सौमित्र की कविताओं को पढ़ते हुए पता नहीं क्यों Innocent Poetry शब्द गूंजता है। यह गूंज अनायास नहीं है। सौमित्र की कविताओं से गुज़रें तो यह एहसास होता है। कवि का सीपी में बैठकर समुद्र की यात्रा का स्वप्न क्या है? यह अबोध स्वप्न सौमित्र की कविता को अभिव्यक्ति की नई ऊष्मा देता है। बहरहाल, सभी कविताएं कवित्त से भरपूर हैं जो काव्य की नई वर्णमाला रचती लग रही हैं। – हरि भटनागर

कविताएँ

जल यात्रा

मैं एक सीपी में बैठ कर
समुद्र यात्रा करना चाहता हूँ।

भीतर छिपे घोंघे के मुलायम कंधे पर सर रख
सो रहना चाहता हूँ देरतक-

उतनी देर जब तक किसी नई बूँद के
छिटके हुए जल से प्लावित मेरी चेतना
मुझे नींद से न उठा दे !

बंद रहूँगा मित्र के साथ-

खाली समय में देखूंगा कैसे बनता है मोती
कौन कारीगर चला आता है ऐसी गुप्त जगह
और अपने हुनर से तराश देता है जलांश !

जब मन करेगा
मैं बाहर निकलकर धूप तापूँगा-

बिना किसी छाया से बाधित अपार धूप
सागर के थल पर फैली

कभी मछलियों को छू आऊंगा नींद में
कभी बहुत गहरे पानी में उतरकर निहारूँगा आदिम वनस्पति और जीव-

मैं फिर लेटा रहूँगा देर तक अपनी सीपी के भीतर
कहते हैं जब हवाएँ उसके भीतर पहुँचती हैं तब
वह छज-छज बजती है!

किसी ऐसी ही हवा के संग मैं उड़कर
बाहर आ जाऊँगा

फिर सोचूँगा –

क्या यह मैं सही में हूँ या फिर
कोई धुन है जो उस सीपी में गोल-गोल घूमी फिर
समुद्र के तल के अनंत संगीत में
अपनी आहटें जोड़ कर लौटी !

मैं समाधिष्ट रहूँगा उस समय में-

फिर किसी जाल में फंस अथवा
उलझ कर शैवाल में किसी
या फिर प्रतापी लहर पर सवार हो
लौटूँगा तट पर

मनुष्यों के पार्थिव लोक में-

निहारा करूँगा उन अस्थियों को जो मेरी सी यात्रा को विसर्जित हो रहीं हैं।

 

शोक सन्देश

एक शोक सन्देश मिला ।

शोक को प्रेरित करता
किसी के हाथ का लिखा हुआ पत्र !
अस्फुट बातें-
टूटे हुए हरफों से विचलते वे शब्द-

शब्द अथवा थोड़ी बहुत पहचान में आने वाली लिपि के कुछ निशान
लिपि जिसमें कुछ तो लिखा जा सके
कभी अच्छा कभी
बहुत ही बेडोल आखरों या
बिलकुल धूमिल से भित्ति चित्रों सा-

एक कागज़ के टुकड़े पर लिखा वैसा सन्देश !

सम्प्रेषित हुआ-
जैसे ही वह सन्देश, मैं दुखी हुआ
कुछ अक्षर मुझे दुखी कर सके
बदल सके वे
मेरी देह के द्रव्यों का संतुलन।

इसी घड़ी में जल तो ज़ाया हुआ
पर फिर भी मैं आश्वस्त हुआ
कि कोई अब तक चैतन्य था, अभी कुछ समय पूर्व ही मृत हुआ है
उसके साथ ज़रूर कोई सहयात्री भी है
जो जानता है कि वह मृत है
फिर महसूस करता है वह उसके खोने की संवेदना-
बाँटना चाहता है दुःख
इसलिए लिख देता है शोक सन्देश ।

अब मैं
उसे ढूंढ़ने जाना चाहता हूँ
जो अभी भी जीवित है इस समय में
और संवेदना का
धरती से आकाश जाता पुल चढ़ रहा है !

मैं उसके साथ चला चलूँगा-
रहूँगा भी उसी के साथ तब तक
जबतक हम दोनों में से कोई एक
शोक सन्देश रचेगा-

पर वह किसी तक पहुंचेगा या नहीं
यह कहना मेरे लिए अभी संभव नहीं है।

 

अलस्सुबह

बिंधी हुई रात्रि
पीत-कुण्डल पहने, अँधेरे में टीस जीती ।

सर्वविस्तृत-
इतनी भी नहीं पर
कि सबकुछ ढाँप ले
पैर निकल आते हैं यहाँ छाँव में
और सिर उधर उजाले में ।

अधूरी निशा देवी है या
अदेवी!

