सत्यनारायण पटेल मुख्यत: मालवा क्षेत्र के ग्रामीण जीवन के चितेरे हैं। ग्रामीण क्षेत्र में इधर जो बदलाव देखने को मिलते हैं , सत्यनारायण उसको बहुत ही सधे अंदाज़ में व्यक्त करते हैं। प्रेम को आप कवित्त बना देते हैं। क्रूरता के पीछे छिपे तत्त्व को आप बिना किसी दुराव – छिपाव के सामने ला देते हैं। यही उनकी कला है जो उनका क्लिशे बन गई है जिसे वे सतत् तोड़ते जाते हैं।
यहां हम आपकी ताज़ा कहानी प्रस्तुत कर रहे हैं, विश्वास है , पाठको को पसंद आएगी।
-हरि भटनागर
कहानी:
उस दिन हम गाॅंव में दादी के घर गये थे। दादी ने दाल-बाटी और चूरमा बनाया था। मैंने और पापा ने एक ही थाली में दाल-बाटी और चूरमा खाया था।
हमारे सामने आसन पर बैठकर दादी और मम्मी भी वही खा रही थी, लेकिन अलग-अलग थाली में लेकर खा रही थी ।
दादी के हाथ का दाल-बाटी और चूरमा खाना जैसे धरती का सत्व आत्मसात करना। आ § ह। और पापा के साथ एक ही थाली में मसल-मसल कर खाने का जो आनंद मिला था, उसे कहने के लिए मुझे नये शब्दों की फ़सल ही उगाना पड़ेगी ! अभी माफ़ करे, बया नहीं कर सकता।
उस दिन साथ में खाते-खाते पापा ने बताया कि जब वे छोटे थे, और उनकी दादी दाल-बाटी बनाती थी, तब वे भी अपने दायजी के साथ एक ही थाली में ऐसे ही मसल-मसल खाया करते थे।
मुझे मेरे पापा का यह राज भी उसी दिन पता चला था कि मेरे पापा अपने पापा को ‘दायजी’ कह कर पुकारते थे और मम्मी को ‘बई’ कह कर बुलाते थे।
मैं जानता हूॅं कि मेरे पापा कभी-कभी मज़ाक़ में मुझे ढब्बू कहकर पुकारते हैं, लेकिन मैं ढब्बू नहीं हूॅं, यह भी वे जानते ही हैं कि मैं एक समझदार और संवेदनशील बेटा हूॅं अपने पापा का।
हाॅं, उसी दिन पापा ने यह भी बताया था कि पापा के दायजी के पास एक कुत्ता था। वह कुत्ता हमेशा उनके साथ रहता था। दायजी खेत, नदी, जंगल या जहाॅं भी जाते, कुत्ता उनके साथ ही जाता। हाट-बाजार भी, शादी-ब्याह में भी। दायजी उसे शेरा नाम से पुकारते।
बात सिर्फ़ उस दिन की नहीं थी, मेरे पापा जब कभी भी मुझसे अपने दायजी के बारे में बात करते या उनका कोई क़िस्सा सुनाते, मैं महसूस करता कि पापा की आवाज़ बदल जाती थी। कुछ मुलायम और स्नेहिल हो जाती थी। जैसे अनेक बार मुझसे लाड़ करते वक़्त हो जाया करती।
उस दिन हमने मन भर कर दाल-बाटी और चूरमा खाया और अचानक से मैं पापा से बोल पड़ा- पापा, आज तो मुझे उस खेत पर ले चलो, जहाॅं आपको आपके दायजी ले जाया करते थे।
पापा ने हॅंसकर कहा- अरे बेटा, क्या करेगा वहाॅं ?
