हैं कि किस जीवन को संरक्षण और शोक की पूर्ण मान्यता मिलती है। ‘विरुदावली’, ‘पूजा’, ‘बलिदान’ और ‘पक्ष’ जैसी संकल्पनाएँ दिखाती हैं कि सांस्कृतिक और राजनीतिक भाषा मृत्यु के अर्थ को कैसे बदल सकती है।
इस दृष्टि से अभिमन्यु की त्रासदी केवल यह नहीं है कि वह मारा गया। उसकी गहरी त्रासदी यह है कि उसकी मृत्यु को ऐसी महान कथा में समाहित किया जा सकता है जिसमें उसकी वास्तविक पीड़ा पीछे छूट जाए। कुँवर नारायण इसी सम्भावना का प्रतिरोध करते हैं। वे अभिमन्यु को केवल पूजनीय प्रतीक नहीं रहने देते; उसे घायल देह, बोलते हुए ‘मैं’ और शोकयोग्य जीवन के रूप में पुनः उपस्थित करते हैं। कविता इस प्रकार वीरगाथा के भीतर दबे हुए शोक को सामने लाती है और पूछती है कि क्या किसी मनुष्य को पहले मारकर फिर उसकी पूजा करना उसकी मृत्यु के नैतिक प्रश्न का उत्तर हो सकता है।
‘चक्रव्यूह’ का मानवीय आग्रह इसी बिन्दु पर सबसे व्यापक बनता है: किसी भी युद्ध, संघर्ष या सामूहिक उद्देश्य के नाम पर किसी जीवन को केवल साधन, आँकड़ा, क्षति या गौरवपूर्ण बलिदान में बदल देने से पहले यह स्वीकार करना आवश्यक है कि वह जीवन अपने आप में एक जीवन था—असुरक्षित, सम्बन्धों से जुड़ा हुआ, भविष्य की सम्भावनाओं से भरा हुआ और इसलिए उसकी मृत्यु वास्तविक क्षति थी। कविता अभिमन्यु के माध्यम से इसी मानवीय मान्यता को पुनः स्थापित करती है। उसके लिए शोक करना केवल अतीत के एक योद्धा को याद करना नहीं, बल्कि उन सभी जीवनों को शोक के योग्य मानना है जिन्हें इतिहास, युद्ध और सामूहिक राजनीति कभी-कभी अपने बड़े आख्यानों के नीचे दबा देती है। यही बिन्दु ‘चक्रव्यूह’ को युद्ध की कविता से आगे ले जाकर जीवन के असमान मूल्यांकन, शरीर की राजनीतिक असुरक्षा और शोक की नैतिक राजनीति पर एक गम्भीर काव्यात्मक हस्तक्षेप बनाता है।
देरिदा की विखंडनवादी दृष्टि (Deconstruction) से ‘चक्रव्यूह’ पर गौर करने से कविता का एक महत्त्वपूर्ण आयाम सामने आता है: यह कविता केवल युद्ध, अभिमन्यु या महाभारत की कथा का पुनर्पाठ नहीं करती, बल्कि उन भाषिक, नैतिक और सांस्कृतिक द्वैतों को भी अस्थिर करती है जिनके आधार पर इतिहास अपने पात्रों, घटनाओं और मूल्यों को अर्थ देता आया है। देरिदा के लिए किसी पाठ का अर्थ किसी एक स्थिर, अन्तिम और निर्विवाद केन्द्र में सुरक्षित नहीं रहता। अर्थ उन भेदों, विरोधों, अनुपस्थितियों और अन्तर्विरोधों के माध्यम से निर्मित होता है जिन्हें कोई सांस्कृतिक व्यवस्था स्थिर मान लेने की कोशिश करती है। ‘चक्रव्यूह’ इसी अर्थ में एक ऐसा पाठ है जो युद्ध और वीरता की प्रचलित भाषा को भीतर से खोलता है और दिखाता है कि जिन शब्दों के सहारे किसी ऐतिहासिक घटना को नैतिक अर्थ दिया जाता है, उन्हीं शब्दों के भीतर उनके विपरीत अर्थ भी सक्रिय रहते हैं।
कविता का आरम्भ ही इस बात की ओर संकेत करता है कि इतिहास कोई निष्कलुष या निष्पक्ष स्मृति नहीं है। ‘युद्ध की प्रतिध्वनि जगाकर / जो हज़ारों बार दुहराई गई, / रक्त की विरुदावली कुछ और रँगकर / लोरियों के संग जो गाई गई’—इन पंक्तियों में इतिहास, स्मृति और भाषा के बीच का सम्बन्ध निर्णायक हो जाता है। युद्ध केवल घटित नहीं होता; उसके बाद उसकी कथा कही जाती है, दोहराई जाती है, सजाई जाती है और अगली पीढ़ियों तक पहुँचाई जाती है। ‘रक्त की विरुदावली’ में हिंसा का रक्त ‘विरुदावली’ अर्थात् यशगान में बदल जाता है। यही परिवर्तन देरिदाई नज़रिए से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ एक शब्द का अर्थ दूसरे शब्द की अनुपस्थिति के सहारे निर्मित होता है। ‘रक्त’ और ‘विरुद’ स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं; कविता उन्हें एक ही संरचना में रखकर उस सांस्कृतिक प्रक्रिया को उजागर करती है जिसमें हत्या को यश, हिंसा को वीरता और मृत्यु को गौरव में परिवर्तित किया जाता है। ‘लोरियों’ के साथ ‘रक्त की विरुदावली’ का जुड़ना इस प्रक्रिया को और गहरा करता है। जो बात बच्चों को सुलाने वाली लोरी की तरह आत्मीय और निर्दोष बनकर आती है, उसके भीतर युद्ध की स्मृति और रक्त की कथा छिपी हुई है। इस प्रकार कविता उस द्वैत को अस्थिर करती है जिसमें ‘लोरी’ को शान्ति और ‘युद्ध’ को हिंसा का क्षेत्र मान लिया जाता है। दोनों एक-दूसरे से अलग नहीं हैं; युद्ध की सांस्कृतिक स्मृति लोरी के भीतर भी जीवित रह सकती है।
इसी बिन्दु पर ‘इतिहास’ और ‘स्मृति’ का द्वैत भी स्थिर नहीं रहता। कविता कहती है, ‘उसी इतिहास की स्मृति, / उसी संसार में लौटे हुए।’ इतिहास यहाँ अतीत की बन्द किताब नहीं है। वह स्मृति के माध्यम से वर्तमान में लौटता है। लेकिन यह लौटना केवल घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं है; हर पुनरावृत्ति अर्थ को भी बदलती है। देरिदा की दृष्टि से किसी पाठ या संकेत का अर्थ उसकी पहली उपस्थिति में पूरी तरह बन्द नहीं हो जाता। वह दूसरी परिस्थितियों में लौटकर नये अर्थ उत्पन्न करता है। ‘चक्रव्यूह’ में महाभारत का अभिमन्यु इसी प्रकार वर्तमान में लौटता है। वह केवल पुराण-कथा का पात्र नहीं रह जाता; वह हर उस मनुष्य का रूपक बन जाता है जो पहले से निर्मित सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक संरचनाओं के भीतर प्रवेश करता है। इस तरह ‘अभिमन्यु’ एक निश्चित चरित्र से एक पुनरावृत्त संकेत में बदल जाता है। उसका अर्थ हर ऐतिहासिक सन्दर्भ में फिर से निर्मित हो सकता है।
कविता का ‘ओ योद्धा, तुम कौन हो?’ भी इसी विखंडन की प्रक्रिया का हिस्सा है। यहाँ प्रश्न अभिमन्यु की पहचान के बारे में है, लेकिन वास्तव में प्रश्न ‘योद्धा’ की पहचान को ही अस्थिर करता है। योद्धा कौन है? क्या वह केवल वह व्यक्ति है जो युद्ध करता है? क्या वीरता केवल युद्धभूमि में लड़ने से सिद्ध होती है? क्या किसी पक्ष के लिए लड़ना अपने-आप सत्य के लिए लड़ना है? कविता इन प्रश्नों का कोई सरल उत्तर नहीं देती। इसके बजाय वह उस नैतिक शब्दावली को भीतर से प्रश्नांकित करती है जिसमें ‘योद्धा’, ‘वीर’, ‘विजेता’ और ‘सत्य’ एक-दूसरे के निकट रखे जाते रहे हैं।
