समकालीन हिंदी कविता में रंजना मिश्र का योगदान उन विरल आवाज़ों में से है, जो शास्त्रीय संगीत की गहन साधना को स्त्री-संवेदना की तरल अभिव्यक्ति से जोड़कर एक नई ‘नाद-भाषा’ की सृष्टि करती हैं। उनकी रागाधारित कविताएँ—‘राग अल्हैया बिलावल’, ‘राग मालकौंस’ और ‘राग गौड़ सारंग’—मात्र संगीत के शाब्दिक चित्रण नहीं हैं, बल्कि वे स्त्री-अस्मिता के उस दार्शनिक और सौंदर्यबोधपूर्ण विमर्श का माध्यम हैं, जहाँ आँसू स्वर बनते हैं, तरलता कठोर तटबंधों को तोड़ती है, और विरेचन मुक्ति की ओर ले जाता है।

प्रोफेसर रवि रंजन का यह आलोचनात्मक आलेख इन कविताओं को बहुस्तरीय प्रकाश में रखता है—जूलिया क्रिस्टेवा की सेमियोटिक ऊर्जा, देरिदा के विखंडनवादी स्थगन, हेलेन सिक्सू की स्त्री-लेखन की तरलता, अभिनवगुप्त के चित्त-द्रुति और नाद-ब्रह्म के दर्शन, तथा टी.एस. एलियट, पॉल सेलान और लोर्का जैसे वैश्विक संगीत-बोध के साथ एक सजीव संवाद स्थापित करते हुए किया गया यह विश्लेषण हिंदी साहित्य में एक दुर्लभ प्रयास है—जो संगीतशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र, उत्तर-आधुनिक आलोचना और स्त्रीवादी चिंतन के मिलन-बिंदु पर खड़ा होकर समकालीन कविता की नई संभावनाओं को न केवल उद्घाटित करता है, बल्कि उन्हें एक वैचारिक और संवेदनात्मक फलक प्रदान करता है।

यह आलेख रंजना मिश्र की मौलिकता को रेखांकित करने के साथ-साथ हिंदी कविता में संगीत और स्त्री-चेतना के उस गूढ़ अंतर्संबंध को भी उजागर करता है, जहाँ शब्द स्वर बनकर बहते हैं, स्वर मौन में विलीन होकर भी गूँजते रहते हैं, और स्त्री की आंतरिक यात्रा ब्रह्मांडीय नाद का एक छोटा-सा, पर अनंत अंश बन जाती है।

‘रचना समय’ का यह अंक इस आलेख को प्रमुखता से प्रस्तुत करते हुए हिंदी साहित्य की उस जीवंत परंपरा का उत्सव मनाता है, जहाँ शब्द स्वर बनकर बहते हैं और स्त्री की आंतरिक यात्रा ब्रह्मांडीय नाद में रूपांतरित हो उठती है। पाठकों को इस गहन चिंतन-यात्रा में सहभागी होने का निमंत्रण है।
—हरि भटनागर 

आलेख – रवि रंजन

रंजना मिश्र समकालीन हिंदी साहित्य की एक ऐसी प्रतिष्ठित कवयित्री हैं, जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत, स्त्रीवादी दृष्टिकोण और सामाजिक-राजनैतिक चेतना के अद्भुत मेल से अपनी एक अलग पहचान बनाई है। वे उन महान रचनाकारों की परंपरा को आगे बढ़ाती हैं, जिन्होंने कविता और संगीत के बीच एक सेतु का निर्माण किया। उनकी लेखनी में जहाँ एक ओर शास्त्रीय रागों और सुरों की गहरी समझ दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर समाज और संस्कृति में हो रहे बदलावों पर पैनी नज़र भी मिलती है। उनका चर्चित कविता संग्रह “पत्थर समय की सीढ़ियाँ” (2022) उनके काव्य-कौशल का जीवंत प्रमाण है। इस संग्रह की छिहत्तर कविताओं में उन्होंने दुःख, स्मृतियों, समय के प्रभाव और ढलती उम्र की स्त्री के अनुभवों को बहुत ही मर्मस्पर्शी ढंग से उकेरा है। रंजना जी की कविताएँ पितृसत्तात्मक बंदिशों और सांस्कृतिक पतन के विरुद्ध प्रतिरोध की आवाज़ उठाती हैं। वे बाज़ारवाद के शोर में कविता की साख को बचाते हुए उसे नैतिक और संवेदनात्मक ताजगी प्रदान करती हैं।
संगीत की सैद्धांतिक और व्यावहारिक बारीकियों का ज्ञान उनकी रचनाओं को एक विशेष दार्शनिक गहराई और लय देता है। इसका सबसे सुंदर उदाहरण पंडित जसराज को समर्पित उनकी सात कड़ियों वाली कविता है, जो संगीत के सात सुरों (सा से नी तक) पर आधारित है। इसमें उन्होंने सुरों के माध्यम से मानवीय संवेदनाओं, पुनर्जन्म और जीवन की नश्वरता को एक आध्यात्मिक विस्तार दिया है।
कविता के अलावा उन्होंने भावपूर्ण संस्मरण, यात्रा वृत्तांत और अनुवादों के जरिए भी अपनी साहित्यिक पहचान बनाई है । उनके गद्य में भी व्यक्तिगत अनुभवों और सामाजिक टिप्पणियों का सुंदर सामंजस्य मिलता है। आज के डिजिटल युग में उनकी रचनाएँ हिंदवी, कविता कोश और हिंदी समय जैसे प्रमुख पोर्टल्स पर व्यापक रूप से उपलब्ध हैं, जिससे दुनिया भर के पाठक और शोधार्थी उनके बहुआयामी लेखन से जुड़ पा रहे हैं।
यह आलेख कवि रंजना मिश्र की संगीतपरक कविताओं का एक अंतःअनुशासनिक (Interdisciplinary) विश्लेषण है। इसमें ‘राग अल्हैया बिलावल’, ‘राग मालकौंस’ और ‘राग गौड़ सारंग’ जैसे शास्त्रीय रागों पर आधारित उनकी तीन विशिष्ट कविताओं की व्याख्या की गई है। साथ ही, इसमें विषयवस्तु की समानता और अंतर्वस्तु की भिन्नता के धरातल पर उनकी एक अन्य कविता ‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ का भी गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
यह यह आलोचनात्मक अध्ययन संगीतशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र और उत्तर-आधुनिक आलोचनात्मक सिद्धांतों के मिलन बिंदु पर स्थित है। यहाँ ‘राग अल्हैया बिलावल’, ‘राग मालकौंस’ या ‘राग गौड़ सारंग’ केवल शास्त्रीय राग के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय विरेचन और स्त्री-अस्मिता की एक तरल अभिव्यक्ति के रूप में विश्लेषित किया गया है। इस विवेचन का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि कैसे संगीत की संरचना शब्दों के अनुशासन को तोड़कर एक नई ‘नाद-भाषा’ निर्मित करती है। आलेख में जूलिया क्रिस्टेवा के ‘सेमियोटिक’ आवेग, देरिदा के ‘विखंडन’ और हेलेन सिक्सू के ‘स्त्री-लेखन’ (Ecriture Féminine) के आलोक में कविता के उन मर्मस्थलों को स्पर्श किया गया है जहाँ ‘आँसू’ और ‘स्वर’ एकाकार हो जाते हैं।
इसके साथ ही, यह आलेख वैश्विक संदर्भों में टी.एस. एलियट, पॉल सेलान और लोर्का जैसे विश्व-कवियों के गहरे संगीत-बोध के मद्देनज़र रंजना मिश्र की कविता की संगीतशास्त्रीयता की चर्चा करते हुए उनकी मौलिकता और विशिष्टता को रेखांकित करता है। उनकी कविताएँ उस ‘धुंधली भोर’ की ओर संकेत करती हैं, जहाँ दुःख की सघनता कला के माध्यम से एक आध्यात्मिक उजास में रूपांतरित होती है।

(एक)

राग अल्हैया बिलावल

भोर का तारा अभी लौटा
एक हल्का पूर्व का आभास सा कुछ
स्वर किलकते हैं
पकड़ते छूटते है भागते
खिलखिलाते लौट आते
पात पीली पर है ठहरा
बूँद सा जीवन
टूट कर बहता हुआ वह स्वर तुम्हारा
फिर बहेगा देर तक और दूर तक
तम के प्रहर तक
-रंजना मिश्र

‘राग अल्हैया बिलावल’ कविता ध्वनि और मौन के बीच का एक जीवंत सेतु है। iइस कविता में राग ‘अल्हैया बिलावल’ के शास्त्रीय स्वरूप को आधार बनाकर कवि ने जीवन के राग-विराग को बड़ी सूक्ष्मता से उकेरा है। कविता का शीर्षक इसके मिजाज को निर्धारित करता है। बिलावल ठाठ का यह राग प्रातःकालीन बेला का है, जिसमें सभी स्वर ‘शुद्ध’ लगते हैं। किंतु अल्हैया में ‘निषाद कोमल’ का ‘अल्प’ प्रयुक्त होता है। रचना समय एवं वातावरण की दृष्टि से भोर का तारा और पूर्व का आभास सीधे राग के गायन समय (प्रथम प्रहर) की ओर संकेत करते हैं। ‘चलन’ और ‘गमक’ के लिहाज से कविता में ‘स्वर किलकते हैं / पकड़ते छूटते हैं भागते’ — काव्यपंक्ति बिलावल की चपलता और इसके ‘वक्र’ चलन को दर्शाता है। संगीत में जब स्वर ‘पकड़’ में आते हैं और फिर ‘छूट’ जाते हैं, तो वह राग की विस्तार प्रक्रिया (आलाप और तान) को प्रतिध्वनित करता है। भाव की दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट होता है कि बिलावल स्फूर्ति और प्रसन्नता का राग है। कविता में ‘खिलखिलाते लौट आते’ राग की इसी सकारात्मक ऊर्जा का परिचायक है।
सौन्दर्यशास्त्र की दृष्टि से यह कविता ‘ध्वनि-बिम्ब’ और ‘दृश्य-बिम्ब’ का अनूठा संगम है। कविता में क्षणभंगुरता का सौंदर्य है। इसमें ‘पात पीली पर है ठहरा / बूँद सा जीवन’ काव्यपंक्ति से गुज़रते हुए लगता है कि यहाँ कवयित्री ने ओस की एक बूँद के माध्यम से जीवन की नश्वरता को पकड़ा है। यह बिम्ब बुद्ध के दर्शन और छायावादी काव्य के ‘आँसू’ की याद दिलाता है। प्रवाह की दृष्टि से स्वर का टूट कर बहना और दूर तक, तम के प्रहर तक जाना एक सांगीतिक निरंतरता को दर्शाते हुए महादेवी वर्मा रचित ‘जाग तुझको दूर जाना’ का स्मरण कराता है। यहाँ प्रकाश (भोर) से अंधकार (तम) तक की यात्रा स्वर के माध्यम से पूरी होती है, जो यह बताती है कि कला समय के बंधनों से ऊपर है।
समाजशास्त्रीय धरातल पर यह कविता कला और कलाकार के संघर्ष और उसकी सामाजिक व्याप्ति को रेखांकित करती है। कविता में अस्तित्व का संघर्ष रूपायित हुआ है। स्वर का ‘भागना’ और ‘लौटना’ कवि के उस रचनात्मक श्रम को व्यंजित करता है जहाँ वह समाज के शोर के बीच अपना एक निजी कोना ढूँढती है। इसमें अंधकार से संघर्ष भी चित्रित है। कविता का अंत तम के प्रहर तक होता है। समाज में व्याप्त जड़ता और अंधकार (अज्ञान/दुख) को केवल कला का ‘बहता हुआ स्वर’ ही चुनौती दे सकता है। यह स्वर यहाँ व्यक्ति की आवाज़ है जो व्यवस्था के अंधेरे में भी गूँजती रहती है।
इस रचना में निहित स्त्री-दृष्टि पर विचार करते हुए देखा जा सकता है कि यहाँ स्त्री-दृष्टि अत्यंत कोमल परंतु दृढ़ है। यह पारंपारिक ‘विद्रोह’ की भाषा के बजाय ‘सृजन’ की भाषा में बात करती है। “राग अल्हैया बिलावल” कविता शास्त्रीयता के अनुशासन और मानवीय संवेदना के उल्लास का मेल है। कवि ने राग के तकनीकी पक्ष को जीवन के दर्शन के साथ ऐसे बुना है कि वह केवल एक गायकी का वर्णन न रहकर, अस्तित्व की पुकार बन गई है। कविता में ‘पात पीली’ और ‘बूँद’ का बिम्ब यह स्पष्ट करता है कि सौंदर्य पूर्णता में नहीं, बल्कि उस क्षणिक संसंस्पर्श में है जो अंततः विराट (अंधकार को चीरने वाले स्वर) में विलीन हो जाता है।
स्त्री का जीवन अक्सर ‘पकड़ते-छूटते’ और ‘खिलखिलाते-लौट आते’ के बीच झूलता है। यहाँ स्वर केवल संगीत नहीं, बल्कि स्त्री की वह दबी हुई अभिव्यक्ति है जो भोर होते ही खिलना चाहती है। संवेदनशीलता और विस्तार की दृष्टि से बूँद सा जीवन होने के बावजूद, वह स्वर देर तक और दूर तक बहने की सामर्थ्य रखता है। यह स्त्री की उस जिजीविषा का प्रतीक है, जो सीमित संसाधनों (पीली पात पर बूँद) में भी असीमित प्रभाव छोड़ने का माद्दा रखती है। कविता में मौन का संगीत विचारणीय है। इसमें एक ठहराव है, जो अक्सर स्त्री के एकांत का हिस्सा होता है। यहाँ ‘तम’ वस्तुत: पितृसत्तात्मक अवरोध है जहाँ तक कवि अपने स्वर को ले जाने का साहस करती है।यह रचनाकार के मूक प्रतिरोध का सांगीतिक रूप है।
इस कविता में ‘पात पीली’ और ‘तम का प्रहर’ केवल दृश्य नहीं हैं, बल्कि ये जीवन के गहरे दर्शन और समय के चक्र को अभिव्यक्त करने वाले सशक्त बिम्ब हैं। ‘पात पीली पर ठहरा बूँद सा जीवन’ –यह बिम्ब कविता का सबसे भावुक और दार्शनिक नाभकीय बिंदु है। यहाँ ‘पीली पात’ और ‘बूँद’ के माध्यम से कवयित्री ने अस्तित्व की क्षणभंगुरता को पकड़ा है। पीला पत्ता जीवन के अंतिम चरण, परिपक्वता या झड़ने की स्थिति का प्रतीक है। संगीत के संदर्भ में देखें तो यह एक ‘ठहराव’ है। राग अल्हैया बिलावल की सुबह की ताजगी के बीच यह ‘पीलापन’ एक अंतर्विरोध पैदा करता है, जो याद दिलाता है कि हर सृजन के पीछे विसर्जन की छाया है। पीली पत्ती पर टिकी ओस की बूँद ज़रा सी हवा या कंपन से गिर सकती है। यह वृद्धावस्था और अवसान का प्रतीक है। कबीर की ‘पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात’ पंक्ति की याद दिलाती यहाँ ‘बूँद सा जीवन’ काव्यपंक्ति कलाकार की उस साधना को दिखाता है जो बहुत कोमल है। इसमें अस्थिरता का सौंदर्य है। यह बिम्ब स्त्री के उस धैर्य को भी दर्शाता है जो जर्जर हो चुकी परंपराओं (पीली पात) के बीच भी अपनी शुचिता और अस्तित्व (बूँद) को बचाए रखने का प्रयास करती है।
‘तम के प्रहर तक’ से गुज़रते हुए महसूस होता है कि कविता भोर (प्रकाश) से शुरू होती है और तम (अंधकार) पर समाप्त। यह यात्रा राग की शास्त्रीय परिधि से निकलकर जीवन की व्यापकता में प्रवेश करती है। कला की अजेयता के रूप में राग अल्हैया बिलावल सुबह का राग है, लेकिन कवयित्री कहती हैं कि उसका स्वर ‘तम के प्रहर तक’ बहेगा। इसका अर्थ है कि सच्ची कला समय की पाबंदियों को तोड़ देती है। जो स्वर सुबह उपजा था, उसकी गूँज रात के गहन अंधकार (कष्ट या मृत्यु) तक साथ निभाती है। संघर्ष और विस्तार के रूप में ‘तम का प्रहर’ समाज की उन विसंगतियों, दुखों और एकांत का प्रतीक है जहाँ प्रकाश नहीं पहुँच पाता। यहाँ स्वर का ‘देर तक और दूर तक’ बहना एक आशावादी दृष्टि है। यह स्त्री के उस स्वर की ओर संकेत है जो सामाजिक रूढ़ियों के अंधेरे के बावजूद अपना मार्ग प्रशस्त करती है। संगीतशास्त्र में हर राग का अपना समय होता है, लेकिन यहाँ ‘तम’ तक पहुँचकर वह राग ‘अनंत’ हो जाता है। यह बिम्ब बताता है कि अंत (अंधेरा) अनिवार्य है, परंतु स्वर (चेतना) उसे भी अपनी लय से भर देने की क्षमता रखता है। रंजना जी ने इन बिम्बों के माध्यम से यह स्थापित किया है कि संगीत केवल कानों के लिए नहीं है, बल्कि वह अंधेरों से लड़ने का एक आत्मिक अस्त्र है।
राग अल्हैया बिलावल के ‘पकड़ते-छूटते और भागते’ स्वरों का विश्लेषण करना वास्तव में संगीत की साधना और जीवन के द्वंद्व के बीच के उस ‘अदृश्य तार’ को छूना है, जिसे कवि ने यहाँ बड़ी कुशलता से पिरोया है। संगीतशास्त्र और जीवन-दर्शन के धरातल पर इसके कुछ प्रमुख आयाम उभरते हैं। सांगीतिक कौशल में ‘वक्र’ चलन और ‘पकड़’ महत्त्वपूर्ण हैं। अल्हैया बिलावल अपनी प्रकृति में सीधा राग नहीं है। इसमें स्वरों का प्रयोग अक्सर ‘वक्र’ तरीके से होता है। कविता में पकड़ना और छूटना महत्त्वपूर्ण है ,क्योंकि जब साधक किसी राग की ‘पकड़’ गाता है, तो वह राग के अस्तित्व को स्थापित करता है। लेकिन कविता में स्वर का ‘छूट जाना’ उस ‘मींड’ या ‘गमक’ की ओर संकेत है जहाँ स्वर ठहरते नहीं, बल्कि एक-दूसरे में विलीन होते हुए फिसल जाते हैं। भागना और लौटना यह राग की ‘तान’ और ‘तिहाई’ का बिम्ब है। गायक स्वर के विस्तार में दूर तक निकल जाता है (भागना), और फिर एक कलात्मक मोड़ लेकर वापस ‘सम’ (मुख्य ताल) पर लौट आता है। कविता में ‘खिलखिलाते हुए लौटना’ राग की आनंदमयी प्रकृति को दर्शाता है।
दार्शनिक स्तर पर ‘पकड़ना और छूटना’ हमारे जीवन के संघर्षों का सटीक रूपक है। पकड़ना हमारी इच्छाएं, रिश्ते और सफलताएँ हैं जिन्हें हम थामना चाहते हैं। छूटना समय की गति है जहाँ चाहकर भी हम कुछ पकड़ कर नहीं रख सकते। सहजता के रूप में कवयित्री यहाँ ‘छूटने’ को दुख की तरह नहीं, बल्कि संगीत की एक ‘लय’ की तरह देखती हैं। जैसे संगीत में स्वर का छूटना अनिवार्य है ताकि अगला स्वर जन्म ले सके, वैसे ही जीवन में भी पुरानी स्थितियों का छूटना नए ‘सृजन’ का मार्ग प्रशस्त करता है। स्त्री-साधना की दृष्टि से देखें तो ‘पकड़ते-छूटते’ स्वर उसकी अपनी पहचान की जद्दोजहद हैं। वह समाज की तय की गई मर्यादाओं और भूमिकाओं को ‘पकड़ती’ है, पर उसका अपना अस्तित्व अक्सर उन पकड़ से ‘भाग’ निकलता है। खिलखिलाते लौट आना स्त्री की उस आंतरिक मुक्ति का प्रतीक है, जहाँ वह अपनी साधना में इतनी मगन है कि दुनिया की पकड़ से छूटने का उसे मलाल नहीं, बल्कि उल्लास है। वह अपनी शर्तों पर अपने केंद्र पर लौटती है।
कविता का यह हिस्सा बताता है कि साधना और तरलता साथ-साथ चलते हैं। स्वर अगर केवल ‘पकड़’ में रहे तो वह जड़ हो जाएगा, और अगर सिर्फ ‘भागता’ रहे तो वह शोर बन जाएगा। जीवन और संगीत की सार्थकता उसी ‘पकड़ने-छूटने’ के बीच के संतुलन में है। स्वर का भागना उसकी स्वाधीनता है, और लौट आना उसकी प्रतिबद्धता। संगीत और कविता के अंतर्संबंधों में ‘स्वर’ और ‘मौन’ का रिश्ता वैसा ही है जैसा देह और प्राण का। इस कविता में स्वर की जो ‘किलकारी’ और ‘भागना’ दिखाई देता है, वह दरअसल उस गहरे मौन की कोख से उपजा है जो ‘भोर के तारे’ के लौटने और ‘पूर्व के आभास’ के बीच व्याप्त है।

संगीतशास्त्र के नज़रिए से देखें तो राग अल्हैया बिलावल की शुद्धता और उसकी चपलता तभी मुखर होती है जब दो स्वरों के बीच का सूक्ष्म अंतराल या ‘विश्राम’ सही जगह पर हो। कविता की पंक्तियों के बीच जो अनकहा खालीपन है, वह उस मौन का प्रतीक है जहाँ साधक अपने भीतर के कोलाहल को शांत कर राग की तैयारी करता है। स्वर यहाँ केवल ध्वनि नहीं, बल्कि उस सन्नाटे का विस्तार है जो रात के बीतने और उजाले के आगमन के संधिकाल में अनुभव होता है। सौन्दर्यशास्त्रीय धरातल पर स्वर का ‘टूटकर बहना’ और ‘मौन’ का गहरा होना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। जब कवयित्री कहती हैं कि स्वर ‘देर तक और दूर तक’ बहेगा, तो वे उस गूँज की बात कर रही हैं जो स्वर के रुक जाने के बाद भी श्रोता के भीतर टिकी रहती है।
यही वह बिंदु है जहाँ संगीत भौतिक सीमा को त्यागकर आध्यात्मिक हो जाता है। मौन यहाँ रिक्तता नहीं, बल्कि उस ‘बूँद’ की तरह सघन है जो पीली पात पर ठहरकर पूरे ब्रह्मांड की शांति को स्वयं में समेटे हुए है। स्वर की गति और भाग-दौड़ बाह्य जगत की हलचल है, जबकि उसका लौट आना उस आंतरिक मौन की शरण में जाना है जहाँ से अभिव्यक्ति की शक्ति मिलती है। स्त्री के दृष्टिकोण से यह स्वर और मौन का संबंध और भी मर्मस्पर्शी हो जाता है। एक स्त्री का जीवन अक्सर गहरे मौन की परतों में लिपटा होता है, जहाँ उसकी आकांक्षाएँ और इच्छाएँ दबी रहती हैं। यहाँ ‘राग अल्हैया बिलावल’ कविता में जब स्वर ‘खिलखिलाते’ हैं, तो वे उस मौन को तोड़कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
यह मौन अब उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी वह ‘पीठ’ है जिस पर चढ़कर स्वर ऊँचाइयाँ छूता है। ‘तम के प्रहर तक’ स्वर का जाना यह संकेत देता है कि स्त्री का स्वर केवल उजाले या अनुकूल परिस्थितियों का मोहताज नहीं है; वह तो उस सघन अंधेरे और मौन को भी अपनी लय से रंजित करने का साहस रखती है जहाँ दुनिया मौन हो जाती है। अंततः, स्वर और मौन का यह द्वैत ही इस कविता को एक मुकम्मल राग बनाता है।
रंजना मिश्र की इस कविता का भाषाई शिल्प राग की बंदिश की तरह ही सुगठित और सधा हुआ है, जहाँ तत्सम और तद्भव शब्दों का चयन केवल अर्थ संप्रेषण के लिए नहीं, बल्कि एक विशेष नाद-सौंदर्य उत्पन्न करने के लिए किया गया है। कविता का आरंभ ‘भोर’, ‘तारा’ और ‘पूर्व’ जैसे तत्सम प्रधान शब्दों से होता है, जो संगीत की शास्त्रीय गरिमा और सुबह की पवित्रता का वातावरण निर्मित करते हैं। ‘आभास’ और ‘प्रहर’ जैसे शब्द कविता को एक दार्शनिक ऊँचाई देते हैं, जिससे पाठक को यह अनुभव होता है कि यहाँ केवल एक राग की चर्चा नहीं हो रही, बल्कि समय के एक विराट फलक की बात की जा रही है। ये शब्द कविता में वह ‘ठहराव’ लेकर आते हैं जो राग बिलावल की प्रकृति के अनुकूल है।
वहीं दूसरी ओर, ‘किलकते’, ‘पकड़ते-छूटते’, ‘भागते’ और ‘खिलखिलाते’ जैसी क्रियाओं में तद्भव और देशज शब्दों की प्रधानता है। यह भाषाई प्रयोग राग की ‘चपलता’ और ‘हरकत’ को जीवंत कर देता है। यहाँ काव्य-भाषा शास्त्रीयता के अनुशासन को तोड़कर लोक की सहजता से जा मिलती है। जैसे एक गायक गंभीर आलाप के बाद तानों की तेज़ और लहरदार गतियों में उतरता है, वैसे ही कवयित्री की भाषा यहाँ अधिक लचीली और ध्वन्यात्मक हो जाती है। ‘किलकते’ शब्द में जो शिशु-सुलभ निश्छलता है, वह राग के आनंदमय पक्ष को उजागर करती है। यह चयन दर्शाता है कि कला जब अपने चरमोत्कर्ष पर होती है, तो वह व्याकरण के भारीपन से मुक्त होकर ‘क्रीड़ा’ बन जाती है ।
प्रसंगवश यहाँ उत्तर-संरचनावादी चिंतक देरिदा (Jacques Derrida) के उस प्रसिद्ध मन्तव्य की याद आती है, जहाँ वे काव्य-सृजन को ‘संकेतों की एक स्वतंत्र क्रीड़ा’ (Free play of signs) कहते हैं। देरिदा के अनुसार, कविता में शब्द किसी एक स्थिर अर्थ से बँधे नहीं होते, बल्कि वे एक अनंत खेल की तरह एक-दूसरे से टकराते और नए अर्थों का सृजन करते हैं। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए रोलां बार्थ (Roland Barthes) ने भी ‘पाठ के आनंद’ की व्याख्या करते हुए उसे ‘भाषा की एक क्रीड़ा’ (A play of language) के रूप में स्वीकारा है, जहाँ व्याकरणिक अनुशासन गौण हो जाता है और सृजन का उल्लास सर्वोपरि।
इस दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो, कवयित्री द्वारा ‘किलकते’ जैसे शब्दों का प्रयोग केवल एक ध्वनि-प्रभाव नहीं है, बल्कि यह उस ‘केंद्र’ को नकारने की प्रक्रिया है जो कविता को केवल अर्थ की गंभीरता में कैद करना चाहता है। जब बार्थ ‘लेखक की मृत्यु’ (The Death of the Author) और ‘पाठक के जन्म’ की बात करते हैं, तो उनका आशय भी इसी भाषाई स्वतंत्रता से होता है जहाँ शब्द अपने कोशगत अर्थों को त्यागकर रसात्मक क्रीड़ा में लीन हो जाते हैं।
यहाँ जिस ‘क्रीड़ा’ की ओर संकेत किया गया है, वह वास्तव में कला की वह अवस्था है जहाँ वह ‘साध्य’ (Product) न रहकर एक ‘प्रक्रिया’ (Process) बन जाती है। यहाँ भाषा केवल विचार का वहन नहीं रह जाती, बल्कि वह स्वयं में एक उत्सव बन जाती है—एक ऐसा खेल, जिसमें व्याकरण की बेड़ियाँ पिघलकर राग की तरलता में विलीन हो जाती हैं। अंततः, काव्य-सृजन का यह आनंद हमें उस चेतना तक ले जाता है जहाँ सृजनकर्ता और सृष्टि के बीच का अंतर मिट जाता है और केवल ‘क्रीड़ा’ शेष रह जाती है।

‘राग अल्हैया बिलावल’ कविता के उत्तरार्ध में ‘पात’, ‘बूँद’ और ‘तम’ जैसे शब्दों का प्रयोग प्रतीकात्मकता को सघन बनाता है। ‘पात’ का तद्भव रूप उस कोमलता और झड़ते हुए जीवन की संवेदना को अधिक आत्मीयता से व्यक्त करता है, जो शायद ‘पत्र’ या ‘पल्लव’ में उतनी गहराई से न उभरती। इसी तरह ‘तम’ का तत्सम प्रयोग अंधेरे की उस सघनता और विस्तार को व्यंजित करता है जिसे पार करना स्वर का लक्ष्य है। अंततः, कविता का भाषाई शिल्प एक ऐसी ‘जुगलबंदी’ की तरह है जहाँ तत्सम शब्दावली राग का आधार तैयार करती है और तद्भव शब्दावली उस पर स्वर-विस्तार की सुंदर मींड और मुरकियाँ सजाती है। यह भाषाई संतुलन ही कविता को बौद्धिक विमर्श और रागात्मक अनुभूति के संगम पर खड़ा करता है। रंजना मिश्र की यह कविता राग ‘अल्हैया बिलावल’ के बहाने वास्तव में जीवन के राग को ही संपूर्णता में परिभाषित करती है। इसका मूल संदेश यह है कि सृजन और अस्तित्व दोनों ही ‘पकड़ने और छूटने’ के एक निरंतर प्रवाह का नाम हैं, जहाँ न तो कुछ स्थायी है और न ही कुछ व्यर्थ।
‘भोर’ से शुरू होकर ‘तम के प्रहर’ तक की काव्य-यात्रा यह रेखांकित करती है कि कला और मनुष्य की जिजीविषा समय की सीमाओं से परे है। जीवन यदि ‘पीली पात’ पर ठहरी हुई एक नश्वर ‘बूँद’ जैसा क्षणभंगुर है, तो वही जीवन अपने ‘स्वर’ के माध्यम से उस अंधकार को भी आलोकित करने की सामर्थ्य रखता है जो शाश्वत प्रतीत होता है। इस कविता का अंतिम स्वर एक गहरी सकारात्मकता और स्त्री-शक्ति की उद्घोषणा है। कविता यह संदेश देती है कि भले ही परिस्थितियाँ प्रतिकूल हों या जीवन का अंत निकट हो, एक सार्थक ‘स्वर’ या कर्म की गूँज देर तक और दूर तक बनी रहती है। राग की शास्त्रीयता यहाँ जीवन के अनुशासन का प्रतीक है, तो स्वरों की ‘खिलखिलाहट’ उस मुक्ति का मार्ग है जो हर बंधन को लाँघकर स्वयं को अभिव्यक्त करना चाहती है।
अंततः, यह कविता मनुष्य को उसके भीतर छिपे उस ‘अनहद’ नाद को पहचानने की प्रेरणा देती है जो मृत्यु की छाया के बीच भी जीवन का उत्सव मनाना जानता है। रंजना मिश्र की इस कविता की तुलना यदि हम आधुनिक हिंदी कविता की शिखर कवयित्री महादेवी वर्मा के गीतों से करें, तो एक अद्भुत साम्य उभरता है। महादेवी जहाँ कहती हैं, “मैं नीर भरी दुख की बदली” या “मिलन का मत नाम ले,मैं विरह में चिर हूँ”, वहाँ वे भी रंजना मिश्र की तरह ही सूक्ष्म बिम्बों के माध्यम से स्त्री के अस्तित्व और उसकी साधना को स्वर देती हैं। महादेवी के यहाँ ‘दीपक’ जलकर मिटने की प्रक्रिया में प्रकाश फैलाता है, जबकि रंजना मिश्र के यहाँ ‘स्वर’ पीली पात पर ठहरी ओस की बूँद की तरह टूटकर भी अपनी गूँज ‘तम के प्रहर’ तक पहुँचाता है। इस प्रकार दोनों ही कवयित्रियाँ ‘क्षणभंगुरता’ में ‘अमरता’ को ढूँढती प्रतीत होती हैं।

समकालीन भारतीय संगीतज्ञों और खासकर गायकों –गायिकाओं के संदर्भ में देखें तो इस कविता का भाव प्रसिद्ध हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका किशोरी अमोनकर के गायन दर्शन के बहुत निकट ठहरता है। किशोरी जी राग को केवल स्वरों का समूह नहीं, बल्कि एक ‘अनुभूति’ मानती थीं। वे अक्सर कहती थीं कि राग का काम साधक को उस पारलौकिक मौन तक ले जाना है जहाँ शब्द समाप्त हो जाते हैं। इस कविता में ‘पकड़ते-छूटते’ स्वरों का जो ‘खिलखिलाकर लौटना’ है, वह किशोरी जी के बिलावल जैसे रागों में प्रयुक्त होने वाली उन सूक्ष्म ‘मुरकियों’ और ‘तैयारी’ की याद दिलाता है जो श्रोता को एक पल के लिए उल्लास से भरती हैं और अगले ही पल एक गंभीर दार्शनिक सोच में छोड़ देती हैं।
इस तुलनात्मक विमर्श का निचोड़ यह है कि चाहे महादेवी वर्मा की ‘बदली’ हो, किशोरी जी का ‘आलाप’ हो या रंजना मिश्र का ‘बिलावल’—इन सबमें अंतर्धारा एक ही है: स्त्री की अपनी निजता और उसकी कलात्मक स्वाधीनता। ये तीनों ही कला रूप यह स्थापित करते हैं कि स्त्री का सृजन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अंधेरे के विरुद्ध एक निरंतर जारी रहने वाला सांगीतिक और साहित्यिक-सांस्कृतिक संघर्ष है। यह तुलना यह भी स्पष्ट करती है कि ‘अल्हैया बिलावल’ यहाँ केवल एक राग का नाम नहीं, बल्कि उस ‘मुक्ति’ के विशेष ‘बोध’ का प्रतीक है जो हर सीमा को पार कर ‘अनंत’ में विलीन होने की तड़प रखता है।

