विश्वविख्यात पोलिश कवि तादेउश रोज़ेविच के युद्धोत्तर शून्य को व्यंजित करती उनकी प्रसिद्ध ‘दरवाज़ा‘ कविता से लेकर हिन्दी कविता को वैश्विक उंचाई प्रदान करनेवाले हमारे समय के संभवत: वरिष्ठतम भारतीय कवि अशोक वाजपेयी के अधखुले दरवाज़े और वरिष्ठ स्त्रीवादी कवि अनामिका के पिटे दरवाज़े से निकलते सृजनात्मक संचय तक—यह आलोचनात्मक यात्रा केवल पाँच कविताओं की तुलना नहीं है, बल्कि ‘दरवाज़ा जैसे एक ही रूपक के माध्यम से अस्तित्व, नैतिकता, लिंग, इतिहास और भाषा के उस संकट को समझने का प्रयास है जो आधुनिक मनुष्य के सामने बार-बार खड़ा होता रहा है।
इस क्रम में रोज़विच, नेरुदा, अशोक वाजपेयी और केदारनाथ सिंह द्वारा इस्तेमाल की गयी पुरुष-भाषा तथा एमिली डिकिंसन, एड्रिएन रिच, सिल्विया प्लाथ के साथ ही भारतीय स्त्री-कवि अनामिका और सविता सिंह द्वारा प्रयुक्त स्त्री-भाषा का विवेचन नई बहस को जन्म दे सकता है ।
टी. एस. एलियट की परंपरा की अवधारणा को आधार बनाकर प्रोफ़ेसर रवि रंजन ने जिस संवेदनशीलता और तार्किक अंदाज़ में रोज़ेविच की नग्न शून्यता, अशोक वाजपेयी की जानबूझकर की गई भूल, अनामिका के श्रम-चक्र और सविता सिंह की दार्शनिकता को एक साथ रखा है, वह हिंदी आलोचना में दुर्लभ है। यहाँ देरिदा का विखंडन, उपनिषदों की सजगता, नेरुदा का क्रांतिकारी लहज़ा , जॉन एशबरी की शब्द-क्रीड़ा और प्लाथ-डिकिंसन की स्त्री-दृष्टि—सब एक साथ साँस लेते हैं।
विशेष रूप से अशोक वाजपेयी की दो कविताओं—“दरवाज़ा” और “उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम”—के बीच का संवाद इस आलेख को एक गहरी आंतरिक गति प्रदान करता है। आलोचक रवि रंजन ने जिस सूक्ष्मता से अशोक वाजपेयी की ‘दरवाज़ा‘ कविता में “जानबूझकर भूलना” को पतंजलि योगसूत्र के ‘विभूतिपाद‘ में आए एक छंद में निहित भारतीय सजगता और देरिदाई फिसलन (स्लिपेज ऑफ़ सिग्निफायर्स), दोनों के साथ जोड़ा है, वह पाठक को बार-बार सोचने पर विवश करता है कि क्या कविता सचमुच सत्य को ‘खोलती‘ है या स्वयं एक ऐसा अधखुला दरवाज़ा बन जाती है जिसके पार अर्थ कभी स्थिर नहीं होता।
यह आलेख हिंदी कविता को केवल अपनी भाषा की सीमा में नहीं रखता, बल्कि उसे वैश्विक काव्य-चेतना के उस खुले आकाश के नीचे खड़ा करता है जहाँ शून्य भी सृजन की संभावना बन सकता है।
हमारा मानना है कि ऐसी आलोचना ही आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है—जो न तो परंपरा से भागती है, न आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता के सामने सिर झुकाती है, बल्कि इनके बीच की चौखट पर खड़े होकर नए अर्थ गढ़ती है।
‘रचना समय‘ का यह अंक पाठकों को केवल एक आलेख नहीं सौंप रहा, बल्कि एक दहलीज पर खड़ा कर रहा है—जहाँ से झाँकने पर शायद हम स्वयं को भी एक अधखुला दरवाज़ा पाएँ।
— हरि भटनागर
वैश्विक चौखट पर पाँच ‘दरवाज़ा’: शून्य से सृजन तक
(तादेउश रोज़ेविच, अशोक वाजपेयी,केदारनाथ सिंह, अनामिका और सविता सिंह की कविताओं का तुलनात्मक विवेचन) – रवि रंजन
सार्थक जीवन के हर छोर पर एक दरवाज़ा खड़ा होता है। यह दरवाज़ा सिर्फ लकड़ी या लोहे का कोई बेजान ढांचा नहीं है, बल्कि एक ऐसी कांपती हुई दहलीज़ है जो हमारे अतीत और भविष्य के बीच, हमारी यादों और विस्मृति के बीच, और हमारे दुखों तथा उनसे उबरने की तड़प के बीच खड़ी है। किसी दरवाज़े पर दस्तक देना, उसे अधखुला छोड़ देना, या उसका किसी अंतहीन शून्य में खुलना—यह सब असल में हमारे अस्तित्व की सबसे बुनियादी परतों से रूबरू होना है।
यह आलोचनात्मक आलेख ऐसे ही पाँच दरवाज़ों पर कान लगाकर उनकी आहट सुनने की कोशिश है। तादेऊश रोज़ेविच (Tadeusz Różewicz), अशोक वाजपेयी, केदारनाथ सिंह, अनामिका और सविता सिंह की कविताओं के ज़रिए यह आलेख एक वैश्विक संवाद में उतरता है, जहाँ ‘दरवाज़ा’ जैसा सीधा-साधा शब्द एक गहरे दार्शनिक सफ़र में बदल जाता है। यह सफ़र युद्ध के बाद तबाह हुए यूरोप से शुरू होकर आज के भारत तक आता है; और पुरुषों के बौद्धिक विमर्श से आगे बढ़कर स्त्रियों के भोगे हुए यथार्थ तक पहुँचता है।
इन पाँचों कवियों के यहाँ ‘दरवाज़े’ के मायने और उसकी भूमिका पूरी तरह बदल जाती है। जहाँ तादेऊश रोज़ेविच का दरवाज़ा बीसवीं सदी की उस भयानक त्रासदी और खाई की तरफ खुलता है जहाँ से सिर्फ़ ‘कुछ भी नहीं’ की ठंडी फुसफुसाहट लौटती है, वहीं अशोक वाजपेयी का दरवाज़ा कभी पूरी तरह बंद नहीं होता; वह इंसानी कमियों को स्वीकार करते हुए भीतर और बाहर के बीच एक संवेदनशील और करुणा भरी आवाजाही के लिए हमेशा खुला रहता है। इसी तरह, केदारनाथ सिंह अपने दरवाज़े को एक गहरे भरोसे और शांत आतिथ्य की तरह खुला छोड़ देते हैं, मानो उन्हें विश्वास हो कि खोया हुआ अतीत या इंसान एक न एक दिन ज़रूर लौट आएगा। इसके विपरीत, स्त्रियों के संघर्ष को रेखांकित करती अनामिका की ‘दरवाज़ा’ कविता में दरवाज़ा भले ही पितृसत्तात्मक हिंसा और चोटों से जर्जर है, लेकिन वह महज़ खुलता नहीं, बल्कि अपने साथ हुए अन्याय को अथक श्रम और एक व्यापक सामाजिक चेतना में बदल देता है। अंततः, सविता सिंह का ‘नीला दरवाज़ा’, जिसकी निगहबानी रात का सन्नाटा कर रहा है, इतिहास की तमाम यातनाओं और बंधनों से मुक्त होकर अनंत आकाश की ओर ले जाने वाला एक बेहद पवित्र और आध्यात्मिक रास्ता बन जाता है।
‘द इगोइस्ट’ पत्रिका में प्रकाशित‘परम्परा और वैयक्तिक प्रज्ञा’ (ट्रेडिशन एंड इंडिविजुअल टैलेंट, 1919) निबन्ध में टी.एस.एलियट का एक बहुउद्धृत कथन है कि “कोई भी कवि, कोई भी कलाकार, अकेले अपने आप में अपना पूरा अर्थ नहीं रखता। उसका महत्त्व और मूल्यांकन उन कवियों और कलाकारों के साथ उसके संबंध से बनता है जो उससे पहले आ चुके होते हैं।”
एलियट का यह विचार साहित्य और आलोचना के क्षेत्र में ‘परम्परा’ (Tradition) को समझने का एक आधार माना जाता है।उनके लिए कविता एकान्त आत्माभिव्यक्ति के बजाय परंपरा के भीतर घटित होने वाली सांस्कृतिक प्रक्रिया है—जहाँ नये कवियों का महत्त्व पुराने कवियों की उपस्थिति से मापा जाता है और पुराने कवियों की उपस्थिति नए कवि के आने से पुनः अर्थवान हो जाती है। आधुनिक हिन्दी कविता के इतिहास से अगर सिर्फ़ एक उदाहरण देकर इसे स्पष्ट करना हो,तो विश्व कविता और हिन्दी कविता समेत भारतीय कविता की परम्परा में निराला को रखकर देखा जा सकता है जिन पर रामविलास शर्मा समेत अनेक बड़े आलोचकों ने बहुत कुछ लिखा है।इस अर्थ में कहा जा सकता है कि कवि स्वयं भी एक दरवाज़ा होता है—जिससे होकर वर्तमान अतीत में और अतीत वर्तमान में प्रवेश करता हैं।
एलियट के इस मंतव्य को आधार कथन मानकर यहाँ ‘दरवाज़ा’ शीर्षक से पोलिश कवि तादेउश रोज़ेविच ((Tadeusz Różewicz: 1921-2014) के साथ ही समकालीन हिन्दी कविता को वैश्विक ऊँचाई प्रदान करनेवाले अशोक वाजपेयी, केदारनाथ सिंह, अनामिका और सविता सिंह की ‘दरवाज़ा’ शीर्षक कविताओं की पाठ-केन्द्रित अर्थ-मीमांसा करते हुए मूल्यांकन का प्रयास किया जा रहा है:
दरवाज़ा
रेड वाइन का एक प्याला
एक मेज़ पर टिका हुआ
एक अन्धेरे कमरे में
खुले दरवाज़े से
मैं देखता हूँ बचपन का एक दृश्यालेख
एक रसोईघर और एक नीली केतली
पवित्र ह्रदय
माँ की पारदर्शी छाया
बांग देता मुर्गा
एक सुडौल शान्ति में
पहला पाप
एक नन्हा सफ़ेद बीज
एक हरे फल में कोमल
कड़वा-सा
पहला शैतान गुलाबी है
और अपने गोलार्ध में घुमाता है
छींटदार रेशमी पोशाक में
रोशन दृश्यालेख में
एक तीसरा दरवाज़ा
खुलता है
और उसके पार धुँधलके में
पीछे की तरफ़
जरा सा बाएँ को
या फिर बीचोंबीच
मैं देखता हूँ
कुछ नहीं ।
साहित्यिक जगत में रोज़ेविच की कविताओं को अंग्रेजी में अनूदित करने का मुख्य और प्रामाणिक कार्य एडम कज़र्नियाव्स्की (Adam Czerniawski) और नोबेल पुरस्कार विजेता चेस्लाव मिलोज़ (Czesław Miłosz) द्वारा किया गया है। मिलोज़ द्वारा संकलित प्रसिद्ध पुस्तक “पोस्टवार पोलिश पोएट्री” में रोज़ेविच की कई महत्त्वपूर्ण कविताएँ शामिल हैं।
चेस्लाव मिलोज़ और एडम कज़र्नियाव्स्की के अनुवादों के आधार पर इस कविता का सबसे प्रामाणिक, अकादमिक और स्वीकृत अंग्रेजी रूप इस प्रकार है:
The Door
By Tadeusz Różewicz
A glass of red wine
resting on a table
in a dark room
through the open door
I see a landscape of childhood
a kitchen and a blue kettle
the sacred heart
the transparent shadow of my mother
a crowing cock
in a well-proportioned peace
the first sin
a tiny white seed
soft in a green fruit
somewhat bitter
the first devil is pink
and spins on his hemisphere
in a spotted silk dress
in the illuminated landscape
a third door
opens
and beyond it in the mist
to the rear
a little to the left
or else right in the middle
I see
nothing.
रोज़ेविच की यह कविता उनके युद्ध से उत्पन्न हुई अनुभूति का सघन उदाहरण है—जहाँ भाषा सपाट, विखंडित और प्रतीकात्मक है, और अर्थ किसी निष्कर्ष पर नहीं, बल्कि एक अस्तित्वगत रिक्ति पर जाकर ठहरता है।यह कविता स्मृति, अपराधबोध, नैतिकता और अर्थ-शून्यता के बीच डोलती हुई एक ऐसी आन्तरिक दृश्य-श्रृंखला रचती है, जिसे स्वयं कवि ‘दृश्यालेख’ कहता है। यह शब्द महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह कविता,नाटक नहीं या कथा के बजाय देखे जाने योग्य मानसिक चौखटें हैं, जिनमें भावनाएँ और विचार बिना व्याख्या के उपस्थित हैं।
कविता की शुरुआती पंक्तियाँ —“रेड वाइन का एक प्याला / एक मेज़ पर टिका हुआ / एक अन्धेरे कमरे में”—यूरोपीय चित्रकला की स्थिर–चित्र (still life) परम्परा की याद दिलाती है। ‘रेड वाइन’ यहाँ केवल पेय नहीं, बल्कि रक्त, पाप, संस्कार और यौवन का सांकेतिक घनत्व लिए हुए है। अन्धेरा कमरा चेतना का वह क्षेत्र है जहाँ स्मृति और अवचेतन सक्रिय होते हैं। खुले दरवाज़े से कवि ‘बचपन का एक दृश्यालेख’ देखता है। यहाँ बचपन ‘स्मृतिपूर्ण स्वर्ग’ के रूप में नहीं, बल्कि एक निरीक्षणीय, लगभग ठंडी दूरी से देखी गई चीज़ की तरह मौजूद है। रसोईघर, नीली केतली, माँ की पारदर्शी छाया—ये सब घरेलू, सुरक्षित और परिचित प्रतीक हैं, किन्तु ‘पारदर्शी छाया’ माँ की अनुपस्थिति, उसकी मृत्यु या स्मृति में बदल जाने का संकेत देती है। माँ यहाँ संरक्षण की मूर्ति नहीं, बल्कि एक लुप्त होती आकृति है।
कविता में ‘पवित्र हृदय’ और ‘बांग देता मुर्गा’ जैसे प्रतीकात्मक तत्त्व ईसाई परंपरा से आए हैं। ‘पवित्र हृदय’ करुणा और बलिदान का प्रतीक है।कविता में ‘मुर्गे की बांग’ का प्रतीक पीटर के इनकार और उसके पश्चात उत्पन्न अपराधबोध का एक गहन संकेत है। रोज़ेविच इस प्रतीक का उपयोग किसी धार्मिक संदर्भ में नहीं, बल्कि मानवीय कमजोरी और नैतिक चेतना को समझने-समझाने के लिए करते हैं। कवि दर्शाता है कि मासूमियत और सुरक्षा से भरे एक सामान्य घरेलू दृश्य में भी नैतिक असहजता और ‘पाप’ का जन्म हो सकता है। यहाँ पाप कोई नाटकीय या विस्फोटक घटना नहीं है, बल्कि एक सुंदर और सुडौल शांति के बीच होने वाली सूक्ष्म नैतिक स्खलन है।
बाइबिल की कथा में ईसा मसीह के सबसे क़रीबी शिष्य पीटर (Peter) ने डर के कारण तीन बार उन्हें पहचानने से इनकार किया था। जैसे ही मुर्गे ने बांग दी, ‘अंतिम भोज’ (The Last supper) के बाद ईसा मसीह की उस भविष्यवाणी का स्मरण हुआ कि “मुर्गे के बांग देने से पहले, तू तीन बार मेरा इनकार करेगा।” उस समय पतरस ने कहा था कि वह ऐसा कभी नहीं कर सकता और भले ही उसकी जान चली जाए। लेकिन ईसा की गिफ्तारी के समय उसने ख़ुद को उनका शिष्य बताने के बजाय इन्हें पहचानने से इनकार कर दिया था । जब मुर्गे ने बांग दी, तो पतरस को अपनी कायरता का एहसास हुआ और गहरा पश्चाताप हुआ जिसके तहत वह रोने-बिलखने लगा। इस पुरागाथा में ‘मुर्गे की बांग’ को ईसाई परंपरा में आत्मग्लानि, ग़लती का एहसास और नैतिक भरोसे के टूटने के स्थायी प्रतीक के रूप में माना जाता है। पीटर यहाँ उस मानवीय कमजोरी का प्रतिनिधि है जो आदर्श से प्रेम तो करता है, पर संकट के समय डर से अन्यायी के आगे झुक जाता है।
उल्लेखनीय है कि बाइबिल की सबसे मार्मिक घटनाओं में पीटर के पुनरुद्धार का प्रसंग भी एक है जो दर्शाता है कि पश्चाताप की अग्नि जब प्रेम से मिलती है, तो वह इंसान के चरित्र को फ़ौलाद बना देती है। पुनरुत्थान (जी उठने) के बाद तिबिरियास झील के किनारे ईसा मसीह ने पतरस को तीन बार प्रेम के इज़हार का मौक़ा दिया ताकि उसके मन से अपराधबोध (Guilt) पूरी तरह मिट जाए। हर बार जब पीटर ने अपने प्रेम की पुष्टि की, तो ईसा ने अपने चर्च की बड़ी जिम्मेदारी सौंपते हुए उससे कहा— “मेरी भेड़ों को चरा।” इसी पीटर ने, जो कभी डर के मारे छिप गया था, बाद में निडर होकर प्रचार किया और अंततः अपने विश्वास के लिए शहीद (Martyr) होना स्वीकार किया।
रोज़ेविच अपनी कविता में इस पूरी कथा को सीधे न कहकर केवल ‘बांग देते मुर्गे’ के माध्यम से संकेतित करते हैं। यह उस क्षण की ओर इशारा है जब बचपन की सुरक्षित दुनिया में पहली बार यह एहसास होता है कि हम पूरी तरह निर्दोष नहीं हैं। ‘पवित्र हृदय’ उस आदर्श दुनिया का प्रतीक है जहाँ सब कुछ साफ़ और भरोसेमंद है, वहीं ‘मुर्गे की बांग’ उस आदर्श के चुपचाप टूटने का संकेत है। कवि इसे ही ‘पहला पाप’ कहता है —भीतर पैदा होने वाली एक ऐसी नैतिक असहजता जो सामान्य जीवन की शांति में पैबस्त होती है।
कविता की पंक्ति ‘एक सुडौल शान्ति में / पहला पाप’ स्पष्ट करती है कि बुराई कोई असामान्य चीज़ नहीं, बल्कि यह सौंदर्य और सहजता के भीतर ही छिपी रहती है। जिस प्रकार एक हरे और कोमल फल के भीतर एक नन्हा, सफेद और कड़वा बीज होता है, वैसे ही ज्ञान और अनुभव के साथ मानवीय चेतना में कड़वाहट का प्रवेश अनिवार्य है। रोज़ेवोच का कहना कि ‘पहला शैतान गुलाबी है’, नैतिकता के पारंपरिक ढाँचे को ध्वस्त कर देता है। यहाँ शैतान भयावह नहीं, बल्कि आकर्षक और रेशमी है, जो आधुनिक सभ्यता की उस बुराई की ओर संकेत करता है जो सौंदर्य और चकाचौंध के आवरण में आती है। इस प्रकार, कवि पवित्रता और अपवित्रता के बीच की धुंधली रेखाओं को उजागर करते हुए एक अत्यंत मानवीय अनुभव को स्वर देता है ।
इस विश्वविख्यात कविता का दार्शनिक आधार द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की उस चेतना से निर्मित है, जहाँ मानवीय गरिमा और नैतिक मूल्य पूरी तरह खंडित हो चुके थे। उनके लिए युद्ध केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसी ‘शून्य’ की स्थिति थी जिसने भाषा और अर्थ के पुराने ढांचों को अर्थहीन कर दिया था। उनकी काव्य-दृष्टि में मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो ईश्वरविहीन दुनिया में अपने अस्तित्व की रक्षा करने की कोशिश कर रहा है। यहाँ ‘पतरस का अपराधबोध’ केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस पूरी पीढ़ी का सामूहिक बोध है जिसने सभ्यता को गिरते हुए देखा और कुछ न कर पाने की लाचारी को महसूस किया।
रोज़ेविच का दर्शन ‘अ-कविता’ (Anti-poetry) के विचार पर आधारित है। वे कविता में अलंकारों, छंदों और काल्पनिक सौंदर्य का विरोध करते हैं,क्योंकि उनका मानना है कि आउशवित्ज़ जैसे नरसंहारों के बाद सुंदर कविता लिखना अनैतिक है। इसलिए, उनकी भाषा बहुत सीधी, नग्न और खुरदरी होती है। जहाँ पारंपरिक कवियों ने पाप को बहुत भयावह दिखाया, वहीं रोज़ेवोच इसे ‘गुलाबी’ और ‘आकर्षक’ कहते हैं। उनका यह नज़रिया आधुनिक सभ्यता के प्रति एक गहरी विडंबना का सूचक है—एक ऐसी सभ्यता जहाँ बुराई विज्ञापन, फैशन और उपभोक्तावाद के माध्यम से अत्यंत सहज और सुंदर बनकर हमारे जीवन में प्रवेश करती है।
उनकी ‘द सर्वाइवर’ (The Survivor) कविता में भी यही दर्शन झलकता है। वे लिखते हैं कि युद्ध से बचा हुआ व्यक्ति अब ‘सच’ और ‘झूठ’, या ‘पवित्र’ और ‘अपवित्र’ के बीच भेद करने की सलाहियत खो चुका है। उसके लिए अब सब कुछ एक बराबर है—पशु, मनुष्य, वधशाला और घर। यह एक डरावनी तटस्थता है, जहाँ नैतिक चेतना पूरी तरह सुन्न हो गई है। रोज़ेवोच की कविताओं का मुख्य संघर्ष इसी जड़ता को तोड़ना और उस ‘नैतिक टूटन’ को पहचानना है जो ‘मुर्गे की बांग’ की तरह हमें बार-बार सचेत करती है।
‘सर्वाइवर’ (The Survivor) कविता की पंक्तियाँ ‘अ-कविता’ की शैली और उनके दार्शनिक संकट को पूरी तरह स्पष्ट करती हैं:
“मैं चौबीस वर्ष का हूँ / वध के लिए ले जाया गया / मैं जीवित बच निकला।“
(“I am twenty-four/led to slaughter/I survived.”)
“ये शब्द अब केवल शब्द मात्र हैं: / पुण्य और पाप / सत्य और असत्य / सुंदरता और कुरूपता / साहस और कायरता”।
(“The terms are only terms:/virtue and vice/truth and lie/beauty and ugliness/courage and cowardice.”
“इनका भार अब एक समान है: पुण्य और पाप / मैंने देखा है: / एक ऐसा मनुष्य जो एक साथ पुण्यात्मा भी था और पापी भी”।
(“Equally they weigh: virtue and vice/I have seen:/a man who was both virtuous and vicious.”)
“मैं एक गुरु और एक स्वामी की तलाश में हूँ / जो मेरी देखने, सुनने और बोलने की शक्ति लौटा दे / जो वस्तुओं और विचारों को फिर से नाम दे सके / जो प्रकाश को अंधकार से अलग कर सके”।
(‘I seek a teacher and a master/may he restore my sight hearing and speech/may he name objects and ideas again/may he separate the light from the darkness.’)
इन पंक्तियों में ‘वस्तुओं और विचारों को फिर से नाम देने’ की माँग सबसे महत्त्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि युद्ध के बाद भाषा इतनी दूषित हो चुकी थी कि ‘न्याय’ या ‘प्रेम’ जैसे शब्दों पर भरोसा करना मुश्किल हो गया था। कवि को एक ऐसे ‘नामकरण’ की ज़रूरत है जो शून्य से शुरू हो सके।
अशोक वाजपेयी जब ‘आश्वित्ज़’ कविता में कहते हैं कि ‘अगर हो सके तो / मैं अपने समय के लिए /उम्मीद की नई वर्णमाला लिखना चाहता हूँ’ या ‘इतिहास की कभी साफ़ न हो सकने वाली स्याह पड़ती स्लेट पर /उम्मीद की एक नई वर्णमाला लिखना चाहता हूँ’ ,तो प्रकारांतर से वे लगभग इसी मनोदशा को व्यक्त करते हैं ।
बहरहाल, रोज़ेविच की ‘दरवाज़ा’ कविता पर लौटें जिसके अंत में ‘एक तीसरा दरवाज़ा / खुलता है’। यदि पहला दरवाज़ा वर्तमान से स्मृति की ओर था और दूसरा नैतिक चेतना की ओर, तो तीसरा दरवाज़ा अस्तित्व के अंतिम प्रश्न की ओर खुलता है। किन्तु उसके पार कवि ‘कुछ नहीं’ देखता है। यह ‘कुछ नहीं’ निराशावादी शून्यता मात्र नहीं है, बल्कि रोज़ेवोच की कविता का दार्शनिक केन्द्र है। द्वितीय विश्वयुद्ध और ख़ासकर ‘होलोकॉस्ट’ के बाद उनके लिए इतिहास, ईश्वर, नैतिकता—सब संदिग्ध हो चुके थे। इस कविता में ‘कुछ नहीं’ उस स्थिति का नाम है जहाँ सभी अर्थ–संरचनाएँ ढह चुकी हैं, और मनुष्य अकेला, प्रश्नवाचक और बे-यक़ीन खड़ा है। इस कविता का शीर्षक ‘दरवाज़ा’ केवल एक भौतिक वस्तु का संकेत नहीं है, बल्कि पूरी कविता की संरचना, गति और अर्थ–दृष्टि को बाँधने वाला केन्द्रीय रूपक है। कविता वस्तुतः एक कमरे से दूसरे कमरे में जाने का नहीं, बल्कि चेतना की परतों के बीच खुलते–बंद होते दरवाज़ों का पाठ है।कविता की शुरुआत ही ‘खुले दरवाज़े’ से होती है। यह पहला दरवाज़ा वर्तमान से अतीत की ओर खुलता है। अँधेरे कमरे में रखा रेड वाइन का प्याला परिपक्व, अनुभव–भरा, थोड़ा बोझिल वर्तमान क्षण है । इसी वर्तमान से कवि बचपन के दृश्यालेख को देखता है। यह दरवाज़ा स्मृति का है, जिसके पार माँ, रसोईघर, नीली केतली जैसे सुरक्षित और आत्मीय चित्र दिखाई देते हैं। दरवाज़ा यहाँ दूरी भी बनाता है—बचपन में प्रवेश नहीं होता, केवल उसे देखा जाता है।
इसके बाद कविता में नैतिक और संवेदनात्मक संसार का एक और द्वार खुलता है। ‘पवित्र हृदय’, ‘बांग देता मुर्गा’, ‘पहला पाप’ जैसे संकेत बताते हैं कि यह दरवाज़ा मासूमियत से चेतना की ओर और निर्दोषता से अपराधबोध की ओर ले जाता है। यह कोई अचानक खुलने वाला द्वार नहीं, बल्कि चुपचाप सरकता हुआ दरवाज़ा है—जहाँ पहली बार मनुष्य को अपने भीतर की दरार का बोध होता है।फिर कविता स्पष्ट रूप से कहती है—‘एक तीसरा दरवाज़ा / खुलता है’। यह पंक्ति शीर्षक को सीधे कविता के भीतर ले आती है। यह तीसरा दरवाज़ा न स्मृति का है, न नैतिक शिक्षा का। यह अस्तित्व के अंतिम प्रश्न की ओर खुलता है—अर्थ, सत्य और अंतिम उत्तर की ओर। लेकिन उसके पार कवि को ‘कुछ नहीं’ दिखाई देता है। यही बिन्दु रोज़ेवोच की आधुनिक युद्धोतरयुगीन चेतना को स्पष्ट करता है। सभी दरवाज़ों के पार कोई ठोस सत्य या कोई स्थायी आश्वासन नहीं है।
इस प्रकार दरवाज़ा इस कविता में सिर्फ़ आने–जाने का रास्ता नहीं, बल्कि स्थिति–परिवर्तन का प्रतीक है—एक अवस्था से दूसरी अवस्था में प्रवेश का क्षण। हर दरवाज़ा कुछ दिखाता है, लेकिन साथ ही कुछ छुपा भी लेता है। अन्ततः जो दरवाज़ा सबसे अधिक अर्थ देने वाला लगता है, वही शून्य की ओर खुलता है। इसलिए कविता का शीर्षक ‘दरवाज़ा’ पूरी तरह सार्थक है, क्योंकि पूरी कविता दरवाज़ों के खुलने से बनी है—स्मृति का दरवाज़ा, नैतिक चेतना का दरवाज़ा और अस्तित्वगत शून्यता का दरवाज़ा। कविता स्वयं एक ऐसा दरवाज़ा बन जाती है, जिसके पार पाठक झाँकता है, लेकिन भीतर जाकर उसे कोई निश्चित उत्तर नहीं, केवल देखने की स्थिति मिलती है।
कुल मिलाकर, तादेउश रोज़ेवोच की यह कविता किसी कथा या सन्देश को नहीं, बल्कि अनुभव की विखंडित सच्चाई को प्रस्तुत करती है। वे भाषा को सजाते नहीं, बल्कि उसे लगभग असहाय छोड़ देते हैं, ताकि पाठक स्वयं उस रिक्ति का सामना करे। यही इस कविता की आलोचनात्मक महत्ता है—यह अर्थ नहीं देती, बल्कि अर्थ की अनुपस्थिति को ही अपना विषय बनाती है।
‘कहीं कोई दरवाज़ा’ कविता संग्रह के कवि अशोक वाजपेयी का कहना है कि “कविता का एक काम सचाई का दरवाज़ा खोलना होता है.वो दरवाज़े जो कई बार बंद होते हैं. वो दरवाज़े जिनका पता ही नहीं है कि वो हैं. वो दरवाज़े भी- अरसा हुआ जिनको बंद हुए जिन्हें किसी ने खोला ही नहीं. वो भी दरवाज़े जिन पर आप दस्तक दे सकते हैं,पर या तो संकोच के मारे या डर के मारे आप दस्तक नहीं देते हैं. कविता भी एक प्रकार का दरवाज़ा है जो आपको पुकारता है कि यहाँ आइए, मेरे पास आइए, दस्तक दीजिए .मुझे खोलिए.” (डिजिटल मीडिया पर काव्य-पाठ का पूर्व वक्तव्य )
अशोक वाजपेयी की कविताएँ हिंदी कविता की उस धारा का सबसे शुद्ध और परिष्कृत रूप हैं जहाँ भाषा न तो ज़ोर से चिल्लाती है, न भावुकता में बहती है—वह बस बोलती है, जैसे कोई बहुत पुराना, बहुत सजग दोस्त धीरे से बात कर रहा हो। उनकी कविता में विचार और भावना के बीच कोई खाई नहीं; दोनों एक-दूसरे में घुल जाते हैं। भाषा की सादगी और गहराई का यह मेल उनकी सबसे बड़ी ताकत है। शब्द रोज़मर्रा के हैं—दरवाज़ा, खिड़की, चाय, रोटी, बाल सुखाना—लेकिन उनका प्रयोग इतना सटीक और संयत है कि साधारण शब्द भी दार्शनिक गहराई ग्रहण कर लेते हैं। ‘दरवाज़ा’ में ‘फिसल ही जाता है’ या ‘जानबूझकर भूल जाते हैं’ जैसी पंक्तियाँ आम बोलचाल की लगती हैं, पर इन्हें पढ़कर जीवन का पूरा दर्शन सामने आ जाता है।
उनकी कविता का केंद्रीय विचार अपूर्णता और संतुलन का है। पूर्णता उनके लिए असंभव और अवांछनीय है। पूर्ण बंदी कठोरता है, पूर्ण खुलापन अराजकता। जीवन उस बीच की जगह में संभव है जहाँ थोड़ा-सा अधूरापन, थोड़ा-सा रिसाव, थोड़ा-सा भूलना बचा रहता है। ‘दरवाज़ा’ इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है, लेकिन यह भाव उनके अधिकांश काम में मौजूद है—‘उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम’ में प्रेम का लाचार होना, ‘कहीं कोई दरवाज़ा’ संग्रह की कई कविताओं में प्रेम, स्मृति और समय का अधूरापन।
मौन अशोक वाजपेयी की कविता का दूसरा बड़ा तत्त्व है। उनकी रचनाओं में जो कहा नहीं जाता, वही सबसे ज़्यादा व्यक्त होता है। वे बहुत कम शब्दों में अपनी बात कहकर बहुत कुछ छोड़ देते हैं। ‘उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम’ कविता में ‘वह कुछ कहती नहीं है / पर उसकी आँखों में डबडबाते हैं शब्द’—यह पंक्ति उनकी काव्य-दृष्टि का सार है। मौन उनके लिए विरोध नहीं, बल्कि एक प्रकार की गरिमा और संरक्षण है। यह मौन स्त्री के संदर्भ में भी आता है—वह बोलती नहीं, लेकिन जीती है ‘पोर-पोर पग-पग’।
घरेलू और दार्शनिक का मेल उनकी कविता की जान है। घर उनके लिए वह स्थान है जहाँ सबसे बड़ा दर्शन घटित होता है—अपूर्णता को स्वीकार करना, सीमाओं का सम्मान करना, और थोड़े से रिसाव को जीवन की श्वास मानना। प्रेम उनके यहाँ अक्सर लाचार खड़ा रहता है—दरवाज़े पर, खिड़की के बाहर। वह प्रवेश नहीं करता, क्योंकि प्रवेश करने से वह प्रेम नहीं रह जाता। यह प्रेम सहनशीलता, दूरी और सम्मान का प्रेम है। ‘उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम’ शायद उनकी सबसे मार्मिक प्रेम-कविता है—जहाँ प्रेम न तो विजयी होता है, न पराजित; वह बस लाचार खड़ा देखता रहता है।