‘मैं नवागत वह अजित अभिमन्यु हूँ’ में ‘नवागत’ और ‘अजित’ का संयोजन भी अर्थ की एक दिलचस्प उलझन पैदा करता है। अभिमन्यु युद्ध में प्रवेश करता है, घायल होता है और अन्ततः मारा जाता है; फिर भी वह ‘अजित’ है। यहाँ ‘विजय’ और ‘पराजय’ का पारम्परिक द्वैत अस्थिर हो जाता है। बाहरी घटना की दृष्टि से मृत्यु पराजय प्रतीत हो सकती है, लेकिन नैतिक और अस्तित्वगत स्तर पर वही मृत्यु किसी अन्य प्रकार की विजय का रूप ले सकती है। इस प्रकार कविता पूछती है कि विजय को किस आधार पर परिभाषित किया जाए। यदि विजय का अर्थ केवल जीवित बचना या शत्रु को परास्त करना है, तो अभिमन्यु पराजित है; लेकिन यदि सत्य, नैतिक साहस और अन्याय के प्रतिरोध को विजय का आधार माना जाए, तो वही अभिमन्यु ‘अजित’ है। कविता इस दूसरे अर्थ को किसी नारे की तरह स्थापित नहीं करती; वह ‘अजित’ शब्द को ‘मृत्यु’ के साथ रखकर ‘विजय’ की पारम्परिक परिभाषा को अस्थिर करती है।
यही तनाव ‘विजय / मृत्यु’ के द्वैत में दिखाई देता है। सामान्य युद्ध-भाषा में विजय का सम्बन्ध जीवन, सफलता और शत्रु की पराजय से होता है, जबकि मृत्यु को पराजय का परिणाम माना जाता है। लेकिन ‘चक्रव्यूह’ इस सम्बन्ध को उलट देती है। ‘विजय के चंद घातक पलों में जाना’—यहाँ विजय और मृत्यु एक-दूसरे के विरोधी नहीं रह जाते। विजय के क्षण ही ‘घातक’ हैं। जिस क्षण में सत्य का बोध होता है, उसी क्षण मृत्यु की सम्भावना भी उपस्थित है। इस प्रकार विजय की भाषा अपने भीतर मृत्यु का संकेत लेकर चलती है। दूसरी ओर मृत्यु भी केवल अन्त नहीं है; वह एक ऐसे बोध का क्षण बन जाती है जिसमें अस्तित्व का ‘हर पक्ष’ पहचाना जाता है। कविता इसीलिए मृत्यु को केवल हार के रूप में नहीं पढ़ती।
‘मेरे हाथ में टूटा हुआ पहिया’ भी इस विखंडन को गहराता है। पहिया सामान्यतः गति, शक्ति, युद्ध और नियंत्रण का प्रतीक हो सकता है, लेकिन यहाँ वह ‘टूटा हुआ’ है। फिर भी वह अभिमन्यु के हाथ में है। वस्तु की भौतिक शक्ति समाप्त हो चुकी है, लेकिन उसका प्रतीकात्मक अर्थ समाप्त नहीं हुआ। टूटा हुआ पहिया हथियार के रूप में कमजोर हो सकता है, पर प्रतिरोध और स्मृति के रूप में शक्तिशाली हो जाता है। यहाँ शक्ति और निर्बलता का द्वैत भी स्थिर नहीं रहता। जो वस्तु युद्ध में प्रभावहीन दिखाई देती है, वही नैतिक अर्थ में प्रतिरोध का चिह्न बन जाती है।
इसी तरह ‘बदन पर एक फूटा कवच’ और ‘सारी देह क्षत-विक्षत’ की छवियाँ शरीर और वीरता के पारम्परिक सम्बन्ध को उलट देती हैं। युद्ध की वीरगाथाओं में योद्धा का कवच सुरक्षा और सामर्थ्य का संकेत होता है; यहाँ कवच ‘फूटा’ हुआ है। शरीर सुरक्षित नहीं है। फिर भी यही असुरक्षित शरीर कविता के नैतिक अर्थ का केन्द्र बन जाता है। वीरता अब सुरक्षित और अजेय शरीर में नहीं, बल्कि घायल और असुरक्षित शरीर में दिखाई देती है। इस प्रकार कविता वीरता की उस पारम्परिक छवि को विखंडित करती है जो शक्ति, कवच और विजय के साथ जुड़ी रही है।
‘वीर / कायर’ का द्वैत कविता के विखंडनवादी पाठ का सबसे तीखा उदाहरण है। कविता सीधे कहती है कि ‘छल के लिए उद्यत व्यूह-रक्षक वीर-कायर हैं।’ यहाँ ‘वीर-कायर’ एक सामान्य विरोधाभासी पद नहीं है; यह उस नैतिक व्यवस्था को खोलता है जिसके भीतर ‘वीर’ की उपाधि प्राप्त करने वाले लोग अपने कर्मों के स्तर पर कायर सिद्ध हो सकते हैं। युद्ध की आधिकारिक भाषा उन्हें वीर कह सकती है, पर कविता उनके आचरण को उस नाम के भीतर से चुनौती देती है। ‘वीर’ और ‘कायर’ दो पूर्णतः अलग और स्थिर श्रेणियाँ नहीं रह जातीं। एक ही व्यक्ति या समूह के भीतर दोनों अर्थ एक साथ उपस्थित हो सकते हैं। इसीलिए ‘वीर-कायर’ का संयुक्त प्रयोग द्वैत को समाप्त नहीं करता, बल्कि उसकी आन्तरिक अस्थिरता को सामने लाता है।
यहाँ देरिदा के विखंडन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष समझ में आता है। विखंडन का अर्थ केवल किसी द्वैत को उलट देना नहीं है। यदि कविता केवल इतना कहती कि ‘वीर वास्तव में कायर हैं और कायर वास्तव में वीर’, तो वह एक पुराने द्वैत को उलटकर नया द्वैत बना देती। लेकिन ‘चक्रव्यूह’ इससे आगे जाती है। वह पूछती है कि ‘वीर’ कहलाने की सामाजिक प्रक्रिया क्या है, किसके पास किसी को वीर कहने का अधिकार है, किन कर्मों को वीरता का नाम दिया जाता है और किन कर्मों को इतिहास की भाषा से बाहर कर दिया जाता है। इस तरह समस्या केवल यह नहीं रह जाती कि कौन वीर है और कौन कायर; समस्या यह बन जाती है कि वीरता का अर्थ किस प्रकार निर्मित होता है।
इसी बिन्दु पर ‘पक्ष / सत्य’ का द्वैत भी कविता में टूटता है। पंक्ति है—‘जिन्होंने पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना।’ यहाँ ‘पक्ष’ का अर्थ केवल राजनीतिक या सैन्य पक्ष नहीं है; वह सामूहिक पहचान, समूह-निष्ठा और वैचारिक प्रतिबद्धता का संकेत भी है। जब ‘पक्ष’ ‘सत्य’ से बड़ा हो जाता है, तब सत्य किसी सार्वभौमिक नैतिक मानक की तरह काम करना बन्द कर देता है। वह पक्षीय हित के अधीन हो जाता है। देरिदाई दृष्टि से यह पंक्ति उस केन्द्र को अस्थिर करती है जिसके आधार पर कोई समूह स्वयं को सत्य का प्रतिनिधि मानता है। यदि सत्य किसी एक पक्ष की सम्पत्ति नहीं है, तो ‘हम’ और ‘वे’ का नैतिक विभाजन भी स्वतः संदिग्ध हो जाता है।
‘पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना’ में ‘सत्य’ और ‘पक्ष’ का सम्बन्ध उलट दिया गया है। सामान्यतः माना जाता है कि कोई पक्ष सत्य के आधार पर अपना औचित्य सिद्ध करता है; यहाँ पक्ष स्वयं सत्य से बड़ा हो जाता है। इसका अर्थ है कि सत्य अब निर्णय का आधार नहीं, बल्कि पक्ष की रक्षा का साधन बन जाता है। इस बिन्दु पर कविता केवल महाभारत की राजनीति की आलोचना नहीं करती; वह उस व्यापक मानसिकता को प्रश्नांकित करती है जिसमें समूह के प्रति निष्ठा नैतिक विवेक से ऊपर चली जाती है।
