‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन का आलेख प्रकाशित किया जा रहा है, जिसमें पोलिश समाजशास्त्री ज़िगमुंट बॉमन समेत एरिक एरिक्सन, ज्यां पॉल सार्त्र और अल्बेयर कामू जैसे महत्त्वपूर्ण चिंतकों की अवधारणाओं के आलोक में वरिष्ठ प्रगतिशील कवि कुमार अम्बुज की ‘व्यवधान’ कविता का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है।
इस आलेख की विशेषता यह है कि इसमें कविता की सूक्ष्म पाठ-प्रक्रिया को व्यापक समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य से जोड़ा गया है। इसमें सैद्धांतिक अवधारणाएँ आरोपित न होकर कविता की अर्थ-संरचना को अधिक गहन और बहुआयामी बनाती हैं।
विश्वास है कि यह आलेख कुमार अम्बुज की कविता की नई अर्थ-संभावनाओं को उद्घाटित करने के साथ-साथ समकालीन हिन्दी आलोचना और कविता के समाजशास्त्रीय अध्ययन में भी उपयोगी हस्तक्षेप साबित होगा।
-हरि भटनागर

स्मृति का बोझ और विस्मृति का कौशल : ‘व्यवधान‘ कविता का समाजशास्त्रीय पाठ – रवि रंजन
साहित्य और समाज का संबंध केवल प्रतिबिंब का नहीं, बल्कि परस्पर निर्माण का संबंध है। साहित्य जहाँ समाज की संरचनाओं, मूल्यों और अंतर्विरोधों को संवेदनात्मक रूप में अभिव्यक्त करता है, वहीं समाजशास्त्र उन सामाजिक प्रक्रियाओं की व्याख्या करता है जिनके भीतर मानवीय अनुभव आकार ग्रहण करते हैं। इसलिए प्रेम, वियोग, स्मृति, विस्मृति और अकेलेपन जैसी अनुभूतियाँ केवल व्यक्तिगत मनःस्थितियाँ नहीं हैं, बल्कि वे अपने समय की सामाजिक संरचना, सांस्कृतिक परिवर्तनों और ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज भी हैं। आधुनिक हिन्दी कविता विशेषतः उन सूक्ष्म मानवीय संकटों को सामने लाती है, जिन्हें समझने के लिए साहित्यिक संवेदना के साथ समाजशास्त्रीय दृष्टि भी आवश्यक हो जाती है।
फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम का मानना था कि व्यक्ति का अस्तित्व समाज से पृथक नहीं है; उसकी चेतना और व्यवहार सामाजिक तथ्यों से निर्मित होते हैं। जब समाज के सामूहिक मूल्य और नैतिक बंधन कमजोर पड़ते हैं, तब व्यक्ति ‘एनोमी’ (Anomie) की स्थिति में पहुँच जाता है, जहाँ उसे न केवल दिशाहीनता का अनुभव होता है, बल्कि वह अपने ही सामाजिक परिवेश से भावनात्मक रूप से कटने लगता है। आधुनिक जीवन में बढ़ती आत्मकेंद्रिकता, संबंधों का क्षरण और सामुदायिकता का विघटन इसी एनोमिक स्थिति की अभिव्यक्तियाँ हैं। इस संदर्भ में समकालीन कविता का अकेलापन किसी एक व्यक्ति की निजी नियति नहीं, बल्कि आधुनिक सामाजिक संरचना के अंतर्विरोधों का परिणाम प्रतीत होता है।
उत्तर-औद्योगिक समाज में निजी जीवन की संरचना भी गहरे परिवर्तन से गुज़री है। परिवार, प्रेम और आत्मीयता जैसी संस्थाएँ अब परंपरा की स्थिरता के बजाय व्यक्तिगत चुनाव, अनिश्चितता और निरंतर पुनर्समायोजन पर आधारित होती जा रही हैं। एंथनी गिडेन्स ने अपनी पुस्तक ‘द ट्रांसफॉरमेशन ऑफ़ इंटिमेसी’ (The Transformation of Intimacy) में संकेत किया है कि आधुनिकता ने घनिष्ठ संबंधों को अधिक स्वतंत्र तो बनाया है, किन्तु उसी अनुपात में उन्हें अस्थिर और जोखिम भरा भी बना दिया है। नतीज़तन, संबंध अब स्थायित्व की अपेक्षा निरंतर संवाद, आत्म-पुनर्निर्माण और भावनात्मक संतुलन की माँग करते हैं। इस परिवर्तन ने व्यक्ति के भीतर सुरक्षा की जगह असुरक्षा तथा निकटता की जगह एक विचित्र प्रकार की भावनात्मक दूरी का विस्तार किया है।
इसी सामाजिक पृष्ठभूमि में उपभोक्तावादी संस्कृति ने मानवीय संबंधों को भी बाज़ार की तर्क-प्रणाली से प्रभावित किया है।
पोलिश समाजशास्त्री ज़िगमुंट बॉमन ने ‘तरल आधुनिकता’ या ‘लिक्विड मॉडर्निटी‘ और ‘लिक्विड लव‘ की अवधारणाओं के माध्यम से यह प्रतिपादित किया है कि समकालीन समाज में संबंधों का स्थायित्व लगातार क्षीण हो रहा है। सुविधा, उपभोग और तात्कालिक संतुष्टि की संस्कृति ने प्रतिबद्धता, धैर्य और दीर्घकालिक आत्मीयता को हाशिये पर पहुँचा दिया है। ऐसे सामाजिक परिवेश में स्मृति अक्सर भावनात्मक बोझ में बदल जाती है और विस्मृति उत्तरजीविता (Survival) की एक सामाजिक रणनीति का रूप ग्रहण कर लेती है।
कुमार अम्बुज की ‘व्यवधान‘ कविता इसी बदलते सामाजिक मानस की अत्यंत सूक्ष्म और मार्मिक अभिव्यक्ति है। यह कविता केवल दो व्यक्तियों के संबंधों की कथा नहीं कहती, बल्कि उस समय-बोध को रेखांकित करती है जिसमें मनुष्य अपने अकेलेपन के साथ समझौता करना सीख चुका है और किसी आत्मीय उपस्थिति को भी अपने निर्मित भावनात्मक संतुलन में हस्तक्षेप के रूप में अनुभव करता है। इस दृष्टि से ‘व्यवधान’ आधुनिक समाज में स्मृति, विस्मृति, आत्मीयता, भावनात्मक प्रबंधन तथा संबंधों के विघटन का एक महत्त्वपूर्ण समाजशास्त्रीय आख्यान बन जाती है। प्रस्तुत आलेख का उद्देश्य इन्हीं समाजशास्त्रीय अंतर्दृष्टियों के आलोक में कविता का विश्लेषण करना है, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि निजी अनुभूति के भीतर किस प्रकार व्यापक सामाजिक यथार्थ और समकालीन सभ्यता का संकट अंतर्निहित है।
इस आलेख में सिगमंड फ्रायड के ‘शोक सिद्धांत’ और एरिक एरिक्सन के ‘मनो-सामाजिक विकास’ के चश्मे से व्यक्ति के आंतरिक सुरक्षा तंत्रों का विश्लेषण किया गया है। साथ ही, ज़िगमुंट बॉमन की ‘लिक्विड लव’ (तरल प्रेम) की अवधारणा के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि कैसे आधुनिक मनुष्य अपनी ‘स्वतंत्रता’ को बचाने के लिए ‘जुड़ाव’ से डरने लगा है। सार्त्र और कामू के अस्तित्ववादी दर्शन के आलोक में, यह आलेख कविता की उस अंतिम परिणति—”कि तुम हो और / हम अकेले हैं”—की व्याख्या करता है, जहाँ दो व्यक्तियों का शारीरिक सान्निध्य उनके बीच की भावनात्मक खाई को पाटने के बजाय और अधिक गहरा कर देता है। अंततः, यह विवेचन यह सिद्ध करता है कि ‘व्यवधान’ सिर्फ़ कोई सामान्य कविता के बजाय हमारे सत्यातीत युग के उत्तर-आधुनिक मनुष्य के उस ‘अकेलेपन की आदत’ का समाजशास्त्रीय दस्तावेज़ है जिसे आज के आदमी ने अपनी ढाल बना लिया है।