उनकी कविता में आधुनिक जीवन की हड़बड़ी, डिजिटल गोपनीयता का क्षरण, स्त्री-श्रम का बोझ—सब मौजूद है। लेकिन वह अस्तित्व, सीमा, स्मृति, भूल, अपूर्णता से जुड़े शाश्वत सवालों को छूती है । यही कारण है कि उनकी कविता समय के साथ पुरानी नहीं पड़ती। वह हमें सिखाती है कि जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई शायद उसी अधखुले दरवाज़े में है जहाँ से थोड़ी-सी रोशनी आती है, थोड़ा-सा हवा आती है, और थोड़ा-सा हम भूल जाते हैं। यही उनकी कविता का सबसे बड़ा योगदान है—वह हमें अपूर्णता में जीना सिखाती है, और उसी अपूर्णता में सुंदरता देखना सिखाती है।
अशोक वाजपेयी की ‘दरवाज़ा’ कविता की बनावट और बुनावट (स्ट्रक्चर एंड टेक्सचर) रोज़ेविच की ‘दरवाज़ा’ से भिन्न है :
दरवाज़ा
दरवाज़ा खुल सकता था
कोई खोले तभी नहीं
अपने आप भी
क्योंकि पूरी तरह बंद नहीं था
किसी ने किया ही नहीं
सबको जाने की जल्दी होती है
ठीक से बंद करने की नहीं
जाने के बाद दरवाज़ा भुला दिया जाता है
अगर न जाते और वहीं बंद या घिरे रहते
तो दरवाज़ा बना रहता
उसका ख़याल रहता
दरवाज़ा घिरे हुए को रोकता है
और अनघिरे हुए को अन्दर आने से थामता है
दरवाज़ा न हो तो घिरा अनघिरा गड्डमड्ड हो जाए
आवाजाही दरवाज़े से होती है
पर फिर भी थोड़ा-सा बाहर-अंदर और थोड़ा-सा अन्दर-बाहर
फिसल ही जाता है
क्योंकि
दरवाज़ा कभी पूरी तरह से बंद नहीं होता
हम ऐसा करना जानबूझकर भूल जाते हैं
यह कविता वस्तु और विचार के बीच के अंतर्संबंधों को बहुत बारीकी से उधेड़ती है। कवि ने दरवाज़े को एक भौतिक जड़ वस्तु से ऊपर उठाकर उसे मानवीय व्यवहार और चेतना का विस्तार बना दिया है। कविता का आरंभ एक संभावना से होता है—खुल सकने की संभावना। यह इशारा है कि जीवन में बदलाव या संवाद की गुंजाइश हमेशा रहती है, भले ही हम उसे सक्रिय रूप से न अपनाएँ।
जब कवि कहता है कि सबको जाने की जल्दी होती है और ठीक से बंद करने की नहीं, तो वे सीधे आधुनिक जीवन की आपाधापी पर चोट करता है । मनुष्य अपनी मंज़िल या गंतव्य की ओर इतना केंद्रित है कि वह उन माध्यमों की परवाह करना छोड़ देता है जो उसे सुरक्षा या मार्ग प्रदान करते हैं। जाने के बाद दरवाज़ा भुला दिया जाना उस कृतघ्नता का प्रतीक है जो हम अक्सर अपने रिश्तों या अतीत के साथ निभाते हैं।जबकि वाल्मीकि रामायण समेत दुनिया भर के साहित्य में कृतज्ञता को एक मूल्य माना गया है। कविता का सबसे गंभीर हिस्सा वह है जहाँ कवि ‘घिरे और अनघिरे’ के बीच के फ़र्क को समझाता है। दरवाज़ा एक संतुलन है। अगर यह न हो, तो निजी एकांत और बाहरी दुनिया का कोलाहल एक-दूसरे में इस क़दर मिल जाएँगे कि व्यक्ति का अपना अस्तित्व धुंधला पड़ सकता है। लेकिन वह यह भी मानता है कि पूरा अलगाव असंभव है। भीतर का कुछ हिस्सा बाहर जाता ही है और बाहर का कुछ अंश भी भीतर ज़रूर आता है। यह फिसलन जीवंतता का सबूत है।
अंत में, जानबूझकर भूल जाने की बात कहकर कवि मानवीय कमज़ोरी को एक दार्शनिक गरिमा प्रदान करता है । हम पूर्णतः बंद नहीं होना चाहते, क्योंकि पूरी तरह बंद हो जाना एक प्रकार की जड़ता या मृत्यु है। एक अधखुला दरवाज़ा ही वह जगह है जहाँ से उम्मीद, हवा और रोशनी की आवाजाही बनी रहती है। यह कविता अंततः हमें हमारी अपनी अपूर्णताओं को स्वीकार करने और उन्हें जीने की प्रेरणा देती है।कविता साधारण वस्तु से शुरू होकर मानवीय अस्तित्व, नैतिकता और सामाजिक व्यवहार के जटिल प्रश्नों तक पहुँचने वाली कविता है। इसका अनोखापन इसी में है कि यह किसी भावनात्मक विस्फोट, रूपक–आडम्बर या दार्शनिक शब्दावली के सहारे नहीं, बल्कि लगभग गद्यात्मक, तर्कपूर्ण और शांत भाषा में गहरे निहितार्थ रचती है।
कविता में पहला ही कथन—‘दरवाज़ा खुल सकता था / कोई खोले तभी नहीं / अपने आप भी’—एक महत्त्वपूर्ण संकेत देता है। यहाँ दरवाज़ा किसी सक्रिय प्रयास से नहीं, बल्कि उपेक्षा और असावधानी से खुला रह गया है। यह सिर्फ़ भौतिक दरवाज़ा नहीं, बल्कि जीवन की वे सभी सीमाएँ हैं जिन्हें हम सचेत होकर नहीं तोड़ते, बल्कि लापरवाही से ढीला छोड़ देते हैं। कवि बताता है कि दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं था, क्योंकि ‘सबको जाने की जल्दी होती है / ठीक से बंद करने की नहीं’। यह पंक्ति आधुनिक जीवन की हड़बड़ी, सतहीपन और जिम्मेदारी से पलायन की तीखी आलोचना है।यहाँ ‘जाना’ केवल स्थान बदलने का संकेत नहीं, बल्कि सम्बन्धों, मूल्यों और प्रतिबद्धताओं से हटने का भी रूपक है। जब हम ‘जाने के बाद दरवाज़ा भुला देते हैं’, तो हम यह भी भूल जाते हैं कि किसी सीमा को बनाए रखना क्यों ज़रूरी था। यदि हम ‘न जाते और वहीं बंद या घिरे रहते’, तो दरवाज़ा बना रहता—अर्थात् यदि हम किसी स्थिति, रिश्ते या नैतिक दायित्व के भीतर ठहरते, तो सीमा का बोध बना रहता। दरवाज़ा तभी तक याद रहता है, जब तक भीतर और बाहर का फ़र्क जीवित है।
कविता का केन्द्रीय विचार उस जगह उभरता है जहाँ कवि कहता है—‘दरवाज़ा घिरे हुए को रोकता है / और अनघिरे हुए को अन्दर आने से थामता है’। यहाँ दरवाज़ा व्यवस्था, मर्यादा और संतुलन का प्रतीक है। यह न पूरी तरह क़ैद करता है, न पूरी तरह खुला छोड़ देता है। इसके अभाव में ‘घिरा अनघिरा गड्डमड्ड हो जाए’—यानी निजी और सार्वजनिक, सही और गलत, भीतर और बाहर का भेद मिट जाए। यह पंक्ति सामाजिक और नैतिक अराजकता की ओर स्पष्ट संकेत करती है।
इसके बावजूद कवि यह भी स्वीकार करता है कि आवाजाही दरवाज़े से ही होती है, लेकिन ‘थोड़ा-सा बाहर-अंदर और थोड़ा-सा अन्दर-बाहर / फिसल ही जाता है’। यानी कोई भी सीमा पूरी तरह कठोर नहीं होती। जीवन में कुछ रिसाव, कुछ अतिक्रमण अनिवार्य है। यहीं कविता का संतुलन दिखाई देता है—यह न तो कठोर अनुशासन की पक्षधर है, न पूर्ण स्वच्छन्दता की। समस्या सीमा के लचीले होने में नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह बंद करना ‘जानबूझकर भूल जाने’ में है। अंतिम पंक्ति—‘क्योंकि / दरवाज़ा कभी पूरी तरह से बंद नहीं होता / हम ऐसा करना जानबूझकर भूल जाते हैं’—कविता को गहरे नैतिक स्तर पर ले जाती है। यह भूल निर्दोष नहीं है; यह सचेत है। हम सीमाओं को इसलिए ढीला छोड़ते हैं ताकि जवाबदेही से बच सकें, ताकि यह न तय करना पड़े कि हम भीतर हैं या बाहर, पक्ष में हैं या विपक्ष में। इस कविता का अनोखापन यह है कि यह दरवाज़े को न प्रतीकात्मक रहस्य में ढँकती है, न भावुकता में डूबोती है । वह उसे एक सोचने वाली वस्तु बना देती है। कविता पाठक को यह नहीं बताती कि दरवाज़ा बंद होना चाहिए या खुला, बल्कि यह प्रश्न छोड़ती है कि हम उसे अधखुला क्यों छोड़ देते हैं। इसी प्रश्न में इस कविता का निहितार्थ, उसका नैतिक दबाव और उसका समकालीन महत्त्व निहित है।
‘दरवाज़ा’ कविता का शीर्षक उसकी अर्थ–संरचना का केन्द्रीय सूत्र है और यही शीर्षक उसे तादेयुश रोज़ेविच की समान शीर्षक वाली कविता से जोड़ते हुए भी निर्णायक रूप से अलग कर देता है। दोनों कविताओं में ‘दरवाज़ा’ एक साधारण वस्तु नहीं, बल्कि चेतना, नैतिकता और अस्तित्व के प्रश्नों को खोलने वाला रूपक है; परन्तु इन प्रश्नों की दिशा, तीव्रता और दार्शनिक परिणति दोनों कवियों में मूलतः भिन्न है। दरवाज़ा सबसे पहले सीमा और अनुशासन का प्रतीक है। शीर्षक इस कारण सार्थक है कि पूरी कविता इसी वस्तु के व्यवहार, उपेक्षा और उपयोग के इर्द-गिर्द घूमती है। दरवाज़ा यहाँ खुलने या बंद होने की नाटकीय घटना नहीं, बल्कि अधखुला छूट जाने का परिणाम है। ‘सबको जाने की जल्दी होती है / ठीक से बंद करने की नहीं’—यह पंक्ति स्पष्ट करती है कि दरवाज़ा मानवीय लापरवाही, हड़बड़ी और नैतिक गैर-जिम्मेदारी का सूचक है। कविता यह दिखाती है कि दरवाज़ा भीतर और बाहर, घिरे और अनघिरे, निजी और सार्वजनिक के बीच आवश्यक भेद रचता है। उसके बिना सब कुछ ‘गड्डमड्ड’ हो जाता है। इस अर्थ में शीर्षक पूरी तरह सार्थक है, क्योंकि कविता दरवाज़े को सामाजिक और नैतिक व्यवस्था के न्यूनतम उपकरण के रूप में स्थापित करती है।
इसके विपरीत, रोज़ेविच की कविता में दरवाज़ा सीमा का रक्षक नहीं, बल्कि चेतना का संक्रमण-बिन्दु है। वहाँ दरवाज़ा किसी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए नहीं, बल्कि एक स्थिति से दूसरी स्थिति में झाँकने के लिए खुलता है—वर्तमान से स्मृति, मासूमियत से पाप, और अन्ततःअर्थ से शून्यता की ओर। कवि यहाँ दरवाज़ा खुलने के बाद किसी संतुलन की स्थापना नहीं करता; वह उलटे हर दरवाज़े के पार किसी और अनिश्चितता को उजागर करता है। अन्तिम दरवाज़े के पार ‘कुछ नहीं’ दिखाई देना इस बात का संकेत है कि आधुनिक मनुष्य के लिए कोई अन्तिम नैतिक या आध्यात्मिक आश्रय शेष नहीं।
अशोक वाजपेयी की कविता का वैशिष्ट्य यह है कि वह दरवाज़े को नैतिक विवेक और जिम्मेदारी से जोड़ती है। यहाँ समस्या यह नहीं कि दरवाज़े के पार क्या है, बल्कि यह है कि हम दरवाज़े के प्रति लापरवाह क्यों हो गए हैं। उनका दरवाज़ा सामाजिक जीवन में आवश्यक सीमाओं की याद दिलाता है और यह बताता है कि पूर्ण खुलापन या पूर्ण बंदी—दोनों ही जीवन-विरोधी हैं। इसलिए वे स्वीकार करते हैं कि ‘थोड़ा-सा बाहर-अंदर… फिसल ही जाता है’। यह कविता संतुलन की पक्षधर है। इसके विपरीत, रोज़ेवोच का वैशिष्ट्य यह है कि उनकी कविता में दरवाज़ा किसी संतुलन पर नहीं टिकता। वह महायुद्धोत्तरयुगीन यूरोपीय चेतना की उस स्थिति को रूपायित करता है जहाँ स्मृति, अपराधबोध और नैतिकता—सब अन्ततः एक रिक्ति में विलीन हो जाते हैं। वहाँ दरवाज़ा खुलता है, परन्तु वह न रोकता है, न थामता है; वह केवल दिखाता है—और अन्त में कुछ भी नहीं दिखाता।
इस प्रकार समान शीर्षक होने के बावजूद दोनों कविताओं की आत्मा भिन्न है। रोज़ेवोच की ‘दरवाज़ा’ अस्तित्वगत अनिश्चितता और अर्थ-शून्यता की कविता है और अशोक वाजपेयी की ‘दरवाज़ा’ सामाजिक-नैतिक विवेक और मानवीय उत्तरदायित्व की कविता । शीर्षक दोनों में सार्थक है, पर एक में वह अर्थ के अभाव का द्वार है और दूसरे में व्यवस्था की चेतावनी है। यही भिन्नता दोनों कविताओं के अनोखे वैशिष्ट्य को स्पष्ट करती है।
अनामिका की ‘दरवाज़ा’ कविता का तेवर और निहितार्थ रोज़विच और अशोक वाजपेयी की कविताओं से स्वभावत: भिन्न है, जिसकी एक बड़ी वजह उनकी स्त्री-दृष्टि है :
दरवाज़ा
मैं एक दरवाज़ा थी
मुझे जितना पीटा गया
मैं उतना ही खुलती गई।
अंदर आए आने वाले तो देखा–
चल रहा है एक वृहत्चक्र–
चक्की रुकती है तो चरखा चलता है
चरखा रुकता है तो चलती है कैंची-सुई
गरज़ यह कि चलता ही रहता है
अनवरत कुछ-कुछ !
…और अन्त में सब पर चल जाती है झाड़ू
तारे बुहारती हुई
बुहारती हुई पहाड़, वृक्ष, पत्थर–
सृष्टि के सब टूटे-बिखरे कतरे जो
एक टोकरी में जमा करती जाती है
मन की दुछत्ती पर।
अनामिका उसी प्रतीक को ग्रहण करती हैं जिसे रोज़ेविच और अशोक वाजपेयी ने चुना है, पर उनका स्वर, अनुभूति और निहितार्थ अलग है। यहाँ दरवाज़ा न तो केवल चेतना का संक्रमण–बिन्दु है और न सामाजिक–नैतिक सीमा का उपकरण, बल्कि स्त्री देह, स्त्री अनुभव और स्त्री श्रम का रूपक बन जाता है। इसी कारण कविता का ‘दरवाज़ा’ शीर्षक अनामिका के यहाँ एक नई, अधिक तीखी और देहगत सार्थकता प्राप्त करता है। इस कविता की पहली पंक्ति—‘मैं एक दरवाज़ा थी’—ही निर्णायक है।इसके मुक़ाबले रोज़ेविच और अशोक वाजपेयी दोनों के यहाँ दरवाज़ा बाहरी वस्तु है, जिसे कवि देखता, परखता या समझता है। अनामिका के यहाँ दरवाज़ा स्वयं बोल रहा है। यह वस्तूकरण (ऑब्जेक्टिफिकेशन) नहीं, बल्कि आत्मपहचान है। स्त्री स्वयं को दरवाज़े के रूप में पहचानती है—जिसे पीटा जाता है, खोला जाता है, और जिसके भीतर से संसार आता–जाता है। ‘मुझे जितना पीटा गया / मैं उतना ही खुलती गई’—यह पंक्ति दरवाज़े को हिंसा, यौन उत्पीड़न और सामाजिक दबाव से जोड़ देती है। यहाँ खुलना स्वैच्छिक नहीं, बल्कि विवशता से पैदा हुआ है। यही बिन्दु इस कविता को दोनों पुरुष कवियों से निर्णायक रूप से अलग करता है। इस कविता में दरवाज़े के भीतर जो संसार दिखता है, वह भी विशिष्ट है। रोज़ेविच के यहाँ भीतर स्मृति और अन्ततः शून्यता है; अशोक वाजपेयी के यहाँ भीतर–बाहर का संतुलन और व्यवस्था का प्रश्न है। अनामिका के यहाँ भीतर लगातार चलता हुआ श्रम–चक्र है—चक्की, चरखा, कैंची–सुई, झाड़ू। ये प्रतीक स्त्री के अनवरत, अदृश्य और अवैतनिक श्रम के हैं। “गरज़ यह कि चलता ही रहता है / अनवरत कुछ-कुछ!”—यह पंक्ति स्त्री जीवन की उस निरन्तरता को पकड़ती है जिसमें रुकने की कोई गुंजाइश नहीं। कविता का अन्त इस दरवाज़े की भूमिका को और गहरा करता है। झाड़ू चलाती हुई स्त्री केवल सफ़ाई नहीं कर रही; वह ‘सृष्टि के सब टूटे-बिखरे क़तरे’ बटोर रही है। यहाँ दरवाज़ा केवल प्रवेश का स्थान नहीं, बल्कि संभालने, समेटने और अर्थ देने का केन्द्र बन जाता है। मन की दुछत्ती पर इन टुकड़ों को जमा करना रचनात्मकता और स्मृति का संकेत है। यह स्त्री की वह शक्ति है जो टूटे हुए को भी व्यर्थ नहीं जाने देती।
विशेष रूप से ‘मैं एक दरवाज़ा थी’ और ‘मुझे जितना पीटा गया / मैं उतना ही खुलती गई’ जैसी पंक्तियाँ इस कविता को स्त्री–स्वर देती हैं। यहाँ दरवाज़ा न तो दार्शनिक अमूर्तन है, न नैतिक रूपक मात्र, बल्कि पारिवारिक-सामाजिक हिंसा से गुज़री हुई स्त्री–देह और स्त्री–चेतना का प्रत्यक्ष रूप है। यही कारण है कि अनामिका की ‘दरवाज़ा’ कविता, समान शीर्षक के बावजूद तादेउश रोज़ेवोच और अशोक वाजपेयी की कविताओं से मिलते हुए भी उनसे नितांत भिन्न रुख अख्तियार करती हुई दरवाज़े को एक ऐसे अनुभव–केन्द्र में बदल देती है जहाँ से स्त्री का संसार, श्रम, पीड़ा और रचना—सब एक साथ दिखाई देते हैं।यह कविता पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के साथ होने वाली शारीरिक हिंसा और उससे उपजे मानसिक अनुकूलन (conditioning) को लेकर बहुत स्पष्ट, लेकिन बिना बयानबाज़ी के इशारा करती है। अनामिका इसे न तो प्रत्यक्ष आरोप की भाषा में कहती हैं, न ही पीड़ित-विलाप में; बल्कि एक गहरे रूपक के माध्यम से उस प्रक्रिया को दिखाती हैं, जिसमें हिंसा धीरे-धीरे ‘सहज’ और ‘कार्यशील’ बना दी जाती है।
“मैं एक दरवाज़ा थी”—यह कथन अपने आप में पितृसत्तात्मक दृष्टि का उद्घाटन है। स्त्री को यहाँ व्यक्ति नहीं, इस्तेमाल की चीज़ के रूप में देखा गया है—ऐसी वस्तु जिसे खोला जाता है, जिस पर प्रहार होता है, और जिससे आवाजाही संभव होती है। इसके बाद की पंक्ति—“मुझे जितना पीटा गया / मैं उतना ही खुलती गई”—सीधे शारीरिक हिंसा की ओर संकेत करती है। यह खुलना स्वीकृति या सहमति का नहीं, बल्कि हिंसा के परिणामस्वरूप पैदा हुई आदतन खुलना है। कविता यहाँ उस ख़तरनाक सामाजिक तर्क को उजागर करती है, जिसमें हिंसा को ‘अनुशासन’ या ‘सुधार’ का साधन मान लिया जाता है।
महत्त्वपूर्ण यह है कि कविता केवल हिंसा पर रुकती नहीं, बल्कि उसके बाद होने वाले मानसिक अनुकूलन को दिखाती है। भीतर का दृश्य—चक्की, चरखा, कैंची-सुई, झाड़ू—स्त्री के निरन्तर श्रम का संसार है। यह श्रम हिंसा के बावजूद नहीं, बल्कि हिंसा के साथ-साथ चलता रहता है। “गरज़ यह कि चलता ही रहता है / अनवरत कुछ-कुछ!”—यह पंक्ति उस मानसिक अवस्था को पकड़ती है जिसमें स्त्री रुकना भूल जाती है, प्रश्न करना छोड़ देती है, और जीवित रहने के लिए स्वयं को काम में ढाल लेती है। यही अनुकूलन है—हिंसा को जीवन की पृष्ठभूमि मानकर आगे बढ़ते रहना।कविता का अन्त इस अनुकूलन को और जटिल बना देता है। झाड़ू लगाती हुई स्त्री केवल सफ़ाई नहीं कर रही; वह टूटे-बिखरे टुकड़ों को समेट रही है। यह केवल दमन का चित्र नहीं, बल्कि स्त्री की अन्तर्निहित रचनात्मक शक्ति का भी संकेत है। लेकिन यह शक्ति भी एक ऐसी व्यवस्था के भीतर काम कर रही है, जहाँ स्त्री से अपेक्षा की जाती है कि वह सब कुछ सँभाल ले—दर्द भी, अव्यवस्था भी, और दूसरों द्वारा छोड़ा गया कचरा भी।
इस प्रकार यह कविता पितृसत्ता की दोहरी प्रक्रिया की ओर इशारा करती है—पहले हिंसा, फिर अनुकूलन। स्त्री को मारा जाता है, और जब वह खुल जाती है, तो उसी खुलाव को उसकी ‘प्रकृति’ मान लिया जाता है। बिना उसे सामान्य या स्वाभाविक ठहराए अनामिका की कविता इस प्रक्रिया को उजागर करती है । यही कारण है कि यह कविता केवल स्त्री-अनुभव का बयान नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक समाजव्यवस्था की गहरी आलोचना बन जाती है।
इस क्रम में समकालीन कवि सविता सिंह की “नींद थी और रात थी” संग्रह की ‘रात का दरवाज़ा’ कविता भी विचारणीय है :
कितनी अपनी है अब भी रात
सुनती है किस धीरज से रुदन विलाप
रहस्य की तरह बचा उल्लास
किस तरह छिपाये रखती है
कौतूहल उस स्वप्न के आगमन का
जिसे पाने के बाद वह सदा के लिए बदल जायेगी
अब भी कितनी अपनी
बचाये हुए उस नीले दरवाजे को
जिससे अनन्त निकला जा सकता है यातनाओं के पार
‘रात का दरवाज़ा’ पहली नज़र में एक नितांत वैयक्तिक और प्रशांत आत्म-संवाद प्रतीत होती है, किंतु गहराई में उतरने पर यह कविता स्त्री के एकांत, उसकी छिपी हुई आकांक्षाओं, और एक दार्शनिक मुक्ति-बोध का विराट दस्तावेज़ बन जाती है।
इस कविता का आलोचनात्मक मूल्यांकन करते हुए सबसे पहली बात जो उभरती है, वह है ‘रात’ का अनूठा मानवीकरण। परंपरा से साहित्य में रात को अक्सर अंधेरे, भय, अवसाद या फिर शृंगार के उद्दीपन विभाव के रूप में देखा गया है। इसके विपरीत, सविता सिंह की रचना में रात कोई डरावनी या बेगानी ताक़त नहीं है, बल्कि वह स्त्री की सबसे अंतरंग सहेली, उसकी सहचरी है। कविता की शुरुआत ही इस आत्मीय बोध से होती है—”कितनी अपनी है अब भी रात”। यह ‘अपनापन’ इस बात से प्रमाणित होता है कि रात बिना किसी पूर्वाग्रह, निर्णय या उपदेश के स्त्री के भीतर छिपे “रुदन विलाप” को “धीरज” से सुनती है। दिन का उजाला जिस स्त्री को एक तयशुदा सामाजिक भूमिका में बांधकर रखता है और उसे रोने तक की आज़ादी नहीं देता, वही स्त्री रात के सन्नाटे में अपने दुखों को व्यक्त कर पाती है, क्योंकि रात उसकी सबसे बड़ी राज़दार है।
कविता का दूसरा महत्त्वपूर्ण आयाम ‘उल्लास’ और ‘स्वप्न’ की उपस्थिति है। कवि ने उल्लास को “रहस्य की तरह बचा” हुआ कहा है। यह एक गहरी मार्मिक टिप्पणी है कि निरंतर संघर्षों और यातनाओं के बीच भी स्त्री ने अपने भीतर की ख़ुशी और कौतूहल को मरने नहीं दिया है; उसे एक रहस्य की तरह सहेज कर रखा है। यहाँ रात सिर्फ़ विलाप सुनने वाली नहीं है, बल्कि वह उस ‘स्वप्न’ के आने की प्रतीक्षा का कौतूहल भी छिपाये रखती है, जिसके आने के बाद सब कुछ सदा के लिए बदल जाएगा। यह स्वप्न किसी बेहतर भविष्य, पूर्ण स्वतंत्रता, या अपनी वास्तविक अस्मिता की पहचान का हो सकता है। यह बदलाव की वह आकांक्षा है जो स्त्री को पूरी तरह रूपांतरित करने का माद्दा रखती है।
अंतिम हिस्से में कविता एक असाधारण दार्शनिक और आध्यात्मिक ऊंचाई छूती है। यहाँ रात “उस नीले दरवाजे को” बचाए रखने का माध्यम बनती है। ‘नीला दरवाज़ा’ यहाँ एक बेहद अनूठा और गहरा प्रतीक है। नीला रंग असीमता, आकाश, शांति और गरिमा का प्रतीक है। यह दरवाज़ा वह मार्ग है जो स्त्री को उसकी रोज़मर्रा की सांसारिक और मानसिक “यातनाओं के पार” अनंत की ओर ले जा सकता है। यह पलायन नहीं है, बल्कि चेतना का वह विस्तार है जहाँ दुख अपना प्रभाव खो देते हैं। रात इस दरवाज़े की रक्षक है, जो स्त्री को याद दिलाती रहती है कि दुखों का यह संसार अंतिम नहीं है, इसके पार भी एक अनंत गरिमामयी दुनिया मौजूद है।
शिल्प और भाषा के स्तर पर, कविता अपनी सादगी में बेहद सघन है। सविता सिंह क्लिष्ट शब्दों का जाल नहीं बुनतीं, बल्कि “धीरज”, “रुदन विलाप”, “कौतूहल”, “नीला दरवाज़ा” जैसे सहज शब्दों के प्रयोग से एक गहरा दृश्य-बिम्ब और मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार करती हैं। कविता की लय धीमी, शांत और चिंतनपरक है, जो रात के सन्नाटे और मन की अंतर्यात्रा के बिल्कुल अनुकूल है। कविता में ‘अब भी’ का बार-बार आना इस बात को रेखांकित करता है कि तमाम बदलती और बिखरती दुनिया के बावजूद, आंतरिक एकांत और मुक्ति की यह संभावना अब भी बची हुई है।
वस्तुत: यह कविता सिर्फ़ एक स्त्री के व्यक्तिगत दुःख का विलाप नहीं है, बल्कि यह दमित इच्छाओं, छिपे हुए उल्लास और अंतहीन यातनाओं से उबरने की जिजीविषा की कविता है। सविता सिंह ने ‘रात’ को एक ऐसी सुरक्षित शरणस्थली के रूप में पुनर्परिभाषित किया है, जहाँ हर तरह के सामाजिक बंधनों से मुक्त होकर एक स्त्री अपने अस्तित्व को दोबारा पा सकती है और मुक्ति के ‘नीले दरवाज़े’ की ओर क़दम बढ़ा सकती है। यह कविता समकालीन स्त्री-विमर्श को एक दार्शनिक और आत्मीय गरिमा प्रदान करती है।
अनामिका की ‘दरवाज़ा’ और सविता सिंह की ‘रात का दरवाज़ा’ समकालीन हिंदी स्त्री-कविता के दो उल्लेखनीय रचनाएँ हैं। दोनों ही कविताएं ‘दरवाज़े’ के केंद्रीय रूपक को लेकर चलती हैं, लेकिन दोनों कवियों की वैचारिक दृष्टि, काव्यात्मक शिल्प और दार्शनिक निष्कर्षों में एक गहरा और दिलचस्प अंतर है। इन दोनों कविताओं का गंभीरता और विस्तार के साथ तुलनात्मक विश्लेषण करने पर स्त्री-जीवन के दो अलग-अलग क्षितिज और संघर्ष के अनुभव सामने आते हैं।
सबसे पहले, दोनों कविताओं में ‘दरवाज़े’ की मूल अवधारणा और उसकी स्थिति का अंतर विचारणीय है। अनामिका की कविता में स्त्री स्वयं एक वस्तुगत यथार्थ के रूप में ‘दरवाज़ा’ बन जाती है—”मैं एक दरवाज़ा थी”। यहाँ दरवाज़ा होना स्त्री के सामाजिक शोषण, उसकी सहनशीलता और उसकी नियति का प्रतीक है। समाज उस पर प्रहार करता है, उसे पीटता है, और विडंबना यह है कि वह जितना प्रताड़ित होती है, उतना ही दूसरों के लिए “खुलती” जाती है। यहाँ दरवाज़ा बाहरी दुनिया के क्रूर हस्तक्षेप और स्त्री की विवशता का माध्यम है। इसके ठीक विपरीत, सविता सिंह की रचना में दरवाज़ा स्त्री का अपना आंतरिक, सुरक्षित और गोपनीय कोना है—”बचाये हुए उस नीले दरवाजे को”। सविता सिंह का दरवाज़ा बाहर से पीटा जाने वाला कोई काष्ठ-कपाट नहीं है, बल्कि वह चेतना के भीतर बचा कर रखी गई एक संभावना है, जिसके पार अनंत शांति है। अनामिका का दरवाज़ा बाहरी दबावों से खुलता है, जबकि सविता सिंह का दरवाज़ा आंतरिक मुक्ति की ओर ले जाता है।
दूसरा महत्त्वपूर्ण अंतर दोनों कविताओं में वर्णित स्त्री के कार्य-जगत और उसके संघर्ष की प्रकृति का है। अनामिका की कविता पूरी तरह से स्त्री के घरेलू श्रम, उसकी रोज़मर्रा की यातना और एक कभी न ख़त्म होने वाले चक्र की शिनाख्त करती है। दरवाज़े के अंदर प्रवेश करने पर एक “वृहत्चक्र” दिखाई देता है, जहाँ चक्की, चरखा, कैंची-सुई जैसे उपकरण एक के बाद एक अनवरत चलते रहते हैं। यह स्त्री के अंतहीन घरेलू श्रम का यथार्थवादी और बेहद मारक चित्रण है। कविता का अंत और भी मारक है जहाँ इस पूरे श्रम और सृष्टि के टूटे-बिखरे कतरों पर अंततः “झाड़ू” चल जाती है। यह झाड़ू केवल घर की सफ़ाई नहीं है, बल्कि यह स्त्री के अस्तित्व, उसकी इच्छाओं और उसकी मेहनत को पोंछकर शून्य कर देने वाली सामाजिक निर्ममता है, जिसे वह अंत में “मन की दुछत्ती पर” समेट लेती है। इसके विपरीत, सविता सिंह की कविता इस सांसारिक और घरेलू चक्र से ऊपर उठकर एक दार्शनिक धरातल पर बात करती है। वहाँ भी “रुदन विलाप” और “यातनाएँ” मौजूद हैं, लेकिन कविता उस यातना के ब्योरों में जाने के बजाय सीधे उस मनोदशा की बात करती है जहाँ “रहस्य की तरह बचा उल्लास” और “स्वप्न का आगमन” है। सविता सिंह की स्त्री में इस चक्रव्यूह से मुक्त होने की छटपटाहट और क्षमता है।
तीसरा बिंदु दोनों कविताओं की दार्शनिक परिणति और अंतिम संदेश से जुड़ा है। अनामिका की कविता का अंत एक तरह की उदासी, विवशता और संचयबोध में होता है। सृष्टि के सारे टूटे-बिखरे कतरे अंततः मन की दुछत्ती (अटारी) पर धूल और मलबे की तरह जमा हो जाते हैं। यहाँ स्त्री स्मृतियों और दुखों का बोझ ढोने वाली एक मूक गवाह बनकर रह जाती है। कविता यथार्थ के उस क्रूर मोड़ पर समाप्त होती है जहाँ मुक्ति का कोई स्पष्ट मार्ग नहीं दिखता, केवल एक अनंत ठहराव और अवसाद है। दूसरी ओर, सविता सिंह की रचना यातनाओं के यथार्थ को स्वीकार करते हुए भी एक बेहद आशावादी और जादुई मोड़ पर समाप्त होती है। उनका ‘नीला दरवाज़ा’ वह मार्ग है जिससे “अनन्त निकला जा सकता है यातनाओं के पार”। उनकी स्त्री के पास एक स्वप्न है “जिसे पाने के बाद वह सदा के लिए बदल जायेगी”। इस प्रकार, अनामिका जहाँ स्त्री की वर्तमान सांसारिक नियति और उसके शोषण के चक्र को पूरी नग्नता के साथ अनावृत करती हैं, वहीं सविता सिंह उस नियति से परे जाने का एक मनोवैज्ञानिक और चेतस मार्ग खोजती हैं।