‘बलिदान / हत्या’ का द्वैत भी इसी तरह जटिल होता है। कविता कहती है, ‘मैं बलिदान इस संघर्ष में / कटु व्यंग्य हूँ उस तर्क पर / जो ज़िंदगी के नाम पर हारा गया।’ ‘बलिदान’ सामान्यतः पवित्र, स्वैच्छिक और गौरवपूर्ण मृत्यु का अर्थ रखता है। लेकिन कविता इसी शब्द को युद्ध की हिंसा के भीतर रखकर पूछती है कि किसे बलिदान कहा जाता है और किसे मारा जाता है। आगे ‘वह जीव हूँ निष्पाप / जिसको पूज कर मारा गया’ इस विरोधाभास को और तीखा कर देता है। ‘पूजना’ और ‘मारना’ यहाँ साथ उपस्थित हैं। जिस व्यक्ति की हत्या की गई, उसी को बाद में पूजनीय बना दिया जाता है। इस प्रकार पूजा हत्या को नैतिक रूप से निर्दोष नहीं बना देती। कविता उस सांस्कृतिक प्रक्रिया को सामने लाती है जिसमें हिंसा के बाद पीड़ित व्यक्ति को ‘बलिदानी’ कहकर उसकी मृत्यु को गौरवपूर्ण कथा में बदल दिया जाता है।
यहाँ ‘बलिदान’ और ‘हत्या’ को केवल दो विरोधी शब्दों की तरह देखना पर्याप्त नहीं होगा। कविता दिखाती है कि दोनों के बीच की सीमा सत्ता, इतिहास और स्मृति द्वारा निर्धारित की जाती है। किसी की मृत्यु को बलिदान कहना उस मृत्यु को अर्थ प्रदान करता है; लेकिन यही अर्थ कभी-कभी उस हिंसा को ढँक भी सकता है जिसने मृत्यु को जन्म दिया। ‘पूज कर मारा गया’ इसीलिए कविता की सबसे जटिल पंक्तियों में से एक है। ‘पूजा’ मृत्यु के बाद आती है, लेकिन ‘मारा गया’ पहले घटित हो चुका है। सम्मान और हिंसा का यह क्रम कविता में एक-दूसरे से अलग नहीं रहता।
‘जीवन / युद्ध’ का द्वैत भी कविता लगातार अस्थिर करती है। युद्ध प्रायः जीवन की रक्षा, धर्म की स्थापना, न्याय या समुदाय की सुरक्षा के नाम पर लड़ा जाता है। लेकिन कविता पूछती है कि यदि जीवन के नाम पर जीवन ही नष्ट हो, तो उस युद्ध के औचित्य का क्या अर्थ रह जाता है। ‘जो ज़िंदगी के नाम पर हारा गया’ में यही विडम्बना है। जीवन युद्ध का घोषित उद्देश्य हो सकता है, लेकिन युद्ध की वास्तविक प्रक्रिया जीवन को नष्ट करती है। इस प्रकार युद्ध जीवन का विरोधी होते हुए भी स्वयं को जीवन के रक्षक के रूप में प्रस्तुत करता है। कविता इसी आत्म-विरोध को उजागर करती है।
‘इतिहास / स्मृति’ का सम्बन्ध भी यहाँ सीधा नहीं है। इतिहास सामान्यतः व्यवस्थित, प्रमाणित और सार्वजनिक कथा के रूप में सामने आता है, जबकि स्मृति अधिक व्यक्तिगत और अनुभवात्मक प्रतीत होती है। लेकिन कविता कहती है कि इतिहास की अपनी स्मृति है और उस स्मृति में कुछ आवाज़ें बार-बार दोहराई जाती हैं, जबकि कुछ पृष्ठ छिपे रहते हैं। ‘छिपा वह पृष्ठ मेरा है’ में ‘पृष्ठ’ इतिहास का भी है और आत्मकथा का भी। अभिमन्यु कहता है कि इतिहास की विशाल कथा में एक ऐसा पृष्ठ है जो उसका है, लेकिन वह ‘छिपा’ हुआ है। इस प्रकार इतिहास की पूर्णता पर प्रश्न उठता है। जो कुछ लिखा गया है, उसके साथ वह भी महत्त्वपूर्ण है जो दबा दिया गया, भुला दिया गया या पर्याप्त रूप से कहा नहीं गया।
यहीं से ‘इतिहास’ और ‘स्मृति’ के बीच एक नया सम्बन्ध बनता है। स्मृति इतिहास की केवल पुनरावृत्ति नहीं है; वह इतिहास के भीतर छूटे हुए को वापस लाने की प्रक्रिया भी हो सकती है। अभिमन्यु का ‘छिपा पृष्ठ’ इतिहास की आधिकारिक कथा में उपस्थित होकर भी अनुपस्थित है। देरिदा के लिए उपस्थिति और अनुपस्थिति का यही तनाव अर्थ-निर्माण में महत्त्वपूर्ण है। जो अनुपस्थित है, वह पाठ के अर्थ से बाहर नहीं होता; कई बार वही अनुपस्थिति अर्थ को सम्भव बनाती है। ‘चक्रव्यूह’ में अभिमन्यु की आवाज़ इतिहास के उस मौन हिस्से को बोलने देती है जिसे वीरगाथा की चमक ने ढँक दिया था।
‘धर्म / छल’ का द्वैत भी इसी प्रक्रिया में अस्थिर होता है। महाभारत का युद्ध धर्म और अधर्म के संघर्ष के रूप में पढ़ा जाता रहा है, लेकिन कविता ‘छल के लिए उद्यत व्यूह-रक्षक वीर-कायर’ कहकर धर्मयुद्ध की सरल नैतिक संरचना को चुनौती देती है। यदि धर्म के नाम पर छल किया जा सकता है, तो धर्म और छल को पूर्णतः अलग-अलग क्षेत्रों में रखना सम्भव नहीं रहता। यहाँ कविता धर्म की अवधारणा को नकारती नहीं; बल्कि यह पूछती है कि धर्म के नाम पर किए गए कर्म किस बिन्दु पर अपने घोषित नैतिक आधार से विचलित हो जाते हैं। इस तरह धर्म की भाषा के भीतर छल की सम्भावना को उजागर किया जाता है।
‘महासंग्राम’, ‘महाभारत’, ‘हज़ारों युद्ध, उपदेशों, उपाख्यानों, कथाओं’ का उल्लेख कविता को एक ऐसे पाठ-संसार में रखता है जहाँ एक कथा दूसरी कथा को जन्म देती रहती है। महाभारत यहाँ कोई बन्द और पूर्ण अर्थ वाला ग्रन्थ नहीं रह जाता। वह निरन्तर पुनर्पाठ की सम्भावना वाला सांस्कृतिक पाठ बन जाता है। अभिमन्यु हर बार नये अर्थ में लौट सकता है। यही कारण है कि कविता में ‘युग-युग से चला आता महाभारत’ केवल अतीत का वर्णन नहीं है; वह इतिहास के निरन्तर वर्तमान में बने रहने की ओर संकेत करता है। महाभारत का चक्र टूटता नहीं, बल्कि नये संदर्भों में नये रूप ग्रहण करता है।
‘व्यूह’ स्वयं भी एक स्थिर संरचना नहीं है। वह एक ओर सैन्य रणनीति है, दूसरी ओर जीवन की संरचना, इतिहास की संरचना, भाषा की संरचना और अर्थ की संरचना का रूपक बन जाती है। अभिमन्यु उसमें प्रवेश करता है और ‘बाँधी पंक्तियों को तोड़ / क्रमशः लक्ष्य तक बढ़ता हुआ’ आगे बढ़ता है। यहाँ ‘तोड़ना’ केवल शारीरिक अवरोध तोड़ना नहीं है। यह उन स्थिर अर्थ-संरचनाओं को भी चुनौती देने का संकेत है जो मनुष्य को पहले से निर्धारित भूमिकाओं में बाँधती हैं। लेकिन कविता यह भ्रम भी नहीं देती कि व्यूह को तोड़ देना सरल है। उसके पास ‘टूटा हुआ पहिया’ है, ‘फूटा कवच’ है और ‘क्षत-विक्षत’ देह है। प्रतिरोध स्वयं जोखिम और असुरक्षा से जुड़ा है।
इसीलिए कविता को केवल ‘अभिमन्यु की वीरता’ की कविता कहना उसके अर्थ को सीमित कर देगा। यहाँ अभिमन्यु की वीरता से अधिक महत्त्वपूर्ण वह प्रक्रिया है जिसमें ‘वीरता’ का अर्थ ही प्रश्न के घेरे में आता है। जो व्यक्ति छलपूर्ण व्यूह की रक्षा करते हैं, वे सामाजिक कथा में वीर कहलाते हैं; जो अकेला होकर उस व्यूह से संघर्ष करता है, वह मर जाता है। फिर भी कविता नैतिक अर्थ की दिशा बदल देती है। मृत्यु यहाँ सत्य की समाप्ति नहीं, बल्कि उस सत्य को उजागर करने का माध्यम बन जाती है जिसे विजयी पक्ष छिपाना चाहता है।
