‘रचना समय’ की इस प्रस्तुति में वरिष्ठ आलोचक प्रोफेसर रवि रंजन का अज्ञेय की कालजयी कविता ‘असाध्य वीणा’ पर केन्द्रित दीर्घ आलेख प्रकाशित किया जा रहा है,जो इस महान कविता का एक गंभीर, व्यापक और बहुआयामी पुनर्पाठ प्रस्तुत करता है।  प्रचंड बौद्धिकता और गहरी संवेदना के विरल समन्वय से भरपूर यह आलेख यह प्रस्तावित करता है कि ‘असाध्य वीणा’ उपनिषदों की विराट चेतना, बौद्ध शून्यता, अद्वैत और संगीत के नाद-सिद्धांत का जीवंत काव्य-रूपांतरण है। यहाँ कला कौशल के बजाय साधना है, और मौन रिक्तता नहीं—सृजन का सक्रिय क्षेत्र है। 

इसमें भारतीय काव्यशास्त्र के साथ-साथ पाश्चात्य सिद्धांतों—जैसे हैंस रॉबर्ट याउस और स्टैनली फ़िश का ‘पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत’ (Reader-Response), उम्बेर्तो एको का ‘ओपन वर्क’ (खुली कृति) और गाडमर व पॉल रिक्योर के ‘हर्मेन्युटिक्स’ (व्याख्याशास्त्र)—का उत्कृष्ट अनुप्रयोग किया गया है। आलेख दर्शाता है कि वीणा का संगीत श्रोताओं की अपनी-अपनी चेतना के अनुसार बहुवाचक अर्थ ग्रहण करता है। मार्क्सवादी, उत्तर-औपनिवेशिक, पारिस्थितिक (Ecocriticism)और स्त्रीवादी दृष्टियों से भी इसमें कविता की शक्तियों और सीमाओं का बेहद प्रासंगिक व संतुलित मूल्यांकन किया गया है।

हमारा विश्वास है कि यह आलेख आज के उपभोक्तावादी युग में ‘साधना, समर्पण और सह-अस्तित्व’ के महत्त्व को रेखांकित करते हुए अज्ञेय की काव्य-चेतना को नए सिरे से समझने की एक अनिवार्य खिड़की खोलेगा ।

 – हरि भटनागर

‘असाध्य वीणा’: भारतीय ज्ञान-परंपरा, अर्थ-मीमांसा और आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य

       रवि रंजन                                                                                             

आधुनिक हिंदी कविता में कुछ रचनाएँ ऐसी हैं जिनका पाठ समय के साथ समाप्त नहीं होता, बल्कि प्रत्येक नए बौद्धिक और सांस्कृतिक संदर्भ में पुनः आरंभ होता है। सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ ऐसी ही कालजयी कृति है। पहली नज़र में यह कविता एक साधक, एक वीणा और एक राजसभा की कथा प्रतीत होती है, किंतु जैसे-जैसे उसका पाठ गहरा होता जाता है, वह कथा से अधिक एक अनुभव, अनुभव से अधिक एक चिंतन और चिंतन से अधिक एक ऐसी काव्य-चेतना में रूपांतरित हो जाती है जहाँ कला, दर्शन, प्रकृति, संगीत, मौन और मनुष्य की आत्म-यात्रा एक-दूसरे से पृथक नहीं रह जाते। इसीलिए ‘असाध्य वीणा’ का महत्त्व उसके कथ्य में जितना निहित है, उससे कहीं अधिक उसकी अर्थ-संभावनाओं में है।

यह कविता उन विरल आधुनिक काव्य-कृतियों में है जो अपनी रचना-प्रक्रिया में ही पाठक को अर्थ के स्थिर निष्कर्षों से दूर ले जाकर अर्थ के क्रमिक उद्घाटन की प्रक्रिया में सहभागी बनाती हैं। यहाँ किसी सत्य की उद्घोषणा नहीं है; सत्य की ओर बढ़ती हुई एक साधना है। यहाँ किसी दार्शनिक मत की स्थापना नहीं है; विभिन्न दार्शनिक संवेदनाओं के बीच जीवंत संवाद है। यहाँ कलाकार की सफलता का उत्सव नहीं है; कलाकार के आत्म-विसर्जन की प्रक्रिया है। यहाँ प्रकृति दृश्य नहीं, चेतना है; संगीत ध्वनि नहीं, अस्तित्व की लय है; मौन रिक्तता नहीं, सृजन का सबसे सक्रिय क्षेत्र है। इस प्रकार कविता अपने कथात्मक विन्यास से कहीं आगे बढ़कर मनुष्य और विश्व के संबंध की पुनर्व्याख्या करती है।

‘असाध्य वीणा’ की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि वह भारतीय ज्ञान-परंपरा के अनेक स्रोतों से संवाद करती है, किंतु उनमें से किसी एक की काव्यात्मक पुनरावृत्ति नहीं बनती। उसमें उपनिषदों की विराट चेतना की प्रतिध्वनि है, बौद्ध दर्शन की शून्यता और तथता का अनुभव है, अद्वैत की एकत्व-दृष्टि की स्मृति है, भारतीय संगीत-दर्शन के नाद-सिद्धांत की गूँज है और प्रकृति के प्रति ऐसी आत्मीयता है जो भारतीय सांस्कृतिक मानस की दीर्घ परंपरा का हिस्सा रही है। पर अज्ञेय इन सबको उद्धृत नहीं करते; वे उन्हें आधुनिक काव्य-अनुभव में रूपांतरित करते हैं। इसी कारण यह कविता परंपरा का अनुकरण नहीं करती, बल्कि उसके साथ एक सर्जनात्मक संवाद स्थापित करती है।

यह रचना आधुनिक साहित्यिक आलोचना के लिए भी उतनी ही चुनौतीपूर्ण रही है। प्रतीकवाद, संरचनावाद, उत्तर-संरचनावाद, पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत, पारिस्थितिक आलोचना, उत्तर-मानववाद, मार्क्सवादी, उत्तर-औपनिवेशिक और स्त्रीवादी दृष्टियाँ—इन सभी के लिए यह कविता नए सवाल खड़ा करती है। इसकी प्रतीक-संपन्नता, अर्थ की बहुस्तरीयता, संरचनात्मक जटिलता और अनुभव की बहुवाचकता इसे किसी एक आलोचनात्मक पद्धति में सीमित नहीं रहने देती। प्रत्येक नई दृष्टि इसके भीतर एक नया अर्थ-क्षेत्र उद्घाटित करती है, किंतु कोई भी दृष्टि इसके समूचे अर्थ-संसार को अपने भीतर समाहित नहीं कर पाती। यही इसकी रचनात्मक शक्ति है।

इस आलेख का उद्देश्य ‘असाध्य वीणा’ को किसी एक दार्शनिक या आलोचनात्मक खाँचे में स्थापित करना नहीं है, बल्कि उसकी बहुआयामी अर्थ-संरचना को समझने का प्रयास करना है। इस संदर्भ में मूल कविता का सूक्ष्म पठन आधारभूमि का कार्य करता है, जबकि भारतीय काव्यशास्त्र, भारतीय दार्शनिक परंपराएँ, संगीत-दर्शन, समकालीन पारिस्थितिक चिंतन और आधुनिक साहित्यिक सिद्धांत उसके अर्थ-निर्माण के विभिन्न स्तरों को उद्घाटित करने के उपकरण बनते हैं। इन सभी दृष्टियों का प्रयोजन किसी पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष की पुष्टि करना नहीं, बल्कि कविता की अंतर्निहित जटिलता, उसकी वैचारिक गहराई और उसकी सौंदर्यात्मक संरचना को अधिक स्पष्ट रूप में समझना है।

‘असाध्य वीणा’ का पुनर्पाठ आज इसलिए भी आवश्यक है कि यह कविता ऐसे समय में मनुष्य, प्रकृति, कला और संस्कृति के संबंधों पर विचार करने की प्रेरणा देती है जब आधुनिक सभ्यता उपलब्धि, उपभोग, तात्कालिकता और आत्म-केंद्रिकता के दबावों से संचालित होती दिखाई देती है। अज्ञेय की कविता इसके बरअक्स साधना, श्रवण, संवाद, समर्पण और सह-अस्तित्व की ऐसी दृष्टि प्रस्तुत करती है जो केवल साहित्यिक नहीं, सांस्कृतिक और दार्शनिक भी है। इस अर्थ में ‘असाध्य वीणा’ अपने समय की कविता होने के साथ-साथ समयातीत काव्य-अनुभव भी है।

इन्हीं प्रश्नों और संभावनाओं को केंद्र में रखते हुए प्रस्तुत अध्ययन ‘असाध्य वीणा’ की भारतीय ज्ञान-परंपरा से संबद्ध वैचारिक पृष्ठभूमि, उसकी अर्थ-मीमांसा की बहुस्तरीय प्रक्रिया तथा विविध आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्यों में उसकी पुनर्व्याख्या का समन्वित प्रयास है। आशा है कि यह विवेचन इस महान कविता की रचनात्मक जटिलता और उसके स्थायी साहित्यिक महत्त्व को समझने की दिशा में एक सार्थक आलोचनात्मक उद्यम सिद्ध होगा।

‘असाध्य वीणा’ का आरंभ एक ऐसे दृश्य से होता है जो देखने में राजदरबार का दृश्य है, लेकिन कविता आगे बढ़ते ही स्पष्ट कर देती है कि यह केवल एक राजकीय घटना नहीं है। यह मनुष्य की साधना, कला और आत्मबोध की परीक्षा का मंच है। कविता किसी प्रकृति-वर्णन या आत्मकथन से नहीं, बल्कि एक नाटकीय प्रवेश से आरंभ होती है—“आ गए प्रियंवद! केशकंबली! गुफा-गेह!” केवल तीन संबोधनों में अज्ञेय प्रियंवद का पूरा व्यक्तित्व खड़ा कर देते हैं। ‘प्रियंवद’ उसका नाम है, पर यह नाम भी अर्थपूर्ण है। ‘प्रिय’ और ‘वद’ का मेल ऐसा व्यक्ति सामने लाता है जिसकी वाणी में मधुरता और अपनापन है। इसके साथ ही ‘केशकंबली’ और ‘गुफा-गेह’ जैसे संबोधन उसके सामाजिक परिचय से अधिक उसकी साधना का परिचय देते हैं। ‘केशकंबली’ का संकेत उस तपस्वी जीवन की ओर है जिसमें शरीर-सुख और वैभव का कोई आकर्षण नहीं बचा। ‘गुफा-गेह’ बताता है कि उसका घर राजमहल नहीं, प्रकृति की एकांत शरण है। अज्ञेय यहाँ साधक का परिचय उसके पद, जाति, कुल या उपलब्धियों से नहीं देते; उसका परिचय उसके जीवन-व्यवहार से देते हैं। यही आरंभ से कविता का मूल्य-बोध स्पष्ट कर देता है।

अगली पंक्तियों में राजा उठकर उसका स्वागत करता है—

“राजा ने आसन दिया। कहा :

‘कृतकृत्य हुआ मैं तात! पधारे आप।
भरोसा है अब मुझको

साध आज मेरे जीवन की पूरी होगी!’”

राजा का व्यवहार विनम्र है। वह प्रियंवद को ‘तात’ कहकर संबोधित करता है। यह संबोधन केवल सम्मान नहीं, आत्मीयता का भी संकेत है। लेकिन उसकी विनम्रता के भीतर एक आकांक्षा छिपी हुई है। वह कहता है कि आज उसके जीवन की साध पूरी होगी। इस एक वाक्य में राजा की मनःस्थिति खुल जाती है। वह किसी आध्यात्मिक अनुभव की प्रतीक्षा नहीं कर रहा; वह चाहता है कि वह कार्य पूरा हो जाए जो अब तक किसी से नहीं हो पाया। उसकी दृष्टि अभी भी परिणाम पर है।

यहीं से कविता दो प्रकार की साधना का अंतर बनाना शुरू कर देती है। एक वह जो उपलब्धि चाहती है, दूसरी वह जो स्वयं को बदलना चाहती है। राजा पहली वृत्ति का प्रतिनिधि है, जबकि प्रियंवद दूसरी का।

“लघु संकेत समझ राजा का

गण दौड़। लाए असाध्य वीणा,
साधक के आगे रख उसको, हट गए।”

यहाँ ‘लघु संकेत’ और ‘दौड़’ जैसे शब्द दरबारी अनुशासन और सत्ता की गति को सामने लाते हैं। राजा को आदेश भी पूरा नहीं देना पड़ता। संकेत ही पर्याप्त है। दूसरी ओर ‘हट गए’ भी ध्यान देने योग्य है। वीणा रख देने के बाद सेवक पीछे हट जाते हैं। अब राजा की सत्ता भी उस वीणा और साधक के बीच नहीं रह सकती। यह सूक्ष्म संकेत है कि कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जहाँ बाहरी व्यवस्था की भूमिका समाप्त हो जाती है:

“सभी की उत्सुक आँखें
एक बार वीणा को लख, टिक गईं

प्रियंवद के चेहरे पर।”

यह दृश्य मनोवैज्ञानिक है। पहले सबकी दृष्टि वीणा पर जाती है, क्योंकि वही आकर्षण का केंद्र है। लेकिन अगले ही क्षण सबकी आँखें प्रियंवद के चेहरे पर टिक जाती हैं। अब प्रश्न वीणा का नहीं, उस मनुष्य का है जो उसके सामने बैठा है। अज्ञेय बिना किसी टिप्पणी के यह दिखा देते हैं कि समाज हर असाधारण वस्तु से अधिक उस व्यक्ति को देखने लगता है जो उससे सामना करने वाला है।

इसके बाद राजा वीणा का इतिहास सुनाता है। यह इतिहास केवल सूचना नहीं है। यह उस वस्तु की आध्यात्मिक गरिमा का निर्माण करता है:

“यह वीणा उत्तराखंड के गिरि-प्रांतर से

—घने वनों में जहाँ तपस्या करते हैं व्रतचारी—
बहुत समय पहले आई थी।”

अज्ञेय यहाँ उत्तराखंड को केवल भौगोलिक क्षेत्र की तरह नहीं देखते। भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में हिमालय तप, एकांत और ज्ञान का प्रदेश रहा है। ‘व्रतचारी’ शब्द इस स्मृति को और गहरा करता है। इसका अर्थ है कि वीणा का जन्म ऐसे वातावरण में हुआ जहाँ मनुष्य का संबंध प्रकृति से उपयोग का नहीं, साधना का था। इस तरह वीणा आरंभ से ही किसी राजकीय विलास की वस्तु नहीं रह जाती।

राजा आगे कहता है—

“पूरा तो इतिहास न जान सके हम :
किंतु सुना है…”

यह स्वीकार भी ध्यान देने योग्य है। राजा सब कुछ नहीं जानता। उसके पास केवल लोकश्रुति है। यहाँ अज्ञेय इतिहास और किंवदंती के बीच की दूरी बनाए रखते हैं। कविता किसी ऐतिहासिक प्रमाण पर नहीं, सांस्कृतिक स्मृति पर चलती है। ‘सुना है’ का बार-बार प्रयोग कथा को लोकविश्वास की गरिमा देता है।

अब कविता किरीटी-तरु का चित्र रचती है—

“वज्रकीर्ति ने मंत्रपूत जिस
अति प्राचीन किरीटी-तरु से इसे गढ़ा था—

उसके कानों में हिम-शिखर रहस्य कहा करते थे अपने,
कंधों पर बादल सोते थे…”

यहाँ प्रकृति का मानवीकरण केवल अलंकार नहीं है। हिम-शिखर रहस्य कहते हैं, बादल सोते हैं। इससे वृक्ष जीवित सत्ता बन जाता है। वह सुनता है, धारण करता है, स्मरण रखता है। अज्ञेय के लिए प्रकृति जड़ पदार्थ नहीं है। वह चेतना से भरी हुई है। इसीलिए आगे वही वृक्ष साधक का गुरु बन सकेगा—

“उस की करि-शुंडों-सी डालें
हिम-वर्षा से पूरे वन-यूथों का कर लेती थीं परित्राण,”

‘करि-शुंडों-सी’ उपमा वृक्ष को विराट आकार देती है। हाथी की सूँड़ जैसी शाखाएँ केवल आकार का बोध नहीं करातीं; उनमें शक्ति और संरक्षण का भाव भी है। हिमपात से पूरे वन की रक्षा करना वृक्ष को केवल जीव नहीं, संरक्षक बना देता है। इस तरह वह भारतीय परंपरा के कल्पवृक्ष या विश्ववृक्ष की स्मृति भी जगाता है।

इसके बाद कवि लिखता है—

“कोटर में भालू बसते थे,
केहरि उसके वल्कल से कंधे खुजलाने आते थे।”

इन पंक्तियों में प्रकृति का चित्र केवल सुंदर नहीं है, जीवंत है। भालू, सिंह, वृक्ष—सभी एक साझा संसार में रहते हैं। जंगल यहाँ भय का नहीं, सह-अस्तित्व का स्थान है। वृक्ष सबका आश्रय है। इस तरह किरीटी-तरु जीवन के अनेक रूपों को अपने भीतर समेटने वाली सत्ता बन जाता है।

इसके बाद एक और बड़ा विस्तार आता है—

“और—सुना है—जड़ उसकी जा पहुँची थी पाताल-लोक,
उस की ग्रंध-प्रवण शीतलता से फण टिका नाग वासुकि

सोता था।”

अब वृक्ष पृथ्वी तक सीमित नहीं रहता। उसकी जड़ें पाताल तक पहुँचती हैं। ऊपर हिमालय है, नीचे वासुकि। इस प्रकार वृक्ष आकाश, पृथ्वी और पाताल तीनों लोकों को जोड़ने वाला अक्ष बन जाता है। विश्व की अनेक मिथकीय परंपराओं में ऐसा विश्व-वृक्ष मिलता है जो समूचे अस्तित्व का केंद्र होता है। अज्ञेय भारतीय मिथकीय संकेतों के सहारे उसी कल्पना को नया रूप देते हैं। वासुकि का उल्लेख समुद्र-मंथन और नाग-परंपरा की स्मृति जगाता है। वृक्ष की जड़ों का उसके फण तक पहुँचना बताता है कि यह केवल वनस्पति नहीं, ब्रह्मांडीय सत्ता है।

ध्यान देने की बात यह भी है कि अज्ञेय वृक्ष के आकार का वर्णन नहीं करते; वे उसके संबंधों का वर्णन करते हैं। हिमालय, बादल, वन, पशु, पाताल, नाग—इन सबसे उसका रिश्ता है। इसी संबंध-व्यवस्था से उसकी विराटता निर्मित होती है।

राजा आगे कहता है—

“उसी किरीटी-तरु से वज्रकीर्ति ने

सारा जीवन इसे गढ़ा :
हठ-साधना यही थी उस साधक की—

वीणा पूरी हुई, साथ साधना, साथ ही जीवन-लीला।”

यहाँ कविता एक निर्णायक मोड़ लेती है। वज्रकीर्ति बढ़ई नहीं है, साधक है। उसने वीणा बनाई नहीं, साधी है। ‘सारा जीवन’ और ‘हठ-साधना’ दो ऐसे पद हैं जो निर्माण को तपस्या बना देते हैं। सबसे मार्मिक बात यह है कि वीणा के पूरा होते ही उसका जीवन भी पूरा हो जाता है। इसका अर्थ है कि उसके जीवन का लक्ष्य वीणा बनाना नहीं, अपने जीवन को वीणा में रूपांतरित करना था। इसीलिए आगे प्रियंवद उस वीणा को केवल लकड़ी और तारों का वाद्य नहीं मानता।

राजा अब अपनी असफलता स्वीकार करता है—

“मेरे हार गए सब जाने-माने कलावंत,
सबकी विद्या हो गई अकारथ, दर्प चूर,

कोई ज्ञानी गुणी आज तक इसे न साध सका।”

यहाँ तीन बातें एक साथ कही गई हैं—कला हार गई, विद्या निष्फल हो गई और दर्प टूट गया। अज्ञेय यह नहीं कहते कि कलाकार अयोग्य थे। वे बताते हैं कि उनकी योग्यता पर्याप्त नहीं थी। इसका कारण यह है कि इस वीणा के सामने केवल तकनीक काम नहीं आती। यह कविता का मूल सौंदर्यशास्त्रीय कथन है। कला में कौशल का स्थान है, पर वह अंतिम नहीं है।

राजा की अंतिम आशा भी इसी समझ पर आधारित है—

“पर मेरा अब भी है विश्वास
कृच्छ्र-तप वज्रकीर्ति का व्यर्थ नहीं था।

वीणा बोलेगी अवश्य, पर तभी
इसे जब सच्चा-स्वरसिद्ध गोद में लेगा।”

‘स्वरसिद्ध’ शब्द पर ध्यान देना चाहिए। राजा ‘वादक’ या ‘कलाकार’ नहीं कहता। ‘स्वरसिद्ध’ वह है जिसने स्वर पर अधिकार नहीं, स्वर में सिद्धि पाई हो। यह शब्द संगीत को साधना से जोड़ देता है। फिर भी राजा की भाषा में एक अपेक्षा बनी रहती है। वह चाहता है कि वीणा बोले। उसका ध्यान अभी भी घटना पर है।

फिर वह पूरे दरबार की ओर संकेत करता है—

“यह मैं, यह रानी, भरी सभा यह :
सब उदग्र, पर्युत्सुक,

जन-मात्र प्रतीक्षमाण!”

यह दृश्य केवल राजपरिवार का नहीं रह जाता। पूरी जनता प्रतीक्षा कर रही है। इससे वीणा का परीक्षण सार्वजनिक घटना बन जाता है। लेकिन कविता धीरे-धीरे दिखाएगी कि जहाँ सबकी दृष्टि बाहर लगी है, वहाँ असली घटना भीतर घटेगी।

इस आरंभिक अंश में अज्ञेय ने बिना किसी दार्शनिक व्याख्या के कई आधार तैयार कर दिए हैं। पहला, साधक और कलाकार का अंतर। दूसरा, प्रकृति को चेतन सत्ता के रूप में देखने की दृष्टि। तीसरा, सृजन को श्रम नहीं, तप मानने की अवधारणा। चौथा, कौशल और आत्मसमर्पण के बीच का भेद। पाँचवाँ, यह संकेत कि कला की अंतिम उपलब्धि प्रदर्शन नहीं, किसी गहरे मौन से संवाद है। कविता अभी अपने मुख्य अनुभव तक नहीं पहुँची है, फिर भी उसके सारे बीज इसी आरंभ में बो दिए गए हैं। आगे प्रियंवद का मौन, उसका आत्म-संवाद और उसका आत्म-विलय इन्हीं बीजों से विकसित होगा।

अब कविता का वातावरण बदलता है। आरंभ तक कथा का संचालन राजा कर रहा था। वीणा का इतिहास भी उसी ने सुनाया। अब कथा का केंद्र प्रियंवद के भीतर प्रवेश करता है। बाहर की गतिविधि कम होती जाती है और भीतर की साधना धीरे-धीरे सामने आने लगती है। यही वह क्षण है जहाँ अज्ञेय नाटकीय घटना से ध्यान हटाकर चेतना की आंतरिक गति का चित्र बनाते हैं।

“केशकंबली गुफा-गेह ने खोला कंबल।

धरती पर चुप-चाप बिछाया।”

इन दो पंक्तियों में कोई बड़ा दृश्य नहीं है, फिर भी इनका अर्थ गहरा है। प्रियंवद राजमहल के दिए हुए आसन का उपयोग नहीं करता। वह अपना कंबल बिछाता है। यह केवल बैठने की सुविधा नहीं है। यह उसके जीवन-संसार का विस्तार है। गुफा से आया साधक राजसभा के वैभव के बीच भी अपनी साधना का परिवेश साथ लेकर चलता है। वह राजकीय गरिमा में शामिल नहीं होता, बल्कि अपने स्वाभाविक जीवन-क्रम को बनाए रखता है। इससे स्पष्ट होता है कि साधना का आधार बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, भीतर की स्थिति है।

“वीणा उस पर रख, पलक मूँद कर, प्राण खींच,

करके प्रणाम,
अस्पर्श छुअन से छुए तार।”

क्रियाओं का क्रम ध्यान देने योग्य है—रखना, आँखें मूँदना, प्राण खींचना, प्रणाम करना, फिर तारों को छूना। इन सबके बीच कहीं भी जल्दी नहीं है। प्रियंवद वादन की तैयारी नहीं कर रहा; वह अपने भीतर एकाग्रता का क्षेत्र बना रहा है।

“प्राण खींच” का अर्थ केवल गहरी साँस लेना नहीं है। योग और ध्यान की परंपरा में श्वास को भीतर समेटना मन को स्थिर करने की प्रक्रिया का संकेत है। अज्ञेय इस तकनीकी अर्थ को प्रत्यक्ष नहीं कहते, पर शब्द उसी अनुभव की ओर ले जाता है। इससे पहले कि हाथ वीणा को छुए, साधक अपनी चेतना को व्यवस्थित करता है।

“अस्पर्श छुअन” एक विलक्षण पद है। पहली दृष्टि में यह विरोधाभास लगता है। छूना और न छूना एक साथ कैसे संभव है? लेकिन यहीं कविता का अर्थ खुलता है। प्रियंवद का स्पर्श अधिकार का स्पर्श नहीं है। वह इतना हल्का है कि मानो स्पर्श भी न हो। भारतीय काव्य-परंपरा में यह भाव बार-बार आता है कि सच्चा संबंध वही है जिसमें दूसरे के अस्तित्व पर अपना दबाव न डाला जाए। प्रियंवद का स्पर्श उसी प्रकार का है।

इसके बाद वह बोलता है—

“राजन्! पर मैं तो
कलावंत हूँ नहीं, शिष्य, साधक हूँ—

जीवन के अनकहे सत्य का साक्षी।”

यह आत्म-परिचय पूरी कविता की कुंजी है। प्रियंवद स्वयं को कलाकार नहीं कहता। इसका अर्थ कला का अस्वीकार नहीं है। वह कला को साधना के भीतर रखता है। कलाकार होना उसकी पहचान का एक छोटा भाग हो सकता है, पर उसकी मूल पहचान शिष्य होना है। शिष्य वह है जो अभी सीख रहा है। साधक वह है जो निरंतर अभ्यास में है। साक्षी वह है जो अनुभव को अपने अहं की वस्तु नहीं बनाता।

“जीवन के अनकहे सत्य” पर भी ध्यान देना चाहिए। यहाँ सत्य का संबंध तर्क से नहीं, अनुभव से है। वह कहा नहीं जा सकता, केवल जिया जा सकता है। इसीलिए प्रियंवद स्वयं को उसका साक्षी कहता है, स्वामी नहीं।

फिर वह तीन बार संबोधन करता है—

“वज्रकीर्ति!

प्राचीन किरीटी-तरु!

अभिमंत्रित वीणा!”

ये तीनों संबोधन एक क्रम बनाते हैं। पहले साधक, फिर वृक्ष, फिर वीणा। इसका अर्थ यह है कि प्रियंवद वस्तु से पहले उसके सर्जक और उसके मूल स्रोत को याद करता है। वह केवल तैयार वाद्य के सामने नहीं है; वह उस साधना की परंपरा के सामने है जिससे यह वाद्य जन्मा है।

“ध्यान-मात्र इनका तो गद्-गद् विह्वल कर देने वाला है!”

यहाँ प्रियंवद कोई दार्शनिक वक्तव्य नहीं देता। वह केवल अपनी भाव-दशा बताता है। केवल स्मरण ही उसे भर देता है। इससे पता चलता है कि उसकी संवेदना कितनी ग्रहणशील है। जो मन केवल स्मरण से ही भर उठता हो, वही आगे चलकर उस विराट अनुभव का पात्र बन सकता है।

“चुप हो गया प्रियंवद।

सभा भी मौन हो रही।”

इस मौन का निर्माण धीरे-धीरे होता है। पहले प्रियंवद चुप होता है, फिर सभा भी शांत हो जाती है। अर्थात् एक व्यक्ति का मौन सामूहिक वातावरण को बदल देता है। अज्ञेय यहाँ मौन को निष्क्रियता नहीं मानते। यह सक्रिय उपस्थिति है, जो दूसरों को भी प्रभावित करती है।

“वाद्य उठा साधक ने गोद रख लिया।

धीरे-धीरे झुक उस पर, तारों पर मस्तक टेक दिया।”

सामान्यतः वादक वीणा को गोद में रखकर बजाता है। प्रियंवद पहले मस्तक रखता है। यह क्रम बदल देना ही कविता का संकेत है। उसके लिए वादन से पहले प्रणति है। मस्तक ज्ञान, अहं और चेतना का प्रतीक माना जाता है। उसे तारों पर रख देना अपने ज्ञान और अपने अहं दोनों को समर्पित कर देना है।

यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि प्रियंवद हाथों से नहीं, पहले सिर से संपर्क करता है। हाथ क्रिया के प्रतीक हैं, सिर चेतना का। इसलिए क्रिया से पहले चेतना का समर्पण आवश्यक है।

“सभा चकित थी—अरे, प्रियंवद क्या सोता है?

केशकंबली अथवा होकर पराभूत
झुक गया वाद्य पर?”

सभा की दृष्टि बाहर की है। उसे दिखाई देता है कि प्रियंवद कुछ कर नहीं रहा। इसलिए दो ही संभावनाएँ सूझती हैं—या तो वह सो गया है, या हार गया है। समाज अक्सर भीतर घट रही प्रक्रिया को नहीं देख पाता। वह केवल बाहरी परिणामों से निष्कर्ष निकालता है। अज्ञेय इस छोटे-से प्रसंग में मनुष्य की इसी अधीरता को सामने लाते हैं।

“वीणा सचमुच क्या है असाध्य?”

यह प्रश्न केवल सभा का नहीं है। यह पाठक का भी प्रश्न बन जाता है। क्या सचमुच यह वाद्य इतना कठिन है? लेकिन कवि तुरंत उत्तर नहीं देते। वे दृष्टि को भीतर मोड़ देते हैं।

“पर उस स्पंदित सन्नाटे में

मौन प्रियंवद साध रहा था वीणा—
नहीं, स्वयं अपने को शोध रहा था।”

यह कविता की निर्णायक पंक्तियों में है। पहले कवि स्वयं एक कथन करते हैं—वह वीणा साध रहा था। फिर उसी का संशोधन करते हैं—“नहीं।” यह “नहीं” पूरे अर्थ को बदल देता है। असली साधना वीणा की नहीं, अपनी है।

“शोध रहा था” शब्द भी ध्यान देने योग्य है। यहाँ ‘खोज’ नहीं, ‘शोध’ है। खोज किसी खोई वस्तु की होती है। शोध किसी गहरे सत्य की पड़ताल है। प्रियंवद अपने भीतर की उन परतों तक पहुँचना चाहता है जहाँ अहं, इच्छा और प्रदर्शन समाप्त हो जाएँ।

“सघन निविड में वह अपने को

सौंप रहा था उसी किरीटी-तरु को।”

हाँ “सौंप रहा था” सबसे महत्त्वपूर्ण क्रिया है। साधना का अर्थ अधिकार नहीं, समर्पण है। प्रियंवद स्वयं को वृक्ष को सौंप देता है। यह उलटाव ध्यान देने योग्य है। सामान्यतः मनुष्य प्रकृति का उपयोग करता है। यहाँ मनुष्य स्वयं प्रकृति को समर्पित हो रहा है।

“कौन प्रियंवद है कि दंभ कर

इस अभिमंत्रित कारुवाद्य के सम्मुख आवे?”

यहाँ प्रियंवद स्वयं से प्रश्न करता है। वह अपने नाम का प्रयोग तीसरे पुरुष में करता है। यह आत्मालोचन की शैली है। अपने को बाहर से देखने की क्षमता ही साधना की पहचान है।

“दंभ” शब्द यहाँ निर्णायक है। प्रियंवद मानता है कि यदि वह यह सोचे कि वह इस वीणा को बजा लेगा, तो वही दंभ होगा। इस प्रकार वह अपने भीतर अहं की सबसे छोटी संभावना को भी पहचान लेता है।

“कौन बजावे

यह वीणा जो स्वयं एक जीवन भर की साधना रही?”

यहाँ वीणा को वस्तु नहीं, समय का रूप दिया गया है। वह एक जीवन भर की साधना है। किसी एक क्षण की कला उससे कैसे मुकाबला कर सकती है? यह प्रश्न केवल प्रियंवद का नहीं, कला के प्रति अज्ञेय की दृष्टि का भी प्रश्न है। कोई भी बड़ी कलाकृति अपने भीतर अपने रचनाकार का जीवन लेकर आती है। उसे केवल तकनीक से नहीं समझा जा सकता।

“भूल गया था केशकंबली राजा-सभा को :

कंबल पर अभिमंत्रित एक अकेलेपन में डूब गया था…”

यहाँ “अकेलापन” शब्द सामान्य अर्थ में नहीं आया है। यह सामाजिक अलगाव नहीं है। यह वह आंतरिक एकांत है जहाँ मनुष्य अपने सबसे गहरे अनुभव से मिलता है। ध्यान की अनेक परंपराओं में यही एकांत आवश्यक माना गया है। प्रियंवद भीड़ के बीच बैठा है, फिर भी अकेला है। यह अकेलापन बाहरी नहीं, भीतरी है।

“जिसमें साक्षी के आगे था

जीवित वही किरीटी-तरु…”

अब वृक्ष स्मृति नहीं रह गया। वह वर्तमान हो उठा है। “जीवित” शब्द का यही अर्थ है। साधना में स्मरण इतना गहरा हो जाता है कि अनुपस्थित भी उपस्थित हो उठता है। प्रियंवद के लिए अब वीणा नहीं, वही वृक्ष सामने है।

कवि फिर वृक्ष की विराटता का स्मरण कराता है—

“जिसकी जड़ वासुकि के फण पर थी आधारित,

जिसके कंधे पर बादल सोते थे

और कान में जिसके हिमगिरि कहते थे अपने रहस्य।”

ये पंक्तियाँ पहले भी आ चुकी हैं, पर अब उनका कार्य बदल गया है। पहले वे इतिहास का भाग थीं। अब वे प्रियंवद की चेतना का भाग हैं। इससे पता चलता है कि साधना केवल वर्तमान में बैठने का नाम नहीं है; वह स्मृति को भी जीवित अनुभव में बदल देती है।

“संबोधित कर उस तरु को, करता था

नीरव एकालाप प्रियंवद।”

“नीरव एकालाप” भी विरोधाभासी पद है। एकालाप सामान्यतः बोला जाता है, पर यहाँ वह मौन है। इसका अर्थ है कि संवाद शब्दों से पहले शुरू हो चुका है। बाहर अभी कोई ध्वनि नहीं है, पर भीतर संप्रेषण चल रहा है।

यहीं से प्रियंवद का लंबा आत्म-संवाद आरंभ होगा। यह केवल वृक्ष से बातचीत नहीं है। यह मनुष्य की उस यात्रा की शुरुआत है जिसमें वह अपने सीमित अस्तित्व से निकलकर प्रकृति की व्यापक चेतना में प्रवेश करना चाहता है। कविता अब कथा से आगे बढ़कर अनुभव की भाषा में प्रवेश करती है। आने वाले अंशों में स्मृति, प्रकृति, ध्वनि और आत्म-विलय एक-दूसरे में इस तरह मिलेंगे कि संगीत बजने से पहले ही साधना अपने चरम की ओर बढ़ने लगेगी।

अब कविता अपने सबसे भीतरी प्रदेश में प्रवेश करती है। कथा लगभग ठहर जाती है और उसकी जगह अनुभव की गति ले लेती है। प्रियंवद का जो संवाद आरंभ होता है, वह देखने में वृक्ष से संबोधन है, पर वास्तव में वह अपने भीतर उस चेतना को जगाने का प्रयत्न है जो प्रकृति, स्मृति और सृजन के बीच बिखरी हुई है। यहाँ अज्ञेय ने किसी दार्शनिक ग्रंथ की भाषा नहीं अपनाई। वे संबोधनों, स्मृतियों और संवेदनाओं के सहारे उस मानसिक स्थिति को रचते हैं जिसमें साधक अपने को धीरे-धीरे मिटाता चलता है।

प्रियंवद कहता है—

“ओ विशाल तरु!