शिल्प और भाषा के स्तर पर भी दोनों कवयित्रियों का अपना विशिष्ट अंदाज़ है। अनामिका की भाषा ठोस, गद्यात्मक, दृश्यपरक और बिम्बों से भरी है। वे चक्की, चरखा, सुई, झाड़ू और टोकरी जैसे नितांत घरेलू और लोक-जीवन के प्रतीकों से एक विराट दृश्य बुनती हैं। उनकी लय में एक तरह की हड़बड़ाहट और निरंतरता है, जो कविता की प्रोटागोनिस्ट के ऊपर घरेलू काम के दबाव को दर्शाती है। इसके विपरीत, सविता सिंह की भाषा अधिक अमूर्त, काव्यात्मक, शांत और प्रतीकात्मक है। वे “धीरज”, “कौतूहल”, “उल्लास” और “नीला रंग” जैसे अमूर्त भावों के सहारे कविता बुनती हैं। सविता सिंह की रचना में एक आंतरिक संगीत और सन्नाटा है, जो रात के वातावरण के सर्वथा अनुकूल है।
आलोचनात्मक नज़रिए से देखें तो ये दोनों कविताएं परस्पर पूरक प्रतीत होती हैं। अनामिका जहाँ स्त्री-जीवन के उस कड़वे सच और सामाजिक शोषण को रेखांकित करती हैं जिसका सामना वह रोज़ करती है, वहीं सविता सिंह इस क्रूर यथार्थ के बीच स्त्री-अस्मिता को बचाए रखने के आंतरिक संघर्ष को स्वर देती हैं। संक्षेप में, अनामिका का सरोकार यदि स्त्री की सामाजिक देह और उसके श्रम के ‘दरवाज़े’ से है, तो सविता सिंह का सरोकार उसकी आत्मा और मुक्ति के ‘दरवाज़े’ से है। हिंदी स्त्री-विमर्श के इतिहास में ये दोनों वैचारिक दृष्टिकोण अत्यंत प्रासंगिक और अनिवार्य हैं।
दरवाज़ा विषयक इन कविताओं में एक समानता यह है कि इनमें ‘दरवाज़ा’ किसी स्थिर स्थिति का प्रतीक नहीं है। वह खुलता है, ढीला पड़ता है, चोट खाता है या संक्रमण की जगह बनता है। चारों ही कवि दरवाज़े को गतिशील मानते हैं। परन्तु भिन्नता यह है कि रोज़ेवोच के यहाँ दरवाज़ा अन्ततः शून्य की ओर खुलता है, अशोक वाजपेयी के यहाँ वह विवेक और सीमा की याद दिलाता है, जबकि अनामिका के यहाँ दरवाज़ा अनुभव, श्रम और देह की गवाही देता है और सविता सिंह के यहाँ मुक्ति का मार्ग दिखाता है।
इन कविताओं पर देरिदा द्वारा बहुविध विवेचित ‘संकेतकों की फिसलन’(Slippage of Signifiers) वाले सिद्धांत के तहत विचारने के पहले संरचनावाद एवं उत्तर-संरचनावाद में संकेतक और संकेतित के बीच द्वंद्वात्मक संबंध पर एक नज़र डालना औसत पाठक के हित में होगा। वस्तुत: भाषाविज्ञान और उत्तर-संरचनावाद के संदर्भ में संकेतक (Signifier ) का अर्थ गहरा और दार्शनिक है। आधुनिक भाषाविज्ञान के जनक माने जाने वाले सस्यूंर (Ferdinand de Saussure:1857-1913) से शुरू होकर देरिदा (Jacques Derrida:1930-2004) तक पहुँचते-पहुँचते इस शब्द ने अर्थ की पूरी समझ को बदल दिया है।संरचनावाद के अनुसार, कोई भी भाषाई ‘चिन्ह’ या संकेत (Sign) दो हिस्सों से मिलकर बनता है। पहला है संकेतक (Signifier), जो शब्द की ध्वनि, आकृति या लिखावट है (जैसे ‘द-र-वा-ज़ा’ ध्वनि)। दूसरा है संकेतित (Signified), जो उस शब्द को सुनकर हमारे मस्तिष्क में बनने वाली अवधारणा या मानसिक चित्र है (जैसे दरवाज़े का विचार)। सोस्युर का मानना था कि इन दोनों का संबंध निश्चित होता है।
लेकिन उत्तर-संरचनावाद और ख़ासकर देरिदा ने इस निश्चितता को विखंडित कर दिया। उनके अनुसार, एक ‘संकेतक’ (Signifier) कभी भी किसी एक निश्चित ‘संकेतित’ (Signified) तक नहीं पहुँचाता। बल्कि, एक संकेतक से दूसरा संकेतक निकलता है और अर्थ हमेशा फिसलता रहता है। उदाहरण के लिए, जब रोज़विच, अशोक वाजपेयी, अनामिका या सविता सिंह ‘दरवाज़ा’ कहते हैं, तो वह केवल एक लकड़ी का ढांचा (Signified) नहीं रह जाता, बल्कि वह ‘अवसर’, ‘ख़तरा’, ‘भूल’, या ‘आवाजाही’ अथवा काव्यार्थ का दरवाज़ा जैसे अन्य संकेतकों की ओर इशारा करने लगता है। इसे ही देरिदा ने संकेतकों की फिसलन (Slippage of Signifiers) कहा है। यहाँ अर्थ किसी एक बिंदु पर ‘उपस्थित’ होने के बजाय निरंतर ‘स्थगित’ (Defer) होता रहता है। अनामिका की कविता में ‘झाड़ू’ एक संकेतक है, जो सिर्फ़ सफ़ाई के काम को सूचित नहीं करता, बल्कि वह ‘स्त्री-श्रम’, ‘प्रतिरोध’ और ‘ब्रह्मांडीय संचय’ जैसे नए संकेतकों की एक शृंखला खोल देता है।वस्तुत: संकेतक वह ‘माध्यम’ या ‘शब्द’ है जो अर्थ की यात्रा शुरू तो करता है, लेकिन वह किसी एक अंतिम अर्थ पर रुकता नहीं है। अशोक वाजपेयी की कविता में जो ‘बाहर-अंदर फिसलना’ है, वह असल में संकेतकों की यही भाषाई फिसलन है, जहाँ सचाई किसी बंद कमरे की तरह स्थिर नहीं है, बल्कि वह एक प्रवाह की तरह गतिशील है।
याद रहे कि “संकेतकों की भाषाई फिसलन” (Linguistic Slippage of Signifiers) उत्तर-संरचनावाद और विखंडनवाद की एक विशेष अवधारणा है, जो यह स्पष्ट करती है कि भाषा में शब्दों के अर्थ कभी भी स्थिर, स्थायी या अंतिम नहीं होते। पारंपरिक भाषाविज्ञान जहाँ शब्द (संकेतक) और उसके अर्थ (संकेतित) के बीच एक निश्चित संबंध मानता था, वहीं जाक देरिदा और जाक लकान जैसे विचारकों ने प्रतिपादित किया कि शब्द हमेशा अपने निश्चित अर्थ से परे फिसलते रहते हैं। जब हम शब्दकोश में किसी शब्द का अर्थ ढूंढते हैं, तो हमें उस अर्थ को समझने के लिए कुछ और शब्द मिलते हैं, और यह श्रृंखला अंतहीन रूप से चलती रहती है, जिससे अर्थ कभी एक जगह ठहर नहीं पाता। संदर्भ, संस्कृति, समय और व्यक्तिगत अनुभवों के बदलते ही एक ही शब्द बिल्कुल नए अर्थ ग्रहण कर लेता है; जैसे साहित्य में एक साधारण ‘दरवाज़ा’ केवल लकड़ी का ढांचा न रहकर मुक्ति, बंधन, शोषण या चेतना का प्रतीक बन जाता है। इस प्रकार, यह भाषाई फिसलन यह सिद्ध करती है कि भाषा कोई जड़ या ठोस ढांचा नहीं है, बल्कि एक गतिशील और बहती हुई व्यवस्था है जहाँ अर्थ हमेशा विस्थापित होता रहता है, और यही फिसलन साहित्य को बहुआयामी तथा नए अर्थों को जनने की असीमित क्षमता प्रदान करती है।
संकेतकों की इस फिसलन को समाजशास्त्रीय और दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में और विस्तार से समझने के लिए हमें भाषा को एक सत्ता के रूप में देखना होगा। देरिदा का तर्क है कि ‘पाठ के बाहर कुछ भी नहीं है’ (There is nothing outside the text), जिसका अर्थ यह है कि हमारी पूरी सामाजिक सच्चाई संकेतकों की एक जटिल बुनावट है। फ़ूको की शब्दावली में कहें तो समाजशास्त्र में संकेतक अक्सर ‘शक्ति संबंधों’ और पहचान को परिभाषित करते हैं। जब अशोक वाजपेयी की कविता में दरवाज़ा पूरी तरह बंद होने के बजाय थोड़ा-सा फिसल जाता है, तो यह संकेतक की उस अस्थिरता को दर्शाता है जहाँ सामाजिक पहचानें—जैसे निजी और सार्वजनिक, या अपना और पराया—अपनी स्पष्टता खो देती हैं। समाजशास्त्रीय नज़रिए से यह फिसलन उस आधुनिक समाज की ओर संकेत है जहाँ सीमाओं का बने रहना असंभव होता जा रहा है।
संकेतक की इस फिसलन को हम समकालीन विमर्श के एक अन्य उदाहरण से देख सकते हैं। यदि हम घर शब्द को एक संकेतक मानें, तो संरचनावाद के लिए इसका एक निश्चित अर्थ था—एक चारदीवारी या निवास। लेकिन उत्तर-संरचनावादी फिसलन में घर संकेतक अब केवल स्थान नहीं रहा; वह सुरक्षा, क़ैद, याद, या अनामिका की कविता के संदर्भ में श्रम की एक निरंतरता बन गया है। संकेतक यहाँ अपने बुनियादी भौतिक अर्थ से फिसलकर वैचारिक अर्थों की एक शृंखला या ‘चेन ऑफ सिग्निफायर्स’ (Chain of Signifiers) निर्मित करता है। अनामिका की कविता में झाड़ू संकेतक का भौतिक अर्थ सफ़ाई है, लेकिन वह फिसलकर जब तारे बुहारने तक पहुँचता है, तो वह तुच्छता से महानता की ओर एक समाजशास्त्रीय छलांग लगाता है। ठीक वैसी ही वैचारिक और दार्शनिक फिसलन सविता सिंह की कविता ‘रात का दरवाज़ा’ में भी घटित होती है। यहाँ ‘दरवाज़ा’ और ‘रात’ केवल भौतिक वस्तु या समय के सूचक नहीं रह जाते, बल्कि वे ‘चेन ऑफ सिग्निफायर्स’ (Chain of Signifiers) का निर्माण करते हुए स्त्री-अस्मिता और चेतना के गहरे प्रतीकों में बदल जाते हैं।
भौतिक धरातल पर ‘दरवाज़ा’ लकड़ी या लोहे का एक ढांचा है जिसका काम सुरक्षा करना या बंद होना है, और ‘रात’ अंधकार का वह समय है जब दुनिया सोती है। लेकिन सविता सिंह की कविता में यह संकेतक अपने इस बुनियादी अर्थ से तुरंत फिसल जाता है। यहाँ ‘रात का दरवाज़ा’ स्त्री के उस अचेतन मन (Unconscious), उसकी दमित इच्छाओं और एकांत का सूचक बनता है जहाँ वह दिन भर के सामाजिक बंधनों, घरेलू श्रम और लैंगिक भूमिकाओं के दबाव से मुक्त होती है। दिन का समय यदि समाज, सत्ता और पितृसत्तात्मक नियमों का है, तो ‘रात’ स्त्री के अपने आत्म-साक्षात्कार का समय है। इस संदर्भ में ‘दरवाज़ा’ बंद होने के बजाय खुलता है—एक ऐसी आंतरिक दुनिया की ओर जहाँ वह अपनी खोई हुई अस्मिता और आत्मा की तलाश करती है।
यह भाषाई फिसलन तब और गहरी हो जाती है जब यह भौतिक सीमा को लांघकर मुक्ति और चेतना की शृंखला से जुड़ती है। अनामिका की कविता में झाड़ू जहाँ ‘श्रम की निरंतरता’ का प्रतीक है, वहीं सविता सिंह की कविता में दरवाज़ा ‘मुक्ति और आत्म-संरक्षण की निरंतरता’ का संकेतक बन जाता है। यहाँ दरवाज़े का खुलना या उसके पीछे जाना समाज से भागना नहीं, बल्कि क्रूर यथार्थ के बीच अपने भीतर के मनुष्य को बचाए रखने की एक दार्शनिक छलांग है। इस प्रकार, ‘रात का दरवाज़ा’ संकेतक अपनी भौतिकता से फिसलकर एक ऐसे वैचारिक विस्तार तक पहुँचता है जहाँ वह स्त्री की स्वतंत्रता, उसके अस्तित्व की गरिमा और उसकी रूहानी मुक्ति का दरवाज़ा बन जाता है। निवेदन है कि यह फिसलन ही वह स्थान है जहाँ हाशिए की आवाज़ें मुख्यधारा के अर्थों को चुनौती देती हैं।
उत्तर-संरचनावाद, मिशेल फ़ूको के शक्ति-सिद्धांत और ज़ाक देरिदा की संकेतकों की शृंखला (‘चेन ऑफ़ सिग्निफायर्स’) के आलोक में जब हम सविता सिंह की कविता ‘रात का दरवाज़ा’ का विश्लेषण करते हैं, तो यहाँ संकेतक की फिसलन और शक्ति-संबंधों का एक बिल्कुल अलग, गहरा और क्रांतिकारी समाजशास्त्रीय परिदृश्य उभरता है। अनामिका जहाँ संकेतक को भौतिक धरातल (श्रम, झाड़ू, चक्की) से उठाकर वैचारिक विस्तार देती हैं, वहीं सविता सिंह संकेतक को पूरी तरह से वि-उपनिवेशीकृत करके उसे दमन के तंत्र के विरुद्ध एक प्रति-विमर्श बना देती हैं।
मिशेल फ़ूको के अनुसार, शक्ति केवल दमन नहीं करती, बल्कि वह ज्ञान और विमर्शों का निर्माण भी करती है। पितृसत्तात्मक और पूंजीवादी समाजशास्त्र ने ‘रात’ को हमेशा एक ऐसे संकेतक के रूप में निर्मित किया जो भय, असुरक्षा, अकर्मण्यता या फिर वासना से जुड़ा था। यह विमर्श स्त्री को रात में घरों के भीतर क़ैद रखने या उसे ‘असुरक्षित’ घोषित करने के शक्ति-संबंधों से संचालित था। सविता सिंह इस संकेतक को उसके पारंपरिक अर्थ से पूरी तरह भटका देती हैं। उनकी कविता में रात “कितनी अपनी है” बन जाती है। यहाँ रात अब अंधकार या भय का संकेतक नहीं है, बल्कि वह पितृसत्तात्मक निगरानी से मुक्त एक ‘सुरक्षित स्थल’ बन जाती है। दिन का उजाला जहाँ फ़ूको के निगरानी तंत्र (‘पैनऑप्टिकॉन’) की तरह स्त्री पर नज़र रखता है और उसे अपनी पहचान को एक निश्चित सांचे में ढालने पर मजबूर करता है, वहीं रात का संकेतक इस निगरानी तंत्र को ध्वस्त कर देता है।
देरिदा के भाषा-दर्शन के अनुसार, किसी भी संकेतक का अर्थ स्थिर नहीं होता, वह लगातार आगे खिसकता रहता है। इस कविता में दुखों और यातनाओं का संकेतक स्थिर रहने के बजाय एक दार्शनिक फिसलन से गुज़रता है। कविता की शुरुआत “रुदन विलाप” से होती है, लेकिन यह विलाप केवल अवसाद पर जाकर नहीं रुकता। संकेतक यहाँ से फिसलकर “रहस्य की तरह बचा उल्लास” पर पहुँचता है, और वहाँ से आगे बढ़कर “स्वप्न के आगमन का कौतूहल” बन जाता है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह फिसलन असाधारण है। यह दर्शाती है कि दमन के सबसे घने दौर में भी (जिसे रात और रुदन से दिखाया गया है), स्त्री चेतना ने अपने भीतर प्रतिरोध और आनंद की एक समानांतर शृंखला निर्मित कर ली है। उल्लास का ‘रहस्य’ बने रहना ही यह सिद्ध करता है कि वह दमनकारी शक्तियों की पकड़ से बाहर है।
अशोक वाजपेयी के यहाँ दरवाज़े की फिसलन जहाँ निजी और सार्वजनिक के धुंधला होने या आधुनिक समाज की सीमाओं के टूटने को दर्शाती है, वहीं सविता सिंह के यहाँ ‘नीला दरवाज़ा’ संकेतक के अर्थ की एक अंतिम और जादुई फिसलन है। संरचनात्मक रूप से दरवाज़ा घर की सीमा तय करता है—अंदर और बाहर को बांटता है। लेकिन सविता सिंह का यह दरवाज़ा भौतिक नहीं, चेतनापरक है। ‘नीला’ संकेतक यहाँ केवल एक रंग नहीं है, बल्कि वह असीमता, आकाश और मुक्ति की वैचारिक शृंखला से जुड़ जाता है। इस दरवाज़े की फिसलन यह है कि यह किसी दूसरे भौतिक कमरे में नहीं खुलता, बल्कि “अनन्त” में खुलता है—”जिससे अनन्त निकला जा सकता है यातनाओं के पार”। यह समाजशास्त्र के उस नियम को तोड़ता है जिसके तहत मनुष्य अपनी सामाजिक परिस्थितियों और यातनाओं का क़ैदी है। यह दरवाज़ा संकेतक के माध्यम से स्थापित करता है कि स्त्री के पास अपनी यातनाओं के पार जाने की एक आंतरिक, व्यक्तिपरक स्वायत्तता हमेशा बची रहती है।
कविता की पंक्ति “जिसे पाने के बाद वह सदा के लिए बदल जायेगी” उत्तर-संरचनावाद के उस सिद्धांत की पुष्टि करती है जहाँ पहचानें कभी भी स्थिर या अंतिम नहीं होतीं, बल्कि वे हमेशा निर्माण की प्रक्रिया में होती हैं। सविता सिंह की स्त्री उस ‘स्वप्न’ के माध्यम से समाज द्वारा थोपी गई अपनी पारंपरिक पहचान का विखंडन करना चाहती है। वह जो है, वह अंतिम नहीं है; वह जो हो सकती है, उसकी संभावना हमेशा खुली है।
इस पूरे प्रसंग में ‘रात का दरवाज़ा’ कविता के बारे में कहा जा सकता है कि जहाँ अनामिका ‘घर’ और ‘श्रम’ के यथार्थवादी संकेतकों को समेटते हुए मन की दुछत्ती पर अवसाद और संचय का एक समाजशास्त्र रचती हैं, वहीं सविता सिंह ‘रात’ और ‘दरवाज़े’ जैसे पारंपरिक संकेतकों को उनके रूढ़ अर्थों से मुक्त कराकर स्त्री-मुक्ति का एक अमूर्त, दार्शनिक और विद्रोही विमर्श खड़ा करती हैं। उनकी कविता यह बताती है कि भाषा और व्यवस्था ने स्त्री के लिए जितने भी बंद दायरे बनाए हों, संकेतकों की उत्तर-संरचनावादी फिसलन के सहारे वह अपने लिए हमेशा एक ‘नीला दरवाज़ा’ ढूंढ ही लेती है।
इसे समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में समझने का एक और कारगर बिंदु यह है कि संकेतकों का अर्थ समाज की सत्ता संरचना द्वारा तय किया जाता है। जिसे हम सचाई कहते हैं, वह अक्सर सत्ता द्वारा स्थिर किए गए संकेतकों का एक समूह होता है। देरिदा का विखंडन और इन कवियों का भाषाई विन्यास उस स्थापित सचाई के दरवाज़े को इसलिए खोलता है क्योंकि वे संकेतक को उसकी जड़ता से मुक्त कर देते हैं। उदाहरण के लिए रोज़ेवोच के यहाँ जब नीली केतली का संकेतक युद्ध के बाद के शून्य से टकराता है, तो वह केवल एक बर्तन नहीं रह जाता, बल्कि वह पूरी खोई हुई सभ्यता का संकेतक बन जाता है। यहाँ अर्थ का फिसलना दरअसल पाठक को उस मानसिक दासता से मुक्त करना है जो शब्दों के एक ही अर्थ को अंतिम मान लेती है।
अशोक वाजपेयी की कविता का यह निष्कर्ष – ‘हम दरवाज़ा बंद करना जानबूझकर भूल जाते हैं’- समाजशास्त्रीय रूप से एक प्रकार की उत्तर-आधुनिक उदारता है। यह इस बात की स्वीकृति है कि कोई भी संकेतक कभी भी पूरी सचाई को क़ैद नहीं कर सकता। अर्थ हमेशा थोड़ा-सा बाहर और थोड़ा-सा अंदर फिसलता रहेगा। यही वह फिसलन है जो समाज को कट्टरता से बचाती है और संवाद की गुंजाइश बनाए रखती है। कविता इसी फिसलन का उपयोग करके उस सचाई का दरवाज़ा खोलती है जिसे समाजशास्त्र अक्सर आँकड़ों और परिभाषाओं में बंद करना चाहता है।
भाषाविज्ञान और समाजशास्त्र के धरातल पर जब हम संकेतों की इस ‘फिसलन’ को देखते हैं, तो इसका अर्थ और भी स्पष्ट हो जाता है। संकेतों का अर्थ कभी भी किसी एक बिंदु पर स्थिर नहीं रहता। उदाहरण के लिए, जब हम किसी कविता में ‘दरवाज़ा’ शब्द को एक संकेतक के रूप में देखते हैं, तो यह शब्द केवल लकड़ी के एक ढांचे की ओर इशारा नहीं करता, बल्कि यह अपनी मूल परिभाषा से फिसलकर ‘अवसर’, ‘सीमा’ या ‘रहस्य’ जैसे अन्य संकेतों की एक शृंखला बना देता है।अशोक वाजपेयी की पंक्तियों में अर्थ का यह ‘बाहर-अंदर फिसलना’ वास्तव में संकेतकों की अस्थिरता को दर्शाता है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से, जिसे हम ‘सत्य’ मानते हैं, वह वास्तव में सत्ता और समाज द्वारा थोपे गए स्थिर संकेतों का एक समूह होता है। जब कविता इन संकेतों को उनकी जड़ता से मुक्त करती है, तो वह भाषा के भीतर एक लोकतांत्रिक स्पेश क़ायम करती है। यहाँ ‘दरवाज़ा’ शब्द अब एक वाचक के रूप में किसी एक निष्कर्ष पर नहीं रुकता। वह एक ‘खुले पाठ’ की तरह व्यवहार करता है, जहाँ पाठक अपनी परिस्थितियों के अनुसार नए अर्थ ढूँढ सकता है।
अनामिका की कविता में ‘झाड़ू’ या ‘चक्की’ जैसे संकेतक अपनी पारंपरिक और घरेलू पहचान से फिसलकर स्त्री-अस्तित्व के ‘वृहत्चक्र’ के प्रतीक बन जाते हैं। यह फिसलन ही वह प्रक्रिया है जो किसी भी वस्तु को उसकी तुच्छता से बाहर निकालकर उसे दार्शनिक गरिमा प्रदान करती है। यदि अर्थ स्थिर होता, तो झाड़ू केवल एक सफ़ाई का उपकरण बनी रहती, लेकिन संकेतकों की इस फिसलन ने उसे ‘तारे बुहारने’ वाली एक ब्रह्मांडीय शक्ति में बदल दिया। दूसरे शब्दों में अनामिका की ‘दरवाज़ा’कविता इन संकेतकों को उस मन की दुछत्ती पर संचित करती हैं जो पितृसत्तात्मक इतिहास के रैखिक समय के विरुद्ध एक चक्रीय और सृजनात्मक समय का निर्माण करता है।
अनामिका और सविता सिंह के बीच का यह वैचारिक प्रस्थान बिंदु समकालीन कविता और ख़ासकर स्त्री-कविता का संभवत: सबसे सुंदर और जटिल मोड़ है। जहाँ अनामिका ‘झाड़ू’ और ‘चक्की’ जैसे घरेलू संकेतकों को उनके पारंपरिक अर्थ से फिसलाकर ब्रह्मांडीय और चक्रीय समय (Cyclic Time) की ओर ले जाती हैं, वहीं सविता सिंह इन संकेतकों की पूरी भौतिक दुनिया को ही विखंडित (Deconstruct) करके ‘शून्य’ और ‘अमूर्तन’ (Abstraction) का एक समानांतर समाजशास्त्र रचती हैं।
यदि अनामिका की प्रक्रिया ‘तुच्छ से महान’ या ‘लौकिक से ब्रह्मांडीय’ की ओर जाने वाली एक ऊर्ध्वगामी छलांग है, तो सविता सिंह की प्रक्रिया ‘भौतिक से आत्मिक’ और फ्रांसिस फुकुयामा (Francis Fukuyama) की शब्दावली में ‘इतिहास से मुक्ति’ की ओर जाने वाली एक क्षैतिज यात्रा है। सविता सिंह की ‘रात का दरवाज़ा’ कविता इन संकेतकों के खेल में जो करती है, उसे कुछ बहुत सूक्ष्म दार्शनिक आयामों से समझा जा सकता है।
अनामिका जहाँ इतिहास और पितृसत्ता के रैखिक समय के विरुद्ध एक ‘चक्रीय और सृजनात्मक समय’ का निर्माण करती हैं—जहाँ काम कभी ख़त्म नहीं होता और चीज़ें मन की दुछत्ती पर जमा होती रहती हैं—वहीं सविता सिंह इस चक्रीय समय के अंतहीन चक्रव्यूह (Vicious विशाल चक्र) को ही तोड़ देती हैं। वे स्त्री को उस चक्रव्यूह में संचय करने के लिए नहीं छोड़तीं। सविता सिंह की रचना में ‘रात’ एक ऐसा समय है जो न रैखिक है और न ही सिर्फ़ चक्रीय; वह ‘विश्राम और रूपांतरण का समय’ (Transformative Time) है। वह एक ऐसा ठहराव है जहाँ इतिहास की गूँज धीमी पड़ जाती है। सविता सिंह की स्त्री समय को बुहारकर जमा नहीं करती, बल्कि वह समय के पार जाने की आकांक्षा रखती है—”जिसे पाने के बाद वह सदा के लिए बदल जायेगी”।
अनामिका के यहाँ संकेतकों की फिसलन वस्तु से शुरू होती है (झाड़ू से तारे बुहारना), जबकि सविता सिंह के यहाँ संकेतक पहले से ही अमूर्त और संवेगात्मक हैं। वे किसी झाड़ू, चक्की या सुई-कैंची का नाम तक नहीं लेतीं। उनके संकेतक हैं—”धीरज”, “रुदन विलाप”, “उल्लास” और “स्वप्न”। सविता सिंह भौतिकता का पूरी तरह से निषेध (Negation) कर देती हैं। वे यह मानती हैं कि यदि स्त्री भौतिक वस्तुओं और घरेलू उपकरणों के संसार में ही फँसी रहेगी, तो वह चाहे जितनी ब्रह्मांडीय छलांग लगा ले, अंततः उसका पैर उसी यथार्थ की ज़मीन पर रहेगा जिसमें वह घुटन महसूस करती है । इसलिए, सविता सिंह स्त्री के अस्तित्व को वस्तुओं की निर्भरता से मुक्त करती हैं। उनके यहाँ ‘उल्लास’ किसी काम को करने से नहीं पैदा होता, बल्कि वह एक “रहस्य की तरह बचा” हुआ है, जो शुद्ध रूप से आत्मिक है।
अनामिका की कविता ‘मन की दुछत्ती’ पर दुखों, स्मृतियों और सृष्टि के टूटे-बिखरे कतरों का एक भव्य ‘संग्रहालय’ (Archive) बनाती है। यह इतिहास के विरुद्ध स्त्री का अपना एक दस्तावेज़ है। इसके विपरीत, सविता सिंह ‘संचय’ के इस तर्क को ही ख़ारिज कर देती हैं। उनकी स्त्री दुखों को सहेजती नहीं है, बल्कि वह “यातनाओं के पार” जाना चाहती है। सविता सिंह की रचना का ‘नीला दरवाज़ा’ कोई ऐसी जगह नहीं है जहाँ कचरा या बुरी यादें जमा की जाएँ; वह तो ‘अनंत’ की ओर खुलने वाला मार्ग है। अनामिका की स्त्री जहाँ दुछत्ती पर अपनी दुनिया समेटकर बैठ जाती है, वहीं सविता सिंह की स्त्री उस ‘नीले दरवाज़े’ से बाहर निकल जाती है। यह ‘संग्रह’ के विरुद्ध ‘मुक्ति’ का विमर्श है।
देरिदा और फ़ूको के चिंतन के ही प्रसंग में बात करें तो, अनामिका संकेतकों की शृंखला को सामाजिक यथार्थ के भीतर ही फैलाती हैं, जिससे एक ‘वृहत्चक्र’ निर्मित होता है। सविता सिंह उस श्रृंखला या चेन को तोड़कर एक ‘प्रति-संसार’ (Counter-Universe) का निर्माण करती हैं। दिन का संसार यदि दमन और सीमाओं का संसार है, तो सविता सिंह ‘रात’ को एक राजनैतिक और दार्शनिक स्पेस में बदल देती हैं जहाँ सीमाओं का कोई मूल्य नहीं रह जाता। उनकी कविता में ‘नीला’ रंग चेतना के असीम फैलाव का संकेतक है।
संक्षेप में कहें तो, जहाँ अनामिका पितृसत्ता के थोपे गए यथार्थ और औज़ारों को ही अपनी सृजनात्मकता से महिमावान बनाकर उन्हें ‘प्रतिरोध का चक्र’ बनाती हैं, वहीं सविता सिंह उस यथार्थ और उन औज़ारों को पूरी तरह से अप्रासंगिक घोषित कर देती हैं। अनामिका स्त्री को इतिहास के भीतर एक नए समय की रचना करते हुए दिखाती हैं, जबकि सविता सिंह स्त्री को इतिहास की यातनाओं से मुक्त कराकर ‘अनंत के नीले आकाश’ में स्थापित कर देती हैं। अनामिका की कविता यदि यथार्थ का ब्रह्मांडीय विस्तार है, तो सविता सिंह की कविता उस यथार्थ का दार्शनिक और आत्मिक अतिक्रमण है।
कहना न होगा कि संकेतों का यह विस्थापन स्पष्ट करता है कि भाषा कोई बंद कमरा नहीं है जिसे पूरी तरह बंद किया जा सके। अशोक वाजपेयी के यहाँ ‘जानबूझकर भूलना’ दरअसल इसी संकेतकीय तरलता को स्वीकार करना है। यह इस बात की स्वीकृति है कि सत्य हमेशा व्याख्याओं के बीच ‘फिसलता’ रहेगा और उसे किसी एक परिभाषा में क़ैद करना असंभव है।
यहाँ ध्यान में रखना आवश्यक है कि भाषा के संकेत किस प्रकार अपनी निश्चित परिधि से बाहर निकलकर अर्थ की एक अनंत शृंखला का निर्माण करते हैं।
अशोक वाजपेयी के इस सूत्रवाक्य को कि ‘कविता सचाई का दरवाज़ा खोलती है’, यदि हम वैश्विक काव्य-परंपरा के आईने में देखें, तो तादेयुश रोज़ेविच, अशोक वाजपेयी,अनामिका और सविता सिंह की कविताएँ सचाई के किसी एक बंद कमरे की ओर नहीं ले जातीं, बल्कि वे स्वयं को एक ऐसी फिसलन भरी दहलीज़ के रूप में स्थापित करती हैं जहाँ अर्थ निरंतर निर्मित और विखंडित होता रहता है।रोज़ेवोच की कविता में दरवाज़ा और नीली केतली जैसे संकेत युद्धोत्तर (Post-war) समाज की उस शून्यता के वाचक हैं जहाँ इतिहास का मलबा स्मृतियों को दबा चुका है। यहाँ संकेतक अपनी भौतिकता से फिसलकर एक अस्तित्ववादी अभाव में बदल जाते हैं।
टी.एस. एलियट की कृति ‘बर्न्ट नॉर्टन’ (Burnt Norton) की वे पंक्तियाँ ,जहाँ वे उस दरवाज़े की बात करते हैं ‘जिसे हमने कभी नहीं खोला’ (Towards the door we never opened), डिजिटल मीडिया पर अशोक वाजपेयी द्वारा काव्य पाठ के पहले दिए गये संक्षिप्त वक्तव्य और रोज़ेवोच के उस तीसरे दरवाज़े के समानांतर खड़ी प्रतीत होती हैं ,जहाँ देखने के लिए कुछ नहीं शेष बचता। रोज़ेवोच का शून्य असल में संकेतों का वह विलोपन है जो पाठक को एक ऐसी त्रासदी के सम्मुख खड़ा करता है जहाँ भाषा स्वयं को विसर्जित कर देती है। यह एज़रा पाउंड के उस बोध का विस्तार है जहाँ शब्द अपनी अर्थवत्ता खो देते हैं और केवल वस्तुओं का शोकगीत शेष रह जाता है।यहाँ एज़रा पाउंड के जिस ‘बोध’ की यहाँ चर्चा की जा रही है, वह वस्तुतः उनकी ‘इमेजिज़्म’ (Imagism) या ‘चित्रवाद’ की अवधारणा से जुड़ा है। पाउंड का मानना था कि कविता में अनावश्यक विशेषणों का प्रयोग बंद होना चाहिए और शब्द को वस्तु के साथ सीधे टकराना चाहिए।जब शब्द अपनी परंपरागत अर्थवत्ता (decorative meaning) खो देते हैं और केवल ‘वस्तु’ (Object) की नग्नता शेष रह जाती है, तो वह एक प्रकार का ‘शोकगीत’ (Elegy) या शून्य बन जाता है।इस बोध को उनकी सबसे प्रसिद्ध और संक्षिप्त कविता – ‘इन अ स्टेशन ऑफ़ मेट्रो’(1913) में सबसे सटीक रूप से घटित देखा जा सकता है:
“मेट्रो के एक स्टेशन में
भीड़ में इन चेहरों का यह आभास:
मानो भीगी, स्याम सरोरुह पर बिखरीं पंखुड़ियाँ।“
(“In a Station of Metro
The apparition of these faces in the crowd:
Petals on a wet, black bough.”)
