मधुसूदन आनंद हिंदी कथा के आठवें दशक के एक महत्त्वपूर्ण नाम हैं। मिन्नी या करौंदे का पेड़ आपकी बहुचचिॅत कहानियां हैं। वैसे भी आपने जो भी कहानियां लिखीं , आकार में छोटी होने के बावजूद विचार में बड़े फलक की कहानियां हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी आपके योगदान को आदर के साथ याद किया जाता है। आप नवभारत टाइम्स और नया ज्ञानोदय के सम्पादक रहे। 18 फरवरी 2026 को आपका देहावसान होना साहित्य और पत्रकारिता की दुनिया की बहुत बड़ी क्षति है। यहां हम सुधांशु गुप्त के सौजन्य से प्राप्त आनंद भाई की एक अप्रकाशित कहानी श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत कर रहे हैं।
– हरि भटनागर
कहानी:
रिश्ते में वे मेरे भाई थे। मेरे पिता के एक दूरे के भाई के बेटे। बचपन में उन्होंने मुझे खिलाया है। मैंने कभी समझा ही नहीं कि वे मेरे सगे भाई नहीं थे। उनका ज्यादातर वक्त हमारे घर ही बीतता था। उनके अपने तीन सगे भाई और एक बहन थी। सभी बड़े-बड़े शहरों में नौकरी करने चले गए थे और साल में एकाध बार अपनी माँ से मिलने आते थे। तब वे भाई भी हमारे घर ही ठहरते थे। क्योंकि उन्होंने बैठक बेचकर शेष घर किराये पर दे दिया था। उनकी बहन की भी अमृतसर के एक परिवार में शादी हो गई थी। वे अपनी माँ और अपने छोटे भाई से मिलने कभी नहीं आईं। पिता की मृत्यु के बाद भी नहीं! मुझे याद नहीं कब ताई जी विधवा हो गईं और वे अपनी माँ के साथ अपने एक बड़े भाई ओम जी के घर लखनऊ चले गए थे। उनकी चिट्ठियां जरूर बचपन में आती रहती थीं और वे मुझे और मेरे छोटे भाई को याद करते थे।
बरसों बाद एक शाम एक रिक्शा हमारे घर के बाहर आया और उसमें से वे उतरे। रिक्शेवाले को उन्होंने एक बड़ा नोट (शायद दस का) किराए के लिए दिया। वे उसमें से किराए की अठन्नी काटकर रिक्शेवाले से बाकी पैसे माँग रहे थे। रिक्शावाला किराए के पैसे 12 आने चाहता था क्योंकि उसका कहना था कि टीन का सन्दूक काफी वजनी है। काफी देरतक दोनों के बीच झैं-झैं होती रही। आखिर बात दस आने पर जाकर टिकी। पर रिक्शेवाले के पास भी एक रुपए से कम का कोई सिक्का नहीं था। उसने दस का नोट भुनाने की कोशिश की मगर खोमचेवालों से भी यह नोट नहीं भुना।
मैंने बाहर की आवाजें सुनीं तो उत्सुकता में बाहर आ गया। वे बोले ‘बब्बू जी मैं राजा हूं। रिक्शेवाले को दस आने दे दो।’ मैं झट भागकर अन्दर गया और मैंने रिक्शेवाले को पैसे दे दिये। रिक्शेवाले ने लगभग बड़बड़ाते हुए सन्दूक को सहारा दिया और राजा भाई साहब ने आहिस्ता से सन्दूक आँगन में टिका दिया। राजा भाई साहब वहीं आँगनमें बिछी खाट पर बैठ गए। अम्मा ने उन्हें पानी का गिलास दिया। भाई साहब तीन-चार गिलास फटाफट गटक गए। गर्मियों के दिन थे। उनका पसीना टपक रहा था। कमीज तो सारी भीगी ही पड़ी थी। अम्मा उन्हें पँखा झलने लगीं। चाय उन्होंने चूल्हे पर चढ़ा दी और मुझे बिस्कुट नमकीन खरीदने के लिए बाजार भेज दिया।
