श्रुति कुशवाहा समकालीन कविता का एक ज़रूरी नाम हैं।
श्रुति मात्र स्त्री प्रतिरोध का आख्यान नहीं बल्कि स्मृति , इतिहास की बेचैनी का रचनात्मक संवाद रचती हैं। श्रुति अपने अनुभव – संसार में ठस वैचारिकता के बदले सामान्य से जीवन – प्रसंगों में छिपे मानवीय तत्व को रूप देती हैं जिसे वे काव्य की धार मानती हैं।
– हरि भटनागर
1. गुमनाम किताब
मैं 1862 में लिखी किसी गुमनाम किताब की किरदार हूँ
उस किताब में ज़ंग लग गया है
अमूमन किताबों में दीमक लगती है
लेकिन ये किताब अमूमन का अपवाद है
“आपको पता होना चाहिए जीवन नियमों से ज़्यादा अपवादों से चलता है”
ये किताब की पहली पंक्ति है
मैं इसे पढ़ने अक्सर इक्कीसवें पन्ने से पहले पन्ने पर कूद आती हूँ
लेखक परेशान है मेरी कूद-फाँद से
इस ज़ंग लगी किताब में एक रेगिस्तान है
यहाँ हर साल बाढ़ आती है
मैं कितनी बार किताब से बाहर बह जाती हूँ
वापस लौटना आसान नहीं
एक-एक शब्द जोड़ रस्सी बुननी पड़ती है
शब्दों की रस्सी से बँधी मैं हर बार लौटती हूँ
किताब मेरा घर है
“भूख से ज़्यादा सताती है घर की याद”
ये किताब के सोलहवें पन्ने पर लिखा है
ये एक तिलस्मी किताब है
पढ़ने वालों को जादू लगती है
जबकि मुझे बराबर पता है
जादू जैसा कुछ नहीं होता
फिर भी मैं जादू से बिल्ली का रूप धर लेती हूँ
हालाँकि मुझे बिल्लियाँ सख्त नापसंद हैं
मैं चाहती तो तितली हो जाती
“मैं अपनी ही चाहतों की दुश्मन हूँ”
ये किताब के बहत्तरवें पन्ने पर लिखा है
मैं गुज़री सदी का गुज़रा वक़्त हूँ
वक़्त कभी लौटकर नहीं आता
लेकिन आप पीछे मुड़कर देख सकते हैं
देख सकते हैं हुक्म-उदूली करने वाले लोहे के किरदार
जो किसी की ग़ुलामी नहीं करते
वो किरदार जिन्होंने इतिहास लिखा
किताबों के किरदार जीवन से जुदा नहीं
“लोहे और सोने में से लोहा चुनना”
ये किताब के आखिरी पन्ने पर लिखा है
2. स्मृति
मेरी स्मृति में एक किताब है
रंगीन चित्रों वाली इस किताब पर लिखा है
रूसी लोक कथाएँ
मेरी स्मृति में है एक मैन की डिबिया
चीकट मैन पर कुमकुम लगा
माँ माथे पर सजाती धरती जैसी गोल बिंदी
मेरे कान अब भी पहचान सकते हैं
ऑल्विन-पुष्पक की आवाज़
मेरी यादों में एक रास्ता है
चाहे जितनी दूरी हो
ये रास्ता हमेशा घर पहुँचाता
एक लबालब कुआँ
गर्मियों में हम इस कुएँ में तरबूज डाल देते
मेरे बचपन में है अकाव का पेड़
हम उसे मछली का पेड़ कहते थे
मेरे ज़हन में एक टीन की पेटी है
और ट्रेन की खिड़की से लटका छागल
उसका पानी शरबत जैसा मीठा होता
खट्टे-मीठे अचार से निकली चिरौंजी
वर्धा स्टेशन पर चने के बड़े
अब भी सुनाई देते हैं नानी की मुँहलगी हसीना मामी के ताने
मुझे हर मौसम की गंध याद है
पतझड़ की उदास महक
परीक्षा की बेचैन खुशबू
गर्मी की छुट्टियों का इत्र
बारिश की सौंधी गमक
मेरी यादों में देवमणि सिंह ठाकुर सोलंकी नाम का एक लड़का है
मेरी स्मृतियों में कुछ पोस्टकार्ड है
कुछ अंतर्देशीय
एक गुलाबी लेटरपैड
ताले-चाबी वाली डायरी
पड़ोस में रहने वाली सन्नो बाजी की रफ कॉपी
जिसमें एक नाम बार-बार लिखकर मिटाया था
एक गली
एक मोहल्ला
एक मकान
मेरी स्मृति में एक देश है
जहाँ लोग कम नफ़रत करते थे
3. मिसेज माहुरकर
क्या करती हो मिसेज माहुरकर!
