हिन्दी साहित्य और कला-संस्कृति के परिदृश्य में अशोक वाजपेयी एक ऐसी बहुआयामी शख्सियत हैं, जिन्होंने केवल कविता के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि आलोचना, संपादन और सांस्कृतिक प्रशासन में भी अपनी गहरी छाप छोड़ी है। उनका महत्त्व इस बात में निहित है कि उन्होंने साहित्य को केवल शब्दों तक सीमित न रखकर उसे कला के अन्य रूपों (संगीत, चित्रकला, नृत्य) के साथ जोड़कर एक व्यापक ‘सांस्कृतिक बोध’ विकसित किया है ।
एक कवि के रूप में, वाजपेयी जी की कविताओं में जीवन की रागात्मकता, प्रेम, प्रकृति और समय का अनूठा संगम मिलता है। उनकी शैली में एक प्रकार की मितव्ययिता और गहराई है, जहाँ वे छोटी-छोटी पंक्तियों के माध्यम से बड़े दार्शनिक प्रश्न खड़े करते हैं। उनके प्रमुख कविता संग्रह जैसे ‘शहर अब भी संभावना है’ और ‘कहीं नहीं वहीं’ (जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला) हिन्दी कविता में आधुनिकता और परंपरा के बीच एक सेतु हैं।
एक सजग आलोचक के तौर पर उन्होंने ‘रचना के साथ खड़ी होने’ वाली आलोचना को बढ़ावा दिया है । उन्होंने विचारधाराओं के संकीर्ण घेरों से निकलकर रचना की सौंदर्यशास्त्रीय परख पर भी बल दिया है । भारत भवन (भोपाल) के संस्थापक और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति के रूप में उनकी भूमिका ने यह सिद्ध किया है कि एक रचनाकार व्यवस्था के भीतर रहकर भी रचनात्मकता के लिए उदार स्थान बना सकता है। उन्होंने ‘पूर्वग्रह’ ,’बहुवचन’ तथा ‘समास’ जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से नए रचनाकारों को मंच दिया और हिन्दी आलोचना को एक नई शब्दावली प्रदान की। संक्षेप में, अशोक वाजपेयी का महत्त्व हिन्दी संसार में एक ऐसे ‘अग्रदूत’ के रूप में है, जिन्होंने कलाओं के बीच के संवाद को पुनर्जीवित किया और रचना को मनुष्य की मुक्ति का माध्यम माना।
हम सबके आदरणीय और प्रिय अशोक वाजपेयी के 86वें जन्मदिन के अवसर पर उनकी कुछ कविताओं के समाजशास्त्रीय एवं सौंदर्यशास्त्रीय विश्लेषण से युक्त प्रोफ़ेसर रवि रंजन का यह प्रखर आलोचनात्मक आलेख प्रस्तुत करते हुए ‘रचना समय’ की टीम अशोक जी को जन्मदिन की हार्दिक मंगलकामनाएँ देती हुई उनके स्वस्थ और चिरायु होने की कामना करती है। प्रिय अशोक जी की कुछ कविताओं पर परंपरागत आलोचना से भिन्न दृष्टि से की गई इस गहन और सम्यक आलोचना के बारे में अलग से कुछ कहने के बजाय शमशेर बहादुर सिंह की एक प्रसिद्ध पंक्ति का स्मरण करना अधिक प्रासंगिक जान पड़ता है— ‘बात बोलेगी, हम नहीं।’
– हरि भटनागर

आलेख

“साहित्य में भटकते हुए पचहत्तर बरस हो गए हैं …जिन्हें पहले से पता है कि उन्हें ज़िन्दगी में क्या- कुछ-कैसे करना है उनके लिए साहित्य बहुत सहायक या उपयोगी नहीं हो पाता.वे साहित्य से दूर रहते हैं और साहित्य भी उनसे दूर ही…साहित्य भटकने का परिसर है –उसमें चलना, चलते रहना अभीष्ट होता है, कहीं पहुँचना नहीं.इस भटकने के कई मुक़ाम होते हैं पर कोई मंजिल नहीं.यह एक तरह की विपथगामिता है …यह भी कह सकते हैं कि साहित्य में चलना-भटकना ही मंजिल है…भटकना भले अकेले होता है पर हम एक कारवाँ में भी ,चाहे-अनचाहे, शामिल होते हैं. यह आलम हमें अकेला नहीं छोड़ता ,हरदम साथ रहता है. मीर का एक शेर याद आता है :
आलम के साथ जायें चले किस तरह न हम
आलम तो कारवाँ है हम कारवानियाँ”

-अशोक वाजपेयी : ‘समालोचन’, सितम्बर 2, 2025

भारत के लोकवृत्त में अशोक वाजपेयी को प्रायः ‘संस्कृति-पुरुष’ के रूप में पहचाना जाता रहा है—अर्थात ऐसे रचनाकार के रूप में जो साहित्य, कला और बौद्धिक विवेक के संस्थागत तथा नैतिक आयामों को एक साथ साधते हैं। प्रस्तुत अध्ययन में उनके काव्य-सृजन को भारतीय आधुनिकता के एक नैतिक-सांस्कृतिक दस्तावेज़ के रूप में पढ़ने का प्रयास किया गया है। यह आधुनिकता पाश्चात्य आधुनिकतावाद के प्रत्यक्ष अनुकरण से अधिक एक आत्मालोचनपरक और स्वानुभूत प्रक्रिया के रूप में प्रकट होती है, जिसमें भाषा, इतिहास और सांस्कृतिक स्मृति निरंतर प्रश्नांकित होती रहती हैं। अशोक वाजपेयी की कविताओं में आधुनिक मनुष्य की स्वतंत्रता, अकेलापन, अनास्था और नैतिक उत्तरदायित्व जैसे प्रश्न अवश्य उपस्थित हैं, किंतु वे किसी आयातित वैचारिक संरचना के रूप में नहीं आते; वे भारतीय समाज की ऐतिहासिक स्थितियों, सांस्कृतिक अनुभवों और नैतिक द्वंद्वों के भीतर से जन्म लेते हैं। इसी कारण उनकी कविता वैश्विक आधुनिक काव्य-संवाद में सहभागी होते हुए भी अपनी स्थानीय और सांस्कृतिक जड़ों से विच्छिन्न नहीं होती, बल्कि उन्हें पुनः सक्रिय और पुनर्परिभाषित करती हुई आगे बढ़ती है।
शहर अब भी संभावना है’, ‘एक पतंग अनंत में’, ‘अगर इतने से’, ‘तत्पुरुष’, ‘कहीं नहीं वहीं’, ‘बहुरि अकेला’, ‘थोड़ी-सी जगह’, ‘घास में दुबका आकाश’, ‘जो नहीं है’, ‘अभी कुछ और’, ‘समय के पास समय’, ‘कहीं कोई दरवाज़ा’, ‘दुःख चिट्ठीरसा है’, ‘पुनर्वसु’, ‘विवक्षा’, ‘कुछ रफू कुछ थिगड़े’, ‘इस नक्षत्रहीन समय में’, ‘कम से कम’, ‘हार-जीत’ आदि कविता-संग्रहों तथा ‘फ़िलहाल’ और ‘कुछ पूर्वग्रह’ जैसी आलोचना-पुस्तकों के साथ-साथ उनके सैकड़ों आलेखों, साक्षात्कारों, आलोचनात्मक टिप्पणियों और वक्तव्यों से गुज़रते हुए किसी भी प्रबुद्ध पाठक के मन में अशोक वाजपेयी की छवि अपनी सांस्कृतिक भूमि में गहरे धँसे एक ऐसे विश्व-कवि के रूप में उभरती है, जिसकी काव्य-संवेदना व्यापक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में विकसित होती है। यह काव्य-दृष्टि आदिकवि वाल्मीकि से आरंभ होने वाली भारतीय काव्य-परंपरा से लेकर ‘Victims of a Map’ (1984) के रचनाकार महमूद दरवेश (1941–2008) और ‘The Curved Planks’ (2001) के लिए प्रख्यात फ्रांसीसी कवि ईव बॉनफुआ (Yves Bonnefoy : 1923–2016) तक के साथ एक नैतिक, सांस्कृतिक और काव्यात्मक संवाद में संलग्न दिखाई देती है—ऐसा संवाद जो प्रत्यक्ष प्रभाव से अधिक संवेदनात्मक समानधर्मिता और साझा मानवीय प्रश्नाकुलता पर आधारित है।
अशोक वाजपेयी की कविता को हिंदी आलोचना में प्रायः ‘संयम, नैतिक सजगता और बौद्धिक सघनता’ की कविता कहा गया है। उनकी रचनाओं में बड़बोलापन या किसी तात्कालिक राजनीतिक प्रतिक्रियात्मकता की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति नहीं मिलती। इसके स्थान पर वहाँ आत्मसंयम, विचारशीलता और एक धीमी लेकिन दृढ़ नैतिक ज़िद दिखाई देती है। यह ज़िद घोषणाओं में नहीं, बल्कि चयन की प्रक्रिया में प्रकट होती है। वे अक्सर इस चिंतन में डूबे दिखाई देते हैं कि किन शब्दों को बचाया जाए, किन अनुभवों को दर्ज किया जाए और किन बातों को मौन रहकर छोड़ दिया जाए। उनकी कविता में नैतिक स्वर किसी उपदेशात्मक मुद्रा में नहीं आता, बल्कि अनुभव, आत्मस्वीकृति और विवेकपूर्ण संकोच से उपजता है।

दिनकर द्वारा कविता में ‘भाषा की सफ़ाई’ के संदर्भ में कही गई उक्ति—“सच्चाई की पहचान कि पानी साफ़ रहे, जो चाहे ले निरख जलाशय के तल को”—हिंदी काव्य-परंपरा में भाषिक पारदर्शिता के एक आदर्श की ओर संकेत करती है। इस परंपरा को अशोक वाजपेयी अपनी रचनात्मक प्रक्रिया में अनायास आत्मसात करते हुए दिखाई देते हैं। उनके यहाँ सादगी और पारदर्शिता काव्य-भाषा की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता के रूप में पहचानी जा सकती है। यह सादगी किसी सतही सहजता का परिणाम नहीं है; इसके भीतर गहरे दार्शनिक और सांस्कृतिक संकेत अंतर्निहित हैं। उनकी कविताओं को पढ़ते हुए यह अनुभव होता है कि जटिल विचारों को आलंकारिक या दुरूह भाषा में प्रस्तुत करने के बजाय वे उन्हें लगभग साधारण वाक्य-रचना में विन्यस्त करते हैं। ‘प्रार्थना’, ‘कोई नहीं सुनता चीख’, ‘हम अपना समय नहीं लिख पाएँगे’ जैसी पंक्तियाँ पहली दृष्टि में अत्यंत सहज प्रतीत होती हैं, किंतु इन्हीं के भीतर आधुनिक मनुष्य की गहरी दार्शनिक और नैतिक दुविधाएँ निहित हैं। इस प्रकार उनकी काव्य-भाषा उस सृजनात्मक क्षमता का उदाहरण बनती है जिसे आलोचना में ‘कम-से-कम में अधिक कहने की कला’ कहा गया है।
उनकी कविता किसी संकीर्ण साहित्यिक दायरे में नहीं रची गई है, बल्कि वह संगीत, चित्रकला, स्थापत्य, दर्शन और इतिहास से निरंतर संवाद करती रही है। वह एक ऐसे कवि का सृजन है जो अपनी परम्परा से गहरे जुड़ा है, लेकिन उसे ज्यों का त्यों दोहराने के बजाय उसे प्रश्नांकित और पुनर्परिभाषित करता रहा है। औपनिषदिक चेतना, भक्तिकाव्य और भारतीय नवजागरण से पैदा हुई देशज आधुनिकता और आधुनिक एवं उत्तर-आधुनिक यूरोपीय दर्शन—ये सब उनकी कविता में संदर्भों की तरह नहीं, बल्कि अनुभव की तरह आते हैं।

उनकी कविता की जो एक और महत्त्वपूर्ण विशेषता उभरकर सामने आती है वह है —आस्था और अनास्था के बीच का तनाव। कहमे की ज़रूरत नहीं कि यह तनाव प्रकारान्तर से दुनिया-भर में आधुनिक मनुष्य की चेतना में कमोबेश पाया जाता है । उनकी कविता न तो धार्मिक विश्वास का प्रचार करती है और न ही नास्तिकता का उत्सव मनाती है। ‘मैंने प्रार्थना नहीं की’ जैसी कविता में यह तनाव अत्यंत सूक्ष्म और गहन रूप में व्यक्त हुआ है। यहाँ प्रार्थना का निषेध ईश्वर का निषेध नहीं है, बल्कि संस्थागत, अनुष्ठानिक और अक्सर हिंसक होती जा रही तथाकथित आस्था से एक नैतिक दूरी है। सच तो यह है कि ऐसी कविताएँ आस्था को कर्मकाण्ड या धार्मिक पहचान की राजनीति के बजाय अनुभव, करुणा और नैतिक विवेक से जोड़ती हैं ।

इन कविताओं में ‘सुनने और न सुने जाने’ का मर्मान्तक बोध निहित है। ‘कोई नहीं सुनता चीख’ या ‘कोई नहीं सुनता पुकार’ जैसी काव्यपंक्तियों में केवल सामाजिक उदासीनता की शिकायत नहीं , बल्कि आधुनिक सभ्यता के उस ढाँचे की ओर संकेत हैं जहाँ सुनना स्वयं एक संकटग्रस्त क्रिया बन चुकी है। इस पहलू को आधुनिक सत्ता-संरचनाओं और भाषिक संकट के संदर्भ में पढ़ा जा सकता है। उनकी कविता में चीख़-पुकार और प्रार्थना का अनसुना रह जाना इस बात का संकेत है कि आधुनिक समाज में संवेदना और अर्थ के लिए जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है।

अपने समय की चेतना का आकलन भी उनकी कविता की एक विशिष्ट पहचान है। ‘हम अपना समय नहीं लिख पाएँगे’ जैसी कविता कोई व्यक्तिगत हताशा की उपज नहीं , बल्कि यह उस ऐतिहासिक क्षण की पहचान है जिसमें कवि स्वयं को भाषा, सत्य और अनुभव—तीनों संकट में घिरा पाता है। इस कविता में समय को मुकम्मल ढंग से पकड़ने की असमर्थता को विनम्रतापूर्वक स्वीकार किया गया है और यही स्वीकारोक्ति उसे एक मुस्तनद तहज़ीबी दस्तावेज़ बनाती है। ऐसी कविता समय का शोर नहीं रचती, बल्कि समय की चुप्पी को सुनने का प्रयास करती है।

ब्रेष्ट ने लिखा है कि रचनाकार को कभी मूंगफली की तरह लोकप्रिय नहीं होना चाहिए । अशोक वाजपेयी का रचनाकर्म भी किसी तात्कालिक लोकप्रियता या वैचारिक फैशन का आकांक्षी नहीं है। वह धीमे, धैर्यपूर्ण और आत्मालोचनात्मक तरीके से अपने पाठक से संवाद करने में विश्वास करता है। यही कारण है कि उनकी कविता को पढ़ने के लिए एक विशेष प्रकार की पाठकीय तैयारी और संवेदनशील चौकन्नापन ज़रूरी है। ऐसी कविता पाठक से त्वरित सहमति या असहमति नहीं, बल्कि ठहरकर सोचने की माँग करती है। वस्तुत: अशोक वाजपेयी की कविता समकालीन हिन्दी साहित्य में एक सशक्त नैतिक, बौद्धिक और सौन्दर्यबोधात्मक हस्तक्षेप है। यह आधुनिक मनुष्य की आस्था, अनास्था, अकेलेपन, समय-बोध और नैतिक जिम्मेदारी को किसी एक निष्कर्ष में नहीं बाँधती, बल्कि उन्हें प्रश्नों की तरह हमारे सामने रखती है। इसी कारण यह आलोचनात्मक विवेचन-विश्लेषण के लिए एक समृद्ध, और बहुस्तरीय अर्थगर्भित ‘टेक्स्ट’ है।

मलयज का कहना है कि “समग्र सत्य को जब उसके द्वद्वात्मक सिरों से पकड़ने की कोशिश की जाती है ,तब अंतर्विरोध का जन्म होता है।” अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी की आलोचनात्क अभ्यर्थना के साथ ही अशोक वाजपेयी में युवा रचनाकारों एवं संस्कृतिकर्मियों के प्रति गहरा जुड़ाव दिखाई पड़ता है । अज्ञेय की ‘नए कवि से’ कविता की ‘आ, तू आ, हाँ, आ, / मेरे पैरों की छाप-छाप पर रखता पैर, मिटाता उसे, / मुझे मुँह भर-भर गाली देता- /आ, तू आ’ से नितांत भिन्न ही नहीं,बल्कि बिलकुल विपरीत लहजे में रचित एक कविता में युवा पीढ़ी से अपने अपने गहरे जुड़ाव की आकांक्षा का मूर्तन करते हुए अशोक वाजपेयी लिखते
हैं :

एक युवा जंगल मुझे,
अपनी हरी पत्तियों से बुलाता है।
मेरी शिराओं में हरा रक्त बहने लगा है
आँखों में हरी परछाइयाँ फिसलती हैं
कंधों पर एक हरा आकाश ठहरा है
होंठ मेरे एक हरे गान में काँपते हैं :
मैं नहीं हूँ और कुछ
बस एक हरा पेड़ हूँ
– हरी पत्तियों की एक दीप्त रचना!
ओ युवा जंगल
बुलाते हो
आता हूँ
एक हरे बसंत में डूबा हुआ
आऽताऽ हूँ…।

नई पीढ़ी के शब्दकर्मियों से एक वरिष्ठ कवि के आत्मीय लगाव का चित्रण करती इस श्रेष्ठ कविता से गुज़रते हुए ‘रामचरितमानस’ की एक सिखावन याद न आए, यह मुमकिन नहीं; जिसमें कहा गया है कि वन-गमन के समय राम के ज़मीन पर अंकित होने वाले दोनों चरण-चिह्नों पर पैर रखने से बचकर केवल बीच में अपने पाँव रखती हुईं सीता मार्ग में चल रही हैं और मर्यादा की रक्षा के लिए सीता और राम दोनों के चरण चिह्नों को बचाते हुए लक्षमण दाहिनी ओर पैर रखकर रास्ता चल रहे हैं:

प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता॥
सीय राम पद अंक बराएँ । लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ॥

अमूमन दृष्टि की संकीर्णता (मायोपिक विज़न) की वजह से गद्य और कविता की तरह ‘साहित्य का समाजशास्त्र’ और ‘सौंदर्यशास्त्र’ को भी एक दूसरे के बरअक्स खड़ा किया जाता रहा है, जिसका प्रतिवाद करते हुए अर्नाल्ड हॉउज़र (Arnold Hauser:1892–1978) ने कला, विचारधारा, वर्ग-संरचना और सांस्कृतिक सत्ता के संबंधों को जोड़कर देखते हुए रचित ‘सौंदर्यशास्त्र और कला का समाजशास्त्र’ (Aesthetics and Sociology of Art: 1974) पुस्तक में लिखा है कि “श्रेष्ठ कला न तो पूरी तरह स्वायत्त (autonomous) है, न ही मात्र सामाजिक प्रतिबिंब—वह समाज और सौंदर्यबोध के बीच निरंतर संवाद से निर्मित होती है।” उन्होंने कला के समाजशास्त्रीय सौन्दर्यशास्त्र और सौन्दर्यशास्त्रीय समाजशास्त्र की चर्चा करते हुए कला एवं संस्कृति-चिन्तन के क्षेत्र में सक्रिय विचारकों से इन दोनों शास्त्रों को मिला-जुलाकर कला के मूल्यांकन का आह्वान किया है ।
इसी नज़रिए से तत्काल यहाँ अशोक वाजपेयी की कुछ कविताओं की पाठ-केन्द्रित अर्थ मीमांसा करने की कोशिश करते हुए साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र के मानदण्डों के अनुसार मुक्त भाव से आलोचनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करने का विनम्र प्रयास किया जा रहा है । इस क्रम में जितना इन कविताओं के भीतर देखा गया है, उतना ही उसके बाहर भी ।

(एक)

प्रेम खो जाएगा

जैसे प्रार्थना के शब्दों की शुद्धता में ईश्वर

जैसे खिली धूप में पिछली बादल-घिरी शाम का अवसाद
वैसे ही अपनी चाहत से बिलमकर

प्रेम खो जाएगा
हम छीलते रहेंगे मेज़ पर चुपचाप बैठे नारंगियाँ और यादें

न सपने काफ़ी होंगे न शब्द
अंत में नहीं बचेगी कोई मांगलिकता

प्रेम खो जाएगा
आकाश को अपनी बाँहों में भरने की कोशिश रह जाएगी

रह जाएगी पृथ्वी के शस्य की तरह समृद्ध होने की इच्छा
कविता जैसा निश्छल होने का उपक्रम

गली पहले ही ख़त्म हो जाएगी
दरवाज़े बंद

धूप आने में असमर्थ
बीतने के भय के अलावा कोई नहीं होगा साथ

प्रेम खो जाएगा
जीर्णोद्धार के लिए नहीं मिलेंगे औज़ार

रफ़ू करने वाला धागा नहीं सूझेगा आँख को
दृश्यालेख से हरियाली, पक्षी

और बेंच पर हर दिन किसी देवता की तरह बैठा बूढ़ा
ओझल हो जाएँगे

प्रेम खो जाएगा…

‘प्रेम खो जाएगा’ समकालीन हिन्दी कविता में प्रेम पर संकट, भाषा की असमर्थता और आधुनिक मनुष्य की अस्तित्वगत असुरक्षा का अत्यन्त सूक्ष्म, गहन और दार्शनिक आख्यान प्रस्तुत करती है। यह कविता किसी एक निजी प्रेम-भंग की कथा नहीं है, बल्कि प्रेम को एक सांस्कृतिक, नैतिक और भाषिक संरचना के रूप में देखती है—जो धीरे-धीरे हमारे समय से खिसकती जा रही है। यहाँ प्रेम का खो जाना किसी आकस्मिक घटना की तरह नहीं, बल्कि एक अनिवार्य प्रक्रिया की तरह उपस्थित होता है, मानो यह हमारे समय की नियति हो।
कविता का आरम्भ ही एक भविष्यवाणी की तरह होता है -‘प्रेम खो जाएगा।’ यह कथन न तो शोकगीत है और न ही चेतावनी; यह एक दार्शनिक उद्घोष है, जिसमें निश्चय और विवशता दोनों साथ-साथ हैं। गौरतलब है कि कविता में प्रेम के खो जाने की तुलना ‘प्रार्थना के शब्दों की शुद्धता में ईश्वर’ के खो जाने से की गयी है। यह उपमा अत्यन्त अर्थगर्भी है। यहाँ ईश्वर का लुप्त होना नास्तिकता की घोषणा नहीं, बल्कि भाषा और आस्था के बीच टूटते सम्बन्ध की ओर संकेत है। जैसे-जैसे प्रार्थना के शब्द शुद्ध, सटीक और नियमबद्ध होते गए, ईश्वर उनमें से अनुपस्थित होता गया। यह वही संकट है जिसे देरिदा भाषा के भीतर अर्थ की अनुपस्थिति या स्थगन के रूप में व्याख्यायित करते रहे हैं।
देरिदा का ‘डिकंस्ट्रक्शन’ सिद्धांत इस कविता को समझने के लिए उपयोगी प्रतीत होता है। उनके अनुसार किसी भी शब्द का स्थिर अर्थ नहीं होता; वह सदैव अन्य शब्दों की ओर खिसकता रहता है। वे इसे ‘डिफरांस’ (différance) कहते हैं, जिसका दार्शनिक निहितार्थ एक ही साथ ‘स्थगन’ (deferral) और ‘भिन्नता’ (difference) का मिलाजुला रूप है । विवेच्य कविता में भी प्रेम, कविता और प्रार्थना—तीनों ऐसे शब्द हैं जिनका अर्थ आज तक सुनिश्चित नहीं है, बल्कि लगातार फिसलता रहता है। जब कवि कहता है कि प्रेम वैसे ही खो जाएगा जैसे शुद्ध प्रार्थना में ईश्वर, तो वह यह संकेत करता है कि अत्यधिक संरचनागत बुनावट , शुद्धता और परिभाषा प्रेम को नष्ट कर देती है। प्रेम तब तक जीवित है जब तक वह अस्पष्ट, अधूरा और असुरक्षित है। जैसे ही उसे परिभाषित, सुरक्षित और संस्थागत किया जाता है, वह अपने ही अर्थ से च्युत हो जाता है।
इस कविता में बार-बार अतीत की स्मृति और वर्तमान के बीच एक तनाव दिखाई देता है जिसका निदर्शन ‘हम छीलते रहेंगे मेज़ पर चुपचाप बैठे नारंगियाँ और यादें’ पंक्ति में हुआ है। साधारण प्रतीत होने वाला यह दृश्य अत्यन्त गहरे अर्थ से भरा हुआ है । नारंगी छीलना एक घरेलू दैनिक क्रिया है, पर उसके साथ ‘यादें’ छीलना प्रेम के क्षरण की प्रक्रिया को रूपायित करता है। यहाँ स्मृति भी कोई स्थिर संरचना नहीं है; वह भी धीरे-धीरे ‘छिलती’ जाती है। देरिदा के अनुसार स्मृति भी उपस्थिति नहीं, बल्कि अनुपस्थिति का चिह्न है। जो याद किया जा रहा है, वह अब वहाँ नहीं है। इस प्रकार प्रेम अपनी वास्तविक उपस्थिति के बजाय अब सिर्फ़ स्मृति के रूप में मौजूद है ।
उत्तर-आधुनिक सन्दर्भ में यह कविता ‘महान आख्यानों ’ के विघटन की कविता है। विदित है कि उत्तर-आधुनिकता, ब-क़ौल फ्रेडरिक जेम्सन, वृद्ध पूँजीवाद (लेट कैपिटलिज्म) का सांस्कृतिक तर्क है । यह प्रेम, सत्य, ईश्वर और इतिहास जैसे सार्वभौमिक मूल्यों पर संदेह करती है। ल्योतार ने उत्तर-आधुनिकता को ‘महान आख्यानों के प्रति अविश्वास’ कहा है । प्रेम भी एक महान आख्यान है—जो मनुष्य के जीवन में पूर्णता, समर्पण और अर्थ का वादा करता है। अशोक जी की कविता इस आख्यान के टूटने की कथा कहती है। कविता की ‘न सपने काफ़ी होंगे न शब्द’—यह पंक्ति इशारा करती है कि अब प्रेम न तो कल्पना और न ही भाषा सम्भव बना सकती है।
कविता में ‘मांगलिकता’ का लुप्त होना विशेष रूप से ध्यान खींचता है। मांगलिकता भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में शुभ, पूर्ण और जीवनदायी स्थिति का संकेत मानी जाती रही है। यहाँ ईश्वर को भी ‘मंगल भवन अमंगल हारी’ कहा गया है। प्रेम के खो जाने के साथ ही ‘अंत में नहीं बचेगी कोई मांगलिकता’ —यह कथन प्रेम को केवल निजी अनुभव नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक ऊर्जा के रूप में स्थापित करता है। कविता का मूल संदेश है कि प्रेम के बिना समाज में शुभता, उत्सव और भविष्य की सम्भावना भी समाप्त हो जाती है।
यह विचित्र स्थिति घनघोर आस्तिकों के लिए भी ख़तरे की घंटी है, क्योंकि भक्ति से सम्बद्ध लगभग सारे धार्मिक एवं दार्शनिक ग्रंथों में स्पष्ट कहा गया है कि धर्म, अर्थ, काम ,मोक्ष के मुक़ाबले प्रेम सबसे बड़ा पुरुषार्थ है (‘प्रेमा पुमर्थों महान्’) और ईश्वर भी प्रेम से ही प्रकट होता है : ‘भक्त्याहम् एकया ग्राह्यःश्रद्धयाऽत्मा प्रियः सताम्’ या गोस्वामी जी के शब्दों में ‘प्रेम भगति जल बिनु रघुराई । अभिअंतर मल कबहुँ न जाई ॥’
श्रीमद्भावत महापुराण में श्रीकृष्ण गोपियों से कहते हैं :
न पारयेऽहं निरवद्यसंयुजां स्वसाधुकृत्यं विभुधायुषापि वः।
या माभजन् दुर्जरगेहशृङ्खलाः संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना॥

(“हे गोपियों! मेरे प्रति आपके इस निस्वार्थ और पवित्र प्रेम (निरवद्यसंयुजां) के बदले में, मैं देवताओं की लंबी आयु (विभुधायुषापि) पाकर भी आपका ऋणी ही रहूँगा। आपने अपने घर-गृहस्थी की उन बेड़ियों को तोड़ दिया है जिन्हें काटना अत्यंत कठिन है। आपके इस उपकार का बदला मैं कभी नहीं चुका सकता; आपके सद्गुण ही स्वयं में आपका पुरस्कार बनें।”)

ध्यान देने की बात है कि उपर्युक्त छंद में ‘प्रेम’ शब्द के बजाय ‘निरवद्यसंयुजां’ का प्रयोग हुआ है ,जिसका अर्थ ‘दोषरहित संबंध या मिलन’ है और भागवत के प्रामाणिक टीकाकार श्रीधर स्वामी के अनुसार यह ईश्वर द्वारा व्यक्त प्रतिदान-असमर्थता के मद्देनज़र ‘प्रेम-भक्ति’ का सशक्त प्रमाण है । एक अन्य श्लोक में स्पष्ट शब्दों में भक्ति को प्रेम प्रकट करने वाला भाव कहा गया है :

लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्।
अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे॥

(परम पुरुष (भगवान) के प्रति किया जाने वाला वह प्रेमपूर्ण जुड़ाव, जो बिना किसी स्वार्थ (कारण) के हो और जिसमें कभी कोई रुकावट न आए, उसे ही ‘निर्गुण भक्ति’ का लक्षण कहा गया है।”)

इतना ही नहीं, ‘चैतन्य चरितामृत’ जैसे गौड़ीय वैष्णव दर्शन ग्रंथों की टीकाओं एवं श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर की रचनाओं में बल देकर कहा गया है कि भक्ति का एकमात्र सुफल प्रेम है :

सा भक्तिः साधनं साध्यं फलं प्रेमेति निश्चितम्।
इति कृष्णार्पणं साध्यं साधनं तन्मयात्मकम्॥
भक्ति‑रसामृतसिन्धु में, रूप गोस्वामी ने भी भक्ति के संदर्भ में प्रेम का महत्त्व प्रदिपादित करते हुए लिखा है :
सम्यङ् मसृणित स्वान्तो ममत्वातिशयाङ्कितः |
भावः स एव सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते ||
उनका आशय है कि जब भक्त का हृदय पूरी तरह नरम हो जाता है और भगवान के प्रति अत्यधिक ममतापूर्ण भाव उत्पन्न होता है, तब वह भाव सघन, परिपक्व और अनुभवपूर्ण बन जाता है। विद्वानों के अनुसार, इसे प्रेम कहा जाता है। प्रेम भगवान के प्रति भाव से भी उत्पन्न हो सकता है और उनके अनुग्रह या प्रसाद से भी। भक्ति-भाव का परिपक्व रूप में प्रेम में परिवर्तित होना ही परवर्ती शास्त्रकारों द्वारा ‘प्रेमभावाभिव्यञ्जना’ कहा गया है ।
गौरतलब है कि यदि दुर्भाग्यवश भविष्य में दुनिया से पूरी तरह ‘प्रेम खो जाएगा’, तो यह सिर्फ़ नास्तिकों या संदेहवादियों के लिए ही चिंता का विषय नहीं होना चाहिए। यह स्थिति उन सीधे-सादे भक्तों के लिए और भी अधिक गंभीर चिंता की वजह होनी चाहिए, जो प्रेम के लोप के लिए जिम्मेदार सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक परिस्थितियों से मुँह मोड़कर अपनी अखंड आस्था के साथ केवल कर्म काण्ड सम्पन्न करने में लगे रहते हैं।
हमारे इस सत्यातीत समय में चंद त्यागी-तपस्वी और भजनानंदी धर्माचार्यों को छोड़कर, भगवद्-प्रेम के नाम पर धन्ना सेठों से पोषित और धार्मिक उन्माद फैलाकर उसका राजनीतिक लाभ उठाने को आतुर राजनीतिज्ञों के संरक्षण में पलने वाले तथाकथित साधु-साध्वियों की बढ़ती संख्या के मद्देनज़र अनायास मुक्तिबोध का स्मरण हो आता है, जिन्होंने बहुत पहले डिजिटल माध्यमों पर प्रदर्शनकारी कला की तरह विकसित होती जा रही तथाकथित धर्म के धंधे की धज्जी उड़ाते हुए मानवीय सामर्थ्य और नैतिक संभावना की ओर संकेत करते हुए लिखा था—

इतने प्राण, इतने हाथ; इतनी बुद्धि
इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि।

इतने प्राण, इतने हाथ; इतनी बुद्धि
इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशद्धि

इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति
यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति,

इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद—
जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंध

इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर जाल—
केवल एक जलता सत्य देने टाल।
बहरहाल, उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से देखें तो लगभग भविष्यवाणी की मुद्रा में वर्तमान स्थिति के मद्देनज़र आधुनिक मनुष्य को ‘प्रेम खो जाएगा’ की संभावना व्यक्त करती अशोक वाजपेयी की कविता आधुनिक सभ्यता द्वारा निर्मित उस ख़ालीपन को उजागर करती है, जिसमें प्रेम, ग़ालिब की शब्दावली में कहें तो, ज़रूरत से ज्यादा बेताबी की वजह से ‘सब्र-तलब’ के बजाय तुरंत प्राप्त कर लेने योग्य एक उपभोग्य वस्तु में बदल गया है। औपनिवेशिक आधुनिकता ने भावनाओं को भी इस्तेमाल और नतीज़े के तर्कजाल में उलझा दिया है । प्रेम से अपेक्षा की जाने लगी कि वह सुरक्षा दे, पहचान दे और स्थायित्व दे। पर प्रेम का स्वभाव इन अपेक्षाओं के विपरीत है। जब प्रेम से यह सब माँगा जाता है, तो वह टूटने लगता है। विवेच्य कविता में ‘आकाश को अपनी बाँहों में भरने की कोशिश रह जाएगी’— पंक्ति प्रेम की उसी असम्भव आकांक्षा को प्रकट करती है, जिसे आधुनिक मनुष्य पूरा करना चाहता है, पर कर नहीं पाता।
‘गली का खत्म हो जाना’, ‘दरवाज़ों का बंद होना’ और ‘धूप का आने में असमर्थ होना’ जैसे सारे के सारे बिंब आधुनिक एवं उत्तर-आधुनिक शहरी जीवन के रूपक हैं। यहाँ न तो खुलापन है, न प्रवेश की सम्भावना। प्रेम के लिए खुली जगह चाहिए—भौतिक भी और मानसिक भी। निराला के शब्दों में ‘प्रेम का पयोधि तो उमड़ता है सदा ही निस्सीम भू पर।’ जाहिर है कि जब इंसान की ज़िन्दगी में हर जगह ‘बंद दरवाज़े’ हों, तो प्रेम का प्रवेश असम्भव हो जाता है।
हमारे ‘सत्यातीत’ समय में इस कविता की अर्थवत्ता और गहरी हो जाती है। इस युग में सत्य की जगह अंधविश्वास और भावनात्मक विभ्रम ले लेते हैं। इस दौर में प्रेम भी अब अनुभव नहीं, बल्कि ‘प्रस्तुति’ (performance) बनता जा रहा है। आजकल सोशल मीडिया पर प्रदर्शित किया जाने वाला प्रेम इसका एक उदाहरण हो सकता है ,जिसके तहत चौबीसों घंटे साथ रहते हुए ज़िंदगी से ऊबे हुए अनेक पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका फेसबुक और इन्स्टाग्राम पोस्ट के माध्यम से एक-दूसरे को शादी की सालगिरह या ‘प्रणय दिवस’ के मौक़े पर मुबारकबाद देते नज़र आते हैं । कहने की ज़रूरत नहीं कि ऐसे में प्रेम का वास्तविक अनुभव खो जाना अस्वाभाविक नहीं है। कवि कहता है—‘बीतने के भय के अलावा कोई नहीं होगा साथ।’ यह भय समय के बीतने का नहीं, बल्कि जीवन से अर्थ के लुप्त होने का है। याद आ सकते हैं भर्तृहरि ,जिन्होंने लिखा है कि काल नहीं बीताता, हम बीतते चले जाते हैं – ‘कालो न यातो वयमेव याताः।’
कविता के उत्तरार्ध में ‘जीर्णोद्धार’ और ‘रफ़ू’ जैसे शब्द आते हैं,जिनसे गुज़रते हुए ग़ालिब की पंक्ति ‘हमारे जैब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है’ की याद स्वाभाविक है । ये शब्द मरम्मत और पुनर्निर्माण की सम्भावना की ओर संकेत करते हैं, पर कवि कहता है कि न औज़ार मिलेंगे, न धागा । इसलिए मरम्मत की कोई संभावना नहीं है । ‘धागा’ यहाँ प्रेम और रिश्तों की नाजुकी है, जिसके अभाव में संबंध के नाम पर लोग उसका बोझ ढोने के लिए अभिशप्त होते हैं । प्रकारांतर से यह कविता देरिदा की उस अवधारणा से जुड़ती है जिसके अनुसार कोई भी अर्थ पूरी तरह पुनर्स्थापित नहीं किया जा सकता। एक बार जो संरचना टूट गई, वह उसी रूप में लौट नहीं सकती। प्रेम भी एक बार खो गया, तो उसी रूप में वह लौट नहीं सकता जैसा वह था।
‘दृश्यालेख से हरियाली, पक्षी और वह बूढ़ा—जो‘किसी देवता की तरह बेंच पर बैठता था—सब ओझल हो जाएँगे’ – यह दृश्य सांस्कृतिक स्मृति के क्षरण का द्योतक है। ‘देवता की तरह बूढ़ा’ यहाँ किसी धार्मिक सत्ता का नहीं, बल्कि जीवन के समृद्ध अनुभव और धैर्य का प्रतीक है। उसके ओझल हो जाने के साथ ही प्रेम की आखिरी सम्भावना भी धुँधली हो जाती है।
फिर भी यह कविता पूरी तरह निराशावादी नहीं कही जा सकती । वजह यह कि प्रेम के खो जाने की बार-बार घोषणा के भीतर ही प्रेम की अनिवार्यता छिपी है। यदि प्रेम इतना महत्त्वपूर्ण न होता, तो उसके खो जाने का शोक भी इतना गहरा न होता। देरिदा के अनुसार अनुपस्थिति भी एक तरह की उपस्थिति होती है। प्रेम का खो जाना इस बात का प्रमाण है कि वह कभी था, और पुराने अर्थों में न सही शायद किसी अन्य रूप में फिर प्राप्त हो सकता है। दूसरे शब्दों में ‘प्रेम खो जाएगा’ प्रेम के अंत के बजाय प्रेम की कठिन सम्भावना की कविता है। यह हमें यह सोचने के लिए विवश करती है कि क्या प्रेम केवल स्मृति, भाषा और आकांक्षा के सहारे जीवित रह सकता है, या उसे किसी नई नैतिक और सांस्कृतिक संरचना की आवश्यकता है। उत्तर-आधुनिक, उत्तर-औपनिवेशिक और ‘पोस्ट-ट्रुथ’ के इस दौर में प्रेम शायद पहले की तरह सहज नहीं रहा, पर उससे जुड़ा प्रश्न अब भी हमारे समय का सबसे गम्भीर और मानवीय प्रश्न बना हुआ है।
वस्तुत: ‘प्रेम खो जाएगा’ कविता केवल भावुकता के बजाय प्रेम, भाषा और मनुष्य की स्थिति पर एक गम्भीर दार्शनिक और सांस्कृतिक विमर्श के रूप में उपस्थित होती है। कविता का उद्घोष—‘प्रेम खो जाएगा’—किसी निजी आशंका का बयान नहीं, बल्कि हमारे समय की ऐतिहासिक और बौद्धिक स्थिति का कथन है। स्पष्ट ही यह कथन भविष्यवाणी की तरह आता है, पर उसका स्रोत वर्तमान में गहरे धँसा हुआ है। प्रेम यहाँ किसी एक सम्बन्ध का नाम नहीं, बल्कि एक नैतिक, भाषिक और सांस्कृतिक सम्भावना का नाम है, जिसके क्षरण को कवि पूरे धैर्य और संयम के साथ देख रहा है।
मैक्स वेबर (1864-1920) ने लिखा था कि अब समाज तार्किक गणनाओं (rational calculations) और दक्षता पर आधारित होता जा रहा है, जिससे उसका एक ‘लोहे का पिंजरा’ (Iron Cage) की तरह बनने का ख़तरा है ,जहाँ भावना और मूल्य हाशिये पर चले जाते हैं। ऐसी स्थिति में संसार से रहस्य और दैवी उपस्थिति का क्षरण होता है। ‘साइंस ऐज अ वोकेशन’(1917) में उनका कहना था , “आधुनिक संसार में अब कोई रहस्यमय शक्तियाँ नहीं बची हैं; सब कुछ सिद्धान्ततः गणना और नियंत्रण के अधीन है।”( There are no mysterious incalculable forces that come into play, but rather that one can, in principle, master all things by calculation.”) अशोक वाजपेयी की इस कविता में प्रार्थना के शब्द शुद्ध हैं, पर ईश्वर अनुपस्थित है; ठीक उसी तरह जैसे आधुनिक जीवन में प्रेम के सारे क्रिया-कलाप अनुष्ठान की हद तक मौजूद हैं, पर प्रेम स्वयं धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है।
देरिदा के अनुसार किसी भी शब्द में अर्थ स्थिर रूप से उपस्थित नहीं होता; वह हमेशा टलता रहता है। ‘ऑफ़ ग्रामेटोलोज़ी’ में वे लिखते हैं—“अर्थ कभी पूर्ण रूप से उपस्थित नहीं होता; वह सदैव स्थगन और अन्तर के माध्यम से उत्पन्न होता है” । प्रेम, कविता और प्रार्थना—तीनों इस कविता में ऐसे ही शब्द हैं जिनका अर्थ फिसलता रहता है। जब प्रेम को पूरी तरह परिभाषित करने, सुरक्षित करने और संरचित करने की कोशिश की जाती है, तभी वह खोने लगता है। कविता प्रेम की उस असंरचित, असुरक्षित और अनिश्चित प्रकृति की रक्षा करती है।
विवेच्य कविता में—“हम छीलते रहेंगे मेज़ पर चुपचाप बैठे नारंगियाँ और यादें”—वस्तुत: एक ज़बरदस्त स्मृति -बिम्ब है और प्रेम के उत्तरजीवित होने की विडम्बनापूर्ण स्थिति को प्रकट करता है। यह स्मृति प्रेम की उपस्थिति नहीं, बल्कि उसकी अनुपस्थिति का चिह्न है। देरिदा के शब्दों में, “स्मृति कभी शुद्ध उपस्थिति नहीं होती; वह अनुपस्थिति की छाया होती है।”। प्रेम अब अनुभव नहीं, स्मृति बन चुका है—और स्मृति स्वयं ‘छिलती’ चली जा रही है।
लम्बे अरसे से प्रेम भी पूर्णता, समर्पण और अर्थ का वादा करने वाला एक महान आख्यान रहा है । पर इस कविता में कहा जा रहा है कि—‘न सपने काफ़ी होंगे न शब्द।’ यह कथन इस बात का प्रमाण है कि न तो कल्पना और न ही भाषा अब प्रेम को सम्भव बना पा रही है। यहाँ प्रेम का संकट भाषा का भी संकट है, जिसे टी. एस. एलियट ने ‘द वेस्ट लैंड’ में अत्यन्त तीव्र रूप में व्यक्त किया है।
एलियट जब अप्रैल को ‘क्रूरतम महीना’ बताते है (“April is the cruelest month”), तो यह पंक्ति उस सभ्यता की ओर संकेत करती है जहाँ प्रेम की सम्भावना भी पीड़ा बन जाती है। सर्दी के मौसम के बाद ‘अप्रैल’ को अमूमन वसंत और नवजीवन का महीना माना जाता रहा है। पर एलियट इसे ‘क्रूरतम’ कहते हैं, क्योंकि यह उनके शब्दों में “Lilacs out of the dead land” है। अर्थात वह मृत-सी भूमि से जीवन को जबरन उगाता है। एलियट कहना यह चाह रहे हैं कि जो लोग आंतरिक रूप से निष्क्रिय, टूटे हुए और शून्य हो चुके हैं, उनके लिए वसंत और पुनर्जागरण सुख के बजाय यातना और पीड़ा बन जाता है। अप्रैल का महीना उन स्मृतियों और इच्छाओं को जगा देता है जो बीत चुकी हैं और लौट नहीं सकतीं। जिन इच्छाओं की पूर्ति अब असंभव है। इसलिए यह महीना मनुष्य को उसके अभाव, विफलता और टूटन का बोध कराता है। एलियट के अनुसार आधुनिक सभ्यता एक ‘वेस्ट लैंड’ बन चुकी है—जहाँ विश्वास टूट चुका है परंपराएँ अर्थहीन हो गई हैं और जीवन यांत्रिक और निर्जीव है। विदित है कि कविता के शीर्षक में ‘वेस्ट’(Waste) से तात्पर्य केवल ‘बंजर’ नहीं, बल्कि अर्थहीन, उजाड़, मूल्यहीन और ‘लैंड’ का मतलब सभ्यता, संस्कृति और चेतना का क्षेत्र है। ऐसे में कवि को शीतकाल (winter) बेहतर लगता है, क्योंकि वह “covered the earth in forgetful snow” यानी भूलने की विश्रांति प्रदान करता है । इसके विपरीत अप्रैल मनुष्य को जगाता है—और यही उसकी क्रूरता है । निवेदन है कि एलियट के ‘वेस्ट लैंड’ की तरह अशोक वाजपेयी की ‘प्रेम खो जाएगा’ कविता और उसमें ‘गली पहले ही ख़त्म हो जाएगी’, ‘दरवाज़े बंद’,’धूप आने में असमर्थ’, ‘बीतने के भय के अलावा कोई नहीं होगा साथ’ आदि अपने-अपने मुस्तनद तहज़ीबी तजुर्बे के दो रूप हैं।
उत्तर-औपनिवेशिक सन्दर्भ में देखें तो प्रेम का यह संकट केवल दार्शनिक नहीं, ऐतिहासिक भी है। एडवर्ड सईद ने बताया है कि आधुनिक सत्ता-संरचनाएँ केवल भूगोल ही नहीं, भावनाओं को भी नियंत्रित करती हैं। ‘कल्चर एंड इम्पेरिअलिज़्म’ में उन्होंने लिखा है —“संस्कृति सत्ता का एक रूप है, जो यह निर्धारित करती है कि क्या और कैसे महसूस किया जाएगा ।” कहने की ज़रूरत नहीं है कि प्रेम जब उपभोक्तावादी तर्क के अधीन हो जाता है, तो वह अनुभव नहीं, प्रदर्शन बन जाता है। विवेच्य कविता में आयी पंक्ति – “आकाश को अपनी बाँहों में भरने की कोशिश रह जाएगी”— आधुनिक मनुष्य की उसी असम्भव आकांक्षा को प्रकट करती है। ‘सत्यातीत’ (पोस्ट-ट्रुथ) युग में प्रेम का संकट और भी जटिल हो जाता है,जहाँ प्रेम वास्तविक अनुभव के बजाय उसकी छवियों और प्रस्तुतियों में बदल जाता है।
इसी सन्दर्भ में प्रथम महायुद्ध, बोल्शेविक क्रान्ति और योरोप में बढ़ती हिंसा की पृष्ठभूमि पर रचित डब्ल्यू. बी. यीट्स की कविता ‘द सेकंड कमिंग’ (The Second Coming, 1919) का ज़िक्र ज़रूरी है, जो आधुनिक विश्व की नैतिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक विघटन की सबसे प्रभावशाली कविताओं में से एक मानी जाती है। ईसाई परंपरा में ‘सेकंड कमिंग’ को ईसा मसीह के पुनरागमन की संभावना का संकेत मान जाता है, पर यीट्स ने अपनी रचना में इसे उद्धार बजाय विनाशकारी परिवर्तन के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया है।उनके अनुसार पुरानी सभ्यता मर रही है, पर जो नया जन्म ले रहा है वह और भी भयावह है। ‘द सेकंड कमिंग’ कविता की पंक्तियाँ —“सब कुछ बिखर रहा है; केन्द्र अब टिक नहीं पा रहा” (Things fall apart; the centre cannot hold) इसी विसंगति को व्यक्त करती हैं।
महर्षि वाल्मीकि की ‘प्रीत्यभिरामाश्च सर्वे रामानुयायिनः’ और तुलसीदास की ‘सब नर करहिं परस्पर प्रीती’ सरीखी काव्यपंक्तियों को अगर प्रमाण मानें , तो जाहिर है कि भारतीय समाज में कभी लोगों का परस्पर प्रेम ही व्यक्ति और समाज का एक केन्द्र माना जाता था, जिसके बिखरने की अनुभूति अशोक वाजपेयी की कविता में गहरे स्तर पर मौजूद है। कविता के अन्त में ‘बेंच पर हर दिन किसी देवता की तरह बैठा बूढ़ा’ का ओझल हो जाना सांस्कृतिक स्मृति और नैतिक अनुभव के लोप का संकेत है। यह वही ‘बूढ़ा’ है जो मानवता के इतिहास में लम्बे समय तक अनुभव, धैर्य और प्रेम की निरन्तरता का प्रतीक था। फिलिप लार्किन की कविता ‘चर्च गोइंग’ सवाल खड़ा करती है कि जब अविश्वास चला जाएगा,तब क्या बचेगा (What remains when disbelief has gone?) अनजाने ही इस तीखे प्रश्न का उत्तर देती हुई अशोक वाजपेयी की कविता कहती है कि—शायद केवल स्मृति, आकांक्षा और भाषा की टूटी हुई कोशिशें बची रह जाएँगी ।
इस प्रकार ‘प्रेम खो जाएगा’ कविता ‘उत्तर-आधुनिक’, ‘उत्तर-औपनिवेशिक’ और इस ‘सत्यातीत’ दौर में प्रेम की असम्भवता नहीं, बल्कि उसकी कठिन सम्भावना को हमारे चिन्तन की परिधि में ले आती है। प्रेम का खो जाना अन्त नहीं, बल्कि एक प्रश्न है—कि क्या हम बिना सुनिश्चित अर्थ, बिना स्थायी संरचना और बिना किसी गारंटी के भी प्रेम कर सकते हैं। यही प्रश्न इस कविता को हमारे समय की एक गम्भीर और संभवत: सबसे मानवीय कवित्वपूर्ण चिन्ता में बदल देता है।
(दो )

हम अपना समय लिख नहीं पाएँगे
यह ठहरा हुआ निर्जन समय
जिसमें पक्षी और चिड़ियाँ तक चुप हैं,

जिसमें रोज़मर्रा की आवाज़ें नहीं सिर्फ़ गूँजें भर हैं,
जिसमें प्रार्थना, पुकार और विलाप सब मौन में बिला गए हैं,

जिसमें संग-साथ कहीं दुबका हुआ है,
जिसमें हर कुछ पर चुप्पी समय की तरह पसर गई है,

ऐसे समय को हम कैसे लिख पाएँगे?
पता नहीं यह हमारा समय है

यहाँ हम किसी और समय में बलात् आ गए हैं
इतना सपाट है यह समय

कि इसमें कोई सलवटें, परतें, दरारें, नज़र नहीं आतीं
और इससे भागने की कोई पगडंडी तक नहीं सूझती।

हम अपना समय लिख नहीं पाएँगे।
यह समय धीरे चल रहा है

लगता सब घड़ियों ने विलम्बित होना ठान लिया है;
बेमौसम हवा ठंडी है;
यों वसंत है और फूल खिलखिला रहे हैं
मानो हमारे कुसमय पर हँस रहे हों

और गिलहरियाँ तेज़ी से भागते हुए
मुँह चिढ़ाती पेड़ों या खंभों पर चढ़ रही है;

अचानक कबूतर कुछ कम हो गए हैं जैसे
दिहाड़ी मज़दूरों की तरह अपने घर-गाँव वापस

जाने की दुखद यात्रा पर निकल गए हों :
हमें इतना दिलासा भर है कि

अपने समय में भले न हों, हम अपने घर में हैं।
उम्मीद किसी कचरे के छूट गए हिस्से की तरह

किसी कोने में दुबकी पड़ी है
जो आज नहीं तो कल बुहारकर फेंक दी जाएगी।

हम अपना समय लिख नहीं पाएँगे।

‘हम अपना समय नहीं लिख पाएँगे’ समकालीन हिंदी कविता में एक समर्थ कवि की दुर्लभ आत्मस्वीकृति की तरह दर्ज की जाने योग्य कविता है। इसमें न तो किसी घटना का सीधा विवरण है, न किसी वैचारिक उद्घोषणा का शोर; बल्कि यह उस ईमानदार कवि की अंतःसंघर्षपूर्ण चुप्पी है जो अपने समय को पहचानते हुए उससे आतंकित होने के बावजूद दो-दो हाथ करने के लिए तैयार बैठा है। यह भय किसी निजी असफलता का नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक क्षण का है जिसमें सत्य, भाषा और अनुभव—तीनों एक-दूसरे से अलग-थलग कर दिए गए हैं। जिस समय को आज ‘सत्यातीत’ (‘पोस्ट–ट्रुथ) कहा जाता है, उसमें कविता लिखना स्वयं एक नैतिक संकट बन गया है। यह कविता उसी संकट की रचनात्मक गवाही है।

हन्ना अरेंट (Hannah Arendt: 1906-1975) ने ‘बिटवीन पास्ट एंड फ्यूचर’(Between Past and Future,1961) निबन्ध संग्रह में लिखा है — “When facts are replaced by lies, freedom itself is endangered.” उनका आशय यह है कि जब सार्वजनिक जीवन में तथ्य व्यवस्थित रूप से झूठ से बदल दिए जाते हैं, तो केवल राजनीतिक निर्णय-प्रक्रिया ही नहीं टूटती, बल्कि भाषा, अर्थ और सत्य को पहचानने की मानवीय क्षमता भी क्षीण हो जाती है। ऐसे हालात में लोग वास्तविकता को समझने के औज़ार खो देते हैं, और स्वतंत्रता—जो सत्य पर आधारित विवेकपूर्ण निर्णय से जुड़ी होती है—खतरे में पड़ जाती है। ‘आइख़मान इन जेरुसलम’ (Eichmann in Jerusalem ,1963) पुस्तक में ‘बनैलिटी ऑफ़ ईविल’ (The Banality of Evil) शीर्षक एक अत्यंत प्रभावशाली और विवादास्पद अवधारणा प्रस्तुत करते हुए अरेंट का तर्क यह था कि ‘भीषण बुराइयाँ हमेशा राक्षसी या असाधारण लोगों द्वारा नहीं की जातीं’,, बल्कि अक्सर बिना गहरे नैतिक चिंतन के जीवन यापन करने वाले ‘साधारण, औसत, आज्ञाकारी लोग’ भी उन्हें अंजाम देते हैं । यहूदियों को मृत्यु-शिविरों तक पहुँचाने की प्रशासनिक व्यवस्था का ज़िम्मेदार नाज़ी अधिकारी ऐडोल्फ़ आइख़मान कोई असाधारण रूप से क्रूर या मानसिक विक्षिप्त व्यक्ति नहीं था मुक़दमे के दौरान अरेंट ने पाया कि वह स्वयं को “आदेशों का पालन करने वाला” नौकरशाह मानता था जिसने अपने कर्मों पर नैतिक रूप से सोचने से इनकार किया । यहीं से अरेंट ने निष्कर्ष निकाला कि बुराई की जड़ क्रूरता नहीं, बल्कि विचारहीनता (thoughtlessness) हो सकती है। बुराई हमेशा शैतानी इरादों से नहीं आती और नियम, आदेश और व्यवस्था के पीछे छिपकर लोग भयावह अपराध कर सकते हैं । जब व्यक्ति अपनी नैतिक जिम्मेदारी छोड़ देता है, तब बुराई ‘सामान्य’ हो जाती है । अधिनायकवादी प्रणालियाँ इसी विचारहीन आज्ञाकारिता पर निर्भर करती हैं । कहना यह है कि नैतिक विवेक का परित्याग किसी भी समाज को ख़तरनाक और संकटग्रस्त बना सकता है और “मैं सिर्फ़ अपना काम कर रहा था” सबसे भयावह तर्क हो सकता है। लोकतंत्र और मानवता की रक्षा के लिए ‘सोचना’ और ‘सवाल करना’ बेहद ज़रूरी है ।
‘हम अपना समय नहीं लिख पाएंगे’ कविता इसी संकट को जड़ से पकड़ती है। इस श्रेष्ठ कविता में आया ‘यह ठहरा हुआ निर्जन समय’ केवल एक भावुक वक्तव्य नहीं, बल्कि उस सामाजिक स्थिति का सटीक वर्णन है जिसमें सार्वजनिक संवाद का स्थान प्रचार, अफ़वाह और विवशता से भरे मौन ने ले लिया है। कविता में पक्षियों और चिड़ियों का चुप होना प्रकृति के दृश्य नहीं, बल्कि उस भाषिक सन्नाटे का रूपक है जिसमें मनुष्य की आवाज़ अनावश्यक या ख़तरनाक बना दी जाती है।
यह स्थिति टी.एस. एलियट की ‘द वेस्ट लैंड’ (‘The Waste Land’) कविता की याद दिलाती है, जहाँ आधुनिक सभ्यता एक ऐसे ‘वेस्ट लैंड’ में बदल जाती है जिसमें जीवन के संकेत केवल खंडहरों की तरह बिखरे होते हैं। एलियट ने ‘परम्परा और वैयक्तिक प्रज्ञा’(Tradition and the Individual Talent) निबंध में लिखा है कि कवि का काम केवल भाव व्यक्त करना नहीं, बल्कि अपने समय की ऐतिहासिक चेतना को भी आत्मसात करना है। लेकिन जब समय स्वयं ‘इतना सपाट’ हो जाए कि उसमें कोई ‘सलवटें, परतें, दरारें’ न दिखें, तब कवि के पास आत्मसात करने के लिए क्या बचेगा? अशोक वाजपेयी की यह कविता इसी जटिल प्रश्न से जूझती है। इसमें बार-बार —‘हम अपना समय नहीं लिख पाएँगे’-पंक्ति आती है और यह वाक्य पराजय का उद्घोष नहीं, बल्कि एक नैतिक स्वीकृति है।
जर्मन कवि पॉल सेलान ने होलोकॉस्ट के बाद रचित अपनी पुस्तक (Collected Poems) में लिखा था कि —“Poetry after Auschwitz must walk through silence.” सेलान के लिए कविता मौन के विरुद्ध अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मौन के भीतर से जन्म लेती अभिव्यक्ति है। अशोक वाजपेयी की कविता भी उसी मौन के भीतर खड़ी है, जहाँ प्रार्थना, पुकार और विलाप सब कवि के शब्दों में ‘मौन में बिला गए हैं।’