प्रसंगवश कवि यतीन्द्र मिश्र और रंजना मिश्र की संगीत-विषयक कविताओं के बीच तुलना दिलचस्प हो सकती है। वस्तुत: इन दोनों कवियों के बीच तुलनात्मक विमर्श संगीत और साहित्य के अंतर्संबंधों को एक नया विस्तार देता है। यतीन्द्र मिश्र जहाँ संगीत के ‘अनुष्ठान’ और ‘स्मृति’ के कवि हैं, वहीं रंजना मिश्र संगीत के ‘अस्तित्व’ और ‘विखंडन’ की कवयित्री के रूप में उभरती हैं। यतीन्द्र मिश्र की कविताओं में, विशेषकर गिरिजा देवी पर केंद्रित उनकी रचनाओं में, संगीत एक सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक स्मृति की तरह आता है। वे संगीत को बनारस की गलियों, घाटों और वहाँ के विशिष्ट सौंदर्यशास्त्र में बुनते हैं, जहाँ राग एक ‘अनुभव की स्मृति’ बन जाता है। इसके विपरीत, रंजना मिश्र की ‘राग अल्हैया बिलावल’ में राग कोई स्मृति नहीं, बल्कि एक घटित होता हुआ ‘वर्तमान’ है। यहाँ राग के स्वर ‘किलकते और भागते’ हुए एक जीवंत क्रिया के रूप में मौजूद हैं, जो सीधे मनुष्य के अस्तित्ववादी संघर्ष से जुड़ जाते हैं।
यतीन्द्र मिश्र की रचनाओं में संगीत की शास्त्रीय मर्यादा के प्रति एक गहरा आदर और समर्पण भाव है, जहाँ वे गिरिजा देवी के गायन को एक दैवीय आभा प्रदान करते हैं। रंजना मिश्र भी शास्त्रीयता को स्वीकार करती हैं, लेकिन उनका ‘अल्हैया बिलावल’ अनुशासन को तोड़कर ‘भागने’ और ‘खिलखिलाने’ का साहस दिखाता है। जहाँ यतीन्द्र के यहाँ संगीत एक ‘ठहराव’ और ‘श्रद्धा’ है, वहीं रंजना के यहाँ वह एक ‘विमर्श’ और ‘प्रतिरोध’ के रूप में प्रकट होता है। रंजना मिश्र का स्वर पितृसत्तात्मक व्याकरण को विखंडित करने की चेष्टा करता है, जबकि यतीन्द्र उसे संजोने और उसकी भव्यता को स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
बिम्ब विधान की दृष्टि से भी दोनों कवियों में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। यतीन्द्र मिश्र के यहाँ संगीत के बिम्ब अक्सर गंगा के घाटों, चंदन, केवड़े की खुशबू और मंजरियों के इर्द-गिर्द घूमते हैं, जो एक समृद्ध और अलंकृत सौंदर्यशास्त्र का निर्माण करते हैं। रंजना मिश्र के बिम्ब इसके उलट अधिक एकांत, सूक्ष्म और भंगुर हैं, जैसे ‘पीली पात’ और ‘ठहरी हुई बूँद’। यतीन्द्र का संगीत एक ‘विराट परंपरा’ का गौरवशाली हिस्सा है, जबकि रंजना का संगीत एक ऐसी ‘एकांत साधना’ है जो अंधकार के प्रहर से जूझ रही है। यतीन्द्र जहाँ विराट सांस्कृतिक परिवेश को स्वर देते हैं, वहीं रंजना सूक्ष्म के भीतर छिपे सत्य की महत्ता को प्रतिपादित करती हैं।
स्त्री-चेतना के स्तर पर गिरिजा देवी पर लिखते हुए यतीन्द्र मिश्र एक ऐसी स्त्री की छवि गढ़ते हैं जो कला की अधिष्ठात्री है और जिसमें वात्सल्य तथा अधिकार का समन्वय है। रंजना मिश्र की कविता में स्त्री एक ऐसी ‘साधक’ है जो अपनी स्वाधीनता के लिए स्वरों के बीच अपना निजी कोना तलाश रही है। यतीन्द्र के यहाँ स्त्री का स्वर संगीत के इतिहास में ‘स्थापित’ है, जबकि रंजना के यहाँ वह ‘प्रवहमान’ और निरंतर ‘अन्वेषी’ है। रंजना की स्त्री अपनी पकड़ से ‘छूटकर भागने’ में ही अपनी वास्तविक सार्थकता देखती है, जो यतीन्द्र की ‘परंपरा-निष्ठ’ स्त्री-छवि से अधिक आधुनिक और विखंडनवादी है। अंततः, यतीन्द्र मिश्र संगीत को एक सांस्कृतिक उत्सव की तरह देखते हैं, जबकि रंजना मिश्र उसे एक अस्तित्ववादी अस्त्र की तरह प्रयुक्त करती हैं।
यतीन्द्र मिश्र की कविता ‘गिरिजा’ और रंजना मिश्र की ‘राग अल्हैया बिलावल’ का आमने-सामने रखकर किया गया पाठ-मिलान कला के दो अलग ध्रुवों को स्पष्ट करता है। यतीन्द्र मिश्र जब लिखते हैं कि ‘वे जब गाती हैं / तो बनारस के तमाम घाट / उनके कंठ की ओट में चले आते हैं’, तो यहाँ संगीत का विस्तार भौगोलिक और सांस्कृतिक वैभव की ओर है। यहाँ गायिका का व्यक्तित्व इतना विराट है कि वह पूरे शहर की विरासत को अपने भीतर समेट लेता है। इसके उलट, रंजना मिश्र जब कहती हैं कि ‘पात पीली पर है ठहरा / बूँद सा जीवन’, तो यहाँ संगीत का विस्तार किसी बाहरी भूगोल में नहीं, बल्कि जीवन की आंतरिक भंगुरता में है। यतीन्द्र के यहाँ संगीत ‘संग्रह’ करने की कला है—स्मृतियों और परंपराओं का संग्रह; जबकि रंजना के यहाँ संगीत ‘छोड़ने’ की कला है—पकड़ से छूटकर भागने और बिखर जाने की क्रिया।
यतीन्द्र की कविता में गिरिजा देवी का स्वर ‘गंगा की लहरों’ जैसा शाश्वत और पूजनीय है, जो श्रोता को एक पवित्र विस्मय से भर देता है। वहाँ स्वर का ‘लौटना’ एक उत्सव है, जैसे कोई अपनी जड़ों की ओर वापस आ रहा हो। रंजना मिश्र की कविता में स्वर का ‘खिलखिलाते हुए लौटना’ कोई पारंपरिक वापसी नहीं, बल्कि एक खेल (Play) है, जो देरिदा के विखंडनवादी दर्शन के करीब पहुँच जाता है। यतीन्द्र के यहाँ स्वर का अनुशासन ‘मर्यादा’ है, रंजना के यहाँ वही अनुशासन एक ‘पिंजरा’ है जिससे स्वर किलककर भाग जाना चाहता है। यतीन्द्र मिश्र ‘स्वर के माध्यम से सिद्ध’ हो चुकी एक स्त्री का आख्यान रचते हैं, वहीं रंजना मिश्र ‘स्वर के माध्यम से स्वयं को सिद्ध करने की प्रक्रिया’ में लगी एक स्त्री की जद्दोजहद को उकेरती हैं।
जहाँ यतीन्द्र मिश्र का भाषाई शिल्प ‘केसर’, ‘अबीर’ और ‘मल्हार’ जैसे सघन और रंजित शब्दों से सुसज्जित है, वहीं रंजना मिश्र की भाषा ‘भोर का तारा’ और ‘हल्का आभास’ जैसी पारभासी (Transparent) कोमलता से निर्मित है। यतीन्द्र मिश्र का संगीत ‘मौन’ को शब्दों से भर देने का प्रयास है, जबकि रंजना मिश्र का संगीत शब्दों के बीच ‘मौन’ की जगह बनाने की कोशिश है। यतीन्द्र की कविता पाठक को एक भव्य मंदिर के गर्भगृह में ले जाती है जहाँ संगीत की अर्चना हो रही है, जबकि रंजना की कविता उसे एक खुले हुए, निर्जन मैदान में ले जाती है जहाँ एक स्वर ‘तम के प्रहर’ से बेखौफ होकर टकरा रहा है। यह तुलना अंततः यह सिद्ध करती है कि यतीन्द्र संगीत की ‘देह’ और उसके ‘इतिहास’ के चितेरे हैं, तो रंजना मिश्र उसकी ‘आत्मा’ और उसके ‘अस्तित्व’ की अन्वेषी।
यतीन्द्र मिश्र और रंजना मिश्र की सांगीतिक दृष्टि के आधार पर ‘परंपरा’ और ‘आधुनिकता’ के द्वंद्व का विश्लेषण भारतीय साहित्य की दो महत्वपूर्ण धाराओं को रेखांकित करता है। यतीन्द्र मिश्र जहाँ ‘परंपरा’ को एक अटूट निरंतरता और सांस्कृतिक गौरव के रूप में देखते हैं, वहीं रंजना मिश्र आधुनिक बोध के साथ उस परंपरा के भीतर अपनी स्वायत्तता और विखंडन की तलाश करती हैं। यतीन्द्र के यहाँ संगीत का अर्थ अपनी जड़ों की ओर लौटना और पूर्वजों की थाती को सहेजकर उसे एक नए सौन्दर्यबोध के साथ प्रस्तुत करना है। उनके लिए परंपरा एक विशाल वटवृक्ष की तरह है, जिसकी छाया में कलाकार सुरक्षित है। यहाँ आधुनिकता का अर्थ परंपरा का त्याग नहीं, बल्कि उसे और अधिक समृद्ध और अलंकृत करना है।
इसके विपरीत, रंजना मिश्र की कविता में आधुनिकता एक प्रश्नवाचक चिह्न की तरह आती है। उनके लिए परंपरा (राग का व्याकरण) एक आधार तो है, लेकिन वह अंतिम गंतव्य नहीं है। रंजना की आधुनिकता इस बात में निहित है कि वे परंपरा के बने-बनाए ढांचों को तोड़कर उसके भीतर के एकांत और व्यक्तिपरक सत्य को बाहर लाती हैं। जहाँ यतीन्द्र परंपरा को एक सामूहिक उत्सव के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं, वहीं रंजना उसे एक व्यक्तिगत संघर्ष और अस्तित्ववादी बहाव (Flow) के रूप में देखती हैं। यतीन्द्र की दृष्टि ‘परंपरा की भव्यता’ पर है, जबकि रंजना की दृष्टि ‘परंपरा की सीमाओं’ और उन सीमाओं के पार जाने वाले स्वर पर है।
यह द्वंद्व अंततः एक संतुलन पर आकर टिकता है। यतीन्द्र मिश्र हमें बताते हैं कि बिना जड़ों के संगीत का कोई इतिहास नहीं होता, और रंजना मिश्र हमें आभास कराती हैं कि बिना व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विखंडन के संगीत का कोई भविष्य नहीं होता। यतीन्द्र ‘अतीत’ को गौरवशाली बनाकर वर्तमान में लाते हैं, जबकि रंजना ‘वर्तमान’ की भंगुरता को राग के माध्यम से शाश्वत बनाती हैं। इन दोनों कवियों का संगम ही आधुनिक हिंदी कविता में संगीत के उस पूर्ण विमर्श को निर्मित करता है, जहाँ एक ओर गिरिजा देवी की ठुमरी का सांस्कृतिक विस्तार है और दूसरी ओर ‘राग अल्हैया बिलावल’ के टूटकर बहते हुए स्वर की अस्तित्ववादी गहराई।
कुल मिलाकर यतीन्द्र मिश्र संगीत को एक ‘सांस्कृतिक उत्सव’ की तरह देखते हैं, जबकि रंजना मिश्र उसे एक ‘अस्तित्ववादी अस्त्र’ की तरह। दोनों ही कवि हिंदी कविता को संगीत की शब्दावली से समृद्ध करते हैं, लेकिन रंजना मिश्र का ‘राग’ उत्तर-संरचनावादी विखंडन की प्रक्रिया से गुज़रकर अधिक दार्शनिक और प्रश्नात्मक हो जाता है।

उत्तर-संरचनावादी शब्दावली में इस कविता में केंद्र का विखंडन और देरिदा का ‘डिफ़रांस’ (différance) घटित होता हुआ दिखाई पड़ता है । उत्तर-संरचनावाद के प्रणेताओं में प्रमुख देरिदा का मानना था कि भाषा में कोई ‘निश्चित केंद्र’ नहीं होता। रंजना मिश्र की कविता में ‘राग अल्हैया बिलावल’ को यदि हम एक केंद्र मानें, तो उत्तर-संरचनावादी दृष्टि इसे तुरंत विखंडित कर देगी। यहाँ राग केवल एक सांगीतिक ढाँचा नहीं है, बल्कि वह स्वरों के निरंतर ‘स्थगन’ का नाम है। जब कवयित्री कहती हैं—”पकड़ते छूटते है भागते / खिलखिलाते लौट आते”, तो यहाँ देरिदा का ‘डिफ़रांस’ (différance)सक्रिय हो जाता है। स्वर न तो पूरी तरह ‘पकड़’ में हैं, न ही पूरी तरह ‘छूट’ गए हैं। उनका अर्थ उस अंतराल में है जो पकड़ने और छूटने के बीच मौजूद है। राग की पहचान किसी एक स्वर में नहीं, बल्कि स्वरों के एक-दूसरे से भिन्न होने और एक-दूसरे पर निर्भर होने में है। यहाँ ‘अल्हैया बिलावल’ एक निश्चित सत्य न होकर स्वरों का एक ‘खेल’ बन जाता है, जहाँ अर्थ कभी भी पूरी तरह हाथ नहीं आता, वह हमेशा ‘भागता’ रहता है।
रोलां बार्थ और ‘लेखक की मृत्यु’ का सिद्धांत भी इस कविता पर पूरी तरह सटीक बैठता है। कविता में ‘स्वर तुम्हारा’ का प्रयोग हुआ है। सवाल उठता है कि यह ‘तुम्हारा’ कौन है? क्या यह किसी गुरु का स्वर है? क्या यह प्रकृति का स्वर है? या यह स्वयं कवयित्री का स्वर है? उत्तर-संरचनावाद कहता है कि कविता का अर्थ कवयित्री की मंशा में नहीं, बल्कि पाठक के अनुभव में है। दूसरे शब्दों में जैसे ही स्वर “टूट कर बहता” है, वह कवयित्री के नियंत्रण से बाहर हो जाता है। अब वह स्वर पाठक के अपने एकांत, उसके अपने ‘तम के प्रहर’ और उसके अपने जीवन-संघर्षों के साथ मिलकर नए अर्थ गढ़ने लगता है। यहाँ कवि केवल एक माध्यम है; वास्तविक रचना तो पाठक के मस्तिष्क में घटित हो रही है। स्वर का “देर तक और दूर तक” बहना ही इस बात का प्रमाण है कि पाठ की कोई सीमा नहीं है।
जूलिया क्रिस्तेवा का ‘सेमियोटिक’ सिद्धांत उत्तर-संरचनावाद का एक प्रमुख वैचारिक स्तंभ है। क्रिस्तेवा के अनुसार, भाषा की तार्किक और व्याकरणिक संरचना के नीचे एक आदिम, लयबद्ध और विद्रोही प्रवाह हमेशा मौजूद रहता है। इस कविता में संगीत का व्याकरण प्रतीकात्मक या ‘सिम्बोलिक’ है, लेकिन स्वरों का ‘खिलखिलाना’ और ‘किलकना’ उस ‘सेमियोटिक’ ऊर्जा का प्रस्फुटन है। यह ऊर्जा जेंडर की सीमाओं को भी चुनौती देती है। स्त्री-दृष्टि से देखें तो यह ‘सेमियोटिक’ प्रवाह पितृसत्तात्मक भाषा के कठोर अनुशासन को तोड़ता है। ‘पीली पात’ पर ठहरी ‘बूँद’ उस भंगुरता का उत्सव है जिसे मुख्यधारा का विमर्श अक्सर कमज़ोरी मानकर नकार देता है। उत्तर-संरचनावाद इस ‘कमज़ोरी’ को ही ‘शक्ति’ के रूप में पुनर्संस्थापित करता है।
‘पात पीली’ और ‘तम का प्रहर’—ये दोनों बिम्ब उत्तर-संरचनावादी ‘विखंडन’ की प्रक्रिया को दर्शाते हैं। परंपरागत रूप से ‘पीला पत्ता’ मृत्यु या दुख का सूचक है, और ‘अंधकार’ नकारात्मकता का। लेकिन यह कविता इन द्विपक्षीय विरोधों या ‘बाइनरी अपोजिशन्स’ को उलट देती है। यहाँ ‘तम’ वह स्थान है जहाँ स्वर को सबसे अधिक विस्तार मिलता है। जूलिया क्रिस्तेवा का ‘अपवर्जन’ (Abjection) यहाँ ‘उदात्तीकरण’ (Sublimation) में बदल जाता है। जो ‘त्याज्य’ है, वही ‘सौंदर्य’ का आधार है। यह कविता यह स्थापित करती है कि पूर्णता में उतना अर्थ नहीं है जितना कि ‘टूटने’ और ‘बहने’ में है। अर्थ की प्राप्ति ‘भोर’ में उतनी नहीं होती, जितनी ‘तम के प्रहर’ में होती है।

उत्तर-संरचनावादी परिप्रेक्ष्य में ‘राग अल्हैया बिलावल’ कविता एक खुला पाठ या ‘ओपन टेक्स्ट’ है। यह कविता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती, बल्कि पाठक को एक प्रवाह पर छोड़ देती है—”फिर बहेगा देर तक और दूर तक”। यह ‘बहना’ ही उत्तर-संरचनावाद की मूल आत्मा है। अर्थ स्थिर नहीं है; वह समय के साथ, राग के साथ और पाठक की चेतना के साथ बहता रहता है। कवि ने संगीत के माध्यम से भाषा की उस असमर्थता को भी पकड़ा है जहाँ शब्द कम पड़ जाते हैं और केवल ‘किलकारी’ या ‘स्वर’ ही सत्य रह जाते हैं। यह कविता प्रमाणित करती है कि जीवन और कला का कोई एक केंद्र नहीं है; वे तो अनंत संभावनाओं और अंतहीन व्याख्याओं का एक ‘मोज़ेक’ हैं।
‘राग अल्हैया बिलावल’ कविता का पाठ जब देरिदा के ‘विखंडन’ और मिशेल फूको के ‘शक्ति-ज्ञान’ तथा ‘विमर्श’ के सिद्धांतों से टकराता है, तो यह कविता मात्र एक सांगीतिक रचना न रहकर सत्ता, भाषा और अस्तित्व के जटिल संघर्ष का अखाड़ा बन जाती है। इन दोनों दार्शनिकों के विचारों के आलोक में इस कविता का विश्लेषण पाठ की उन परतों को उधेड़ता है जो सामान्यतः सांगीतिक सौंदर्य के पीछे छिपी रह जाती हैं। देरिदा के विखंडनवादी सिद्धांत के अनुसार, पश्चिमी और पूर्वी चिंतन में हमेशा एक ‘केंद्र’ की तलाश रही है। इस कविता में ‘राग’ और ‘स्वर’ को सामान्यतः उस केंद्र के रूप में देखा जाता है जो अर्थ को स्थिरता प्रदान करता है। किंतु, देरिदा की दृष्टि यहाँ ‘उपस्थिति’ के बजाय ‘अनुपस्थिति’ और ‘स्थगन’ को खोजती है।
स्थगन का स्वर कविता में स्वर ‘पकड़ते-छूटते’ हैं। देरिदा के अनुसार, स्वर की कोई अपनी स्वतंत्र और पूर्ण सत्ता नहीं है। ‘पकड़ना’ तभी अर्थवान है जब ‘छूटना’ संभव हो। स्वर का अर्थ उस ‘पकड़’ में नहीं है, बल्कि उस निरंतर ‘भागने’ में है जहाँ वह कभी भी पूरी तरह ‘उपस्थित’ नहीं होता। जब कवयित्री कहती हैं कि स्वर “खिलखिलाते लौट आते”, तो यह लौटना भी एक छलावा है, क्योंकि वह स्वर जो गया था और जो लौटा है, उनके बीच समय का एक अंतराल आ चुका है। अर्थ हमेशा ‘अभी नहीं’ की स्थिति में आगे खिसकता रहता है। देरिदा संरचनावादियों के द्विपक्षीय विरोध या ‘बाइनरी अपोजिशन’ को चुनौती देते हैं। परंपरागत रूप से ‘भोर’ को श्रेष्ठ और ‘तम’ को गौण माना जाता है। किंतु कविता के अंत में “तम के प्रहर तक” स्वर का बहना इस पदानुक्रम को उलट देता है। यहाँ ‘तम’ वह व्यापक धरातल बन जाता है जहाँ स्वर को अपनी अंतिम परिणति और विस्तार मिलता है। इस प्रकार, अंधकार प्रकाश का विरोधी नहीं, बल्कि उसका पूरक और अनिवार्य विस्तार सिद्ध होता है।
मिशेल फूको का दर्शन ‘शक्ति’ और ‘विमर्श’ के संबंधों पर आधारित है। उनके लिए भाषा और कला के रूप केवल सौंदर्यपरक नहीं होते, बल्कि वे शक्ति के तंत्रों द्वारा अनुशासित होते हैं। शास्त्रीयता के अनुशासन पर नज़र डालें तो राग ‘अल्हैया बिलावल’ स्वयं में एक सांगीतिक विमर्श है। इसके नियम, इसके वर्जित स्वर और इसके गायन का समय—ये सब ‘ज्ञान’ के वे तंत्र हैं जो ‘स्वर’ को अनुशासित करते हैं। फूको की दृष्टि से, राग का व्याकरण एक प्रकार की ‘बायोपॉवर’ या ‘शासनबद्धता’ है जो कलाकार की अभिव्यक्ति को एक सांचे में ढालती है। कविता में जब स्वर “भागते” हैं, तो फूकोवादी दृष्टिकोण से यह ‘शक्ति’ के विरुद्ध ‘प्रतिरोध’ का क्षण है। स्वर का अनुशासन से भागना और “खिलखिलाना” उस दमनकारी व्याकरण के भीतर एक ‘दरार’ पैदा करता है।फूको की शब्दावली में यह एक ‘हेटरोटोपिया’ का निर्माण है—एक ऐसा स्थान जहाँ कलाकार नियमों के भीतर रहकर भी नियमों को छका देता है। जहाँ ‘यूटोपिया’ (Utopias) केवल आदर्श और काल्पनिक होते हैं, वहीं ‘हेटरोटोपिया’ (Heterotopia) समाज के भीतर ही स्थित वे ‘अन्य स्थान’ (Other spaces) हैं जो प्रचलित व्यवस्था को एक साथ दर्शाते भी हैं और उसे चुनौती देकर विखंडित भी करते हैं। यह ‘खिलखिलाहट’ कविता के उस व्याकरणिक भूगोल में एक ऐसा ही प्रति-स्थान (Counter-site) रचती है, जहाँ भाषा के सामान्य नियम स्थगित हो जाते हैं।
फूको के अनुसार ‘हेटरोटोपिया’ एक प्रकार के दर्पण (Mirror) की तरह कार्य करता है—यह एक ऐसी जगह है जहाँ हम वास्तव में नहीं हैं (यूटोपिया), लेकिन साथ ही यह एक वास्तविक वस्तु के रूप में हमारे अस्तित्व को प्रतिबिंबित कर उसे एक भिन्न धरातल पर स्थापित कर देता है। रंजना जी की कविता में जब स्वर की लय व्याकरण के जड़ ढाँचे को तोड़ती है, तो वह एक ‘हेटरोक्रोनी’ (Heterochrony) का भी सृजन करती है, जहाँ समय की रैखिक गति रुक जाती है और शिशु-सुलभ निश्छलता का एक शाश्वत क्षण संचित हो जाता है। यह चयन दर्शाता है कि कला जब अपने चरमोत्कर्ष पर होती है, तो वह व्यवस्था के भारीपन से मुक्त होकर एक ऐसी ‘क्रीड़ा’ बन जाती है जिसमें प्रवेश और निकास के नियम सामान्य जगत से भिन्न होते हैं।
इस प्रकार, यह हेटरोटोपियाई स्थान कलाकार को वह स्वायत्तता प्रदान करता है जहाँ ‘अंत’ का अंधेरा और व्याकरण का दमन अनिवार्य होने के बावजूद बेअसर हो जाते हैं। यहाँ भाषा केवल विचार का वाहन नहीं रह जाती, बल्कि वह स्वयं में एक उत्सव बन जाती है—एक ऐसा ‘विचलन का स्थान’ (Space of deviation), जहाँ स्वर की अपनी लय सत्ता के कठोर अनुशासन को एक कोमल खिलखिलाहट में रूपांतरित कर देती है।
कविता में “पात पीली पर है ठहरा / बूँद सा जीवन” वस्तुत: फूको के ‘हाशिए के ज्ञान’ का बिम्ब है। ‘पीली पात’ वह जर्जर सत्ता या परंपरा है जो अब अप्रासंगिक हो चुकी है, लेकिन उस पर ठहरी ‘बूँद’ अपनी सूक्ष्मता में भी पूरी व्यवस्था को चुनौती देती है। फूको के अनुसार, शक्ति जहाँ होती है, प्रतिरोध भी वहीं होता है। स्वर का ‘टूटकर बहना’ उस सत्ता के विखंडन की प्रक्रिया है जो उसे थामना चाहती थी। फूको का सर्वद्रष्टा’ या ‘पैनोप्टिकॉन’ उजाले में सबसे अधिक सक्रिय होता है। ‘भोर’ और ‘पूर्व का आभास’ सामाजिक निगरानी के समय हैं, जहाँ स्वर को ‘सही’ तरीके से प्रस्तुत होना पड़ता है। किंतु ‘तम का प्रहर’ वह क्षेत्र है जहाँ निगरानी शिथिल पड़ जाती है। यहाँ स्वर ‘देर तक और दूर तक’ बह सकता है क्योंकि यहाँ वह सत्ता की सीधी नज़र से ओझल है। यह अंधकार मुक्ति का स्थान बन जाता है।
रंजना मिश्र की कविता इन दोनों दार्शनिकों के संगम पर खड़ी है। जहाँ देरिदा ‘स्वर’ के भीतर छिपे ‘मौन’ और ‘अंतराल’ को पकड़ते हैं, वहीं फूको उस स्वर के पीछे सक्रिय ‘सत्ता’ और ‘अनुशासन’ को उघाड़ते हैं। कविता में निहित स्त्री-दृष्टि इन दोनों को आत्मसात करती है। स्त्री का स्वर ‘पकड़’ से भागता है और ‘तम’ में अपनी स्वायत्तता खोजता है। यह स्वर “टूट कर बहता हुआ” भी अपनी निरंतरता बनाए रखता है, जो यह दर्शाता है कि ‘विखंडन’ विनाश नहीं, बल्कि एक नया सृजन है। अंततः, यह कविता एक ‘प्रति-विमर्श’ तैयार करती है। यह शास्त्रीयता के ‘सिम्बोलिक’ ढांचे को स्वीकार तो करती है, लेकिन उसे अपनी ‘सेमियोटिक’ खिलखिलाहट से भीतर से विखंडित कर देती है। रचनाकार ने संगीत के माध्यम से यह सिद्ध किया है कि स्वर का असली अर्थ उसकी ‘पकड़’ में नहीं, बल्कि उसके ‘बहाव’ में है—एक ऐसा बहाव जो किसी भी केंद्र, सत्ता और निश्चित परिभाषा को स्वीकार नहीं करता।
‘राग अल्हैया बिलावल’ कविता का ज्ञानमीमांसीय विश्लेषण इस प्रश्न से टकराता है कि हम ‘सत्य’ को कैसे जानते हैं और कलात्मक अनुभव में ‘सत्य’ की प्रकृति क्या है। उत्तर-संरचनावादी दर्शन के परिप्रेक्ष्य में, सत्य कोई स्थिर वस्तु नहीं है, बल्कि वह एक निरंतर घटित होने वाली प्रक्रिया है। इस कविता में सत्य की अवधारणा ‘निश्चितता’ से हटकर ‘तरलता’ की ओर विस्थापित होती है। परंपरागत ज्ञानमीमांसा में राग अल्हैया बिलावल का ‘सत्य’ उसके व्याकरण, उसके स्वरों की शुद्धता और उसके गायन के समय में निहित माना जाता है। किंतु कविता का आरंभ ही इस सत्य को एक संशय में डाल देता है। “भोर का तारा अभी लौटा” और “एक हल्का पूर्व का आभास सा कुछ” —यहाँ ‘आभास’ शब्द अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ज्ञानमीमांसा की दृष्टि से आभास सत्य की पूर्णता नहीं, बल्कि उसकी आहट है। कवयित्री यहाँ यह संकेत दे रही हैं कि सत्य कभी भी अपनी पूर्णता में प्रकट नहीं होता; वह हमेशा एक ‘आभास’ या एक ‘परछाईं’ के रूप में सामने आता है।
देरिदा के विखंडन के आलोक में, कविता में सत्य का स्थान ‘स्वर’ और ‘मौन’ के बीच के द्वंद्व में बदल जाता है। जब स्वर “पकड़ते-छूटते” हैं, तो सत्य उस ‘पकड़’ में नहीं है जिसे हम प्रमाणित कर सकें, बल्कि उस ‘छूटने’ में है जो हमें बे-यक़ीनी की ओर ले जाता है। यहाँ ज्ञान का आधार ‘निश्चितता’ नहीं, बल्कि ‘अस्थिरता’ बन जाता है। पीली पात पर ठहरी बूँद का बिम्ब इसी अस्थायी ज्ञानमीमांसा को पुष्ट करता है। एक ऐसी बूँद जो किसी भी क्षण गिर सकती है, वह उस सत्य का प्रतिनिधित्व करती है जो केवल एक ‘क्षण’ के लिए सत्य है। यह बुद्ध के क्षणवाद के करीब है, जहाँ हर क्षण का अपना सत्य है जो अगले क्षण विलीन हो जाता है। फूको के ‘ज्ञान-शक्ति’ के सिद्धांत के अनुसार, हम जिसे ‘सत्य’ कहते हैं, वह अक्सर सत्ता द्वारा निर्मित एक विमर्श होता है। संगीत का अनुशासन और राग की शास्त्रीयता वह निर्मित सत्य है जिसे ‘ज्ञान’ के रूप में स्थापित किया गया है।

इस कविता में स्वर का “भागना” इस निर्मित सत्य के विरुद्ध एक ‘ज्ञानमीमांसीय विद्रोह’ है। यह स्वर यह दावा करता है कि राग का सत्य केवल उसके नियमों में नहीं, बल्कि उस ‘खिलखिलाहट’ में है जो नियमों की पकड़ से बाहर निकल जाती है। यहाँ ‘व्यक्तिगत सत्य’ और ‘संस्थागत सत्य’ के बीच एक संघर्ष है, जिसमें कवयित्री अंततः व्यक्तिगत अनुभव और प्रवाह को प्रधानता देती हैं। कविता का अंत “तम के प्रहर तक” स्वर के बहने से होता है, जो सत्य की एक नई परिभाषा गढ़ता है। सामान्यतः प्रकाश को ‘ज्ञान’ और अंधकार को ‘अज्ञान’ का प्रतीक माना जाता है। किंतु यहाँ, स्वर का अंधकार में बहना यह दर्शाता है कि वास्तविक ज्ञान वह नहीं है जो केवल स्पष्टता में दिखाई दे, बल्कि वह है जो सघन रहस्य में भी अपना अस्तित्व बनाए रखे। यह ‘नकारात्मक ज्ञानमीमांसा’ की स्थिति है, जहाँ सत्य को उसके अभाव में, उसके टूटने में और उसके बहने में पहचाना जाता है।
स्त्री-दृष्टि से, यह ज्ञानमीमांसा ‘अनुभवजन्य’ है। स्त्री का सत्य समाज द्वारा परिभाषित ‘नियमों’ में नहीं, बल्कि उसके अपने ‘स्वर’ और उसकी अपनी ‘तरलता’ में है। “टूट कर बहता हुआ वह स्वर तुम्हारा” —काव्यपंक्ति में ‘टूटने’ की क्रिया सत्य के बिखरने की नहीं, बल्कि उसके विस्तार की क्रिया है। जैसे एक बूँद टूटकर सरिता का हिस्सा बनती है, वैसे ही व्यक्तिगत स्वर टूटकर एक सार्वभौमिक सत्य बन जाता है। इस प्रकार यह कविता सत्य को एक ‘ठोस वस्तु’ के बजाय एक ‘बहते हुए स्वर’ के रूप में स्थापित करती है। यह उत्तर-संरचनावादी सत्य है जो विखंडित है, जो निरंतर बदल रहा है, और जो किसी भी अंतिम निष्कर्ष को अस्वीकार करता है। सत्य यहाँ ‘भोर’ की स्पष्टता में जितना है, उतना ही ‘तम’ की गहराई में भी है। यह कविता हमें सिखाती है कि जानना केवल सूचना प्राप्त करना नहीं है, बल्कि उस ‘पकड़ने और छूटने’ के खेल में शामिल होना है जिसे हम जीवन कहते हैं।

‘राग अल्हैया बिलावल’ कविता का सौन्दर्यशास्त्रीय नैतिकता के नज़रिए से विश्लेषण हमें उस मुकाम पर ले जाता है जहाँ कला केवल आस्वादन की वस्तु नहीं रह जाती, बल्कि एक नैतिक उत्तरदायित्व बन जाती है। यहाँ नैतिकता का अर्थ किसी बने-बनाए सामाजिक आचार-संहिता का पालन करना नहीं है, बल्कि अपने अस्तित्व और अपनी अभिव्यक्ति के प्रति ईमानदार होना है। राग अल्हैया बिलावल के माध्यम से कवयित्री ने जिस ‘स्वर’ की रचना की है, वह कलाकार की आत्मा का वह सत्य है जो विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानता। कविता में स्वर का ‘पकड़ना और छूटना’ एक सांगीतिक क्रिया के साथ-साथ एक नैतिक चुनाव भी है। पकड़ने का अर्थ है परंपरा और अनुशासन का सम्मान, जबकि छूटने का अर्थ है अपनी मौलिकता और स्वाधीनता की रक्षा। एक सच्चा कलाकार वही है जो इन दोनों के बीच संतुलन बना सके।
सौन्दर्यशास्त्रीय नैतिकता यहाँ ‘पीली पात’ और ‘बूँद’ के बिम्ब में अधिक मुखर होकर सामने आती है। जब जीवन अपने अवसान पर हो या परिस्थितियाँ शुष्क और जर्जर हो चुकी हों, तब भी अपनी शुचिता और कोमलता को बनाए रखना एक नैतिक कर्म है। कवयित्री यह संदेश देती हैं कि जीवन की सार्थकता उसकी लंबी उम्र में नहीं, बल्कि उसकी सघनता और उसके प्रभाव में है। एक ‘बूँद सा जीवन’ भी यदि ‘राग’ बन जाए, तो वह पीली पात की जड़ता को सार्थकता प्रदान कर देता है। यहाँ कला की नैतिकता यह है कि वह ‘अभाव’ को ‘उत्सव’ में बदल देती है। स्वर का “टूट कर बहना” यह दर्शाता है कि सृजन के लिए स्वयं का विसर्जन अनिवार्य है। कलाकार जब स्वयं को संगीत के हवाले कर देता है या कवि जब काव्य-सृजन के दौरान अपने सम्पूर्ण रचनात्मक अस्तित्व को दांव पर लगा देता है तभी वह उस ‘सत्य’ तक पहुँच पाता है जो व्यक्ति से ऊपर उठकर समष्टि का हो जाता है।

स्त्री-दृष्टि के संदर्भ में यह नैतिकता ‘प्रतिरोध के सौंदर्य’ के रूप में उभरती है। एक ऐसी व्यवस्था में जहाँ स्त्री की आवाज़ को दबाने या नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है, वहाँ ‘खिलखिलाते हुए’ अपने स्वर को बचाए रखना और उसे ‘तम के प्रहर तक’ ले जाना एक बड़ी नैतिक जीत है। यह कविता यह स्थापित करती है कि सौंदर्य केवल फूलों और उजाले में नहीं है, बल्कि उस साहस में भी है जो अंधेरे को चीरते हुए आगे बढ़ता है। ‘तम का प्रहर’ यहाँ उन तमाम सामाजिक बाधाओं और आंतरिक संघर्षों का प्रतीक है जो कला की गति को रोकना चाहते हैं, किंतु स्वर का ‘देर तक और दूर तक’ बहना यह प्रमाणित करता है कि अंतत: सत्य का गला नहीं घोंटा जा सकता। यह बहाव ही कला का नैतिक धर्म है।

सौन्दर्यशास्त्रीय नैतिकता के लिहाज से ‘राग अल्हैया बिलावल’ कविता वस्तुत: एक पूर्ण जीवन-दर्शन का दस्तावेज बन गई है। यह हमें सिखाती है कि हम भले ही ‘पीली पात’ पर टिकी हुई ‘क्षणभंगुर बूँद’ हों, लेकिन हमारे भीतर का ‘स्वर’ अमर है। कला हमें वह दृष्टि देती है जिससे हम भोर के प्रकाश और रात के अंधकार, दोनों को एक ही राग के आरोह-अवरोह की तरह स्वीकार कर सकें। अंततः, यह कविता मनुष्यता को यह विश्वास दिलाती है कि जब तक हमारे पास अपना ‘स्वर’ है, तब तक कोई भी ‘तम’ हमें पराजित नहीं कर सकता। सृजन का यह निरंतर प्रवाह ही वह परम सत्य है जो समय की धूल को झाड़कर हमें एक नई पहचान देता है। इस प्रकार, यह कविता राग, शब्द, मौन और नैतिकता का एक ऐसा महापाठ बन जाती है जो पाठक के भीतर भी एक अनंत संगीत को जन्म देती है।

यह कविता अपनी संरचना में जितनी सुगठित है, अपने अर्थों में उतनी ही विस्तृत और व्यापक है। देखा जा सकता है कि किस प्रकार ‘भोर के तारे’ से शुरू हुई यह यात्रा ‘तम के प्रहर’ तक पहुँचते-पहुँचते केवल एक राग का विवरण न रहकर जीवन की नश्वरता और कला की अमरता का महाख्यान बन जाती है। संगीत के व्याकरण और हृदय की उमंग के बीच जो द्वंद्व जूलिया क्रिस्तेवा ने पहचाना था, वह यहाँ ‘पकड़ने’ और ‘छूटने’ की सांगीतिक क्रिया में साक्षात होता है। देरिदा के ‘विखंडन’ और फूको के ‘शक्ति-विमर्श’ के माध्यम से यह समझ में आता है कि यह कविता किस प्रकार शास्त्रीयता के अनुशासन को स्वीकार करते हुए भी उससे परे जाने का साहस करती है और हाशिए पर धकेले गए अस्तित्व को केंद्र में लाकर प्रतिष्ठित करती है।

