ज्ञान चतुर्वेदी हिन्दी भाषा के साथ एशिया महाद्वीप के बड़े लेखक हैं। यह कथन मेरा नहीं, मेरे सहचर हरि भटनागर का है। हाल ही में ज्ञान चतुर्वेदी का ताज़ा उपन्यास ‘एक तानाशाह की प्रेमकथा’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित होकर आया है। हरि ने उस पर संक्षिप्त समीक्षा लिखी है। प्रस्तुत है। – नरेश अग्रवाल।

एक तानाशाह की प्रेमकथा : ज्ञान चतुर्वेदी

समीक्षा : हरि भटनागर

लेव तोल्स्तोय को उनके जनता से गहरे जुड़ाव को याद करते हुए रूसी लेखक लियोनीद लियोनोव ने कहा था :
कहीं निकट ही एक ऐसा दिल धड़कता है जिसे किसी क़ीमत पर ख़रीदा नहीं जा सकता , सजग आंखें उनके भयंकर श्रम और अभावों को देख रही हैं, सतर्क कान उनकी आहों – कराहों और गीतों को सुन रहे हैं और समय पाकर यह सब कुछ भविष्य की नई दुनिया के सर्वमान्य कोष में सोना बनकर संचित हो जाएगा …
इस कथन के परिप्रेक्ष्य में ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास ‘ एक तानाशाह की प्रेमकथा ‘ को देखें तो कहा जा सकता है कि यह समय का आईना है जिसमें समय के विद्रूप को देखा जा सकता है, जिसमें कोई ख़रीद- फरोख्त़ का खेल नहीं – सजग आंखें और सतर्क कान समय की धड़कन को जुबान दे रहे हैं।
‘एक तानाशाह की प्रेमकथा’ से गुज़रते हुए पता नहीं क्यों डिकेन्स के A tale of two cities उपन्यास की प्रारंभिक पंक्तियां गूंजने लगीं जिनमें कहा गया है It was the worst of time, It was the age of wisdom, It was the age of foolishness … ख़ैर, हम यहां ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास के समय को जानना चाहते हैं। ज्ञान चतुर्वेदी ने ख़ुद समय के बारे में कहा है। यह एक अजीब विडम्बना है कि वर्तमान समय एक अजीब से दौर से गुज़र रहा है। दिखने में तो यह देश लोकतंत्र को जी रहा है लेकिन अंदर से लोकतंत्र और तानाशाही का सहअस्तित्व है। स्पष्ट कहें तो तानाशाही मुख्य भूमिका में है जो लोकतंत्र को मुखौटे के रूप में इस्तेमाल कर रही है। बादशाह को ईश्वरीय आदेश है इसीलिए सिंहासन पर बैठते ही उसने लोकतंत्र की सीढ़ियां तोड़ डालीं और उसकी जगह आज के बाज़ार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मिज़ाज को समझा और नये एस्केलेटर्स लगवा दिए ताकि उन पर चढ़कर विकास की नई ऊंचाइयां हासिल की जा सकें। इन एस्केलेटरों के खटके बादशाह के खुद के हाथ में हैं। उसकी मर्जी के बिना कोई कहीं नहीं पहुंच सकता। लेकिन यही बादशाह दुखी है कि सदियों से धोखे पर धोखे खाने के बाद भी यह देश, यह समाज सर्वधर्म समभाव, साम्प्रदायिक सहिष्षुणता पर यक़ीन करता है , दुश्मन से नफ़रत करने में जिसे संकोच हो – उस देश के सोच में कहीं न कहीं भारी घपला है। ज़ाहिर है बादशाह इस दकियानूसी सोच को जड़ से ख़त्म करना चाहता है। इतिहास बताता है दूसरों को लूट कर ही सब बड़े बने हैं। हम मूरख ठहरे जो प्रेम के चक्कर में हैं और पिछड़े हुए हैं। बादशाह अब इस देश को इस दकियानूसी प्रेम से बाहर लाना चाहता है…
यह पृष्ठभूमि है इस उपन्यास की जिसके आधार पर एक तानाशाह की प्रेमकथा के समानांतर रचनाकार ने कई तानाशाहों की ख्व़ाहिशों – मंशाओं और उनके तथाकथित प्रेम के विद्रूप को उजागर किया है। कहा जा सकता है कि मौजूदा समय के ये वीभत्स चेहरे हैं जो कहीं न कहीं व्यवस्था के ख़ूखार रूप को सामने लाते हैं जिसकी चक्की में सामान्य आदमी पिस रहा है और इंसान के दर्जे से लगातार नीचे गिरता जा रहा है। यह डिके समय के डिके को उजागर करता है।