कविता का मूल पाठ यहाँ दिया जा रहा है :
व्यवधान
तुम जब भी यहाँ आते हो
जैसे यह याद दिलाने के लिए
कि तुम अभी इसी संसार में हो
लेकिन हमारे लिए नहीं
तुम्हारे बिना रह सकने की
बनती जा रही हमारी आदत में
तुम्हारा आना एक व्यवधान है
कि अब फिर से शुरू करना होगा
तुम्हारे बिना रहना
तुम्हें देखकर ख़ुशी होती है
लेकिन वह याद दिलाती है
कि तुम हो और
हम अकेले हैं।
- कुमार अम्बुज
‘व्यवधान’ कविता हमारे समय में मानवीय संबंधों के उस जटिल मरुस्थल की पड़ताल करने की भरसक कोशिश करती है, जहाँ प्रेम अब मिलन का उत्सव नहीं, बल्कि एक ‘भावनात्मक प्रबंधन’ (Emotional Management) की चुनौती बन गया है। सत्यातीत (Post-truth) और उपभोक्तावादी संस्कृति के इस दौर में, जहाँ बाज़ार ने संबंधों को ‘डिस्पोजेबल’ बना दिया है, यह कविता ‘स्मृति’ को एक बोझ और ‘विस्मृति’ को जीवित रहने के अनिवार्य ‘कौशल’ के रूप में रेखांकित करती है।
वस्तुत: ‘व्यवधान’ कविता मानवीय संवेदनाओं के उस जटिल और नितांत निजी क्षेत्र की कविता है, जहाँ प्रेम, अभाव, और अस्तित्वगत सुरक्षा का आपस में टकराव होता है। इस कविता का मनोसामाजिक और मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि मनुष्य का मन विछोह और उपस्थिति के द्वंद्व को किस तरह संसाधित करता है।
‘व्यवधान‘ साधारण शब्दों और न्यूनतम भाषिक विन्यास के माध्यम से आधुनिक मनुष्य की जटिल भावनात्मक स्थिति को उद्घाटित करती हैं। कविता की शक्ति किसी बड़े कथानक, रूपक या नाटकीय घटना में नहीं, बल्कि उन सूक्ष्म मनःस्थितियों के उद्घाटन में निहित है, जो आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुकी हैं। यह कविता प्रेम-विरह की पारंपरिक संवेदना का पुनरावर्तन नहीं करती; बल्कि वह उस मानसिक अवस्था को अभिव्यक्त करती है जहाँ अनुपस्थिति धीरे-धीरे जीवन की सामान्य स्थिति बन जाती है और उपस्थिति एक असामान्य घटना। इसीलिए कविता का शीर्षक ‘व्यवधान‘ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि पूरी कविता का केंद्रीय बिंब है।
कविता की शुरुआत—”तुम जब भी यहाँ आते हो / जैसे यह याद दिलाने के लिए / कि तुम अभी इसी संसार में हो / लेकिन हमारे लिए नहीं“—में ही एक गहरा विडंबनात्मक स्वर उपस्थित हो जाता है। सामान्यतः किसी प्रिय का आगमन जीवन में उल्लास, आश्वस्ति और निकटता का बोध कराता है, किंतु यहाँ उसका आना केवल उसकी अनुपलब्धता का पुनः स्मरण कराता है। “इसी संसार में हो” और “हमारे लिए नहीं”—इन दोनों कथनों के बीच आधुनिक संबंधों की पूरी त्रासदी सिमट आती है। शारीरिक अस्तित्व और भावनात्मक उपलब्धता के बीच जो गहरी खाई है, वही इस कविता का वास्तविक विषय है। प्रिय अनुपस्थित नहीं है; वह संसार में है, परंतु संबंध की दृष्टि से अनुपस्थित है। यह उपस्थिति और अनुपस्थिति का ऐसा द्वंद्व है, जो आधुनिक जीवन में डिजिटल निकटता और भावनात्मक दूरी के अनुभव को भी व्यक्त करता है।
कवि इसके बाद लिखता है—”तुम्हारे बिना रह सकने की / बनती जा रही हमारी आदत में।” यहाँ “आदत” शब्द पूरी कविता का सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है। प्रेम-कविता की परंपरा में सामान्यतः प्रतीक्षा, स्मृति, तड़प, विरह या आशा जैसे शब्द मिलते हैं, किंतु अम्बुज ‘आदत’ का चयन करते हैं। यह चयन आकस्मिक नहीं है। आदत का अर्थ है किसी असाधारण अनुभव का धीरे-धीरे सामान्य जीवन का हिस्सा बन जाना। इसका अर्थ यह भी है कि मनुष्य ने अपने दुःख को इतना बार-बार जिया है कि अब वह उसकी स्वाभाविक जीवन-स्थिति बन चुका है। यहाँ अकेलापन किसी आकस्मिक दुर्घटना का परिणाम नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामाजिक और मानसिक अनुकूलन का परिणाम है। यह आधुनिक मनुष्य की उस मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया का चित्रण है जिसमें वह अपने अभाव के साथ जीना सीख लेता है और वही अभाव उसकी पहचान का हिस्सा बन जाता है।
इसी कारण अगली पंक्ति—”तुम्हारा आना एक व्यवधान है“—पूरी कविता का सबसे अप्रत्याशित और सबसे मार्मिक कथन बन जाती है। सामान्य भावबोध में प्रिय का आगमन उत्सव होना चाहिए, किंतु यहाँ वह व्यवधान है। यह व्यवधान प्रेम में नहीं, बल्कि उस भावनात्मक संतुलन में है जिसे व्यक्ति ने बड़ी कठिनाई से निर्मित किया है। इस एक पंक्ति में आधुनिक मनुष्य का पूरा मनोविज्ञान उद्घाटित हो जाता है। वह अपने अकेलेपन को स्वीकार कर चुका है; उसने अपने भीतर एक नया जीवन-संतुलन बना लिया है। प्रिय का पुनः उपस्थित होना उसी संतुलन को भंग कर देता है। इसलिए उसका आना सुख से अधिक असुविधा उत्पन्न करता है। यह प्रेम की अस्वीकृति नहीं है, बल्कि बार-बार टूटने की पीड़ा से बचने की एक विवश मानसिक रणनीति है।
“कि अब फिर से शुरू करना होगा / तुम्हारे बिना रहना“—इन पंक्तियों में कविता समय की रैखिक अवधारणा को तोड़ देती है। यहाँ समय आगे नहीं बढ़ता; वह एक चक्र में घूमता रहता है। व्यक्ति बार-बार उसी बिंदु पर लौट आता है जहाँ से उसने अपने अकेलेपन को स्वीकार करना शुरू किया था। “फिर से” शब्द इस चक्रीय पीड़ा का सबसे प्रभावी संकेत है। यह केवल विरह का नहीं, बल्कि भावनात्मक श्रम (Emotional Labour) का अनुभव है। व्यक्ति हर बार अपने को पुनर्गठित करता है, अपने भीतर के रिक्त स्थान को भरने का प्रयास करता है और प्रिय की प्रत्येक उपस्थिति उसे उसी श्रम को दोबारा करने के लिए विवश कर देती है। इस प्रकार कविता दुःख को किसी आकस्मिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि निरंतर दोहराए जाने वाले अस्तित्वगत श्रम के रूप में प्रस्तुत करती है।
कविता का सबसे सूक्ष्म भाव उसकी अगली पंक्तियों में व्यक्त होता है—”तुम्हें देखकर ख़ुशी होती है / लेकिन वह याद दिलाती है।” यहाँ ‘लेकिन’ शब्द कविता की पूरी संवेदना को पलट देता है। खुशी यहाँ मुक्तिदायी नहीं है; वह एक नए दुःख का आरंभ है। प्रिय को देखकर प्रसन्नता होती है, किंतु वही प्रसन्नता यह भी याद दिलाती है कि यह क्षण स्थायी नहीं है। आनंद के भीतर भविष्य का वियोग पहले से उपस्थित है। इस प्रकार सुख और दुःख यहाँ दो अलग-अलग अवस्थाएँ नहीं रह जाते, बल्कि एक-दूसरे में अंतर्निहित अनुभव बन जाते हैं। यही आधुनिक भावबोध की सबसे बड़ी विडंबना है कि मनुष्य अपनी प्रसन्नता को भी निश्चिंत होकर जी नहीं पाता, क्योंकि उसे उसके समाप्त हो जाने की पूर्वानुभूति बनी रहती है।
