प्रेमचंद के बाद से आज तक की हिंदी कहानी के संवेदना और स्वरूप से पाठक भलीभांति परिचित हैं। कहानी आंदोलन अर्थात् किसी विचारधारा से नहीं वरन् जीवन से जन्म लेती है , वही असल कहानी होती है और सर्वमान्य। यह बात कहानी की आज तक की यात्रा से साफ़ हो चुकी है। वैचारिकता के दांव- पेंच और शिल्प के जादू भर से अब काम बननेवाला नहीं। वह चेतना चाहिए जो समय को भेद सके ।

Discover more from रचना समय
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
