उर्दू के महान शायर मीर तक़ी  मीर के पूर्वज सऊदी अरब से भारत आए थे। वह राजनीतिक उथल – पुथल का दौर था। नादिर शाह और अहमद शाह दुर्रानी के आक्रमणों से सब दूर ख़ौफ़ फैला  था। 1723 में आगरा में मीर तक़ी मीर का जन्म हुआ। आपके पिता एक सूफ़ी थे। लम्बे समय तक दिल्ली में रहने के  पश्चात मीर  लखनऊ चले गए, जहाँ जीवन के अंतिम वर्ष व्यतीत किए। मीर उर्दू के सर्वकालिक महान शायरों में अग्रगण्य हैं और उन्हें सम्मानपूर्वक “ख़ुदा-ए-सुख़न” कहा जाता है। उनकी शायरी में इश्क़, विरह, मानवीय करुणा, अकेलापन, समय की विडंबनाएँ और जीवन की नश्वरता अद्भुत संवेदनात्मक गहराई के साथ व्यक्त हुई हैं। सरल, स्वाभाविक और हृदयग्राही भाषा में कही गई उनकी ग़ज़लों ने उर्दू कविता को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। मीर की काव्य-दृष्टि केवल प्रेम तक सीमित नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतरी संसार और उसके अस्तित्वगत अनुभवों की भी सशक्त अभिव्यक्ति है। इसी कारण वे आज भी उर्दू साहित्य की सबसे प्रभावशाली और कालजयी आवाज़ों में गिने जाते हैं।
अपर्णा पात्रीकर ने  मीर के जीवन – प्रसंगों के साथ उनकी शायरी पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं।
सुखद बात यह है कि अपर्णा शेख़ इब्राहीम ज़ौक़ , मिर्ज़ा ग़ालिब के साथ नामचीन अदीबों पर निरंतर क़लम चलाती रहेंगी।
– हरि भटनागर

 

हमारे मीर तक़ी मीर

“रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’

कहते हैं अगले ज़माने में कोई ‘मीर’ भी था”

हिंदुस्तान में उर्दू शायरी का सफ़र शुरु करना है तो, सबसे पहले वो मील का पत्थर छूना होगा जिसका नाम है, “मीर तक़ी मीर”… यूं शुरआत ख़ुसरो से भी की जा सकती थी, लेकिन जिस विद्या को ग़ज़ल कहते हैं, उसके हवाले से जब भी बात की जाएगी तो पहला नाम मीर साहिब का ही आएगा।

यही वजह रही कि मुझे और मेरी तरह मीर पर हर लिखने वाले को उनके परिचय के लिए उपर लिखे ग़ालिब के इस शेर से बेहतर कुछ और नहीं जान पड़ता है।

इसी सिलसिले में मीर कौन थे, कहां से आए थे, उनके पुरखों का क्या क़िस्सा रहा, या कि उन्होंने रोज़ी रोटी के लिए कब-कहां, किस ओर रुख किया, किस नवाब या बादशाह की सर परस्ती में रहे, ये सभी चर्चाएं मुझे बहुत ज़रूरी मालूम नहीं पड़ती क्यूंकि इनका ज़िक्र कई बार हो चुका है।

लेकिन मीर का उर्दू शायरी में क्या क़द है? क्या मिजाज़ है? उनकी मानसिक ऊँचाई क्या है? इसका ज़िक्र और इस पर विश्लेषण ज़रूर होना चाहिए। तो मेरे हिसाब इस बात को ग़ालिब के शेर ने बाख़ूबी समझा दिया है।

मानने वाले मीर जी को ख़ुदा-ए-सुख़न यानी शायरी का ख़ुदा और बाबा-ए-ग़ज़ल भी कहते आएं हैं। अली सरदार ज़ाफरी, अपनी क़िताब दीवाने मीर में कुछ यूं लिखते है, कि “ग़ालिब और इक़बाल के शायराना क़द को इनकार करने वाले मौजूद हैं, मगर मीर की उस्तादी से इनकार करने वाला कोई नहीं है।”

“देख तो दिल कि जाॅं से उठता है,

ये धुंआ सा कहां से उठता है।”

ये दो मिसरों में बंधे शे’र को कहने का वो सलीक़ा है, जो मीर को उर्दू शायरी में सबसे आला मक़ाम देता है। बेहद आसान तरीके से मानीखेज़ बात कह देना। मुश्किल बात को आसान अल्फ़ाज़ में कह पाना, बेहद मुश्किल होता है ये शायरी करने वाले और उसकी समझ रखने वाले बहुत अच्छे से जानते हैं।

“शेर के पर्दे में मैं ने ग़म सुनाया है बहुत

मरसिए ने दिल के मेरे भी रुलाया है बहुत”

आलम ये भी है कि बहरे मीर आज भी ग़ज़ल या नज़्म कहने वालों के लिए सबसे आसान और पसंदीदा बहर है, जिसमें सारा दारोमदार इसके अल्फ़ाज़ की रवानी पर टिका है। इस बात को मीर ने कुछ यूँ अपने अंदाज़ में कहा है..