कविता के अन्त में ‘मृत्यु के निष्पक्ष, समयातीत घेरे’ का उल्लेख द्वैतों की इस पूरी संरचना को एक व्यापक अस्तित्वगत स्तर पर ले जाता है। जीवन और मृत्यु, विजेता और पराजित, पक्ष और विपक्ष, वीर और कायर—इन सभी मानवीय विभाजनों के ऊपर मृत्यु का एक ऐसा क्षेत्र है जो ‘निष्पक्ष’ और ‘समयातीत’ है। लेकिन यहाँ भी कविता किसी सरल सार्वभौमिक निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती। मृत्यु की निष्पक्षता जीवन की असमानताओं को समाप्त नहीं करती। बल्कि वह यह दिखाती है कि जिन विभाजनों को मनुष्य स्थायी मानता है, वे अन्ततः सीमित और ऐतिहासिक हैं। मृत्यु के सामने ‘पक्ष’ की राजनीतिक पहचान अपनी अन्तिम सत्ता खो देती है।
फिर भी कविता की शक्ति केवल इस बात में नहीं कि मृत्यु सबको समान कर देती है। यदि ऐसा होता, तो कविता का नैतिक आग्रह कमजोर पड़ जाता। कविता का असली प्रश्न यह है कि मनुष्य को समानता और सत्य की पहचान मृत्यु के बाद क्यों हो? ‘घिरे अस्तित्व का हर पक्ष पहिचाना’ जाने का बोध मृत्यु के निकट क्यों आए? इस प्रश्न से कविता की नैतिक बेचैनी पैदा होती है। वह चाहती है कि जीवन के भीतर ही उन द्वैतों की जाँच की जाए जिनके आधार पर किसी को वीर और किसी को कायर, किसी को बलिदानी और किसी को शत्रु, किसी को सत्य का पक्षधर और किसी को असत्य का प्रतिनिधि घोषित किया जाता है।
इस प्रकार देरिदा की विखंडनवादी दृष्टि से ‘चक्रव्यूह’ किसी एक निश्चित नैतिक निष्कर्ष पर पहुँचने वाली कविता नहीं है। यह अपने ही भीतर उन अर्थ-संरचनाओं को खोलती है जिनके सहारे इतिहास युद्ध को वीरता, मृत्यु को बलिदान, पक्ष को सत्य, हिंसा को धर्म और विजेता को नैतिक अधिकार में बदलता है। कविता द्वैतों को केवल उलटती नहीं; वह दिखाती है कि प्रत्येक पद अपने विरोधी पद पर निर्भर है। ‘वीर’ को ‘कायर’ के बिना समझना सम्भव नहीं, ‘विजय’ को ‘पराजय’ के बिना, ‘बलिदान’ को ‘हत्या’ के बिना, ‘सत्य’ को ‘पक्ष’ के बिना, ‘जीवन’ को ‘मृत्यु’ के बिना और ‘इतिहास’ को उन स्मृतियों के बिना नहीं समझा जा सकता जिन्हें इतिहास अक्सर दबा देता है। इस अर्थ में ‘चक्रव्यूह’ स्वयं एक विखंडनकारी पाठ बन जाती है: वह उस व्यूह को तोड़ती है जिसमें अर्थों को स्थिर, शुद्ध और परस्पर पृथक मान लिया गया है।
अन्ततः अभिमन्यु का ‘अजित’ होना इसी विखंडन का सबसे सघन रूप है। वह युद्धभूमि में मारा जाता है, लेकिन उसकी मृत्यु उन लोगों की नैतिक विजय को प्रमाणित नहीं करती जिन्होंने उसे घेरा। इसके उलट, उसकी मृत्यु उनके ‘वीरत्व’ के भीतर छिपे ‘कायरपन’ को उजागर करती है। वह ‘बलिदान’ है, लेकिन उसकी कथा ‘हत्या’ की स्मृति को मिटाती नहीं। वह पराजित शरीर है, लेकिन नैतिक अर्थ में पराजित नहीं। वह इतिहास का पात्र है, लेकिन उसकी आवाज़ इतिहास के छिपे हुए पृष्ठ को खोलती है। वह महाभारत का अभिमन्यु है, लेकिन कविता में लौटकर वह हर उस मनुष्य का रूप ग्रहण करता है जो किसी पहले से निर्मित व्यूह में प्रवेश करता है और उस व्यूह की भाषा, नैतिकता और सत्ता को भीतर से प्रश्नांकित करता है। इसीलिए ‘चक्रव्यूह’ का असली विखंडन केवल युद्ध-व्यूह का विखंडन नहीं है; यह उन अर्थ-व्यूहों का विखंडन भी है जिनके भीतर समाज वीरता, सत्य, धर्म, बलिदान, इतिहास और विजय की अपनी धारणाओं को सुरक्षित रखता आया है। कविता इन धारणाओं को नष्ट करने के बजाय उनके भीतर छिपे अन्तर्विरोधों को उजागर करती है और पाठक को यह देखने के लिए विवश करती है कि जिसे हम किसी एक नाम से पहचानते हैं, उसके भीतर उसका दूसरा, दबा हुआ और असुविधाजनक अर्थ भी लगातार सक्रिय रहता है। यही ‘चक्रव्यूह’ की विखंडनवादी सम्भावना है।
कुँवर नारायण की ‘चक्रव्यूह’ कविता युद्ध को केवल ऐतिहासिक या पौराणिक घटना के बजाय नैतिक निर्णय की एक जटिल समस्या के रूप में सामने लाती है। कविता का अभिमन्यु इस प्रश्न का केन्द्र बन जाता है कि किसी युद्ध को ‘धर्म’, ‘न्याय’, ‘कर्तव्य’ या ‘सत्य’ के नाम पर वैध ठहराने के बाद भी क्या युद्ध में कुछ ऐसे नियम और सीमाएँ बची रहती हैं जिनका उल्लंघन उस युद्ध की नैतिकता को भीतर से विघटित कर देता है। इस दृष्टि से ‘चक्रव्यूह’ युद्ध के औचित्य से अधिक युद्ध के आचरण की नैतिकता पर प्रश्न उठाती है।
न्यायोचित युद्ध सिद्धान्त की परम्परा में ऑगस्टीन (Augustine) से लेकर थॉमस एक्विनास (Thomas Aquinas) और आधुनिक युद्ध-नैतिकता तक एक बुनियादी सवाल लगातार बना रहा है: क्या युद्ध कभी नैतिक रूप से उचित हो सकता है? इस परम्परा का उत्तर सामान्यतः यह नहीं है कि हर युद्ध अनिवार्य रूप से अनैतिक है, बल्कि यह है कि यदि युद्ध को किसी परिस्थिति में न्यायोचित माना भी जाए, तो उसे कुछ नैतिक शर्तों के अधीन रहना होगा। आधुनिक ‘न्यायसंगत युद्ध सिद्धान्त’ (Just War Theory) इस प्रश्न को मोटे तौर पर दो स्तरों पर देखती है—युद्ध आरम्भ करने की न्यायसंगतता और युद्ध के दौरान किए जाने वाले कार्यों की न्यायसंगतता। ‘चक्रव्यूह’ का विशेष महत्त्व यह है कि कविता युद्ध के औचित्य की घोषित भाषा से आगे बढ़कर युद्ध के भीतर किए गए कर्मों की नैतिक परीक्षा करती है।
महाभारत में महर्षि व्यास ने लिखा है—‘दारुणः क्षत्रधर्मोऽयं विहितो धर्मकर्तृभिः। / यत्र राज्येप्सवः शूरा बाले शस्त्रमपातयन्॥’ अर्थात्, ‘धर्मशास्त्रकारों द्वारा निर्धारित यह क्षत्रिय-धर्म कितना कठोर है कि राज्य की इच्छा रखने वाले वीरों को एक बालक पर भी शस्त्र चलाने की अनुमति देता है।’ यह श्लोक युद्ध के घोषित ‘धर्म’ और उसके नैतिक परिणाम के बीच मौजूद अन्तर्विरोध को ख़ुद महाभारत के भीतर से उजागर करता है। इसी नैतिक तनाव का आधुनिक कवित्वपूर्ण पुनर्संस्कार कुँवर नारायण की पंक्ति ‘कटु व्यंग्य हूँ उस तर्क पर / जो ज़िंदगी के नाम पर हारा गया’ में दिखाई देता है। महाभारत का यह प्रसंग जहाँ राज्य और क्षत्रिय-धर्म के नाम पर बालक के विरुद्ध हिंसा की नैतिक वैधता पर प्रश्नचिह्न उपस्थित करता है, वहीं कुँवर नारायण धर्म और ‘ज़िंदगी के नाम पर’ युद्ध को वैध ठहराने वाले तर्क की विडम्बना को सामने लाते हैं। इस प्रकार दोनों पाठों के बीच अन्तरपाठीय सम्बन्ध केवल अभिमन्यु की मृत्यु के प्रसंग का नहीं, बल्कि युद्ध की वैधता की उस नैतिक कसौटी से संबंधित है जहाँ ‘धर्म’ या किसी उच्चतर सामूहिक उद्देश्य का नाम हिंसा को अपने-आप न्यायोचित नहीं बना देता।
