बहादुर पटेल समकालीन कविता के एक ज़रूरी नाम हैं। आपके लिए जो जीवन है ,वही काव्य है। अर्थात जीवन से दूर काव्य अर्थहीन है। इसलिए आप जीवन के समानांतर नहीं बल्कि जीवन में धँसकर जीवन के विद्रूप का अर्थ देते हैं। बिना शोर के आप ख़ामोश स्वर में पीड़ा के ऐतिहासिक रूप का कवित्त रचते हैं ,एक तरह से वह कविता की नई इबारत रचता है। बहरहाल।
बहादुर पटेल की कविताएं पढ़ें।
– हरि भटनागर
कविताएँ:
1/ मेरी हँसी
मैंने हँसना चाहा
अपने मूल स्वाभाव में हँसना चाहता था
फीकी हँसी को जानदार बनाने के सारे जतन
बेकार हो गए
लोगों की हँसी से
अपनी हँसी की तुलना की
बहुत बोगस और नकली लगी
मैंने एक बच्चे की हँसी से मिलाई हँसी
एक बूढ़ा भी मिला मुझे
जिसकी हँसी बच्चे की हँसी से बहुत करीब लगी
एक स्त्री की उन्मुक्त हँसी से
भयभीत हुआ
फिर अपनी हँसी से मिलाया तो लगा कि
मेरी हँसी को ठीक हँसी बनाने में
उसकी अहम् भूमिका हो सकती है
कई सालों तक एक स्त्री ने
मेरी हँसी को हँसी से भी बड़ी बनाया
संक्रामक कि हद तक फैलाया मैंने
एक दिन गहरी अँधेरी रात में
उस स्त्री की हँसी को
मैंने रुदन में बदलते हुए सुना
आज फिर सुन रहा हूँ अपनी हँसी
ऐसी नकली हँसी आज तक
इस पृथ्वी पर नहीं सुनी गई ।
2/ चिड़चिड़ाहट
मैं इन दिनों बहुत चिडचिडा हो गया हूँ
किसी भी समय मेरे गुस्से का पारा जा सकता है
सातवें आसमान पर
इसकी वजह मुझे नहीं पता
जब शांत होता है जल तो गोते लगाकर जानना चाहता हूँ
कि तल में क्या है
क्या मेरी परछाई वहाँ पत्थर की तरह पड़ी हुई है
कांटे का कोई झाँकरा भी नहीं दिखता वहाँ
मेरे मन के कोटर में जहरीला जंतु तो नहीं बैठा है
बेवजह चिड़चिड़ाहट का सबब कोई कैसे जाने
यह मुझे कमजोर करती है
जैसे मुझे जिस पर गुस्सा होना चाहिए उस पर अचानक
प्रेम की बारिश करने लगता हूँ
और जो कमजोर और असहाय होता है
उसी पर उतर जाता है सदियों का गुस्सा
मेरे पास गुस्से और प्रेम करने की कई वजह हैं
जो अचानक सामने आती हैं
प्रायोजित कुछ भी नहीं होता
काम का बोझ तो होता ही है इन दिनों
कैसी दौड़ लगाता है यह जीवन
सबको देखता हूँ गौर से तो लगता है
हर कोई चिडचिडा है
अपने से कमजोर पर निकालता है अपना गुस्सा
हर आदमी अपने गुस्से को प्रेम में बदलने की कला में माहिर है
ठीक उसी तरह प्रेम को गुस्से में
जैसे मुफलिसी में होता हूँ
तो गाली देता हूँ पूंजीपतियों को
और गांठ में आते है कुछ रुपये
तो गरिया लेता हूँ गरीबों को
फेरी वाले से मोल भाव करता हूँ
तो लूटने का इल्जाम लगता हूँ
मॉल में जाता हूँ तो गदगद भाव से खरीद लाता हूँ
गैरज़रूरी सामान
मेरी और आप सबकी चिड़चिड़ाहट में कोई खास अंतर नहीं हैं
यह समय ही ऐसा है
हम चिड़चिड़े हो गए हैं
और हम सबमें एक चापलूस की आत्मा भी उतर आई है।
3/ मैं हास्यस्पद होता जा रहा हूँ इन दिनों
मैंने बहुत सी बातों से