“मीर’ दरिया है सुने शेर ज़बानी उस की

अल्लाह अल्लाह रे तबीअत की रवानी उस की”

उजड़ी हुई दिल्ली के हवाले से कहे इस शे’र को देखिए…

“दिल्ली में आज भीख भी मिलती नहीं उन्हें,

था कल तलक दिमाग़ जिन्हे ताज ओ तख़्त का।”

ये शेर किसी दौर के ख़त्म होने या कि परिवर्तन के शाश्वत नियम को कितने आसान तरीके से समझा रहा है।अपने एक रिश्तेदार ख़ान आरज़ू की बेटी से हुआ मीर साहब का इश्क़ ….शायद ये वही इश्क़ था जिसके अलग-अलग नज़ारे मीर की शायरी में नज़र आते रहें हैं।

“न सोचा न समझा न सीखा न जाना,

मुझे आ गया ख़ुद- ब-ख़ुद दिल लगाना।”

प्रेम की सहजता को समझाने के लिए ये दो पंक्तियाँ अपने आप में अध्याय है।

या

“क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है इश्क़

हक़-शनासों के हाँ ख़ुदा है इश्क़”

यूं मीर को नर्म लबो लहज़े और मद्धम बोलने वाला शख़्स माना और बताया जाता रहा है। लेकिन मीर में ख़ुद्दारी जुनून की हद तक थी ये मानना पड़ेगा। बकौल निदा फ़ाज़ली साहिब- “मीर बेहद ख़ुद्दार शायर थे जो दरबारों में नहीं गए। और अगर गए भी तो अपने मानदंडों से समझौता न कर सके। फिर चाहे पेंशन की तौर पर मिलने वाले, लखनऊ के नवाब के हज़ार रुपये ही क्यूं न ठुकराने पड़े हो।

“दर्द-ओ-अंदोह में ठहरा जो रहा मैं ही हूँ

रंग-रू जिस के कभू मुँह न चढ़ा मैं ही हूँ”

या

“जिस सर को ग़ुरूर आज है याँ ताज-वरी का

कल उस पे यहीं शोर है फिर नौहागरी का”

मीर की शायरी में वो मुहब्बत है जो, इंसान को इंसान से होती है। ये कहना ग़लत नहीं होगा कि मीर एक जीनियस शायर थे। उनके विचारों के कद को  इस शे’र के माध्यम से बहुत अच्छे से समझा जा सकता है।

“हमको शायर न कहो मीर, कि साहिब हमने

दर्दो ग़म कितने किए जमा तो दीवान किया”

ये बड़ा ही अच्छा संयोग है कि,  हिंदुस्तान में उर्दू और मीर साथ-साथ चले। अस्ल में हिंदुस्तान में फारसी ज़ुबान का चढ़ाव और उतार, मुगल सल्तनत के साथ चला। नादिर शाह के बाद क़रीब-क़रीब बर्बाद हो चुकी मुग़ल सल्तनत में, दिल्ली और फ़ारसी दोनों की ही कद्र नहीं बची थी। उसी समय सैनिक छावनियों की ज़ुबान उर्दू अपने पैरो पर खड़ी होना शुरू हुई।

उर्दू ख़ालिस हिन्दुस्तानी ज़ुबान थी। छावनियों में अलग-अलग सूबों, तहज़ीब और उनकी बोलियों को बोलने वाले सिपाहियो की, भाषा के मेल को इस ज़ुबान की पैदाइश माना जाता है।

ये उर्दू की खुशक़िस्मती रही कि, उसे मीर मिले। जिनकी शायरी ने उर्दू को  आम आदमी की ज़ुबान बनने में बड़ी मदद की। ये मीर की भी खुशक़िस्मती रही कि, उन्हें उर्दू मिली वरना आज फ़ारसी पढ़ने-जानने या समझने वाले न के बराबर लोगो में, इतने अज़ीम शायर का सुख़न सिर्फ़ अदबी इदारों की लाइब्रेरी की धूल बढ़ाने में काम आता।

तकरीबन पंद्रह हजार शेर कहने वाले मीर साहिब ने, लंबी ज़िंदगी जी। इसलिए हर दौर, हर उम्र के फ़लसफ़े के अश’आर उनकी क़लम से निकले हैं।अपने आख़िरी वक़्त में अपनी जवान बेटी और बीवी की मौत से टूट चुका ऊर्दू अदब के आसमान का ये सबसे चमकीला सितारा सितम्बर 1810 में लखनऊ की मिट्टी के आगोश में हमेशा के लिए समा गया।

“सिरहाने मीर के आहिस्ता बोलो,

अभी टुक रोते-रोते सो गया है।”


 

अपर्णा पात्रीकर 

शिक्षा:– एम. ए. इकोनॉमिक्स, पी.जी. डिप्लोमा इन मास कम्युनिकेशन।

प्रकाशन :– हंस, अभिनव इमरोज़, कला समय, सदीनामा, हिंदुस्तानी ज़ुबान आदि पत्रिकाओं में दैनिक ट्रिब्यून, हिंदुस्तान, राजस्थान पत्रिका आदि समाचार पत्रों तथा अश्रुतपूर्वा एवं आब-ओ-हवा इ पत्रिकाओं में ग़ज़ल, कविताएं तथा सम सामयिक लेख।

आकाशवाणी भोपाल में रजिस्टर्ड गज़लकार

वर्तमान में उर्दू अकादमी मध्यप्रदेश की ओर से एक क़िताब “ज़ुबान-ए-बेज़ुबानी” शीर्षक से प्रकाशित हुई है, जिसका लोकार्पण शेष है।

अन्य:– मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी द्वारा आयोजित तलाशे जौहर में विजेता। तथा मंचो पर ग़ज़ल पाठ में सहभागिता।

पता :– GMR गोल्डन पॉम, बगली रोड, मिसरोद, भोपाल।

मो.– 8319953957

ई मेल – patrikar.aparna@gmail.com

 

 

 

 

 

 

 

 


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