इंदु श्रीवास्तव गीत – ग़ज़ल और दोहे के लिए पहचानी जाती हैं। आपके कवित्त की ताक़त जीवन में गहरी आस्था है। आप दुख -दर्द को गीली आवाज़ में कहने से गुरेज करती हैं। हँस हँस के कहने का अंदाज आपको अपनी परम्परा से जोड़ता है।
यहां हम आपकी कुछ ग़ज़लें प्रस्तुत कर रहे हैं जिनमें नयापन है और जीवन- आस्था का वह रंग जिसके लिए आप जानी जाती हैं।
– हरि भटनागर

ग़ज़लें:
1
काम कुछ भी करें, मिन्नत नहीं होती हमसे
अब किसी की भी हो ख़िदमत नहीं होती हमसे

इन अंधेरों पे करें तंज़ कि तूफ़ां से डरें
जब चरागों की, हिफ़ाज़त नहीं होती हमसे

उम्र गुज़री है, अंधेरों की गुलामी में जनाब
रोशनीयों की वकालत नहीं होती हमसे

क्यूं पशोपेश में हैं, ज़िन्दगी से क्या मागें
मौत की भी तो ख़िलाफ़त नहीं होती हमसे

लोग कितने, ख़ुदी के वास्ते दर- दर भटके
कुछ भी हो जाए, बगावत नहीं होती हमसे

ज़िन्दगी है कि, ये बाज़ार का चौराहा है
बेचने- बिकने की ज़हमत नहीं होती हमसे

हमने ताउम्र यूँ, ज़िंदा बुतों को पूजा है
अब ख़ुदा की भी, इबादत नहीं होती हमसे

प्यार, ईमान, वफ़ा, सब उन्हीं पे जचते हैं
दिल के रिश्तों पे सियासत नहीं होती हमसे

2

बांध कर सर पे गिरस्ती,चल दिए बिस्तर समेत
हम तो जाते हैं जहाँ, जाते हैं अपने घर समेत

अपनी मर्जी से, कहाँ होता है कोई दर ब दर
आंधियां हमको उड़ा कर ले गईं छप्पर समेत

पार कर पाएगा क्या, वो उम्र का दरया कभी
वक़्त ने फेका हो जिसको,बांध कर पत्थर समेत

घर से क्या निकली नदी, जाने कहाँ गुम हो गई
रह गया बेजान साहिल, रेत के पैकर समेत

आग यूँ फैली, कि जंगल सोते-सोते जल गया
उड़ गया मौसम धुएं में, पंछियों के पर समेत

नाम न कोई निशां, सर पर लिए सहरा की धूप
घर से निकला मेरा का़तिल मोम के नश्तर समेत

ये हमारा दर्द है, या काहिली की इंतहा
जैसे कोई नींद में ही, चल पड़े चादर समेत

3

यूं दिलों का चैन, होठों की हंसी जाती रही
क्यूं फ़कत ही चार दिन की ज़िन्दगी जाती रही

खेत जंगल बस इसी अफ़सोस में जलते रहे
रह गया बेजान सा साहिल,नदी जाती रही

हादसे,दंगे, सियासत, और क़ुदरत का कहर
देख कर न देखते, ये भी सदी जाती रही

कौन मंदिर, कौन मस्जिद,क्या तुम्हारा क्या मेरा
ऐ ख़ुदा किस कश्मकश में, बंदगी जाती रही

कैसी ज़हरीली हवा,माहौल में तारी हुई
शाम की रंगत सुबह की ताज़गी जाती रही

गुलबदन, मोती, नगीने और परियों सा लिबास
इस तकल्लुफ़ में, बला की सादगी जाती रही

ढोल-ताशे थम गए,महफ़िल उठी परदा गिरा
रह गए आंसू, बखत की पालकी जाती रही

रात,ख्वाबों का तेरे, लश्कर समेटे चल पड़ी
नीम पल्कों से मेरी,वो रौशनी जाती रही

4

बदलते वक़्त की रफ़्तार में रफ़्तार होने को
यहाँ हर आदमी बेचैन है बाज़ार होने को

अगर जिस्मों की हो तो हो, दिलों की भी नुमाइश है
दुकानें भी बहुत तैयार हैं, तैयार होने को

बड़े ख़ुदगर्ज़ हैं, अपनों से जो मुंह मोड़‌ लेते हैं
कि लानत हैं अना के, इस तरह दीवार होने को

न रखते वो हमारे सामने, दिल खोलकर अपना
बहुत कोसे हैं हम, अपने के यूं बेदार होने को

हमारी बस्तियाँ पहले से ही बदकारियों‌ में हैं
बची है राजधानी भी कहां बीमार होने को

कोई कालाबज़ारी में, तो कोई सेक्स रैकेट में
तो क्या के ख़ूबियाँ काफ़ी नहीं, ग़द्दार होने को

कभी इक लफ़्ज़ भी होना, महीनों हो नहीं पाता
कभी बातों में ही हो जाते हैं, अश्आर होने को