परहेज करना शुरू कर दिया है आजकल
लेकिन फिर भी निकल आता है कभी-कभी
मेरे भीतर का असली आदमी
लेकिन यह क्या हो गया आजकल
कछुए में बदल जाता हूँ
कभी खरगोश की दौड़ लगा देता हूँ
कई बार खजेले कुत्ते की तरह पाता हूँ अपने आपको
कई-कई साबुत कुत्तों का झुण्ड मुझे छकाता रहता है
बहुत सी बातों का प्रतिकार करता हूँ
तो लोग अचंभे से देखते
मेरी पीठ पीछे मुझ पर हँसते हैं
और मुझे देखो मैं सबकी पीठ पीछे रोता रहता हूँ
बच्चे और पत्नी तक हड़काते रहते हैं
ज़माने के साथ चलने की नसीहत देते हुए
ऑफिस के चपरासी से लेकर अफसर तक
मेरे बारे में साफ़ नज़रिया रखते
मेरी बैंक का मैनेजर
पैट्रोल पम्प का वह लड़का
मेरा किराने वाला तक
मेरी उपस्थिति से हो जाते हैं सतर्क
और धीरे-धीरे मुस्कराते रहते हैं
ऐसा लगता है कि वे मुझे उकसा रहे हैं
कि मैं चिल्लाने लगूँ पागलों की तरह
उनकी बातों में धीरे से मैं शामिल होता हूँ
और बात धर्म, साम्प्रदायिकता और राजनीति
पर चली जाती है
मुझे लगता है एक दिन
मैं धकिया दिया जाऊँगा इस पृथ्वी से
मैं आजकल अक्सर बचने लगा हूँ
प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद
और अपने ही क्षेत्र के विधायक पर बात करने से
मेरे आसपास इनके अलावा
किसी और पर बात भी नहीं होती
मुझसे प्यार भरी बातें की जाती है
जो हिंसा के पर्याय की तरह होती जाती है
कहीं चुनाव होता है और परिणाम आते ही
मैं हास्यास्पद हो जाता हूँ ।
4/ भयानक दृश्य
मैंने धरती से पूछा
तुम्हारा भारीपन
कितना बढ़ गया है इन दिनों
अपनी व्यथा कहने से पहले
पृथ्वी थोड़ा हँसी
फिर उसके चेहरे पर
आँसू का समंदर
देखकर मैं डर गया
उसकी हँसी और दुःख
के बीच कितना कम समय था
उसके ताप का पारा बहुत ऊपर था
उसी में जी रहे थे हम
बिना किसी चिंता के
हमारे संसाधनों के
नाख़ून उसके चेहरे में
धँसते जा रहे हैं
हमारे साहस का रंग
उसकी देह के रंग से बहुत गाढ़ा है
वह गिर रही है
अपनी धूरी से
जैसे किसी भयावह समंदर में
हम देख रहे हैं
इस सदी का सबसे भयानक दृश्य बेख़ौफ़।
5/ तुम्हारा अनुवाद
तुम एक भाषा हो
जिसे मुझे सीखने समझने में बहुत वक्त लगा
यों कहें कि अरसा लगा
बहुत विचित्र है व्याकरण
एक वाक्य का अर्थ एक समय से दूसरे समय में बदल जाता है
कुछ शब्द बिलकुल चांद की तरह है तुम्हारी भाषा में
मेरे उच्चारण करते-करते
वाक्य में स्थान और ध्वनि बदल जाती है
एक अल्पविराम लंबी प्रतीक्षा के बाद
पूर्णविराम में बदल जाता है
और कर्म क्रिया में कब बदल जाता है
यह समझते-समझते विषय समाप्त हो जाता
और सारी व्याख्याएँ निरर्थक हो जाती है
तुम्हारी आकृति के भीतर एक उजास होता है
मैं उसे छूता हूँ और अंधेरा फैल जाता है
और निरक्षर की तरह देखता रहता हूँ तुम्हारी और
दरअसल अनुवाद करना चाहता हूँ मैं
तुम्हारा अपनी भाषा में
लेकिन पूरा अनुवाद करने के बाद