शत्-सहस्र पल्लवन-पतझरों ने जिसका नित रूप सँवारा,
कितनी बरसातों कितने खद्योतों ने आरती उतारी,”

संबोधन का पहला शब्द है—“विशाल”। यह केवल आकार का बोध नहीं कराता। इस विशालता में समय भी शामिल है। अगली पंक्ति इसे स्पष्ट कर देती है। वृक्ष को किसी एक ऋतु ने नहीं गढ़ा। असंख्य पल्लवन और पतझर उसके निर्माण में लगे हैं। यहाँ वृक्ष समय का जीवित रूप बन जाता है। उसकी देह पर ऋतुओं का इतिहास लिखा हुआ है। वह एक क्षण का नहीं, अनगिनत परिवर्तनों का परिणाम है।

“बरसातों” और “खद्योतों” का एक साथ आना भी ध्यान देने योग्य है। बरसात प्रकृति की विराट घटना है, जबकि खद्योत या जुगनू बहुत छोटे हैं। अज्ञेय एक ही दृश्य में विशाल और सूक्ष्म दोनों को साथ रखते हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि किसी जीवन को बनाने में बड़ी घटनाएँ ही नहीं, छोटे-छोटे स्पर्श भी भाग लेते हैं। “आरती उतारी” कहना इस पूरे दृश्य को धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के अपने उत्सव में बदल देता है। जुगनुओं का प्रकाश दीपों की तरह दिखाई देता है। प्रकृति स्वयं इस वृक्ष का अभिनंदन करती है।

“दिन भौंरे कर गए गुँजरित,
रातों में झिल्ली ने

अनकथ मंगल-गान सुनाए,”

दिन और रात दोनों यहाँ संगीत में बदल गए हैं। दिन का संगीत भौंरों की गूँज है, रात का संगीत झिल्ली का स्वर। “अनकथ मंगल-गान” एक महत्त्वपूर्ण पद है। मंगल-गान सामान्यतः विवाह, जन्मया उत्सव में गाया जाता है। यहाँ कोई मनुष्य नहीं गा रहा। प्रकृति स्वयं वृक्ष के जीवन का उत्सव मना रही है। “अनकथ” बताता है कि यह भाषा से पहले का संगीत है। उसका अर्थ शब्दों में नहीं, अनुभूति में मिलता है।

“साँझ-सवेरे अनगिन

अनचीन्हे खग-कुल की मोद-भरी क्रीड़ा-काकलि
डाली-डाली को कँपा गई—”

“अनचीन्हे” शब्द पर ध्यान देना चाहिए। प्रियंवद पक्षियों की जातियाँ नहीं गिनाता। उसे नामों से अधिक उनके जीवन की लय याद है। इससे कविता का ध्यान वर्गीकरण से हटकर अनुभव पर आ जाता है। “क्रीड़ा-काकलि” में उल्लास है। शाखाओं का काँपना केवल हवा से नहीं, जीवन की चहल-पहल से है। वृक्ष यहाँ स्थिर होकर भी गतिशील दिखाई देता है।

इसके बाद संबोधनों की एक शृंखला आती है—

“ओ दीर्घकाय!
ओ पूरे झारखंड के अग्रज,

तात, सखा, गुरु, आश्रय,
त्राता महच्छाय,”

यह क्रम धीरे-धीरे संबंधों का विस्तार करता है। पहले वृक्ष का आकार है—दीर्घकाय। फिर उसका सामाजिक स्थान है—पूरे वन का अग्रज। इसके बाद वह परिवार और आत्मीयता के क्षेत्र में प्रवेश करता है—तात, सखा, गुरु, आश्रय। अंत में “त्राता महच्छाय” उसे संरक्षण देने वाली सत्ता बना देता है।

इन संबोधनों में एक सूक्ष्म क्रम है। “तात” में वात्सल्य है। “सखा” में बराबरी है। “गुरु” में सीखने का संबंध है। “आश्रय” में सुरक्षा है। इस प्रकार प्रियंवद मनुष्य के लगभग सभी मूल संबंधों को वृक्ष में खोज लेता है। यह प्रकृति के प्रति उसकी श्रद्धा भर नहीं, मनुष्य और प्रकृति की अभिन्नता की अनुभूति है।

“ओ व्याकुल मुखरित वन-ध्वनियों के
वृंदगान के मूर्त रूप,”

यहाँ वृक्ष को वन की ध्वनियों का “मूर्त रूप” कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि वृक्ष केवल ध्वनियाँ सुनता नहीं, उन्हें अपने भीतर धारण करता है। वह जंगल की सामूहिक स्मृति है। वृंदगान का अर्थ है अनेक स्वरों का मेल। इस प्रकार वृक्ष एकता का नहीं, बहुलता का प्रतीक बन जाता है। अनेक आवाज़ें उसमें समाकर एक व्यापक लय रचती हैं।

इसके बाद प्रियंवद अपनी इच्छा व्यक्त करता है—

“मैं तुझे सुनूँ,
देखूँ, ध्याऊँ

अनिमेष, स्तब्ध, संयत, संयुत, निर्वाक् :”

यहाँ पाँच विशेषण एक के बाद एक आते हैं। “अनिमेष” अर्थात बिना पलक झपकाए; “स्तब्ध” यानी भीतर की चंचलता से मुक्त; “संयत” अर्थात नियंत्रित; “संयुत” यानी भीतर से एकाग्र; “निर्वाक्” यानी शब्दों से परे। यह सूची केवल अलंकार नहीं है। यह ध्यान की क्रमिक अवस्थाओं का संकेत भी देती है। प्रियंवद देखने की साधारण क्रिया नहीं करना चाहता; वह पूरे अस्तित्व से देखना चाहता है।

“कहाँ साहस पाऊँ

छू सकूँ तुझे!”

यहाँ फिर वही भाव लौटता है जो पहले “अस्पर्श छुअन” में आया था। प्रियंवद के लिए स्पर्श अधिकार का नहीं, उत्तरदायित्व का विषय है। जो वृक्ष इतने लंबे समय तक जीवन का आधार रहा हो, उसे छूने का साहस भी साधारण बात नहीं है।

फिर वह कहता है—

“तेरी काया को छेद, बाँध कर रची गई वीणा को

किस स्पर्धा से
हाथ करें आघात”

“स्पर्धा” शब्द बहुत अर्थपूर्ण है। वादन सामान्यतः प्रतियोगिता नहीं होता, पर यदि कलाकार अपने कौशल का प्रदर्शन करना चाहे तो उसमें स्पर्धा आ जाती है। प्रियंवद इस वृत्ति को अस्वीकार करता है। वह मानता है कि इस वीणा पर हाथ चलाना किसी विजय का प्रयत्न नहीं हो सकता।

“छीनने को तारों से
एक चोट में वह संचित संगीत जिसे रचने में

स्वयं न जाने कितनों के स्पंदित प्राण रच गए!”

यहाँ “छीनने” और “संचित” के बीच का संबंध ध्यान देने योग्य है। यदि संगीत सदियों से संचित अनुभव है, तो उसे एक झटके में निकाल लेना हिंसा होगी। प्रियंवद इसी हिंसा से बचना चाहता है। वह यह भी कहता है कि इस संगीत को केवल वज्रकीर्ति ने नहीं बनाया; इसमें “न जाने कितनों” के प्राण जुड़े हैं। इस “कितनों” में ऋतुएँ, वर्षाएँ, पक्षी, पशु, हवा, बादल, स्वयं वृक्ष और साधक—सब शामिल हैं। सृजन किसी एक व्यक्ति का निजी कार्य नहीं रह जाता। वह सामूहिक जीवन का परिणाम बन जाता है।

इसके बाद कविता का भाव और आत्मीय हो जाता है—

“नहीं, नहीं! वीणा यह मेरी गोद रखी है, रहे,

किंतु मैं ही तो
तेरी गोद बैठा मोद-भरा बालक हूँ,”

यहाँ संबंध पूरी तरह उलट जाता है। देखने में वीणा प्रियंवद की गोद में है। पर अनुभव में प्रियंवद वृक्ष की गोद में बैठा बालक है। यह दृष्टि का परिवर्तन कविता का मूल बिंदु है। मनुष्य अपने को केंद्र मानना छोड़ देता है। वह स्वयं आश्रित बन जाता है।

“मोद-भरा बालक” कहना भी महत्त्वपूर्ण है। बालक के पास ज्ञान कम होता है, जिज्ञासा अधिक होती है। उसमें स्वामित्व नहीं, विस्मय होता है। प्रियंवद स्वयं को उसी स्थिति में ले आता है। साधना का अर्थ यहाँ फिर से सीखने की तैयारी है।

“ओ तरु-तात! सँभाल मुझे,
मेरी हर किलक

पुलक में डूब जाए :”

“किलक” और “पुलक” दोनों शब्द बाल-सुलभ आनंद के हैं। प्रियंवद किसी सिद्ध पुरुष की मुद्रा नहीं बनाता। वह चाहता है कि उसका उल्लास भी वृक्ष की व्यापक अनुभूति में समा जाए। यहाँ व्यक्तिगत आनंद भी प्रकृति की लय में विलीन हो रहा है।

“मैं सुनूँ,

गुनूँ, विस्मय से भर आँकूँ
तेरे अनुभव का एक-एक अंत:स्वर”

यहाँ तीन क्रियाएँ हैं—सुनना, गुनना और आँकना। पहले ग्रहण, फिर आत्मसात्, फिर समझ। “अंत:स्वर” शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है। प्रियंवद बाहरी ध्वनि नहीं, भीतर के कंपन को सुनना चाहता है। वह वृक्ष के अनुभव को उसकी भीतरी लय में पहचानना चाहता है।

“तेरे दोलन की लोरी पर झूमूँ मैं तन्मय—
गा तू :

तेरी लय पर मेरी साँसें
भरें, पुरें, रीतें, विश्रांति पाएँ।”

इन पंक्तियों में मनुष्य और वृक्ष का संबंध साँस तक पहुँच जाता है। प्रियंवद अपनी श्वास को वृक्ष की लय के साथ जोड़ना चाहता है। “भरें, पुरें, रीतें” जीवन की पूरी गति है—आना, भरना, खाली होना। साँस का यह चक्र प्रकृति की लय में मिल जाए, यही उसकी कामना है। “विश्रांति पाएँ” का अर्थ मृत्यु नहीं, उस गहरे संतुलन से है जहाँ जीवन अपनी स्वाभाविक गति में लौट आता है।

यहीं तक आते-आते यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रियंवद अभी तक वीणा बजाने की तैयारी भी नहीं कर रहा। वह स्वयं को उस चेतना के अनुकूल बना रहा है जिससे संगीत जन्म ले सके। अज्ञेय का संकेत साफ है कि कला की शुरुआत तकनीक से नहीं, ग्रहणशीलता से होती है। जब तक कलाकार अपने भीतर सुनने की क्षमता विकसित नहीं करता, तब तक उसका सृजन बाहर से आरोपित रहता है। प्रियंवद इसी सुनने की साधना में है। वह वृक्ष को बोलने देना चाहता है, स्वयं बोलना नहीं चाहता। यही कारण है कि आगे वह बार-बार कहेगा—“गा तू।” इस छोटे-से आग्रह में पूरी कविता का सौंदर्य-दर्शन छिपा हुआ है।

अगले भाग में “गा तू! यह वीणा रक्खी है : तेरा अंग-अपंग…” से लेकर “तू गा, तू गा, तू गा, तू गा!” तक के अंश का सूक्ष्म पठन किया जाएगा, जहाँ प्रियंवद की चेतना व्यक्तिगत स्तर से उठकर स्मृति, श्रुति और सृष्टि के व्यापक अनुभव में प्रवेश करती है।

प्रियंवद के आत्म-संवाद का यह अगला विस्तार कविता के विचार-जगत का केंद्र है। अब तक वह वृक्ष को प्रणाम कर रहा था, उससे सीखने की इच्छा व्यक्त कर रहा था और अपने अहं को पीछे रख रहा था। अब वह उस बिंदु पर पहुँचता है जहाँ वह वीणा और वृक्ष के संबंध को नई तरह से समझता है। यही समझ आगे चलकर संगीत के अवतरण का आधार बनती है।

वह कहता है—

“गा तू!
यह वीणा रक्खी है : तेरा अंग-अपंग!

किंतु अंगी, तू अक्षत, आत्म-भरित,
रस-विद्

तू गा :”

“गा तू” का बार-बार दोहराया जाना किसी आग्रह की पुनरावृत्ति भर नहीं है। यह प्रियंवद के भीतर घट रहे परिवर्तन का संकेत है। सामान्य कलाकार कहता—“मैं बजाऊँगा।” प्रियंवद कहता है—“तू गा।” इस छोटे-से परिवर्तन में पूरी काव्य-दृष्टि बदल जाती है। सृजन का केंद्र कलाकार नहीं, वह व्यापक सत्ता है जिसके साथ कलाकार अपने को जोड़ता है।

“तेरा अंग-अपंग” एक जटिल और गहरा पद है। वीणा वृक्ष के शरीर का एक अलग हुआ अंग है। वह उसी से बनी है, पर अब अपने मूल से कट चुकी है। इसलिए वह “अंग” भी है और “अपंग” भी। उसमें मूल सत्ता का अंश है, पर उसकी संपूर्णता नहीं। इसके विपरीत वृक्ष “अंगी” है, अर्थात वह संपूर्ण सत्ता है जिसमें सब कुछ समाहित है। “अक्षत” और “आत्म-भरित” कहकर प्रियंवद यह स्पष्ट करता है कि मूल चेतना अब भी वृक्ष में सुरक्षित है। वीणा उसी की स्मृति है।

“रस-विद्” शब्द संस्कृत काव्यशास्त्र की परंपरा की याद दिलाता है। यहाँ उसका अर्थ केवल रस का जानकार नहीं है। वृक्ष जीवन के रस को जानता है क्योंकि उसने ऋतुओं, जन्म-मरण, धूप-छाँह, वर्षा और समय के दीर्घ प्रवाह को जिया है। उसके भीतर अनुभव का ऐसा संचय है जिसे किसी पुस्तक से नहीं पाया जा सकता।

फिर प्रियंवद कहता है—

“मेरे अँधियारे अंतस् में आलोक जगा

स्मृति का
श्रुति का—”

यहाँ “अँधियारा अंतस्” आत्महीनता या निराशा का प्रतीक नहीं है। यह वह आंतरिक क्षेत्र है जहाँ अभी प्रकाश नहीं पहुँचा। प्रियंवद अपने भीतर ज्ञान भरने की याचना नहीं करता। वह प्रकाश की याचना करता है। इस प्रकाश के दो स्रोत हैं—“स्मृति” और “श्रुति”।

“स्मृति” का अर्थ यहाँ केवल अतीत को याद करना नहीं है। यह उस सांस्कृतिक और अस्तित्वगत अनुभव का संकेत है जो पीढ़ियों से मनुष्य और प्रकृति के बीच संचित होता आया है। “श्रुति” शब्द इस अर्थ को और व्यापक बना देता है। भारतीय परंपरा में श्रुति वह है जिसे सुना गया है, जो अनुभव के रूप में प्राप्त हुई है। प्रियंवद चाहता है कि उसके भीतर वही सुनने की क्षमता जागे जिससे जीवन का मूल स्वर सुना जा सके।

इसलिए वह फिर कहता है—“तू गा, तू गा, तू गा, तू गा!” चार बार की पुनरावृत्ति केवल लय नहीं बनाती; वह साधना की तीव्रता को भी व्यक्त करती है। यह वैसा ही है जैसे ध्यान में कोई मंत्र बार-बार जपा जाता है। यहाँ “गा” स्वयं एक मंत्र बन जाता है। प्रियंवद अपने बोलने की जगह वृक्ष के गाने की प्रतीक्षा कर रहा है।

इसके बाद कविता स्मृति की लंबी यात्रा पर निकलती है—

“हाँ, मुझे स्मरण है :

बदली—कौंध—पत्तियों पर वर्षा-बूँदों की पट-पट।
घनी रात में महुए का चुप-चाप टपकना।”

यहाँ “मुझे स्मरण है” से एक नया विन्यास आरंभ होता है। स्मरण किसी एक घटना का नहीं है। वह प्रकृति के असंख्य सूक्ष्म अनुभवों का है। ध्यान देने की बात यह है कि प्रियंवद बड़े दृश्यों से आरंभ नहीं करता। सबसे पहले उसे वर्षा-बूँदों की “पट-पट” याद आती है। फिर महुए का “चुप-चाप टपकना”।

यह क्रम अर्थपूर्ण है। वर्षा की ध्वनि खुली और स्पष्ट है। महुए का गिरना इतना धीमा है कि उसे सुनने के लिए एकाग्रता चाहिए। प्रियंवद की स्मृति इस सूक्ष्मता तक जाती है। इसका अर्थ है कि उसका संबंध प्रकृति से केवल दृश्यात्मक नहीं, श्रव्य और संवेदनात्मक भी है।

“चौंके खग-शावक की चिहुँक।”

यह एक क्षणिक ध्वनि है। चिड़िया के बच्चे की छोटी-सी आवाज़ सामान्यतः हमारे ध्यान में नहीं आती। लेकिन प्रियंवद उसे भी याद रखता है। इससे उसकी संवेदना की महीनता का पता चलता है। वह प्रकृति के बड़े कोलाहल से अधिक उसके छोटे-छोटे कंपन सुनता है।

“शिलाओं को दुलराते वन-झरने के

द्रुत लहरीले जल का कल-निदान।”

यहाँ “दुलराते” क्रिया विशेष ध्यान देने योग्य है। जल शिलाओं को काटता भी है, पर प्रियंवद उसे “दुलराते” हुए देखता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह प्रकृति की कठोरता से परिचित नहीं है। वह उस संबंध को देख रहा है जिसमें निरंतर स्पर्श से परिवर्तन आता है। “कल-निदान” में ध्वनि और अर्थ दोनों जुड़े हैं। झरने का स्वर जीवन की सतत गति का संकेत बन जाता है।

“कुहरे में छन कर आती

पर्वती गाँव के उत्सव-ढोलक की थाप।”

यहाँ ध्वनि दूर से आती है। कुहरा उसे मद्धिम बना देता है। फिर भी वह सुनाई देती है। अज्ञेय ध्वनि की दूरी और उसकी कोमलता दोनों को एक साथ उपस्थित करते हैं। गाँव का उत्सव जंगल की निस्तब्धता से विरोध नहीं बनाता; दोनों मिलकर एक व्यापक जीवन-संगीत रचते हैं।

“गड़रियों की अनमनी बाँसुरी।”

“अनमनी” विशेषण बहुत सूक्ष्म है। बाँसुरी कोई औपचारिक प्रस्तुति नहीं दे रही। वह सहज जीवन का हिस्सा है। उसमें अभ्यास की चमक नहीं, दिनचर्या की स्वाभाविकता है। यही स्वाभाविकता प्रियंवद को आकर्षित करती है।

“कठफोड़े का ठेका। फुलसुँघनी की आतुर फुरकन :
ओस-बूँद की ढरकन—इतनी कोमल, तरल

कि झरते-झरते मानो
हरसिंगार का फूल बन गई।”

इन पंक्तियों में ध्वनियों की विविधता दिखाई देती है। कठफोड़े की चोट में लय है, फुलसुँघनी की उड़ान में बेचैनी है, ओस की बूँद में कोमलता है। सबसे सुंदर बात यह है कि ओस की बूँद गिरते-गिरते फूल बन जाती है। यह यथार्थ का वर्णन नहीं, अनुभव का रूपांतरण है। प्रकृति का स्पर्श संवेदना को इस हद तक बदल देता है कि ध्वनि दृश्य में और दृश्य सुगंध में बदलने लगता है।

“भरे शरद के ताल, लहरियों की सरसर-ध्वनि।
कूँजों का क्रेंकार। काँद लंबी टिट्टिभ की।”

यहाँ जल और आकाश दोनों के स्वर मिलते हैं। “सरसर” और “क्रेंकार” जैसे शब्द केवल अर्थ नहीं देते, ध्वनि भी पैदा करते हैं। अज्ञेय की भाषा में ध्वन्यात्मकता केवल अलंकार नहीं, अनुभव की रचना का माध्यम है।

“पंख-युक्त सायक-सी हंस-बलाका।”

यह उपमा गति का बोध कराती है। हंसों की उड़ान तीर की तरह तीव्र है। लेकिन उसमें हिंसा नहीं, सौंदर्य है। अज्ञेय प्रकृति की गतियों को मानवीय अनुभव से जोड़ते हैं, पर उन्हें सीमित नहीं करते।

“चीड़-वनों में गंध-अंध उन्मद पतंग की जहाँ-तहाँ टकराहट”

यहाँ ध्वनि से अधिक स्पर्श और गंध का अनुभव है। “गंध-अंध” एक नया प्रयोग है। पतंगा गंध के आकर्षण में अंधा होकर भटक रहा है। यह प्रकृति के सहज आवेग का चित्र है। अज्ञेय ध्वनि के साथ गंध और गति को भी जोड़ देते हैं।“जल-प्रताप का प्लुत एकस्वर।”

यहाँ नदी का सतत प्रवाह एक लंबी ध्वनि में बदल जाता है। “प्लुत” संगीत का शब्द है, जिसका अर्थ दीर्घ उच्चारण भी है। जल का प्रवाह मानो एक निरंतर खिंचा हुआ स्वर बन गया है।

“झिल्ली-दादुर, कोकिल-चातक की झंकार पुकारों की यति में

संसृति की साँय-साँय।”

यहाँ कविता अपनी पहली बड़ी दार्शनिक छलाँग लगाती है। अब तक अलग-अलग ध्वनियाँ थीं। अब वे मिलकर “संसृति की साँय-साँय” बन जाती हैं। “संसृति” केवल संसार नहीं, सतत प्रवाहित जीवन है। उसका संगीत किसी एक जीव का स्वर नहीं, समूची सृष्टि की सम्मिलित ध्वनि है।

इस पूरे अंश की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ स्मृति किसी निजी घटना का लेखा-जोखा नहीं है। प्रियंवद को अपना बचपन, अपना परिवार या अपने जीवन की घटनाएँ याद नहीं आतीं। उसे प्रकृति की ध्वनियाँ याद आती हैं। इसका अर्थ यह है कि उसका व्यक्तित्व मनुष्य-केंद्रित स्मृति से आगे निकल चुका है। उसकी पहचान उस व्यापक पर्यावरण से बनती है जिसमें उसने जीवन को सुना है।

इसीलिए इस स्मरण में कहीं भी भावुकता नहीं है। यह अतीत का विलाप नहीं, अनुभव की पुनर्रचना है। प्रियंवद इन ध्वनियों को केवल याद नहीं कर रहा; वह अपने भीतर उन्हें फिर से जीवित कर रहा है। यही जीवित स्मृति आगे चलकर उसके अहं को शिथिल करेगी और उसे उस स्थिति तक पहुँचाएगी जहाँ वह कह सकेगा—“मैं नहीं, नहीं! मैं कहीं नहीं।” उस अंतिम आत्म-विलय की तैयारी इसी स्मृति-साधना में हो रही है।

अब तक प्रियंवद की स्मृति में प्रकृति का कोमल, लयपूर्ण और अंतरंग संसार उपस्थित था। वर्षा की बूँदें, महुए का टपकना, झरने का स्वर, बाँसुरी, पक्षियों की पुकार—इन सबके बीच जीवन का एक मृदु संगीत था। लेकिन अज्ञेय प्रकृति को केवल सौंदर्य और शांति तक सीमित नहीं रखते। अगले अंश में वही प्रकृति अपने उग्र, विध्वंसकारी और विराट रूप में सामने आती है। इससे कविता का अनुभव एकांगी नहीं रहता। प्रियंवद जिस चेतना तक पहुँचना चाहता है, उसमें सृष्टि के दोनों पक्ष—सृजन और संहार, कोमलता और कठोरता—एक साथ उपस्थित हैं।

वह कहता है—

“हाँ, मुझे स्मरण है :

दूर पहाड़ों से काले मेघों की बाढ़
हाथियों का मानो चिंघाड़ रहा हो यूथ।”

यहाँ बादलों का वर्णन केवल दृश्य नहीं है। “बाढ़” शब्द गति, विस्तार और अनियंत्रित शक्ति का बोध कराता है। अगले ही क्षण बादलों की गर्जना हाथियों के झुंड की चिंघाड़ में बदल जाती है। यह उपमा इसलिए प्रभावशाली है कि हाथी भारतीय वन-संसार में सामूहिक शक्ति का प्रतीक है। “यूथ” शब्द इस सामूहिकता को और गहरा करता है। प्रकृति की आवाज़ यहाँ किसी एक जीव की नहीं, समूह की आवाज़ है।

“घरघराहट चढ़ती बहिया की।
रेतीले कगार का गिरना छप्-छड़ाप।”

इन पंक्तियों में ध्वनि की गति पर ध्यान देना चाहिए। “घरघराहट” लंबी और फैलती हुई ध्वनि है, जबकि “छप्-छड़ाप” अचानक टूटने का अनुभव कराती है। नदी का चढ़ना और कगार का गिरना एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अज्ञेय यहाँ केवल घटना नहीं बताते, बल्कि उसके ध्वन्यात्मक क्रम को पकड़ते हैं। कविता पढ़ते हुए लगता है जैसे पानी की रफ़्तार और मिट्टी का टूटना सुनाई दे रहा हो।

“झंझा की फुफकार, तप्त,
पेड़ों का अररा कर टूट-टूट कर गिरना।”

“फुफकार” सामान्यतः साँप के लिए प्रयुक्त होती है। आँधी को “फुफकारती” हुई बताकर कवि उसे जीवित बना देता है । “अररा कर” शब्द पेड़ों के टूटने की पीड़ा को सुनने योग्य बना देता है। यह केवल लकड़ी के गिरने की आवाज़ नहीं, एक जीवित सत्ता के विखंडन की ध्वनि है।

यहाँ ध्यान देने की बात यह भी है कि प्रियंवद इस विनाश से भयभीत नहीं है। उसे यह भी स्मरण है। इसका अर्थ है कि उसकी प्रकृति-दृष्टि चयनात्मक नहीं है। वह केवल सुखद अनुभवों को ही प्रकृति नहीं मानता। उसके लिए विनाश भी उसी जीवन-चक्र का हिस्सा है।

“ओले की कर्री चपत।”

यह पूरी पंक्ति केवल चार शब्दों की है, लेकिन इसमें ध्वनि, स्पर्श और पीड़ा तीनों एक साथ उपस्थित हैं। “कर्री” का उच्चारण ही कठोरता का अनुभव कराता है। “चपत” में अचानक आघात का भाव है। कविता का शब्द अपने अर्थ से पहले अपने उच्चारण में प्रभाव पैदा करता है।

“जमे पाले से तनी कटारी-सी सूखी घासों की टूटन।”

यहाँ पाला और घास का दृश्य है, पर कवि उसे “कटारी” की उपमा देता है। सूखी घास की तनी हुई अवस्था तलवार जैसी लगती है। फिर उसका टूटना एक सूक्ष्म ध्वनि बन जाता है। यह वही कवि है जिसने महुए के चुपचाप गिरने की ध्वनि सुनी थी। अब वह घास के टूटने का स्वर भी सुन रहा है। इससे स्पष्ट होता है कि उसकी संवेदना किसी एक स्तर पर नहीं ठहरती।

“ऐंठी मिट्टी का स्निग्ध घाम में धीरे-धीरे रिसना।”

यह पंक्ति विशेष ध्यान चाहती है। मिट्टी का “रिसना” सामान्य प्रयोग नहीं है। पानी रिसता है, मिट्टी नहीं। लेकिन धूप में सूखी धरती धीरे-धीरे नरम पड़ती है। कवि उस परिवर्तन को “रिसना” कहता है। इससे पता चलता है कि अज्ञेय के लिए परिवर्तन भी एक ध्वनि है, चाहे वह सुनाई न दे।

हिम-तुषार के फाहे धरती के घावों को सहलाते चुप-चाप।”

अभी कुछ पंक्तियाँ पहले आँधी, बाढ़ और टूटन थी। अब वही प्रकृति घाव सहला रही है। “घाव” और “सहलाना” का मेल इस बात की ओर संकेत करता है कि प्रकृति केवल आघात नहीं देती; वह उपचार भी करती है। यह द्वंद्व कविता में बार-बार लौटता है। विनाश और करुणा एक ही व्यवस्था के दो पक्ष हैं।

“घाटियों में भरती
गिरती चट्टानों की गूँज—

काँपती मंद्र गूँज—अनुगूँज—साँस खोई-सी, धीरे-धीरे नीरव।”

यहाँ ध्वनि का पूरा जीवन-क्रम उपस्थित है। पहले गूँज है, फिर अनुगूँज, फिर वह धीरे-धीरे क्षीण होती है और अंततः मौन में बदल जाती है। यह केवल ध्वनि का वर्णन नहीं है। यह उस प्रक्रिया का भी रूपक है जिसमें हर घटना अंततः मौन में विलीन हो जाती है। कविता में आगे जो “महामौन” आएगा, उसकी तैयारी यहाँ से ही आरंभ हो जाती है।

इसके बाद प्रियंवद फिर कहता है—

“मुझे स्मरण है :

हरी तलहटी में, छोटे पेड़ों की ओट ताल पर
बँधे समय वन-पशुओं की नानाविध आतुर-तृप्त पुकारें :”

यहाँ “बँधे समय” विशेष ध्यान देने योग्य है। इसका अर्थ घड़ी का समय नहीं है। यह दिन के उस निश्चित क्षण की ओर संकेत है जब वन-पशु जल पीने आते हैं। प्रकृति का अपना समय है, जो मनुष्य की घड़ी से नहीं चलता। प्रियंवद उसी लय को याद करता है।

“आतुर-तृप्त” भी विरोधी भावों का मेल है। प्यास उन्हें आतुर बनाती है, जल उन्हें तृप्त करता है। एक ही शब्द में यात्रा और उसका फल दोनों समा जाते हैं।

“गर्जन, घुर्घुर, चीख़, भूक, हुक्का, चिचियाहट।”

अज्ञेय यहाँ पशुओं की आवाज़ों को अलग-अलग शब्दों में बाँधते हैं। यह केवल सूची नहीं है। प्रत्येक शब्द का अपना ध्वनि-विन्यास है। “गर्जन” भारी है, “चिचियाहट” तीखी है, “घुर्घुर” भीतर से उठती हुई लगती है। कविता में शब्द स्वयं ध्वनि का रूप ले लेते हैं।

“कमल-कुमुद-पत्रों पर चोर-पैर द्रुत धावित

जल-पंछी की चाप”“चोर-पैर” एक सुंदर प्रयोग है। जल-पक्षी का चलना इतना हल्का है कि मानो चोरी-छिपे चल रहा हो। “चाप” शब्द से उसके पैरों का जल पर पड़ता हुआ स्पर्श सुनाई देता है। अज्ञेय गति को भी ध्वनि में बदल देते हैं।

“थाप दादुर की चकित छलाँगों की।”

दादुर का कूदना दृश्य है, पर कवि उसे “थाप” के रूप में सुनता है। इस प्रकार दृश्य और श्रव्य अनुभव लगातार एक-दूसरे में रूपांतरित होते रहते हैं।

“पंथी के घोड़े की टाप अधीर।
अचंचल धीर थाप भैंसों के भारी खुर की।”

इन दोनों पंक्तियों का संतुलन उल्लेखनीय है। घोड़े की टाप में अधीरता है, भैंस के कदमों में धैर्य। दोनों ध्वनियाँ अलग हैं, दोनों जीवन की अलग लय का प्रतिनिधित्व करती हैं। अज्ञेय किसी एक को श्रेष्ठ नहीं ठहराते। उनके लिए प्रकृति में हर गति का अपना सौंदर्य है।

फिर स्मृति का एक और विस्तार आता है—

“मुझे स्मरण है :
उझक क्षितिज से

किरण भोर की पहली
जब तकती है ओस-बूँद को

उस क्षण की सहसा चौंकी-सी सिहरन।”

यहाँ दृश्य इतना सूक्ष्म है कि वह लगभग ध्यान का दृश्य बन जाता है। पहली किरण और ओस-बूँद का मिलन क्षणिक है। “चौंकी-सी सिहरन” उस सूक्ष्म परिवर्तन का नाम है जो प्रकाश के स्पर्श से घटित होता है। यह प्रकृति का एक ऐसा क्षण है जिसे देखने के लिए असाधारण धैर्य चाहिए।

“और दुपहरी में जब

घास-फूल अनदेखे खिल जाते हैं
मौमाखियाँ असंख्य झूमती करती हैं गुँजार—

उस लंबे विलमे क्षण का तंद्रालस ठहराव।”

भोर की सिहरन के बाद अब दोपहर का ठहराव है। “विलमे क्षण” में समय धीमा पड़ जाता है। दोपहर का यह आलस्य निष्क्रियता नहीं है; यह जीवन की भीतर चलती हुई लय है। मधुमक्खियों का गुँजार इस मौन को भरता नहीं, उसे और गहरा करता है।

“और साँझ को

जब तारों की तरल कँपकँपी
स्पर्शहीन झरती है—”

यहाँ अज्ञेय दृश्य को स्पर्श में बदल देते हैं। तारों की रोशनी “झरती” है, जबकि वास्तव में वह गिरती नहीं। “तरल कँपकँपी” से आकाश की झिलमिलाहट का ऐसा बिंब बनता है जिसमें प्रकाश स्थिर न होकर जीवित प्रतीत होता है।

“मानो नभ में तरल नयन ठिठकी
नि:संख्य सवत्सा युवती माताओं के आशीर्वाद—

उस संधि-निमिष की पुलकन लीयमान।”

यह पूरी कविता के सबसे कोमल बिंबों में है। संध्या का आकाश कवि को उन माताओं की आँखों जैसा दिखाई देता है जो अपने शिशुओं के साथ आशीर्वाद दे रही हों। “सवत्सा” शब्द वात्सल्य का वातावरण रचता है। यहाँ आकाश किसी निर्जीव विस्तार की तरह नहीं, करुणा से भरी उपस्थिति की तरह सामने आता है।

“पुलकन लीयमान” का अर्थ है कि वह आनंद धीरे-धीरे पूरे अस्तित्व में घुल रहा है। यह अनुभव न तो केवल दृश्य है, न केवल भाव। यह उस स्थिति का संकेत है जहाँ प्रकृति और चेतना के बीच का भेद कम होने लगता है।

इस पूरे अंश को पढ़ते हुए एक बात लगातार सामने आती है कि प्रियंवद की स्मृति में प्रकृति स्थिर चित्रों के रूप में नहीं है। वह गति, ध्वनि, स्पर्श, प्रकाश, ताप और समय के रूप में उपस्थित है। उसने प्रकृति को देखा कम, जिया अधिक है। इसी कारण उसकी स्मृति केवल अतीत का संग्रह नहीं बनती; वह साधना का माध्यम बन जाती है।

अब तक यह भी स्पष्ट हो जाता है कि प्रियंवद की चेतना धीरे-धीरे अपने व्यक्तिगत अनुभवों से बाहर निकल रही है। उसकी स्मृति में ‘मैं’ कहीं नहीं है। वहाँ वर्षा है, पक्षी हैं, नदी है, पाला है, पशु हैं, प्रकाश है, संध्या है। यही क्रम आगे चलकर उसे अपने ‘मैं’ को भी भुला देने की स्थिति तक ले जाएगा। अगले अंश में यही परिवर्तन प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देगा, जहाँ वह कहेगा कि स्मरण तो है, पर स्वयं वह अपने को भूल चुका है।

अब कविता उस मोड़ पर पहुँचती है जहाँ स्मृति का स्वरूप बदलने लगता है। अभी तक प्रियंवद प्रकृति के असंख्य रूपों को याद कर रहा था। उन स्मृतियों में बाहर की दुनिया थी—पर्वत, वर्षा, पक्षी, पशु, नदी, ओस, धूप, संध्या, आकाश। अब वह अपने भीतर लौटता है। लेकिन यह लौटना आत्मकथा सुनाने के लिए नहीं है। इसके विपरीत, जितना वह अपने भीतर उतरता है, उतना ही उसका निजी ‘मैं’ पीछे हटने लगता है। अज्ञेय इस परिवर्तन को किसी दार्शनिक व्याख्या से नहीं, बल्कि अनुभव की क्रमिक गति से दिखाते हैं।