विवेच्य कविता की पंक्ति ‘छल के लिए उद्यत व्यूह-रक्षक वीर-कायर हैं’ उस नैतिक प्रश्न का सबसे सीधा आधार बनती है जहाँ ‘व्यूह’ सिर्फ़ एक सैन्य रणनीति नहीं रह जाता। वह युद्ध के नियमों के भीतर रहते हुए युद्ध करने और नियमों को अपने पक्ष के लाभ के लिए मोड़ने के बीच की सीमा का प्रतीक बन जाता है। यदि कोई युद्ध किसी धर्म, न्याय या कर्तव्य के नाम पर लड़ा जा रहा है, लेकिन उसके भीतर छल, सामूहिक घेराबन्दी और नैतिक सीमाओं का उल्लंघन किया जाता है, तो केवल घोषित उद्देश्य उस युद्ध के आचरण को नैतिक नहीं बना सकता। कविता इसी विरोधाभास को ‘वीर-कायर’ जैसे संयुक्त पद के माध्यम से उजागर करती है। जो युद्धभूमि में विजयी दिखाई देते हैं, वे नैतिक कसौटी पर प्रश्नांकित हो जाते हैं।
यहाँ ‘युद्ध-पूर्व न्यायसंगतता’ (Jus ad Bellum) और ‘युद्ध के भीतर न्यायसंगत आचरण’ (Jus in Bello) के बीच अन्तर उपयोगी हो जाता है। कोई संघर्ष किसी घोषित न्यायसंगत कारण से शुरू किया गया हो, तब भी उसके भीतर किए जाने वाले प्रत्येक कार्य को स्वतः न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। दूसरे शब्दों में, न्यायसंगत उद्देश्य और न्यायसंगत साधन एक ही बात नहीं हैं। ‘चक्रव्यूह’ इसी अन्तर को अभिमन्यु के प्रसंग में तीखे ढंग से सामने लाती है। यहाँ प्रश्न यह नहीं रह जाता कि पाण्डवों का पक्ष न्यायपूर्ण था या कौरवों का; कविता इससे अधिक कठिन प्रश्न पूछती है—यदि किसी पक्ष का उद्देश्य न्यायपूर्ण माना जाए, तो क्या उस पक्ष को युद्ध में हर प्रकार का आचरण करने का अधिकार मिल जाता है?
‘जिन्होंने पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना’ इस प्रश्न को और व्यापक बनाती है। न्यायोचित युद्ध की नैतिकता में ‘न्यायसंगत कारण’ (Just Cause) को महत्त्व दिया जाता है, लेकिन कविता दिखाती है कि ‘पक्ष’ स्वयं ‘सत्य’ से बड़ा हो जाए तो न्यायसंगत कारण की धारणा भी विकृत हो सकती है। कोई समूह अपने पक्ष को ही सत्य का पर्याय मान ले, तो उसके लिए विरोधी का मानवीय अस्तित्व गौण हो सकता है। इस स्थिति में युद्ध का नैतिक विवेक समूह-निष्ठा के अधीन हो जाता है। कविता की चिन्ता यही है कि सत्य का दावा करने वाला पक्ष अपने ही आचरण की नैतिक जाँच से मुक्त न हो जाए।
इसी सन्दर्भ में ‘वैध प्राधिकार’ (Legitimate Authority) की धारणा को भी कविता के भीतर पढ़ा जा सकता है। युद्ध में किसी पक्ष का औपचारिक या राजनीतिक अधिकार उसके प्रत्येक सैन्य कर्म को नैतिक वैधता नहीं देता। ‘व्यूह-रक्षक’ अपने-आप में वैध या अवैध नहीं हो जाते क्योंकि वे किसी मान्य पक्ष से सम्बन्धित हैं। उनकी नैतिकता उनके कर्म से निर्धारित होती है। इसीलिए कविता ‘वीर-कायर’ कहती है, ‘वीर’ और ‘कायर’ को अलग-अलग समूहों में बाँटकर नहीं देखती। वह प्रतिष्ठित सैन्य पहचान और वास्तविक नैतिक आचरण के बीच का अन्तर खोलती है।
‘आनुपातिकता’ (Proportionality) का प्रश्न भी ‘चक्रव्यूह’ में अप्रत्यक्ष रूप से गहराई से उपस्थित है। युद्ध में बल-प्रयोग का नैतिक मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जाता कि सामने वाला शत्रु है; यह भी देखा जाता है कि प्रयुक्त हिंसा और प्राप्त किए जाने वाले सैन्य उद्देश्य के बीच कोई उचित अनुपात है या नहीं। अभिमन्यु का प्रसंग इस प्रश्न को इसलिए तीखा बनाता है क्योंकि कविता एक अकेले योद्धा और उसके विरुद्ध संगठित व्यूह के बीच की असमानता को सामने लाती है। ‘बदन पर एक फूटा कवच’, ‘सारी देह क्षत-विक्षत’ और ‘मेरे हाथ में टूटा हुआ पहिया’ जैसी छवियाँ युद्ध में शक्ति के असमान वितरण को रेखांकित करती हैं। यहाँ युद्ध की वीरतापूर्ण छवि के पीछे एक ऐसी संरचना दिखाई देती है जिसमें व्यक्ति को सामूहिक शक्ति घेर लेती है।
इस असमानता को केवल सैन्य दुर्बलता के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा। कविता का नैतिक तनाव इस बात में है कि सामूहिक शक्ति का प्रयोग किस सीमा तक न्यायसंगत है। यदि युद्धरत पक्ष किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध अपनी सामूहिक शक्ति का प्रयोग करता है जिसकी स्थिति पहले ही असमान है, तो ‘वीरता’ और ‘आनुपातिकता’ के प्रश्न एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। कविता इसीलिए विजेताओं की संख्या या शक्ति को उनकी नैतिक श्रेष्ठता का प्रमाण नहीं मानती। वह शक्ति और न्याय के बीच आवश्यक दूरी बनाए रखती है।
‘युद्धरत और गैर-युद्धरत के बीच भेद’ आधुनिक ‘न्यायसंगत युद्ध सिद्धान्त’ (Just War Theory) का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। ‘चक्रव्यूह’ में अभिमन्यु युद्धरत योद्धा है, इसलिए कविता को सीधे गैर-युद्धरत नागरिकों की हत्या के प्रश्न से जोड़ना उचित नहीं होगा। लेकिन कविता इससे जुड़ा एक व्यापक नैतिक प्रश्न अवश्य उठाती है: क्या युद्धरत व्यक्ति की भी मानवीय गरिमा और नैतिक सीमा होती है? क्या ‘योद्धा’ का दर्जा उसे किसी भी प्रकार के व्यवहार के लिए उपलब्ध लक्ष्य बना देता है? अभिमन्यु के प्रसंग में इसका उत्तर नकारात्मक दिशा में जाता है। युद्धभूमि में होना किसी मनुष्य को नैतिक अधिकारों से रहित नहीं कर देता।
यहाँ कविता का ‘वह जीव हूँ निष्पाप / जिसको पूज कर मारा गया’ विशेष ध्यान माँगता है। ‘निष्पाप’ शब्द युद्ध की सामान्य भाषा में एक असुविधाजनक हस्तक्षेप है। युद्ध की भाषा में ‘शत्रु’ एक श्रेणी है; कविता उस श्रेणी के भीतर ‘जीव’ को पुनः उपस्थित करती है। इससे युद्ध की अमूर्त भाषा टूटती है। ‘शत्रु’, ‘पक्ष’, ‘योद्धा’, ‘वीर’ जैसी सामूहिक संज्ञाओं के पीछे एक शरीर, एक जीवन और एक व्यक्ति है। कविता का नैतिक आग्रह इसी मानवीय व्यक्तित्व को फिर से दिखाई देने योग्य बनाना है।
