आलोचक रवि रंजन ने सविता सिंह की ‘रात्रि प्रहरी’ कविता में मौजूद बिम्ब-विधान और एड्रिएन रिच की ‘इतिहास के मलबे’ वाली दृष्टि के बीच जो संवेदनात्मक सेतु निर्मित किया है, वह वैश्विक स्त्रीवादी विमर्श के परिप्रेक्ष्य में हिंदी आलोचना को एक नई ऊँचाई प्रदान करता है। कवि त्रिलोचन की सुप्रसिद्ध ‘मैं तुम्हें सौंपता हूँ’ कविता के हवाले से सविता सिंह की ‘रात्रि प्रहरी’ कविता में ‘सौंपना’ क्रिया का इस्तेमाल करते हुए रचित काव्य-पंक्तियों का विश्लेषण करते हुए पुरुष-दृष्टि एवं स्त्री-दृष्टि के बीच के अंतर को आलेख में जिस बारीकी से उभरा गया है वह अपनी मिसाल आप है.। आलेख की सबसे बड़ी खूबी इसकी वैचारिक सघनता और वह विश्लेषण पद्धति है जो जेंडर, भाषा और अस्तित्ववाद, उत्तर-संरचनावाद आदि के अंतर्संबंधों को खोलती है, जिससे यह कविता के गंभीर अध्येताओं, प्राध्यापकों, शोधार्थियों और कविता प्रेमियों के लिए एक अपरिहार्य और मार्गदर्शक सामग्री बन पड़ा है।
-हरि भटनागर


आत्मा का अंश और इतिहास का मलबा : सविता सिंह और एड्रिएन रिच का स्त्रीवादी काव्य-संवाद : रवि रंजन
समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में सविता सिंह एक ऐसी उल्लेखनीय रचनाकार हैं, जिनकी काव्य-चेतना में स्त्री-अनुभव, आत्मबोध, देह और काल के दार्शनिक आयामों का गहरा अन्वेषण मिलता है। उनकी कविताओं में स्त्री केवल एक विषय वस्तु बनकर नहीं आती, बल्कि वह ज्ञान और सृजन की एक सशक्त केंद्र के रूप में स्थापित होती है। सविता सिंह के रचनात्मक कौशल का परिचय उनके महत्वपूर्ण संग्रहों—‘अपने जैसा जीवन’, ‘स्वप्न समय’, ‘नींद थी और रात थी’, और ‘वासना एक नदी का नाम है’—से मिलता है, जहाँ बिंबों की सघनता और भाषा की तरलता के माध्यम से एक स्वतंत्र स्त्री-दृष्टि विकसित होती है।
साहित्यिक सृजन के साथ-साथ उनका योगदान अकादमिक और वैचारिक क्षेत्रों में भी अत्यंत गौरवशाली रहा है। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) के जेंडर अध्ययन संकाय में बतौर प्रोफेसर सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्होंने स्त्री-विमर्श को केवल सैद्धांतिक विमर्श तक सीमित न रखकर उसे व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों से जोड़ने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। वैश्विक स्तर पर उनकी पहचान द्विभाषिक संग्रह ‘रोइंग टुगेदर’ और उनके द्वारा संपादित अंतर्राष्ट्रीय काव्य-चयन ‘सेवेन लीव्स, वन ऑटम’ से पुख्ता होती है। इस प्रकार, अपनी सृजनात्मक मेधा और बौद्धिक नेतृत्व के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य एवं जेंडर अध्ययनके क्षेत्र में नई ऊँचाइयाँ प्रदान की हैं।
सविता सिंह की ‘रात्रि प्रहरी’ कविता समकालीन हिन्दी कविता में उस जटिल संवेदनात्मक और वैचारिक परिदृश्य का प्रतिनिधित्व करती है, जहाँ भाषा, मौन और अस्तित्व के बीच के संबंध अत्यंत सूक्ष्म और बहुस्तरीय रूप में उद्घाटित होते हैं। यह कविता पहली दृष्टि में एक आत्मनिवेदन या आंतरिक संवाद प्रतीत हो सकती है, किन्तु इसके भीतर निहित बिम्ब-संरचना, भाषिक तनाव और अर्थ की अनिश्चितता इसे एक ऐसे काव्य-पाठ में रूपांतरित कर देते हैं, जो अपने ही कथ्य को निरन्तर प्रश्नांकित करता चलता है। ‘मौन की संरचनाएँ और भाषा का विघटन: ‘रात्रि प्रहरी’ कविता का उत्तर-संरचनात्मक पाठ’ शीर्षक यह आलेख इसी जटिलता को केन्द्र में रखते हुए कविता के भीतर सक्रिय अर्थ-निर्माण और अर्थ-विघटन की प्रक्रियाओं को समझने की विनम्र चेष्टा है।
उत्तर-संरचनात्मक दृष्टि यह मानकर चलती है कि भाषा किसी स्थिर अर्थ की वाहक नहीं, बल्कि एक ऐसी गतिशील संरचना है, जहाँ अर्थ निरंतर टलता, बदलता और पुननिर्मित होता रहता है। इस परिप्रेक्ष्य में ‘रात्रि प्रहरी’ का पाठ एक ऐसे भाषिक परिदृश्य के रूप में सामने आता है, जहाँ ‘शब्द’ अपने आशय को स्थिर करने के बजाय उसे विखंडित करते हैं, और ‘मौन’ अनुपस्थिति नहीं, बल्कि अर्थ-उत्पादन की एक सक्रिय स्थिति बन जाता है। “शब्दों का अस्त होना” और “सौंपती हूँ तुम्हें ये सारे शब्द”—जैसे कथन इस तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि भाषा में जो कहा जाता है, वह उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि वह जो छूट जाता है, दबा रहता है या अनकहा रह जाता है। इस प्रकार कविता में मौन और भाषा के बीच का संबंध विरोध का नहीं, बल्कि परस्पर-निर्भरता का है, जहाँ एक की उपस्थिति दूसरे को निरंतर पुनर्परिभाषित करती रहती है।
कविता का ‘रात्रि प्रहरी’ रूपक भी इस अर्थ-संरचना की जटिलता को उद्घाटित करता है। ‘रात्रि’ और ‘प्रहरी’—ये दोनों बिम्ब अपने पारंपरिक अर्थों में विरोधी प्रतीत होते हैं, परन्तु कविता में वे एक-दूसरे के भीतर प्रविष्ट होते हुए एक ऐसी ‘धूसर’ स्थिति का निर्माण करते हैं, जहाँ अर्थ किसी एक ध्रुव पर स्थिर नहीं रह पाता। यही धूसरता उत्तर-संरचनात्मक विचार का केन्द्रीय बिंदु है—एक ऐसा क्षेत्र जहाँ द्वैतों की स्थिरता भंग हो जाती है और अर्थ बहुवचन (plural) रूप ग्रहण कर लेता है। “भोर” और “कालिमा” का पारस्परिक विनिमय इस विघटन को और तीव्र करता है, जहाँ प्रकाश और अंधकार के पारंपरिक अर्थ-बंध टूटते हुए दिखाई देते हैं।
वस्तुतः ‘रात्रि प्रहरी’ कविता को सिर्फ एक भावनात्मक या दार्शनिक पाठ के रूप में ग्रहण करना उसके बहुस्तरीय भाषिक और वैचारिक आयामों को सीमित कर देना होगा। यह कविता दरअसल भाषा की उन संरचनाओं को उजागर करती है, जिनके भीतर अर्थ निर्मित भी होता है और विघटित भी। यहाँ ‘सौंपना’ एक सरल संप्रेषण नहीं, बल्कि अर्थ के अस्थिर हस्तांतरण की प्रक्रिया है; ‘शब्द’ अभिव्यक्ति के साधन होते हुए भी अपनी ही नश्वरता से ग्रस्त हैं; और ‘मौन’ अनुपस्थिति न होकर एक सक्रिय अर्थ-क्षेत्र है, जो भाषा के भीतर ही कार्य करता है। इस प्रकार यह आलेख ‘रात्रि प्रहरी’ को एक ऐसे पाठ के रूप में देखने की पेशकश करता है, जो अपने भीतर किसी अंतिम अर्थ को स्थापित नहीं करता, बल्कि अर्थ की अनिश्चितता, बहुलता और स्थगन को ही अपनी केन्द्रीय संवेदना बनाता है। ‘मौन की संरचनाएँ’ और ‘भाषा का विघटन’—ये दोनों पद केवल विश्लेषण के उपकरण नहीं, बल्कि स्वयं कविता की अंतःक्रियात्मक प्रक्रियाएँ हैं, जिनके माध्यम से यह रचना पाठक को एक निरंतर व्याख्यात्मक यात्रा में संलग्न करती है, जहाँ हर अर्थ अपने भीतर एक नए प्रश्न और एक नए विघटन की संभावना को समाहित किए रहता है।
कविता का मूल पाठ नीचे दिया जा रहा है:
रात्रि प्रहरी
अपनी आत्मा के एक अंश-सा
सौंपती हूँ तुम्हें ये सारे शब्द
जो मुझ तक आए अपनी नश्वरता में
तुम्हें सौंपती हूँ अपनी सारी विह्वलता
जो उमड़ी मुझमें उस नदी की तरह
जिसने देखा अपने तटों पर शब्दों को अस्त होते हुए
उस रूखे ज्ञान का मर्मर तुम्हें सौंपती हूँ
सम्मिलित हवा में जो बहता है
मेरे अस्तित्व में अब तक
तुम जानोगे एक दिन
कैसी है मुक्ति की मेरी उत्कट अभिलाषा
सब कुछ कितना रंगहीन है आस-पास
जब जानोगे
हो एक धूसर रात्रि प्रहरी तुम
जिसका इंतज़ार करती है भोर सदा
तुम जानोगे
जब वह सौंपेगी तुम्हें
अपनी संपूर्ण कालिमा
-सविता सिंह
समकालीन हिंदी कविता में सविता सिंह की एक विशिष्ट पहचान है। उनकी काव्य-दृष्टि निजी अनुभवों को बहुत ही सहजता से दार्शनिक गहराई प्रदान करती है। ‘रात्रि प्रहरी’ कविता को पढ़ते हुए यह महसूस होता है कि यह केवल स्वयं को व्यक्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अस्तित्व, भाषा, समय और स्वतंत्रता के आपसी रिश्तों की एक गहरी पड़ताल है। यहाँ ‘रात्रि’ और ‘प्रहरी’ के प्रतीक एक ऐसी चेतना को जन्म देते हैं, जिसमें अंधेरे के बीच जागते रहने, बदलाव का इंतज़ार करने और निरंतर सजग रहने का भाव एक साथ घुला-मिला है। कविता का आरंभ अत्यन्त आत्मीय और गहन आत्म-निवेदन के स्वर में होता है—“अपनी आत्मा के एक अंश-सा / सौंपती हूँ तुम्हें ये सारे शब्द।” यहाँ ‘शब्द’ केवल भाषिक इकाइयाँ नहीं हैं, बल्कि वे कवयित्री के अस्तित्व के जीवंत अंश हैं। यह सौंपना एक प्रकार का आत्म-त्याग भी है और आत्म-प्रसारण भी। ‘जो मुझ तक आए अपनी नश्वरता में’—यह पंक्ति भाषा के अस्थायित्व की ओर संकेत करती है। शब्द स्थायी नहीं हैं; वे क्षणभंगुर हैं, फिर भी उन्हीं के माध्यम से मनुष्य अपने अनुभवों को साझा करता है। यहाँ भाषा की सीमाएँ और उसकी अनिवार्यता—दोनों एक साथ उपस्थित हैं।