मैंने कहा – उस जगह घुमूंगा, जहाॅं आप अपने दायजी और उनके शेरा के साथ घुमा करते थे।
पापा ने कहा – ठीक है, ले चलूॅंगा कभी, अभी तो दाल-बाटी और चूरमा का आनंद महसूस करो।
-अरे पापा वह खा लिया, अब पचाना भी तो है ! मैंने कहा था।
मुझे खेत पर जाने की धुन सवार हो गई थी, इसलिए मैं झटपट-झटपट जूते और कैप पहन कर तैयार हो गया था। मैं बहुत उत्साहित था। जैसे खेत पर दादाजी और शेरा से मिलने जा रहा था।
मेरे पापा के पास ना-नुकुर कर बचने की कोई वजह नहीं थी, और मेरे पापा बेवजह ना-नुकुर करते भी नहीं थे।
फिर जब तक हम खेत पर पहुॅंचे, धूप चुभने वाली नहीं रह गई थी, बल्कि कुछ नर्म हो चुकी थी। मानो कि खेत पर हमारे आने की ख़ुशी और स्वागत में, बदली अपने मन से या दादाजी के निवेदन पर सूरज के सामने छा गई थी।
उस दिन खेत में गेहूॅं-चना की अलग-अलग फ़सल खड़ी थी। फ़सल हरी-हरी और ताज़गी भरी लग रही थी।
खेत के एक किनारे पर नदी थी, नदी किनारे झाड़ियाॅं थीं। झाड़ियों से पहले खेत की मेड़ पर बेर का पेड़ था। पेड़ पुराना था। फल और फूल से लदा हुआ था। पके बेर की ख़ुशबू नथुनों के रास्ते दिमाग़ तक को बौरा रही थी। मेड़ पर पक कर गिरे बेरों की जैसे चादर बिछी हुई थी।
मेरा दिल-दिमाग़ और सारी उर्जा जीभ पर उतर आई थी, दादाजी के खेत और बेर के पेड़ किनारे से नदी उज्जैन की और मंथर गति से बह रही थी, लेकिन जीभ व गलफों से फूटी लार की एक नदी मुॅंह से पेट की ओर बह रही थी।
मैंने शहर में हमारी कॉलोनी में ठेले पर ख़रीद कर बेर खाए थे। लेकिन मेड़ पर बिखरे बेर इतने लाल-पीले,साबुत, चमकीले, ताज़ा और ख़ुशबूदार थे कि जैसे अभी, बस अभी एक-एक बेर को सिर्फ़ हम बाप-बेटे के लिए बिखराया गया था। बेरों का इतना मनमोहक दृश्य मैंने कभी नहीं देखा था।
मैंने एक बेर को उठाकर चखा और उसकी मिठास ने मेरा दिल जीत लिया था। बेर को सिर्फ़ मीठा, बहुत मीठा कहना मुझे गुनाह लग रहा था। उसके स्वाद के आगे मैं निःशब्द हो गया था। और एक के बाद एक बेर खाने में मगन हो गया था।
लेकिन कुछ ही क्षण बाद मैंने देखा कि पापा तो बेर खा ही नहीं रहे थे। वे कभी बेर के पेड़ के तने से लिपटते और कभी झुककर बेर के पेड़ के गोड़ को छूते थे। जैसे कि मैं कभी-कभी झुककर मम्मी -पापा के पैर छूता था।
फिर पापा बेर के पेड़ का तना पकड़ ऐसे खड़े थे कि जैसे किसी पुरानी याद में डूबे-खोए थे।
मुझे लग रहा था कि शायद पापा को उनका बचपन याद आ रहा होगा ! उनके दायजी और शेरा की याद आ रही होगी !
मैं बेर खाते हुए ही पापा के नज़दीक गया। उनका हाथ छू कर पूछा- पापा, आप बेर नहीं खा रहे हो ?
और उनके आगे अपनी मुट्ठी खोलकर कहा- लीजिए, आप भी खाओ, बहुत यम्मी है। ऐसी मिठास है कि जैसे किसी ने बेर में इंजेक्शन से शहद भर दी है।
मैंने देखा कि जैसे पापा स्मृति के किसी टापू से लौटे और मेरे सिर के बालों में उंगलियाॅं फिराते हुए बोले- बेटा, बेर में शहद भरने का जादू , मेरे दायजी के हाथ में था ।
फिर पापा ख़ुद -ब -ख़ुद आगे बताने लगे- पहले तो मेरे दायजी ने बेर का पौधा बहुत जतन से उछेरा था। फिर उस पौधे को यहाॅं रोपा था। रोपने से पहले कुछ ख़ास तरह से गड्डा तैयार किया था। गड्डे में जाने कौन-कौन सी चीज़ मिलाई थीं। तब मैं भी बच्चा ही था, तुम्हारे जितना या थोड़ा बहुत तुमसे बड़ा, अब मुझे भी ज़्यादा कुछ याद नहीं रहा। बस, मन में हल्की-हल्की स्मृति की धुॅंध है। बस, यूॅं समझ लो बेटा, मेरे दायजी ने इसकी जड़ों में प्रेम का शहद उड़ेला था।
” ओ, दादाजी ने बोया था, यह बेर का पेड़ ”
” हाॅं बेटा, आज मैंने पेड़ को देखा तो लगा कि पेड़ नहीं, बल्कि मेरे दायजी खड़े हैं ! ”
फिर पापा ने कहा – आपको बेर में जो मीठा लग रहा है, वह दादाजी के प्रेम की मिठास है।