समाजशास्त्री जिग्मंट बॉमन ने ‘लिक्विड मॉडर्निटी’(Liquid Modernity) में आधुनिक समय को अस्थिर, फिसलन भरा और नैतिक रूप से अनिश्चित बताया है। कवि अशोक वाजपेयी के यहाँ समय स्थिर है, लेकिन यह स्थिरता जीवनदायी नहीं, दमनकारी है। विवेच्य कविता में घड़ियों का ‘विलम्बित होना’ केवल समय के धीमेपन का बिंब नहीं, बल्कि उस सामाजिक जड़ता का संकेत है जिसमें परिवर्तन की संभावना ही स्थगित कर दी गई है। यही कारण है कि कवि कहता है—‘इससे भागने की कोई पगडंडी तक नहीं सूझती।’ यह पंक्ति हमें इतालवी दार्शनिक जॉर्जियो अगाम्बेन की ‘स्टेट ऑफ़ एक्सेप्शन’ (State of Exception) की अवधारणा की ओर ले जाती है, जहाँ सामान्य जीवन निलंबित कर दिया जाता है और लोग एक ऐसे समय में रहने को विवश होते हैं जो उनका अपना नहीं होता।

विवेच्य कविता में प्रकृति का उल्लास—वसंत का होना और फूल का खिलखिलाना — देखकर कवि को लगता है प्रकृति मनुष्य के बुरे वक़्त पर पर हँस रही हो। कविता में व्यक्त यह विडम्बना विस्वावा शिम्बोर्स्का की कविता ‘अंत और आरम्भ’(‘The End and the Beginning’) का स्मरण कराती है, जहाँ युद्ध के बाद दुनिया फिर से ‘सामान्य’ दिखने लगती है, लेकिन भीतर की टूटन बनी रहती है। शिम्बोर्स्का लिखती हैं :”हर युद्ध के बाद करनी होगी किसी को तो सफ़ाई/आखिर, सब स्वयं ही/ठीक तो नहीं हो जाएगा/किसी को तो हटाना होगा मलबा/करनी होंगी सड़कें साफ़,/ताकि मिल सके रास्ता/लाशों से लदी गाड़ियों को.( “Someone has to tidy up after the war….”) अशोक वाजपेयी के यहाँ यह ‘सफ़ाई’ भी अपनी भोली मासूमियत में व्यंग्य का रूप ले लेती है , क्योंकि उम्मीद स्वयं ‘कचरे के छूट गए हिस्से’ की तरह पड़ी है, जिसे कभी भी बुहारकर फेंक दिया जा सकता है।

अशोक वाजपेयी की इस कविता में दिहाड़ी मज़दूरों का उल्लेख इसे वैश्विक मानवीय संदर्भ देता है। जाहिर है कि कोविड महामारी के दौरान हुए प्रवासन ने पूरी दुनिया के लेखकों को झकझोरा है । अरुंधति रॉय ने अपने निबंध ‘The Pandemic Is a Portal’ में लिखा—“The virus has made the mighty kneel and brought the world to a halt.” अशोक वाजपेयी की कविता बिना किसी उद्घोषणा की भाषा का इस्तेमाल किए उसी ठहराव को दर्ज करती है। ‘कबूतरों का कम हो जाना’ और ‘मज़दूरों की घर-वापसी’ जैसे बिंब कविता को स्थानीय से वैश्विक बनाते हैं। इसमें सबसे गहरा कथन है—‘पता नहीं यह हमारा समय है/ यहाँ हम किसी और समय में बलात् आ गए हैं।’ यह काव्यपंक्ति कालिक ही नहीं, नैतिक विस्थापन का भी संकेत है। महमूद दरवेश ने ‘Unfortunately, It Was Paradise’ में लिखा था—“We suffer from an incurable malady: hope.” अशोक वाजपेयी के यहाँ उम्मीद असाध्य रोग नहीं, बल्कि लगभग त्याज्य वस्तु बन चुकी है। फिर भी उसका पूरी तरह नष्ट न होना कविता को मायूसी फैलाने वाली रचना बनकर रह जाने से बचा लेता है।

‘द इवेंट ऑफ़ लिटरेचर’(The Event of Literature) में टेरी ईगलटन ने लिखा है कि साहित्य का कार्य केवल यथार्थ को ‘प्रतिबिंबित’ करना नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक संरचना को उजागर करना भी है। अशोक वाजपेयी की यह कविता सिर्फ़ अपने समय का चित्र नहीं बनाती, बल्कि ‘असंभवता के सिद्धांत’ (Doctrine of impossibility) के तहत एक ख़ास समय के भीतर कविता की नामुमकिनियत को उजागर करती है। यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। यह कविता हमें बताती है कि कभी-कभी सबसे ईमानदार रचना वही होती है जो अपनी सीमाओं को स्वीकार कर ले। असंभवता का सिद्धांत बताता है कि ऐतिहासिक स्थितियाँ कई बार कुछ संभावनाओं को असम्भव बना देती हैं। इसलिए अपनी सीमा को स्वीकार कर लेना भी ईमानदारी का परिचायक है ।

वस्तुत: ‘हम अपना समय नहीं लिख पाएँगे’ कविता एक ऐसे कवि की रचना है जो अपने समय की वर्चस्वशाली शक्तियों से समझौता नहीं करता, लेकिन उससे मुँह भी नहीं मोड़ता। वह समय को लिख नहीं पाने की बात कहकर भी उसकी चुप्पी, उसकी सपाटता, उसकी क्रूर सामान्यता के साथ उसे हमारे सामने रख देता है । यही कारण है कि यह कविता हिंदी की सीमाओं से बाहर जाकर विश्व कविता के उस साझा अनुभव से जुड़ती है, जहाँ कवि अपने समय का साक्षी तो होता है, लेकिन उसका प्रवक्ता बनने से इंकार कर देता है। ग्राम्शी के शब्दों में कहें तो अपने समय के तेज़ाबी यथार्थ का ओजस्वी प्रवक्ता होना और कलाकार होना, दो भिन्न -भिन्न बातें हैं।

(तीन )

कितने दिन और बचे हैं ?

कोई नहीं जानता कि
कितने दिन और बचे हैं?
चोंच में दाने दबाए
अपने घोसले की ओर
उड़ती चिड़िया कब सुस्ताने बैठ जाएगी
बिजली के एक तार पर और
आल्हाद से झूलकर छू लेगी दूसरा तार भी।
वनखंडी में
आहिस्ता-आहिस्ता एक पगडंडी पार करता
कीड़ा आ जाएगा
सूखी लकड़ियाँ बीनती
बुढ़िया की फटी चप्पल के तले।
रेल के इंजन से निकलती
चिनगारी तेज हवा में उड़कर
चिपक जाएगी
एक डाल पर बैठी प्रसन्न तितली से।
कोई नहीं जानता कि
कितना समय और बचा है
प्रतीक्षा करने का
कि प्रेम आएगा एक पैकेट में डाक से,
कि थोड़ी देर और बाकी है
कटहल का अचार खाने लायक होने में,
कि पृथ्वी को फिर एक बार
हरा होने और आकाश को फिर दयालु और
उसे फिर विगलित होने में
अभी थोड़ा-सा समय और है।
दस्तक होगी दरवाजे पर
और वह कहेगी कि
चलो, तुम्हारा समय हो चुका।
कोई नहीं जानता कि
कितना समय और बचा है,
मेरा या तुम्हारा।
वह आएगी –
जैसे आती है धूप
जैसे बरसता है मेघ
जैसे खिलखिलाती है
एक नन्ही बच्ची
जैसे अँधेरे में भयातुर होता है
खाली घर।
वह आएगी जरूर,
पर उसके आने के लिए
कितने दिन और बचे है
कोई नहीं जानता।

‘कितने दिन और बचे हैं ?’ कविता से गुज़रते हुए दिमाग़ में अनायास अज्ञेय की एक पंक्ति कौंधती है: ‘साहित्य का निर्माण, मानो जीवित मृत्यु का आह्वान है।’ इस कविता के बरअक्स केदारनाथ अग्रवाल की एक रचना को रखकर पढ़ने पर संभव है कि पहली नज़र में अशोक जी की कविता एक निराशावादी रचना प्रतीत हो:

हम न रहेंगे
तब भी तो ये खेत रहेंगे
इन खेतों पर घन घहराते शेष रहेंगे
जीवन देते
प्यास बुझाते
माटी को मदमस्त बनाते
श्याम बदरिया के लहराते केश रहेंगे.
– केदारनाथ अग्रवाल

किन्तु, कविता की सतही संरचना पर तैराकी के बजाय इसकी गहन संरचना में गोताखोरी करने के लिए मूल पाठ से बार-बार गुज़रते हुए हमारा भ्रम दूर हो जाता है और हम एक ऐसे काव्यनायक को अपने सामने पाते हैं जो मृत्यु-भय से मुक्त है, जिसने जीवन को भरपूर जिया है और मनोनुकूल कुछ सार्थक काम भी किये हैं।
जाहिर है कि अस्तित्ववाद से प्रभावित कविताओं एवं कथासाहित्य में मृत्यु-बोध एक अनिवार्य तत्त्व के रूप में कहीं न कहीं अवश्य मौजूद देखा गया है। इस वजह से उन रचनाओं को पढ़ने पर कोई भी संवेदनशील पाठक तत्काल अवसाद से थोड़ा बहुत ग्रस्त हुए बिना नहीं रहता। सार्त्र का विश्वविख्यात उपन्यास ‘नॉसिया’ , विक्टर ई. फ्रैंकल (Viktor E. Frankl, 1905–1997) द्वारा होलोकॉस्ट के अनुभव, यातना-शिविरों और अस्तित्ववादी मनोविज्ञान पर आधारित अत्यंत प्रभावशाली दार्शनिक-मनोवैज्ञानिक कृति ‘मैन्स सर्च ऑफ़ मीनिंग’ (Man’s Search for Meaning), अल्बैयर कामू का ‘अजनबी’, हिंदी में ‘अपने अपने अपने अजनबी’, ‘अंतिम अरण्य’, ‘दूसरा न कोई’, ‘आउश्वित्ज़: एक प्रेम कथा’ जैसे अनेक श्रेष्ठ उपन्यासों और राजकमल चौधरी की ‘मुक्तिप्रसंग’ समेत अज्ञेय, शमशेर, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय एवं अशोक वाजपेयी समेत अनेका कवियों ऐसी कुछ कविताएँ मिलती हैं। यह अलग बात है कि ऐसी तमाम रचनाएँ अंततः ‘दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना’ के अंदाज़ में पाठक के निजी अवसाद को भी विरचित करके उसे सामान्य मनोभूमि पर ला खड़ा करती हैं।

‘कितने दिन और बचे हैं ?’ कविता की विशेषता यह है कि इसमें ऐसा कोई बिम्ब नहीं है जो पाठक के मन में नकारात्मक भाव पैदा करे। ‘बिजली के एक तार पर सुस्ताने बैठी चिड़िया का आह्लाद से दूसरा तार छूकर लटक जाना’ इसका एक बेहतर उदाहरण है। कवि को संभवतः कहना यह है कि इस भौतिक शरीर का आज न कल समाप्त होना जब तय है तो क्यों न संभावित भविष्य को सिर धुनकर या रो-पीटकर मरने के बजाय सहज मन से प्रसन्नता के साथ स्वीकार कर लिया जाय।

स्पष्ट ही मनुष्य को अपनी कम या ज़्यादा उम्र के बावजूद जीवन के अंत का पता नहीं होता और यह ठीक भी है।

महर्षि व्यास ने महाभारत में यक्ष के प्रश्न –‘किमाश्चर्यम् ?’ – का उत्तर दिलवाते हुए युधिष्ठिर के मुख से कहलवाया है कि दुनिया में लोगों की रोज़ाना मौत हो रही है ,पर सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि जो जीवित हैं वे मृत्यु-भय से मुक्त हैं :

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥

(प्रतिदिन, हर दिन, इस संसार में प्राणी यमलोक की ओर जा रहे हैं, फिर भी जो शेष रह जाते हैं, वे स्वयं को अमर समझते हैं। इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है?)

महर्षि व्यास कृत ही माने गये ‘श्रीमद्भागवत महापुराण’ में तो यहाँ तक कहा गया है कि यदि मनुष्य को उसकी आयु का पता चल जाय तो वह पूरा जीवन मृत्यु-भय से ग्रस्त रहेगा। इसलिए ‘गीता’ में लिखित-‘जास्तस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च’ को जानते हुए भी बेहतर है कि मनुष्य सहज भाव से अपनी शक्ति एवं सीमा में इंसानियत के हक़ में काम करता रहे।

यह कविता भी जीवन और मृत्यु के उसी पुराने पर शाश्वत प्रश्न से टकराती हुई अपने पाठक को सहज स्वाभाविक जीवन की महिमा का एहसास कराकर ज़िंदगी के अंत को ‘डाक द्वारा कहीं से पैकेट में आये हुए प्रेमपूर्ण उपहार’ की तरह खुश होकर स्वीकार करने की अहमियत बताती है। कविता के बीच में ‘प्रसन्न तितली का चिनगारी से नष्ट हो जाना’ भी इसकी ओर इंगित करता है। अंतिम हिस्से में ‘ख़ाली घर’ की भयावहता के उल्लेख के बावजूद जीवन के अवश्यमेव अंत को धूप और बादल के खिलने तथा बरसने के लिए आने, छोटी बच्ची के खिलखिलाने आदि के रूप में देखना कवि की संवेदनशीलता और ज़िंदादिली का सबूत है, जिसमें ग़ालिब की ‘एक मर्ग-ए-ना-गहानी और है’ वाली लापरवाही भी मौजूद है।

वस्तुतः यह धार्मिक हुए बगैर साहित्य में आध्यात्मिकता के पुनर्वास को संभव करती एक दार्शनिक कविता है । ‘कितने दिन और बचे हैं?’ कविता के साथ अशोक वाजपेयी की ‘विदा’ कविता को मिलाकर एक साथ पढ़ने पर समाजशास्त्रीय शब्दावली में पाठकीय अभिग्रहण का वृत्त पूरा होता है:

‘तुम चले जाओगे
पर थोड़ा-सा यहाँ भी रह जाओगे
जैसे रह जाती है
पहली बारिश के बाद
हवा में धरती की सोंधी-सी गंध…

तुम चले जाओगे
पर मेरे पास
रह जाएगी
प्रार्थना की तरह पवित्र
और अदम्य
तुम्हारी उपस्थिति,
छंद की तरह गूँजता
तुम्हारे पास होने का अहसास…’

‘विदा’ कविता से गुजरते हुए मालिक मुहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ की एक पंक्ति की याद न आए, यह मुमकिन नहीं, जिसमें कहा गया है कि वह मनुष्य धन्य है जिसकी कीर्ति जीवित रहती है। जिस प्रकार फूल मुरझा जाता है लेकिन उसकी सुगंध समाप्त नहीं होती:

धनि सो पुरूख जस कीरति जासू। फूल मरै पै मरै न बासू॥
केइ न जगत जस बे़चा, केइ न लीन्ह जस मोल ।
जो यह पढ़ै कहानी, हम सँवरै दुइ बोल ॥

 

(चार )

अपनी आसन्नप्रसवा माँ के लिए तीन गीत
काँच के टुकड़े

काँच के आसमानी टुकड़े

और उन पर बिछलती सूर्य की करुणा
तुम उन सबको सहेज लेती हो

क्योंकि तुम्हारी अपनी खिड़की के
आठों काँच सुरक्षित हैं

और सूर्य की करुणा
तुम्हारे मुँडेरों भी

रोज़ बरस जाती है।

जीवित जल

तुम ऋतुओं को पसंद करती हो
और आकाश में

किसी न किसी की प्रतीक्षा करती हो—
तुम्हारी बाँहें ऋतुओं की तरह युवा हैं

तुम्हारे कितने जीवित जल
तुम्हें घेरते ही जा रहे हैं।

और तुम हो कि फिर खड़ी हो
अलसायी; धूप-तपा मुख लिए

एक नए झरने का कलरव सुनतीं
—एक घाटी की पूरी हरी महिमा के साथ!

जन्मकथा
तुम्हारी आँखों में नई आँखों के छोटे-छोटे दृश्य हैं,

तुम्हारे कंधों पर नए कंधों का
हल्का-सा-दबाव है—

तुम्हारे होंठों पर नई बोली की पहली चुप्पी है
और तुम्हारी उँगलियों के पास कुछ नए स्पर्श हैं

माँ, मेरी माँ,
तुम कितनी बार स्वयं से ही उग आती हो

और माँ, मेरी जन्मकथा कितनी ताज़ी
और अभी-अभी की है!

अशोक वाजपेयी की काव्य-यात्रा में ‘अपनी आसन्नप्रसवा माँ के लिए तीन गीत’ शीर्षक शृंखला एक विशिष्ट मुक़ाम रखती है।प्रकारांतर से ये कविताएँ परम्परा और आधुनिकता के संधि-स्थल पर मातृसत्ता का पुनराविष्कार करती प्रतीत होती हैं । कवि का स्वर इन कविताओं में न केवल आत्मपरक है, बल्कि वह एक दार्शनिक ऊँचाई भी प्राप्त करता है जहाँ ‘माँ’ केवल एक जैविक सम्बन्ध भर नहीं रह जाती, अपितु वह सृष्टि, प्रकृति और काल का रूपक बन जाती है। इन तीनों कविताओं—‘काँच के टुकड़े’, ‘जीवित जल’ और ‘जन्मकथा’—के ‘टेक्स्ट’ को अगर हम परम्परागत भारतीय सौंदर्यशास्त्र से लेकर आधुनिक, उत्तर-आधुनिक, उत्तर-औपनिवेशिक और स्त्रीवादी सिद्धांतों के निकष पर कसें, तो अर्थ की अनेक परतें खुलती हैं जो वात्सल्य और अस्तित्व के नए आयामों को उजागर करती हैं।

पहली कविता ‘काँच के टुकड़े’ में कवि एक घरेलू बिम्ब के माध्यम से विराट करुणा को साधने का प्रयास करता है। यहाँ काँच के आसमानी टुकड़े और उन पर बिछलती सूर्य की करुणा से एक अद्भुत विरोधाभास पैदा होता है । परम्परागत दृष्टि से देखें तो यह भारतीय गृहिणी की उस छवि का विस्तार है जो घर की ‘श्री’ है, जो अमंगल (काँच की चुभन) को मंगल (सूर्य की करुणा) में बदलने की कला जानती है। यहाँ कालिदास के ‘रघुवंश’ का वह प्रसंग स्मरणीय है जहाँ प्रौढ़ावस्था में माँ बनने वाली अज की पत्नी इंदुमती के सौन्दर्य और प्रभाव का वर्णन करते हुए कहा गया है—

पाश्चिमात् यामिनी-यामात् प्रसादमिव चेतना ।
बभूव तस्याः पुत्रार्थं गर्भाधानस्य कारणम् ॥

इन्दुमती के विलम्बित मातृत्व को किसी कमी के रूप में नहीं, बल्कि काल-सिद्ध, चेतन और गरिमामय घटना के रूप में प्रस्तुत करता हुआ यह श्लोक बताता है कि जैसे रात्रि के अंतिम प्रहर के बीत जाने पर मन में एक स्वच्छ, प्रशांत और प्रसन्न चेतना प्रकट होती है, उसी प्रकार प्रौढ़ावस्था में इन्दुमती के भीतर भी मातृत्व की चेतना उत्पन्न हुई। जाहिर है कि ऐसे भी माँ की उपस्थिति किसी घर के वातावरण को निर्मल कर देती है।

‘आसन्नप्रसवा माँ के लिए’ कविता पर आधुनिकतावादी साहित्य सिद्धांतों (Modernist Criticism) की दृष्टि से विचार करें , तो टी.एस. एलियट (T.S. Eliot) का ‘वस्तुनिष्ठ सहसंबंध’ (Objective Correlative) यहाँ सटीक बैठता प्रतीत होता है। एलियट कहते हैं, “कला के रूप में भावना को व्यक्त करने का एकमात्र तरीका एक ‘वस्तुनिष्ठ सहसंबंध’ खोजना है; दूसरे शब्दों में, वस्तुओं का एक समूह, एक स्थिति, घटनाओं की एक श्रृंखला जो उस विशेष भावना का सूत्र होगी” (“The only way of expressing emotion in the form of art is by finding an ‘objective correlative’; in other words, a set of objects, a situation, a chain of events which shall be the formula of that particular emotion”). अशोक जी की इस कविता में माँ के प्रति प्रेम और सुरक्षा की भावना को सीधे न कहकर ‘खिड़की’, ‘काँच’ और ‘मुंडेर’ आदि के माध्यम से व्यक्त किया है।
उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से यह कविता ‘घर’ (Home) को एक सुरक्षित क़िले के रूप में स्थापित करती है। होमी भाभा (Homi K. Bhabha) जैसे सिद्धांतकार जहाँ ‘हाइब्रिडिटी’ की बात करते हैं, वहीं इक्कीसवीं सदी में सक्रिय हिन्दी का कवि यहाँ एक शुद्ध ‘देसी स्पेस’ की रचना करता है, जहाँ बाहरी दुनिया की कठोरता (काँच) को माँ अपनी सांस्कृतिक जड़ों (मुंडेर) पर रोक लेती है।
इस कविता का स्त्रीवादी पाठ (Feminist Reading) थोड़ा द्वन्द्वात्मक प्रतीत हो सकता है। एक ओर यह माँ को ‘सहेजने वाली’ (Nurturer) की रूढ़िगत भूमिका में क़ैद करता है, जिसे सीमोन द बोउवार (Simone de Beauvoir) ने अपनी पुस्तक ‘द सेकंड सेक्स’ (The Second Sex) में स्त्री की ‘आंतरिकता’ (Immanence) कहा है, जहाँ वह घर की चारदीवारी में सीमित है। पर दूसरी ओर काँच के टुकड़ों को सहेजना उसकी शक्ति और एजेंसी (Agency) का भी परिचायक है, जहाँ वह विध्वंस के बीच भी सृजन को बचाए रखने में सक्षम है।
दूसरी कविता ‘जीवित जल’ में माँ का तादात्म्य प्रकृति के साथ स्थापित किया गया है। यहाँ माँ ऋतुओं को पसंद करती है और आकाश में प्रतीक्षा करती हुई दिखाई देती है। यह कविता आधुनिक भारतीय कविता में प्रकृति और स्त्री को एक साथ रखकर देखने की प्रचलित रूढ़ छवि का विखंडन करते हुए एक भिन्न समीकरण प्रस्तुत करती है। इस रचना में प्रकृति और स्त्री बिम्ब–प्रतिबिम्ब के रूप में नहीं, बल्कि मूलतः एक ही बिम्ब से उद्भूत प्रतीत होती हैं—मानो दोनों की सृजनात्मक सत्ता किसी साझा स्रोत से विकसित हुई हो।
काव्यकला की दृष्टि से अशोक वाजपेयी की यह संरचना उस अनोखी कवि-कल्पना का स्मरण कराती है जिसे ध्वन्यालोककार आनंदवर्धन समेत परवर्ती आचार्यों और टीकाकारों ने वाल्मीकि रामायण के एक प्रसिद्ध छंद के संदर्भ में रेखांकित किया है। वहाँ महर्षि वाल्मीकि कुश और लव के राम से साम्य का वर्णन करते हुए ‘बिम्बादिवोद्धृतौ’ पदबंध का प्रयोग करते हैं—अर्थात वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो एक ही मूल बिम्ब (राम) से निकालकर निर्मित किए गए हों। अशोक वाजपेयी की कविता में ‘स्त्री और प्रकृति’ का यह ‘बिम्बात्मक एकत्व’ उसी महान काव्य-परंपरा का आधुनिक, सांस्कृतिक और नैतिक पुनर्संस्कार जान पड़ता है, जिसमें काव्य-सौंदर्य के साथ-साथ अस्तित्व और सृजन की गहरी नैतिक चेतना भी अंतर्निहित है:
रूपलक्षणसम्पन्नौ मधुरस्वरभाषिणौ।
बिम्बादिवोद्धृतौ बिम्बौ रामदेहात् तथापरौ॥
(वाल्मीकि रामायण, उत्तर काण्ड, 94.12)
स्त्रीवादी नज़रिए से विवेच्य कविता में माँ के ‘जीवित जल’ से घिरे होने का बिम्ब संभवत: गर्भस्थ शिशु के ‘एम्नियोटिक द्रव’ (Amniotic Fluid) का संकेत है, जो जीवन का आदि स्रोत है। यहाँ माँ केवल एक मानवी नहीं, बल्कि स्वयं ‘प्रकृति’ है। कविता में माँ अपने भीतर जीवन को धारण किए हुए है। ‘देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्’ में भगवत्पाद आदि शंकराचार्य का प्रसिद्ध पंक्ति —’कुपुत्रो जायते क्वचिदपि कुमाता न भवति’ (पुत्र कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता कभी कुमाता नहीं होती)— ‘माँ’ की जिस निश्छल और अगाध प्रेममयी छवि को पुष्ट करती है; ‘जीवित जल’ कविता में आयी ‘माँ की छवि’ उससे पहले की जैविक स्थिति की काव्यात्मक पुनर्रचना प्रतीत होती है।
उत्तर-आधुनिकतावादी (Post-Modernist) दृष्टि से देखें तो ज्याँ-फ़्रांस्वा लियोतार (Jean-François Lyotard) का ‘महान वृत्तांतों का अंत’ (Incredulity towards meta-narratives) यहाँ प्रासंगिक हो सकता है, क्योंकि कवि किसी ईश्वर या धर्म के महावृत्तांत की शरण में जाने के बजाय माँ के व्यक्तिगत, शारीरिक और मानसिक अनुभवों (धूप-तपा मुख, अलसायी देह) को ही ‘मातृत्व’ का आधार बनाता है। यहाँ समय रेखीय नहीं है। माँ ‘फिर खड़ी है’—यह समय की चक्रीय अवधारणा (Cyclical Time) है, जो भारतीय दर्शन के अनुकूल है। स्त्रीवादी समालोचना के अंतर्गत हेलेन सिक्सू (Hélène Cixous) का ‘स्त्री लेखन’ (Écriture féminine) का सिद्धांत यहाँ लागू होता प्रतीत होता है, जिसमें शरीर और भाषा के बीच गहरा सम्बन्ध स्वीकार किया गया है। सिक्सू कहती हैं, “स्त्री को न केवल स्वयं अपने बारे में तथा अन्य स्त्रियों के विषय में लिखना चाहिए ,बल्कि स्त्रियों को उस लेखन की दुनिया में वापस भी लाना चाहिए, जहाँ से उन्हें अपने शरीर की तरह ही हिंसक तरीके से बाहर कर दिया गया है ।” (Woman must write herself: must write about women and bring women to writing, from which they have been driven away as violently as from their bodies”).
विवेच्य कविता का रचनाकार यद्यपि पुरुष हैं, परन्तु वह माँ की देहभाषा— ‘तुम्हारी बाँहें ऋतुओं की तरह युवा हैं’, ‘और तुम हो कि फिर खड़ी हो अलसायी; धूप-तपा मुख लिए’ आदि —के माध्यम से लज्जा या संकोच के विषय के रूप स्त्री की शारीरिकता को देखने-दिखाने के बजाय उसे एक उत्सव के रूप में प्रस्तुत कर रहा है । याद आ सकते हैं जॉन कीट्स , जिन्होंने दिसम्बर 21, 1817 को लिखे एक पत्र में शेक्सपियर की महानता के प्रसंग में ‘नेगेटिव कैपेबिलिटी’ की बात करते हुए लिखा था, “मुझे यह बात सूझी कि साहित्य में महान उपलब्धि वाले व्यक्ति को गढ़ने वाली जो विशेषता होती है—और जो शेक्सपियर में असाधारण रूप से पाई जाती थी—वही है, जिसे मैं ‘नेगेटिव कैपेबिलिटी’ कहता हूँ।”। (It struck me, what quality went to form a Man of Achievement especially in Literature & which Shakespeare possessed so enormously—I mean Negative Capability…”) उनका मत है कि बड़े रचनाकारों में पायी जाने वाली सक्षमता (कैपेबिलिटी) के तहत वे रचना में उन सन्दर्भों से सम्बद्ध अनुभूतियों को भी पुनर्रचित कर पाते हैं जो वे कई बार अपने वास्तविक जीवन में नहीं होते । कहना न होगा कि दुनिया-भर के साहित्य में ऐसे अनेक सन्दर्भ मिलते हैं जिनके रचनाकार धर्म,जाति, नस्ल, लिंग आदि की सीमाओं का अतिक्रमण करके श्रेष्ठ सृजन करते रहे हैं ।
इस शृंखला की तीसरी और अंतिम कविता ‘जन्मकथा’ इस त्रयी का शिखर है। यहाँ कवि माँ के भीतर हो रहे परिवर्तनों को अपनी ही उत्पत्ति-कथा के रूप में देखता है। ‘तुम्हारी आँखों में नई आँखों के छोटे-छोटे दृश्य हैं’—यह पंक्ति अस्तित्ववाद (Existentialism) की उस अवधारणा का स्पर्श करती प्रतीत होती है जहाँ ‘दूसरा’ (The Other) हमारे अस्तित्व को परिभाषित करता है, लेकिन ‘जन्मकथा’ कविता में वह ‘दूसरा’ कोई और नहीं, स्वयं कवि का अपना भावी रूप है। माँ के कन्धों पर नए कन्धों का दबाव और होंठों पर नई बोली की चुप्पी वस्तुत: सृजन की प्रक्रिया का उन्मेष है – ‘तुम्हारे होंठों पर नई बोली की पहली चुप्पी है /और तुम्हारी उँगलियों के पास कुछ नए स्पर्श हैं।’
यहाँ जूलिया क्रिस्टेवा (Julia Kristeva) का ‘इंटरटेक्चुअलिटी’ (Intertextuality) का सिद्धांत एक नए रूप में कवि के जाने-अनजाने ही कला के स्तर के पुनर्रचित होता हुआ देखा जा सकता है, जहाँ माँ का शरीर एक ‘टेक्स्ट’ (Text) है और शिशु दूसरा ‘टेक्स्ट’; और, दोनों एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। क्रिस्टेवा ने अपने विवेचन में ‘सेमयोटिक’ (Semiotic) और ‘सिम्बॉलिक’ (Symbolic) के बीच जो भेद किया है, वह यहाँ माँ की ‘चुप्पी’ (सेमयोटिक/पूर्व-भाषायी अवस्था) और शिशु की ‘नई बोली’ (सिम्बॉलिक/भाषा का जगत) के बीच द्वंद्व के रूप में दिखाई देता है।
उत्तर-औपनिवेशिक परिप्रेक्ष्य में यह कविता ‘आत्म- पहचान’ (Self-Identity) की खोज है। कवि अपनी जड़ों को माँ के बार-बार ‘उग आने’ में पाता है –‘ माँ, मेरी माँ, /तुम कितनी बार स्वयं से ही उग आती हो / और माँ, मेरी जन्मकथा कितनी ताज़ी /और अभी-अभी की है!’ ध्यान देना ज़रूरी है कि यह सृजन पश्चिमी व्यक्तिवाद के विपरीत ‘सामूहिकता’ और ‘निरंतरता’ के भारतीय मूल्य का द्योतक है। इस कविता की – ‘तुम कितनी बार स्वयं से ही उग आती हो’— पंक्ति प्रकारांतर से ‘स्त्री’ को ‘पृथ्वी की उर्वरा शक्ति’ के समकक्ष रखती प्रतीत होती है।
स्त्रीवादी आलोचना यहाँ पुनः प्रश्न खड़ा कर सकती है कि क्या स्त्री का बार-बार ‘उगना’ केवल जैविक प्रजनन तक सीमित है ? क्या उसकी पहचान केवल ‘माँ’ होने में ही है ? सैंड्रा गिल्बर्ट और सुसन गुबर (Sandra Gilbert and Susan Gubar) ने अपनी पुस्तक ‘द मैडवुमन इन द एटिक’ (The Madwoman in the Attic) में पुरुष लेखकों द्वारा रचित स्त्री-छवियों की आलोचना की है, जहाँ स्त्री या तो ‘देवदूत’ (Angel) होती है या ‘राक्षसी’ (Monster) हैं । अशोक वाजपेयी की इस कविता में माँ की छवि पवित्र और सृजनशील होने के बावजूद निश्चित रूप से ‘देवदूत’ की श्रेणी में नहीं आती। कवि को इल्म है कि ऐसा आदर्शीकरण (Idealization) स्त्री के वास्तविक संघर्षों को धुंधला कर सकता है। कविता का टेक्स्ट संकेत करता है कि कवि का रचनात्मक उद्देश्य यहाँ सन्दर्भ भिन्नता की वजह से गोर्की या महाश्वेता देवी रचित ‘माँ’ वाले यथार्थवादी-क्रांतिकारी चित्रण से विलग ‘माँ’ की एक वत्सल छवि की सृष्टि करते हुए उससे सम्बद्ध भावनात्मक और दार्शनिक सत्य को उद्घाटित करना है। अशोक वाजपेयी की रचनाओं में शब्द, मौन और स्मृति एक-दूसरे से विलग नहीं, बल्कि आपस में गुंथे हुए दिखाई देते हैं। ‘आसन्नप्रसवा माँ के लिए तीन गीत’ शृंखला में रचित ये तीनों कविताएँ मिलकर स्मृतियों का ऐसा कोलाज रचती हैं जहाँ रिवायत का सलीक़ा और समकालीनता का शऊर एक ही लय में साँस लेते हैं, और माँ की शख़्सियत वक़्त के आर-पार फैली हुई एक शाश्वत उपस्थिति में रूपान्तरित हो जाती है।
(पाँच)
एक आदिम कवि का प्रत्यावर्तन
मैं एक जीवित सभ्यता लाया हूँ, लोगो!