खाना पकाती हूँ सर
खाना परसती हूँ
बासन माँजती हूँ
फिर खाना पकाती हूँ
खाना परसती हूँ
बासन माँजती हूँ
रात में थोड़ा सोती भी हूँ
शादी की फैक्ट्री में काम करती हूँ सर
झुनका भाकर मस्त बनाती हूँ
बेटे को उकड़पेंडी भाती है
देवर को पूरण पोली
नवरे को थालीपीठ चाहिए डिब्बे में
बुढ़िया को दोनों टैम ठेचा
इतवार को पातोड़ी या रसे वाली सेव भाजी
साथ में शीरा
आजी को आमटी बिना पूरा नहीं पड़ता पूरण
बासुंदी के साथ भाकरवड़ी
आमरस के साथ कुडलई
गर्मी में खूब पापड़ डालती हूँ सर
सत्तू में जीरा सही सिंका हो
कढ़ी में हींग का बराबर छौंक
मोदक कम से कम ग्यारह टाइप के
चाय वो बशी में ही पीते हैं
साथ में कच्चा चूड़ा हो तो खुश हो जाते हैं
बेटे के लिए मिरिच डालने से पहले निकाल लेती हूँ
सास को एक्स्ट्रा मिरच चाहिए
मुझे कैसा भी चलता है सर
बाकी छोटे-मोटे काम बीच में हो जाते हैं
जैसे बच्चा पैदा करना
या नंद के लिए जचकी के लड्डू
देवर की शादी
पड़ोसी से व्यवहार
कपड़े धोना, झाड़ू लगाना, सडा टाकणा
रोज़ सुबह चार बजे डाल देती हूँ रंगोली
फिर नल आ जाता है
खुश हो मिसेज माहुरकर ?
खुश हूँ सर
मेरे मरद ने कभी मुझपर हाथ नहीं उठाया
4. कपड़े
लड़कियों के कपड़ों पर टिकी थी सभ्यता की चूलें
लड़की के कपड़ों से नापी जाती मर्यादा
लड़की के कपड़ों से होती संस्कारों की पहरेदारी
छोटे कपड़े पहनने वाली लड़कियाँ बेहया कहलाईं
कइयों ने उन्हें वैश्या भी पुकारा
कम कपड़े यानी लड़कों को निमंत्रण
खुले घुटने खुली बाँहें कभी भी लड़कों का ईमान डिगा सकती थीं
लड़की के पहनावे से तय होता लड़कों का आचरण
लड़की का लिबास भी उसके चरित्र का सर्टिफिकेट था
औरतों ने सदियों घूँघट में गुज़ारा जीवन
ये घूँघट समाज की लाज पर पहरा था
घूँघट खुलते ही समाज के नग्न होने का खतरा मंडराता
लड़कियों की टाँगें सात पर्दों में छिपाई गईं
उनकी छातियों पर कपड़ों की परतें चढ़ीं
फिर भी बलात्कार कभी थमे नहीं
बुर्का हिजाब घूँघट
आदमी को सात पर्दे में भी स्त्री निर्वस्त्र दिखाई दी
उन्नीसवीं, बीसवीं, इक्कीसवीं सदी आई
औद्योगिक क्रांति, आधुनिक काल, डिजिटल युग, एआई एज
दुनिया ग्लोबल विलेज बन गई
रोबोट झाड़ू लगाने लगे
इंसान से तेज हो गए यंत्र
कृत्रिम प्रज्ञा बन गई मनुष्य की काउंसलर
मशीनें अपने मन की करने लगीं
लड़कियों ने भी अपनी मर्ज़ी से कपड़े चुने
युग बदलते हैं कुछ परंपराएँ कभी नहीं नहीं बदलतीं
आज़ादख़याल लड़कियों को नंगी-बूची कहा गया
शॉर्ट्स पहनने वाली को चड्डी वाली
छोटी आस्तीन पर बोले बहुत शौक है आदमियों को रिझाने का
गहरा गला पूरी संस्कृति का अपमान था
लड़की की छाती पर हाथ मारना इस अपराध की सज़ा