यहीं ‘हत्या’ और ‘बलिदान’ के बीच का सम्बन्ध भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। ‘जिसको पूज कर मारा गया’ में ‘पूजा’ और ‘हत्या’ का साथ-साथ आना युद्ध की नैतिक भाषा पर गहरा प्रश्न है। किसी की मृत्यु को बाद में ‘बलिदान’ कह देना उस मृत्यु की परिस्थितियों को नैतिक रूप से निष्पाप नहीं कर देता। यदि मृत्यु अन्यायपूर्ण साधनों से हुई है, तो उसके बाद निर्मित गौरवगाथा उस अन्याय को मिटा नहीं सकती। कविता इसीलिए ‘बलिदान’ शब्द के भीतर छिपी हिंसा को दिखाई देती है।
‘मैं बलिदान इस संघर्ष में / कटु व्यंग्य हूँ उस तर्क पर / जो ज़िंदगी के नाम पर हारा गया’—इन पंक्तियों को न्यायोचित युद्ध की दृष्टि से पढ़ने पर एक गहरी विडम्बना उभरती है। युद्ध का औचित्य प्रायः जीवन, समुदाय, न्याय या भविष्य की रक्षा के नाम पर निर्मित किया जाता है। लेकिन यदि युद्ध के साधन स्वयं जीवन का विनाश करते हैं, तो घोषित उद्देश्य और वास्तविक परिणाम के बीच तनाव पैदा होता है। कविता इस तनाव को ‘कटु व्यंग्य’ कहती है। यहाँ युद्ध अपने औचित्य की भाषा से ही कटघरे में आता है।
युद्ध की ‘आवश्यकता’ का प्रश्न भी इसी स्तर पर उठता है। न्यायसंगत युद्ध-सिद्धांत में युद्ध या किसी विशिष्ट सैन्य कार्रवाई को तभी नैतिक रूप से स्वीकार्य माना जा सकता है जब वह किसी वास्तविक और प्रासंगिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक हो और जब कम हिंसक विकल्प पर्याप्त न हों। ‘चक्रव्यूह’ में यह प्रश्न सीधे किसी नीति-निर्णय के रूप में नहीं आता, लेकिन ‘छल के लिए उद्यत व्यूह’ इस बात की ओर संकेत करता है कि सैन्य रणनीति और नैतिक आवश्यकता एक ही चीज़ नहीं हैं। किसी रणनीति का सैन्य दृष्टि से उपयोगी होना उसे नैतिक रूप से आवश्यक नहीं बना देता।
इस दृष्टि से ‘व्यूह’ का अर्थ और गहरा हो जाता है। व्यूह एक सैन्य योजना है, लेकिन कविता उसे नैतिक परीक्षा की जगह में बदल देती है। प्रश्न यह है कि किसी रणनीति की सफलता क्या अपने-आप उसकी वैधता सिद्ध करती है? यदि कोई सैन्य योजना शत्रु को परास्त कर देती है, तो क्या उसकी सफलता ही उसके औचित्य का प्रमाण है? कविता का उत्तर स्पष्ट रूप से ऐसा नहीं है। वह सफलता के बजाय साधन की नैतिकता पर ध्यान केन्द्रित करती है। ‘व्यूह-रक्षक वीर-कायर हैं’ का अर्थ यही है कि सैन्य सफलता और नैतिक वीरता अलग-अलग कसौटियाँ हो सकती हैं।
‘अन्तिम उपाय’ की धारणा भी इस कविता के युद्ध-विमर्श को व्यापक बनाती है। न्यायोचित युद्ध की आधुनिक नैतिकता में युद्ध को तभी उचित माना जाता है जब शान्तिपूर्ण या कम हिंसक विकल्प पर्याप्त न हों। ‘चक्रव्यूह’ इस पूर्व-युद्ध प्रश्न को विस्तार से प्रस्तुत नहीं करती, इसलिए कविता से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि महाभारत का युद्ध इस कसौटी पर निश्चित रूप से न्यायसंगत या अन्यायसंगत था। लेकिन कविता का ध्यान युद्ध के परिणामों और आचरण पर है, और वहाँ उसका प्रश्न स्पष्ट है: युद्ध आरम्भ करने के कारण चाहे जो हों, युद्ध के भीतर मनुष्य की नैतिक गरिमा समाप्त नहीं हो सकती।
इसी कारण ‘उचित आशय’ का प्रश्न भी महत्त्वपूर्ण है। कोई पक्ष स्वयं को धर्म, न्याय या सत्य का प्रतिनिधि मान सकता है, लेकिन उसकी वास्तविक कार्रवाई उसके घोषित आशय से भिन्न हो सकती है। कविता ‘पक्ष अपनी सत्य से ज़्यादा बड़ा माना’ के माध्यम से इसी अन्तर को सामने लाती है। किसी पक्ष की आत्म-घोषित नैतिकता और उसके वास्तविक कर्म के बीच दूरी हो सकती है। न्यायोचित युद्ध सिद्धान्त की दृष्टि से यह दूरी निर्णायक है, क्योंकि नैतिकता केवल उद्देश्य की घोषणा से नहीं, बल्कि व्यवहार से भी निर्धारित होती है।
‘व्यूह-रक्षक वीर-कायर हैं’ में ‘कायर’ शब्द इसलिए विशेष अर्थ ग्रहण करता है कि यहाँ कायरता शारीरिक भय नहीं, बल्कि नैतिक साहस की कमी से सम्बन्धित प्रतीत होती है। अनेक लोग मिलकर एक व्यक्ति को घेर लें तो उनकी सामूहिक सैन्य शक्ति उन्हें ‘वीर’ की सामाजिक प्रतिष्ठा दे सकती है, लेकिन कविता पूछती है कि क्या नैतिक साहस भी उसी अनुपात में बढ़ जाता है। यदि सामूहिक शक्ति का प्रयोग किसी नैतिक सीमा को तोड़ने के लिए किया गया है, तो संख्या और विजय नैतिक साहस का प्रमाण नहीं रह जाते।
यही बात ‘भेदभाव’ की अवधारणा को एक और स्तर देती है। युद्ध में युद्धरत (combatant) और ग़ैर-युद्धरत (non-combatant) का भेद बहुत ज़रूरी है, लेकिन कविता यह भी संकेत करती है कि युद्धरत शब्द के भीतर भी व्यक्ति को पूर्णतः अमानवीय बना देना अनुचित है। अभिमन्यु युद्धरत है, फिर भी वह ‘निष्पाप जीव’ है। अर्थात् युद्धरत होना मनुष्य की सम्पूर्ण नैतिक पहचान नहीं है। आधुनिक युद्ध-नैतिकता का मानवीय आग्रह भी यही है कि युद्ध की स्थिति में व्यक्ति को केवल लक्ष्य या श्रेणी में बदल देना नैतिक समस्या पैदा करता है।
‘चक्रव्यूह’ युद्ध को केवल तत्कालीन सैन्य संघर्ष के रूप में नहीं देखती, बल्कि यह प्रश्न भी उठाती है कि किसी युद्ध के बाद उसके नैतिक परिणामों का हिसाब किस प्रकार किया जाए। अभिमन्यु की मृत्यु यहाँ केवल एक योद्धा की मृत्यु नहीं रह जाती; वह उस समूची युद्ध-व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न बन जाती है जिसमें विजय प्राप्त करने के लिए नैतिक सीमाओं का उल्लंघन सम्भव हो जाता है। ‘वह शीश जिसका रक्त सदियों तक बहा’ और ‘वह दर्द जिसको बेगुनाहों ने सहा’ जैसी पंक्तियाँ युद्ध की सफलता और उसके मानवीय मूल्य के बीच के अन्तर को सामने लाती हैं। इस दृष्टि से युद्ध का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि किस पक्ष ने विजय प्राप्त की या उसका घोषित उद्देश्य क्या था; यह भी देखना आवश्यक है कि उस विजय की मानवीय कीमत क्या रही। कविता इस प्रकार युद्ध की नैतिकता को उसके परिणामों, पीड़ा और उत्तरदायित्व की कसौटी से जोड़ती है और विजय के पार जाकर उन जीवनों की ओर ध्यान आकृष्ट करती है जिन पर युद्ध का वास्तविक भार पड़ा।
इसीलिए ‘इतिहास की स्मृति’ और ‘छिपा वह पृष्ठ मेरा है’ को युद्ध-नैतिकता के साथ पढ़ना आवश्यक है। यदि किसी युद्ध की आधिकारिक कथा केवल विजेताओं, सेनापतियों और रणनीतिक उपलब्धियों को दर्ज करती है, तो पीड़ित शरीरों और नैतिक उल्लंघनों की स्मृति दब सकती है। अभिमन्यु का ‘छिपा पृष्ठ’ इस दबे हुए इतिहास का प्रतिनिधि बनता है। वह युद्ध की विजय-कथा को पीड़ित की दृष्टि से पुनः पढ़ने के लिए बाध्य करता है।