कविता का समापन—”कि तुम हो और / हम अकेले हैं“—हिन्दी कविता की अत्यंत अर्थगर्भित पंक्तियों में गिना जा सकता है। यहाँ ‘हो’ और ‘अकेले’ के बीच उपस्थित विरोधाभास ही कविता का अंतिम सत्य है। सामान्यतः किसी के होने का अर्थ अकेलेपन का समाप्त होना माना जाता है, परंतु यहाँ किसी का होना ही अकेलेपन को और अधिक स्पष्ट कर देता है। यह अकेलापन भौतिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और अस्तित्वगत है। दो मनुष्य एक-दूसरे के सामने उपस्थित हैं, फिर भी उनके बीच संवाद का वह सेतु नहीं है जो अकेलेपन को समाप्त कर सके। यही आधुनिक संबंधों की सबसे गहरी त्रासदी है कि निकटता का बाहरी रूप बना रहता है, जबकि आत्मीयता का आंतरिक आधार क्षीण हो चुका होता है।
भाषा की दृष्टि से कविता का शिल्प अत्यंत संयमित है। इसमें कोई अलंकारिक चमत्कार, जटिल बिंब या दार्शनिक शब्दावली नहीं है। कवि बोलचाल की भाषा में ऐसी संरचना निर्मित करते हैं कि साधारण शब्द असाधारण अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। “आदत”, “व्यवधान”, “फिर से”, “लेकिन” और “अकेले” जैसे सामान्य शब्द पूरी कविता में गहरे सांकेतिक अर्थों से भर उठते हैं। यही कारण है कि कविता अपने कथ्य से अधिक अपने मौन में बोलती है। पंक्तियों के बीच उपस्थित विराम, कथन की मितव्ययिता और भावों का संयम पाठक को उन रिक्त स्थानों को स्वयं भरने के लिए प्रेरित करता है जिन्हें कवि जानबूझकर अनकहा छोड़ देता है।
इस प्रकार ‘व्यवधान’ आधुनिक मनुष्य की उस मनःस्थिति का सशक्त कवित्वपूर्ण दस्तावेज़ है जिसमें स्मृति एक बोझ बन जाती है, विस्मृति जीवन की आवश्यकता और अकेलापन एक अर्जित आदत। कुमार अम्बुज प्रेम का महिमामंडन नहीं करते, न ही विरह का विलाप करते हैं; वे उस भावनात्मक थकान का सूक्ष्म चित्र प्रस्तुत करते हैं जहाँ मनुष्य अपने ही बनाए हुए संतुलन को टूटने से बचाना चाहता है। इसीलिए प्रिय का आगमन स्वागत नहीं, बल्कि “व्यवधान” बन जाता है। कविता अंततः इस कठोर सत्य की ओर संकेत करती है कि समकालीन जीवन में सबसे बड़ी त्रासदी किसी का दूर होना नहीं, बल्कि किसी के होते हुए भी संबंध का अनुपस्थित हो जाना है।
मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से देखें तो यह कविता ‘शोक की प्रक्रिया’ (Mourning Process) का एक जीवंत दस्तावेज़ है। सिगमंड फ्रायड के अनुसार, जब कोई प्रिय वस्तु या व्यक्ति हमसे दूर होता है, तो हमारा ‘ईगो’ (अहं) अपनी ऊर्जा (Libido) को उस वस्तु से धीरे-धीरे वापस खींचने की कोशिश करता है ,ताकि वह स्वयं को नष्ट होने से बचा सके। कविता की पंक्तियाँ—”तुम्हारे बिना रह सकने की / बनती जा रही हमारी आदत”—इसी ऊर्जा के पुनर्निवेश को दर्शाती हैं। यहाँ ‘आदत’ शब्द बहुत महत्त्वपूर्ण है। यह आदत वास्तव में मन का एक सुरक्षा तंत्र है। जब दुःख बहुत गहरा और स्थायी हो जाता है, तो मन उसे एक सामान्य स्थिति मानकर उसके साथ सामंजस्य बिठा लेता है।
कविता में ‘व्यवधान’ शब्द का प्रयोग चौंकाने वाला है। सामान्यतः किसी प्रिय व्यक्ति का आगमन उत्सव होना चाहिए, लेकिन कवि इसे एक ‘बाधा’ की तरह देखता है। यह मनोविश्लेषण की उस स्थिति को दर्शाता है जिसे ‘ट्रॉमा का पुनरागमन’ कहा जा सकता है। व्यक्ति ने बड़ी मुश्किल से अपनी भावनाओं को अनुशासित किया था, अपने अकेलेपन को एक ढाँचे में ढाला था, और प्रिय की उपस्थिति उस ढाँचे को तोड़ देती है। यह उपस्थिति सुखद तो है -“तुम्हें देखकर ख़ुशी होती है”, लेकिन यह ख़ुशी एक चेतावनी की तरह आती है। यह याद दिलाती है कि जिसे हमने भुलाने या जिसके बिना जीने का अभ्यास कर लिया था, वह अब भी मौजूद है। यह मौजूदगी उस ‘पौरुष’ या ‘शक्ति’ को चुनौती देती है जो हमने अकेले रहकर अर्जित की थी।
मनोसामाजिक दृष्टिकोण से, यह कविता आधुनिक मनुष्य के अकेलेपन और संबंधों के विखंडन की कहानी है। ‘नव-फ्रायडवादी’ (Neo-Freudian) विकासात्मक मनोवैज्ञानिक और मनोविश्लेषक तथा ‘मनो-सामाजिक विकास का सिद्धांत’ (Theory of Psychosocial Development) के जनक एरिक एरिक्सन(Erik Homburger Erikson,1902-1994) के अनुसार, मनुष्य की पहचान उसके संबंधों से बनती है, लेकिन आधुनिक समाज में व्यक्ति ‘अलगाव’ (Alienation) को अपनी पहचान का हिस्सा बना चुका है। ‘व्यवधान’ कविता का नायक या प्रेमास्पद उस समाज का प्रतिनिधि है जिसने अभाव को ही अपनी नियति मान लिया है। यहाँ “संसार में होने” की याद दिलाना एक दार्शनिक चोट है। जब व्यक्ति किसी के बिना रहना सीख जाता है, तो वह एक तरह के ‘आंतरिक निर्वासन’ में चला जाता है। प्रिय व्यक्ति का आना उसे वापस उस भौतिक संसार की याद दिलाता है जहाँ रिश्ते, उम्मीदें और फिर उनसे मिलने वाले दुख मौजूद हैं।
कविता के अंत में जो विरोधाभास है—”कि तुम हो और / हम अकेले हैं”—वह मनोवैज्ञानिक सत्य का चरम है। यह ‘सामूहिक अकेलेपन’ की स्थिति है। एक व्यक्ति का होना दूसरे के अकेलेपन को कम नहीं करता, बल्कि उसे और अधिक परिभाषित कर देता है। सामाजिक मनोविज्ञान में इसे ‘शारीरिक उपस्थिति बनाम भावनात्मक अनुपस्थिति’ के रूप में देखा जा सकता है। प्रिय का होना अब साथ होने का आश्वासन नहीं, बल्कि उस दूरी का पैमाना बन गया है जिसे अब पाटा नहीं जा सकता।
‘व्यवधान’ कविता यह भी रेखांकित करती है कि ‘स्मृति’ किस प्रकार एक बोझ बन जाती है। मनोविश्लेषण में ‘दमन’ (Repression) एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। हम अक्सर उन यादों को दबा देते हैं जो हमें विचलित करती हैं। लेकिन जब वह व्यक्ति साक्षात सामने आता है, तो वह सारा दमित भाव (Suppressed emotions) सतह पर आ जाता है। इसीलिए उसका आना एक ‘व्यवधान’ है, क्योंकि वह उस शांति को भंग कर देता है जो ‘भूल जाने’ से पैदा हुई थी। यह कविता हमें बताती है कि इंसान सबसे ज्यादा उस समय थका हुआ महसूस करता है जब उसे एक ही दुःख को बार-बार नए सिरे से सहने के लिए मजबूर किया जाता है। “कि अब फिर से शुरू करना होगा / तुम्हारे बिना रहना”—यह पंक्ति उस मनोवैज्ञानिक थकान (Emotional Fatigue) की पराकाष्ठा है।