इस कविता का सौन्दर्यबोध केवल कर्णप्रिय ध्वनियों में नहीं, बल्कि उस ‘नैतिक साहस’ में है जो मृत्यु की छाया में भी ‘खिलखिलाने’ का माद्दा रखता है। स्त्री-दृष्टि यहाँ किसी शोर के साथ नहीं, बल्कि एक बहते हुए, अटूट स्वर के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है, जो काल की सीमाओं को लाँघकर कवयित्री के शब्दों में ‘देर तक और दूर तक’ जाने का संकल्प है। रंजना मिश्र ने ‘राग अल्हैया बिलावल’ कविता में भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक प्रहर विशेष के राग को मानवीय संवेदना के सार्वभौमिक और शाश्वत राग में बदल दिया है। इस कविता के समाजशास्त्रीय एवं सौन्दर्यशास्त्रीय विश्लेषण के दौरान मूल पाठ को संगीत, दर्शन, समाजशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र और ख़ास तौर से संरचनावाद एवं उत्तर-संरचनावाद के साथ ही स्त्री-विमर्श के ‘मल्टी-वे जंक्शन’ पर खड़ा करने से यह सत्य उभरकर सामने आता है कि जब शब्द राग बनते हैं और राग जीवन दर्शन, तब साहित्य अपने वास्तविक गंतव्य को प्राप्त करता है।

(दो )

राग मालकौंस

कोरों के कूल किनारे तोड़ता
आँसू फूटा गहरी रात

बह निकली ख़ुद के भीतर
बहती एक और नदी

वे स्वर हैं मालकौंस के
गझिन कोमलता के भार से द्रवित
धुंधली भोर, उजास के ठीक पहले
– रंजना मिश्र

विवेच्य कविता में राग मालकौंस की शास्त्रीय गंभीरता और उसके भावनात्मक प्रभाव का एक अत्यंत सूक्ष्म चित्रण है जिसमें कवि ने संगीत को केवल ध्वनि नहीं, बल्कि एक आंतरिक विरेचन के रूप में प्रस्तुत किया है। कविता का मूल स्वर विरेचन है, क्योंकि राग मालकौंस अपनी प्रकृति में गंभीर, शांत और कुछ हद तक वैराग्य प्रधान राग माना जाता है। कवि के अनुसार, जब दुःख की अति होती है और व्यक्ति के भीतर के किनारे टूट जाते हैं, तब वह रुदन संगीत का रूप ले लेता है। यहाँ आँसू केवल जल नहीं हैं, बल्कि वे स्वर बनकर बह रहे हैं। भारतीय संगीतशास्त्र के सिद्धांतों का इस कविता में बहुत ही सटीक प्रयोग हुआ है। मालकौंस मध्यरात्रि का राग है और कविता में गहरी रात तथा धुंधली भोर का उल्लेख राग के गायन समय की ओर संकेत करता है। यह वह समय होता है जब संसार सो रहा होता है और मनुष्य अपने एकांत में स्वयं से मिलता है।

मालकौंस में सभी पांच स्वर कोमल प्रयुक्त होते हैं और कविता की पंक्ति गझिन कोमलता के भार से द्रवित इन्हीं कोमल स्वरों की सघनता और उनकी गंभीरता को रेखांकित करती है। यद्यपि इस राग में वीर और भक्ति रस का मिश्रण माना जाता है, किंतु कवि ने इसके करुण पक्ष को उभारा है, जहाँ संगीत हृदय की जड़ता को पिघलाकर उसे प्रवाहमयी बना देता है। कविता का शिल्प जितना सरल है, उसका प्रभाव उतना ही गहरा है। इसमें कोरों के कूल किनारे जैसे बिम्बों के माध्यम से आँखों की कोरों को नदी के किनारों के समान बताया गया है और ‘बहती एक और नदी’ को आंतरिक अश्रुधारा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। गझिन जैसे ठेठ शब्द का प्रयोग कोमलता की सघनता को दर्शाता है और इसकी भाषा तत्सम प्रधान होते हुए भी प्रवाहमयी बनी रहती है।

कविता का दार्शनिक पक्ष यह संदेश देता है कि संगीत कोई बाहरी वस्तु नहीं है, बल्कि वह हमारे भीतर की भावनाओं का ही परिष्कृत रूप है। जब व्यक्ति अपने स्व में डूबता है, तो उसके भीतर संगीत की एक नदी फूट पड़ती है। उजास के ठीक पहले का उल्लेख जीवन की उस संधिबेला का प्रतीक है, जहाँ दुःख की सघनता के बाद शांति का प्रकाश होने वाला है। राग मालकौंस यहाँ केवल एक राग नहीं, बल्कि मनुष्य की उस अवस्था का प्रतीक है जहाँ वह अपने दुःख को कला में रूपांतरित कर देता है। कवि ने राग मालकौंस की शास्त्रीय मर्यादा को बनाए रखते हुए उसे मानवीय संवेदना से जोड़ दिया है। इस प्रकार यह कविता संगीत के नाद-ब्रह्म की उस शक्ति को प्रतिपादित करती प्रतीत होती है जो मनुष्य के भीतर के अवरोधों को तोड़कर उसे मुक्त करती है।

जिस प्रकार मालकौंस मध्यरात्रि की सघनता और करुणा का राग है, उसी प्रकार राग दरबारी कान्हड़ा अपनी राजसी गंभीरता और गहरे मानसिक द्वंद्व के लिए जाना जाता है। दरबारी का संगीतशास्त्र मालकौंस से भिन्न होते हुए भी उतना ही प्रभावशाली है, क्योंकि जहाँ मालकौंस में कोमलता और विरेचन का भाव है, वहीं दरबारी में एक थका हुआ विजेता अपने भीतर के एकांत को खोजता है। यह राग सप्तक के मंद्र क्षेत्र यानी निचले स्वरों में अधिक विचरता है, जो मनुष्य के अंतर्मन की उन गहराइयों का प्रतीक है जहाँ बाहरी कोलाहल शांत हो जाता है। इसके कोमल गांधार और धैवत पर दिया जाने वाला विशेष कंपन मन की उस कशमकश को दर्शाता है जो गाकर या सुनकर महसूस करने वाला अनुभव है और जिसे शब्दों में व्यक्त करना असंभव है।

दरबारी की प्रकृति अत्यंत स्थिर और धैर्यवान है जो श्रोता को एक अंतर्मुखी यात्रा पर ले जाती है। इसकी गायकी में जो भारीपन और ठहराव होता है, वह एक दार्शनिक की उस अवस्था के समान है जिसने जीवन के उत्थान-पतन को बहुत क़रीब से देखा हो। यदि मालकौंस आँखों से बहती नदी है, तो दरबारी हृदय के भीतर जमा हुआ वह गहरा सागर है जिसकी लहरें शांत हैं पर जिनकी गहराई अनंत है। यह राग भी रात्रि के उत्तरार्ध में गाया जाता है, जहाँ ‘धुंधली भोर’ से ठीक पहले का समय आत्मा के साक्षात्कार का समय बन जाता है। यहाँ स्वर केवल मनोरंजन नहीं करते, बल्कि वे एक आध्यात्मिक गुरु की भांति व्यक्ति को स्वयं की कमियों और शक्तियों से परिचित कराते हैं।
साहित्यिक दृष्टि से देखें तो दरबारी पर लिखी गई कोई भी रचना मनुष्य के अहंकार के विसर्जन और उसकी विवशता के सौंदर्य को प्रकट करती है। इसके स्वरों का उतार-चढ़ाव जीवन के संघर्षों का संगीत है जो अंततः शांति की खोज में विलीन हो जाता है। उदाहरण के लिए अज्ञेय की कालजयी कविता ‘असाध्य वीणा’ का वह क्षण जब राजा अपना अहंकार विसर्जित करता है, राग दरबारी के दार्शनिक पक्ष का सबसे सुंदर उदाहरण है। यद्यपि कविता किसी एक राग का नाम नहीं लेती, किंतु जिस भावभूमि पर वीणा बजती है, वह दरबारी के मूल स्वभाव—अहंकार का विसर्जन और पूर्ण समर्पण—को ही रूपायित करती है। इस कविता में राजा जब हार मान लेता है और वीणा साधक प्रियम्वद के सामने अपना राजसी गर्व त्याग देता है, तब वीणा से जो स्वर फूटते हैं, वे राग दरबारी की दार्शनिक परिणति हैं। राजा का यह स्वीकार करना कि वह वीणा को नहीं बजा सकता, उसकी मानवीय विवशता का सौंदर्य है। प्रियम्वद का स्वयं को शून्य कर देना और वीणा का बजना वस्तुत: अहंकार का विसर्जन है –

पर नहीं, विसर्जन यह मेरा
मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में…”

यदि ‘राग मालकौंस’ कविता में मालकौंस ‘तरलता’ और ‘विरेचन’ (Catharsis) की नदी है, तो दरबारी वह ‘मौन’ है जो सब कुछ पा लेने के बाद की रिक्तता से जन्मता है। मालकौंस में स्त्री अपने दुखों को ‘स्वर-शिल्प’ में बदलती है, जबकि दरबारी में पुरुष (विजेता) अपने गौरव के बोझ को उतारकर ‘शून्य’ होने की कोशिश करता है।
अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ और समकालीन कवि रंजना मिश्र की कविता ‘राग मालकौंस’ दोनों ही रचनाएँ संगीत के माध्यम से ‘स्व’ के रूपांतरण की कथा कहती हैं, किंतु इनके केंद्र में सक्रिय ‘अहंकार का विसर्जन’ अलग-अलग धरातलों पर घटित होता है।
अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ में अहंकार का विसर्जन एक ‘शून्यता’ की मांग करता है। यहाँ वीणा तब तक नहीं बजती जब तक साधक प्रियम्वद अपने ‘हूँ’ (अहंकार) को पूरी तरह मिटा नहीं देता। प्रियम्वद का आत्म-विसर्जन एक दार्शनिक उपलब्धि है, जहाँ वह स्वयं को ‘कम्बल’ और ‘साधक’ की सीमाओं से मुक्त कर उस विराट ‘किरीटी-तरु’ को सौंप देता है। यहाँ संगीत ‘मौन’ से उपजता है और राजा का मुकुट (सत्ता का प्रतीक) उस विराट संगीत के सामने बौना हो जाता है। यह राग दरबारी की उस प्रकृति के करीब है जहाँ वैभव की पराकाष्ठा पर व्यक्ति अपनी विवशता को स्वीकार कर ‘विजेता’ से ‘शरणार्थी’ बन जाता है।
इसके विपरीत, रंजना मिश्र की ‘राग मालकौंस’ कविता में विसर्जन ‘तरलता’ के माध्यम से होता है। यहाँ अहंकार का विसर्जन ‘शून्य’ होने में नहीं, बल्कि ‘द्रवित’ होने में है। मालकौंस की इस यात्रा में स्त्री अपने भीतर की कठोरता और मर्यादा के ‘कूल-किनारों’ को तोड़कर स्वयं को एक ‘नदी’ के रूप में विसर्जित करती है। यदि अज्ञेय के यहाँ विसर्जन ‘स्थिरता और मौन’ है, तो रंजना जी के यहाँ यह ‘गति और रुदन’ है। यहाँ आँसू ही वह तत्त्व हैं जो अहंकार की बर्फ को पिघलाकर उसे संगीत के स्वरों में बदल देते हैं।
तुलनात्मक दृष्टि से थोड़ा और विचारें तो स्पष्ट होगा कि ‘असाध्य वीणा’ कविता में विसर्जन का मार्ग जहाँ मौन और शून्यता है, वहीं ‘राग मालकौंस’ कविता में अश्रु और तरलता है । ‘असाध्य वीणा’ में राग की प्रकृति गंभीर, मन्द्र और दार्शनिक है, वहीं ‘राग मालकौंस’ कविता में यह कोमल और विरेचंकारी है । ‘असाध्य वीणा’ में परिणाम अहंकार का अंत और शून्य में विलय है, पर ‘राग मालकौंस’ में संवेदना का उदय और राग में रूपांतरण है। दोनों कविताओं में प्रतीक भिन्न भिन्न हैं ।‘असाध्य वीणा’ में यह ‘कीरीटी तरु’ अर्थात विराट सत्ता है ,जबकि ‘राग मालकौंस’ में यह बहती नदी अर्थात आतंरिक प्रवाह है ।

कवि रंजना मिश्र की ख़ासियत यह है कि उन्होंने विसर्जन को ‘स्त्री-अनुभव’ से जोड़ दिया है। जहाँ अज्ञेय के प्रियम्वद का विसर्जन एक साधक का सचेत प्रयास है, वहीं रंजना जी की कविता में यह विसर्जन मीर तकी मीर की कविता में आया ‘तलातुम’ या एक नैसर्गिक विस्फोट (आँसू का फूटना) है। यह ‘मेटाफिजिकल’ विसर्जन न होकर एक ‘शारीरिक और संवेदनात्मक’ विसर्जन है, जो पितृसत्तात्मक कठोरता के विरुद्ध कोमलता की जीत की घोषणा करता है।
‘राग मालकौंस’ कविता के सन्दर्भ में संगीत और दर्शन को आलोचनात्मक सिद्धांतों में पिरोने पर हिंदी आलोचना समृद्ध हो सकती है। इस क्रम में राग मालकौंस और राग दरबारी के दार्शनिक अंतर को स्त्रीवादी और विखंडनवादी दृष्टि से स्पष्ट करना इस विमर्श को और भी अधिक सूक्ष्मता प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में, इस कविता के बहाने राग मालकौंस बनाम राग दरबारी की प्रकृति पर विचारने पर रचनाकार के अंतर्मन की गहराइयों का द्वंद्व कुछ और उभरकर सामने प्रकट होता है ।
भारतीय शास्त्रीय संगीत में मालकौंस और दरबारी कान्हड़ा दोनों ही गंभीर प्रकृति के राग हैं, परंतु उनके दार्शनिक और भावनात्मक धरातल भिन्न हैं। रंजना मिश्र की कविता जिस ‘मालकौंस’ को चुनती है, वह मूलतः विमुक्ति (Liberation) का राग है। मालकौंस में प्रयुक्त होने वाले कोमल स्वरों की सघनता—विशेषकर उसका ‘निषाद’ और ‘धैवत’—एक ऐसी आंतरिक पुकार पैदा करते हैं जो सामाजिक तटबंधों को तोड़ती है। यह राग मध्यरात्रि का है, जहाँ बाह्य संसार का कोलाहल शांत हो जाता है और ‘खुद के भीतर बहती एक और नदी’ का साक्षात्कार संभव होता है। स्त्रीवादी दृष्टि से यह ‘तरलता’ (Fluidity) का प्रतीक है, जहाँ आँसू और स्वर मिलकर एक नया ‘नाद-ब्रह्म’ रचते हैं।
इसके विपरीत, राग दरबारी कान्हड़ा अपनी प्रकृति में एक भारीपन और अधिनायकत्व (Regality) लिए हुए है। जहाँ मालकौंस ‘विरेचन’ (Catharsis) है, वहीं दरबारी एक थके हुए विजेता के ‘एकांत’ और ‘मानसिक द्वंद्व’ का राग है। दरबारी का संगीतशास्त्र निचले स्वर-सप्तक (मंद्र क्षेत्र) में विचरता है, जो अवसाद और गंभीरता की एक ऐसी परत बुनता है जो मालकौंस की प्रवाहमयी नदी के विपरीत ‘जमे हुए गहरे सागर’ के समान है। दरबारी के ‘गांधार’ और ‘धैवत’ पर दिया जाने वाला विशेष आंदोलन (Vibration) मन की उस कशमकश को दर्शाता है जिसे पितृसत्तात्मक मर्यादा अक्सर मौन में दबा देती है।

देरिदा के विखंडनवादी परिप्रेक्ष्य में देखें तो मालकौंस एक ‘सृजनात्मक विखंडन’ है—यह किनारों को तोड़कर नया मार्ग बनाता है। वहीं दरबारी ‘अहंकार का विसर्जन’ है। रंजना मिश्र की कविता में मालकौंस का चयन इसलिए सार्थक है क्योंकि वह ‘कोमलता के भार’ को पिघलाने की क्षमता रखता है। दरबारी का भार अक्सर स्थिर और बोझिल होता है, जबकि मालकौंस का भार ‘द्रवित’ करने वाला है। कवयित्री के यहाँ यह द्रवण ही वह बिंदु है जहाँ स्त्री-वेदना अपना गौरव (Dignity) प्राप्त करती है और विलाप को एक शास्त्रीय गरिमा में रूपांतरित कर देती है। मालकौंस ‘उजास के ठीक पहले’ की संधिबेला है—यह उस संभावना का संगीत है जहाँ अंधकार समाप्त होने वाला है। दरबारी जहाँ मनुष्य को उसके अतीत और उसके द्वारा ढोए गए भार के प्रति सचेत करता है, मालकौंस उसे उस ‘प्रवाह’ की ओर ले जाता है जहाँ आत्मा स्वयं को मुक्त अनुभव करती है। रंजना मिश्र की ‘राग मालकौंस’ कविता इसी ‘मुक्ति’ का संगीत है, जो ‘राग’ के माध्यम से ‘रुदन’ को एक वैश्विक कलाकृति में बदल देती है।

प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि संस्कृत साहित्य की परंपरा में, जहाँ संगीत को ईश्वर की आराधना से जोड़ा गया है, अभिनवगुप्त की व्याख्याओं में रागों के ‘अन्तःप्रवेश’ की चर्चा है। राग दरबारी जैसा राग जब ‘अहंकार विसर्जन’ की बात करता है, तो वह उपनिषदों के ‘नेति-नेति’ (यह भी नहीं, वह भी नहीं) के दर्शन के करीब पहुँच जाता है। यहाँ स्वर केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ‘कैवल्य’ (मोक्ष) की ओर एक विवश कदम है। भारतीय संगीत का यह पक्ष सिद्ध करता है कि राग केवल सुरों का समूह नहीं हैं, बल्कि वे मानवीय अनुभूतियों के विभिन्न पड़ाव हैं।
अभिनवगुप्त ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘तंत्रालोक’ और ‘अभिनवभारती’ में संगीत के माध्यम से चैतन्य के विस्तार और अहंकार के विसर्जन की अद्भुत व्याख्या की है। उनके अनुसार, जब कोई व्यक्ति मधुर स्वर या संगीत सुनता है, तो वह अपने सीमित ‘स्व’ (अहंकार) को भूलकर उस विराट चेतना में ‘अन्तःप्रवेश’ कर जाता है। उनके शब्दों में “जब मनुष्य का चित्त गीत और वाद्यों की ध्वनियों (संगीत) में पूरी तरह विलीन (प्रलीन) हो जाता है, तब वह तन्मयता की उस अवस्था को प्राप्त कर लेता है जो परम आनंदमय पद (परम चेतना) है”-
गीतवादित्रशब्देषु यदा चित्तं प्रलीयते।
तदा तन्मयतां याति परानन्दमयं पदम् ॥

अभिनवगुप्त के अनुसार, संगीत केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह ‘हृदय-विश्रांति’ का मार्ग है। मधुर संगीत सुनते समय व्यक्ति अपनी निजी चिंताओं और ‘मैं’ (अहंकार) को भूल जाता है। यह ‘स्व’ का भूलना ही ‘अन्तःप्रवेश’ की पहली सीढ़ी है। संगीत के स्वर सुनते ही श्रोता का हृदय ‘विमल’ (स्वच्छ) हो जाता है। उस समय वह जो आनंद अनुभव करता है, वह उसका निजी आनंद नहीं होता, बल्कि वह ‘ब्रह्मानंद’ का ही एक रूप (ब्रह्मानंद सहोदर) होता है। प्रकारांतर से विवशता का सौन्दर्य उद्घाटित करते हुए आचार्य अभिनवगुप्त कहते हैं कि राग दरबारी या मालकौंस जैसे गंभीर रागों को सुनते समय जब चित्त द्रवित होता है, तो वह कठोर अहंकार की परतों को पिघला देता है। उनके शब्दों में यह ‘चित्त-द्रुति’ है और रंजना मिश्र की कविता में प्रयुक्त शब्द “द्रवित” शब्द जिसके बहुत निकट है। रंजना मिश्र की कविता में “कोरों के कूल किनारे तोड़ना” वास्तव में अभिनवगुप्त के उसी ‘विकास’ या चेतना के विस्तार का आधुनिक काव्य-रूप है, जहाँ सीमित मर्यादाएँ टूटती हैं और गायक (या श्रोता) नाद के माध्यम से विराट सत्ता में प्रवेश कर जाता है।
संगीतशास्त्र की परिधि से बाहर आकर ‘राग मालकौंस’ कविता को संरचनावादी निकष पर और ख़ास तौर पर रोलाँ बार्थ द्वारा साहित्यालोचन के लिए प्रस्तावित कोडों के अंतर्गत परखने के पहले इस मुद्दे की थोड़ी चर्चा शायद ज़रूरी हो । निवेदन है कि संरचनावाद के भीतर भाषाई व्यवस्था और अर्थ-उत्पादन की प्रक्रिया को समझने के लिए रोलाँ बार्थ के पाँच कोड (S/Z) अत्यंत प्रभावी उपकरण माने जाते हैं। ‘राग मालकौंस’ कविता में इन कोडों का विनियोग इस प्रकार देखा जा सकता है । प्रश्नात्मक कोड (Hermeneutic Code) के तहत कविता की शुरुआत “कोरों के कूल किनारे तोड़ता” से होती है। पाठक के मन में तुरंत प्रश्न उठता है कि यह कौन सा आवेग है जो इन किनारों को तोड़ रहा है? इस प्रश्न का उत्तर राग मालकौंस के स्वरों में छिपा है। संकेत कोड (Semic Code) के अनुसार “गहरी रात”, “धुंधली भोर” और “गझिन कोमलता” जैसे शब्द केवल समय या गुण के वाचक नहीं हैं, बल्कि वे राग की शास्त्रीय गंभीरता और मनुष्य की मानसिक सघनता के संकेत (Connotations) हैं। प्रतीकात्मक कोड (Symbolic Code) के अंतर्गत यहाँ ‘नदी’ और ‘आँसू’ का द्वैत है। आँसू का बहना विसर्जन है, जबकि राग का फूटना सृजन। यह विरोध (Opposition) ही कविता की प्रतीकात्मक बुनावट करता है।क्रियात्मक कोड (Proairetic Code) के तहत विचारें ,तो “बह निकली”, “फूटा”, “तोड़ता” – ये क्रियाएँ एक निरंतर गतिशीलता और भावनात्मक विरेचन की प्रक्रिया को पूर्ण करती हैं।सांस्कृतिक कोड (Cultural/Gnomic Code) बताता है कि भारतीय संगीतशास्त्र और रागों के समय-चक्र (Time Cycle) का ज्ञान इस कविता के अर्थ को पूर्णता देता है। मालकौंस का मध्यरात्रि और करुणा से संबंध एक सांस्कृतिक सत्य है।
बार्थियन कोडों से विलग उत्तर-संरचनावाद और देरिदा के विखंडन (Deconstruction) सिद्धांत के आलोक में यह कविता किसी एक स्थिर अर्थ (Stable Meaning) पर नहीं रुकती। देरिदा के विखंडनवाद के अनुसार, ‘भाषा स्वयं में अपूर्ण है’। यहाँ “गझिन कोमलता के भार से द्रवित” होना एक अंतर्विरोध पैदा करता है। कोमलता सामान्यतः हल्की होती है, लेकिन यहाँ वह ‘भार’ बन गई है।विखंडन की दृष्टि से देखें तो राग मालकौंस केवल एक बाह्य संगीत नहीं है, बल्कि वह मौन की अनुपस्थिति में स्वयं को व्यक्त कर रहा है। यहाँ ‘उपस्थिति’ (Presence) और ‘अनुपस्थिति’ (Absence) की क्रीड़ा है। संगीत तब उपस्थित होता है जब शब्द अनुपस्थित हो जाते हैं। देरिदा के ‘डिफ़रांस ‘ (Différance) के सिद्धांत के अनुसार, कविता का अर्थ निरंतर टल रहा है—वह न तो पूरी तरह राग है, न पूरी तरह रुदन, बल्कि दोनों के बीच की एक रिक्तता है।
स्त्रीवादी आलोचना के नज़रिए से इस कविता को ‘स्त्री-भाषा’ (Écriture féminine) के रूप में देखा जा सकता है। हेलेन सिक्सू (Hélène Cixous) के सिद्धांतों के अनुसार, स्त्री का लेखन उसके शरीर और संवेदनाओं से जुड़ा होता है।इस कविता में “खुद के भीतर बहती एक और नदी” का बिम्ब अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पितृसत्तात्मक संरचनाओं द्वारा आरोपित कठोरता के विरुद्ध ‘तरलता’ (Fluidity) का उत्सव है। स्त्री का दुःख यहाँ कमजोरी नहीं, बल्कि एक सृजनात्मक शक्ति के रूप में प्रकट हुआ है। “कोरों के कूल किनारे तोड़ना” उस सामाजिक नियंत्रण और मर्यादा के किनारों को तोड़ने का रूपक भी हो सकता है जो स्त्रियों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने से रोकता है।
कविता में ‘मालकौंस’ का चयन भी सार्थक है। यह राग वीर और शांत रसों का मिश्रण है, जो एक स्त्री की शक्ति और उसकी आंतरिक शांति के सामंजस्य को दर्शाता है। यहाँ स्त्री रोती नहीं है, बल्कि वह अपने आँसुओं को एक ‘स्वर-शिल्प’ में बदल देती है। यह दुःख का निजीकरण न होकर उसका उदात्तीकरण (Sublimation) है।कुल मिलाकर यह कविता संरचनात्मक रूप से जितनी कसी हुई है, वैचारिक रूप से उतनी ही मुक्त है। दूसरे शब्दों में यह कविता राग, रुदन और रचना के त्रिकोण पर टिकी है।
‘राग मालकौंस’ कविता का स्त्रीवादी पाठ पितृसत्तात्मक संरचनाओं द्वारा आरोपित भावशून्यता और कठोरता के विरुद्ध ‘तरलता’ के सौंदर्यशास्त्र को प्रतिष्ठित करता है। स्त्रीवादी आलोचना, विशेषकर हेलेन सिक्सू द्वारा प्रतिपादित ‘एक्रितुर फेमिनिन’ (स्त्री-लेखन) के आलोक में, यह कविता देह और मन के उस एकांत का उत्सव है जहाँ स्त्री अपने दुखों को केवल सहती नहीं बल्कि उन्हें सृजन में रूपांतरित कर देती है। कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ “कोरों के कूल किनारे तोड़ता, आंसू फूटा गहरी रात” उस सामाजिक और मर्यादावादी नियंत्रण के टूटने का रूपक हैं जो सदियों से स्त्री की अभिव्यक्ति को संयम और मौन के किनारों में बांधे हुए था। यहाँ ‘किनारों का टूटना’ कोई विखंडन नहीं, बल्कि एक अनिवार्य विमुक्ति है। स्त्री का रुदन यहाँ कमजोरी का परिचायक न होकर एक सक्रिय शक्ति के रूप में उभरता है, जो आंतरिक जड़ता को काटकर “एक और नदी” का मार्ग प्रशस्त करता है। यह नदी उस आदिम स्त्री-चेतना की प्रतीक है जो सभ्यता के थोपे गए नियमों से परे अपने सहज वेग में प्रवाहित होना चाहती है।
कविता में प्रयुक्त “गझिन कोमलता के भार से द्रवित” होना स्त्री-अनुभव की उस सघनता को दर्शाता है जहाँ कोमलता कोई लाचारी नहीं बल्कि एक ऐसा ‘भार’ या गरिमा है जो पत्थर सदृश कठोर व्यवस्था को पिघलाने की क्षमता रखती है।यह रंजना जी के कविता संग्रह ‘पत्थर समय की सीढ़ियाँ’ के पत्थर की याद दिलाता है। पारंपरिक विमर्शों में कोमलता को स्त्री की दुर्बलता माना गया, किंतु यहाँ वह एक ‘द्रव्य’ है जो जम चुके अनुभवों को पिघलाकर संगीत बना देता है। राग मालकौंस का चुनाव इस परिप्रेक्ष्य में अत्यंत अर्थपूर्ण है क्योंकि यह राग अपनी प्रकृति में पुरुषोचित ओज और स्त्रियोचित करुणा का एक अद्भुत अद्वैत है। जब कवयित्री कहती हैं कि “वे स्वर हैं मालकौंस के”, तो वह वास्तव में एक ऐसी स्वायत्त स्त्री-सत्ता की घोषणा कर रही हैं जो अपने भीतर के अंधकार (गहरी रात) का सामना करती है और उसे “उजास के ठीक पहले” की उस संधिबेला तक ले जाती है जहाँ आत्म-साक्षात्कार संभव है। यह ‘उजास’ किसी बाहरी सत्ता से प्राप्त प्रकाश नहीं है, बल्कि स्वयं के भीतर से फूटी हुई वह स्वर-लहरी है जिसने दुःख के मरुस्थल को राग की नदी में बदल दिया है।
उत्तर-संरचनावादी और स्त्रीवादी दृष्टि से इस कविता का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि यहाँ ‘स्वर’, ‘नदी’ और ‘स्त्री’ एक ही इकाई के तीन नाम हैं। पितृसत्ता ने जिसे ‘आँसू’ कहकर नकारा, कवयित्री ने उसे ‘राग मालकौंस’ का गौरव प्रदान किया। यह हाशिए पर धकेली गई संवेदनाओं का मुख्यधारा के शास्त्रीय गौरव के साथ सामंजस्य है। कविता यह सिद्ध करती है कि स्त्री का एकांत कोई रिक्तता नहीं, बल्कि एक ऐसा गझिन और सघन संसार है जहाँ वह अपनी पीड़ा को ‘नाद-ब्रह्म’ में बदलकर स्वयं को और इस जगत को पुनः परिभाषित करती है। इस प्रकार, यह रचना केवल एक राग का वर्णन नहीं है, बल्कि स्त्री-अस्तित्व के उस संगीत का दस्तावेज़ है जो मर्यादाओं के तटबंध तोड़कर अपनी अस्मिता की नई परिभाषा गढ़ता है।
जूलिया क्रिस्टेवा के ग्रंथ ‘रेवोल्यूशन इन पोएटिक लैंग्वेज’ (1974) में प्रतिपादित ‘सेमियोटिक’ (Semiotics/Le Sémiotique) और ‘सिम्बोलिक’ (Symbolic/Le Symbolique) का द्वैध, रंजना मिश्र की कविता ‘राग मालकौंस’ की व्याख्या के लिए एक अत्यंत गहरा सैद्धांतिक आधार प्रदान करता है। क्रिस्टेवा के अनुसार, काव्य-भाषा इन दो तत्वों के बीच के निरंतर तनाव और अंतःक्रिया का परिणाम है।
यहाँ कविता में कोरों के कूल किनारे तोड़ना ‘सेमियोटिक’ का विस्फोट है । क्रिस्टेवा के अनुसार, ‘सेमियोटिक’ भाषा का वह पूर्व-भाषाई (Pre-Oedipal) स्तर है जो लय, ध्वनि, आवेग और शारीरिक संवेदनाओं से जुड़ा होता है। यह भाषा तर्कहीन, अराजक और प्रवाहमयी है। कविता की शुरुआत ही “कूल किनारे तोड़ता” से होती है। यहाँ ‘किनारे’ उस ‘सिम्बोलिक’ व्यवस्था (सामाजिक नियम, व्याकरण, मर्यादा) के प्रतीक हैं जो भावनाओं को एक निश्चित आकार में बांधकर रखते हैं। “आँसू फूटा” और “बह निकली ख़ुद के भीतर” की क्रिया उस ‘सेमियोटिक’ आवेग का प्रतीक है जो ‘सिम्बोलिक’ अनुशासन को भंग कर बाहर आता है। क्रिस्टेवा जिसे ‘कोरा’ (Chora) कहती हैं—एक ऐसी जगह जहाँ अर्थ अभी बना नहीं है, बस स्पंदन है—वही स्पंदन इस कविता में “गहरी रात” के सन्नाटे में फूटता है। इस रचना में राग मालकौंस की शास्त्रीयता को ‘सिम्बोलिक’ का अनुशासन से जोड़कर देखा जा सकता है। ‘सिम्बोलिक’ वह व्यवस्था है जो भाषा को अर्थ, व्याकरण, सामाजिक नियम और संरचना प्रदान करती है। यह पितृसत्तात्मक और तार्किक व्यवस्था है। कविता में ‘राग मालकौंस’ का नाम लेना ‘सिम्बोलिक’ व्यवस्था में प्रवेश करना है। राग के अपने नियम हैं, निश्चित स्वर हैं और एक शास्त्रीय ढांचा है। क्रिस्टेवा मानती हैं कि काव्य-भाषा में ‘सेमियोटिक’ तत्व ‘सिम्बोलिक’ व्यवस्था के भीतर ही प्रकट होता है। यहाँ कवयित्री ने उस आंतरिक, निराकार रुदन (सेमियोटिक) को ‘मालकौंस’ (सिम्बोलिक) के शास्त्रीय सांचे में ढालकर उसे एक गरिमा और पहचान दी है। यह केवल विलाप नहीं है, यह ‘राग’ है।
क्रिस्टेवा का तर्क है कि काव्य-भाषा में ‘सेमियोटिक’ तत्व ‘सिम्बोलिक’ भाषा के तार्किक अर्थों को ‘विस्थापित’ (Displace) कर देते हैं। “गझिन कोमलता के भार से द्रवित” होना तार्किक भाषा (Symbolic) के विरुद्ध विद्रोह है। व्याकरणिक रूप से कोमलता भारहीन होनी चाहिए, लेकिन यहाँ वह सघन (गझिन) और भारी है। यह ‘सेमियोटिक’ की वह सघनता है जो ‘सिम्बोलिक’ अर्थों को पिघलाकर (द्रवित कर) एक नई संवेदना की सृष्टि करती है। यहाँ शब्द अपने शब्दकोशीय अर्थ को छोड़कर एक ‘लयबद्ध अनुभूति’ बन जाते हैं। जाहिर है कि संगीत में भाषा का अतिक्रमण होता है ।क्रिस्टेवा के लिए संगीत ‘सेमियोटिक’ के सबसे करीब है क्योंकि इसमें शब्द नहीं, केवल ध्वनि और लय होती है। कविता का शीर्षक और उसकी आत्मा ‘संगीत’ (मालकौंस) है। जब कवयित्री कहती हैं “वे स्वर हैं मालकौंस के”, तो वह भाषा की सीमा को पार कर रही हैं। यहाँ कविता ‘क्रांतिकारी’ (Revolutionary) हो जाती है, क्योंकि वह पाठक को केवल सूचना नहीं देती, बल्कि राग की तरंगों के माध्यम से एक ‘शारीरिक और मानसिक बोध’ (Bodily experience) कराती है। “उजास के ठीक पहले” की स्थिति वह क्षण है जहाँ ‘सेमियोटिक’ और ‘सिम्बोलिक’ का मिलन एक नई चेतना को जन्म देता है। अपने सैद्धांतिक विवेचन में क्रिस्टेवा ‘सब्जेक्ट-इन-प्रोसेस’ (निरंतर परिवर्तनशील कर्ता) की बात करती हैं। इस कविता में भी स्त्री-अस्तित्व स्थिर नहीं है। वह “बहती एक और नदी” की तरह प्रवाहमयी है। कविता का अंत किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं, बल्कि एक ‘धुंधली भोर’ पर होता है—जो निरंतर बनने और होने की प्रक्रिया का संकेत है।
उल्लेखनीय है कि ‘राग मालकौंस’ कविता के विश्लेषण में जूलिया क्रिस्टेवा का ‘सेमियोटिक’ (Semiotics) विस्फोट के साथ ही अभिनवगुप्त का तंत्र-शास्त्रीय ‘अन्तःप्रवेश एक ही सत्य के दो छोरों की तरह मिलते प्रतीत होते हैं। यह मिलन बिंदु आधुनिक कविता की उस शक्ति को रेखांकित करता है जहाँ प्राचीन भारतीय दर्शन और समकालीन पाश्चात्य सिद्धांत एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं।
दोहराव का ख़तरा उठाते हुए निवेदन है कि क्रिस्टेवा के अनुसार, ‘सेमियोटिक’ वह आदिम आवेग है जो भाषा के व्याकरण और पितृसत्तात्मक अनुशासन (Symbolic) को भंग कर देता है। रंजना जी की कविता में जब “कोरों के कूल किनारे” टूटते हैं, तो वह केवल भावनाओं का आवेग नहीं है, बल्कि अभिनवगुप्त के शब्दों में वह ‘चित्त-द्रुति’ है—यानी हृदय का वह पिघलना जो अहंकार के कठोर किनारों को समाप्त कर देता है। अभिनवगुप्त जिसे “गीतवादित्रशब्देषु यदा चित्तं प्रलीयते” (जब संगीत में चित्त विलीन होता है) कहते हैं, वह वास्तव में क्रिस्टेवा के उस ‘कोरा’ (Chora) में लौटना है, जहाँ शब्द अभी अर्थों की सीमाओं में बँधे नहीं हैं, बल्कि केवल स्पंदन और लय के रूप में जीवित हैं।
यहाँ ‘अन्तःप्रवेश’ का अर्थ है—स्वयं के उस एकांत में प्रवेश करना जहाँ सामाजिक मुखौटे और अहंकार का ‘मुकुट’ (जैसा कि ‘असाध्य वीणा’ के संदर्भ में हमने देखा) गिर जाता है। रंजना मिश्र की कविता में यह विसर्जन ‘स्त्री-चेतना’ के माध्यम से घटित होता है। पितृसत्ता जिसे ‘रुदन’ या ‘अश्रु’ कहकर निर्बलता मानती आई है , अभिनवगुप्त की दृष्टि में वही ‘द्रवित होना’ परम आनंद के पद की प्राप्ति का मार्ग है। संगीत की यह ‘नाद-भाषा’ (Sémiotique) तार्किक भाषा का अतिक्रमण कर पाठक को उस ‘परानन्द’ तक ले जाती है, जहाँ ‘उजास के ठीक पहले’ की अवस्था आत्म-साक्षात्कार की अवस्था बन जाती है।
इस प्रकार, रंजना मिश्र की कविता राग मालकौंस के माध्यम से एक ऐसी ‘क्रांतिकारी काव्य-भाषा’ (Revolutionary Poetic Language) का सृजन करती है, जो देह की संवेदना को ब्रह्मांडीय नाद से जोड़ देती है। यह ‘अन्तःप्रवेश’ ही वह बिंदु है जहाँ राग, रुदन और रचना मिलकर एक ऐसी अखंड सत्ता निर्मित करते हैं, जो समय और समाज के तटबंधों से परे ‘अस्मिता’ की नई परिभाषा गढ़ती है।
वस्तुत: यह कविता क्रिस्टेवा के सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप प्रदान करती है और पाठक को महसूस कराती है कि कैसे एक कलाकार अपने भीतर के ‘सेमियोटिक’ तूफ़ान (आंसू और आवेग) को ‘सिम्बोलिक’ कला (राग मालकौंस) के माध्यम से एक उदात्त सौंदर्य में रूपांतरित कर देता है। यहाँ संगीत और रुदन का एक होना ही वह ‘क्रांति’ है जिसकी चर्चा क्रिस्टेवा अपनी पुस्तक में करती हैं। इस सन्दर्भ में मीर की कुछ काव्यपंक्तियों की याद न आए, यह नामुमकिन है –