पढ़ नहीं पाता
क्योंकि तब तक मेरी अपनी भाषा भी अपना अर्थ खो देती है।
6/ उपवास
जब मनुष्य डार्विन के कहे अनुसार
पृथ्वी पर आया
तो फाकाकशी में उपवास किया
फल और पत्तियों के भरोसे रहा
तब भी उपवास में रहा
पहली बार उसने हथियार बनाया
और उसका उपवास टूटा
किसी के पास हथियार होना
और उपवास में रहना एक साथ कैसे हो सकता है भला
यह कला भी उसने बहुत बाद में ईजाद की
जब उसने खेत बनाये
पसीना बहाया और अन्न उपजा
तब खेती माता को शीश नवाया
अन्न को पूजा तब उपवास किया
हमारे पूर्वज किसान और वनवासी ही थे
वे जब धरती पर दुःख आया तो रोये
उन्होंने अपने बच्चों को
दुःख से लड़ना सिखाया
इसी अभ्यास में एक बार फिर उपवास किया
पहली बार बच्चा माँ से रूठा
और उसने प्रतिरोध में उपवास किया
पानी, आग और हवा ने
उनका रास्ता रोका तो वे नतमस्तक हुए
उनको देवता मानकर पूजा
और उनके लिए फिर उपवास किया
राजा पैदा हुए
तो उनके लिए भी उपवास किया
जब दुनिया बड़ी हुई तो
सबका पेट भरा
फसलें खराब हुई
खाने भर को नहीं मिला
तो पूरे परिवार के साथ उपवास किया
उपवास करने की कला को
उन्होंने ही विकसित किया
कला धीरे-धीरे आदत में तब्दील हुई
फिर भी शिकायत नहीं की
उपवास उपवास और उपवास किया
लाल बहादुर जानते थे उपवास के मर्म को
गांधी ने उपवास किये आज़ादी के लिए
शर्मिला इरोम ने लंबा उपवास किया
इन सबने अपने लिए नहीं
बहुजन हिताय उपवास किया
जब राजा की गोलियों से मारे गए
तब पहली बार उन्होंने उपवास करने से मना किया
हिंसा का जवाब उसी भाषा में दिया
राजनीति को राजनीति की तरह समझा और इस्तेमाल किया
पहली बार उन्होंने जाना कि
राजा की नींद हराम होती है
तो वह उपवास करता है
यह भी जाना कि असंवेदनशील वह
संवेदना के हथियार का इस्तेमाल
बहुत चालाकी से उनके ही खिलाफ करता है।
7/ हम धातुओं से बने हैं
किसी भी वस्तु के दूसरी से टकराने की आवाज़
जानते हैं हम सभी
विज्ञान भी करता ही है अपनी तरह से परिभाषित
लेकिन जिन लोगों की संगीत में रही रुचि
उन्होंने सबसे पहले पहचाना उन्हें
उससे भी आगे उन्होंने आवाज़ को ढालना सीखा
कई आवाज़ों को एक साथ मिलाकर
उन्होंने रस पैदा किया
फिर उस रस को भी उन्होंने
सलीके से तरल कर नदियों की तरह
चलना सिखाया
धातुओं के टकराने के बाद
देर तक हवा में होता रहता है कंपन
और वह सन्नाटे को तोड़ता नहीं
बल्कि उसे पोसता है
तभी तो हम संगीत सुनते हुए
भर जाते हैं विलक्षण शांति से
जैसे कोई कहता है
महीन आवाज़ में अपनी बात
तो उसके भीतर की धातु टकराती है हमारी धातु से
और यह तीव्रता हमेशा बनी रहती है हमारे साथ
और उनका तो क्या कहना
जिन्होंने पत्थरों की आवाज़ को
सबसे पहले पहचाना
वे दुनिया के सबसे पहले प्रेमी थे
वे जानते थे कि पत्थर ही टूटकर
कर सकते हैं सबसे ज्यादा प्रेम ।
8/ झुकना