‘व्यवधान’ कविता मानव मन की उस परतों को खोलती है जहाँ प्रेम केवल मिलन नहीं, बल्कि एक कठिन अभ्यास है। यह अभ्यास जब टूटता है, तो खुशी से ज्यादा एक घबराहट पैदा होती है। यह कविता आज के दौर के उस मनुष्य का मनोवैज्ञानिक चित्र है जो रिश्तों की अस्थिरता के बीच अपनी ‘अकेलेपन की आदत’ को ही अपना सबसे सुरक्षित घर मानता है।
‘सत्यातीत’(पोस्ट-ट्रुथ) युग केवल सूचनाओं या राजनीति के हेरफेर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने हमारे निजी संबंधों और ‘प्रेम’ की मौलिक अवधारणा को भी गहराई से प्रभावित किया है। ‘व्यवधान’ कविता इस दौर में प्रेम के बदलते स्वरूप, उसकी भंगुरता और उसमें समाहित ‘सुविधाजनक अकेलेपन’ का एक सटीक समाजशास्त्रीय दस्तावेज़ है।
‘सत्यातीत’ युग की सबसे बड़ी विशेषता है ‘वस्तुनिष्ठ सत्य’ (Objective Truth) का अंत और ‘व्यक्तिगत धारणाओं’ (Personal Perceptions) का हावी होना। प्रेम के संदर्भ में इसका अर्थ यह है कि अब प्रेम ‘शाश्वत मिलन’ की तड़प के बजाय ‘व्यक्तिगत स्पेस’ और ‘मानसिक अनुकूलन’ का विषय बन गया है। कविता की शुरुआती पंक्तियाँ—”तुम जब भी यहाँ आते हो / जैसे यह याद दिलाने के लिए / कि तुम अभी इसी संसार में हो”—उस विखंडन को दर्शाती हैं जहाँ प्रेमी एक-दूसरे की वास्तविकता से कट चुके हैं। आज के दौर में डिजिटल आभास (Digital Presence) इतना हावी है कि किसी का ‘साक्षात’ आना एक सुखद अनुभव होने के बजाय एक ‘विस्मय’ या ‘व्यवधान’ बन जाता है। यह उस ‘सत्य’ की ओर इशारा है जहाँ व्यक्ति की छवि (Image) उसकी वास्तविकता से बड़ी हो गई है।
इस युग में ‘प्रेम’ अब आत्मोसर्ग नहीं, बल्कि एक ‘प्रबंधन’ है। कविता में जो “तुम्हारे बिना रह सकने की / बनती जा रही हमारी आदत” का जिक्र है, वह इसी भावनात्मक प्रबंधन को दिखाता है।‘सत्यातीत’ (पोस्ट-ट्रुथ) समाज में हम हानि (लॉस) को बहुत जल्दी निस्तारित (प्रोसेस) करना चाहते हैं। हम दुःख में डूबने के बजाय उससे आगे बढ़ जाने (‘मूव ऑन’ करने) को अपनी सफलता मानते हैं। ऐसे में किसी पुराने प्रेम का वापस आना उस साँचे में ढली ज़िंदगी (प्रोसेस्ड लाइफ) में एक बाधा की तरह है। यह उस भावात्मक अनुकूलन (Emotional Programming) को भंग कर देता है जिसे व्यक्ति ने बड़ी मेहनत से अकेलेपन की ‘आदत’ डालकर सुचारू बनाया था। प्रिय की उपस्थिति उस संसाधित (Processed) शांति को चुनौती देती है और यह याद दिलाती है कि जिसे हम अतीत-त्याग (Move-on) करना समझ रहे थे, वह वास्तव में भावनाओं का केवल एक यांत्रिक विस्थापन (Mechanical Displacement) था। अतः, यह वापसी किसी उत्सव के बजाय एक प्रणालीगत त्रुटि या ‘व्यवधान’ की तरह महसूस होती है, क्योंकि यह हमें उस शून्य पर लौटने को मजबूर करती है जहाँ से हमने खुद को पुनर्स्थापित (Reset) करने का श्रमसाध्य कार्य शुरू किया था। यह उस आधुनिक स्व-मोह (‘नार्सिसिज्म’) को भी झलकाता है जहाँ व्यक्ति अपने द्वारा निर्मित ‘अकेलेपन के घेरे’ को किसी भी इंसानी दख़लअंदाज़ी से बचाना चाहता है।
प्रेम की पारंपरिक अवधारणा में ‘प्रतीक्षा’ एक मूल्य थी, लेकिन इस उत्तर-सत्य युग में ‘विस्मृति’ एक कौशल बन गई है। कविता की यह पंक्ति—”कि अब फिर से शुरू करना होगा / तुम्हारे बिना रहना”—उस थकान को व्यक्त करती है जो बार-बार खुद को ‘रीसेट’ करने से पैदा होती है। आज के उपभोक्तावादी समाज में रिश्ते भी ‘डिस्पोजेबल’ वस्तुओं की तरह हैं। जब हम किसी के बिना रहना ‘सीख’ लेते हैं, तो वह हमारी एक उपलब्धि बन जाती है। प्रिय का पुनरागमन उस उपलब्धि को शून्य कर देता है। यहाँ प्रेम अब हृदय का विषय न रहकर ‘आदत’ और ‘असुविधा’ के बीच का संघर्ष बन गया है।
‘सत्यातीत’ युग में भावनाएँ ‘तरल’ (Liquid) हो गई हैं, जैसा कि आधुनिक रिश्तों की बदलती प्रकृति पर एक बहुत ही गहरी और सटीक टिप्पणी करते हुए पोलिश समाजशास्त्री ज़िगमुंट बॉमन (Zygmunt Bauman,1925-2017) ‘लिक्विड लव’ (Liquid Love: On the Frailty of Human Bonds) में कहते हैं कि हमारी आज की दुनिया “तरल” (Liquid) हो गई है, जहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है और आधुनिक समाज में प्रेम और मानवीय संबंध बिलकुल बदल गए हैं । बॉमन के अनुसार, आधुनिक व्यक्ति ऐसे रिश्ते चाहता है जिन्हें वह जब चाहे “डिलीट” या “कैंसिल” कर सके। लोग गहराई (Depth) के बजाय विस्तार (Quantity) चाहते हैं। रिश्तों में अब ‘स्थायित्व’ की जगह ‘सुविधा’ ने ले ली है। यदि साथी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता, तो उसे ठीक करने के बजाय “बदलना” आसान माना जाता है। बॉमन कहते हैं कि आधुनिक इंसान स्वतंत्रता तो चाहता है, जो किसी बंधन में न बंधने से मिलती है,पर वह अकेलेपन (Loneliness) से भी डरता है, जिससे बचने का एकमात्र रास्ता गहरे और स्थायी रिश्ते हैं जो प्रतिबद्धता की दरकार रखते हैं। व्यवधान कविता का अंत—”कि तुम हो और / हम अकेले हैं”—वस्तुत: बॉमन द्वारा कथित इसी तरलता की पराकाष्ठा है। यह इस कड़वे सच को उजागर करता है कि दो व्यक्तियों का एक ही स्थान पर होना अब उनके ‘साथ’ होने की गारंटी नहीं है। यह प्रेम की उस नई परिभाषा को गढ़ता है जहाँ ‘अकेलापन’ साथ होने का विलोम नहीं, बल्कि साथ होने की एक अनिवार्य शर्त बन गया है। हम दूसरे की उपस्थिति को स्वीकार तो करते हैं, लेकिन अपनी ‘अकेलेपन की आदत’ को छोड़ने की कीमत पर नहीं।
यह रचना ‘सत्यातीत’ या पोस्ट-ट्रुथ युग के उस मनुष्य का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है जो प्रेम तो करना चाहता है, लेकिन अपनी ‘कम्फर्ट ज़ोन’ या ‘सुविधाजनक विरक्ति’ में किसी भी प्रकार का व्यवधान बर्दाश्त नहीं करना चाहता। यह कविता प्रेम के रोमांटिक गौरव का गान नहीं करती, बल्कि उसकी ‘थकान’ और ‘अनिवार्यता’ के बीच फँसे आधुनिक मनुष्य का चेहरा दिखाती है।