“तुम्हें सौंपती हूँ अपनी सारी विह्वलता”—इस पंक्ति में भावनात्मक उच्छ्वास अपने चरम पर है। ‘विह्वलता’ का नदी के रूपक से जुड़ना—“जो उमड़ी मुझमें उस नदी की तरह”—कविता को एक प्रवहमान, गतिशील संरचना प्रदान करता है। नदी यहाँ केवल भावनाओं का रूपक नहीं है, बल्कि समय और स्मृति का भी द्योतक है। “जिसने देखा अपने तटों पर शब्दों को अस्त होते हुए”—पंक्ति में ‘शब्दों का अस्त होना’ एक बेहद मार्मिक बिम्ब है। यह संकेत देता है कि भाषा भी क्षीण होती है, अर्थ भी लुप्त होते हैं, और अनुभव भी समय के साथ धुँधले पड़ जाते हैं। इस प्रकार कविता भाषा की क्षयशीलता और अनुभव की अस्थिरता को एक साथ रखती है।
“उस रूखे ज्ञान का मर्मर”—पंक्ति में ज्ञान को ‘रूखा’ कहा जाना अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यह वह ज्ञान है जो संवेदना से कटा हुआ है, जो केवल बौद्धिक है, जिसमें जीवन की ऊष्मा नहीं है। ‘मर्मर’ शब्द उस ज्ञान के भीतर की हल्की-सी कम्पन, उसकी शेष बची हुई जीवंतता की ओर संकेत करता है। यह ज्ञान सम्मिलित हवा में बहता है—अर्थात यह केवल व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक भी है। यह हमारे अस्तित्व में गहराई तक व्याप्त है, चाहे हम उसे स्वीकार करें या नहीं।
कविता का अगला खंड भविष्य की ओर उन्मुख है। सवाल उठना लाज़िमी है कि—“तुम जानोगे एक दिन।” –में यह ‘तुम’ कौन है? यह एक पाठक हो सकता है, एक प्रिय, या स्वयं कवयित्री का दूसरा रूप। इस ‘तुम’ के माध्यम से कविता संवाद की स्थिति रचती है। “कैसी है मुक्ति की मेरी उत्कट अभिलाषा”—पंक्ति में ‘मुक्ति’ का विचार केन्द्रीय है। यह मुक्ति केवल सामाजिक या भौतिक नहीं, बल्कि अस्तित्वगत और आध्यात्मिक है। यह उस स्थिति से मुक्ति है जहाँ “सब कुछ कितना रंगहीन है आस-पास।” कहना न होगा कि यहाँ ‘रंगहीनता’ जीवन की नीरसता, अर्थहीनता और एक प्रकार की
अस्तित्वगत शून्यता का प्रतीक है।
“हो एक धूसर रात्रि प्रहरी तुम”—पंक्ति में कविता का सबसे महत्त्वपूर्ण रूपक सामने आता है। ‘रात्रि प्रहरी’ वह है जो अन्धकार में जागता है, जो दूसरों की नींद के समय सचेत रहता है। ‘धूसर’ विशेषण इस स्थिति को और जटिल बनाता है—यह न पूरी तरह अन्धकार है, न प्रकाश; यह एक मध्यवर्ती, अनिश्चित स्थिति है। यह वही अवस्था है जहाँ मनुष्य न पूरी तरह अज्ञान में है, न पूर्ण ज्ञान में। इस ‘प्रहरी’ का कार्य केवल पहरा देना नहीं, बल्कि प्रतीक्षा करना भी है—“जिसका इंतज़ार करती है भोर सदा।” यहाँ भोर आशा, नवजीवन और मुक्ति का प्रतीक है।
कविता का समापन—“जब वह सौंपेगी तुम्हें / अपनी संपूर्ण कालिमा।”—बहुत ही प्रभावशाली, लेकिन बहसतलब है। अमूमन भोर को प्रकाश और उजाले के रूप में देखा जाता है, पर यहाँ भोर ‘कालिमा’ सौंपती है। यह एक विडम्बनात्मक और गहन दार्शनिक मोड़ है। इसका अर्थ यह हो सकता है कि मुक्ति का अनुभव भी अपने भीतर एक नयी जटिलता, एक नया अन्धकार लेकर आता है। या यह कि अन्धकार और प्रकाश एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं। भोर की कालिमा उस सत्य की ओर संकेत करती है कि हर आरम्भ अपने भीतर किसी अन्त का अंश लिए होता है।
इस प्रकार ‘रात्रि प्रहरी’ एक ऐसी कविता प्रतीत होती है जो भाषा की सीमाओं, ज्ञान की रूक्षता, भावनाओं की प्रवहमानता और मुक्ति की जटिल आकांक्षा—इन सभी को एक साथ साधती है। यह कविता पाठक को केवल अर्थ नहीं देती, बल्कि उसे एक अनुभव की प्रक्रिया में सम्मिलित करती है, जहाँ वह स्वयं भी एक ‘रात्रि प्रहरी’ बन जाता है—अन्धकार में जागता हुआ, भोर की प्रतीक्षा करता हुआ, और इस प्रतीक्षा में अपने अस्तित्व के गहरे प्रश्नों से जूझता हुआ।
इस कविता पर समाजशास्त्रीय नज़रिए से विचार करते हुए यह स्पष्ट होता है कि इसकी अंतर्वस्तु केवल निजी संवेदना या अस्तित्वगत व्यथा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कविता आधुनिक निगरानी-समाज (surveillance society) की गहन आलोचना भी प्रस्तुत करती है। कविता का ‘प्रहरी’ रूपक विशेष रूप से उस संरचना की ओर संकेत करता है, जिसे मिशेल फूको (Michel Foucault) और जेरेमी बेंथम (Jeremy Bentham ) ने ‘अखण्ड निगरानी’ या ‘पैनोप्टिकॉन’ (Panopticon) के रूप में व्याख्यायित किया है—एक ऐसी सत्ता-व्यवस्था, जहाँ देखने और देखे जाने का संबंध असमान, अदृश्य और अंततः आंतरिकीकृत (internalized) होता है। दूसरे शब्दों में, फूको के अनुसार ‘पैनोप्टिकॉन’ आधुनिक सत्ता की उस कार्यप्रणाली का प्रतीक है, जहाँ नियंत्रण शारीरिक बल से नहीं बल्कि ‘लगातार देखे जाने के मनोवैज्ञानिक डर’ से किया जाता है। इसकी संरचना ऐसी होती है जहाँ बीच में स्थित एक मीनार से सभी लोगों पर नज़र रखी जा सकती है, लेकिन वे लोग यह नहीं जान सकते कि उन्हें वास्तव में उस समय देखा जा रहा है या नहीं। दिलचस्प है कि जब निगरानी अदृश्य हो जाती है, तो व्यक्ति खुद ही अपना ‘निरीक्षक’ बन जाता है और बिना किसी बाहरी दबाव के सत्ता के नियमों का पालन करने लगता है। फूको इसे ही ‘आंतरिकीकरण’ (Internalization) कहते हैं, जहाँ सत्ता बाहर से पहरा नहीं देती, बल्कि व्यक्ति के दिमाग के भीतर स्थापित हो जाती है।
कविता में “अपनी आत्मा के एक अंश-सा / सौंपती हूँ तुम्हें ये सारे शब्द”—पंक्ति में ‘सौंपना’ केवल काव्यात्मक विनिमय नहीं है, बल्कि ज्ञान और अभिव्यक्ति के हस्तांतरण की एक राजनीतिक क्रिया भी है। फूको ने ‘द आर्कियोलॉजी ऑफ नॉलेज’ (The Archaeology of Knowledge) और ‘डिसिप्लिन एंड पनिश’ (Discipline and Punish) ग्रंथों में प्रतिपादित किया है कि ज्ञान स्वयं सत्ता का उपकरण है जो यह तय करता है कि कौन बोल सकता है और किसकी वाणी को वैधता प्राप्त होगी। इस परिप्रेक्ष्य में ‘शब्द’ केवल आत्म-अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक संघर्षशील स्थल (contested site) हैं। कवयित्री द्वारा शब्दों का ‘सौंपना’ उस प्रक्रिया को उद्घाटित करता है, जहाँ हाशिए की आवाजें अपनी वैधता के लिए किसी ‘दूसरे’—संभवतः सत्ता-संरचना या संवेदनशील श्रोता—पर निर्भर होती हैं।
“जो मुझ तक आए अपनी नश्वरता में”—पंक्ति में शब्दों की नश्वरता वस्तुतः फूको के ‘विमर्श’ (discourse) की अस्थायित्व-धर्मिता को रेखांकित करती है। डिस्कोर्स स्थायी नहीं होते; वे सत्ता-संबंधों के अनुसार बदलते रहते हैं। जो आज कहा जा सकता है, वह कल वर्जित हो सकता है। इस प्रकार यह कविता भाषा के भीतर ही सत्ता की अस्थिरता और नियंत्रण की प्रक्रिया को उजागर करती है। कविता में “शब्दों को अस्त होते हुए” देखने वाली नदी उस ऐतिहासिक चेतना का रूपक बन जाती है, जो यह देखती है कि कैसे कुछ अनुभव, कुछ पीड़ाएँ, समय के साथ अदृश्य कर दी जाती हैं—ठीक वैसे ही जैसे ‘पैनोप्टिक’ व्यवस्था में हाशिए के समुदायों की पीड़ा ‘देखी’ तो जाती है, पर उसे मान्यता नहीं मिलती।
“उस रूखे ज्ञान का मर्मर”—में ‘रूखा ज्ञान’ आधुनिक संस्थागत ज्ञान (institutionalized knowledge) की ओर संकेत करता है, जो संवेदनात्मक जीवन से कटकर केवल अनुशासन और नियंत्रण का साधन बन जाता है। फूको के अनुसार, आधुनिक समाज में ज्ञान तटस्थ नहीं होता; वह ‘नॉर्मल’ और ‘एबनॉर्मल’ (normal/abnormal) के बीच भेद स्थापित करता है और इसी के माध्यम से व्यक्तियों को अनुशासित करता है। कविता में यह ‘रूखापन’ उसी अमानवीयता की ओर इशारा करता है, जहाँ ज्ञान का उद्देश्य समझना नहीं, बल्कि नियंत्रित करना होता है। ‘मर्मर’ इस व्यवस्था के भीतर की हल्की-सी दरार है—एक ऐसी संभावना, जहाँ से प्रतिरोध की ध्वनि उत्पन्न हो सकती है।