कहा मैं ने कितना है गुल का सबात
कली ने ये सुन कर तबस्सुम किया ।
जिगर में ही इक क़तरा खूँ है सरिश्क
पलक तक गया तो तलातुम किया ।

‘राग मालकौंस’ कविता पर आधारित इस आलेख में तमाम तर्कों को एक सूत्र में पिरोते हुए यह कहा जा सकता है कि यह कविता केवल एक राग का शाब्दिक चित्रण नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदना के उस ‘मेटाफिजिकल’ धरातल की खोज है जहाँ दुःख, कला और अस्तित्व एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। संरचनात्मक दृष्टि से रोलाँ बार्थ के कोडों से यह सिद्ध होता है या कि कविता की बुनावट कितनी सघन है, वहीं विखंडनवादी पाठ से स्पष्ट होता है कि ‘मालकौंस’ यहाँ किसी बँधी-बँधाई शास्त्रीय परिभाषा का मोहताज नहीं , बल्कि वह अर्थों के निरंतर स्थगन और नए अर्थों के उदय की एक प्रक्रिया है।
स्त्रीवादी परिप्रेक्ष्य ने यह रचना बताती है कि स्त्री का ‘द्रवित’ होना उसकी दुर्बलता नहीं बल्कि उसकी वह सृजनात्मक शक्ति है, जो कठोर तटबंधों को तोड़ने का साहस रखती है। भाषिक विस्थापन के माध्यम से कवि ने शब्दों को उनके नियत अर्थों से मुक्त कर एक ऐसी ‘नाद-भाषा’ की सृष्टि की है जो पाठक को तार्किक बोध से ऊपर उठाकर एक संवेदनात्मक समाधि की ओर ले जाती है। यह कविता अंततः यह संदेश देती है कि महान कला वही है जो अपने माध्यम (शब्द) का अतिक्रमण कर उस ‘मौन’ तक पहुँच जाए जहाँ से ‘उजास’ का जन्म होता है। इस प्रकार ‘राग मालकौंस’ कविता समकालीन हिंदी कविता के एक ऐसे प्रतिमान के रूप में स्थापित होती है जहाँ शास्त्र और लोक, परंपरा और आधुनिकता, तथा पुरुषोचित ओज और स्त्रियोचित करुणा का पूर्ण सामंजस्य घटित होता है।
विश्व साहित्य के परिप्रेक्ष्य में देखें तो रंजना मिश्र की यह काव्य-दृष्टि टी.एस. एलियट, पॉल सेलान और फेडरिको गार्सिया लोर्का जैसे कवियों की याद दिलाती है । जहाँ एलियट के ‘फोर क्वार्टेट्स’ में संगीत एक दार्शनिक संरचना प्रदान करता है और लोर्का की कविताओं में वह मृत्यु और जुनून का ‘डुआंडे’ (Duende) बनकर आता है, वहीं रंजना मिश्र के यहाँ राग मालकौंस ‘आत्म-साक्षात्कार’ का माध्यम है। भारतीय संदर्भों में अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ जिस शून्य और मौन की बात करती है, रंजना जी की कविता उस मौन को एक ‘राग’ की पहचान देकर उसे मानवीय गरिमा से मंडित करती है। रोलाँ बार्थ के कोडों के आलोक में यह कविता अपनी संरचना में जितनी कसी हुई है, अर्थ के स्तर पर उतनी ही टलने वाली और बहुआयामी है। यह कविता अंततः यह सिद्ध करती है कि राग केवल सुरों का समूह नहीं, बल्कि मानवीय अनुभूतियों के वे पड़ाव हैं जहाँ शब्द समाप्त होते हैं और ‘उजास’ का प्रारंभ होता है। यह रचना शास्त्र और लोक, परंपरा और आधुनिकता, तथा पुरुषोचित ओज और स्त्रियोचित करुणा के बीच एक ऐसा संवेदनात्मक सेतु निर्मित करती है जो समकालीन हिंदी कविता में विरल है।

‘राग मालकौंस’ कविता को विश्व साहित्य के दिग्गजों की रचनाओं के साथ रखकर पढ़ने-गुनने पर संगीत और शब्द के अंतर्संबंधों के नए आयाम खुलते हैं। टी.एस. एलियट के कालजयी काव्य ‘फोर क्वार्टेट्स’ (Four Quartets) में संगीत केवल विषय नहीं, बल्कि एक दार्शनिक ढांचा है। एलियट लिखते हैं, “संगीत इतना गहराई से सुना गया कि वह सुनाई ही नहीं दिया, बल्कि आप खुद संगीत बन गए” (Music heard so deeply that it is not heard at all, but you are the music while the music lasts)। यहाँ एलियट का आशय उस ‘स्थिर बिंदु’ से है जहाँ समय और कालातीत का मिलन होता है। रंजना जी की कविता में भी जब ‘आँसू’ राग मालकौंस के स्वर बन जाते हैं, तो वह क्षण भी समय की परिधि से मुक्त होकर एक आध्यात्मिक सत्य में बदल जाता है।
वहीं स्पेनिश कवि फेडरिको गार्सिया लोर्का (Federico García Lorca) के यहाँ संगीत ‘डुआंडे’ (Duende) के रूप में प्रकट होता है। लोर्का के अनुसार, ‘डुआंडे’ वह रूहानी शक्ति है जो किसी कलाकार के भीतर मृत्यु और सृजन के संघर्ष से पैदा होती है। वे लिखते हैं, “डुआंडे कोई शैली नहीं है, यह एक जीवित शक्ति है, यह एक रक्त है” (The duende is not a matter of ability, but of real live form; of blood; of ancient culture; of creative action)। रंजना मिश्र की कविता में ‘कोरों के कूल किनारे तोड़ना’ इसी ‘डुआंडे’ या आंतरिक आवेग का प्रस्फुटन है, जो कला को महज तकनीक न रखकर एक दैहिक और आत्मिक अनुभव बना देता है। लोर्का का संगीत जहाँ अंधकार और जुनून से भरा है, इस कविता का ‘मालकौंस’ उसी अंधकार (गहरी रात) को चीरकर ‘उजास’ की ओर ले जाता है।
जर्मन भाषा के कवि पॉल सेलान (Paul Celan) अपनी कविता ‘डेथ फ्यूग’ (Death Fugue / Todesfuge) में संगीत की ‘फ्यूग’ (Fugue) शैली का उपयोग करते हैं, जिसमें स्मृतियाँ और स्वर बार-बार लौटते हैं। वे लिखते हैं, “मृदा में हम कब्र खोदते हैं जहाँ लेटने में तंगी नहीं” (We shovel a grave in the air there you won’t lie too cramped)। सेलान जहाँ संगीत की पुनरावृत्ति का उपयोग इतिहास की त्रासदी को दर्ज करने के लिए करते हैं, वहीं रंजना मिश्र ‘गझिन कोमलता’ की पुनरावृत्ति से व्यक्तिगत विलाप का उदात्तीकरण करती हैं। इन तीनों महाकवियों के कई दशकों बाद जन्मी रंजना मिश्र की विशिष्टता यह है कि वे रागों के शास्त्रीय विधान को ‘स्त्री-संवेदना’ की तरलता से जोड़कर उसे एक नई वैश्विक पहचान देती हैं, जहाँ विलाप संगीत में विसर्जित होकर विमुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
टी.एस. एलियट, पॉल सेलान और लोर्का की रचना-प्रक्रिया के साथ रंजना मिश्र के ‘स्वर-शिल्प’ का तकनीकी और संवेदनात्मक साम्य वास्तव में शब्द और नाद के उस सूक्ष्म अंतर्संबंध को उजागर करता है, जहाँ भाषा अपनी भौतिक सीमाओं को लांघने की कोशिश करती है।
एलियट की ‘फोर क्वार्टेट्स’ (Four Quartets) की रचना-प्रक्रिया संगीत के ‘थीम और वेरिएशन’ (Theme and Variation) पर आधारित है। वे कविता में एक विचार को उठाते हैं और उसे संगीत के वाद्ययंत्रों की तरह अलग-अलग कोणों से दोहराते हैं। एलियट का मानना था कि “कविता में संगीत का अर्थ केवल शब्दों की मधुर ध्वनि नहीं, बल्कि अर्थों का लयबद्ध विस्तार है” (The music of poetry is not something which exists apart from the meaning)। ‘राग मालकौंस’ कविता में ‘मालकौंस’ का प्रयोग भी इसी तरह एक दार्शनिक थीम की तरह आता है। कवि ने राग के तकनीकी पक्ष—जैसे कोमल स्वरों का प्रयोग—को अर्थ के विस्तार से जोड़ा है । जब वे “गझिन कोमलता” की बात करती हैं, तो वह मालकौंस के ‘गांधार’ और ‘धैवत’ जैसे कोमल स्वरों के उस ‘कम्पन’ (Vibration) का शाब्दिक रूपांतरण है, जो श्रोता के भीतर एक सघन भारीपन पैदा करता है।
रंजना जी के “आँसू फूटा” वाले आवेग को फेडरिको गार्सिया लोर्का की ‘डुआंडे’ (Duende) की अवधारणा के क़रीब रखकर देखा जा सकता है। लोर्का कहते हैं कि असली कला वह है जिसमें “काली आवाज़ें” (Black sounds / Sonidos negros) हों, यानी वह कला जो मृत्यु के स्पर्श और जीवन के संघर्ष से उपजी हो। लोर्का ‘गिटार’ कविता में लिखते हैं, “गिटार का विलाप शुरू होता है… इसे चुप कराना असंभव है” (The lament of the guitar begins… It is impossible to hush it)। रंजना मिश्र की कविता में भी ‘नदी’ का बहना और ‘किनारों का टूटना’ उसी ‘असंभव चुप्पी’ का अंत है। तकनीकी रूप से, जिस प्रकार स्पेनिश ‘कैंटे जोंडो’ (Cante Jondo) में गले की बारीक तानों से दुःख व्यक्त होता है, रंजना जी ‘गझिन’ और ‘द्रवित’ जैसे शब्दों के ‘ध्वन्यात्मक चयन’ (Phonetic selection) से वही सघनता पैदा करती हैं।
पॉल सेलान की ‘डेथ फ्यूग’ (Death Fugue) में ‘फ्यूग’ एक ऐसी संगीत रचना है जिसमें एक ही धुन अलग-अलग स्तरों पर एक-दूसरे का पीछा करती है। सेलान “रात का काला दूध” (Black milk of daybreak) जैसे बिम्बों को बार-बार दोहराकर एक भयावह लय पैदा करते हैं। रंजना जी की कविता में यह ‘पुनरावृत्ति’ (Repetition) संरचनात्मक न होकर संवेदनात्मक है। वे ‘गहरी रात’ से शुरू कर ‘धुंधली भोर’ तक जिस यात्रा का वर्णन करती हैं, वह संगीत के ‘आरोह’ और ‘अवरोह’ (Ascending and Descending scales) की तरह काम करता है। राग मालकौंस का चढ़ाव-उतार जिस प्रकार मन को एक ‘ट्रांस’ (Trance) की स्थिति में ले जाता है, रंजना जी का स्वर-शिल्प भी पाठक को उसी मानसिक विरेचन तक पहुँचाता है।

यह तुलनात्मक अध्ययन सिद्ध करता है कि ‘राग मालकौंस’ केवल एक भारतीय राग पर लिखी गई कविता नहीं है, बल्कि यह एक भारतीय स्त्री-कवि द्वारा रचित ऐसी विलक्षण कविता है जो कवि की संपूर्ण रचनात्मक उपलब्धि की दृष्टि से ‘विश्व-कविता’ के महारथियों की उपलब्धियों से किसी भी मायने में तुलनीय न होने के बावजूद एक हद तक उस व्याकरण का हिस्सा है जहाँ संगीत और विलाप मिलकर अस्तित्व का नया अर्थ गढ़ते हैं।
रंजना मिश्र का विशिष्ट योगदान यह है कि उन्होंने इस ‘मेटाफिजिकल’ अनुभव को ‘स्त्री-देह’ और ‘स्त्री-मन’ की स्वायत्तता से जोड़ दिया है। जहाँ पश्चिमी कवियों के यहाँ संगीत अक्सर एक अमूर्त दार्शनिकता है, कवि रंजना के यहाँ वह एक मनोदैहिक प्रक्रिया (साइकोसोमेटिक प्रोसेस) या ‘जैविक क्रिया’ (Biological process) की तरह सहज और अनिवार्य है।
निष्कर्षतः, ‘राग मालकौंस’ कविता की यह ‘नाद-भाषा’ समकालीन हिंदी कविता के लिए एक ऐसा नया प्रतिमान स्थापित करती है जहाँ शब्द अब केवल सूचना के वाहक नहीं, बल्कि अनुभूतियों के ‘स्वर-शिल्प’ में रूपांतरित हो चुके हैं। कविता इस सत्य को उद्घाटित करती है कि भविष्य की कविता वहीं संभव है जहाँ शास्त्र की मर्यादा और लोक की तरलता का पूर्ण सामंजस्य हो। रंजना जी ने राग मालकौंस के माध्यम से दुःख का जो उदात्तीकरण किया है, वह कला के उस चरम उत्कर्ष का परिचय देता है जिसे दार्शनिकों ने ‘मौन का संगीत’ कहा है।
यह ‘नाद-भाषा’ केवल भावों की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि यह उस ‘अनहद’ (Unstruck sound) की अनुगूंज है जो शब्दों के चुक जाने के बाद भी शेष रह जाती है। जिस प्रकार मालकौंस की अंतिम तान श्रोता को एक गहन शांति और ‘उजास’ में छोड़ जाती है, उसी प्रकार यह कविता भी पाठक को उस संधिबेला पर लाकर खड़ा कर देती है जहाँ आत्म-साक्षात्कार और विश्व-बोध एकाकार हो जाते हैं। यह रचना सिद्ध करती है कि जब विलाप कला का रूप लेता है, तो वह केवल व्यक्तिगत रुदन नहीं रह जाता, बल्कि वह ‘ब्रह्मांडीय संगीत’ का हिस्सा बन जाता है—एक ऐसी शाश्वत नदी जो समय के कूल-किनारों को तोड़ती हुई अनंत की ओर प्रवाहित होती है।

(तीन )

राग गौड़ सारंग

समंदर में नाचती मछलियों सा
नाचता है पुराना चावल देग में
फैलाई सूखने को फटी धोती
बूढ़े बरगद ने आँगन में
पक चली सुबह की सीढ़ियों से
उतरती है धुन कोई, इठलाती हुई
किसी याद सी चमचमाती है
गौड़ सारंग ने अभी ही पुकारा है
‘आज मोरी अंखियाँ पलन लागी’
-रंजना मिश्र

रंजना मिश्र की यह कविता एक सूक्ष्म संवेदनात्मक चित्रपट है, जहाँ संगीत, स्मृति और समय की रेत एक साथ मिलकर एक जीवंत दृश्य रचते हैं।यह कविता केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि एक अनुभव (Experience) का मूर्तन है। यहाँ राग ‘गौड़ सारंग’ केवल एक पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि कविता की आत्मा है। इसमें स्थिरता और गति का संगम काबिले गौर है. पुराने चावल का देग में नाचना और फटी धोती का बरगद की छाँव में सूखना—जैसे बिम्ब एक मध्यमवर्गीय, पुराने घर की सादगी और ठहराव को दर्शाते हैं।कविता में समय का बीतता पहर भी विचारणीय है। सुबह की सीढ़ियों से उतरती धुन समय के प्रवाह का प्रतीक है।

भारतीय शास्त्रीय संगीतशास्त्र के मुताबिक़ राग गौड़ सारंग दोपहर का राग है, जो अपनी चंचलता और वक्र चाल के लिए जाना जाता है। संगीतशास्त्रीय निकष पर इस कविता को परखने पर राग गौड़ सारंग का स्वरूप उभरकर सामने आता है.कविता की पंक्तियाँ राग के व्याकरण को अद्भुत ढंग से प्रतिध्वनित करती हैं।इसकी प्रकृति एवं अनुगूँज पर दृष्टि डालने से स्पष्ट होता है कि गौड़ सारंग एक वक्र (Crooked) प्रकृति का राग है। जिस प्रकार कविता में मछलियाँ ‘नाचती’ हैं और चावल ‘इठलाता’ है, वैसे ही इस राग के स्वर सीधे नहीं चलते। इसमें कल्याण और बिलावल थाट के स्वरों का ऐसा मिश्रण होता है जो सुनने वाले को एक सुरीली उलझन में डाल देता है।
काल-बोध (Time Theory) की दृष्टि से -“पक चली सुबह की सीढ़ियों से / उतरती है धुन कोई…” पंक्ति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. संगीतशास्त्र के अनुसार, गौड़ सारंग दिन के दूसरे प्रहर (दोपहर) का राग है। कविता में ‘पक चली सुबह’ इसी संक्रमण काल को दर्शाती है। जब सुबह की ताजगी कम होने लगती है और दोपहर की मादकता बढ़ने लगती है, तब गौड़ सारंग की अवतारणा होती है।
इसमें उल्लिखित बंदिश के सन्दर्भ पर रुककर विचार करने पर स्पष्ट होता है कि कविता की अंतिम पंक्ति—‘आज मोरी अंखियाँ पलन लागी’—इस राग की एक अत्यंत प्रसिद्ध पारंपरिक बंदिश है। यह बंदिश विरह और मिलन के बीच के उस क्षण की है जहाँ आँखें झपकना (पलन लगना) भूल जाती हैं। कवि ने इस बंदिश को केवल गीत नहीं, बल्कि एक पुकार (Invocation) की तरह इस्तेमाल किया है।
संरचनावादी सिद्धांतों के आलोक में इस कविता का विश्लेषण करने के दौरान याद रखना ज़रूरी है कि संरचनावाद के अनुसार कोई भी कृति अपने आप में स्वतंत्र नहीं होती, बल्कि वह प्रतीकों के एक बड़े ढांचे (System) का हिस्सा होती है। साथ ही यह भी कि संरचनावाद विरोधाभासों के माध्यम से अर्थ तलाशता है और इस कविता में कई स्तरों पर ‘द्वैत’ है । पहला द्वैत पुराना बनाम नया का है । कविता में ‘पुराना चावल’ और ‘फटी धोती’ अतीत की जड़ों को दिखाते हैं, जबकि ‘नाचना’ और ‘चमचमाना’ वर्तमान की जीवंतता को। दूसरा द्वैत स्थिरता बनाम गति का है । कविता में बूढ़ा बरगद स्थिर है, जबकि मछलियाँ और धुन गतिशील ।तीसरा द्वैत लौकिकता बनाम आध्यात्मिकता का है । देग और धोती भौतिक संसार हैं, जबकि राग गौड़ सारंग सूक्ष्म आध्यात्मिक अनुभव।
कविता में संकेतक (Signifier) और संकेतित(Signified) को लेकर विचार करने पर ‘फटी धोती’ और ‘बरगद’ संकेतक हैं, जबकि संकेतित यहाँ केवल वस्तुएं नहीं हैं; ये ‘त्याग’, ‘मर्यादा’ और ‘पारिवारिक विरासत’ के अर्थ ध्वनित करते हैं। ‘मछलियों सा नाचना’ यहाँ केवल दृष्टि नहीं है, बल्कि राग की वक्र गतियों (Meend and Gamak) का शाब्दिक प्रतीक है।
जूलिया क्रिस्टेवा के अंतर्पाठीयता वाले सिद्धांत के तहत हर पाठ अन्य पाठ से जुड़ा होता है। यहाँ कविता (साहित्य) और राग (संगीत) के बीच एक गहरा अंतर्पाठीय (इंटरटेक्चुअल) संबंध है। कविता राग की संरचना को ‘कोड’ की तरह इस्तेमाल कर रही है। बिना गौड़ सारंग के व्याकरण को समझे, पाठक कविता के उस ‘नृत्य’ (चावल का नाचना) के वास्तविक आनंद को पूरी तरह नहीं उठा सकता।
रंजना मिश्र की यह कविता जर्मन संगीतकार रिचर्ड वैगनर (Richard Wagner) के शब्द उधार लेकर कहें तो एक ‘सम्पूर्ण कलाकृति’ या ‘गेज़ाम्ट-कुन्स्ट-वेर्क’ (Gesamtkunstwerk) की तरह है ।वस्तुत: ‘गेज़ाम्ट-कुन्स्ट-वेर्क’ एक ऐसी अवधारणा है जिसमें अलग-अलग कला विधाओं (जैसे संगीत, नाटक, कविता, नृत्य और चित्रकला) को मिलाकर एक एकल, शक्तिशाली अनुभव बनाया जाता है। इसका लक्ष्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि दर्शक को मानसिक और भावनात्मक रूप से पूरी तरह प्रभावित करना होता है। विवेच्य कविता यह दृश्य-श्रव्य बिम्बों का ऐसा ताना-बना है जहाँ संगीतशास्त्र का अनुशासन और संरचनावाद का दार्शनिक आधार एक साथ मिलते हैं। कविता यह सिद्ध करती है कि कला के अलग-अलग रूप (संगीत और कविता) वास्तव में एक ही सत्य की भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ हैं।
जिस प्रकार ‘गौड़ सारंग’ में ‘प ध प म’ की विशिष्ट संगति एक खास मिजाज़ पैदा करती है, वैसे ही यह कविता ‘स्मृति’ और ‘संगीत’ की संगति से एक ऐसी दोपहर रचती है जो कभी ख़त्म नहीं होती।
कविता में ‘पुराना चावल’ और ‘फटी धोती’ केवल घरेलू वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि ये अस्तित्ववाद और परंपरा की निरंतरता के गहरे दार्शनिक प्रतीक हैं। दोनों बिम्बों का सूक्ष्म अन्वेषण करने पर पुराना चावल परिपक्वता और रूपांतरण का दर्शन प्रतिपादित करता हुआ प्रतीत होता है. कविता की पंक्ति है— “नाचता है पुराना चावल देग में”। यहाँ ‘पुराना’ होना और ‘नाचना’ दो विरोधाभासी स्थितियाँ हैं, जो गहरा अर्थ रखती हैं। भाव बनाम कथ्य (Essence vs. Substance) पर नज़र डालें,तो चावल जितना पुराना होता है, वह पकने पर उतना ही खिला-खिला और सुगंधित होता है। दार्शनिक दृष्टि से यह ‘अनुभव की परिपक्वता’ का प्रतीक है। जिस तरह राग गौड़ सारंग की जटिलता को साधने के लिए एक परिपक्व रियाज़ या पुराने अभ्यास की आवश्यकता होती है, वैसे ही जीवन के ‘देग’ (पात्र) में जब अनुभव पकता है, तो उसमें एक स्वाभाविक नृत्य (आनंद) पैदा होता है।
कविता में ऊष्मा और गतिशीलता का विशेष अर्थ है । देग के उबलते पानी में चावल का नाचना ‘संघर्ष’ और ‘रूपांतरण’ की प्रक्रिया है। यह दर्शाता है कि ज्ञान या कला जब भीतर की तपन (साधना) से गुजरती है, तो वह जड़ नहीं रहती, बल्कि ‘नृत्य’ (Creation) बन जाती है। यहाँ चावल का नाचना राग की ‘लय’ का भौतिक रूप है।
फटी धोती में हम त्याग, समय और सादगी का सौंदर्यबोध (Aesthetics of Wabi-Sabi) देख सकते हैं। इस नज़रिए से “फैलाई सूखने को फटी धोती / बूढ़े बरगद ने आँगन में”— सरीखा दृश्य भारतीय जीवन दर्शन के एक विशिष्ट पक्ष को उजागर करता है. यहाँ धोती का ‘फटा’ होना दरिद्रता का नहीं, बल्कि ‘उपयोग’ और ‘समय के बीतने’ का चिह्न है। कोई चाहे तो इसे समय का शिलालेख भी कह सकता है। यह उन तमाम कर्मों और स्मृतियों का लेखा-जोखा है जिसे उस देह ने जिया है। संरचनावादी दृष्टि से देखें तो फटी धोती शरीर का ‘जीर्ण-शीर्ण’ होना है जो उसके ‘पूर्ण’ होने की निशानी है। कविता में ‘बूढ़ा बरगद’ (स्थिरता/संरक्षण) और ‘फटी धोती’ (नश्वरता/त्याग) के बीच एक संवाद है। बरगद धोती को सुखा रहा है—अर्थात् प्रकृति मनुष्य के दुखों और अनुभवों को अपनी ओट में ले लेती है। यह अद्वैत की स्थिति है जहाँ मनुष्य की उपयोग की हुई वस्तु और प्रकृति का अंग (बरगद) एक ही धरातल पर मिल रहे हैं। यह प्रकारांतर से प्रकृति और पुरुष का तादात्म्य है । संगीत से इसे जोड़कर कहा जा सकता है कि राग गौड़ सारंग में जैसे कुछ स्वर बहुत कोमल और बारीक स्पर्श (कण स्वर) के साथ आते हैं, वैसे ही ‘फटी धोती’ जीवन की उन बारीक झिर्रियों की तरह है जिनसे होकर स्मृतियों की धूप छनती है।
दार्शनिक संश्लेषण की दृष्टि से कविता में ये दोनों बिम्ब मिलकर एक ‘स्थिर गत्यात्मकता’ (Static Dynamism) पैदा करते हैं। चावल वस्तुत: आंतरिक अवस्था है जो भीतर पक रहा है, जो अदृश्य है पर तृप्ति देगा और धोती बाह्य अवस्था है,जो बाहर सूख रही है. यह फटी धोती दृश्य है और अपनी उपयोगिता सिद्ध कर चुकी है।
प्रकारांतर से कवि यहाँ स्पष्ट करती हैं कि संगीत (गौड़ सारंग) कोई आसमान से उतरी चीज़ नहीं है, बल्कि वह रसोई के देग और आँगन की फटी धोती के बीच की ‘घरेलू दिव्यता’ है।

रंजना मिश्र की यह कविता राग गौड़ सारंग की अंतर्निहित संरचना और मानवीय संवेदनाओं के बीच एक अपूर्व सेतु का निर्माण करती है। जब हम सुबह की सीढ़ियों से उतरती धुन की बात करते हैं, तो यह संगीतशास्त्र के उस समय-सिद्धांत की ओर संकेत है जहाँ प्रकाश की किरणें धीरे-धीरे प्रखरता की ओर बढ़ती हैं। राग गौड़ सारंग को दोपहर का राग माना जाता है, लेकिन इसकी तैयारी और इसका मानसिक परिवेश सुबह के अवसान से ही निर्मित होने लगता है। कविता में सीढ़ियों से उतरती धुन का बिम्ब समय के उसी क्रमिक प्रवाह को दर्शाता है, जहाँ एक प्रहर दूसरे प्रहर में विलीन हो रहा है। यह उतरना केवल भौतिक नहीं है, बल्कि यह चेतना के स्तर पर गहरे उतरने की प्रक्रिया है। संगीत में जब कोई राग अपने पूर्ण स्वरूप में प्रकट होता है, तो वह शून्य से नहीं आता, बल्कि वह उन तमाम ध्वनियों और सन्नाटों की परिणति होता है जो उससे पहले घटित हुए हैं।
स्मृति का चमचमाना और गौड़ सारंग का पुकारना एक ऐसी मनोवैज्ञानिक अवस्था है जिसे संरचनावाद के भीतर ‘अनुपस्थिति की उपस्थिति’ के रूप में देखा जा सकता है। कविता में स्मृति कोई मृत वस्तु नहीं है, बल्कि वह उस पुराने चावल की तरह है जो देग के भीतर उबलते जल की ऊष्मा पाकर पुनर्जीवित हो उठा है। यहाँ चावल का नाचना और स्मृति का चमचमाना एक ही क्रिया के दो छोर हैं। संगीतशास्त्र के अनुसार, गौड़ सारंग अपनी वक्रता के लिए प्रसिद्ध है। इसकी चाल सीधी नहीं होती; यह रुक-रुक कर, बल खाकर और पिछले स्वरों को छूते हुए आगे बढ़ता है। कविता की संरचना भी इसी वक्रता का अनुसरण करती है। इसमें पाठक सीधे लक्ष्य तक नहीं पहुँचता, बल्कि वह पहले मछलियों के नृत्य, फिर उबलते चावल, फिर सूखती धोती और अंततः राग की बंदिश तक पहुँचता है। यह भटकाव ही इस कविता का सौंदर्य है और यही गौड़ सारंग का व्याकरण भी है।

फटी धोती और बूढ़े बरगद का बिम्ब इस राग की ‘स्थिर प्रकृति’ और ‘गंभीर विस्तार’ को ध्वनित करता है। बरगद यहाँ परंपरा का वह आधार है जो सब कुछ ओढ़ लेने की क्षमता रखता है। धोती का फटा होना समय के उन निशानों को प्रकट करता है जो रियाज़ या साधना के दौरान एक कलाकार के व्यक्तित्व पर अंकित हो जाते हैं। जैसे पुराने कपड़े की बुनावट ढीली पड़ने पर वह अधिक पारभासी हो जाता है, वैसे ही जीवन के अनुभवों से झिरझिरी हुई चेतना से ही संगीत की वास्तविक धुन छनकर बाहर आती है। संरचनावादी दृष्टि से देखें तो यह धोती और बरगद का आँगन एक ऐसा स्पेस (Space) है जहाँ निजी और सार्वजनिक का भेद मिट जाता है। संगीत जब साधना से निकलकर अभिव्यक्ति बनता है, तो वह भी इसी तरह सार्वजनिक आँगन में सूखने के लिए डाल दिया जाता है, जहाँ वह सबकी स्मृतियों का हिस्सा बन सके।
अंतिम पंक्ति ‘आज मोरी अंखियाँ पलन लागी’ केवल एक बंदिश का उद्धरण नहीं है, बल्कि यह पूरी कविता के बिखराव को एक केंद्र प्रदान करती है। संगीतशास्त्र में इसे ‘सम’ पर आना कहते हैं। पूरी कविता जिस चंचलता और बिम्बों के नृत्य के साथ शुरू हुई थी, वह इस एक पंक्ति पर आकर ठहर जाती है। यहाँ ‘पलन लगना’ या पलकों का झपकना भूल जाना उस अतीन्द्रिय अवस्था का परिचायक है जहाँ श्रोता और संगीतज्ञ के बीच का द्वैत समाप्त हो जाता है। यह राग का वह चरम बिंदु है जहाँ तकनीकी जटिलताएँ (वक्रता) भावुकता की सरलता में विलीन हो जाती हैं। स्मृति यहाँ चमचमाती इसलिए है क्योंकि वह वर्तमान के प्रकाश में राग के माध्यम से धोई गई है। जैसे धोती सूखकर उजली हो जाती है और चावल पककर खाने योग्य, वैसे ही यह राग मन के भीतर की कड़वाहट और भारीपन को सोखकर उसे एक संगीतमय हल्कापन प्रदान करता है।

इस प्रकार, यह रचना संगीत को मात्र मनोरंजन या कला रूप में नहीं, बल्कि जीवन की एक अनिवार्य जैविक प्रक्रिया के रूप में देखती है। यहाँ राग कोई बाहरी वस्तु नहीं है जिसे सुना जाए, बल्कि वह एक ऐसी गूँज है जो घर के बर्तनों, आँगन के पेड़ों और पुराने कपड़ों के रेशों में रची-बसी है। संरचनावाद यहाँ भाषा और सुर के उस गहरे रिश्ते को पुष्ट करता है जहाँ शब्द स्वयं को मिटाकर ध्वनि बन जाना चाहते हैं। कविता का समापन उस ‘पुकार’ पर होता है जो अनादि है। गौड़ सारंग का पुकारना दरअसल समय का ही पुकारना है, जो हमें याद दिलाता है कि भले ही सुबह की सीढ़ियाँ बीत चुकी हों और दोपहर की धूप चढ़ रही हो, पर जीवन की देग में अनुभव का चावल अभी भी उसी उत्साह के साथ नाच रहा है। यह कविता राग के शास्त्रीय अनुशासन को लोक की सहजता के साथ जोड़कर एक ऐसे पूर्ण अनुभव की रचना करती है जो जितना शास्त्रीय है, उतना ही मानवीय भी।

संगीतशास्त्र के सूक्ष्म धरातल पर यदि राग गौड़ सारंग की स्वर-संगतियों का अवलोकन करें, तो इसमें गंधार, ऋषभ, पंचम और मध्यम के बीच की वक्रता अर्थात् ‘गा-रे-पा-म’ की जो विशिष्ट चाल है, वह कविता की भाषाई बुनावट में एक अदृश्य लय का संचार करती है। गौड़ सारंग की यह वक्रता सीधे मार्ग का त्याग कर घुमावदार रास्तों से अपने गंतव्य तक पहुँचती है, जो कविता में ‘मछलियों के नाचने’ और ‘चावल के इठलाने’ के बिम्बों में पूर्णतः चरितार्थ होती है। संरचनावादी सिद्धांतों के अनुसार, भाषा यहाँ केवल अर्थ संप्रेषण का माध्यम नहीं है, बल्कि वह स्वयं एक संगीत रचना की भाँति व्यवहार कर रही है। जिस प्रकार गौड़ सारंग में कल्याण और बिलावल के स्वर आपस में लुका-छिपी करते हुए एक जटिल किंतु मधुर वितान रचते हैं, ठीक उसी प्रकार कविता के शब्द भी रोजमर्रा की वस्तुओं और पारलौकिक अनुभूतियों के बीच एक निरंतर आवाजाही बनाए रखते हैं। ‘पक चली सुबह की सीढ़ियों’ का रूपक राग के आरोह-अवरोह की उस गति को दर्शाता है जहाँ समय का हर पायदान एक नए स्वर का स्पर्श कराता है। यहाँ सीढ़ियों से उतरना केवल अवरोह नहीं है, बल्कि यह राग की उस गंभीर पकड़ का संकेत है जो मध्य सप्तक से मंद्र की ओर जाते समय अपनी पूरी भव्यता के साथ प्रकट होती है।
कविता के भाषाई उतार-चढ़ाव में ‘वक्रता’ का यह प्रयोग केवल शिल्प तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह संवेदना के स्तर पर भी राग के मिजाज़ को प्रतिध्वनित करता है। गौड़ सारंग एक ऐसा राग है जो अपनी चंचलता के बावजूद एक गहरे ठहराव और परिपक्वता की मांग करता है। कविता में ‘पुराना चावल’ और ‘फटी धोती’ इसी परिपक्वता और पुरानेपन की उस गूँज को दर्शाते हैं जो राग के ‘वादी-संवादी’ स्वरों की तरह पूरे परिवेश को अनुशासित रखते हैं। संरचनावाद के परिप्रेक्ष्य में देखें तो कविता की प्रत्येक पंक्ति एक ‘साइन’ (Sign) है, जिसका अर्थ उसके पिछले या अगले शब्द के संदर्भ में ही खुलता है। जैसे राग में ‘पा’ (पंचम) पर ठहरना एक विशेष प्रकार की व्याकुलता या शांति पैदा करता है, वैसे ही कविता में ‘बूढ़े बरगद’ का उल्लेख पाठक की चेतना को एक विस्तृत और ठहरे हुए समय में ले जाकर टिका देता है। यह ठहराव ही वह बिंदु है जहाँ से ‘आज मोरी अंखियाँ पलन लागी’ जैसी पारंपरिक बंदिश का उदय संभव हो पाता है। यहाँ संगीत और शब्द एक-दूसरे में इस तरह गुंथे हुए हैं कि राग की वक्रता शब्दों की सादगी को एक दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करती है।