तुमने देखा है सड़ने लगे हैं नगर और फल
और मरे हुए हैं गेहूँ-धानों के खेत और उछाह।

अर्राकर गिरती हैं पड़ोस की दीवारें और मित्रताएँ,
टूटते हैं दरवाज़े और बूढ़े सक्रिय लोग,

पड़ोस एक सड़ाँध देता धुआँ है…
मैं एक जीवित सभ्यता लिए दौड़ा आया हूँ,

लोगो—
मेरा चेहरा सोनल नहीं है

(तुम उसमें लावे की झुलस देखते हो!)
और मेरी हथेलियाँ भरी हुईं

मांसल गंध डूबी नहीं हैं
(तुम उनमें चट्टानों की परतें देखते हो!)

और मेरे होंठ नहीं हैं जलते हुए उद्दीप्त
(तुम उनमें डूबे जल-स्रोत देखते हो!)

तुममें से किसी को जब बाँहों में कसूँगा मैं
तो लोगो, तुम जानोगे

कि मुझमें मांसपेशियों की उत्तेजना भी नहीं है।
मुझमें नहीं है मांस की घाटियाँ

और तेज़ रक्त-झरने,
मुझमें चट्टानें हैं सिर्फ़

हड्डियों की,
लोगो, मैं इन्हीं हड्डियों की

एक जीवित सभ्यता लाया हूँ
लोगो, यह आकाश तुम्हारे कंधों पर

वस्त्र-सा पड़ा होगा
और जहाँ नहीं हैं

वहाँ भी देखोगे तुम फूलों के अनगिनत अग्निवन।
लोगो, मैं लदी हुई डालें और जीवित पत्तियाँ लाया हूँ

लोगो, मैं आया हूँ :
लोगो, तुम हँसे थे—धरती अंदर काँप गई थी,

तुम रोए थे—घाटियाँ पिघल गई थीं,
तुमने गाया था—झीलों पर कुहरा घिर आया था।

लोगो, मैं सभ्यता का काव्यमुख लाया हूँ,
ये मेरी छाती धरती की याद है,

ये मेरी जाँघें घाटियों का प्रेम हैं,
ये मेरी आँखें झीलों का रूप हैं।

लोगो, मैं तुम्हारी आदिम हँसी हूँ।
मुझमें तुम्हारा वह आँसू संगृहीत है

मेरा हृदय डूबा है
तुम्हारे उस आदिम संगीत में :

तुम्हारी आँखों में
तुम्हारी होंठों पर

तुम्हारे कंठों में
मैं लौट आया हूँ।

मैं रक्त नहीं मांस नहीं,
हड्डियाँ हूँ तुम्हारी

असंख्य जड़ ऋतुओं के गर्भ से
मैं एक पुरातन संतति हूँ,

एक जीवित सभ्यता लाया हूँ,
लोगो, मैं आया हूँ—

लोगो, यह आभा हड्डियों का सूर्योदय है,
लोगो, यह छाया हड्डियों की तितलियों का घेरा है,

लोगो, यह प्रेम फूलचेहरों पर मेरी हड्डियों की छाप है,
लोगो यह जीवित सभ्यता है

जो लाया हूँ।
लोगो, मैं आया हूँ—

‘एक आदिम कवि का प्रत्यावर्तन’ समकालीन हिंदी कविता की एक गहन वैचारिक संरचना है, जो सभ्यता के संकट, स्मृति के लोप और मानवीय मूल्यों के क्षरण को केंद्र में रखती है। यह कविता काव्यात्मक अनुभूति से निष्पन्न एक सार्थक सांस्कृतिक वक्तव्य है। टी. एस. एलियट के शब्दों में, “कोई भी कविता अकेले नहीं होती, वह परंपरा के भीतर अर्थ ग्रहण करती है” (No poet, no artist of any art, has his complete meaning alone). इस दृष्टि से यह कविता भारतीय काव्य परंपरा और आधुनिक वैश्विक बौद्धिक विमर्श के बीच सेतु निर्मित करती प्रतीत होती है।

परम्परागत भारतीय काव्यशास्त्रीय संदर्भ में यह कविता रस, ध्वनि और प्रतीक की समृद्ध संरचना प्रस्तुत करती है। आचार्य अभिनवगुप्त के अनुसार, “रस आत्मानंद का अनुभव है” (‘रसः स्वसंवेदनानन्दात्मकःआत्मविश्रान्तिरूप’). अभिनवगुप्त वस्तुत: भट्टनायक की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया, आनन्दवर्धन की ‘काव्यध्वनि’ और आदि शंकराचार्य की ‘आत्मानन्द-परंपरा’ को एक सूत्र में पिरोकर रस को कला के क्षेत्र में आत्मानुभूति का विशिष्ट रूप सिद्ध करते हैं, जिससे भारतीय काव्यशास्त्र एक दार्शनिक गहराई प्राप्त करता है।

विवेच्य कविता में ‘नगरों का सड़ना’, ‘खेतों का मरना’ और ‘मित्रताओं का टूटना’ करुण रस की सृष्टि करता है, जबकि ‘आदिम स्मृति’, ‘हड्डियों की सभ्यता’ और प्रकृति के बिंब शान्त रस की ओर ले जाते हैं। यहाँ भावों की अभिव्यक्ति प्रत्यक्ष कथन से कहीं अधिक ध्वन्यात्मक है। आनंदवर्धन की मान्यता कि ‘काव्य की आत्मा ध्वनि है’ और यह स्थापना इस कविता पर पूर्णतः लागू होती है, क्योंकि ‘आदिम कवि’ अपने प्रत्यक्ष अर्थ से आगे जाकर सभ्यता की चेतना के उस स्तर का संकेत देता है जिसे अमूमन अवचेतन कहा जाता है । इस नज़रिए से यह कविता सभ्यतागत संकट की सशक्त अभिव्यक्ति है। आधुनिकता के भीतर निहित विघटन को रेखांकित करते हुए कवि इस रचना में उस मनुष्य को सामने लाता है जो तकनीकी प्रगति के बावजूद भीतर से रिक्त होता जा रहा है। मैक्स वेबर ने आधुनिक समाज को “मोहभंग की दुनिया” (The world is disenchanted) कहा था। . कविता में सड़ते नगर और निष्प्राण रिश्ते इसी मोहभंग की त्रासद काव्यात्मक अभिव्यक्ति हैं। कवि आधुनिक सभ्यता की गति पर प्रश्नचिह्न लगाता है और पूछता है कि क्या प्रगति बिना मानवीय संवेदना के संभव है।

उत्तर-आधुनिक दृष्टि से यह कविता किसी एक स्थिर सत्य को स्वीकार नहीं करती। ज्याँ-फ़्रांस्वा लियोतार लिखते हैं , “उत्तर-आधुनिकता महाआख्यानों के प्रति अविश्वास है।” (Postmodernism is incredulity toward metanarratives). इस कविता में ‘सभ्यता’, ‘विकास’ और ‘आधुनिकता’ जैसी अवधारणाएँ विखंडित होती हैं तथा ‘आदिम’ यहाँ पिछड़ेपन के बजाय वैकल्पिक ज्ञान और अनुभव का प्रतीक बन जाता है। यह कविता इतिहास को रैखिक न मानकर स्मृति और अनुभव के बहुवचन रूपों में देखती है।

स्त्रीवादी आलोचना-दृष्टि के तहत इस कविता का शरीर और प्रकृति-बोध विशेष अर्थ ग्रहण करता है। सिमोन द बोउवार का कथन है कि “स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है।” इस कविता में संकेत है कि सभ्यता भी प्राकृतिक नहीं, बल्कि निर्मित संरचना है। रक्त, मांस और मांसपेशियों की उत्तेजना से इनकार कर कवि एक ऐसी सभ्यता की कल्पना करता है जो आक्रामक और पितृसत्तात्मक मूल्यों से मुक्त है । धरती, घाटियाँ और झीलें जहाँ पोषण, स्मृति और सहअस्तित्व के प्रतीक हैं । वैदिक ‘पावनं पोषणं पावृणु’ अभिव्यक्ति की तर्ज़ पर पवित्रता और पोषण से प्रकृति के आच्छादन की यह कल्पना प्रकारांतर से कविता में स्त्री-चेतना का साक्ष्य प्रतीत होती है ।
उत्तर-उपनिवेशवादी दृष्टि से ‘आदिम कवि’ औपनिवेशिक विमर्श द्वारा गढ़ी गई हीनता की अवधारणा को तोड़ता है। 20वीं शताब्दी के प्रमुख विचारक, मनोचिकित्सक और उपनिवेशवाद-विरोधी चिंतक फ्रांत्ज़ फ़ैनन (Frantz Fanon :1925 – 1961) ने लिखा है कि “औपनिवेशिक व्यवस्था सताए जनों के अतीत / मूल संस्कृति को विकृत कर देती है।” (Colonialism distorts and destroys the past of the oppressed people). विवेच्य कविता में ‘आदिम’ उसी विकृत की गई स्मृति की पुनर्वापसी है।अशोक वाजपेयी का कवि पश्चिमी सभ्यता के प्रभुत्वशाली मॉडल के विरुद्ध देशज अनुभव, लोकस्मृति और सांस्कृतिक आत्मसम्मान को पुनर्स्थापित करने का आकांक्षी है।
आज के ‘सत्यातीत’ दौर में इस कविता का समाजशास्त्रीय महत्त्व और अधिक गहरा हो जाता है। बीसवीं सदी की जानी मानी राजनीतिक सिद्धांतकार हन्ना अरेन्ट (Hannah Arendt : 1906–1975)ने ‘ओरिजिन ऑफ़ टोटलिटेरियनिज्म’(1951) में चेताया है कि “जब सत्य और असत्य का अंतर मिटता है, तब मनुष्य के सोचने की क्षमता नष्ट हो जाती है।” (The ideal subject of totalitarian rule is people for whom the distinction between fact and fiction no longer exists). ऐसे समय में कविता में आई हड्डियाँ, स्मृति और आदिम संगीत ठोस यथार्थ और मूल मानवीय सत्य के प्रतीक बन जाते हैं और मौजूदा ‘सत्यातीत’ दौर की बखिया उधेड़कर रख देते हैं । ‘एक आदिम कवि का प्रत्यावर्तन’ कविता हमारे सत्यातीत समय में बेज़रूरी के मुद्दों पर जनभावनाओं को भड़काने वाले कुप्रचार से निर्मित ‘झूठे सत्यों’ का प्रतिरोध करती हुई स्मृति और संवेदना को बचाने का आग्रह करती है।

सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से इस कविता में ‘गो-मुख’ की तर्ज़ पर ‘काव्य मुख’ संज्ञा पदबंध का निर्माण काव्यभाषा के स्तर पर नवाचार है। कविता का सौन्दर्य उसके गहन बिंबों, लयात्मक पुनरावृत्तियों और प्रकृति से जुड़े उस महाकाव्यात्मक विस्तार में निहित है जिसे भिन्न सन्दर्भ में अमरीकी दार्शनिक, सौन्दर्यशास्त्री एव प्रतीक चिन्तक सुज़ैन लैंगर (Susanne K. Langer:1895–1985) ने ‘फीलिंग एंड फॉर्म’(1953) में ‘कलानुभूति का प्रतीकात्मक रूप’ (symbolic form of feeling) कहा है। विवेच्य कविता का सौन्दर्य किसी सजावटी या बनावटी अलंकरण में नहीं, बल्कि आचार्य कुंतक के वक्रोक्ति-सिद्धान्त के अंतर्गत विवेचित भाव और विचार के बीच ‘परस्पर स्पर्धी समभाव’ में निहित है। दूसरे शब्दों में, यह रचना गहन अनुभूति और प्रखर विचार की मिलीजुली उपज है, जो प्रबुद्ध पाठकों को गहराई से प्रभावित करती और उन्हें आंदोलित करने में भी समर्थ है।

कुल मिलाकर ‘एक आदिम कवि का प्रत्यावर्तन’ कविता परम्परा और आधुनिकता, सभ्यता और प्रकृति तथा ‘सत्य’(ट्रुथ) और ‘सत्यातीत’ (पोस्ट-ट्रुथ) के बीच संवाद क़ायम करने वाली रचना है। समकालीन समाज, देश और दुनिया की नाजुक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में यह रचना सभ्यता के आलोचनात्मक विवेचन के माध्यम से मनुष्य को उसकी आदिम मानवीय जड़ों की ओर लौटने का आग्रह करती है और सभ्यता के वास्तविक आधार के रूप में स्मृति, संवेदना तथा नैतिक चेतना को सृजन के स्तर पर रेखांकित करती है।

(छह)
असंभव-संभव
मैं असंभव को संभव से स्पर्श कर रहा हूँ
जैसे दैव के पास जाने की चेष्टा करती है प्रार्थना।

पवित्र हैं बदराए आकाश के नीचे
अपनी शाखाओं पर हवा में डोलती हरी पत्तियाँ;
पवित्र है दृश्यालेख में
कविताओं को सहारा देने वाले शब्दों की तरह
घरों का जगह घेरना;
पवित्र है दूर की उपत्यका से एक पुकार का
उठना, छा जाना और ओझल हो जाना;
पवित्र है अँधेरे में दरवाज़ा खोजती लड़खड़ाहट;
पवित्र है अपने-अपने बर्तनों में अपनी-अपनी रसोइयों में पक रहा भोजन;
नदी में बह रहा जल जिसे अंजलि में भरकर पीने वाला अब कोई नहीं;
पवित्र है बूढ़े का थककर पुलिया पर बैठकर सुस्ताना;
पवित्र है बचाकर रखना रोटी और दाने पक्षियों के लिए;
पवित्र है वृक्ष के नीचे किसी अज्ञात देवता के लिए नैवेद्य रख आना;

पवित्र है दूर सघन निर्जन में होती अविराम वर्षा;
पवित्र है शताब्दियों के बाद किसी शब्द का कविता में पुनरवतरण :
इतनी सारी निर्भय नीलिमा के नीचे
ओर-छोर फैली निष्कलुष हरीतिमा से
मैं पूछना चाहता हूँ
होने के आशय के बारे में एक अरुणाभ प्रश्न।
बढ़ती हुई ठंड के विरुद्ध
मुझे पवित्र और ज़रूरी लग रही है
अपने शरीर की प्रेमाकुल गर्माहट
मैं असंभव को संभव से पकड़ना चाहता हूँ।

‘असंभव–संभव’ कविता समकालीन हिंदी कविता की उन गिनीचुनी रचनाओं में एक है जो साधारण अनुभवों, दृश्यात्मक बिंबों और दैनंदिन जीवन की सूक्ष्म गतिविधियों के माध्यम से गहन दार्शनिक प्रश्नों को उठाती है। यह कविता केवल आध्यात्मिक या सौन्दर्यात्मक अनुभूति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि अस्तित्व, भाषा, अर्थ, पवित्रता और मनुष्य की सीमाओं को निरंतर प्रश्नांकित करती है। कविता का केंद्रीय कथन — ‘मैं असंभव को संभव से स्पर्श कर रहा हूँ’ — अपने भीतर एक गहरा द्वंद्व समेटे हुए है, जो भारतीय दार्शनिक परंपरा से लेकर पश्चिमी आधुनिक और उत्तर-आधुनिक चिंतन की रिवायत तक फैला हुआ है। यह पंक्ति स्वयं में एक विखंडित कथन है, जहाँ असंभव और संभव किसी स्थिर द्वैत के रूप में उपस्थित होने के बजाय एक-दूसरे को स्पर्श करते, परिभाषित करते और परस्पर चुनौती देते दिखाई पड़ते हैं।
मूलतः विधि के क्षेत्र में चर्चित ‘असंभवता का सिद्धांत’ (Doctrine of Impossibility) का संस्कृति-विषयक अध्ययन और विश्लेषण में यहाँ विधिक अवधारणा के रूप में नहीं, बल्कि एक रूपक और आलोचनात्मक औज़ार के रूप में प्रयोग किया जा रहा है। अनेकविचारकों ने इस ओर संकेत किया है कि संस्कृति-चिंतन में यह दृष्टि यह समझने में सहायक होती है कि प्रत्येक युग में हर तरह की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति संभव नहीं होती। ऐतिहासिक परिस्थितियाँ कुछ संभावनाओं को स्वाभाविक रूप से असंभव बना देती हैं।
सांस्कृतिक आलोचना में यह अवधारणा इस बात की चेतावनी देती है कि किसी रचनाकार का मूल्यांकन करते समय उस पर असंभव अपेक्षाएँ न थोपी जाएँ। उदाहरणत के लिए स्त्री-लेखन से यह अपेक्षा कि वह हर दौर में समान रूप से विद्रोही स्वर में बोल सके, या किसी दमनग्रस्त समाज से पूर्ण प्रतिरोध की आकांक्षा करना, ऐतिहासिक संदर्भ की उपेक्षा करता है। इस अर्थ में ‘असंभवता’ की अवधारणा आलोचना में एक नैतिक विनम्रता और ऐतिहासिक न्यायबोध उत्पन्न करती है।
साहित्य-सृजन के संदर्भ में यह दृष्टि यह समझने में सहायक होती है कि किसी विशिष्ट ऐतिहासिक क्षण में साहित्यिक अभिव्यक्ति की भी अपनी सीमाएँ होती हैं। कई बार कुछ अनुभव, पीड़ा या सामूहिक आघात ऐसे होते हैं जिन्हें भाषा पूर्णतः अभिव्यक्त नहीं कर पाती और कविता या कला केवल उनकी ओर संकेत भर कर सकती है। इस प्रकार यह सिद्धांत ऐतिहासिक यथार्थ को केंद्र में रखते हुए ज़मीनी हक़ीक़त की अनदेखी करने वाली यूटोपियन सोच की आलोचना करता है और नैतिक निर्णयों को अधिक मानवीय तथा संदर्भ-सचेत बनाता है।
भारतीय दार्शनिक परंपरा में असंभव और संभव का संबंध सिर्फ़ तार्किक नहीं, अनुभूतिपरक है। उपनिषदों में ब्रह्म को ‘नेति-नेति’ कहा गया है: “स एष नेति नेत्यात्मा।अगृह्यो न हि गृह्यते।अशीर्यो न हि शीर्यते।असङ्गो न हि सज्यते।असितो न व्यथते।न रिष्यति॥” (बृहदारण्यक उपनिषद 2.3.6 ; शंकराचार्य कृत भाष्य में उद्धृत ) । गोस्वामी जी के शब्दों में – ‘नेति नेति जेहिं बेद बखाना ।’ ब्रह्म वह सत्ता है जिसे कहा नहीं जा सकता, जिसे पूरी तरह संभव की सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। तैत्तिरीयोपनिषद् के ब्रह्मानन्द वल्ली/आनन्दवल्ली, चतुर्थ अनुवाक में ब्रह्म को अनिर्देशनीय, अकथनीय तथा मन और वाणी से परे ‘असंभव’ कहा गया है —‘यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।’ ‘रामचरितमानस’ की एक चौपाई भी ब्रह्म के निर्गुण और सगुण रूपों की अद्भुत, अकथनीय और अनुपम प्रकृति को रेखांकित करती है, जिसे मनुष्य द्वारा पूरी तरह समझ सकना और व्यक्त कर पाना असंभव है —‘अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।।’
अशोक वाजपेयी की ‘असंभव-संभव’ शीर्षक कविता की प्रारंभिक पंक्तियों में प्रार्थना के दैव तक पहुँचने की चेष्टा का रूपक आता है जो ज्ञान की परंपरा से जुड़ता है। प्रार्थना स्वयं में एक ऐसी क्रिया है जो ‘असंभव’ की ओर संभव माध्यमों से जाने का प्रयास करती है। यहाँ ‘असंभव’ ईश्वर या परम सत्य है और संभव मनुष्य की भाषा, भाव और उसका कर्म। यह भारतीय दर्शन एवं भक्तिकाव्य परंपरा की स्मृति भी जगाता है, जहाँ साधारण कर्म, वस्तुएँ और भाव भी पवित्र बन जाते हैं। प्रसंगवश याद आते हैं भगवत्पाद आदि शंकराचार्य ,जिन्होंने ‘शार्दूलविक्रीडितम्’ में रचित एक छंद में मनुष्य के अतिसामान्य नित्यकर्मों में माध्यम से ईश्वर की आराधना को संभव मानते हुए लिखा है कि “आप ही मेरी आत्मा हैं, गिरिजा मेरी बुद्धि हैं, मेरे प्राण आपके अनुचर हैं, मेरा शरीर आपका निवासस्थान है, मेरी निद्रा आपकी समाधि है, मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है, मेरी सारी वाणी और शब्द आपके ही स्तोत्र हैं। हे शम्भू ! मैं जो भी कर्म करता हूँ, वह सब आपकी ही आराधना है” :

आत्मा त्वं गिरिजा मति: सहचरा: प्राणा: शरीरं गृहम्
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थिति:।
संचार: पदयो: प्रदक्षिणविधि: स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत् कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥

विवेच्य कविता में ‘पवित्र’ शब्द की बार-बार आवृत्ति विशेष रूप से ध्यान आकर्षित करती है। यह पवित्रता किसी संस्थागत धर्म से नहीं, बल्कि जीवन की साधारण गतिविधियों से उत्पन्न होती है। कविता में आये ‘बदराए आकाश के नीचे डोलती हरी पत्तियाँ’, ‘घरों का जगह घेरना’, ‘दूर उपत्यका से आती और लुप्त हो जाती पुकार’, ‘अँधेरे में दरवाज़ा खोजती लड़खड़ाहट’, ‘अपनी-अपनी रसोइयों में पकता भोजन’—ये सभी दृश्य और कर्म भारतीय गृहस्थ जीवन की याद दिलाते हैं। ‘गीता’ में कहा गया है कि किसी भी कर्म का ईश्वरार्पण करने से वह पवित्र हो जाता है:

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥

(जो मनुष्य अपने सभी कर्म ब्रह्म में अर्पित करके, आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है,वह पाप (अच्छे–बुरे कर्मफल) से उसी प्रकार लिप्त नहीं होता,जैसे कमल-पत्र जल में रहकर भी जल से नहीं भीगता।)

इससे विलग ‘असंभव-संभव’ कविता का रचनाकार बिना किसी ईश्वर-स्मरण के इस जीवन को ही पवित्र घोषित करता है। यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहाँ पवित्रता का स्रोत कोई पारलौकिक या बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि स्वयं जीवन की उपस्थिति और रोज़मर्रा के क्रिया-कलाप हैं ।

पश्चिमी आधुनिक विचारकों के मन्तव्य के तहत ‘असंभव –संभव’ कविता मार्टिन हाइडेगर (1889-1976) की ‘होने’(Being) की अवधारणा से संवाद करती प्रतीत होती है। उनकी पुस्तक ‘बीइंग एंड टाइम’ में कहा गया है कि दर्शन का मूल प्रश्न है: ‘होने का अर्थ क्या है?’ पारंपरिक दर्शन ने केवल ‘अस्तित्ववान वस्तुओं’ (Seiendes) पर ध्यान दिया; उनके वास्तविक ‘होने’ (बीइंग) को नहीं समझा। हाइडेगर के लिए मनुष्य का अस्तित्व वही है जो अपने होने के अर्थ से सचेत है और जिसे मनुष्य अपने अनुभवों के माध्यम से जानता है। ‘होना’ केवल भौतिक दृष्टि से मौजूद होना नहीं, बल्कि सम्भावनाओं, अर्थ और अनुभवों में अपने वास्तविक स्वरूप के प्रकट होने को दर्शाता है। इस दृष्टि से, हाइडेगर के दर्शन में ‘होना’ हमें इंसान की ज़िन्दगी और वुजूद की गहराई की ओर ले जाता है।

‘असंभव-संभव’ कविता के अंतिम हिस्से में कवि का यह कहना कि वह ‘होने के आशय के बारे में एक अरुणाभ प्रश्न’ पूछना चाहता है, सीधे इसी दार्शनिक जिज्ञासा से जुड़ता प्रतीत होता है। ‘अरुणाभ प्रश्न’ काव्यभाषा के स्तर पर नवाचार है —यानी ऐसा प्रश्न जो उषा वेला की तरह अर्धप्रकाशित, सुंदर और आकर्षक है । थोड़ा अस्फुट, लेकिन कर्णकटु नहीं । ‘अरुणाभ’ प्रयोग यह संकेत देता है कि अस्तित्व का सत्य पूर्ण प्रकाश में नहीं, बल्कि धुंधले, संक्रमणशील क्षणों में प्रकट होता है। यह आधुनिक अस्तित्ववाद की उस चिन्तनधारा से मेल खाता है, जहाँ उत्तर से अधिक प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।