ठंडक और विश्राम
या कालिमा और ठहराव !

कुण्डल हिलते हैं उसके या
पृथ्वी हिलती है तिमिर में भूलकर कोई डग-

जमीन पर आकृतियों की मीनाकारी में
भूलती है वह धूमिल होता अपना दुःख
या उसके कम होने का अहसास बस ।

अवधान का पल
कोमल है।

 

पुनर्गमन

(पुनः अमेरिका)

मैं लौटता हूँ उस जगह
जहाँ अपनी गंध छोड़ आया था
वापिस सिर्फ मैं लौटा था
मेरी गंध वहीं रह गयी थी-

गंध वहां और स्मृतियाँ मेरे पास
मेरी गंध की
अब बिखरी हुई
अस्तित्व को तरसती-

जाने कहाँ-कहाँ छूट गए अपने अवशेषों को
यदा-कदा सर्वत्र सदा
अथवा कहीं-नहीं की नियति को पा बैंठीं
वे दोनों ।

आज जब लौटा हूँ-

तब इस देश की खुशबू ने
उस छूटी हुई गंध की स्मृति ताजा कर दी

अब दोनों फिर से भर गयीं हैं
यहाँ और भीतर
कुछ और वर्षों के लिए।

 

गमनागमन

जब भी मैं तुम्हें देखता हूँ
एक बहुत लम्बे और चौड़े काले पर्दे के सामने
तुम्हें पाता हूँ
यह पर्दा धरती से उठता हुआ आकाश छूता है
और फिर
किन्हीं बादलों में जा ग़ुम हो जाता है ।

उघड़ी हुई हो तुम-

सिमट कर सामने बैठी हो उसके
जब उठ के चलना चाहती हो
तब यह पर्दा जोर-जोर से हिलता है
इसकी खंदकनुमा गहराइयों में हवा
उतरकर बैठती है और तुम्हें समूचा छूकर

वापिस अपने लोक में
चली जाती है।

तुम पीछे खिंच जाती हो।

कभी लगता है कि तुम्हें सर्दी लग रही होगी और
किसी भी क्षण तुम
वह पर्दा एक चादर की तरह ओढ़ लोगी
यह चादर भी इतनी बार लिपटेगी तुमपर
कि तुम बीज सी हो जाओगी और चादर
पृथ्वी की तरह कोई गेंद-

फिर यह अहसास होता है
कि मैं तुम्हें खो रहा हूँ
जैसे जैसे यह चादर तुमपर और परतों में लिपटती है
तुम एक गहरी कब्र में
अंतिम निद्रा को जा रही हो
और
सारी उम्र लगाकर भी मैं तुम्हें
इस चादर की तहों से नहीं निकाल सकूँगा।

पर्दे के फड़फड़ाने को देखता हूँ मैं
जिसकी छाया में अब-तब तुम
मुझे एक मुखर आकृति सी दिखने लगी हो
क्लांत अँधेरे में भी-

हवा का झोंका फिर उन गहराइयों में गया और फिर जैसे परदे को देर तक ठहरा कर लौटा
इस बार जब पर्दा गिरा तब उसने तुम्हें
भूमि से उठाकर
मेरे समीप धकेल दिया
तुम मुझमें मिल गयीं
जैसे किसी प्रबल प्राकृतिक जलप्रताप सी गिरी तुम
नदी की तलहटी में फैली झील पर!

मैं तुम्हें आलिंगन में लिए हूँ अब।

काले पार्श्व में हम रोशनी के बिन्दुओं से दमकते हैं
पर हमपर गिरती रोशनी कहाँ से आ रही है
उसका पता नहीं चल पा रहा है।

 

तिलिस्म

मैं अंतहीन में भागता हूँ
वह खुलता जाता है
मैं भागता रहता हूँ, वह और खुलता जाता है।

ऐसे जैसे समुद्र में तैर रहा होऊँ
साँस भरने को
मुँह बाहर निकालूँ तो
हवा ही समुद्र बन जाये
पानी से उठकर मैं तैरने लगूँ हवा में
और साँस लेने की जग़ह ही न बचे कहीं-

मैं भागते हुए बहता हूँ-
बहते हुए भागता और उड़ता हूँ।

अपनी गति में तलाशता हूँ दृश्य
हवा के विपरीत पानी से अलग
मैं अंतहीन के उस सबसे अंतिम कोने तक
पहुँचना चाहता हूँ
फिर वहां से वापिस मुड़ना।