प्रियंवद कहता है—

“मुझे स्मरण है :

और चित्र प्रत्येक
स्तब्ध, विजड़ित करता है मुझको।”

“चित्र प्रत्येक” का अर्थ केवल दृश्य नहीं है। अब तक जिन-जिन अनुभवों का स्मरण हुआ, वे सब मिलकर उसके सामने एक साथ उपस्थित हो जाते हैं। “प्रत्येक” शब्द बताता है कि कोई भी अनुभव तुच्छ नहीं है। प्रत्येक दृश्य अपने भीतर एक ऐसी शक्ति रखता है जो साधक को भीतर तक हिला देती है।

“स्तब्ध” और “विजड़ित” दोनों शब्दों का मेल ध्यान देने योग्य है। “स्तब्ध” होने का अर्थ है कि मनुष्य बोलना बंद कर देता है; “विजड़ित” का अर्थ है कि उसकी जड़ें हिल जाती हैं, उसका पुराना ढाँचा टूटने लगता है। स्मृति यहाँ सुखद पुनरावृत्ति नहीं है; वह साधक की पुरानी पहचान को तोड़ रही है। यही कारण है कि प्रियंवद आगे अपनी स्थिति को नए शब्दों में व्यक्त करता है।

“सुनता हूँ मैं
पर हर स्वर-कंपन लेता है मुझको मुझसे सोख—”

यहाँ कविता का एक मूल विचार सामने आता है। सामान्य अनुभव में मनुष्य ध्वनि को सुनता है। प्रियंवद के अनुभव में ध्वनि ही उसे अपने भीतर खींच लेती है। “स्वर-कंपन” केवल कान तक नहीं पहुँचता; वह उसके अस्तित्व को प्रभावित करता है। “सोख” शब्द बहुत अर्थपूर्ण है। जैसे सूखी धरती पानी को अपने भीतर खींच लेती है, वैसे ही स्वर प्रियंवद के ‘मैं’ को सोख लेते हैं। यहाँ सुनने वाला और सुनी जाने वाली ध्वनि अलग नहीं रह जाते।

“वायु-सा नाद-भरा मैं उड़ जाता हूँ…”

यह उपमा इस पूरी प्रक्रिया को और स्पष्ट करती है। वायु का अपना कोई निश्चित आकार नहीं होता। वह जहाँ जाती है, उसी के अनुसार रूप ग्रहण कर लेती है। प्रियंवद भी अब वैसा ही हो रहा है। वह स्थिर व्यक्तित्व नहीं रह गया। वह नाद से भरकर बहने लगा है। “नाद-भरा” कहना भी महत्त्वपूर्ण है। वह केवल हवा नहीं है; वह संगीत से भरी हुई हवा है। इस प्रकार उसका अस्तित्व ध्वनि का माध्यम बनने लगता है।

फिर वह कहता है—

“मुझे स्मरण है—

पर मुझको मैं भूल गया हूँ :”

यह पूरी कविता के निर्णायक वाक्यों में से एक है। पहले उसने कहा था कि उसे प्रकृति स्मरण है। अब वह स्वीकार करता है कि उसी स्मरण की प्रक्रिया में वह स्वयं को भूल गया है।

यह “स्वयं को भूल जाना” सामान्य विस्मृति नहीं है। इसका अर्थ अपनी पहचान खो देना भी नहीं है। यहाँ “मैं” से आशय उस सीमित अहं से है जो स्वयं को संसार का केंद्र मानता है। प्रियंवद की स्मृति जितनी व्यापक होती गई, उसका निजी अहं उतना ही क्षीण होता गया। अज्ञेय इस अनुभव को किसी धार्मिक सिद्धांत के रूप में नहीं रखते। वे उसे एक जीवित मानसिक अवस्था की तरह सामने लाते हैं।

ध्यान देने की बात यह भी है कि यहाँ “भूल गया हूँ” में कोई दुख नहीं है। प्रियंवद अपने खो जाने पर शोक नहीं करता। उसके स्वर में राहत है। मानो अपने छोटे-से ‘मैं’ से मुक्त होना ही उसकी साधना का उद्देश्य रहा हो।

वह आगे कहता है—

“सुनता हूँ मैं—

पर मैं मुझसे परे, शब्द में लीयमान।”

“मुझसे परे” एक गहरा पद है। इसका अर्थ अपने अस्तित्व से बाहर निकल जाना नहीं है। इसका अर्थ है अपने सीमित आत्मबोध से आगे बढ़ जाना। “शब्द में लीयमान” कहना भी ध्यान देने योग्य है। यहाँ “शब्द” केवल भाषा नहीं है। भारतीय परंपरा में “शब्द” सृष्टि की मूल ध्वनि का भी संकेत है। अज्ञेय इस सांस्कृतिक स्मृति का उपयोग करते हैं, लेकिन उसे किसी धार्मिक निष्कर्ष में नहीं बाँधते। प्रियंवद उस मूल ध्वनि में विलीन हो रहा है जिससे जीवन की लय बनती है।

इसके बाद आत्म-विलय की प्रक्रिया अपने चरम पर पहुँचती है—“मैं नहीं, नहीं! मैं कहीं नहीं!” इस पंक्ति को केवल नकारात्मक कथन मान लेना भूल होगी। यह अस्तित्व के निषेध का वक्तव्य नहीं है। यहाँ “मैं नहीं” का अर्थ है—वह अहं नहीं रहा जो स्वयं को अलग और स्वतंत्र सत्ता मानता था। “नहीं” की पुनरावृत्ति इस अनुभूति की तीव्रता को व्यक्त करती है। प्रियंवद जैसे स्वयं को बार-बार आश्वस्त कर रहा हो कि अब उसका व्यक्तिगत दावा समाप्त हो चुका है।

यहाँ अज्ञेय की काव्य-दृष्टि पर विशेष ध्यान देना चाहिए। वे यह नहीं कहते कि संसार नहीं है, या व्यक्ति का कोई मूल्य नहीं है। वे केवल यह दिखाते हैं कि सृजन के सबसे गहरे क्षण में कलाकार अपने निजी दावे से मुक्त हो जाता है। वह माध्यम बन जाता है।

इसके तुरंत बाद संबोधनों की एक नई शृंखला आती है—

“ओ रे तरु! ओ वन!
ओ स्वर-संभार!

नाद-मय संसृति!
ओ रस-प्लावन!”

यहाँ संबोधन का क्रम पहले से भी व्यापक हो गया है। पहले प्रियंवद केवल वृक्ष से बात कर रहा था। अब वृक्ष से वन तक, वन से स्वर तक, स्वर से पूरी संसृति तक उसका विस्तार हो जाता है।

“स्वर-संभार” का अर्थ है स्वरों का संचय। यह वही संचय है जिसकी झलक हमें पहले प्रकृति की ध्वनियों में मिली थी। अब प्रियंवद उसे एक व्यापक एकता के रूप में देख रहा है।

“नाद-मय संसृति” में संसार ध्वनि का रूप धारण कर लेता है। इसका अर्थ यह नहीं कि संसार केवल संगीत है। इसका अर्थ है कि अस्तित्व की मूल प्रकृति स्पंदनशील है। हर वस्तु, हर जीव, हर गति किसी न किसी कंपन का हिस्सा है।

“रस-प्लावन” कहना भी अर्थपूर्ण है। “प्लावन” में बाढ़ का भाव है। यहाँ रस किसी छोटे अनुभव की तरह नहीं आता। वह पूरे अस्तित्व को भर देने वाली धारा बन जाता है।

फिर प्रियंवद प्रार्थना करता है— “मुझे क्षमा कर—भूल अकिंचनता को मेरी—” “अकिंचनता” शब्द सामान्यतः दीनता या निर्धनता के अर्थ में आता है, लेकिन यहाँ उसका अर्थ अस्तित्वगत सीमितता से है। प्रियंवद मानता है कि उसका व्यक्तिगत अस्तित्व उस विराट सृष्टि की तुलना में बहुत छोटा है। वह उसी सीमितता के लिए क्षमा माँगता है।

यह क्षमा किसी अपराध की नहीं, बल्कि उस स्थिति की है जिसमें मनुष्य अनजाने में स्वयं को अलग सत्ता मान बैठता है।

वह आगे कहता है—

“मुझे ओट दे—ढँक ले—छा ले—

ओ शरण्य!”

तीन क्रियाएँ—“ओट दे”, “ढँक ले”, “छा ले”—एक क्रम बनाती हैं। पहले संरक्षण, फिर आवरण, फिर पूर्ण व्याप्ति। प्रियंवद चाहता है कि उसका अलग अस्तित्व ही दिखाई न दे। वह उस व्यापक सत्ता में इस तरह समा जाए कि उसका निजी स्वर अलग से सुनाई न पड़े। “शरण्य” शब्द में भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की स्मृति है। लेकिन यहाँ शरण किसी देवता की नहीं, प्रकृति और सृष्टि की चेतना की है। इससे कविता किसी संकीर्ण धार्मिक अर्थ में नहीं जाती। उसका अनुभव सार्वभौमिक बना रहता है।

इसके बाद वह कहता है—“मेरे गूँगेपन को तेरे साए स्वर-सागर का ज्वार डुबा ले!” यहाँ “गूँगेपन” का अर्थ बोल न पाने की असमर्थता नहीं है। इसका अर्थ है—व्यक्ति की सीमित अभिव्यक्ति। प्रियंवद स्वीकार करता है कि उसका अपना स्वर अधूरा है। वह चाहता है कि वह स्वर सृष्टि के महासंगीत में डूब जाए।

“स्वर-सागर” एक बड़ा प्रतीक है। अलग-अलग ध्वनियाँ अब समुद्र बन गई हैं। समुद्र में छोटी नदियाँ अपना अलग नाम खो देती हैं, पर उनका अस्तित्व समाप्त नहीं होता। वे एक व्यापक जलराशि का हिस्सा बन जाती हैं। प्रियंवद भी अपने साथ ऐसा ही होना चाहता है।

फिर वह कहता है—“आ, मुझे भुला,/तू उतर वीन के तारों में” यहाँ सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वह अपने को याद रखने की नहीं, भुला देने की प्रार्थना करता है। यह आत्महीनता नहीं, आत्म-सीमा से मुक्ति की इच्छा है।

“तू उतर” में भी वही आग्रह है जो पहले “तू गा” में था। प्रियंवद स्वयं संगीत उत्पन्न नहीं करना चाहता। वह चाहता है कि वह व्यापक चेतना वीणा में अवतरित हो।

इसके बाद कविता की सबसे सारगर्भित पंक्तियाँ आती हैं—“अपने से गा—/अपने को गा—” इन दो पंक्तियों में पूरी कविता का सौंदर्य-दर्शन समा जाता है। संगीत किसी दूसरे को प्रभावित करने के लिए नहीं होना चाहिए। वह अपने ही सत्य की अभिव्यक्ति हो। “अपने से” और “अपने को”—इन दोनों के बीच कोई दूरी नहीं है। जब सृजन अपनी ही प्रकृति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति बन जाता है, तभी वह प्रामाणिक होता है।

आगे प्रियंवद वृक्ष से कहता है—

“अपने खग-कुल को मुखरित कर
अपनी छाया में पले मृगों की चौकड़ियों को ताल बाँध,

अपने छायातप, वृष्टि-पवन, पल्लव-कुसुमन की लय पर
अपने जीवन-संचय को कर छंदयुक्त,

अपनी प्रज्ञा को वाणी दे!”

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रियंवद किसी मनुष्य का उल्लेख नहीं करता। वह वृक्ष से कहता है कि अपने पक्षियों, अपने पशुओं, अपनी ऋतुओं, अपने पत्तों, अपने फूलों, अपनी वर्षा और अपने जीवन को ही स्वर दे। कलाकार यहाँ केवल माध्यम है; रचयिता प्रकृति है।

“जीवन-संचय” शब्द फिर उसी विचार को लौटाता है कि कला किसी एक क्षण की घटना नहीं है। वह लंबे अनुभव का परिणाम है।

“प्रज्ञा को वाणी दे” इस अंश का अंतिम महत्त्वपूर्ण कथन है। प्रज्ञा तब तक मौन है जब तक उसे उपयुक्त माध्यम नहीं मिलता। प्रियंवद चाहता है कि वीणा वही माध्यम बने।

अंत में फिर वही आवर्तन आता है—

“तू गा, तू गा—

तू सन्निधि पा—तू खो
तू आ—तू हो—तू गा! तू गा!”

“सन्निधि पा” और “तू खो” एक साथ आए हैं। निकटता और विलय यहाँ अलग-अलग अवस्थाएँ नहीं हैं। जो सचमुच निकट आता है, वह अपने अलग अस्तित्व का आग्रह छोड़ देता है। “तू आ—तू हो” में भी यही भाव है। उपस्थिति और अस्तित्व एक हो जाते हैं।

इस पूरे अंश में प्रियंवद का ‘मैं’ लगभग पूरी तरह पीछे हट चुका है। अब उसकी भाषा में आग्रह नहीं, आमंत्रण है; प्रदर्शन नहीं, प्रतीक्षा है। उसने स्वयं को उस बिंदु तक पहुँचा दिया है जहाँ कलाकार का निजी स्वर समाप्त होकर व्यापक जीवन का स्वर बन सकता है। यही वह क्षण है जिसके बाद कविता में पहली बार वीणा स्वयं बोलने लगेगी। संगीत अब प्रियंवद की क्रिया का परिणाम नहीं होगा; वह उसके आत्म-विलय का स्वाभाविक फल होगा।

अब तक कविता में संगीत नहीं बजा था। पूरा काव्य जैसे उसकी प्रतीक्षा में था। यह प्रतीक्षा केवल कथा का तनाव नहीं है; यह उस साधना का आवश्यक हिस्सा है जिसके बिना संगीत का जन्म संभव नहीं। अज्ञेय ने पहले प्रियंवद के भीतर के सारे अवरोध हटाए, उसके अहं को शिथिल किया, उसकी स्मृतियों को जाग्रत किया और उसे प्रकृति की विराट चेतना में विलीन होने की स्थिति तक पहुँचाया। अब पहली बार बाहर की दुनिया फिर से दिखाई देती है। लेकिन बाहर लौटने वाला यह दृश्य भी पहले जैसा नहीं है। अब राजसभा वही है, पर उसका अर्थ बदल चुका है।

कवि लिखता है —“राजा जागे।” यह केवल एक साधारण वाक्य नहीं है। इससे पहले राजा पूरी तरह अनुपस्थित था। वह राजसभा में उपस्थित अवश्य था, पर कविता का केंद्र प्रियंवद की चेतना में चला गया था। “राजा जागे” का एक सीधा अर्थ है कि उसका ध्यान फिर बाहर की दुनिया में लौटा। दूसरा अर्थ यह भी है कि वह अब एक नए अनुभव के सामने जाग रहा है। यह जागरण केवल शारीरिक नहीं, अनुभवात्मक भी है।

अगली पंक्ति है—“समाधिस्थ संगीतकार का हाथ उठा था—” यहाँ “समाधिस्थ” शब्द पर विशेष ध्यान देना चाहिए। प्रियंवद अब केवल संगीतकार नहीं है। वह ऐसी मानसिक अवस्था में है जहाँ उसका ध्यान पूरी तरह भीतर स्थिर है। अज्ञेय ने उसे “ध्यानमग्न” या “मौन” नहीं कहा, बल्कि “समाधिस्थ” कहा। इसका अर्थ यह नहीं कि कविता किसी योगशास्त्रीय सिद्धांत का वर्णन कर रही है। यहाँ यह शब्द उस गहरी एकाग्रता का संकेत है जिसमें व्यक्ति और उसका कर्म अलग-अलग नहीं रहते।

ध्यान देने की बात यह भी है कि पहले हाथ नहीं उठता। पहले पूरी साधना होती है। हाथ का उठना उस भीतर घटित प्रक्रिया का बाहरी संकेत मात्र है। “काँपी थीं उँगलियाँ।” यह काँपना अस्थिरता का नहीं है। यह उस सूक्ष्म क्षण का संकेत है जहाँ भीतर का स्पंदन शरीर में उतरता है। कलाकार का शरीर अब उसके निजी नियंत्रण का साधन नहीं रह गया। वह उस अनुभव का माध्यम बन रहा है जो उसके भीतर उमड़ रहा है।

अज्ञेय ने यहाँ कोई भव्य क्रिया नहीं चुनी। वे यह नहीं कहते कि उँगलियाँ वेग से चलीं या वीणा पर टूट पड़ीं। वे केवल कहते हैं—“काँपी थीं।” इस सूक्ष्मता में ही पूरे दृश्य की गरिमा है।

फिर कवि लिखते हैं—“अलस अँगड़ाई लेकर मानो जाग उठी थी वीणा :/किलक उठे थे स्वर-शिशु।” यहाँ एक गहरा रूपक उपस्थित है। अभी तक प्रियंवद को साधना का केंद्र माना जा रहा था। अब वीणा स्वयं जागती हुई दिखाई देती है। “मानो जाग उठी थी वीणा” का अर्थ यह है कि संगीत बाहर से आरोपित नहीं हुआ। वह भीतर से फूटा।

“अलस अँगड़ाई” में सहजता है। जागरण आकस्मिक विस्फोट नहीं है। जैसे कोई शिशु नींद से धीरे-धीरे उठता है, वैसे ही वीणा भी जाग रही है। यह रूपक बताता है कि संगीत जन्म है, निर्माण नहीं। “किलक उठे थे स्वर-शिशु।” यह पूरी कविता के सबसे सुंदर बिंबों में से है। स्वर को “शिशु” कहना केवल कोमलता का संकेत नहीं है। शिशु में निष्कपटता होती है। वह किसी प्रदर्शन की वस्तु नहीं होता। उसमें जीवन की पहली ताजगी होती है। इस प्रकार अज्ञेय संगीत को पहले से तैयार वस्तु नहीं मानते; वह हर बार नए जन्म की तरह आता है।

यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि प्रियंवद नहीं किलकता, स्वर किलकते हैं। कलाकार फिर पीछे चला गया। केंद्र में संगीत स्वयं आ गया।

इसके बाद कवि लिखता है —

“नीरव पदा रखता जालिक मायावी

सधे करों से धीरे-धीरे-धीरे
डाल रहा था जाल हेम-तारों का।”

यह अंश पहली दृष्टि में कठिन लग सकता है, लेकिन इसमें संगीत के फैलने की प्रक्रिया का अद्भुत दृश्य उपस्थित है।

“जालिक मायावी” कोई वास्तविक व्यक्ति नहीं है। यह संगीत का रूपक है। जैसे कोई कुशल जाल बुनने वाला बिना शोर किए अपना जाल फैलाता है, वैसे ही संगीत भी धीरे-धीरे श्रोताओं को अपने घेरे में ले रहा है।

“नीरव पदा” का अर्थ है—बिना आहट के। संगीत श्रोताओं पर अचानक आक्रमण नहीं करता। वह चुपचाप उनके भीतर प्रवेश करता है।

“धीरे-धीरे-धीरे” की त्रि-पुनरावृत्ति लय पैदा करती है। यह केवल गति नहीं बताती; पाठक को भी उसी धीमी गति का अनुभव कराती है। कविता यहाँ अपने कथ्य को अपने लय-विन्यास से व्यक्त करती है।

“हेम-तारों का जाल” भी बहुस्तरीय प्रतीक है। “हेम” अर्थात स्वर्ण। स्वर्ण यहाँ मूल्य का नहीं, प्रकाश का संकेत है। संगीत सुनाई भी देता है और मानो चमकता भी है। अज्ञेय ध्वनि को दृश्य में बदल देते हैं। यही उनकी बिंब-रचना की विशेषता है।

इसके बाद अचानक एक परिवर्तन आता है—“सहसा वीणा झनझना उठी—” अब तक गति मंथर थी। “धीरे-धीरे-धीरे” के बाद “सहसा” आता है। यह विरोध कविता की आंतरिक लय का हिस्सा है। साधना लंबी होती है, लेकिन अनुभूति का क्षण अचानक आता है। “झनझना” शब्द स्वयं ध्वनि है। इसे पढ़ते ही वीणा का कंपन सुनाई देने लगता है। अज्ञेय ध्वन्यात्मक शब्दों का प्रयोग केवल सजावट के लिए नहीं करते। वे उन्हें अनुभव का अंग बना देते हैं।

अगली पंक्ति है—“संगीतकार की आँखों में ठंडी पिघली ज्वाला-सी झलक गई—” यहाँ “ठंडी” और “ज्वाला” साथ आए हैं। पहली दृष्टि में यह विरोधाभास लगता है, पर यही उसकी शक्ति है।

सामान्य ज्वाला जलाती है। यहाँ ज्वाला “ठंडी” है। इसका अर्थ है कि भीतर की तीव्रता अब हिंस्र नहीं रही। वह तप से गुजरकर शांत हो चुकी है। “पिघली” शब्द भी ध्यान देने योग्य है। ज्वाला कठोर नहीं है। वह द्रव हो गई है। यह रूपक उस साधना की परिणति है जिसमें ऊर्जा और शांति एक साथ उपस्थित हैं।

इस पूरी कविता में यह पहला अवसर है जब प्रियंवद की आँखों का उल्लेख आता है। पहले वह सिर झुकाए था, मौन था, भीतर डूबा था। अब उसकी आँखों में उस अनुभव की झलक दिखाई देती है जो शब्दों में नहीं कहा जा सकता।

फिर कवि लिखता है—“रोमांच एक बिजली-सा सबके तन में दौड़ गया।” यहाँ संगीत का प्रभाव श्रोताओं के शरीर पर दिखाई देता है। अभी तक वह भीतर उतर रहा था। अब वह एक साथ सबको स्पर्श करता है।

“बिजली-सा” उपमा दो बातें बताती है। पहली, अनुभव की तीव्रता। दूसरी, उसका सामूहिक होना। बिजली किसी एक स्थान पर नहीं ठहरती; वह क्षण भर में फैल जाती है। संगीत भी उसी प्रकार पूरी सभा में एक साथ फैल जाता है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि अज्ञेय यहाँ किसी के आँसू, किसी की वाहवाही या किसी की प्रशंसा का उल्लेख नहीं करते। पहला प्रभाव शरीर के रोमांच के रूप में आता है। इससे पता चलता है कि संगीत का अनुभव बुद्धि से पहले संवेदना तक पहुँचता है।

इसके बाद कविता अपने सबसे ऊँचे काव्य-बिंदु पर पहुँचती है—“अवतरित हुआ संगीत/स्वयंभू” में “अवतरित” और “स्वयंभू” दोनों शब्द मिलकर पूरे प्रसंग का अर्थ बदल देते हैं।

यदि संगीत प्रियंवद ने बनाया होता तो वह “उत्पन्न” होता। यदि वह अभ्यास का परिणाम होता तो “बजा” होता। लेकिन कवि कहते हैं—“अवतरित हुआ।” अर्थात वह ऊपर से उतरा नहीं, बल्कि किसी ऐसी सत्ता से प्रकट हुआ जो पहले से विद्यमान थी।

“स्वयंभू” का अर्थ है—जो स्वयं प्रकट हो। उसका कोई बाहरी निर्माता नहीं। यही वह बिंदु है जहाँ प्रियंवद की सारी साधना सार्थक होती है। उसने संगीत नहीं रचा; उसने अपने भीतर वह रिक्तता बनाई जिसमें संगीत स्वयं प्रकट हो सका।

फिर कवि लिखता है—

“जिसमें सोता है अखंड

ब्रह्मा का मौन
अशेष प्रभामय।”

यहाँ “ब्रह्मा” को केवल सृष्टिकर्ता देवता के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। यह सृजन की मूल चेतना का प्रतीक है।

और उससे भी अधिक ध्यान देने योग्य है “ब्रह्मा का मौन।” सामान्यतः सृजन को शब्द, ध्वनि और क्रिया से जोड़ा जाता है। अज्ञेय कहते हैं कि संगीत उस मौन से निकलता है जिसमें सृजन की संभावना सोई रहती है।

“अखंड” और “अशेष” दोनों शब्द उस अनुभव की सीमा-रहितता को व्यक्त करते हैं। “प्रभामय” बताता है कि यह मौन अंधकार नहीं है। उसमें आलोक है।

इस प्रकार कविता एक अद्भुत उलटाव करती है। संगीत का स्रोत ध्वनि नहीं, मौन है। यही कारण है कि आगे प्रियंवद कह सकेगा—जो सुना गया, वह मेरा नहीं था; वह उस महामौन का स्वर था।

इस पूरे अंश में एक भी स्थान ऐसा नहीं है जहाँ प्रियंवद अपनी सफलता का प्रदर्शन करता हो। जैसे-जैसे संगीत जन्म लेता है, कलाकार और पीछे हटता जाता है। पहले वीणा जागती है, फिर स्वर जन्म लेते हैं, फिर संगीत स्वयं अवतरित होता है। कलाकार केवल माध्यम रह जाता है। यही अज्ञेय की कला-दृष्टि का केंद्र है। उनके लिए सच्चा सृजन कलाकार की उपस्थिति से नहीं, उसके अहं की अनुपस्थिति से संभव होता है।

अगले भाग में “डूब गए सब एक साथ…” से लेकर “इयत्ता सबकी अलग-अलग जागी, संगीत हुई, पा गई विलय” तक का सूक्ष्म पठन प्रस्तुत किया जाएगा। यही वह अंश है जहाँ एक ही संगीत प्रत्येक श्रोता के भीतर अलग अर्थ ग्रहण करता है और कविता कला की ग्रहण-प्रक्रिया का अद्वितीय सिद्धांत प्रस्तुत करती है।

अब कविता उस अनुभव को सामने लाती है जो संगीत के जन्म से भी अधिक महत्त्व रखता है। अज्ञेय का ध्यान इस बात पर नहीं है कि संगीत कितना मधुर था, कितना जटिल था या किस राग में था। वे यह दिखाते हैं कि सच्ची कला का प्रभाव सब पर एक जैसा नहीं होता। वही संगीत प्रत्येक व्यक्ति के भीतर जाकर उसकी अपनी चेतना, उसकी स्मृतियों, उसकी इच्छाओं और उसके जीवनानुभव के अनुसार नया अर्थ ग्रहण करता है। यही कारण है कि इस पूरे प्रसंग में संगीत का कोई वस्तुगत वर्णन नहीं मिलता। उसकी जगह श्रोताओं के अनुभवों का वर्णन मिलता है।

आगे अज्ञेय लिखते  हैं—

“डूब गए सब एक साथ।
सब अलग-अलग एकाकी पार तिरे।”

ये दो पंक्तियाँ पूरी कविता की सबसे सूक्ष्म पंक्तियों में हैं। पहली दृष्टि में वे विरोधाभासी लगती हैं। सब एक साथ डूबते हैं, लेकिन अलग-अलग पार पहुँचते हैं। यही कला का स्वभाव है।

“डूब गए” का अर्थ है कि सभी अपने-अपने अहं, अपनी तत्कालीन स्थिति और बाहरी संसार से कुछ समय के लिए मुक्त हो गए। वे संगीत के अनुभव में समा गए। लेकिन “अलग-अलग एकाकी पार तिरे” बताता है कि अनुभव का अंतिम रूप प्रत्येक व्यक्ति के भीतर अलग बनता है। कला सामूहिक रूप से घटती है, पर उसका आत्मानुभव व्यक्तिगत होता है।

“एकाकी” शब्द पर विशेष ध्यान देना चाहिए। राजसभा में सैकड़ों लोग उपस्थित हैं, फिर भी संगीत सुनते समय हर व्यक्ति अकेला है। यह अकेलापन अलगाव नहीं है; यह आत्म-साक्षात्कार का अकेलापन है। मनुष्य अंततः अपने भीतर ही अनुभव करता है। कोई दूसरा उसकी जगह अनुभव नहीं कर सकता।

सबसे पहले राजा का अनुभव सामने आता है—

“राजा ने अलग सुना :

जय देवी यश:काय

वरमाल लिए
गाती थी मंगल-गीत,”

राजा का अनुभव राजसत्ता की भाषा में आरंभ होता है। “जय”, “यश”, “वरमाल”, “मंगल-गीत”—ये सभी राजकीय और सांस्कृतिक वैभव के संकेत हैं। लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि यह केवल सत्ता का उत्सव नहीं है। यह एक आंतरिक विजय का संकेत भी है। राजा के भीतर जो परिवर्तन होने वाला है, उसकी भूमिका यहाँ तैयार होती है।

कवि आगे लिखते हैं—“दुंदभी दूर कहीं बजती थी,” “दूर कहीं” का प्रयोग महत्त्वपूर्ण है। विजय की दुंदुभि पास नहीं बज रही। मानो राजा के भीतर जो पुरानी सत्ता थी, उसका संसार अब दूर होता जा रहा है। अनुभव का केंद्र बाहरी राजमहल नहीं, भीतर की चेतना है। फिर आता है कविता का एक निर्णायक वाक्य—

“राज-मुकुट सहसा हल्का हो आया था, मानो हो फूल सिरिस का”

राजमुकुट सत्ता, उत्तरदायित्व, अहं और वैभव का प्रतीक है। उसका “हल्का” हो जाना केवल शारीरिक अनुभव नहीं है। राजा के भीतर सत्ता का बोझ उतर रहा है। “सिरिस का फूल” भारतीय काव्य में हल्केपन और कोमलता का प्रतीक रहा है। जो मुकुट अभी तक भार था, वह अब फूल की तरह हल्का लगने लगता है।

यह रूपांतरण बाहर की वस्तु में नहीं, भीतर की दृष्टि में हुआ है। यही संगीत का प्रभाव है।

इसके बाद राजा के भीतर का नैतिक परिवर्तन सामने आता है—

“ईर्ष्या, महदाकांक्षा, द्वेष, चाटुता
सभी पुराने लुगड़े-से झर गए,”

अज्ञेय यहाँ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण नहीं करते। वे चार शब्दों में राजसत्ता की पूरी विकृति सामने रख देते हैं—ईर्ष्या, महदाकांक्षा, द्वेष और चाटुता।

“महदाकांक्षा” का प्रयोग विशेष ध्यान देने योग्य है। यह सामान्य आकांक्षा नहीं है, बल्कि ऐसी महत्वाकांक्षा है जो मनुष्य को अपने से बाहर धकेल देती है।

इन सबका “पुराने लुगड़े-से झर जाना” एक घरेलू और सहज उपमा है। अज्ञेय किसी अलौकिक भाषा का उपयोग नहीं करते। जैसे पुराने वस्त्र उतार दिए जाते हैं, वैसे ही राजा के भीतर के विकार उतर जाते हैं। परिवर्तन स्वाभाविक है, नाटकीय नहीं।

फिर कवि लिखते हैं—“निखर आया था जीवन-कांचन/धर्म-भाव से जिसे निछावर वह कर देगा।” “जीवन-कांचन” सोने का रूपक है, लेकिन यह बाहरी संपत्ति नहीं है। यह मनुष्य के भीतर की निर्मलता है। राजा अब उसे अपने पास रखने की नहीं, अर्पित कर देने की बात सोचता है। सत्ता का भाव सेवा में बदलने लगता है। यही संगीत का नैतिक परिणाम है। इसके बाद रानी का अनुभव आता है—“रानी ने अलग सुना :/छँटती बदली में एक कौंध कह गई—” राजा ने ध्वनि सुनी थी। रानी प्रकाश देखती है। इससे पता चलता है कि एक ही संगीत अलग-अलग इंद्रिय-अनुभवों में भी रूपांतरित हो सकता है।

“कौंध” क्षणिक होती है। वह स्थायी प्रकाश नहीं है। लेकिन कभी-कभी वही क्षणिक चमक जीवन की दिशा बदल देती है।

वह कौंध कहती है—

“तुम्हारे ये मणि-माणक, कंठहार, पट-वस्त्र,

मेखला-किंकिणि—
सब अंधकार के कण हैं ये!”