वैसे ढाई मीटर दुपट्टे वाली की छाती मसलने से भी लड़के कभी नहीं चूके
जाँघिया पहने आदमियों ने लड़की के कपड़ों पर पंचायत बुलाई
5. लड़कियाँ
इश्क करने वाली लड़कियाँ बेहया और चरित्रहीन कहलाईं
जिन्होंने मर्ज़ी बताई उन्हें कहा बहुत उड़ने लगी हो
ज़िद्दी लड़कियों को बताया तुम जैसों के घर नहीं बसते
आवाज़ उठाने वाली दुत्कारी गईं
उनकी इच्छाओं को पाप कामनाओं को कलंक माना
लड़की की जवानी शर्म की तरह आई और बोझ की तरह गुज़री
जवानी के किस्से लड़कों के हिस्से आए
उनके पास लड़की देखने का जन्मजात अधिकार था
शादी की लड़की देखने से पहले उन्होंने तमाम लड़कियाँ देखीं
घर मोहल्ले स्कूल कॉलेज दफ़्तर बाज़ार अस्पताल बस ट्रेन में
इशारे किए, फब्तियाँ कसी, सीटी बजाई
“मैडम इतनी तकलीफ है तो घर से क्यों निकलती हो”
घर से निकली लड़की छेड़ना उनका मौलिक अधिकार था
उनके पास अपने बेटों के लिए जवानी की रंगीन कहानियाँ थीं
माँओं ने बेटियों को चुप रहना सिखाया
छेड़ने की शिकायत पर दी रास्ता बदलने की नसीहत
दुपट्टा ठीक से न ओढ़ने पर डपटा
उनके कपड़ों पर मढ़ा लड़कों को उकसाने का इल्ज़ाम
जिस लड़की ने किसी लड़के से खुलकर बात तक न की
उसे समझाया पहली रात पति की मानना
पति की मर्ज़ी को मना नहीं करते
मना करने पर आदमी को बाहर जाने की छूट है
बीमार भी हो तो थोड़ा सह लेना
लड़कों को हमेशा पता था
लड़की की ना में भी हाँ होती है
लड़की ने जब भी अपने हक़ की बात की
घरवालों ने कहा ज़्यादा कानून मत झाड़ा करो
6. कविता पाठ
तेरह कवियों को आमंत्रित करने संचालक ने बारह कविताएँ, आठ शेर और छह चुटकुले सुनाए
अट्ठाईस मिनट विभाग के निदेशक और विश्वविद्यालय के कुलपति का परिचय उर्फ स्तुतिगान हुआ
संचालक ने कहा सभी कवि तीन-तीन कविता सुनाएँगे
क्योंकि, कविता पाठ के बाद भोजन भी है
और समय की अपनी सीमा है
पहले चार कवियों ने सोलह किलोमीटर बटा तीन के हिसाब से कविताएँ सुनाईं
अब संचालक ने अनुरोध किया बचे हुए कवि कृपया तीन मिनट में कविता निपटाएँ
मेरी माँ कहती थी डिब्बे में कभी तीन रोटी नहीं रखनी चाहिए
या तो आधी तोड़ लो या एक जोड़ दो
कवि भला आधी कविता कैसे तोड़ता
लिहाज़ा कवियों ने तीन का तेरह करने में कोई कसर नहीं छोड़ी
मुख्य कविता के आगे दो मुक्तक, एक नज़्म, ग़ज़ल के चंद मिसरे
अंतिम से पहले एक नवगीत
इस तरह चार कवियों ने एक पीरियड पूरा किया
अगले तीन कवियों को संचालक ने ढाई मिनट बाद पर्ची पहुँचाई
गंभीरता से कहा “अगली बार एक घंटी लगाएँगे”
निदेशक महोदय के चेहरे पर तनाव बढ़ रहा था
आखिरी दो कवियों को बुलाते हुए संचालक ने कहा
आपका यश आसमान से ऊँचा है
आपकी कविताएँ सबने पढ़ी हैं
आपकी कविताएँ तो सबको याद हैं
अतएव..आप अपनी एक प्रतिनिधि रचना का पाठ करें