यह कविता पाउंड के उस विचार का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ शब्द केवल एक छवि (Image) बनकर रह जाते हैं ।यहाँ ‘आभास या भूत’ (Apparition) शब्द चेहरों की क्षणभंगुरता को दर्शाता है।जो शब्द जो किसी व्यक्ति की गरिमा या व्यक्तित्व का वर्णन कर सकते थे, वे यहाँ खो गए हैं और केवल ‘वस्तुगत’ सादृश्य (पेटल्स यानी पंखुड़ियाँ) शेष रह गया है।यह आधुनिक जीवन की निर्वैयक्तिकता का एक ‘शोकगीत’ है।
अपनी पुस्तक ‘अ रेट्रोस्पेक्ट’ (A Retrospect’,1918) में उन्होंने कविता के लिए जो नियम दिए, उनमें से एक प्रमुख कथन यह है : वस्तु का सीधा उपचार, चाहे वह व्यक्तिपरक हो या वस्तुपरक”।(Direct treatment of the ‘thing’ whether subjective or objective.) और एक अन्य प्रसिद्ध निर्देश भी है : “पूर्णतः ऐसे किसी भी शब्द का प्रयोग न करें जो प्रस्तुति में योगदान न देता हो”। (To use absolutely no word that does not contribute to the presentation.) यह दर्शन स्पष्ट करता है कि जब लेखक शब्दों को अलंकार से मुक्त कर देता है, तो वे केवल ‘वस्तु’ के अस्तित्व की गवाही देते हैं, जो अक्सर आधुनिकता के संदर्भ में उदासी या शोक पैदा करती है।
अशोक वाजपेयी की कविता में दरवाज़े का थोड़ा-सा बाहर-अंदर फिसलना वास्तव में देरिदा के उस सिद्धांत का काव्यात्मक साक्ष्य है जिसे वे ‘संकेतकों की फिसलन’(Slippage of Signifiers) कहते हैं। यहाँ दरवाज़ा कोई स्थिर सत्य नहीं है, बल्कि वह एक ऐसी प्रक्रिया है जहाँ अंदर और बाहर का द्वैत लगातार भंग हो रहा है। ओक्टावियो पाज़ की कविता ‘बिटवीन गोइंग एंड स्टेइंग’ (Between Going and Staying) में जो पारदर्शिता और अछूतापन है, वही अशोक वाजपेयी के यहाँ उस फिसलन में बदल जाता है जहाँ हम चीज़ों को जानबूझकर भूल जाते हैं। यह भूलना यक़ीनी के खिलाफ़ एक दार्शनिक चुनाव है। अमेरिकी महाकवि जॉन एशबरी की तरह अशोक वाजपेयी भी यह मानते हैं कि सतह ही वह सब कुछ है जो वहाँ है (‘The surface is all that there is’ : John Ashbery,1927-2017)। यहाँ संकेतक किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय एक प्रवाह का हिस्सा बन जाते हैं, जो पाठक को अर्थ की क़ैद से मुक्त कर देता है।
याद रहे कि जॉन एशबरी की यह पंक्ति (‘The surface is all that there is’) उनकी काव्य-चेतना और उत्तर-आधुनिक (Post-modern) दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण सूत्र है। इसका गूढ़ अर्थ उस पारंपरिक धारणा को चुनौती देना है जो मानती है कि सत्य हमेशा किसी चीज़ की गहराई में, उसके पीछे या उसके नीचे छिपा होता है। एशबरी यहाँ तर्क देते हैं कि जो कुछ भी प्रत्यक्ष है, जो हमारी आँखों के सामने सतह पर घटित हो रहा है, वही पूर्ण सत्य है। गहराई की तलाश अक्सर हमें भ्रमित करती है, क्योंकि हम उस चीज़ को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जो वास्तव में हमारे सामने मौजूद है।
कला और कविता के संदर्भ में इसका अर्थ यह है कि एक पेंटिंग का रंग, उसकी बनावट और उसका कैनवास ही उसका अंतिम सत्य है, न कि उसके पीछे छिपा कोई रहस्यमयी दार्शनिक संदेश। एशबरी के लिए ‘सतह’ (Surface) सतहीपन का संकेत नहीं है, बल्कि यह उस जटिलता का स्वीकार है जिसे हम अक्सर ‘गहराई’ के नाम से सरल बनाने की कोशिश करते हैं। वे कहना चाहते हैं कि जीवन का अनुभव खंडित, अस्थिर और निरंतर बदलती हुई छवियों का एक प्रवाह है। इस प्रवाह की सतह ही वह एकमात्र स्थान है जहाँ हम वास्तव में निवास करते हैं और अनुभव प्राप्त करते हैं।
दार्शनिक रूप से यह पंक्ति इस बात की ओर इशारा करती है कि भाषा और वास्तविकता के बीच कोई ‘छिपी हुई दुनिया’ नहीं है। जिस प्रकार एक दर्पण की सतह पर दिखने वाली छवि ही उस क्षण की वास्तविकता होती है, उसी प्रकार हमारे विचार और शब्द भी अपनी सतह पर ही अपना अर्थ रखते हैं। एशबरी हमें उस अंतहीन खोज से मुक्त करते हैं जहाँ हम अर्थ की गहराई ढूँढते-ढूँढते वर्तमान क्षण की दृश्यमान सुंदरता और वास्तविकता को खो देते हैं। उनके लिए सतह ही संपूर्ण है, क्योंकि जो कुछ भी ‘गहरा’ है, वह भी अंततः सतह पर ही किसी न किसी रूप में प्रकट होता है। इस प्रकार, ‘सतह ही सब कुछ है’ का अर्थ है जीवन को उसकी समग्रता में, उसके बाहरी रूप और तात्कालिकता के साथ स्वीकार करना।
गौरतलब है कि जॉन एशबरी और तादेउश रोज़ेविच के भाषाई विन्यास का अंतर उनके दर्शन की तरह ही विपरीत ध्रुवों पर स्थित है। एशबरी की शब्दावली अत्यंत समृद्ध, जटिल और बहुस्तरीय है। उनके वाक्य अक्सर लंबे, घुमावदार और व्याकरणिक रूप से विचलित करने वाले होते हैं। वे भाषा का उपयोग पाठक को एक ऐसी भूलभुलैया में ले जाने के लिए करते हैं जहाँ अर्थ स्थिर नहीं रहता। एशबरी की ‘सतह’ भाषाई चमक और शब्दों के अंतहीन प्रवाह से बनी है, जहाँ एक विचार दूसरे में विलीन हो जाता है। बहसतलब मंतव्य होने के बावजूद यह कहा जा सकता है कि उनकी भाषा में एक प्रकार का ‘बौद्धिक विलास’ है, जो पाठक को अर्थ की तलाश के बजाय भाषा के सौंदर्य में उलझाए रखता है।इसके विपरीत, रोज़ेविच की शब्दावली ‘अस्थि-पंजर’ की तरह नग्न और न्यूनतम है। उन्होंने अपनी कविता से विशेषणों, अलंकारों और यहाँ तक कि विराम चिह्नों को भी लगभग बाहर कर दिया था। उनकी वाक्य संरचना छोटी, सीधी और प्रहार जैसी होती है। रोज़ेविच के लिए भाषा अब विलास की वस्तु नहीं, बल्कि एक टूटे हुए औज़ार की तरह है। वे ‘मलबे की भाषा’ का उपयोग करते हैं, जहाँ शब्द अपने अर्थ के बोझ से दबे हुए और थके हुए लगते हैं। उनकी भाषा का सपाटपन पाठक को कोई सुरक्षा नहीं देता, बल्कि उसे सीधे उस कड़वे सत्य के सामने खड़ा कर देता है जिसे वे ‘दृश्यमान’ कहते हैं।
जहाँ एशबरी की भाषा एक ‘कॉन्वेक्स मिरर’ (उत्तल दर्पण) की तरह दृश्य को फैलाती और अलंकृत करती है, वहीं रोज़ेविच की भाषा एक ‘एक्स-रे’ की तरह है जो बाहरी खाल को उतारकर सीधे उस हड्डी को दिखाती है जहाँ चोट लगी है। एशबरी की शब्दावली में दर्शन, कला और रोजमर्रा की बातचीत का एक कोलाज है, जबकि रोज़ेविच की शब्दावली केवल अस्तित्व के लिए अनिवार्य शब्दों—जैसे रोटी, वध, शरीर, और भय—तक सीमित रहती है। एशबरी की कविता एक सुंदर ‘सतह’ पर नृत्य करती है, जबकि रोज़ेवोच की कविता उस सतह पर रेंगती हुई अपनी साँसें गिन रही होती है।जॉन एशबरी और तादेउश रोज़ेविच की शैलियों का भाषाई अंतर पाठक को दो बिल्कुल अलग मानसिक अवस्थाओं में ले जाता है। इसे समझने के लिए उनके वाक्यों के प्रभाव और पाठक की प्रतिक्रिया पर विचार करना आवश्यक है।
एशबरी की भाषा पाठक के भीतर एक प्रकार का ‘बौद्धिक भटकाव’ (Intellectual Wanderlust) पैदा करती है। जब पाठक एशबरी को पढ़ता है, तो वह शब्दों के एक प्रवाह में बहता है जहाँ एक अर्थ दूसरे की ओर संकेत तो करता है, लेकिन उसे कभी पकड़ नहीं पाता। एशबरी की शब्दावली में ‘होना’ और ‘दिखना’ के बीच का फासला बहुत धुंधला है। पाठक का अनुभव एक ऐसे व्यक्ति की तरह होता है जो एक विशाल और चमकदार गैलरी में खड़ा है, जहाँ हर पेंटिंग सुंदर है पर उसका कोई निश्चित शीर्षक नहीं है। यह शैली पाठक को सक्रिय बनाती है कि वह अपने अर्थ स्वयं गढ़े, क्योंकि कवि ने सतह पर सब कुछ बिखेर दिया है।इसके विपरीत, रोज़ेवोच की भाषा पाठक के भीतर ‘नैतिक स्तब्धता’ (Moral Numbness) या एक भारी चुप्पी पैदा करती है। उनके छोटे और विराम-रहित वाक्य पाठक को संभलने का मौका नहीं देते। जब रोज़ेविच लिखते हैं, तो वे भाषा को एक ‘डॉक्यूमेंट्री’ की तरह इस्तेमाल करते हैं। पाठक को यहाँ अर्थ गढ़ने की आज़ादी नहीं मिलती, बल्कि उसे उस कड़वे सत्य को ‘सहना’ पड़ता है जो कवि ने उसके सामने रख दिया है। यह अनुभव एक ऐसी खाली वधशाला में खड़े होने जैसा है जहाँ सब कुछ साफ कर दिया गया है, पर हवा में अभी भी एक भारीपन मौजूद है।एशबरी की जटिलता जहाँ पाठक को ‘विस्मय’ (Wonder) से भरती है, वहीं रोज़ेवोच की सरलता उसे ‘शर्म’ या ‘अपराधबोध’ (Guilt) के करीब ले जाती है। एशबरी की भाषा एक खेल (Play) है, जबकि रोज़ेवोच की भाषा एक गवाही (Witness) है। एशबरी की शब्दावली में संसार का ‘विस्तार’ है, जबकि रोज़ेवोच की शब्दावली में संसार का ‘संकुचन’ है, जहाँ केवल वही बचता है जो अत्यंत अनिवार्य है।
जॉन एशबरी और तादेउश रोज़ेवोच का वैश्विक प्रभाव आधुनिक कविता के दो अलग-अलग रास्तों को प्रशस्त करता है। एशबरी ने जहाँ कविता को अर्थ की निश्चितता से मुक्त कर उसे एक भाषाई खेल और अमूर्त कला के करीब पहुँचाया, वहीं रोज़ेविच ने कविता को इतिहास की क्रूरता और नैतिक जिम्मेदारी के प्रति जवाबदेह बनाया।
एशबरी का प्रभाव मुख्य रूप से उन कवियों पर पड़ा जो भाषा की संरचना और ‘उत्तर-आधुनिक’ जटिलता में रुचि रखते थे। अमेरिका और यूरोप के अकादमिक और कलात्मक हलकों में एशबरी को ‘कवियों का कवि’ माना गया। उनकी शैली ने यह सिखाया कि कविता का उद्देश्य हमेशा संवाद करना ही नहीं, बल्कि भाषा के माध्यम से एक नया अनुभव निर्मित करना भी है। समकालीन भारतीय अंग्रेज़ी कविता के साथ ही अज्ञेय,विष्णु खरे और अशोक वाजपेयी की रचनाओं में एशबरी का प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है।इन कवियों ने कई बार अर्थ की स्पष्टता के बजाय बिंबों के विखंडन और भाषाई प्रयोगों को अधिक महत्त्व दिया है ।
इसके विपरीत, तादेउश रोज़ेविच का प्रभाव उन क्षेत्रों और कवियों पर अधिक रहा जिन्होंने युद्ध, तानाशाही और मानवीय संकटों का सामना किया है। रोज़ेवोच की ‘अ-कविता’ और ‘शून्य की भाषा’ ने पूरी दुनिया के उन कवियों को प्रेरित किया जो त्रासदी के बाद लिखने की चुनौती से जूझ रहे थे। उनकी शैली ने सिखाया कि जब दुनिया टूट रही हो, तो कविता को सुंदर दिखने की ज़रूरत नहीं है; उसे केवल सच्चा और ईमानदार होना चाहिए।
हिंदी कविता की बात करें, तो रोज़ेवोच का गहरा प्रभाव धूमिल सरीखे साठोत्तरी कविता और उसके बाद के कवियों पर दिखाई देता है। मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ जैसी कविताओं में जो नैतिक छटपटाहट और मलबे के बिंब हैं, वे कहीं न कहीं रोज़ेवोच की काव्य-संवेदना के करीब हैं। रघुवीर सहाय, कुंवर नारायण और अशोक वाजपेयी जैसे कवियों ने जिस तरह से घरेलू दृश्यों के भीतर छिपी हिंसा और नैतिक पतन को पकड़ा, उसमें रोज़ेविच जैसी ही तटस्थता और ‘दृश्यमान’ सत्य की खोज दिखाई देती है। हिंदी के अनेक कवियों ने एशबरी के ‘सतह’ के दर्शन की तुलना में रोज़ेवोच की ‘नैतिक टूटन’ को भारतीय समाज की विषमताओं के करीब पाया है और कविता लिखी है ।
इस प्रकार, एशबरी और रोज़ेवोच मिलकर आधुनिक कविता का वह विस्तार पूरा करते हैं जहाँ एक ओर भाषा का असीमित आकाश (एशबरी) है और दूसरी ओर इतिहास की कठोर ज़मीन (रोज़ेवोच)। जहाँ एशबरी हमें कल्पना की स्वतंत्रता देते हैं, वहीं रोज़ेवोच हमें वास्तविकता के प्रति हमारी जिम्मेदारी की याद दिलाते हैं।
बावजूद इसके , इन दोनों कवियों और ख़ास तौर से जॉन एशबरी के दवारा रचित पाठ में ‘संकेतकों की फिसलन’ के अनेकानेक उदाहरण मौजूद हैं।
एशबरी की कविता तो कई बार इस ‘फिसलन’(Slippage) का उत्सव प्रतीत है। उनकी पंक्तियों में पाठक एक शब्द के अर्थ तक पहुँचने ही वाला होता है कि कविता का वाक्य विन्यास उसे किसी दूसरे संदर्भ में फेंक देता है। उनकी सुविख्यात पंक्ति “जो कुछ भी है, बस इस सतह पर ही है।” (‘The surface is all that there is’) का एक अर्थ यह भी है कि अर्थ की कोई गहराई (Signified) है ही नहीं; वह सिर्फ़ सतह पर तैरते हुए संकेतकों (Signifiers) का एक अंतहीन खेल है। एशबरी पाठक को इस फिसलन का आनंद लेने के लिए प्रेरित करते हैं, जहाँ भाषा स्वयं को बार-बार पुनर्परिभाषित करती है।
तादेउश रोज़ेविच के यहाँ यह ‘फिसलन’ एक त्रासदी है। युद्ध के बाद उनके लिए शब्दों के अर्थ ‘फिसल’ नहीं रहे थे, बल्कि ‘मर’ रहे थे। जब वे कहते हैं कि “पुण्य और पाप का भार अब एक समान है,” तो वे वास्तव में संकेतकों के उस पतन की बात कर रहे होते हैं जहाँ ‘पुण्य’ शब्द अब किसी पवित्र अर्थ को धारण करने में सक्षम नहीं रहा। उनके लिए फिसलन (Slippage) का अर्थ है भाषा का वह विश्वासघात जिसने ‘न्याय’ या ‘मानवता’ जैसे शब्दों को खोखला बना दिया।
अशोक वाजपेयी के यहाँ दोनों प्रकार की फिसलनों के उदाहरण मौजूद हैं । उनकी ‘शब्द से’ कविता कई बार जहाँ अमेरिकी महाकवि जॉन एशबरी की कविताओं की तरह संकेतकों की क्रीड़ा प्रतीत होती है, वहीं उनकी ‘आश्वित्ज़’ कविता एक सीमा तक तादेउश रोज़ेविच की ‘सर्वाइवर’ कविता की तरह पाठक को बेचैन और स्तब्द्ध कर देती है । अनामिका के यहाँ भी संकेतकों की क्रीड़ा के बजाय बिना खरी-खोटी सुनाए ही पाठक को ज़िन्दगी की असलियत से रूबरू करा देने की सलाहियत मिलती है। ‘बेजगह’ कविता में उन्होंने लिखा है –“सारे संदर्भों के पार/मुश्किल से उड़ कर पहुँची हूँ/ऐसी ही समझी-पढ़ी जाऊँ/जैसे तुकाराम का कोई /अधूरा अंभग!”
उनकी ‘दरवाज़ा’ कविता इस फिसलन को एक नई राजनैतिक और सृजनात्मक दिशा देती है। यहाँ पीटा गया दरवाज़ा, चक्की, चरखा और झाड़ू जैसे घरेलू संकेत अपनी पारंपरिक पहचान से फिसलकर एक वृहत् स्त्री-समय (Women’s Time) के प्रतीक बन जाते हैं। पाब्लो नेरुदा जिस तरह साधारण वस्तुओं के भीतर से बोलने का आह्वान करते हैं (‘Come up and speak through my body’), अनामिका की ‘दरवाज़ा’ कविता उसी तरह अपनी पीड़ा को एक उद्घाटन या ‘ओपनिंग’ (Opening) में बदल देती है। यह झाड़ू और सुई-कैंची का बिम्ब फ्रांसीसी महाकवि ईव बॉनफुआ की उस कविता-पंक्ति को पुष्ट करता है जहाँ चीज़ों के मलबे के नीचे ही सत्य दबा होता है:
‘उनकी फुसफुसाहट
पत्थरों के नीचे से उठती है —
जैसे स्मृति, अनुभव और सत्य
ठोस सतहों के नीचे दबे हुए हों,
और अब भी जीवित हों’।
(Their whisper rises from beneath the stones
To fuse into a single heat with that blind
Light you are as yet, who can still gaze.)
इस काव्यांश से गुज़रते हुए अंतर्मन में ईशोपनिषद् के एक मंत्र की अनुगूँज जगती है:
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥
यहाँ हिरण्मय पात्र (स्वर्णमय आवरण) वही है जो सत्य के मुख को ढँक लेता है—ठीक उसी तरह जैसे बॉनफुआ के यहाँ सत्य पत्थरों के नीचे दबा है और फुसफुसाहट बनकर ऊपर उठता है। दोनों में एक साझा अनुभूति है:सत्य अनुपस्थित नहीं है, केवल आवृत है—और उसे देखने के लिए किसी परदे के हटने की आवश्यकता है, न कि किसी नई रचना की।
सच तो यह है कि बॉनफुआ के काव्यांश और ईशोपनिषद् के मंत्र के बीच जो साम्य उभरता है, वह मात्र बिम्ब–साम्य नहीं, बल्कि सत्य की अनुभूति को लेकर भारतीय और यूरोपीय परम्पराओं की गहरी दार्शनिक समानता का संकेत है। बॉनफुआ कहते हैं—“Their whisper rises from beneath the stones”—अर्थात् जो सत्य है वह अनुपस्थित नहीं, बल्कि पत्थरों के नीचे दबा हुआ है, और फुसफुसाहट के रूप में ऊपर उठ रहा है। यह वही स्थिति है जिसे उपनिषद् “हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्” कहता है—सत्य का मुख स्वर्णमय आवरण से ढँका हुआ है। दोनों ही स्थितियों में सत्य नष्ट नहीं हुआ है; वह केवल किसी आवरण, किसी ठोस परत या किसी चमकदार सतह के नीचे छिपा हुआ है। बॉनफुआ के यहाँ यह आवरण पत्थर है—सभ्यता, इतिहास, भाषा और नामों का बोझ। उनके काव्यांश में सत्य सीधे दिखाई नहीं देता, बल्कि फुसफुसाहट (whisper) बनकर आता है, जिसे सुनने के लिए पढ़ना नहीं, बल्कि ध्यान और मौन चाहिए। इसी तरह उपनिषद् में सत्य को देखने के लिए किसी तर्क या ज्ञान–प्रदर्शन की नहीं, बल्कि ‘अपावृणु’—अर्थात् आवरण हटाने की प्रार्थना की गयी है। सत्य को रचा नहीं जाता, केवल अनावृत्त किया जाता है। “Light you are as yet, who can still gaze” में बॉनफुआ उस देखने वाले की ओर संकेत करते हैं जो अहल-ए-नज़र होने के बावजूद रोशनी को सीधे नहीं देख पा रहा है । यह वही स्थिति है जो उपनिषद् में साधक की है—वह सत्यधर्म की दृष्टि चाहता है, पर जानता है कि सत्य उसके सामने है, बस ढँका हुआ है। दोनों परम्पराओं में दृष्टि बाहरी आँख की नहीं, बल्कि अन्तरदृष्टि की है।
कहना यह है कि बॉनफुआ की कविता फ़्रांसीसी काव्यभाषा में जो बात कहती है, वह हजारों साल पहले रचित उपनिषद् में मंत्र की संरचना में विन्यस्त है—कि सत्य शोर में नहीं, चमक में नहीं, स्पष्ट उद्घोष में नहीं, बल्कि परतों के नीचे, मौन में और धैर्यपूर्ण देखने–सुनने की अवस्था में उपलब्ध होता है। पत्थर और हिरण्मय पात्र अलग प्रतीक हैं, पर दोनों का कार्य एक ही है: सत्य को ढँकना—और साधक/आलोचक /पाठक का काम है उसे हटाने की आकांक्षा बनाए रखना।
दूसरे शब्दों में जॉन एशबरी का ‘संकेतकों की क्रीड़ा और उत्सवबोध’ (Slippage as Celebration) और तादेउश रोज़ेवोच का ‘संकेतकों का पतन और भाषाई विश्वासघात’ (Slippage as Tragedy)—संकेतकों की फिसलन के ये दो छोर आधुनिक विश्व-कविता के दो विलोम ध्रुव हैं। एशबरी के यहाँ अर्थ की गहराई का निषेध है और वे पाठक को केवल चमकीली सतह पर तैरते हुए भाषा के खेल का आनंद लेने के लिए आमंत्रित करते हैं, जहाँ सत्य जैसी कोई चीज़ अस्तित्व में ही नहीं है। इसके विपरीत, रोज़ेवोच के यहाँ यह फिसलन एक महाविपदा है, जहाँ युद्ध की विभीषिका के बाद भाषा के भीतर से नैतिक मूल्य और शब्दों की पवित्रता मर चुकी है।
अनामिका इन दोनों अर्थों के बीच एक अनूठा राजनैतिक-सृजनात्मक संतुलन बनाती हैं, जहाँ रोज़मर्रा के घरेलू संकेत (चक्की, झाड़ू) अपनी तुच्छता से फिसलकर एक ‘वृहत् स्त्री-समय’ के ब्रह्मांडीय यथार्थ और ईव बॉनफुआ तथा ईशोपनिषद् की तरह परतों के नीचे दबे ‘आवृत सत्य’ को अनावृत्त करते हैं।
सवाल उठता है कि इन दोनों अर्थों के बीच सविता सिंह की ‘रात का दरवाज़ा’ कविता कहाँ खड़ी है और उसका दार्शनिक मंतव्य क्या है।
सविता सिंह की कविता न तो एशबरी की तरह अर्थहीन सतहों पर संकेतकों का कोई उत्तर-आधुनिक कौतुक या तमाशा है, और न ही वह रोज़ेवोच की तरह भाषा के मुकम्मल विश्वासघात से उपजी कोई अंतिम शून्यवाद की त्रासदी है। सविता सिंह इन दोनों अर्थों का एक अत्यंत गंभीर दार्शनिक अतिक्रमण (Transcendence) करती हैं। वे एशबरी की तरह सतह पर नहीं रुकतीं, बल्कि सतह के पार जाती हैं; और वे रोज़ेविच की तरह त्रासदी में डूबकर मौन नहीं होतीं, बल्कि त्रासदी का रूपांतरण (Transformation) करती हैं। सविता सिंह की रचना में संकेतकों की फिसलन वास्तव में ‘सत्य के आवरण को हटाने’ (De-shrouding) की वह उपनिषद्परक और बॉनफुआपरक दार्शनिक क्रिया है, जहाँ भाषा व्यवस्था के बंधनों से फिसलकर सीधे आत्मिक स्वायत्तता में विलीन हो जाती है।
यदि गहराई से देखें, तो सविता सिंह की कविता में ‘रात’ ही वह पहला संकेतक है जो एशबरी के उत्सव और रोज़ेविच की त्रासदी को एक साथ अपने भीतर आत्मसात कर लेता है। दिन का संसार यदि रोज़ेवोच की तरह यातनाओं और दमन का संसार है, जहाँ स्त्री की अस्मिता रोज़ छली जाती है, तो ‘रात’ उस त्रासदी का अंत है। रात में जो “रुदन विलाप” है, वह रोज़ेविच की त्रासदी को दर्ज करता है, लेकिन रात का “धीरज” उस त्रासदी को एक उत्सवोन्मुख कौतूहल में बदल देता है। सविता सिंह की रात कोई शून्य अंधकार नहीं है, बल्कि वह ईशोपनिषद् के ‘हिरण्मय पात्र’ और बॉनफुआ के ‘पत्थरों’ के विपरीत एक ‘संरक्षक परत’ है। दिन का उजाला यदि सत्य को ढकने वाला स्वर्ण-पात्र है जो अपनी चकाचौंध में स्त्री के वास्तविक यथार्थ को ओझल कर देता है, तो रात उस पात्र को हटाकर सत्य को अनावृत्त करती है।
इस कविता में “रहस्य की तरह बचा उल्लास” और “स्वप्न के आगमन का कौतूहल” संकेतकों की फिसलन का वह दार्शनिक बिंदु है जिसे एशबरी कभी नहीं छू सकते। एशबरी के यहाँ सतह के नीचे कुछ नहीं है, लेकिन सविता सिंह के यहाँ रात की शांत परत के नीचे ‘उल्लास’ और ‘स्वप्न’ जीवित हैं। यह ठीक बॉनफुआ की उन पंक्तियों की तरह है जहाँ “उनकी फुसफुसाहट पत्थरों के नीचे से उठती है”। स्त्री का उल्लास समाज के पत्थरों और इतिहास के मलबे के नीचे दबा हुआ है, जिसे रात बड़ी आत्मीयता और गोपनीयता से “छिपाए रखती है”। यह सत्य अनुपस्थित नहीं है, वह केवल आवृत है। सविता सिंह की भाषा यहाँ उस ‘अपावृणु’ (आवरण हटाने) की प्रार्थना बन जाती है, जो किसी नए सत्य को रचती नहीं है, बल्कि जो पहले से मौजूद है—जो चेतना के भीतर बचा हुआ है—उसे केवल देखने की अंतरदृष्टि (Gaze) देती है।
कविता के अंतिम हिस्से में जब “नीला दरवाज़ा” सामने आता है, तो यहाँ संकेतक की फिसलन अपने चरम दार्शनिक मंतव्य को प्राप्त करती है। अशोक वाजपेयी की कविता में दरवाज़ा जानबूझकर खुला छोड़ दिया जाता है जिससे अंदर-बाहर की सीमाएं धुंधली हो जाएं, लेकिन सविता सिंह का दरवाज़ा कोई भौतिक या लौकिक कपाट नहीं है जिससे कोई सांसारिक आवाजाही हो। यह दरवाज़ा “बचाया हुआ” है। यह पितृसत्ता, इतिहास, समय और भाषा के तमाम विभाजनों के बीच बची हुई मनुष्य की (विशेषकर स्त्री की) अंतिम आत्मिक स्वतंत्रता का संकेतक है। ‘नीला’ रंग यहाँ असीमता और उस परम प्रकाश का बिम्ब है जो ईशोपनिषद् के “सत्यधर्माय दृष्टये” की याद दिलाता है। इस दरवाज़े की फिसलन यह है कि इससे “अनन्त निकला जा सकता है यातनाओं के पार”।
समाजशास्त्रीय और दार्शनिक रूप से, रोज़ेवोच के यहाँ यातना मनुष्य को अंततः ‘शून्यता’ (Nothingness) की ओर धकेलती है, जहाँ अंत में “कुछ नहीं” दिखाई देता। लेकिन सविता सिंह की स्त्री यातना के पार ‘शून्य’ में नहीं, बल्कि ‘अनंत’ (Infinity) में प्रवेश करती है। यह अनंत कोई पलायन नहीं है, बल्कि यह चेतना का वह रूपांतरण है जिसके बाद “वह सदा के लिए बदल जायेगी”। यह बदलाव भाषा के खेल से नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार से घटित होता है।
जॉन एशबरी और रोज़ेविच के द्वैत के बीच सविता सिंह की ‘रात का दरवाज़ा’ कविता यह दार्शनिक मंतव्य देती है कि भाषा चाहे कितनी भी संकटग्रस्त हो (जैसा कि रोज़ेवोच मानते हैं) और यथार्थ चाहे कितना भी सतही हो (जैसा कि एशबरी मानते हैं), मनुष्य के अंतर्मन में एक ऐसा एकांत, एक ऐसी ‘रात’ हमेशा बची रहती है जहाँ सत्य अपनी फुसफुसाहट के साथ जीवित रहता है। अनामिका जहाँ इस फिसलन को वस्तुओं के माध्यम से सामाजिक और ऐतिहासिक समय के चक्र में बदलती हैं, वहीं सविता सिंह इस फिसलन को एक ‘नीले दरवाज़े’ में बदल देती हैं जो इतिहास के पार जाने का आध्यात्मिक और दार्शनिक मार्ग है। यह कविता उपनिषद् के ऋषियों और बॉनफुआ की तरह यह घोषणा करती है कि यातनाओं की ठोस परतों के नीचे जो सत्य दबा है, उसे पाने के लिए केवल ‘धीरज’ और ‘मौन देखने’ की आवश्यकता है। रात का वह दरवाज़ा दरअसल हमारे अपने भीतर का वह द्वार है जो खुलते ही हमें हमारी आदिम और असीम स्वतंत्रता से मिला देता है।
रोज़ेविच, अशोक वाजपेयी,अनामिका और सविता सिंह की कविताओं का यह वैश्विक अन्तःपाठ यह सिद्ध करता है कि सचाई का दरवाज़ा खोलना कोई ऐसी क्रिया नहीं है जिसका कोई अंतिम सिरा हो। रोज़ेविच का शून्य, अशोक वाजपेयी की फिसलन, अनामिका का ‘मन की दुछत्ती पर संचय’और सविता सिंह का दार्शनिक अतिक्रमण —ये चारों मिलकर उस सत्य की तस्दीक करते हैं जो संकेतों की पकड़ में नहीं आता, बल्कि उनके बीच की रिक्तियों में साँस लेता है। पुश्किन से लेकर नेरुदा तक और पाज़ से लेकर एशबरी और अशोक वाजपेयी तक, विश्व कविता की यह चौखट हमें बताती है कि हम स्वयं एक अधखुले दरवाज़े की तरह हैं, जहाँ से होकर समय और अर्थ का प्रवाह गुज़र रहा है। भर्तृहरि के शब्दों में कहें ,तो समय नहीं बीत रहा है,बल्कि हम बीतते जा रहे हैं– कालो न यातो वयमेव याताः ।
अशोक वाजपेयी की कविता इसी फिसलन को सहेजती है और हमें उस सचाई के रूबरू खड़ा करती है जिसे किसी एक शब्द या संकेत में कभी बंद नहीं किया जा सकता। पुश्किन जब ‘मैंने तुमसे प्रेम किया था’ कविता में कहते हैं – ‘मैंने तुमसे प्रेम किया था; सम्भव है वह प्रेम/मेरे हृदय में पूरी तरह बुझा भी न हो’– तो यह पंक्ति उसी अधखुलेपन को बनाए रखती है जहाँ प्रेम न पूरी तरह उपस्थित है, न पूरी तरह अनुपस्थित; वह भीतर कहीं अभी भी धड़क रहा है। मौजूदा प्रसंग में यह ठीक उसी तरह है जैसे कोई दरवाज़ा जो बंद नहीं हुआ।
अशोक वाजपेयी की कविता का वैश्विक संदर्भ ‘आधुनिकता’ (Modernity) और ‘उत्तर-आधुनिकता’ (Post-modernity) के बीच के संक्रमण से जुड़ा है। उनका दरवाज़ा उस ‘तरल आधुनिकता’ (Liquid Modernity) का प्रतीक है जिसकी विस्तृत चर्चा समाजशास्त्री ज़िगमुंट बॉमन (Zygmunt Bauman) ने की है, जिनका कहना है कि “तरल आधुनिकता में, जीवन की स्थितियाँ उतनी देर भी स्थिर नहीं रहतीं कि वे जम सकें या आदतों में बदल सकें।”(Liquid Modernity, 2000) अशोक वाजपेयी का दरवाज़ा पूरी तरह बंद न होकर हमें उस अनिश्चितता में रहने का साहस देता है जो आज के दौर की सबसे बड़ी हक़ीक़त है। यह कविता वैश्विक नागरिक को यह संदेश देती है कि ‘सचाई’ किसी बंद विचारधारा या कठघरे में नहीं है, बल्कि वह उस निरंतर आवाजाही में है जहाँ विचार और संस्कृतियाँ एक-दूसरे में ‘गड्डमड्ड’ होती रहती हैं। यह दरवाज़ा ‘बहिष्कार’ (Exclusion) के विरुद्ध ‘समावेशन’ (Inclusion) की एक दार्शनिक पुकार है।
अनामिका की कविता ‘दरवाज़ा’ वैश्विक स्त्रीवादी विमर्श के उस फलक पर खड़ी है जहाँ ‘निजी ही राजनैतिक है’। (The Personal is Political)। उनका दरवाज़ा वर्जीनिया वुल्फ के ‘अपना एक कमरा’ (A Room of One’s Own) की अवधारणा का विस्तार प्रतीत होता है, लेकिन यहाँ वह कमरा बंद नहीं है—वह ‘पिटकर’ खुला हुआ है। अनामिका का ‘वृहत्चक्र’ उस वैश्विक पारिस्थितिकी और स्त्री-श्रम (Ecofeminism and Labour) को संबोधित करता है जो विकास के बड़े विमर्शों में अनसुना कर दिया जाता है। यह कविता ‘सब-अल्टर्न’ (Subaltern) चेतना का वह द्वार प्रतीत होती है जो दमन के औज़ारों को ही अपनी मुक्ति की कुंजी बना लेता है।
इस वैश्विक विमर्श में सविता सिंह की ‘रात का दरवाज़ा’ कविता स्त्री-स्वायत्तता और दार्शनिक मुक्ति के बोध को एक सर्वथा नए और ऊँचे क्षितिज पर ले जाती है। सविता सिंह की रचना फ़्रांसीसी दार्शनिक सिक्सू (Hélène Cixous) के ‘स्त्री-लेखन’ (Écriture Féminine) और मिशेल फ़ूको के ‘हेटरोटोपिया’ (Heterotopia) यानी एक ऐसे समानांतर, वास्तविक और जादुई स्पेस की खोज से जुड़ती है जो दमनकारी सामाजिक संरचनाओं से मुक्त हो। यदि अनामिका का दरवाज़ा वर्जीनिया वुल्फ़ के कमरे की भौतिक और श्रमसाध्य सीमाओं को अनावृत्त करता है, तो सविता सिंह का दरवाज़ा उस कमरे से भी आगे बढ़कर शुद्ध आत्मिक और चेतनात्मक स्वतंत्रता (Subjective Sovereignty) का संधान करता है। वे ज़िगमुंट बॉमन की ‘तरलता’ के सांसारिक बिखराव और अनामिका के ‘घरेलू चक्रव्यूह’ दोनों का दार्शनिक अतिक्रमण करती हैं। उनकी कविता वैश्विक स्त्री को यह संदेश देती है कि बाहरी दुनिया के सारे दरवाज़े बंद होने या पीटे जाने के बावजूद, उसके अवचेतन और आंतरिक एकांत में एक ऐसा ‘नीला दरवाज़ा’ हमेशा सुरक्षित रहता है जो इतिहास और समय की यातनाओं के पार, असीमता की ओर खुलता है। यह कविता ‘दमन के यथार्थ’ पर केवल विलाप नहीं करती, बल्कि ‘रूपांतरण के स्वप्न’ के माध्यम से स्त्री-अस्मिता को एक वैश्विक, सार्वभौमिक और दार्शनिक गरिमा प्रदान करती है।
कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि इन चारों कविताओं में ‘दरवाज़ा’ यहाँ एक ‘मेटा-नैरेटिव’ है जो समय के चार आयामों को जोड़ता है: रोज़ेवोच का दरवाज़ा स्मृति और विनाश का द्वार है, अशोक वाजपेयी का दरवाज़ा बोध और भूल का द्वार, अनामिका का दरवाज़ा श्रम और सृजन का द्वार और सविता सिंह का दरवाज़ा यातना के पार दार्शनिक रूपांतरण तथा अनंत आत्म-मुक्ति का द्वार है। इन चारों कविताओं का साझा सत्य यह है कि सचाई हमेशा एक ‘दहलीज़’ (Threshold) पर होती है। देरिदा के ‘विखंडनवाद’ ने जिस ‘अनिश्चितता’ को एक दार्शनिक मूल्य बनाया था, ये कविताएँ उसे मानवीय संवेगों में ढाल देती हैं। अशोक वाजपेयी का वह कथन कि “कविता सचाई का दरवाज़ा खोलती है”, इन तीनों के संगम से एक महासत्य में बदल जाता है। कविता हमें संकोच और डर को छोड़कर उस दरवाज़े पर दस्तक देने के लिए तैयार करती है जहाँ एक ओर शून्यता का साहस है, दूसरी ओर मानवीय भूलों की स्वीकारोक्ति है, और तीसरी ओर अनंत सृजन का श्रम है।
यह विश्लेषण सिद्ध करता है कि दरवाज़ा केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि वह क्रिया है जो हमें अपने ‘होने’ (Being) का अहसास कराती है। चाहे वह रोज़ेविच की शून्यता हो या अनामिका की ‘मन की दुछत्ती’, ये सभी उस ‘सचाई’ के भिन्न-भिन्न रूप हैं जिसे कविता अपने पारदर्शी शब्दों में क़ैद करने का प्रयास करती है। अंततः, पाठक स्वयं वह दरवाज़ा बन जाता है जिसके माध्यम से दुनिया का अर्थ गुज़रता है और नया रूप लेता है।
तादेयुश रोज़ेविच, अशोक वाजपेयी, अनामिका और सविता सिंह की इन कविताओं के ‘दरवाज़ा’ बिम्ब के परस्पर संवाद पर विचार-विमर्श के दौरान हम यह पाते हैं कि ये चारों रचनाएँ मिलकर मानवीय चेतना का एक ‘बहुआयामी मानचित्र’ तैयार करती हैं। यहाँ ‘दरवाज़ा’ केवल एक प्रतीक नहीं रह जाता, बल्कि वह ‘ज्ञानमीमांसा’ (Epistemology) की एक ऐसी सक्रिय इकाई बन जाती है जो पाठक को चार अलग-अलग अस्तित्वपरक स्थितियों में एक साथ खड़ा कर देती है। दूसरे शब्दों में, इन कविताओं का परस्पर संवाद एक ऐसी दार्शनिक स्थिति का निर्माण करता है जहाँ रोज़ेविच का ‘शून्य’, वाजपेयी की ‘फिसलन’, अनामिका का ‘संचय’ और सविता सिंह का ‘अतिक्रमण’ एक-दूसरे को संतुलित करते हैं। यदि रोज़ेविच की शून्यता हमें अतीत के अंत की ओर ले जाती है, अशोक वाजपेयी की मानवीय भूल हमें वर्तमान की सहजता में वापस लाती है, और अनामिका का अनवरत श्रम हमें भविष्य की पुनर्रचना का रास्ता दिखाता है, तो सविता सिंह का ‘नीला दरवाज़ा’ हमें समय और इतिहास की इन तमाम सीमाओं से मुक्त कराकर अनंत की ओर ले जाता है।
यह संवाद इस दार्शनिक प्रश्न का उत्तर है कि सचाई केवल ‘देखने’ में नहीं है, बल्कि ‘होने’ और ‘करने’ के अंतर्संबंधों में निहित है।
विशिष्ट दार्शनिक शब्दावली में कहें तो रोज़ेविच का दरवाज़ा ‘अभाव’ (Absence) का उत्सव है, जहाँ अर्थ का लोप ही उसकी सचाई है। अशोक वाजपेयी का दरवाज़ा ‘अतिव्याप्ति’ (Overlap) का स्थल है, जहाँ अंदर और बाहर का भेद मिटना ही सत्य का उद्घाटन है। वहीं अनामिका का दरवाज़ा ‘रूपांतरण’ (Transformation) की प्रयोगशाला है, जहाँ दमन की ताक़त को सृजन की ऊर्जा में बदल दिया जाता है। ये तीनों स्थितियाँ मिलकर एक ‘वैश्विक मानवीय अनुभव’ (Universal Human Experience) को मुकम्मल करती हैं, जो किसी भी प्रकार की जड़ता या बंद वैचारिकता को स्वीकार नहीं करता।
अशोक वाजपेयी की ‘दरवाज़ा’ कविता की संरचना में दार्शनिक अंतर्वस्तु इतनी गहरी और सूक्ष्म रूप से अनुस्यूत है कि कविता पढ़ते हुए लगता है जैसे कोई विचार स्वयं बोल रहा हो, न कि कवि कोई दर्शन गढ़ रहा हो। कविता की संरचना ही उसका दर्शनशास्त्र है—एक ही लंबी, बिना विराम वाली, लगभग बोलचाल की भाषा में बही हुई धारा, जिसमें न कोई स्तब्धता है, न कोई नाटकीय विराम, न कोई उपदेशात्मक चरम। यही संरचना कविता को एक जीवंत चिंतन-प्रक्रिया बना देती है।
कविता शुरू होती है संभावना से—‘दरवाज़ा खुल सकता था’—और तुरंत निषेध में चली जाती है—‘कोई खोले तभी नहीं’। यह पहला वाक्य ही संभावना और अनुपस्थिति का एक दार्शनिक द्वंद्व उजागर कर देता है । फिर कवि कहता है कि दरवाज़ा अपने आप भी नहीं खुला, क्योंकि वह पूरी तरह बंद भी नहीं था। यहाँ संरचना हमें एक ऐसे यथार्थ की ओर ले जाती है जहाँ चीज़ें न तो पूरी तरह अस्तित्व में होती हैं, न पूरी तरह अनुपस्थित। दरवाज़ा एक ‘आधा-स्थिति’ में है—न बंद, न खुला—और यही आधा-स्थिति जीवन की वास्तविक स्थिति है।
कविता का मध्य भाग दरवाज़े के कार्य को परिभाषित करता है—‘दरवाज़ा घिरे हुए को रोकता है / और अघिरे हुए को अंदर आने से थामता है’। यह पंक्ति भारतीय दर्शन की उस परंपरा से सीधे जुड़ती है जिसमें सीमा (boundary) न तो कारागार है, न पूर्ण मुक्ति। यह मध्य-मार्ग (middle way) का दर्शन है—न अत्यधिक बंद, न अत्यधिक मुक्त। लेकिन कवि तुरंत कहता है कि ‘दरवाज़ा न हो तो घिरा अनघिरा गड्डमड्ड हो जाए’। यह संरचना हमें एक गहरे अस्तित्व-विज्ञान (ontology) की ओर ले जाती है: चीज़ों का अस्तित्व उनकी सीमा पर निर्भर है। बिना सीमा के सब कुछ एकाकार हो जाएगा, अर्थ खो जाएगा। दरवाज़ा न्यूनतम शर्त है सभ्यता, संबंध और आत्म-परिचय की।
फिर आती है सबसे महत्त्वपूर्ण पंक्ति—‘आना-जाना दरवाज़े से होता है / पर फिर भी थोड़ा-सा बाहर-अंदर और थोड़ा-सा अंदर-बाहर / फिसल ही जाता है’। यह ‘फिसलना’ कविता की दार्शनिक चरम बिंदु है। यह देरिदा लाकाँ के ‘संकेतक के फिसलन’ ‘स्लिपेज ऑफ़ सिग्निफायर’(Linguistic Slippage of Signifiers) की याद दिलाता है, लेकिन अशोक वाजपेयी इसे इतने कोमल, लगभग दयालु स्वर में कहते हैं कि यह फिसलन डरावना नहीं, जीवन-दायी लगता है। फिसलन अपरिहार्य है, और यही अपरिहार्यता जीवन की श्वास है।
कविता का अंतिम वाक्य सबसे गहरा दार्शनिक झटका देता है—‘दरवाज़ा कभी पूरी तरह बंद नहीं होता / हम ऐसा करना जान-बूझकर भूल जाते हैं’। यह ‘जान-बूझकर भूलना’ कविता की अंतिम दार्शनिक कुंजी है। भूलना यहाँ दोष नहीं, बुद्धिमत्ता है। पूरी तरह बंद करना कठोरता है और पूर्ण खुलापन अराजकता। जान-बूझकर भूलना एक प्रकार की करुणा है—अपने प्रति, दूसरे के प्रति और अंतत: जीवन के प्रति। यह भारतीय परंपरा की उस ‘सजगता’ (mindfulness) से जुड़ता है जिसमें ध्यान वस्तु को नष्ट नहीं करता, बल्कि उसे उसके अपूर्ण रूप में स्वीकार करता है।
पतंजलि ‘योगसूत्र’ के ‘विभूति पाद’ में कहा गया है: ‘तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्’।ध्यान को परिभाषित करता यह श्लोक भारतीय परंपरा की उस सजगता को पुष्ट करता है जो अपूर्णता को ज़बरदस्ती पूर्ण बनाने की बजाय उसे ज्यों का त्यों, सजग होकर देखने और जीने की कला सिखाता है।यहाँ सजगता की उस अवस्था को रेखांकित किया गया है जहाँ मन किसी वस्तु या अनुभव पर निरंतर, एकतान (एक समान प्रवाह वाली) जागरूकता बनाए रखता है—बिना उसे बदलने की कोशिश किए, बिना उसमें हस्तक्षेप किए। यह ठीक वही मनोदशा है जो अशोक वाजपेयी की कविता में ‘जान-बूझकर भूलना’ और ‘थोड़ा-सा फिसल जाना’ के माध्यम से व्यक्त होता है: वस्तु (दरवाज़ा) को उसके अपूर्ण, आधे खुले रूप में ही स्वीकार करना, उसे पूरा बंद या पूरा खुला बनाने की कठोरता न दिखाना ही मनुष्यता है। ध्यान की यह एकतानता वस्तु को नष्ट नहीं करती, बल्कि उसे कविता में वर्णित करुणा और सजगता के साथ उसके वर्तमान, अपूर्ण स्वरूप में ही देखती और स्वीकार करती है। इसी प्रकार ‘ऐतरेय उपनिषद्’ में आया ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ (प्रज्ञा या शुद्ध जागरूक चेतना ही ब्रह्म/परम सत्य है।) जैसा सबसे सीधा और सार्थक कथन अशोक वाजपेयी की कविता में ‘जान-बूझकर भूलना’ और अपूर्णता की करुणा से जुड़ता है, क्योंकि प्रज्ञा वस्तु को उसके अपूर्ण रूप में ही देखती है, उसे बदलने या नष्ट करने की कोशिश नहीं करती।
सच तो यह है कि कविता की पूरी संरचना—एक ही साँस में बही हुई, बिना खंड, बिना चरम, बिना उपदेश—ख़ुद एक दार्शनिक कथन है। यह हमें सिखाती है कि सत्य किसी बंद कमरे में नहीं, बल्कि उस आधे खुले दरवाज़े में है जहाँ थोड़ी-सी फिसलन, थोड़ा-सा भूलना, थोड़ा-सा अघिरापन जीवन को साँस लेने देता है। यह दर्शन न तो निराशावादी है, न आदर्शवादी—यह एक कोमल, मानवीय, अपूर्णता को स्वीकार करने वाला दर्शन है, जो कविता की संरचना में इतनी सहजता से घुला-मिला है कि पढ़ते हुए लगता है जैसे हम खुद सोच रहे हों।दूसरे शब्दों में ,यह कविता दर्शन नहीं सिखाती—ख़ुद दर्शन बन जाती है।
अशोक वाजपेयी के पूर्व-उद्धृत वक्तव्य के आलोक में यह प्रतीत होता है कि दरवाज़ा शीर्षक के रचित विवेच्य कविताएँ स्वयं एक ‘पुकार’ (Calling) बन गई हैं। रोज़ेवोच का दरवाज़ा हमें अपनी नश्वरता और शून्यता को स्वीकार करने का साहस देता है—यह वह दरवाज़ा है जिसे हम ‘डर के मारे’ नहीं खोलते थे। अशोक वाजपेयी का दरवाज़ा हमें अपनी अपूर्णता और भूलों के साथ प्रेम करना सिखाता है—यह वह दरवाज़ा है जिसे हम ‘संकोच के मारे’ नहीं छूते थे। अनामिका का दरवाज़ा हमें उस अदृश्य श्रम की रणनीति से जोड़ता है जिसे ‘अरसा हुआ बंद हुए’ और जिसे किसी ने खोलने की जहमत नहीं उठाई थी।’दरवाज़ा’ शीर्षक से प्रकाशित इन कवियों का यह संगम साहित्य में ‘बहुध्वन्यात्मकता’ (Polyphony) का एक अनुपम उदाहरण है। तादेयुश रोज़ेवोच, अशोक वाजपेयी और अनामिका की कविताओं का यह संगम वस्तुतः ‘सत्य के बहुआयामी उद्घाटन’ की एक प्रक्रिया है। जहाँ रोज़ेविच का भाषाई विन्यास ‘युद्धोत्तर विस्थापन’ (Post-war Displacement) और ‘अस्तित्ववादी शून्यता’ (Existential Void) के मौन को प्रतिध्वनित करता है, वहीं अशोक वाजपेयी की कविता ‘उत्तर-आधुनिक तरलता’ (Liquid Modernity) और मानवीय सीमाओं के बीच की ‘फिसलन’ को एक नागरिक गरिमा प्रदान करती है। अनामिका इन दोनों से आगे बढ़कर दरवाज़े को एक ‘ऐतिहासिक कर्ता’ (Historical Agent) के रूप में स्थापित करती हैं, जो पितृसत्तात्मक हिंसा को ‘सृजन के वृहत्चक्र’ (Grand Cycle of Creation) में रूपांतरित कर देता है।
रचना जगत में घटित होता यह संवाद हमें बताता है कि सचाई का दरवाज़ा कोई एक अकेला द्वार नहीं है, बल्कि यह उन हज़ारों छोटी-छोटी दरारों, फिसलन भरी चौखटों और पीटे गए किवाड़ों का समूह है जिनसे होकर मनुष्य की आत्मा गुज़रती है। इन कविताओं का अंतिम स्वर ‘मुक्ति’ का है—स्मृति से मुक्ति, निश्चितता से मुक्ति और दमन से मुक्ति। यह त्रिआयामी संवाद पाठक को एक ऐसे ‘खुले आकाश’ के नीचे छोड़ देता है जहाँ दरवाज़े अब दीवार का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वयं प्रकाश का माध्यम बन गए हैं। इस विवेचन से यह भी स्पष्ट होता है कि कवित कैसे एक साधारण वस्तु को ‘महा-सत्य’ में बदलने की क्षमता रखते हैं ।
रोलाँ बार्थ के ‘प्रोकैरेटिक’ (Proairetic), ‘हर्मेन्यूटिक’ (Hermeneutic), ‘सिम्बोलिक’ (Symbolic) और ‘कल्चरल’ (Cultural) कोड्स के माध्यम से जब हम इन पाठों को देखते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि ये कविताएँ केवल अर्थ नहीं देतीं, बल्कि अर्थ के निर्माण की प्रक्रिया को ही विखंडित और पुनर्गठित करती हैं। देरिदा के ‘अन्तर/विलम्बन’ या ‘डिफरांस’ (Différance) के सिद्धांत के अनुसार, इन कविताओं में सत्य कभी भी एक स्थिर उपस्थिति नहीं है; वह रोज़ेवोच के ‘शून्य’ में स्थगित है, अशोक वाजपेयी की ‘भूल’ में सुरक्षित है, अनामिका की ‘दुछत्ती’ पर संचित है और सविता सिंह के ‘नीले दरवाज़े’ के पार असीम में प्रवहमान है।
इस वैचारिक चतुष्कोण को इस प्रकार रेखांकित करते हुए कहा जा सकता है कि रोज़ेविच के बिम्ब ‘स्मृति’ (Memory) के खंडहरों से, अशोक वाजपेयी के बिम्ब ‘दर्शन’ (Philosophy) की सहजता से, अनामिका के बिम्ब ‘श्रम’ (Labour) की गूँज से और सविता सिंह के बिम्ब ‘आंतरिक चेतना’ (Subjective Consciousness) की गहनता से उपजे हैं। सविता सिंह के लिए ‘रात’ और ‘दरवाज़ा’ सामाजिक बंधनों और यथार्थ की परतों से मुक्त होकर अपनी अस्मिता को पुनः प्राप्त करने और एक नए अस्तित्व में रूपांतरित होने का माध्यम बनते हैं।रोज़ेवोच हमें ‘निषेध’ (Negation) तक ले जाते हैं, अशोक वाजपेयी ‘स्वीकृति’ (Acceptance) तक, अनामिका ‘पुनर्निर्माण’ (Reconstruction) तक और सविता सिंह ‘अतिक्रमण’ (Transcendence) तक।
इन कविताओं के बीच का सन्नाटा वह ‘पाठगत अंतराल’ है जहाँ पाठक स्वयं अपना प्रतिबिम्ब देखता है। यह मौन दमन का नहीं, बल्कि फैज़ की शब्दों में कहें तो उस ‘अनकहे’ का है जो शब्दों की सीमा के पार है- ‘अनकही ही रह गयी वो बात सब बातों के बाद’।
अशोक वाजपेयी के प्रारंभिक वक्तव्य को आधार बनाकर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि कविता सचाई का दरवाज़ा खोलती नहीं है, बल्कि वह पाठक को स्वयं एक ऐसी ‘दहलीज़’ बना देती है जहाँ से वह ख़ुद संसार को उसकी संपूर्ण नग्नता, तरलता और सृजनात्मकता में देख सके। इस विश्लेषण से न इन तीन कवियों का वैशिष्ट्य तो उजागर होता ही है ;इससे संरचनावाद और विशेषकर उत्तर-संरचनावादी आलोचना के उन औज़ारों की सार्थकता भी सिद्ध होती है जो पाठ के भीतर छिपे सामाजिक और राजनैतिक सत्यों को अनावृत करने की शक्ति रखते हैं।
अशोक वाजपेयी की कविता ‘दरवाज़ा’ को देरिदा के विखंडनवादी सिद्धांतों के आलोक में एक ‘अनंत संभावनाओं वाला पाठ’ (A Text of Infinite Possibilities) माना जा सकता है। देरिदा ने अपनी स्थापनाओं में स्पष्ट किया था कि किसी भी पाठ का अर्थ निश्चित या स्थिर नहीं होता, बल्कि वह निरंतर विलंबित (Defer) होता रहता है।अशोक जी की यह कविता भौतिक दरवाज़े से शुरू होकर अर्थ की उस फिसलन तक जाती है जहाँ पहुँचकर पाठक, लेखक और सत्य के बीच की दीवारें ढह जाती हैं।
कविता का प्रारंभ ही एक संभावना से होता है: “दरवाज़ा खुल सकता था”। यहाँ ‘सकता था’ क्रियापद ‘हर्मेन्यूटिक कोड’ (Hermeneutic Code) के माध्यम से एक ऐसी रिक्तता पैदा करता है जो यह संकेत देता है कि सत्य उपस्थित तो है, पर वह किसी मानवीय हस्तक्षेप की प्रतीक्षा में है। देरिदा के अनुसार, अर्थ कभी भी पूर्णतः उपस्थित (Present) नहीं होता। अशोक वाजपेयी जब कहते हैं कि “कोई खोले तभी नहीं / अपने आप भी”, तो वे कर्ता (Subject) की प्रधानता को समाप्त कर देते हैं। यहाँ दरवाज़ा ख़ुद एक ‘स्वतंत्र पाठ’ बन जाता है जो किसी बाहरी व्याख्या या प्रहार का मोहताज नहीं है।
कविता की संरचना में “पूरी तरह बंद नहीं था / किसी ने किया ही नहीं” जैसी पंक्तियाँ उस ‘लोगोसेंट्रिज्म’ (Logocentrism) को चुनौती देती हैं जो हर चीज़ को एक पूर्णता या निश्चित खांचे में देखना चाहता है। देरिदा ने जिस ‘अन्तर/विलम्बन’ या ‘डिफ़रांस’ (Différance) की बात की थी, वह अशोक वाजपेयी के यहाँ ‘जाने की जल्दी’ और ‘दरवाज़ा भुला दिए जाने’ में दिखाई देती है। जाने वाले के लिए दरवाज़ा केवल एक साधन था, लेकिन कविता के लिए वह एक ऐसी ‘बाइनरी’ (अंदर बनाम बाहर) है जो लगातार विखंडित हो रही है। कवि तर्क देता है कि यदि हम वहीं ‘घिरे’ रहते तो दरवाज़ा बना रहता। यहाँ ‘घिरना’ अर्थ को सीमित करना है। जैसे ही हम उस घेरे से बाहर निकलते हैं, दरवाज़े का निश्चित अर्थ (Signified) लुप्त हो जाता है और वह अनंत संभावनाओं के लिए खुल जाता है।
कविता में सबसे महत्त्वपूर्ण मोड़ इन पंक्तियों में आता है: “पर फिर भी थोड़ा-सा बाहर-अंदर और थोड़ा-सा / अन्दर-बाहर / फिसल ही जाता है”। देरिदा की शब्दावली में इसे ‘संकेतकों की फिसलन’ (Slippage of Signifiers) कहा जा सकता है। यहाँ दरवाज़ा अब एक ठोस अवरोध नहीं है, बल्कि वह एक ‘छिद्रिल सीमा’ (Porous Margin) है। जब अर्थ ‘फिसलता’ है, तो वह यह सुनिश्चित करता है कि न तो ‘अंदर’ पूरी तरह शुद्ध है और न ही ‘बाहर’। यह उस ‘श्रेणीगत शुद्धता’ का विखंडन है जो सभ्यताओं और दर्शनों ने निर्मित की थी। यह फिसलन ही इस कविता को एक ‘खुला पाठ’ (Open Text) बनाती है, जहाँ पाठक अपनी संवेदना के अनुसार यह तय कर सकता है कि क्या अंदर आया और क्या बाहर गया।
कविता के अंत में “जानबूझकर भूल जाना” एक अत्यंत गहरा दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक वक्तव्य है। देरिदा के नज़रिए से, यह ‘भूलना’ सत्य की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि यह ‘निश्चितता’ के प्रति एक सचेत अरुचि है। इसके कुछ निहितार्थ हो सकते हैं।
पूरी तरह दरवाज़ा बंद करने का अर्थ है—अर्थ को क़ैद कर लेना। ‘जानबूझकर भूलना’ इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य (या पाठक) सत्य को एक अंतिम निष्कर्ष (Final Meaning) के रूप में नहीं देखना चाहता। वह उस खिड़की को खुली छोड़ना चाहता है जहाँ से नई संभावनाएँ आ सकें।
उत्तर-संरचनावाद मानता है कि पूर्णता एक कृत्रिम निर्माण है। अशोक वाजपेयी का कहना है कि हमारी ‘भूल’ ही हमें मनुष्य बनाती है। यह भूलना दार्शनिक रूप से ‘अहं’ का विसर्जन है। जानबूझकर भूलना यह स्वीकार करना है कि हम कभी भी ‘बाहर’ और ‘अंदर’ को पूरी तरह अलग नहीं कर सकते। यह उस द्वैतवाद (Dualism) का अंत है जहाँ हम स्वयं को दुनिया से अलग एक बंद कमरे में सुरक्षित मानते थे।
वस्तुत: अशोक वाजपेयी की यह कविता देरिदाई विखंडन का एक जीवंत उदाहरण प्रतीत होती है । यह दरवाज़े के माध्यम से हमें उस ‘अस्थिरता’ (Instability) तक ले जाती है जो जीवन और साहित्य दोनों का मूल तत्त्व है। दरवाज़ा खुला छोड़ देना असल में अर्थ को मुक्त कर देना है, ताकि वह समय और संदर्भ के अनुसार बदलता रहे। यह कविता हमें सिखाती है कि सचाई वह नहीं है जो बंद कमरों में सुरक्षित है, बल्कि सचाई वह है जो चौखटों से ‘फिसल’ रही है। अशोक वाजपेयी की ‘फिसलन’ और तादेयुश रोज़ेविच के ‘शून्य’ के बीच का तुलनात्मक विश्लेषण हमें यह समझने में मदद करता है कि दो कवि एक ही बिम्ब (दरवाज़ा) का उपयोग करके कैसे दो नितांत भिन्न दार्शनिक निष्कर्षों तक पहुँचते हैं। जहाँ रोज़ेवोच अर्थ की मृत्यु का वर्णन करते हैं, वहीं वाजपेयी अर्थ की मुक्ति का उत्सव मनाते हैं।
इन दोनों दृष्टिकोणों का सैद्धांतिक परीक्षण यदि करें तो हम देख सकते हैं कि रोज़ेविच का शून्य अर्थ का विलोपन (The Erasure of Meaning) है ।उनकी कविता में दरवाज़ा एक ऐसी यात्रा है जो दृश्य से अदृश्य की ओर ले जाती है। उनका ‘तीसरा दरवाज़ा’ देरिदा के ‘विखंडन’ से अधिक नीत्शे के ‘शून्यवाद’ (Nihilism) के करीब है। रोज़ेविच जब “मैं देखता हूँ / कुछ नहीं” कहते हैं, तो वे पाठक की सभी अपेक्षाओं को समाप्त कर देते हैं। यहाँ ‘शून्य’ अर्थ की संभावना का अंत है। यह उस ऐतिहासिक आघात का परिणाम है जहाँ युद्ध ने मानवीय मूल्यों के शब्दों को खोखला कर दिया।
कविता शून्यता की उपस्थिति पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि उनके यहाँ शून्य ‘अभाव’ नहीं है, बल्कि वह एक ‘अंतिम सत्य’ के रूप में उपस्थित है। यह दरवाज़ा उस सच्चाई की ओर खुलता है जिसे मनुष्य सहन नहीं कर पाता—कि अंततः सब कुछ रिक्त है। यहाँ अर्थ फिसलता नहीं, बल्कि विलीन हो जाता है।
अशोक वाजपेयी की फिसलन को अर्थ का विलम्बन (Différance) से जोड़कर देखने पर उनकी कविता रोज़ेविच की शून्यता के ठीक उलट खड़ी प्रतीत होती है। उनके लिए दरवाज़े के पार ‘कुछ नहीं’ नहीं है, बल्कि ‘बहुत कुछ’ है जो अभी परिभाषित होना शेष है। अशोक वाजपेयी की “फिसलन” देरिदा के अन्तर/विलम्बन (Différance) का साक्षात रूप है। अर्थ यहाँ स्थिर नहीं होता, वह “अंदर-बाहर” होता रहता है। यह शून्यता नहीं, बल्कि अर्थ की बहुलता (Plurality of Meaning) है। जहाँ रोज़ेविच का पाठक अंत में एक ‘दीवार’ (शून्य) से टकराता है, वहीं अशोक वाजपेयी का पाठक एक ‘प्रवाह’ में शामिल हो जाता है। “जानबूझकर भूल जाना” यह सुनिश्चित करता है कि अर्थ कभी भी ‘जड़’ न हो पाए। अशोक वाजपेयी का दरवाज़ा अर्थ को खोता नहीं है, बल्कि उसे क़ैद होने से बचाता है। रोज़ेविच के यहाँ “तीसरा दरवाज़ा” खुलना एक अनिवार्य नियति है, जबकि अशोक वाजपेयी के यहाँ दरवाज़ा खुला छोड़ना एक नैतिक और कलात्मक चुनाव है।वस्तुत: अशोक वाजपेयी की कविता के अंत में “जानबूझकर भूलना” उस ‘अहंकार’ का त्याग है जो यह दावा करता है कि उसने सत्य को पा लिया है और अब वह दरवाज़ा बंद कर सकता है।कवि हमें संदेश दे रहा है कि सचाई वह नहीं है जिसे ताले में बंद कर दिया जाए, बल्कि सचाई वह “फिसलन” है जो दो स्थितियों के बीच बनी रहती है। रोज़ेवोच उस सचाई के मौन को दिखाते हैं, तो अशोक वाजपेयी उस सचाई के अधखुलेपन को। उनकी कविता एक ‘अनंत पाठ’ (Infinite Text) है, क्योंकि वह कभी समाप्त नहीं होती; वह उस दरवाज़े की तरह है जो हमेशा थोड़ा-सा खुला रहता है ताकि अर्थ की नई रश्मियाँ भीतर आ सकें। दूसरे शब्दों में यह ‘खुला पाठ’ ही वास्तव में उस “सचाई के दरवाज़े” का प्रतीक है जहाँ दस्तक देना और उसे अधखुला छोड़ देना ही कविता का सबसे बड़ा धर्म है।
अशोक वाजपेयी का मानना है कि कविता का एक काम सचाई का दरवाज़ा खोलना होता है। यदि देरिदा के विखंडनवाद और स्त्रीवाद के निकष पर इसे कसा जाए, तो ये कविताएँ मात्र साहित्यिक रचनाएँ न रहकर दार्शनिक प्रस्थान बिंदु बन जाती हैं। तादेयुश रोज़ेविच की कविता में मौन का चरित्र अस्तित्ववादी शून्यता से निर्मित है जहाँ कविता के अंत में जब तीसरा दरवाज़ा खुलता है और कवि कहता है कि मैं देखता हूँ कुछ नहीं, तो यहाँ भाषा स्वयं को विसर्जित कर देती है। यह कुछ नहीं जिसे मूल में नथिंगनेस (Nothingness) कहा गया है, एक विराट पाठगत रिक्ति है जो देरिदा के उस विखंडनवादी तर्क की पुष्टि करती है जहाँ अर्थ किसी एक केंद्र पर टिकने के बजाय पूरी तरह लुप्त हो जाता है। रोज़ेविच युद्ध के बाद की उस दुनिया के कवि हैं जहाँ मानवीय मूल्यों का महाविनाश हो चुका था और उनके यहाँ जो मौन है, वह उस ईश्वर की अनुपस्थिति का मौन है जिसने मनुष्य को तड़पते हुए छोड़ दिया। पहला शैतान गुलाबी है जैसी पंक्तियों के बीच जो रिक्ति है, वह उस मनोवैज्ञानिक आघात या ट्रॉमा (Trauma) की ओर इशारा करती है जहाँ बुराई आकर्षक और कोमल बनकर आती है। रोज़ेविच का मौन पाठक को एक ऐसे शून्य के सम्मुख खड़ा करता है जहाँ कोई ऐतिहासिक दिलासा या दार्शनिक ढाँचा काम नहीं आता। उनका तीसरा दरवाज़ा उस महाआख्यान या ग्रैंड नैरेटिव (Grand Narrative) का विखंडन है जो मानता है कि हर दरवाज़े के पीछे कोई न कोई रहस्य या अर्थ अवश्य होगा।
अशोक वाजपेयी की ‘दरवाज़ा’ कविता को देरिदा के विखंडनवादी सिद्धांतों के आलोक में एक अनंत संभावनाओं वाला पाठ यानी ‘टेक्स्ट ऑफ इनफिनिट पॉसिबिलिटीज़’ (A Text of Infinite Possibilities) माना जा सकता है। देरिदा ने स्पष्ट किया था कि किसी भी पाठ का अर्थ निश्चित या स्थिर नहीं होता, बल्कि वह निरंतर विलंबित होता रहता है जिसे वे ‘डिफरांस’ (Différance) कहते हैं। अशोक वाजपेयी की यह कविता भौतिक दरवाज़े से शुरू होकर अर्थ की उस फिसलन तक जाती है जहाँ पहुँचकर पाठक, लेखक और सत्य के बीच की दीवारें ढह जाती हैं। जब वे कहते हैं कि पर फिर भी थोड़ा-सा बाहर-अंदर और थोड़ा-सा अन्दर-बाहर फिसल ही जाता है, तो यह देरिदा की शब्दावली में संकेतकों की फिसलन या ‘स्लिपेज ऑफ सिग्निफ़ायर्स’ (Slippage of Signifiers) का साक्षात उदाहरण है। यहाँ दरवाज़ा अब एक ठोस अवरोध नहीं है, बल्कि वह एक छिद्रिल सीमा या ‘पोरस मार्जिन’ (Porous Margin) है। जब अर्थ फिसलता है, तो वह यह सुनिश्चित करता है कि न तो अंदर पूरी तरह शुद्ध है और न ही बाहर। यह उस श्रेणीगत शुद्धता का विखंडन है जो सभ्यताओं और दर्शनों ने निर्मित की थी। कविता के अंत में जानबूझकर भूल जाना एक अत्यंत गहरा दार्शनिक वक्तव्य है जो देरिदाई नज़रिए से निश्चितता के प्रति एक सचेत अरुचि है। पूरी तरह दरवाज़ा बंद करने का अर्थ है अर्थ को क़ैद कर लेना, जबकि जानबूझकर भूलना यह यक़ीनी बनाता है कि अर्थ कभी भी जड़ न हो पाए और वह एक खुले पाठ के रूप में बना रहे। यह उस उपस्थिति की तत्त्वमीमांसा या देरिदा की शब्दावली में ‘मेटाफिज़िक्स ऑफ प्रेजेंस’ (Metaphysics of Presence) को भंग करता है जो मानती है कि चीज़ें या तो बंद होती हैं या खुली।
अनामिका की ‘दरवाज़ा’ कविता इन दोनों से भिन्न एक प्रखर स्त्रीवादी चेतना और ऐतिहासिक दमन के रूपांतरण का आख्यान रचती है। यहाँ दरवाज़ा एक जड़ वस्तु नहीं है, बल्कि वह स्वयं को एक कर्ता के रूप में प्रस्तुत करता है। सिमोन द बोउआर ने ‘स्त्री उपेक्षिता’ (The Second Sex) में कहा था कि स्त्री पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती है। अनामिका इस बनाए जाने की प्रक्रिया को दरवाज़े के रूपक से उलट देती हैं। ‘मैं एक दरवाज़ा थी/मुझे जितना पीटा गया/मैं उतना ही खुलती गयी’- इन पंक्तियों में जो विखंडन है वह यह है कि वे इस पीटने को खुलने की क्रिया में बदल देती हैं, जो दमनकारी पितृसत्तात्मक संरचना (Patriarchal Structure) के उद्देश्य को ही विफल कर देता है। हेलेन सिक्सू ने जिस ‘स्त्री-लेखन’ (Écriture féminine) की बात की थी, जहाँ स्त्री अपनी देह और अपने अनुभवों के माध्यम से लिखती है, अनामिका की कविता में चक्की, चरखा, सुई और झाड़ू जैसे बिम्ब उसी का हिस्सा हैं। ये बिम्ब उस घरेलू अर्थव्यवस्था या ‘डोमेस्टिक इकोनॉमी’ (Domestic Economy) को उजागर करते हैं जिसे मुख्यधारा के इतिहास ने हमेशा अदृश्य रखा। रोज़ेवोच जहाँ शून्य तक पहुँचते हैं, वहीं अनामिका उस शून्य को झाड़ू से बुहारकर मन की दुछत्ती पर एक नया संसार रचती हैं। यह पितृसत्तात्मक शून्यता के विरुद्ध एक सर्जनात्मक प्रतिरोध है। यहाँ श्रम की एक निरंतरता है जिसे जूलिया क्रिस्टेवा द्वारा वर्णित ‘स्त्री का समय’ (Women’s Time) के चक्रीय और स्मारकीय स्वरूप में देखा जा सकता है।
उनकी कविता ‘दरवाज़ा’ पितृसत्तात्मक हिंसा और स्त्री-प्रतिरोध के संबंधों की नई व्याख्या करती है। यहाँ स्त्री स्वयं को एक ‘दरवाज़ा’ कहती है—“मैं एक दरवाज़ा थी, मुझे जितना पीटा गया, मैं उतना ही खुलती गई।” यह बिंब प्रहार और विस्तार के विरोधाभास को रेखांकित करता है। भीतर प्रवेश करने पर एक ‘अनवरत श्रम’ का संसार दिखाई देता है, जहाँ चक्की, चरखा, कैंची-सुई और झाड़ू जैसे घरेलू उपकरण एक व्यापक ब्रह्मांडीय चक्र का हिस्सा बन जाते हैं।कवयित्री यहाँ हिंसा को केवल विनाश के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘अनचाहे उद्घाटन’ के रूप में देखती हैं। पितृसत्ता जिस चोट से स्त्री को तोड़ना चाहती है, अनामिका उसे एक ‘सृजनात्मक द्वार’ में बदल देती हैं। अंत में झाड़ू द्वारा तारे, पहाड़ और पत्थर जैसे तत्वों को सहेजना यह दर्शाता है कि स्त्री का घरेलू श्रम दरअसल सृजन के बिखरे हुए टुकड़ों को ‘मन की अटारी’ में संरक्षित करने की एक महान ऐतिहासिक प्रक्रिया है। इस प्रकार, यह कविता हिंसा से प्राप्त रिक्तता को सृजन के असीम विस्तार और प्रतिरोध की भाषा से भर देती है।