यहाँ रानी के जीवन की सारी भौतिक संपदा एक साथ उपस्थित हो जाती है। मणि, माणक, आभूषण, वस्त्र—सब राजसी वैभव के प्रतीक हैं।

लेकिन संगीत उन्हें निरर्थक नहीं कहता। वह उन्हें “अंधकार के कण” कहता है। यह बहुत सूक्ष्म बात है। वस्तुएँ अपने-आप में दोषपूर्ण नहीं हैं, पर यदि मनुष्य उन्हें अंतिम सत्य मान ले, तो वे प्रकाश को ढँक देती हैं।

फिर वह कहता है—“आलोक एक है/प्यार अनन्य!” यहाँ कविता पहली बार प्रेम को अस्तित्वगत अर्थ देती है। यह व्यक्तिगत प्रेम नहीं है। “अनन्य” का अर्थ है—जिसका दूसरा कोई नहीं। यह वह प्रेम है जो मनुष्य को दूसरे से जोड़ता है, अलग नहीं करता।

अगली पंक्तियाँ इस प्रेम का रूपक बनाती हैं—

“उसी की
विद्युल्लता घेरती रहती है रस-भार मेघ को,

थिरक उसी की छाती पर उसमें छिपकर सो जाती है
आश्वस्त, सहज विश्वास भरी।”

यहाँ प्रेम को बिजली की लता कहा गया है। यह बिंब बहुत सुंदर है। बिजली क्षणिक है, बादल विशाल है। लेकिन वही बिजली बादल को अर्थ देती है।

“आश्वस्त” और “सहज विश्वास” शब्द बताते हैं कि प्रेम भय का नहीं, भरोसे का संबंध है। रानी का अनुभव बाहरी आभूषणों से हटकर इसी भरोसे तक पहुँचता है।

इसलिए कवि निष्कर्ष देते हैं—“रानी/उस एक प्यार को साधेगी।” यहाँ भी वही शब्द आया है—“साधेगी।” जैसे प्रियंवद वीणा को साध रहा था, वैसे ही रानी प्रेम को साधना चाहती है। प्रेम यहाँ भावना नहीं, साधना है।

अब कविता पूरे समाज की ओर मुड़ती है—“सबने भी अलग-अलग संगीत सुना।” यह एक साधारण वाक्य लगता है, लेकिन इसके बाद अज्ञेय कला की ग्रहण-प्रक्रिया का अद्वितीय चित्र खींचते हैं। “इसको/वह कृपा-वाक्य था प्रभुओ का।” जिसके जीवन में श्रद्धा प्रधान है, वह उसी भाषा में संगीत को सुनता है। उसके लिए वह ईश्वर की कृपा है। “उसको/आतंक-मुक्ति का आश्वासन!” जिसका जीवन भय से भरा है, उसे वही संगीत सुरक्षा का अनुभव देता है। “इसको/वह भरी तिजोरी में सोने की खनक।” यहाँ किसी व्यापारी या धन-संचय में लगे व्यक्ति की चेतना बोल रही है। उसके अनुभव की भाषा धन है। संगीत उसी में रूपांतरित हो जाता है।

“उसे/बटुली में बहुत दिनों के बाद अन्न की सोंधी खुदबुद।” यह पूरी कविता की सबसे मार्मिक पंक्तियों में है। जिस व्यक्ति ने भूख जानी है, उसके लिए संगीत राग नहीं बनता; वह पकते हुए अन्न की आवाज़ बन जाता है।

“सोंधी खुदबुद” केवल ध्वनि नहीं है। उसमें गंध, स्वाद और तृप्ति तीनों समाए हैं। कला यहाँ जीवन की मूल आवश्यकता से जुड़ जाती है। “किसी एक को नई वधू की सहमी-सी पायल ध्वनि।” जिसके जीवन में प्रेम और दांपत्य का संसार है, वह उसी स्मृति में संगीत को सुनता है। “किसी दूसरे को शिशु की किलकारी।” जिसके जीवन का केंद्र मातृत्व या पितृत्व है, उसके लिए वही संगीत नवजीवन की ध्वनि बन जाता है।“एक किसी को जाल-फँसी मछली की तड़पन—एक अपर को चहक मुक्त नभ में उड़ती चिड़िया की।” यहाँ दो विपरीत अनुभव साथ आते हैं। एक के लिए संगीत बंधन है, दूसरे के लिए मुक्ति। इससे स्पष्ट हो जाता है कि संगीत अपने आप में इन अर्थों को लेकर नहीं आया। अर्थ श्रोता की चेतना से पैदा हुआ। “एक तीसरे को मंडी की ठेलमठेल, गाहकों की आस्पर्धा भरी बोलियाँ,/चौथे को मंदिर की ताल-युक्त घंटा-ध्वनि!” बाज़ार और मंदिर—दो अलग संसार। लेकिन दोनों को एक ही संगीत अपने-अपने रूप में दिखाई देता है।

“और पाँचवे को लोहे पर सधे हथौड़े की सम चोटें

और छटे को लंगर पर कसमसा रही नौका पर लहरों की
अविराम थपक।”

यहाँ श्रम और यात्रा दोनों उपस्थित हैं। लोहार को संगीत अपने काम की लय में मिलता है। नाविक को जल की थपक में।

इन उदाहरणों का अर्थ यह नहीं कि संगीत अनेक रूप धारण कर लेता है। अर्थ यह है कि मनुष्य अपनी जीवन-संरचना के अनुसार उसे ग्रहण करता है।

अज्ञेय यहाँ कला के बारे में एक गहरा सिद्धांत सामने रखते हैं। कला का अर्थ कलाकार तय नहीं करता। वह श्रोता और कृति के बीच के संवाद में जन्म लेता है। इसलिए कोई एक व्याख्या अंतिम नहीं हो सकती।

यही कारण है कि इस पूरे प्रसंग में कवि यह नहीं बताते कि वास्तव में कौन-सा संगीत बजा था। यदि वे उसका वर्णन कर देते, तो अर्थ सीमित हो जाता। वे केवल उसके प्रभावों का वर्णन करते हैं। इससे संगीत अनंत संभावनाओं का क्षेत्र बन जाता है।

यहीं से कविता आगे उस निष्कर्ष की ओर बढ़ेगी जहाँ प्रत्येक व्यक्ति की अलग-अलग इयत्ता जागेगी और फिर उसी संगीत में विलीन भी हो जाएगी। यह विरोध नहीं, बल्कि अज्ञेय की समग्र दृष्टि का स्वाभाविक विस्तार है।

कविता के इस अंश में अज्ञेय पहले से स्थापित विचार को और व्यापक बनाते हैं। अब तक राजा, रानी और कुछ अन्य श्रोताओं के अनुभव सामने आ चुके हैं। उससे यह स्पष्ट हो गया था कि एक ही संगीत अलग-अलग व्यक्तियों के भीतर अलग अर्थ ग्रहण करता है। अब कवि उस विविधता को और विस्तार देते हैं। यह विस्तार केवल उदाहरणों की वृद्धि नहीं है। इसके माध्यम से कविता यह दिखाती है कि मनुष्य का अनुभव उसकी सामाजिक स्थिति, श्रम, स्मृति, आकांक्षा और जीवन-संघर्ष से बनता है। इसलिए कला का कोई एक सार्वभौमिक अर्थ नहीं होता, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि वे सब अर्थ अंततः एक ही स्रोत से निकलते हैं।

कवि लिखता है —

“बटिया पर चमरौधे की रूँधी चाप सातवें के लिए—
और आठवें को कुलिया की कटी मेंड़ से बहते जल की छुल-छुल।”

इन दोनों पंक्तियों का चयन बहुत अर्थपूर्ण है। “चमरौधा” चमड़े का जूता है और “बटिया” गाँव की पगडंडी। किसी ग्रामीण श्रमिक के लिए यह ध्वनि रोज़मर्रा के जीवन की परिचित ध्वनि है। “रूँधी चाप” बताती है कि यह कोई तेज़ या भव्य आवाज़ नहीं है। मिट्टी की पगडंडी पर चलते हुए जूते की दबती हुई ध्वनि है। कविता यहाँ जीवन के सबसे साधारण क्षण को भी सौंदर्यबोध का हिस्सा बना देती है।

इसके ठीक बाद “कुलिया की कटी मेंड़ से बहते जल की छुल-छुल” आती है। खेत की टूटी मेड़ से बहता पानी किसी किसान के लिए केवल दृश्य नहीं है। उसमें फसल, श्रम, चिंता और आशा सब जुड़े हैं। “छुल-छुल” ध्वनि में एक घरेलापन है। यह किसी बड़ी नदी का गर्जन नहीं है, बल्कि खेती-बाड़ी के संसार का आत्मीय संगीत है।

अज्ञेय का ध्यान यहाँ किसी रोमानी ग्रामीण जीवन का चित्र बनाने में नहीं है। वे यह दिखा रहे हैं कि मनुष्य की संवेदना उसके श्रम और उसके परिवेश से बनती है। इसलिए वही संगीत हर व्यक्ति के भीतर उसकी अपनी दुनिया के अनुसार आकार लेता है।

फिर कवि लिखता है—

“इसे गमक नट्टिन की एड़ी के घुँघरू की।
उसे युद्ध का ढोल।”यहाँ दो बिल्कुल भिन्न संसार आमने-सामने हैं। एक ओर नृत्य है, दूसरी ओर युद्ध। एक ओर लय, दूसरी ओर आक्रमण। लेकिन दोनों एक ही संगीत को अलग-अलग रूप में सुनते हैं।

“गमक” शब्द संगीत और नृत्य की परंपरा से जुड़ा है। नट्टिन की एड़ी के घुँघरुओं में शरीर की लय, अभ्यास और सौंदर्य का संसार है। इसके विपरीत “युद्ध का ढोल” संघर्ष, साहस और हिंसा की स्मृति जगाता है।

इन दोनों उदाहरणों से अज्ञेय यह स्पष्ट करते हैं कि कला का अर्थ वस्तु में नहीं, ग्रहण करने वाले की चेतना में बनता है। यदि किसी सैनिक के लिए वही संगीत युद्ध की तैयारी का स्वर है, तो यह संगीत का दोष या सीमा नहीं है। यह उसके जीवनानुभव का स्वाभाविक परिणाम है।

इसके बाद फिर एक विरोधी युग्म आता है—

“इसे संझा-गोधूलि की लघु टुन-टुन—
उसे प्रलय का डमरू-नाद।”

“गोधूलि” भारतीय ग्रामीण जीवन का वह समय है जब पशु लौटते हैं, धूल उड़ती है और दिन का कोलाहल धीरे-धीरे शांत होने लगता है। “टुन-टुन” में घरेलापन और आत्मीयता है।

इसके विपरीत “प्रलय का डमरू-नाद” ब्रह्मांडीय परिवर्तन का संकेत है। यहाँ शिव की स्मृति भी अनायास उपस्थित हो जाती है, क्योंकि डमरू भारतीय सांस्कृतिक चेतना में सृष्टि और संहार दोनों का प्रतीक है।

एक ही संगीत किसी के लिए दिन के शांत अवसान का अनुभव है, तो किसी दूसरे के लिए समूची व्यवस्था के टूटने और नए सृजन की आहट। इससे स्पष्ट होता है कि संगीत किसी निश्चित भाव का वाहक नहीं है।

फिर कहा गया है —

“इसको जीवन की पहली अँगड़ाई
पर उसको महाजृंभ विकराल काल!”

यह कविता का सबसे तीखा विरोध है। “जीवन की पहली अँगड़ाई” जन्म, संभावना और नए आरंभ का प्रतीक है। दूसरी ओर “महाजृंभ विकराल काल” मृत्यु, विनाश और समय की अजेय शक्ति का संकेत है।

यहाँ अज्ञेय जीवन और मृत्यु को दो अलग संसारों की तरह नहीं रखते। वे दिखाते हैं कि एक ही अनुभव में दोनों की संभावना छिपी रहती है। श्रोता अपने भीतर जिस अनुभव को सबसे गहरे रूप में सँजोए हुए है, वही उसके सामने प्रकट होता है।

इन उदाहरणों के बाद कवि किसी एक अनुभव को श्रेष्ठ नहीं ठहराते। वे निष्कर्ष की ओर बढ़ते हैं—

“सब डूबे, तिरे, झिपे, जागे—
हो रहे वंशवद, स्तब्ध :”

यहाँ चार क्रियाएँ हैं—“डूबे”, “तिरे”, “झिपे”, “जागे”। पहली दृष्टि में ये अलग-अलग अवस्थाएँ लगती हैं, लेकिन वास्तव में ये एक ही अनुभव की क्रमिक अवस्थाएँ हैं। “डूबे”—अर्थात अपने पुराने अहं से मुक्त हुए।“तिरे”—अर्थात उस अनुभव से गुजरकर दूसरी ओर पहुँचे।“झिपे”—इस शब्द में लज्जा, विनम्रता और भीतर सिमट जाने का भाव है। अनुभव इतना गहरा है कि व्यक्ति स्वयं को छोटा महसूस करने लगता है।“जागे”—अब वह पहले जैसा नहीं है। उसके भीतर कुछ बदल चुका है।

“वंशवद” शब्द का अर्थ बाँस की तरह खोखला होना भी लिया गया है। बाँसुरी भी बाँस से बनती है। इस अर्थ में यह शब्द और अधिक गहरा हो जाता है। जब भीतर का अहं खाली होता है, तभी उसमें संगीत प्रवाहित हो सकता है। यह वही बात है जिसे प्रियंवद ने अपनी साधना से सिद्ध किया था। अब वही अनुभव श्रोताओं के भीतर भी घट रहा है।

इसके बाद कविता का एक सबसे सूक्ष्म दार्शनिक निष्कर्ष आता है—

“इयत्ता सबकी अलग-अलग जागी,
संगीत हुई,

पा गई विलय।”

“इयत्ता” का अर्थ है—व्यक्ति का विशिष्ट अस्तित्व, उसकी अलग पहचान। पहली नज़र में लगता है कि यदि सब विलय हो गए, तो उनकी अलग पहचान कैसे बची? लेकिन अज्ञेय का कथन इससे अधिक जटिल है।

वे कहते हैं कि पहले प्रत्येक व्यक्ति की अपनी इयत्ता जागी। इसका अर्थ है कि संगीत ने उसे उसके अपने सबसे प्रामाणिक स्वरूप से मिलाया। उसने किसी दूसरे का अनुभव नहीं जिया। उसने वही अनुभव किया जो उसकी अपनी चेतना में निहित था।

लेकिन वहीं रुक जाना अंतिम अवस्था नहीं है। वह इयत्ता “संगीत हुई”। यह बहुत अर्थपूर्ण प्रयोग है। व्यक्ति संगीत को नहीं सुनता मात्र; वह स्वयं संगीत बन जाता है। उसकी चेतना उसी लय का हिस्सा हो जाती है।

फिर वह “विलय” पा जाती है। यहाँ विलय का अर्थ नष्ट हो जाना नहीं है। जैसे अनेक स्वर मिलकर एक राग बनाते हैं, वैसे ही अनेक व्यक्तित्व अपनी विशिष्टता खोए बिना एक व्यापक अनुभव में सम्मिलित हो जाते हैं।

यहाँ अज्ञेय व्यक्ति और समष्टि के संबंध की बहुत संतुलित व्याख्या करते हैं। वे न तो व्यक्ति को मिटा देते हैं और न ही उसे अंतिम सत्य मानते हैं। पहले व्यक्ति अपनी असली पहचान पाता है, फिर उसी पहचान के सहारे व्यापक अस्तित्व से जुड़ता है।

यह विचार पूरी कविता में पहले भी संकेत रूप में उपस्थित था। प्रियंवद ने अपने ‘मैं’ को नष्ट नहीं किया था; उसने उसके अहंकार को छोड़ा था। उसी प्रकार यहाँ भी श्रोताओं की इयत्ता नष्ट नहीं होती। वह अपने परिपक्व रूप में संगीत का अंग बन जाती है।

इस पूरे अंश में अज्ञेय कला के बारे में एक गहरी बात कहते हैं। सच्ची कला मनुष्य को अपने जैसा नहीं बनाती; वह उसे उसके अपने भीतर ले जाती है। इसलिए एक ही रचना अलग-अलग लोगों के लिए अलग अर्थ रख सकती है। यह उसकी कमजोरी नहीं, उसकी जीवंतता का प्रमाण है।

कविता का यह प्रसंग रोला बार्थ एवं जूलिया क्रिस्तेवा के आधुनिक साहित्यिक सिद्धांतों की उस धारणा से भी मेल खाता है जिसके अनुसार किसी कृति का अर्थ केवल रचनाकार नहीं तय करता। पाठक या श्रोता भी अपने अनुभव के आधार पर उसमें अर्थ का निर्माण करता है। लेकिन अज्ञेय इस विचार को किसी सैद्धांतिक भाषा में नहीं कहते। वे उसे एक जीवंत काव्य-अनुभव में बदल देते हैं।

यहीं संगीत का सामूहिक प्रभाव पूरा होता है। अब वीणा फिर मौन होगी, राजसभा अपने होश में लौटेगी और प्रियंवद अपनी साधना का ऐसा अर्थ बताएगा जो पूरी कविता को एक नई ऊँचाई देगा। वहाँ जाकर यह स्पष्ट होगा कि इस पूरे अनुभव का श्रेय वह स्वयं लेने से क्यों इंकार करता है।

कविता अब अपने अंतिम चरण में प्रवेश करती है। संगीत का चमत्कार घट चुका है। श्रोता अपने-अपने अनुभवों से गुजर चुके हैं। यदि अज्ञेय चाहते, तो यहीं कविता समाप्त कर सकते थे। लेकिन ऐसा करने से यह केवल एक विलक्षण संगीत-प्रस्तुति की कथा रह जाती। कविता का वास्तविक केंद्र अभी शेष है। अब प्रश्न यह है कि इस अद्भुत संगीत का श्रेय किसे दिया जाए। राजसभा का उत्तर एक है, प्रियंवद का उत्तर बिल्कुल दूसरा। इसी अंतर में पूरी कविता का दार्शनिक और कलात्मक अर्थ निहित है।

कवि का कहना है—“वीणा फिर मूक हो गई।” यह पंक्ति जितनी सरल है, उतनी ही अर्थगर्भित भी। अभी कुछ क्षण पहले वही वीणा पूरे अस्तित्व का संगीत बन गई थी। अब वह फिर मौन है। इससे स्पष्ट होता है कि संगीत वीणा में स्थायी रूप से बंद नहीं था। वह किसी वस्तु का गुण नहीं था। वह एक विशेष साधना, विशेष चेतना और विशेष क्षण में प्रकट हुआ अनुभव था।

यहाँ मौन किसी समाप्ति का नहीं, पूर्णता का संकेत है। जिस प्रकार वर्षा के बाद बादल छँट जाते हैं, उसी प्रकार संगीत के बाद मौन लौट आता है। अज्ञेय के यहाँ मौन और संगीत विरोधी नहीं हैं। दोनों एक-दूसरे को जन्म देते हैं।

इसके तुरंत बाद सभा की प्रतिक्रिया आती है—“साधु! साधु!” यह भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में प्रशंसा का उद्गार है। लेकिन ध्यान देने की बात यह है कि यह प्रतिक्रिया सहज है। किसी ने विश्लेषण नहीं किया, कोई निर्णय नहीं दिया। अनुभव इतना गहरा है कि पहली प्रतिक्रिया केवल विस्मय की है।

फिर कवि लिखता है—“राजा सिंहासन से उतरे—” यह दृश्य प्रतीकात्मक है। राजा सचमुच सिंहासन से उतरता है, लेकिन इसके साथ-साथ वह अपने राजकीय अहं से भी नीचे उतरता दिखाई देता है।

पूरी कविता में यह पहला अवसर है जब राजा सत्ता की ऊँचाई छोड़कर साधक के पास आता है। पहले प्रियंवद को राजसभा में बुलाया गया था। अब राजा स्वयं उसके निकट जाता है। यह परिवर्तन केवल व्यवहार का नहीं, दृष्टि का है। “रानी ने अर्पित की सतलड़ी माल,” माला सम्मान का प्रतीक है। लेकिन यहाँ “अर्पित” शब्द महत्त्वपूर्ण है। सम्मान किसी औपचारिक पुरस्कार की तरह नहीं दिया जा रहा। उसमें श्रद्धा है। “जनता विह्वल कह उठी ‘धन्य!/हे स्वरजित्! धन्य! धन्य!’” “स्वरजित्” शब्द पर ध्यान देना चाहिए। जनता मानती है कि प्रियंवद ने स्वर पर विजय पा ली है। यही सामान्य दृष्टि है। जो व्यक्ति कठिन काम कर दे, वही विजेता कहलाता है।लेकिन पूरी कविता का अगला भाग इसी धारणा को उलट देता है।

कवि लिखते हैं—

“संगीतकार

वीणा को धीरे से नीचे रख, ढँक—मानो
गोदी में सोए शिशु को पालने डाल कर मुग्धा माँ

हट जाए, दीठ से दुलराती—”

यह पूरी कविता के सबसे कोमल दृश्यों में है। ध्यान देने की बात यह है कि प्रियंवद वीणा को विजय-चिह्न की तरह नहीं उठाता। वह उसे वैसी ही सावधानी से रखता है जैसे कोई माँ सोए हुए बच्चे को पालने में रखती है। यह उपमा कई स्तरों पर काम करती है।

पहला, इससे स्पष्ट होता है कि प्रियंवद के लिए वीणा निर्जीव वस्तु नहीं है। उसमें जीवन है। दूसरा, यहाँ कलाकार और वाद्य का संबंध स्वामी और साधन का नहीं, स्नेह और संरक्षण का है।

तीसरा, “दीठ से दुलराती” कहना बताता है कि प्रेम का संबंध स्पर्श से भी आगे जाता है। माँ दूर हटकर भी बच्चे को प्रेम से देखती रहती है। उसी तरह प्रियंवद भी वीणा से अलग होकर भी उससे जुड़ा रहता है। इस दृश्य में कहीं भी प्रदर्शन का भाव नहीं है। जिसने अभी-अभी अद्वितीय संगीत का माध्यम बनकर सबको अभिभूत कर दिया, वही व्यक्ति अब चुपचाप पीछे हट रहा है।

फिर कवि लिखते हैं—“उठ खड़ा हुआ।/बढ़ते राजा का हाथ उठा करता आवर्जन,” राजा आगे बढ़ रहा है। उसका हाथ सम्मान देने के लिए उठता है। “आवर्जन” में आदर, आमंत्रण और अपनत्व तीनों भाव हैं।

लेकिन प्रियंवद उसे रोक देता है—“बोला :/‘श्रेय नहीं कुछ मेरा :’” यहीं पूरी कविता का सबसे महत्त्वपूर्ण कथन आरंभ होता है।

ध्यान देने की बात यह है कि प्रियंवद यह नहीं कहता कि “मैंने कुछ नहीं किया।” वह कहता है—“श्रेय नहीं कुछ मेरा।”

अर्थात कार्य हुआ है, अनुभव घटा है, संगीत प्रकट हुआ है, लेकिन उसका स्वामित्व मेरा नहीं है।

यहाँ अज्ञेय कलाकार के अहं पर सबसे गहरी चोट करते हैं। सच्चा कलाकार अपने सृजन का मालिक नहीं बनता। वह स्वयं को उसका माध्यम मानता है।

प्रियंवद आगे कहता है—“मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में—” यह वही “शून्य” है जिसकी तैयारी पूरी कविता में चल रही थी।

पहले उसने अपने ‘मैं’ को छोड़ा। फिर प्रकृति में विलीन हुआ। फिर कहा—“मैं कहीं नहीं।”अब वह उसी अनुभव को एक शब्द देता है—“शून्य।” यह शून्य रिक्तता नहीं है। यह वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति अपने सीमित अहं से मुक्त हो जाता है।

अज्ञेय यहाँ बौद्ध दर्शन के “शून्यता” के संकेत का रचनात्मक उपयोग करते हैं, लेकिन उसे दार्शनिक व्याख्या नहीं बनाते। कविता में यह शब्द एक जीवित अनुभव के रूप में आता है।

प्रियंवद आगे कहता है—“वीणा के माध्यम से अपने को मैंने/सब कुछ को सौंप दिया था—” यहाँ “माध्यम” शब्द पूरी कविता की कुंजी है। प्रियंवद स्वयं लक्ष्य नहीं है। वीणा भी लक्ष्य नहीं है। दोनों माध्यम हैं। और समर्पित किसे किया गया? “सब कुछ को।” यह “सब कुछ” बहुत व्यापक पद है। इसमें प्रकृति, श्रोता, स्मृति, समय, जीवन, मौन—सब शामिल हैं। यहाँ कलाकार किसी विशेष व्यक्ति के लिए नहीं रचता। उसका समर्पण समूचे अस्तित्व के प्रति है। फिर वह कहता है—“सुना आपने जो वह मेरा नहीं,

न वीणा का था :” यहाँ दूसरा बड़ा निषेध आता है।पहले उसने अपने श्रेय का निषेध किया।अब वह वीणा के श्रेय का भी निषेध करता है।अर्थात न कलाकार अंतिम स्रोत है, न वाद्य।दोनों आवश्यक हैं, लेकिन दोनों मूल कारण नहीं हैं।यही वह जगह है जहाँ अज्ञेय कला की परंपरागत समझ से आगे जाते हैं।सामान्यतः कला का श्रेय या तो कलाकार को दिया जाता है या उसकी तकनीक को।प्रियंवद दोनों से इनकार करता है।

इसके बाद कविता की सबसे प्रसिद्ध पंक्तियाँ आती हैं—

“वह तो सब कुछ की तथता थी

महाशून्य

वह महामौन”

“तथता” शब्द बौद्ध चिंतन से आया है। उसका अर्थ है—वस्तु का वैसा ही होना जैसी वह है; बिना किसी आग्रह, कल्पना या आरोप के उसका सत्य। प्रियंवद कहता है कि संगीत उसी तथता की अभिव्यक्ति था। वह किसी व्यक्ति की भावना नहीं थी।

वह किसी विचारधारा का प्रचार नहीं था।वह अस्तित्व के अपने सत्य का प्रकट होना था।इसके बाद “महाशून्य” आता है।

यहाँ “शून्य” व्यक्तिगत अनुभव से आगे बढ़कर ब्रह्मांडीय अर्थ ग्रहण कर लेता है।यह वह रिक्तता नहीं है जिसमें कुछ नहीं है।

यह वह व्यापक संभावना है जिससे सब कुछ जन्म ले सकता है।और फिर—“महामौन” पूरी कविता का सबसे बड़ा विरोधाभास यहीं उपस्थित है। जिस अनुभव को सबने संगीत के रूप में सुना, उसका स्रोत “महामौन” है। अर्थात मौन ध्वनि का अभाव नहीं है।

मौन वह आधार है जिससे सच्ची ध्वनि निकलती है। पूरी कविता के आरंभ से अंत तक मौन बार-बार लौटता है। प्रियंवद मौन था।

सभा मौन हुई। नीरव एकालाप हुआ। संगीत के बाद फिर मौन लौटा। अब स्पष्ट हो जाता है कि अज्ञेय के लिए मौन निष्क्रियता नहीं, सृजन की मूल अवस्था है।

प्रियंवद आगे कहता है—“अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय/जो शब्दहीन/सब में गाता है।” ये चार विशेषण क्रमशः उस अनुभव की सीमा-रहितता को व्यक्त करते हैं। “अविभाज्य”—जिसे बाँटा नहीं जा सकता।“अनाप्त”—जो किसी की निजी संपत्ति नहीं बन सकता।“अद्रवित”—जो किसी बाहरी प्रभाव से बदलता नहीं। “अप्रमेय”—जिसे किसी माप से नहीं मापा जा सकता।

इन चारों के बाद “जो शब्दहीन सब में गाता है” पूरी कविता का अंतिम दार्शनिक निष्कर्ष है। गाता कौन है? कोई व्यक्ति नहीं।

कोई देवता भी नहीं। स्वयं अस्तित्व। और वह भी “शब्दहीन।” अर्थात ध्वनि का अंतिम सत्य शब्दों में नहीं पकड़ा जा सकता।

इसीलिए कविता भी अब समाप्त होने की ओर बढ़ती है। “नमस्कार कर मुड़ा प्रियंवद केशकंबली।/लेकर कंबल गेह-गुफा को चला गया।” ध्यान देने की बात यह है कि प्रियंवद यहीं नहीं रुकता। न पुरस्कार लेता है।न सम्मान स्वीकार करता है।न अपने अनुभव का विस्तार से वर्णन करता है।जिस तरह आया था, उसी तरह चला जाता है।उसकी साधना किसी उपलब्धि का उत्सव नहीं बनती।

वह फिर अपने एकांत में लौट जाता है।अंतिम दृश्य भी उतना ही अर्थपूर्ण है—“उठ गई सभा। सब अपने-अपने काम लगे।” यहाँ कोई चमत्कारिक परिवर्तन नहीं दिखाया गया।राज्य नहीं बदल जाता।लोग संन्यासी नहीं बन जाते।वे अपने-अपने काम पर लौट जाते हैं।लेकिन कवि तुरंत जोड़ता है—“युग पलट गया।” यही इस कविता का सबसे सूक्ष्म व्यंग्य और सबसे गहरा सत्य है।

बाहर से कुछ नहीं बदला।भीतर से सब बदल गया।युग का परिवर्तन पहले मनुष्य की चेतना में होता है, इतिहास में बाद में दिखाई देता है। कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं—“प्रिय पाठक! यों मेरी वाणी भी/मौन हुई।” यहाँ अज्ञेय स्वयं कविता में प्रवेश करते हैं।

लेकिन वे भी कोई अंतिम व्याख्या नहीं देते। वे अपनी वाणी को मौन कर देते हैं।यह समापन पूरी कविता की संरचना के अनुरूप है।

जिस कविता ने आरंभ से अंत तक मौन को सृजन का आधार माना, उसका अंत भी मौन में ही होना स्वाभाविक है।

इस प्रकार ‘असाध्य वीणा’ का अंतिम संदेश यह नहीं है कि एक महान कलाकार ने असंभव कार्य कर दिखाया। उसका आशय इससे कहीं गहरा है। कविता बताती है कि सृजन तब घटित होता है जब कलाकार अपने अहं का परित्याग करके स्वयं को व्यापक अस्तित्व का माध्यम बना देता है। तब जो प्रकट होता है, वह न उसका निजी कौशल होता है, न वाद्य का चमत्कार, बल्कि जीवन की वही तथता होती है जो शब्दों से पहले, ध्वनियों के भीतर और मौन की गहराइयों में निरंतर गाती रहती है। इसी अनुभव तक पहुँचने की यात्रा का नाम अज्ञेय ने ‘असाध्य वीणा’ रखा है।

‘असाध्य वीणा’ का भारतीय काव्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य से अध्ययन करने पर सबसे पहले यह स्पष्ट होता है कि अज्ञेय की कविता आधुनिक होते हुए भी भारतीय काव्य-चिंतन की अनेक आधारभूत अवधारणाओं से गहरे स्तर पर जुड़ी हुई है। यह संबंध किसी प्रत्यक्ष अनुकरण का नहीं है। अज्ञेय न तो रसशास्त्र का अनुपालन करने के लिए कविता लिखते हैं और न ध्वनि या वक्रोक्ति के सिद्धांतों को प्रमाणित करने के लिए। फिर भी उनकी काव्य-दृष्टि ऐसी है कि भारतीय काव्यशास्त्र के प्रमुख सिद्धांत उसके भीतर स्वाभाविक रूप से सक्रिय दिखाई देते हैं। इसलिए इस कविता को रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, औचित्य और साधारणीकरण की संयुक्त दृष्टि से पढ़ना अधिक फलदायी सिद्ध होता है।

इस कविता का प्रधान रस शांत है, लेकिन यह शांत रस निष्क्रिय विरक्ति या संसार-त्याग से उत्पन्न नहीं होता। यहाँ शांति का आधार साधना, आत्म-विलय और अस्तित्व के साथ एक गहरे सामंजस्य की उपलब्धि है। भारतीय आचार्यों ने शांत रस को मनुष्य की ऐसी मानसिक अवस्था माना है जहाँ राग-द्वेष, आकांक्षा और अहं का आवेग शांत हो जाता है। प्रियंवद की पूरी साधना इसी दिशा में आगे बढ़ती है। वह किसी विजय या प्रदर्शन की इच्छा से वीणा के पास नहीं जाता। वह धीरे-धीरे अपने भीतर के आग्रहों को छोड़ता है, स्वयं को प्रकृति की विराट सत्ता के सामने छोटा अनुभव करता है, अपने सीमित ‘मैं’ से मुक्त होने का प्रयत्न करता है और अंततः अपने व्यक्तिगत अस्तित्व का दावा छोड़ देता है। यही क्रम शांत रस की अनुभूति का आधार बनता है।

इस शांत रस की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह किसी एक क्षण में अचानक प्रकट नहीं होता। पूरी कविता उसकी क्रमिक तैयारी करती है। राजसभा की उत्सुकता, वीणा की कथा, वज्रकीर्ति की तपस्या, प्रियंवद का मौन, वृक्ष के साथ उसका संवाद, प्रकृति की स्मृतियाँ, आत्म-विस्मृति और अंततः संगीत का अवतरण—ये सब मिलकर उस भावभूमि का निर्माण करते हैं जहाँ शांत रस अपनी पूर्णता प्राप्त करता है। इसीलिए कविता का अंतिम प्रभाव किसी नाटकीय उपलब्धि का नहीं, बल्कि गहरे आत्मिक संतुलन का होता है।

यद्यपि शांत रस प्रधान है, कविता की संवेदनात्मक संरचना एकरस नहीं है। उसके भीतर अद्भुत रस की व्यापक उपस्थिति है। किरीटी-तरु का विराट स्वरूप, उसकी ब्रह्मांडीय सत्ता, वज्रकीर्ति की आजीवन साधना, संगीत का स्वयंभू रूप में अवतरित होना और प्रत्येक श्रोता के भीतर उसका अलग अर्थ ग्रहण करना—ये सभी प्रसंग विस्मय उत्पन्न करते हैं। यह विस्मय किसी चमत्कार-प्रियता से नहीं जन्मता, बल्कि उस अनुभव से उत्पन्न होता है जहाँ साधारण जीवन के भीतर असाधारण अर्थ दिखाई देने लगते हैं। अद्भुत रस यहाँ अलौकिकता का परिणाम नहीं है; वह अस्तित्व की गहराई का अनुभव है।

कविता में करुण रस भी एक सूक्ष्म स्तर पर उपस्थित है। यह करुणा किसी व्यक्तिगत दुःख से नहीं आती। उसका आधार जीवन की नश्वरता, श्रम की दीर्घ प्रक्रिया और मनुष्य की सीमितता का बोध है। वज्रकीर्ति का पूरा जीवन एक वीणा के निर्माण में समर्पित हो जाना, प्रियंवद का अपने अहं को बार-बार अस्वीकार करना, भूखे व्यक्ति का संगीत में अन्न की खुदबुद सुनना या किसी अन्य का उसमें मुक्ति की आकांक्षा सुनना—ये सब प्रसंग करुणा को व्यापक मानवीय संवेदना का रूप देते हैं। यह करुणा दया नहीं जगाती; वह मनुष्य की साझा नियति का बोध कराती है।

वीर रस का भी एक भीतरी रूप इस कविता में मिलता है। यह युद्ध, पराक्रम या शौर्य का वीरत्व नहीं है। यहाँ साहस अपने भीतर उतरने का है। अपने अहं का परित्याग करना, अपने कौशल पर भरोसा छोड़ना, अपने को व्यापक सत्ता के सामने समर्पित कर देना—यह भी एक प्रकार का आंतरिक वीरत्व है। भारतीय परंपरा में आत्म-विजय को बाहरी विजय से बड़ा माना गया है। प्रियंवद का चरित्र इसी अर्थ में वीर है। वह किसी बाहरी प्रतिद्वंद्वी को नहीं, अपने भीतर के दंभ को पराजित करता है।

रस की दृष्टि से सबसे ध्यान देने योग्य बात यह है कि कविता इन सब भावों को अंततः शांत रस में रूपांतरित कर देती है। अद्भुत, करुण और वीर रस स्वतंत्र रूप में उपस्थित होते हुए भी अंततः उसी व्यापक शांति में समाहित हो जाते हैं। इससे कविता की भाव-संरचना में एक प्रकार की अंतर्धारा बनती है जो आरंभ से अंत तक निरंतर बनी रहती है।

भारतीय काव्यशास्त्र में आनंदवर्धन का ध्वनि-सिद्धांत इस कविता को समझने की सबसे प्रभावी कुंजी प्रदान करता है। आनंदवर्धन के अनुसार श्रेष्ठ कविता का अर्थ उसके प्रत्यक्ष कथन में नहीं, बल्कि व्यंजना में निहित होता है। ‘असाध्य वीणा’ इस सिद्धांत का आधुनिक उदाहरण है। कविता का कोई भी केंद्रीय बिंब अपने प्रत्यक्ष अर्थ तक सीमित नहीं रहता। वीणा केवल वाद्य नहीं है। वह साधना, परंपरा, स्मृति और सृजन का समेकित प्रतीक बन जाती है। किरीटी-तरु केवल वृक्ष नहीं है। वह प्रकृति की दीर्घकालिक चेतना, समय की निरंतरता और समस्त जीव-जगत के सह-अस्तित्व का संकेत है। वज्रकीर्ति केवल एक कारीगर नहीं है; वह उस सर्जक का रूप है जो अपनी कृति में अपना जीवन समर्पित कर देता है। प्रियंवद कलाकार भर नहीं है; वह साधक, शिष्य और माध्यम है। इसी प्रकार संगीत केवल श्रव्य घटना नहीं है; वह उस मौन का प्रकट रूप है जो समूची सृष्टि में व्याप्त है।

ध्वनि-सिद्धांत की दृष्टि से इस कविता का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह अपने प्रतीकों का एकमात्र अर्थ निर्धारित नहीं करती। प्रत्येक प्रतीक अर्थ की अनेक दिशाएँ खोलता है। उदाहरण के लिए ‘शून्य’ को केवल बौद्ध दर्शन की अवधारणा मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। वह आत्म-विसर्जन का भी संकेत है, अहं के लोप का भी, सृजन की रिक्त तैयारी का भी और उस अनंत संभावना का भी जिससे नया अर्थ जन्म लेता है। इसी प्रकार ‘मौन’ केवल न बोलने की अवस्था नहीं है। वह सृजन की पूर्वपीठिका भी है, आत्म-साक्षात्कार का क्षेत्र भी और शब्दों से परे स्थित अनुभव का भी प्रतीक है। ध्वनि-सिद्धांत की यही विशेषता है कि वह कविता को अर्थों की बहुलता प्रदान करता है, बिना उसे अस्पष्ट बनाए।

आनंदवर्धन ने रस-ध्वनि को सर्वोच्च माना था। ‘असाध्य वीणा’ इसी अर्थ में उल्लेखनीय है कि उसकी व्यंजना अंततः शांत रस की अनुभूति को पुष्ट करती है। कविता पढ़ने के बाद पाठक केवल कथा नहीं याद रखता; उसके भीतर एक दीर्घकालिक मानसिक लय रह जाती है। यही रस-ध्वनि की सफलता है।

कुंतक के वक्रोक्ति-सिद्धांत की दृष्टि से भी यह कविता उल्लेखनीय है। कुंतक ने काव्य की प्राणशक्ति को वक्रता में देखा था। वक्रता का अर्थ कठिन या कृत्रिम भाषा नहीं, बल्कि वस्तु को इस प्रकार कहना है कि उसमें नया सौंदर्य और नया अर्थ उत्पन्न हो। अज्ञेय की पूरी कविता ऐसी ही वक्र अभिव्यक्ति से निर्मित है। वे सीधे यह नहीं कहते कि कलाकार को अहं छोड़ देना चाहिए। वे यह दिखाते हैं कि प्रियंवद स्वयं को भूलता जाता है। वे यह नहीं कहते कि प्रकृति चेतन है। वे किरीटी-तरु को इस प्रकार चित्रित करते हैं कि वह स्वयं जीवित सत्ता के रूप में सामने आ जाता है। वे यह नहीं कहते कि कला का अर्थ प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग होता है। वे एक ही संगीत को अनेक अनुभवों में विभाजित कर देते हैं। इस प्रकार विचार प्रत्यक्ष उपदेश न बनकर काव्यात्मक अनुभव में रूपांतरित हो जाता है।