यहाँ ‘युद्ध-अध्ययन’ और ‘स्मृति-अध्ययन’ एक-दूसरे से जुड़ते हैं। युद्ध केवल कितने लोग मरे, किसने विजय प्राप्त की और कौन-सी रणनीति सफल हुई—इन प्रश्नों से नहीं समझा जा सकता। युद्ध के नैतिक अध्ययन के लिए यह भी देखना आवश्यक है कि मृत्यु को किस भाषा में याद किया गया। ‘पूज कर मारा गया’ इस स्मृति-राजनीति की विडम्बना को अत्यन्त सघन रूप में व्यक्त करता है। मृत व्यक्ति को पूजनीय बनाना और उसकी मृत्यु की हिंसक परिस्थितियों को भूल जाना दो अलग प्रक्रियाएँ हैं। कविता दूसरी प्रक्रिया को स्वीकार नहीं करती।
‘हज़ारों युद्ध, उपदेशों, उपाख्यानों, कथाओं में / छिपा वह पृष्ठ मेरा है’ में युद्ध की पुनरावृत्ति भी नैतिक प्रश्न बन जाती है। यदि मनुष्य ने बार-बार युद्ध किए और बार-बार उनकी कथाएँ सुनाईं, तो क्या उसने युद्ध की नैतिक विफलताओं से कुछ सीखा? ‘युग-युग से चला आता महाभारत’ इस प्रश्न को वर्तमान तक लाता है। यहाँ महाभारत केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक युद्ध नहीं, बल्कि मनुष्य की उस निरन्तर प्रवृत्ति का संकेत है जिसमें न्याय और सत्य के नाम पर संघर्ष किए जाते हैं और फिर उन्हीं संघर्षों की हिंसा को गौरव-कथा में बदला जाता है।
इस सन्दर्भ में कविता ‘युद्ध की नैतिक सीमा’ की अवधारणा को भी गहरा करती है। युद्ध यदि कभी न्यायोचित माना जा सकता है, तो भी वह नैतिक रूप से असीमित नहीं हो सकता। युद्ध में प्रवेश करने के बाद ‘सब कुछ जायज़’ हो जाने की धारणा न्याय संगत युद्ध सिद्धांत की बुनियादी धारणा के विपरीत है। ‘चक्रव्यूह’ कविता इसी असीमित युद्ध-मानसिकता को प्रश्नांकित करती है। अभिमन्यु का प्रसंग यह दिखाता है कि युद्ध की नैतिकता केवल इस बात से निर्धारित नहीं होती कि कौन-सा पक्ष सही माना गया था; यह भी निर्णायक है कि सही माने जाने वाले पक्ष ने संघर्ष के दौरान क्या किया।
यहाँ ‘धर्म’ और ‘युद्ध’ का सम्बन्ध भी नए सिरे से सामने आता है। कविता धर्म का प्रत्यक्ष खण्डन नहीं करती, लेकिन वह धर्म के नाम पर किए जाने वाले आचरण की परीक्षा करती है। यदि धर्म सत्य, न्याय और नैतिकता से जुड़ा है, तो छल, सामूहिक अन्याय और नैतिक सीमा के उल्लंघन को केवल इसलिए उचित नहीं कहा जा सकता कि वे किसी धार्मिक या न्यायपूर्ण पक्ष की विजय में सहायक थे। इस अर्थ में कविता धर्म की भाषा को उसके अपने नैतिक दावे के सामने खड़ा करती है।
अभिमन्यु की मृत्यु का एक और महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि कविता उसे केवल करुणा का पात्र बनाकर नहीं छोड़ती। ‘वह शीश जिसका रक्त सदियों तक बहा, / वह दर्द जिसको बेगुनाहों ने सहा’ में व्यक्तिगत मृत्यु सामूहिक मानवीय अनुभव में बदल जाती है। युद्ध में मारा गया व्यक्ति एक ऐतिहासिक घटना का हिस्सा है, लेकिन उसका दर्द समय से बाहर भी जाता है। यही कारण है कि अभिमन्यु आधुनिक युद्धों के पीड़ितों का सीधा प्रतिनिधि न होते हुए भी युद्ध की नैतिक समस्या का स्थायी रूपक बन सकता है।
फिर भी इस रूपक का उपयोग सावधानी से करना चाहिए। कविता में अभिमन्यु स्वयं एक योद्धा है; इसलिए उसे आधुनिक अर्थ में गैर-युद्धरत नागरिक के समान रखना ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन यही तथ्य कविता को और जटिल बनाता है। वह यह नहीं कहती कि युद्ध में शामिल हर व्यक्ति निर्दोष है; वह यह पूछती है कि युद्धरत व्यक्ति के विरुद्ध भी नैतिक सीमाएँ कहाँ तक लागू रहती हैं। इस अन्तर को बनाए रखना कविता और Just War Theory दोनों की सूक्ष्म समझ के लिए आवश्यक है।
अन्ततः ‘मृत्यु के निष्पक्ष, समयातीत घेरे’ की छवि युद्ध की सम्पूर्ण नैतिक संरचना को एक अस्तित्वगत धरातल पर ले जाती है। युद्ध मनुष्यों को पक्षों में बाँटता है; मृत्यु उन पक्षों को पार कर जाती है। लेकिन कविता मृत्यु की इस समानता को युद्ध की नैतिकता का विकल्प नहीं बनाती। वह हमें यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि यदि मृत्यु अन्ततः सभी को एक समान घेरे में लेती है, तो जीवन के दौरान मनुष्य द्वारा निर्मित ‘पक्ष’, ‘वीरता’, ‘धर्म’ और ‘विजय’ की श्रेणियों को किस नैतिक विवेक से परखा जाए।
इस प्रकार ‘चक्रव्यूह’ को न्यायोचित युद्ध सिद्धान्त की दृष्टि से पढ़ने पर कविता का केन्द्र युद्ध की विजय नहीं, युद्ध की नैतिक जवाबदेही बन जाता है। ऑगस्टीन और एक्विनास की परम्परा से आधुनिक Just War Theory तक विकसित प्रश्न—क्या युद्ध का कारण न्यायसंगत है, क्या युद्ध आवश्यक है, क्या उसका उद्देश्य उचित है, क्या हिंसा आनुपातिक है, क्या युद्धरत और गैर-युद्धरत के बीच भेद रखा गया है, और क्या युद्ध के दौरान कुछ नैतिक सीमाएँ अटल रहती हैं—‘चक्रव्यूह’ में अपने पौराणिक रूपक के भीतर नए अर्थ ग्रहण करते हैं। अभिमन्यु का प्रसंग विशेष रूप से यह स्पष्ट करता है कि किसी पक्ष का घोषित सत्य उसके प्रत्येक कर्म को सत्य नहीं बना देता और युद्ध की विजय उसके साधनों को स्वतः नैतिक नहीं बनाती।
कविता की सबसे गहरी नैतिक बेचैनी शायद इसी विडम्बना में है कि जिस युद्ध को धर्म, सत्य या जीवन की रक्षा के नाम पर वैध ठहराया जा सकता है, वही युद्ध अपने आचरण में धर्म, सत्य और जीवन की सीमाओं का उल्लंघन कर सकता है। ‘वीर-कायर’, ‘बलिदान-हत्या’, ‘पक्ष-सत्य’, ‘जीवन-युद्ध’ और ‘विजय-मृत्यु’ जैसे तनाव इसी कारण कविता में इतने प्रभावशाली हैं। ये केवल भाषिक विरोध नहीं हैं; ये युद्ध की नैतिक संरचना के भीतर मौजूद अन्तर्विरोध हैं। कुन्वर नारायण की कविता इन अन्तर्विरोधों को किसी सरल निर्णय से बन्द नहीं करती। वह पाठक को उस कठिन नैतिक क्षेत्र में ले जाती है जहाँ युद्ध की वैधता को उसके घोषित उद्देश्य से नहीं, उसके साधनों, सीमाओं, मानवीय परिणामों और स्मृति में बची हुई पीड़ा से भी परखना पड़ता है। ‘चक्रव्यूह’ इस अर्थ में युद्ध का महिमामण्डन करने वाली कविता नहीं, बल्कि युद्ध की नैतिक जवाबदेही की कविता बन जाती है—ऐसी जवाबदेही जिसमें विजय से अधिक महत्त्वपूर्ण यह प्रश्न है कि विजय किस कीमत पर और किन साधनों से प्राप्त हुई।
