रश्मि शर्मा समकालीन कहानी का एक ज़रूरी नाम हैं। आपकी कहानियां जीवन का पर्याय हैं अर्थात आप जीवन को जो जैसा दीख रहा है , उसे नहीं बल्कि उसके पीछे के अदृश्य जीवन को जो वास्तविक सच्चा जीवन होता है , ज़बान देती हैं। आपमें अपने अंचल की ख़ुशबू है ,स्थानीय बेजुबानों की पीड़ा। ‘ सपनों का ढाई घर’ इसी जीवन को आकार देता है। इस संग्रह की समीक्षा मीना बुद्धि राजा ने की है। मीना अदिति महाविद्यालय में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। -हरि भटनागर
समीक्षा- रश्मि शर्मा के कहानी- संग्रह ‘ सपनों के ढाई घर’


समकालीन कहानी को पत्रकारिता और शोध के स्थूल यथार्थ की सतही कथा मात्र न बनाकर उसे अपने समय के बयान के सार्थक हस्तक्षेप के रूप में दर्ज़ करने के लिये लेखन की अनेक विधाओं के लिये सम्मानित सशक्त युवा कथाकार ‘रश्मि शर्मा’ एक महत्वपूर्ण उपस्थिति हैं। आज के कथा परिदृश्य में उनका दूसरा नवीनतम प्रकाशित कहानी संग्रह ‘सपनों के ढाई घर’ में अपनी गहन, सजग और संवेदनापूर्ण दृष्टि के साथ स्त्री जीवन के सभी आयामों को गहराई से स्पर्श करते हुए उसकी मुक्ति की दिशा की पहचान करती नौ कहानियों का समावेश है। जिनमें एक कथाकार के रूप में अपने समय की उनकी मानवीय, सामाजिक और पर्यावरण के सरोकारों की चिंताएं भी शामिल हैं ।
रश्मि जी लोक जीवन और मानव मन की ज़मीन में गहरी धंसी तरलता को केंद्र में लाकर समाज की व्यवस्था की कटु सच्चाईयों के बीच स्त्री समाज के कठिन सत्य का यथार्थ चित्रण करके कथा लेखन को अपने सामाजिक दायित्व का माध्यम भी बना देती हैं ।इन कहानियों के स्त्री चरित्र जीवन के सभी स्पंदन, अनुभवों, सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद के विरोधाभासों में भी जीवन का सृजन करते हैं, नये सपनों की सृष्टि करते हैं । अपने यथार्थ और घटनाओं के साथ उनके संबंधों को पहचानने की सघन यात्रा में कथाकार काजिस नयी दृष्टि को अन्वेषित करती है, वह रास्ता मौलिक और पथरीला है जो सभी विडंबनाओं और उनकी त्रासद नियति के कई बंद दरवाज़ों को खोलने की कोशिश करता है ।
शीर्षक कहानी जो इस संग्रह की अंतिम लम्बी और महत्वपूर्ण कहानी है ,पूर्णिमा के रूप में उसके चरित्र को केंद्र में रखकर स्त्री का अप्रत्याशित निर्णय ज़िंदगी को समग्रता में देखने की सर्जनात्मक बेचैनी का प्रतीक है । उच्चशिक्षित और अविवाहित पूर्णिमा का अतीत की भयावह पितृसत्तात्मक व्यवस्था की अपने रूढ़िवादी परिवार की संरचना में विवाहित स्त्री की घुटन के स्याह अनुभवों से भागकर स्त्री को व्यक्ति और लिंग से अलग मात्र मनुष्य बनाकर अपने समय को गढने की प्रक्रिया निहित है ।सहकर्मी विवाहित पुरुष मनोहर के सौम्य, संवेदनशील और उदार व्यक्तित्व के अंश को अपने गर्भ में धारण करने की आंकाक्षा उन अधूरे सपनों के स्खलन और सृजन के बीच विभाजक रेखा के रूप में मौजूद है जो इस विकृत समाज में मानवीय विवेक को विवाह संस्था के विकल्प के रूप में स्त्री-पुरुष सबंधों की गरिमा को स्वीकार करने और स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व को पूर्ण ईकाई मानने का संदेश देती है । पूर्णिमा के चरित्र में कथाकार जैसे उस मानवीय दायित्व को वहन करना चाह्ती है जिसमें अपने परिवेश को स्वस्थ, विकसित और संतुलित रूप देने के लिये परंपरा की सड़ी-गली नैतिक व्यस्था का अतिक्रमण करके भी नयी लीक की शुरुआत की जा सकती है । स्त्री-पुरुष संबधों का सहअस्तित्व ही इस नयी प्रक्रिया को संपन्न कर सकता है, नयीधारा का पुनर्निर्माण कर सकता है जिसमें पूर्णिमा, मनोहर और संगीता तीनों चरित्रों के माध्यम से यह कहा नी नये जीवन की भूमिका लिखती है ।