उत्तर-आधुनिक विमर्श के अंतर्गत यह कविता विशेष रूप से देरिदा के विखंडनवाद के आलोक में अत्यंत अर्थगर्भी प्रतीत होती है। देरिदा ने पश्चिमी दर्शन की उस परंपरा की आलोचना की है जिसमें अर्थ को स्थिर, केंद्रित और उपस्थिति से जुड़ा हुआ माना गया है । उनके अनुसार, अर्थ हमेशा स्थगित रहता है, वह पूर्णतः मौजूद नहीं होता। विवेच्य कविता में ‘असंभव’ और ‘संभव’ का संबंध इसी ‘स्थगन’ और ‘अंतराल’ (‘différance’) का उदाहरण है। असंभव को संभव से स्पर्श करना एक ऐसा कथन है जो अपने भीतर विरोधाभास की सृष्टि करता है, और यही विरोधाभास कविता का अर्थ रचता है। असंभव कभी पूरी तरह संभव नहीं होता और संभव कभी पूरी तरह असंभव को समाहित नहीं कर पाता। यह अंतर ही अर्थ का स्थगन है।

‘असंभव- संभव’ कविता में पवित्रता की सूची को यदि देरिदा के नज़रिए से देखें, तो यह किसी केंद्रित धार्मिक अर्थ का विखंडन है। परंपरागत रूप से पवित्र वह माना जाता है जो अपवित्र से अलग और एक निश्चित मानदण्ड के भीतर परिभाषित हो। लेकिन यहाँ कविता में पवित्रता फैलती जाती है—‘घरों के जगह घेरने से लेकर बूढ़े के पुलिया पर बैठकर सुस्ताने तक’ और ‘नदी के उस जल तक जिसे अब कोई अंजलि में भरकर नहीं पीता ।’ यह पवित्रता किसी उपयोगिता या धार्मिक कर्म के बजाय उपेक्षा, थकान, अनुपस्थिति और विस्मृति से जुड़ी है। देरिदा के अनुसार रचना का अर्थ अक्सर उसी में छिपा होता है जिसे हम हाशिये पर डाल देते हैं। कविता में नदी का जल, जिसे कोई नहीं पीता; उसी हाशिये का प्रतीक है और कवि के द्वारा वही पवित्र घोषित होता है।

उत्तर-आधुनिक आलोचना का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू है – बड़े आख्यानों का विघटन। इसे भी यह कविता मूर्त रूप देती है। यहाँ कोई एक महान विचार, कोई सर्वव्यापी सत्य या कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं है। इसके स्थान पर छोटे-छोटे अनुभव, क्षणिक दृश्य और स्थानीय अर्थ हैं। ‘दूर सघन निर्जन में होती अविराम वर्षा’ या ‘शताब्दियों के बाद किसी शब्द का कविता में पुनरवतरण’—ये सभी क्षण इतिहास की रैखिकता को तोड़ते हैं। समय यहाँ सीधा नहीं, परतदार है। शब्द का पुनरवतरण इस बात का संकेत है कि भाषा स्वयं स्थिर नहीं है; वह समय के साथ बदलती है, खोती है और फिर नए संदर्भ में लौटती है। हिन्दी में तुलसीदास,प्रसाद, निराला, दिनकर आदि की कविता में ऐसे सैकड़ों शब्द मिलते हैं जिनका लम्बे से तक हिन्दी ही नहीं,संस्कृत में भी प्रयोग न के बाराबर होता रहा । उदाहरण के लिए ‘उर्वशी’ में ‘वक्ष के इस तल्प पर सोती न केवल देह / मेरे तप्त व्याकुल प्राण भी विश्राम पाते हैं’ में प्रयुक्त ‘तल्प’ शब्द का प्रयोग हिन्दी में शायद ही कहीं और हुआ हो ।
इस कविता में ‘शताब्दियों के बाद किसी शब्द का कविता में पुनरवतरण’ की बात सीधे देरिदा की भाषा-संबंधी अवधारणा से जुड़ती है, जहाँ भाषा की यात्रा में विभिन्न समयों में भिन्न-भिन्न शब्द-प्रयोगों के साथ ही शब्द और अर्थ के बीच किसी स्थायी संबंध को अस्वीकार करते हुए अस्थिर संबध पर बल दिया गया है । जाहिर है कि यह ‘वाक्यपदीयम्’ में ‘शब्दविवर्तवाद’ का अनूठा सिद्धांत प्रतिपादित करने वाली भर्तृहरि की उस स्थापना का प्रत्याख्यान है जिसके तहत वहाँ माना गया है कि शब्द और अर्थ अलग नहीं, बल्कि एक ही ब्रह्म के दो रूप हैं; शब्द ही ब्रह्म है जो विभिन्न अर्थों के रूप में जगत को उत्पन्न करता है:
अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥
(वाक्यपदीयम् १.१)
(अनादि और अनन्त ब्रह्म वह अक्षर शब्दतत्त्व है, जो अर्थ के रूप में विवर्त (प्रकट) होता है और जिससे जगत की सारी प्रक्रिया (सृष्टि आदि) चलती है।)
भारतीय सौन्दर्यशास्त्र के संदर्भ में यदि ‘असंभव-संभव’ कविता को देखें, तो यह रस की पारंपरिक अवधारणा को भी चुनौती देती है। यहाँ कोई एक रस प्रधान नहीं है। करुण, शान्त, अद्भुत और वात्सल्य जैसे भाव एक-दूसरे में घुलते-मिलते दिखाई देते हैं। यह रसों का स्थिर विधान नहीं, बल्कि एक तरल अनुभूति है। अभिनवगुप्त के रस-सिद्धांत में सहृदय की भूमिका महत्वपूर्ण है; यहाँ सहृदय को किसी निश्चित भाव तक नहीं ले जाया जाता, बल्कि उसे अनुभवों की खुली संरचना में छोड़ दिया जाता है। यह भी एक प्रकार का विखंडन है—रस के केंद्र का विखंडन।

विवेच्य कविता का सामाजिक और नैतिक पक्ष भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ‘रोटी और दाने पक्षियों के लिए बचाकर रखना’, ‘वृक्ष के नीचे किसी अज्ञात देवता के लिए नैवेद्य रख आना’ जैसी क्रियाएँ उपभोक्तावादी और उपयोगितावादी उसूलों के ख़िलाफ़ खड़ी होती हैं। यहाँ नैतिकता किसी नियम या सिद्धांत से नहीं, बल्कि करुणा और सहअस्तित्व से उत्पन्न होती है। उत्तर-आधुनिक समाज में, जहाँ नैतिक मूल्यों को सापेक्ष और अस्थिर माना जाता है, यह कविता एक सूक्ष्म लेकिन दृढ़ नैतिक संवेदना को सामने लाती है। यह नैतिकता न तो उपदेशात्मक है, न ही घोषणात्मक; यह जीवन की साधारण गतिविधियों में अंतर्निहित है।

कविता के अंतिम हिस्से में शरीर की प्रेमाकुल गर्माहट का उल्लेख विशेष अर्थ रखता है। कविता में बढ़ती हुई ठंड के विरुद्ध यह गर्माहट पवित्र और ज़रूरी लगती है। यहाँ शरीर को किसी पाप या निम्नता का स्थान नहीं, बल्कि अस्तित्व की अनिवार्य शर्त के रूप में देखा गया है। भारतीय वेदान्त दर्शन और पश्चिमी दर्शन में प्लेटो से लेकर परवर्ती ईसाई परंपरा तक शरीर और आत्मा के द्वैत पर बल दिया गया, जहाँ आत्मा को श्रेष्ठ और शरीर को तुच्छ माना गया। देरिदा ने इस द्वैत का भी विखंडन किया है । ‘असंभव-संभव’ शीषक कविता में शरीर की गर्माहट उसी विखंडन की पुष्टि का सर्जनात्मक उदाहरण है, जहाँ शरीर और आत्मा, भौतिकता और आध्यात्मिकता अलग-अलग नहीं रह जाते।
जॉन डन का हवाला देते हुए ‘मेटाफिजिकल कवियों ’ ( Metaphysical Poets) की प्रशंसा में एलियट ने लिखा है कि वे विचारों को सीधे अनुभूति के रूप में प्रस्तुत करते हैं, अर्थात् विचार और भावना को एकीकृत कर देते हैं। एलियट के शब्दों में “मेटाफिजिकल कवि विद्वान थे, और उनकी संवेदनशीलता तथा विचार की सटीकता उन्हें अद्वितीय बनाती है… उनमें एक बौद्धिक उत्साह था, जो उनकी कविता की जीवनशक्ति का रहस्य है।” (The Metaphysical poets were men of learning, and they are remarkable for their sensibility and for the exactness of their thought… they have an intellectual passion which is the secret of their vitality.” – The Sacred Wood: Essays on Poetry and Criticism (1920) में The Metaphysical Poets” निबंध ) इसी विख्यात निबन्ध में दार्शनिक कवियों द्वारा प्रयुक्त रूपक की विशेषताओं का आकलन करते हुए कहा गया है , “एक मेटाफिजिकल रूपक… एक तुलना होती है जो भावनाओं की तुलना में अधिक बौद्धिक होती है… यह असंबंधित प्रतीत होने वाली वस्तुओं को जोड़ता है और मन को उस संयोजन को समझने के लिए प्रेरित करता है।” (“A metaphysical conceit… is a comparison that is more intellectual than emotional… it unites the seemingly unconnected, and forces the mind to perceive the union.”) यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि ‘रूपक’ के लिए अग्रेज़ी में अमूमन ‘मेटाफर’ शब्द इस्तेमाल किया जाता है, पर एलियट ने‘कन्सीट’(conceit) शब्द चुना है जो साधारण के बजाय एक असाधारण, अप्रत्याशित और बौद्धिक रूपक है और अक्सर दो निहायत अलग चीज़ों को जोड़ देता है। यह भाव और विचार दोनों को चुनौती देता है और पाठक को सोचने पर मजबूर करता है।
विदित है कि अशोक वाजपेयी भी एक विद्वान कवि हैं। निराला की सुप्रसिद्ध ‘तुलसीदास’ कविता से शब्दावली उधार लेकर कहें, तो वे – ‘समधीत-शास्त्र-काव्यालोचन’ हैं ।ऐसे ही रचनाकारों के बारे में राजशेखर ने ‘काव्यमीमांसा’ में लिखा है, “कोई ऐसा होता है, जिसमें काव्य-सृजन की क्षमता होती है। कोई ऐसा भी होता है, जिसमें कविता सुनने की क्षमता होती है. तुम्हारी कल्याणमयी बुद्धि दोनों में समर्थ है, इसलिए हमें चकित कर देती है. एक में इतने सारे गुणों का सन्निपात नहीं हो सकता. एक पत्थर होता है जो सोने को जन्म देता है और दूसरा पत्थर उस सोने की परीक्षा करने में सक्षम होता है. गरज़ कि तुम ऐसे दुर्लभ पाषाण हो, जो कंचन होने के साथ ही कसौटी भी हो:
‘कश्चिद् वाचं रचयितुमलं श्रोतुमेवादsपरस्तां
कल्याणी ते मतिरुभयथा विस्मयं नस्तनोति ।
नह्योकस्मिन्नतिशयवतां सन्निपातो गुणानां
मेक: सूते कनकमुपलस्तत्परीक्षा क्षमोद्Sन्य:।।’
अशोक वाजपेयी की ‘असंभव–संभव’ एक ऐसी दार्शनिक कविता है,जो एलियट द्वारा प्रयुक्त सामान्य रूपक (Metaphor ) के बजाय असाधारण एवं बौद्धिक रूपक (Conceit) के उपयोग के माध्यम से परस्पर असम्बद्ध लगने वाली चीज़ों को एक एक-दूसरे के साथ गूंथती हुई प्रबुद्ध पाठक को प्रचलित ढर्रे से बाहर आकर सोचने के लिए प्रेरित करती है। स्पष्ट ही यह कविता किसी एक पूर्वनिर्धारित दार्शनिक ढाँचे में पूरी तरह समाहित नहीं होती। यह भारतीय दर्शन की अनुभूतिपरक परंपरा, पश्चिमी आधुनिकता, अस्तित्ववाद और उत्तर-आधुनिक विखंडनवादी चिंतन— तीनों से एक साथ अपने ख़ास अंदाज़ में संवाद करती है, लेकिन किसी की अनुकृति नहीं बनती। यह अर्थ को ज़बरन स्थिर करने की कोशिश करने के बजाय उसे खुला छोड़ देती है। असंभव को संभव से पकड़ने की इच्छा स्वयं में एक अधूरी, लेकिन उत्तेजक मानवीय आकांक्षा है। यही अधूरापन, यही असमाप्तता इस कविता की सबसे बड़ी ताकत है। स्वभावत: ऐसी कविताएँ आस्वादन के लिए पाठक से समुचित बौद्धिक तैयारी , संवेदनशील चौकन्नापन और सक्रिय सहभागिता की माँग करती हैं । ‘असंभव-संभव’ कविता पाठक को कोई बना-बनाया निष्कर्ष नहीं देती, बल्कि प्रश्नों के साथ छोड़ देती है। देरिदा के शब्दों में कहें तो यह कविता अपने ही अर्थ का निरंतर विखंडन करती चलती है और उसी में जीवित भी रहती है। यही कारण है कि यह रचना समकालीन हिंदी कविता में एक गहन दार्शनिक और सौन्दर्यबोधीय हस्तक्षेप के रूप में स्थापित होने योग्य सृजन है।

(सात )

पृथ्वी का मंगल हो

सुबह की ठंडी हवा में
अपनी असंख्य हरी रंगतों में

चमक-काँप रही हैं
अनार-नींबू-नीम-सप्रपर्णी-शिरीष-बोगेनबेलिया-जवाकुसुम-सहजन की पत्तियाँ :

धूप उनकी हरीतिमा पर निश्छल फिसल रही है :
मैं सुनता हूँ उनकी समवेत प्रार्थना :

पृथ्वी का मंगल हो!
एक हरा वृंदगान है विलम्बित वसंत के उकसाए

जिसमें तरह-तरह के नामहीन फूल
स्वरों की तरह कोमल आघात कर रहे हैं :

सब गा-गुनगुना-बजा रहे हैं
स्वस्तिवाचन पृथ्वी के लिए।

साइकिल पर एक लड़की लगातार चक्कर लगा रही है
खिड़कियाँ-बालकनियाँ खुली हैं पर निर्जन

एकांत एक नए निरभ्र नभ की तरह
सब पर छाया हुआ है

पर धीरे-धीरे बहुत धीमे बहुत धीरे
एकांत भी गा रहा है पृथ्वी के लिए मंगलगान।

घरों पर, दरवाज़ों पर
कोई दस्तक नहीं देता—

पड़ोस में कोई किसी को नहीं पुकारता
अथाह मौन में सिर्फ़ हवा की तरह अदृश्य

हल्के से धकियाता है हर दरवाज़े, हर खिड़की को
मंगल आघात पृथ्वी का।

इस समय यकायक बहुत सारी जगह है
खुली और ख़ाली

पर जगह नहीं है संग-साथ की, मेल-जोल की,
बहस और शोर की, पर फिर भी

जगह है : शब्द की, कविता की, मंगलवाचन की।
हम इन्हीं शब्दों में, कविता के सूने गलियारे से

पुकार रहे हैं, गा रहे हैं,
सिसक रहे हैं

पृथ्वी का मंगल हो, पृथ्वी पर मंगल हो।
पृथ्वी ही दे सकती है

हमें
मंगल और अभय

सारे प्राचीन आलोकों को संपुंजित कर
नई वत्‍सल उज्ज्वलता

हम पृथ्वी के आगे प्रणत हैं।

‘पृथ्वी का मंगल हो’ समकालीन हिंदी कविता में पर्यावरणीय चेतना की दृष्टि से एक गहन, नैतिक, सभ्यतागत एवं सांस्कृतिक सृजन है ।
इको-क्रिटिसिज़्म के सिद्धांतों के तहत वैदिक आदिम पृथ्वी-बोध और वैश्विक पर्यावरणीय काव्य-परंपरा के संदर्भ में समन्वित रूप से वाचन करने पर इसके अर्थ की अनेक परतें खुलती हैं, जिससे यह रचना बहुआयामी हो जाती है। यह कविता केवल प्रकृति के प्रति प्रेम या संरक्षण की भावुक या राजनीतिक अभिव्यक्ति के बजाय उस मूल संबंध की पुनर्स्थापना का प्रयास है जो मनुष्य और पृथ्वी के बीच अनादिकाल से मौजूद रहा है, पर आधुनिक औद्योगिक और पूँजीवादी सभ्यता के घटाटोप में यह लगभग विस्मृत हो चुका है। इको-क्रिटिसिज़्म प्रकृति तथा अन्य मानवेतर प्राणियों की तरफ़दारी करते हुए जिस मानव-केंद्रित दृष्टि का प्रतिवाद करता है, यह कविता उसी प्रतिवाद के समानात्र एक काव्यात्मक पुनर्रचना है। यहाँ पृथ्वी किसी निष्क्रिय पृष्ठभूमि या संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवित, संवेदनशील और नैतिक सत्ता के रूप में उपस्थित है।

समकालीन ब्रिटिश साहित्य-आलोचना के एक अत्यंत प्रतिष्ठित विद्वान–आलोचकऔर इको-क्रिटिसिज़्म के प्रमुख चिंतक जोनाथन बेट (Jonathan Bate) का कहना है कि “पर्यावरणीय संकट का मूल हमारी कल्पना और नैतिक दृष्टि के संकट में है।” (The environmental crisis is a crisis of imagination and ethics). यह बयान इस कविता को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी प्रदान करता है। विवेच्य कविता इसी कल्पनात्मक और नैतिक पुनर्संरचना का कलात्मक रूप है। उसमें ‘पृथ्वी का मंगल हो’ कहना एक शुभकामना मात्र नहीं है; यह उस भाषा और दृष्टि को बदलने का आग्रह है जिसमें पृथ्वी को अब तक संपत्ति, संसाधन और उपभोग की वस्तु के रूप में देखा जाता रहा है । यह कविता ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ से आगे बढ़ी हुई आज की घनघोर वस्तुवादी भाषा को अस्वीकार करती है और पृथ्वी के साथ संबंध को पुनः नैतिक और भावात्मक स्तर पर स्थापित करती है।
याद रहे कि यह भावबोध भारतीय वैदिक परंपरा में अत्यंत प्राचीन है। ‘अथर्ववेद’ के पृथ्वी सूक्त में उद्घोषित मंत्र ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।’- यह स्पष्ट करता है कि मनुष्य पृथ्वी का स्वामी नहीं, बल्कि उसकी संतान है। अथर्ववेद का यह सूक्त धार्मिक नहीं है, बल्कि यह मानव के साथ ही धरती पर रहने वाले मानवेतर प्राणियों के अस्तित्व का घोषणा-पत्र है। भूमि सूक्त के 63 मंत्रों में से एक मंत्र (12.1.35) में ऋषि पृथ्वी से क्षमा मांगते हुए कहते हैं: “यत्ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोहतु।” (हे माता! अपनी आवश्यकताओं के लिए मैं जहाँ भी आपको खोदता हूँ, आपका वह घाव शीघ्र ही भर जाए।) कहना न होगा कि यह मंत्र आज के समय में सतत विकास (‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’) का सबसे प्राचीन और सटीक संदेश है।
इसी सूक्त की व्याख्या करने वाली एक पंक्ति पृथ्वी को केवल मनुष्य के बजाय समस्त जीव-जगत का साझा आश्रय बताती है – ‘सा विश्वस्याधारः स्थिरा नित्या च धृतिः । सर्वे जीवाः तस्या कृते पोषिताः सदा॥’ निवेदन यह है कि वैदिक दृष्टि में पृथ्वी केवल मानव-केंद्रित नहीं है; वह बहुजीवी, बहुस्तरीय और पारिस्थितिक संतुलन से युक्त सत्ता है। इक्कीसवीं सदी में रचित ‘पृथ्वी का मंगल हो’ कविता इसी साझा अस्तित्व की चेतना को आधुनिक संदर्भ में पुनः मनुष्य की विचार-परिधि के केंद्र में लाती है, जहाँ पृथ्वी का मंगल मनुष्य के मंगल से अलग नहीं, बल्कि उससे गहराई से जुड़ा हुआ है।

इको-क्रिटिसिज़्म यह मानता है कि साहित्य केवल प्रकृति का चित्रण नहीं करता, बल्कि यह भी निर्धारित करता है कि हम प्रकृति को कैसे समझते और उसके साथ कैसा व्यवहार करते हैं। समकालीन अमेरिकी साहित्य-आलोचना के एक प्रमुख विद्वान, इको-क्रिटिसिज़्म (Ecocriticism) के संस्थापक एवं सर्वाधिक प्रभावशाली सिद्धांतकारों में एक लॉरेंस बुएल(Lawrence Buell) का कथन है कि “पर्यावरणीय साहित्य वह है जिसमें मानवेतर संसार केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि नैतिक चिंता का केंद्र होता है।” (Environmental literature places the non-human world at the center of ethical concern),. यह बात ‘पृथ्वी का मंगल हो’ कविता पर पर सौ फ़ीसदी लागू होती है। वजह यह कि इस कविता में भी पृथ्वी पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि नैतिक केंद्र है। कविता की हर पंक्ति इस बात की ओर संकेत करती है कि पृथ्वी का कल्याण मनुष्य की नैतिक जिम्मेदारी है, न कि उसका वैकल्पिक शौक।

विदित है कि यह दृष्टि उपनिषदों और वैदिक शान्ति पाठ के मन्त्रों में भी गहराई से अंतर्निहित है। “द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः” जैसे मंत्र यह स्पष्ट करते हैं कि शांति और मंगल केवल मानव समाज तक सीमित नहीं हो सकते; वे समस्त प्राकृतिक तत्त्वों में व्याप्त होने चाहिए। विवेच्य कविता इसी व्यापक मंगल-कामना की आधुनिक काव्यभाषा में प्रभावशाली पुनर्रचना है। यहाँ मंगल का अर्थ केवल सुख या समृद्धि नहीं, बल्कि संतुलन, सह-अस्तित्व और नैतिक उत्तरदायित्व है।

कविता के सूक्ष्म पाठ-विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि पृथ्वी यहाँ किसी प्रतीकात्मक अमूर्तता में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से आहत होने के बावजूद जीवनदायिनी सत्ता के रूप में उपस्थित है। जब कवि पृथ्वी के मंगल की कामना करता है, तो यह वैदिक अर्थ में ‘कल्याण’ का संकेत है, न कि केवल शुभ या सौभाग्य का। अथर्ववेद की पंक्ति ‘विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम् । शिवां स्योऽनामनु चरेम विश्वहा ॥’ यह बताती है कि “पृथ्वी संसार की माता के समान है, यह पृथ्वी ‘धर्म / ऋत’ के कारण स्थिर और टिकाऊ है; अर्थात् धरती का संतुलन और अस्तित्व धर्म / ऋत (न्याय, सत्य, संतुलन) पर आधारित है। यह शुभ/कल्याणकारी भूमि है, जिस पर हम सब चलें और उसका आदर करें।” अशोक वाजपेयी की यह कविता इसी ‘ऋत; के विघटन की पीड़ा की उपज है। कविता की पंक्तियाँ बार-बार यह संकेत देती हैं कि मनुष्य के अनावश्यक-हस्तक्षेप ने इस ‘ ऋत संतुलन’ को डगमगा दिया है और इसलिए अब मंगल की कामना एक नैतिक अनिवार्यता बन जाती है।

कविता की भाषा में विशेष रूप से संयम और लज्जा का भाव दिखाई देता है। यहाँ पृथ्वी को ‘माँ’ कहकर भावुक संबोधन नहीं किया गया, बल्कि उसके साथ एक आत्मालोचनपरक संवाद रचा गया है। यह वही नैतिक लज्जा है जिसकी ओर ‘उत्तरदायित्व की नैतिकता’ (Ethics of Responsibility), प्रौद्योगिकी-आलोचना, तथा आधुनिक सभ्यता के नैतिक संकट पर अपने गहन दार्शनिक विमर्श के लिए मशहूर हांस जोनास (Hans Jonas) संकेत करते हैं। वे कहते हैं कि “भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी ही आधुनिक नैतिकता का केंद्र है” (The responsibility toward future generations is the core of modern ethics). उनका एक अन्य विख्यात नैतिक सूत्र है : “ऐसे कर्म करो कि उनके परिणाम पृथ्वी पर प्रामाणिक मानव जीवन की निरंतरता के अनुकूल हों।”

अशोक वाजपेयी की कविता में भी पृथ्वी का मंगल केवल वर्तमान के लिए नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए है। जयशंकर प्रसाद की शब्दावली में कहें तो एक आधुनिक कवि की सौन्दर्य-चेतना को प्राप्त यह ‘उज्ज्वल वरदान’ उसकी कविता को तात्कालिक भावुकता से ऊपर उठाकर दीर्घकालिक नैतिक विमर्श के रूप में स्थापित करता है। कविता में पृथ्वी को एक ऐसी सत्ता के रूप में देखा गया है जो अब भी जीवन धारण कर रही है, किंतु गहरे संकट में है। इको-क्रिटिसिज़्म इस स्थिति को ‘असुरक्षा और संजीवन-क्षमता’ (vulnerability and resilience) के द्वंद्व के रूप में पहचानता है। वैदिक पृथ्वी सूक्त में पृथ्वी की सहनशीलता की प्रशंसा के साथ यह चेतावनी भी निहित है कि मनुष्य उसके वक्ष को घायल न करे। विवेच्य कविता इसी चेतावनी को आधुनिक संदर्भों में पुनः अर्थवान बनाती है। यह किसी घोषणापत्र की तरह नहीं, बल्कि एक गंभीर, धीमी और आत्मालोचनात्मक उद्बोधन की तरह सामने आती है।
विवेच्य कविता में प्रयुक्त मिट्टी, जल, हवा और वृक्ष जैसे बिंब केवल सौन्दर्यात्मक नहीं हैं; वे नैतिक संकेतक हैं। जब कविता पृथ्वी के मौन और धैर्य की ओर संकेत करती है, तो यह मौन केवल शांति का नहीं, बल्कि सहन की गई हिंसा का मौन है। प्रिंसटन विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर , अमेरिकी पर्यावरणीय आलोचक और प्रकृति पर मनुष्य द्वारा ढाए जा रहे ज़ुल्म के प्रसंग में अपनी ‘धीमी हिंसा (Slow Violence) की अवधारणा के लिए विश्वविख्यात रॉब निक्सन (Rob Nixon) कहते हैं—“ऐसी हिंसा जो दिखती नहीं, लेकिन धीरे-धीरे विनाश करती है।” (Violence that occurs gradually and out of sight) ‘पृथ्वी का मंगल हो’ कविता इस अदृश्य हिंसा को काव्यात्मक संवेदना के माध्यम से दृश्य और अनुभूत बनाती है।

वैदिक परंपरा में पृथ्वी के साथ मनुष्य का संबंध पारस्परिक है। ‘भूमि सूक्त’ (12.1.3) के तीसरे मंत्र में कहा गया है : ‘यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्यामन्नं कृष्टयः सं बभूवुः । यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत् सा नो भूमिः पूर्वपेये दधातु ॥’(जिस भूमि में समुद्र और सिन्धु जल हैं, जिसमें अन्न और धान्य उत्पन्न होते हैं और जिसमें हमारे प्राण (जीवन शक्ति) का पोषण होता है, वही हमारे लिए भूमि है; वह हमें अग्रिम फल समृद्धि दे ।) कहना न होगा कि ये पंक्तियाँ पृथ्वी को जल, वनस्पति और जीवन के समवेत संजाल के रूप में देखती हैं। ‘पृथ्वी का मंगल हो’ कविता में भी पृथ्वी किसी एक तत्त्व का नाम नहीं, बल्कि संबंधों का जटिल और संवेदनशील तंत्र है। यही कारण है कि इस कविता में पृथ्वी का मंगल अकेला नहीं, बल्कि समस्त जीव-जगत के मंगल से जुड़ा हुआ है। यह दृष्टि आधुनिक ‘डीप इकोलॉजी’ के उस सिद्धांत से मेल खाती है, जिसके अनुसार प्रत्येक जीवन-रूप का अपना अंतर्निहित मूल्य होता है।

विश्व साहित्य में इस भावबोध की पुनर्रचना की व्यापक परंपरा मिलती है। वॉल्ट व्हिटमैन की पंक्ति -“घास की एक पत्ती भी तारों के श्रम से कम नहीं है,” (“I believe a leaf of grass is no less than the journey-work of the stars”) – प्रकृति के प्रत्येक अंश को ब्रह्मांडीय गरिमा प्रदान करती है। अशोक वाजपेयी की कविता भी पृथ्वी के मंगल को किसी सीमित क्षेत्र या जीव तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उसे समग्र अस्तित्व से जोड़ती है। पाब्लो नेरूदा की कविता ‘कीपिंग क्वाईट’ (Keeping Quiet) की पंक्ति “Now we will count to twelve and we will all keep still” जिस प्रकार मनुष्य की आक्रामक सक्रियता पर विराम लगाने का संकेत देती है, उसी अंदाज़ में ‘पृथ्वी का मंगल हो’ कविता भी मनुष्य से प्रकृति के प्रति एक सजग, विनम्र और आत्मालोचनपरक दृष्टि की माँग करती है।