मैं तुम्हारे साथ खड़ा हूँ
मैं जहाँ भी रहूं वहीँ हूँ
जहाँ तुम हो
और तुम्हारी बात कर रहा हूँ
तुम्हारी बातें और पदचिन्ह मेरे पास की हवा को बोझिल कर देते हैं
मैं थक जाता हूँ खड़े खड़े और बोलते हुए
लगता हैं मैं उजाड़ बयाबान जगह है
जहाँ दूर दूर तक कोई नहीं है
पर मैं किसी सभ में बोल रहा हूँ
मुझे सिर्फ अपने शब्द सुनाई देते हैं
और तुम्हारा चेहरा कौंधता हुआ दिखाई देता है
मैं अकेलेपन और निःशब्दता में डूबने लगता हूँ

मुझे लगता है कि मैं ख़त्म हो रहा हूँ
पर फिर भी
बातें रहा हूँ हूँ तुम्हारे बारे में।

 

भाग्यश्री

मेरे सफ़ेद कुर्ते पर हल्दी का एक छींटा है
मैं कभी किसी ठिठोली में

किसी से बचकर भाग रहा था
तब उसने हल्दी के हाथों से
मेरे कुर्ते पर पीछे से धप्प करना चाहा था

पर मैं भाग निकला और उसके हाथ की हल्दी
भरसक छिटककर भी बस एक छींटा दे पाई
वो पीछे भागी भी थी
पर पीछे छूट गयी थी
मैं आगे भागता रहा और बहुत आगे निकल गया
पर अपने कुर्ते पर वह छींटा ले आया
सालों बाद भी अलमारी में
हैंगर पर स्त्री किया वह कुरता और उस स्त्री का भान
मैं दूल्हा नहीं था उस रोज़, बस यूँहीं खड़ा था वहां
वह स्त्री कौन थी जो मेरे पीछे भागी थी
उसे क्यों लगा कि मुझे रंग दे वह
हाथ उसने अपने पीले कर लिए थे
और मुख मेरा वो पीला करना चाहती थी

वो कौन थी
जितनी बार उसका ख्याल आता है
आँखों के परदे पर छाया दृश्य पीला रंग जाता है।

कदम भी ठिठक कर गच्चा देने को
तत्पर हो जाते हैं।
स्मृति में उसका चेहरा उभरते ही

 

दृश्य

मैं चलते समय हाथ से जैसे धुआँ हटाता हूँ
मुझे आदमी बहुत से
धुएँ में तरंगयायित होकर भटकते
और छिन्न भिन्न होते दिखाई पड़ते हैं।

मैं सोचता हूँ शायद हवा उन्हें विपरीत दिशा में उड़ाकर दूर धकेल दे
ले जाए उतनी दूर और उतना फैलाकर
कि फिर उनका ना अस्तित्व रहे ना धुंध

पर हवा तेज़ बहाकर उन्हें मेरे चेहरे पर थपेड़ों की तरह मारती है।
धुएं के बादल संगठित हो आँखों को चोट दे भीतर जम जाते हैं।
मैं हाथ पैर मारता हूँ हवा में

पर कुछ भी जाता नहीं है दूर

ये धुएं के गुबार
अपने भीतर जिन जिन चेहरों को घोल कर बने थे
वे सब दिखते हैं एक के बाद एक पर गट सट
ऐसे जैसे आदि जल से निर्मित हो रहे हो या घुल रहे रहे हो उसमें उस क्षण
एक चेहरा चिपक जाता है पुतली की सतह पर चुभता और
फिर बहुत पास से दीखता है
फिर खो जाता है

मैं आँखें मलता हूँ
जिनकी ज्योति उत्तरोत्तर कम हो रही है
उनकी सतह पर कब्रगाह की हरी घास और ऊबड़ खाबड़ उधड़ी मिट्टी सा कुछ उभरकर बिंधता है।

 

संबोधन

आवाज़ ऐसी दर्दीली है कि
लगता है जैसे
उनके गले में ही गाँठ है-

जिसके चारों ओर बहता स्वर रुक-रुक के चल रहा है

फिर आ रहा है बाहर
एक व्यग्र आलाप सा-

भीतर स्तन कैंसर सा कुछ है-

दूर तक फैला हुआ
कोशिकाओं की अंतिम कंदराओं तक जाकर
काली राख छोड़कर वापिस आता हुआ।

ऐसी ही न जाने कौन सी गहराई से
खोकर लौटती है आवाज़
तरन्नुम की लहरें
बिंध के तैरती हवा में
फिर धसकतीं-