कविता की भाषाई संरचना में ध्वनि का जो उतार-चढ़ाव है, वह गौड़ सारंग के ‘मींड’ और ‘ग़मक’ की याद दिलाता है। जब कवयित्री कहती हैं कि ‘गौड़ सारंग ने अभी ही पुकारा है’, तो यह पुकार केवल बाहरी कान के लिए नहीं है, बल्कि यह उस आंतरिक तान की तरह है जो चेतना के रेशों को झंकृत कर देती है। संरचनावादी दृष्टि से यह ‘पुकार’ उस व्यवस्था का हिस्सा है जहाँ संगीत भाषा के व्याकरण को अपनी शर्तों पर पुनर्गठित करता है। जैसे राग में शुद्ध मध्यम और तीव्र मध्यम का सूक्ष्म प्रयोग एक अद्भुत चमक पैदा करता है, वैसे ही कविता में ‘याद सी चमचमाती’ धुन उस मानसिक प्रकाश का प्रतीक है जो बीते हुए समय (सुबह) और आने वाले समय (दोपहर) के संधि-स्थल पर घटित होता है। यह चमक ही वह ‘कण’ स्वर है जो जीवन की साधारण क्रियाओं—जैसे धोती सुखाना या चावल पकाना—को एक अनुष्ठानिक गरिमा दे देता है। यहाँ संगीतशास्त्र और कविता का सामंजस्य यह सिद्ध करता है कि कला का कोई भी रूप स्वतंत्र नहीं है; वे एक-दूसरे की रिक्तियों को भरते हुए एक अखंड सौंदर्य की सृष्टि करते हैं।

इस समग्र विश्लेषण का सार यह है कि राग गौड़ सारंग की सांगीतिक संरचना और रंजना मिश्र की ‘राग गौड़ सारंग’ कविता की बुनावट में विधाओं के अंतर के बावजूद समानता है। दोनों ही सीधेपन के बजाय घुमाव और गहराई को प्राथमिकता देते हैं। कविता की भाषा जिस तरह स्मृतियों के गलियारों से होकर गुजरती है, वह राग के उन वक्र रास्तों की तरह है जहाँ हर मोड़ पर एक नया भाव-संवेग प्रतीक्षारत रहता है। ‘पलन लागी’ के साथ समाप्त होती यह कविता वस्तुतः उस अनिमेष अवस्था का गान है, जहाँ सुरों की वक्रता जीवन की तमाम उलझनों को सुलझाकर उन्हें एक दिव्य सामंजस्य में बदल देती है। यह एक ऐसी दोपहर का दृश्य है जहाँ समय थमा हुआ है, पर भीतर संगीत की अविरल धारा प्रवाहित हो रही है, जो हर पुराने चावल और हर फटी धोती को एक नए अर्थ और नई चमक से भर देती है।

कविता के भीतर ‘आँगन’ और ‘देग’ का चित्रण केवल भौतिक स्थान का बोध नहीं कराता, बल्कि यह ‘स्पेस’ (आकाश) और ‘साउंड’ (ध्वनि) के उस दार्शनिक संबंध को उद्घाटित करता है जिसे भारतीय दर्शन में ‘नाद-ब्रह्म’ की संज्ञा दी गई है। संरचनावाद के परिप्रेक्ष्य में देखें तो आँगन वह ‘कंटेनर’ या वह व्यापक क्षेत्र है जहाँ स्मृतियों की धूप और संगीत की धुन एक साथ आकर आकार लेती हैं। संगीतशास्त्र के अनुसार, ध्वनि को गूँजने के लिए एक रिक्त स्थान की आवश्यकता होती है, और यहाँ बूढ़े बरगद वाला आँगन उसी रिक्तता या ‘शून्यता’ का प्रतीक है जहाँ राग गौड़ सारंग की वक्र तानें अपनी पूरी भव्यता के साथ विस्तार पाती हैं। जब कवयित्री आँगन में फटी धोती के सूखने की बात करती हैं, तो वह दृश्य की स्थिरता और ध्वनि की गतिशीलता के बीच एक अपूर्व संतुलन निर्मित करती हैं। यहाँ ‘स्पेस’ केवल एक रिक्त स्थान नहीं रह जाता, बल्कि वह राग के उन ‘विश्राम स्थलों’ की तरह काम करता है जहाँ एक स्वर के बाद दूसरा स्वर आने से पहले की ख़ामोशी संगीत को अर्थ प्रदान करती है।

इसी क्रम में ‘देग’ के भीतर नाचते हुए पुराने चावल का बिम्ब ‘साउंड’ के उस सूक्ष्म और आंतरिक पक्ष को उजागर करता है जो बाहर के विस्तृत आँगन से ठीक विपरीत एक संकुचित और ऊष्म स्थान में घटित हो रहा है। देग यहाँ ‘घट’ या शरीर का प्रतीक है, जिसके भीतर प्राणों की ऊष्मा पाकर अनुभव रूपी चावल नृत्य कर रहा है। संगीत के संदर्भ में यह देग उस ‘मंद्र’ क्षेत्र की गूँज है जहाँ से ध्वनि का जन्म होता है। जिस प्रकार देग के भीतर चावल का नाचना एक निरंतर लयबद्ध खदबदाहट (Rhythm) पैदा करता है, उसी प्रकार राग गौड़ सारंग की आंतरिक लय मनुष्य के अंतर्मन में एक निरंतर स्पंदन बनाए रखती है। संरचनावादी दृष्टि से देखें तो आँगन ‘बाह्य’ (Macrocosm) है और देग ‘आंतरिक’ (Microcosm), और इन दोनों के बीच राग गौड़ सारंग एक सेतु का कार्य कर रहा है। ध्वनि यहाँ ‘स्पेस’ को केवल भरती नहीं है, बल्कि वह स्थान को एक पवित्रता और एक नई पहचान प्रदान करती है।
इस दार्शनिक विमर्श में ‘सुबह की सीढ़ियों से उतरती धुन’ वह बिंदु है जहाँ आकाश (Space) और ध्वनि (Sound) का मिलन होता है। सीढ़ियाँ यहाँ ऊर्ध्व और अधो के बीच के संबंध का प्रतीक हैं। संगीत में जब स्वर ऊपर से नीचे (अवरोह) की ओर आते हैं, तो वे अपने साथ आकाश की व्यापकता को समेटकर धरातल की सघनता की ओर लाते हैं। गौड़ सारंग की धुन का ‘इठलाते हुए’ उतरना यह दर्शाता है कि सौंदर्य कभी भी एकरैखिक नहीं होता; वह हमेशा अपने परिवेश के साथ अठखेलियाँ करता हुआ प्रकट होता है। जैसे आँगन की धूप फटी धोती के छिद्रों से छनकर जमीन पर एक चितकबरा बिम्ब बनाती है, वैसे ही राग के स्वर भी स्मृतियों के झरोखों से छनकर वर्तमान के ‘स्पेस’ को चमका देते हैं। यहाँ ‘चमचमाना’ ध्वनि का प्रकाश में रूपांतरण है, जहाँ कान का विषय (शब्द और सुर) आँख का विषय (चमक और दृश्य) बन जाता है।
इस प्रकार यह कविता प्रतिपादित करती है कि ‘स्पेस’ और ‘साउंड’ अलग-अलग सत्ताएँ नहीं हैं। देग की ऊष्मा, बरगद की छाया, धोती की सघनता और चावल की गति—ये सब मिलकर एक ऐसा ‘साउंडस्केप’ रचते हैं जिसमें राग गौड़ सारंग की उपस्थिति अनिवार्य हो जाती है। ‘आज मोरी अंखियाँ पलन लागी’ की गूँज जब इस आँगन और देग के बीच प्रतिध्वनित होती है, तो वह एक ऐसी समाधि या ‘ट्रान्स’ की स्थिति पैदा करती है जहाँ स्थान का बोध लुप्त हो जाता है और केवल शुद्ध ध्वनि शेष रह जाती है। संरचनावाद के आलोक में यह उस ‘ग्रैंड नैरेटिव’ का हिस्सा है जहाँ संगीत मनुष्य को उसके छोटे से घर के आँगन से उठाकर ब्रह्मांडीय लय के साथ जोड़ देता है। यह कविता हमें सिखाती है कि हमारे रोजमर्रा के सबसे साधारण ‘स्पेस’ भी यदि संगीत के ‘साउंड’ से अनुप्राणित हों, तो वे किसी मंदिर के गर्भगृह की तरह पवित्र और जीवंत हो उठते हैं।

रंजना मिश्र की कविता में राग गौड़ सारंग की वक्रता और भाषाई संरचना का सामाजिक-सांस्कृतिक विश्लेषण एक अत्यंत गंभीर धरातल प्रस्तुत करता है। संरचनावाद के अनुसार कोई भी कलात्मक कृति अपनी संस्कृति की उपज होती है और वह उन सामाजिक संकेतों को वहन करती है जो उस समाज की सामूहिक चेतना में गहरे धंसे होते हैं। यहाँ राग की वक्रता—जो सीधे मार्ग को त्यागकर घुमावदार रास्तों से सत्य तक पहुँचती है—भारतीय मध्यवर्गीय जीवन की उस जटिल बुनावट का प्रतीक है जहाँ सरलता और आडंबर के बीच एक निरंतर द्वंद्व चलता रहता है। ‘फटी धोती’ और ‘पुराना चावल’ जैसे बिम्ब इस सामाजिक यथार्थ के ‘साइनिफ़ायर’ (Signifier) हैं जो एक ऐसे समाज की ओर संकेत करते हैं जहाँ अभाव को दरिद्रता के रूप में नहीं, बल्कि एक गरिमापूर्ण संतोष के रूप में स्वीकार किया गया है। यह वह संस्कृति है जहाँ वस्तुएँ केवल उपभोग की सामग्री नहीं हैं, बल्कि वे परिवार के इतिहास और स्मृति का हिस्सा बन जाती हैं।
संगीतशास्त्र के निकष पर देखें तो गौड़ सारंग की प्रकृति ‘चंचल’ और ‘प्रौढ़’ दोनों है। यह विरोधाभास भारतीय समाज की उस स्त्री-शक्ति या घरेलू व्यवस्था को प्रतिबिंबित करता है जो घर की देग (रसोई) की ऊष्मा और आँगन की मर्यादा के बीच तालमेल बिठाती है। ‘चावल का नाचना’ उस आंतरिक उल्लास का सामाजिक रूप है जो तमाम संघर्षों के बावजूद भारतीय जीवन-पद्धति में जीवित रहता है। संरचनावाद यहाँ स्पष्ट करता है कि जैसे राग में स्वरों का क्रम एक निश्चित सामाजिक-सांस्कृतिक अनुशासन (थाट और नियम) से बँधा होता है, वैसे ही आँगन में बरगद और धोती का संबंध भी एक सांस्कृतिक मर्यादा का पालन करता है। धोती का फटा होना यहाँ ‘जीर्णता’ का प्रतीक नहीं, बल्कि ‘निरंतरता’ का सामाजिक साक्ष्य है—यह उस श्रम और साधना का सम्मान है जो एक कलाकार अपने रियाज़ में या एक गृहस्थ अपने जीवन में लगाता है।
कविता के भाषाई उतार-चढ़ाव और राग की वक्रता के बीच का सामाजिक संबंध ‘इठलाती हुई धुन’ में और भी मुखर हो जाता है। यह इठलाना उस लोक-संस्कृति की ओर संकेत है जहाँ शास्त्रीय संगीत के कड़े अनुशासन के भीतर भी लोक की सहजता और श्रृंगारिक चपलता के लिए स्थान सुरक्षित रहता है। ‘आज मोरी अंखियाँ पलन लागी’ जैसी बंदिश का प्रयोग इस बात का प्रमाण है कि संगीत केवल राजदरबारों या मंचों की वस्तु नहीं थी, बल्कि वह आँगन की सीढ़ियों से उतरकर सामान्य जन के विरह और मिलन की भाषा बन चुकी थी। सामाजिक दृष्टि से यह कविता एक ऐसे ‘इकोसिस्टम’ को रचती है जहाँ प्रकृति (बरगद), मानव-निर्मित वस्तुएँ (धोती, देग) और सूक्ष्म कला (राग) एक ही समतल पर विद्यमान हैं। यहाँ कोई भी ऊँचा या नीचा नहीं है; यहाँ ‘पुराना चावल’ उतना ही पूज्य और जीवंत है जितना कि ‘गौड़ सारंग’ का पुकारना।

अत: राग की वक्रता और कविता की भाषा का यह सामाजिक-सांस्कृतिक विन्यास हमें एक ऐसी सभ्यता की याद दिलाता है जहाँ स्मृतियों को ‘चमचमाने’ के लिए किसी बाह्य तड़क-भड़क की आवश्यकता नहीं होती। यह कविता सिद्ध करती है कि हमारी सांस्कृतिक पहचान उन छोटी-छोटी ध्वनियों और दृश्यों में छिपी है जो सुबह की सीढ़ियों से उतरते हुए हमें अपने होने का अहसास दिलाते हैं। राग गौड़ सारंग यहाँ केवल एक राग नहीं रह जाता, बल्कि वह उस भारतीय समय-चेतना का पर्याय बन जाता है जो हर ‘फटी’ और ‘पुरानी’ चीज़ में भी एक नई धुन और एक नया नृत्य देख लेने की क्षमता रखती है। यह संरचनात्मक एकता ही इस कविता की वास्तविक शक्ति है, जो इसे केवल एक साहित्यिक कृति से ऊपर उठाकर एक सांस्कृतिक दस्तावेज़ बना देती है।
रंजना मिश्र की यह कविता अपनी विशिष्टता में स्थानीय होते हुए भी अपनी अंतर्ध्वनि में वैश्विक और सार्वभौमिक है। जब हम इस कविता की वैश्विक प्रासंगिकता पर विचार करते हैं, तो हमें यह बोध होता है कि संगीत और स्मृति का जो अंतर्संबंध यहाँ राग गौड़ सारंग के माध्यम से व्यक्त हुआ है, वह विश्व साहित्य की महानतम कृतियों में भी एक साझा सूत्र की तरह विद्यमान है। संरचनावादी दृष्टि से यह कविता एक ऐसे ‘यूनिवर्सल कोड’ का उपयोग करती है जहाँ समय की नश्वरता और कला की अमरता के बीच संघर्ष दिखाया गया है। टी.एस. इलियट ने अपनी सुप्रसिद्ध कृति ‘फोर क्वार्टेट्स’ में समय और संगीत के इसी संबंध को रेखांकित करते हुए कहा था कि संगीत जो सुना जाता है वह इतनी गहराई से सुना जाता है कि आप स्वयं ही वह संगीत बन जाते हैं (Music heard so deeply / That it is not heard at all, but you are the music)। रंजना मिश्र की कविता में ‘गौड़ सारंग ने अभी ही पुकारा है’ की स्थिति ठीक वही है जहाँ कवयित्री और राग के बीच की दूरी समाप्त हो गई है और वह स्वयं उस धुन का हिस्सा बन गई हैं।
विदेशी साहित्य चिंतकों और कवियों के आलोक में इस कविता की ‘फटी धोती’ और ‘पुराने चावल’ जैसी बिम्बात्मकता को जापानी सौंदर्यबोध ‘वाबी-साबी’ (Wabi-sabi) के निकट पाया जा सकता है, जो अपूर्णता और जीर्णता में सौंदर्य की तलाश करता है। जर्मन कवि रेनर मारिया रिल्के ने भी अपनी कविताओं में वस्तुओं के भीतर की ‘आत्मा’ को पकड़ने की कोशिश की थी। रिल्के के अनुसार, शायद हम यहाँ केवल इतना कहने के लिए हैं: घर, पुल, कुआँ, गेट, घड़ा, फल का पेड़, खिड़की (Perhaps we are here in order to say: house, bridge, fountain, gate, pitcher, fruit-tree, window)। रंजना मिश्र भी अपनी कविता में इसी तरह ‘देग’, ‘आँगन’ और ‘बरगद’ का नाम लेकर उन्हें केवल वस्तु नहीं रहने देतीं, बल्कि उन्हें राग के व्याकरण में पिरोकर एक आध्यात्मिक अर्थ प्रदान कर देती हैं। यहाँ ‘पुराना चावल’ और ‘फटी धोती’ वही साधारण वस्तुएँ हैं जो संगीत के स्पर्श से असाधारण हो गई हैं।
स्मृति और संगीत का जो चमचमाता हुआ अंतर्संबंध इस कविता में है, वह फ्रांसीसी उपन्यासकार मार्सेल प्रूस्त की ‘स्मृति की पुनर्रचना’ के दर्शन से मेल खाता है। प्रूस्त के लिए भी कोई स्वाद या कोई गूँज अचानक ही बीते हुए समय के पूरे संसार को पुनर्जीवित कर देती थी। रंजना मिश्र जब ‘याद सी चमचमाती’ धुन की बात करती हैं, तो वह प्रूस्त के उसी विचार को स्वर देती हैं जहाँ कला के माध्यम से समय की पराजय होती है। अमेरिकी कवि वॉल्ट व्हिटमैन ने अपनी पंक्तियों में कहा था कि मैं अपने भीतर बहुलताएं समेटे हुए हूँ (I contain multitudes)। रंजना मिश्र की कविता में राग गौड़ सारंग भी एक ‘बहुलता’ है, जो रसोई की साधारण खदबदाहट से लेकर ब्रह्मांडीय संगीत तक का विस्तार समेटे हुए है। यह वैश्विक स्तर पर इस सत्य को स्थापित करती है कि संगीत किसी भूगोल की जागीर नहीं है, बल्कि वह मानवीय संवेदना का वह ‘कॉमन ग्राउंड’ है जहाँ पूरब और पश्चिम अपनी सांस्कृतिक भिन्नताओं के बावजूद एक ही धरातल पर मिलते हैं।
विश्व साहित्य में ‘अस्तित्व’ की व्याख्या करते हुए दर्शनशास्त्रियों ने अक्सर ‘स्थिरता’ और ‘प्रवाह’ के द्वंद्व पर चर्चा की है। इस कविता में ‘बूढ़ा बरगद’ स्थिरता का वैश्विक प्रतीक है और ‘उतरती हुई धुन’ प्रवाह का। यह द्वंद्व वैसा ही है जैसा डब्लू.बी. ईट्स की कविता ‘अमंग स्कूल चिल्ड्रन’ में मिलता है जहाँ वे पूछते हैं कि हम नर्तक को नृत्य से कैसे अलग कर सकते हैं? (How can we know the dancer from the dance?)। रंजना मिश्र की कविता में जब पुराना चावल देग में नाचता है, तो वहाँ चावल और नृत्य (वस्तु और कला) एक हो जाते हैं। यह कलात्मक सार्वभौमिकता ही इस कविता को एक वैश्विक प्रासंगिकता प्रदान करती है। यह कविता हमें यह विश्वास दिलाती है कि भले ही दुनिया तकनीक और गति की अंधी दौड़ में भाग रही हो, लेकिन एक ‘पुराना आँगन’ और ‘गौड़ सारंग की एक पुकार’ आज भी मनुष्य को उसकी जड़ों से जोड़ने और उसे मानसिक शांति प्रदान करने में समर्थ है।
‘राग गौड़ सारंग’ कविता की वैश्विक और कलात्मक सार्वभौमिकता तब और अधिक स्पष्ट हो जाती है जब हम इसे विश्व के उन कवियों की परंपरा में रखकर देखते हैं जिन्होंने साधारण घरेलू बिम्बों के माध्यम से ब्रह्मांडीय सत्यों को पकड़ने का प्रयास किया है। इस कविता में राग गौड़ सारंग की जो वक्रता और चंचलता है, उसका एक अद्भुत समानांतर हमें पोलिश कवयित्री विस्लावा शिम्बोर्स्का की काव्य-दृष्टि में मिलता है। शिम्बोर्स्का साधारण वस्तुओं के पीछे छिपे इतिहास और उनकी रहस्यमय उपस्थिति को बहुत सम्मान देती थीं। एक प्रसिद्ध कविता में वे कहती हैं कि एक नन्हा सा कंकड़ भी अपने आप में पूर्ण है (The pebble is a perfect creature)। रंजना मिश्र की कविता में ‘पुराना चावल’ और ‘फटी धोती’ भी उसी पूर्णता के ‘साइन’ हैं। जिस प्रकार शिम्बोर्स्का का कंकड़ अपनी तुच्छता में भी महान है, उसी प्रकार यहाँ की ‘फटी धोती’ भी राग की सूक्ष्मता को ओढ़कर दिव्य हो गई है। यहाँ संरचनावाद का यह सिद्धांत लागू होता है कि अर्थ वस्तु के भीतर नहीं, बल्कि उस ‘रिलेशन’ में होता है जो वह दूसरी वस्तुओं और कलाओं के साथ बनाती है।
जर्मन कवि रेनर मारिया रिल्के की सौंदर्यबोध संबंधी धारणाएँ भी इस कविता के ‘बूढ़े बरगद’ और ‘आँगन’ के परिप्रेक्ष्य में अत्यंत प्रासंगिक हैं। रिल्के का मानना था कि वस्तुओं को केवल देखना पर्याप्त नहीं है, उन्हें ‘अनुभव’ करना ही उनके अस्तित्व को बचाना है। अपनी एक कविता में वे लिखते हैं कि हम यहाँ केवल इतना कहने के लिए हैं: घर, पुल, कुआँ, गेट, घड़ा, फल का पेड़, खिड़की (Perhaps we are here in order to say: house, bridge, fountain, gate, pitcher, fruit-tree, window)। रंजना मिश्र जब ‘देग’, ‘आँगन’ और ‘सीढ़ियों’ का उल्लेख करती हैं, तो वे रिल्के की तरह ही इन भौतिक निर्जीव वस्तुओं को ‘नाद’ (Sound) के माध्यम से जीवित कर देती हैं। राग गौड़ सारंग यहाँ वह प्राण-वायु है जो इन निर्जीव वस्तुओं को एक स्पंदन प्रदान करती है, जिससे वे केवल घरेलू उपकरण न रहकर राग के ‘कण स्वर’ बन जाते हैं।
चीनी महाकवि ली बाई (ली पो) की कविताओं में प्रकृति और संगीत का जो सहज एकात्म भाव मिलता है, वह इस कविता की ‘मछलियों सा नाचता चावल’ वाली पंक्ति में प्रतिध्वनित होता है। ली बाई अक्सर प्रकृति की छोटी-छोटी हलचलों में संगीत की लय तलाशते थे। उन्होंने लिखा था कि बाँसुरी की धुन हवा में घुल जाती है और गिरते हुए फूल उसे और भी करुण बना देते हैं (The flute’s tune drifts on the wind, / and falling blossoms make it even more plaintive)। रंजना मिश्र की कविता में भी धुन का ‘इठलाते हुए’ सीढ़ियों से उतरना इसी तरह के ‘ऑडियो-विजुअल’ बिम्ब का निर्माण करता है जहाँ दृश्य और ध्वनि एक-दूसरे में विलीन हो रहे हैं। यहाँ संरचनावादी द्वैत (दृश्य बनाम श्रव्य) मिट जाता है और केवल एक अखंड अनुभव शेष रहता है। यह ‘इठलाना’ राग की वक्र चाल का वह पक्ष है जो चीनी और भारतीय दोनों ही कला-दर्शनों में सौंदर्य का अनिवार्य अंग माना गया है।
फ्रांसीसी कवि पॉल वेलेरी ने कविता और संगीत के अंतर्संबंधों पर गहन चिंतन करते हुए कहा था कि कविता और संगीत के बीच का अंतर केवल माध्यम का है, उनकी आत्मा एक ही है। वेलेरी के अनुसार, कविता संगीत की तरह ही शुद्ध होने की ओर प्रवृत्त होती है (Poetry should be a musical hesitation between sound and sense)। ‘राग गौड़ सारंग’ कविता ध्वनि और अर्थ के बीच की इसी ‘संदेहात्मक मधुरता’ का उदाहरण है। यहाँ ‘याद सी चमचमाती’ धुन का बिम्ब फ्रांसीसी प्रतीकवाद (Symbolism) की याद दिलाता है, जहाँ मूर्त वस्तुएँ अमूर्त भावनाओं की सूचक बन जाती हैं। जिस प्रकार राग गौड़ सारंग में एक स्वर दूसरे स्वर की स्मृति के साथ चलता है, उसी प्रकार इस कविता में ‘फटी धोती’ अतीत की स्मृति है और ‘नाचता चावल’ वर्तमान का संगीत।
रूसी कवि ओसिप मैंडेलस्टम ने ‘सांस्कृतिक स्मृति’ को ही कविता का आधार माना था। उनके लिए संस्कृति एक ‘गूँज’ थी जो पुराने समय से चली आ रही थी। वे लिखते हैं कि मेरी आँखों में अभी भी वही पुरानी प्यास है, और मेरे कानों में वही पुरानी गूँज (My eyes still thirst for what is gone, / and my ears for the same old echo)। ‘राग गौड़ सारंग’ कविता की अंतिम पंक्ति ‘आज मोरी अंखियाँ पलन लागी’ इसी ‘पुरानी प्यास’ और ‘पुरानी गूँज’ का भारतीय शास्त्रीय संस्करण है। यह बंदिश केवल एक गीत नहीं है, बल्कि यह उस सांस्कृतिक ‘आर्केटाइप’ (Archetype) का हिस्सा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। यहाँ ‘पलन लगना’ या पलकों का झपकना भूल जाना उस अतींद्रिय अवस्था को वैश्विक मान्यता देता है जहाँ मनुष्य अपनी भौतिक सीमाओं को पार कर जाता है। किराना घराने से प्रभावित डी.वी. पलुस्कर और पंडित भीमसेन जोशी सरीखे महान गायकों को राग गौड़ सारंग गाते हुए सुनकर इसे सहज ही महसूस किया जा सकता है.
इस प्रकार, यह स्पष्ट होता है कि ‘राग गौड़ सारंग’ कविता एक ओर राग गौड़ सारंग के शास्त्रीय अनुशासन (गा-रे-पा-म की वक्रता) में बद्ध है, तो दूसरी ओर यह विश्व के महानतम कवियों और दार्शनिकों के साथ एक रचनात्मक संवाद स्थापित करती है। यह संरचनावादी सिद्धांतों के उस ‘यूनिवर्सल ग्रामर’ को पुष्ट करती है जहाँ संगीत और शब्द मिलकर समय की नश्वरता पर विजय प्राप्त करते हैं। ‘देग’, ‘आँगन’, ‘चावल’ और ‘धोती’ जैसे स्थानीय प्रतीक इस कविता को जड़ें प्रदान करते हैं, जबकि ‘गौड़ सारंग’ की धुन इसे वैश्विक आकाश प्रदान करती है। यह कविता यह सिद्ध करती है कि कला का चरम लक्ष्य उस ‘मौन’ तक पहुँचना है जहाँ ‘अँखियाँ पलन लगना’ भूल जाएँ और केवल शुद्ध ‘होने’ का बोध शेष रहे।
समाहार के रूप में यह कहा जा सकता है कि ‘राग गौड़ सारंग’ कविता संगीतशास्त्र के कठोर अनुशासन, संरचनावाद के बौद्धिक विश्लेषण और वैश्विक साहित्य की मानवीय संवेदना का एक दुर्लभ संगम है। यह कविता यह प्रमाणित करती है कि राग गौड़ सारंग की वक्रता केवल स्वरों का घुमाव नहीं है, बल्कि वह जीवन की जटिलताओं को स्वीकार करने और उन्हें माधुर्य में बदलने की एक कला है। ‘आज मोरी अंखियाँ पलन लागी’ पर समाप्त होती यह कविता पाठक को एक ऐसे बिंदु पर छोड़ देती है जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं और केवल एक चमकती हुई याद शेष रह जाती है। यह कविता वैश्विक साहित्य की वह उपलब्धि है जहाँ एक भारतीय स्त्री-कवि द्वारा रचित हिन्दी कविता अपनी गहनता के कारण विश्व-चेतना का हिस्सा बन जाती है।
इस कविता के भाषाई शिल्प और राग गौड़ सारंग की ‘लय’ के मध्य जो अंतर्संबंध है, वह संगीतशास्त्र के ‘ताल’ और साहित्य के ‘छंद’ के बीच की सूक्ष्म सीमाओं को मिटा देता है। संरचनावादी दृष्टि से देखें तो कविता की पंक्तियों की लंबाई और उनके बीच का अंतराल राग की ‘विलंबित’ और ‘द्रुत’ गतियों का ही एक शाब्दिक अनुवाद है। जिस प्रकार गौड़ सारंग अपनी प्रकृति में धीमा होने के बावजूद भीतर एक चंचलता समेटे रहता है, उसी प्रकार कविता का शिल्प भी बाहरी तौर पर ‘बूढ़े बरगद’ की स्थिरता दिखाता है, किंतु ‘मछलियों सा नाचता चावल’ उसमें एक आंतरिक गति (Internal Rhythm) भर देता है। यहाँ ‘ताल’ केवल समय की गणना नहीं है, बल्कि वह उस मनोवैज्ञानिक स्पंदन का नाम है जो ‘देग’ के भीतर खदबदाते जल और ‘सीढ़ियों से उतरती धुन’ के बीच एक सामंजस्य बिठाता है।
विश्व साहित्य के परिप्रेक्ष्य में यदि हम लय के इस दर्शन को और विस्तार दें, तो अमेरिकी कवयित्री सिल्विया प्लाथ की कविताओं में घरेलू वस्तुओं के माध्यम से जिस ‘रिदम’ का सृजन होता है, वह यहाँ ‘फटी धोती’ के बिम्ब में एक नई भारतीय व्याख्या पाता है। प्लाथ जहाँ वस्तुओं की सघनता को एक भयावहता में बदल देती थीं, रंजना मिश्र यहाँ उन वस्तुओं को राग के ‘सप्तकों’ में आरोहित कर एक पवित्र लय प्रदान करती हैं। इतालवी लेखक इतालो कालविनो ने ‘सिक्स मेमोस फॉर द नेक्स्ट मिलेनियम’ में ‘लघुता’ (Lightness) को भविष्य के साहित्य का अनिवार्य गुण माना है । कालविनो के अनुसार, ज्ञान का भार अक्सर हमें जड़ कर देता है, लेकिन कला उसे पंख देती है (Knowledge of the world is a weight, / but art can turn it into a feather)। ‘राग गौड़ सारंग’ कविता में ‘इठलाती हुई धुन’ वही लघुता है जो ‘पुराने चावल’ और ‘फटी धोती’ जैसे भारी यथार्थ को संगीत के माध्यम से भारहीन बना देती है। यहाँ लय वह माध्यम है जो यथार्थ के गुरुत्वाकर्षण को संगीत की दिव्यता में रूपांतरित कर देता है।
चीनी कवि वांग वेई की रचनाओं में मिलने वाला मौन और दृश्य का तालमेल भी इस कविता के भाषाई शिल्प में देखा जा सकता है। वांग वेई लिखते हैं कि खाली पहाड़ पर कोई नहीं दिखता, फिर भी मनुष्य की आवाज़ गूँजती है (In the empty mountain, no one is seen, / yet the sound of voices is heard)। ‘राग गौड़ सारंग’ कविता के ‘आँगन’ में भी एक ऐसा ही ‘रचनात्मक चुप्पी’(क्रिएटिव साइलेंस) है जहाँ गौड़ सारंग की पुकार शब्दों के बिना भी सुनाई देती है। यह ‘पुकार’ राग की उस ‘पकड़’ जैसी है जो केवल कुछ मुख्य स्वरों के माध्यम से पूरे राग का खाका खींच देती है। संरचनावाद यहाँ यह स्पष्ट करता है कि कविता की लयबद्धता केवल उसके शब्दों के चुनाव में नहीं, बल्कि उन शब्दों के बीच के ‘मौन’ (Gap) में छिपी है। जब कवयित्री कहती हैं कि ‘गौड़ सारंग ने अभी ही पुकारा है’, तो यह पुकार पाठक के भीतर एक ऐसी तालबद्ध प्रतीक्षा पैदा करती है जो उसे ‘आज मोरी अंखियाँ पलन लागी’ के अंतिम विश्राम (सम) तक ले जाती है।
इस प्रकार, राग गौड़ सारंग की वक्रता और कविता के भाषाई शिल्प का यह समागम एक ऐसी वैश्विक कला-दृष्टि का निर्माण करता है जहाँ स्थानीय रंगत सार्वभौमिक सत्य में बदल जाती है। यह कविता यह सिद्ध करती है कि संगीत की लय और जीवन की लय एक ही सत्ता के दो नाम हैं। चाहे वह रसोई की देग हो या संगीत का मंच, जहाँ भी ‘साधना’ और ‘स्मृति’ का मिलन होता है, वहाँ एक राग जन्म लेता है। रंजना मिश्र का यह भाषाई प्रयोग राग के शास्त्रीय व्याकरण को आम आदमी के आँगन तक पहुँचाकर संगीत को लोकतांत्रिक बनाता है। यह विश्लेषण हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि ‘पलन लगना’ भूल जाना ही वह परम बिंदु है जहाँ पहुँचकर कवि, संगीतकार और श्रोता—तीनों एक ही ‘नाद’ में विलीन हो जाते हैं। यह कविता समय के बीतने का शोक नहीं मनाती, बल्कि संगीत की अमरता में समय के हर पल को ‘चमचमाता’ हुआ देखती है।

‘राग गौड़ सारंग’ कविता संगीत और साहित्य के समन्वय का एक ऐसा दुर्लभ प्रतिमान है, जहाँ शब्द अपनी अर्थगत सीमाओं को तोड़कर नाद में रूपांतरित हो जाते हैं। संगीत-साहित्य के इस एकीकरण का मूल्यांकन करते हुए यह स्पष्ट होता है कि यहाँ राग गौड़ सारंग केवल एक विषय के रूप में उपस्थित नहीं है, बल्कि वह कविता की ‘रचनात्मक प्रक्रिया’ का नियामक तत्त्व है। साहित्य जब संगीत के साथ इस प्रकार एकाकार होता है, तो वह केवल सूचना या विचार संप्रेषित नहीं करता, बल्कि एक ‘अवस्था’ निर्मित करता है। संरचनावादी शब्दावली में कहें तो, यहाँ कविता का ‘टेक्स्ट’ एक ऐसी खुली संरचना बन गया है जहाँ राग के स्वर शब्दों के संकेतक (सिग्निफायर) को एक नयी चमक और गहराई प्रदान करते हैं। यह समन्वय हमें यह समझने में मदद करता है कि भारतीय कला दृष्टि में काव्य और संगीत कभी अलग नहीं रहे; ‘वागर्थाविव संपृक्तौ’ की धारणा यहाँ शब्द और सुर के संदर्भ में पुनः जीवित हो उठती है।
इस समन्वय की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह ‘शास्त्रीयता’ को ‘लोक’ के आँगन में ले आती है। गौड़ सारंग जैसे जटिल और वक्र प्रकृति के राग को पुराने चावल की खदबदाहट और फटी धोती की सादगी से जोड़ना एक अत्यंत साहसी और सफल प्रयोग है। यह कलात्मक सेतु इस सत्य को उजागर करता है कि रागों का जन्म प्रकृति और मनुष्य के रोजमर्रा के संघर्षों से ही हुआ है। जब कविता कहती है कि ‘पक चली सुबह की सीढ़ियों से उतरती है धुन कोई’, तो यह साहित्य के माध्यम से संगीत के उस ‘अदृश्य’ को ‘दृश्य’ में बदलने की कोशिश है। यहाँ शब्द संगीत के लिए एक देह का निर्माण करते हैं, और संगीत उन शब्दों को प्राणवायु प्रदान करता है।
वैश्विक संदर्भ में यह समन्वय जापानी हायकू की संक्षिप्तता और रूसी कवि एलेक्जेंडर पुश्किन की लयात्मक सघनता की तरह खड़ा होता है। पुश्किन ने अपनी पंक्तियों में कहा था कि आत्मा की गहरी गुफाओं में संगीत एक ऐसी मशाल है जो अंधकार को भी प्रकाश में बदल देती है (In the soul’s deep caverns, music is a torch / that turns even darkness into light)। ‘राग गौड़ सारंग’ कविता में गौड़ सारंग की पुकार भी वही मशाल है जो स्मृतियों के अँधेरे को ‘चमचमाती’ हुई याद में बदल देती है। यह कविता यह संदेश देती है कि जब तक हमारे जीवन में संगीत की यह वक्रता और स्मृतियों का यह उल्लास जीवित है, तब तक कोई भी अभाव हमें रिक्त नहीं कर सकता। ‘आज मोरी अंखियाँ पलन लागी’ पर आकर कविता जिस मौन को जन्म देती है, वह साहित्य और संगीत के मिलन का वह चरम बिंदु है जिसे प्राप्त करना हर कलाकार का स्वप्न होता है।