कविता का ‘तुम’—जिससे संवाद स्थापित किया गया है—फूको के ‘आंतरिकीकृत निगरानी’ (internalized surveillance) के सिद्धांत के साथ गहरे रूप में जुड़ता है। निवेदन किया जा चुका है कि कैसे ‘पैनोप्टिकॉन’-व्यवस्था में व्यक्ति ख़ुद ही अपने ऊपर निगरानी रखने लगता है और वह बाहरी सत्ता के बिना भी अनुशासित रहता है। “हो एक धूसर रात्रि प्रहरी तुम”—यह पंक्ति इस आंतरिकीकृत प्रहरी की छवि प्रस्तुत करती है। यह प्रहरी कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि स्वयं व्यक्ति के भीतर स्थापित वह चेतना है, जो लगातार स्वयं को देखती, जाँचती और नियंत्रित करती रहती है। ‘धूसर’ विशेषण इस स्थिति की अनिश्चितता और नैतिक अस्पष्टता को रेखांकित करता है—यह न पूरी तरह दमनकारी है, न पूरी तरह मुक्त; यह सत्ता और प्रतिरोध के बीच की एक जटिल स्थिति है।
“जिसका इंतज़ार करती है भोर सदा”—पंक्ति में ‘भोर’ को यदि मुक्ति या परिवर्तन के रूप में देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यह मुक्ति भी निगरानी की संरचना से पूरी तरह बाहर नहीं है। फूको के अनुसार, सत्ता सर्वव्यापी है; वह केवल दमन नहीं करती, बल्कि संभावनाएँ भी निर्मित करती है। इस दृष्टि से ‘भोर’ कोई पूर्ण स्वतंत्रता का क्षण नहीं, बल्कि एक नई सत्ता-संरचना की शुरुआत भी हो सकती है। यही कारण है कि कविता के अंत में “भोर” ‘संपूर्ण कालिमा’ सौंपती है। कहने की ज़रूरत नहीं कि यह एक गहन विडम्बना है, जो यह दर्शाती है कि हर मुक्ति अपने भीतर एक नया नियंत्रण भी समाहित किए रहती है।
‘रात्रि प्रहरी’ कविता का समूचा विन्यास इस तथ्य को रेखांकित करता है कि आधुनिक समाज में निगरानी केवल बाहरी संस्थाओं—जैसे राज्य, पुलिस या मीडिया—तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी चेतना, हमारी भाषा और हमारे आत्मीय संबंधों तक फैली हुई है। कविता में ‘रात्रि प्रहरी’ इस निगरानी-व्यवस्था का एक जटिल प्रतीक बन जाता है—वह न केवल देखता है, बल्कि स्वयं भी देखा जा रहा होता है; वह न केवल नियंत्रित करता है, बल्कि स्वयं भी नियंत्रण के अधीन है। इस प्रकार यह कविता फूको के इस तर्क को जीवंतता के साथ प्रस्तुत करती है कि सत्ता कोई केंद्रीकृत शक्ति नहीं, बल्कि संबंधों का एक जाल (network of relations) है, जो हर स्तर पर कार्य करता है।
वस्तुतः, ‘रात्रि प्रहरी’ कविता उस विडम्बनापूर्ण स्थिति को उजागर करती है, जहाँ मनुष्य अपनी ही निगरानी का उपकरण बन जाता है। वह स्वयं को अभिव्यक्त करने के लिए जिन ‘शब्दों’ का सहारा लेता है, वही शब्द सत्ता के अनुशासन से नियंत्रित होते हैं। वह जिस ‘मुक्ति’ की आकांक्षा करता है, वही मुक्ति एक नए ‘अंधकार’ को जन्म देती है। इस प्रकार कविता आधुनिक निगरानी-समाज (Surveillance Society) की उस जटिल सच्चाई को सामने लाती है, जहाँ देखने और देखे जाने, बोलने और चुप रहने, तथा मुक्ति और नियंत्रण के बीच की सीमाएँ धुँधली हो जाती हैं, और मनुष्य एक ‘धूसर रात्रि प्रहरी’ के रूप में अपने ही अस्तित्व की निगरानी करता रहता है।
सौन्दर्यशास्त्रीय निकष पर सविता सिंह की ‘रात्रि प्रहरी’ कविता को परखते हुए यह स्पष्ट होता है कि इसकी काव्य-संरचना संवेदना, भाषा और अस्तित्व के बीच एक जटिल, बहुस्तरीय अन्तसंबिंध रचती है। यह कविता केवल भावाभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सौन्दर्य के उस अनुभव का निर्माण करती है जिसे अनुभूति और अर्थ के बीच की सतत गतिशीलता में समझा जा सकता है। इस अर्थ में कविता का सौन्दर्य स्थिर नहीं, बल्कि प्रक्रियात्मक (processual) है—वह निरन्तर बनता और विघटित होता रहता है। कविता के प्रारम्भ में “अपनी आत्मा के एक अंश-सा / सौंपती हूँ तुम्हें ये सारे शब्द”—पंक्ति में ‘शब्द’ और ‘आत्मा’ के बीच स्थापित सम्बन्ध सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मार्टिन हाइडेगर ने ‘कविता’ को उस स्थल के रूप में देखा है जहाँ भाषा ‘अस्तित्व का घर’ (house of Being) बनती है। इस परिप्रेक्ष्य में ‘शब्द’ केवल अभिव्यक्ति के साधन नहीं, बल्कि अस्तित्व के उद्घाटन (unconcealment) के माध्यम हैं। कवयित्री का अपने ‘शब्दों’ को ‘सौंपना’ वस्तुतः अपने अस्तित्व के एक अंश को साझा करना है, जो हाइडेगर की शब्दावली में कहें, तो यह एक प्रकार की ‘अलेथिया’ (aletheia) है।
उल्लेखनीय है कि ‘अलेथिया’ (Aletheia) प्राचीन यूनानी दर्शन, विशेषकर मार्टिन हाइडेगर के चिंतन में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण अवधारणा है जिसका अर्थ केवल तथ्यों की जानकारी मात्र नहीं, बल्कि सत्य का अपने परदे को हटाकर सामने आना है। हाइडेगर के अनुसार, सत्य कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे हम पहले से जानते हैं, बल्कि यह ‘छिपे हुए’ से ‘प्रकट’ होने की एक निरंतर प्रक्रिया है। यह अवधारणा बताती है कि जब भी सत्य का कोई एक पक्ष हमारे सामने उजागर होता है, तो उसका कोई न कोई दूसरा पक्ष हमेशा रहस्य या अंधेरे में ओझल रहता है। सविता सिंह की इस कविता के सन्दर्भ में गौर करने की बात यह है कि यहाँ सत्य प्रकट होता है, पर पूर्णतः नहीं; वह आंशिक, अस्थायी और नश्वर है—कवयित्री के शब्दों में “जो मुझ तक आए अपनी नश्वरता में।”
इस नश्वरता का बोध सौन्दर्य के उस रूप की ओर संकेत करता है जिसे इमानुएल कांट ने ‘निष्काम आनन्द’ (disinterested pleasure) के रूप में परिभाषित किया था। यहाँ सौन्दर्य किसी स्थायी सत्य या उपयोगिता से नहीं, बल्कि अनुभव की क्षणभंगुरता से उत्पन्न होता है। कविता में ‘शब्दों का अस्त होना’—सरीखा बिम्ब इस क्षणभंगुरता को तीव्र करता है। सौन्दर्य यहाँ स्थायित्व में नहीं, बल्कि लुप्त होते हुए अर्थों की उस प्रक्रिया में है, जहाँ अनुभव स्वयं को खोते हुए भी एक गहरी संवेदना उत्पन्न करता है। “तुम्हें सौंपती हूँ अपनी सारी विह्वलता / जो उमड़ी मुझमें उस नदी की तरह”—काव्य-पंक्ति में नदी का रूपक सौन्दर्य की प्रवहमानता और अनियतता को रूपायित करता है। ”फीलिंग एंड फॉर्म” पुस्तक की लेखिका सुसान लैंगर के अनुसार, कला ‘भावनाओं के रूप’ (forms of feeling) का निर्माण करती है; वह भावनाओं की प्रतिलिपि नहीं, बल्कि उनकी संरचना का रूपायन है। इस दृष्टि से ‘नदी’ केवल विह्वलता का प्रतीक नहीं, बल्कि उस भावात्मक संरचना का दृश्यात्मक रूप है, जिसमें संवेदना समय और स्मृति के साथ बहती है। ‘शब्दों का तटों पर अस्त होना’ इस प्रवाह के भीतर अर्थ के क्षरण और पुननिर्माण की प्रक्रिया को सूचित करता है—सौन्दर्य यहाँ स्थिर अर्थ में नहीं, बल्कि अर्थ के लगातार बदलते रहने में निहित है।
“उस रूखे ज्ञान का मर्मर”—काव्य-पंक्ति सौन्दर्य और ज्ञान के बीच के तनाव को उद्घाटित करती है। थियोडोर अडोर्नो ने कला को ‘नकारात्मक द्वंद्वावाद’ (negative dialectics) के रूप में देखा है, जहाँ कला सामाजिक यथार्थ के साथ एक आलोचनात्मक दूरी बनाए रखती है। ‘रूखा ज्ञान’ वह यथार्थ है जो जीवन की संवेदना से कटा हुआ है, जबकि ‘मर्मर’ उस यथार्थ के भीतर छिपी हुई संवेदनात्मक सम्भावना है। सविता सिंह की यह कविता पाठक में इस मर्मर को सुनने की क्षमता विकसित करने की आकांक्षी है—जिससे कवयित्री की पवित्र नीयत में अन्तर्निहित विलक्षण सौन्दर्य-बोध का पता चलता है।
याद रहे कि कविता में यह सौन्दर्य किसी समरसता में नहीं, बल्कि विसंगति और विखंडन में निहित है। कविता में ‘तुम’ का संबोधन सौन्दर्यशास्त्रीय रूप से पाठक की सक्रिय भागीदारी को सुनिश्चित करता है। वोल्फगैंग ईजर (Wolfgang Iser) के ‘रीडर-रिस्पॉन्स’ सिद्धांत के अनुसार, पाठ का अर्थ पाठक की सहभागिता से निर्मित होता है। यहाँ ‘तुम’ केवल एक पात्र नहीं, बल्कि वह स्थान है जहाँ पाठक स्वयं को स्थापित करता है। “तुम जानोगे एक दिन”—पंक्ति में निहित भविष्यकालीन उद्घोष पाठक को एक संभावित अनुभव की ओर आमंत्रित करता है। सौन्दर्य यहाँ किसी तैयार अर्थ में नहीं, बल्कि उस प्रत्याशा में है, जो पाठक के भीतर निर्मित होती है।
“हो एक धूसर रात्रि प्रहरी तुम”—में ‘धूसर’ रंग सौन्दर्य के पारंपरिक द्वैत (सफेद/काला, प्रकाश/अंधकार) को भंग करता है। कलात्मक और दार्शनिक दृष्टि से चित्रकला और दृश्य-संवेदना के संदर्भ में ‘धूसर’ (Grey) रंग की भूमिका बहुत गहरी है। पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र अक्सर ‘श्वेत और स्याम’ के बीच बंटा होता है। ‘धूसर’ इन दोनों के बीच का वह क्षेत्र है जिसे ‘मध्यम मार्ग’ या ‘लिमिनैलिटी’ (Liminality) कहा जाता है। यह न तो पूरी तरह रोशनी है और न ही पूरी तरह अंधेरा। चित्रकला में यह मौन को अभिव्यक्त करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है ।