मैंने उससे कहा कि तुममत झुका करो
मुझे कह दिया करो
मुझे झुकना अच्छा लगता है
उसने कहा कि तुम भी मत झुका करो
मैंने कहा एक कल्डा हो
तो दूसरे को नरम होना चाहिए
मेरे पास झुकने की कला है
मैं अपनी समग्रता में झुकना जानता हूँ
ये मैंने पेड़ों से सीखा है
वे कैसे तो अपने फलों सहित झुक जाते हैं
फिर एक दिन उसने कहा कि
हर कहीं झुकना कला नहीं हो सकती
मैंने कहा सही है
डर, पद-प्रतिष्ठा और सरकार केआगे झुकना
भांडगिरी होती है
वह बहुत देर तक चुप मुझे देखती रही
फिर मैंने बहुत आदर के साथ
उससे कहा देखो ये जो प्रेम है न
इसके आगे हमेशा झुकना चाहिए।
9/ विदा का हाथ
रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म बहुत लुभाते रहे
कभी दिन में कभी रात में
सुहाने लगते रहे
एक छोटा सा स्टेशन भी
रात दो बजे के सूनेपन में भी
कभी डरावना नहीं लगा
घर छोड़ने और घर लौटने
या किसी को विदा देने
किसी लिवा लाने
यहाँ आता रहा बार-बार
पहली बार जब घर से दूर जाना हुआ
तो उदासी मेरे साथ सफर करती रही
उदासी घर में भी पसरी रही
जब भी माँ पिता से बात की
आवाज़ उदासी के पर्दे छनकर आई
जब-जब भी लौटा घर
ख़ुशी स्टेशन से साथ हो ली
कितना कुछ था इसके भीतर बाहर
जो मुझे पहचानता था
यह बाहें फैलाये खड़ा होता था
आज जब बेटे को इसी स्टेशन पर
विदा करने आया
कैसा मनहूस सा लगा यह स्टेशन
हलचल के बीच सन्नाटा पसरा है
हिदायतों में उलझाये रखा अपने आपको
इन औलादों पर बड़ा नाज़ होता है
इन्हें विदा करना कितना कठिन
ट्रेन में बैठते वक्त गले लगाना
विदा की शुरुआत का क्षण होता है
अपने सारे सामान के साथ
कैसे तो निकल पड़ते हैं ये पंछी की तरह
सिग्नल होते ही
ट्रेन की धड़धड़ाहट के साथ
हृदय की धड़कन मिलाती है लय
सारा वक्त चला जाता है उसी के साथ
और रह जाते हैं हम अकेले
डिब्बे के दरवाजे पर
एक हाथ हिलता रहता है विदा में
जब तक वह लौटेगा नहीं
वह हाथ स्टेशन की उदास हवा में
ऐसे ही हिलता दिखाई देता रहेगा मुझे ।
10/ गिरा हुआ हाथ
हाथ सलामत है तो जिंदगी भी
यूँ तो संवारने के लिए दुनिया को
सारे अंगों की होती है जरूरत
और अंग ही क्यों हम सबको भी होना ही होता है
जीव-जंतु, वनस्पतियाँ और हवा
पहाड़ के साथ समतल मैदान और समुद्र भी
हाथ इन सबको सलीके से संवारते हैं
काम से लेकर मदद के लिए उठते
विदा में हिलते
अदा में भी
दुआ और बददुआ में भी
कभी प्यार कभी नफ़रत और गुस्से में भी
बच्चों की कुट्टी का तोहफ़ा भी इनसे ही
किसी बड़े से हाथ में बच्चे का हाथ
जीवन भर के साथ के लिए हाथ में हाथ
प्रार्थना और आशीष खूब इन्ही से
हाथों का न होना
कई निर्जीव चीजों न होना होता
जैसे हथियार या कुदाल
हसिया-हथौड़ा
ऐसी ही कई वस्तुएँ दृश्य में नहीं होती
एक कोरा पर्दा होता
जिस पर नहीं होता कोई रंग
लेकिन जब गिरता है हाथ
तो गिर जाती है भरी पूरी संस्कृति
