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लफ्फाज -योगेंद्र आहूजा एथेंस का पतन हो रहा है क्योंकि शब्द अपने अर्थ खो रहे हैं । (सुकरात, 469-399 ईसा पूर्व) अच्छा, आज तुम्हें लफ्फाज की कहानी सुनाता हूं, एक सच्ची कहानी । बहुत साल हो गये, शायद बीस या…

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पार्टी के बाद -आनंद बहादुर मैं बैठा हूँ। सामने वह बैठी है। दावत खत्म हो चुकी है और लोग जा चुके हैं। मगर लगता है हर व्यक्ति अपनी एक एक आहट और एक-एक परछाई छोड़ गया है। हम अकेले हैं…

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मारिया   ज़किया ज़ुबैरी   सभी एक दूसरे से आँखें चुरा रहे थे। अजब-सा माहौल था। हर इंसान पत्र-पत्रिकाओं को इतना ऊँचा उठाए पढ़ रहा था कि एक दूसरे का चेहरा तक दिखाई नहीं दे रहा था। सिर्फ़ कपड़ों से…

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ख़्वाहिशों के पैबन्द… – तेजेन्द्र शर्मा   ऐसे हादसे मेरे साथ ही क्यों होते हैं… अच्छी भली ज़िन्दगी चल रही थी। अचानक माइकल मेरे जीवन में कहाँ से चला आया? अगर आया भी था तो मुझे अच्छा क्यों लगा?… अगर…

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  जार्ज लुकाच के विरुद्ध बर्तोल्त ब्रेख़्त Bertolt Brecht against Georg Lukács -संतोष चौबे   जार्ज लुकाच: एक परिचय अनुवाद: संतोष चौबे जार्ज लुकाच की साहित्यिक अवधारणाओं को अब अंग्रेज़ीभाषी विश्व में ज्यादा बेहतर तरीके से पहचाना जाता है हालाँकि…

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