वक्रोक्ति का एक और रूप कविता की भाषिक संरचना में दिखाई देता है। विरोधी प्रतीत होने वाले पदों का संयोजन—जैसे मौन का गान, शब्दहीन संगीत, अंग और अपंग का संबंध, शून्य की पूर्णता, संगीत का मौन से जन्म लेना—ये सब भाषा को नया अर्थ प्रदान करते हैं। यह विरोधाभास केवल अलंकार नहीं है। इसी के माध्यम से कविता अस्तित्व की जटिलता को व्यक्त करती है। साधारण गद्य में इन्हें कह देने से वही प्रभाव उत्पन्न नहीं होता।

औचित्य-सिद्धांत की दृष्टि से देखें तो कविता का प्रत्येक बिंब, प्रत्येक प्रसंग और प्रत्येक भाषिक स्तर अपनी जगह पूरी तरह संगत दिखाई देता है। क्षेमेन्द्र ने औचित्य को काव्य का प्राण कहा था। ‘असाध्य वीणा’ में कहीं भी अनावश्यक विस्तार या प्रभावोत्पादन का आग्रह नहीं है। जहाँ राजसभा है वहाँ भाषा में गरिमा है। जहाँ प्रियंवद का आत्म-संवाद है वहाँ संबोधन, पुनरावृत्ति और ध्यानमय लय है। जहाँ प्रकृति की स्मृतियाँ हैं वहाँ ध्वनियों और स्पर्शों से भरी हुई भाषा है। जहाँ संगीत का अवतरण है वहाँ भाषा क्रमशः विरल होती जाती है। अंत में जब प्रियंवद श्रेय अस्वीकार करता है, तब भाषा सबसे अधिक संयत और निर्व्याज हो जाती है। यह भाषिक औचित्य ही कविता की विश्वसनीयता को बनाए रखता है।

औचित्य केवल भाषा तक सीमित नहीं है। चरित्र-निर्माण में भी उसका पालन हुआ है। प्रियंवद यदि प्रारंभ से ही चमत्कारी कलाकार की मुद्रा में होता और अंत में विनम्रता की बातें करता, तो कविता कृत्रिम लगती। लेकिन आरंभ से ही उसका व्यवहार, उसका मौन, उसका आत्म-संदेह और उसका समर्पण इस निष्कर्ष की तैयारी करते हैं कि वह अंत में श्रेय स्वयं को नहीं देगा। इसी प्रकार राजा का परिवर्तन भी आकस्मिक नहीं लगता। संगीत सुनने के बाद उसका राजमुकुट हल्का लगना उसी मानसिक यात्रा का स्वाभाविक परिणाम है।

अभिनवगुप्त के साधारणीकरण-सिद्धांत की दृष्टि से यह कविता विशेष महत्त्व ग्रहण करती है। साधारणीकरण का अर्थ यह नहीं है कि सब लोग एक जैसा अनुभव करते हैं। उसका अर्थ यह है कि काव्य का अनुभव व्यक्तिगत सीमाओं से ऊपर उठकर ऐसा रूप ग्रहण करता है जिसमें अनेक व्यक्ति अपने-अपने अनुभवों के साथ सहभागी हो सकें। ‘असाध्य वीणा’ में संगीत का प्रसंग इसी सिद्धांत का आधुनिक रूप प्रस्तुत करता है। प्रत्येक श्रोता संगीत को अलग अर्थ में सुनता है। कोई उसे प्रेम के रूप में ग्रहण करता है, कोई भूख की तृप्ति के रूप में, कोई श्रम की लय के रूप में, कोई भय से मुक्ति के रूप में। इन सबके अनुभव अलग हैं, फिर भी वे एक ही सौंदर्य-अनुभूति में सहभागी हैं। यही साधारणीकरण है।

अभिनवगुप्त के अनुसार रस का अनुभव व्यक्तिगत सुख-दुःख का अनुभव नहीं रह जाता; वह सार्वजनीन बन जाता है। ‘असाध्य वीणा’ इसी प्रक्रिया को कथा का रूप देती है। भूखे व्यक्ति की भूख व्यक्तिगत है, लेकिन संगीत उसे इस प्रकार रूपांतरित करता है कि पाठक भी उस अनुभव में प्रवेश कर सके। राजा की सत्ता व्यक्तिगत है, पर उसका अहं हल्का होने का अनुभव पाठक के लिए भी अर्थपूर्ण बन जाता है। रानी का प्रेम निजी है, पर उसका रूपांतरण सार्वजनीन संवेदना में होता है। कविता किसी एक पात्र की भावभूमि तक सीमित नहीं रहती; वह सभी अनुभवों को एक व्यापक सौंदर्य-क्षेत्र में बदल देती है।

यहाँ एक और बात ध्यान देने योग्य है। साधारणीकरण का अर्थ अनुभवों का एकरूप हो जाना नहीं है। अज्ञेय इसके विपरीत यह दिखाते हैं कि अलग-अलग अनुभव बने रहते हैं, फिर भी वे विरोध में नहीं खड़े होते। इस प्रकार वे भारतीय काव्यशास्त्र की अवधारणा को आधुनिक संवेदना के अनुरूप नया विस्तार देते हैं। व्यक्ति की विशिष्टता सुरक्षित रहती है, लेकिन वह समष्टि से भी जुड़ता है।

भारतीय काव्यशास्त्र की इन सभी अवधारणाओं को एक साथ रखकर देखें तो स्पष्ट होता है कि ‘असाध्य वीणा’ केवल आधुनिक प्रतीकात्मक कविता नहीं है। वह भारतीय सौंदर्य-दृष्टि की अनेक परंपराओं का सर्जनात्मक पुनर्संयोजन है। उसका सौंदर्य कथानक में नहीं, उसके व्यंजना-लोक में है; उसका प्रभाव प्रत्यक्ष विचार में नहीं, रसानुभूति में है; उसका अर्थ किसी एक प्रतीक में नहीं, प्रतीकों के परस्पर संबंध में है; उसकी भाषा सूचना नहीं देती, अनुभव का निर्माण करती है। यही कारण है कि कविता का अंतिम प्रभाव किसी निष्कर्ष या उपदेश के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसी मानसिक स्थिति के रूप में पाठक के भीतर रह जाता है जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं और उनके पीछे छिपी हुई अर्थ-ध्वनियाँ लंबे समय तक गूँजती रहती हैं। यही भारतीय काव्यशास्त्र की दृष्टि से ‘असाध्य वीणा’ की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

‘असाध्य वीणा’ का बौद्ध दार्शनिक परिप्रेक्ष्य से अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि अज्ञेय ने बौद्ध चिंतन को किसी धार्मिक उपदेश या दार्शनिक प्रतिपादन के रूप में ग्रहण नहीं किया है। उन्होंने उसे एक जीवित काव्य-अनुभव में रूपांतरित किया है। इस कविता में प्रयुक्त ‘शून्य’, ‘महाशून्य’, ‘तथता’, ‘महामौन’, आत्म-विस्मृति, अहं का लोप और समग्र अस्तित्व के साथ एकात्मक अनुभव जैसे संकेत बौद्ध चिंतन की याद अवश्य दिलाते हैं, किंतु कविता किसी दार्शनिक ग्रंथ की पुनरावृत्ति नहीं है। अज्ञेय की रचना-दृष्टि की विशेषता यही है कि वे दार्शनिक अवधारणाओं को काव्यात्मक अनुभव में बदल देते हैं। इसलिए इस कविता को बौद्ध दर्शन का उदाहरण कहने के बजाय बौद्ध संवेदना से संवाद करती हुई आधुनिक कविता कहना अधिक उचित होगा।

सबसे पहले ‘अनात्म’ की अवधारणा की ओर ध्यान देना चाहिए। बौद्ध दर्शन का एक मूल प्रतिपादन यह है कि मनुष्य जिस स्थिर और स्वतंत्र आत्मा की कल्पना करता है, वह वास्तव में अनेक क्षणभंगुर प्रक्रियाओं का समुच्चय है। अहं का जो आग्रह मनुष्य को अपने चारों ओर एक कठोर सीमा खींचने के लिए प्रेरित करता है, वही दुःख का कारण बनता है। ‘असाध्य वीणा’ में प्रियंवद की पूरी साधना इसी सीमित अहं से मुक्त होने की प्रक्रिया है। वह आरंभ से ही स्वयं को कलाकार घोषित नहीं करता। वह अपने कौशल का दावा नहीं करता। वह वीणा को जीतने या साध लेने की घोषणा नहीं करता। उसके भीतर सबसे पहले जिस चीज़ का विघटन होता है, वह उसका आत्म-अभिमान है। वह स्वयं को शिष्य और साधक कहता है, फिर अपने को वृक्ष की गोद में बैठे बालक के रूप में देखता है, फिर स्वयं को भूल जाने की बात करता है और अंततः अपने अस्तित्व के स्वतंत्र दावे का पूर्ण परित्याग कर देता है। यह क्रम अनात्म की अनुभूति की ओर बढ़ता हुआ दिखाई देता है।

यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि प्रियंवद का आत्म-विलय आत्म-विनाश नहीं है। वह अपने अस्तित्व को नकार नहीं रहा, बल्कि उसके सीमित और अहंकारी रूप को छोड़ रहा है। बौद्ध चिंतन में भी अनात्म का अर्थ अस्तित्व का निषेध नहीं है, बल्कि स्थायी, स्वतंत्र और अपरिवर्तनीय आत्मा की धारणा का अतिक्रमण है। प्रियंवद जब स्वयं को भूलने की बात करता है, तब वह उसी सीमित आत्मबोध से बाहर निकलता है जिसने कलाकार और कला के बीच स्वामित्व का संबंध बना रखा था। उसके बाद वह स्वयं को माध्यम के रूप में स्वीकार करता है। यह परिवर्तन केवल नैतिक विनम्रता नहीं है; यह अस्तित्व की नई समझ है।

इसी से जुड़ा हुआ दूसरा महत्त्वपूर्ण विचार ‘शून्यता’ का है। आधुनिक पाठक प्रायः ‘शून्य’ को रिक्तता या निषेध के अर्थ में ग्रहण करता है, जबकि बौद्ध दर्शन में शून्यता का अर्थ किसी वस्तु का न होना नहीं है। उसका अर्थ है—किसी भी वस्तु का स्वतंत्र, स्वायत्त और स्थिर सत्ता के रूप में न होना। प्रत्येक सत्ता दूसरे के साथ संबंधों में निर्मित होती है। उसका अपना पृथक अस्तित्व नहीं होता।

कविता इस विचार को प्रत्यक्ष सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि प्रतीकों और अनुभवों के माध्यम से व्यक्त करती है। वीणा अपने आप में कुछ नहीं है। उसका अर्थ किरीटी-तरु से जुड़कर बनता है। किरीटी-तरु अपने परिवेश, ऋतुओं, पर्वत, बादलों, पशुओं और समय से जुड़ा हुआ है। वज्रकीर्ति का श्रम उसके भीतर समाया हुआ है। प्रियंवद उस परंपरा से जुड़कर ही संगीत तक पहुँचता है। संगीत स्वयं भी किसी एक व्यक्ति की संपत्ति नहीं बनता। वह प्रत्येक श्रोता के अनुभव में नया रूप ग्रहण करता है। इस प्रकार पूरी कविता में कोई भी सत्ता अपने-आप में पूर्ण नहीं है। प्रत्येक वस्तु दूसरे के साथ संबंध में अर्थ ग्रहण करती है। यही शून्यता का जीवित काव्यात्मक रूप है।

जब प्रियंवद कहता है कि वह शून्य में डूब गया था, तब उसका आशय किसी अंधकारमय रिक्तता से नहीं है। वह उस मानसिक अवस्था की ओर संकेत करता है जहाँ अहं का आग्रह समाप्त हो चुका है। उसी रिक्तता में संगीत का अवतरण संभव होता है। यदि वह अपने कौशल, प्रसिद्धि या उपलब्धि की चिंता में उलझा रहता, तो यह रिक्तता उत्पन्न नहीं होती। इस प्रकार शून्य यहाँ सृजन का आधार बन जाता है। यह बौद्ध चिंतन के उस गहरे बोध से जुड़ता है जहाँ रिक्तता निषेध नहीं, संभावना है।

कविता में प्रयुक्त ‘महाशून्य’ इस अनुभव को व्यक्तिगत स्तर से उठाकर ब्रह्मांडीय स्तर पर पहुँचा देता है। यहाँ महाशून्य का अर्थ किसी निराकार शून्य लोक से नहीं है। यह वह व्यापक अस्तित्व है जिसमें व्यक्ति और वस्तु के अलग-अलग दावे समाप्त हो जाते हैं। अज्ञेय इसे किसी दार्शनिक भाषा में नहीं समझाते। वे केवल यह दिखाते हैं कि सच्चा संगीत उसी महाशून्य का स्वर है। इससे स्पष्ट होता है कि कविता में महाशून्य का संबंध सृजनात्मक ऊर्जा से है, न कि अस्तित्व के निषेध से।

बौद्ध दर्शन का एक और केंद्रीय विचार ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ है, अर्थात परस्पर निर्भर उत्पत्ति। संसार की कोई भी वस्तु स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में नहीं आती। प्रत्येक वस्तु अनेक कारणों और परिस्थितियों के मेल से बनती है। ‘असाध्य वीणा’ का पूरा विन्यास इसी विचार का कलात्मक रूप प्रतीत होता है। वीणा किसी एक कारीगर की उपलब्धि नहीं है। उसके पीछे वृक्ष का दीर्घ जीवन, प्रकृति का इतिहास, ऋतुओं का परिवर्तन, वज्रकीर्ति की साधना और समय का संचय है। प्रियंवद भी अकेला नहीं है। उसकी चेतना प्रकृति की स्मृतियों, ध्वनियों और अनुभवों से निर्मित हुई है। संगीत भी किसी एक व्यक्ति की देन नहीं है। वह कलाकार, वाद्य, प्रकृति, श्रोता और मौन—इन सबके संयुक्त संबंध से जन्म लेता है। इस प्रकार कविता किसी भी उपलब्धि को व्यक्तिगत प्रतिभा का परिणाम नहीं मानती। उसका आधार संबंधों का जाल है।

यही बात कविता के अंतिम कथन को भी समझाती है कि जो सुना गया, वह न कलाकार का था, न वीणा का। यदि प्रतीत्यसमुत्पाद की दृष्टि से देखें तो यह कथन पूरी तरह संगत प्रतीत होता है। किसी भी रचना का कोई एकमात्र स्वामी नहीं हो सकता। वह असंख्य कारणों और स्थितियों का परिणाम होती है। प्रियंवद का श्रेय अस्वीकार करना केवल विनम्रता नहीं है; वह इसी गहरे अस्तित्वबोध का परिणाम है।

बौद्ध दर्शन में ‘तथता’ का विचार विशेष महत्त्व रखता है। तथता का अर्थ है—वस्तुओं का वैसा होना जैसी वे हैं। उसमें मनुष्य की कल्पनाएँ, इच्छाएँ और आग्रह आरोपित नहीं होते। वह वस्तु का निष्कपट सत्य है। ‘असाध्य वीणा’ में तथता का उल्लेख अंत में आता है, किंतु उसकी तैयारी पूरी कविता में चलती रहती है। प्रियंवद वीणा पर अपना संगीत आरोपित नहीं करना चाहता। वह चाहता है कि वृक्ष स्वयं बोले। वह चाहता है कि जीवन स्वयं अपनी वाणी पाए। वह अपने अनुभव को भी अंतिम सत्य नहीं मानता। इसी कारण अंत में वह कहता है कि जो सुना गया, वह तथता थी। इस कथन का अर्थ यह है कि सच्ची कला कलाकार की निजी भावुकता का विस्तार नहीं होती। वह जीवन के अपने सत्य को प्रकट होने देती है।

तथता का एक दूसरा पक्ष भी है। जब सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति संगीत को अलग-अलग रूप में सुनता है, तब पहली दृष्टि में लगता है कि सत्य अनेक हो गए। लेकिन बौद्ध दृष्टि से देखें तो ऐसा नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी चेतना के अनुरूप तथता का एक पक्ष ग्रहण करता है। सत्य एक है, अनुभव अनेक हैं। अज्ञेय इस विचार को बिना किसी दार्शनिक व्याख्या के कथा के माध्यम से मूर्त कर देते हैं।

बौद्ध परंपरा में मौन का भी विशेष स्थान है। बुद्ध के अनेक मौन प्रसंग प्रसिद्ध हैं जहाँ वे कुछ प्रश्नों का उत्तर नहीं देते, क्योंकि भाषा की सीमाएँ वहाँ समाप्त हो जाती हैं। ‘असाध्य वीणा’ में भी मौन केवल ध्वनि का अभाव नहीं है। पूरी कविता में मौन एक सक्रिय उपस्थिति है। प्रियंवद का मौन, सभा का मौन, आत्म-संवाद का मौन, संगीत के बाद लौटता हुआ मौन और अंत में कवि की वाणी का मौन—ये सब मिलकर एक ऐसी संरचना बनाते हैं जिसमें मौन ही सृजन का आधार बन जाता है।

सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि अज्ञेय संगीत का स्रोत भी मौन को ही मानते हैं। यह विचार बौद्ध ध्यान-परंपरा की उस अनुभूति से जुड़ता है जहाँ अंतिम सत्य शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। भाषा वहाँ संकेत भर है। अनुभव उससे कहीं बड़ा है। इसलिए कविता भी अंत में अपने को मौन में समाप्त करती है। यह समापन आकस्मिक नहीं है; यह पूरी रचना की आंतरिक अनिवार्यता है।

बौद्ध चिंतन में करुणा का स्थान भी केंद्रीय है। करुणा केवल दया नहीं है। वह समस्त प्राणियों के परस्पर संबंध की अनुभूति से उत्पन्न होती है। ‘असाध्य वीणा’ में यह करुणा प्रत्यक्ष उपदेश के रूप में नहीं आती, बल्कि संवेदना के रूप में उपस्थित रहती है। किरीटी-तरु सभी जीवों का आश्रय है। प्रियंवद उसके प्रति अधिकार का भाव नहीं रखता। सभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति का अनुभव उसके जीवन-संघर्ष के अनुरूप स्वीकार किया जाता है। किसी की भूख को छोटा नहीं कहा जाता, किसी की आकांक्षा का उपहास नहीं किया जाता। संगीत सबको उनके अपने सत्य में स्वीकार करता है। यही करुणा का व्यापक रूप है।

इस कविता में प्रकृति और मनुष्य का संबंध भी बौद्ध दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। बौद्ध परंपरा मनुष्य को सृष्टि का स्वामी नहीं मानती। वह उसे व्यापक जीवन-व्यवस्था का एक अंग मानती है। प्रियंवद का पूरा व्यवहार इसी समझ पर आधारित है। वह वृक्ष को संसाधन की तरह नहीं देखता। वह उसके सामने विनम्र है। वह उससे सीखना चाहता है। वह स्वयं को उसकी गोद में बैठा बालक अनुभव करता है। यह संबंध आधुनिक पर्यावरणीय नैतिकता के साथ-साथ बौद्ध करुणा और परस्पर निर्भरता की भावना से भी जुड़ता है।

फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि ‘असाध्य वीणा’ बौद्ध दर्शन की काव्यात्मक व्याख्या मात्र है। अज्ञेय का रचनात्मक संसार इससे कहीं अधिक व्यापक है। उसमें उपनिषद् की प्रतिध्वनियाँ भी हैं, भारतीय संगीत की परंपरा भी है, आधुनिक अस्तित्वबोध भी है और प्रकृति के प्रति गहरी आत्मीयता भी। यदि कविता को केवल बौद्ध दर्शन में सीमित कर दिया जाए, तो उसके अनेक अर्थ छूट जाएँगे। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि बौद्ध चिंतन की सहायता से इस कविता के कई गहरे स्तर उद्घाटित होते हैं। विशेषकर शून्यता, तथता, अनात्म, प्रतीत्यसमुत्पाद और मौन की अवधारणाएँ कविता की संरचना और उसके अंतिम अर्थ को समझने की सबसे सशक्त कुंजियों में से हैं।

बावजूद इसके, ‘असाध्य वीणा’ बौद्ध दर्शन का काव्यात्मक रूपांतरण नहीं, बल्कि उसके साथ एक सर्जनात्मक संवाद है। अज्ञेय दार्शनिक शब्दों को काव्य में लाकर उनका अर्थ नहीं दोहराते; वे ऐसे अनुभव की रचना करते हैं जिसमें पाठक स्वयं उन अवधारणाओं की अनुभूति कर सके। यही इस कविता की सबसे बड़ी उपलब्धि है। यहाँ दर्शन विचार नहीं रह जाता, वह संवेदना बन जाता है; और संवेदना किसी मत का प्रचार नहीं करती, बल्कि मनुष्य की चेतना को उसके सीमित अहं से उठाकर उस व्यापक जीवनानुभव तक ले जाती है जहाँ व्यक्ति, प्रकृति, संगीत और मौन एक-दूसरे से अलग नहीं रह जाते।

‘असाध्य वीणा’ का अध्ययन अगर विभिन्न भारतीय दार्शनिक परंपराओं के व्यापक परिप्रेक्ष्य में किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि अज्ञेय किसी एक दार्शनिक मत के कवि नहीं हैं। उनकी कविता किसी विचार-प्रणाली का काव्यात्मक भाष्य नहीं बनती। उसका संबंध दर्शन से वहाँ स्थापित होता है जहाँ दर्शन जीवनानुभव में रूपांतरित हो जाता है। इसीलिए इस कविता में बौद्ध चिंतन के संकेत मिलते हैं, उपनिषदों की चेतना की प्रतिध्वनि सुनाई देती है, अद्वैत वेदांत की कुछ मूल अवधारणाएँ भी पहचान में आती हैं और कहीं-कहीं ज़ेन सौंदर्यबोध की सादगी, मौन और अकृत्रिमता भी अनुभव होती है। किंतु इनमें से कोई भी परंपरा कविता पर इस प्रकार आरोपित नहीं की जा सकती कि वह उसकी अंतिम व्याख्या बन जाए। अज्ञेय इन परंपराओं से संवाद करते हैं, उनका सर्जनात्मक रूपांतरण करते हैं और अंततः अपनी स्वतंत्र काव्य-दृष्टि निर्मित करते हैं।

इस संवाद की शुरुआत उपनिषदों से की जा सकती है। उपनिषदों का एक मूल प्रश्न यह है कि मनुष्य अपने सीमित व्यक्तित्व से आगे बढ़कर उस व्यापक सत्ता का अनुभव कैसे करे जो समस्त अस्तित्व का आधार है। उपनिषदों में बार-बार यह आग्रह मिलता है कि मनुष्य अपने अहं, अपनी संकीर्ण पहचान और अपने इंद्रिय-आश्रित ज्ञान से आगे बढ़े। वहाँ आत्मा और ब्रह्म की एकता का विचार इसी व्यापक अनुभव की ओर संकेत करता है। ‘असाध्य वीणा’ में प्रियंवद की साधना भी व्यक्ति से विराट की ओर बढ़ने की यात्रा है। वह आरंभ में एक व्यक्ति के रूप में उपस्थित होता है, किंतु धीरे-धीरे उसकी चेतना प्रकृति, स्मृति, वृक्ष, संगीत और अंततः समूची सृष्टि के साथ जुड़ने लगती है। यह यात्रा किसी धार्मिक अनुष्ठान की नहीं, अनुभव की यात्रा है।

उपनिषदों में ज्ञान का अर्थ केवल बौद्धिक सूचना नहीं है। वास्तविक ज्ञान वह है जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय के बीच की दूरी समाप्त होने लगती है। ‘असाध्य वीणा’ में भी यही प्रक्रिया दिखाई देती है। प्रियंवद वीणा को बाहर रखी हुई वस्तु की तरह नहीं देखता। पहले वह उसके इतिहास से जुड़ता है, फिर उसके मूल स्रोत किरीटी-तरु से, फिर उस वृक्ष के अनुभव से, और अंततः उसी चेतना में अपने को समर्पित कर देता है। इस क्रम में कलाकार और वाद्य, साधक और साध्य, व्यक्ति और प्रकृति—इन सबके बीच की सीमाएँ धीरे-धीरे धुँधली होती जाती हैं। यही वह बिंदु है जहाँ उपनिषदों की चेतना की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।

यहाँ यह सावधानी आवश्यक है कि इस कविता को अद्वैत वेदांत की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति न मान लिया जाए। अद्वैत का केंद्रीय प्रतिपादन ब्रह्म की परम सत्ता और जीव-ब्रह्म की एकता पर आधारित है। अज्ञेय कहीं भी ऐसे दार्शनिक निष्कर्ष नहीं देते। वे न ब्रह्म का प्रतिपादन करते हैं, न आत्मा की शाश्वत सत्ता का। फिर भी अद्वैत की एक अनुभूतिगत समानता कविता में दिखाई देती है। वह समानता इस बात में है कि अलग-अलग प्रतीत होने वाली वस्तुएँ अंततः किसी व्यापक एकता में अनुभव की जाती हैं।

प्रियंवद का समर्पण इसी अनुभूति की ओर बढ़ता है। वह स्वयं को केंद्र से हटाता है, प्रकृति को अपने बाहर स्थित वस्तु नहीं मानता और अंततः अपने तथा समस्त अस्तित्व के बीच की दूरी कम कर देता है। यह अनुभव अद्वैत की स्मृति अवश्य जगाता है, किंतु अज्ञेय इसे किसी आध्यात्मिक सिद्धांत में नहीं बदलते। उनके लिए यह दार्शनिक निष्कर्ष नहीं, काव्यात्मक अनुभव है।

उपनिषदों की एक और महत्त्वपूर्ण अवधारणा है—मौन। अनेक उपनिषदों में अंतिम सत्य को भाषा से परे बताया गया है। जहाँ शब्द लौट आते हैं, वहाँ अनुभव आरंभ होता है। ‘असाध्य वीणा’ की पूरी संरचना इसी दिशा में आगे बढ़ती है। कविता का आरंभ शब्दों से होता है, फिर मौन बढ़ता है, संगीत उसी मौन से जन्म लेता है और अंत में कवि स्वयं अपनी वाणी को मौन कर देता है। यह मौन किसी असमर्थता का नहीं, बल्कि अनुभव की पूर्णता का संकेत है। उपनिषदों में भी मौन उत्तर का अभाव नहीं है; वह उस उत्तर का रूप है जिसे भाषा पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकती। अज्ञेय इसी अनुभव को आधुनिक कविता की भाषा में रूपांतरित करते हैं।

यदि अद्वैत वेदांत और बौद्ध मध्यमक को साथ रखकर इस कविता को पढ़ें, तो एक रोचक तथ्य सामने आता है। दोनों परंपराएँ अहं के अतिक्रमण की बात करती हैं, किंतु उनके दार्शनिक आधार अलग हैं। अद्वैत अंततः एक परम अद्वितीय सत्ता को स्वीकार करता है, जबकि मध्यमक सभी स्वतंत्र सत्ताओं के निषेध के माध्यम से शून्यता की ओर जाता है। ‘असाध्य वीणा’ इन दोनों के बीच किसी एक का चयन नहीं करती। प्रियंवद के अनुभव में एक ओर शून्य और महाशून्य की उपस्थिति है, दूसरी ओर समग्र अस्तित्व के साथ ऐसी एकात्मता भी है जिसे केवल निषेध के रूप में नहीं समझा जा सकता। इसी कारण कविता किसी एक दार्शनिक खाँचे में नहीं समाती।

यदि केवल अद्वैत की दृष्टि से पढ़ेंगे, तो शून्यता का अनुभव गौण हो जाएगा। यदि केवल मध्यमक की दृष्टि से पढ़ेंगे, तो उस व्यापक एकत्व की अनुभूति की पर्याप्त व्याख्या नहीं हो सकेगी जो पूरी कविता में बार-बार उभरती है। अज्ञेय की रचनात्मकता इन दोनों ध्रुवों के बीच संवाद स्थापित करती है। वे एक ऐसी अनुभूति रचते हैं जिसमें व्यक्ति अपने सीमित अहं से मुक्त होता है, पर वह किसी अमूर्त सिद्धांत में विलीन नहीं हो जाता। उसका अनुभव जीवित, संवेदनात्मक और प्रकृति-सापेक्ष बना रहता है।

यहीं से ज़ेन सौंदर्यबोध की ओर बढ़ना स्वाभाविक है। ज़ेन परंपरा में अनुभव को शब्दों की अपेक्षा अधिक महत्त्व दिया जाता है। वहाँ ज्ञान तर्क से कम, प्रत्यक्ष अनुभूति से प्राप्त होता है। साधारण वस्तुओं में असाधारण अर्थ की पहचान, मौन का सौंदर्य, सहजता, अकृत्रिमता और वर्तमान क्षण की पूर्ण उपस्थिति—ये ज़ेन की कुछ प्रमुख विशेषताएँ हैं। ‘असाध्य वीणा’ में इनका गहरा साम्य दिखाई देता है।

प्रियंवद किसी चमत्कार की खोज में नहीं है। वह प्रकृति की साधारण ध्वनियों को सुनता है—पत्तियों पर गिरती वर्षा, महुए का टपकना, पक्षियों की पुकार, ओस की बूँद, खेत का जल, झरने की लय। ये सब सामान्य अनुभव हैं। किंतु उसकी चेतना उन्हें इस तरह ग्रहण करती है कि वे सृष्टि के व्यापक संगीत का हिस्सा बन जाते हैं। यही ज़ेन की वह दृष्टि है जिसमें साधारण जीवन ही आध्यात्मिक अनुभव का क्षेत्र बन जाता है।

ज़ेन में कलाकार का आदर्श भी वही है जो अपने अहं को कृति पर आरोपित न करे। चित्रकार बाँस बनकर बाँस को चित्रित करे, कवि प्रकृति के साथ इस तरह एकाकार हो जाए कि उसकी अपनी उपस्थिति पीछे हट जाए। प्रियंवद की साधना भी इसी दिशा में जाती है। वह वीणा से अपना संगीत नहीं निकालना चाहता। वह चाहता है कि वृक्ष स्वयं गाए। यह आग्रह कलाकार की विनम्रता मात्र नहीं है; यह सृजन की ऐसी अवधारणा है जिसमें कलाकार निर्माता से अधिक माध्यम होता है।

ज़ेन सौंदर्यबोध का एक और महत्त्वपूर्ण पक्ष है—रिक्तता का रचनात्मक उपयोग। चित्रकला में खाली स्थान उतना ही अर्थपूर्ण होता है जितनी रेखाएँ। कविता में मौन उतना ही अर्थपूर्ण होता है जितने शब्द। ‘असाध्य वीणा’ का पूरा विन्यास इसी सिद्धांत पर आधारित है। प्रियंवद का मौन, संगीत से पहले का विराम, संगीत के बाद लौटता हुआ मौन और अंतिम आत्मसंयम—ये सब बताते हैं कि अज्ञेय के लिए रिक्तता अनुपस्थिति नहीं है। वही सृजन की सबसे उपजाऊ भूमि है।

यहाँ यह भी ध्यान देना चाहिए कि ज़ेन और भारतीय दार्शनिक परंपराओं के बीच ऐतिहासिक संबंध अवश्य हैं, किंतु अज्ञेय की कविता को सीधे ज़ेन कविता कहना उचित नहीं होगा। वे भारतीय सांस्कृतिक अनुभव के भीतर रहकर ऐसी काव्यभाषा निर्मित करते हैं जो ज़ेन की कुछ संवेदनात्मक विशेषताओं से साम्य रखती है। यह प्रभाव से अधिक संवेदना का साम्य है।

इन सभी परंपराओं को साथ रखकर देखें तो कविता का सबसे बड़ा दार्शनिक गुण यह है कि वह किसी एक अंतिम सत्य की घोषणा नहीं करती। वह पाठक को किसी मत में दीक्षित नहीं करती। वह एक अनुभव का निर्माण करती है। यही कारण है कि कविता के अंत में प्रियंवद स्वयं अपने अनुभव का स्वामित्व स्वीकार नहीं करता। यदि वह कहता कि यही अंतिम सत्य है, तो कविता दार्शनिक उपदेश बन जाती। लेकिन वह केवल इतना कहता है कि जो प्रकट हुआ, वह उसका नहीं था। यह कथन भारतीय दार्शनिक परंपराओं की उस साझा विनम्रता का भी संकेत है जहाँ सत्य व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होता।

उपनिषद, अद्वैत, बौद्ध मध्यमक और ज़ेन—इन चारों परंपराओं में एक समान तत्त्व यह है कि वे मनुष्य को उसके सीमित अहं से बाहर निकलने की प्रेरणा देती हैं। किंतु प्रत्येक का मार्ग अलग है। ‘असाध्य वीणा’ इन मार्गों को एक-दूसरे में विलीन नहीं करती। वह उनकी अनुभूतिगत समानताओं को ग्रहण करती है और उन्हें आधुनिक काव्य की भाषा में रूपांतरित करती है। इसीलिए कविता किसी संप्रदाय की नहीं लगती, फिर भी भारतीय दार्शनिक संवेदना से गहरे जुड़ी हुई प्रतीत होती है।

अज्ञेय की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने दर्शन को विचार के स्तर पर नहीं, संवेदना के स्तर पर रूपांतरित किया। पाठक पहले किसी दार्शनिक अवधारणा को नहीं पढ़ता; वह प्रियंवद के साथ उस अनुभव से गुजरता है जिसमें अहं धीरे-धीरे शिथिल होता है, प्रकृति एक जीवित उपस्थिति बन जाती है, संगीत मौन से जन्म लेता है और व्यक्ति का सीमित अस्तित्व किसी व्यापक जीवन-लय में सम्मिलित हो जाता है। दर्शन यहाँ निष्कर्ष नहीं, अनुभव की परिणति है। यही कारण है कि ‘असाध्य वीणा’ भारतीय दार्शनिक परंपराओं के साथ गहरे संवाद में रहते हुए भी अपनी स्वतंत्र आधुनिक काव्य-दृष्टि को सुरक्षित रखती है। इसी स्वतंत्रता के कारण यह कविता आज भी केवल एक दार्शनिक पाठ नहीं, बल्कि एक जीवित सौंदर्य-अनुभव के रूप में पढ़ी जाती है।

यह विवेचन कविता को भारतीय संगीत-दर्शन की परंपरा में रखकर पढ़ता है। इसका उद्देश्य कविता को केवल संगीत पर लिखी कविता मानना नहीं, बल्कि यह समझना है कि अज्ञेय संगीत की भारतीय अवधारणा को किस प्रकार आधुनिक काव्य-अनुभव में रूपांतरित करते हैं।

‘असाध्य वीणा’ का भारतीय संगीत-दर्शन की दृष्टि से अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि अज्ञेय संगीत को मनोरंजन, प्रदर्शन या कलात्मक कौशल की वस्तु नहीं मानते। उनके लिए संगीत अस्तित्व की मूल लय का अनुभव है। इसी कारण इस कविता में संगीत का अर्थ किसी राग, ताल या वादन-प्रणाली तक सीमित नहीं रहता। वह प्रकृति, साधना, मौन, स्मृति, चेतना और आत्म-विलय के साथ जुड़कर एक व्यापक दार्शनिक और सौंदर्यात्मक अर्थ ग्रहण करता है। भारतीय संगीत-परंपरा में जिस नाद, श्रुति, स्वर, साधना और मौन की चर्चा मिलती है, ‘असाध्य वीणा’ उन्हीं अवधारणाओं का आधुनिक काव्यात्मक पुनर्पाठ प्रस्तुत करती है।

भारतीय संगीत-दर्शन का आधार यह विश्वास है कि संगीत का उद्गम मनुष्य से पहले है। मनुष्य संगीत का निर्माता नहीं, उसका खोजी और साधक है। इसी विश्वास को बाद की परंपरा में ‘नाद-ब्रह्म’ की अवधारणा के रूप में विकसित किया गया। इसका आशय यह नहीं कि प्रत्येक ध्वनि अपने-आप में आध्यात्मिक है, बल्कि यह कि समस्त सृष्टि मूलतः स्पंदनशील है और संगीत उसी सार्वभौमिक स्पंदन का कलात्मक रूप है। ‘असाध्य वीणा’ का पूरा विन्यास इसी विचार को नए ढंग से सामने लाता है।