उपभोक्तावादी संस्कृति और बाज़ारवाद के चश्मे से कुमार अम्बुज की ‘व्यवधान’ कविता का विश्लेषण करने पर प्रेम की एक ऐसी डरावनी लेकिन वास्तविक तस्वीर उभरती है, जहाँ भावनाएँ भी ‘उपयोगिता’ (Utility) और ‘लागत-लाभ’ (Cost-Benefit) के तराजू पर तौली जाती हैं। बाज़ारवाद ने मनुष्य को केवल एक ‘उपभोक्ता’ ही नहीं बनाया, बल्कि उसने उसके हृदय को भी एक ‘मार्केटप्लेस’ में तब्दील कर दिया है।
बाज़ारवाद का सबसे पहला नियम है—’सुविधा’। उपभोक्तावादी संस्कृति में हर वह चीज़ ‘बाधा’ या ‘व्यवधान’ है जो हमारी दिनचर्या की सहजता को रोकती है। प्रेम, जो पारंपरिक रूप से ‘असुविधा’ और ‘समर्पण’ का मार्ग था, अब बाज़ार के प्रभाव में ‘सुलभ’ और ‘घर्षण-रहित’ बनाया जा रहा है। कविता की पंक्तियाँ—”तुम्हारे बिना रह सकने की / बनती जा रही हमारी आदत में / तुम्हारा आना एक व्यवधान है”—इसी ‘सुविधा’ की मानसिकता को रेखांकित करती हैं। बाज़ार ने हमें सिखाया है कि जो चीज़ उपलब्ध नहीं है, उसके बिना जीना सीख लेना ही ‘स्मार्टनेस’ है। ऐसे में प्रेमी का अचानक आना उस ‘इमोशनल स्टेबिलिटी’ के लिए एक ‘ख़तरा’ या ‘बग’ की तरह है, जिसे हमने बहुत मेहनत से प्रोग्राम किया था।
बाज़ारवाद प्रतिस्थापनीयता (रिप्लेसेबिलिटी) के सिद्धांत पर चलता है। अगर एक वस्तु नहीं है, तो दूसरी उसकी जगह ले लेगी। कविता में “आदत” का बनना वास्तव में भावनाओं का वस्तूकरण (कोमोडिफिकेशन) है। हममें से अनेक लोग प्रेम को एक उत्पाद की तरह इस्तेमाल करते हैं, और जब वह चला जाता है , तो हम उसके ‘अभाव’ को ही अपना नया उत्पाद बना लेते हैं । प्रिय की उपस्थिति अब उस ‘इनवेंटरी’ को ख़राब करती है जिसे हमने अपने अकेलेपन से सजाया है। बाज़ार हमें आत्मनिर्भर (सेल्फ-सफ़िशिएंट) बनने का लालच देता है, लेकिन यह आत्मनिर्भरता वास्तव में एक गहरा अलगाव है। “कि अब फिर से शुरू करना होगा / तुम्हारे बिना रहना” यह पंक्ति उस ‘उपभोक्ता’ की हताशा है जिसे एक ही ‘सब्सक्रिप्शन’ को बार-बार ‘कैंसिल’ और ‘रीस्टोर’ करना पड़ रहा है। यह भावनात्मक निवेश की वह थकान है जहाँ ‘रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट’ (ROI) शून्य हो चुका है।
पूँजीवादी व्यवस्था में ‘समय’ सबसे बड़ी मुद्रा है। किसी के आने पर उसे समय देना, अपनी भावनाओं को फिर से संगठित करना और उसके जाने के बाद फिर से खुद को सँभालना—यह सब एक ‘अनुत्पादक’ कार्य है। कविता में जो ‘व्यवधान’ है, वह दरअसल उत्पादकता या ‘प्रोडक्टिविटी’ में लगने वाली सेंध है। आधुनिक प्रेमी अब तीव्रता (‘इंटेंसिटी’) से डरता है क्योंकि तीव्रता काम करने की क्षमता को प्रभावित करती है। इसीलिए, प्रिय को देखकर होने वाली ‘ख़ुशी’ भी एक अपराधबोध (गिल्ट) के साथ आती है क्योंकि वह याद दिलाती है कि हम अब भी भावनाओं के गुलाम हैं, जबकि बाज़ार हमें तर्कसंगत और मशीनी बनाना चाहता है।
बाज़ारवाद ने ‘स्पेस’ (स्थान) की अवधारणा को भी बदल दिया है। “तुम हो और / हम अकेले हैं” यह उस निजी संपत्ति (‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’) का मनोवैज्ञानिक विस्तार है जहाँ एक ही छत के नीचे रहते हुए भी दो लोग अलग-अलग उपभोग के बुलबुले (कंजम्पशन बबल) में रहते हैं। यह अति-व्यक्तिवाद (हाइपर-इंडिविजुअलिज्म) का दौर है जहाँ दूसरे की मौजूदगी केवल तभी तक स्वीकार्य है जब तक वह हमारे व्यक्तिगत सुख में बाधा न बने। प्रेम अब ‘साझा भविष्य’ का निर्माण नहीं, बल्कि ‘सह-अस्तित्व’ का एक समझौता मात्र रह गया है।
यह कविता बाज़ार के उस क्रूर सत्य को उजागर करती है जहाँ मानवीय गरिमा और प्रेम जैसे उदात्त भाव भी ‘लॉजिस्टिक’ की समस्या बनकर रह गए हैं। यह उस ‘इमोशनल कैपिटलिज्म’ का दस्तावेज़ है जहाँ हृदय अब भावनाओं का घर नहीं, बल्कि एक ‘प्रोसेसिंग यूनिट’ है जो केवल उन्हीं डेटा (यादें या लोग) को रखना चाहता है जो सिस्टम को सुचारू रूप से चलाने में मदद करें।
‘व्यवधान’ कविता को जब हम नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन जैसे प्रगतिशील कवियों की प्रेम कविताओं के बरक्स रखते हैं, तो हमें आधुनिक भावबोध और पारंपरिक प्रगतिशील चेतना के बीच का एक गहरी दरार दिखाई देती है। नागार्जुन के यहाँ प्रेम ‘मिट्टी और पसीने’ की महक से भरा है। उनकी कविता “याद आता है तुम्हारा सिन्दूर तिलकित भाल” में दूरी एक तड़प पैदा करती है जो मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़ती है। नागार्जुन का नायक विछोह में भी ‘जीवंत’ है; वह यादों को एक संबल की तरह इस्तेमाल करता है। इसके विपरीत, कुमार अम्बुज के यहाँ यादें ‘संबल’ नहीं, बल्कि ‘खलल’ बन गई हैं। अम्बुज का वैशिष्ट्य इस बात में है कि वे प्रेम को किसी उदात्त या रूमानी ऊँचाई पर बिठाने के बजाय उसे ‘दैनिक अनुकूलन’ के धरातल पर ले आते हैं जो हमारे ज़माने की सचाई है । दूसरे शब्दों में, नागार्जुन के यहाँ प्रेम का अभाव एक सामाजिक पीड़ा है, वहीं अम्बुज के यहाँ यह एक निजी प्रबंधन की समस्या है।
केदारनाथ अग्रवाल ‘केन’ के किनारे बैठकर प्रेम का जो उल्लास गाते हैं—”हे मेरी तुम! / राग विराग भरी पंखुरियाँ”—वह एक तरह की ‘आदिम ऊर्जा’ और ‘प्राकृतिक तृप्ति’ का संसार है। केदार के यहाँ प्रेम में एक ‘सृजनात्मक विस्तार’ है; वहाँ प्रेमी का होना संसार को सुंदर बनाता है। लेकिन कुमार अम्बुज की कविता ‘व्यवधान’ में प्रेमी का होना संसार को ‘अव्यवस्थित’ कर देता है। यहाँ प्रिय का चेहरा देखकर होने वाली खुशी भी एक प्रकार की ‘थकान’ से लिपटी हुई है। केदार प्रेम को एक ‘उपलब्धि’ की तरह देखते हैं, जबकि अम्बुज उसे ‘पुनरावृत्ति के श्रम’ (Labour of Repetition) के रूप में देखते हैं। अम्बुज का वैशिष्ट्य उनकी उस क्रूर ईमानदारी में है जहाँ वे स्वीकार करते हैं कि एक ही व्यक्ति के बिना बार-बार जीना शुरू करना मनुष्य को भीतर से रिक्त कर देता है।