5

इक बूंद सा ख़याल,लहर में बदल गया
नन्हा सा एक बीज, शजर‌ में बदल गया

चश्में पहन के धूप के, चमके हैं बिजलियाँ
मेरा ग़रीब गाँव, शहर में बदल गया

बिखरी है उधर धूप, इधर बादलों के गांव
रुत का मिज़ाज, एक नज़र में बदल गया

बरसों से बियाबान सा, ख़ाली मेरा मकां
तुमने रखा चराग, तो घर में बदल गया

मासूम उंगलियों ने, सजाया जो ताक पर
लकड़ी का एक ठूठ, हुनर में बदल गया

खेतों में धान रोपती, बच्ची का पसीना
बादेसबा चली, तो इतर में बदल गया

6

लगी है शर्त, धनियां और होरी में
नफ़ा खेती में है, या सूदखोरी में

किसानी के ही चलते, मर मिटा आख़िर
सिवा ईमान के, क्या था बहोरी में

हमारा जिस्म, ठाकुर की हवेली में
हमारा चैन, बनिए की तिजोरी में

बने ऐ काश, इक कानून ऐसा भी
कि जुर्माना लगे, सपनों की चोरी में

कहाँ अब मस्तियां, सावन के झूलों में
कहाँ वो रंग, अब फागुन की रोरी में

मिलेंगे हम किसानों की कथाओं में
गुल- ओ- गुलफ़ाम,न चंदा- चकोरी में

7

रहेंगे यहाँ लोग, हैरान कब तक
थमेगा न जाने, ये तूफ़ान कब तक

उन्हें भी तो कुछ, हादसे का पता हो
बनेंगे वो ख़तरे से अंजान कब तक

मदारी, पुजारी, भिखारी बने कुछ
छिपाएंगे आख़िर वो पहचान कब तक

कोई दोस्त हो, जो दिया इक जला दे
रहेगा मेरा घर,बियाबान कब तक

ग़रीबी, उदासी, किफ़ायत, उधारी
बसेंगे मेरे घर, ये मेहमान कब तक

फ़ना हो रहे हैं, किसानों के कुनबे
बचेंगे यहाँ, खेत- खलिहान कब तक

8

हम फ़क़त ख़ुद्दारियों में रह गए
इसलिए बदकारियों में रह गए

बोनसाई बन गए सब पेड़ वो
जो तुम्हारी क्यारियों में रह गए

बाढ़ में घर बह रहे थे और वो
जश्न की तैयारियों में रह गए

वो सिंहासन में विराजे और हम
सिर्फ़ पहरेदारियों में रह गए

दर्द, बेकारी, ग़रीबी, बेबसी
ला दवा बीमारियों में रह गए

9

बला की चुप्पियां हैं, और हम हैं
अंधेरी बस्तियां हैं, और हम हैं

हमारे साथ कोई हो, न हो पर
ये फाके मस्तियां हैं, और हम हैं

कलम कागज सियाही, लफ़्ज़ ढाई
ग़ज़ल, रूबाइयां हैं और हम हैं

उसूलों की, रिवाज़ों की, धरम की
वही बैसाखियां हैं, और हम हैं

जनम भर हम जिन्हें सुलझा न पाए
भरम की गुत्थियां हैं, और हम हैं

इसे फ़ितरत कहें, या बदनसीबी
हमारी गल्तियां हैं, और हम हैं

10

जिस तरह हम्द से ख़ुदा आगे
रोटियों से भी है नशा आगे

भूख की बस्तियों से चल‌ निकला
कामगारों का क़ाफ़िला आगे

दूर से कुछ नज़र नहीं आता
धुंध आगे कि रास्ता आगे

रिन्द अब्रो- हवा से आगे है
जन्नतों से भी मयक़दा आगे

तेरा आना, मेरा फ़ना होना
यूं ही चलने दे सिलसिला आगे

देखना है कि, रंग-ए-महफ़िल को
कौन कहता है अलविदा आगे


इन्दु श्रीवास्तव 

चार ग़ज़ल संग्रह प्रकाशित

1 आशियाने की बातें, 2008

2  उड़ना बेआवाज परिन्दें, 2012

3 बारिश में जल रहे हैं खेत, 2017

4 कंदील जलाओ कोई

गीत संग्रह-

1-भोर पनिहारन (अप्रकाशित)

दोहा संग्रह

1-तू ही मेरा जोगिया (अप्रकाशित)

आठ ग़ज़लों का एल्बम ‘बादलों के रंग’ रिलीज।

पहल, हंस, साक्षात्कार, बया, वीणा, वागर्थ आदि सभी शीर्ष साहित्यिक पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

एक कहानी संग्रह अप्रकाशित।

साथ ही आलोचनाएँ, संस्मरण, स्मृति लेखों पर काम।

सम्मान- रज़ा सम्मान, स्पेनिन साहित्य गौरव सम्मान झारखण्ड, सुधेश सम्मान।

राष्टीय स्तर के मंचों,आकाशवाणी, दूरदर्शन में काव्य पाठ।

संप्रति-स्वतंत्र लेखन


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