माफ कीजिए समय की बाध्यता है
आप तो समझते ही हैं
और डिनर भी लग गया है
7. पुल
मैं पुल पर खड़ी हूँ
यहाँ दो छोर हैं
नीचे गहरी नदी
या इस पार जा सकते हैं
या उस पार
पुल से नदी तक पहुँचना एक हादसा है
मैं पुल के बीचोबीच खड़ी हूँ
और कोई सिरा नहीं भा रहा
अभी मुझे खुदकुशी नहीं करनी
इसलिए नदी कोई विकल्प नहीं
मैंने अकुलाकर हर दिशा टटोली
दो तृष्णा एक भय दिखाई दिया
तभी आसमान पर नज़र गई
अचानक समझ आया
पुल से सिर्फ नीचे नहीं
ऊपर भी झाँक सकते हैं
पुल से एक राह आसमान की ओर भी जाती है
8. बेहट
हमें साथ देख
चाँद पर सूत कातने वाली बुढ़िया ने
सूरज का कान मरोड़ धीमी कर दी लौ
झिलमिल नदी पर पेड़ों ने बाँध दिया झूला
नर्म धूप ने चट्टान पर गलीचा बिछा दिया
हमने शिवमंदिर का चबूतरा चढ़ा
और उन टेढ़ी दीवारों से फूट पड़ा तानसेन का संगीत
दिसंबर की उस दुपहर
हम पहली बार अकेले थे
पहली बार निर्बंध
बाइस बरस की मैं
साढ़े इक्कीस के तुम
बेहट का निर्जन एकांत
और खालिस प्रेम वाले दिन
उस दुपहर मैंने चाहा
तुम एक बार तो मेरा हाथ पकड़ो
एक बार तो कहो कोई मीठी बात
लेकिन तुम सदा के उज्जड
सुनाते रहे तानसेन समारोह का इतिहास
बीच में तुमने ये भी बताया कि दिल्ली पास ही है
साल बीतते ही लौट जाओगे दिल्ली
जिस दिन हम मिले
उसी दिन तय हो गया था बिछड़ना
भोपाल और दिल्ली के बीच
ग्वालियर के नसीब वाले दो दिन
तुमने पंडित विश्व मोहन भट्ट का इंटरव्यू लिया
मैं मोहन वीणा निहारती रही
हमारे दो बेहद व्यस्त साथी
सबसे खाली मैं
सबसे अहमक़ तुम
तुम्हें प्रोजेक्ट पूरा करने की जल्दी
मुझे हर बात परसों पर टालनी थी
ग्वालियर से बेहट तब तक का सबसे सुंदर सफर
हमारे सिर बेहट से कुछ खोज लाने का ज़िम्मा था
तुम मेरे हिस्से की भी ज़िम्मेदारी निभा रहे थे
मैं तुम्हारे हिस्से का भी प्रेम जी रही थी
वापसी में तुम्हारे कुछ सैंतालीस पन्ने भरे हुए थे
और मैं इस आधी-अधूरी कविता के साथ लौटी
9. मन
अपना मन वापिस लेती हूँ
वो दृश्य जो हमारे बीच घटे
उन्हें विलोपित करती हूँ स्मृतियों से
जो वादे हुए
उन्हें ग्वारीघाट में बहा देती हूँ
वो गीत जो हमने साथ सुने
उन्हें मूल नायक-नायिका लौटाती हूँ
मैं अपने कान की लौ से तुम्हारा स्पर्श उतार
फिर पहनती हूँ मोगरे का कर्णफूल
अपनी कलाई की तितलियों को
तुम्हारे आरोप से बरी करती हूँ
मैं फिर लौटती हूँ जीवन में
और तुम्हें तुम्हारे कारोबार में लौटने को मुक्त करती हूँ
10. जीवन
इतना मुकम्मल नहीं था जीवन
कि मैं बिना अफ़सोस के मर पाती
सुख के फूल जल्द मुरझा जाते
वेदना के डंठल बचे रहते हैं
ग्लानि की गमक से कंपित रहता हृदय
मैं जान गई थी
निज दुख निज प्राप्ति