दूसरे शब्दों में चित्रकला में ‘धूसर’ (Grey) को अक्सर ‘तटस्थ’ (Neutral) रंग माना जाता है। यह लाल या नीले रंग की तरह मुखर (Loud) नहीं होता। जहाँ चटख रंग शोर या तीव्र भावना पैदा करते हैं, वहीं ‘धूसर’ आँखों को ठहराव देता है। यह ठहराव ही ‘मौन’ का दृश्य रूप है। जब कोई कलाकार धूसर रंग का उपयोग करता है, तो वह बाहरी दिखावे के बजाय विषय की आंतरिक सघनता और उदासी (Melancholy) को उभारता है। यह वह शून्य है जहाँ से विचार शुरू होते हैं。
सविता सिंह की काव्य-पंक्ति के संदर्भ में, ‘धूसर’ प्रहरी होने का अर्थ है उस स्थिति में होना जहाँ सक्रियता और स्थिरता के बीच एक धुँधली संधि है। यह रंग हाइडेगर के उस ‘अलेथिया’ (सत्य के उद्घाटन) की प्रतीक्षा का रंग है, जो न तो अभी पूरी तरह छिपा है और न ही पूरी तरह प्रकट हुआ है—
ख़ूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं
साफ़ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं।
दाग़ देहलवी
देरिदा के ‘विखंडन’ (deconstruction) सिद्धांत के अनुसार, अर्थ हमेशा द्वैतों के भीतर निर्मित होता है, परन्तु ये द्वैत स्थिर नहीं होते; वे एक-दूसरे में प्रविष्ट होते रहते हैं। ‘धूसर’ इसी प्रविष्टि का प्रतीक है—यह न पूरी तरह अंधकार है, न प्रकाश; यह दोनों के बीच की एक तरल, अस्थिर स्थिति है ।
सौन्दर्य यहाँ इस अस्थिरता में निहित है, जहाँ अर्थ निश्चित नहीं, बल्कि निरन्तर टलता (deferred) रहता है।
कविता का अन्त—“जब वह सौंपेगी तुम्हें / अपनी संपूर्ण कालिमा”—सौन्दर्य के एक गहन विरोधाभासी आयाम को उद्घाटित करता है। अमूमून ‘भोर’ को प्रकाश और उजाले के रूप में देखा जाता है, पर सविता सिंह के इस पाठ में वह ‘कालिमा’ सौंपती है। यह सौन्दर्यशास्त्रीय रूप से ‘उदात्त’ या ‘सबलाइम’ (sublime) की अवधारणा के निकट है, जैसा कि एडमंड बर्क (Edmund Burke) और कांट (Immanuel Kant) ने प्रतिपादित किया है।
प्रसंगवश निवेदन है कि ‘उदात्त’ पर सबसे पहले लॉन्ग़ाइनस (Cassius Longinus) ने अपनी कालजयी पुस्तक ‘ऑन द सबलाइम’ (पेरि इप्सुस) में विस्तार से विचार किया था। लेकिन लॉन्ग़ाइनस, एडमंड बर्क और इमानुएल कांट के ‘उदात्त’ (Sublime) संबंधी विचारों में बुनियादी अंतर उनके दृष्टिकोण और व्याख्या के धरातल पर निहित है। लॉन्ग़ाइनस जहाँ उदात्त को मुख्य रूप से एक साहित्यिक गुण मानते हैं, जिसका लक्ष्य भव्य भाषा और महान विचारों के माध्यम से पाठक को सम्मोहित करना है, वहीं एडमंड बर्क ने इसे मनोविज्ञान से जोड़ते हुए ‘सुंदर’ के विपरीत खड़ा किया ।
बर्क के अनुसार उदात्त का अनुभव विशालता, शक्ति और अंधेरे जैसी उन स्थितियों से होता है जो मन में एक सुरक्षित दूरी से भय और विस्मय (Terror and Awe) का संचार करती हैं। इसके विपरीत, इमानुएल कांट ने इस अवधारणा को और अधिक दार्शनिक गहराई प्रदान करते हुए इसे वस्तु से हटाकर मानवीय चेतना और तर्क शक्ति में स्थापित किया। कांट का मानना था कि उदात्त वह अनुभव है जहाँ प्रकृति की अनंतता या प्रचंड शक्ति के सामने मनुष्य को अपनी शारीरिक तुच्छता का अहसास तो होता है, किंतु साथ ही वह अपनी बौद्धिक और नैतिक श्रेष्ठता को भी पहचान लेता है।
सविता सिंह की ‘रात्रि प्रहरी’ कविता में ‘उदात्त’ वह अनुभव है जहाँ भय, विस्मय और आकर्षण एक साथ उपस्थित होते हैं। ‘भोर की कालिमा’ इसी विस्मयकारी विरोधाभास को रचती है—यह सौन्दर्य को सहज, सुखद अनुभव से आगे ले जाकर एक गहन, जटिल अनुभूति में रूपांतरित करती है। इसलिए ‘रात्रि प्रहरी’ के टेक्स्ट में सौन्दर्य उसकी भाषा, बिम्बों और संरचना में निहित उस जटिलता से उत्पन्न होता है, जहाँ अर्थ स्थिर नहीं, बल्कि निरन्तर बनता-बिगड़ता रहता है। यह कविता पाठक को किसी निश्चित निष्कर्ष तक नहीं पहुँचाती, बल्कि उसे एक ऐसे अनुभव में सम्मिलित करती है, जहाँ वह स्वयं अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है। यहाँ सौन्दर्य किसी वस्तु या भाव में नहीं, बल्कि उस अंतराल (in-between) में है, जहाँ भाषा और मौन, प्रकाश और अंधकार, ज्ञान और संवेदना—एक-दूसरे में विलीन होते हुए भी अलग बने रहते हैं। यही इस कविता का गहनतम सौन्दर्यशास्त्रीय सत्य है।
‘रात्रि प्रहरी’ कविता को मनोविश्लेषणात्मक परिप्रेक्ष्य में पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि इसकी काव्य-संरचना चेतन और अचेतन के बीच की जटिल अंतःक्रियाओं को रूपायित करती है। यह रचना सतह पर जितनी शांत और आत्मीय प्रतीत होती है, उतनी ही गहराई में वह दमन, स्मृति, अभाव और अस्थिर आत्म-चेतना के तनावों से निर्मित है। ‘रात्रि’, ‘प्रहरी’ और ‘सौंपना’—ये तीनों बिम्ब मिलकर उस मनोभूमि का निर्माण करते हैं जहाँ व्यक्तित्व अपने ही भीतर विभाजित, निगरानीग्रस्त और अभिव्यक्ति के लिए संघर्षरत दिखाई देता है। सिग्मंड फ्रायड के अनुसार अचेतन प्रत्यक्ष भाषा में नहीं बोलता; वह स्वप्न, प्रतीक और विस्थापन (displacement) के माध्यम से स्वयं को प्रकट करता है ।
इस दृष्टि से ‘रात्रि’ केवल बाहरी अंधकार नहीं, बल्कि अचेतन का वह क्षेत्र है जहाँ दबे हुए अनुभव, इच्छाएँ और स्मृतियाँ सक्रिय रहती हैं। ‘रात्रि प्रहरी’ इस अचेतन के भीतर स्थापित एक ऐसे निगरानी-तंत्र का रूपक है, जो इन इच्छाओं को पूर्णतः मुक्त नहीं होने देता। यह प्रहरी ‘सुपर-इगो’ (super-ego) की तरह कार्य करता है—एक आंतरिक सत्ता, जो इच्छाओं पर नियंत्रण रखती है, उन्हें अनुशासित करती है और उनके उच्छृंखल प्रस्फुटन को रोकती है। इस प्रकार कविता में उपस्थित ‘प्रहरी’ केवल रक्षक नहीं, बल्कि दमनकारी संरचना का भी सूचक है।
“अपनी आत्मा के एक अंश-सा / सौंपती हूँ तुम्हें ये सारे शब्द”—पंक्ति में ‘सौंपना’ मनोविश्लेषणात्मक अर्थ में एक जटिल क्रिया है। यह केवल साझा करना नहीं, बल्कि एक प्रकार का स्थानांतरण (transference) है, जहाँ ‘मैं’ अपने भीतर संचित अनुभवों और भावनाओं को ‘दूसरे’ पर आरोपित करता है। यह ‘दूसरा’ एक श्रोता, पाठक, प्रिय, या आलोचक भी हो सकता है। फ्रायड की उपचार-प्रक्रिया ((Psychoanalytic Therapy) ) में रोगी अपने अचेतन को विश्लेषक के सामने ‘सौंपता’ है; उसी प्रकार यहाँ कवयित्री अपने ‘शब्दों’ के माध्यम से अपने दमित अनुभवों को बाहर लाने का प्रयास करती हैं ।
गौरतलब है कि फ्रायड की मनोविश्लेषण पद्धति में उपचार की प्रक्रिया (Psychoanalytic Therapy) मुख्य रूप से अचेतन में दबी हुई ग्रंथियों और दमित इच्छाओं को सचेतन धरातल पर लाने का कार्य करती है। इस प्रक्रिया का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष ‘मुक्त साहचर्य’ (Free Association) है, जिसमें रोगी बिना किसी काट-छाँट या संकोच के अपने विचारों के प्रवाह को विश्लेषक के समक्ष प्रस्तुत कर देता है; इसे ही प्रतीकात्मक रूप से अचेतन को ‘सौंपना’ कहा जाता है। जब ये दमित अनुभव शब्दों के माध्यम से बाहर आते हैं, तो व्यक्ति को ‘विरेचन’ (Catharsis) की प्राप्ति होती है, जिससे भावनात्मक एवं मानसिक बोझ कम हो जाता है। साहित्य के संदर्भ में यही प्रक्रिया सृजन का आधार बनती है, जहाँ रचनाकार अपने दबे हुए अनुभवों और जटिल संवेदनाओं को भाषा के माध्यम से व्यक्त करता है।
रचना-प्रक्रिया की दृष्टि से दिलचस्प है कि ‘रात्रि प्रहरी’ कविता खुद ही एक विश्लेषक की भूमिका निभाती है, जिसमें शब्द उन अनुभवों को वहन करते हैं जिन्हें समाज या स्वयं व्यक्ति ने अब तक दबाए रखा था। जिस प्रकार मनोविश्लेषणात्मक उपचार की प्रक्रिया में रोगी अपने सत्य को स्वीकार कर मुक्ति पाता है, उसी प्रकार कवयित्री अपनी रचना प्रक्रिया में आत्म-स्वीकृति और अभिव्यक्ति के माध्यम से एक प्रकार की आंतरिक स्वतंत्रता और भावनात्मक स्पष्टता प्राप्त करती हैं । इसके बावजूद, “जो मुझ तक आए अपनी नश्वरता में”—काव्य-पंक्ति संकेत देती है कि यह अभिव्यक्ति पूर्ण नहीं है; अचेतन कभी पूरी तरह भाषा में अनूदित नहीं हो सकता। कुछ न कुछ सदैव छूट जाता है, दबा रह जाता है।