त्रिलोचन के ‘सोनेट’ प्रेम को एक दार्शनिक गरिमा और ‘धैर्य’ प्रदान करते हैं। त्रिलोचन के यहाँ प्रेम ‘साधना’ है, जिसमें दूरी भी आत्मीयता का हिस्सा है। वे कहते हैं—”छोटा-सा घर होगा, बादल-सा जीवन होगा।” यहाँ एक भविष्य की संभावना और निरंतर संवाद की उम्मीद है। मगर कुमार अम्बुज के यहाँ ‘भविष्य’ जैसी कोई रूमानी कल्पना नहीं बची है। यहाँ केवल ‘वर्तमान’ को सँभालने की जद्दोजहद है। अम्बुज की कविता में संवाद टूट चुका है और उसकी जगह ‘आदत’ ने ले ली है। त्रिलोचन का नायक अकेलेपन में भी ‘पूर्ण’ महसूस करता है क्योंकि उसके पास स्मृतियों की पूँजी है, जबकि अम्बुज का नायक स्मृतियों को ‘व्यवधान’ मानता है, क्योंकि वे उसे उस ‘शून्य’ से बाहर खींच लाती हैं जिसे उसने बहुत जतन से अपना घर बनाया था।
कुमार अम्बुज का असली वैशिष्ट्य उनकी ‘मनोवैज्ञानिक तटस्थता’ में है। वे प्रेम के उस मिथक को तोड़ते हैं कि ‘मिलन’ हमेशा सुखद होता है। ‘पोस्ट-ट्रुथ’ और बाज़ारवाद के इस दौर में, जहाँ मानवीय संवेदनाएँ भी ‘डिस्पोजेबल’ हो गई हैं, अम्बुज यह दिखाने का साहस करते हैं कि मनुष्य अब इतना थक चुका है कि वह प्रेम की ऊष्मा से ज्यादा अपने अकेलेपन की ‘ठंडक’ को सुरक्षित रखना चाहता है। “तुम हो और / हम अकेले हैं”—यह पंक्ति प्रगतिशील त्रयी की उस ‘सामूहिकता’ पर गहरी चोट है जहाँ साथ होने का मतलब एक होना होता था। अम्बुज यहाँ चरम व्यक्तिवाद के उस कड़वे सच को दर्ज कर रहे हैं जहाँ दो व्यक्तियों का शारीरिक सान्निध्य उनके बीच की भावनात्मक खाई को और बढ़ा देता है।
इन पूर्ववर्ती कवियों के यहाँ प्रेम एक ‘क्रांतिकारी ऊर्जा’ थी, जो व्यक्ति को संसार से लड़ने की शक्ति देती थी। अम्बुज के यहाँ प्रेम एक ‘ऊर्जा-व्यय’ है, जो व्यक्ति को खुद से ही लड़ने पर मजबूर कर देता है। यह उत्तर-आधुनिक मनुष्य की वह नियति है जहाँ वह किसी के बिना रहना ‘सीख’ लेना ही अपनी सबसे बड़ी जीत मानता है। यही वह बिंदु है जहाँ कुमार अम्बुज अपनी विशिष्ट पहचान बनाते हैं—वे प्रेम का गान नहीं करते, बल्कि प्रेम के ‘अवशेषों’ और उनसे निपटने की ‘थकान’ का समाजशास्त्र रचते हैं।
कुमार अम्बुज की इस कविता का भाषाई शिल्प इतना पारदर्शी है कि वह अपनी सादगी में ही सबसे अधिक मारक हो जाता है। यहाँ भाषा किसी अलंकार या भारी-भरकम शब्दों का सहारा नहीं लेती, बल्कि वह ‘मौन’ और ‘ठहराव’ के बीच से अपना अर्थ निकालती है। रेमण्ड विलियम्स की शब्दावली में कहें ,तो कविता में प्रयुक्त ‘आदत’ शब्द इस पूरी रचना का केंद्र बिंदु या ‘कीवर्ड’ है। सामान्यतः प्रेम में ‘स्मृति’, ‘तड़प’ या ‘इंतजार’ जैसे शब्द प्रयुक्त होते हैं, लेकिन अम्बुज ‘आदत’ शब्द चुनते हैं। समाजशास्त्र और मनोविज्ञान में आदत का अर्थ है—किसी प्रक्रिया का इतना स्वाभाविक हो जाना कि उसके लिए सचेत प्रयास न करना पड़े। जब कवि कहता है कि “तुम्हारे बिना रह सकने की / बनती जा रही हमारी आदत”, तो वह प्रेम के ‘वि-रोमानीकरण’ (De-romanticization) की घोषणा करता है। यहाँ प्रेम कोई दैवी प्रेरणा नहीं, बल्कि एक ‘मैकेनिकल’ या यांत्रिक प्रक्रिया बन गया है जिससे पीछा छुड़ाना ही अब शांति है।
कविता का बिंब-विधान अमूर्त है। यहाँ कोई दृश्य नहीं है, बल्कि एक ‘मनोदशा’ का बिंब है। “व्यवधान” शब्द स्वयं में एक बहुत बड़ा बिंब है। यह किसी चलते हुए संगीत में बेसुरा स्वर पड़ जाने जैसा है या किसी सलीके से सजी हुई मेज के बिखर जाने जैसा। प्रगतिशील कवियों के यहाँ बिंब अक्सर बाहरी प्रकृति से आते थे, जैसे नदी, पहाड़ या लहलहाती फसलें। अम्बुज के यहाँ बिंब ‘आंतरिक भूगोल’ से आते हैं। “संसार में होने” की याद दिलाना एक ऐसा बिंब है जो व्यक्ति को उसकी सुरक्षात्मक गुफा से बाहर खींच लाता है। यह गुफा ‘अकेलेपन’ की है, जिसे आधुनिक मनुष्य ने अपने चारों ओर बड़ी मेहनत से बुना है।
कविता की संरचना में ‘विराम’ (Pauses) का बहुत महत्त्व है। “कि अब फिर से शुरू करना होगा / तुम्हारे बिना रहना”—इन पंक्तियों के बीच का ख़ाली स्थान उस हताशा को भरता है जिसे शब्द नहीं कह पाते। यह ‘शून्य’ ही वह जगह है जहाँ पाठक खुद को खड़ा पाता है। यहाँ भाषा ‘कथन’ से ज्यादा ‘अवस्था’ का बयान कर रही है। ‘फिर से शुरू करना’ एक ऐसी थका देने वाली क्रिया है जो किसी ‘सिसीफस’ (Sisyphus) के श्रम की याद दिलाती है, जिसे बार-बार पत्थर ऊपर ले जाना है और वह पत्थर बार-बार नीचे गिर जाता है। यहाँ पत्थर ‘किसी के बिना रहने का अभ्यास’ है, जो प्रिय के आते ही गिर जाता है।
कवि अम्बुज ने ‘ख़ुशी’ शब्द का प्रयोग जिस तरह किया है, वह बेहद जटिल है। “तुम्हें देखकर ख़ुशी होती है / लेकिन वह याद दिलाती है”—यहाँ ‘लेकिन’ शब्द पूरी कविता की धुरी को घुमा देता है। यह खुशी विरेचन या ‘कैथार्सिस’ नहीं लाती, बल्कि एक नया ‘संकट’ खड़ा कर देती है। यह आधुनिक भावबोध की सबसे बड़ी सच्चाई है कि हम अपनी ख़ुशियों से भी डरने लगे हैं क्योंकि वे पुराने घावों को हरा कर देती हैं। कविता का अंत किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता, बल्कि एक ‘ठहरे हुए अकेलेपन’ पर जाकर रुक जाता है। “तुम हो और / हम अकेले हैं” में ‘और’ शब्द प्रेमी और प्रेमिका के बीच की उस खाई को और गहरा कर देता है जिसे पाटना नामुमकिन है।
इस प्रकार, कविता की भाषा और शिल्प उस ‘अकेलेपन’ को एक ठोस रूप देते हैं जो हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना है। वे शब्दों को बहुत मितव्ययिता से खर्च करते हैं, जैसे कि वे खुद भी उस ‘व्यवधान’ से बचना चाहते हों। यह कविता अपनी बुनावट में जितनी सरल दिखती है, अपने अर्थ-विस्तार में उतनी ही भयावह और सच है। यह भाषा के स्तर पर उस ‘न्यूनतमवाद’ (Minimalism) का उदाहरण है जहाँ कम से कम कहकर सबसे अधिक बेचैन किया जाता है।
इस कविता में ‘समय’ (Time) और ‘अंतराल’ (Space) का दर्शन कोई दार्शनिक विलासिता नहीं, बल्कि एक अस्तित्वगत संकट की अभिव्यक्ति है। यहाँ समय एक सीधी रेखा में नहीं चलता, बल्कि वह एक ‘वृत्ताकार चक्र’ (Cyclical Trap) की तरह है। जब कवि कहता है कि “अब फिर से शुरू करना होगा”, तो वह समय की उस क्रूरता को रेखांकित करता है जहाँ मनुष्य प्रगति नहीं कर रहा, बल्कि बार-बार उसी शून्य पर लौट रहा है जहाँ से उसने दुःख को जीतना शुरू किया था। आधुनिक काल-बोध में समय एक ‘घाव भरने वाला’ तत्त्व नहीं है, जैसा कि पुरानी कविताओं में माना जाता था (“समय हर जख्म भर देता है”)। यहाँ समय एक ‘अभ्यास’ है। समय बीतने का अर्थ केवल ‘दूरी’ का बढ़ना है, और इस बढ़ती दूरी को ही कवि “आदत” कहता है।
इस कविता में अंतराल की अवधारणा और भी सूक्ष्म है। यहाँ दो तरह के अंतराल काम कर रहे हैं—एक वह भौतिक अंतराल जो प्रेमी और प्रेमिका के बीच है, और दूसरा वह मनोवैज्ञानिक अंतराल जिसे व्यक्ति ने अपने भीतर अपने ‘स्व’ को बचाने के लिए निर्मित किया है। प्रिय का आना इस निजी अंतराल का अतिक्रमण है। जब कोई “यहाँ आता है”, तो वह केवल एक भौगोलिक दूरी तय नहीं करता, बल्कि वह उस ‘भावनात्मक व्यवस्था’ में प्रवेश करता है जिसे व्यक्ति ने बड़ी मुश्किल से ‘ख़ाली’ (Empty) रखा था। यह खालीपन ही आधुनिक मनुष्य की शांति है। बाज़ारवाद और उपभोक्तावाद ने हमें सिखाया है कि अपने ‘निजी स्पेस’ को किसी भी बाहरी दख़लअंदाज़ी से बचाकर रखना ही आज़ादी है। अतः, प्रिय का आगमन उस स्वतंत्रता में एक “व्यवधान” की तरह महसूस होता है।
कविता का अंतिम हिस्सा—”कि तुम हो और / हम अकेले हैं”—समय और अंतराल के मिलन का चरम बिंदु है। यहाँ ‘होना’ एक क्रिया नहीं, बल्कि एक ‘तथ्य’ बन गया है जो केवल दूरी को और अधिक स्पष्ट करता है। यह अंतराल इतना बड़ा हो चुका है कि अब उसे मिलन से नहीं भरा जा सकता। भौतिक रूप से प्रेमी-प्रेमिका एक ही अंतराल में मौजूद हो सकते हैं, लेकिन समय के स्तर पर वे अलग-अलग लोकों में जी रहे हैं। एक वह है जिसने अपनी उपस्थिति से “याद दिलाया” और दूसरा वह है जो “अकेले रहने की आदत” में निवेश कर चुका है। यहाँ समय ‘साथ बिताने’ की इकाई नहीं है, बल्कि ‘अकेलेपन को सहने’ की माप है।
यह कविता उस विडम्बना को जड़ से पकड़ती जहाँ आधुनिक मनुष्य का संकट ‘अकेलापन’ नहीं है, बल्कि ‘अकेलेपन का भंग होना’ बन चुका है। हम उस युग में हैं जहाँ हम दूसरे के अस्तित्व को तो स्वीकार करते हैं (“कि तुम हो”), लेकिन उस अस्तित्व के साथ जुड़ने की ऊर्जा खो चुके हैं। यह ‘समय’ की वह अवस्था है जिसे हम ‘स्थिरता’ कह सकते हैं, जहाँ व्यक्ति किसी नए अनुभव या किसी पुराने अनुभव की वापसी से भी घबराता है। यह कविता स्पष्ट करती है कि अब प्रेम में ‘शाश्वतता’ की आकांक्षा नहीं बची है, बल्कि केवल ‘समय को किसी तरह काट लेने’ की व्याकुलता है।
इस प्रकार ‘व्यवधान’ कविता महज़ एक साधारण कविता नहीं, बल्कि आधुनिक मानवीय संबंधों का एक ‘पोस्टमॉर्टम’ प्रतीत होती है। यह हमें उस ठंडे सच के आमने-सामने खड़ा करती है जहाँ प्रेम अब मुक्ति का मार्ग नहीं, बल्कि उस ‘एकरसता’ (Monotony) को तोड़ने वाला एक अनचाहा झटका है, जिसे हमने सुरक्षा मान लिया था। ‘व्यवधान’ में जिस अकेलेपन की अभिव्यक्ति हुई है, वह ज्यां पॉल सार्त्र और अल्बेयर कामू के अस्तित्ववादी दर्शन के बहुत निकट खड़ी दिखाई देती है, किंतु इसमें एक समकालीन भारतीय जटिलता भी शामिल है। सार्त्र के ‘नो एग्जिट’ नाटक में प्रसिद्ध कथन है—”दूसरे लोग नर्क हैं” (Hell is other people)। सार्त्र के अनुसार, जब कोई दूसरा व्यक्ति हमें देखता है, तो वह हमें एक ‘वस्तु’ में बदल देता है और हमारी स्वतंत्रता को बाधित करता है। ‘व्यवधान’ कविता में प्रिय का आना ठीक यही सार्त्रवादी संकट पैदा करता है। प्रिय की उपस्थिति केवल एक व्यक्ति की उपस्थिति नहीं है, बल्कि वह उन सभी पुरानी अपेक्षाओं, यादों और भूमिकाओं का पुनरागमन है जिनसे प्रेमास्पद मुक्त होना चाहता था। यहाँ प्रिय का ‘देखना’ प्रेमास्पद की उस स्वतंत्रता में बाधा है जो उसने अकेलेपन की “आदत” डालकर अर्जित की थी।
सार्त्र के ‘बीइंग एंड नथिंगनेस’ (Being and Nothingness) के आलोक में देखें, तो कविता का नायक अपने ‘शून्य’ (Nothingness) को सहेजने की कोशिश कर रहा है। वह अपने अकेलेपन में अपनी सत्ता को स्वयं परिभाषित कर चुका था। प्रिय का आना उस ‘शून्य’ को ‘उपस्थिति’ से भर देता है, जो नायक के लिए असहज है। यह सार्त्र की शब्दावली में ‘बैड फेथ’ (Bad Faith) या मिथ्या चेतना से बचने का संघर्ष भी है। नायक जानता है कि प्रिय के साथ होने की ख़ुशी अस्थायी है और वह फिर से उसे उसी अकेलेपन की ओर धकेलेगी। इसलिए, वह उस सुख को एक “व्यवधान” की तरह देखता है क्योंकि वह उसे उस कड़वे अस्तित्ववादी सत्य से विचलित करता है कि अंततः हर मनुष्य अकेला ही है।
अल्बेयर कामू के विसंगतिवाद (एब्सर्डिज्म) के संदर्भ में यह कविता और भी गहरी हो जाती है। कामू का ‘सिसीफस’ एक ही निरर्थक कार्य को बार-बार करने के लिए अभिशप्त है। कविता की पंक्तियाँ—”कि अब फिर से शुरू करना होगा / तुम्हारे बिना रहना”—ठीक सिसीफस के उस श्रम की याद दिलाती हैं। कामू के अनुसार, जीवन की निरर्थकता को जानते हुए भी उस कार्य को जारी रखना ही मनुष्य की नियति और उसकी विजय है। कविता में “अकेले रहने की आदत डालना” एक विसंगत (एब्सर्ड) कृत्य है। जब प्रिय लौटकर आता है, तो वह उस ‘चक्र’ को तोड़ देता है जिसे नायक ने बड़ी मुश्किल से संतुलित किया था। प्रिय का आना यह याद दिलाता है कि जिस दूरी को हम ‘जीत’ चुके थे, वह अभी भी एक घाव की तरह मौजूद है।
कामू के ‘अजनबी’ (The Stranger) का नायक मर्सो जिस तरह की तटस्थता दिखाता है, वैसी ही तटस्थता ‘व्यवधान’ कविता के स्वर में भी निहित है। यहाँ दुख का विलाप नहीं है, बल्कि एक ठंडी स्वीकृति है। सार्त्र और कामू दोनों ही मानते थे कि मनुष्य को अपने अस्तित्व की जिम्मेदारी स्वयं लेनी होगी। अम्बुज की कविता में “हम अकेले हैं” की घोषणा इसी जिम्मेदारी की स्वीकारोक्ति है। यह अकेलापन कोई सज़ा नहीं है, बल्कि एक तथ्य (फैक्ट) है। प्रिय की उपस्थिति इस तथ्य को और अधिक ‘एब्सर्ड’ बना देती है, क्योंकि वह साथ होने का भ्रम तो पैदा करती है, लेकिन अकेलेपन को मिटा नहीं पाती।