नहीं रह जाती पृथ्वी की सुंदरता और गर्माहट
इस गिरे हुए हाथ को देखो
निरीह होकर ही गिरा होगा
किसी हाथ के प्रहार ने ही
रोकी होगी इस हाथ की आस
मनुष्यता को बचाने की गिड़गिड़ाहट है इसमें
यह संस्कृति की विकृति में मुरझाया हुआ है।
11/ अकेला आदमी
अकेले आदमी का कमरा
निर्जन टापू की तरह होता है
जहाँ कभी-कभी कुछ लोग
सैर-सपाटे के लिए आया करते हैं
कोई भी इत्मीनान से वहाँ नहीं रुकता
कुछ लोग कमरे को टटोलते हैं
जैसे किसी सुराग की तलाश में आये हो यहाँ
और कुछ तो वहाँ की वस्तुओं को
ललचाई नजरों से देखते हैं
जाते-जाते कह भी देते क्या यह मैं ले लूँ
अकेला आदमी सोचता है
यह उसे और अकेला करने की साजिश है
अकेला आदमी जीवितों से ज्यादा
वस्तुओं से प्यार करने लगता है
वह जब भी घर से निकलता है बाहर
कोई न कोई वस्तु साथ लेकर आता है
इस तरह उसका कमरा
एक सुंदर कबाड़खाने में तब्दील हो जाता है
बहुत सी वस्तुएँ आवारा सैलानियों में बाँट
कहता है आगे से किसी को नहीं दूँगा
अकेला आदमी अच्छा खाना बनाना जनता है
जो भी आता है उसे कुछ न कुछ खिलाना चाहता है
इसी के चलते उसके पास अक्सर फोन आते हैं
यह खिला दो या पीने के लिए कुछ हो तो आऊँ
अपने अकेलेपन के चलते वह झाँसे में आ ही जाता है
अकेला आदमी दुनिया से बहुत प्रेम करता है
अपने एकांत में वह सारी दुनिया के साथ सोता
और आँख खुलते ही प्रकृति को निहारता
अक्सर रात में चाँद से बातें करता
कभी कहता यह जनम तो अकारथ गया
अगला न मिले तो अच्छा
वह अपने कमरे के एकांत से दोस्ती करता है
उसी के साथ जीना और मरना चाहता
उसका कमरा और वस्तुएँ
अक्सर उसकी चिंता में घिरी दिखाई देती है
अक्सर वह अवसाद में चला जाता है
निचाट अकेलेपन में छत को ताकता रहता है
एक छिपकली सरकती है धीरे से
अपने शिकार की ओर
वह अचकचाकर उठ बैठता है
उसकी खामोशी
पूरे वातावरण को भयावह बना देती है ।
12/ पुरुषों को ठेंगा दिखाती हुई स्त्रियाँ
एक संगठन के धरने के दौरान
महिला सदस्यों की कमी पर
कुछ पुरुषों ने
उन पर निशाना साधा
उन्होंने नारी समता पर
व्हाट्सएप्प समूह में गहरे तंज किये
महिलाएँ खामोशी के साथ थी उसी समूह में
उन्होंने कहा कुछ साथी धरने पर
आठ-दस साड़ियाँ लेते आना
कुछ साथी ओढ़ लेंगे तो अनुपात संतुलित हो जाएगा
आये दिन समूह में पुरुष साथी चुटकुले
और बहुत-सा कचरा ठेलते रहते हैं
ठीक उसी समय
स्त्रियाँ खाना बनाती
कपड़े धोती
बच्चों को तैयार करती
पुरुषों के अंतर्वस्त्र धोती
पुरुष नहाकर पूजा करते
और ऐसे असंख्य समूहों में हाजत करते रहते
ये ऐसे ही पुरुषों की
माँएँ थीं
बहनें थीं
बेटियाँ थीं
पत्नियाँ थीं
सबकुछ थीं लेकिन वे स्त्रियाँ थीं
उन्हें काम से काम पर भी जाना था
ऐसे ही काम पर जाते हुए एक स्त्री
बेलन बेचने वाले पुरुष को उसमें ऐब बता रही थी
तो उसने कहा कि तुमको रोटी बनाना आता है?