कविता में “शब्दों का अस्त होना” एक महत्त्वपूर्ण बिम्ब है। यह उस प्रक्रिया का रूपक है, जिसे फ्रायड ‘दमन’ (repression) के रूप में चिह्नित करते हैं। जो अनुभव असह्य या अस्वीकार्य होते हैं, वे चेतन से हटाकर अचेतन में धकेल दिए जाते हैं। ‘रात्रि प्रहरी’ कविता में ‘अस्त होते शब्द’ उसी दमन की प्रक्रिया को दृश्यात्मक रूप देते हैं—वे पूरी तरह नष्ट नहीं होते, बल्कि क्षितिज के उस पार चले जाते हैं, जहाँ से वे फिर कभी किसी अन्य रूप में लौट सकते हैं। विवेच्य रचना की पंक्ति “विह्वलता का नदी की तरह उमड़ना” इस दमित मनोभावनाओं की वापसी (return of the repressed) का संकेत है। दबी हुई भावनाएँ स्थिर नहीं रहतीं; वे कभी न कभी और किसी न किसी रूप में उभरती हैं—अक्सर तीव्र, अनियंत्रित और प्रतीकात्मक।
फ्रायड के सिद्धांतों को संरचनावाद (Structuralism) और भाषाविज्ञान के साथ जोड़कर एक नई व्याख्या प्रदान करने वाले प्रसिद्ध फ्रांसीसी मनोविश्लेषक और दार्शनिक लाकाँ (Jacques Lacan) के सिद्धांत के अनुसार ‘अचेतन की संरचना भाषा की तरह होती है’ (the unconscious is structured like a language)। ‘रात्रि प्रहरी’ के पाठ के परिप्रेक्ष्य में कविता का पूरा तंत्र ‘शब्दों’ की अस्थिरता पर आधारित है । “शब्दों की नश्वरता” केवल भाषा की सीमा नहीं, बल्कि आत्म की अस्थिरता का भी संकेत है। ‘मैं’ स्वयं भाषा के भीतर निर्मित होता है; जब भाषा ही अस्थिर है, तो ‘मैं’ भी स्थिर नहीं रह सकता। यह वही स्थिति है जिसे लाकाँ ‘विखंडित आत्म’ (‘le corps morcelé’ या The fragmented body/”body-in-pieces”) के रूप में देखते हैं—एक ऐसा ‘मैं’ जो कभी पूर्ण नहीं होता, जो हमेशा किसी अभाव (lack) से संचालित होता है।
“तुम जानोगे एक दिन”— पंक्ति में ‘तुम’ को यदि लाकाँ के ‘बिग अदर’ (Big Other) के रूप में पढ़ें, तो यह वह स्थान है जहाँ अर्थ की मान्यता प्राप्त होती है। ‘मैं’ अपने अनुभवों को ‘तुम’ के माध्यम से वैधता देना चाहता है। परन्तु यह वैधता स्थगित है—‘एक दिन’ में टली हुई। यह स्थगन (deferral) लाकाँ के उस विचार से जुड़ता है कि इच्छा कभी पूरी नहीं होती; वह हमेशा किसी और की ओर सरकती रहती है। इस रचना में ‘मुक्ति की उत्कट अभिलाषा’ भी इसी अधूरी इच्छा का रूप है—एक ऐसी चाह, जो पूर्णता की ओर बढ़ती है, पर कभी वहाँ पहुँचती नहीं ।
“हो एक धूसर रात्रि प्रहरी तुम”—यह पंक्ति आत्म के भीतर स्थापित निगरानी-तंत्र की जटिलता को और गहरा करती है। ‘धूसर’ यहाँ द्वैत के विघटन का संकेत है—न पूरी तरह दमन, न पूरी तरह मुक्ति । यह वही मनोवैज्ञानिक स्थिति है जहाँ व्यक्ति स्वयं ही अपने ऊपर निगरानी रखता है; वह अपने भीतर के ‘प्रहरी’ को आंतरिक बना लेता है। यह आंतरिकीकरण फ्रायड के ‘सुपर-इगो’ और लाकाँ के ‘नियम के प्रतीकात्मक क्रम’ (symbolic order) दोनों से जुड़ता है। कविता का अंत—“जब वह सौंपेगी तुम्हें / अपनी संपूर्ण कालिमा”—मनोविश्लेषणात्मक दृष्टि से अत्यन्त गहन है। ‘भोर’ का ‘कालिमा’ सौंपना एक विरोधाभासी बिम्ब है, जो यह दर्शाता है कि प्रकाश (चेतन) भी अपने भीतर अंधकार (अचेतन) को समाहित करता है। यह उस सत्य की ओर संकेत करता है कि दमन कभी पूर्ण नहीं होता; अचेतन की ‘कालिमा’ सदैव चेतन के साथ रहती है। मुक्ति का क्षण भी इस अंधकार से मुक्त नहीं, बल्कि उसी के साथ गठित होता है।
इस प्रकार ‘रात्रि प्रहरी’ कविता मनोविश्लेषणात्मक स्तर पर एक ऐसी संरचना का निर्माण करती है, जहाँ ‘मैं’ अपने ही भीतर विभाजित है—एक भाग जो अनुभव करता है, दूसरा जो उन अनुभवों पर निगरानी रखता है, और तीसरा जो उन्हें भाषा में व्यक्त करने का प्रयास करता है। ‘सौंपना’ इस विभाजन को पाटने का प्रयास है, पर वह कभी पूर्ण नहीं होता। ‘शब्दों का अस्त होना’ और ‘विह्वलता का उमड़ना’—ये दोनों इस असफलता और पुनः प्रयास की चक्रीय प्रक्रिया को व्यक्त करते हैं। अंततः कविता यह दिखाती है कि मनुष्य का आत्म कोई स्थिर इकाई नहीं, बल्कि दमन, स्मृति, भाषा और इच्छा के बीच निरंतर बनता-बिगड़ता एक जटिल मनोवैज्ञानिक परिदृश्य है, जिसमें ‘रात्रि’ और ‘प्रहरी’ एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के भीतर अंतर्निहित हैं।
सविता सिंह की ‘रात्रि प्रहरी’ कविता पर स्त्रीवादी परिप्रेक्ष्य में विचार करना बेहद ज़रूरी है । वजह यह कि बहुतेरे स्त्रीवादी कहे जाने वाले रचनाकारों से भिन्न उनके सृजन में स्त्रीवादी सौंदर्यशास्त्र के तत्त्व अवधारणा (Concept) के बजाय अवबोध (Percept) के रूप में घुले मिले हैं । उनके काव्य-संसार में अवगाहन से यह स्पष्ट होता है कि उनकी भाषा, संरचना और बिम्ब-विधान के माध्यम से स्त्री-अनुभव की एक जटिल दार्शनिक पुनर्संरचना होती है । उनकी ‘रात्रि प्रहरी’ कविता स्त्री-स्वर की उस ऐतिहासिक यात्रा को रूपायित करती है, जिसमें अभिव्यक्ति, मौन, दमन और आत्म-स्वीकृति के बीच निरंतर तनाव बना रहता है। ‘सौंपती हूँ’ की आवृत्ति इस पूरी काव्य-प्रक्रिया का केन्द्रीय बिंदु बन जाती है—यह एक साथ समर्पण का संकेत देती हुई भी, दरअसल अभिव्यक्ति के अधिकार का एक गहन दावा प्रस्तुत करती है । “अपनी आत्मा के एक अंश-सा / सौंपती हूँ तुम्हें ये सारे शब्द”—पंक्ति में ‘सौंपना’ को यदि पारंपरिक पितृसत्तात्मक अर्थ में पढ़ें, तो यह स्त्री के आत्म-त्याग, समर्पण और निष्क्रियता का बोध कराता है; परन्तु सविता सिंह की यह कविता इस अर्थ को उलट देती है। यहाँ ‘सौंपना’ एक सक्रिय कृत्य है—यह अपने अनुभवों को, अपनी संवेदनाओं को, और सबसे महत्त्वपूर्ण, अपनी भाषा को सामने लाने का साहस है। यह वह क्षण है जहाँ स्त्री अपनी चुप्पी को तोड़ती है, भले ही वह उसे ‘सौंपने’ के रूप में ही क्यों न व्यक्त करे। यहाँ भाषा स्त्री के लिए केवल माध्यम नहीं, बल्कि अस्तित्व की पुनर्प्राप्ति का साधन बन जाती है।
विस्तार और विषयांतर का ख़तरा उठाते हुए निवेदन है “सौंपना” क्रिया अपने भीतर केवल एक साधारण संप्रेषण का भाव नहीं रखती, बल्कि यह संबंध, अधिकार, स्वामित्व, विश्वास और सत्ता—इन सभी के सूक्ष्म आयामों को एक साथ समेटे रहती है। इसी कारण जब सविता सिंह की पंक्ति “अपनी आत्मा के एक अंश-सा / सौंपती हूँ तुम्हें ये सारे शब्द” को अगर त्रिलोचन के काव्य-संसार—विशेषतः उनके संग्रह ‘मैं तुम्हें सौंपता हूँ’—के संदर्भ में पढ़ा जाय, तो ‘सौंपने’ की यह क्रिया दो भिन्न काव्य-दृष्टियों में विभाजित होकर सामने आती है, जहाँ पुरुष-दृष्टि और स्त्री-दृष्टि के बीच का अंतर अर्थपूर्ण हो उठता है।
त्रिलोचन लिखते हैं:
फूल मेरे जीवन में आ रहे हैं
सौरभ से दसों दिशाएँ
भरी हुई हैं
मेरा जी विह्वल है
मैं किस से क्या कहूँ
आओ,
अच्छे आए समीर,
ज़रा ठहरो
फूल जो पसंद हों, उतार लो
शाखाएँ, झकझोरो, जिन्हें गिरना हो गिर जाएँ
जाएँ जाएँ
पत्र पुष्प जितने भी चाहो
अभी ले जाओ
जिसे चाहो, उसे दो
लो
जो भी चाहो लो
एक अनुरोध मेरा मान लो
सुरभि हमारी यह
हमें बड़ी प्यारी है
इस को सँभाल कर जहाँ ले जाना
ले जाना
इसे
तुम्हें सौंपता हूँ
त्रिलोचन की इस कविता को ध्यान से देखें तो स्पष्ट होता है कि “तुम्हें सौंपता हूँ” यहाँ केवल अधिकार-भाव या पदानुक्रम से संचालित क्रिया नहीं है। इसके भीतर एक आत्मीय खुलापन, उदारता और एक प्रकार का आत्म-उत्सर्ग भी है। “फूल जो पसंद हों, उतार लो… जिसे चाहो, उसे दो… जो भी चाहो लो”—इन पंक्तियों में ‘मैं’ अपने को सुरक्षित रखकर नहीं, बल्कि अपने अनुभव-संसार को लगभग बिना शर्त उपलब्ध कराते हुए दिखाई देता है। यहाँ एक प्रकार का विकेंद्रण (de-centring) भी है—‘मैं’ अपने केंद्र को ढीला करता है और ‘तुम’ को चयन की स्वतंत्रता देता है। “एक अनुरोध… सुरभि हमारी यह… सँभाल कर”—यह जोड़ इस बात का संकेत है कि यह ‘सौंपना’ पूरी तरह निरपेक्ष नहीं, बल्कि एक नैतिक-संवेदनात्मक जिम्मेदारी के साथ जुड़ा हुआ है। अर्थात त्रिलोचन के यहाँ ‘सौंपना’ अधिकार से अधिक संबंध और परस्पर विश्वास पर आधारित क्रिया है।
फिर भी, इस उदारता के भीतर एक सूक्ष्म संरचना बनी रहती है—‘फूल’, ‘सौरभ’, ‘पत्र-पुष्प’ जैसी वस्तुएँ सौंपने योग्य हैं; वे एक प्रकार से बाह्य, साझा की जा सकने वाली चीज़ें हैं। ‘मैं’ यहाँ अपेक्षाकृत स्थिर है; वह अपने अनुभव-संसार का स्वामी है और उसे वितरित करने की स्थिति में है। इसीलिए उसका सौंपना सहज, प्रवाहमय और लगभग निर्विघ्न है।