प्रियंवद जब वीणा के सामने बैठता है, तब वह संगीत उत्पन्न करने की तैयारी नहीं करता। वह पहले सुनने की तैयारी करता है। यह क्रम भारतीय संगीत-दर्शन की दृष्टि से बहुत अर्थपूर्ण है। यहाँ सुनना, बजाने से पहले आता है। इसका कारण यह है कि संगीत को बाहर निर्मित करने से पहले भीतर ग्रहण करना आवश्यक है। भारतीय संगीत की परंपरा में गुरु शिष्य से पहले श्रवण की अपेक्षा करता है, क्योंकि बिना श्रवण के स्वर केवल ध्वनि रह जाता है, संगीत नहीं बनता। प्रियंवद की साधना इसी श्रवण से आरंभ होती है।

इसीलिए उसकी स्मृति में सबसे पहले प्रकृति की ध्वनियाँ आती हैं। वर्षा, झरना, पक्षी, पत्तियाँ, ओस, हवा, पशु, पर्वत, नदी, बादल—ये सब मिलकर एक ऐसे संसार का निर्माण करते हैं जहाँ संगीत किसी मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं है। यह प्रकृति का अपना संगीत है। अज्ञेय इस बिंदु पर भारतीय संगीत-दृष्टि की उस परंपरा से जुड़ते हैं जिसमें प्रकृति को संगीत की पहली गुरु माना गया है। रागों का समय, ऋतुओं से उनका संबंध और पक्षियों की ध्वनियों से अनेक स्वरों की तुलना इसी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है। कविता इस परंपरा का उल्लेख नहीं करती, लेकिन उसकी संवेदना उसी भूमि पर खड़ी है।

भारतीय संगीत-दर्शन में ‘नाद’ को दो स्तरों पर समझा गया है—आहत नाद और अनाहत नाद। आहत नाद वह है जो किसी आघात से उत्पन्न होता है, जैसे तार, मृदंग या स्वरयंत्र से निकलने वाली ध्वनि। अनाहत नाद वह है जो किसी बाहरी टकराव से नहीं, बल्कि अस्तित्व की भीतरी स्पंदनशीलता से जुड़ा माना गया है। ‘असाध्य वीणा’ में यह विभाजन प्रत्यक्ष रूप से नहीं आता, किंतु पूरी कविता उसी दिशा में संकेत करती है।

प्रियंवद बार-बार अपने हाथ को रोकता है। वह वीणा पर आघात करने की जल्दी में नहीं है। उसका आग्रह इस बात पर है कि संगीत बाहर से उत्पन्न न हो, भीतर से प्रकट हो। जब अंततः संगीत अवतरित होता है, तब उसका वर्णन इस प्रकार किया जाता है कि वह किसी कौशल का परिणाम नहीं लगता। वह स्वयंभू है। इस प्रकार कविता आहत ध्वनि से आगे बढ़कर उस अनाहत नाद की ओर संकेत करती है जो भारतीय संगीत और योग-दर्शन दोनों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।

यहाँ ‘स्वयंभू’ शब्द का विशेष महत्त्व है। यदि संगीत कलाकार की तकनीक का परिणाम होता, तो वह अर्जित उपलब्धि होता। लेकिन कविता उसे स्वयंभू कहती है। इसका अर्थ यह है कि कलाकार ने संगीत का निर्माण नहीं किया; उसने केवल उसके प्रकट होने की परिस्थितियाँ निर्मित कीं। यह दृष्टि भारतीय संगीत-परंपरा में साधना की अवधारणा से जुड़ती है। साधना का लक्ष्य संगीत को पैदा करना नहीं, अपने भीतर ऐसी ग्रहणशीलता विकसित करना है जिसमें संगीत स्वयं प्रकट हो सके।

भारतीय संगीत-परंपरा में ‘श्रुति’ का स्थान ‘स्वर’ से भी पहले है। श्रुति का सामान्य अर्थ सुनना नहीं है। वह वह सूक्ष्म ध्वनि-अंतर है जिसके आधार पर स्वर की शुद्धता संभव होती है। व्यापक सांस्कृतिक अर्थ में श्रुति का संबंध उस संवेदनशीलता से भी है जो सूक्ष्मतम कंपन को ग्रहण कर सके। ‘असाध्य वीणा’ में प्रियंवद का पूरा व्यक्तित्व इसी श्रुति का साधक दिखाई देता है।

वह प्रकृति की सबसे सूक्ष्म ध्वनियों को याद करता है। उसका ध्यान केवल गर्जना या प्रचंड ध्वनियों पर नहीं जाता। उसे ओस की बूँद, महुए का गिरना, घास की टूटन, दूर से आती ढोलक की थाप और जल की महीन गति भी सुनाई देती है। यह केवल प्रकृति-प्रेम नहीं है। यह ऐसी श्रवण-संवेदना है जो संगीत की भारतीय अवधारणा का मूल आधार है। जिसने सूक्ष्म ध्वनियों को नहीं सुना, वह बड़े संगीत का अधिकारी भी नहीं हो सकता। अज्ञेय इस सत्य को किसी सिद्धांत की तरह नहीं कहते; वे उसे प्रियंवद की चेतना में घटित करते हैं।

इसी संदर्भ में ‘स्वर’ की अवधारणा भी नए अर्थ ग्रहण करती है। भारतीय संगीत में स्वर केवल निश्चित आवृत्ति वाली ध्वनि नहीं है। वह जीवित अनुभव है। प्रत्येक स्वर का अपना स्वभाव, अपना रंग और अपनी भाव-संभावना होती है। ‘असाध्य वीणा’ में स्वर भी किसी तकनीकी इकाई की तरह उपस्थित नहीं है। वह जीवन के अनुभव से उत्पन्न होता है। इसीलिए जब संगीत जन्म लेता है, तो वह प्रत्येक श्रोता के भीतर अलग रूप ग्रहण करता है। यदि स्वर केवल गणितीय संरचना होता, तो उसका प्रभाव सब पर समान होता। लेकिन कविता यह दिखाती है कि संगीत का वास्तविक स्वर तब पूरा होता है जब वह श्रोता की चेतना से संवाद करता है।

भारतीय संगीत-दर्शन में रियाज़ और साधना के बीच भी अंतर किया गया है। रियाज़ तकनीकी दक्षता का विकास करता है, जबकि साधना व्यक्ति के भीतर परिवर्तन लाती है। ‘असाध्य वीणा’ का सबसे बड़ा आग्रह इसी अंतर पर है। राजसभा के सभी बड़े कलाकार असफल हो चुके हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि वे संगीत नहीं जानते थे। उनकी असफलता का कारण यह है कि उनके पास कौशल था, पर वह आंतरिक साधना नहीं थी जो कलाकार को अपने अहं से मुक्त करती है।

प्रियंवद का सबसे बड़ा गुण उसका कौशल नहीं, उसकी विनम्रता है। वह स्वयं को कलाकार से पहले शिष्य कहता है। यह शब्द भारतीय संगीत-परंपरा में गहरा अर्थ रखता है। शिष्य होना केवल सीखने की अवस्था नहीं है; वह एक मानसिक अनुशासन है जिसमें व्यक्ति अपने ज्ञान को अंतिम नहीं मानता। भारतीय संगीत का गुरु-शिष्य संबंध इसी आधार पर टिका है। ज्ञान केवल तकनीक का हस्तांतरण नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि का संस्कार भी है। प्रियंवद इसी अर्थ में शिष्य है।

वज्रकीर्ति का चरित्र भी भारतीय संगीत-दर्शन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। उसने वीणा बनाई नहीं, अपने जीवन को उसमें रूपांतरित कर दिया। भारतीय संगीत-परंपरा में अनेक वाद्यों और घरानों का विकास इसी दीर्घ साधना से हुआ है। अज्ञेय इस ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख नहीं करते, लेकिन वज्रकीर्ति के माध्यम से यह दिखाते हैं कि श्रेष्ठ कलाकृति केवल कौशल से नहीं बनती; उसमें रचनाकार का समय, श्रम और जीवन समाया रहता है। इसलिए प्रियंवद उस वीणा पर अधिकार नहीं जताता। वह पहले उस साधना का सम्मान करता है जो उसमें निहित है।

भारतीय संगीत की एक और बड़ी ख़ासियत यह है कि इसमें मौन का उतना ही महत्त्व है जितना स्वर का। किसी भी राग की अभिव्यक्ति केवल स्वरों से नहीं होती; स्वरों के बीच के विराम भी उसके अर्थ का हिस्सा होते हैं। यदि विराम समाप्त कर दिए जाएँ, तो संगीत केवल ध्वनियों की निरंतरता रह जाएगा। ‘असाध्य वीणा’ में यह मौन संगीत की आत्मा बन जाता है।

प्रियंवद का मौन, सभा का मौन, संगीत से पहले का मौन, संगीत के बाद का मौन और अंत में कवि का मौन—ये सब बताते हैं कि अज्ञेय के लिए मौन निष्क्रियता नहीं है। वही संगीत की सबसे बड़ी तैयारी है। संगीत मौन का विरोध नहीं करता; वह उसी से जन्म लेता है और उसी में लौट जाता है। भारतीय संगीत के अनुभवी कलाकार प्रायः कहते हैं कि जो नहीं बजाया गया, वह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना जो बजाया गया। ‘असाध्य वीणा’ इसी अनुभव को काव्य में रूपांतरित करती है।

कविता में कलाकार की अवधारणा भी भारतीय संगीत-दर्शन से गहरे जुड़ती है। भारतीय परंपरा में श्रेष्ठ कलाकार वह नहीं माना गया जो अपने कौशल का प्रदर्शन करे, बल्कि वह जो स्वयं को साधकर संगीत का माध्यम बन सके। इसी कारण बड़े संगीतज्ञ प्रायः अपने गायन या वादन को ईश्वर, गुरु या परंपरा की देन मानते रहे हैं। प्रियंवद जब श्रेय लेने से इंकार करता है, तब उसका कथन इसी सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ता है। उसका आशय केवल विनम्रता नहीं है। वह सचमुच मानता है कि संगीत का स्रोत उससे बड़ा है। उसने केवल अपने भीतर वह रिक्तता बनाई जिसमें संगीत प्रकट हो सका।

यहीं भारतीय संगीत-दर्शन और अज्ञेय की आधुनिक काव्य-दृष्टि का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। अज्ञेय कलाकार को अलौकिक प्रतिभा का स्वामी नहीं बनाते। वे उसे माध्यम बनाते हैं। लेकिन यह माध्यम निष्क्रिय नहीं है। उसके लिए कठोर साधना, आत्म-अनुशासन, गहरी संवेदनशीलता और प्रकृति के साथ जीवंत संबंध आवश्यक है। इसलिए कविता में साधना और सृजन अलग-अलग प्रक्रियाएँ नहीं हैं। सृजन साधना की परिणति है।

इस कविता में संगीत और प्रकृति का संबंध भी भारतीय संगीत की सांस्कृतिक स्मृति से जुड़ता है। भारतीय रागों का संबंध समय, ऋतु और प्रकृति से रहा है। संगीत को प्रकृति के विरुद्ध नहीं, उसकी लय के साथ विकसित होने वाली कला माना गया। ‘असाध्य वीणा’ में भी संगीत किसी बंद कक्ष की वस्तु नहीं है। वह जंगल, पर्वत, वर्षा, हवा, पशु-पक्षियों और ऋतुओं से निर्मित होता है। इस प्रकार संगीत मानव-केंद्रित कला न रहकर समस्त जीवन का उत्सव बन जाता है।

कविता का अंतिम कथन—कि जो सुना गया वह न कलाकार का था, न वीणा का—भारतीय संगीत-दर्शन की दृष्टि से भी बहुत अर्थपूर्ण है। संगीत यदि नाद का रूप है, तो कलाकार उसका स्वामी नहीं हो सकता। वह केवल उस नाद का संवाहक हो सकता है। इसी कारण अज्ञेय कलाकार की प्रतिष्ठा उसके अधिकार में नहीं, उसके आत्म-विसर्जन में देखते हैं।

इस प्रकार ‘असाध्य वीणा’ भारतीय संगीत-दर्शन की अनेक आधारभूत अवधारणाओं—नाद, श्रुति, स्वर, साधना, मौन, गुरु-शिष्य परंपरा, कलाकार की विनम्रता और संगीत की सार्वभौमिकता—को आधुनिक काव्य में नए ढंग से रूपायित करती है। यह कविता संगीत के बारे में नहीं है; यह संगीत की तरह सोचने और जीने की कविता है। इसमें संगीत ध्वनि नहीं, चेतना है; वादन नहीं, साधना है; कौशल नहीं, आत्म-परिवर्तन है। इसी कारण यह रचना भारतीय संगीत-संवेदना की सबसे गहरी आधुनिक काव्याभिव्यक्तियों में गिनी जा सकती है।

निवेदन यह है कि ‘असाध्य वीणा’ में संगीत कोई बाह्य ध्वनि या कौशल नहीं, बल्कि चेतना, साधना और आत्म-परिवर्तन का माध्यम है जो कला के माध्यम से व्यक्ति को उसके अहं से मुक्त कर समष्टि से जोड़ता है। संगीत का यही गहरे रूपांतरण और खोई हुई चेतना को जगाने वाला दर्शन हमें महाकवि कालिदास रचित अभिज्ञानशाकुन्तलम्  के पंचम अंक में राजा दुष्यंत के आत्मबोध में भी दिखाई देता है। जब दुष्यंत हंसपदिका का संगीत सुनते हैं, तो बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के उनका मन व्याकुल हो उठता है और वे एक गहरे अंतर्बोध व विस्मृत स्मृति के कगार पर आ खड़े होते हैं। इसी भाव को कालिदास ने अपने सुप्रसिद्ध छंद में पिरोया है:

रम्याणि वीक्ष्य मधुरांश्च निशम्य शब्दान्।

पर्युत्सुकीभवति यत्सुखितोऽपि जन्तुः॥

तच्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्वम्।

भावस्थिराणि जननान्तरसौहृदानि॥

(सुंदर वस्तुओं को देखकर और मधुर शब्दों (संगीत) को सुनकर सुखी व्यक्ति भी जो उत्कंठित या व्याकुल हो उठता है; वहाँ निश्चय ही वह अपने अंतःकरण में संस्कार रूप से स्थिर पूर्वजन्मों के (या अतीत के) उन प्रेम-संबंधों को अचेतन रूप से स्मरण करता है, जो इस जन्म में प्रत्यक्ष रूप से याद नहीं हैं।)

जिस प्रकार ‘असाध्य वीणा’ में प्रियंवद स्वयं को शून्य में विलीन कर, किरीटी-तरु की विराटता के सम्मुख पूर्ण विनम्रता के साथ आत्म-समर्पण करता है तब जाकर वीणा से वह ‘अनहद नाद’ प्रस्फुटित होता है जो श्रोताओं को उनकी अपनी-अपनी चेतना के अनुसार सत्य का साक्षात्कार कराता है; ठीक उसी प्रकार हंसपदिका का संगीत दुष्यंत के भीतर जड़ हो चुके राजसी अहं और शकुंतला की विस्मृत स्मृति (श्राप के कारण खोई चेतना) के बीच एक सेतु का कार्य करता है। यह संगीत केवल कर्णप्रिय ध्वनि नहीं है, बल्कि ‘नाद’ और ‘मौन’ का वह गहरा रसायन है जो दुष्यंत को उनकी सतही सुख-सुविधाओं से ऊपर उठाकर ‘भावस्थिराणि’—अर्थात् आत्मा की गहराई में दबे सनातन सत्यों और संबंधों से रूबरू कराता है। दोनों ही रचनाओं में संगीत एक ऐसी सार्वभौमिक चेतना के रूप में उभरता है जहाँ वादन कौशल समाप्त हो जाता है और केवल शुद्ध आत्म-परिवर्तन शेष रहता है, जो मनुष्य को उसकी विस्मृत मूल चेतना की ओर वापस ले जाता है।

‘असाध्य वीणा’ को यदि पारिस्थितिक आलोचना की दृष्टि से पढ़ा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल प्रकृति का सुंदर चित्रण करने वाली कविता नहीं है। प्रकृति यहाँ दृश्य-सौंदर्य का विषय नहीं है और न ही मनुष्य की भावनाओं की पृष्ठभूमि भर है। पूरी कविता में प्रकृति एक जीवित, सक्रिय और स्वायत्त उपस्थिति के रूप में सामने आती है। यही वह बिंदु है जहाँ यह कविता आधुनिक पारिस्थितिक चिंतन से गहरे स्तर पर जुड़ती दिखाई देती है। अज्ञेय ने यह कविता उस समय लिखी थी जब पारिस्थितिक आलोचना साहित्यिक अध्ययन की स्थापित पद्धति भी नहीं बनी थी, फिर भी उनकी रचनात्मक दृष्टि में प्रकृति को लेकर जो संवेदनात्मक और दार्शनिक गहराई है, वह आज के पर्यावरणीय विमर्श के साथ उल्लेखनीय साम्य रखती है।

पारिस्थितिक आलोचना का एक मूल आग्रह यह है कि साहित्य में प्रकृति को केवल मनुष्य की आवश्यकताओं या भावनाओं के संदर्भ में न देखा जाए। लंबे समय तक साहित्य में प्रकृति या तो सौंदर्य का स्रोत रही, या मनुष्य की मनःस्थिति का प्रतीक, या संसाधन। पारिस्थितिक आलोचना इस मनुष्य-केंद्रित दृष्टि पर प्रश्न उठाती है। ‘असाध्य वीणा’ की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह प्रारंभ से ही प्रकृति को मनुष्य के अधीन नहीं रखती। किरीटी-तरु का वर्णन करते समय उसका मूल्य इस आधार पर निर्धारित नहीं किया जाता कि वह मनुष्य के किस काम आता है। उसका अपना जीवन है, अपना इतिहास है, अपनी स्मृति है और अपना स्वतंत्र अस्तित्व है। उसके साथ बादल, हिमालय, नाग, भालू, सिंह, पक्षी, वर्षा और ऋतुएँ एक साझा जीवन-व्यवस्था बनाते हैं। वृक्ष किसी एक प्रजाति का नहीं, पूरे जीवन-जगत का आश्रय है।

यहीं कविता आधुनिक पारिस्थितिकी की उस अवधारणा के निकट पहुँचती है जिसमें पृथ्वी को परस्पर संबद्ध जीवन-तंत्र के रूप में देखा जाता है। किरीटी-तरु अकेला नहीं है। उसकी जड़ें पाताल तक जाती हैं, उसकी शाखाएँ बादलों को स्पर्श करती हैं, उसकी छाया में जीव-जगत पलता है और उसकी लकड़ी से बनी वीणा में भी उसका जीवन बना रहता है। इस प्रकार वृक्ष जैविक, भौगोलिक और सांस्कृतिक तीनों स्तरों पर संबंधों का केंद्र बन जाता है। यह दृष्टि आधुनिक पारिस्थितिकी की उस समझ से मेल खाती है जिसके अनुसार किसी जीव या वस्तु को उसके संबंधों से काटकर नहीं समझा जा सकता।

डीप इकोलॉजी का प्रतिपादन करने वाले आर्ने नेस ने मनुष्य और प्रकृति के बीच संबंध को मूलतः समानता और सह-अस्तित्व के आधार पर समझने का आग्रह किया था। इस दृष्टि के अनुसार मनुष्य किसी उच्चतर प्राणी के रूप में प्रकृति का स्वामी नहीं है। वह उसी जीवन-जाल का एक अंग है जिसका हिस्सा अन्य सभी जीव भी हैं। ‘असाध्य वीणा’ का पूरा काव्य-विन्यास इसी दिशा में जाता है।

प्रियंवद जब किरीटी-तरु के सामने उपस्थित होता है, तब उसके भीतर कहीं भी अधिकार का भाव नहीं है। वह वृक्ष को केवल उस पदार्थ के रूप में नहीं देखता जिससे वीणा बनी है। वह उसे गुरु, मित्र, आश्रय और पिता के रूप में संबोधित करता है। इन संबोधनों का अर्थ भावुकता नहीं है। इनके माध्यम से मनुष्य और प्रकृति के बीच शक्ति-संबंध बदल जाता है। आधुनिक सभ्यता में मनुष्य स्वयं को प्रकृति का स्वामी मानता है। प्रियंवद स्वयं को वृक्ष का शिष्य मानता है। यही परिवर्तन इस कविता की पारिस्थितिक चेतना का मूल आधार है।

‘डीप इकोलॉजी’ यह भी मानती है कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके व्यक्तिगत अहं तक सीमित नहीं रहती। वह धीरे-धीरे विस्तृत होकर समूची प्रकृति के साथ एक व्यापक आत्मीयता स्थापित करती है। आर्ने नेस ने इसे ‘इकोलोजिकल सेल्फ’ (Ecological Self) कहा था। ‘असाध्य वीणा’ में प्रियंवद की साधना इसी विस्तार की यात्रा है। पहले वह अपने व्यक्तिगत अस्तित्व से जुड़ा है। फिर वह वृक्ष के अनुभव में प्रवेश करता है। उसके बाद वह जंगल, ऋतुओं, पक्षियों, जल, पर्वत और समूची प्रकृति की स्मृतियों से भर जाता है। अंततः उसका निजी ‘मैं’ पीछे हट जाता है और उसकी चेतना व्यापक जीवन-व्यवस्था का हिस्सा बन जाती है। यह अनुभव डीप इकोलॉजी के उस विचार से गहरा साम्य रखता है जिसमें आत्म की सीमाएँ प्रकृति तक फैल जाती हैं।

इस कविता में प्रकृति केवल दृश्य नहीं है; वह स्मृति भी है। प्रियंवद की स्मृतियों में प्रकृति का कोई स्थिर चित्र नहीं मिलता। वहाँ ध्वनियाँ हैं, गंध हैं, स्पर्श हैं, ऋतुओं का परिवर्तन है, जल का प्रवाह है, मिट्टी का ताप है, पक्षियों का जीवन है, पशुओं की गतियाँ हैं। इसका अर्थ यह है कि प्रकृति को केवल आँखों से नहीं, संपूर्ण इंद्रियबोध से अनुभव किया गया है। पारिस्थितिक आलोचना इस बात पर बल देती है कि मनुष्य प्रकृति को वस्तु की तरह नहीं, संबंध की तरह अनुभव करे। अज्ञेय का पूरा काव्य-शिल्प इसी अनुभव को संभव बनाता है।

इस कविता का एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि यहाँ प्रकृति का रोमानीकरण नहीं किया गया है। प्रकृति केवल फूलों, पत्तियों और हरियाली तक सीमित नहीं है। उसमें आँधी है, ओले हैं, टूटते हुए वृक्ष हैं, गिरती हुई चट्टानें हैं, बाढ़ है, पाला है और कठोर ऋतु-परिवर्तन भी है। यह संतुलन बहुत महत्त्वपूर्ण है। अज्ञेय प्रकृति को केवल सौंदर्य का पर्याय नहीं बनाते। वे उसे उसकी संपूर्णता में स्वीकार करते हैं। पारिस्थितिक दृष्टि से यही परिपक्वता है, क्योंकि प्रकृति केवल मनुष्य को सुख देने वाली सत्ता नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र प्रक्रियाओं से संचालित जीवित व्यवस्था है।

उत्तर-मानववाद (पोस्ट-हुमनिज्म) की दृष्टि से यह कविता और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। उत्तर-मानववाद आधुनिक पश्चिमी चिंतन की उस मनुष्य-केंद्रित परंपरा की आलोचना करता है जिसमें मनुष्य को समस्त सृष्टि का केंद्र और शिखर माना गया। इस दृष्टि के अनुसार संसार का अर्थ केवल मनुष्य के अनुभव से निर्धारित नहीं किया जा सकता। पशु, वनस्पति, जल, पर्वत और निर्जीव प्रतीत होने वाली वस्तुओं की भी अपनी सक्रिय उपस्थिति है।

‘असाध्य वीणा’ में मनुष्य कभी भी अंतिम केंद्र नहीं बनता। कथा का केंद्र धीरे-धीरे प्रियंवद से हटकर किरीटी-तरु पर आ जाता है। फिर वह भी प्रकृति की व्यापक चेतना में विलीन हो जाता है। यहाँ वृक्ष केवल पृष्ठभूमि नहीं है। वही अनुभव का मूल स्रोत है। वीणा की शक्ति भी वृक्ष से आती है। प्रियंवद का ज्ञान भी उसी से विकसित होता है। इस प्रकार मनुष्य ज्ञान का एकमात्र उत्पादक नहीं रह जाता। ज्ञान प्रकृति से प्राप्त होता है।

उत्तर-मानववाद का एक महत्त्वपूर्ण विचार यह भी है कि वस्तुएँ निष्क्रिय नहीं होतीं। उनमें भी सक्रियता होती है। आधुनिक दार्शनिक जेन बेनेट ने इसे ‘वाइब्रेंट मैटर’ (Vibrant Matter) कहा है। ‘असाध्य वीणा’ में यह विचार अद्भुत रूप से उपस्थित है। वीणा निर्जीव वस्तु नहीं रहती। वह जागती है, उसके भीतर संगीत प्रकट होता है और वह स्वयं एक जीवित सत्ता की तरह व्यवहार करती है। इसका अर्थ यह नहीं कि कविता वस्तुओं का मानवीकरण कर रही है। बल्कि वह यह संकेत देती है कि मनुष्य और वस्तु के बीच का संबंध उतना सरल नहीं है जितना आधुनिक यांत्रिक दृष्टि मानती रही है।

यही बात किरीटी-तरु पर भी लागू होती है। वृक्ष काट दिए जाने के बाद भी समाप्त नहीं होता। उसका जीवन वीणा में बना रहता है। उसका इतिहास, उसकी स्मृति और उसकी चेतना उसी के भीतर प्रवाहित होती रहती है। इस प्रकार पदार्थ और जीवन के बीच कठोर विभाजन भी टूट जाता है। उत्तर-मानववादी अध्ययन के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण बिंदु है।

कविता में पशु-पक्षियों की उपस्थिति भी उल्लेखनीय है। वे सजावट के लिए नहीं आए हैं। भालू, सिंह, पक्षी, नाग, मृग, जल-पक्षी, कीट, सब अपने-अपने स्वाभाविक जीवन में उपस्थित हैं। कविता उन्हें मनुष्य की दृष्टि से परिभाषित नहीं करती। वे अपने जीवन के साथ उपस्थित हैं। इससे स्पष्ट होता है कि अज्ञेय की दृष्टि में जैव-विविधता केवल पृष्ठभूमि नहीं, अस्तित्व की मूल संरचना है।

पारिस्थितिक आलोचना का एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न है—क्या मनुष्य प्रकृति को सुन सकता है? आधुनिक सभ्यता में मनुष्य प्रायः प्रकृति पर बोलता है, उसके लिए निर्णय करता है, उसका उपयोग करता है। ‘असाध्य वीणा’ इस संबंध को उलट देती है। प्रियंवद बोलने से पहले सुनता है। वह चाहता है कि वृक्ष स्वयं गाए। यह परिवर्तन केवल काव्यात्मक नहीं, नैतिक भी है। प्रकृति को सुनना, उसे अपने से निम्न न मानना, उसकी अपनी भाषा को स्वीकार करना—ये सब आधुनिक पर्यावरणीय नैतिकता के केंद्रीय आग्रह हैं।

यहाँ कला और पारिस्थितिकी का संबंध भी नया रूप ग्रहण करता है। वीणा प्रकृति पर मनुष्य की विजय का प्रतीक नहीं है। यदि ऐसा होता, तो प्रियंवद उसे अपने कौशल से जीत लेता। लेकिन कविता यह दिखाती है कि कला तभी सार्थक होती है जब वह अपने स्रोत—प्रकृति—के प्रति विनम्र रहे। कलाकार प्रकृति से सामग्री लेकर उस पर अधिकार स्थापित नहीं करता; वह उसके भीतर निहित जीवन का सम्मान करता है। इस अर्थ में अज्ञेय कला को भी पारिस्थितिक नैतिकता से जोड़ते हैं।

इस कविता में समय की अवधारणा भी पर्यावरणीय दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। आधुनिक उपभोक्तावादी दृष्टि तात्कालिक उपयोग पर आधारित होती है, जबकि यहाँ किरीटी-तरु का जीवन शताब्दियों में फैला हुआ है। वज्रकीर्ति एक पूरा जीवन वीणा के निर्माण में लगा देता है। प्रियंवद भी तात्कालिक सफलता नहीं चाहता। इस प्रकार कविता हमें धीमे समय (Deep Time) का बोध कराती है। पर्यावरणीय चिंतन में यह विचार आज बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि प्रकृति का समय मनुष्य की तत्कालिक इच्छाओं से कहीं अधिक विस्तृत होता है।

फिर भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ‘असाध्य वीणा’ को केवल पारिस्थितिक कविता कहना पर्याप्त नहीं होगा। प्रकृति यहाँ पर्यावरणीय संकट का विषय नहीं है। कविता प्रदूषण, विनाश या संरक्षण की प्रत्यक्ष चर्चा नहीं करती। उसका सरोकार इससे अधिक गहरा है। वह मनुष्य और प्रकृति के संबंध की मूल चेतना को बदलना चाहती है। अज्ञेय का संकेत यह है कि जब तक मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग और श्रेष्ठ मानता रहेगा, तब तक उसका संबंध भी उपयोग और अधिकार का रहेगा। लेकिन जैसे ही वह स्वयं को व्यापक जीवन-व्यवस्था का एक अंग अनुभव करेगा, उसका व्यवहार भी बदल जाएगा।

यही कारण है कि ‘असाध्य वीणा’ आज के समय में पहले से अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है। जलवायु संकट, जैव-विविधता के क्षरण और प्रकृति के निरंतर दोहन के दौर में यह कविता किसी पर्यावरणीय घोषणापत्र की तरह नहीं, बल्कि एक गहरे सांस्कृतिक आत्मपरीक्षण की तरह सामने आती है। वह यह नहीं सिखाती कि प्रकृति को कैसे बचाया जाए; वह यह सिखाती है कि प्रकृति के साथ कैसे रहा जाए। उसका मूल आग्रह संरक्षण नहीं, सह-अस्तित्व है; स्वामित्व नहीं, संवाद है; उपयोग नहीं, सहभागिता है। इसी कारण ‘असाध्य वीणा’ आधुनिक पारिस्थितिक आलोचना, डीप इकोलॉजी और उत्तर-मानववादी चिंतन की दृष्टि से पढ़े जाने पर एक ऐसी कविता के रूप में सामने आती है जो अपने समय से आगे जाकर मनुष्य और प्रकृति के संबंध की नई नैतिकता का संकेत देती है।

‘असाध्य वीणा’ आधुनिक हिंदी कविता की उन दुर्लभ रचनाओं में है जिन्हें आधुनिक साहित्यिक सिद्धांतों की दृष्टि से पढ़ने पर बार-बार नए अर्थ प्राप्त होते हैं। यह कविता केवल कथात्मक नहीं है, केवल प्रतीकात्मक भी नहीं है और केवल दार्शनिक भी नहीं है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका अर्थ किसी एक स्तर पर स्थिर नहीं रहता। पाठक जितनी बार कविता के भीतर प्रवेश करता है, उतनी बार उसके अर्थ की नई परतें खुलती हैं। यही कारण है कि प्रतीकवाद, संरचनावाद, उत्तर-संरचनावाद और पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत—ये सभी दृष्टियाँ इस कविता को समझने में विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होती हैं।

सबसे पहले प्रतीकवादी दृष्टि पर विचार करना ज़रूरी है। आधुनिक प्रतीकवाद का मूल विश्वास यह है कि कविता का सत्य प्रत्यक्ष कथन में नहीं, प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त होता है। प्रतीक किसी विचार का संकेत भर नहीं होता; वह अपने भीतर अनेक अर्थों की संभावनाएँ समेटे रहता है। उसका अर्थ निश्चित नहीं होता, बल्कि वह पाठक की चेतना में क्रमशः विकसित होता है। ‘असाध्य वीणा’ की पूरी रचना-प्रक्रिया इसी प्रकार के प्रतीकों पर आधारित है।

इस कविता का सबसे केंद्रीय प्रतीक वीणा है। यदि उसे केवल एक वाद्य मानकर पढ़ा जाए, तो कविता का अधिकांश अर्थ नष्ट हो जाएगा। वीणा एक साथ कई स्तरों पर अर्थ ग्रहण करती है। वह कला है, साधना है, परंपरा है, स्मृति है, सृजन की कठिन प्रक्रिया है और कलाकार तथा अस्तित्व के बीच संवाद का माध्यम भी है। इन सभी अर्थों में से कोई भी अकेला पर्याप्त नहीं है। कविता इन सबको एक साथ सक्रिय रखती है।

इसी प्रकार किरीटी-तरु भी केवल वृक्ष नहीं है। वह समय की दीर्घता, प्रकृति की समग्रता, जीवन की निरंतरता और उस मौलिक स्रोत का प्रतीक है जहाँ से सृजन की ऊर्जा उत्पन्न होती है। उसकी जड़ों का पाताल तक पहुँचना और शिखर का हिमालय से जुड़ना केवल अलंकारिक विस्तार नहीं है। यह वृक्ष को ब्रह्मांडीय आयाम प्रदान करता है। इस प्रकार वह धरती, आकाश और अधोलोक को जोड़ने वाली सत्ता बन जाता है।

प्रियंवद का चरित्र भी प्रतीकात्मक है। वह किसी ऐतिहासिक व्यक्ति का चित्र नहीं है। वह साधक-कलाकार का प्रतीक है, किंतु उससे भी अधिक वह उस मनुष्य का प्रतीक है जो अपने सीमित अहं से मुक्त होकर व्यापक जीवन के साथ संवाद स्थापित करना चाहता है। इसलिए उसकी यात्रा व्यक्तिगत कथा नहीं रहती; वह सृजन की सार्वभौमिक प्रक्रिया का रूप ग्रहण कर लेती है।

मौन इस कविता का सबसे सूक्ष्म प्रतीक है। सामान्यतः मौन को ध्वनि का अभाव माना जाता है, लेकिन अज्ञेय के यहाँ मौन सृजन की मूल अवस्था है। वह रिक्तता नहीं, संभावनाओं से भरा हुआ क्षेत्र है। संगीत उसी से जन्म लेता है और उसी में लौट जाता है। इस प्रकार मौन ध्वनि का विरोध नहीं करता; वह उसका आधार बन जाता है।

शून्य और महाशून्य भी प्रतीक के रूप में इसी बहुस्तरीयता को व्यक्त करते हैं। उन्हें केवल बौद्ध दर्शन के संदर्भ में सीमित नहीं किया जा सकता। वे अहं के लोप, आत्म-समर्पण, सृजन की रिक्त तैयारी और अस्तित्व की व्यापकता—इन सभी अर्थों को एक साथ सक्रिय रखते हैं। प्रतीकवादी दृष्टि की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह किसी प्रतीक का एकमात्र अर्थ निर्धारित नहीं करती। ‘असाध्य वीणा’ इसी अर्थ में आधुनिक प्रतीकात्मक कविता की परिपक्व उपलब्धि है।

अगर संरचनावादी दृष्टि से कविता को देखें, तो उसका केंद्र प्रतीकों के अलग-अलग अर्थों में नहीं, बल्कि उनके पारस्परिक संबंधों में दिखाई देता है। संरचनावाद का आग्रह यह है कि किसी रचना का अर्थ उसके एक-एक तत्व में नहीं, बल्कि संपूर्ण संरचना में निहित होता है। प्रत्येक तत्व दूसरे तत्वों के साथ संबंध बनाकर ही अर्थ ग्रहण करता है।

‘असाध्य वीणा’ की संरचना कई द्वंद्वात्मक युग्मों पर निर्मित है। राजसभा और वन, सत्ता और साधना, कलाकार और साधक, ध्वनि और मौन, व्यक्ति और समष्टि, प्रकृति और संस्कृति, कौशल और समर्पण, इतिहास और मिथक—ये सभी युग्म पूरी कविता में सक्रिय रहते हैं।

लेकिन संरचनात्मक दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि कविता इनमें से किसी भी युग्म को स्थिर नहीं रहने देती। राजसभा और वन एक-दूसरे के विरोधी नहीं रहते। साधना वन में प्रारंभ होती है, लेकिन उसका फल राजसभा में प्रकट होता है। इसी प्रकार कलाकार और साधक भी अलग-अलग नहीं रहते। प्रियंवद का कलाकार होना तभी सार्थक होता है जब वह साधक बनता है।