इस समग्र विवेचन के अंत में यह कहा जा सकता है कि यह कविता राग गौड़ सारंग का एक ‘भाषिक अवतार’ है। यह हमें शिद्दत के साथ महसूस कराती है कि श्रेष्ठ कला वही है जो हमें स्वयं से बाहर ले जाकर फिर से अपने भीतर के ‘आँगन’ में खड़ा कर दे। संगीत और साहित्य का यह संगम अंततः मनुष्य को उसकी नश्वरता से मुक्त कर उसे उस ‘अनाहत नाद’ की ओर ले जाता है जहाँ न शब्द शेष रहते हैं, न सुर, केवल एक अखंड अनुभूति रह जाती है।
अनाहत नाद और ‘याद सी चमचमाती’ धुन के बीच का संबंध ही इस कविता का वह परम वितान है जहाँ भौतिक और आध्यात्मिक जगत का मिलन होता है। संरचनावादी दृष्टि से देखें तो ‘अनाहत’ वह शब्द है जो किसी भी ‘संकेतक’ (सिग्निफायर) से मुक्त है; यह वह शुद्ध ध्वनि है जो वस्तुओं के अस्तित्व से पहले भी थी और उनके मिटने के बाद भी रहेगी। इस कविता में जब ‘याद’ को चमचमाता हुआ बताया जा रहा है , तो वह वास्तव में उस स्मृति की बात हो रही है जो समय की धूल से साफ़ होकर अब ‘नाद’ में बदल चुकी है। यह याद अब केवल एक बीता हुआ लम्हा नहीं है, बल्कि वह कुछ गायकों द्वारा दिन का विहाग कहे गए राग गौड़ सारंग की उस गूँज के साथ एकाकार हो गई है जो बिना किसी आघात के, स्वतः ही कवयित्री के भीतर गूँज रही है।
दार्शनिक धरातल पर अनाहत नाद की यह अवधारणा ‘शून्यता’ और ‘पूर्णता’ के बीच का सेतु है। आँगन का वह शून्य, जिसमें बूढ़ा बरगद खड़ा है और फटी धोती सूख रही है, वास्तव में उस अनाहत संगीत से भरा हुआ है। संगीतशास्त्र के अनुसार, जब राग गौड़ सारंग अपने चरम पर होता है, तो गायक और वाद्य यंत्र केवल माध्यम रह जाते हैं; मुख्य ध्वनि उस आंतरिक आकाश (हृदयाकाश) से उत्पन्न होने लगती है। कविता में ‘सुबह की सीढ़ियों से उतरती धुन’ इसी अनाहत नाद का भौतिक अवतरण है। वह सीढ़ियों से इसलिए उतर रही है ताकि वह हमारे साधारण जीवन की ‘देग’ और ‘चावल’ को स्पर्श कर सके। यह ध्वनि का वह प्रकाश है जिसे चक्षुओं से नहीं, बल्कि चेतना से देखा जाता है, इसीलिए वह ‘चमचमाती’ हुई प्रतीत होती है।

कहना न होगा कि ‘अनाहत’ की यह व्याख्या कविता की अंतिम परिणति ‘अँखियाँ पलन लागी’ को एक नया आयाम देती है। पलकों का न झपकना उस एकाग्रता का सूचक है जहाँ बाहरी दुनिया का ‘आहत’ (टकराव और कोलाहल) शांत हो गया है और भीतर का ‘अनाहत’ शुरू हो गया है। यहाँ स्मृति, संगीत और समय—तीनों एक ही बिंदु पर आकर ठहर जाते हैं। रंजना मिश्र की यह कविता सिद्ध करती है कि राग गौड़ सारंग केवल बारह सुरों का समूह नहीं है, बल्कि वह उस अनहद या अनाहत संगीत तक पहुँचने की एक सीढ़ी है, जो हर पुराने घर के आँगन और हर सादे जीवन की लय में पहले से ही मौजूद है। यह कविता हमें उस मौन को सुनने के लिए आमंत्रित करती है जो शब्दों के समाप्त होने के बाद भी गूँजता रहता है।

रंजना मिश्र की कविता “राग गौड़ सारंग” को स्त्रीवादी परिप्रेक्ष्य से पढ़ने पर यह एक ऐसी रचना बनकर उभरती है जो सतह पर बहुत साधारण, घरेलू और रोज़मर्रा की लगती है, लेकिन ठीक उसी साधारणता के भीतर स्त्री के अनुभव की गहरी राजनीति, उसकी छिपी हुई सृजनात्मक शक्ति और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के प्रति उसकी चुपचाप की गई, लेकिन बहुत गहरी चुनौती मौजूद है।

यह कविता तीन मुख्य स्तरों पर स्त्रीवादी विमर्श करती है ।सबसे पहले, यह घरेलू स्थान और स्त्री-श्रम को पूरी तरह से पुनर्परिभाषित करती है। कविता का पूरा परिवेश एक सामान्य भारतीय घर के आँगन और रसोई तक सीमित है: पुराना चावल देग में नाच रहा है, फटी धोती बूढ़े बरगद के नीचे सूख रही है, सुबह की सीढ़ियों से धुन उतर रही है। ये तीनों तत्व—रसोई का देग, आँगन की धोती, बरगद की छाँव—सदियों से स्त्री-जीवन और स्त्री-श्रम से इतने गहराई से जुड़े हुए हैं कि इन्हें “महिला-क्षेत्र” कहकर पितृसत्तात्मक संस्कृति में तुच्छ, निम्न और गैर-बौद्धिक मान लिया जाता है। कवि ने ठीक इन्हीं तथाकथित “छोटी” चीज़ों को राग गौड़ सारंग की चंचल, वक्र और इठलाती लय से जोड़ दिया है । आँगन और देग अब कोई पृष्ठभूमि नहीं रह जाते; वे कविता की आत्मा बन जाते हैं। स्त्री का दैनिक श्रम, उसकी देखभाल की क्रिया, उसकी स्मृति और उसका थका हुआ शरीर ही राग को जन्म दे रहा है। यह एक स्पष्ट स्त्रीवादी हस्तक्षेप है: जो काम और जो जगह सदियों से हाशिए पर रखी गई, उसे वही कवयित्री शास्त्रीय संगीत के उच्चतम स्तर—राग—के साथ एकाकार करके उसकी गरिमा और सौंदर्य स्थापित करती है।

दूसरा महत्वपूर्ण स्तर “फटी धोती” का सौंदर्य और प्रतिरोध है। “फटी धोती फैलाई सूखने को बूढ़े बरगद ने आँगन में”—यह पंक्ति स्त्रीवादी दृष्टि से बहुत गहरी है। फटी धोती समय के निशान, श्रम के प्रमाण, जीर्णता और थकान की कहानी कहती है। लेकिन इसे “फैलाना” और “सूखने देना” एक देखभाल, संरक्षण और पुनर्जन्म की क्रिया है। बूढ़ा बरगद स्थिरता और परंपरा का प्रतीक है—पितृसत्ता का प्राकृतिक रूप। स्त्री अपनी फटी धोती (अपने घिसे-पिटे जीवन, अपने पुराने दुख, अपने शरीर के निशान) को बरगद की छाँव में सुखा रही है—अर्थात् वह अपने घावों को छिपा नहीं रही, बल्कि उन्हें खुले में, धूप में, प्रकृति के सामने ला रही है। यह “प्रकट करना” पितृसत्तात्मक संस्कृति द्वारा अपेक्षित “छिपाने” और “संयम” के ठीक विपरीत है। फटी धोती को राग की धुन के साथ जोड़ना यह संदेश देता है कि स्त्री का जीर्ण शरीर, उसका पुराना श्रम, उसकी थकी हुई स्मृति भी संगीत बन सकती है। यह हेलेन सिक्सू के ‘स्त्री-लेखन’ (écriture feminine) से बहुत करीब है—स्त्री की अभिव्यक्ति उसके शरीर से, उसके रक्त-मांस से, उसके द्रवों से निकलती है, न कि अमूर्त तर्क या शुद्ध बुद्धि से।

तीसरा स्तर “पुराने चावल का नाचना” है, जो स्त्री की सृजनात्मकता का घरेलू उत्सव है। “समंदर में नाचती मछलियों सा नाचता है पुराना चावल देग में”—यह पंक्ति स्त्रीवादी दृष्टि से बहुत शक्तिशाली है। पुराना चावल समय के साथ परिपक्व हुआ अनुभव है, पोषण और जीवनदायी शक्ति है। देग में नाचना गर्मी, दबाव और उबाल के बीच भी आनंद और गति की बात करता है।

स्त्री का अधिकांश जीवन इसी “देग” में बीतता है—घर का काम, परिवार की देखभाल, भावनाओं का उबालना। समाज इसे “रूटीन”, “दासता” या “निम्न” मानता है। लेकिन रंजना मिश्र इसे राग गौड़ सारंग की चंचल, वक्र और इठलाती लय से जोड़ देती हैं। यह एक बहुत बड़ा स्त्रीवादी कथन है: जो काम पितृसत्ता “छोटा” समझती है, वही काम संगीत की तरह जीवंत, लयबद्ध और सृजनात्मक हो सकता है। स्त्री का दैनिक श्रम कोई बोझ नहीं—वह एक नृत्य है।

अंत में “आज मोरी अँखियाँ पलन लागी” की बंदिश विरह और समाधि दोनों को एक साथ लाती है। स्त्रीवादी नजरिए से देखें तो यहाँ दो स्तर हैं: – विरह की पीड़ा—जो स्त्री के जीवन में प्रेम, अलगाव, अपेक्षा और त्याग के रूप में बार-बार आती है और – उस पीड़ा में डूबकर भी एक समाधि जैसी अवस्था—जहाँ आँखें पलक झपकना भूल जाती हैं, समय थम जाता है और केवल धुन रह जाती है। यह समाधि पितृसत्तात्मक “सहनशीलता” नहीं है। यह एक सक्रिय, संगीतमय अवस्था है। स्त्री अपनी पीड़ा को दबाती नहीं—उसे राग में बदल देती है। वह रोती नहीं—गाती है। यह स्त्री-शक्ति का बहुत सूक्ष्म लेकिन बहुत दृढ़ रूप है। “राग गौड़ सारंग” कविता में रचनाकार बेहद सहजता और शास्त्रीय गरिमा के साथ घरेलू स्थान और स्त्री-श्रम को तुच्छ नहीं, बल्कि संगीतमय और दार्शनिक बनाती हैं। वे जीर्णता, फटेपन और पुरानेपन को सौंदर्य और सृजन का आधार बनाना जानती हैं। यहाँ स्त्री की पीड़ा और स्मृति केवल मौन या सहनशीलता की नियति नहीं है, बल्कि वह राग की लय और पुकार में रूपांतरित होने का साहस है। पितृसत्तात्मक विभाजनों (उच्च/निम्न, शास्त्रीय/लौकिक, पुरुष/स्त्री) को धुंधला करके एक नया, तरल सामंजस्य रचने का यह कठिन कार्य वे बिना किसी ‘नारेबाज़ी’ के संपन्न करती हैं।

दूसरे शब्दों में यह कविता स्त्री को “सहन करने वाली” नहीं—“सृजन करने वाली”, “नृत्य करने वाली” और “संगीत बनने वाली” के रूप में प्रस्तुत करती है। राग गौड़ सारंग यहाँ केवल संगीत नहीं रह जाता; वह स्त्री-अस्मिता की उस तरल, चंचल लेकिन गहरी शक्ति का नाम बन जाता है जो घर के आँगन से निकलकर भी ब्रह्मांडीय लय का हिस्सा हो सकती है। यह कविता पितृसत्ता के सामने चुपचाप, लेकिन बहुत दृढ़ता से कहती है: मेरी फटी धोती, मेरा पुराना चावल, मेरी थकी आँखें—सब राग हैं। और राग में कोई छोटा-बड़ा नहीं होता।

(चार)

भारतीय दर्शन की मूलभूत अवधारणा के अनुसार नाद-ब्रह्म वह परम सत्य है, जो इंगित करता है कि समस्त सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और लय एक अनादि, अनाहत ध्वनि या कंपन से ही संभव है। यह ध्वनि शब्दों, अर्थों और भौतिक रूपों की सीमाओं से परे स्वयं परम ब्रह्म का ही साकार रूप है। उपनिषदों में इसे ‘सर्वोच्च सत्य’ और ‘ब्रह्म का प्रथम स्पंदन’ माना गया है, जो एकाक्षर ॐकार के रूप में प्रकट होकर अंततः महामौन में विलीन हो जाता है। इस दार्शनिक प्रगाढ़ता को नादबिंदु उपनिषद के इस श्लोक से समझा जा सकता है:

नादब्रह्म परं तत्त्वं नाद एव परं पदम्। नादेन संनादति विश्वं नादेनैव प्रलीयते॥
(नाद ही परम तत्व है और वही परम पद है; इसी से विश्व गुंजायमान होता है और इसी में विलीन हो जाता है।)

शार्ङ्गदेव कृत संगीतरत्नाकर भी इसी मत की पुष्टि करता है। उसके अनुसार नाद ही वह मार्ग है जो साधक को बाह्य जगत के कोलाहल से हटाकर ‘अनाहत नाद’ की ओर ले जाता है। योग और संगीत की इस संयुक्त साधना में जब साधक हृदय के भीतर उस अनहद ध्वनि को सुनने लगता है, तब द्वैत का अंत होता है और वह शुद्ध कंपन के माध्यम से पूर्ण मौन (ब्रह्म) से एकाकार हो जाता है।
रंजना मिश्र की ‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ कविता इसी प्राचीन दर्शन का एक आधुनिक और बेहद संवेदनशील विस्तार प्रतीत होती है। कविता में ‘सा’ (षड्ज) से शुरू होकर प्रतिध्वनियों के अविजित साम्राज्य तक की जो यात्रा वर्णित है, वह सीधे तौर पर नाद-ब्रह्म की दार्शनिक यात्रा का प्रतिबिंब है। जहाँ कविता की ‘रेत की तरह फिसलती श्वासें’ जीवन की नश्वरता को दर्शाती हैं, वहीं ‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ समय के अमिट पदचिह्नों को अंकित करती हैं। मौन के गहरे पानी में उतरने और ‘तुममें गहरे उतरने’ की जो अनुभूति कविता में है, वह वस्तुतः व्यक्तिगत ध्वनि का ब्रह्मांडीय नाद में विलीन हो जाना है। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे साधक ॐकार से मौन की ओर बढ़ता है। इस कविता में हर गूँजती प्रतिध्वनि और हर मौन क्षण उसी अनंत साम्राज्य की ओर संकेत करता है, जो कभी नष्ट नहीं होता, बल्कि हर क्षण नए रूप में प्रकट होता रहता है। इस प्रकार, यह कविता नाद-ब्रह्म के दार्शनिक सिद्धांत को एक जीवंत, कलात्मक और मानवीय रूप प्रदान करती है।

कविता का मूल पाठ द्रष्टव्य है:

आवाज़ की झुर्रियाँ

याद आता है-
‘लम्बी साँस लो और ‘सा’ लगाओ

पहली सीढ़ी पर ठिठकती है आवाज़
पूरी सांस भरती ऊर्जा से थरथराती

नन्हे शिशु का पहला कदम
फेफड़े फैलते हैं हवा को जगह देने
विस्तार देती है धरती ऊर्जा के साम्राज्य को

रेत की तरह मुट्ठी से फिसलती हैं साँसें
जीवन है, फिसलता जाता है।

अदृश्य तनी रस्सी पर बंद आँखें चलना है ‘सा’
एक अनियंत्रित साँस – ज़रा सी हलकी और वज़नदार
सारा खेल ख़राब – प्रेम की तरह

हर नया ‘सा’ जीवन की ओर फैला एक खाली हाथ
हर नये ‘सा’ के साथ पुराना मृत

हर नये ‘सा’ के साथ खाली होती जाऊं
पुराना ‘सा’ विस्मृत कर नए सिरे से शुरुआत

स्मृतियों का क्या? वे किन श्रुतियों से छिटक जाती हैं, बाहर
मन्द्र सप्तक की ‘म’ में ठहर जाना अनोखा है…
गहरे पानी में उतरने सा कोई आवाज़ नहीं
मौन जब ऊब-डूब होता है आस पास भीतर
तुममें गहरे उतरना संदेहों का छंटना है

प्रतिध्वनियाँ प्रतिध्वनियाँ प्रतिध्वनियाँ
न. यहाँ कुछ भी नहीं
नाद है अपने आप पसरता गूँजता
क्यों पृथ्वी की तरह अचल हो ‘प’
पैर नहीं थकते तुम्हारे
अपनी गृहस्थी जमाए ठाठ से खिलते
चंचल उत्साही स्वर तुम्हारे काँधे पर

सुनो, थक जाओ तो धीरे बजना कुछ देर
आकाश चादर है ताने सुरों की
अविजित अविचल साम्राज्य तुम्हारा
ढहेगा नहीं
-रंजना मिश्र

इस कविता का सूक्ष्म पठन (क्लोज़ रीडिंग) करते हुए हर पंक्ति, हर बिंब और हर ध्वनि को उसके दार्शनिक, संगीतिक और अस्तित्वगत स्तर पर खोलते हुए देखना ज़रूरी है ।
“याद आता है-” स्वयं एक प्रतिध्वनि है। यह स्मृति नहीं, स्मृति की ध्वनि है। कवयित्री अतीत की किसी घटना को नहीं, बल्कि उसकी कंपन को याद कर रही हैं। तुरंत निर्देश आता है: ‘लम्बी साँस लो और ‘सा’ लगाओ’। ‘सा’ (षड्ज) चेतना का आदि-बिंदु है। संगीतशास्त्र में यह वह स्वर है जिससे समस्त सप्तक जन्म लेते हैं और उसी में विलीन होते हैं। ‘लम्बी साँस लो’ में ‘लो’ क्रिया सक्रिय है—श्वास को ध्वनि में रूपांतरित करना है। श्वास प्राण बनती है और प्राण नाद बन जाता है।
“पहली सीढ़ी पर ठिठकती है आवाज़” जीवन की पहली हिचक है। आवाज़ अभी पूर्ण नहीं हुई, सीढ़ी पर खड़ी है। “पूरी सांस भरती ऊर्जा से थरथराती”—‘थरथराती’ न केवल शारीरिक कंपन है, बल्कि नाद-ब्रह्म के प्रथम स्पंदन की तरह ॐकार के ‘अ’ वाले कंपन की याद दिलाती है। “नन्हे शिशु का पहला कदम” शिशु की पहली साँस और पहला स्वर को एक कर देता है। फेफड़े “हवा को जगह देने” के लिए फैलते हैं—यह विस्तार ब्रह्मांडीय है। धरती ऊर्जा के साम्राज्य को विस्तार देती है, अर्थात् व्यक्तिगत श्वास ब्रह्मांड की श्वास बन जाती है।
“रेत की तरह मुट्ठी से फिसलती हैं साँसें / जीवन है, फिसलता जाता है।” यह कविता का सबसे मर्मस्पर्शी बिंब है। मुट्ठी बंद करने का प्रयास जितना तीव्र, रेत उतनी तेज़ फिसलती है। यह नाद-ब्रह्म की शिक्षा है—पकड़ने की चेष्टा में ही विसर्जन है। अल्पविराम के बाद ‘फिसलता’ क्रिया जीवन को स्थिर सत्ता नहीं, निरंतर प्रवाह घोषित करती है। यह देरिदा के डिफरांस (Différance) की तरह है—अर्थ कभी ठहरता नहीं। लेकिन भारतीय दर्शन में यह फिसलन क्षणिकवाद नहीं, पुनर्जन्म की शर्त है। हर फिसलती साँस नया ‘सा’ जन्म देती है।
“अदृश्य तनी रस्सी पर बंद आँखें चलना है ‘सा’”—यह पंक्ति साधना की कठिनाई को छूती है। अदृश्य रस्सी जीवन का संतुलन है, बंद आँखें बाहरी दृष्टि का त्याग। ‘सा’ अब स्वर नहीं, अंधकार में विश्वास की परीक्षा है। “एक अनियंत्रित साँस – ज़रा सी हलकी और वज़नदार / सारा खेल ख़राब – प्रेम की तरह”। ‘प्रेम की तरह’ तुलना गहरी है। प्रेम और संगीत दोनों में एक छोटी असावधानी सब बिगाड़ देती है। ‘खेल’ शब्द संगीत की लीला और जीवन की लीला को एक करता है।
“हर नया ‘सा’ जीवन की ओर फैला एक खाली हाथ”—यह दार्शनिक केंद्र है। ‘खाली हाथ’ अभाव नहीं, ग्रहणशीलता की पराकाष्ठा है। गायक ‘सा’ लगाते समय पूरी श्वास निकालकर स्वयं को रिक्त करता है। यही खाली होना बौद्ध शून्यता और सूफी फना दोनों को छूता है। “हर नये ‘सा’ के साथ पुराना मृत”—मृत्यु अंत नहीं, संक्रमण है। पुराना ‘सा’ विस्मृत होकर नया जन्म लेता है।
“स्मृतियों का क्या? वे किन श्रुतियों से छिटक जाती हैं, बाहर”—श्रुति और स्मृति का अंतर्संबंध कविता को भारतीय श्रुति-परंपरा से जोड़ता है। स्मृतियाँ छिटक जाती हैं क्योंकि वे स्थूल हैं; श्रुतियाँ सूक्ष्म हैं और नाद में विलीन हो जाती हैं। “मन्द्र सप्तक की ‘म’ में ठहर जाना अनोखा है… गहरे पानी में उतरने सा कोई आवाज़ नहीं”—मन्द्र सप्तक हृदय-नाभि का क्षेत्र है। ‘म’ (मध्यम) संतुलन का स्वर है। ठहरना गहरे पानी में उतरने जैसा है। “मौन जब ऊब-डूब होता है आस पास भीतर / तुममें गहरे उतरना संदेहों का छंटना है”—‘ऊब-डूब’ जल-बिंब को सघन बनाता है। मौन रिक्तता नहीं, सघन उपस्थिति है। ‘तुम’ नाद या आत्म-तत्व है।

“प्रतिध्वनियाँ प्रतिध्वनियाँ प्रतिध्वनियाँ”—तीन बार दोहराव शून्यता के भीतर गूँजने वाले नाद की अनंतता साकार करता है। “न. यहाँ कुछ भी नहीं / नाद है अपने आप पसरता गूँजता”—अनाहत नाद का सीधा अनुभव। “क्यों पृथ्वी की तरह अचल हो ‘प’ / पैर नहीं थकते तुम्हारे”—पंचम अचल है, पृथ्वी की तरह। उसके कंधे पर चंचल स्वर नृत्य करते हैं। “अपनी गृहस्थी जमाए ठाठ से खिलते / चंचल उत्साही स्वर तुम्हारे काँधे पर”—संगीत को परिवार बना देता है। ‘प’ गृहस्थ है।

“सुनो, थक जाओ तो धीरे बजना कुछ देर”—करुणा की पुकार। “आकाश चादर है ताने सुरों की / अविजित अविचल साम्राज्य तुम्हारा / ढहेगा नहीं”—कविता का अंत। आकाश महामौन है, सुरों की चादर ताने हुए। यह साम्राज्य ध्वन्यात्मक है, इसलिए कभी ढहता नहीं।
कविता के इस सूक्ष्म पठन (क्लोज़ रीडिंग) से स्पष्ट है कि पाठ का हर शब्द नाद-ब्रह्म की यात्रा का हिस्सा है। ‘सा’ से ‘म’ की गहराई, ‘प’ की अचलता और अंत में प्रतिध्वनियों के साम्राज्य तक श्वास ध्वनि, ध्वनि मौन और मौन ब्रह्म में बदल जाती है।
इसकी भाषा में तरलता संगीत के आरोह-अवरोह से मेल खाती है। ‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ समय की परतों का स्पर्श करती है। ‘रेत की तरह फिसलती साँसें’ नश्वरता और निरंतरता के बीच संतुलन स्थापित करती है। ‘खाली हाथ’ का बिंब बौद्ध शून्यता और सूफी फना की याद दिलाता है। हर नया ‘सा’ पुराने की चिता पर जन्म लेता है—यह क्षणिकवाद का काव्यात्मक रूप है।
मन्द्र सप्तक की ‘म’ में ठहरना अंतर्मन की गहराई है। मौन यहाँ रिक्तता नहीं, सघनता है। ‘तुममें गहरे उतरना’ द्वैत का अंत है। ‘प्रतिध्वनियाँ’ का त्रिक शून्यता और पूर्णता को एक कर देता है। ‘प’ पृथ्वी की तरह अचल है, लेकिन उसके कंधे पर चंचल स्वर खिलते हैं—यह जीवन की स्थिरता और गतिशीलता का समन्वय है। ‘आकाश चादर है ताने सुरों की’ बिंब ब्रह्मांड को ध्वनि-मय बना देता है।
कविता का शिल्प शास्त्रीय बंदिश की तरह खुलता है। भाषा में तत्सम और तद्भव का मेल गरिमा और सहजता दोनों देता है। ‘मुट्ठी से फिसलती रेत’ जैसे मुहावरे उसे मानवीय बनाते हैं।
यह कविता संगीत के बहाने मनुष्य की नियति का साक्षात्कार करती है। ‘खाली होना’ ग्रहणशीलता है। ‘विस्मृत करना’ सृजन की शर्त है। जब ‘पुराना सा’ मृत होता है, नया ‘सा’ जन्म लेता है। यह मृत्यु संक्रमण है, अंत नहीं। कवयित्री जीवन की सौंदर्य को नश्वरता और निरंतरता के बीच के संतुलन में देखती हैं।

देरिदा के सिद्धांतों को कविता के साथ जोड़ते हुए देखने पर स्पष्ट होता है कि देरिदा का डिफरांस (Différance) अर्थ की निरंतर फिसलन और अंतर पर आधारित है। कविता में ‘सा’ का अर्थ ‘सा’ होने में नहीं, बल्कि ‘पुराना मृत’ और ‘खाली हाथ’ के बीच के अंतर में छिपा है। ‘खाली हाथ’ का बिंब सिद्ध करता है कि कोई स्वर अपने आप में पूर्ण नहीं है; वह हमेशा किसी अनुपस्थिति की गूँज है। ‘स्मृतियों’ का छिटकना और ‘विस्मृत कर नए सिरे से शुरुआत’ करना इस बात का प्रमाण है कि कोई मूल पाठ या ओरिजिनल नहीं होता। हर शुरुआत एक ट्रेस है—एक पदचिह्न जो उस चीज़ की याद दिलाता है जो अब वहाँ नहीं है। पुराना ‘सा’ मर चुका है, लेकिन उसका ट्रेस नए ‘सा’ की संरचना में अनिवार्य रूप से मौजूद है।
देरिदा का ‘चिह्न’ (Trace) सिद्धांत कहता है कि कोई शब्द अपने आप में पूर्ण नहीं है; उसमें हमेशा उन अर्थों की अनुपस्थिति का निशान बाकी रहता है जो वह ‘नहीं’ है। ‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ शब्द वस्तुतः उसी दार्शनिक चिह्न का भौतिक रूप बन जाता है। नाद-ब्रह्म जहाँ एक अखंड, चिकनी ध्वनि की कल्पना करता है, वहीं ‘झुर्री’ उस पूर्णता में दरार या सिलवट की तरह है। यह सिलवट बताती है कि आवाज़ केवल वर्तमान की उपस्थिति नहीं है, बल्कि उसमें बीते हुए समय, घिसी हुई स्मृतियों और स्थगित अर्थों का ट्रेस मौजूद है।
‘अनाहत नाद’ अनादि और अनंत है, लेकिन कविता में वह आवाज़ ‘झुर्रियों’ के साथ आती है, जो उसे ऐतिहासिक और मानवीय बनाती है। देरिदा के अनुसार चिह्न कभी मिटता नहीं, वह अर्थ को आगे बढ़ाता रहता है। इसी तरह कविता में ‘सा’ से शुरू हुई यात्रा जब प्रतिध्वनियों के साम्राज्य तक पहुँचती है, तो वह प्रतिध्वनि ही ट्रेस है—एक ऐसी आवाज़ जो मूल से दूर हो चुकी है लेकिन उसका प्रभाव साथ लेकर चल रही है।
यहाँ नाद-ब्रह्म का विखंडन इस रूप में होता है कि ‘मौन’ अब केवल ब्रह्म की प्राप्ति नहीं, बल्कि उन सभी आवाज़ों का स्थगन बन जाता है जिन्हें शब्द व्यक्त नहीं कर पाए। ‘तुममें गहरे उतरना’ एक ऐसी क्रिया है जहाँ स्व और पर के बीच की दूरी डिफरांस के कारण बनी रहती है, फिर भी वह नाद की गूँज में एक होने का आभास देती है। यह ‘झुर्री’ ही वह बिंदु है जहाँ शाश्वत और क्षणभंगुर एक-दूसरे को काटते हैं।
देरिदा के विखंडन की दृष्टि से कविता में प्रयुक्त द्विध्रुवीय विरोधों (बाइनरी ओपोजिशन्स) का विश्लेषण भी महत्त्वपूर्ण है। कविता ‘आवाज़/मौन’, ‘अचल/चंचल’, ‘पुराना/नया’ और ‘अस्तित्व/मृत्यु’ जैसे द्वंद्वों पर टिकी है। देरिदा इन विरोधों को श्रेणीबद्ध मानते हैं, जहाँ एक पक्ष को दूसरे पर वरीयता दी जाती है। रंजना मिश्र इन श्रेणियों को उलट देती हैं। ‘मौन’ को ‘गहरे पानी’ की तरह सघन बताया गया है। ‘खालीपन’ को ‘पूर्णता’ से श्रेष्ठ माना गया है। ‘प’ को अचल कहा गया है, लेकिन उसके कंधे पर चंचल स्वर बैठे हैं। कोई भी पक्ष स्वतंत्र नहीं है; स्थिरता का अर्थ केवल गतिशीलता के संदर्भ में ही संभव है।

कविता के अंत में ‘प्रतिध्वनियों’ का विस्तार देरिदा के ‘सीमिओटिक प्ले’ का सुंदर उदाहरण है। प्रतिध्वनि वह अर्थ है जो मूल स्रोत से कट चुका है और अब केवल शून्य में भटक रहा है। जब कवयित्री कहती हैं कि ‘यहाँ कुछ भी नहीं, नाद है’, तो वे उस शून्यता को ही पूर्णता घोषित कर देती हैं। यह ‘शून्य’ ही वह अविजित साम्राज्य है जो कभी नहीं ढहेगा, क्योंकि वह किसी ठोस आधार पर नहीं बल्कि अनुपस्थिति पर टिका है। देरिदा के अनुसार पाठ का कोई अंतिम अर्थ नहीं होता। रंजना मिश्र की कविता भी पाठक को किसी निश्चित गंतव्य पर नहीं छोड़ती, बल्कि ‘सा’ और ‘प’ के बीच के उस अनंत अंतराल में ले जाती है जहाँ अर्थ निरंतर बन और बिगड़ रहा है। यह विखंडन ही इस कविता की कलात्मक शक्ति है।
‘रेत की तरह मुट्ठी से फिसलती हैं साँसें, जीवन है, फिसलता जाता है’ और देरिदा के अर्थ की फिसलन के बीच गहरा संबंध है। देरिदा मानते हैं कि भाषा में अर्थ कभी स्थिर नहीं होता; वह हमेशा एक चिन्ह से दूसरे चिन्ह की ओर फिसलता रहता है। मुट्ठी में बंद रेत की तरह अर्थ भी पकड़ से बाहर निकल जाता है। ‘सा’ के बाद दूसरे स्वर का आना और पिछले का मिट जाना दर्शाता है कि संगीत का सौंदर्य किसी एक स्वर में उपस्थित नहीं है, बल्कि स्वरों के बीच के अंतराल और उनके निरंतर विस्थापन में है। साँसों के फिसलने का बिंब अस्तित्व के उस विखंडन को स्वर देता है जहाँ जीवन कोई ठहरी हुई वस्तु नहीं बल्कि प्रवाह है।

कविता में ‘मुट्ठी’ मानवीय आग्रह का प्रतीक है जो सत्य को मुट्ठी में भींचकर उपस्थित करना चाहता है। लेकिन साँसों का फिसलना सिद्ध करता है कि जीवन उपस्थिति में नहीं, बल्कि अनुपस्थिति और निरंतर क्षरण में घटित होता है। देरिदा कहते हैं कि चिन्ह हमेशा उस चीज़ की याद दिलाता है जो वहाँ नहीं है। जब साँस फिसल जाती है, तो वह रिक्तता छोड़ जाती है जो अगले स्वर के लिए जगह बनाती है। यह शून्यता ही अर्थ के सृजन का केंद्र है।

‘प्रतिध्वनियाँ प्रतिध्वनियाँ प्रतिध्वनियाँ’ का बिंब लांका के ‘चैन ऑफ सिग्निफायर’ का प्रतिनिधित्व करता है। एक ध्वनि दूसरी ध्वनि को जन्म देती है, और अर्थ का कभी कोई अंतिम सिरा नहीं मिलता। यह गूँज उस ‘बिग अदर’ की आवाज़ है जो हमारे भीतर निरंतर गूँजती रहती है। वहीं ‘प’ (पंचम) का अचल होना और ‘गृहस्थी जमाना’ उस ‘लॉ ऑफ द फादर’ का प्रतीक माना जा सकता है जो व्यवस्था को स्थिरता प्रदान करता है। ‘प’ वह आधार है जो चंचल स्वरों (इच्छाओं) को एक सीमा और अनुशासन में रखता है। कविता के अंत में ‘आकाश का चादर तानना’ उस विराट मनोवैज्ञानिक विस्तार को दर्शाता है जहाँ मनुष्य अपनी व्यक्तिगत कमियों को पार कर एक सार्वभौमिक अर्थ में विलीन हो जाता है। रंजना मिश्र की यह कविता लांका के ‘रीयल, इमेजिनरी और सिम्बोलिक’ के त्रिकोण को संगीत के ‘सा, म, प’ के माध्यम से बड़ी कुशलता से संयोजित करती है, जहाँ अंततः ‘मौन’ ही वह परम सत्य सिद्ध होता है जिसे भाषा पकड़ने की असफल पर अनिवार्य कोशिश करती रहती है।

कविता की इन पंक्तियों पर पुनर्विचार करें:

मौन जब ऊब-डूब होता है आस पास भीतर
तुममें गहरे उतरना संदेहों का छंटना है

यह विवरण अत्यंत सूक्ष्म है और कविता के उस जटिल बिंदु को स्पर्श करता है जहाँ लिंग, भाषा और भक्ति-परंपरा का त्रिकोणीय संगम होता है। ‘तुममें गहरे उतरना’ वाक्यांश में जो ऐंद्रियता है, वह पुरुष-प्रधान काव्य-भाषा के मुहावरों के निकट प्रतीत हो सकती है। किंतु एक स्त्री कवि के संदर्भ में इसके मायने पूरी तरह बदल जाते हैं।
स्त्री विमर्श के भीतर ऐंद्रियता का प्रयोग अक्सर सत्ता के विरुद्ध एक औजार के रूप में किया जाता है। यहाँ ‘तुममें गहरे उतरना’ पुरुष-दृष्टि वाला वर्चस्ववादी उतरना नहीं है, बल्कि यह आत्म-विसर्जन की वह प्रक्रिया है जिसे मीरा या अंडाल या महादेवी वर्मा जैसी कवयित्रियों के यहाँ देखा गया है। जब रंजना मिश्र ‘मौन’ के ‘ऊब-डूब’ होने की बात करती हैं, तो वे एक ऐसे तरल वातावरण की रचना कर रही हैं जहाँ ‘तुम’ (संगीत का स्वर, प्रिय या अंतर्मन) और ‘मैं’ के बीच की सीमाएँ धुंधली हो गई हैं। यहाँ ऐंद्रियता भोग की नहीं, बल्कि विलीन होने की है।
इसे पुरुष भाषा समझने का भ्रम होना अस्वाभाविक नहीं है, क्योंकि हमारी साहित्यिक समझ में गहनता और भेदन को पौरुष से जोड़कर देखा गया है। लेकिन स्त्री के संदर्भ में ‘गहरे उतरना’ अक्सर गर्भ-गृह की ओर वापसी जैसा है—एक ऐसी सुरक्षा और शांति की तलाश जहाँ संदेह छंटते हैं। यहाँ ‘तुम’ कोई पराया अन्य नहीं है जिसे जीता जाना है, बल्कि वह एक ऐसा विस्तार है जिसमें समाकर स्त्री अपनी खंडित पहचान को अखंडता प्रदान करती है।
लाकाँ के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह ‘तुम’ वह ‘मिरर इमेज’ भी हो सकता है जिसे हम पूर्ण मानते हैं। स्त्री जब इस पूर्णता में उतरती है, तो वह सामाजिक संदेहों से मुक्त होती है। संगीत के संदर्भ में यह ‘तुम’ वह मन्द्र सप्तक का ‘म’ है, जो इतना गहरा और गूँजता हुआ है कि उसमें उतरना किसी देह में उतरने जैसा ऐंद्रिय अनुभव तो है, किंतु उसका उद्देश्य शारीरिक न होकर ध्वन्यात्मक साक्षात्कार है।