कुँवर नारायण की ‘चक्रव्यूह’ का स्थायी काव्य-मूल्य इस बात में है कि वह मिथकीय आख्यान को किसी एक निश्चित अर्थ में स्थिर करने के बजाय उसे लगातार पुनर्व्याख्या के लिए खुला रखती है। कविता महाभारत से सामग्री ग्रहण करती है, लेकिन उसका लक्ष्य महाभारत की पुनरावृत्ति नहीं है। वह मिथक को ऐसी आलोचनात्मक भूमि में रूपान्तरित करती है जहाँ इतिहास, वर्तमान और मनुष्य के अनुभव एक-दूसरे को नए ढंग से प्रकाशित करते हैं। इस प्रक्रिया में अभिमन्यु किसी एक ऐतिहासिक क्षण का पात्र न रहकर बदलते समय में पुनः पढ़े जाने योग्य काव्यात्मक उपस्थिति बन जाता है। उसकी सार्थकता इस बात में नहीं कि वह किसी एक अर्थ का प्रतिनिधि है, बल्कि इस बात में है कि उसके माध्यम से कविता अपने समय से लगातार नए प्रश्न पूछ सकती है।
इस कविता की दूसरी बड़ी उपलब्धि उसकी बहुस्तरीयता है। सत्ता, विचारधारा, सांस्कृतिक वर्चस्व, हिंसा, युद्ध-नैतिकता, स्मृति और विखंडन जैसी अलग-अलग आलोचनात्मक दृष्टियाँ यहाँ एक-दूसरे की पुनरावृत्ति नहीं करतीं, बल्कि कविता के अलग-अलग आयामों को प्रकाशित करती हैं। इन दृष्टियों को साथ रखकर पढ़ने पर ‘चक्रव्यूह’ किसी एक सिद्धान्त का उदाहरण मात्र नहीं रह जाती। इसके विपरीत, कविता स्वयं ऐसी जटिल संरचना के रूप में सामने आती है जो किसी एक व्याख्यात्मक पद्धति में पूरी तरह समाहित नहीं होती। यही उसकी आलोचनात्मक उत्पादकता है। एक सिद्धान्त जहाँ अर्थ की किसी परत को स्पष्ट करता है, वहीं दूसरा उस परत के भीतर छिपे किसी नए तनाव को सामने ला देता है। इस प्रकार कविता का अर्थ एक अन्तिम व्याख्या में बन्द होने के बजाय परत-दर-परत विस्तृत होता जाता है।
इस बहुस्तरीयता का एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह है कि कविता में मिथक और आधुनिक आलोचनात्मक चिन्तन के बीच कोई कृत्रिम दूरी नहीं रह जाती। महाभारत का प्रसंग आधुनिक सिद्धान्तों पर आरोपित नहीं होता; बल्कि स्वयं कविता में उपस्थित अन्तर्विरोध उन सिद्धान्तों के लिए आलोचनात्मक सम्भावना निर्मित करते हैं। इसी कारण ‘चक्रव्यूह’ को पढ़ना केवल किसी प्राचीन कथा का अर्थ समझना नहीं, बल्कि यह देखना भी है कि एक साहित्यिक पाठ अलग-अलग बौद्धिक परम्पराओं के साथ किस प्रकार संवाद स्थापित कर सकता है। कविता की शक्ति उसकी इसी अन्तर्विषयी खुलावट में है।
इस सन्दर्भ में कुँवर नारायण की भाषा विशेष ध्यान आकर्षित करती है। कविता जटिल दार्शनिक और नैतिक प्रश्नों को अमूर्त विमर्श में विलीन नहीं करती। ‘टूटा हुआ पहिया’, ‘फूटा कवच’, ‘क्षत-विक्षत’ देह, ‘पिघलती आग-सी संध्या’ और ‘गिद्ध-सा मँडराता आकाश’ जैसी छवियाँ विचार को दृश्य अनुभव में बदल देती हैं। इसी कारण कविता में विचार और संवेदना अलग-अलग स्तरों पर नहीं चलते। वैचारिक तनाव देह, दृश्य और प्रतीक में रूपान्तरित होकर पाठक के अनुभव का हिस्सा बन जाता है। यह गुण कविता को केवल वैचारिक वक्तव्य बनने से बचाता है।
‘चक्रव्यूह’ की काव्यात्मक शक्ति उसके मौन और अनिर्णीत क्षेत्रों में भी है। कविता अनेक प्रश्न उठाती है, लेकिन उन्हें किसी घोषणात्मक उत्तर से समाप्त नहीं करती। यही खुलापन उसके पुनर्पाठ की सम्भावना को बनाए रखता है। अलग-अलग समयों में पाठक अभिमन्यु, व्यूह, मृत्यु, संघर्ष और इतिहास को अलग संदर्भों में देख सकता है। इस अर्थ में कविता का अर्थ उसके रचना-काल में बन्द नहीं है। वह प्रत्येक नये पाठ के साथ अपने भीतर से कुछ और उजागर करने की क्षमता रखती है।
कविता का अन्त भी इसी खुलेपन को बनाए रखता है। ‘घिरे अस्तित्व का हर पक्ष पहिचाना’ किसी पूर्ण समाधान की घोषणा नहीं करता; यह पहचान की एक प्रक्रिया की ओर संकेत करता है। अस्तित्व को उसके अनेक पक्षों में पहचानना अपने-आप में एक अन्तिम उत्तर नहीं, बल्कि समझ की निरन्तर प्रक्रिया है। इसीलिए कविता का अन्त पाठक को निष्क्रिय निष्कर्ष नहीं देता। वह उसे उस बिन्दु पर छोड़ती है जहाँ कविता के प्रश्न पाठकीय चेतना का हिस्सा बन जाते हैं।
यही शायद ‘चक्रव्यूह’ की सबसे स्थायी उपलब्धि है। वह पाठक को केवल अभिमन्यु की मृत्यु का साक्षी नहीं बनाती, बल्कि उसे अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया में सहभागी बनाती है। पाठक को तय करना पड़ता है कि वह मिथक को किस दूरी से देखे, इतिहास को किस दृष्टि से पढ़े, नैतिकता को किस आधार पर परखे और व्यक्ति को किन पूर्वनिर्धारित श्रेणियों से मुक्त करके समझे। कविता इस प्रकार पाठक के सामने कोई बन्द अर्थ नहीं रखती; वह उसकी आलोचनात्मक सक्रियता को अपना आवश्यक हिस्सा बना लेती है।
अन्ततः ‘चक्रव्यूह’ की प्रासंगिकता किसी समकालीन घटना से उसकी सतही समानता में नहीं, बल्कि उसकी उस काव्यात्मक क्षमता में है जिसके कारण वह अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों में नए प्रश्न उत्पन्न कर सकती है। कुँवर नारायण मिथक को वर्तमान का सरल रूपक नहीं बनाते; वे उसे ऐसी जीवित संरचना में बदलते हैं जिसमें वर्तमान स्वयं को पहचान सकता है और अपने स्थापित अर्थों पर पुनर्विचार कर सकता है। इसीलिए ‘चक्रव्यूह’ को पढ़ना अतीत की ओर लौटना भर नहीं है। यह साहित्य की उस आलोचनात्मक शक्ति को पहचानना है जो मनुष्य को अपने समय, अपनी स्मृतियों और अपने नैतिक निर्णयों को अधिक जटिलता के साथ देखने की क्षमता प्रदान करती है। कविता समाप्त होती है, लेकिन उसकी अर्थ-प्रक्रिया समाप्त नहीं होती—और इसी निरन्तर खुली रहने वाली अर्थ-प्रक्रिया में कुँवर नारायण की ‘चक्रव्यूह’ की स्थायी काव्यात्मक शक्ति निहित है।
सन्दर्भ
बुनियादी पाठ
नारायण,कुँवर. ‘चक्रव्यूह’, प्रतिनिधि कविताएँ. राजकमल प्रकाशन .2008.
https://www.hindwi.org/kavita/chakrawyuh-kunwar-narayan-kavita?sort=popularity-desc
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*प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय.संपर्क: raviranjan@uohyd.ac.in
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