मैं सामान लेकर लौटा तो पता चला कि पिताजी भी घर आ गए हैं। राजा भाई साहब यू.पी. बोर्ड से हाई स्कूल की परीक्षा पास करके मेरठ में विमान संचार ऑपरेटर का कोर्स करने आए थे। उन्होंने हिसाब लगाया तो पता चला कि कोर्स में दाखिला तो मिल जाएगा मगर कोर्स के दौरान महीने भर का खर्चा चलाने के लिए पूरा इन्तज़ाम नहीं है। पिताजी ने उन्हें पूरी आस बंधाई कि उनके मकान का हर महीना मिलने वाला किराया वे निश्चित ही वसूल करके उन्हें समय पर मनीऑर्डर द्वारा भेज दिया करेंगे। उनके तीनों भाइयों को उन्होंने पत्र लिखे कि हर महीने दस पन्द्रह या जो भी बन पड़े तो उन्हें सीधे भेज दिया करो तो यह राजा भी रेडियो- ऑपरेटर बन जाएगा। तो संक्षेप में हुआ यह कि राजा भाई साहब को मेरठ में सम्बन्धित कोर्स में दाखिला मिल गया और मकान के किराए और तीनों भाइयों के आधे-अधूरे सहयोग से उन्होंने रेडियो ऑपरेटर का कोर्स कर ही डाला। कोर्स पूरा करके वे फिर अपनी विधवा माँ के साथ हमारे कस्बे में वापस आ गए। कह-सुनकर किराएदार ने एक कोठरी उनके लिए खाली कर दी और कस्बे में छोटी-मोटी नौकरी करते हुए वे वहीं रहने लगे। मगर रेडियो ऑपरेटर की नौकरियां निकलने का नाम तक नहीं ले रही थीं। भाई साहब अक्सर उदास हो जाते तो पिताजी उन्हें समझाते। आखिर एक दिन उनकी किस्मत खुल गई। उन्हें बाड़मेर में टिड्डियों को भगाने वाले विभाग में रेडियो ऑपरेटर की नौकरी का नियुक्ति पत्र मिल गया। वे खुश हो गए। अपनी माँ को उन्होंने बड़े भाई के पास लखनुऊ भेज दिया। एक लकड़ी की पेटी में अपनी किताबें रखकर वे हमारे घर दे गए। अब आपको कैसे बताऊं कि यह कैसा अनोखा खजाना था!
मैं उन दिनों जासूसी उपन्यास पढ़ता था। ओम प्रकाश शर्मा, कर्नल रंजीत और इब्ने सफी के उपन्यास। हर दिन औसतन एक। इनमें इब्ने सफी मुझे बहुत प्रिय थे। उनके पात्र फरीदी और हमीद या कासिम और इमरान अजब रहस्यमय संसार रचते थे। रहस्य, रोमांच, जासूसी और हास्य से भरपूर उनकी कहानियों के किरदार अमूमन आपको बांधकर रखते थे। उनका जन्म इलाहबाद के पास नोरा नामक कस्बे में हुआ था लेकिन देश के विभाजन के बाद 1952 में वे पाकिस्तान चले गए। इस बीच जासूसी उपन्यासों की दुनिया में उन्होंने काफी प्रतिष्ठा अर्जित की। हिन्दी में जिन दिनों चंद्रकांता संतति की धूम थी, उन्होंने अपने रोचक उपन्यासों से लाखों पाठकों को आकर्षित किया।
कहते हैं कि अगाथा क्रिस्टी जैसी प्रतिष्ठित अन्तर्राष्ट्रीय जासूसी उपन्यासकार ने उनकी तारीफ की थी। उनकी रचनाओँ ने अपनी तरह से पढ़ने का संस्कार मुझे दिया। सैकड़ों उपन्यास उन्होंने लिखे होंगे जिनका जीवन भले ही उनकी तरह अल्पजीवी रहा हो, लेकिन उन्होंने न केवल पाठकों का मनोरंजन किया बल्कि देशप्रेम के लिए जज्बा भी बनाया। बुराई के खिलाफ लड़ाई लड़ाई में वे अच्छाई का पक्ष लेने के लिए जाने गए। इब्ने सफी और अऩ्य जासूसी लेखकों के अलावा उन दिनों आचार्य शास्त्री और गुरुदत्त को भी मैं पढ़ा करता था। प्रेमचंद से उनकी कुछ कहानियों के मार्फत परिचय जरूर हो चुका था मगर पौष्टिक बौद्धिक खुराक के मामले में मैं कुपोषित ही था।