तुलनात्मक दृष्टि से विचारें ,तो सिल्विया प्लाथ की कविताओं में दरवाज़ा या ‘थ्रेशोल्ड’ का बिम्ब नकारात्मक, अवरोधक या निषेधात्मक है। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘द मून एंड द न्यू इयर’(The Moon and the Yew Tree) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि चाँद कोई दरवाज़ा नहीं है—यह अपना अलग चेहरा है, सफेद, उदास और भयानक रूप से परेशान। चाँद मातृत्व या स्त्रीत्व का प्रतीक है लेकिन कोई प्रवेश या मुक्ति नहीं देता। प्लाथ की दुनिया में दरवाज़ा अक्सर बंद या अनुपलब्ध रहता है या जब खुलता है तो विनाश या आत्म-नाश की ओर ले जाता है। ‘कट’ (Cut) में घाव एक खून से सना हुआ ‘त्वचा का कब्ज़ा’ (A sort of hinge / Of skin) बन जाता है—एक अस्थायी दरवाज़ा जो आत्म-हिंसा से खुलता है लेकिन मुक्ति नहीं देता। प्लाथ के दरवाज़े ट्रॉमेटिक हैं—वे या तो नहीं खुलते या जब खुलते हैं तो अंदर ख़ालीपन, असफल मातृत्व या घरेलू कारावास दिखाते हैं। स्त्री शरीर या मन एक बंद कमरा या ‘बेल जार’ बन जाता है जहाँ से बाहर निकलना असंभव या विनाशकारी है।
एमिली डिकिंसन की कविताओं में दरवाज़ा चयन और अलगाव का प्रतीक है। उनकी प्रसिद्ध कविता ‘आत्मा चुनती है अपनी सोसाइटी’(The Soul selects her own Society) में आत्मा खुद अपनी सोसाइटी चुनती है और फिर दरवाज़ा बंद कर देती है— अपने दिव्य बहुमत पर — अब उपस्थित नहीं। ( To her divine Majority—Present no more) यहाँ दरवाज़ा निजता और चयन का प्रतीक है—बाहर की दुनिया को अस्वीकार। यह सकारात्मक अलगाव है—आत्मा अपनी दिव्य बहुमत के साथ रहती है। ‘मैं तुम्हारे साथ रह नहीं सकती’ (I cannot live with You) में भी दरवाज़ा थोड़ा खुला रहता है, लेकिन समुद्र जितना दूर—
तुम्हारे साथ जीना —
क्योंकि जीवन एक अलग दरवाज़ा है —
जिसे थोड़ा खुला छोड़ दिया गया है —
समुद्र जितना दूर —
और प्रार्थना जितना —
तुम्हारे साथ नहीं जी सकती —
क्योंकि तुम्हारे साथ मरना भी एक अलग तरह की मृत्यु होगी —
और मैं उसे सहन नहीं कर सकती —
तुम्हारे साथ नहीं रह सकती —
क्योंकि तुम्हारे साथ रहना एक अलग तरह का जीना होगा —
जो मैं नहीं जी सकती —
यहाँ प्रेम संभव नहीं है, लेकिन पूर्ण अलगाव भी नामुमकिन है —इसलिए दरवाज़ा उम्मीद और दूरी दोनों का प्रतीक है।अनामिका का दरवाज़ा पीटा जाता है और खुलता जाता है—यह बाहरी हिंसा से प्रभावित है लेकिन अंदर सृजन की संभावना है। प्लाथ का दरवाज़ा नहीं खुलता या विनाशकारी ढंग से खुलता है। आंतरिक चयन, निजता, अलगाव के तहत डिकिंसन का दरवाज़ा आत्मा द्वारा बंद किया जाता है।दरवाज़ा अनामिका के यहाँ दाख़िले और बर्दाश्त का ज़रिया है, प्लाथ में नकार और अनुपलब्धता का, डिकिंसन में प्रतिबंध और चयन का।
अनामिका की कविता हिंसा को सृजन में बदल देती है जबकि प्लाथ हिंसा को ट्रॉमा में और डिकिंसन चयन में बदलती हैं । तीनों कवयित्रियों में दरवाज़ा स्त्री के शरीर या मन का प्रतीक है लेकिन अनामिका का स्वर सहनशील सृजन का है, प्लाथ का विनाशकारी निराशा का और डिकिंसन का शांत अलगाव का। अनामिका का दरवाज़ा बाहरी बल से खुलता है और अंदर श्रम और सृजन का चक्र बनाता है, प्लाथ का दरवाज़ा या तो बंद रहता है या खुलने पर विनाश लाता है, डिकिंसन का दरवाज़ा आत्मा की इच्छा से बंद या थोड़ा खुला रहता है। अनामिका की कविता हिंसा के बाद भी निरंतरता और संग्रह दिखाती है जबकि प्लाथ और डिकिंसन अलग-अलग रूप से अलगाव या असफलता की ओर इशारा करती हैं। यह तीनों कवयित्रियों के बीच दरवाज़े के बिम्ब की विविधता और गहराई को दर्शाता है।
अनामिका की यह कविता ‘पीड़ा के सौंदर्यशास्त्र’ (Aesthetics of Pain) की नई परिभाषा गढ़ती है। यहाँ स्त्री केवल ‘पीड़ित’ (Victim) नहीं है, बल्कि वह एक ‘सर्जक’ (Creator) भी है, जो पितृसत्ता द्वारा दी गई दरारों को अनुभवों की अटारी भरने के लिए उपयोग करती है। इस क्रम में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ‘दरवाज़ा’ यहाँ एक सीमांत (liminal) स्थिति है। यह घर के भीतर और बाहर के बीच की वह झिल्ली है जो स्त्री की देह और उसकी चेतना, दोनों का प्रतिनिधित्व करती है। झाड़ू द्वारा केवल कचरा नहीं, बल्कि ‘तारे और पहाड़’ सहेजा जाना एक प्रकार का ‘कॉस्मिक मेटाफर’ है। यह दर्शाता है कि स्त्री का श्रम तुच्छ नहीं है, बल्कि वह बिखरती हुई दुनिया को समेटने और उसे अर्थ देने की एक वृहद् प्रक्रिया है। वह जिसे पितृसत्ता ‘पीटना’ समझती है, वह अंततः स्त्री के लिए एक ‘उद्घाटन’ बन जाता है—एक ऐसा खुलापन जहाँ वह अपनी पीड़ा को सृजन की अटारी में अनुभवों के रूप में संचित कर लेती है। अनामिका की यह कविता ‘विक्टिमहुड’ (पीडि़त होने की स्थिति) को ‘एजेंसी’ (कर्तृत्व) में बदल देती है। यहाँ स्त्री अपनी चोटों से नहीं पहचानी जाती, बल्कि उस असीम विस्तार से पहचानी जाती है जो उन चोटों के परिणामस्वरूप पैदा हुआ है। यह प्रतिरोध का एक ऐसा मौन लेकिन मुखर रूप है जहाँ ‘खुलना’ ही सबसे बड़ी जीत है।
इस कविता में चक्की, चरखा और सुई जैसे उपकरण केवल घरेलू वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि वे स्त्री के ‘समय’ और ‘धैर्य’ के दार्शनिक प्रतीक हैं।चक्की का बिंब उस निरंतरता को दर्शाता है जिसमें स्त्री अपने दुखों और अनुभवों को पीसकर उन्हें जीवन के लिए उपयोगी (आटा) बनाती है। यह एक प्रकार का रूपांतरण है—कठोर अनुभवों को कोमलता में बदलना। वहीं चरखा उस सूत कातने की प्रक्रिया है जहाँ वह अपनी स्मृतियों और श्रम को एक सूत्र में पिरोती है। ये दोनों ही बिंब गतिशीलता के प्रतीक हैं, जो यह बताते हैं कि समाज जिसे स्त्री की ‘मजबूरी’ समझता है, वह वास्तव में एक सृजनात्मक चक्र है जो पूरी दुनिया के अस्तित्व को थामे हुए है।कैंची और सुई का द्वंद्व और भी गहरा है। कैंची जहाँ काटने या विखंडन का प्रतीक है, वहीं सुई जोड़ने और मरम्मत करने का। पितृसत्तात्मक संरचनाएँ जहाँ रिश्तों या पहचानों को काटती हैं, स्त्री अपनी सुई से उन फटे हुए हिस्सों को सिलती है। झाड़ू का अंत में आना सबसे महत्वपूर्ण है; यह सफ़ाई का काम नहीं बल्कि ‘चयन’ (Selection) का कार्य है। वह तय करती है कि मन की अटारी में क्या सहेजना है। ‘तारे और पहाड़’ को सहेजना यह सिद्ध करता है कि उसका कार्यक्षेत्र रसोई तक सीमित नहीं है, उसकी चेतना का विस्तार ब्रह्मांडीय है।यह समस्त श्रम उस ‘दरवाज़े’ के खुलने के बाद की स्थिति है, जो यह स्पष्ट करता है कि स्त्री का खुलापन केवल रिक्तता नहीं, बल्कि एक बेहद व्यस्त और अर्थपूर्ण संसार है।
आधुनिक विमर्श के केंद्र में ‘स्त्री का समय’ और उसका ‘अदृश्य योगदान’ सबसे महत्त्वपूर्ण बहस है। चक्की और चरखे जैसे बिंबों के माध्यम से अनामिका सिल्विया फेडेरिची (Silvia Federici) जैसे विचारकों के उस सिद्धांत को पुष्ट करती हैं, जो घरेलू श्रम को केवल ‘काम’ नहीं बल्कि ‘सभ्यता का आधार’ मानती हैं। आधुनिक स्त्रीवाद अब केवल बराबरी की बात नहीं करता, बल्कि वह स्त्री-अनुभवों के विशिष्ट ‘सौंदर्यशास्त्र’ (Aesthetics) की मांग करता है। यहाँ ‘सुई-धागा’ और ‘झाड़ू’ पितृसत्ता द्वारा थोपे गए बोझ नहीं, बल्कि एक ‘सबअल्टर्न’ (Subaltern) शक्ति के रूप में उभरते हैं। आधुनिक स्त्रीवादी विमर्श के अनुसार, जब स्त्री अपने घरेलू दायरे की वस्तुओं को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाती है, तो वह उस भाषा को तोड़ देती है जो पुरुषों ने उसके लिए गढ़ी थी। झाड़ू लगाना यहाँ दुनिया की गंदगी साफ करना नहीं, बल्कि अपने इतिहास को पुनर्गठित करना है। यह ‘इको-फेमिनिज्म’ (Eco-feminism) की ओर भी इशारा करता है, जहाँ स्त्री और प्रकृति (तारे, पहाड़, पत्थर) एक ही धरातल पर आकर खड़े हो जाते हैं।इस कविता के सन्दर्भ में उल्लेखनीय है कि स्त्री का ‘खुलना’ उसकी कमजोरी या सुरक्षा का अभाव नहीं है, बल्कि यह उसके व्यक्तित्व का वह ‘रेडिकल’ विस्तार है जो दुनिया को सहेजने की क्षमता रखता है।
अनामिका की कविता जहाँ प्रहार और बाह्य यातना के बीच घरेलू उपकरणों के माध्यम से एक ब्रह्मांडीय और श्रमसाध्य स्त्री-समय की रचना करती है, वहीं सविता सिंह की ‘रात का दरवाज़ा’ कविता स्त्री-स्वायत्तता को एक अत्यंत सूक्ष्म, अमूर्त और परा-भौतिक क्षितिज पर ले जाती है। इस धरातल पर सविता सिंह की कविता की तुलना अमेरिकी कवयित्री एड्रिएन रिच (Adrienne Rich) की प्रसिद्ध कविता ‘डाइविंग इन टू द रेक’ (Diving into the Wreck) से करना बेहद प्रासंगिक और विश्लेषण को दार्शनिक रूप से समृद्ध करता है। एड्रिएन रिच वैश्विक स्त्रीवादी विमर्श की एक ऐसी प्रखर आवाज़ हैं, जो स्त्री को इतिहास के मलबे और दमन के गहरे समुद्र में उतारकर उसकी वास्तविक पहचान की खोज करवाती हैं। इन दोनों कवयित्रियों के यहाँ बाह्य संसार से हटकर एक ‘गोपनीय’ और ‘आंतरिक’ यात्रा की समान छटपटाहट दिखाई देती है, जो स्त्री-चेतना को एक नए रूप में रूपांतरित करती है।
एड्रिएन रिच की कविता में समुद्र की अगाध गहराइयाँ और वहाँ डूबा हुआ जहाज़ (The Wreck) वही कार्य करते हैं, जो सविता सिंह की कविता में ‘रात’ का सन्नाटा करता है। रिच कहती हैं कि वे अकेले, बिना किसी पितृसत्तात्मक इतिहास की बैसाखी के, समुद्र की गहराइयों में उतरती हैं ताकि उस सच को अपनी आँखों से देख सकें जो समय की परतों के नीचे आवृत है—”द रेक एंड नॉट द स्टोरी ऑफ द रेक/ द थिंग इटसेल्फ एंड नॉट द मिथ” (The wreck and not the story of the wreck / the thing itself and not the myth)। यह यात्रा बाह्य समाज की चकाचौंध से दूर एक गहरे सन्नाटे की यात्रा है। ठीक इसी प्रकार, सविता सिंह की कविता में ‘रात’ वह स्पेस है जो स्त्री को दिन के पितृसत्तात्मक और बाज़ारू कोलाहल से मुक्त करके उसके “रुदन विलाप” को “धीरज” से सुनने का अवसर देती है। रिच के समुद्र की तरह सविता सिंह की रात भी कोई डरावना अंधकार नहीं है, बल्कि वह स्त्री की सबसे अंतरंग सहचरी है, जो उसके भीतर “रहस्य की तरह बचे उल्लास” और “स्वप्न” को सहेज कर रखती है। दोनों कवयित्रियां बाह्य इतिहास के समानांतर एक आंतरिक इतिहास की खोज में लगी हैं।
सिल्विया प्लाथ जहाँ बंद दरवाज़ों के आघात या ट्रॉमा में घिरी रहती हैं और एमिली डिकिंसन एक शांत अलगाव में दरवाज़ा बंद कर लेती हैं, वहीं एड्रिएन रिच और सविता सिंह दोनों ही ‘रूपांतरण और अतिक्रमण’ (Transformation and Transcendence) की कवयित्रियां हैं। रिच जब समुद्र की गहराई में डूबते हुए जहाज़ के अवशेषों को छूती हैं, तो उनका अपना अस्तित्व विलीन हो जाता है और वे स्वयं को उस मलबे का हिस्सा, यानी जलपरी और जलमानव दोनों के रूप में महसूस करती हैं—”आई एम शी: आई एम ही” (I am she: I am he)। यह पहचान का वह विखंडन है जो स्त्री को केवल पीड़ित होने की स्थिति (Victimhood) से बाहर निकालकर एक सार्वभौमिक चेतना (Universal Consciousness) बनाता है। ‘रात का दरवाज़ा’ समेत सविता सिंह की रचनाओं में भी यही रूपांतरण अपने चरम पर दिखाई देता है जहाँ स्त्री उस स्वप्न की प्रतीक्षा करती है “जिसे पाने के बाद वह सदा के लिए बदल जायेगी”। यह बदलाव कोई मामूली सामाजिक सुधार नहीं है, बल्कि यह पहचान का पूर्ण नवीनीकरण है।
अंतिम स्तर पर, दोनों कविताओं का दार्शनिक निष्कर्ष मुक्ति के एक असीम द्वार पर जाकर मिलता है। एड्रिएन रिच के लिए समुद्र की गहराइयों से वापस लौटना इतिहास की नई किताब लिखने जैसा है, जहाँ वे औज़ारों और अवशेषों के साथ एक नई शुरुआत का रास्ता ढूंढती हैं। वहीं सविता सिंह इस मुक्ति को एक जादुई और अमूर्त प्रतीक देती हैं—”उस नीले दरवाजे को/ जिससे अनन्त निकला जा सकता है यातनाओं के पार”। अनामिका जहाँ चक्की, सुई और झाड़ू जैसे ठोस भौतिक उपकरणों से अपना संसार बुनती हैं, वहीं प्लाथ के बजाय एड्रिएन रिच की तर्ज़ पर सविता सिंह भौतिकता का निषेध करके चेतना के विस्तार की बात करती हैं। सविता सिंह का ‘नीला दरवाज़ा’ और रिच का ‘गहरा समुद्र’ वास्तव में मिशेल फ़ूको के ‘हेटरोटोपिया’ के वे जीवंत उदाहरण हैं जो समाज द्वारा निर्मित सीमाओं को अप्रासंगिक बना देते हैं। रिच जहाँ समुद्र की परतों के नीचे सत्य की फुसफुसाहट सुनती हैं, वहीं सविता सिंह रात के धीरज में उस सत्य को अनावृत्त करती हैं। ये दोनों रचनाएँ वैश्विक स्त्रीवादी काव्य-परंपरा में इस बात की गवाह हैं कि स्त्री की सबसे बड़ी शक्ति उसके भीतर का वह असीम एकांत है, जहाँ वह अपनी यातनाओं को रूपांतरित करके एक सर्वथा नए और स्वतंत्र अस्तित्व का निर्माण करने की क्षमता रखती है।
इन चारों कविताओं का तुलनात्मक सैद्धांतिक विश्लेषण यह सिद्ध करता है कि दरवाज़ा यहाँ एक अस्थिर संकेतक या ‘फ्लोटिंग सिग्निफ़ायर’ (Floating Signifier) है। रोज़ेवोच के लिए यह अस्तित्ववादी संकट (Existential Crisis) का द्वार है, अशोक वाजपेयी के लिए यह संरचनात्मक द्वंद्व या संरचनात्मक अनेकार्थकता (Structural Ambiguity) का स्थल है, अनामिका के लिए यह ऐतिहासिक दमन और मुक्ति का माध्यम है, और सविता सिंह के लिए यह यातनाओं के पार दार्शनिक अतिक्रमण (Transcendence) तथा अनंत आत्म-मुक्ति का मार्ग है। रोज़ेवोच की शून्यता जहाँ अर्थ की मृत्यु का वर्णन करती है, वहीं अशोक वाजपेयी की फिसलन अर्थ की मुक्ति का उत्सव मनाती है, अनामिका का संचय उस अर्थ को एक नई ज़मीन प्रदान करता है, तो सविता सिंह का ‘नीला दरवाज़ा’ उस अर्थ को भौतिकता से मुक्त कराकर चेतना के असीम फैलाव में विलीन कर देता है।
देरिदा के विखंडनवाद के अनुसार, ये चारों कविताएँ लोगोसेंट्रिज्म यानी शब्द-केंद्रित सत्य को चुनौती देती हैं। रोज़ेवोच केंद्र को शून्य कर देते हैं, अशोक वाजपेयी केंद्र को अस्थिर कर देते हैं, अनामिका केंद्र को हाशिए पर विस्थापित कर देती हैं, और सविता सिंह केंद्र की समूची भौतिक सत्ता का अतिक्रमण करके एक नए आंतरिक केंद्र की स्थापना करती हैं। पियरे माछरे के नज़रिए से इन कविताओं की सचाई इनके मौन और पाठगत रिक्तियों में छिपी है।अशोक वाजपेयी का दरवाज़ा इसलिए सार्थक है क्योंकि वह पूरी तरह बंद होने के अभाव को प्रदर्शित करता है, रोज़ेवोच का दरवाज़ा इसलिए त्रासद है क्योंकि वह स्मृतियों के ध्वंस पर खड़ा है, अनामिका का दरवाज़ा इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि वह पीड़ा को ज्ञान और सृजन में बदल देता है, तो सविता सिंह का दरवाज़ा इसलिए विलक्षण है क्योंकि वह रात के मौन और यातना के सन्नाटे के भीतर से एक रूपांतरकारी स्वप्न और अनंत मुक्ति का मार्ग अनावृत्त करता है।
अंततः ये कविताएँ मिलकर एक ऐसा अन्तःपाठ या इंटरटेक्स्टुअलिटी (Intertextuality) निर्मित करती हैं जहाँ दरवाज़ा खुलना केवल एक भौतिक क्रिया नहीं, बल्कि चेतना का एक ऐसा विस्फोट है जो हमें सचाई के उस पार ले जाता है जहाँ शब्द और अर्थ का द्वैत समाप्त हो जाता है।
इन कवियों के दरवाज़ा बिम्ब का यह संवाद पाठक को एक ऐसे खुले आकाश के नीचे छोड़ देता है जहाँ दरवाज़े अब दीवार का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वयं प्रकाश का माध्यम बन गए हैं। रोज़ेवोच का शून्य हमें अंत की ओर ले जाता है, वाजपेयी की फिसलन हमें वर्तमान की सहजता में वापस लाती है, और अनामिका का संचय हमें भविष्य की पुनर्रचना का रास्ता दिखाता है। यह संवाद इस दार्शनिक प्रश्न का उत्तर है कि सचाई केवल देखने में नहीं है, बल्कि होने और करने के अंतर्संबंधों में निहित है। अशोक वाजपेयी का वह प्रारंभिक वक्तव्य कि कविता सचाई का दरवाज़ा खोलती है, इन तीनों के मेल से पूर्ण होता है क्योंकि कविता केवल दरवाज़ा खोलती नहीं है, वह स्वयं एक दरवाज़ा बन जाती है जिस पर दस्तक देना और उसे अधखुला छोड़ देना ही कविता का सबसे बड़ा धर्म है। यह विश्लेषण सिद्ध करता है कि दरवाज़ा केवल एक वस्तु नहीं, बल्कि वह क्रिया है जो हमें अपने होने या बीइंग (Being) का अहसास कराती है। चाहे वह रोज़ेवोच की शून्यता हो या अनामिका की मन की दुछत्ती, ये सभी उस सचाई के भिन्न-भिन्न रूप हैं जिसे कविता अपने पारदर्शी शब्दों में कैद करने का प्रयास करती है। अंततः, पाठक स्वयं वह दरवाज़ा बन जाता है जिसके माध्यम से दुनिया का अर्थ गुज़रता है और नया रूप लेता है।
तादेयुश रोज़ेविच , अशोक वाजपेयी, अनामिका और सविता सिंह की कविताओं में ‘दरवाज़ा’ जिस सत्य के उद्घाटन का माध्यम बना है, वह वैश्विक काव्य-परंपरा के उन महान कवियों के विमर्शों से गहरे स्तर पर जुड़ता है जिन्होंने कविता को महज़ शब्दों का खेल नहीं, बल्कि अस्तित्व की सीमाओं का परीक्षण माना है। रोज़ेविच का ‘शून्य’ और ‘तीसरा दरवाज़ा’ टी.एस. एलियट की कृति ‘बर्नट नॉर्टन’ (Burnt Norton) की उन पंक्तियों की याद दिलाता है जहाँ वे कहते हैं, “पैर की आहट स्मृति में उस दरवाज़े की ओर गूँजती है जिसे हमने कभी नहीं खोला” (Footfalls echo in the memory / Down the passage which we did not take / Towards the door we never opened)। एलियट की तरह रोज़ेविच भी उस दरवाज़े के पार समय की शून्यता को देखते हैं। यह एज़रा पाउंड के उस विचार का विस्तार है जहाँ वे ‘द केंटोस’ (The Cantos) में लिखते हैं, “जो तुम वास्तव में प्रेम करते हो, वही शेष रहता है, बाकी सब कूड़ा है” (What thou lovest well remains, the rest is dross)। रोज़ेविच के यहाँ वह ‘कूड़ा’ या अवशेष ही ‘कुछ नहीं’ बनकर उभरता है, जो युद्धोत्तर मनुष्य की अंतिम नियति है।
एलियट की ‘बर्न्ट नॉर्टन’(Burnt Norton) कविता में आए ‘दरवाज़ा’ के बिम्ब को ध्यान में रखते हुए अशोक वाजपेयी की ‘दरवाज़ा’ कविता की तुलना करने पर दोनों कवियों के बीच गहन समानता और गहन अंतर दोनों ही दिखाई देते हैं। एलियट का दरवाज़ा मुख्य रूप से एक अनदेखी, कभी न खोली गई संभावना का प्रतीक बनता है। ‘बर्न्ट नॉर्टन’(Burnt Norton) में प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं—”उस दरवाज़े की ओर जिसे हमने कभी नहीं खोला / उस गुलाब के बगीचे के भीतर।”(‘Towards the door we never opened / Into the rose-garden’):
पदचिह्न स्मृति में गूँजते हैं
उस गलियारे में जो हमने नहीं लिया
उस दरवाज़े की ओर जो हमने कभी नहीं खोला
रोज गार्डन में प्रवेश के लिए।
मेरे शब्द इस प्रकार तुम्हारे मन में गूँजते हैं।
लेकिन किस उद्देश्य से?
एक कटोरे में गुलाब की पंखुड़ियों पर धूल उड़ाते हुए मुझे नहीं पता।
अन्य गूँजें बगीचे में बसती हैं।
यह दरवाज़ा उस ‘रोज गार्डन’ (rose-garden) की ओर खुलता है जो बचपन की मासूमियत, ईडन की तरह का आदर्श बाग़, प्रेम की पूर्णता या समय और कालातीतता के मिलन बिंदु का प्रतीक है। लेकिन यह दरवाज़ा कभी नहीं खोला गया क्योंकि मानव जाति बहुत अधिक वास्तविकता सहन नहीं कर सकती । मनुष्य वास्तविकता का बोझ, पूर्ण सत्य या अनंतता से रूबरू होना बर्दाश्त नहीं कर पाता। एलियट का यह बिम्ब पश्चातापपूर्ण, स्थिर और आध्यात्मिक रूप से त्रासदीपूर्ण है। दरवाज़ा एक अनंत संभावना का द्वार है जो कभी पार नहीं किया गया, और इसलिए यह समय की सीमाओं में फँसे मानव की असमर्थता को दर्शाता है। ‘फ़ोर क्वार्टेट्स’ (Four Quartets) के अन्य भागों में भी समय, पश्चाताप और आध्यात्मिक खोज के संदर्भ में दरवाज़े या सीमाओं के बिम्ब आते हैं, लेकिन ‘बर्न्ट नॉर्टन’ का यह दरवाज़ा सबसे प्रसिद्ध और गहन है। यह दरवाज़ा बंद या न खोला हुआ रहता है, और उसकी अनदेखी ही कविता का केंद्र बन जाती है।
अशोक वाजपेयी की ‘दरवाज़ा’ कविता बिलकुल विपरीत दिशा में काम करती है। यहाँ दरवाज़ा आधा खुला है—न पूरी तरह बंद, न पूरी तरह खुला। कविता की मुख्य पंक्तियाँ हैं—’दरवाज़ा खुल सकता था / कोई खोले तभी नहीं / अपने आप भी नहीं / क्योंकि वह पूरी तरह बंद नहीं था / किसी ने किया ही नहीं / सबको जाने की जल्दी होती है / ठीक से बंद करने की नहीं’। आगे चलकर कवि कहते हैं—’दरवाज़ा कभी पूरी तरह बंद नहीं होता / हम ऐसा करना जान-बूझकर भूल जाते हैं’। यहाँ दरवाज़ा मानवीय लापरवाही, जल्दबाज़ी और जान-बूझकर भूलने का प्रतीक है। वाजपेयी का दरवाज़ा सीमा का प्रतीक है जो अंदर और बाहर को अलग रखता है, लेकिन पूरी तरह अलग नहीं करता। यह रिश्तों, निजी और सार्वजनिक के बीच संतुलन, अपूर्णता की स्वीकृति और जीवन की सांस लेने की जगह बनाता है। दरवाज़ा ‘घिरे हुए को रोकता है / और अघिरे हुए को अंदर आने से थामता है’, लेकिन ‘थोड़ा-सा बाहर-अंदर और थोड़ा-सा अंदर-बाहर फिसल ही जाता है’। यह फिसलन जीवन की आवश्यकता है—पूर्ण बंद होना कठोरता है, पूर्ण खुला होना अराजकता। जान-बूझकर भूलना बुद्धिमत्ता और दया है।
दोनों कविताओं में दरवाज़ा एक सीमा या संक्रमण का प्रतीक है, लेकिन उसकी स्थिति और अर्थ बिलकुल अलग हैं। एलियट का दरवाज़ा न खोला गया है—यह एक खोई हुई संभावना है जो कभी साकार नहीं हुई और इसलिए हमेशा दुख देती है। अशोक वाजपेयी का दरवाज़ा आधा खुला है—यह एक जीवित संतुलन है जो अपूर्णता को उत्सव बनाता है। एलियट का स्वर पश्चाताप, त्रासदी और असहायता से भरा है—दरवाज़ा खुलने से डर लगता है क्योंकि वास्तविकता असहनीय है। वाजपेयी का स्वर क्षमा, स्वीकृति और मानवीय दया से भरा है—दरवाज़ा आधा खुला रहना जीवन की आवश्यकता है। एलियट समय की सीमाओं और मानव की सीमित क्षमता पर जोर देते हैं—दरवाज़ा कालातीतता की ओर खुल सकता था, लेकिन खुला नहीं। वाजपेयी समय और जीवन की अपूर्णता को स्वीकार करते हैं—दरवाज़ा सापेक्षता, संतुलन और रिश्तों की सांस का प्रतीक है। थोड़ा बहाव जीवन को संभव बनाता है।
एलियट का दरवाज़ा पश्चिमी आधुनिकतावादी संदर्भ में आध्यात्मिक संकट और ईसाई प्रतीकों से जुड़ा है। वाजपेयी का दरवाज़ा भारतीय दार्शनिक परंपरा—ध्यान, सजगता, अपूर्णता की स्वीकृति—से जुड़ा है। उनकी दूसरी कविता ‘उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम’ में दरवाज़ा स्त्री की निजता और प्रेम की असमर्थता का प्रतीक बनता है, जो एलियट की तुलना में अधिक घरेलू और मानवीय है।
संक्षेप में, एलियट का दरवाज़ा एक न खुलने की त्रासदी है—जो हमें पिछले पछतावे में छोड़ जाता है। वाजपेयी का दरवाज़ा एक न पूरी तरह बंद होने की सुंदरता है—जो हमें वर्तमान की कोमल स्वीकृति सिखाता है। एलियट हमें एक अनंत संभावना की कमी से रूबरू कराते हैं, जबकि वाजपेयी हमें अपूर्णता में जीने की कला दिखाते हैं। यही दोनों कविताओं के बीच का मूल अंतर है।
अशोक वाजपेयी की कविता में जो अर्थ की ‘फिसलन’ और ‘अधखुलापन’ है, वह ओक्टावियो पाज़ के उस बोध के करीब है जहाँ वे अपनी कविता ‘बिटवीन गोइंग एंड स्टेइंग’ (Between Going and Staying) में लिखते हैं, “सब कुछ पारदर्शी है, सब कुछ अछूता है” (All is transparent, all is untouched)। पाज़ के यहाँ भी अंदर और बाहर के बीच की सीमाएँ वाजपेयी के ‘गड्डमड्ड’ होने की तरह ही धुंधली हैं। वाजपेयी का ‘जानबूझकर भूलना’ जॉन एशबरी की उस उत्तर-आधुनिक शैली से संवाद करता है जहाँ अर्थ किसी केंद्र पर टिकने के बजाय बिखरने में अपनी सार्थकता पाता है। एशबरी अपनी ‘सेल्फ-पोर्ट्रेट इन ए कॉन्वेक्स मिरर’ (Self-Portrait in a Convex Mirror) कविता में कहते हैं, “सतह ही वह सब कुछ है जो वहाँ है” (The surface is all that there is)। अशोक वाजपेयी भी दरवाज़े की सतह और उसकी फिसलन को ही सत्य मानते हैं, न कि उसके पीछे छिपे किसी भारी रहस्य को। यह अलेक्जेंडर पुश्किन के उस बोध का आधुनिक रूपांतरण है जहाँ ‘भूलना’ और ‘भटकना’ जीवन की जीवंतता का हिस्सा है।
अनामिका का ‘दरवाज़ा’ और ‘श्रम का संचय’ पाब्लो नेरुदा की उन पंक्तियों के साथ एक नया अन्तःपाठ रचता है जहाँ वे ‘माचू पिचू के शिखर’ (The Heights of Macchu Picchu) कविता में दबे हुए लोगों के श्रम को आवाज़ देते हुए कहते हैं, “आओ, मेरी देह के भीतर से बोलो” (Come up and speak through my body)। अनामिका का दरवाज़ा पीटे जाने के बावजूद जिस तरह खुलता है, वह नेरुदा की उस पुकार का जवाब है जहाँ वस्तुएँ मनुष्य के संघर्ष का हिस्सा बन जाती हैं। यह ईव बॉनफुआ (Yves Bonnefoy) के उस विचार से भी जुड़ता है जहाँ वे ‘द कर्व ऑफ द सोंग्स’ (The Curve of the Songs) में लिखते हैं, “घर वह जगह है जहाँ हम सत्य के साथ अकेले रह सकते हैं” (Home is the place where one can be alone with truth)। अनामिका का ‘मन की दुछत्ती’ पर संचय करना बॉनफुआ के उसी आंतरिक घर का निर्माण है जो बाहरी हिंसा के बावजूद सुरक्षित रहता है।
सविता सिंह की ‘रात का दरवाज़ा’ कविता में ‘अमूर्त आत्म-मुक्ति’ एड्रिएन रिच की उन पंक्तियों के साथ एक गहरा दार्शनिक अंतर्संवाद रचती है जहाँ वे ‘डाइविंग इन टू द रेक’ (Diving into the Wreck) में इतिहास के मलबे और दमन के गहरे समुद्र से परे एक समानांतर आंतरिक सत्य की खोज करती हैं। सविता सिंह का दरवाज़ा जॉन एशबरी की तरह केवल सतह पर नहीं तैरता और न ही अनामिका की तरह भौतिक श्रम के चक्रव्यूह में बंधता है, बल्कि वह ‘रात’ के धीरज में “रहस्य की तरह बचे उल्लास” और “रूपांतरण के स्वप्न” को अनावृत्त करता है। यह दरवाज़ा मनुष्य की उस चेतनात्मक स्वायत्तता का प्रतीक है जो ज़िगमुंट बॉमन की तरल आधुनिकता के बिखराव और लौकिक यातनाओं का दार्शनिक अतिक्रमण करके “अनन्त” की ओर खुलता है, जहाँ पहुँचकर स्त्री-अस्मिता का कोण बदल जाता जाता है।
इन कवियों का साझा विमर्श यह सिद्ध करता है कि दरवाज़ा केवल आने-जाने का मार्ग नहीं है, बल्कि वह उस ‘महान पाठ’ का हिस्सा है जिसे मानवता सदियों से लिख रही है। यदि एज़रा पाउंड के लिए कविता ‘विचारों को अर्थ प्रदान करना’ थी, तो वाजपेयी के लिए वह ‘अर्थ को फिसलन देना’ है। यदि एलियट के लिए दरवाज़ा ‘अतीत की अनुगूँज’ था, तो अनामिका के लिए वह ‘वर्तमान का प्रतिरोध’ है। ओक्टावियो पाज़ के शब्दों में कहें तो, “कविता वह दरवाज़ा है जो हमें समय के बाहर ले जाता है और फिर समय के भीतर वापस ले आता है” (Poetry is the door that takes us out of time and brings us back into it)। ये सभी वैश्विक स्वर रोज़ेवोच के शून्य, वाजपेयी की फिसलन और अनामिका के सृजन के साथ मिलकर उस ‘सचाई’ की तस्दीक करते हैं जो हर भाषा और हर संस्कृति में दरवाज़े पर दस्तक दे रही है।