” अच्छा, अब कहाॅं है दादाजी ”
” बेटा, अब दादाजी इस पेड़ में है। ”
” पेड़ में ? लेकिन मुझे दिखाई क्यों नहीं देते ? मुझे भी दादाजी को देखना है, दिखाओ न पापा ”
” देखो, मैं बताता हूॅं, पापा मेरे काॅंधे पर हाथ रखते हुए बताने लगे- देखो, वह जिसे तुम तना समझ रहे हो, वह मेरे दायजी का सीना है। मजबूत।
‘ बेटा, ध्यान से देखो, पापा ने कहा, और उॅंगली के इशारे से दिखाने लगे- देखो, दायजी के सीने से नीचे, पेट, कमर, और पैर हैं। अपनी खेत की मिट्टी में धॅंसे हुए। नंगे पैर।
पापा बोल-बोल कर जैसा दिखा रहे थे, वैसे-वैसे ही मैं देखने, समझने और महसूस करने की कोशिश कर रहा था।
-बेटा और ज्यादा ध्यान से देखो, पापा ने मेरे चेहरे को थोड़ा ऊपर की ओर उठाते हुए कहा और बेर के पेड़ की तरफ़ इशारा करते बोलने लगे- देखो बेटा, तुम्हें ये जो डगाले और टहनियाॅं दिख रही हैं न, ये डगालें और टहनियाॅं नहीं हैं । डगालें दायजी की बाहें हैं और टहनियाॅं उनकी उॅंगलियाॅं हैं।
फिर पापा मेरी ऑंखों में ग़ौर से देखने लगे, जैसे कि मेरी ऑंखें चैक कर रहे हो और फिर धीमे व चिंतित स्वर में पूछा – बेटा, सच में तुम्हें दादाजी दिखाई नहीं दे रहे ? मुझे तो मेरे दायजी दिख रहे हैं। देखो, जरा ग़ौर से देखो, उधर दायजी के पैरों के पास उनका शेरा भी खड़ा है ”
मैं कभी बेर का पेड़ देखता। कभी पापा का चेहरा देखता। पापा की बात सुनता और भाव को समझने की कोशिश करता।
पापा का स्वर और ज़्यादा गंभीर, और ज़्यादा भावुक, और ज़्यादा भारी, और ज़्यादा बारीकी से उनके दायजी और दायजी के शेरा का शब्द चित्र बना रहे थे।
फिर कुछ देर बाद यह हुआ कि मेरी ऑंखों के सामने से बेर का पेड़ गायब हो गया था। पके बेर और उनकी ख़ुशबू ही महसूस हो रही थी।
फिर मुझे धीरे-धीरे पापा का स्वर भी मंद-मंद सुनाई पड़ने लगा और अंततः सुनाई देना ही बंद हो गया था।
फिर मुझे ऑंखों के सामने दादाजी खड़े नज़र आने लगे थे। दादाजी ने सफ़ेद झक कमीज़ और धोती पहनी थी। उनके सिर पर सफ़ेद टोपी थी। उनके पास ही उनका शेरा खड़ा दुम हिला रहा था।
मैं मन ही मन ख़ुद को कोस रहा था कि जब से मुझे दादाजी क्यों नहीं दिख रहे थे ? दादाजी की कद-काठी तो पापा से भी मजबूत और लम्बी है। दादाजी के भाल पर कैसा तो तेज़ है ।
मैंने देख रहा था कि दादाजी ने अपनी बाॅंहें फैला दी थी। वह मुस्करा रहे थे और उॅंगलियों के इशारे से मुझे अपनी ओर बुला रहे थे। उनके शेरा पूॅंछ हिलाते हुए देख रहा था कि दादाजी मुझे देख बहुत ख़ुश हो रहे थे ।
मुझे मन ही मन मलाल हुआ कि दादाजी के रहते ही मैं क्यों नहीं जन्मा था ?
मैंने बरबस ही पुकारा ‘ दादाजी ‘ और दौड़ कर उनके घुटनों में लिपट गया था। मैं महसूस कर रहा था कि दादाजी मेरे सिर के बालों में अपनी उॅंगलियाॅं फिरा रहे थे। मेरे गाल चूम रहे थे और उनका शेरा मेरे पैर का टखना चाट रहा था।
मेरे पापा पास ही खड़े थे और दादा-पोते का मिलन देख ख़ुश हो रहे थे और ख़ुशी के मारे उनकी ऑंखें चू रही थी। वह दिन मेरी मानस भूमि पर स्मृति की नदी के संगीत की तरह कल-कल, कल-कल बह रहा है।
23/01/25
सत्यनारायण पटेल
कथाकार और लेखक, सत्यनारायण पटेल इंदौर में रहते हैं। उनके तीन कहानी संग्रह, भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान (2008), लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना ( 2011 ) और काफ़िर बिजूका उर्फ़ इब्लीस ( 2014) में आ चुके हैं। जबकि इसी साल उनका पहला उपन्यास गांव भीतर गांव (2015) आया है। उन्हें वागीश्वरी सम्मान 2008, भोपाल (म.प्र.) जबकि प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान 2011 बांदा, ( उ.प्र.) की ओर से मिल चुका है।
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