निज उत्कर्ष भर से नहीं बनता जीवन
व्यक्ति होना इतना भी व्यक्तिगत मामला नहीं
मैं खूब खुश रहने वालों को ईर्ष्या नहीं
विस्मय से देखती
कभी-कभी अविश्वास से भी
मेरी नींद जब भी टूटती
आँख की कटोरियों भरा रहता पानी
क्यों इतना मुश्किल है निस्पृह हो पाना
मुझे कभी-कभी साँस नहीं आती है हेट स्पीच सुनकर
यूँ भी नहीं कि मैंने महफिल नहीं सजाई
जी नहीं बहलाया ठहाके नहीं लगाए
या रोटी में घी लगाना छोड़ दिया
लेकिन इन कहकहों में बहा नहीं अवसाद
सुलगती आग पर छींटे नहीं पड़े
सुख के फल से उतरा नहीं दुख का छिलका
सुख पाने की कोशिश और हताश करती रही
मेरे सीने में धँसा रहा कोई रुदन
जितना भी अनुलोम विलोम करूँ
भीतर के दुख जलते नहीं
मेरे कपड़ों में टंके रहते हैं उदासी के फूल
मेरी देह से उदासियों की गंध आती
कोई न कोई पूछ ही लेता उदासी का कारण
तिर्यक दृष्टि से देख ताना देता
क्या कमी है तुम्हें
मैं कह नहीं पाती कमियों से भरा है संसार
किसी न किसी को तो कोई कमी ज़रूर होगी
मैं उसी कमी से रिक्त हूँ
ये फ़िज़ूल सी बात लगती
मैं ओढ़ लेती हूँ कृत्रिम मुस्कान
इस अश्लील समय में बनावटी मुस्कानों ने बहुत बचाया है
उम्र के साथ बढ़ रही है निरर्थकता
शोर और चुप्पियों के बीच
एक मुसलसल थरथराहट है
जागने और सोने के बीच
अपराधबोध और ढेर सी पेनकिलर्स
मुझे मरते वक्त कम से कम इतना अफ़सोस तो ज़रूर रहेगा
जब युद्ध में मारे जा रहे थे बच्चे
मैं बेगम अख़्तर की ठुमरी सुन रही थी
श्रुति कुशवाहा
जन्म 13 फरवरी को भोपाल, मध्यप्रदेश में हुआ। पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (माखनलाल चतुर्वेदी
राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल, वर्ष 2001)।
वर्ष 2025 में दूसरा कविता संग्रह ‘सुख को भी दुख होता है’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है।
पहला कविता संग्रह ‘कशमकश’ वर्ष 2016 में मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के सहयोग से प्रकाशित हुआ। संग्रह को मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा वर्ष 2016 ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ प्राप्त, वर्ष 2007 कादंबिनी युवा कहानी प्रतियोगिता में कहानी पुरस्कृत, पत्रकारिता हेतु वर्ष 2022 में ‘अचला सम्मान’ से सम्मानित। हिंदी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएँ निरंतर प्रकाशित होती रही हैं।
हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई, भोपाल में विभिन्न न्यूज़ चैनल में काम करने के बाद अब गृहनगर भोपाल में डिजिटल मीडिया में कार्यरत।
ई-मेल : shrutyindia@gmail.com
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