ध्वनि और मौन का संबंध भी संरचनात्मक दृष्टि से उल्लेखनीय है। सामान्यतः दोनों को विरोधी माना जाता है, किंतु कविता उन्हें परस्पर निर्भर अवस्थाओं के रूप में प्रस्तुत करती है। मौन ध्वनि को जन्म देता है और ध्वनि पुनः मौन में विलीन हो जाती है। इस प्रकार कविता विरोधों को बनाए रखते हुए भी उन्हें उच्चतर स्तर पर जोड़ देती है।

पूरी कथा की संरचना भी ध्यान देने योग्य है। आरंभ में बाहरी संसार है, फिर भीतर की यात्रा आरंभ होती है, फिर संगीत जन्म लेता है, फिर बाहर की दुनिया में उसका प्रभाव दिखाई देता है और अंत में फिर मौन लौट आता है। यह संरचना वृत्ताकार है, किंतु वह प्रारंभिक स्थिति में वापस नहीं लौटती। अंत का मौन आरंभ के मौन से भिन्न है। उसके भीतर अनुभव की संपूर्ण यात्रा समाई हुई है। यही संरचनात्मक विकास कविता को आंतरिक एकता प्रदान करता है।

उत्तर-संरचनावाद इस संरचनात्मक स्थिरता पर प्रश्न उठाता है। देरिदा और अन्य उत्तर-संरचनावादी चिंतकों ने यह दिखाया कि अर्थ कभी पूरी तरह स्थिर नहीं होता। प्रत्येक पाठ अपने भीतर ऐसे अंतराल और तनाव रखता है जो किसी अंतिम निष्कर्ष को असंभव बना देते हैं। ‘असाध्य वीणा’ इस दृष्टि से भी असाधारण रूप से समृद्ध कविता है।

पूरी कविता बार-बार अपने ही कथनों का संशोधन करती है। पहले ऐसा लगता है कि प्रियंवद वीणा को साधने आया है। फिर स्पष्ट होता है कि वह स्वयं को साध रहा है। फिर यह भी पर्याप्त नहीं रह जाता, क्योंकि अंत में वह कहता है कि उसने कुछ साधा ही नहीं; वह तो स्वयं शून्य में डूब गया था। इस प्रकार अर्थ निरंतर बदलता रहता है।

इसी प्रकार कलाकार की अवधारणा भी स्थिर नहीं रहती। राजसभा उसे विजेता मानती है, लेकिन वह स्वयं उस पहचान को अस्वीकार कर देता है। इससे कविता का केंद्र उपलब्धि से हटकर समर्पण पर आ जाता है।

वीणा भी अपने प्रत्यक्ष अर्थ से लगातार दूर जाती है। वह वाद्य है, फिर स्मृति है, फिर वृक्ष का रूप है, फिर साधना का माध्यम है और अंत में स्वयं भी अंतिम स्रोत नहीं रह जाती। कलाकार और वाद्य दोनों पीछे हट जाते हैं, जबकि संगीत स्वयं स्वतंत्र सत्ता के रूप में उभरता है। उत्तर-संरचनावादी दृष्टि से यह अर्थ की स्थिरता का विघटन है।

सबसे रोचक बात यह है कि कविता का अंतिम निष्कर्ष भी किसी निश्चित सत्य की घोषणा नहीं करता। प्रियंवद यह नहीं कहता कि उसने सत्य प्राप्त कर लिया। वह केवल इतना कहता है कि जो कुछ हुआ, वह उसका नहीं था। इससे अर्थ फिर खुला रह जाता है। कविता किसी अंतिम दार्शनिक विधान पर समाप्त नहीं होती। उसका अंत भी पाठक के लिए नए प्रश्न छोड़ जाता है।

यहीं से पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत के तहत कविता पर विचार करने की दिशा में बढ़ा जा सकता है। आधुनिक साहित्यिक आलोचना में पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत (Reader-Response Theory) ने एक बुनियादी परिवर्तन उपस्थित किया है । इस सिद्धांत ने साहित्यिक कृति को लेखक की एकतरफा अभिव्यक्ति या आत्मनिर्भर वस्तु मानने के बजाय अर्थ-निर्माण की ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा जिसमें पाठक सक्रिय भूमिका निभाता है। इस दृष्टि के अनुसार किसी कृति का अर्थ पहले से पूर्ण रूप में उसमें सुरक्षित नहीं रहता, बल्कि पाठ और पाठक के बीच होने वाली सर्जनात्मक अंतःक्रिया में निर्मित होता है। अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ इस दृष्टि से आधुनिक हिंदी कविता की ऐसी रचना है जो पाठक-प्रतिक्रिया आलोचना की अनेक अवधारणाओं को आश्चर्यजनक रूप से मूर्त करती दिखाई देती है। उल्लेखनीय बात यह है कि अज्ञेय ने यह कविता उस समय लिखी थी जब यूरोप में पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत का व्यवस्थित विकास भी आरंभिक अवस्था में था। इसलिए यह समानता किसी प्रत्यक्ष प्रभाव का परिणाम नहीं, बल्कि गहरी कलात्मक अंतर्दृष्टि का परिचायक है।

जर्मन आलोचक हैंस रॉबर्ट याउस (Hans Robert Jauss) ने साहित्य को ग्रहण (Reception) की प्रक्रिया के रूप में समझते हुए ‘क्षितिज की अपेक्षा’ (Horizon of Expectations) की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार प्रत्येक पाठक अपने सांस्कृतिक अनुभव, ऐतिहासिक स्थिति, सामाजिक पृष्ठभूमि और पूर्व साहित्यिक संस्कारों के साथ किसी कृति के सामने उपस्थित होता है। इसलिए कोई भी कृति सभी पाठकों के लिए समान अर्थ नहीं रखती। उसका अर्थ प्रत्येक युग और प्रत्येक पाठकीय समुदाय में बदलता रहता है। ‘असाध्य वीणा’ का संगीत इसी सिद्धांत का काव्यात्मक रूपक बन जाता है। राजसभा में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति एक ही संगीत सुनता है, किंतु किसी को उसमें राज्यधर्म का आह्वान सुनाई देता है, किसी को प्रेम का आलोक, किसी को भूख की तृप्ति, किसी को श्रम की लय, किसी को युद्ध की गर्जना और किसी को जीवन का उल्लास। यह विविधता किसी भ्रम या गलत समझ का परिणाम नहीं है। कविता स्वयं इन सभी अनुभवों को समान वैधता प्रदान करती है। इस प्रकार अज्ञेय यह संकेत करते हैं कि कला का अनुभव श्रोता की चेतना के साथ मिलकर निर्मित होता है।

याउस की दृष्टि से इस प्रसंग का एक और अर्थ खुलता है। कविता केवल अपने भीतर अर्थ नहीं रखती; वह प्रत्येक पाठकीय क्षितिज को बदलती भी है। संगीत सुनने के बाद राजा वही व्यक्ति नहीं रह जाता जो संगीत से पहले था। रानी की दृष्टि भी बदल जाती है। सभा में उपस्थित लोगों की चेतना में भी परिवर्तन आता है। अर्थात कला केवल पाठक की पूर्व अपेक्षाओं की पुष्टि नहीं करती; वह उन्हें रूपांतरित भी करती है। याउस के अनुसार महान साहित्य वही है जो पाठक के ‘क्षितिज-अपेक्षा’ को विस्तृत कर दे। ‘असाध्य वीणा’ में संगीत का प्रभाव इसी परिवर्तनकारी शक्ति का प्रतीक है। वह प्रत्येक व्यक्ति को वहीं से संबोधित करता है जहाँ वह खड़ा है, लेकिन उसे वहीं छोड़ नहीं देता। वह उसकी चेतना में नया आयाम जोड़ता है।

जर्मन साहित्यिक सिद्धांतकार वोल्फगैंग आइज़र (Wolfgang Iser) ने पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत को एक और दिशा देते हुए ‘अभिप्रेत पाठक’ (Implied Reader) तथा ‘रिक्त स्थानों’ (Gaps या Blanks) की अवधारणा विकसित की। उनके अनुसार कोई भी साहित्यिक कृति अपने भीतर अनेक ऐसे अवकाश छोड़ती है जिन्हें पाठक अपनी कल्पना और अनुभव से भरता है। यही प्रक्रिया अर्थ-निर्माण का मूल आधार है। ‘असाध्य वीणा’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि कविता अपने प्रतीकों का कोई निश्चित अर्थ निर्धारित नहीं करती। वीणा क्या है? केवल वाद्य? साधना? कला? स्मृति? संस्कृति? किरीटी-तरु क्या है? प्रकृति? समय? ब्रह्मांडीय जीवन? मौन क्या है? रिक्तता? ध्यान? सृजन की पूर्वावस्था? कविता इन प्रश्नों के एकमात्र उत्तर नहीं देती। वह पाठक को इन अर्थों के बीच सक्रिय रूप से विचरण करने के लिए आमंत्रित करती है।

आइज़र का मानना था कि श्रेष्ठ कृतियाँ पाठक को निष्क्रिय उपभोक्ता नहीं बनने देतीं। वे उसे अर्थ-निर्माण में सहभागी बनाती हैं। ‘असाध्य वीणा’ का पूरा विन्यास इसी प्रकार का है। कविता अनेक बिंब प्रस्तुत करती है, लेकिन उनके बीच के संबंधों को पूरी तरह स्पष्ट नहीं करती। पाठक को स्वयं यह समझना पड़ता है कि वृक्ष, वीणा, साधना, संगीत और मौन एक-दूसरे से किस प्रकार जुड़े हुए हैं। इसी प्रक्रिया में पाठक स्वयं रचना का सह-निर्माता बन जाता है। इस अर्थ में कविता का प्रत्येक गंभीर पाठ एक नया पुनर्सृजन है।

आइज़र की एक और महत्त्वपूर्ण अवधारणा है कि पाठन एक गतिशील प्रक्रिया है जिसमें पहले पढ़े गए अंशों का अर्थ बाद के अंश बदल देते हैं। ‘असाध्य वीणा’ का पाठ भी इसी प्रकार आगे बढ़ता है। आरंभ में पाठक को लगता है कि कथा का केंद्र असाध्य वीणा है। कुछ आगे बढ़ने पर प्रतीत होता है कि केंद्र प्रियंवद की साधना है। फिर लगता है कि केंद्र किरीटी-तरु है। अंत में स्पष्ट होता है कि इन सबके पीछे संगीत भी अंतिम केंद्र नहीं है; उससे भी बड़ा वह अनुभव है जो कलाकार, वाद्य और श्रोता—सभी को पार कर जाता है। इस प्रकार पाठक को लगातार अपने पूर्व निष्कर्षों का संशोधन करना पड़ता है। यही वह गतिशील पाठकीय अनुभव है जिसकी ओर आइज़र संकेत करते हैं।

अमेरिकी साहित्यिक सिद्धांतकार स्टैनली फ़िश (Stanley Fish)ने पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत को और आगे बढ़ाते हुए यह प्रतिपादित किया कि अर्थ केवल व्यक्तिगत पाठक नहीं बनाता, बल्कि ‘व्याख्यात्मक समुदाय’ (Interpretive Communities) भी उसे आकार देते हैं। मनुष्य जिस सांस्कृतिक, वैचारिक और भाषिक समुदाय से जुड़ा होता है, उसी के अनुसार वह किसी पाठ का अर्थ ग्रहण करता है। ‘असाध्य वीणा’ को यदि इस दृष्टि से देखें, तो कविता स्वयं व्याख्यात्मक समुदायों की विविधता को पहचानती है। राजा, रानी, व्यापारी, श्रमिक, सैनिक, नाविक, भूखा व्यक्ति—ये केवल अलग-अलग व्यक्ति नहीं हैं; वे अलग-अलग सामाजिक संसारों और अनुभव-समुदायों का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रत्येक समुदाय अपने जीवनानुभव के आधार पर संगीत का अर्थ ग्रहण करता है। इसलिए अर्थ का अंतर केवल निजी मनोविज्ञान का परिणाम नहीं है; वह सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति से भी निर्मित होता है।

फ़िश के अनुसार किसी पाठ का कोई अर्थ पूरी तरह पाठ के बाहर भी नहीं होता और पूरी तरह पाठ के भीतर भी नहीं। अर्थ उस समुदाय की व्याख्यात्मक प्रक्रियाओं में निर्मित होता है जो उसे पढ़ता है। ‘असाध्य वीणा’ की स्थायी लोकप्रियता इसी तथ्य से भी जुड़ी है कि विभिन्न वैचारिक समुदाय इसे अलग-अलग रूपों में पढ़ते रहे हैं। भारतीय काव्यशास्त्र का अध्येता इसमें रस और ध्वनि की उपलब्धि देखता है। दार्शनिक उसमें शून्यता और तथता का अनुभव खोजता है। संगीत का अध्येता उसे नाद और साधना की कविता मानता है। पर्यावरणवादी उसमें प्रकृति की स्वायत्त सत्ता पहचानता है। मार्क्सवादी वर्ग-चेतना के संकेत देखता है और स्त्रीवादी उसकी लैंगिक संरचना पर प्रश्न उठाता है। इनमें से कोई भी व्याख्या अकेली कविता को समाप्त नहीं कर देती। प्रत्येक व्याख्या अपने व्याख्यात्मक समुदाय की दृष्टि से सार्थक होती है। यह स्थिति फ़िश की अवधारणा को स्मरण कराती है कि अर्थ सदैव समुदाय-सापेक्ष होता है।

इतालवी उपन्यासकार, आलोचक एवं संकेतविज्ञानी (Semiotician) उम्बेर्तो एको (Umberto Eco) का ‘ओपन वर्क’ (Open Work) का विचार भी ‘असाध्य वीणा’ को समझने में उपयोगी सिद्ध होता है। एको के अनुसार कुछ रचनाएँ ऐसी होती हैं जिनका स्वरूप पाठक को अनेक संभावित अर्थों की ओर उन्मुख करता है। वे अनिर्णीत नहीं होतीं, बल्कि बहुअर्थी होती हैं। ‘असाध्य वीणा’ इसी अर्थ में खुली कृति है। उसकी प्रतीक-व्यवस्था इतनी समृद्ध है कि वह विभिन्न स्तरों पर अर्थ ग्रहण करती है, किंतु उसकी आंतरिक संरचना इन अर्थों को पूरी तरह विखंडित भी नहीं होने देती। इसीलिए वह असीम अर्थ-संभावना और कलात्मक अनुशासन—दोनों को एक साथ बनाए रखती है।

अमेरिकी साहित्यिक सिद्धांतकार लुईज़ रोज़ेनब्लैट (Louise Rosenblatt) की ‘लेन-देन सिद्धांत’ (Transactional Theory) भी यहाँ स्मरणीय है। वे लिखती हैं कि ‘पाठ और पाठक का संबंध एकतरफ़ा नहीं होता’। दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। पाठक अपने अनुभव के साथ पाठ तक पहुँचता है, लेकिन पाठ भी उसके अनुभव को रूपांतरित करता है। ‘असाध्य वीणा’ में संगीत सुनने वाले सभी पात्र इसका प्रमाण हैं। वे संगीत को अपने जीवन की परिस्थितियों के अनुसार ग्रहण करते हैं, किंतु संगीत उनके अनुभव को यथावत नहीं रहने देता। राजा के भीतर सत्ता की चेतना बदलती है, रानी की मूल्य-दृष्टि बदलती है और सामान्य जन के भीतर भी अपने-अपने जीवन का नया बोध जन्म लेता है। यहाँ कला केवल प्रतिबिंब नहीं है; वह चेतना को बदलने वाली शक्ति भी है।

इन सभी विचारकों  की अवधारणाओं को साथ रखकर देखें, तो स्पष्ट होता है कि ‘असाध्य वीणा’ में अर्थ किसी एक केंद्र से नियंत्रित नहीं होता। न कवि उसे अंतिम रूप से निर्धारित करता है, न पात्र, न प्रतीक और न कोई दार्शनिक निष्कर्ष। अर्थ पाठ, प्रतीक, सांस्कृतिक स्मृति, पाठक के अनुभव और उसके व्याख्यात्मक समुदाय के संयुक्त संवाद में निर्मित होता है। कविता के भीतर संगीत का प्रसंग इसी जटिल प्रक्रिया का कलात्मक रूपक बन जाता है। एक ही संगीत अनेक अनुभवों में विभाजित होकर भी अपने मूल सौंदर्य को खोता नहीं; बल्कि उसी विविध ग्रहणशीलता में उसकी वास्तविक समृद्धि प्रकट होती है।

इसी कारण ‘असाध्य वीणा’ पाठक-प्रतिक्रिया आलोचना की दृष्टि से सिर्फ़ एक उपयुक्त उदाहरण नहीं है, बल्कि उसकी कुछ मूल अवधारणाओं का काव्यात्मक प्रतिरूप भी प्रतीत होता है। यह कविता पाठक को तैयार अर्थ नहीं देती; वह उसे अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया में सहभागी बनाती है। वह यह विश्वास स्थापित करती है कि कला का जीवन उसके रचे जाने में जितना है, उतना ही उसके पढ़े, सुने और पुनः अनुभव किए जाने में भी है। यही कारण है कि ‘असाध्य वीणा’ का प्रत्येक नया पाठ उसके अर्थ-संसार का विस्तार करता है और उसे प्रत्येक पीढ़ी के लिए पुनः जीवित बना देता है।

ऊपर जिन आलोचकों की चर्चा की गयी है उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि किसी रचना का अर्थ केवल लेखक द्वारा निर्धारित नहीं होता। पाठक भी अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार होता है। ‘असाध्य वीणा’ इस सिद्धांत का अद्भुत काव्यात्मक रूप प्रस्तुत करती है।

इस कविता के भीतर ही एक ऐसा प्रसंग है जहाँ एक ही संगीत अलग-अलग व्यक्तियों के भीतर भिन्न-भिन्न अनुभव उत्पन्न करता है। राजा उसे एक रूप में सुनता है, रानी दूसरे रूप में, भूखा व्यक्ति तीसरे रूप में, व्यापारी चौथे रूप में, श्रमिक पाँचवें रूप में। यह विविधता किसी भ्रम का परिणाम नहीं है। कविता स्वयं उसे स्वीकार करती है।

इसका अर्थ यह है कि संगीत का अर्थ उसके भीतर पहले से बंद नहीं था। वह श्रोता और संगीत के संवाद में निर्मित हुआ। यही आधुनिक पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत का मूल प्रतिपादन है। अर्थ कृति में स्थिर वस्तु की तरह उपस्थित नहीं रहता। वह पाठक की चेतना के साथ मिलकर आकार ग्रहण करता है।

इस प्रसंग का एक और गहरा अर्थ है। कविता यह नहीं कहती कि किसी एक श्रोता ने सही अर्थ ग्रहण किया और बाकी सब ग़लत थे। सभी अनुभव अपनी-अपनी जगह वैध हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि कला का सत्य बहुवचन में अस्तित्व रखता है। वह अनेक अनुभवों को अपने भीतर समाहित कर सकता है।

इसी सिद्धांत को स्वयं पाठक पर लागू करें, तो ‘असाध्य वीणा’ का प्रत्येक अध्ययन उसके नए अर्थ खोलता है। कोई पाठक उसे आध्यात्मिक कविता की तरह पढ़ेगा, कोई संगीत-दर्शन की कविता की तरह, कोई पर्यावरणीय चेतना की कविता की तरह और कोई आधुनिक कलाकार की त्रासदी की कविता की तरह। इन सबमें से कोई भी व्याख्या अंतिम नहीं है, क्योंकि कविता की संरचना ही ऐसी है कि वह अनेक अर्थ-संभावनाओं को एक साथ सुरक्षित रखती है।

‘असाध्य वीणा’ के सन्दर्भ में प्रतीकवाद बताता है कि कविता के अर्थ उसके प्रतीकों में छिपे हैं। संरचनावाद दिखाता है कि वे प्रतीक अकेले नहीं, बल्कि संबंधों के जाल में अर्थ ग्रहण करते हैं। उत्तर-संरचनावाद यह स्पष्ट करता है कि वे संबंध भी स्थिर नहीं हैं और अर्थ लगातार बदलता रहता है। पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत यह जोड़ता है कि इस अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया में पाठक ख़ुद भी सक्रिय सहभागी है।

‘असाध्य वीणा’ को हर्मेन्युटिक्स (Hermeneutics) या व्याख्याशास्त्र की परंपरा के आलोक में पढ़ना विचारोत्तेजक अनुभव है। इस दौरान  फ़्रेडरिक श्लायरमाखर (Friedrich Schleiermacher), विल्हेल्म डिल्थे (Wilhelm Dilthey), हान्स-जॉर्ग गाडामर (Hans-Georg Gadamer) और पॉल रिक्योर (Paul Ricoeur) की अवधारणाओं के माध्यम से कविता की अर्थ-मीमांसा को समझने का प्रयास किया जा सकता है। यह दृष्टि पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत से आगे बढ़कर यह सवाल उठाती है कि किसी कृति का अर्थ समय, परंपरा और व्याख्या की प्रक्रिया में किस प्रकार निरंतर विकसित होता है।

आधुनिक व्याख्याशास्त्र का मूल विश्वास यह है कि किसी साहित्यिक कृति का अर्थ एक बार में पूरी तरह प्राप्त नहीं हो जाता। अर्थ किसी स्थिर वस्तु की तरह पाठ में सुरक्षित नहीं रहता, बल्कि पाठ, परंपरा, भाषा, इतिहास और पाठक की चेतना के बीच निरंतर होने वाले संवाद में विकसित होता है। इस दृष्टि से ‘असाध्य वीणा’ आधुनिक हिंदी कविता की उन दुर्लभ कृतियों में है जो प्रत्येक गंभीर पुनर्पाठ के साथ अपने नए आयाम खोलती हैं। यह कविता अपने अर्थ को कभी अंतिम रूप में बंद नहीं करती; वह प्रत्येक पाठक को अपनी अर्थ-यात्रा में सहभागी बनाती है। यही कारण है कि व्याख्याशास्त्रीय दृष्टि से इसका अध्ययन विशेष रूप से फलदायी सिद्ध होता है।

फ़्रेडरिक श्लायरमाखर को आधुनिक हर्मेन्युटिक्स का आरंभकर्ता माना जाता है। उनके अनुसार किसी भी कृति को समझने के लिए दो प्रकार की व्याख्या आवश्यक होती है—व्याकरणिक (Grammatical Interpretation) और मनोवैज्ञानिक (Psychological Interpretation)। व्याकरणिक व्याख्या भाषा, संरचना और शब्दों के अर्थ पर ध्यान देती है, जबकि मनोवैज्ञानिक व्याख्या रचनाकार की सर्जनात्मक चेतना तक पहुँचने का प्रयास करती है।

‘असाध्य वीणा’ पर यह दृष्टि लागू करने पर स्पष्ट होता है कि केवल शब्दार्थ के आधार पर कविता को नहीं समझा जा सकता। यदि वीणा को केवल वाद्य, वृक्ष को केवल वृक्ष और संगीत को केवल ध्वनि मान लिया जाए, तो कविता का अधिकांश अर्थ छूट जाएगा। दूसरी ओर यदि केवल कवि की मनःस्थिति खोजने का प्रयास किया जाए, तब भी कविता सीमित हो जाएगी। श्लायरमाखर की दृष्टि से इस कविता का अर्थ भाषा और अनुभव—दोनों की संयुक्त प्रक्रिया में निर्मित होता है। अज्ञेय की भाषा प्रतीकात्मक है, लेकिन प्रतीकों की जड़ें जीवनानुभव में हैं। इसलिए कविता की व्याख्या केवल भाषिक विश्लेषण या केवल जीवनीपरक अध्ययन से संभव नहीं है।

विल्हेल्म डिल्थे ने हर्मेन्युटिक्स को मानवीय अनुभव की व्याख्या से जोड़ा। उनके अनुसार साहित्य जीवन की अभिव्यक्ति है और उसे समझने का अर्थ है उस जीवन-अनुभव को पुनः अनुभव करना। डिल्थे के लिए समझना (Understanding) केवल बौद्धिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अनुभवात्मक सहभागिता है।

‘असाध्य वीणा’ इस दृष्टि से जीवन के गहन अनुभव की कविता है। यहाँ साधना, मौन, प्रकृति, संगीत और आत्म-विसर्जन किसी सिद्धांत की भाषा नहीं हैं; वे जीवन के अनुभव हैं। प्रियंवद को समझना केवल उसके कथनों को समझना नहीं है। उसके अनुभव की क्रमिक यात्रा में प्रवेश करना भी आवश्यक है। डिल्थे की दृष्टि से पाठक तभी कविता तक पहुँचता है जब वह बाहरी घटनाओं से आगे बढ़कर उनके भीतर निहित जीवनानुभव को ग्रहण करे। यही कारण है कि इस कविता का प्रभाव केवल बौद्धिक नहीं, अस्तित्वगत है। वह पाठक से केवल समझे जाने की अपेक्षा नहीं करती; वह उससे सह-अनुभूति की अपेक्षा करती है।

हान्स-जॉर्ग गाडामर ने हर्मेन्युटिक्स को एक नई दिशा देते हुए यह प्रतिपादित किया कि किसी भी कृति की व्याख्या इतिहास और परंपरा से अलग होकर संभव नहीं है। उन्होंने ‘क्षितिजों का संलयन’ (Fusion of Horizons) की प्रसिद्ध अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार न तो पाठ का ऐतिहासिक क्षितिज अकेले पर्याप्त है और न पाठक का वर्तमान क्षितिज। वास्तविक समझ तब उत्पन्न होती है जब दोनों क्षितिज एक-दूसरे के साथ संवाद करते हैं।

‘असाध्य वीणा’ का अध्ययन गाडामर की इस अवधारणा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। कविता भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी हुई है, किंतु उसका पाठ आधुनिक समय में किया जाता है। आज का पाठक जलवायु संकट, तकनीकी सभ्यता, उपभोक्तावाद, व्यक्तिवाद और वैश्विक सांस्कृतिक परिवर्तनों के बीच इस कविता को पढ़ता है। परिणामस्वरूप वह किरीटी-तरु को केवल मिथकीय वृक्ष नहीं, बल्कि पारिस्थितिक चेतना के प्रतीक के रूप में भी ग्रहण करता है। वह प्रियंवद की साधना को केवल आध्यात्मिक साधना नहीं, बल्कि आधुनिक आत्म-केंद्रिकता के विरुद्ध एक वैकल्पिक जीवन-दृष्टि के रूप में भी समझता है। इस प्रकार कविता का मूल ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान पाठकीय संदर्भ परस्पर मिलकर नए अर्थों का निर्माण करते हैं।

गाडामर ने यह भी कहा था कि परंपरा कोई मृत वस्तु नहीं होती; वह प्रत्येक नई व्याख्या में पुनर्जीवित होती है। ‘असाध्य वीणा’ इस कथन की पुष्टि करती है। उपनिषद, बौद्ध दर्शन, भारतीय संगीत-दर्शन और काव्यशास्त्र इस कविता में संग्रहालय की वस्तुओं की तरह उपस्थित नहीं हैं। वे आधुनिक अनुभव के साथ मिलकर नए अर्थ ग्रहण करते हैं। यही कारण है कि यह कविता परंपरा का संरक्षण नहीं करती; उसका पुनर्सृजन करती है।

गाडामर की एक और महत्त्वपूर्ण अवधारणा है कि व्याख्या सदैव संवाद है। पाठ पर कोई अंतिम अधिकार नहीं होता। ‘असाध्य वीणा’ इस दृष्टि से खुली कृति है। प्रत्येक नया पाठ उससे नया संवाद स्थापित करता है। यही कारण है कि भारतीय काव्यशास्त्र, बौद्ध दर्शन, पारिस्थितिक आलोचना, उत्तर-मानववाद, मार्क्सवादी आलोचना या स्त्रीवादी आलोचना—सभी उसके साथ संवाद कर सकते हैं, बिना एक-दूसरे को निरस्त किए। कविता स्वयं इस संवादात्मकता को संभव बनाती है।

पॉल रिक्योर ने व्याख्याशास्त्र को प्रतीक और अर्थ की बहुस्तरीयता से जोड़ते हुए कहा था कि “प्रतीक सोचने के लिए बाध्य करता है।” उनका आशय यह था कि महान प्रतीक अपने अर्थ को तुरंत प्रकट नहीं करते; वे व्याख्या की लंबी प्रक्रिया को जन्म देते हैं। ‘असाध्य वीणा’ के प्रतीकों की प्रकृति बिल्कुल ऐसी ही है।

वीणा, किरीटी-तरु, मौन, शून्य, संगीत और साधना—इनमें से कोई भी प्रतीक एक अर्थ पर स्थिर नहीं रहता। प्रत्येक प्रतीक पाठक को उसके प्रत्यक्ष अर्थ से आगे सोचने के लिए विवश करता है। उदाहरण के लिए वीणा केवल वाद्य नहीं है; वह सृजन की प्रक्रिया भी है, सांस्कृतिक स्मृति भी, साधना का माध्यम भी और कलाकार तथा अस्तित्व के बीच संवाद का स्थल भी। इसी प्रकार मौन ध्वनि का अभाव नहीं है; वह अर्थ के जन्म का क्षेत्र है। रिक्योर की दृष्टि से प्रतीकों की यही बहुअर्थी प्रकृति किसी कृति को दीर्घजीवी बनाती है।

रिक्योर ने यह भी प्रतिपादित किया कि किसी पाठ का अर्थ लेखक की मूल मंशा से आगे बढ़ जाता है। एक बार रचना संसार में आ जाए, तो वह नई परिस्थितियों में नए अर्थ ग्रहण करती है। ‘असाध्य वीणा’ का आज का पाठ इसका प्रमाण है। समकालीन पाठक इसमें पर्यावरणीय चेतना, उत्तर-मानववादी दृष्टि, सांस्कृतिक आत्मबोध, कला की नैतिकता और आधुनिक मनुष्य के आत्म-संकट जैसे प्रश्न भी पढ़ता है। संभव है कि ये सभी प्रश्न अज्ञेय के सामने उसी रूप में उपस्थित न रहे हों, किंतु कविता की संरचना इतनी व्यापक है कि वह इन नई व्याख्याओं का भी स्वागत करती है।

रिक्योर की एक और अवधारणा यहाँ उल्लेखनीय है—व्याख्या का संबंध केवल अर्थ से नहीं, आत्म-समझ से भी है। किसी महान कृति को पढ़ते हुए पाठक केवल पाठ को नहीं समझता; वह स्वयं को भी नए रूप में समझने लगता है। ‘असाध्य वीणा’ का प्रभाव भी यही है। पाठक केवल प्रियंवद की साधना का साक्षी नहीं रहता; वह अपने भीतर भी यह प्रश्न अनुभव करने लगता है कि सृजन क्या है, अहं क्या है, मौन क्या है, प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध क्या है और कला का वास्तविक उद्देश्य क्या है। इस प्रकार कविता का पाठ आत्म-व्याख्या की प्रक्रिया बन जाता है।

यदि श्लायरमाखर, डिल्थे, गाडामर और रिक्योर की अवधारणाओं को एक साथ रखकर ‘असाध्य वीणा’ को देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कविता किसी बंद अर्थ-संरचना का उदाहरण नहीं है। उसका अर्थ भाषा, अनुभव, इतिहास, परंपरा, प्रतीक और पाठक की चेतना—इन सबके संयुक्त संवाद में विकसित होता है। प्रत्येक नई पीढ़ी उसे नए प्रश्नों के साथ पढ़ती है और वह उन प्रश्नों के उत्तर देने के बजाय नए अर्थ-संभावना-क्षेत्र खोल देती है।

यही कारण है कि ‘असाध्य वीणा’ को केवल पढ़ा नहीं जाता; उसकी व्याख्या की जाती है। और प्रत्येक व्याख्या उसके अर्थ का विस्तार करती है। व्याख्या यहाँ पाठ पर आरोपित प्रक्रिया नहीं है; वह कविता के अस्तित्व का स्वाभाविक विस्तार है। इसी अर्थ में ‘असाध्य वीणा’ आधुनिक हिंदी कविता की ऐसी कृति है जिसकी जीवन्तता उसके पाठ में नहीं, उसके निरंतर पुनर्पाठ में निहित है। वह प्रत्येक गंभीर व्याख्या के साथ नई हो उठती है और यही उसकी स्थायी साहित्यिक तथा दार्शनिक शक्ति का सबसे विश्वसनीय प्रमाण है।

इस क्रम में आगे पश्चिमी हर्मेन्युटिक्स और भारतीय मीमांसा की तुलना के बजाय यह विचारणीय है कि ‘असाध्य वीणा’ जैसी कृति की व्याख्या के लिए दोनों परंपराओं का समन्वित उपयोग कैसे अधिक सार्थक सिद्ध हो सकता है।‘असाध्य वीणा’ का अध्ययन जितनी गहराई से किया जाता है, उतना ही स्पष्ट होता जाता है कि यह कविता किसी एक आलोचनात्मक पद्धति से पूरी तरह नहीं खुलती। भारतीय काव्यशास्त्र उसके रस, ध्वनि और साधारणीकरण की व्याख्या करता है; भारतीय दार्शनिक परंपराएँ उसके अस्तित्वगत आयामों को उद्घाटित करती हैं; आधुनिक साहित्यिक सिद्धांत उसके अर्थ-निर्माण की जटिल प्रक्रिया को स्पष्ट करते हैं; जबकि हर्मेन्युटिक्स यह समझने में सहायता करता है कि कविता का अर्थ प्रत्येक पुनर्पाठ में किस प्रकार विकसित होता है। इन सभी दृष्टियों को एक साथ रखने पर यह अनुभव होता है कि ‘असाध्य वीणा’ स्वयं एक ऐसी कृति है जो किसी एक व्याख्यात्मक परंपरा की अपेक्षा एक समन्वित व्याख्याशास्त्र की माँग करती है।

भारतीय बौद्धिक परंपरा में ‘मीमांसा’ का अर्थ केवल किसी ग्रंथ की टीका करना नहीं है। मीमांसा का मूल अर्थ है—किसी कथन, अनुभव या सत्य की गहन और क्रमिक जिज्ञासा। भारतीय काव्यशास्त्र भी इसी अर्थ में मीमांसात्मक है। आनंदवर्धन ध्वनि के माध्यम से प्रत्यक्ष अर्थ से आगे बढ़ते हैं। अभिनवगुप्त रस को केवल भाव नहीं, चेतना की विशिष्ट अनुभूति मानते हैं। कुंतक वक्रोक्ति के माध्यम से अभिव्यक्ति की रचनात्मकता को समझते हैं। क्षेमेन्द्र औचित्य के द्वारा काव्य के आंतरिक संतुलन की व्याख्या करते हैं। इन सभी आचार्यों के यहाँ व्याख्या का उद्देश्य अर्थ को सीमित करना नहीं, उसके अंतःसंबंधों को उद्घाटित करना है।

पश्चिमी हर्मेन्युटिक्स भी अंततः इसी दिशा में विकसित होती है। श्लायरमाखर भाषा और रचनाकार की चेतना के बीच संबंध खोजते हैं। डिल्थे जीवनानुभव को व्याख्या का आधार बनाते हैं। गाडामर परंपरा और वर्तमान के संवाद को समझने का आग्रह करते हैं। रिक्योर प्रतीकों की बहुस्तरीयता और आत्म-व्याख्या की प्रक्रिया पर बल देते हैं। यदि इन विचारों की तुलना भारतीय व्याख्यात्मक परंपरा से की जाए, तो स्पष्ट होता है कि दोनों की भाषाएँ अलग हैं, लेकिन दोनों का अंतिम उद्देश्य एक ही है—रचना के अर्थ को उसके बहुस्तरीय स्वरूप में समझना।

‘असाध्य वीणा’ का पाठ इस समन्वय की आवश्यकता को प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध करता है। यदि इसे केवल भारतीय काव्यशास्त्र की दृष्टि से पढ़ा जाए, तो रस, ध्वनि और प्रतीक की समृद्ध व्याख्या संभव होगी, किंतु आधुनिक पाठकीयता, इतिहास और अर्थ-बहुलता के अनेक प्रश्न अनछुए रह जाएँगे। यदि इसे केवल पश्चिमी हर्मेन्युटिक्स की दृष्टि से पढ़ा जाए, तो अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया तो स्पष्ट होगी, किंतु भारतीय सौंदर्य-दृष्टि, साधना की अवधारणा और रसानुभूति का विशिष्ट स्वरूप पर्याप्त रूप से सामने नहीं आएगा। इसलिए इस कविता के लिए किसी एक परंपरा का चयन करने की अपेक्षा दोनों के बीच संवाद स्थापित करना अधिक उपयुक्त है।