उपन्यास में वर्णित कई सारे तानाशाह दरअसल एक ही चरित्र के कई रूप हैं। मसलन तानाशाह नम्बर एक ऐसा किरदार है जो अपनी रानी को इंतहा प्यार करता है और कहीं न कहीं अनजाने में कोई ग़लती या चूक होने पर वह रानी की बेतरह कुटाई करता है । रानी बेकस जानवर की तरह उसके जुल्म को सहती है , डर की वजह ज़रा भी प्रतिरोध नहीं कर पाती। तानाशाह नम्बर दो है जो शक्की दिमाग़ है और अपनी रानी या पत्नी के चरित्र पर सवालिया निगाह रखता है और प्रेम के अंतरंग क्षणों में उससे यह जानना चाहता है कि जिस पुरुष को चोरी – छिपे चाहती है , दरअसल वह उसका खुलासा कर दे। पत्नी किसी भी पर पुरुष से संबंध होने से इनकार करती है। तानाशाह का स्त्री के प्रति यह रवैया मानसिक बीमारी का एक नमूना है जिसमें स्त्री लगातार आहत होते हुए भी पति या कहें तानाशाह के प्रति मन में कल्मष नहीं लाती। तानाशाह नम्बर तीन में पुरुष की जगह एक स्त्री है जो काम वासना में पूरी तरह अतृप्त है और पति को हर समय इसके लिए लांछित करती रहती है। और आख़िर में डाक्टर से सम्पर्क करने के लिए पति पर दबाव बनाती रहती है। पति पत्नी का सम्मान करते हुए डाक्टर से मिलता है और बताता है कि वह पूरी तरह फिट है जबकि पत्नी इस बात को मंसूख करती है। बहरहाल, चौथा तानाशाह है तो पूरी तरह तानाशाह पर अपने को वह जनसेवक कहलाना पसंद करता है । हर समय वह इस चिंता में रहता है कि प्रजाजन स्त्री- प्रेम में अपना समय ख़राब कर रहे हैं- किसी के पास देश- प्रेम के लिए समय नहीं है। इस सोच के चलते वह ऐसा प्लान करता है जिससे देश के स्त्री-प्रेम को देश- प्रेम में मोड़ा जा सके। पांचवा तानाशाह है जो देश में व्याप्त प्रेमभाव को अपनी सत्ता के लिए ख़तरा मानता है। वह प्रेम से डरता है ।उसकी तानाशाही के प्राण हैं नफ़रत। वह प्रेम को नेस्तनाबूद करना चाहता है। इस दिशा में वह सक्रिय है। देश में प्रेमबंदी का कानून लगाकर जनता को सताना और प्रेम में डूबे प्रेमियों (सूरज प्रकाश और नायाब जान )को प्यार के जुर्म में मौत के घाट उतरवा देना बादशाह के सनक के निहितार्थ ग़ौरतलब हैं।
संक्षेप में कहें कि घोर निराशा से भरे समय में उपन्यास के जुल्म सहते किरदार टूटते हैं किन्तु झुकते नहीं। अनाचार- अत्याचार के ख़िलाफ़ अंतत: वे असहमति दिखलाते नज़र आते हैं। यह असहमति ही किरदारों को पुतला बनने से रोकती है। इन किरदारों को जीता हुआ रचनाकार अंतत: उपन्यास-लेखन के क्षेत्र में सम काल का ऐसा सवाल खड़ा करता है जो अवाम के ख़िलाफ़ है। लेखक का सत्ता के अमानवीय रवैये के विरुद्ध आवाज़ उठाना लेखकीय दायित्व का परिचायक है जो कहीं न कहीं समाज से गहरे सरोकार का परिचायक है। प्रेमचंद ने साहित्य को राजनीति के आगे चलने वाली मशाल कहा था। मशाल दरअसल चेतना है, दृष्टि है जो राजनीति की ‘राजनीति’ को समझती है। उसकी कलई खोल देती है। ज्ञान चतुर्वेदी ने आज के समय की ‘ राजनीति ‘ की बखिया उधेड़ दी है।
ज्ञान चतुर्वेदी की भाषा आज के आधुनिक समय की नई भाषा है जो हवा में नहीं बल्कि यथार्थ की खुरदुरी माटी से पैदा हुई है जिसके डी एन ए में जातीय परम्परा की तुर्शी है जो सुलाने में नहीं वरन जगाने में भरोसा जगाती है।


हरि भटनागर

उत्तर प्रदेश के बहुत ही छोटे कस्बे राठ, हमीरपुर में 1955 में जन्म. अमर उजाला और हितवाद जैसे राष्ट्रीय पत्रों से सम्बद्ध रहे. सगीर और उसकी बस्ती के लोग, बिल्ली नहीं दीवार, नाम में क्या रखा है और आंख का नाम रोटी प्रकाशित कहानी संग्रह. दो उपन्यास- एक थी मैना एक था कुम्हार और दो गज़ ज़मीन प्रकाशित हैं. कहानियां उर्दू, मलयालम, मराठी, पंजाबी के साथ रूसी और अंग्रेजी में अनूदित.तीस वर्षों तक मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल की साहित्यिक पत्रिका साक्षात्कार के संपादन से संबद्ध रहे. रूस के पूश्किन सम्मान समेत देश के राष्ट्रीय श्रीकांत वर्मा पुरस्कार, दुष्यंत कुमार सम्मान, वनमाली कथा एवं पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित. रूस, अमेरिका और ब्रिटेन की साहित्यिक एवं सांस्कृतिक यात्राएं.वर्तमान में साहित्यिक पत्रिका रचना समय के संपादक.
haribhatnagar@gmail.com


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