वस्तुतः यह पंक्ति पुरुष-मुहावरे का उपयोग करते हुए भी उसके अर्थ को उलट देती है। यह अधिकार की भाषा नहीं, बल्कि एकाकार होने की भाषा है। रंजना मिश्र यहाँ उस द्वैत को समाप्त कर रही हैं जहाँ एक सक्रिय है और दूसरा निष्क्रिय। यहाँ ‘मौन’ और ‘तुम’ दोनों एक ही समुद्र के दो नाम बन जाते हैं, जिसमें उतरना स्वयं को खोकर स्वयं को पाने की स्त्री-साधना है।

सच तो यह है कि इन पंक्तियों में साँसों के फिसलने और ‘तुममें गहरे उतरना’ के बीच जो ऐंद्रिय संबंध है, वह देह और ध्वनि के द्वैत को मिटाकर एक समग्र जैविक अनुभव निर्मित करता है। कविता के आरम्भ में साँसों का रेत की तरह फिसलना एक स्पर्श-बिंब है, जो जीवन की भौतिक नश्वरता को त्वचा के स्तर पर महसूस कराता है। जब वही साँसें साधना के माध्यम से ‘तुममें गहरे उतरना’ के स्तर तक पहुँचती हैं, तो यह ऐंद्रियता केवल त्वचा की नहीं रहती, बल्कि चेतना के रंध्रों तक फैल जाती है। यहाँ ‘तुम’ कोई बाह्य पुरुष सत्ता नहीं, बल्कि वह नाद या स्वर है जिसका अपना एक व्यक्तित्व है। ‘गहरे उतरना’ यहाँ एक तरह का सिनेस्थीसिया पैदा करता है, जहाँ ध्वनि को एक तरल पदार्थ की तरह अनुभव किया जा रहा है जिसमें डूबा जा सकता है। यह पुरुष भाषा के वर्चस्ववादी मुहावरे का अतिक्रमण है क्योंकि यहाँ उद्देश्य किसी को जीतना नहीं, बल्कि संदेहों के कुहासे से मुक्त होकर एक आदिम शांति को प्राप्त करना है।
इस ऐंद्रियता का मनोवैज्ञानिक पहलू यह है कि स्त्री कवि यहाँ मौन और ध्वनि को एक संवेदनात्मक देह प्रदान कर रही हैं। ‘ऊब-डूब होना’ शब्द स्वयं में एक जल-बिंब है, जो समर्पण और लयबद्धता की माँग करता है। यदि इसे पुरुष भाषा माना जाए, तो इसमें एक प्रकार की रैखिकता होती, किंतु रंजना मिश्र के यहाँ यह उतरना वृत्ताकार और गहरा है, जैसे कुएं या समुद्र में उतरना। यह क्रिया स्त्री के स्व को विखंडित नहीं करती, बल्कि उसे संदेहों से मुक्त कर एक सघन आत्म-पहचान देती है। ‘संदेहों का छंटना’ वह मानसिक शुद्धि है जो तब घटित होती है जब कला और कलाकार के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। यहाँ ऐंद्रियता पवित्रता के विरुद्ध नहीं है, बल्कि वह पवित्रता का ही एक सघन रूप है, जहाँ शरीर (फेफड़े, श्वास, मुट्ठी) ही वह वाद्य यंत्र है जिस पर ब्रह्मांडीय संगीत बज रहा है।
इसलिए ‘तुममें गहरे उतरना’ की ऐंद्रियता वास्तव में नाद के साथ एक अभिन्न संभोग जैसी स्थिति है, जिसे सूफी संतों और भक्त कवियों ने भी अपनी भाषा में अपनाया है। यह भाषा स्त्री की इसलिए है क्योंकि इसमें अहंकार का विसर्जन है, न कि उसे थोपने की चेष्टा। यह साँसों के फिसलने के भय से मुक्त होकर उस अचल साम्राज्य की ओर बढ़ने की एक अनिवार्य मानवीय छटपटाहट है, जहाँ पहुँचकर भाषा स्वयं मौन हो जाती है। यह पूरी कविता देह से शुरू होकर देहातीत होने की एक ऐसी प्रक्रिया है, जहाँ हर स्वर एक स्पर्श है और हर मौन एक आलिंगन।
‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ कविता अंततः एक ऐसी ध्वन्यात्मक समाधि की रचना करती है, जहाँ देह का भूगोल और संगीत का व्याकरण एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। विश्लेषण के इस अंतिम निष्कर्ष में यह स्पष्ट होता है कि कविता की मूल शक्ति उस अंतराल में निहित है, जिसे कवयित्री ने ‘सा’ और ‘प’ के बीच बहुत बारीकी से बुना है। यहाँ ‘तुममें गहरे उतरना’ केवल एक आध्यात्मिक उत्कंठा नहीं, बल्कि उस परम मौन से साक्षात्कार है जो समस्त कोलाहल का आदि और अंत है। कविता का कलात्मक गठन एक श्वास की तरह है—जो भीतर जाती है तो अस्तित्व को विस्तार देती है और बाहर आती है तो स्वयं को रिक्त करती है। यह शून्यता की साधना ही इस रचना को वैश्विक संदर्भों में विशिष्ट बनाती है, क्योंकि यहाँ खाली होना दरिद्रता नहीं बल्कि एक सार्वभौमिक नाद को धारण करने की पात्रता है।
पूरी कविता एक ऐसे अविजित साम्राज्य की प्रस्तावना है, जहाँ ध्वनियाँ मरती नहीं, बल्कि प्रतिध्वनियों के रूप में समय के चादर पर स्थायी रूप से अंकित हो जाती हैं। ‘प’ की अचलता और ‘म’ की गहराई के बीच स्त्री-चेतना ने अपने लिए जो एकांत निर्मित किया है, वह किसी भी बाह्य हस्तक्षेप से मुक्त है। यह कविता हमें यह सिखाती है कि जीवन का सबसे बड़ा कौशल फिसलती हुई रेत को मुट्ठी में भींचना नहीं, बल्कि उस फिसलन की लय में खुद को सुरीला बनाना है। रंजना मिश्र यहाँ एक कलाकार के संशय और एक साधक के विश्वास को एक ही धरातल पर ले आती हैं। अंत में, यह कविता पाठ को एक ऐसी गूँज पर छोड़ती है जो पाठक के भीतर तब भी बजती रहती है जब शब्द समाप्त हो जाते हैं। यह मौन का वह ऊब-डूब होना है, जो हमें हमारे अपने ही संदेहों से मुक्त कर उस शाश्वत ‘सा’ के करीब ले जाता है, जिसे पाने के लिए हर नया ‘सा’ एक नई और पहली शुरुआत है।

‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ कविता की स्त्रीवादी और सामाजिक-राजनैतिक व्याख्या इसे केवल एक आध्यात्मिक विमर्श से बाहर निकालकर स्त्री के अस्तित्वगत संघर्ष और साम्राज्य की पितृसत्तात्मक अवधारणाओं के विरुद्ध एक प्रति-संसार के रूप में स्थापित करती है। कविता के आरम्भ में ‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ और ‘लंबी साँस’ लेने का निर्देश उस अनुशासित परिवेश की याद दिलाता है जहाँ स्त्री की अभिव्यक्ति को हमेशा एक सांचे या व्याकरण में ढालने की कोशिश की जाती है। ‘सा’ लगाने की प्रक्रिया में जो ठिठकन है, वह केवल सुर की कमी नहीं, बल्कि सदियों के उस संकोच का परिणाम है जहाँ स्त्री को अपनी आवाज़ को पूरी ऊर्जा के साथ विस्तार देने से रोका गया। जब कवयित्री कहती हैं कि ‘फेफड़े फैलते हैं हवा को जगह देने’, तो यह एक राजनैतिक वक्तव्य बन जाता है—यह अपने अस्तित्व के लिए जगह घेरने की प्रक्रिया है। ‘विस्तार देती है धरती उर्जा के साम्राज्य को’ जैसी पंक्ति में धरती का विस्तार और स्त्री की ऊर्जा का साम्राज्य उस पितृसत्तात्मक सीमा को चुनौती देता है जो स्त्री को केवल घर की चहारदीवारी तक सीमित रखना चाहती है। यहाँ साम्राज्य का अर्थ विजय या दमन नहीं, बल्कि आत्म-प्रसार और सृजन की वह शक्ति है जो प्रकृति की तरह अदम्य है।
‘रेत की तरह मुट्ठी से फिसलती साँसें’ और ‘अदृश्य तनी रस्सी पर चलना’ स्त्री के उस रोजमर्रा के जीवन का प्रतीक है जहाँ वह निरंतर एक नाजुक संतुलन बनाए रखने के दबाव में रहती है। एक अनियंत्रित साँस—ज़रा सी हल्की और वज़नदार—और सारा खेल खराब हो जाना, उस सामाजिक नैतिकता और शुचिता के बोझ को दर्शाता है जहाँ स्त्री की एक छोटी सी चूक उसके पूरे चरित्र और अस्तित्व को कटघरे में खड़ा कर देती है। ‘प्रेम की तरह’ शब्द का प्रयोग यहाँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रेम में स्त्री अक्सर स्वयं को विसर्जित करती है, और यहाँ संगीत की साधना उसी आत्म-विसर्जन और पुनर्सृजन की प्रक्रिया बन जाती है। ‘हर नए सा के साथ खाली होती जाऊं’ का संकल्प दरअसल उन थोपी गई पहचानों, रूढ़ियों और पुराने सा को विस्मृत करने की एक क्रांतिकारी चेष्टा है। यह खाली होना निर्बलता नहीं, बल्कि उस कचरे को बाहर फेंकना है जो समाज ने उसकी चेतना में भर दिया है, ताकि वह नए सिरे से शुरुआत कर सके।
मन्द्र सप्तक के ‘म’ में ठहरना और गहरे पानी में उतरना स्त्री की निजता और उसके अंतर्मन के उस एकांत का प्रतीक है जहाँ बाहरी दुनिया का प्रवेश वर्जित है। यह वह स्थान है जहाँ संदेह छंटते हैं और वह स्वयं के प्रति आश्वस्त होती है। कविता में ‘प’ को अचल कहना और उसकी गृहस्थी का उल्लेख करना एक दिलचस्प विडंबना पैदा करता है। आमतौर पर गृहस्थी का बोझ स्त्री पर होता है, लेकिन यहाँ ‘प’ को गृहस्थी जमाए ठाठ से खिलते हुए दिखाया गया है, जिसके कंधे पर चंचल उत्साही स्वर सवार हैं। यह स्त्री द्वारा आधार बनने और सबको सम्भालने की उस भूमिका का काव्यात्मक रूपांतरण है, जहाँ वह अचल रहकर पूरी व्यवस्था को लयबद्ध रखती है। लेकिन अंत में ‘थक जाओ तो धीरे बजना’ की मानवीय पुकार उस अदृश्य श्रम की स्वीकृति है, जो एक कलाकार और एक स्त्री दोनों को निरंतर करना पड़ता है।
‘आकाश चादर है ताने सुरों की’ और ‘अविजित साम्राज्य’ का बिंब अंततः एक ऐसे स्त्री-लोक की कल्पना करता है जो ध्वन्यात्मक है, जहाँ कोई सीमाएँ नहीं हैं। यह साम्राज्य किसी राजा का नहीं, बल्कि सुरों का है, जो कि स्वभाव से ही मुक्त और प्रवाहमान हैं। ‘ढहेगा नहीं’ का दृढ़ विश्वास उस स्त्री-चेतना की अमरता की घोषणा है जिसने संगीत और साधना के माध्यम से समय और समाज की नश्वरता को जीत लिया है। इस प्रकार, रंजना मिश्र की यह कविता संगीत के पारिभाषिक शब्दों का उपयोग करते हुए एक ऐसी वैचारिक संरचना खड़ी करती है जहाँ स्त्री की मुक्ति, उसका मौन, उसकी थकान और उसका सृजन एक अखंड सत्य के रूप में प्रकट होते हैं। यह पाठ अपनी भाषिक सूक्ष्मता में जितना कोमल है, अपने दार्शनिक और राजनैतिक मंतव्य में उतना ही दृढ़ और विद्रोही भी।
रंजना मिश्र की इस कविता का कलात्मक विन्यास अंततः एक ऐसी ध्वन्यात्मक वास्तुकला का निर्माण करता है जहाँ संगीत के तकनीकी अनुशासन और जीवन की दार्शनिक अनिश्चितता के बीच का द्वंद्व समाप्त हो जाता है। कविता का गठन रैखिक न होकर वृत्ताकार है, जहाँ ‘सा’ से शुरू हुई यात्रा ‘मौन’ और ‘प्रतिध्वनियों’ से होती हुई पुनः एक अचल ‘प’ पर आकर ठहरती है, किंतु यह ठहराव जड़ता नहीं बल्कि एक सचेतन विश्राम है। यहाँ शिल्प का सबसे अनूठा पक्ष क्रियापदों का चयन है—ठिठकना, थरथराना, फिसलना और छिटकना—जो यह संकेत देते हैं कि सत्ता का मूल स्वभाव होना नहीं बल्कि होते जाना है। भाषा यहाँ केवल अर्थ का वाहन नहीं है, बल्कि वह स्वयं एक अनुभव में रूपांतरित हो गई है, जहाँ शब्दों के बीच का खाली स्थान उतना ही मुखर है जितने कि शब्द स्वयं।
वैधानिक दृष्टि से यह कविता नाद-सौंदर्य और दृश्य-बिंब का एक दुर्लभ संगम है। कवयित्री ने अमूर्त संगीत को मूर्त भौतिकता प्रदान करके उसे इंद्रियगोचर बना दिया है। यह कविता उस अविजित साम्राज्य की घोषणा करती है जो सत्ता या शक्ति के अहंकार से नहीं, बल्कि समर्पण और रिक्तता से निर्मित होता है। उत्तर-आधुनिक विमर्शों और देरिदा या लाकाँ जैसे सिद्धांतों के निकष पर यह पाठ सिद्ध करता है कि सत्य किसी एक केंद्र में नहीं, बल्कि हाशिए पर छिटकती स्मृतियों और प्रतिध्वनियों के प्ले में निहित है। रंजना मिश्र की यह कृति समकालीन हिंदी कविता में संगीत के दर्शन को एक नई ऊंचाई देती है, जहाँ ‘सा’ की साधना केवल कंठ का व्यायाम न रहकर, स्वयं को ब्रह्मांडीय लय में विलीन करने की एक अनंत प्रक्रिया बन जाती है।

इस कविता की आंतरिक लय किसी छंद की गणितीय गणना पर नहीं, बल्कि श्वसन-तंत्र की जैविक गति पर आधारित है। संगीत में जिसे दम या प्राण कहा जाता है, वही इस कविता का अदृश्य छंद है। कविता के शब्दों का विन्यास—कहीं अत्यंत संक्षिप्त और कहीं लयात्मक रूप से फैला हुआ—एक प्रकार के सिंकोपेटेड रिदम का निर्माण करता है, जहाँ लय ताल के धक्के से नहीं बल्कि अर्थ के ठहराव से पैदा होती है। उदाहरण के लिए, ‘प्रतिध्वनियाँ प्रतिध्वनियाँ प्रतिध्वनियाँ’ का त्रिक केवल नाद नहीं जगाता, बल्कि वह पाठक की साँस की गति को एक खास आवृत्ति पर ले आता है। यह आंतरिक लय पाठक को कविता पढ़ने के लिए विवश नहीं करती, बल्कि उसे एक खास तरह के मेडिटेटिव स्लोनेस में उतार देती है।
इस लय की एक और विशेषता इसकी असमानता या असंतुलित (असिमेट्रिकल) प्रकृति है। जिस प्रकार शास्त्रीय संगीत में आलाप की कोई निश्चित समय-सीमा नहीं होती और वह गायक की श्वास-क्षमता पर निर्भर करता है, वैसे ही इस कविता की पंक्तियाँ भी विचार की सघनता के अनुसार छोटी-बड़ी होती हैं। ‘ठिठकना’, ‘थरथराना’ और ‘पसरना’ जैसे क्रियापद कविता में टेम्पो का निर्धारण करते हैं। जब कवयित्री मन्द्र सप्तक की बात करती हैं, तो कविता की लय स्वतः भारी और मद्धम हो जाती है, और जब वे चंचल उत्साही स्वर की बात करती हैं, तो लय में एक तीव्र थिरकन आ जाती है। यह लयबद्धता शब्दों के बाहरी विन्यास में नहीं, बल्कि उनके बीच के मौन में छिपी है—ठीक वैसे ही जैसे संगीत में दो मात्राओं के बीच का खाली स्थान ही ताल की धड़कन तय करता है।
अंततः यह आंतरिक लय पाठक के हृदय की गति के साथ तादात्म्य स्थापित करती है। यह कविता गद्य की तरह पढ़ी जाने वाली रचना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी वॉइस स्कोर है जिसे पढ़ने के लिए पाठक को अपनी साँस की गति को कविता के श्वास-क्रम के अनुकूल ढालना पड़ता है। ‘प’ के अचल होने का बोध केवल शब्द से नहीं, बल्कि उस पंक्ति के बाद आने वाले दीर्घ ठहराव से होता है, जो संगीत के विश्राम की तरह है। रंजना मिश्र ने छंद के पारंपरिक अनुशासन को त्यागकर साँस के अनुशासन को अपनाया है, जो इस कविता को एक ऐसी जैविक जीवंतता प्रदान करता है जहाँ शब्द और धड़कन के बीच की दूरी मिट जाती है।

रंजना मिश्र की कविता का जो अंतिम गंतव्य है—जहाँ मौन संदेहों को छाँटता है और ‘प’ की अचलता एक साम्राज्य निर्मित करती है—वह भारतीय काव्यशास्त्र के शांत रस की पराकाष्ठा है। आचार्य अभिनवगुप्त ने शांत रस को सभी रसों का मूल और अंतिम परिणति माना है। इस कविता में ‘सा’ की साधना से शुरू होकर मौन के गहरे पानी में उतरना दरअसल निर्वेद से शम की ओर बढ़ने की प्रक्रिया है। जब कवयित्री कहती हैं कि ‘मौन जब ऊब-डूब होता है’, तो यह उस मानसिक अवस्था का चित्रण है जिसे शास्त्रकारों ने तत्त्वज्ञान से उपजा आनंद कहा है।

शांत रस की महत्ता को प्रतिपादित करते हुए काव्यशास्त्र में कहा गया है :

न यत्र दुःखं न सुखं न चिन्ता न द्वेषरागौ न च काचिदिच्छा।
रसः स शान्तः कथितो मुनीन्द्रैः सर्वेषु भावेषु शमप्रधानः॥

(जहाँ न दुःख है, न सुख, न चिंता, न द्वेष, न राग और न ही कोई इच्छा शेष रहती है; मुनियों ने उस रस को ‘शांत रस’ कहा है, जो सभी भावों में ‘शम’ यानी मानसिक शांति की प्रधानता वाला होता है।)

इस कविता में ‘संदेहों का छंटना’ इसी श्लोक के ‘न चिन्ता’ और ‘न द्वेषरागौ’ का आधुनिक काव्यात्मक रूपांतरण है। शांत रस का स्थायी भाव शम है, और इस कविता में ‘प’ (पंचम) की अचल स्थिति इसी शम का ध्वन्यात्मक प्रतीक है। संगीत यहाँ केवल एक कला नहीं रह जाता, बल्कि वह ब्रह्मस्वाद सहोदर का माध्यम बन जाता है। जिस प्रकार शांत रस में विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव अंततः एक निर्वात और निर्मल चेतना में विलीन हो जाते हैं, उसी प्रकार इस कविता के सभी चंचल उत्साही स्वर अंततः ‘प’ और मौन के अचल साम्राज्य में समाहित हो जाते हैं।
यह रचना सिद्ध करती है कि ऐंद्रियता और वैराग्य परस्पर विरोधी नहीं हैं। शांत रस के परिप्रेक्ष्य में, इंद्रियों का पूरी तरह जाग्रत होकर एक बिंदु पर एकाग्र हो जाना ही योग है, और यही इस कविता का रचनात्मक अभिप्राय भी है। यह कविता ‘सा’ से ‘मौन’ तक की एक ऐसी यात्रा है जो पाठक को संसार के कोलाहल से निकालकर उसके अपने भीतर के अविजित साम्राज्य में प्रतिष्ठित कर देती है।
‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ कविता और अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ के मध्य एक गहरा रचनात्मक सेतु है, जो दोनों ही कविताओं को आत्म-विसर्जन और नाद-ब्रह्म की साझी परंपरा में खड़ा करता है। अज्ञेय की कविता में जब प्रियंवद केशकंबली वीणा साधने के लिए प्रस्तुत होता है, तो वह किसी अहंकारपूर्ण विजय की चेष्टा नहीं करता, बल्कि स्वयं को पूरी तरह शून्य कर देता है। ‘असाध्य वीणा’ की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं—

“ओ विशाल तरु!
शत-सहस्र पल्लव-पतझर ने जिसका नित रूप संवारा….

श्रेय नहीं कुछ मेरा :
मैं तो डूब गया था स्वयं शून्य में—

वीणा के माध्यम से अपने को मैंने
सब कुछ को सौंप दिया था—

सुना आपने जो वह मेरा नहीं,
न वीणा का था :

वह तो सब कुछ की तथता थी
महाशून्य

वह महामौन
अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय

जो शब्दहीन
सब में गाता है।’

‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ कविता में ‘पुराने सा को विस्मृत कर नए सिरे से शुरुआत’ और ‘खाली हाथ’ का बिंब ‘असाध्य वीणा’ के प्रियंवद के इसी आत्म-समर्पण का आधुनिक विस्तार है। अज्ञेय जहाँ वीणा को किरीटी तरु की स्मृतियों का संचयन मानते हैं, वहीं रंजना मिश्र ‘आवाज़ की झुर्रियों’ के माध्यम से स्मृतियों और ध्वनियों के इसी जैविक इतिहास को स्वर देती हैं। दोनों ही कविताओं में ‘मौन’ का केंद्रीय महत्त्व है। अज्ञेय के यहाँ वीणा तब बजती है जब प्रियंवद पूरी तरह मौन होकर वीणा के साथ एकाकार हो जाता है— “शून्य में पिघल गया था प्रियंवद”। रंजना मिश्र के यहाँ भी ‘मौन जब ऊब-डूब होता है’ और ‘संदेहों का छंटना’ उसी शून्य में पिघलने की प्रक्रिया है। ‘असाध्य वीणा’ में जो संगीत निकलता है, वह अलग-अलग व्यक्तियों को उनकी पात्रता के अनुसार अलग-अलग सुनाई देता है, जो ‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ कविता की ‘प्रतिध्वनियों’ और ‘अविजित साम्राज्य’ की बहुआयामी प्रकृति के निकट है। अज्ञेय की वीणा जब बजती है, तो वह “महामौन का शब्द” है, और रंजना मिश्र का ‘सा’ भी अंततः उस महामौन की ओर ही फैला हुआ एक खाली हाथ है।
संरचनात्मक स्तर पर, अज्ञेय की वीणा एक बाह्य उपकरण है जिसके माध्यम से विराट सत्य का साक्षात्कार होता है, जबकि रंजना मिश्र की कविता में मनुष्य का अपना कंठ, उसकी साँसें और उसके फेफड़े ही वह ‘वीणा’ हैं जिन्हें साधना ‘तनी हुई रस्सी पर चलने’ जैसा कठिन है। अज्ञेय के यहाँ “साधना ही सिद्धि है”, और रंजना जी के यहाँ ‘सा’ लगाना ही वह जीवन-साधना है जहाँ हर नया स्वर एक नया जन्म है। ‘असाध्य वीणा’ में राजा, रानी और दरबारी अपनी-अपनी आकांक्षाओं के अनुसार संगीत सुनते हैं, लेकिन रंजना मिश्र इन बाह्य अपेक्षाओं से परे ‘मन्द्र सप्तक’ की आंतरिक गहराई में उतरने को प्राथमिकता देती हैं।

अंततः, दोनों कविताएँ ‘अहं’ के लोप को ही सृजन की अनिवार्य शर्त मानती हैं। यदि प्रियंवद में ‘मैं’ बचा रहता, तो वीणा नहीं बजती; वैसे ही यदि रंजना मिश्र की कविता में ‘पुराना सा’ मृत नहीं होता, तो नया ‘सा’ ऊर्जा से नहीं थरथराता। अज्ञेय की वीणा का स्वर जहाँ “डूबा था सागर में”, वहीं रंजना मिश्र का मौन ‘गहरे पानी में उतरने’ सा है। यह दोनों कवियों की एक ऐसी दार्शनिक उपलब्धि है जो यह सिद्ध करती है कि सच्चा नाद वही है जो मनुष्य को विखंडित करके उसे पुनः ब्रह्मांडीय लय में जोड़ दे। यह साम्राज्य ‘अविजित’ इसलिए है क्योंकि इसे बल से नहीं, बल्कि पूर्ण रिक्तता और समर्पण से जीता गया है।

रचनाओं में पूर्वापर संबंध की दृष्टि से रंजना मिश्र की ‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ कविता और सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के एक गीत के बीच ‘मौन’ का एक ऐसा सेतु है जो शब्द की सीमा को समाप्त कर चेतना के विस्तार की बात करता है:

मौन

बैठ लें कुछ देर,
आओ, एक पथ के पथिक-से
प्रिय, अंत और अनंत के,
तम-गहन-जीवन घेर।

मौन मधु हो जाए
भाषा मूकता की आड़ में,
मन सरलता की बाढ़ में,
जल-बिंदु-सा बह जाए।

सरल अति स्वच्छंद
जीवन, प्रात के लघुपात से,
उत्थान-पतनाघात से
रह जाए चुप, निर्द्वंद।

निराला के इस गीत की पंक्तियों का सूक्ष्म पठन (क्लोज रीडिंग) करने पर ज्ञात होता है कि यह ‘मौन’ की एक दार्शनिक और संवेदनात्मक यात्रा है। कविता की शुरुआत ही एक आत्मीय आह्वान से होती है—”बैठ लें कुछ देर”। यहाँ ‘बैठना’ केवल एक शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन की आपाधापी से एक सचेत ठहराव है। “एक पथ के पथिक-से” उपमा के माध्यम से निराला यह स्पष्ट करते हैं कि अस्तित्व की इस यात्रा में हम सब सहयात्री हैं, और अंततः “अंत और अनंत” (मृत्यु और मोक्ष या परिसीमता और असीमता) के बीच का जो धुंधलका है, उसे साझा करना ही मनुष्यता है। ‘तम-गहन-जीवन घेर’ वाक्यांश जीवन की उन जटिलताओं और अंधकारों की ओर संकेत करता है, जो मनुष्य को घेरे रहते हैं, परंतु कवि उन अंधकारों को ‘घेरकर’ बैठने की बात करता है, उनसे भागने की नहीं।
अगले सोपान में निराला मौन का रूपांतरण करते हैं। “मौन मधु हो जाए” एक अत्यंत कोमल और रसात्मक बिंब है। मधु यहाँ एक हद तक संचय, धैर्य और मिठास का प्रतीक होने के बावजूद शहद के अर्थ में प्रयुक्त नहीं है।
ऋग्वेद के एक प्रसिद्ध सूक्त (1.90.6) में भी मधु शब्द का व्यापक प्रयोग हुआ है, जिसे शांति पाठ के समय भी दोहराया जाता है:
मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥
मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता॥
(हवाएं हमारे लिए मधु (सुखद) होकर बहें।नदियां मधु (अमृततुल्य जल) बहाएं।औषधियां हमारे लिए मधुमय (कल्याणकारी) हों।रात और दिन मधुमय हों, पृथ्वी की धूल मधुमय हो और आकाश रूपी पिता हमारे लिए मधुमय (शांतिदायक) हो।)
यहाँ ऋषि प्रार्थना कर रहे हैं कि साधक की दृष्टि इतनी पवित्र हो जाए कि उसे पूरे ब्रह्मांड के कण-कण में केवल ‘मधु’ यानी परमानंद की अनुभूति हो। यह वह स्थिति है जहाँ व्यक्ति का द्वेष समाप्त हो जाता है और उसे हर वस्तु में ईश्वर का मधुर स्वरूप दिखने लगता है। दूसरे शब्दों में, शास्त्रों में ‘मधु’ का अर्थ ‘अमृतत्व’ और ‘ब्रह्म-रस’ से है। यह वह परम सत्य है जो कड़वाहट (दुःख, द्वेष, अज्ञान) को मिटाकर जीवन को माधुर्य से भर देता है। जब उपनिषद कहते हैं कि ‘आत्मा ही मधु है’, तो उनका तात्पर्य है कि हमारे भीतर का चैतन्य ही वह असली मिठास है जिसे हम बाहर की वस्तुओं में खोज रहे हैं।
इस दार्शनिक पक्ष को समझने के लिए सबसे उत्तम उदाहरण ‘मधु-विद्या’ है, जिसका वर्णन ‘बृहदारण्यक उपनिषद’ में मिलता है।बृहदारण्यक उपनिषद के दूसरे अध्याय के पांचवें ब्राह्मण को ‘मधु ब्राह्मण’ कहा जाता है। यहाँ ऋषि दधीचि ने अश्विनी कुमारों को यह विद्या सिखाई थी। वह मूल मंत्र इस प्रकार है:

इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मधु, अस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु। (बृहदारण्यक उपनिषद 2.5.1)

(यह पृथ्वी समस्त प्राणियों के लिए ‘मधु’ (अमृत/आनंद) है और समस्त प्राणी इस पृथ्वी के लिए ‘मधु’ हैं।)

यहाँ मधु का अर्थ है ‘परस्पर उपकारकता’ (Mutual Interdependence)। जैसे मधुमक्खी फूलों से रस लेती है और बदले में उनका परागण (Pollination) कर उन्हें जीवन देती है, वैसे ही पूरा ब्रह्मांड एक-दूसरे से जुड़ा है।प्रकृति हमारे लिए उपयोगी है, और हम प्रकृति के लिए।यह ‘मधु’ वह आनंदमय सूत्र है जो जड़ और चेतन को एक सूत्र में पिरोता है।

इस विमर्श के आलोक में निराला के गीत ‘मौन’ में आए ‘मधु’ शब्द पर विचार करने पर रचनाकार का आशय स्पष्ट होता है। यहाँ निराला कहना चाह रहे हैं कि जब शब्द शांत होते हैं, तभी अनुभवों का ‘सार’ (मधु) निकलता है। “भाषा मूकता की आड़ में” का प्रयोग उस स्थिति को दर्शाता है जहाँ शब्द अपनी असमर्थता स्वीकार कर लेते हैं और मूकता ही श्रेष्ठतर संवाद का माध्यम बन जाती है। यह भाषा के सौंदर्यशास्त्र की एक नई परिभाषा गढ़ती है, जहाँ रिक्त स्थान और चुप्पी शब्दों से अधिक अर्थवान हो जाते हैं।
कविता के मध्य भाग में मन की अवस्था का वर्णन “सरलता की बाढ़” के रूप में किया गया है। सामान्यतः ‘बाढ़’ विनाशकारी होती है, लेकिन निराला के यहाँ यह ‘सरलता’ की बाढ़ है, जो व्यक्ति के अहं (Ego) और कृत्रिमता को बहा ले जाती है। “जल-बिंदु-सा बह जाए” में ‘जल-बिंदु’ (पानी की बूंद) व्यक्ति की लघुता और उसकी विनम्रता का प्रतीक है। जिस प्रकार एक बूंद प्रवाह में मिलकर अपना पृथक अस्तित्व खोकर विराट का हिस्सा बन जाती है, वैसे ही सरल मन भी अनंत की चेतना में विलीन हो जाता है। यह विसर्जन ही निराला की आध्यात्मिक दृष्टि का कलात्मक गठन है।
गीत का समापन एक शांत और उच्चतर चेतना पर होता है। “प्रात के लघुपात से” का अर्थ है सुबह की उस मंद और शीतल वर्षा या ओस की तरह, जो बिना शोर किए गिरती है। यहाँ जीवन की स्वच्छंदता और स्वाभाविकता पर बल दिया गया है। अंतिम पंक्तियाँ “उत्थान-पतनाघात से रह जाए चुप, निर्द्वंद” इस काव्य का चरमोत्कर्ष हैं। समाजशास्त्रीय और व्यक्तिगत जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव (उत्थान-पतन) जो प्रायः मनुष्य को विचलित और द्वंद्वग्रस्त करते हैं, कवि उनके सामने ‘मौन’ को एक ढाल की तरह रखता है। यह ‘चुप’ हो जाना हार नहीं, बल्कि जीवन के द्वंद्वों (Conflict) से ऊपर उठकर एक आंतरिक सामंजस्य (Harmony) पा लेने की स्थिति है। इस प्रकार, यह गीत मौन के माध्यम से आत्मिक स्वतंत्रता का एक लघु घोषणापत्र बन जाता है।
वस्तुत: यह गीत ‘परिमल’ के संकलित गीतों में अपनी सादगी और दार्शनिक गहराई के कारण एक विशिष्ट स्थान रखता है। यह रचना केवल मौन की वकालत नहीं करती, बल्कि जीवन की कोलाहलपूर्ण वास्तविकता और आंतरिक शांति के बीच एक सेतु निर्मित करने का प्रयास करती है। गीत के सूक्ष्म पठन से स्पष्ट होता है कि निराला यहाँ व्यक्तिपरक एकांत को एक सामूहिक ‘साझापन’ में बदल देते हैं। “आओ, एक पथ के पथिक-से” का आह्वान यह दर्शाता है कि यह मौन किसी सन्यासी का पलायन नहीं, बल्कि दो सहयात्रियों के बीच का वह आत्मीय क्षण है जहाँ शब्दों की सीमा समाप्त हो जाती है। ‘अंत और अनंत’ के मिलन बिंदु पर बैठकर कवि जीवन के ‘तम-गहन’ यानी अंधकारपूर्ण और जटिल अनुभवों को स्वीकार करने की बात करता है। यहाँ कलात्मक गठन का सौंदर्य इस बात में निहित है कि कवि ने जीवन की विभीषिकाओं को नकारने के बजाय उन्हें घेरकर बैठने और उनमें से शांति तलाशने का मार्ग चुना है।
सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से, यह गीत निराला की छायावादी चेतना और उससे आगे के विस्तार को रेखांकित करता है। यहाँ ‘मौन’ का ‘मधु’ हो जाना एक विलक्षण रूपक है। मधु माधुर्य और सार तत्व का प्रतीक है; कवि का मानना है कि जब भाषा ‘मूकता की आड़’ लेती है, तभी अभिव्यक्ति अपने शुद्धतम रूप में प्रकट होती है। यह सौंदर्यशास्त्र ‘अति-कथन’ के विरुद्ध है। “मन सरलता की बाढ़ में, जल-बिंदु-सा बह जाए” पंक्तियों में जो बिंब विधान है, वह मन के विलयन (dissolution) की प्रक्रिया को दर्शाता है। एक छोटी सी ओस की बूंद या जल-बिंदु का विशाल प्रवाह में बह जाना अहम् (Ego) के विसर्जन का सौंदर्य है। निराला की कला यहाँ सूक्ष्म से स्थूल की ओर नहीं, बल्कि स्थूल संसार के संघर्षों से सूक्ष्म आध्यात्मिक शांति की ओर गमन करती है।
समाजशास्त्रीय नज़रिए से देखें तो निराला का समय घोर संघर्ष, सामाजिक विषमता और व्यक्तिगत अभावों का समय था। ‘उत्थान-पतनाघात’ (उतार-चढ़ाव के आघात) शब्द उस दौर के सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल की ओर संकेत करते हैं। एक ऐसे समाज में जहाँ व्यक्ति लगातार आर्थिक और मानसिक चोटों से जूझ रहा हो, वहाँ ‘चुप और निर्द्वंद्व’ रहने की आकांक्षा एक क्रांतिकारी शांति की माँग है। यह मौन अकर्मण्यता नहीं है, बल्कि उस ‘आघात’ को सहने की आंतरिक शक्ति अर्जित करना है। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से “प्रात के लघुपात” (सुबह की हल्की गिरती बूंदों या मंद गति) की तरह जीवन को स्वच्छंद बनाने की इच्छा, उस दौर की जड़ताओं और बंधनों से मुक्ति की छटपटाहट है। यह गीत व्यक्ति को सामाजिक शोर से काटकर उसकी अपनी मौलिकता और सरलता की ओर लौटने के लिए प्रेरित करता है।
रचनात्मक अभिप्राय के धरातल पर निराला यहाँ एक ऐसी ‘भाषा’ की तलाश कर रहे हैं जो अक्षरों से नहीं बल्कि संवेदनाओं से बनी हो। उनका उद्देश्य जीवन की जटिलताओं को सरल बनाना है—”सरल अति स्वच्छंद”। यह सरलता ही निराला के व्यक्तित्व और उनके साहित्य का मूल आधार है। इस गीत का कलात्मक गठन लयात्मकता और संक्षिप्तता का अद्भुत समन्वय है। छंद की गति जल के प्रवाह की तरह है, जो धीरे-धीरे ‘निर्द्वंद्व’ की स्थिति पर जाकर शांत हो जाती है। अंततः, यह कविता मनुष्य को उसके अस्तित्व के सबसे कोमल और वास्तविक पक्ष से परिचित कराती है, जहाँ वह संसार के आघातों के बीच भी अपनी आंतरिक पवित्रता को अक्षुण्ण रख सकता है।

‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ कविता की अंतर्वस्तु एवं रूप के मद्देनज़र निराला के इस गीत पर तुलनात्मक दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट होता है कि निराला जहाँ ‘भाषा मूकता की आड़ में’ की बात करते हैं, वहीं रंजना मिश्र ‘मौन जब ऊब-डूब होता है’ के माध्यम से मौन की सघनता को रेखांकित करती हैं। निराला के गीत में ‘बैठ लें कुछ देर’ का आह्वान समय के प्रवाह को रोककर आत्म-साक्षात्कार करने की चेष्टा है, जो रंजना मिश्र के ‘मन्द्र सप्तक की म में ठहर जाना’ के समान है। दोनों ही कवियों के यहाँ ठहरना जड़ता नहीं है, बल्कि वह अंत और अनंत के बीच एक संधि-स्थल की खोज है। निराला जिसे ‘तम-गहन-जीवन’ कहते हैं, रंजना मिश्र उसी के समांतर ‘अदृश्य तनी रस्सी पर बंद आँखें चलना’ जैसे कठिन जीवन-यथार्थ को रखती हैं, जहाँ मौन ही एकमात्र सहारा बनता है। निराला का बिंब ‘मन सरलता की बाढ़ में, जल-बिंदु-सा बह जाए’ रंजना मिश्र के ‘रेत की तरह मुट्ठी से फिसलती साँसें’ के बिंब के साथ एक अद्भुत संवाद करता है। निराला जहाँ बह जाने में एक स्वच्छंदता और तरलता देखते हैं, रंजना मिश्र उसी बहाव को ‘जीवन है, फिसलता जाता है’ के माध्यम से नश्वरता के बोध से जोड़ती हैं। निराला का ‘मधु हो जाए मौन’ उस स्थिति की ओर संकेत है जहाँ शब्द अब भार नहीं रह गए हैं, और यही वह स्थिति है जहाँ रंजना मिश्र के ‘संदेह छंटने’ लगते हैं। दोनों ही कविताओं में ‘मौन’ केवल ध्वनि का अभाव नहीं है, बल्कि वह ‘मधु’ या ‘गहरे पानी’ की तरह एक पोषक तत्त्व है जो मनुष्य को उसके ‘निद्वंद’ रूप से साक्षात्कार कराता है।
राजनैतिक और दार्शनिक स्तर पर निराला का ‘उत्थान-पतनाघात से रह जाए चुप’ होना उस अचल स्थिति का परिचायक है जिसे रंजना मिश्र ‘पृथ्वी की तरह अचल प’ कहती हैं। निराला का ‘चुप’ और रंजना मिश्र का ‘अचल’ साम्राज्य दरअसल उसी मानसिक स्वाधीनता के दो नाम हैं जो संसार के उतार-चढ़ाव से प्रभावित नहीं होते। निराला का गीत एक ‘पथिक’ की थकान मिटाने का उपक्रम है, तो रंजना मिश्र की कविता ‘थक जाओ तो धीरे बजना’ की मानवीय करुणा से ओत-प्रोत है। दोनों रचनाएँ अंततः एक ऐसे बिंदु पर मिलती हैं जहाँ भाषा की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं और केवल एक ‘अविजित साम्राज्य’ शेष रह जाता है, जो निराला के यहाँ ‘स्वच्छंद जीवन’ है और रंजना मिश्र के यहाँ ‘नाद’ का प्रसार है। यह तुलना सिद्ध करती है कि छायावाद की वह दार्शनिक गहराई समकालीन कविता में संगीत के प्रतीकों के माध्यम से नए अर्थ ग्रहण कर रही है।

रंजना जी की कविता में ‘प्रतिध्वनि’ का बिंब पाश्चात्य काव्यशास्त्र के ‘इको-फेनोमेनोलॉजी’ और ‘वॉइस’ के सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य में एक अनूठा आयाम ग्रहण करता है। पाश्चात्य विचारक एडवर्ड केसी के अनुसार, प्रतिध्वनि केवल ध्वनि की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि वह स्थान और समय के बीच का एक ऐसा संवाद है जहाँ स्रोत के समाप्त हो जाने के बाद भी उसका प्रभाव बना रहता है। रंजना मिश्र जब ‘प्रतिध्वनियाँ प्रतिध्वनियाँ प्रतिध्वनियाँ’ का त्रिक रचती हैं, तो वे मूल स्वर (‘सा’) की अनुपस्थिति में भी उसकी सत्ता को ब्रह्मांडीय विस्तार देती हैं। यह पाश्चात्य दार्शनिक जोआचिम-अर्न्स्ट बेरेन्ड्ट के ‘नाद-ब्रह्म’ के वैश्विक संस्करण ‘द वर्ल्ड इज़ साउंड’ के सिद्धांत के निकट है, जहाँ माना जाता है कि पदार्थ भले ही नश्वर हो, किंतु उसकी कंपन अनंत आकाश में सुरक्षित रहती है। यहाँ प्रतिध्वनि ‘अतीत’ नहीं है, बल्कि वह ‘वर्तमान’ को अर्थ देने वाला एक जीवंत ट्रेस है।
कलात्मक विन्यास की दृष्टि से, यह प्रतिध्वनि पाश्चात्य ‘रेज़ोनेंस’ के उस सिद्धांत को भी पुष्ट करती है जहाँ संगीत और चेतना के बीच की दूरी मिट जाती है। रंजना मिश्र का ‘अविजित साम्राज्य’ वह है जहाँ ध्वनि अब भौतिक कंठ की सीमा से मुक्त होकर शुद्ध ऊर्जा बन चुकी है। यह संरचना निराला के ‘मौन मधु’ और अज्ञेय के ‘महामौन’ के उस वैश्विक बोध से जुड़ती है जिसे पाश्चात्य साहित्य में ‘द एस्थेटिक्स ऑफ साइलेंस’ कहा गया है। सोंटाग के अनुसार, कलाकार का मौन और उसकी प्रतिध्वनि वास्तव में उसके संचय का नहीं, बल्कि उसके त्याग का प्रमाण है। रंजना मिश्र की कविता में ‘खाली हाथ’ और ‘पुराने का विस्मरण’ इसी त्याग की ध्वन्यात्मक परिणति है, जहाँ अंततः कुछ भी ढहता नहीं क्योंकि सब कुछ प्रतिध्वनियों के उस अभेद्य दुर्ग में बदल जाता है जो समय की सत्ता से ऊपर है।
इस विस्तृत सैद्धांतिक विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि रंजना मिश्र की यह रचना भारतीय नाद-परंपरा और आधुनिक विखंडनवादी सिद्धांतों के बीच एक अत्यंत संतुलित और उर्वर भूमि निर्मित करती है। यह कविता केवल संगीत का गान नहीं, बल्कि मनुष्य की साँस, उसकी देह और उसके ब्रह्मांडीय अस्तित्व का एक अखंड काव्य-शास्त्र है।
यह कविता अंततः ‘शून्यता के आस्वाद’ की एक ऐसी संहिता है, जहाँ पहुँचना किसी कलात्मक लक्ष्य की प्राप्ति नहीं, बल्कि स्वयं के ‘होने’ के अहंकार से मुक्ति है। इस पूरी चर्चा का निचोड़ यह है कि सृजन का वास्तविक साम्राज्य भौतिक स्मृतियों के ढेर पर नहीं, बल्कि उस पवित्र विस्मृति पर खड़ा होता है जो हर क्षण को एक मौलिक गरिमा प्रदान करती है। यहाँ ‘अविजित’ होने का अर्थ दुनिया को जीतना नहीं, बल्कि समय के उस क्रूर प्रवाह को जीत लेना है जो हमारी साँसों को रेत की तरह बहा ले जाना चाहता है। कविता यह संदेश देती है कि जब मनुष्य अपनी आवाज़ की झुर्रियों को अनुभव के आभूषण की तरह स्वीकार कर लेता है, तब वह बुढ़ापे से नहीं, बल्कि अमरता से संवाद करने लगता है।
यह रचना हमें एक ऐसे बिंदु पर छोड़ती है जहाँ संगीत केवल कानों का विषय न रहकर, पूरे अस्तित्व की एक थरथराहट बन जाता है। यहाँ ‘मौन’ का अर्थ चुप्पी नहीं, बल्कि एक ऐसी सघन उपस्थिति है जिसमें समस्त संदेह पिघलकर स्पष्टता में बदल जाते हैं। रंजना मिश्र की यह काव्य-साधना सिद्ध करती है कि एक कलाकार का ‘खाली हाथ’ ही वास्तव में सबसे अधिक भरा हुआ होता है, क्योंकि उसी खालीपन में पूरा आकाश अपनी चादर तान सकता है। यह ‘नाद-साम्राज्य’ कभी न ढहने वाली वह विरासत है, जिसे हम अपनी हर फिसलती हुई साँस के बदले अर्जित करते हैं।

वैश्विक कवियों में अमेरिकी कवयित्री लुईस ग्लूक की काव्य-दृष्टि से रंजना जी रचनात्मक रिश्ता बनता नज़र आता है। इनका समानांतर पाठ अस्तित्व की उस अनिवार्य रिक्तता से शुरू होता है जिसे दोनों कवयित्रियाँ सृजन का प्रस्थान बिंदु मानती हैं। इन दोनों स्त्री-कवियों की कविताओं में ‘आवाज़’, ‘मौन’ और ‘अस्तित्वगत रिक्तता’ की मीमांसा बहुत दूर तक मिलती जुलती है। जहाँ रंजना जी ‘आवाज़ की झुर्रियों’ के माध्यम से समय के संचित अनुभवों और ध्वनियों के क्षरण को स्वर देती हैं, वहीं लुईस ग्लूक अपनी कविताओं में इसी क्षरण को ‘सफ़ेद रोशनी’ या ‘विस्मृति’ के रूप में देखती हैं। ग्लूक जब कहती हैं कि “दुनिया की शुरुआत में, मैंने एक आवाज़ खो दी”, तो वे वास्तव में उसी ‘खाली हाथ’ की स्थिति की ओर संकेत कर रही होती हैं जिसे रंजना मिश्र ने अपने ‘सा’ के विस्तार में ‘खाली होते जाने’ के संकल्प के रूप में व्यक्त किया है। दोनों के यहाँ आवाज़ का मिलना एक तरह की आध्यात्मिक और शारीरिक प्रसव-पीड़ा है, जहाँ स्मृतियाँ किसी बोझ की तरह नहीं बल्कि एक छनते हुए सत्य की तरह उपस्थित होती हैं।
इन दोनों कवयित्रियों के यहाँ ‘मौन’ की अवधारणा पारंपरिक शांति से भिन्न एक सक्रिय और चुनौतीपूर्ण स्थिति है। रंजना मिश्र का मौन जहाँ ऊब-डूब होकर भीतर-बाहर के संदेहों को मिटाता है, वहीं ग्लूक का मौन एक ऐसी तीक्ष्ण उपस्थिति है जो पाठक को स्वयं के भीतर झाँकने पर विवश करती है। लुईस ग्लूक की कविता ‘मिरर’ और रंजना मिश्र के ‘तुममें गहरे उतरना’ के बिंबों को यदि साथ रखा जाए, तो हम पाते हैं कि दोनों ही एक ऐसे ‘दूसरे’ की तलाश में हैं जो दर्पण की तरह स्वच्छ हो। ग्लूक के यहाँ प्रकृति बोलती है, जबकि रंजना मिश्र के यहाँ संगीत का स्वर बोलता है; किंतु दोनों ही माध्यमों का उद्देश्य उस अविजित साम्राज्य की खोज है जो मृत्यु और पतन के भय से मुक्त हो।
भाषिक गठन के स्तर पर भी दोनों में एक अद्भुत समानता दिखती है, जहाँ वे अनावश्यक अलंकरणों का त्याग कर ‘हड्डियों जैसी नग्न भाषा’ का प्रयोग करती हैं। ‘रेत की तरह फिसलती साँसें’ और ग्लूक की ‘मिट्टी में दबी हुई जड़ें’ दोनों ही जीवन की नश्वरता के ठोस भौतिक प्रमाण हैं। रंजना मिश्र जब ‘आकाश की चादर’ तानने की बात करती हैं, तो वे ग्लूक के उस कॉस्मिक विज़न के करीब पहुँच जाती हैं जहाँ व्यक्तिगत दुःख और थकान वैश्विक चेतना का हिस्सा बन जाते हैं। यह तुलनात्मक मीमांसा सिद्ध करती है कि ‘आवाज़ में झुर्रियां’ केवल एक भारतीय संदर्भ की कविता नहीं है, बल्कि वह उस वैश्विक मानवीय अनुभव का दस्तावेज़ है जहाँ आवाज़ का ढहना असंभव है क्योंकि वह शून्य और मौन की राख से बार-बार पुनर्जीवित होती है।

‘आवाज़ में झुर्रियां’ की तुलनात्मक मीमांसा के लिए लुईस ग्लूक की ‘द वाइल्ड आइरिस’ कविता की ये पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं जो ग्लूक के ‘मृत्यु के बाद नए जन्म’ के बिंबों के अत्यंत निकट हैं:

“Whatever returns from oblivion / returns to find a voice.”
(जो कुछ भी विस्मृति से लौटता है / एक आवाज़ पाने के लिए लौटता है।)

रंजना जी जहाँ ‘पुराने सा को विस्मृत कर नए सिरे से शुरुआत’ की बात करती हैं, ग्लूक वहाँ ‘विस्मृति से लौटकर आवाज़ खोजने’ की बात करती हैं। दोनों ही कवयित्रियों के यहाँ आवाज़ कोई सहज उपलब्धि नहीं है, बल्कि वह एक कठिन संघर्ष और झुर्रियों से गुज़रकर हासिल की गई उपलब्धि है। ग्लूक की कविताओं में भी ‘मौन’ एक दमनकारी शून्यता नहीं है, बल्कि वह एक उपजाऊ भूमि है जहाँ से नई आवाज़ फूटती है।
लुईस ग्लूक और रंजना मिश्र के काव्य-दर्शन का यह मिलन बिंदु वस्तुतः अस्तित्वगत पुनर्जन्म की एक वैश्विक पीठिका निर्मित करता है। जहाँ रंजना मिश्र संगीत के ‘सा’ को विस्मृति की राख से दोबारा उगाने की बात करती हैं, वहीं ग्लूक उस आवाज़ की वापसी को ‘विस्मृति से लौटने’ के एक साहसी कृत्य के रूप में देखती हैं। इन दोनों ही रचनाकारों के लिए आवाज़ केवल गले की ध्वनि नहीं, बल्कि वह चिह्न है जो यह प्रमाणित करता है कि चेतना ने अंधकार और शून्यता पर विजय पा ली है। ग्लूक के यहाँ ‘द वाइल्ड आइरिस’ जिस तरह मिट्टी की गहरी परतों को चीरकर अपनी आवाज़ पाती है, रंजना मिश्र के यहाँ ‘सा’ भी फेफड़ों की सघन हवा और समय की झुर्रियों को पार कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। यह ‘पाने’ की प्रक्रिया ‘खोने’ की शर्त पर टिकी है; ग्लूक के लिए वह विस्मृति है और रंजना मिश्र के लिए वह पुराने सा का मरण है।
यहाँ मौन को एक उपजाऊ भूमि कहना इन दोनों कवयित्रियों के वैचारिक साम्य को और भी गहरा कर देता है। जिस प्रकार एक बीज को अंकुरित होने के लिए मिट्टी के अंधेरे और मौन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार रंजना मिश्र का ‘मौन’ वह गर्भ है जहाँ से संदेह छंटने के बाद एक परिपक्व आवाज़ जन्म लेती है। लुईस ग्लूक जब अपनी कविताओं में पीड़ा को एक भाषा की तरह इस्तेमाल करती हैं, तो वह रंजना मिश्र की ‘आवाज़ की झुर्रियों’ के प्रतिबिबं की तरह दिखाई देती है—झुर्रियां जो पीड़ा और समय की गवाह तो हैं, पर सौंदर्य की नई परिभाषा भी। इन दोनों कवयित्रियों का स्वर अंततः एक ऐसी अविजित स्वाधीनता की ओर संकेत करता है, जहाँ आवाज़ का ढहना नामुमकिन है क्योंकि वह शून्य के साथ अपना सामंजस्य स्थापित कर चुकी है।

इस कविता में ‘अंत और अनंत’ का संबंध कोई दार्शनिक विरोधाभास नहीं, बल्कि एक-दूसरे में विलीन होने वाली ध्वन्यात्मक प्रक्रिया है। लुईस ग्लूक के ‘विस्मृति से लौटने’ और रंजना मिश्र के ‘पुराने सा के मरण’ में जो अंत दिखाई देता है, वह वास्तव में अनंत की अनिवार्य पूर्वशर्त है। यहाँ अंत किसी समापन का नाम नहीं है, बल्कि वह उस सीमा का टूटना है जहाँ वैयक्तिक आवाज़ अपनी छोटी पहचान छोड़कर नाद के व्यापक विस्तार में समाहित हो जाती है। जब रंजना मिश्र कहती हैं कि ‘जीवन है, फिसलता जाता है’, तो वे इस अंत की निरंतरता को स्वीकार करती हैं, लेकिन यही फिसलन जब मन्द्र सप्तक की म में गहराई पाती है, तो वह अनंत का द्वार खोल देती है।
यह दार्शनिक सूत्र इस बोध पर टिका है कि अनंत कहीं बाहर नहीं, बल्कि अंत की इसी बारंबारता और प्रतिध्वनियों के भीतर छिपा है। ग्लूक का आइरिस फूल मिट्टी के जिस अंधेरे अंत को झेलता है, वही उसे वसंत के अनंत स्वर तक ले जाता है। इसी तरह, रंजना मिश्र की कविता में ‘प’ की अचलता उस अनंत का केंद्र है, जिसके चारों ओर जीवन का अंतहीन उत्थान-पतन नृत्य करता है। यह कविता हमें यह महसूस कराती है कि हमारी आवाज़ की झुर्रियां दरअसल वे लकीरें हैं जिनसे अनंत अपना मानचित्र बनाता है। अंततः, यह साम्राज्य अविजित इसलिए है क्योंकि यहाँ हारने के लिए कुछ नहीं बचा—सब कुछ उस विराट मौन में बदल चुका है जो न कभी शुरू होता है और न कभी खत्म, बल्कि हर ‘सा’ के साथ एक नया और चिरंतन रूप धारण करता है।

‘आवाज़ की झुर्रियां’ कविता की रचना-प्रक्रिया भारतीय शास्त्रीय संगीत के गायन एवं वादन-व्याकरण से गहराई से संपृक्त है। यह कविता संगीत शास्त्र की पारिभाषिक शब्दावली का उपयोग तो करती है, किंतु स्वयं को केवल एक कलात्मक विन्यास या शिल्प-वस्तु तक सीमित नहीं रखती। इसके उलट, यह कविता संगीत के व्याकरणिक अनुशासन को मानवीय अस्तित्व के अनुभवों से जोड़कर उसे एक व्यापक सामाजिक और निजी जीवन-दर्शन में रूपांतरित कर देती है। स्वरों का उतार-चढ़ाव, मन्द्र की गहराई और पंचम की अचलता यहाँ केवल संगीत की तकनीकें नहीं, बल्कि मनुष्य की संघर्षशीलता, जिजीविषा और आत्म-साक्षात्कार के जीवंत प्रतीक बन जाते हैं। इस प्रकार, यह रचना संगीत के माध्यम से मनुष्य को अपनी नश्वरता और दोषों को स्वीकार करते हुए एक सकारात्मक और अर्थपूर्ण जीवन जीने की दिशा प्रदान करने वाली एक जीवनधर्मी कृति बन जाती है।
कविता में संगीत की तकनीकी शब्दावली जिस तरह जीवन-दर्शन में रूपांतरित होती है, उसका सबसे सशक्त उदाहरण ‘मन्द्र सप्तक की म’ में ठहरना है। शास्त्रीय संगीत में मन्द्र का अर्थ है गंभीरता और गहराई, लेकिन यहाँ यह तकनीकी निर्देश न रहकर मनुष्य को अपनी आत्मा के सबसे निचले और शांत तल पर उतरने का दिशा-निर्देश बन जाता है। जीवन की आपाधापी में जब मनुष्य संदेहों से घिरता है, तब यह कविता उसे उस ‘म’ की तरह अपने भीतर के केंद्र पर लौटने की प्रेरणा देती है जहाँ कोलाहल मौन में बदल जाता है। इसी प्रकार, ‘पृथ्वी की तरह अचल प’ का बिंब संगीत के व्याकरण से निकलकर एक सामाजिक स्थिरता का प्रतीक बन जाता है। पंचम स्वर अपनी जगह से डिगता नहीं है; कविता इसे मनुष्य के उस अडिग व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करती है जो संसार के उत्थान-पतनाघात और तनी हुई रस्सी जैसे जोखिम भरे रास्तों पर चलते हुए भी विचलित नहीं होता।
सकारात्मक जीवन-दृष्टि का एक और आयाम ‘पुराने सा’ को विस्मृत कर ‘नए सा’ की शुरुआत में निहित है। संगीत के व्याकरण में ‘सा’ आधार है, लेकिन जीवन के संदर्भ में यह संदेश देता है कि अतीत की असफलताओं या मृत हो चुकी स्मृतियों को ढोने के बजाय उन्हें विसर्जित करना ही वास्तविक सृजन है। यह ‘नए सिरे से शुरुआत’ करने का साहस ही इस कविता को जीवनधर्मी बनाता है। ‘आवाज़ की झुर्रियों’ को न छिपाना और उन्हें सहज स्वीकार करना दरअसल अपनी कमियों और उम्र के अनुभवों के साथ गरिमापूर्ण जीवन जीने का एक सकारात्मक निर्देश है। यह बताता है कि पूर्णता केवल निर्दोष होने में नहीं, बल्कि अपने दोषों और संघर्षों के निशानों के साथ सुरीला होने में है।
अंततः, ‘थक जाओ तो धीरे बजना’ जैसी पंक्तियाँ कला के व्याकरण को करुणा के व्याकरण में बदल देती हैं। यह संगीत के विलम्बित लय का वह मानवीय संस्करण है जो मनुष्य को अपनी सीमाओं को पहचानने और स्वयं के प्रति दयालु होने की सीख देता है। इस प्रकार, रंजना मिश्र की यह कविता संगीत की पारिभाषिक शब्दावली को केवल माध्यम बनाती है, ताकि वह एक ऐसे अविजित साम्राज्य की रचना कर सके जहाँ जीत किसी दूसरे पर नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर के संशयों और मृत्यु के भय पर प्राप्त की जाती है। यह तकनीकी शुद्धता से कहीं ऊपर उठकर एक ऐसी जीवन-कला बन जाती है, जो मनुष्य को हर फिसलती हुई साँस के साथ एक नया और बेहतर अर्थ खोजने के लिए प्रेरित करती है।
कविता में ‘मौन’ कोई निष्क्रिय अवस्था नहीं, बल्कि सक्रिय कर्म और आत्म-मंथन की एक उर्वर भूमि है। जब कवयित्री कहती हैं कि ‘मौन जब ऊब-डूब होता है’, तो यह संगीत के उस ठहराव की तरह है जहाँ गायक अगली तान लेने से पहले अपनी पूरी ऊर्जा संचित करता है। यह मौन मनुष्य को जीवन के सामाजिक कोलाहल और निजी द्वंद्वों के बीच एक ऐसी स्पष्टता की ओर ले जाता है, जहाँ संदेह छंटने लगते हैं। भारतीय जीवन-दर्शन में सक्रियता का अर्थ केवल भाग-दौड़ नहीं, बल्कि सही दिशा का बोध है, और यह कविता प्रतिपादित करती है कि वह बोध केवल मौन की गहराई में उतरकर ही प्राप्त किया जा सकता है। यह मौन हमें अपनी फिसलती साँसों और समय की नश्वरता के प्रति सचेत करता है, जिससे हम जीवन के हर पल को अधिक सघनता और सार्थकता के साथ जीने के लिए सक्रिय होते हैं।
इस सक्रियता का संबंध ‘तनी हुई रस्सी पर बंद आँखें चलना’ जैसे साहसी कर्म से है। यहाँ बंद आँखें और मौन दरअसल एकाग्रता के उच्चतम शिखर हैं, जो मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में भी अपना अविजित साम्राज्य सुरक्षित रखने का संबल देते हैं। यह साम्राज्य किसी सत्ता का नहीं, बल्कि स्वयं पर नियंत्रण और आत्म-विजय का है। संगीत का व्याकरण यहाँ सक्रिय जीवन-पद्धति में बदल जाता है—जहाँ ‘सा’ लगाना एक आरंभ है, ‘प’ पर ठहरना स्थिरता है, और ‘मौन’ वह सक्रिय प्रतीक्षा है जो हर पुराने के अंत के बाद एक नए अनंत का सृजन करती है। इस प्रकार, रंजना मिश्र की यह रचना मौन को एक जीवनधर्मी उपकरण बनाकर हमें कर्म के उस ऊँचे धरातल पर प्रतिष्ठित करती है जहाँ शब्द और कर्म के बीच का फासला मिट जाता है और मनुष्य अपनी पूरी गरिमा के साथ बजने लगता है।
इस कविता का निष्कर्ष उस अविजित साम्राज्य की उद्घोषणा है, जो किसी बाह्य विजय से नहीं बल्कि आत्म-विलय से निर्मित होता है। कविता की अंतिम पंक्तियाँ—“मौन जब ऊब-डूब होता है / संदेह छंटते हैं / … / एक अविजित साम्राज्य / जहाँ आवाज़ का ढहना नामुमकिन है”—जीवन की उस चरम उपलब्धि को रेखांकित करती हैं जहाँ मनुष्य काल के प्रभाव से परे हो जाता है। यहाँ ‘अविजित’ होने का अर्थ है उस आंतरिक लय को पा लेना जिसे संसार का कोई भी कोलाहल खंडित नहीं कर सकता। यह साम्राज्य संगीत के नाद और जीवन के साहस के मेल से बना है, जहाँ ‘आवाज़ का न ढहना’ वास्तव में मनुष्य की जिजीविषा और उसकी स्मृतियों की अमरता का प्रतीक है।
‘आवाज़ की झुर्रियाँ’ कविता अंततः हमें एक ऐसे बिंदु पर छोड़ती है जहाँ हमारी झुर्रियां अब कमजोरी का निशान नहीं, बल्कि उस ‘प’ की तरह अचल अनुभव का प्रमाण बन जाती हैं। रंजना मिश्र यहाँ एक कलाकार की विनम्रता और एक दार्शनिक की दृष्टि को एकाकार कर देती हैं। ‘अविजित साम्राज्य’ वही है जहाँ ‘मौन’ और ‘शब्द’ के बीच का द्वंद्व समाप्त हो गया है और जीवन एक अखंड संगीत बन गया है। इस तरह, यह रचना न केवल रंजना मिश्र की काव्य-प्रतिभा का परिचायक है, बल्कि यह हर उस व्यक्ति के लिए एक संबल है जो अपने खाली हाथों और फिसलती साँसों के बीच एक स्थायी और गरिमापूर्ण अस्तित्व की तलाश में है।
टी.एस. एलियट का सुप्रसिद्ध कथन कि “कोई भी कवि या कलाकार अकेले अपने पूर्ण अर्थ को प्राप्त नहीं करता” (No poet, no artist, has his complete meaning alone), इस अनिवार्य सत्य की ओर संकेत करता है कि प्रत्येक नई सर्जना अपनी पूर्ववर्ती परंपरा के साथ एक जीवंत संवाद और ‘पुनर्संयोजन’ की निरंतर प्रक्रिया है। इस परिप्रेक्ष्य में, यह रेखांकित करना और भी आवश्यक हो जाता है कि ‘राग मालकौंस’ और ‘राग गौड़ सारंग’ जैसी ये दोनों कविताएँ मात्र भारतीय शास्त्रीय संगीत के व्याकरण पर कुछ पंक्तियाँ लिख देने का कोई सतही उपक्रम नहीं हैं।
यहाँ एलियट की ‘परंपरा’ का अर्थ केवल अतीत का अनुकरण नहीं, बल्कि उस ‘ऐतिहासिक बोध’ (Historical Sense) से है, जो कवयित्री को अपनी समकालीनता में भी उस ‘अनादि’ संगीत के साथ जोड़ देता है। यह कविताएँ उस बिंदु पर खड़ी हैं जहाँ संगीत की तकनीक (Substance) और मन की अतल वेदना (Essence) का द्वैत समाप्त हो जाता है। परिणामतः, यहाँ जो शब्द उभरते हैं, वे यतीन्द्र मिश्र की कुछ कविताओं को अपवादस्वरूप छोडकर कम से कम हिन्दी में पहले कभी नहीं देखे गए; वे अस्तित्व की उन परतों को खोलते हैं जहाँ पहुँचने के लिए केवल काव्य-प्रतिभा नहीं, बल्कि एक गहरी ‘सांगीतिक-चेतना’ की भी आवश्यकता होती है।
रंजना मिश्र की कविताओं को समझने-समझाने के क्रम में बड़े देसी-विदेशी कवियों की विश्वविख्यात कविताओं का हवाला देने का उद्देश्य उनकी कविता को किसी कवि के बराबर या समानांतर स्थापित करना हरगिज़ नहीं है । दूसरे शब्दों में , उनकी रचनाओं की असली ताकत किसी बाहरी मुकाबले में नहीं, बल्कि उस गहरी और मौलिक गूँज में है जो भाषा के सबसे पुराने और हमेशा नए रहने वाले स्वरूप से पैदा होती है। उनकी कविताओं में शब्दों का संगीत और जीवन के गहरे दुखों की समझ इस तरह एक-दूसरे में रचे-बसे हैं कि वे मनुष्य की नियति को समझने के लिए एक बिल्कुल नई शब्दावली तैयार करते हैं। रंजना मिश्र की अभिव्यक्ति का यह अनूठा ढंग उन्हें केवल एक भाषा या देश तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उनकी कविताओं को विश्व-साहित्य के उस बुनियादी ढांचे का हिस्सा बना देता है जहाँ कविता मनुष्य होने के गहरे अर्थ समझाती है।
उनकी कविताओं में संगीत की यह लय और जीवन की त्रासद गहराइयाँ किसी सजावट की तरह नहीं, बल्कि एक अनिवार्य तत्व की तरह घुली-मिली हैं। उदाहरण के लिए, जब वे समय की मार या किसी स्त्री के भीतर की रिक्तता को शब्दों में ढालती हैं, तो वहाँ केवल शोक नहीं होता, बल्कि शब्दों का एक ऐसा सूक्ष्म विन्यास होता है जो उस पीड़ा को भी गरिमा प्रदान करता है। उनकी भाषा में ‘आदिम’ होने का अर्थ उस मौलिक पुकार से है जो सभ्यता के शोर से पहले भी मौजूद थी और ‘नूतन’ होने का अर्थ है उस पुकार को आज के जटिल यथार्थ के बीच फिर से जीवित कर देना। यही कारण है कि उनकी कविताओं को पढ़ते हुए हमें किसी विदेशी या स्थापित ‘कैनन’ की कसौटी की याद नहीं आती, बल्कि हम एक ऐसी संप्रभु दुनिया में प्रवेश करते हैं जहाँ मानवीय नियति अपने दुखों और संघर्षों के साथ एक नए व्याकरण में परिभाषित हो रही होती है। उनकी रचनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि महान कविता तुलनाओं से नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक सत्यता और उस सांगीतिक गठन से महान बनती है जो वैश्विक स्तर पर हर संवेदनशील मनुष्य के हृदय को स्पर्श कर सके।

अंतत: निवेदन है कि इन कविताओं और हिन्दी में रचित ऐसी अन्य कविताओं के रचनात्मक अभिप्राय और कलात्मक गठन को हिन्दी कविता के पाठकों तक पहुँचाने में आलोचना की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है । वजह यह कि जिन आधारभूत कलात्मक विशेषताएँ इन कविताओं को विशिष्ट बनाती हैं उन्हें क़ायदे से जाने-समझे बिना पाठक इन्हें हृदयंगम नहीं कर सकता और कविता में दिलचस्पी रखने वाले पाठकों में ऐसी सलाहियत पैदा करना आलोचना की जिम्मेदारी है ।
याद आ सकते हैं मार्क्स, जिन्होंने ‘1844 की आर्थिक और दार्शनिक पांडुलिपियों’ (Economic and Philosophic Manuscripts of 1844) में स्पष्ट लिखा है- “यदि आप कला का आनंद लेना चाहते हैं, तो आपको एक कलात्मक रूप से सुसंस्कृत व्यक्ति होना चाहिए।(“If you want to enjoy art, you must be an artistically cultivated person;…”) वस्तुत: मार्क्स यहाँ स्पष्ट करना चाहते हैं कि कला का आस्वादन कोई निष्क्रिय क्रिया नहीं है। जैसे संगीत सुनने के लिए एक ‘संगीतज्ञ कान’ की आवश्यकता होती है, श्रेष्ठ चित्र को देखने-समझने के लिए ‘रूपद्रष्टा आँखें’ ज़रूरी होती हैं; वैसे ही श्रेष्ठ साहित्य को गहराई से पढ़ने, समझने और महसूस करने के लिए उपयुक्त ‘साहित्यिक समझ’ विकसित करनी पड़ती है। प्रकारांतर से जनता के कलात्मक प्रशिक्षण की महती आवश्यकता पर बल देते हुए मार्क्स का तर्क था कि जिस प्रकार उत्पादन का विषय (कलाकृति) उपभोक्ता को पैदा करता है, उसी प्रकार कला का उपभोग करने के लिए मनुष्य को अपनी इंद्रियों और बुद्धि को प्रशिक्षित करना पड़ता है। मार्क्स ने इस बात पर भी चिंता जताई थी कि पूँजीवादी व्यवस्था में मनुष्य का ‘अलगाव’ (Alienation) उसे इतना थका देता है कि वह कला के उच्च स्तर का आनंद लेने की क्षमता खोने लगता है।
ऐसे में रंजना मिश्र की ये कविताएँ मरुभूमि में जलाशय की तरह प्रतीत होती हैं। इत्यलम् ।

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प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष (से.नि.), हिन्दी विभाग, हैदराबाद विश्वविद्यालय


 

रवि रंजन
जन्म : 1962, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार
शिक्षा : पी-एच.डी.
रूचि के क्षेत्र : भक्तिकाव्य, आधुनिक हिन्दी कविता, आलोचना, साहित्य का समाजशास्त्र,
प्रकाशित कृतियाँ : ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’, ‘सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन,दिल्ली (2011), ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’ (2012),वाणी प्रकाशन, ‘वारसा डायरी’(2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’(2026), वाणी प्रकाशन, दिल्ली
विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में सौ से अधिक आलेख प्रकाशित.
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भागीदारी.
‘वारसा डायरी’ के लिए ‘जयपुर साहित्य सम्मान (2023)
प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय,बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा स्थापित पीठ (चेयर ) पर विजिटिंग प्रोफ़ेसर
प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष(से.नि.), हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद
ई.मेल. : raviranjan@uohyd.ac.in मो.9000606742


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