मोटिफ़, राहतें और भी हैं जैसी कहानियों में स्त्री होने की पीड़ा और उसका अनथक संघर्ष होते हुए भी इनके चरित्र अपनी हताशा, असफलता और नियति को बोझ की तरह ढोते हुए नहीं दिखते हैं । बल्कि इनमें अपनी मानवीय अस्मिता और गरिमा के साथ उपस्थित रुदनी, पार्वती और श्रेया जैसे स्त्री पात्र हैं । इनमें अकेले ही अपने वर्तमान और भविष्य की सभी चिंताओं के साथ भी गांव, शहर और समाज में अपने अस्तित्व को बचाने की ज़िद है और कितने स्तरों पर अनेक लड़ाई लड़ने की विवशता भी। रुदनी कलाकार के रूप में एक सपने और ध्येय के साथ जीवन की अनेक कठिनाईयों से लड़ रही है कि उसके हाथों की सोहराई चित्रकारी कला छोटे से गांव से निकलकर देश-विदेश में प्रसिद्ध हो और युवा पीढी भी इस बहुमूल्य कला की विरासत को पहचाने। बचपन में माँ की इस कला की उपेक्षा करने वाली बेटी पार्वती अब शायद रुदनी की अपराजेय शक्ति के उत्स को पहचानती है । इसलिए उच्चशिक्षा के लिये शहर में जाने के बाद पार्वती सोहराई कला को जीवित रखने के लिये माँ के लिये समर्पित अपने नवनिर्मित कला केंद्र में सभी प्रयास करती है कि इस कला का सौंदर्य सिर्फ दीवारों पर नहीं बल्कि कपड़ों के आधुनिक डिजाईन, मोटिफ और कला कृतियों के रूप में भी विकसित हो सके। मातृत्व की अनकही डोर उनको एक अटूट रिश्ते में बाँधे रखती है जिसे लोककला , संस्कृति और प्रकृति के समन्वय के सानिध्य ने सँवारा है ।
‘ राहतें और भी हैं’ एक खूबसूरत कहानी है जिसमें श्रेया अकेले भी स्त्री के जीवन की संपूर्णता में संवाद और सार्थकता की सभी संभावनाओं को जी सकती है और समाज द्वारा अनुमोदित विवाह संस्था के बेहतर विकल्प के रूप में पुरुष प्रेमियों से अलग अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व को तलाश करना चाहती है । अपने अतीत की भावुकता और बंधनों का पर्याय बन चुके सबंधो से उबरकर वह अपनी वास्तविक मुक्ति को पाना चाह्ती है जो उसके अस्तित्व की सृजनात्मकता को बाधित न कर सके।
‘स्टूल’ कहानी में वृद्ध होती नानी का परिवार की संरचना में अपनी पहले जैसी सशक्त और दबंग पहचान को खोजने का असफल प्रयास हो अथवा ‘कबीरा खड़ा बाज़ार में’ सहोदरी का आदिवासी संस्कृति की परंपरागत मान्यताओं और धार्मिक रूढियों के चक्र में जीवन का संघर्ष हो, मन के घेरे में कृतिका के आंतरिक द्वंद्व का जीवंत चित्रण, तीज का चाँद और पेट में उड़ती तितलियाँ में पर्यावरण के लिए जंगल और पहाडों को बचाने का रेनी का संकल्प हो , मेहरबान भूत की रोचक कहानी में अंधविश्वास का खंडन हो अथवा रिंगटोन में कामगार और वंचित वर्ग की स्त्रियों का मोबाईल प्रेम जैसी विविध कहानियों में स्त्री का संघर्ष जटिल और बहुआयामी है । शिक्षा, बदलती परिस्थितियों, पर्यावरण के प्रति जागरूकता और नई चेतना ने बदलाव की जो आधारभूमि तैयार की है उसमें अभी भी प्रेम, मानवीय मूल्य ,सामाजिक सरोकार जैसे विषय अपनी गरिमा और अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं । इसलिये जाति, धर्म, लिंग, वर्ग, वर्ण, आर्थिक और शोषण के अनेक भेदों के बीच से गुज़रकर स्त्री के रूप में मनुष्य होने की अपनी स्वंतत्र पहचान की महत्ता को पाने की प्रक्रिया इन कहानियों में निरतंर जारी है ।
यह कहानी संग्रह वस्तुत: तमाम स्त्री विरोधी स्थितियों से बने समाज की व्यवस्था में उसके आत्मविकास और अदृश्य संभावनाओं को खोजकर पूरी पितृसतात्मक परम्परा में परिवर्तन और बदलाव का प्रतीक बनकर उपस्थित होता है। जिसके लिये कथाकार नें कथा शिल्प में सहज़ पठनीयता के प्रवाह को भी कहीं बाधित नहीं होने दिया है। चरित्रों और परिवेश के अनुरूप भाषा का मौलिक सौंदर्य इन कहानियों की विशेषता है। ‘सपनों के ढाई घर’ पुस्तक में नि:संदेह स्त्री विमर्श को देह मुक्ति तक सीमित न करके वृहत्तर और सभी आयामों तक उसके स्वतंत्र अस्तित्व को समाज की मूलभूत मानवीय ईकाई के रूप में स्थापित करने की दिशा में सार्थक प्रतिरोध का महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है ।
कहानी संग्रह: सपनों के ढाई घर
कथाकार: रश्मि शर्मा
प्रकाशक: लोक भारती प्रकाशन; प्रयागराज-2110001
पहला संस्करण: 2025
मूल्य: 299 रु.
डॉ. मीना बुद्धिराजा
सम्प्रति: एसोसिएट प्रोफेसर (आदिति महाविद्यालय दिल्ली)
प्रकाशन:
आजकल, पहल, नया ज्ञानोदय, आलोचना, लमही, जनसत्ता जैसी सुप्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में 100 से ज़्यादा लेख प्रकाशित
आलोचना की पुस्तकें:
• समकालीन रचना शीलता की वैचारिकी का प्रकाशन
• निराला के आलोचनात्मक निबंध
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