सविता सिंह की पंक्ति—“अपनी आत्मा के एक अंश-सा / सौंपती हूँ तुम्हें ये सारे शब्द”—को इस रोशनी में देखें तो अंतर और अधिक स्पष्ट हो जाता है। यहाँ जो ‘सौंपा’ जा रहा है, वह ‘फूल’ या ‘सौरभ’ जैसी बाह्य वस्तु नहीं, बल्कि “आत्मा का अंश” है—अत्यंत भीतरी, नाजुक और असुरक्षित तत्त्व । यह अंतर केवल वस्तु का नहीं, बल्कि अनुभव-स्थिति का है। त्रिलोचन के यहाँ ‘देना’ एक विस्तृत, खुला, लगभग उत्सवधर्मी विनिमय है; सविता सिंह के यहाँ ‘सौंपना’ एक जोखिम भरा, आंशिक और आत्म-उद्घाटन का क्षण है।
त्रिलोचन की कविता में ‘तुम’ को दी जा रही स्वतंत्रता—“जिसे चाहो, उसे दो”—सामाजिक-सांस्कृतिक आत्मविश्वास का संकेत देती है; वहाँ ‘मैं’ को यह आशंका नहीं कि उसकी दी हुई चीज़ का अर्थ विफल हो जाएगा या अस्वीकार कर दिया जाएगा । इसके विपरीत, सविता सिंह के यहाँ “तुम जानोगे एक दिन” जैसी पंक्तियाँ यह दर्शाती हैं कि ‘सौंपना’ तत्काल संप्रेषण नहीं है; वह मान्यता की प्रतीक्षा से जुड़ा हुआ है। वहाँ ‘तुम’ के स्वीकार करने या न करने का प्रश्न खुला रहता है।
इस प्रकार त्रिलोचन की प्रगतिशील काव्य-दृष्टि के बावजूद जीवन के प्रति पुरुष-दृष्टि और स्त्री-दृष्टि का भेद निरस्त होने के बजाय अधिक परिष्कृत रूप में सामने आता है ।दूसरे शब्दों में, त्रिलोचन के यहाँ ‘सौंपना’—अपनी उदारता के बावजूद—एक अपेक्षाकृत स्थिर, आत्मविश्वासी काव्य-स्थिति से उत्पन्न है, जहाँ ‘मैं’ अपने अनुभवों को वितरित करने की क्षमता और अधिकार दोनों रखता है। सविता सिंह के यहाँ वही क्रिया अस्तित्वगत और संवेदनात्मक जोखिम से भरी है, जहाँ ‘मैं’ स्त्री है, जो स्वयं पूरी तरह सुनिश्चित नहीं है और “अंश-सा” ही दे पाती है।
पुरुष-दृष्टि में ‘सौंपना’ जहाँ एक प्रकार का आत्मविश्वासी हस्तांतरण है, वहीं स्त्री-दृष्टि में यह एक जटिल आत्म-उद्घाटन है, जो जोखिम से भरा हुआ है। सविता सिंह की कविता में यह क्रिया एक तरह का साहसिक उद्घाटन है—ऐसा उद्घाटन जिसमें बोलना स्वयं एक चुनौती है। ऐतिहासिक रूप से स्त्री की आवाज़ को या तो दबाया गया है या उसे सीमित रूपों में स्वीकार किया गया है; ऐसे में “सौंपती हूँ” कहना केवल साझा करना नहीं, बल्कि अपने अनुभवों को वैधता देने का प्रयास भी है। यहाँ ‘तुम’ के सामने अपने शब्द रखना एक प्रकार का परीक्षण भी है—क्या ये शब्द सुने जाएँगे? क्या इन्हें स्वीकार किया जाएगा?
त्रिलोचन के यहाँ ‘मैं’ और ‘तुम’ के बीच का संबंध अपेक्षाकृत संतुलित और आश्वस्त है; वहाँ संवाद में एक नैतिक दृढ़ता है। सविता सिंह के यहाँ यही संबंध असंतुलित और प्रश्नांकित है। “तुम जानोगे एक दिन”—यह पंक्ति इस असंतुलन को और स्पष्ट करती है, जहाँ ‘तुम’ के जानने की संभावना भविष्य में टली हुई है। स्त्री-स्वर को तत्काल मान्यता नहीं मिलती; उसे प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इस प्रकार ‘सौंपना’ यहाँ केवल वर्तमान का कृत्य नहीं, बल्कि भविष्य में स्वीकृति की आशा से जुड़ा हुआ एक स्थगित संवाद है।
भाषिक स्तर पर भी यह अंतर स्पष्ट है। त्रिलोचन की भाषा अपेक्षाकृत सीधी, संवादात्मक और सामाजिक यथार्थ से गहरे जुड़ी हुई है; उसमें शब्दों के प्रति एक भरोसा है कि वे अनुभव को पर्याप्त रूप से वहन कर सकते हैं। सविता सिंह के यहाँ यही भाषा अपनी नश्वरता से ग्रस्त है—“जो मुझ तक आए अपनी नश्वरता में।” यहाँ शब्द स्थायी अर्थ नहीं दे पाते; वे टूटते हैं, बिखरते हैं, और “अस्त” हो जाते हैं। ऐसे में ‘सौंपना’ एक अधूरा, अस्थिर और कभी-कभी विफल कृत्य भी बन जाता है। यह विफलता ही स्त्री-दृष्टि की गहनता को जन्म देती है, क्योंकि वह भाषा की सीमाओं और अनुभव की जटिलताओं को एक साथ उजागर करती है।
इस प्रकार त्रिलोचन और सविता सिंह के यहाँ “सौंपना” एक ही क्रिया होते हुए भी दो भिन्न काव्य-दृष्टियों का प्रतिनिधित्व करता है। एक ओर यह स्थिर, आश्वस्त और नैतिक रूप से संगठित पुरुष-स्वर है, जो अपने अनुभव को एक विश्वसनीय भाषा में साझा करता है; दूसरी ओर यह विखंडित, प्रश्नाकुल और संघर्षशील स्त्री-स्वर है, जो अपने ही अनुभव को भाषा में पकड़ने की प्रक्रिया से गुजरते हुए उसे सामने लाने का जोखिम उठाता है। यहाँ ‘सौंपना’ समर्पण नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व को पुनः अर्जित करने की प्रक्रिया है—एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें बोलना ही प्रतिरोध का रूप ले लेता है।
बावजूद इसके, यह कहा जा सकता है कि दोनों कवियों में अंतर ‘पुरुष बनाम स्त्री’ जैसे कठोर द्विभाजन में नहीं, बल्कि ‘सौंपने’ की मनो-भाषिक अवस्थाओं में निहित है—एक ओर वह स्थिति जहाँ देना एक सहज विस्तार है, और दूसरी ओर वह स्थिति जहाँ देना स्वयं को दाँव पर लगाने जैसा है। यही सूक्ष्म भेद दोनों कविताओं को अलग-अलग कवित्वपूर्ण गांभीर्य प्रदान करता है।
बोउवार की ‘द अदर’ (the Other) की अवधारणा ‘रात्रि प्रहरी’ कविता को समझने में विशेष रूप से सहायक है। उनके अनुसार, पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री को ‘स्व’ (Subject) के रूप में नहीं, बल्कि ‘दूसरे’ (Other) के रूप में परिभाषित किया जाता है—एक ऐसी सत्ता जो स्वयं में पूर्ण नहीं, बल्कि पुरुष के सापेक्ष ही अर्थ ग्रहण करती है। ‘रात्रि प्रहरी’ कविता में उपस्थित ‘तुम’ को यदि इस परिप्रेक्ष्य में देखें, तो वह केवल एक संबोधित व्यक्ति नहीं, बल्कि वह सामाजिक-सांस्कृतिक सत्ता भी है, जिसके समक्ष स्त्री को अपने अनुभवों को वैधता दिलानी होती है। “तुम जानोगे एक दिन”—यह वाक्य इस प्रतीक्षा को उद्घाटित करता है कि ‘दूसरा’ कभी उस अनुभव को स्वीकार करेगा, जिसे अब तक हाशिए पर रखा गया है।
“जो मुझ तक आए अपनी नश्वरता में”—पंक्ति में शब्दों की नश्वरता स्त्री-अनुभव की उस अस्थिरता को भी व्यक्त करती है, जिसे इतिहास और परंपरा ने स्थायित्व नहीं दिया। स्त्री की भाषा को अक्सर ‘अस्थायी’, ‘भावनात्मक’ या ‘गैर-तार्किक’ कहकर हाशिए पर रखा गया है। इस अर्थ में ‘शब्दों का अस्त होना’ केवल भाषा का क्षय नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का संकेत है, जिसमें स्त्री की आवाज बार-बार दबाई या कई बार मिटाई जाती है। बावजूद इसके, “विह्वलता का नदी की तरह उमड़ना” इस बात का प्रमाण है कि यह दमन पूर्ण नहीं है; स्त्री-अनुभव लगातार अपनी अभिव्यक्ति के रास्ते खोजता रहता है।
इस कविता में ‘रात्रि’ का बिम्ब स्त्रीवादी दृष्टि से अत्यन्त अर्थगर्भित है। ‘रात्रि’ यहाँ केवल अंधकार नहीं, बल्कि वह क्षेत्र है जहाँ स्त्री के अनुभवों को छिपाकर रखा गया है—एक ऐसा क्षेत्र जो दृश्य भले न हो, पर अत्यन्त जीवंत है। मिशेल फूको की शब्दावली में कहें, तो ‘प्रहरी’ इस अंधकार के भीतर स्थापित निगरानी-तंत्र (Surveillance Mechanism) का प्रतीक बन जाता है। यह प्रहरी सामाजिक मानदंडों, नैतिक नियमों और पितृसत्तात्मक नियंत्रण के रूप में बाहरी भी हो सकता है और आंतरिक भी, जहाँ स्त्री स्वयं ही अपने व्यवहार, अपनी इच्छाओं और अपनी अभिव्यक्ति पर निगरानी रखने लगती है। इस प्रकार ‘रात्रि प्रहरी’ स्त्री-चेतना के भीतर स्थापित उस ‘आंतरिक सेंसर’ का रूप ले लेता है, जो यह तय करता है कि क्या कहा जा सकता है और क्या नहीं।
“हो एक धूसर रात्रि प्रहरी तुम”—में ‘धूसर’ विशेषण इस निगरानी की जटिलता को और गहरा करता है। यह केवल दमनकारी नहीं है; यह एक ऐसी स्थिति है जहाँ स्त्री स्वयं भी इस निगरानी-प्रक्रिया में सहभागी हो जाती है। यह आंतरिकीकरण स्त्रीवादी सिद्धांतों में एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा है—जहाँ सत्ता केवल बाहर से थोप दी नहीं जाती, बल्कि भीतर समा जाती है। इस प्रकार स्त्री का ‘स्व’ स्वयं ही अपने ‘दूसरे’ (one’s own ‘Other’) में बदलने लगता है; वह अपने ही अनुभवों को संदेह की दृष्टि से देखने लगती है। कविता का अंत—“जब वह सौंपेगी तुम्हें / अपनी संपूर्ण कालिमा”—स्त्रीवादी दृष्टि से एक बेहद गहन और विडम्बनापूर्ण क्षण है। ‘भोर’ का लालिमा के बजाय ‘कालिमा’ सौंपना इस बात की ओर संकेत करता है कि स्त्री की मुक्ति भी सरल, उज्ज्वल और निर्विवाद नहीं है। उसमें अंधकार, पीड़ा और जटिलता के तत्त्व भी समाहित हैं। यह ‘कालिमा’ उस इतिहास की स्मृति हो सकती है, जिसे स्त्री अपने साथ लेकर चलती है—एक ऐसा कलंकित इतिहास जिसके लिए पितृसत्ता को माफ़ी भले दे जाय,पर जो भुलाया या मिटाया नहीं जा सकता, बल्कि जिसे स्वीकार करना ही स्त्री और पुरुष, दोनों की मुक्ति की बुनियादी शर्त है।
सार्त्र की मूल स्थापना “अस्तित्व सार से पहले है” को आधार बनाकर सविता सिंह की ‘रात्रि प्रहरी’ कविता को अस्तित्ववादी परिप्रेक्ष्य में पुनर्पाठ करने पर स्पष्ट होता है कि यह कविता मनुष्य की उस स्थिति को रूपायित करती है जहाँ वह किसी पूर्वनिर्धारित अर्थ के बिना संसार में उपस्थित है और अपने अस्तित्व को अर्थ देने के लिए स्वयं उत्तरदायी है । यहाँ ‘मैं’ कोई स्थिर, पूर्वनिर्धारित सत्ता नहीं, बल्कि एक निर्माणशील प्रक्रिया है, जो भाषा, स्मृति और अनुभव के माध्यम से स्वयं को गढ़ने की कोशिश करती है। “अपनी आत्मा के एक अंश-सा / सौंपती हूँ तुम्हें ये सारे शब्द”—इस उद्घाटन में ही ‘स्व’ की अपूर्णता और निर्माणशीलता निहित है। अस्तित्ववादी परिप्रेक्ष्य में यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि यदि मनुष्य का ‘सार’ पहले से निश्चित होता, तो वह एक जड़ वस्तु मात्र होता जिसकी नियति पूर्व-निर्धारित होती। इसके विपरीत, यहाँ केवल ‘अंश’ सौंपना यह दर्शाता है कि अस्तित्व कभी भी एक ‘पूर्ण’ या ‘अंतिम’ सत्य के रूप में उपलब्ध नहीं है, बल्कि वह हमेशा एक निरंतर होने वाली प्रक्रिया (Process of becoming) है। यह ‘अंशात्मकता’ इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि आत्म कोई स्थिर इकाई नहीं, बल्कि निरंतर बनने वाली प्रक्रिया है। सार्त्र के अनुसार मनुष्य अपने चुनावों के माध्यम से स्वयं को परिभाषित करता है; इस अर्थ में ‘सौंपना’ भी एक चुनाव है—एक ऐसा कृत्य जिसके माध्यम से ‘मैं’ अपने होने को अर्थ देने का प्रयास करता है।
“जो मुझ तक आए अपनी नश्वरता में”—पंक्ति उस अस्तित्वगत अनित्यता और आकस्मिकता (contingency) को उद्घाटित करती है, जिसे सार्त्र मनुष्य की मूल स्थिति मानते हैं। न शब्द स्थायी हैं, न अनुभव; सब कुछ क्षणभंगुर है। परन्तु यही क्षणभंगुरता मनुष्य की स्वतंत्रता का आधार बनती है—क्योंकि कोई स्थायी सार न होने के कारण वह अपने अर्थ को स्वयं गढ़ सकता है। यह स्वतंत्रता, हालाँकि, सरल नहीं है। यह अपने साथ एक गहरी व्याकुलता भी लाती है, जो कविता में “विह्वलता का नदी की तरह उमड़ना” बनकर सामने आती है। यह विह्वलता उस ज़िम्मेदारी की अनुभूति है, जो मनुष्य को अपने अस्तित्व के अर्थ-निर्माण के लिए उठानी पड़ती है।
“तुम जानोगे एक दिन”—पंक्ति में भविष्य की ओर संकेत करते हुए कविता उस स्थगित अर्थ (deferred meaning) की स्थिति को व्यक्त करती है, जो अस्तित्ववादी अनुभव का केन्द्रीय तत्त्व है। ज्ञान और मुक्ति वर्तमान में उपलब्ध नहीं हैं; वे एक संभावित भविष्य में टले हुए हैं। सार्त्र के लिए मनुष्य एक ‘परियोजना’ (project) है—वह हमेशा अपने वर्तमान से आगे, भविष्य की ओर उन्मुख रहता है। इस दृष्टि से ‘जानना’ कोई अंतिम उपलब्धि नहीं, बल्कि एक निरंतर प्रक्रिया है, जो कभी पूर्ण नहीं होती। “हो एक धूसर रात्रि प्रहरी तुम”—यह पंक्ति अस्तित्ववादी स्थिति का अत्यन्त सघन रूपक है। ‘रात्रि’ उस अंधकार का प्रतीक है, जहाँ कोई निश्चित अर्थ, कोई पूर्वनिर्धारित मार्गदर्शन उपलब्ध नहीं है। ‘प्रहरी’ वह चेतना है, जो इस अंधकार में भी जागती रहती है—जो अर्थ के अभाव के बावजूद अर्थ की खोज को छोड़ती नहीं। ‘धूसर’ विशेषण इस स्थिति की मध्यवर्ती प्रकृति को रेखांकित करता है—यह न पूर्ण अज्ञान है, न पूर्ण ज्ञान; बल्कि एक ऐसी अवस्था है जहाँ मनुष्य लगातार अपने चुनावों के माध्यम से अपने अर्थ का निर्माण कर रहा है। यही वह स्थिति है जिसे सार्त्र ‘स्वतंत्रता का अभिशाप’ (condemned to be free) कहते हैं—मनुष्य स्वतंत्र है, पर इस स्वतंत्रता से वह बच नहीं सकता ।
कविता का अंत—“जब वह सौंपेगी तुम्हें / अपनी संपूर्ण कालिमा”—अस्तित्ववादी विडम्बना को अत्यन्त तीव्र रूप में उद्घाटित करता है। प्राय: ‘भोर’ से प्रकाश और स्पष्टता की अपेक्षा की जाती है, पर यहाँ वह ‘कालिमा’ सौंपती है। यह इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि अर्थ की खोज स्वयं में विरोधाभासी है; जिसे हम स्पष्टता या मुक्ति समझते हैं, वह भी अपने भीतर एक नई जटिलता, एक नया अंधकार लेकर आता है। सार्त्र के शब्दों में कहें, तो कोई अंतिम, पूर्ण सत्य नहीं है; मनुष्य को हर क्षण अपने अर्थ को पुनः गढ़ना पड़ता है। ‘भोर की कालिमा’ इसी अनंत प्रक्रिया का रूपक है—हर प्राप्ति एक नई अपूर्णता को जन्म देती है।
‘रात्रि प्रहरी’ कविता को संरचनावादी तथा उत्तर-संरचनावादी निकष पर परखने पर स्पष्ट होता है कि यह कविता किसी एक स्थिर अर्थ को उद्घाटित करने के बजाय अर्थ-निर्माण की एक जटिल प्रणाली (system) रचती है। यहाँ भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि स्वयं अर्थ का क्षेत्र है। कविता का पूरा तंत्र द्वैतों (binary oppositions) और उनके अंतःसंबंधों पर टिका हुआ है—‘रात्रि/भोर’, ‘कालिमा/प्रकाश’, ‘धूसर/स्पष्टता’, ‘मौन/शब्द’, ‘नश्वरता/अभिलाषा’। संरचनावादी दृष्टि से इन द्वैतों को स्थिर और विरोधी मानकर पढ़ा जा सकता है, जहाँ प्रत्येक पद अपने विपरीत के संदर्भ में अर्थ ग्रहण करता है। उदाहरण के लिए ‘भोर’ का अर्थ ‘रात्रि’ के बिना संभव नहीं; ‘कालिमा’ का बोध ‘प्रकाश’ की अनुपस्थिति में ही होता है। इसी प्रकार ‘धूसर’ इन दोनों के बीच की एक मध्यवर्ती स्थिति है।
उत्तर-संरचनावादी दृष्टि से यह कविता ‘अर्थ के स्थगन’ (deferral of meaning) की प्रक्रिया को भी उद्घाटित करती है। “तुम जानोगे एक दिन”—पंक्ति में ‘एक दिन’ कभी वर्तमान नहीं बनता; वह हमेशा भविष्य में टला रहता है। अर्थ यहाँ किसी निश्चित क्षण में उपलब्ध नहीं, बल्कि लगातार टलता रहता है। इस प्रकार कविता पाठक को किसी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुँचने देती, बल्कि उसे एक निरंतर व्याख्यात्मक प्रक्रिया में संलग्न रखती है। ‘सौंपना’ क्रियापद भी इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण है। संरचनावादी चिंतन के धरातल पर यह एक स्पष्ट क्रिया प्रतीत होती है, जो वस्तुतः ‘मैं’ से ‘तुम’ की ओर अर्थ का हस्तांतरण है। परन्तु उत्तर-संरचनावादी दृष्टि से यह हस्तांतरण कभी पूर्ण नहीं होता। ‘शब्द’ जब ‘सौंपे’ जाते हैं, तो वे अपने साथ अनेक संभावित अर्थ भी लेकर चलते हैं, जो पाठक के साथ नए संबंधों में पुनः निर्मित होते हैं।
उत्तर-औपनिवेशिकता के परिप्रेक्ष्य में गायत्री चक्रवर्ती स्पिवक का प्रसिद्ध प्रश्न—“क्या सबाल्टर्न बोल सकता है?”—‘रात्रि प्रहरी’ कविता का एक केंद्रीय आलोचनात्मक उपकरण बन जाता है। सविता सिंह की इस कविता को इस परिप्रेक्ष्य में पढ़ने पर ‘आवाज’ और ‘चुप्पी’ के बीच का तनाव उसकी केंद्रीय संवेदना के रूप में उभरता है। “अपनी आत्मा के एक अंश-सा / सौंपती हूँ तुम्हें ये सारे शब्द”—में ‘सौंपना’ प्रतिनिधि की एक जटिल राजनीतिक प्रक्रिया का संकेत है। ‘मैं’ अपनी आवाज को सीधे स्थापित नहीं कर पाता; उसे ‘सौंपना’ पड़ता है—किसी ‘तुम’ को, जो संभवतः उस सत्ता-संरचना का प्रतिनिधि है, जिसके माध्यम से ही उसकी आवाज को मान्यता मिल सकती है। “शब्दों का अस्त होना” इस प्रक्रिया का अत्यन्त सशक्त बिम्ब है—यह केवल भाषिक क्षय नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विलोपन (erasure) का संकेत है जिसके माध्यम से हाशिए की आवाजों को लगातार अदृश्य किया जाता है ।
‘रात्रि प्रहरी’ कविता को यदि समकालीन वैश्विक स्त्रीवादी काव्य-दृष्टि के साथ रखकर पढ़ा जाए, तो एड्रिएन रिच की प्रसिद्ध कविता ‘डाइविंग इंटू द रेक’ (Diving into the Wreck) एक अत्यंत सार्थक समानांतर प्रस्तुत करती है। यह कविता भी आत्म-अन्वेषण, स्मृति, भाषा और इतिहास के भीतर दबी हुई आवाज़ों की खोज का एक सघन स्त्रीवादी रूपक है।
‘डाइविंग इंटू द रेक’ कविता के एक अंश का हिंदी रूपांतरण नीचे दिया जा रहा है—
“मैं उतरती हूँ जहाज़ के मलबे में
सिर्फ़ उस कहानी को नहीं खोजने
जो हमें बताई गई थी,
बल्कि उस कहानी को
जो कभी लिखी ही नहीं गई।”
(“I came to explore the wreck.