इस समन्वित मॉडल का पहला आधार यह है कि कविता का अर्थ स्थिर नहीं है, किंतु अनंत रूप से अनियंत्रित भी नहीं है। भारतीय ध्वनि-सिद्धांत और रिक्योर की प्रतीक-मीमांसा दोनों इस बात से सहमत हैं कि श्रेष्ठ काव्य प्रत्यक्ष अर्थ से आगे बढ़ता है। किंतु वह अर्थहीनता की ओर नहीं जाता। ‘असाध्य वीणा’ के प्रतीक भी ऐसे ही हैं। वीणा, किरीटी-तरु, मौन, शून्य और संगीत अपने अर्थ का विस्तार करते हैं, लेकिन पूरी तरह विखंडित नहीं हो जाते। उनके भीतर एक आंतरिक संरचनात्मक अनुशासन बना रहता है।

दूसरा आधार यह है कि काव्य का अनुभव केवल बौद्धिक नहीं होता। भारतीय रस-सिद्धांत और डिल्थे की जीवनानुभूति की अवधारणा दोनों इस तथ्य पर बल देती हैं कि साहित्य को समझना उसके अनुभव में प्रवेश करना है। ‘असाध्य वीणा’ का अर्थ केवल उसके कथानक या प्रतीकों को समझ लेने से नहीं खुलता। उसका वास्तविक अर्थ तब उद्घाटित होता है जब पाठक प्रियंवद की साधना, उसके मौन, उसकी आत्म-विस्मृति और उसके भीतर घटित परिवर्तन को अनुभव की प्रक्रिया के रूप में ग्रहण करता है।

तीसरा आधार यह है कि व्याख्या सदैव संवाद है। गाडामर के ‘क्षितिजों के संलयन’ और भारतीय परंपरा के ‘संवाद’ की अवधारणा में गहरा साम्य दिखाई देता है। ‘असाध्य वीणा’ का पाठ करते समय आधुनिक पाठक अपने समय के प्रश्नों—पर्यावरण, आधुनिकता, व्यक्तिवाद, सांस्कृतिक पहचान, कला की नैतिकता और तकनीकी सभ्यता—को साथ लेकर कविता के पास आता है। दूसरी ओर कविता अपने समय की सांस्कृतिक स्मृतियों और दार्शनिक अनुभवों के साथ उपस्थित होती है। दोनों के बीच होने वाला संवाद ही अर्थ का वास्तविक क्षेत्र बनाता है।

चौथा आधार यह है कि किसी भी महान कृति की व्याख्या कभी समाप्त नहीं होती। भारतीय काव्यशास्त्र में ध्वनि की अनंत व्यंजना और गाडामर की ऐतिहासिक व्याख्यात्मकता दोनों इसी ओर संकेत करती हैं। ‘असाध्य वीणा’ को प्रत्येक पीढ़ी नए प्रश्नों के साथ पढ़ती है। कभी वह भारतीय आधुनिकता की कविता बन जाती है, कभी कला-दर्शन की, कभी पारिस्थितिक चेतना की, कभी संगीत-दर्शन की और कभी आत्म-विसर्जन की। इन सभी व्याख्याओं के बाद भी कविता समाप्त नहीं होती। उसकी अर्थ-संभावना बनी रहती है।

पाँचवाँ आधार यह है कि व्याख्या का अंतिम उद्देश्य केवल पाठ को समझना नहीं, स्वयं को समझना भी है। भारतीय परंपरा में ज्ञान आत्मानुभूति से जुड़ा है। रिक्योर भी साहित्य को आत्म-समझ का माध्यम मानते हैं। ‘असाध्य वीणा’ पढ़ते हुए पाठक केवल यह नहीं सोचता कि प्रियंवद कौन है; वह यह भी सोचने लगता है कि कलाकार होना क्या है, साधना क्या है, मौन का अर्थ क्या है, प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध क्या है और क्या सृजन अधिकार से जन्म लेता है या समर्पण से। इस प्रकार कविता आत्म-व्याख्या का क्षेत्र बन जाती है।

इस समन्वित हर्मेन्युटिक मॉडल का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि ‘असाध्य वीणा’ को न केवल एक पाठ के रूप में, बल्कि एक व्याख्यात्मक परिघटना (Hermeneutic Event) के रूप में देखा जाना चाहिए। प्रत्येक गंभीर पाठ उसके अर्थ का पुनर्जन्म है। कविता किसी निश्चित निष्कर्ष तक पहुँचाने की अपेक्षा पाठक को अर्थ की खोज में सक्रिय रखती है। यही उसकी जीवंतता है।

इस दृष्टि से ‘असाध्य वीणा’ आधुनिक हिंदी कविता में केवल एक उत्कृष्ट काव्य-कृति नहीं, बल्कि व्याख्या की भारतीय और वैश्विक परंपराओं के बीच सेतु का कार्य करने वाली रचना भी है। वह यह प्रमाणित करती है कि भारतीय काव्यशास्त्र और आधुनिक हर्मेन्युटिक्स परस्पर विरोधी नहीं हैं। दोनों मिलकर ऐसी व्याख्यात्मक पद्धति का निर्माण कर सकते हैं जो न केवल किसी काव्य-कृति की बहुस्तरीयता को अधिक गहराई से समझे, बल्कि साहित्य को मनुष्य की आत्म-चेतना, सांस्कृतिक स्मृति और अस्तित्वगत जिज्ञासा के संयुक्त क्षेत्र के रूप में भी स्थापित करे।

इसी अर्थ में ‘असाध्य वीणा’ का अध्ययन केवल एक कविता की व्याख्या नहीं रह जाता; वह स्वयं व्याख्या की प्रकृति पर विचार करने का अवसर बन जाता है। यही उसकी स्थायी बौद्धिक शक्ति है। वह अपने पाठक को तैयार उत्तर नहीं देती; वह उसे ऐसे प्रश्नों से समृद्ध करती है जो प्रत्येक नए पाठ के साथ नए अर्थों में खुलते जाते हैं। यही किसी कालजयी कृति की सबसे विश्वसनीय पहचान है।

कहना यह है कि ‘असाध्य वीणा’ आधुनिक साहित्यिक सिद्धांतों की कसौटी पर इसलिए महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती है कि वह किसी एक अर्थ, एक प्रतीक, एक संरचना या एक व्याख्या में सीमित नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी शक्ति उसकी अर्थ-संपन्नता और अर्थ-बहुलता है। वह पाठक को तैयार निष्कर्ष नहीं देती; वह उसे एक ऐसी रचनात्मक प्रक्रिया में शामिल करती है जहाँ अर्थ निरंतर जन्म लेता रहता है। यही कारण है कि यह कविता प्रत्येक गंभीर पाठ के साथ नए रूप में खुलती है और प्रत्येक युग में अपने लिए नए पाठकों और नई व्याख्याओं की संभावना बनाए रखती है। आधुनिक आलोचना की दृष्टि से यही किसी महान काव्य-कृति का सबसे विश्वसनीय प्रमाण माना जाता है।

मार्क्सवादी, नव-इतिहासवादी, उत्तर-औपनिवेशिक और स्त्रीवादी सिद्धांतों के माध्यम से भी ‘असाध्य वीणा’ का पुनर्पाठ किया जा सकता  है। इन आलोचना-दृष्टियों का उद्देश्य कविता की उपलब्धियों को नकारना नहीं है, बल्कि उसके भीतर उपस्थित वैचारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक तनावों को भी पहचानना है। इस प्रकार का पुनर्पाठ किसी आलोचना को अधिक संतुलित और व्यापक बनाता है।

‘असाध्य वीणा’ का अध्ययन यदि मार्क्सवादी, नव-इतिहासवादी, उत्तर-औपनिवेशिक और स्त्रीवादी आलोचना की संयुक्त दृष्टि से किया जाए, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कविता केवल आध्यात्मिक या सौंदर्यात्मक अनुभव का आख्यान नहीं है। उसके भीतर सत्ता, वर्ग, इतिहास, संस्कृति, लैंगिक संबंध और वैचारिक संरचनाओं से जुड़े अनेक प्रश्न भी सक्रिय हैं। अज्ञेय स्वयं इन प्रश्नों को प्रत्यक्ष रूप से उठाने वाले कवि नहीं हैं, किंतु उनकी कविता की जटिलता ऐसी है कि वह इन आलोचनात्मक दृष्टियों के साथ गंभीर संवाद की संभावना उत्पन्न करती है। इन दृष्टियों का उद्देश्य कविता का खंडन करना नहीं, बल्कि उसके अर्थ-क्षेत्र को और व्यापक बनाना है।

मार्क्सवादी आलोचना के नज़रिए से सबसे पहले यह सवाल उठता है कि कविता किस सामाजिक संसार में घटित होती है। पूरी कथा एक राजसभा से आरंभ होती है। राजा, रानी, दरबार, कलाकार, साधक और जनता—ये सभी पात्र किसी सामाजिक संरचना का हिस्सा हैं। पहली दृष्टि में लगता है कि कविता सत्ता-संरचना की आलोचना नहीं करती, बल्कि उसे स्वाभाविक रूप में स्वीकार कर लेती है। किंतु थोड़ा ध्यान से देखें, तो राजसभा का वैभव कविता का केंद्र नहीं है। उसका केंद्र वह साधक है जो सत्ता के बाहर से आता है और जिसकी साधना राजकीय प्रतिष्ठा से स्वतंत्र है। इस प्रकार कविता सत्ता की वैधता को नहीं, साधना की प्रामाणिकता को महत्त्व देती है।

फिर भी मार्क्सवादी आलोचना यह प्रश्न उठाने का अधिकार रखती है कि क्या कविता सामाजिक विषमता की संरचना को पर्याप्त रूप से पहचानती है। राजा और जनता दोनों एक ही संगीत सुनते हैं, लेकिन उनके अनुभव अलग-अलग हैं। यह अंतर केवल मनोवैज्ञानिक नहीं है। वह उनकी सामाजिक स्थिति से भी निर्मित होता है। भूखे व्यक्ति को संगीत में अन्न की सोंधी खुदबुद सुनाई देती है, व्यापारी को धन की खनक, श्रमिक को अपने श्रम की लय, नाविक को जल की गति। इससे स्पष्ट होता है कि चेतना वर्ग-निरपेक्ष नहीं है। मनुष्य अपने सामाजिक जीवन के आधार पर ही संसार का अर्थ ग्रहण करता है। इस दृष्टि से कविता अप्रत्यक्ष रूप से उस विचार की पुष्टि करती है कि अनुभव सामाजिक परिस्थितियों से निर्मित होता है।

किन्तु यहीं एक आलोचनात्मक प्रश्न भी खड़ा होता है। कविता यह तो दिखाती है कि सामाजिक स्थिति अनुभव को प्रभावित करती है, लेकिन वह यह नहीं पूछती कि वे सामाजिक स्थितियाँ बनी कैसे। भूखे व्यक्ति की भूख का कारण क्या है? श्रमिक की श्रम-स्थितियाँ कैसी हैं? राजा की सत्ता किन ऐतिहासिक प्रक्रियाओं से निर्मित हुई? इन प्रश्नों पर कविता मौन रहती है। उसका ध्यान संरचनात्मक असमानताओं की व्याख्या से अधिक आंतरिक रूपांतरण पर है। मार्क्सवादी आलोचक इसी बिंदु पर यह कह सकता है कि कविता सामाजिक परिवर्तन की अपेक्षा आध्यात्मिक परिवर्तन को प्राथमिकता देती है।

फिर भी यह कहना उचित नहीं होगा कि कविता सामाजिक यथार्थ से पूरी तरह कट जाती है। वह समाज के विभिन्न वर्गों की उपस्थिति को पहचानती है। उनकी अनुभूतियों को सम्मान देती है। किसी एक वर्ग की संवेदना को सार्वभौमिक घोषित नहीं करती। यह लोकतांत्रिक संवेदनशीलता उसकी एक बड़ी उपलब्धि है। किंतु वर्ग-संघर्ष, उत्पादन-संबंध और ऐतिहासिक भौतिक परिस्थितियों का विश्लेषण उसका उद्देश्य नहीं है। इसलिए मार्क्सवादी आलोचना के लिए यह कविता एक साथ प्रेरक और प्रश्नाकुल दोनों बनी रहती है।

नव-इतिहासवादी दृष्टि कविता को उसके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ में रखकर पढ़ती है। इस दृष्टि के अनुसार साहित्य इतिहास से बाहर नहीं होता। वह अपने समय की सांस्कृतिक शक्तियों के साथ निरंतर संवाद करता है। ‘असाध्य वीणा’ का सृजन ऐसे समय में हुआ जब स्वतंत्रता के बाद भारतीय समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान को नए रूप में समझने का प्रयास कर रहा था। औपनिवेशिक शासन से मुक्त होने के बाद भारतीय बौद्धिक संसार में यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो उठा था कि आधुनिकता और परंपरा का संबंध किस प्रकार स्थापित किया जाए।

अज्ञेय इस प्रश्न का उत्तर किसी वैचारिक घोषणापत्र के रूप में नहीं देते। वे भारतीय सांस्कृतिक स्मृति के भीतर से एक ऐसी कथा चुनते हैं जिसमें साधना, प्रकृति, संगीत और मौन की परंपरा जीवित है। किंतु वे उसे पारंपरिक भाषा में नहीं लिखते। उनकी काव्य-भाषा आधुनिक है, उनकी प्रतीक-योजना आधुनिक है और उनकी आत्मचेतना भी आधुनिक है। इस प्रकार कविता अतीत की पुनरावृत्ति नहीं करती, बल्कि परंपरा का पुनर्सृजन करती है।

नव-इतिहासवादी दृष्टि से देखें तो यह कविता सांस्कृतिक शक्ति-संबंधों की भी पुनर्व्याख्या करती है। राजसभा संस्कृति का आधिकारिक केंद्र है, किंतु सृजन की वास्तविक शक्ति वहाँ नहीं है। वह वन में है, साधना में है, वज्रकीर्ति की दीर्घ तपस्या में है और प्रियंवद की आत्म-विस्मृति में है। इससे सांस्कृतिक अधिकार का केंद्र बदल जाता है। सत्ता संस्कृति को नियंत्रित नहीं करती; संस्कृति सत्ता को रूपांतरित करती है। राजा स्वयं साधक के सामने विनम्र होता है। यह परिवर्तन प्रतीकात्मक होते हुए भी ऐतिहासिक अर्थ रखता है।

उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से ‘असाध्य वीणा’ और भी दिलचस्प पाठ बन जाती है। उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना यह देखती है कि उपनिवेशवाद के बाद साहित्य अपनी सांस्कृतिक पहचान का पुनर्निर्माण किस प्रकार करता है। अज्ञेय की कविता इस दृष्टि से किसी राजनीतिक प्रतिरोध का आख्यान नहीं है, लेकिन वह भारतीय ज्ञान-परंपराओं को आधुनिक काव्यभाषा में पुनर्स्थापित करती है। यह पुनर्स्थापन अतीत की अंधस्वीकृति नहीं है। अज्ञेय न तो परंपरा का महिमामंडन करते हैं और न आधुनिकता का निषेध। वे दोनों के बीच रचनात्मक संवाद स्थापित करते हैं।

कविता में प्रकृति, वृक्ष, साधना, संगीत, मौन, शून्य और तथता जैसे संकेत भारतीय सांस्कृतिक स्मृति से आते हैं, किंतु उनकी प्रस्तुति आधुनिक प्रतीकात्मक शैली में होती है। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय आधुनिकता केवल पश्चिमी प्रतिमानों की अनुकृति नहीं है। वह अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के भीतर से भी आधुनिक अभिव्यक्ति विकसित कर सकती है। उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण बिंदु है।

फिर भी उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना यहाँ एक दूसरा प्रश्न भी उठा सकती है। क्या कविता भारतीय परंपरा को एक समरस सांस्कृतिक इकाई की तरह प्रस्तुत करती है? यदि ऐसा है, तो उसके भीतर मौजूद ऐतिहासिक अंतर्विरोध कहाँ हैं? अज्ञेय इन प्रश्नों पर प्रत्यक्ष विचार नहीं करते। उनकी रुचि सांस्कृतिक स्मृति के रचनात्मक पक्ष में अधिक है। इसलिए यह कविता औपनिवेशिक प्रतिरोध की प्रत्यक्ष कविता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास की कविता अधिक दिखाई देती है।

स्त्रीवादी आलोचना इस कविता के सामने सबसे चुनौतीपूर्ण प्रश्न उपस्थित करती है। पहली नज़र में साफ़ दिखाई देता है कि कथा के केंद्रीय पात्र पुरुष हैं—वज्रकीर्ति, प्रियंवद और राजा। सृजन, साधना और दार्शनिक अनुभव की मुख्य यात्रा इन्हीं के माध्यम से घटित होती है। रानी उपस्थित अवश्य है, किंतु वह इस यात्रा की संचालक नहीं बनती। स्त्रीवादी दृष्टि इस असंतुलन की ओर ध्यान आकर्षित करती है।

यह सवाल सिर्फ़ पात्रों की संख्या का नहीं है। यह भी देखना ज़रूरी है कि अनुभव का अधिकार किसके पास है। प्रियंवद साधना करता है, वज्रकीर्ति वीणा रचता है, राजा परिवर्तन का अनुभव करता है। रानी का अनुभव भी गहरा है, किंतु उसका केंद्र प्रेम है। इससे यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या कविता अनजाने में पुरुष और स्त्री के अनुभवों का पारंपरिक विभाजन बनाए रखती है—पुरुष के हिस्से में साधना और सृजन, स्त्री के हिस्से में प्रेम और संवेदना?

यह प्रश्न गंभीर है, किंतु उसका उत्तर सरल नहीं है। रानी का अनुभव केवल दांपत्य या निजी प्रेम तक सीमित नहीं है। उसके सामने जो सत्य उद्घाटित होता है, वह बाहरी वैभव की निरर्थकता और प्रेम की आंतरिक शक्ति से जुड़ा है। वह भी एक प्रकार का आत्म-रूपांतरण है। इसलिए रानी को केवल पारंपरिक स्त्री-भूमिका में सीमित कर देना भी उचित नहीं होगा। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि कथा की केंद्रीय आध्यात्मिक यात्रा पुरुष पात्र के माध्यम से ही घटित होती है। स्त्रीवादी आलोचना इस सीमा को रेखांकित करती है।

एक और प्रश्न यहाँ उठता है। वीणा स्वयं स्त्रीलिंग शब्द है। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में वीणा का संबंध सरस्वती से भी जोड़ा जाता है। किंतु कविता में वीणा की चेतना को व्यक्त करने वाला माध्यम पुरुष साधक है। स्त्रीवादी अध्ययन इस प्रतीकात्मक संरचना का भी विश्लेषण कर सकता है। क्या यहाँ स्त्री का रूप प्रतीक बनकर रह जाता है, जबकि सक्रिय आध्यात्मिक कर्म पुरुष के हिस्से में चला जाता है? यह प्रश्न कविता के विरुद्ध आरोप नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक संरचना को समझने का एक आलोचनात्मक प्रयास है।

इन दृष्टियों को एक साथ रखकर देखें तो ‘असाध्य वीणा’ कविता की जटिलता और अधिक स्पष्ट होती है। मार्क्सवादी आलोचना हमें वर्ग, श्रम और सामाजिक विषमता के प्रश्नों की ओर ले जाती है। नव-इतिहासवाद कविता को स्वतंत्रता-उत्तर भारत की सांस्कृतिक पुनर्संरचना के संदर्भ में समझने की दृष्टि देता है। उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन यह दिखाता है कि आधुनिक भारतीय कविता किस प्रकार अपनी परंपराओं के साथ संवाद करते हुए एक वैकल्पिक आधुनिकता का निर्माण करती है। स्त्रीवादी आलोचना कविता की उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए उसके लैंगिक विन्यास पर आवश्यक प्रश्न उपस्थित करती है।

इन आलोचनात्मक पुनर्पाठों से यह भी स्पष्ट होता है कि ‘असाध्य वीणा’ किसी एक विचारधारा से संचालित कविता नहीं है। वह इन सभी दृष्टियों के साथ संवाद करती है, उनसे सहमत भी होती है और कई स्थानों पर उनसे अलग भी चली जाती है। उसकी शक्ति इसी में है कि वह किसी एक सिद्धांत द्वारा पूरी तरह व्याख्यायित नहीं हो सकती। प्रत्येक आलोचनात्मक पद्धति उसके कुछ नए पक्ष खोलती है और कुछ प्रश्न अनुत्तरित छोड़ देती है। यही किसी बड़ी काव्य-कृति का गुण है। वह अपने समय की उपज होते हुए भी अपने समय से आगे जाती है और प्रत्येक नई आलोचनात्मक दृष्टि को अपने भीतर प्रवेश करने तथा नए अर्थ खोजने का अवसर देती है। ‘असाध्य वीणा’ का स्थायी महत्त्व भी इसी बहुवाचकता, इसी आलोचनात्मक खुलापन और इसी अर्थ-संपन्नता में निहित है।

आधुनिक हिंदी कविता के विकासक्रम में कुछ रचनाएँ ऐसी हैं जो केवल अपने समय की प्रतिनिधि नहीं रहतीं, बल्कि समय की सीमाओं का अतिक्रमण करके स्थायी काव्य-अनुभव का रूप ग्रहण कर लेती हैं। अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ ऐसी ही रचना है। यह कविता केवल एक संगीत-साधक की कथा नहीं है, न केवल कला और कलाकार के संबंध पर विचार करती है, न केवल भारतीय दार्शनिक परंपराओं का पुनर्स्मरण कराती है और न केवल प्रकृति का सौंदर्य उपस्थित करती है। इसकी वास्तविक उपलब्धि इस बात में है कि यह इन सभी स्तरों को एक साथ जोड़कर आधुनिक मनुष्य के सामने सृजन, चेतना और अस्तित्व के संबंध का एक नया प्रतिमान प्रस्तुत करती है। यही कारण है कि यह कविता आधुनिक हिंदी साहित्य में दार्शनिक गहराई, सौंदर्यात्मक परिपक्वता और सांस्कृतिक आत्मबोध की दृष्टि से विशिष्ट स्थान रखती है।

दार्शनिक स्तर पर ‘असाध्य वीणा’ का सबसे बड़ा हासिल यह है कि वह विचार को अनुभव और अवधारणा (conception) को अवबोध (Perception) में रूपांतरित करती है। आधुनिक कविता में दार्शनिकता का संकट प्रायः यह रहा है कि या तो कविता विचार का विस्तार बन जाती है या फिर विचार के आतंक से केवल भावुकता में सीमित हो जाती है।इस रचना में अज्ञेय इन दोनों अतियों से बचते हैं। वे न किसी दार्शनिक मत का प्रतिपादन करते हैं, न उसे अस्वीकार करते हैं। वे एक ऐसी अनुभूति की रचना करते हैं जिसमें दर्शन पाठक पर आरोपित नहीं होता, बल्कि उसके भीतर धीरे-धीरे घटित होता है।

कविता का केंद्र किसी दार्शनिक निष्कर्ष में नहीं, बल्कि उस यात्रा में है जिसके दौरान व्यक्ति अपने सीमित अहं से मुक्त होकर व्यापक अस्तित्व के साथ संवाद स्थापित करता है। यह यात्रा किसी धार्मिक विश्वास पर आधारित नहीं है। उसका आधार अनुभव, साधना और आत्म-अनुशासन है। इसीलिए कविता का दार्शनिक स्वर आधुनिक है। वह प्रश्नों से भागती नहीं, उन्हें अनुभव के स्तर पर रूपांतरित करती है।

इस रचना का एक बड़ा दार्शनिक गुण यह भी है कि यह भारतीय चिंतन की विभिन्न धाराओं को किसी कृत्रिम समन्वय में नहीं बाँधती। उपनिषदों की विराट चेतना, अद्वैत का एकत्व-बोध, बौद्ध शून्यता, तथता और अनात्म की अनुभूति, संगीत-दर्शन का नाद-सिद्धांत तथा प्रकृति के साथ जीवंत संबंध—ये सभी तत्त्व कविता में उपस्थित हैं, किंतु इनमें से कोई भी दूसरे पर प्रभुत्व स्थापित नहीं करता। अज्ञेय किसी एक दर्शन की व्याख्या नहीं करते; वे एक ऐसी काव्यभूमि रचते हैं जहाँ विभिन्न दार्शनिक संवेदनाएँ एक-दूसरे के साथ संवाद करती हैं। यही संवाद कविता को विचारधारात्मक संकीर्णता से बचाता है।

दार्शनिक दृष्टि से एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ‘असाध्य वीणा’ उपलब्धि की नहीं, प्रक्रिया की कविता है। आधुनिक सभ्यता सफलता, परिणाम और स्वामित्व को महत्त्व देती है। अज्ञेय इस मूल्य-दृष्टि को उलट देते हैं। उनके लिए सृजन किसी उपलब्धि का नाम नहीं है। वह आत्म-विसर्जन की प्रक्रिया है। कलाकार तब तक कलाकार नहीं बनता जब तक वह स्वयं को अपनी कृति का स्वामी मानता रहता है। जैसे ही वह अपने अधिकार-बोध से मुक्त होता है, सृजन संभव होता है। यह विचार आधुनिक कलादर्शन में भी महत्त्वपूर्ण है और भारतीय साधना-परंपरा से भी जुड़ता है।

सौंदर्यात्मक दृष्टि से ‘असाध्य वीणा’ आधुनिक हिंदी कविता की सबसे परिपक्व उपलब्धियों में गिनी जाती है। इसका कारण केवल इसकी भाषा या बिंब-योजना नहीं है, बल्कि इसकी समग्र कलात्मक संरचना है। कविता में कथा है, किंतु वह कथात्मक कविता नहीं रह जाती। उसमें प्रतीक हैं, किंतु वे अमूर्त नहीं हो जाते। उसमें दर्शन है, किंतु वह विचार-काव्य नहीं बनती। उसमें संगीत है, किंतु वह संगीत का विवरण नहीं देती। यह संतुलन उसकी सबसे बड़ी कलात्मक शक्ति है।

अज्ञेय की भाषा इस कविता में अपनी पूर्ण परिपक्वता पर दिखाई देती है। भाषा कहीं भी अनावश्यक अलंकरण से बोझिल नहीं होती। जहाँ राजसभा का प्रसंग है, वहाँ गरिमा है; जहाँ प्रियंवद का आत्म-संवाद है, वहाँ ध्यान की लय है; जहाँ प्रकृति उपस्थित है, वहाँ ध्वनि, गंध, स्पर्श और दृश्य एक साथ सक्रिय हो जाते हैं; जहाँ संगीत जन्म लेता है, वहाँ भाषा स्वयं विरल होने लगती है। इस प्रकार भाषा केवल कथन का माध्यम नहीं रहती; वह अनुभव की संरचना का हिस्सा बन जाती है।

कविता की बिंब-योजना भी उल्लेखनीय है। अज्ञेय दृश्य, श्रव्य, स्पर्श, गंध और गति—इन सभी इंद्रियबोधों का ऐसा संयोजन करते हैं कि पाठक केवल पढ़ता नहीं, अनुभव करने लगता है। प्रकृति के सूक्ष्म स्वर, ऋतुओं की लय, जल का प्रवाह, वृक्ष की विशालता और मौन की उपस्थिति—ये सब मिलकर ऐसी संवेदनात्मक दुनिया का निर्माण करते हैं जिसमें सौंदर्य किसी सजावट का परिणाम नहीं, बल्कि अनुभव की स्वाभाविक परिणति बन जाता है।

इस कविता का सौंदर्य उसके प्रतीकों की बहुस्तरीयता में भी निहित है। वीणा, वृक्ष, मौन, शून्य, संगीत, साधना और स्मृति—ये सभी प्रतीक अपने प्रत्यक्ष अर्थ से आगे बढ़ते हैं। वे पाठक को एक ही अर्थ पर नहीं रोकते। प्रत्येक पुनर्पाठ के साथ वे नए अर्थ ग्रहण करते हैं। यही कारण है कि यह कविता कभी समाप्त नहीं होती; वह प्रत्येक गंभीर पाठ में पुनः आरंभ होती है। किसी महान काव्य-कृति का यही गुण होता है कि उसका अर्थ समय के साथ क्षीण नहीं होता, बल्कि और विस्तृत होता जाता है।

सांस्कृतिक दृष्टि से ‘असाध्य वीणा’ की उपलब्धि और भी व्यापक है। यह कविता भारतीय सांस्कृतिक स्मृति को आधुनिक संवेदना के साथ जोड़ती है। अज्ञेय परंपरा का पुनरुत्थान नहीं करते, न उसका निषेध करते हैं। वे उसे पुनर्सृजित करते हैं। किरीटी-तरु, साधना, वीणा, मौन, नाद और प्रकृति—ये सब भारतीय सांस्कृतिक अनुभव के परिचित तत्त्व हैं, किंतु कविता में वे किसी पुरातन गौरव के प्रतीक नहीं बनते। वे आधुनिक मनुष्य के आत्म-संघर्ष का हिस्सा बन जाते हैं।

यही कारण है कि कविता सांस्कृतिक आत्मविश्वास का निर्माण करती है, सांस्कृतिक आत्ममुग्धता का नहीं। वह यह नहीं कहती कि भारतीय परंपरा सर्वोपरि है। वह यह दिखाती है कि भारतीय ज्ञान और सौंदर्य की परंपराओं में ऐसे जीवित तत्त्व हैं जिन्हें आधुनिक जीवन के संदर्भ में नए अर्थों के साथ समझा जा सकता है। इस प्रकार कविता अतीत और वर्तमान के बीच जीवंत संवाद स्थापित करती है।

आधुनिकता के संदर्भ में भी ‘असाध्य वीणा’ का विशेष महत्त्व है। हिंदी कविता में आधुनिकता को लंबे समय तक परंपरा से विच्छेद के रूप में देखा गया। अज्ञेय इस धारणा को बदलते हैं। वे दिखाते हैं कि आधुनिक होना अपनी सांस्कृतिक स्मृति से कट जाना नहीं है। आधुनिकता का अर्थ है—परंपरा के भीतर निहित अनुभवों को नए प्रश्नों और नई संवेदनाओं के साथ पुनः समझना। इस अर्थ में ‘असाध्य वीणा’ आधुनिकता और परंपरा के बीच रचनात्मक सेतु का कार्य करती है।

इस कविता का एक और सांस्कृतिक महत्त्व उसकी प्रकृति-दृष्टि में निहित है। आज जब पर्यावरणीय संकट पूरी दुनिया के सामने उपस्थित है, तब ‘असाध्य वीणा’ केवल प्रकृति-प्रेम की कविता नहीं रह जाती। वह मनुष्य और प्रकृति के संबंध की ऐसी नैतिकता प्रस्तुत करती है जिसमें अधिकार की जगह सहभागिता, उपभोग की जगह संवाद और स्वामित्व की जगह सह-अस्तित्व का भाव है। यह दृष्टि आज के समय में नई अर्थवत्ता ग्रहण करती है।

कलाकार की अवधारणा के संदर्भ में भी यह कविता आधुनिक हिंदी साहित्य को नया प्रतिमान देती है। रोमानी परंपरा में कलाकार को असाधारण प्रतिभा का स्वामी माना गया था। आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति में कलाकार कभी-कभी प्रसिद्धि और प्रदर्शन का केंद्र बन जाता है। अज्ञेय इन दोनों धारणाओं से अलग रास्ता चुनते हैं। उनके लिए कलाकार वह है जो स्वयं को केंद्र से हटाकर सृजन का माध्यम बन सके। उसकी महानता उसके अधिकार में नहीं, उसके आत्म-विसर्जन में है। यह दृष्टि कला को नैतिक गरिमा भी प्रदान करती है।

कविता का एक और स्थायी महत्त्व उसकी अर्थ-बहुलता में है। इसे भारतीय काव्यशास्त्र, बौद्ध दर्शन, अद्वैत, संगीत-दर्शन, पारिस्थितिक आलोचना, उत्तर-मानववाद, प्रतीकवाद, संरचनावाद, पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत, मार्क्सवादी, उत्तर-औपनिवेशिक और स्त्रीवादी दृष्टियों से पढ़ा जा सकता है। उल्लेखनीय बात यह है कि इन सभी दृष्टियों से पढ़े जाने पर कविता समाप्त नहीं होती। वह प्रत्येक दृष्टि को नए प्रश्न देती है। यही उसकी रचनात्मक समृद्धि का प्रमाण है।

यह बहुवाचकता किसी अस्पष्टता का परिणाम नहीं है। कविता का अपना केंद्र स्पष्ट है, किंतु वह इतना व्यापक है कि अनेक व्याख्याओं को अपने भीतर समाहित कर सकता है। बड़ी काव्य-कृतियों की यही विशेषता होती है। वे किसी एक आलोचनात्मक पद्धति से पूरी तरह नहीं खुलतीं; वे हर नई दृष्टि के साथ अपना एक नया पक्ष उद्घाटित करती हैं।

‘असाध्य वीणा’ से गुज़रते हुए महसूस होता है कि प्रचंड बौद्धिकता और गहरी संवेदना अनिवार्यत: परस्पर विरोधी नहीं होती । दर्शन अगर अनुभव में रूपांतरित हो जाए तो वह कविता को बोझिल नहीं बनाता । प्रतीक कविता को दुर्बोध नहीं बनाते, यदि वे जीवन से जुड़े हों। सांस्कृतिक स्मृति आधुनिकता की विरोधी नहीं होती, यदि उसका पुनर्सृजन किया जाए। कला का चरम प्रदर्शन नहीं, आत्म-विसर्जन भी हो सकता है। प्रकृति पृष्ठभूमि नहीं, संवाद की सहभागी हो सकती है। मौन निष्क्रियता नहीं, सृजन का स्रोत हो सकता है। इन सभी बिंदुओं पर ‘असाध्य वीणा’ आधुनिक हिंदी कविता के लिए एक नया सौंदर्यशास्त्र निर्मित करती है।

इसीलिए यह कविता केवल अज्ञेय की प्रतिनिधि रचना नहीं है। यह आधुनिक हिंदी कविता की उन आधारभूत उपलब्धियों में है जहाँ भाषा, विचार, दर्शन, संगीत, प्रकृति और संस्कृति एक-दूसरे में इस प्रकार रूपांतरित हो जाते हैं कि उन्हें अलग-अलग करके समझना संभव नहीं रहता। उसका स्थायी महत्त्व इसी समग्रता में निहित है। वह पाठक को केवल एक कविता नहीं देती; वह उसे देखने, सुनने, सोचने और सृजन को समझने की एक नई दृष्टि प्रदान करती है। इसी अर्थ में ‘असाध्य वीणा’ आधुनिक हिंदी कविता की दार्शनिक, सौंदर्यात्मक और सांस्कृतिक उपलब्धियों का एक शिखर-बिंदु है, जिसकी प्रासंगिकता समय के साथ कम नहीं होती, बल्कि प्रत्येक नए युग और प्रत्येक नए पाठ के साथ और अधिक गहरी होती जाती है।

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रवि रंजन

जन्म :  1962, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार

शिक्षा :   पी-एच.डी.

रूचि के क्षेत्र :  भक्तिकाव्य,  आधुनिक हिन्दी कविता,  आलोचना,  साहित्य का समाजशास्त्र,

प्रकाशित कृतियाँ :   ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’,  ‘सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन,दिल्ली (2011),  ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’ (2012),वाणी प्रकाशन, ‘वारसा डायरी’(2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’(2026), वाणी प्रकाशन, दिल्ली

विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में सौ से अधिक आलेख प्रकाशित.

राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भागीदारी.

‘वारसा डायरी’ के लिए ‘जयपुर साहित्य सम्मान  (2023)

प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय,बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा स्थापित पीठ (चेयर ) पर विजिटिंग प्रोफ़ेसर

प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवानिवृत्त), हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद

ई.मेल. :  raviranjan@uohyd.ac.in मो.9000606742

 


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