सार्त्र और कामू के दर्शन में ‘विकल्प’ की बड़ी महत्ता है। इस कविता में नायक ने ‘अकेलेपन’ को एक विकल्प के रूप में चुन लिया है। बाज़ारवाद और आधुनिकता के दबावों के बीच, जहाँ रिश्ते बहुत अस्थिर हैं, अकेलापन ही एकमात्र ‘स्थिर’ विकल्प बचता है। प्रिय का आना इस चुनाव को चुनौती देता है। सार्त्र जहाँ दूसरों के हस्तक्षेप को स्वतंत्रता का हनन मानते थे, वहीं अम्बुज इस कविता में दिखाते हैं कि आधुनिक प्रेम अब एक ऐसी ‘परस्पर अकेलेपन’ की स्थिति बन गया है जहाँ दो लोग साथ होकर भी अपनी-अपनी ‘अस्तित्ववादी शून्यता’ में क़ैद हैं।
यह अकेलापन वस्तुत: सार्त्र के ‘नर्क’ और कामू के ‘निरर्थक श्रम’ के बीच की एक ऐसी कड़ी है, जो यह बताती है कि समकालीन मनुष्य ने अपनी विसंगतियों के साथ समझौता करना सीख लिया है। प्रिय का आना यहाँ उत्सव नहीं, बल्कि उस ‘अस्तित्ववादी संतुलन’ का बिगड़ना है जिसे मनुष्य ने अपनी सुरक्षा के लिए गढ़ा था। यह कविता इस दार्शनिक निष्कर्ष पर पहुँचती है कि “होना” और “साथ होना” दो बिल्कुल अलग और कभी-कभी परस्पर विरोधी स्थितियाँ हैं।
कुमार अम्बुज की कविता ‘व्यवधान’ का यह मनोसामाजिक, मनोविश्लेषणात्मक और दार्शनिक विवेचन हमें मानवीय संबंधों के एक ऐसे मरुस्थल के सम्मुख खड़ा करता है, जहाँ प्रेम की हरियाली अब एक ‘बाधा’ की तरह महसूस होने लगी है। यह कविता समकालीन मनुष्य के उस भयावह सच का उद्घाटन करती है, जहाँ उसने ‘अभाव’ को ही अपना ‘स्वभाव’ बना लिया है।
इसलिए यह कविता प्रेम के उस पारंपरिक ढाँचे को पूरी तरह ध्वस्त कर देती है जहाँ प्रिय का आगमन दुखों का अंत माना जाता था। सत्यातीत (Post-truth) और बाज़ारवाद के इस जटिल दौर में, व्यक्ति ने अपनी भावनाओं का इतना अधिक अनुकूलन कर लिया है कि अब वह किसी भी नए संवेग से घबराने लगा है। यहाँ ‘अकेलापन’ कोई पीड़ा नहीं, बल्कि एक सुरक्षित दुर्ग है, और प्रिय की उपस्थिति उस दुर्ग की दीवारों में दरार की तरह है। सार्त्र और कामू के अस्तित्ववाद से लेकर आधुनिक उपभोक्तावादी मनोविज्ञान तक, यह कविता हर स्तर पर यह सिद्ध करती है कि आधुनिक मनुष्य ने ‘विस्मृति’ को एक जीवन-कौशल के रूप में विकसित कर लिया है।
कुमार अम्बुज की विशिष्टता उनकी उस भाषा में है जो बिना किसी शोर के एक गहरी बेचैनी पैदा करती है। वे हमें बताते हैं कि आज का सबसे बड़ा दुख यह नहीं है कि हम अकेले हैं, बल्कि यह है कि हम अब इस अकेलेपन के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि हमें किसी का ‘साथ’ भी एक ‘व्यवधान’ लगने लगा है। यह कविता मानवीय सभ्यता के उस भावनात्मक संकट का दस्तावेज़ है, जहाँ रिश्तों की ऊष्मा अब ‘ऊर्जा की बर्बादी’ लगने लगी है और ‘स्थिर शून्यता’ ही परम शांति बन गई है। “तुम हो और / हम अकेले हैं” केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि आधुनिक प्रेम का वह अंतिम सत्य है, जिसके आगे न तो कोई प्रार्थना है और न ही कोई पुकार। यहाँ प्रेम का अंत नफ़रत में नहीं, बल्कि एक ठंडी और थकी हुई स्वीकारोक्ति में होता है।
कुल मिलाकर ‘व्यवधान’ कविता है हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमने जीवित रहने के लिए ‘भूल जाने’ की जो कला विकसित की है, वह हमें अधिक ‘सक्षम’ बना रही है या अधिक ‘खोखला’? यह ‘विस्मृति का कौशल’ वास्तव में हमारी भावनाओं का आत्मसमर्पण है। ‘व्यवधान’ कविता का यह विश्लेषण अंततः हमें उस ठंडे और निर्मम सच के आमने-सामने खड़ा करता है, जहाँ आधुनिक प्रेम अब कोई ‘गंतव्य’ नहीं, बल्कि एक ‘अनवरत श्रम’ बन चुका है। यह कविता उस ‘रोमांटिक मिथक’ की अंत्येष्टि है जो मानती थी कि प्रेम दूरियों को मिटाता है। इसके विपरीत, यहाँ प्रेम का पुनरागमन उस ‘अस्तित्ववादी शांति’ में सेंध लगाता है जिसे व्यक्ति ने बड़ी मशक्कत से अपने अकेलेपन की ‘आदत’ डालकर अर्जित किया था। आज के ‘सत्यातीत’ और ‘बाज़ारवादी’ युग में, जहाँ रिश्तों की तरलता ही एकमात्र स्थिरता है, ‘विस्मृति’ अब कोई मानसिक कमज़ोरी नहीं, बल्कि एक उत्तरजीविता कौशल (Survival Skill) है। प्रेमी का आना इस कौशल की विफलता की याद दिलाता है। कविता की अंतिम पंक्ति—“कि तुम हो और / हम अकेले हैं”—उस सामूहिक अकेलेपन का समाजशास्त्रीय घोषणापत्र है, जहाँ दो सत्ताओं का साथ होना उनके एकांत को कम नहीं करता, बल्कि उसे और अधिक परिभाषित कर देता है।
‘व्यवधान’ कविता हमें आगाह करती है कि हम एक ऐसी सभ्यता की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ मनुष्य ने दुःख से बचने के लिए संवेदनाओं का ही दमन कर दिया है। यहाँ प्रेम का अंत घृणा में नहीं, बल्कि एक ‘मनोवैज्ञानिक थकान’ और ‘सुविधाजनक विरक्ति’ में होता है। यह कविता हमारे समय का वह दर्पण है जिसमें हम देख सकते हैं कि हमने अपने ‘स्व’ को बचाने की कीमत पर ‘संवाद’ की संभावना को ही खो दिया है।दूसरे शब्दों में, ‘व्यवधान’ एक ऐसी कविता है जो आधुनिक हृदय की वह दरार को सामने लाती है जिसे भरने का हुनर इंसान भूलता जा रहा है।
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रवि रंजन
जन्म : 1962, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार
शिक्षा : पी-एच.डी.
रूचि के क्षेत्र : भक्तिकाव्य, आधुनिक हिन्दी कविता, आलोचना, साहित्य का समाजशास्त्र,
प्रकाशित कृतियाँ : ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’, ‘सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन,दिल्ली (2011), ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’ (2012),वाणी प्रकाशन, ‘वारसा डायरी’(2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’(2026), वाणी प्रकाशन, दिल्ली
विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में सौ से अधिक आलेख प्रकाशित.
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भागीदारी.
‘वारसा डायरी’ के लिए ‘जयपुर साहित्य सम्मान (2023)
प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय,बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा स्थापित पीठ (चेयर ) पर विजिटिंग प्रोफ़ेसर
प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष(से.नि.), हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय .
ई.मेल. : raviranjan@uohyd.ac.in मो.9000606742
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