लकड़ी की पेटी खुली तो उसमें प्रेमचंद अपने ‘गोदान’, मोहन राकेश ‘अँधेरे बन्द कमरे’, गेर्की माँ और जैनेन्द्र कुमार जैसे बड़े और महान लेखक झाँकने लगे। राजा रवि वर्मा के चित्रों की पुस्तक देखकर तो मैं दंग ही रह गया। यों ‘कल्याण’ में ‘देवताओं और भगवानों’ के चित्र देखकर मैं विस्मय से भर जाता था, लेकिन राजा रवि वर्मा के काले सफेद चित्र देखकर तो मैं हतप्रभ और अवाक रह गया। क्या अद्भुत चित्र थे! ये सभी मायावी लगते थे लेकिन यह भी लगता था कि कैसे इस जीती जागती दुनिया के राग-विराग से, प्रेम और सौन्दर्य से कोई न कोई हाड़-मांस का अपरिभाषित रिश्ता जरूर है। सिर्फ यही एकमात्र ऐसी पुस्तक थी जिसपर दीमक का हमला हो चुका था और जिसके कुछ पन्ने फट गए थे। मुझे उस फटी हुई पुस्तक से मोह हो गया। एक साफ पुराने कपड़े से रगड़-रगड़कर मैंने उसे पहले तो साफ किया और पुस्तक को धूप में रखकर नष्ट होने से बचाने का मैं उपक्रम करने लगा। एक दिन पिता ने मुझे देख लिया तो कहने लगे ये चित्र कितने ही सुन्दर क्यों न हों मगर ‘दिव्य’ नहीं हैं। तुम्हें गीता प्रेस गोरखपुर का ‘कल्याण’ और उसमें छपे भगवानों के सुन्दर चित्र देखने चाहिए जिससे तुममें सद्गुणों के संस्कार पैदा होंगे। उन्होंने बताया कि सरस्वती पुस्तकालय में कल्याण आता है, उसे पढ़ने की आदत डालो। यह किताब मत देखा करो। गन्दी है। फेंक दो।
मगर ‘कल्याण’ के मुकाबले राजा रवि वर्मा की फटी-पुरानी पुस्तक की तरफ ज्यादा आकर्षित होता रहा और सोचता रहा कि राजा भाई साहब आएं तो उनसे इस अद्भुत पुस्तक और उसके चित्रकार के बारे में पूछूं। लेकिन वर्षों तक ऐसा अवसर मुझे नहीं मिला। एक बार राजा भाई साहब इतना ही बता पाए कि वे केरल के थे और यह पुस्तक उन्होंने पुरानी पुस्तकों के बाजार से खरीदी थी। मैं मन मारकर रह गया।
एक दिन मैं तिलोत्तमा वाला राजा रवि वर्मा का चित्र धूप में बैठा देख रहा था। तिलोत्तमा का सौन्दर्य देखकर मैं मुग्ध था। साड़ी नीचे ढलकी हुई और स्तन खुले हुए। एक हाथ से साड़ी थामे हुए। गले में मोतियों की माला और आभूषण। हाथ में कंगन और चूड़ियां। कानों में कुंडल। खुले बाल। दूसरा हाथ ऊपर को उठा हुआ। कामुक छवि लेकिन सौम्य चेहरा। बेशक कल्याण के चित्रों को देखकर दिव्यता का अनुभव होता था, वैसा अनुभव तो इस पौराणिक चरित्र के चित्र को देखकर न तो होना था और न हुआ। मगर तब भी यह चित्र वासना तो पैदा नहीं ही करता था।
स्तन खुले हैं, यह भाव भी अश्लीलता पैदा नहीं करता था। इसके विपरीत वह सौन्दर्यबोध के एक आयाम से ही साक्षात्कार कराता था। मैं शपथपूर्वक आज भी यह घोषणा करता हूं कि तब इस चित्र ने मुझमें कोई वासना पैदा नहीं की थी। आज सौन्दर्य वासनामय जरूर हो उठा है, लेकिन तब वह निर्दोष था। लेकिन तभी मुझे पिताजी का एक जोरदार चांटा पड़ा और मैं तिलमिलाकर रह गया। हो सकता है जिस वासनामय सौन्दर्य का बोध मुझे आज हो रहा है, उसकी कलुषित छाया पिताजी के नेत्रों पर तब पड़ी हो, लेकिन मैं तब उस क्षण पूरा तरह निर्दोष था। क्या गाय को दूहता देखकर हममें वासना का संचार होने लगता है? मुझे तो तब चिड़ियों के सम्भोग से भी कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई। सब जोर देकर दोहराना चाहता हूं। वह चित्र निश्चय ही सुन्दर था और पहली नजर में सुन्दरता ही सामने आती थी।