ऐसे जैसे काँसे की कटोरी
हाथ से छूट गयी हो
और फिर बज रही हो फ़र्श पर-

अंततः शांत होती हुई अंतिम स्पंदन के साथ।

बातों में ध्वनिओं की ऐसी आवृत्ति है
कि कथा को दिल थामे सुनना पड़ता है-

कभी लगता है
शब्द हैं ही नहीं
मात्र अकुलाहट है-

मोह है जो
छूट नहीं पाया
आमंत्रण जो
पूरी पुकार नहीं बन सका है ।

ऐसे बुलावे पर
मैं पास जाता हूँ
फिर समझ नहीं पाता
पास आती हुई आवाज़ या
दूर होता हुआ मौन सा कुछ
क्या है वो !

गला रुँध जाता है

मैं भी शब्द खोता हूँ

पर
राग मुखर है-

ऐसे जैसे इतिहास का कोई बड़ा गवैया
अभी-अभी चुप हुआ है
अब गहरी सांसें ले रहा है

दर्द मुँह की धुंध सा ठंडा
बिखरा हुआ स्वरों के गूंजते अवशेषों के साथ-

मैं एक-एक चिंदी बटोर लेना चाहता हूँ हर ध्वनि
इससे पहले कि सब वाष्प हो जाये।

मैं सुनना चाहता हूँ उन्हें
फिर से मेरा नाम लेते हुए।


सौमित्र

सौमित्र पिछले ढाई दशकों से कविताएं लिख रहे हैं और समकालीन हिंदी कविता की दुनिया में एक प्रमुख व्यक्तित्व के रूप में पहचाने जाते हैं। 200 से अधिक कविताओं और कई कहानियों को उनके नाम पर श्रेय दिया जाता है, और उनमें से कई प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं, संकलनों और समाचार पत्रों में प्रकाशित हुई हैं।

सौमित्र का जन्म उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर मेरठ में हुआ था। भारत से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, सौमित्र केमिकल इंजीनियरिंग में पीएच-डी करने के लिए शिकागो चले गए। सौमित्र ने कविताएँ लिखना जारी रखा और उन्हें भारत भेजा जहाँ उनकी कवितायें नियमित रूप से छपती रहीं।

उनके कई कामों के बीच, सौमित्र का पहला कविता संग्रह, ‘मित्र,’ प्रकाशित हुआ। यह संग्रह समीक्षकों द्वारा प्रशंसित किया गया था, और उन्हें 2008 में, भारत की अग्रणी साहित्यिक फाउंडेशन, भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रतिष्ठित भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार मिला। “मित्र” ने अच्छी प्रशंसा हासिल की और इसे अमेरिकी विश्वविद्यालयों और वाशिंगटन डीसी- में स्थित लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस में शामिल किया गया है। “मित्र” का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रसिद्ध  मीडियाकर्मी और लेखक धीरज सिंह ने किया और जो ‘I like to wash my face with seawater,’ शीर्षक से 2020 में प्रकाशित हुआ है। एक लंबी कविता, ‘एक स्वप्नद्रष्टा का रोमांटिसिज़्म’ रचना समय से 2011 में प्रकाशित हुई थी। इस कविता को ‘समय के साखी’ पत्रिका द्वारा 21 वीं सदी के पहले पंद्रह वर्षों की एक उल्लेखनीय लंबी हिंदी कविता माना गया। धीरज सिंह ने इस लंबी कविता का अनुवाद ‘Dreams of a Psychopath’ के रूप में किया। भारत के सबसे प्रसिद्ध वॉयस-ओवर कलाकार हरीश भिमानी ने सौमित्र की तीन  काव्य पुस्तकों को अपनी आवाज़ दी। दी। प्रकाशन पथ पर कई पुस्तकों में बंगाल की वैष्णव परम्परा की पृष्ठभूमि पर आधारित एक उपन्यास, ‘अमर चित्र,’ शामिल हैं।

स्नातकोत्तर शिक्षा के बाद सौमित्र ने अपना अधिकांश जीवन भारत से बाहर गुजारा। वर्तमान में, वे मध्य-पूर्व एशिया के एक प्रमुख विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक के रूप में काम करते हुए कार्बन फुटप्रिंट में कमी और जलवायु परिवर्तन शमन के क्षेत्र में अनुसंधान कर रहे हैं ।

Email: saumitra.saxena@gmail.com


Discover more from रचना समय

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Categorized in: