मलय जैन समकालीन व्यंग्य लेखन के महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं । आप किसी व्यक्ति पर नहीं वरन् उन स्थितियों पर प्रहार करते हैं जो विसंगतियों का मूल हैं। आपके व्यंग्य सीधे- सरल दीखते हैं लेकिन उनकी धार मारक है। इस सरलता के चलते आप परसाई या कहें ज्ञान चतुर्वेदी की पांत में खड़े दीखते हैं।
-हरि भटनागर
व्यंग्य
किस्सा कुछ यूं है कि भोर का वक्त है । मुर्गा बांग देने उठ भी नहीं पाया है कि भक्त चौंक कर उठ बैठा है । उसके माथे पर पसीना और शरीर में कंपन है । उसने अभी-अभी एक भयानक सपना देखा है जिसका लब्बोलुआब यह है कि उसकी ग़लती से दफ्तर में बॉस का तीसरा नेत्र खुल गया है और बॉस टेबल पर चढ़ तांडव कर रहा है । वह टेबल पर रखी फाइलें और पेपरवेट उठा उठा कर मार रहा है । जो पेपरवेट उसने अभी-अभी उठा के मारा है वह सीधा भक्त के माथे पर आकर पड़ा है और तभी घबराकर उठा भक्त पसीना पसीना हो माथा सहला रहा है और टटोल भी रहा है कि जो पेपरवेट आकर पड़ा है , उसका गूमड़ किधर को उठा है।
सपना बुरा है लिहाजा वह बाजू में सोई पत्नी को नहीं सिर्फ भगवान को याद करता है । याद ही नहीं करता , हमेशा की तरह भगवान के पास भागता भी है ।
यों भी भक्त की दिनचर्या देखिए । वह सुबह सकारे उठता है । स्नान के पहले ही भगवान के सामने जा खड़ा होता है । भगवान ड्राइंगरूम के एक कोने में विराजे हैं । विराजे क्या हैं , चिपके हुए हैं । यूं कहिए , चिपकाए हुए हैं । भक्त ने पुराने कैलेंडर में से फाड़कर भगवान की फुल साइज़ फोटो आलमारी के ऊपरी खंड में चिपका रखी है । वैसे ये बात तो उसे बचपन से पता है कि भगवान कोने कोने में हैं । मगर ऑफिशियली एक कोना ज़रूरी है सो घर का यह कोना भगवान का बना रखा है । यहीं वह धूप बत्ती , ऊदबत्ती , फल फूल जलाता चढ़ाता है और संकट निवारण की गुहार लगाता है ।
प्रायः सुबह उठते ही पहली अंगड़ाई के दौरान उसे ध्यान आता है कि आज किस दिस संकट खड़ा होने जा रहा है । वह भगवान के पास भागता है । हे जगबंधु , परमेश्वर , कृपा निधान , संकट मोचक , विध्नहर्ता जैसे तमाम शब्द इसी वक़्त उसके ज़ेहन में आते हैं ।
सुबह के सपने के हिसाब से आज सबसे विकट संकट दफ़्तर में खड़ा दिख रहा है । बॉस तांडव कर रहा है । वह चेहरे पर यथासंभव रिरियाहट के साथ बड़े ही करुणा भाव से बुदबुदाते हुए भगवान से कहता है , हे करुणानिधि , कृपा करो । त्रुटियों को क्षमा करो । आज का दिन बस अच्छे से निबट जाए । स्टाफ के सामने भद्द न पिट जाए ।
भगवान फोटो में मुस्कुराते हैं । भगवान को मुस्कराते देख भक्त आश्वस्त होता है । उसे लगता है मानो भगवान ने तथास्तु टाइप कह दिया हो । कह दिया हो कि वत्स चिंतित न हो , मैं हूँ न । स्नान के बाद वह पुनःभगवान के समक्ष आ खड़ा होता है । बल्कि दफ़्तर जाने से पहले जितनी बार वहाँ से गुजरता है , कनखियों से , सीधी नज़रों से या चोर निगाहों से भगवान की ओर देख मन ही मन हाथ जोड़ता है । हर बार यही बुदबुदाता है कि प्रभु , बचा लेना ।
बॉस के चेंबर में घुसने तक वह भगवान को याद करता है । ‘ हे हरि , राखो लाज मोरी ‘ वह बुदबुदाता है ।
हरि लाज रखते हैं क्योंकि भीतर बॉस को अपनी स्टेनो से ठिठोली करता पाता है । भक्त के प्राण लौटते हैं । बॉस स्टेनो के साथ ज़ारी ठिठोली में उसे भी शामिल करता है । ऐसा होते ही हरि मनमंदिर से आउट हो जाते हैं और छरहरी स्टेनो उसमें दाखिल हो जाती है । नरहरि छवि तज छरहरी छवि वह हृदय में सहेजता है और ‘ हे हरि , राखो लाज मोरी ‘ की जगह ‘ हे लाजो , तुम ही हो प्राण मेरी ‘ गुनगुनाता घर लौटता है ।
आलमारी में विराजे भगवान विचारते हैं , भक्त सीधा उसी के सामने प्रकट होगा । हाथ जोड़ कहेगा , प्रभु तूने लाज रख ली , लेकिन देखता है , भक्त को वक्त नहीं । भक्त के सामने पत्नी है और वह पत्नी के साथ ठिठोली कर लेने को उद्यत है ।
स्टेनो अभी भी हृदय में है भक्त के । सोने से पहले वह ड्राइंगरूम के सोफ़े में धंसता है । फेसबुक पर छरहरि की छवि बार-बार निहारता है । एकाएक उसे स्मरण आता है कि कोने में विराजे नरहरि सब देख रहे हैं । भले ही हमेशा की तरह मुस्कुरा रहे हैं मगर उसे लगता है , वह क्रोध से घूर रहे हैं । लगता है , भगवान के उठे हुए हाथ में शंख नहीं , पेपरवेट है जो वह अभी उसकी खोपड़ी पर मारने वाले हैं । वह ग्लानि से भर जाता है । कानों को सॉरी टाइप हाथ लगाता है और बीच का परदा खींच निष्फिक्र हो जाता है । अब ठीक है । नरहरि गए उस तरफ और छरहरी रह गईं इस तरफ । निश्चिंत हो अब वह स्टेनो की प्रोफ़ाइल में गहरे उतरता है । फोटो पर फोटो । अ… हा .. हा । एक से बढ़ एक पोज़ । आकर्षक । उत्तेजक । बीच में पटल पर बोदे से पति को देख मन खट्टा होता है । कम्बख़्त कैसे उससे चिपकी लिख रही है ‘ फीलिंग फेबुलस ‘ । भक्त के हृदय पटल पर उभरता है ‘ फीलिंग जेलस ‘ । तभी मानस पटल पर मंत्र उभरता है ‘ सार सार को गहि रहे थोथा देय उड़ाय ‘ । वह बोदे पति को थोथा मान उड़ा देता है फिर सार सार स्टेनो को गहरे गहता है ।
अगली सुबह वह उठता है । उसे याद आता है आज परीक्षा की घड़ी है । साल भर के किए धरे का प्रेजेंटेशन है । वह भगवान के सामने खड़ा होता है । रिरियाता है । प्रभु , कैसे भी हो आज बचा लो । प्रेजेंटेशन बस अच्छे से निपट जाए । भगवान मुस्कराते हैं । भक्त निश्चिंत होता है । भगवान की मुस्कुराहट वाली छवि को बचने की सौ फ़ीसदी गारंटी मान वह दफ़्तर रवाना होता है ।
चूंकि भगवान टेक्निकली कोने कोने में हैं लिहाजा उन्हें दफ़्तर के कोने कोने की ख़बर है । यह भी कि भक्त सहज होते ही भगवान को एक ओर उड़ा कर किस कोने का सार आज गहने जा रहा है । सो भक्त के जाने के बाद भी भगवान के चेहरे पर मुस्कान आती है । यों यह ख़ास मुस्कान आती क्यों है , स्वयं भगवान ही जानते हैं । OOO
मलय जैन
*जन्म* 27 फरवरी 1970 को मध्य प्रदेश के सागर में
( मूल भूमि राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त की जन्मस्थली चिरगाँव जिला झाँसी )
*प्रारंभिक प्रकाशन*
किशोर उपन्यास “दीवान गढ़ी का रहस्य ” तथा ” यक्षहरण ” *सुमन सौरभ* में प्रकाशित ।
पराग , सुमन सौरभ , बालभारती आदि में क़रीब तीन दर्ज़न कहानियां प्रकाशित ।
अब व्यंग्य लेखन में सक्रिय
*प्रकाशित कृतियां*
व्यंग्य उपन्यास ‘ ढाक के तीन पात ( 2015 )
व्यंग्य संग्रह हलक़ का दारोग़ा ( 2023 )
राजकमल से प्रकाशित ।
*पत्रिकाओं में प्रकाशन*
नया ज्ञानोदय , हंस , आउटलुक , अहा जिंदगी , व्यंग्य यात्रा , अट्ठहास , बनमाली , हरिगन्धा , समहुत , अनवरत आदि पत्रिकाओं में व्यंग्य प्रकाशित ।
*अनुवाद*
– व्यंग्य नाटक लेखन के साथ पोलिश लेखक वलेरियन डोमिंस्की की अंग्रेज़ी कहानियों एवं व्यंग्य रचनाओं के हिन्दी अनुवाद ।
*सम्मान / पुरस्कार*
•साहित्य अकादमी मप्र से उपन्यास ढाक के तीन पात पर बाल कृष्ण शर्मा नवीन पुरस्कार
• रवींद्रनाथ त्यागी स्मृति सोपान पुरस्कार
• सरदार दिलजीत सिंह रील व्यंग्य सम्मान
• दुष्यंत पांडुलिपि अलंकरण अंतर्गत कमलेश्वर सम्मान
•अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान
•भगवती चरण वर्मा कथारंग पुरस्कार
* ज्ञान चतुर्वेदी राष्ट्रीय व्यंग्य सम्मान 2023
सराहनीय सेवाओं के लिए हाल ही में राष्ट्रपति पदक
मो. 9425465140
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