साइकिल
मोटर साइकिल
कार
हवाई जहाज
मशीन चलाती कुछ न कुछ करती स्त्रियों
को नीचे धकेलने का
कोई मौका नहीं छोड़ना चाहता पुरुष
स्त्रियाँ एक तनी हुई रस्सी पर चलती रहतीं
उनका ये चलना जीवन था
मायका
ससुराल
और कार्यक्षेत्र में संतुलन बैठाती चलती-चली जाती हैं
वे चाहती तो यह है कि पृथ्वी के पार निकल जाएँ
लेकिन नहीं
वे डंटी हुई है अपनी पूरी ताकत के साथ
इन पुरुषों को ठेंगा दिखाती हुई।
13/ रेवड़
पहले वे भेड़ें नहीं थे
वे अपनी तरह से जी रहे थे
उनके चाहे कमतर लेकिन अपने थे विचार
जितना था सामने विस्तार उसी में मग्न
धीरे-धीरे वे बढ़ रहे थे आगे
ऐसा ही होता आया है इस दुनिया में
जिनकी बहुत चाहत होती है वे सौदागर हो जाते हैं
कुछ की चाहत होती है जीने भर की वे बनते हैं चारा
सपनों का झोला लेकर निकलते हैं वे
उनमें वे कुछ लुभावनी जादुई घंटियाँ लेकर आते
उनके पास हर उम्र के लोगों की नाप की घंटियाँ थीं
यहाँ तक कि जो बस मरने ही वाले थे
उनके लिए तो नायाब घंटियाँ थी
वे कहते इन घंटियों से मरने के बाद वे अमर हो जाएँगे
सबके गले में बाँधते घंटियाँ और तैयार हो जाता है एक रेवड़
ऐसे कई उदाहरण थे उनके सामने
लेकिन फिर भी वे सम्मोहित थे सौदागरों से
सब उनकी जय जयकार अपनी-अपनी तरह से करते
उनके गले की घंटियाँ जुगलबंदी करतीं
वे कहते हमारे पास बहुत बड़ा जंगल है
वे चरने के शिविर लगाते और कहते चरकर दिखाओ
और ताली बजाकर हौसला अफजाई करते
वे रेवड़ को बढ़ाना चाहते थे
उनकी ऑंखों में भेड़ों का ऊन झिलमिलाता
अब वे पूरी तरह से रेवड़ में तब्दील हो गए हैं
उनके पास हैं सौदागरों के बहुत से किस्से
इन किस्सों से ये भेड़ें रेवड़ को बड़ा और बड़ा कर रहे हैं
वे सबको रेवड़ में शामिल करना चाहते हैं।
बहादुर पटेल
जन्म : 17 दिसम्बर, 1968 को लोहार पीपल्या गाँव (देवास, म.प्र.) में।
शिक्षा : एम.ए. हिंदी।
प्रकाशन : हिंदी की अधिकांश प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।
उर्दू, मलयालम, नेपाली, पंजाबी और अँग्रेज़ी में कविताओं का अनुवाद।
कविता संग्रह ‘बूँदों के बीच प्यास’, ‘सारा नमक वहीं से आता है’ और ‘मेरा हाथ छोड़ देना’ प्रकाशित।
पुरस्कार : सूत्र सम्मान 2015, राजस्थान पत्रिका कविता सर्जनात्मक पुरस्कार 2015,
पंकज सिंह कविता स्मृति पुरस्कार 2017
सम्बद्ध : ओटला, देवास
सम्प्रति: शासकीय नौकरी
सम्पर्क: 12-13, मार्तंड बाग़,
तारानी कॉलोनी, देवास
(म.प्र.) 455001
ई-मेल: bahadur.patel@gmail.com
मोबाइल : 9827340666
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