प्रेमचंद के बाद से आज तक की हिंदी कहानी के संवेदना और स्वरूप से पाठक भलीभांति परिचित हैं। कहानी आंदोलन अर्थात् किसी विचारधारा से नहीं वरन् जीवन से जन्म लेती है , वही असल कहानी होती है और सर्वमान्य। यह बात कहानी की आज तक की यात्रा से साफ़ हो चुकी है। वैचारिकता के दांव- पेंच और शिल्प के जादू भर से अब काम बननेवाला नहीं। वह चेतना चाहिए जो समय को भेद सके ।

                                          कथा महाविशेषांक की प्रस्तुति का मकसद इसी चेतना को रूप देना है । और यही हम रेखांकित करना भी चाहते हैं। विश्वास है , पाठक हमारे इस प्रयास से निराश न होंगे। महाविशेषांक बहुत जल्द आपकी कुंडी खटखटाने वाला है।
– हरि भटनागर


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