The words are purposes.
The words are maps.
I came to see the damage that was done
and the treasures that prevail.”)
और आगे—
“मैं वह हूँ—स्त्री भी, पुरुष भी—
जो इस मलबे में उतरती/उतरता है
अपने ही नाम की खोज में।”
(“I am she: I am he
whose drowned face sleeps with open eyes
whose breasts still bear the stress…”)
इन पंक्तियों को सविता सिंह की ‘रात्रि प्रहरी’ कविता के साथ रखकर देखने पर दोनों रचनाओं के बीच एक गहरा संवाद उभरता है, भले ही उनकी काव्य-यात्राएँ अलग-अलग दिशाओं से गुजरती हों।
‘रात्रि प्रहरी’ में “अपनी आत्मा के एक अंश-सा / सौंपती हूँ तुम्हें ये सारे शब्द” के रूप में जो काव्य-प्रक्रिया वर्णित है, वह भीतर से बाहर की ओर जाने वाली है—यानी एक ऐसी चेतना जो अपने अनुभवों, अपनी विह्वलता और अपने ज्ञान की प्रतिध्वनि को किसी ‘तुम’ की ओर प्रेषित करती है। इसके विपरीत, रिच की कविता में गमन बाहर से भीतर की ओर है—वह ‘रेक’ (मलबे) में उतरती है, जो इतिहास, स्मृति और भाषा के उन अवशेषों का प्रतीक है जहाँ स्त्री-अनुभव दबा हुआ है। एक ओर जहाँ सविता सिंह की कविता ‘सौंपने’ की क्रिया से ‘स्व’ का संप्रेषण करती है, वहीं रिच की कविता ‘खोजने’ (explore) की प्रक्रिया से उस ‘स्व’ को पुनः प्राप्त करती है।
दोनों ही कविताओं में भाषा के प्रति गहरा अविश्वास और उसकी अपरिहार्यता एक साथ दिखाई देती है। “जो मुझ तक आए अपनी नश्वरता में” और “शब्दों को अस्त होते हुए” जैसे बिम्ब संकेत करते हैं कि भाषा स्थायी नहीं बल्कि क्षयशील है। रिच भी कहती हैं— “द वर्ड्स आर मैप्स” —अर्थात शब्द मार्गदर्शक तो हैं, पर वे स्वयं लक्ष्य नहीं हैं; वे अधूरे और सीमित हैं। इस प्रकार दोनों कविताएँ भाषा को एक ऐसी संरचना मानती हैं जो अर्थ तक पहुँचने में सहायक तो है, पर उसे पूरी तरह मुट्ठी में करना संभव नहीं है।
इन कविताओं में व्यक्त इस ख़ास मनोदशा के मद्देनज़र याद आ सकते हैं ‘वाक्यपदीयम’ सरीखी कालजयी कृति के रचनाकार भर्तृहरि, जिनके वैराग्यशतक में एक ऐसी आत्मदर्शी चेतना मिलती है, जो संसार, अनुभव और भाषा—तीनों के प्रति गहरे संदेह और अस्थिरता-बोध से भरी हुई है। उदाहरण के लिए उनका एक प्रसिद्ध श्लोक देखा जा सकता है—
नास्त्येव स्थिरता जगत्यनितरां नास्त्येव किञ्चिद् ध्रुवं ।
लोके धावति सर्वमेव सततं तद्भावनाभिर्मिथः।।
(इस संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है; सब कुछ निरंतर परिवर्तनशील है और हमारी धारणाएँ ही उसे अर्थ देती हैं।)
यहाँ जो ‘अनित्यता’ और ‘अस्थिरता’ का बोध है, वह सविता सिंह की “शब्दों की नश्वरता” और रिच की ‘रेक’ (wreck) में बिखरे अवशेषों के अनुभव से एक गहरे स्तर पर जुड़ता है। भाषा और अनुभव—दोनों ही यहाँ पूर्ण नहीं, बल्कि क्षयशील और संदिग्ध हैं।
बहरहाल, ‘रात्रि प्रहरी’ में “विह्वलता का नदी की तरह उमड़ना” और रिच की कविता में ‘रेक’ में उतरना—ये दोनों ही स्त्री-अनुभव की दबी हुई परतों को खोलने के प्रयास हैं। जहाँ सविता सिंह की कविता में यह प्रक्रिया अधिक आत्म-उद्घाटनात्मक है, वहीं रिच के यहाँ यह एक ऐतिहासिक-पुरातात्त्विक अन्वेषण का रूप ले लेती है। एक में अनुभव भीतर से बाहर की ओर फूटता है, तो दूसरे में उसे इतिहास के मलबे के बीच तलाशा जाता है।
इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण अंतर ‘संबोधन’ का है। ‘रात्रि प्रहरी’ में लगातार एक ‘तुम’ की उपस्थिति बनी हुई है—“तुम्हें सौंपती हूँ… तुम जानोगे एक दिन…”—यह ‘तुम’ कोई संभावित श्रोता, साक्षी या सत्ता भी हो सकता है, जिसके समक्ष स्त्री अपनी भाषा को वैधता दिलाने का यत्न करती है। इसके विपरीत, रिच की कविता में ‘तुम’ अनुपस्थित है; वहाँ ‘मैं’ स्वयं अपने अन्वेषण का केंद्र और साधन दोनों है। यह अंतर स्त्रीवादी काव्य-दृष्टि के दो चरणों को भी दर्शाता है—एक जहाँ स्त्री संवाद और मान्यता की आकांक्षा में है, और दूसरा जहाँ वह स्वयं अपने अनुभव की स्वायत्त व्याख्याता बन जाती है।
“हो एक धूसर रात्रि प्रहरी तुम”—इस पंक्ति में जो ‘धूसरता’ है, वह अर्थ की अनिश्चितता और मध्यवर्ती स्थिति को दर्शाती है। रिच की कविता में भी यही धूसरता ‘रेक’ के रूप में मौजूद है—जो न पूरी तरह विनाश है, न पूरी तरह खजाना; बल्कि क्षति और शेष बचे मूल्यों का मिश्रण है। दोनों ही कविताएँ इस द्वैत को स्थिर नहीं रहने देतीं; वे विनाश और मूल्य, अंधकार और अर्थ के बीच की जटिलता को सहजता से स्वीकार करती हैं।
कविता के अंत में “भोर” द्वारा “कालिमा” का सौंपा जाना और रिच की कविता में मलबे के भीतर ‘ट्रेज़र्स’ (खजाने) का मिलना—ये दोनों ही विरोधाभासी स्थितियाँ हैं। वे यह संकेत देती हैं कि स्त्री-अनुभव की मुक्ति कोई सरल या प्रकाशमय उद्घाटन नहीं है, बल्कि यह अंधकार, क्षति और जटिलताओं के बीच से होकर गुजरने वाली एक कठिन प्रक्रिया है।
इस प्रकार ‘डाइविंग इंटू द रेक’ (Diving into the Wreck) और ‘रात्रि प्रहरी’ दोनों ही कविताएँ उस स्त्रीवादी काव्य-चेतना का प्रतिनिधित्व करती हैं जहाँ भाषा, स्मृति और अनुभव के संबंधों को नए सिरे से परिभाषित किया जाता है। एक कविता ‘सौंपने’ के जोखिम में स्वयं को प्रकट करती है, तो दूसरी ‘उतरने’ के जोखिम में स्वयं को खोजती है; पर दोनों का गंतव्य उसी आवाज़ की तलाश है जो इतिहास और सत्ता की परतों के नीचे दबा दी गई थी—और जिसे पुनः जागृत करना ही उनका काव्य-धर्म है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ‘रात्रि प्रहरी’ कविता में एक ऐसी काव्य-भूमि का सृजन संभव हुआ है जहाँ पाठक स्वयं अर्थ-निर्माण की प्रक्रिया का सक्रिय सहभागी बन जाता है और पाठ का अनुभव किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के बजाय एक निरंतर खुलते रहने वाले बौद्धिक क्षितिज में रूपांतरित हो जाता है। यह कविता उस सीमा-रेखा पर स्थित है जहाँ भाषा अपनी विश्वसनीयता खोते हुए भी अपरिहार्य बनी रहती है, और मौन अपनी निष्क्रियता त्यागकर एक सघन, अर्थ-संग्रहणीय उपस्थिति ग्रहण करता है। यहाँ अनुभव किसी एक निश्चित रूप में पकड़ा नहीं जा सकता; वह हर बार पुनः व्याख्यायित होने के लिए बाध्य करता है। दूसरे शब्दों में, ‘रात्रि प्रहरी’ कविता में सविता सिंह ने एक ऐसी काव्यात्मक संरचना का सृजन किया है जो अपने पाठकों को किसी निश्चित वैचारिक ठिकाने पर ले जाने के बजाय उन्हें उस अनिश्चितता में ही ठहरने के लिए प्रेरित करती है, जहाँ अर्थ की संभावनाएँ समाप्त नहीं होतीं, बल्कि निरंतर विस्तृत होती रहती हैं।
सन्दर्भ
- बुनियादी पाठ:
- सिंह,सविता. ‘रात्रि प्रहरी’ (कविता). https://www.hindwi.org/kavita/ratri-prahri-savita-singh-kavita?sort=popularity-desc
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रवि रंजन
जन्म : 1962, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार
शिक्षा : पी-एच.डी.
रूचि के क्षेत्र : भक्तिकाव्य, आधुनिक हिन्दी कविता, आलोचना, साहित्य का समाजशास्त्र,
प्रकाशित कृतियाँ : ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’, ‘सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन,दिल्ली (2011), ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’ (2012),वाणी प्रकाशन, ‘वारसा डायरी’(2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’(2026), वाणी प्रकाशन, दिल्ली
विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में सौ से अधिक आलेख प्रकाशित.
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भागीदारी.
‘वारसा डायरी’ के लिए ‘जयपुर साहित्य सम्मान (2023)
प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय,बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा स्थापित पीठ (चेयर ) पर विजिटिंग प्रोफ़ेसर
प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (सेवा निवृत्त), हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद
ई.मेल. : raviranjan@uohyd.ac.in मो.9000606742
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