दरअसल समय और परिस्थितियों के साथ हमारे देखने का नजरिया-हमारा सौन्दर्य बोध-भी बदल जाता है। नागा साधुओं और दिगम्बर जैन मुनियों को देखकर हम लोग आँख तो नहीं मींच लेते। कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन कोई अनावृत है तो दूसरा उसे देखकर कामग्रस्त हो जाएगा, यह नहीं कहा जा सकता। स्त्री को देखकर भी ऐसा ही होगा यानी वासना जग ही जाएगी-नहीं कहा जा सकता। तब तो कोई माँ, बहन और बेटी घर में भी सुरक्षित नहीं रहेगी। हमारे पारिवारिक जीवन में कभी-कभी स्त्री जाति प्रेम में, मोह में या क्रोध में, हर्ष में या विषाद में या फिर हारी-बीमारी में अनावृत हो जाती है, तब हम ही आगे बढ़कर उसे ढंकते हैं।
मैंने राजा भाई साहब को बताया तो वे मुस्कराने लगे। उन्हें पिता के चरित्र के मामले में एक हल्का सा भेद मिल गया था, जो दिन रात सद्गुणों का और ईश्वर उन्मुख होने का उपदेश झाड़ते रहते थे। और हर साल बच्चे भी पैदा करते रहते थे।
वे बोलेः “बब्बू जी राजा रवि वर्मा ने ऐतिहासिक काम किया है। एक तो उन्होंने भगवानों उऔर देवताओं को सबके लिए सुलभ बना दिया। उन्होंने ‘लक्ष्मी,’ ‘सरवस्ती,’ ‘सीता,’ आदि के चित्र बनाए और लोनावाला मुम्बई में जर्मन प्रैस लगाकर उन चित्रों को छापा। जिन अछूतों को मन्दिर में प्रवेश वर्जित था, उन्होंने राजा रवि वर्मा के पौराणिक या मिथकीय चित्रों में अपने ‘भगवान’ ढूढ़ लिए। भगवान मन्दिर की कैदों से निकलकर पहले दक्षिण भारत में और फिर शेष भारत में पहुँचने लगे। है न ऐतिहासिक योगदान!
” दूसरे हम विंध्याचल के नीचे बसे भारत से बिल्कुल अनजान थे। सभी दक्षिण भारतीय हमारे लिए मद्रासी हुआ करते थे और उनकी स्त्रियां काली कलूटी और थुलथुल। राजा रवि वर्मा ने उन स्त्रियों के मोहक सौन्दर्य से-रूप और लावण्य से हमारा परिचय कराया।
” तीसरे उन्होंने साड़ी को भारतीय स्त्रियों की सामान्य वेश-भूषा के रूप में प्रतिष्ठित किया। उनके और भी कई योगदान हैं। खैर छोड़ो…. ”
मुझे लगा राजा भाई साहब सच कह रहे हैं। उन्होंने अनजाने ही मुझे ‘देखना’ सिखाया। आज वे इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन मैं शायद उन्हीं की आँखों से देख रहा हूं। पिता का दृष्टि दोष तो मैं वर्षों पहले ही पहचान चुका था, जो आज मुझे भी विरासत में मिला है।
मधुसूदन आनन्द
उत्तर प्रदेश के नजीबाबाद में 20दिसम्बर 1952 को जन्म 18फरवरी 2026को राजधानी दिल्ली में मृत्यु। पत्रकारिता में बहुत छोटे स्तर से शुरू करके नवभारत टाइम्स के संपदक रहे। राजेन्द्र माथुर परम्पर के पत्रकार आनन्द ने कहानी की दुनिया में भी अपनी जगह बनाई। उनके पाँच कहानी संग्रह-करौंदे का पेड़, साधारण जीवन,बचपन, थोड़ा सा उजाला और क़ब्रिस्तान में कोयल प्रकाशित हुए। एक कविता संग्रह- पृथ्वी से करें फरमाइश भी छपा। उन्होंने राजेन्द्र माथुर संचयन का संपादन भी किया। अन्तिम समय तक वह भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक और नया ज्ञानोदय के सम्पादक रहे।
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