तादेयुश रोज़ेविच की कविता में ‘नीली केतली’ और अनामिका की की कविता में ‘झाड़ू’ जैसे साधारण घरेलू बिम्बों का वैश्विक काव्य-परंपरा के संदर्भ में विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट होता है कि ये वस्तुएं केवल भौतिक पदार्थ नहीं, बल्कि स्मृतियों और दमन के विरुद्ध खड़े सांस्कृतिक प्रतीक हैं। रोज़ेविच के यहाँ ‘नीली केतली’ (A blue kettle) बचपन की उस सुडौल शांति का बिम्ब है जो युद्ध की विभीषिका से पहले अस्तित्व में थी। यह बिम्ब टी.एस. एलियट की ‘द लव सॉन्ग ऑफ जे. अल्फ्रेड प्रुफ्रॉक’ (The Love Song of J. Alfred Prufrock) की उन पंक्तियों के समानांतर खड़ा होता है जहाँ वे कहते हैं, “मैंने अपने जीवन को कॉफ़ी के चम्मचों से मापा है” (I have measured out my life with coffee spoons)। एलियट के यहाँ चम्मच जीवन की व्यर्थता और एकरसता का प्रतीक है, जबकि रोज़ेवोच की नीली केतली उस खोई हुई पवित्रता का शोकगीत है जिसे युद्ध ने लील लिया। यह एज़रा पाउंड के बिम्बवाद या इमेजिज्म (Imagism) के उस सिद्धांत की पुष्टि करता है जहाँ एक बिम्ब ही ‘बौद्धिक और भावनात्मक जटिलता’ को एक क्षण में प्रस्तुत कर देता है। रोज़ेविच की केतली उस ‘वस्तुनिष्ठ सह-संबंध’ (Objective Correlative) की तरह काम करती है जो पाठक के भीतर एक गहरी उदासी और स्मृति का संचार करती है।
अनामिका की ‘झाड़ू’ का बिम्ब वैश्विक स्तर पर पाब्लो नेरुदा की ‘ओड टू कॉमन थिंग्स’ (Ode to Common Things) से गहरा संवाद करता है। नेरुदा जहाँ साधारण वस्तुओं की सुंदरता का उत्सव मनाते हैं, वहीं अनामिका झाड़ू को एक ‘मेटाफिजिकल’ या परा-भौतिक शक्ति प्रदान करती हैं जो ‘तारे बुहारती’ और ‘पहाड़ समेटती’ है। यह झाड़ू उस ‘बुहारने’ की क्रिया का विस्तार है जिसे ओक्टावियो पाज़ अपनी कविताओं में ‘समय की धूल साफ करना’ मानते हैं। अनामिका का यह बिम्ब ईव बॉनफुआ की उन पंक्तियों की याद दिलाता है जहाँ वे ‘द लेक’ (The Lake) में लिखते हैं, “चीजों के मलबे के नीचे ही सत्य दबा होता है” (Beneath the debris of things lies the truth)। अनामिका की झाड़ू उसी मलबे को बुहारकर सत्य के ‘टूटे-बिखरे कतरों’ को मन की दुछत्ती पर संचित करती है। यह ‘दुछत्ती’ जॉन एशबरी की ‘कॉन्वेक्स मिरर’ वाली उस स्पेस की तरह है जहाँ स्मृतियाँ विकृत होकर भी अपना आकार बचाए रखती हैं।
रोज़ेविच की कविता में ‘मेज़ पर रखा रेड वाइन का प्याला’ एक ऐसे दृश्य का हिस्सा है जो वैश्विक कविता में ‘स्थिरता’ और ‘ठहराव’ का महा-रूपक है। यह बिम्ब कीट्स के ‘ओड ऑन ए ग्रीशियन अर्न’ (Ode on a Grecian Urn) की उस चिरस्थायी सुंदरता का विखंडन है जो समय के थपेड़ों से अछूती रहना चाहती है। रोज़ेविच के यहाँ यह प्याला उस ‘क्षण’ की गवाही देता है जो बीत चुका है या बीतने वाला है। यह एज़रा पाउंड के उस विचार को पुष्ट करता है कि “बिम्ब वह है जो समय और स्थान के एक अंतराल में बौद्धिक और भावनात्मक जटिलता को प्रस्तुत करता है” (An ‘Image’ is that which presents an intellectual and emotional complex in an instant of time)। यहाँ ‘लाल शराब’ में जीवन के राग और ‘अंधेरा कमरा’ में मृत्यु की छाया का द्वंद्व है।
अनामिका की ‘सुई और कैंची’ का बिम्ब एज़रा पाउंड के ‘केंटोस’ में बुनने और काटने के प्रतीकों के साथ एक अन्तःपाठ निर्मित करता है। जहाँ पाउंड के यहाँ काटना विनाशकारी हो सकता है, अनामिका के यहाँ कैंची और सुई सृजन के ‘वृहत्चक्र’ का हिस्सा हैं। यह उस ‘ऐतिहासिक निरंतरता’ का भाषाई विन्यास है जिसे अलेक्जेंडर पुश्किन ने अपने काव्य में ‘जीवन के ताने-बाने’ के रूप में देखा था। अनामिका इन घरेलू उपकरणों को उस राजनैतिक औज़ार में बदल देती हैं जो पितृसत्तात्मक इतिहास की सिलाई उधेड़ते हैं और अनुभवों को नए सिरे से सिलते हैं। यह ‘सिलाई’ और ‘बुहारना’ ही वह सचाई है जिस पर अशोक वाजपेयी का वक्तव्य आधारित है कि कविता उन दरवाज़ों को खोलती है जिन्हें खोलने की हिम्मत समाज नहीं जुटा पाता।
इन सभी वैश्विक कवियों—नेरुदा, पाज़, एलियट और बॉनफुआ—के साथ इन कवियों का यह बिम्बगत संवाद यह सिद्ध करता है कि ‘दरवाज़ा’, ‘केतली’ और ‘झाड़ू’ केवल स्थानीय वस्तुएँ नहीं हैं। ये उस वैश्विक मानवीय अनुभव के ‘चिन्हक’ या सिग्निफ़ायर्स (Signifiers) हैं जो समय की धूल बुहारकर सचाई का चेहरा साफ़ करते हैं। इन बिम्बों की ऐतिहासिकता और इनका भाषाई विन्यास हमें उस ‘अन्तःपाठ’ की ओर ले जाता है जहाँ हर कविता दूसरी कविता का उत्तर है। अंततः, रोज़ेवोच का शून्य, वाजपेयी की फिसलन और अनामिका का संचय एक ऐसी ‘वैश्विक काव्य-संवेदना’ का निर्माण करते हैं जहाँ कविता सचाई का दरवाज़ा खोलकर हमें स्वयं अपनी ही आत्मा के आमने-सामने खड़ा कर देती है।
तादेयुश रोज़ेविच, अशोक वाजपेयी, अनामिका और सविता सिंह की इन कविताओं के माध्यम से शुरू हुई यह दार्शनिक यात्रा अंततः उस वैश्विक काव्य-बोध पर विश्राम पाती है जहाँ सचाई का दरवाज़ा कोई जड़ वस्तु नहीं बल्कि चेतना का एक जीवंत विस्तार बन जाता है। रोज़ेवोच का शून्य, अशोक वाजपेयी की फिसलन, अनामिका का संचय और सविता सिंह का अतिक्रमण—ये चारों स्थितियाँ समय के अलग-अलग आयामों को मनुष्य के अस्तित्वपरक अनुभवों से जोड़ती हैं। रोज़ेविच के यहाँ जो रिक्तता है वह इतिहास के मलबे से उपजी एक ऐसी शून्यता है जिसे एज़रा पाउंड ने खंडहरों के बीच अर्थ की तलाश माना था। वहीं वाजपेयी की फिसलन उत्तर-संरचनावादी बे-यक़ीनी का वह जश्न है जहाँ सत्य को पकड़ने के बजाय उसे मुक्त छोड़ने में ही उसकी सार्थकता निहित है। यह ओक्टावियो पाज़ के उस पारदर्शी समय के करीब है जहाँ आवाजाही ही जीवन का एकमात्र प्रमाण है। अनामिका इन सबके बीच श्रम और सृजन के उस महाख्यान को प्रतिष्ठित करती हैं जो नेरुदा और बॉनफुआ की तरह साधारण घरेलू वस्तुओं को ब्रह्मांडीय गरिमा प्रदान करता है। इसी क्रम में, सविता सिंह समकालीन स्त्री-चेतना को वस्तुओं की निर्भरता से मुक्त कर एड्रिएन रिच की तरह एक ऐसे अमूर्त और जादुई आंतरिक स्पेस का संधान करती हैं, जहाँ यातनाओं का पारगमन कर आत्म-रूपांतरण संभव हो पाता है।
इन कविताओं का गंभीर सैद्धांतिक विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि दरवाज़ा वह संधि-स्थल है जहाँ देरिदा का विखंडनवाद, बार्थ के कोड और स्त्रीवादी चेतना एक साथ सक्रिय होते हैं। यह दरवाज़ा उन सत्यों को अनावृत करता है जिन्हें सभ्यताओं ने अपनी सुविधा के लिए बंद कर दिया था। रोज़ेवोच का शून्य हमें अपनी नश्वरता के प्रति सचेत करता है, अशोक वाजपेयी की फिसलन हमें हमारी सीमाओं के प्रति उदार बनाती है, अनामिका का संचय हमें हमारे संघर्षों के प्रति गौरवबोध से भरता है, तो सविता सिंह का ‘नीला दरवाज़ा’ हमें यातनाओं के पार अनंत आत्म-मुक्ति की राह दिखाता है। वैश्विक कवियों एलियट, एशबरी, पुश्किन और एड्रिएन रिच के संदर्भों ने इस बात की पुष्टि की है कि ये भारतीय और यूरोपीय स्वर किसी एक संस्कृति के नहीं, बल्कि समूची मानवता के उस साझे अनुभव के स्वर हैं जो समय के बंद दरवाजों पर निरंतर दस्तक दे रहे हैं।
अशोक वाजपेयी के उस प्रारंभिक वक्तव्य की सार्थकता इसी में है कि कविता हमें उस सचाई के सम्मुख खड़ा कर देती है जहाँ से भागना असंभव है। यह सचाई चाहे रोज़ेविच के तीसरे दरवाज़े के पार वाली चुप्पी हो, वाजपेयी की जानबूझकर की गई भूल हो, अनामिका की मन की दुछत्ती पर जमा कतरे हों, या फिर सविता सिंह की रात के धीरज में छिपा रूपांतरण का स्वप्न हो—यह हमें एक बेहतर मनुष्य बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। कविता का दरवाज़ा खुलना दरअसल हमारी अपनी ही चेतना का खुलना है। यह विश्लेषण सिद्ध करता है कि एक श्रेष्ठ कविता स्वयं एक ऐसा दरवाज़ा होती है जो सदियों से बंद पड़ी संवेदनाओं को झकझोरती है और हमें पुकारती है कि यहाँ आइए, दस्तक दीजिए और इस सचाई को खोलिए जिसे हमने संकोच या डर के मारे बंद कर रखा था। इसी अधखुलेपन, इसी फिसलन और इसी आत्मिक पारगमन में कविता और जीवन की अनंत संभावनाएँ सुरक्षित हैं।
संकेतकों की इस फिसलन के माध्यम से जो सामाजिक यथार्थ उभरता है, वह उस सत्तात्मक संरचना को चुनौती देता है जो समाज को स्थिर और अपरिवर्तनीय परिभाषाओं में बांधकर रखना चाहती है। समाजशास्त्र में जिसे हम यथास्थिति (Status Quo) कहते हैं, वह असल में संकेतों का एक ऐसा अनुशासन है जहाँ दरवाज़ा मतलब केवल रुकावट और घर मतलब केवल चारदीवारी होती है। लेकिन रोज़ेवोच, वाजपेयी और अनामिका की कविताएँ इन संकेतों को उनकी जड़ता से मुक्त कर सामाजिक यथार्थ की एक नई परत खोलती हैं।
रोज़ेविच की नीली केतली का संकेतक उस विस्थापित यथार्थ की ओर संकेत करता है जहाँ युद्ध के बाद की दुनिया में ‘घर’ एक भौतिक सत्य न रहकर केवल एक मानसिक टीस बन गया है। यह उस शरणार्थी चेतना (Refugee Consciousness) का संकेत है जो आज भी वैश्विक स्तर पर प्रासंगिक है। जब संकेतक अपनी मूल वस्तु से कट जाता है, तो वह एक ऐसी रिक्तता पैदा करता है जिसे समाजशास्त्री ज्यां बोद्रिया (Jean Baudrillard) ने सिम्युलेक्रा (Simulacra) कहा है—जहाँ असली वस्तु खो गई है और केवल उसका संकेत बचा है। रोज़ेवोच का यथार्थ यह है कि आधुनिक सभ्यता ने अपनी स्मृतियों के ‘अंदर’ जाने वाले सारे दरवाज़े खो दिए हैं और अब वह केवल एक विराट ‘बाहर’ (Outside) में रहने को अभिशप्त है।
अशोक वाजपेयी की कविता का यथार्थ उस आधुनिक नागरिक की दुविधा है जो एक साथ कई दुनियाओं में जी रहा है। यहाँ ‘अंदर-बाहर का फिसलना’ उस वैश्विक पहचान का संकेतक है जहाँ संस्कृतियाँ और विचार अब शुद्ध नहीं रहे। समाजशास्त्री ज़िगमुंट बॉमन की ‘लिक्विड मॉडर्निटी’ के संदर्भ में देखें तो वाजपेयी का दरवाज़ा उस तरलता का उत्सव है जहाँ हम किसी एक विचारधारा या पहचान के भीतर पूरी तरह बंद नहीं हो सकते। “जानबूझकर भूल जाना” उस सांप्रदायिक या संकीर्ण कट्टरता के विरुद्ध एक नागरिक प्रतिरोध है जो हर चीज़ को बंद और निश्चित करना चाहती है। यह फिसलन ही वह लोकतांत्रिक गुंजाइश है जो समाज में संवाद को जीवित रखती है।
अनामिका की कविता जिस सामाजिक यथार्थ को अनावृत करती है, वह ‘हाशिए की अर्थव्यवस्था’ और ‘स्त्री-संघर्ष’ का यथार्थ है। उनके यहाँ संकेतक (झाड़ू, चक्की, सुई) अपनी घरेलू सीमाओं को लांघकर उस अदृश्य श्रम के वाचक बन जाते हैं जिस पर पूरी सभ्यता टिकी है। यह यथार्थ हमें उस पितृसत्तात्मक इतिहास की याद दिलाता है जिसने स्त्रियों को केवल ‘दरवाज़े’ की तरह इस्तेमाल किया—सिर्फ आने-जाने के लिए, लेकिन उनके भीतर की दुनिया को कभी नहीं समझा। अनामिका का ‘पीटा गया दरवाज़ा’ उस हिंसा का भौतिक संकेतक है जो सदियों से सामान्य मान ली गई थी। लेकिन जब यह दरवाज़ा खुलता है, तो यह केवल एक घर नहीं खोलता, बल्कि इतिहास के उस अंधेरे कोने को खोल देता है जहाँ स्त्री की मेधा और उसका संचय ‘दुछत्ती’ पर धूल फाँक रहा था।
सविता सिंह की रचना जिस यथार्थ को रूपायित करती है, वह ‘आंतरिक उपनिवेशीकरण’ (Internal Colonization) के विरुद्ध स्त्री की आत्मिक और दार्शनिक संप्रभुता का यथार्थ है। उनके यहाँ ‘रात’ और ‘नीला दरवाज़ा’ जैसे संकेतक बाह्य संसार की भौतिकता और सामाजिक भूमिकाओं से पूरी तरह मुक्त होकर उस अवचेतन चेतना के वाचक बनते हैं, जिसे पितृसत्तात्मक इतिहास और बाज़ारवादी व्यवस्था कभी नियंत्रित नहीं कर सकी। सिमोन द बोउआर के ‘द सेकेंड सेक्स’ (The Second Sex) और हेलेन सिक्सू के ‘स्त्री-लेखन’ (Écriture féminine) के वैश्विक संदर्भ में देखें तो, सविता सिंह का यथार्थ अनामिका के श्रमसाध्य यथार्थ से आगे बढ़कर उस ‘अमूर्त स्पेस’ की रचना करता है जहाँ स्त्री अपनी यातनाओं का ऐतिहासिक अतिक्रमण (Transcendence) करती है। दिन का उजाला जहाँ स्त्री पर समाज और व्यवस्था की निरंतर निगरानी (Panopticon) का भौतिक यथार्थ है, वहीं सविता सिंह की ‘रात’ उस दमनकारी विमर्श को ध्वस्त कर स्त्री-अस्मिता को एक ‘सुरक्षित स्थल’ (Safe Space) प्रदान करती है। उनका ‘नीला दरवाज़ा’ किसी सांसारिक कमरे या समाजशास्त्रीय चौखट में नहीं खुलता, बल्कि वह उस ‘अनंत’ का संकेतक है जहाँ यातनाएँ और सामाजिक बंधन अप्रासंगिक हो जाते हैं। यह यथार्थ वैश्विक स्त्री को यह आश्वस्त करता है कि बाहरी दुनिया के सारे दरवाज़े बंद होने या पीटे जाने के बावजूद, उसके भीतर रूपांतरण का एक ऐसा “स्वप्न” और “रहस्य की तरह बचा उल्लास” हमेशा सुरक्षित रहता है, जो उसे उसकी आदिम और असीम स्वतंत्रता से मिला देता है।
वैश्विक संदर्भ में देखें तो इन संकेतकों का बदलना उस ‘महासत्य’ की ओर इशारा करता है कि समाज कभी भी स्थिर नहीं होता। यदि एलियट की ‘कॉफी स्पून’ आधुनिक मनुष्य की ऊब का संकेतक थी, तो अनामिका की ‘झाड़ू’ उस ऊब को बुहारकर नई संभावनाएँ तलाशने का औज़ार है। यदि पाज़ के लिए समय का प्रवाह एक दार्शनिक प्रश्न था, तो वाजपेयी के लिए वह एक सामाजिक व्यवहार है। यह फिसलन हमें यह सिखाती है कि सचाई को किसी एक ‘बंद दरवाज़े’ या ‘निश्चित परिभाषा’ में ढूँढना एक भूल है। सचाई उस आवाजाही में है, उस थोड़े-से फिसलन में है, और उस श्रम में है जो संकेतों को लगातार नए अर्थ प्रदान करता रहता है।
इस प्रकार, कविता सचाई का जो दरवाज़ा खोलती है, वह असल में हमें एक ऐसे खुले समाज (Open Society) की ओर ले जाता है जहाँ संकेतों पर किसी एक का एकाधिकार नहीं है।
केदारनाथ सिंह की कविता में ‘दरवाज़े’ का ज़िक्र अशोक वाजपेयी की ‘दरवाज़ा’ कविता से भिन्न लहजे में है,जिनका तुलनात्मक विवेचन समकालीन कविता के दो बिल्कुल भिन्न छोरों को सामने लाता है। जहाँ केदारनाथ सिंह के यहाँ दरवाज़ा ‘भरोसे का लोक-दर्शन’ है, वहीं अशोक वाजपेयी के यहाँ यह ‘अस्तित्व का संशय और सभ्यतागत व्यवहार’ है:
दरवाज़े खुला रखो
वे लौट सकते हैं
उम्मीद मत रखो
बस उन्हें खुला छोड़ दो
दरवाजों का खुला होना
ख़ुद एक उम्मीद है..
~केदारनाथ सिंह
केदारनाथ सिंह के यहाँ दरवाज़े का खुला रहना एक सुविचारित नैतिकता है। “दरवाजों का खुला रहना खुद एक उम्मीद है”—यह एक सक्रिय चुनाव है। यह घर के ‘व्याकरण’ का हिस्सा है, जिसे ईंटों और मर्यादा से सीखा गया है।अशोक वाजपेयी के यहाँ दरवाज़े का खुला रहना एक भूल या मानवीय लापरवाही है। “सबको जाने की जल्दी होती है / ठीक से बंद करने की नहीं।” यहाँ दरवाज़ा इसलिए खुला नहीं है कि कोई सचेत उम्मीद है, बल्कि इसलिए खुला है क्योंकि जाने वाले उसे ‘भुला’ चुके हैं। यह एक आकस्मिक (Accidental) खुलापन है।
अशोक वाजपेयी की कविता दरवाज़े को एक सीमान्त की तरह रेखांकित करती है है। कवि कहता है कि यदि दरवाज़ा न हो तो “घिरा और अनघिरा गड्डमड्ड हो जाए।” यह निजता (Privacy) और सार्वजनिकता के बीच की अनिवार्य रेखा है। इस कविता में फिसलन का सौंदर्यशास्त्र रेखांकनीय है। इस कविता का सबसे बड़ा वैशिष्ट्य यह विचार है कि “थोड़ा-सा बाहर-अंदर और थोड़ा-सा अंदर-बाहर फिसल ही जाता है।” यह उस ‘लीकेज’ की बात है जो पूर्ण सुरक्षा के दावों के बीच भी मानवीय संवेदना को बचाए रखती है।इसके विपरीत केदारनाथ सिंह का वैशिष्ट्य यह है कि वे दरवाज़े को ‘नींव’ की सुरक्षा से जोड़ते हैं। उनके यहाँ ‘बाहर-अंदर’ का गड्डमड्ड होना भय नहीं, बल्कि ‘सहज-बोध’ और ‘पंचतंत्र’ के साझा सत्य का हिस्सा है।
वस्तुत: दोनों कविताओं का एक साझा सत्य ‘अपूर्णता’ और मानवीय स्वभाव है।अशोक वाजपेयी कहते हैं— “दरवाज़ा कभी पूरी तरह से बंद नहीं होता।”केदारनाथ सिंह की पूरी कविता भी इसी ‘अपूर्णता’ या ‘शागिर्द’ बने रहने की प्रक्रिया है।दोनों कवि मानते हैं कि हम “जानबूझकर भूल जाते हैं” दरवाज़ा बंद करना। केदारनाथ सिंह के लिए यह ‘उम्मीद’ के लिए की गई भूल है, और वाजपेयी के लिए यह मानवीय अस्तित्व की एक अनिवार्य दरार है।अशोक वाजपेयी की कविता नगरीय सभ्यता के अकेलेपन और स्मृतियों की कविता है। यहाँ दरवाज़ा एक ऐसी वस्तु है जिसका ‘ख़याल’ तभी रहता है जब हम अंदर घिरे होते हैं। यह मनुष्य की स्वार्थपरक चेतना पर प्रहार है। वहीं केदारनाथ सिंह की कविता श्रम और लोक-विश्वास की कविता है। वहाँ दरवाज़ा इसलिए खुला है क्योंकि समाज अभी भी एक-दूसरे पर भरोसा करता है।
अशोक वाजपेयी का दरवाज़ा ‘अस्तित्ववादी’ (Existential) है, जो मनुष्य के अकेले होने और उसकी सीमाओं को परिभाषित करता है। केदारनाथ सिंह का दरवाज़ा ‘समाजशास्त्रीय’ (Sociological) है, जो मनुष्य के सामूहिक होने और उसकी जड़ों की बात करता है। साझा सत्य यह है कि दोनों ही कवियों के लिए ‘पूरी तरह बंद’ दरवाज़ा मनुष्यता का अंत है।
वर्तमान युग में ‘पहुंच’ (Access) और ‘असुरक्षा’ (Insecurity) के बीच जो द्वंद्व है, वह अशोक वाजपेयी और केदारनाथ सिंह की कविताओं में वर्णित दरवाज़े के बिम्बों के माध्यम से एक तीखी आलोचना बनकर उभरता है। आज का दौर ‘स्मार्ट दरवाज़ों’ और डिजिटल सुरक्षा प्रणालियों का है, जहाँ ‘अक्सेस’ केवल पासवर्ड या एल्गोरिदम के अधीन है। ऐसे में इन कवियों का ‘खुला दरवाज़ा’ एक प्रकार का राजनीतिक और मानवीय प्रतिरोध बन जाता है। केदारनाथ सिंह की कविता में खुला दरवाज़ा उस ‘पहुंच’ का प्रतीक है जो भरोसे पर टिकी है। आज की असुरक्षा ने हमें अपने घरों को किलों में बदलने पर मजबूर कर दिया है, जहाँ ‘दूसरा’ हमेशा एक संभावित खतरा माना जाता है। लेकिन केदारनाथ सिंह इस असुरक्षा के बीच भी ‘घर के व्याकरण’ की दुहाई देते हैं, जो यह याद दिलाता है कि असली सुरक्षा अलगाव में नहीं, बल्कि संवाद की संभावना में है। उनका दरवाज़ा उस ‘पहुंच’ की वकालत करता है जो तकनीकी नहीं, बल्कि भावनात्मक है।
अशोक वाजपेयी की कविता इस द्वंद्व को एक अलग कोण से छूती है। आज के समय में हमारी ‘पहुंच’ तो असीमित है—हम डिजिटल दुनिया के ज़रिए हर जगह मौजूद हैं—लेकिन इस प्रक्रिया में हमारी ‘निजता’ (Privacy) असुरक्षित हो गई है।अशोक वाजपेयी जब कहते हैं कि “अंदर-बाहर थोड़ा-सा फिसल ही जाता है”, तो वे उस अनिवार्य रिसाव की बात करते हैं जो किसी भी अभेद्य सुरक्षा के बीच भी बना रहता है। आज के दौर की असुरक्षा केवल भौतिक नहीं है, वह एक गहरी अस्तित्वगत बेचैनी है जहाँ मनुष्य यह भूल गया है कि उसे दरवाज़ा कब बंद करना है और कब खोलना है। वाजपेयी के यहाँ “जाने की जल्दी” में दरवाज़ा खुला छूट जाना आज की उस तेज रफ़्तार सभ्यता का प्रतिबिंब है, जहाँ हमारे पास संबंधों की गहराई में जाने का समय नहीं है और हमारी ‘पहुंच’ सतही होकर रह गई है। हम हर जगह ‘एक्सेस’ तो कर रहे हैं, पर कहीं भी ‘घिरे’ हुए या सुरक्षित महसूस नहीं करते।
यह साझा सत्य आज और भी प्रासंगिक हो जाता है कि ‘पूरी तरह बंद दरवाज़ा’ एक ऐसे समाज का निर्माण करता है जहाँ केवल संदेह और अलगाव बचता है। केदारनाथ सिंह की ‘उम्मीद’ और अशोक वाजपेयी की ‘फिसलन’ दोनों ही उस कठोरता को तोड़ती हैं जो आज की ‘सर्विलांस’ वाली दुनिया ने हम पर थोप दी है। असुरक्षा के इस युग में, जहाँ हम कैमरों और तालों के पीछे छिपे हैं, ये कविताएँ हमें बताती हैं कि मनुष्यता का असली सौंदर्य उस जोखिम में है जो एक खुला दरवाज़ा अपने साथ लाता है। यह जोखिम ही वह ‘सहज बोध’ है जो हमें मशीनों से अलग करता है। अंततः, दोनों कवियों का वैशिष्ट्य इस बात में है कि वे दरवाज़े को केवल लकड़ी या लोहे का ढांचा न मानकर, उसे मानवीय गरिमा के एक ऐसे द्वार के रूप में देखते हैं जहाँ से असुरक्षा के डर को पार कर ‘पहुंच’ का एक नया और गहरा मानवीय संसार शुरू होता है।
आधुनिक शहरी स्थापत्य (Urban Architecture) ने ‘दरवाजे’ के उस पारंपरिक और सामाजिक चरित्र को पूरी तरह बदल दिया है जिसे केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी अपनी कविताओं में बचाए रखना चाहते हैं। आज के महानगरों में ‘आंगन’ का लोप और ‘अपार्टमेंट संस्कृति’ का उदय केवल वास्तुकला का बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक गहरे समाजशास्त्रीय संकट का प्रतीक है। पुराने घरों में आंगन एक ऐसा ‘साझा स्पेश’ था जहाँ घर की निजता और बाहर की दुनिया एक सहज संवाद में रहती थी। केदारनाथ सिंह जिस ‘घर के व्याकरण’ की बात करते हैं, वह उसी आंगन वाली संस्कृति से उपजा है, जहाँ दरवाजा केवल सुरक्षा का यंत्र नहीं, बल्कि संबंधों की एक जीवंत देहली (Threshold) था। शहरी स्थापत्य ने अब उस देहली को एक ‘दीवार’ में बदल दिया है, जहाँ ‘पहुँच’ का अर्थ केवल ‘कूरियर बॉय’ या सुरक्षा गार्ड तक सीमित रह गया है।
अशोक वाजपेयी की कविता में जो ‘अंदर-बाहर का फिसलना’ है, वह आज के आधुनिक फ्लैटों में लगभग असंभव बना दिया गया है। आज के दरवाजे ‘ध्वनिरोधी’ (Soundproof) और ‘अभेद्य’ होने का दावा करते हैं, जो मनुष्य को उसके पड़ोस से भी पूरी तरह काट देते हैं। वाजपेयी जिस ‘गड्डमड्ड’ होने के डर या सौंदर्य की बात करते हैं, शहरी स्थापत्य ने उस संभावना को ही समाप्त कर दिया है। अब कुछ भी फिसलता नहीं; सब कुछ ‘वॉटर-टाइट’ खानों में बंद है। यह स्थापत्य मनुष्य को एक ऐसे ‘घिरे हुए’ अस्तित्व में बदल देता है जहाँ बाहर से आने वाली हवा और अजनबी की दस्तक, दोनों ही असुरक्षा का पर्याय बन गई हैं। केदारनाथ सिंह की ‘उम्मीद’ आज के इन बंद दरवाजों के पीछे दम तोड़ती दिखती है, क्योंकि अब दरवाजे “खुद एक उम्मीद” होने के बजाय “खुद एक अवरोध” बन चुके हैं।
इस समाजशास्त्रीय बदलाव ने ‘दरवाजे के दर्शन’ को भी बदल दिया है। पहले दरवाजा एक ‘आमंत्रण’ था, अब वह एक ‘फिल्टर’ है। केदारनाथ सिंह के यहाँ जो ‘पंचतंत्र’ की नैतिकता थी, वह शहरी स्थापत्य के ‘इंटरकॉम और सीसीटीवी’ विमर्श में खो गई है। जब कवि कहता है कि उसने ‘ईंटों से सीखा है घर का व्याकरण’, तो वह उस भौतिक स्पर्श की बात करता है जो आज के कंक्रीट के जंगलों में दुर्लभ है। आज के युवा इसी ‘डिजिटल और स्थापत्यगत अलगाव’ के कारण उस ‘बर्नआउट’ और अर्थहीनता का शिकार हैं, क्योंकि उनके पास वह ‘आंगन’ नहीं बचा जहाँ वे अपनी थकान और अकेलेपन को साझा कर सकें। दरवाजों को पूर्णतः बंद करना हमारी संवेदनात्मक क्षमताओं को कुंद कर रहा है।
केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी की कविताएँ उस लुप्त होते हुए ‘मानवीय भूगोल’ की याद दिलाती हैं, जहाँ घर की पहचान उसके ताले से नहीं, बल्कि उसके खुलेपन से होती थी। शहरी स्थापत्य ने हमें भौतिक रूप से तो सुरक्षित किया है, लेकिन भावनात्मक रूप से एक ऐसे ‘बंद समय’ में धकेल दिया है जहाँ संवाद का सौंदर्यशास्त्र लुप्तप्राय है। इन कविताओं के निकष पर आज के स्थापत्य का मूल्यांकन करें, तो हम पाते हैं कि हमने दीवारों को मजबूत करते-करते उन रास्तों को ही बंद कर दिया है जिनसे ‘सहज बोध’ और ‘साझा उम्मीदें’ हमारे जीवन में प्रवेश करती थीं। यह विमर्श हमें प्रेरित करता है कि हम अपने आधुनिक घरों में कम से कम एक ऐसी खिड़की या दरार तो रहने दें, जहाँ से वाजपेयी का वह ‘अंदर-बाहर’ फिसल सके और केदारनाथ सिंह का वह ‘शागिर्द’ लौट सके।
केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी, अपनी अलग-अलग काव्य-शैलियों के बावजूद, ‘दरवाज़े’ के माध्यम से हमें उस बुनियादी मनुष्यता की याद दिलाते हैं जो आज के सत्यातीत समय और डिजिटल अलगाव के शोर में कहीं खो गई है। जहाँ केदारनाथ सिंह ‘भरोसे के व्याकरण’ से एक नई दुनिया की नींव रखते हैं, वहीं अशोक वाजपेयी ‘अस्तित्वगत फिसलन’ के ज़रिए हमें अपनी अपूर्णता को स्वीकार करने का साहस देते हैं। इन कविताओं से गुज़रते हुए शिद्दत के साथ महसूस होता है कि अपूर्णता ही वह दरार है, जहाँ से संवाद की ताजा हवा भीतर प्रवेश करती है।
स्पष्ट है कि आधुनिक शहरी स्थापत्य और तकनीक ने भले ही हमारे जीवन को सुरक्षित और गणना-बद्ध बना दिया हो, लेकिन उसने हमसे वह ‘सहज बोध’ छीन लिया है जो हमें मिट्टी, वृक्ष और पड़ोसी की धड़कन से जोड़ता था।सचाई यह है कि सभ्यता की असली सुरक्षा दीवारों की मजबूती में नहीं, बल्कि दरवाजों के खुले रहने के साहस में है।”इन कविताओं का साझा सत्य यह है कि एक ‘पूरी तरह बंद दरवाज़ा’ केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक मृत्यु का संकेत है। उत्तर-संरचनावादी निकषों से लेकर समाजशास्त्रीय धरातल तक, यह विश्लेषण हमें यह समझने में मदद करता है कि असली प्रगति दीवारों को ऊँचा करने में नहीं, बल्कि दरवाज़ों को ‘उम्मीद’ और ‘संवाद’ के लिए खुला छोड़ने में है।
इस कविता में ‘दुनिया का पंचतंत्र’ खोजने की यह पुकार हमें एक ऐसे ‘शागिर्द’ में बदल देती है जो उम्र भर सीखने के लिए तत्पर रहता है। यह आलेख इस विश्वास को पुष्ट करता है कि जब तक हमारे भीतर ‘अंदर-बाहर फिसलने’ की गुंजाइश बाकी है और जब तक हम किसी अजनबी के लौटने की उम्मीद में दरवाज़ा खुला रखने का जोखिम ले सकते हैं, तब तक हमारी संवेदनाओं का ‘घर’ सुरक्षित है। केदारनाथ सिंह और अशोक वाजपेयी की ये रचनाएँ हमें बंद समय की बेड़ियों को तोड़कर एक ऐसे खुले आकाश की ओर ले जाती हैं जहाँ संवाद ही एकमात्र और अंतिम सौंदर्यशास्त्र है।
‘दरवाज़ा’ साहित्य और दर्शन में एक ऐसा सार्वभौमिक और बहुआयामी रूपक है, जो देह, चेतना, समाज, स्मृति और मुक्ति के अनेक द्वारों को एक साथ खोलता है। अनामिका, सविता सिंह, तादेउश रोज़ेविच (पोलिश महाकवि), अशोक वाजपेयी और केदारनाथ सिंह की इन कविताओं का जब हम एक साथ रखकर गंभीर विश्लेषण करते हैं, तो यह केवल कुछ रचनाओं की तुलना नहीं रह जाती, बल्कि यह वैश्विक और भारतीय आधुनिक कविता के वैचारिक परिदृश्य, भाषा-शिल्प और सबसे महत्त्वपूर्ण रूप से स्त्री और पुरुष गेज़ के बुनियादी अंतर का एक वृहत् दस्तावेज़ बन जाता है। इन पाँचों कवियों की रचनाओं में जहाँ कुछ गहरे अंतर्संबंध और समानता के तत्त्व दिखाई देते हैं, वहीं उनके अनुभव-जगत और अभिव्यक्ति के ढंग में बुनियादी भिन्नताएं भी मौजूद हैं।सबसे प्रमुख तत्त्व यह है कि ‘दरवाज़ा’ इनमें से किसी भी कवि के लिए लकड़ी या लोहे का ढांचा मात्र नहीं है; यह एक दुनिया से दूसरी दुनिया में आवाजाही करने का माध्यम है।इन तमाम कविताओं में दरवाज़ा अंदर और बाहर के बीच की सीमा रेखा है। दूसरा साझा तत्त्व ‘स्मृति और अतीत’ का गहरा प्रभाव है। रोज़ेविच के यहाँ खुला दरवाज़ा बचपन के दृश्यालेख, माँ की पारदर्शी छाया और पहले पाप की ओर ले जाता है, अनामिका के यहाँ वह अतीत के अनवरत श्रम-चक्र की स्मृतियों को ‘मन की दुछत्ती’ पर जमा करता है, तो केदारनाथ सिंह के यहाँ वह खोए हुए लोगों के लौटने की प्रतीक्षा और स्मृति का माध्यम बनता है। तीसरा तत्त्व ‘अपूर्णता या खुलेपन’ का है। अशोक वाजपेयी का मानना है कि दरवाज़ा कभी पूरी तरह बंद नहीं होता, केदारनाथ सिंह उसे जानबूझकर खुला रखने की वकालत करते हैं, सविता सिंह का दरवाज़ा यातनाओं के पार जाने के लिए बचा हुआ है, तो अनामिका का दरवाज़ा चोट खाकर और अधिक खुलता जाता है। सभी कवि मानते हैं कि मनुष्य ने अपने अस्तित्व में थोड़ी-सी आवाजाही, थोड़ा-सा खुलापन हमेशा बचाकर रखा है।
साम्य के इन बिंदुओं के बावजूद, इन कविताओं में दार्शनिक और वैचारिक स्तर पर बहुत तीखी भिन्नताएं हैं। पोलिश महाकवि तादेउश रोज़ेविच का दरवाज़ा एक यूरोपीय आधुनिकतावादी और अस्तित्ववादी अवसाद (Existential Angst) से उपजा है। उनका दरवाज़ा जब तीसरे छोर पर खुलता है, तो वे धुँधलके में अंततः “कुछ नहीं” (Nothingness/शून्यता) देखते हैं। यह युद्धोत्तर यूरोप की उस निराशा को दिखाता है जहाँ स्मृतियों के पार अंततः केवल शून्यता बचती है। इसके विपरीत, हिंदी के कवियों की परिणति शून्यता में नहीं होती। केदारनाथ सिंह का दरवाज़ा ‘उम्मीद’ पर टिकता है—”दरवाजों का खुला होना खुद एक उम्मीद है।” वे शून्यता के बजाय ‘लौट आने’ की मानवीय संभावना में विश्वास करते हैं। अशोक वाजपेयी का दृष्टिकोण अधिक बौद्धिक और संरचनात्मक है; वे अंदर-बाहर के गड्डमड्ड होने, व्यवस्था और आवाजाही के दार्शनिक संतुलन के रूप में दरवाज़े को देखते हैं। वहीं, अनामिका और सविता सिंह का दृष्टिकोण पूरी तरह से अस्तित्वगत और सामाजिक संघर्ष से प्रेरित है। अनामिका के यहाँ दरवाज़ा प्रताड़ना से खुलता है और घरेलू श्रम की ट्रेजडी को दिखाता है, जबकि सविता सिंह के यहाँ वह यातनाओं के पार जाने का जादुई और आध्यात्मिक मार्ग बनता है। रोज़ेविच जहाँ शून्यता पर रुकते हैं, वाजपेयी जहाँ बौद्धिकता पर, केदारनाथ सिंह जहाँ लोक-उम्मीद पर, वहीं स्त्रियाँ (अनामिका और सविता) उसे अपने संघर्ष और मुक्ति का औज़ार बनाती हैं।
इस तुलना का सबसे अनिवार्य और क्रांतिकारी पक्ष ‘स्त्री-दृष्टि बनाम पुरुष-दृष्टि’ तथा ‘स्त्री-भाषा बनाम पुरुष-भाषा’ का अंतर है। पुरुष कवियों (रोज़ेविच, अशोक वाजपेयी, केदारनाथ सिंह) की दृष्टि में दरवाज़ा एक ‘बाहरी वस्तु’ (Object) है, जिसके वे द्रष्टा या निरीक्षक हैं। रोज़ेविच कहते हैं—”खुले दरवाज़े से मैं देखता हूँ”, वाजपेयी कहते हैं—”हम ऐसा करना जानबूझकर भूल जाते हैं”, और केदारनाथ सिंह आह्वान करते हैं—”दरवाजे खुला रखो”। यहाँ पुरुष कवि दरवाज़े से अलग हटकर खड़ा है; वह दरवाज़े को संचालित कर रहा है, उसे बंद या खुला छोड़ रहा है, या उसके पार देख रहा है। इसके विपरीत, स्त्री-दृष्टि (अनामिका और सविता सिंह) में दरवाज़ा कोई बाहरी वस्तु नहीं है, बल्कि स्त्री स्वयं दरवाज़ा है या दरवाज़ा उसका नितांत आंतरिक हिस्सा है। अनामिका सीधे घोषणा करती हैं—”मैं एक दरवाज़ा थी”। यहाँ वस्तु और आत्म का भेद मिट गया है। सविता सिंह भी किसी बाहरी लकड़ी के किवाड़ की बात नहीं कर रहीं, वे “बचाये हुए उस नीले दरवाजे” की बात करती हैं जो उनके अवचेतन की आंतरिक संपदा है। पुरुष के लिए दरवाज़ा एक दार्शनिक या बौद्धिक कौतूहल है, जबकि स्त्री के लिए वह देह की प्रताड़ना, सामाजिक बंधन और आत्म-मुक्ति का जीवंत अनुभव है।
यही अंतर ‘स्त्री-भाषा और पुरुष-भाषा’ के स्तर पर भी बहुत मुखर होकर प्रकट होता है। पुरुष कवियों की भाषा अधिक संबोधात्मक, दार्शनिक, अमूर्त और बौद्धिक है। अशोक वाजपेयी की भाषा में एक तरह की गद्यात्मक तार्किकता है—”घिरे हुए को रोकता है और अनघिरे हुए को अन्दर आने से थामता है”। यह भाषा अकादमिक और संभ्रांत है। रोज़ेविच की भाषा में “रेड वाइन”, “नीली केतली”, “पहला शैतान गुलाबी है” जैसे पश्चिमी आधुनिकता के अमूर्त और कौतुकपूर्ण बिम्ब हैं। केदारनाथ सिंह की भाषा हालांकि लोक के करीब है, लेकिन वह भी एक उपदेशात्मक या सूक्तिपरक शैली में बात करती है—”उम्मीद मत रखो, बस उन्हें खुला छोड़ दो”। इन तीनों पुरुष कवियों की भाषा में एक तरह का ठहराव, दूरी (Distance) और निरपेक्षता है।
इसके विपरीत, स्त्री-भाषा बेहद आत्मीय, शारीरिक, घरेलू और संवेगात्मक रूप से सघन है। अनामिका की भाषा सीधे रसोई और स्त्री के दैनिक श्रम की खुरदरी ज़मीन से उपजी है। “चक्की”, “चरखा”, “कैंची-सुई”, “झाड़ू” और “मन की दुछत्ती” जैसे शब्द पुरुष-कविता के विमर्शों में इस तरह नहीं आते। अनामिका की भाषा में “पीटा गया” जैसी क्रियाएं देह पर होने वाली हिंसा को सीधे दर्ज करती हैं। वहीं सविता सिंह की भाषा सूक्ष्म और संवेगात्मक है; वे “रुदन विलाप”, “धीरज”, “उल्लास” और “स्वप्न” जैसे आंतरिक और मर्मस्पर्शी शब्दों से अपनी भाषा का वितान बुनती हैं। स्त्री-भाषा में एक छटपटाहट है, एक गतिशीलता है और अपने दुखों को सीधे भोगने की ईमानदारी है। ये कवयित्रियाँ भाषा में ‘सिद्धांत’ नहीं गढ़तीं, बल्कि ‘अनुभूति’ को आकार देती हैं।
इसलिए , जहाँ तीनों पुरुष कवि दरवाज़े को एक दार्शनिक खिड़की की तरह इस्तेमाल करते हैं जिससे वे जीवन, मृत्यु, उम्मीद और व्यवस्था को परिभाषित कर सकें, वहीं दोनों कवयित्रियाँ दरवाज़े को अपने अस्तित्व की लड़ाई का मैदान बनाती हैं। पुरुष दृष्टि दरवाज़े के पार ‘शून्यता’ या ‘तर्क’ तक पहुँचती है, जबकि स्त्री दृष्टि तमाम यातनाओं और श्रम के बावजूद अपने भीतर एक ‘नीला दरवाज़ा’ और ‘उल्लास’ बचाए रखती है जो उसे अंततः मुक्ति की ओर ले जाता है। ये कविताएं सिद्ध करती हैं कि अनुभव की भिन्नता किस तरह भाषा और दृष्टि को पूरी तरह बदल देती है।
इस पूरे विमर्श के बीच अशोक वाजपेयी की ‘उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम’ कविता को रखकर देखना दिलचस्प होगा-
उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम
उसकी खिड़की खुली है,
उसके आँगन में गूँज रहा है दुख,
उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम।
उसकी सुन्दरता ने बनाया है घर,
उसकी चाहत ने डाला है छप्पर,
उसकी उदासी ने खींचे हैं परदे।
वह कुछ कहती नहीं है
पर उसकी आँखों में डबडबाते हैं शब्द,
उसके इशारों में डूबते-उतराते हैं नक्षत्र,
वह आकाश में कौंधती है बिजली की तरह,
वह उगती है वृक्ष की तरह पृथ्वी पर।
वह चाय बनाती है,
रोटी सेंकती है,
सब्ज़ियाँ खरीदने बाज़ार जाती है,
वह मन्दिर में प्रार्थना बुदबुदाती है।
वह दस्तक देती है…
अन्दर जाती है,
धूप में बाल सुखाने छज्जे पर आती है :
वह जीती है
पोर-पोर पग-पग।
यह कविता प्रेम और स्त्री-अस्तित्व के बीच के जटिल संबंधों को एक ऐसी ‘वास्तुशिल्प’ (architecture) के रूप में प्रस्तुत करती है जहाँ घर और शरीर एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। कविता के मूल पाठ के सूक्ष्म पठन से यह स्पष्ट होता है कि कविता ‘प्रेम’ को एक बाहरी और असमर्थ तत्त्व की तरह द्वार पर खड़ा करती है, जबकि स्त्री के आंतरिक भाव—सुंदरता, चाहत और उदासी—उस घर की भौतिक संरचना का निर्माण करते हैं। सैद्धांतिक आलोचना के दृष्टिकोण से देखें तो यहाँ स्त्री केवल एक ‘कर्ता’ (agent) नहीं है, बल्कि वह स्वयं ‘स्थान’ (space) बन गई है। “उदासी ने खींचे हैं परदे” जैसी पंक्ति यह संकेत देती है कि भावनाएँ यहाँ केवल अमूर्त विचार नहीं हैं, बल्कि वे सुरक्षा और गोपनीयता की भौतिक परतें हैं।
कविता का गहरा आलोचनात्मक मूल्यांकन हमें ‘दैनिक कर्मकांड’ और ‘ब्रह्मांडीय गरिमा’ के एकीकरण की ओर ले जाता है। एक ओर वह चाय बनाती है, रोटी सेंकती है और बाज़ार जाती है—जो अत्यंत साधारण और ‘सतही’ क्रियाएँ हैं। लेकिन कविता इन क्रियाओं को “आकाश में कौंधती बिजली” और “पृथ्वी पर उगते वृक्ष” के बिंबों से जोड़कर उन्हें एक आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करती है। यहाँ जॉन एशबरी की उस धारणा का विस्तार दिखता है कि ‘सतह ही सब कुछ है’। स्त्री का पोर-पोर जीना और उसके दैनिक कार्यों का यह सिलसिला ही उसका वास्तविक ‘पाठ’ (text) है। वह अपनी खामोशी में भी ‘डबडबाते शब्दों’ और ‘डूबते-उतराते नक्षत्रों’ को धारण किए हुए है, जो भाषा के उस ‘फिसलन’ (slippage) को दर्शाता है जहाँ मौन, संवाद से कहीं अधिक गहरा अर्थ संप्रेषित करता है।
इस कविता की सबसे बड़ी विशेषता इसका बिंब-विधान और इसकी गत्यात्मकता है। कविता घर की स्थिरता (छप्पर, आँगन, मंदिर) और स्त्री की गतिशीलता (दस्तक देना, बाज़ार जाना, छज्जे पर आना) के बीच एक निरंतर तनाव बनाए रखती है। “प्रेम का लाचार खड़ा होना” एक पितृसत्तात्मक ढांचे में प्रेम की उस पारंपरिक परिभाषा पर प्रहार है जो अधिकार जताना चाहती है, जबकि यहाँ स्त्री का अस्तित्व अपनी शर्तों पर, अपने ‘पोर-पोर’ और ‘पग-पग’ में स्वतंत्र है। वह मंदिर में प्रार्थना भी बुदबुदाती है और धूप में बाल भी सुखाती है; यह पवित्रता और पार्थिवता का एक ऐसा संगम है जो उसे किसी एक सांचे में बंधने नहीं देता। अंततः, यह कविता इस सत्य को स्थापित करती है कि जीवन की सार्थकता किसी दार्शनिक उपलब्धि में नहीं, बल्कि जीवन की निरंतरता और उसकी बारीक से बारीक क्रियाओं को समग्रता में जीने में है।
‘उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम’ को जब हम रोज़ेविच के ‘शून्य’, अशोक वाजपेयी की पूर्व-विवेचित कविता में ‘फिसलन’ और अनामिका के ‘संचय’ वाले विमर्श के बीच रखते हैं, तो अर्थ की दिशा एक नए और अत्यंत मानवीय धरातल की ओर मुड़ जाती है। यहाँ ‘दरवाज़ा’ अब केवल एक दार्शनिक अवधारणा या संकेतकों की फिसलन का स्थल नहीं रह जाता, बल्कि वह एक ठोस ‘अस्तित्वपरक संकट’ और ‘स्त्री-अनुभव’ के घेरे में आ जाता है।इस कविता में दरवाज़े का संकेतक (Signifier) अपनी लाचारी में प्रकट होता है। जहाँ पहले के विमर्श में दरवाज़ा ‘खुलने’ या ‘फिसलने’ की आज़ादी का प्रतीक था, यहाँ वह प्रेम की ‘बेबसी’ का गवाह है। “उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम” पंक्ति यह संकेत देती है कि सचाई केवल दरवाज़ा खोलने में नहीं है, बल्कि उस सीमा को पहचानने में भी है जिसे प्रेम जैसा विराट संवेग भी पार नहीं कर पा रहा। यहाँ प्रेम एक ‘बाहरी’ तत्त्व है, जबकि स्त्री का वजूद—उसका घर, उसका छप्पर, उसके परदे—उसकी अपनी आंतरिकताओं (सुन्दरता, चाहत, उदासी) से निर्मित है। यह फिनोमेनोलॉजी (Phenomenology) के उस सिद्धांत की याद दिलाता है जहाँ ‘होना’ (Being) अपने परिवेश के साथ एकाकार होता है। फिनोमेनोलॉजी (प्रपंचशास्त्र या दृश्यप्रपंच विज्ञान) के सबसे महत्त्वपूर्ण स्तंभ मार्टिन हाइडेगर (Martin Heidegger) के दर्शन में इसका मतलब यह है कि इंसान का अस्तित्व (Being) दुनिया से अलग कोई कटी हुई चीज़ नहीं है, बल्कि वह अपने आसपास के परिवेश के साथ पूरी तरह गुँथा हुआ है ।यहाँ ‘होना’ केवल जीवित रहने के बारे में नहीं है, बल्कि दुनिया को अनुभव करने और उसमें सक्रिय रहने के बारे में है। हाइडेगर इसे ‘दासाइन’ (‘Dasein’) कहते हैं, जिसका शाब्दिक अर्थ है “वहाँ होना” (Being-there)।
अनामिका के विमर्श के साथ इस कविता का अन्तःपाठ (Intertextuality) बहुत गहरा है। अनामिका का दरवाज़ा ‘पिटकर’ खुला था, जबकि अशोक वाजपेयी की इस कविता में वह स्त्री स्वयं “दस्तक देती है… अन्दर जाती है”। यहाँ श्रम और दैनिक चर्या के संकेतकों—चाय बनाना, रोटी सेंकना, सब्ज़ी खरीदना—का एक नया समाजशास्त्र उभरता है। यह जूलिया क्रिस्टेवा के ‘डेली रूटीन’ वाले समय की याद दिलाता है जहाँ क्रिस्टेवा का तर्क यह है कि आधुनिक समाज और इतिहास ‘रेखीय समय’ को महत्त्व देते हैं, जबकि महिलाओं का अनुभव (विशेषकर मातृत्व और घरेलू जीवन में) अक्सर ‘चक्रीय’ और ‘स्मारकीय’ समय में बीता है। ‘डेली रूटीन’ की याद दिलाना दरअसल उस समय की ओर मुड़ना है जो घड़ी की टिक-टिक से नहीं, बल्कि जीवन की लय और दोहराव से संचालित होता है। स्त्री का यह ‘जीना’ रोज़ेविच की शून्यता के विरुद्ध एक सक्रिय प्रतिवाद है। रोज़ेविच के यहाँ दरवाज़े के पीछे ‘कुछ नहीं’ था, लेकिन अशोक वाजपेयी की इस कविता में दरवाज़े के भीतर एक पूरा ब्रह्मांड है—दुख की गूँज है, नक्षत्रों का डूबना-उतराना है और वृक्ष की तरह पृथ्वी पर उगना है।
दार्शनिक रूप से, यह कविता संकेतकों की फिसलन (Slippage of signifiers) को ‘देह और क्रिया’ (Body and Action) के यथार्थ पर ले आती है। मौरिस मरलो-पोंटी (Maurice Merleau-Ponty) के शरीर-विज्ञान दर्शन के अनुसार, अनुभव केवल मस्तिष्क में नहीं, बल्कि पोर-पोर और पग-पग में होता है। वाजपेयी जब लिखते हैं कि “वह जीती है पोर-पोर पग-पग”, तो वे सचाई के उस दरवाज़े को खोलते हैं जो स्त्री की घरेलू और आध्यात्मिक (प्रार्थना बुदबुदाना) दुनिया के बीच के अंतर को मिटा देता है। यहाँ ‘लाचार खड़ा प्रेम’ उस पारंपरिक पुरुष-दृष्टि का विखंडन है जो स्त्री को केवल एक ‘सुन्दर वस्तु’ या ‘प्राप्ति’ मानती रही है। प्रेम लाचार है क्योंकि वह उस स्त्री की उस सचाई तक नहीं पहुँच पा रहा जो बिजली की तरह कौंधती है और वृक्ष की तरह उगती है।
इस विमर्श में ‘उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम’ कविता एक संतुलनकारी भूमिका निभाती है। यदि रोज़ेविच का दरवाज़ा ‘स्मृति’ था, अशोक वाजपेयी का पूर्व-विवेचित दरवाज़ा ‘भूल’ था, अनामिका का दरवाज़ा ‘श्रम’ था और और सविता सिंह का दरवाज़ा ‘आत्म-मुक्ति’ था, तो अशोक वाजपेयी का यह नया दरवाज़ा ‘अस्तित्व की गरिमा’ (Dignity of Being) का द्वार है। यहाँ सचाई यह है कि स्त्री किसी दरवाज़े की मोहताज नहीं है; वह स्वयं वह घर है जिसकी दीवारों को उसकी उदासी ने परदों से ढका है और जिसकी छतों को उसकी चाहत ने सहेजा है।
अशोक वाजपेयी के प्रारंभिक सूत्र को इस कविता के आलोक में पुनर्कल्पित करें तो—कविता सचाई का वह दरवाज़ा खोलती है जहाँ हम देखते हैं कि सत्य किसी के आने या जाने में नहीं, बल्कि “पोर-पोर जीने” की उस निरंतरता में है जो लाचार प्रेम की पहुँच से भी बाहर है। यह सचाई का वह उद्घाटन है जहाँ संकेतक (दरवाज़ा) अंततः उस ‘अनंत सत्ता’ (स्त्री का अस्तित्व) के सामने झुक जाता है। अशोक वाजपेयी की पंक्ति “वह कुछ कहती नहीं है” इस पूरे विमर्श को एक ऐसे समाजशास्त्रीय मोड़ पर ले आती है जहाँ ‘मौन’ (Silence) दमन का प्रतीक न रहकर एक रणनीतिक और दार्शनिक ‘वाक्’ (Speech) बन जाता है। वैश्विक स्त्रीवादी विमर्श में मौन को हमेशा दो नजरियों से देखा गया है: एक वह जिसे पितृसत्ता ने थोपा है, और दूसरा वह जिसे स्त्री ने अपनी सुरक्षा और आंतरिक शक्ति के रूप में चुना है। जब अशोक वाजपेयी कहते हैं कि “उसकी आँखों में डबडबाते हैं शब्द”, तो यह उस ‘अनकहे’ की सचाई है जिसे भाषा के सीमित व्याकरण में नहीं बांधा जा सकता।
सिल्विया प्लाथ के यहाँ मौन अक्सर एक घुटन भरी चीख है। ‘डैडी’ (Daddy) कविता में वे लिखती हैं, “जीभ मेरे जबड़े में फंस गई है… मैं बोल नहीं पाई” (The tongue stuck in my jaw… I could hardly speak)। प्लाथ का यह मौन उस लाचारी से पैदा होता है जहाँ बाहरी दुनिया के संकेतक इतने भारी हैं कि वे स्त्री की अपनी आवाज़ को कुचल देते हैं। इसके विपरीत, अन्ना अख़्मातोवा (Anna Akhmatova) का मौन एक ‘ऐतिहासिक गवाही’ है। उनकी कविताओं में मौन का अर्थ है—सब कुछ सहकर भी अपनी गरिमा को बचाए रखना। अख़्मातोवा के यहाँ जब स्त्री कुछ नहीं कहती, तो वह असल में एक पूरे युग के अन्याय को अपने मौन से ‘दर्ज’ कर रही होती है। अशोक वाजपेयी की कविता में भी यह मौन “इशारों में डूबते-उतराते नक्षत्रों” की तरह है; यह मौन रिक्त नहीं है, बल्कि अर्थों से लबालब भरा हुआ है।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से, स्त्री का यह ‘न कहना’ उस ‘हाशिए की चुप्पी’ का विखंडन है जिसे गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक ने अपने प्रसिद्ध निबंध ‘कैन द सबाल्टर्न स्पीक?’ (Can the Subaltern Speak?) में उठाया था। अशोक वाजपेयी की स्त्री बोलती नहीं है, लेकिन वह ‘जीती’ है, और उसका यह ‘पोर-पोर जीना’ ही उसका सबसे प्रखर वक्तव्य है। वह चाय बनाने, रोटी सेंकने और बाज़ार जाने जैसी दैनिक क्रियाओं के माध्यम से एक ऐसा समानांतर संसार रचती है जहाँ पुरुष का प्रेम ‘लाचार’ खड़ा रह जाता है। यहाँ मौन एक ऐसी ‘दुछत्ती’ है जहाँ वह अपने उन शब्दों को संचित रखती है जिन्हें दुनिया अभी सुनने के लिए तैयार नहीं है।
अनामिका के विमर्श के साथ जोड़ने पर यह मौन ‘सृजन के गुप्त संगीत’ जैसा प्रतीत होता है। जहाँ रोज़ेविच का मौन ‘विनाश’ के बाद की निस्तब्धता थी, वहीं ‘उसके दरवाज़े लाचार खड़ा है प्रेम’ कविता का मौन ‘जीवन के अंकुरण’ की चुप्पी है—जैसे वृक्ष के उगने में कोई शोर नहीं होता, वैसे ही इस स्त्री के जीने में कोई कोलाहल नहीं है। यह मौन उस ‘सचाई का दरवाज़ा’ है जो केवल उन्हीं के लिए खुलता है जो शब्दों के पार जाकर ‘आँखों में डबडबाते नक्षत्रों’ को पढ़ने का धैर्य रखते हैं।
कविता में आयी ‘वह कुछ कहती नहीं है’ पंक्ति का समाजशास्त्रीय सन्दर्भ स्पष्ट करता है कि सचाई हमेशा शोर में नहीं होती। कभी-कभी सचाई उस लाचार खड़े प्रेम की विफलता में होती है, कभी वह अधखुले दरवाज़े से फिसलती धूप में होती है, और कभी वह उस स्त्री के ‘मौन’ में होती है जो चुप रहकर भी आकाश में बिजली की तरह कौंधती है। रोज़ेविच ,अशोक वाजपेयी और अनामिका और सविता सिंह की ये कविताएँ मिलकर सचाई के उस दरवाज़े को पूरी तरह खोल देती हैं जहाँ पहुँचकर हम यह स्वीकार करते हैं कि सबसे महान कविताएँ अक्सर उन्हीं पन्नों पर लिखी जाती हैं जिन्हें दुनिया ने ‘कोरा’ या ‘मौन’ समझकर छोड़ दिया था।
इन कविताओं से भिन्न मिजाज़ की पाब्लो नेरुदा (1904-1973) की कविताओं में अक्सर दरवाज़ों और चौखटों की छवि का इस्तेमाल मिलता है । उनके लिए दरवाज़ा बदलाव, बाहर-भीतर होने, अंतरंगता, हिंसा, सामाजिक रोक, ऐन्द्रियता, इतिहास की टूटन या जीवन के सफ़र का प्रतीक है । पूर्व-विवेचित तीनों कविताओं में आए दरवाज़े —तादेयुश रोज़ेवोच का तीसरा दरवाज़ा जो खुलकर कुछ नहीं दिखाता, अशोक वाजपेयी का दरवाज़ा जो इंसानी लापरवाही से कभी पूरी तरह बंद नहीं होता, और अनामिका का दरवाज़ा जो पीटे जाने से खुलता है और फिर श्रम और सृजन को समेटता है— से नेरुदा के दरवाज़े काफी अलग हैं। वे ज़्यादा ठोस, ऐन्द्रिय -राजनीतिक, सामूहिक और क्रांतिकारी हैं। वे शुद्ध दार्शनिक शून्यता की ओर नहीं ले जाते, बल्कि प्रेम, समाज, इतिहास या सामूहिक संघर्ष में जबरदस्ती या अवरुद्ध प्रवेश का संकेत हैं।
नेरुदा की कविता ‘कवि का कर्तव्य’ (एक्स्ट्रावागारिया, 1958) में दरवाज़ा मुक्ति का प्रतीक है:
“जो इस शुक्रवार सुबह समुद्र की बात नहीं सुन रहा है,
जो घर में, दफ्तर में, फैक्ट्री में, औरत के पास, गली में, खदान में या सूखी जेल में बंद है,
उसके पास मैं आता हूँ, बिना कुछ बोले, बिना कुछ देखे,
और उसके जेल के दरवाजे को खोल देता हूँ,
फिर एक हल्का-सा कंपन शुरू होता है, जो लगातार बढ़ता जाता है,
बिजली का एक बड़ा टुकड़ा ग्रहों की गड़गड़ाहट और झाग को हिलाने लगता है,
पौधों और ज्वालामुखियों को भी”।
(To whoever is not listening to the sea
this Friday morning, to whoever is cooped up
in house or office, factory or woman
or street or mine or dry prison cell,
to him I come, and, without speaking or looking,
I arrive and open the door of his prison,
and a vibration starts up, vague and insistent,
a great fragment of thunder sets in motion
the rumble of the planet and the foam,
the plants and the volcanoes…)
यहाँ दरवाज़ा जेल की दीवार है। कवि खुद उसे खोलता है ताकि समुद्र, प्रकृति, आजादी और ब्रह्मांडीय ऊर्जा उस बंद इंसान में भर आए। यह एकजुटता और जागरण का काम है। यहाँ दरवाज़ा जीवन की ओर या शून्य की ओर खुलने के बजाय बाहर की ओर खुलता है। रोज़ेविच से तुलना में यह बिल्कुल उलटा है। रोज़ेविच के दरवाजे भीतर की ओर खुलते हैं—स्मृति से अपराधबोध से अंत में कुछ नहीं तक। नेरुदा का दरवाज़ा नई शुरुआत और जुड़ाव की ओर बाहर की ओर खुलता है।
यह अशोक वाजपेयी से केवल इतना मिलता-जुलता है कि दोनों के लिए दरवाज़ा इंसानी कमजोरी से जुड़ा है, लेकिन अशोक वाजपेयी में यह निष्क्रिय है। कविता की पंक्ति है -‘हम भूल जाते हैं उसे पूरी तरह बंद करना’। जबकि नेरुदा में यह सक्रिय है—‘कवि खुद जबरदस्ती खोलता है ताकि अकेलापन टूटे’।
अनामिका का दरवाजा पितृसत्ता की हिंसा से खुलता है और फिर श्रम से ब्रह्मांडीय संचय करता है। नेरुदा के लिए दरवाजा तोड़ना मुक्ति का मार्ग है, पीड़ित से सृजन की ओर नहीं, बल्कि कवि की शक्ति से। फिर भी दोनों में चौखट ऊर्जा के बदलाव का स्थान है।
नेरुदा की ‘पृथ्वी पर घर’ (रेजिडेंस ऑन अर्थ,) कविता में कहा गया है :
“गंधक जैसे रंग के पक्षी हैं, और उन घरों के दरवाजों पर भयानक आंतें लटक रही हैं जिनसे मुझे नफरत है,
कॉफी के प्याले में भूली हुई नकली दांत हैं,
आईने ऐसे हैं जो इतना देख-देखकर शराबी हो गए हैं…”
(There are sulphur-colored birds, and hideous intestines
hanging over the doors of houses that I hate,
there are false teeth forgotten in a coffee pot,
there are mirrors
that have got drunk with so much looking…)
यहाँ दरवाज़े मध्यमवर्गीय सड़ांध और अलगाव के प्रवेश द्वार हैं। उन पर आंतें लटक रही हैं । यह शहर के खोखलेपन का घिनौना चित्र है । कवि गुस्से में उनसे गुज़रता है, अंदर जाने से इनकार करता है।
यह कविता रोज़ेविच की कविता के करीब है। दोनों में युद्ध या राजनीतिक त्रासदी के बाद की घृणा है—दरवाज़े स्वागत की जगह नहीं, उल्टी घृणा और शून्य की ओर ले जाते हैं। यह अशोक वाजपेयी और अनामिका से अलग है।वजह यह कि ये दोनों कवि दरवाज़े को नैतिक फिसलन या देह का श्रम मानते हैं। नेरुदा के दरवाज़े इतने घृणित हैं कि उनसे गुजरना ही पड़ता है ।
नेरुदा की ‘माचू पिचू के शिखर से’ (कांतो जनरल, 1950) में दरवाज़ा कुछ अलग तरह का है:
“जब-जब धीरे-धीरे इंसानों ने मुझसे इनकार किया,
जिन्होंने अपने दरवाजे और बंदरगाह मुझ पर बंद कर दिए,
ताकि मेरे हाथों के फव्वारे उनकी घायल अनुपस्थिति को न छू सकें…”
(When, little by little, I was denied by men,
who closed their doors and ports to me,
so that the fountains of my hands
would not touch their wounded non-existence…)
यहाँ दरवाज़े और बंदरगाह अभिजात वर्ग की दीवारें हैं जो कवि को—और जनता को—इतिहास के ज़ख्म से दूर रखते हैं।यहाँ ‘माचू पिचू’ की चढ़ाई उन पूर्वजों के दरवाज़े खोलने वाले क्रांति बन जाती है जो दबे हुए थे।
इस कविता से अनामिका की कविता कुछ मिलती जुलती है। दोनों में दरवाज़ा हिंसा या बहिष्कार का स्थान है—अनामिका में पितृसत्ता की पिटाई, नेरुदा में वर्गीय इनकार। लेकिन दोनों उसे फिर से हासिल करते हैं—अनामिका की कविता में झाड़ू से ब्रह्मांडीय टुकड़े बटोरने और नेरुदा की कविता में मृत मजदूरों को जीवित करने का ज़िक्र काबिल-ए-गौर है।
जाहिर है कि यह अशोक वाजपेयी की कविता से भिन्न स्वर वाली रचना है—नेरुदा के दरवाजे सत्ता द्वारा जानबूझकर बंद किए जाते हैं, लापरवाही से नहीं। जिसका जवाब फिसलन को स्वीकार कर लेने के बजाय उन्हें जबरदस्ती खोलना है। यह कविता रोज़ेविच की कविता से इस अर्थ में भिन्न है कि नेरुदा अंतिम शून्यता नहीं मानते। उनके यहाँ बंद दरवाज़े इतिहास के दुख को दिखाते हैं और फिर उन्हें खोलकर पुनर्जन्म देते हैं।
अन्य जगहों पर नेरुदा के दरवाज़े ऐन्द्रिय या घरेलू अंतरंगता के चिह्न हैं। प्रेम कविताओं में दरवाजा कामुक प्रवेश का प्रतीक होता है—जैसे गर्मियों की हवा के दरवाजे पर संघर्ष। ओड्स में दरवाजे रोजमर्रा की खुशी का स्वागत करते हैं—जैसे टमाटर की महक दरवाजे पर दस्तक देती है।
कुल मिलाकर ये कवि—रोज़ेविच, नेरुदा,अशोक वाजपेयी,अनामिका और सविता सिंह दरवाज़े को अर्थ की चौखट मानते हैं। यह कभी सिर्फ लकड़ी का ढांचा नहीं होता। यह अस्तित्वगत, नैतिक, लैंगिक और राजनीतिक इंसानी सीमाओं को रेखांकित करता है।
नेरुदा की कविता में सबसे बड़ा फ़र्क आशावाद और सक्रियता के तहत पैदा होता है। उनके दरवाज़े कविता से, प्रेम से या क्रांति से ज्यादातर जबरदस्ती खोले जाते हैं, ताकि जीवन और सामूहिकता की पुष्टि हो। रोज़ेवोच शून्य में खत्म होते हैं, अशोक वाजपेयी नैतिक अधूरापन स्वीकार करते हैं और अनामिका हिंसा को सृजन में बदलती हैं। नेरुदा के दरवाज़े शायद ही कभी बंद रहते हैं या कहीं नहीं ले जाते—वे समुद्र, इतिहास, प्रेम या लोगों की ओर खुलते हैं। उनके दरवाजे आखिरकार यही कहते हैं—आओ अंदर, दुनिया इंतजार कर रही है।
पाब्लो नेरुदा, तादेयुश रोज़ेविच, अशोक वाजपेयी, केदारनाथ सिंह, अनामिका और सविता सिंह की इन कविताओं पर बातचीत अंततः इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि सचाई का दरवाज़ा कोई जड़ भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि एक निरंतर घटित होने वाली अस्तित्वपरक क्रिया है। जहाँ रोज़ेविच की शून्यता ऐतिहासिक आघातों के विरुद्ध एक दार्शनिक मौन है, वहीं अशोक वाजपेयी की ‘फिसलन’ यक़ीनी के गुमान को तोड़कर इंसानी अधूरेपन का उत्सव मनाती है। इस विमर्श में अशोक वाजपेयी की कविता में आया ‘लाचार प्रेम’ और ‘पोर-पोर जीने’ का द्वंद्व यह साबित करता है कि स्त्री का यथार्थ सिल्विया प्लाथ की आंतरिक छटपटाहट, अमरीकी कवयित्री एड्रिएन रिच के दार्शनिक रूपांतरण और अन्ना अख़्मातोवा के धैर्य के बीच एक ऐसा संचित सत्य है, जो रोजमर्रा के कामकाज की ओट में ब्रह्मांडीय विस्तार रखता है। इस विश्लेषण से स्पष्ट है कि संकेतकों (सिग्निफाय्रर) की तरलता ही कविता को वह सलाहियत प्रदान करती है कि वह ‘अनकहे’ को भी ‘कौंध’ में बदल सके। ये कविताएँ पाठक को एक ऐसी दहलीज़ पर खड़ा करती हैं जहाँ वह स्वयं एक पारदर्शी माध्यम बन जाता है और सचाई किसी बंद परिभाषा के रूप में नहीं, बल्कि ‘अधखुलेपन’, ‘आंतरिक अतिक्रमण’ और ‘निरंतर श्रम’ के एक जीवंत प्रवाह के रूप में अनुभूत होती है।
सन्दर्भ
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- वाजपेयी,अशोक. कहीं कोई दरवाज़ा, राजकमल प्रकाशन,दिल्ली
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रवि रंजन
जन्म : 1962, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार
शिक्षा : पी-एच.डी.
रूचि के क्षेत्र : भक्तिकाव्य, आधुनिक हिन्दी कविता, आलोचना, साहित्य का समाजशास्त्र,
प्रकाशित कृतियाँ : ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’, ‘सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन,दिल्ली (2011), ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’ (2012),वाणी प्रकाशन, ‘वारसा डायरी’(2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’,वाणी प्रकाशन .दिल्ली
विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में सौ से अधिक आलेख प्रकाशित.
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भागीदारी.
‘वारसा डायरी’ के लिए ‘जयपुर साहित्य सम्मान (2023)
प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय,बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा स्थापित पीठ (चेयर ) पर विजिटिंग प्रोफ़ेसर.
प्रोफ़ेसर (सेवा निवृत्त) एवं पूर्व-अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद – 500 046
ई.मेल. : raviranjan@uohyd.ac.in मो.9000606742
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