‘वी हैव नेवर बीन मॉडर्न,(1993) पुस्तक में फ्रांसीसी दार्शनिक ब्रूनो लातूर (Bruno Latour, 1947-2022) लिखते हैं, “हम कभी आधुनिक थे ही नहीं, क्योंकि हमने प्रकृति और संस्कृति को झूठे रूप में अलग कर दिया।” (We have never been modern because we falsely separated nature and culture). यह गंभीर कथन ‘पृथ्वी का मंगल हो’ कविता के मर्म को कुछ और स्पष्ट करता है। गौरतलब है कि विवेच्य कविता भी प्रकृति और संस्कृति के बीच इस मिथ्या विभाजन के विभ्रम को तोड़ती है और पृथ्वी को संस्कृति की आत्मा के रूप में प्रस्तुत करती है। संस्कृत कविता में वाल्मीकि,व्यास, कालिदास, भवभूति से लेकर हमारे युग के आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री रचित गीतकाव्य ‘काकली’ में और हिन्दी में श्रीधर पाठक, सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद, निराला, अज्ञेय, जानकीवल्लभ शास्त्री, केदारनाथ सिंह, रामइक़बाल सिंह राकेश ,राजेन्द्र प्रसाद सिंह आदि के साथ ही अज्ञेय द्वारा सम्पादित ‘रूपाम्बरा’ में संकलित सैकड़ों रचनाओं में जो सूक्ष्म प्रकृति-बोध मिलता है उसे अशोक वाजपेयी की कविता एक ज्वलंत नैतिक प्रश्न में रूपांतरित कर देती है।
चिनुआ अचेबे का कहना है कि ‘भूमि लोगों की आत्मा होती है।’ (The land is the soul of the people) यह ‘पृथ्वी का मंगल हो’ कविता में अन्तर्निहित भावबोध से गहरे जुड़ता है। जब भूमि घायल होती है, तो सभ्यता की आत्मा भी घायल होती है। ‘पृथ्वी का मंगल हो’ इसी घायल आत्मा के आर्त्तनाद के साथ ही एक आत्मालोचनपरक और सांत्वनापरक कवित्वपूर्ण स्वर है। यह कविता किसी समाधान का नक्शा प्रस्तुत करने के बजाय संवेदना, जिम्मेदारी और नैतिक विवेक को जाग्रत करती है। इको-क्रिटिसिज़्म के अनुसार मनुष्य को पृथ्वी के साथ अपने संबंध पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित और विवश करना भी साहित्य की एक बड़ी भूमिका है । विवेच्य कविता वस्तुत: हिन्दी कविता की इस भूमिका को काव्यात्मक ऊँचाई प्रदान करती हुई एक आवश्यक नैतिक दायित्व का निर्वाह करती है। इस दृष्टि से ‘पृथ्वी का मंगल हो’ हिन्दी कविता को अखिल भारतीय तथा वैश्विक इकोक्रिटिकल साहित्य- परंपरा में एक महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाने की सदिच्छा के तहत रचित एक सांस्कृतिक सुफल है।
(आठ )

पहला चुम्बन

एक जीवित पत्थर की दो पत्तियाँ
रक्ताभ, उत्सुक

काँपकर जुड़ गईं,
मैंने देखा :

मैं फूल खिला सकता हूँ।

– अशोक वाजपेयी

‘पहला चुम्बन’ कविता आकार में जितनी छोटी है, उसका अर्थ उतना ही गहन और बहुस्तरीय है। यह कविता प्रेम के उस क्षण को पकड़ती है जो न तो पूरी तरह निजी है और न ही पूरी तरह सामाजिक; जो न तो केवल देह का अनुभव है और न ही केवल भावना का विषय; बल्कि जो चेतना, सृजन और सामाजिक संरचना—तीनों के संधि-बिंदु पर घटित होता है। इस कविता को पढ़ते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ प्रेम रोमानी आदर्श या केवल कामना या वासना के रूप में व्यक्त किए जाने के बजाय एक ऐसे अनुभव के रूप में पुनर्रचित हुआ है जो जड़ता को तोड़कर सृजनशीलता को जन्म देता है।
कविता की पहली पंक्ति—“एक जीवित पत्थर की दो पत्तियाँ”—हिंदी कविता में प्रेम के पारंपरिक बिंबों से एक निर्णायक विचलन है। कविताओं के साथ साथ आम बोलचाल में पत्थर या ‘पत्थर-ह्रदय’ सामान्यतः जड़ता, कठोरता, संवेदनहीनता और स्थायित्व के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल होता रहा है । यह भवभूति के उत्तररामचरित के उस अमर श्लोक की याद दिलाता है जिसमें वर्णन किया गया है कि सीता के अपहरण के बाद शून्य (जनहीन) जनस्थान में, राम के उन व्याकुल कर देने वाले आचरणों और उनकी शोकाकुल अवस्था को देखकर पत्थर भी रोने लगते हैं और वज्र का हृदय भी फट जाता है (द्रवित हो जाता है): “जनस्थाने शून्ये विकलकरणैरार्यचरितै- रपि ग्रावा रोदित्यपि दलति वज्रस्य हृदयम्॥”

विवेच्य कविता में पत्थर को ‘जीवित’ कहा गया है,जिससे वह आधुनिक मनुष्य की उस अवस्था का रूपक बन जाता है, जिसमें संवेदना पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, पर सामाजिक अनुशासन, नैतिक निगरानी, भय, संकोच और आत्म-संशय के कारण वह ‘पथरा’ गई है। कविता में आया ‘जीवित पत्थर’ प्रेम की असंभवता का नहीं, बल्कि उसकी दबी हुई संभावना का संकेतक है। पत्थर की ‘दो पत्तियाँ’—जो ‘रक्ताभ और उत्सुक’ हैं—देह के अत्यंत कोमल, संवेदनशील अंगों की ओर संकेत करती हैं। पत्तियों की रक्ताभता जीवन-रस की उपस्थिति का चिह्न है और उत्सुकता उस इच्छा का, जो सामाजिक निषेधों के बावजूद जीवित है। यहाँ प्रेम का उद्भव किसी सहज -स्वाभाविक या प्राकृतिक प्रवाह की तरह नहीं होता। वह ‘काँपकर’ घटित होता है। यह कंपन केवल कामना का नहीं है; यह भय का, जोख़िम का, सामाजिक दंड की आशंका का और आत्म-संशय का भी कंपन है।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें, तो यह कंपन उस क्षण का प्रतीक है, जहाँ निजी इच्छा मर्यादित सामाजिक संरचना से टकराती है। प्रमुख ब्रिटिश समाजशास्त्री एंथनी गिडेंस ने ‘द ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ़ इंटीमेसिज़: सेक्सुअलिटी, लव एंड इरोटिसिज्म इन मॉडर्न सोसाइटीज’ (1992) में आधुनिक समाज की संरचना, वैश्वीकरण और व्यक्तिगत संबंधों को लेकर गहन विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि ‘शुद्ध संबंध’ वह संबंध है जो सामाजिक, आर्थिक या धार्मिक बंधनों के बजाय व्यक्तिगत संतुष्टि, भावनात्मक निकटता और संबंध बनाने वालों की इच्छा पर आधारित होता है।भागवत महापुराण में प्रेम की इस अवस्था को ‘दोष रहित’ (‘निरवद्यसंयुजां’) संबंध या मिलन के रूप में अभिहित किया गया है । एंथनी गिडेंस का कहना है कि पारंपरिक समाजों में प्रेम और विवाह-संबंध वस्तुत: परिवार, संपत्ति, उत्तराधिकार या सामाजिक दवाबों से बंधे होते थे, लेकिन आधुनिक युग में ये संबंध ‘शुद्ध’ हो गए हैं। आधुनिक युग में संबंध तब तक चलते हैं जब तक दोनों पक्षों को भावनात्मक और शारीरिक संतुष्टि मिलती है। यदि संतुष्टि नहीं मिलती, तो संबंध समाप्त किया जा सकता है। यह संबंध ‘संगम प्रेम’ (confluent love) पर आधारित है। यह ऐसा प्यार है जहाँ दो आत्माएँ या लोग एक-दूसरे में समाहित होकर एक हो जाती हैं, जैसे नदियाँ समुद्र में मिलकर अपने अस्तित्व को समाहित कर देती हैं। ‘संगम’ या ‘मिलन’ का भाव ऐसा भाव है, जहाँ प्रेम की धाराएँ मिलकर परस्पर गहराई के तहत एक हो जाती हैं। कुल मिलाकर ‘कोन्फ़्लुएन्ट लव’ एक ऐसा गहरा और एकीकृत प्रेम है, जहाँ दो व्यक्ति एक-दूसरे में पूरी तरह घुल-मिल जाते हैं और एक ही दिशा में बहते हैं। दोनों लगातार संवाद करते हैं और अपनी आवश्यकताओं को व्यक्त करते हैं। यह रोमांटिक प्रेम से अलग है, क्योंकि रोमांटिक प्रेम में ‘हमेशा के लिए’ का आदर्श होता है, जबकि शुद्ध संबंध में ‘अभी तक’ (until further notice) का सिद्धांत लागू होता है। गौरतलब है कि आधुनिक प्रेम संबंध व्यक्ति की आत्म-पहचान (self-identity) को मजबूत करते हैं। गिडेंस इसे ‘स्व के प्रति-चिंतनशील परियोजना’ (reflexive project of the self) कहते हैं, जहाँ व्यक्ति अपने संबंधों के माध्यम से खुद को समझता और बदलता है। इसी क्रम में गिडेंस ‘लचीली यौनिकता’ (plastic sexuality) की बात करते हैं, जहाँ काम-संबंध सामाजिक नियंत्रण से मुक्त होकर व्यक्तिगत आनंद का माध्यम बन जाता है। इसमें उन्होंने उदारतावश समलैंगिक संबंधों और गैर-पारंपरिक यौनिकताओं को भी शामिल किया है। उनका तर्क है कि 18वीं शताब्दी से रोमांटिक प्रेम का उदय हुआ, जो स्त्रियों की आकांक्षाओं से जुड़ा था। लेकिन 20वीं शताब्दी के अंत में स्त्रियों की आर्थिक स्वतंत्रता, जन्म नियंत्रण और वैश्वीकरण के कारण संबंध ‘शुद्ध’ हो गए। उनका मानना है कि पारंपरिक विवाह में पति-पत्नी की भूमिकाएँ तय होती थीं, लेकिन आधुनिक प्रेम में समानता और संवाद महत्वपूर्ण है।
कहना न होगा कि यह अवधारणा विकासशील देशों पर भी लागू होती है, जहाँ शहरीकरण के कारण पारंपरिक दाम्पत्य संबंध टूट रहे हैं। स्पष्ट ही गिडेंस की यह अवधारणा सकारात्मक है, क्योंकि यह संबंधों में समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बढ़ावा देती है। लेकिन लिन जैमिस जैसे आलोचक कहते हैं कि यह अवधारणा ‘दोधारी’ (‘डबल-एज्ड’) तलवार है, जिससे नफ़ा और नुकसान दोनों है। वजह यह कि यह अवधारणा एक तरफ स्वतंत्रता, तो दूसरी तरफ अस्थिरता और भावनात्मक असुरक्षा बढ़ाती है। फिर भी, यह अवधारणा समाजशास्त्र, मनोविज्ञान और जेंडर अध्ययन में व्यापक रूप से उपयोगी साबित हुई है। कुल मिलाकर, गिडेंस के विचार आधुनिक प्रेम को एक गतिशील, व्यक्तिगत प्रक्रिया के रूप में देखते हैं, जो समाज की बदलती संरचना से जुड़ा है। फिर भी सचाई है कि आज भारत समेत दक्षिण एशियाई विकासशील देशों के वास्तविक समाज में यह ‘शुद्धता’ वाला संबंध शायद ही पूरी तरह संभव हो पाता है । भारतीय उपमहाद्वीप में ‘पहला चुम्बन’ आज भी वर्ण, जाति, कुल, गोत्र, लिंग, वर्ग, प्रचलित नैतिकता और सामाजिक निगरानी से घिरा होता है। पद्माकर के एक सवैये में ‘अंग सो अंग छुआयो कन्हाई’ पंक्ति में प्रथम प्रेमिल स्पर्श से नायिका के माथे पर स्वेद, रोमांच, घबराहट और अंत में ‘अंखियाँ भर आई’ का स्मरण कराती इस कविता में ‘काँपकर जुड़ गईं’ का उल्लेख जूलिया क्रिस्तेवा की ‘अंतर्पाठीयता’ की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण अभिव्यक्ति है।

अमरीकी समाजशास्त्री इरविंग गोफ़मैन (Erving Goffman :1922-1982) ने प्रतीकात्मक अंतःक्रिया, माइक्रो-सोशियोलॉजी और रोज़मर्रा के जीवन के समाजशास्त्रीय अध्ययन को निर्णायक रूप देनेवाली बहुचर्चित पुस्तक ‘The Presentation of Self in Everyday Life’ (1956) में सामाजिक जीवन को रंगमंच की तरह समझने का सिद्धांत विकसित किया और फ्रंट स्टेज (front stage) तथा ‘बैक स्टेज’ (back stage) की अवधारणाएँ प्रस्तुत कीं हैं। उनकी यह पुस्तक प्रतीकात्मक अंतःक्रिया के क्षेत्र में मील का पत्थर मानी जाती है। इसी प्रकार सार्वजनिक स्थलों पर व्यवहार, शिष्टाचार, दूरी, दृष्टि-संपर्क और मौन जैसे सूक्ष्म सामाजिक नियमों का विश्लेषण करती उनकी पुस्तक ‘Behaviour in Public Places: Notes on the Social Organization of Gatherings’ (1963) भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है जिसमें गोफ़मैन का माइक्रो-लेवल समाजशास्त्र पूरी स्पष्टता से सामने आता है। इसी प्रकार ‘Interaction Ritual: Essays on Face-to-Face Behaviour’ (1967) पुस्तक में उन्होंने आमने-सामने की अंतःक्रिया, face-work, शर्म, सम्मान और सामाजिक मर्यादा के नियमों का विश्लेषण करते हुए सामाजिक जीवन को नैतिक अनुष्ठानों की शृंखला के रूप में देखा है। 1956 से 1981 तक फैले हुए कार्यकाल के दौरान रचित उनकी कृतियाँ आज भी समाजशास्त्र, साहित्य-आलोचना, सांस्कृतिक अध्ययन, नाट्यशास्त्र और मनोविज्ञान में समान रूप से प्रासंगिक मानी जाती हैं। इन पुस्तकों में मौजूद जिन अवधारणाओं का उल्लेख किया गया है, उनमें से कई ऐसी हैं जो अशोक वाजपेयी की कविता ‘पहला चुम्बन’ की आलोचना और व्याख्या में अत्यन्त सूक्ष्म स्तर पर प्रयुक्त की जा सकती हैं। गोफ़मैन का महत्त्व यह है कि वे अध्येताओं को प्रेम जैसे निजी, क्षणिक और लगभग अव्यक्त अनुभवों को भी सामाजिक अंतःक्रिया के ढाँचे में समझने के औज़ार देते हैं। सवाल है कि उनकी कौन-कौन सी अवधारणाएँ विवेच्य कविता के पाठ-केन्द्रित आलोचनात्मक अध्ययन में सबसे अधिक उपयोगी हो सकती हैं, और क्यों ? इस क्रम में गोफ़मैन की पुस्तक ‘दैनिक जीवन में आत्म-प्रस्तुति’ (‘The Presentation of Self in Everyday Life’ :1956) में वर्णित ‘मंच के सामने’ या ‘फ्रंट स्टेज’ और ‘परदे के पीछे’ या ‘बैक स्टेज’ की अवधारणा ‘पहला चुम्बन’ कविता के सन्दर्भ में अत्यन्त प्रासंगिक प्रतीत होती है। कविता में ‘पहला चुम्बन’ सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि पूर्णतः ‘बैक स्टेज’ में प्राप्त किया गया अनुभव है। ‘एक जीवित पत्थर की दो पत्तियाँ’ उस देह और चेतना का रूपक हैं जो सामाजिक मंच के ‘फ्रंट स्टेज’ पर कठोरता से नियंत्रित और आत्म-संयमी बनी रहती है।

‘फ्रंट स्टेज’ पर व्यक्ति पत्थर की तरह संयत, भावनाहीन तथा सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप दिखाई दे रहा है। लेकिन ‘बैक स्टेज’ में, जहाँ सामाजिक दृष्टि और नैतिक निगरानी अस्थायी रूप से शिथिल पड़ती है, वहीं पत्थर जीवित हो उठता है। विवेच्य कविता में ‘काँपकर जुड़ गईं’ का प्रयोग इस निजी, जोख़िम-भरे क्षण की ओर संकेत करता है, जहाँ आत्म-प्रस्तुति के सारे मुखौटे उतर जाते हैं। इस दृष्टि से ‘पहला चुम्बन’ सामाजिक अभिनय से मुक्त होने का क्षण है और यहीं कविता के वाचक को यह बोध होता है कि वह ‘फूल खिला सकता है’। यह आत्म-प्रस्तुति के ढाँचे से बाहर निकलने की सृजनात्मक संभावना है। दूसरे शब्दों में इरविंग गोफ़मैन के ‘प्रतीकात्मक अंतःक्रिया सिद्धांत’ के अनुसार सामाजिक जीवन एक मंच की तरह है, जहाँ हर क्रिया, हर संकेत, हर स्पर्श अर्थों से भरा होता है। ‘पहला चुम्बन’ केवल दो व्यक्तियों के बीच घटित निजी घटना नहीं रहता; वह सामाजिक अर्थों से लदा हुआ एक जोख़िम-भरा कार्य बन जाता है। वह विद्रोह भी हो सकता है, अपराध भी, उपलब्धि भी—और यह सब सामाजिक संरचना पर निर्भर करता है। अशोक वाजपेयी की कविता में इस सामाजिक दबाव की उपस्थिति बहुत सूक्ष्म है, जो मेरे ख़याल से कंपन के रूप में मौजूद है।

गोफ़मैन द्वारा ‘इंटरेक्शन रिचुअल्स’ में विकसित ‘प्रतिष्ठा बचाना’ (face-work) और ‘शर्मिंदगी’ (embarrassment) की अवधारणाएँ भी ‘पहला चुम्बन’ कविता को समझने में सहायक हैं। गोफ़मैन के अनुसार हर सामाजिक अंतःक्रिया में व्यक्ति अपनी सामाजिक छवि, सम्मान और स्वीकार्यता को बचाने की कोशिश करता है। ‘पहला चुम्बन’ इसी ‘फ़ेस सेविंग’ के लिए एक जोख़िम है। कविता में आये ‘काँपकर’ शब्द में इस जोखिम का मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संकेत निहित है। यह ‘कंपन’ केवल कामना का नहीं, बल्कि ‘फ़ेस लौस’ (face-loss) की आशंका का भी परिचायक है जिसके तहत मनुष्य हमेशा चौकन्ना रहता है कि कहीं कोई सामाजिक मर्यादा न टूट जाए और उसकी पहचान ख़तरे में न पड़ जाए। लेकिन जैसे ही चुम्बन घटित होता है, वह एक नया ‘अनुष्ठान’ (ritual) बन जाता है, जो पुराने ‘फेस’ को तोड़कर एक नया आत्म-पहचान रचता है।

विवेच्य कविता में ‘मैंने देखा’ का प्रयोग इस नए ‘फ़ेस’ के उभरने का संकेत है—एक ऐसा ‘फ़ेस’ जो सृजनशील है। गोफ़मैन की ‘कलंक : दूषित पहचान के प्रबंधन पर टिप्पणियाँ’ (‘Stigma: Notes on the Management of Spoiled Identity’: 1963) पुस्तक में प्रस्तुत अवधारणा आधुनिक संदर्भ में ‘पहला चुम्बन’ कविता को और अधिक गहराई देती है। आधुनिक समाज में प्रेम, विशेषकर देहगत प्रेम, अक्सर नैतिक संदेह और कलंक से घिरा रहता है। ख़ास तौर से स्त्री-देह के संदर्भ में ‘पहला चुम्बन’ संभावित ‘कलंक’ को आमंत्रित करता है। विवेच्य कविता में ‘जीवित पत्थर’ को इस दृष्टि से उस समाजीकृत देह के रूप में भी पढ़ा जा सकता है, जिसे कलंक के भय ने पत्थर-सदृश कठोर बना दिया है। लेकिन कविता में यह ‘कलंक’ टूटने के बजाय अप्रासंगिक हो जाता है। चुम्बन उस कलंक को आत्मसात करने या उससे लड़ने के बजाय उसे सृजनात्मक आत्म-बोध में रूपांतरित कर देता है। यहाँ गोफ़मैन की यह अंतर्दष्टि उपयोगी है कि व्यक्ति केवल कलंक का शिकार नहीं होता, बल्कि उसे प्रबंधित (मैनेज) भी करता है। अशोक वाजपेयी की कविता में यह प्रबंधन मौन, कंपन और अंततः सृजन के रूप में घटित होता प्रतीत होता है। गोफ़मैन की ‘फ्रेम विश्लेषण’ (Frame Analysis) की अवधारणा भी ‘पहला चुम्बन’ कविता के विश्लेषण में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । उनके अनुसार हम किसी भी अनुभव को किसी ‘फ्रेम’ के भीतर ही समझते हैं। सामान्यतः ‘चुम्बन’ को या तो नैतिक अपराध के फ्रेम में रखा जाता है, या रोमानी भावुकता के फ्रेम में। ‘पहला चुम्बन’ कविता इन दोनों फ्रेमों को तोड़ती है। विवेच्य कविता में चुम्बन न अपराध है, न भावुक विलास; वह सृजनात्मक चेतना का फ्रेम बन जाता है। विवेच्य रचना में आयी ‘मैं फूल खिला सकता हूँ’ काव्यपंक्ति अनुभव को नए अर्थ के फ्रेम में पुनर्संरचित करती है। यह वही प्रक्रिया है जिसे गोफमैन ‘रिफ्रेमिंग’ (re-framing) कहते हैं—जो वस्तुत: अनुभव का पुनर्पाठ है। ‘सार्वजनिक स्थानों में लोगों के व्यवहार’ (Behaviour in Public Places) को लेकर गोफ़मैन की अवधारणा इस कविता के नकारात्मक अवकाश के रूप में पढ़ी जा सकती है।

कविता में सार्वजनिक स्थान का कोई उल्लेख नहीं है, लेकिन उसकी अनुपस्थिति में उसका दबाव मौजूद है। सार्वजनिक व्यवहार के कठोर नियम ही इस निजी क्षण को इतना कंपन-युक्त बनाते हैं। चुम्बन इस अर्थ में सार्वजनिक नियमों के विरुद्ध एक क्षणिक विद्रोह है, लेकिन आक्रामक नहीं—वह मौन और सूक्ष्म है। गोफ़मैन की ही सुप्रसिद्ध ‘विज्ञापनों में जेंडर की प्रस्तुति’ (जेंडर ऐडवरटिज्मेंट) पुस्तक में विकसित दृष्टि का काव्यमीमांसा में उपयोग करने की कोशिश की जाए, तो यह कविता स्त्री-देह की वस्तूकरण-मुक्त प्रस्तुति की ओर भी संकेत करती है। यहाँ देह किसी दर्शक या किसी प्रदर्शन के लिए नहीं है। वह न तो विज्ञापन है, न प्रदर्शन (spectacle); यह ‘पर्दे के पीछे’ का अनुभव है, जहाँ देह समाजिक घेरेबंदी के बजाय स्वयं के साथ ही अपने मनपसन्द दूसरे के लिए मौजूद है। इस अर्थ में यह कविता अनायास ही स्त्रीवादी व्याख्या के लिए भी संभावना के द्वार खोलती है, जहाँ स्त्री-देह पर प्रचलित सामाजिक नज़रिए का दबाव अस्थायी रूप से निलंबित होता हुआ प्रतीत होता है।

गौरतलब है कि ऐसी अनेक समाजशास्त्रीय अवधारणाएँ अशोक वाजपेयी की ‘पहला चुम्बन’ कविता की आलोचना में अत्यन्त प्रभावी ढंग से प्रयुक्त हो सकती हैं। ये अवधारणाएं विवेच्य कविता को केवल भावात्मक या सौंदर्यात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक-अंतःक्रियात्मक अनुभव के रूप में पढ़ने की सुविधा देती हैं। गोफ़मैन के विचारों के आलोक में यह स्पष्ट होता है कि ‘पहला चुम्बन’ कविता प्रेम के उस क्षण को पकड़ती है, जहाँ व्यक्ति समाज से नहीं भागता, बल्कि समाज के भीतर रहते हुए अपनी चेतना के लिए एक निजी, सृजनशील स्पेश रच लेता है। वस्तुत: ‘पहला चुम्बन’ कविता को भारतीय कविता की परम्परा के साथ ही समाजशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र, मनोविश्लेषण, जीव-मनोविज्ञान और स्त्रीवादी सिद्धांत के क्षेत्र में कार्यरत अनेक विचारकों के मंतव्यों के आलोक में पढ़ना ज़रूरी है जिनकी अवधारणाएँ इस कविता की व्याख्या को और अधिक बहुस्तरीय बना सकती हैं।

‘व्यावहारिकता’ और ‘प्रतीकात्मक अंतःक्रियावाद’ जैसे सिद्धांतों के संस्थापक के रूप में प्रसिद्ध अमेरिकी दार्शनिक, समाजशास्त्री और मनोवैज्ञानिक जॉर्ज हर्बर्ट मीड (1863-1931) ने समाजशास्त्र और सामाजिक मनोविज्ञान में यह विचार व्यक्त किया है कि मन (Mind), स्व (Self) और समाज (Society) सामाजिक अंतःक्रिया से ही उत्पन्न होते हैं, न कि व्यक्ति में जन्मजात होते हैं।
मीड के अनुसार आत्म का निर्माण ‘मैं, वह और मुझ के द्वंद्व’ से होता है। इस दौरान ‘वह’ (अदर) सहज, आवेगात्मक प्रतिक्रिया है, जबकि ‘मुझ’ सामाजिक अपेक्षाओं से बना नियंत्रित आत्म है । ‘पहला चुम्बन’ कविता को इस दृष्टि से पढ़ने पर ‘काँपकर जुड़ गईं’ उस क्षण का संकेत देता है जब कविता का ‘मैं’ पहली बार ‘मुझ’ (ME) और समाज के नियंत्रण से बाहर आता है। जीवित पत्थर समाज द्वारा गढ़ा गया, कठोर और अनुशासित वही ‘मुझ’ या ‘Me’ है और चुम्बन उस ‘मैं’ (‘I’) का विस्फोट है, जो आत्म को रचनात्मक संभावनाओं से भर देता है। ‘मैं फूल खिला सकता हूँ’ कहना इसी नए आत्म-बोध की अभिव्यक्ति है।
एमिल दुर्खीम की ‘सामूहिक उत्साह-उन्माद’ (collective effervescence) की अवधारणा भी विवेच्य कविता को समझने में अप्रत्यक्ष रूप से उपयोगी है। दुर्खीम ने इस अवधारणा को धार्मिक अनुष्ठानों के संदर्भ में विकसित किया था, लेकिन आधुनिक आलोचना में इसे प्रेम और देहगत निकटता पर भी लागू किया गया है। ‘पहला चुम्बन’ एक छोटा-सा निजी अनुष्ठान है, जिसमें दो व्यक्तियों के बीच एक क्षणिक सामूहिक ऊर्जा उत्पन्न होती है। यह ऊर्जा व्यक्ति को स्वयं से बड़ा अनुभव कराती है। अशोक वाजपेयी की कविता में यह ‘सामूहिक उत्साह-उन्माद’ उसी क्षण पकड़ में आता है जब पत्थर जीवित हो उठता है और कविता के वाचक को अपनी सृजन-शक्ति का बोध होता है। मैक्स वेबर ने ‘जगत-जादू-विसर्जन’ (disenchantment of the world) में लिखा था कि आधुनिक समाज में प्रेम भी अक्सर तर्क, उपयोगिता और नैतिक विनियमन के अधीन आ गया है। कविता में आया ‘जीवित पत्थर’ इसी विमोहित दुनिया का रूपक है। ‘पहला चुम्बन’ उस विमोहित संसार में पुनः सम्मोहन (enchantment) का क्षण है—एक ऐसा क्षण जहाँ अनुभव फिर से जादुई, अप्रत्याशित और अर्थ-समृद्ध हो उठता है। कविता के ‘मैं’ का ‘फूल खिला सकता हूँ’ कहना इसी पुनर्निर्माण का संकेत है। मिशेल फूको की सत्ता और देह की अवधारणा इस कविता को एक आलोचनात्मक किनारा देती है। फूको के अनुसार देह सत्ता का प्रमुख क्षेत्र है—जहाँ अनुशासन, निगरानी और नियंत्रण काम करते हैं। ‘पहला चुम्बन’ इस अनुशासित देह में एक सूक्ष्म विघटन पैदा करता है। यह कोई खुला विद्रोह नहीं, बल्कि एक ‘माइक्रोपोलिटिकल कृत्य’ है—एक क्षणिक, निजी प्रतिरोध। ‘काँपकर’ शब्द सत्ता की उपस्थिति और उसके विरुद्ध देह की प्रतिक्रिया—दोनों को एक साथ दर्ज करता है।

पियरे बॉर्दियो की ‘अभ्यस्त प्रवृत्ति’ (habitus) की अवधारणा भी यहाँ प्रासंगिक है। ‘हैबिटस’ वह अंतर्निहित सामाजिक संरचना है जो हमारे स्वाद, प्रतिक्रिया और देहगत व्यवहार को आकार देती है। मनुष्य के जीवन में पहला चुम्बन ‘हैबिटस’ द्वारा पूरी तरह नियंत्रित नहीं होता; वह उसके भीतर एक दरार पैदा करता है। विवेच्य कविता में ‘जीवित पत्थर’ उसी ‘अभ्यस्त प्रवृत्ति’ का संकेत है, और चुम्बन उसका अस्थायी निलंबन। कविता में ‘मैंने देखा’ कहना इस दरार की चेतना है। मॉरिस मर्लो-पोंटी की प्रसिद्ध कृति ‘Phenomenology of Perception’ (1945) के ‘Part One: The Body’ में विस्तार से वर्णित है कि शरीर महज एक भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि जीवंत, अनुभव करने वाला, दुनिया में मौजूद रहने वाला सब्जेक्ट है। यह 20वीं सदी के फ्रांसीसी दर्शन के क्षेत्र में उनकी सबसे महत्वपूर्ण देन है, जिसमें उन्होंने शरीर को महज एक भौतिक वस्तु (object) नहीं, बल्कि जीवंत, अनुभव करने वाला, दुनिया में मौजूद रहने वाला सब्जेक्ट माना है। मॉरिस का ‘phenomenology of the body’ विषयक चिंतन इस कविता के सौंदर्यशास्त्रीय अध्ययन में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। मर्लो-पोंटी के अनुसार देह केवल वस्तु नहीं, बल्कि अनुभव का माध्यम है। अशोक वाजपेयी की कविता में काँपकर जुड़ना, रक्ताभ होना, उत्सुक होना आदि प्रयोगों के दवारा चुम्बन को देखा-दिखाया नहीं, बल्कि महसूस किया-कराया गया है । यह अनुभव भाषा से पहले देह में घटित होता है। कविता में ‘मैंने देखा’ वस्तुत: दृश्य नहीं, बल्कि एक अनुभूत दृष्टि (embodied seeing) है।

यहाँ एडमंड हुसर्ल की फेनोमेनोलॉजी (प्रपंचशास्त्र) की अवधारणा अत्यंत प्रासंगिक है। हुसर्ल के अनुसार, चेतना हमेशा ‘किसी वस्तु की ओर’ (intentionality) होती है। कविता में “मैंने देखा” शब्द केवल बाहरी दृष्टि नहीं है, बल्कि यह चेतना का वह मोड़ है जहाँ वाचक अपने अस्तित्व की जड़ता से हटकर अपनी रचनात्मक संभावना की ओर मुखर होता है। यह एक ऐसी ‘फेनोमेनोलॉजिकल रिडक्शन’ (epoché) की स्थिति है जहाँ सामाजिक पूर्वग्रह और पत्थर जैसी जड़ता अस्थायी रूप से स्थगित हो जाती है और केवल विशुद्ध अनुभव शेष रह जाता है। हुसर्ल की यह दृष्टि स्पष्ट करती है कि चुम्बन यहाँ केवल एक इंद्रियपरक क्रिया नहीं है, बल्कि एक सचेत ‘प्रकटीकरण’ है। मनोविश्लेषण की दृष्टि से ‘पहला चुम्बन’ कविता को समझने-समझाने में मनोवैज्ञानिक डोनाल्ड विनिकॉट की अवधारणा भी उपयोगी है। ‘ऑब्जेक्ट रिलेशंस थ्योरी’ के लिए सुप्रसिद्ध डोनाल्ड विनिकॉट (1896–1971) ब्रिटिश बाल रोग विशेषज्ञ और मनोविश्लेषक एवं विचारक थे। उनकी सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली अवधारणाओं में से एक है ‘संक्रमणकालीन स्थान’ या ‘संभावित स्थान’ (Transitional Space), जिसे उन्होंने 1951 में लिखे प्रपत्र “Transitional Objects and Transitional Phenomena” में पेश किया और बाद में अपनी किताब ‘Playing and Reality’ (1971) में और विस्तार से समझाया। फ्रायड के अनुसार पहला चुम्बन लिबिडिनल ऊर्जा के सामाजिक रूप से स्वीकार्य रूप में प्रकट होने का क्षण है, लेकिन विनिकॉट के ‘संक्रमणशील स्थान’ की सूक्ष्म अवधारणा के तहत ‘पहला चुम्बन’ एक ‘संक्रमणशील अनुभव’ है—न पूरी तरह निजी, न पूरी तरह सामाजिक। इसी संक्रमणशील क्षेत्र में रचनात्मकता जन्म लेती है। ‘मैं फूल खिला सकता हूँ’ उसी ‘संक्रमानाशील क्षेत्र’ की सृजनात्मक उपलब्धि है। यहाँ वाल्टर बेंजामिन की ‘आभा’ (Aura) की अवधारणा इस सृजन-बोध को एक नई ऊँचाई देती है। बेंजामिन के लिए ‘आभा’ किसी वस्तु या क्षण की वह अद्वितीय विशिष्टता है जो उसकी ‘दूरी’ और ‘पवित्रता’ से निर्मित होती है। आधुनिक यांत्रिक युग में जहाँ सब कुछ दोहराव और जड़ता का शिकार है, ‘पहला चुम्बन’ उस पत्थर की तरह जड़ दुनिया में ‘आभा’ का पुनर्जन्म है जिसमें जीवन के प्रति आकर्षण की संभावनाएँ लगातार क्षीण होती जा रही हैं ।विवेच्य कविता में यह ‘क्षण’ अपनी अनुपम मौलिकता में ‘फूल’ की तरह खिलता है, जो बेंजामिन के ‘ऐस्थेटिक एक्सपीरियंस’ के करीब है। यह ‘आभा’ ही है जो वाचक को उस यांत्रिक सामाजिक मंच (फ्रंट स्टेज) से मुक्त कर एक मौलिक और पवित्र बोध प्रदान करती है।

स्त्रीवादी विचारकों में सिमोन द बोउवार और जूडिथ बटलर के मंतव्य विवेच्य कविता के सन्दर्भ में उपयोगी हैं। बोउवार के अनुसार स्त्री देह को ऐतिहासिक रूप से वस्तु बना दिया गया है। अशोक वाजपेयी की कविता में स्त्री देह का कोई वस्तूकरण नहीं है; वह केवल संवेदना का स्थल है। बटलर की ‘प्रदर्शनशीलता’ (performativity) की अवधारणा के अनुसार प्रेम और कामना भी सामाजिक रूप से प्रदर्शित (perform) की जाती हैं। ‘पहला चुम्बन’ उस ‘प्रदर्शनात्मक व्यवहार’ (performative script) से हटकर घटित होता है—इसलिए वह काँपता है, अस्थिर है, लेकिन सच्चा है। जैव-मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विचारने पर प्रेम-संबंधों में स्पर्श ‘भावनात्मक जुड़ाव का तंत्र’ (bonding mechanism) माना जाता है। आधुनिक जीव-मनोविज्ञान बताता है कि पहला चुम्बन ऑक्सीटोसिन और डोपामिन जैसे हार्मोनों को सक्रिय करता है, जो विश्वास, निकटता और सृजनात्मक ऊर्जा से जुड़े होते हैं। गौरतलब है कि अशोक वाजपेयी की ‘पहला चुम्बन’ कविता इस वैज्ञानिक तथ्य को रूपक में बदल देती है—‘पत्थर का जीवित होना’ और ‘फूल का खिलना’ उसी जैविक ऊर्जा का काव्यात्मक रूपांतरण है।

अंततः टी. एस. एलियट की परंपरा की अवधारणा पर फिर से लौटकर इन सभी विचारकों को साथ रखकर देखने पर स्पष्ट होता है कि ‘पहला चुम्बन’ केवल एक निजी अनुभव नहीं, बल्कि आत्म, देह, समाज, सत्ता, जैविकी और परंपरा—सबके ‘संगम’(कांफ्लुएंस) का क्षण है। कविता की अंतिम पंक्ति—“मैंने देखा : / मैं फूल खिला सकता हूँ”—इस पूरे अनुभव को एक नए धरातल पर ले जाती है। यहाँ प्रेम आत्मबोध में बदल जाता है। ‘पहला चुम्बन’ केवल देह का स्पर्श नहीं, बल्कि सृजन की क्षमता का उद्घाटन है। यहाँ समय की एक नई अवधारणा उभरती है। जहाँ पारंपरिक काव्य में प्रेम का क्षण अक्सर ‘अनंत’ होने का दावा करता है, यहाँ वह ‘तात्कालिकता’ (immediacy) में महत्वपूर्ण है। यह चुम्बन एक ‘ऐतिहासिक प्रस्थान’ है। सौंदर्यशास्त्र की दृष्टि से यह अनुभूति का सृजन में रूपांतरण है। कांट के अनुसार सौंदर्य वह है, जो निस्स्वार्थ आनंद उत्पन्न करे, जबकि क्रोचे सौंदर्य को शुद्ध अभिव्यक्ति मानते हैं।अशोक वाजपेयी की कविता में सौंदर्य न तो अलंकारों में है, न दृश्य सज्जा में, बल्कि उस क्षण में है, जब चेतना स्वयं को सृजनशील अनुभव करती है।

अब ‘पहला चुम्बन’ कविता को भागवत महापुराण में ‘रास पंचाध्यायी’ के गोपी-गीत के एक छंद के साथ रखकर पढ़ने की चेष्टा करें :

‘सुरतवर्धनं शोक-नाशनं स्वरित-वेणुना सुष्ठु चुम्बितम् ।
इतर-राग-विस्मारणं नृणां वितर वीर नस्तेऽधरामृतम्’।।

‘भागवत’ की इन पंक्तियों के साथ ‘पहला चुंबन’ के पाठ को रखकर देखने से प्रेम की दो भिन्न ऐतिहासिक और दार्शनिक अवधारणाएँ सामने आती हैं। ‘गोपी-गीत’ में चुम्बन दिव्य है। वह शोक का नाश करता है, रागों का विस्मरण कराता है और ईश्वर तत्त्व के अधर के ‘अलौकिक स्पर्श’ के माध्यम से जीव को अमृत तत्त्व की ओर ले जाता है। वहाँ प्रेम सामाजिक या नैतिक संकट में नहीं है; वह ब्रह्मांडीय लय का हिस्सा है। उससे अलग अशोक वाजपेयी की इस कविता में चुम्बन इस दिव्यता से स्वभावत: वंचित है, लेकिन वह अर्थहीन नहीं। वह जड़ता को तोड़कर सृजन का आत्मविश्वास देता है। एक में प्रेम भक्ति है, दूसरे में प्रेम की चेतना का जागरण है । यहीं टी. एस. एलियट की स्थापना—किसी कवि या कलाकार का केवल अपने आप में कोई अर्थ नहीं होता (No poet, no artist has his complete meaning alone)—पूरी तरह अर्थवान हो जाती है। अशोक वाजपेयी की कविता को यदि अकेले पढ़ा जाए, तो वह केवल एक आधुनिक एवं उत्तर-आधुनिक रचनाकार का निजी अनुभव प्रतीत हो सकती है। लेकिन जब ‘पहला चुंबन’ कविता भागवत महापुराण के गोपी-गीत के साथ ही निराला, दिनकर ,नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल आदि कवियों की काव्यपंक्तियों के साथ संवाद में आती है, तो उसका अर्थ गहराता है। निराला की ‘जुही की कली’ की ‘नायक ने चूमे कपोल /डोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल’ पंक्ति में चुम्बन प्रकृति में तरंग पैदा करता है। प्रेम यहाँ लय है, विस्तार है, उत्सव है। निराला के दूसरे गीत ‘स्पर्श से लाज लगी’ में चुम्बन से चकित होने के उपरान्त चंचल हुई स्त्री बहुसुख छल करती है और अंतत: प्रियतम के उर से लगी उसके कंठ से वासना का अमृत चूसती उसे नि:शेष करती वर्णित की गयी है : ‘स्पर्श से लाज लगी/ अलक पलक में छिपी छलक उर में नवराग जगी/चुम्बन चकित चतुर्दिक चंचल /हेरफेर कर मुख बहु सुख छल/ मौन पान करती अधरासव/ कंठ लगी उरगी’ । निराला के यहाँ प्रेम आत्मविश्वासपूर्ण है, सामाजिक भय से अपेक्षाकृत मुक्त। इसके विपरीत अशोक वाजपेयी की ‘पहला चुंबन’ कविता में प्रेम संकोच और जोख़िम से घिरा है। यह हमारे समय की जटिलता का सबूत है। दिनकर की ‘उर्वशी’ में चुम्बन का स्वरूप एक ख़ास तरह के पौरुष-दीप्त-जयी-भाव वाले प्रेम के अंतर्गत निर्मित है। यहाँ प्रेम दिव्य है, विद्युतमय है, चेतना को झकझोरने वाला है। दिनकर के यहाँ प्रेम मुक्तिदायी और तन-मन की ग्रंथियों को खोलने वाला है। ‘उर्वशी’ में काम और अध्यात्म के बीच का सनातन द्वन्द्व अकुंठ रूप में प्रस्तुत हुआ है : ‘परिरंभ पाश में बंधे हुए उस अम्बर तक उठ जाओ रे /देवता प्रेम का सोया है चुंबन से उसे जगाओ रे’। इनसे विलग केदारनाथ अग्रवाल की कविता में प्रेम विदा की अंतिम वेला में भी जीवन का संचार करता है और चुम्बन मृत्युविजेता बन जाता है : ‘जाते जाते मृत्यु विजेता चुंबन देकर देकर जाओ/ जाओ ! लेकिन आत्मगंध दे जाओ’ । हिन्दी कविता में एक मुखर स्वर वह भी रहा है जहाँ नागार्जुन जैसे जनकवि ने उन तमाम क्रातिकारी मुक्तिदाताओं का आह्वान करते हुए लिखा था : “मैं तुम्हारा ही पता लगाने के लिए/घूमता फिर रहा हूँ/सारा-सारा दिन; सारी-सारी रात।/आगामी युगों के मुक्ति सैनिक, कहाँ हो तुम?/निपीड़ित-शोषित मानवता के उद्घारक, कहाँ हो तुम?/ आओ, सामने आओ बेटे!/मैं तुम्हारा चुम्बन लूँगा/मैं तुम्हें अपना चुम्बन दूँगा।’

इन सारे ‘टेक्स्ट’ को साथ रखकर देखने पर स्पष्ट होता है कि हिंदी कविता में ‘चुम्बन’ केवल शृंगार का उपकरण नहीं, बल्कि चेतना-परिवर्तन का प्रतीक भी रहा है। भागवत महापुराण के ‘गोपी गीत’ में वह दिव्य, निराला में वह प्रकृति की लय, केदारनाथ अग्रवाल में जीवनी-शक्ति, दिनकर में विद्युतमय स्पर्श, नागार्जुन के यहाँ क्रांतिकारियों के प्रति अगाध ममता और अशोक वाजपेयी में जड़ता को तोड़ने वाली सृजनात्मक संभावना है। स्त्रीवादी दृष्टि से इस पूरे विमर्श को देखने पर एक और महत्त्वपूर्ण परत खुलती है। पारंपरिक प्रेम-काव्य में स्त्री प्रायः प्रेम का विषय होती है, कर्ता नहीं। लेकिन अशोक वाजपेयी के यहाँ प्रेम का अनुभव पारस्परिक है। यद्यपि कविता में स्त्री की आवाज़ प्रत्यक्ष नहीं है, लेकिन चुम्बन का अनुभव साझा कंपन है। सिमोन द बोउवार ने कहा था कि प्रेम स्त्री के लिए तभी सार्थक हो सकता है, जब वह आत्म-विसर्जन न होकर आत्म-विस्तार बने। ‘पहला चुम्बन’ कविता में प्रेम आत्म-विस्तार है—“मैं फूल खिला सकता हूँ।” यह फूल केवल कविता का नहीं, संबंध का भी है। प्रेम यहाँ अधीनता नहीं, सृजन की साझी संभावना है। विवेच्य कविता बताती है कि आधुनिक समय में प्रेम सहज नहीं, लेकिन असंभव भी नहीं। वह पत्थर में भी फूल खिला सकता है।

इस कविता पर जीवविज्ञान और मनोविज्ञान के मिलेजुले सिद्धांतों के आलोक में और गहराई से विचार किया जा सकता है। जीव-मनोविज्ञान यह मानता है कि चुम्बन केवल सांस्कृतिक व्यवहार नहीं है, बल्कि इसमें गहरे जैविक संकेत निहित होते हैं। हेलेन फिशर जैसे विकासवादी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार चुम्बन अनुकूलता की जाँच का माध्यम भी होता है। पहला चुम्बन तंत्रिका-तंत्र में तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। अशोक वाजपेयी की कविता में जो ‘काँपना’ है, वह केवल सामाजिक संकोच का नहीं, बल्कि इस जैविक उथल-पुथल का भी सूक्ष्म संकेत हो सकता है। इसी कारण कवि कह पाता है—“मैं फूल खिला सकता हूँ।” यह सृजन-बोध केवल सांस्कृतिक नहीं, जैविक आत्म-पुष्टि से भी जुड़ा है। अब यदि हम विश्व-कविता के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो ‘पहला चुंबन’ एक सार्वभौमिक अनुभव है। शेली की कविता ‘Love’s Philosophy’ में चुम्बन सहज है, लगभग प्राकृतिक नियम की तरह। इसके विपरीत अशोक वाजपेयी का चुम्बन सामाजिक-संघर्ष से भरा है। ई. कमिंग्स की कविता में भी प्रेम आत्म-विस्तार है। पाब्लो नेरुदा की कविताओं में पहला चुम्बन देह और पृथ्वी के बीच संवाद बन जाता है और यह निराला की वनवेला कविता की एक पंक्ति का स्मरण करता है : “प्रतिपल पुलकित व्याकुल कर भर चूमता रसा को बार-बार चुम्बित दिनकर”। जापानी कविता में यह प्रायः संकेतात्मक होता है। फ्रांसीसी कविता में, विशेषकर पॉल एलुआर के यहाँ चुम्बन वस्तुत: स्वतंत्रता और प्रतिरोध का प्रतीक भी बन जाता है। अशोक वाजपेयी की कविता में यह प्रतिरोध बेहद शांत और लगभग आंतरिक होने के बावजूद बेशक मौजूद है—पत्थर में फूल खिलाना स्वयं में एक प्रतिरोध है।

अंत में, इस विमर्श को रोलां बार्थ की पुस्तक ‘ए लवर्स डिस्कोर्स’ (A Lover’s Discourse) के सूत्रों से पूर्णता मिल सकती है। बार्थ प्रेम को संकेतों से बनी एक भाषा मानते हैं। अशोक वाजपेयी की कविता में ‘काँपना’ और ‘जुड़ना’ ऐसे ही संकेत हैं जो किसी भी लिखित शब्द से अधिक प्रभावशाली हैं। बार्थ की शब्दावली उधार लेकर कहें तो ‘पहला चुम्बन’ कविता भाषा के अंत और अनुभव के आरंभ की सीमा पर खड़ी है।

वस्तुत: अशोक वाजपेयी की ‘पहला चुम्बन’ कविता केवल व्यक्तिगत स्मृति नहीं, बल्कि जीव-मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया, सामाजिक संरचना, सत्ता-निगरानी, सौंदर्यात्मक अनावृत्ति और वैश्विक काव्य-परंपरा—इन सबके ‘संगम’ का क्षण है। यह कविता प्रेम को न तो महिमामंडित करती है, न उसका सरलीकरण करती है। वह प्रेम को एक जटिल मानवीय अनुभव के रूप में देखती है—जहाँ जीव-मनोविज्ञान, समाज और सौंदर्य एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। और, शायद इसी कारण यह कविता यह कह पाने में सक्षम होती है कि ‘पहला चुम्बन’ केवल किसी और को पाने का क्षण नहीं, बल्कि स्वयं को सृजनशील रूप में पहचानने का क्षण है। कवि के शब्दों में कहें तो यह पत्थर के भीतर छिपे फूल को देख लेने का क्षण है ।

‘पहला चुम्बन’ कविता के इस व्यापक विश्लेषण को अब हम इसके चरम तार्किक और दार्शनिक निष्कर्ष की ओर ले जाते हुए हम ज्यां-पॉल सार्त्र की ‘दृष्टि’ (The Gaze) और जाक लाकां के ‘अभाव’ (The Lack) के सिद्धांतों को जोड़कर यह देखेंगे कि कैसे यह कविता केवल प्रेम की नहीं, बल्कि अस्तित्व की पुनर्रचना की भी कविता है। अस्तित्ववादी विचारक ज्यां-पॉल सार्त्र के अनुसार जब कोई दूसरा हमें देखता है, तो उसकी ‘दृष्टि’ (The Gaze) हमें एक ‘वस्तु’ (Object) में बदल देती है। समाज की नैतिक और दंडात्मक दृष्टि ने आधुनिक मनुष्य को एक ‘पत्थर’ बना दिया है—एक ऐसी वस्तु जो सामाजिक नियमों के सांचे में ढली हुई और जड़ है। कविता की शुरुआत में ‘एक जीवित पत्थर’ वस्तुतः इसी सार्त्रियन बोध का प्रतीक है, जहाँ मनुष्य की स्वतंत्रता सामाजिक निगरानी के पत्थर तले दबी हुई है। परंतु, कविता में चुम्बन का क्षण इस ‘वस्तूकरण’ (Objectification) के विरुद्ध एक विद्रोह है। सार्त्र मानते थे कि प्रेम में हम अपनी ‘वस्तु’ वाली स्थिति से उबरकर पुनः ‘कर्ता’ (Subject) बनने का प्रयास करते हैं। जब अशोक वाजपेयी कविता में ‘काँपकर जुड़ गईं’ जैसा प्रयोग करते हैं , तो वह ‘कंपन’ उस सामाजिक ‘दृष्टि’ के टूटने का क्षण है। चुम्बन यहाँ वह ‘प्राइवेट स्पेस’ निर्मित करता है जहाँ समाज की बाहरी आँखें बेअसर हो जाती हैं। इस कविता में ‘पत्थर’ का ‘जीवित’ होना वस्तुतः अपनी खोई हुई मानवीय गरिमा और स्वतंत्रता को पुनः प्राप्त करना है।

मनोविश्लेषक जाक लाकां का मानना था कि इच्छा (Desire) हमेशा एक ‘अभाव’ (Lack) से पैदा होती है। मनुष्य हमेशा उस चीज़ की तलाश में रहता है जो उसके पास नहीं है। कविता में ‘फूल’ उस सृजनात्मक पूर्णता का प्रतीक है जिसका अभाव ‘पत्थर’ (जड़ जीवन) में था।जब वाचक अंत में कहता है, ‘मैंने देखा : / मैं फूल खिला सकता हूँ’, तो यह केवल एक उपलब्धि नहीं है, बल्कि लाकां के शब्दों में ‘रियल’ (The Real) से साक्षात्कार है। चुम्बन ने उस शून्य या अभाव को भर दिया है जिसने वाचक को अब तक यह महसूस करने से रोका था कि वह एक ‘सर्जक’ है। लाकां के अनुसार, भाषा अक्सर हमारे अनुभवों को सीमित कर देती है, लेकिन कविता में आया ‘पहला चुम्बन’ भाषा के पार का अनुभव है जो वाचक को अपनी ‘पोटेंसी’ (शक्ति) का एहसास कराता है। इस कविता में ‘फूल’ उस इच्छा का मूर्त रूप है जो अब अभाव से मुक्त होकर सृजन में बदल चुकी है।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ‘पहला चुम्बन’ हिंदी साहित्य की उन विरल कविताओं में से है जो पिंड में ब्रह्माण्ड समेटे हुए है। इसकी वैचारिक यात्रा का समाहार करते हुए निवेदन है कि सामाजिक आयाम के नज़रिए से अगर यह कविता ‘फ्रंट स्टेज’ की कठोरता को तोड़कर ‘बैक स्टेज’ की मानवीय तरलता को प्राप्त करने का उपक्रम है, तो इसका दार्शनिक आयाम चेतना का जड़ता (पत्थर) से सक्रियता (फूल) की ओर प्रस्थान के चित्रण में निहित है।प्रकारांतर से यह कविता सामाजिक वस्तूकरण के विरुद्ध ‘स्व’ की स्थापना की तरफ़दारी करती है।सौंदर्यशास्त्रीय दृष्टि से यह यांत्रिक समय के बीच एक ‘आभा’ युक्त क्षण की खोज है, जो संकेतों की भाषा (कंपन) के माध्यम से घटित होती है,तो इसका मनोवैज्ञानिक आयाम उजागर करता है कि कैसे यह ‘संक्रमणकालीन क्षेत्र’ में घटित होने वाला वह अनुभव है जो मनुष्य के भीतर के ‘अभाव’ को सृजन की ‘संभावना’ में बदल देता है।

कुल मिलाकर अशोक वाजपेयी ‘पहला चुंबन’ कविता के रचनाकार के रूप में एक ऐसे आधुनिक कवि के रूप में उभरते हैं जो देह के एक सूक्ष्म स्पर्श को ब्रह्मांडीय और सृजनात्मक सत्य से जोड़ने में समर्थ है। यह कविता बगैर कोई सिद्धांत बघारे इज़हार करती है कि प्रेम केवल दो शरीरों का मिलन नहीं, बल्कि वह ऐसा उत्प्रेरक (Catalyst) है ,जो मनुष्य को उसकी आंतरिक मृतप्राय अवस्था (पत्थर) से उबारकर जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता—सृजन—की परिधि में ले आता है।

(नौ )

आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न

वृक्ष एक शरीर है
पृथ्वी के शरीर से उगता हुआ और अटूट

फूल तभी तक फूल है जब तक वह एक अंग है वृक्ष का
और पत्तियाँ तभी तक पत्तियाँ जब तक वे वृक्ष से ही लगी हैं

जब तक तुम साधे हो उसके शरीर को
तभी तक

उसकी आत्मा भी तुमसे अटूट है
आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न देखती है ।

अशोक वाजपेयी की कविता ‘आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न’ आकार में जितनी संक्षिप्त है, अपनी वैचारिक सघनता और दार्शनिक विस्तार में उतनी ही विराट है। समकालीन संकट और काव्यात्मक प्रत्युत्तर देती यह कविता केवल शब्दों का विन्यास नहीं है, बल्कि यह उस सभ्यतागत संकट का एक तीखा साक्षात्कार है जहाँ मनुष्य ने विज्ञान और तर्क के नाम पर स्वयं को प्रकृति, परिवेश और यहाँ तक कि अपनी ही देह से विलग कर लिया है। आधुनिक युग का मनुष्य एक ऐसे ‘खंडित बोध’ में जी रहा है जहाँ वह देह को केवल एक उपभोग्य मशीन और आत्मा को एक दूरस्थ, अमूर्त कल्पना मानता है। वाजपेयी की यह कविता इसी विभाजन (Dichotomy) पर प्रहार करती है और एक ‘अखंड जीव-दृष्टि’ का प्रस्ताव रखती है।
कविता का पाठ अत्यंत सरल बिम्बों से शुरू होता है, लेकिन इसकी अनुगूँज वैश्विक है। इस कविता को पढ़ते हुए ऐसा प्रतीत होता है मानो कवि किसी समकालीन खिड़की से नहीं, बल्कि सभ्यता की पूरी स्मृति के झरोखे से बात कर रहा हो। यहाँ ‘वृक्ष’, ‘पृथ्वी’, ‘देह’ और ‘आत्मा’ चार ऐसे खंभे हैं जिन पर संपूर्ण दार्शनिक प्रासाद खड़ा है। जब कवि कहता है कि ‘वृक्ष एक शरीर है’, तो वह वनस्पति जगत को केवल ‘वस्तु’(ऑब्जेक्ट’) मानने की वैज्ञानिक जड़ता को तोड़ देता है। वह वृक्ष को चेतना (‘सब्जेक्ट’) के रूप में प्रतिष्ठित करता है। यह विचार आधुनिक इको-क्रिटिसिज्म (Ecocriticism) के उन सिद्धांतों से मेल खाता है जो प्रकृति को ‘सक्रिय कर्ता’ (Active Agent) मानते हैं। टिमोथी मॉर्टन जैसे विचारकों ने जिस ‘डार्क इकोलॉजी’ की बात की है, वह बताती है कि प्रकृति हमसे अलग कोई दृश्य नहीं है, बल्कि हम उसके भीतर ‘अंतर्ग्रथित’ (Intermeshed) हैं। कवि द्वारा प्रयुक्त ‘अटूट’ शब्द इसी अंतर्ग्रथन का काव्यात्मक साक्ष्य है।
इस कविता का वैचारिक नाभिकीय बिंदु भारतीय औपनिषदिक चिंतन में गहराई से धँसा हुआ है। भारतीय मनीषा ने कभी भी आत्मा और शरीर को दो ऐसे शत्रुओं के रूप में नहीं देखा जो एक-दूसरे को नष्ट करना चाहते हों। इसके विपरीत, यहाँ देह को ‘ब्रह्म’ की ही प्रथम अभिव्यक्ति माना गया है।
तैत्तिरीय उपनिषद (2.1) का प्रसिद्ध मंत्र है: ‘अन्नाद् वै प्रजाः प्रजायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद् विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्म ‘॥
यहाँ ‘अन्न’ का अर्थ केवल भोजन नहीं, बल्कि ‘भौतिक शरीर’ है। उपनिषद कहता है कि ब्रह्म की खोज अन्न (शरीर) से ही शुरू होती है। विवेच्य कविता में जब कवि कहता है कि ‘वृक्ष एक शरीर है’, तो वे वास्तव में वृक्ष को ‘अन्नमय ब्रह्म’ के रूप में देख और दिखा रहा होता है ।जाहिर है कि अगर आधार (शरीर) नहीं होगा, तो अभिव्यक्ति (आत्मा) कहाँ घटेगी? यह कविता देह को वह ‘पवित्र स्थल’ मानती है जहाँ चेतना अपना आकार ग्रहण करती है।
मुंडक उपनिषद (3.1.1) का एक मंत्र इस कविता के लिए सबसे सटीक दार्शनिक आधार प्रस्तुत करता है:

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्य् अनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥

(एक ही वृक्ष पर दो पक्षी—जीवात्मा और परमात्मा—साथ रहते हैं। एक फल भोगता है, दूसरा साक्षी रहता है।)

‘आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न’ कविता इस रूपक को एक नया विस्तार देती है। उपनिषद में वृक्ष ‘आधार’ है, पक्षी ‘चेतना’ हैं। अशोक वाजपेयी इसी जुड़ाव को ‘अटूट’ कहते हैं। जब तक पक्षी (आत्मा) उस वृक्ष (शरीर) पर स्थित है, तभी तक वह ‘सखा’ है। यदि वृक्ष कटेगा, तो पक्षी का अस्तित्व भी संकट में पड़ जाएगा। विवेच्य कविता में कवि द्वारा प्रयुक्त ‘साधना’ शब्द इसी पक्षी और वृक्ष के बीच के ‘संतुलन’ की मांग करता है। बृहदारण्यक उपनिषद (3.7.3) में आत्मा को ‘अंतर्यामी’ कहा गया है: “ यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो… एष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥ (जो पृथ्वी में स्थित है, पृथ्वी के भीतर है, जिसे पृथ्वी नहीं जानती… वह तुम्हारा अंतर्यामी आत्मा है।)
‘आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न’ कविता का रचनाकार जब कहता है कि “वृक्ष पृथ्वी के शरीर से उगता हुआ और अटूट है”, तो प्रकारांतर से वह इसी ‘अंतर्यामी’ तत्त्व की ओर संकेत करता है। पृथ्वी का शरीर ही वह गर्भ है जहाँ से वृक्ष (देह) और आत्मा एक साथ जन्म लेते हैं। यहाँ अलगाव की कोई
गुंजाइश नहीं है।

श्रीमद्भगवदगीता (13.2) में शरीर को ‘क्षेत्र’ और आत्मा को ‘क्षेत्रज्ञ’ कहा गया है:

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रम् इति अभिधीयते।
एतत् यः वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तत् विदः॥
क्षेत्रज्ञं च अपि मां विद्धि सर्व क्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्र क्षेत्रज्ञयो ज्ञानं यत् तत् ज्ञानं मतं मम॥
(हे कुन्तीपुत्र (अर्जुन)! यह शरीर ‘क्षेत्र’ (खेत) के नाम से कहा जाता है और जो इस शरीर को जानता है (इसका अनुभव करता है), उसे इसके तत्व को जानने वाले विद्वान ‘क्षेत्रज्ञ’ (जानने वाला) कहते हैं। हे भरतवंशी (अर्जुन)! तू सब क्षेत्रों में ‘क्षेत्रज्ञ’ (जीवात्मा) भी मुझे ही जान। इस प्रकार क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) को जो तत्व से जानना है, वही मेरे मत में वास्तविक ज्ञान है।)
अक्सर दार्शनिकों ने ‘क्षेत्र’ (शरीर) को तुच्छ माना, लेकिन कृष्ण स्पष्ट करते हैं कि बिना ‘क्षेत्र’ के ‘क्षेत्रज्ञ’ का कोई प्रयोजन नहीं है। अशोक वाजपेयी की कविता इसी प्रयोजन की कविता है। कविता में कहा गया है कि ‘आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न देखती है।’ यहाँ स्वप्न ही वह ‘प्रयोजन’ है जो क्षेत्र (शरीर) के बिना अधूरा है।
कठोपनिषद (1.3.3-4) का ‘रथ-रूपक’ भारतीय दर्शन के सबसे शक्तिशाली और प्रसिद्ध उदाहरणों में से एक है। यह मनुष्य के अस्तित्व, उसकी इंद्रियों और बुद्धि के अंतर्संबंधों को एक रथ के माध्यम से समझाता है: “आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च॥ इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्। आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः”॥ इस रूपक में जीवन की यात्रा को एक रथ के संचालन के समान बताया गया है। आत्मा ‘रथी’ है, यानी वह स्वामी जो रथ में बैठा है। इसका अपना कोई कर्म नहीं है, यह केवल गंतव्य तक जाने वाला यात्री है। यह शरीर ही वह ‘रथ’ है जिसके माध्यम से जीवन की यात्रा संपन्न होती है। बुद्धि वह चालक या ‘सारथि’ है जिसे यह तय करना है कि रथ किस दिशा में जाएगा। विवेकपूर्ण बुद्धि ही सही मार्ग का चयन कर सकती है। मन वह ‘लगाम’ है जो सारथि (बुद्धि) के हाथ में होती है। यदि लगाम ढीली हो या सारथि के नियंत्रण में न हो, तो रथ मार्ग से भटक जाता है। हमारी पाँचों इंद्रियाँ (आँख, कान, आदि) वे ‘घोड़े’ हैं जो रथ को खींचते हैं। यदि ये घोड़े प्रशिक्षित न हों, तो वे रथ को कहीं भी ले जा सकते हैं। संसार के रूप, रस, गंध आदि वे मार्ग हैं जिन पर इंद्रिय रूपी घोड़े दौड़ते हैं। जाहिर है कि इस रूपक का मुख्य संदेश ‘आत्म-नियंत्रण’ है। यदि बुद्धि (सारथि) सो जाए या मन (लगाम) पर नियंत्रण खो दे, तो इंद्रियाँ (घोड़े) अपनी मर्जी से विषयों की ओर भागने लगेंगी और रथी (आत्मा) कभी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाएगा।
कठोपनिषद का रथ-रूपक और अशोक वाजपेयी की ‘आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न’ कविता एक-दूसरे के पूरक और कुछ स्तरों पर एक-दूसरे के सुंदर विरोधाभास के रूप में देखे जा सकते हैं। उपनिषद में शरीर को एक रथ माना गया है जो आत्मा के लक्ष्य प्राप्ति का साधन मात्र है, यहाँ शरीर और आत्मा के बीच एक स्पष्ट पदानुक्रम है जहाँ आत्मा स्वामी है और शरीर उसका वाहन। लेकिन अशोक वाजपेयी की कविता इस अलगाव को मिटाकर एक नई जैविक दृष्टि प्रदान करती है। कवि जब कहता है कि वृक्ष एक शरीर है जो पृथ्वी के शरीर से ‘अटूट’ है, तो वह उपनिषद के उस विचार को विस्तार देता प्रतीत होता है जहाँ शरीर केवल जड़ पदार्थ नहीं, बल्कि जीवंत संबंधों का एक जाल है। उपनिषद में इंद्रियों को घोड़े और मन को लगाम कहा गया है जिसका लक्ष्य नियंत्रण है, जबकि अशोक वाजपेयी की कविता में नियंत्रण के स्थान पर ‘साधने’ और ‘अटूट जुड़ाव’ की बात है। कठोपनिषद के रूपक में यदि सारथि बुद्धि है और लगाम मन, तो वाजपेयी की कविता में यह ‘साधना’ उस देखभाल या ‘केयर’ की तरह है जो शरीर और आत्मा को एक-दूसरे से विमुख नहीं होने देती। उपनिषद कहता है कि आत्मा रथ में बैठा रथी है, पर विवेच्य कविता में आत्मा शरीर का ही एक अनंत स्वप्न है—अर्थात आत्मा शरीर से अलग होकर कहीं बाहर से नहीं आई है, बल्कि वह शरीर की ही गहराई से उपजी एक निरंतरता है। यदि उपनिषद का ‘रथ-रूपक’ मनुष्य को उसकी आंतरिक व्यवस्था को समझने का अनुशासन देता है, तो अशोक वाजपेयी की कविता उस अनुशासन को एक रागात्मक संबंध में बदल देती है। उपनिषद के अनुसार जब इंद्रियाँ वश में होती हैं तब रथी अपने पद को प्राप्त करता है, वहीं कविता में स्पष्ट कहा गया है कि जब तक मनुष्य प्रकृति के शरीर को साधे रहता है, तभी तक उसकी आत्मा भी उस विराट अस्तित्व से अटूट बनी रहती है। इस प्रकार, जहाँ कठोपनिषद शरीर को एक उपकरण मानकर उसे पार करने की प्रेरणा देता है, वहीं अशोक वाजपेयी की कविता उसे पृथ्वी के साथ एक अटूट इकाई मानकर उसके भीतर ही आत्मा की अनंतता खोजने का प्रस्ताव रखती है।
याद रहे कि अशोक वाजपेयी की कविता केवल भारतीय मनीषा का पुनरुत्थान नहीं है, बल्कि यह पश्चिमी आधुनिकता के उस ‘द्वैतवादी घाव’ को भरने का प्रयास भी है, जिसे फ्रांसीसी दार्शनिक रेने डेसकार्टेस (René Descartes, 1596-1650) के दर्शन (Mind-Body Dualism) ने मानव चेतना पर थोप दिया था। उनका मन-शरीर द्वैतवाद (Mind-Body Dualism) इस विचार पर आधारित है कि मनुष्य मन (चेतना) और शरीर (पदार्थ) जैसे दो पूरी तरह से अलग और स्वतंत्र तत्वों से मिलकर बना है।डेसकार्टेस ने अस्तित्व को दो श्रेणियों में विभाजित किया है। उनके अनुसार चिंतनशील तत्त्व मन या आत्मा है। इसकी मुख्य विशेषता सोचना है। यह निराकार है, स्थान नहीं घेरता और अविभाज्य है। डेसकार्टेस का प्रसिद्ध सूत्र “Cogito, ergo sum” (मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ) इसी तत्व की पुष्टि करता है। उनका कहना है कि चिंतनशील मन से विलग विस्तारित तत्त्व शरीर या भौतिक पदार्थ है। इसकी मुख्य विशेषता स्थान घेरना (Extension) है। यह जड़ है, यंत्रवत है और इसे विभाजित किया जा सकता है। डेसकार्टेस शरीर को एक जटिल मशीन मानते थे। उनके अनुसार, शरीर के अंग (हृदय, मांसपेशियां, तंत्रिकाएं) वैसे ही काम करते हैं जैसे घड़ी के गियर। वहीं, मन वह तत्त्व है जो तर्क करता है, इच्छा करता है और अनुभव करता है। उनके लिए पशु केवल “स्वचालित यंत्र” (Automata) थे क्योंकि उनमें ‘रेस कोजिटन्स’ (मन) का अभाव था, जबकि मनुष्य विशिष्ट है क्योंकि उसके पास मशीन रूपी शरीर के साथ विवेकशील मन भी है। उनके लिए एक बड़ा प्रश्न यह था कि यदि मन और शरीर दो अलग चीजें हैं, तो वे एक-दूसरे को प्रभावित कैसे करते हैं? (जैसे: सुई चुभने पर मन को दुःख क्यों होता है?) डेसकार्टेस ने इसका समाधान मस्तिष्क के भीतर स्थित पीनियल ग्रंथि में खोजा। उन्होंने माना कि यही वह स्थान है जहाँ आत्मा और शरीर का मिलन होता है और यहीं से आत्मा शरीर की ‘मशीन’ को संचालित करती है।
कैरोलिन मर्चेंट ने डेसकार्टेस के इस दर्शन की कड़ी आलोचना करते हुए लिखा है कि डेसकार्टेस ने प्रकृति और शरीर को “निर्जीव मशीन” घोषित करके उनके शोषण का रास्ता खोल दिया। जब हम प्रकृति को केवल ‘पदार्थ’ (Res Extensa) मानते हैं, तो उससे हमारा भावनात्मक संबंध टूट जाता है। अशोक वाजपेयी की ‘आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न’ कविता भी डेसकार्टेस के इस विभाजन को नकारती है। जहाँ डेसकार्टेस मन और शरीर को अलग करते हैं, अशोक वाजपेयी उन्हें ‘अटूट’ मानते हैं। उनके लिए आत्मा शरीर से अलग कोई ‘रथी’ नहीं है, बल्कि शरीर के भीतर का ही एक स्वप्न है।
जब कवि कहता है कि ‘आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न देखती है’, तो कविता की यह भावभूमि सीधे तौर पर मार्टिन हाइडेगर (Martin Heidegger : 1889-1976) के ‘Dasein’ (संसार-में-होना) की विचार-भूमि के निकट खड़ी दिखाई देती है । हाइडेगर के अनुसार, मनुष्य का अस्तित्व कोई अमूर्त सत्ता नहीं है, बल्कि वह सदैव ‘होने’ (Being) की स्थिति में है। वे लिखते हैं: “The body is not a thing, but a site of existence.” अशोक वाजपेयी की कविता में आया वृक्ष इसी ‘अस्तित्व के स्थल’ (Site of existence) का बिम्ब है। हाइडेगर के यहाँ अस्तित्व का अर्थ है—संसार के साथ जुड़ा होना। अशोक वाजपेयी इसे ‘अटूट’ कहते हैं।इस बिदु पर इक्कीसवीं सदी के हिन्दी कवि की अपनी पिछली पीढ़ी के महान दार्शनिक से एक सूक्ष्म और दिलचस्प बहस शुरू होती है। हाइडेगर जहाँ मनुष्य को संसार में ‘फेंका हुआ’ (Thrownness) मानते हैं, वहीं अशोक वाजपेयी के यहाँ मनुष्य (या वृक्ष) पृथ्वी से ‘उगता हुआ’ है।गौरतलब है कि ‘फेंके जाने’ में एक विवशता होती है, जबकि ‘उगने’ में एक जैविक उल्लास और सृजनशीलता हुआ करती है।इस प्रकार अशोक वाजपेयी की कवि-दृष्टि हाइडेगर की ‘चिंता’ (Sorge) को ‘साधना’ में बदल देती है।उल्लेखनीय है कि विवेच्य कविता में ‘साधना’ केवल जीने की विवशता नहीं, बल्कि आत्मा के ‘अनंत स्वप्न’ को देह में उतारने की कला है।
इस विमर्श में जब हम जॉक देरिदा (Jacques Derrida) के ‘विखंडन’ (Deconstruction) को लाते हैं, तो अशोक वाजपेयी की कविता एक प्रति-उत्तर की तरह उभरती है। देरिदा ने पश्चिमी दर्शन की ‘उपस्थिति की पारभौतिकी’ (Metaphysics of Presence) की आलोचना करते हुए लिखा है कि सत्य हमेशा भाषा के चिह्नों में ‘स्थगित’ रहता है। लेकिन अशोक वाजपेयी की कविता में ‘उपस्थिति’ (Presence) अत्यंत प्रखर है। जब कवि कहता है कि “फूल तभी तक फूल है जब तक वह अंग है वृक्ष का”, तो वह अर्थ को भाषा में नहीं, बल्कि ‘संबंध’ (Connection) में ढूँढ रहा होता है।दूसरे शब्दों में देरिदा के यहाँ विखंडन है, अशोक वाजपेयी के यहाँ ‘संयोजन’ है। देरिदा जहाँ संबंधों को भाषा के भीतर संदिग्ध मानते हैं, अशोक वाजपेयी उन्हें ‘अटूट’ कहकर भाषा के पार ले जाते हैं। प्रकारांतर से यह कविता देरिदा के ‘स्थगन’ का उत्तर ‘स्वप्न’ से देती है—स्वप्न, जो अधूरा होकर भी उपस्थित है।
फ्रेडरिक नीत्शे (Friedrich Nietzsche) ने जिस ‘देहवाद’ (Corporality) की बात की थी , वाजपेयी की कविता उसका परिष्कृत रूप प्रतीत होती है। नीत्शे ने कहा था: “मैं पूर्णतः शरीर ही हूँ और इसके अतिरिक्त कुछ नहीं; और आत्मा तो शरीर के ही किसी हिस्से (या पक्ष) के लिए प्रयुक्त एक शब्द मात्र है।” (“Body am I entirely, and nothing else; and soul is only a word for something about the body.” : ‘Thus Spoke Zarathustra’,1892).याद रहे कि भारतीय चिंतन परम्परा में सर्वाधिक उल्लेखनीय ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता में महर्षि व्यास के मत और नीत्से के दर्शन की तुलना मनुष्य की सत्ता के दो विपरीत ध्रुवों का मिलन है जो चेतना और पदार्थ के द्वंद्व को स्पष्ट करती है। गीता का संपूर्ण दर्शन इस मूलभूत सत्य पर टिका है कि देह और देही दो पृथक तत्व हैं जैसा कि भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं “ विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति”। यहाँ देह को मात्र एक क्षेत्र या उपकरण माना गया है जबकि नीत्से के अनुसार देह ही वह पूर्ण समग्रता है जिसे हम वास्तविकता कह सकते हैं। नीत्से का यह कहना कि मैं पूर्णतः शरीर ही हूँ गीता के उस सिद्धांत को चुनौती देता है जहाँ आत्मा को नित्य और शरीर को अनित्य कहा गया है। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं “अंतवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत”। इस श्लोक के माध्यम से गीता प्रतिपादित करती है कि शरीर नाशवान है और इसके भीतर वास करने वाला शरीरि यानी आत्मा अविनाशी है। इसके विपरीत नीत्से की दृष्टि में आत्मा कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं बल्कि शरीर की ही एक जटिल अभिव्यक्ति या अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र है। जहाँ गीता क्षेत्रज्ञ को परमात्मा का अंश मानकर अंततः उसी में विलीन होने का मार्ग बताती है वहीं नीत्से का दर्शन व्यक्ति को अपनी शारीरिक प्रवृत्तियों और पृथ्वी के प्रति वफादार रहने का संदेश देता है। गीता में देह का तिरस्कार तो नहीं है परंतु उसे आध्यात्मिक उन्नति का साधन मात्र माना गया है जबकि नीत्से के लिए देह का स्वास्थ्य और उसकी शक्ति ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। गीता के अनुसार वास्तविक ज्ञान वह है जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को समझे जैसा कि कहा गया है ‘क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम’। परंतु नीत्से इस भेद को ही एक भ्रम मानते हैं और तर्क देते हैं कि जिसे हम आत्मा कहते हैं वह शरीर की ही महान बुद्धि का एक छोटा सा हिस्सा है। इस प्रकार गीता हमें इंद्रियातीत होने की प्रेरणा देती है जबकि नीत्से का दर्शन हमें पूर्णतः इंद्रियपरक और दैहिक होने की ओर ले जाता है। इन दोनों विचारधाराओं का टकराव वास्तव में कथित ‘शाश्वत चेतना’ और ‘नश्वर पदार्थ’ के बीच का वह विमर्श है जो सदियों से मानव चिंतन का केंद्र रहा है।
कवि अशोक वाजपेयी की रचना-दृष्टि महर्षि व्यास और नीत्शे, दोनों के चिन्तन के बीच सन्धिस्थल की तलाश करती प्रतीत होती है जिसके तहत वे नीत्से के भौतिकवाद को स्वीकार तो करते हैं, लेकिन उसे ‘अनंत’ की गहराई देते हैं। नीत्शे के यहाँ आत्मा शरीर की भाषा है, अशोक वाजपेयी के यहाँ शरीर आत्मा का स्वप्न है। यहाँ ‘स्वप्न’ शब्द नीत्शे के रूखे भौतिकवाद को एक रहस्यमय और आध्यात्मिक विस्तार प्रदान करता है।
विश्वकविता के परिप्रेक्ष्य में अशोक वाजपेयी की ‘आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न’ कविता पर विचार करने पर यह रचना हिन्दी को एक वैश्विक गौरव प्रदान करती है। वजह यह कि यहाँ रिल्के, व्हिटमैन और नेरुदा के साथ अशोक वाजपेयी का रचनात्मक संवाद एक ‘सिंफनी’ की तरह है। उदाहरण के लिए रिल्के की आध्यात्मिकता सदैव देह के माध्यम से ईश्वर को पुकारती है। वे अपनी कविता में कहते हैं: “ईश्वर, तुम क्या करोगे जब मैं मर जाऊँगा? / मैं तुम्हारा वस्त्र हूँ… मुझे खोकर तुम अपना अर्थ खो दोगे।” (What will you do, God, when I die? / I am your garb and your trade. / You lose your meaning, losing me,) वस्तुत: रिल्के और अशोक वाजपेयी के बीच एक ‘पारस्परिक निर्भरता’ की बहस है। रिल्के जहाँ आत्मा (ईश्वर) को शरीर (वस्त्र) पर आश्रित दिखाते हैं, वहीं वाजपेयी शरीर को आत्मा का ‘स्वप्न’ कहते हैं। रिल्के के यहाँ समर्पण का भाव अधिक है, जबकि अशोक जी के यहाँ ‘अटूट’ होने की शर्त अधिक महत्वपूर्ण है। रिल्के ईश्वर के लुप्त होने से डरते हैं, अशोक वाजपेयी जड़ों से कटने से डरते हैं। रिल्के की चिंता ‘आध्यात्मिक’ है, अशोक वाजपेयी की चिंता ‘पारिस्थितिक’ (Ecological) ।
वॉल्ट व्हिटमैन (Walt Whitman : 1819 से 1892 ) “Leaves of Grass” में संकलित ‘सॉंग ऑफ़ माइसेल्फ’ कविता में देह का उत्सव रचते हुए कहते हैं: “मैंने कहा है कि आत्मा शरीर से बढ़कर नहीं है, / और मैंने कहा है कि शरीर आत्मा से बढ़कर नहीं है।” (I have said that the soul is not more than the body, / And I have said that the body is not more than the soul,) जहाँ नीत्से शरीर को आत्मा से ऊपर रखते हैं और आत्मा को मात्र एक शब्द मानते हैं, वहीं व्हिटमैन एक संतुलन की बात करते हैं। उनका मानना है कि शरीर और आत्मा दोनों का महत्व बराबर है; न कोई ऊँचा है, न कोई नीचा। व्हिटमैन के लिए शरीर केवल एक भौतिक वस्तु नहीं है, बल्कि वह आत्मा की ही अभिव्यक्ति है। वे शरीर के अंगों और उसकी क्रियाओं को भी उतना ही पवित्र मानते हैं जितना कि आध्यात्मिक विचारों को। यह उनके ‘लोकतांत्रिक दर्शन’ का हिस्सा है, जहाँ वे सृष्टि की हर चीज़ को समान गरिमा देते हैं।
‘आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न’ कविता के सन्दर्भ में विचार करने पर स्पष्ट होता है कि व्हिटमैन और अशोक वाजपेयी के बीच यहाँ ‘सत्ता-मीमांसा’ (Ontology) की समानता है। लेकिन व्हिटमैन जहाँ ‘मैं’ (Individual) के माध्यम से देह का उत्सव मनाते हैं, अशोक वाजपेयी ‘वृक्ष’ के माध्यम से इस उत्सव को ‘साधने’ की क्रिया में बदल देते हैं। व्हिटमैन के लिए देह और आत्मा का मिलन एक ‘तथ्य’ है, अशोक वाजपेयी के लिए यह एक ‘साधना’ है। व्हिटमैन का स्वर उल्लासपूर्ण है, अशोक वाजपेयी का स्वर गंभीर और चेतावनी भरा है।
पाब्लो नेरुदा (Pablo Neruda) ने प्रकृति के साथ मनुष्य के आदिम और जैविक जुड़ाव को अपनी कविताओं का आधार बनाया है । वे लिखते हैं: “मैं वह जड़ हूँ जो अँधकारमयी पृथ्वी से रस पीती है।” (I am the root that drinks from the dark earth.)” नेरुदा और वाजपेयी के बीच ‘जड़ों’ की बहस बेहद दिलचस्प है। नेरुदा जहाँ ‘अंधकारमयी पृथ्वी’ (Dark Earth) से रस पीने की बात करते हैं,अशोक वाजपेयी ‘पृथ्वी के शरीर’ से उगने की बात करते हैं। नेरुदा में एक आदिम वेग (Primal Force) है, जबकि अशोक वाजपेयी में एक दार्शनिक ठहराव है। नेरुदा का मनुष्य प्रकृति के साथ संघर्षरत है, वाजपेयी का मनुष्य (वृक्ष) प्रकृति के साथ ‘अटूट’ है।
ख़लील जिब्रान (Kahlil Gibran:1883 से 1931) ने प्रकृति और कला के बीच के अद्भुत संबंध को दर्शाते हुए लिखा है :”वृक्ष वे कविताएँ हैं जिन्हें धरती आकाश पर लिखती है”।(Trees are poems that the earth writes upon the sky.) प्रकारांतर से ख़लील जिब्रान कहते हैं कि जैसे एक कवि अपने भीतर के भावों को कागज़ पर उतारता है, वैसे ही धरती अपने उल्लास और अपनी जीवंतता को वृक्षों के रूप में आकाश की नीलिमा पर अंकित करती है। उनके यहाँ वृक्ष केवल वनस्पति के बजाय ब्रह्मांड की रचनात्मकता का प्रमाण हैं। वे नीचे मिट्टी में जड़ें जमाकर ऊपर अनंत विस्तार (आकाश) की ओर बढ़ने की आकांक्षा का प्रतीक हैं। जिब्रान अक्सर प्रकृति को ईश्वर की भाषा मानते थे। उनके लिए एक वृक्ष का खड़ा होना किसी महाकाव्य की रचना होने जैसा ही पवित्र और कलात्मक था।
गौरतलब है कि अशोक वाजपेयी की ख़लील जिब्रान के साथ रचनात्मक बहस ‘अभिव्यक्ति’ बनाम ‘अनुभव’ की है। जिब्रान के लिए वृक्ष एक ‘परिणाम’ (कविता) है, अशोक वाजपेयी के लिए वृक्ष एक ‘प्रक्रिया’ (शरीर) है। जिब्रान सौंदर्य को बाहर से देखते हैं, अशोक वाजपेयी उसे भीतर के ‘स्वप्न’ के रूप में देखते हैं।
उपर्युक्त विमर्श से यह सिद्ध होता है कि अशोक वाजपेयी की कविता पश्चिमी दर्शन के ‘विखंडन’ और ‘शून्यवाद’ का उत्तर भारतीय ‘अद्वैत’ दर्शन और ‘साधना’ से देती है। सच तो यह है कि ‘आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न’ शीर्षक अशोक वाजपेयी की कविता नेरुदा के आवेग, व्हिटमैन के उल्लास और रिल्के की प्रार्थना को एक ही ‘पारिस्थितिक अद्वैत’ के सूत्र में पिरो देती है।

सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ, स्त्रीवादी पारिस्थितिकी (Eco-feminism), मार्क्सवादी द्वंद्व और बौद्ध शून्यता की उन गहराइयों में जाकर विचारने पर हाँ ‘आत्मा शरीर का अनंत’ कविता एक ‘वैश्विक घोषणापत्र’ का रूप लेती हुई प्रतीत होती है। अशोक वाजपेयी की कविता को इको-फेमिनिज़्म (Eco-feminism) के सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य में देखना आज के समय की अनिवार्य आवश्यकता है। इको-फेमिनिज़्म का मूल तर्क यह है कि जिस पितृसत्तात्मक और पूँजीवादी मानसिकता ने स्त्रियों का दमन किया, उसी मानसिकता ने प्रकृति को भी एक ‘निष्क्रिय वस्तु’ मानकर उसका दोहन किया। वंदना शिवा अपनी पुस्तक Staying Alive में तर्क देती हैं कि आधुनिक विज्ञान ने प्रकृति को एक जीवित इकाई से घटाकर केवल ‘कच्चे माल’ (Raw Material) में बदल दिया है।अशोक वाजपेयी की यह कविता ‘वृक्ष एक शरीर है’ सरीखे इसी यांत्रिक बोध के विरुद्ध एक महान जैविक विद्रोह प्रतीत होती है।
जब कवि वृक्ष को ‘शरीर’ कहता है, तो वह उसे गरिमा और स्वायत्तता प्रदान करता है। बीसवीं–इक्कीसवीं सदी की सुप्रसिद्ध अमेरिकी पर्यावरणविद, दार्शनिक ,विज्ञान की इतिहासकार और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर कैरोलीन मर्चेंट (Carolyn Merchant) ने अपनी प्रसिद्ध कृति “The Death of Nature: Women, Ecology, and the Scientific Revolution” (1980) में स्पष्ट किया है कि वैज्ञानिक क्रांति से पहले दुनिया को एक ‘जीवित जीव’ (Living Organism) के रूप में देखा जाता था। प्रकृति को ‘माता’ (Mother Earth) माना जाता था जो सबका भरण-पोषण करती है। लेकिन फ्रांसिस बेकन, रेने डेकार्ट और आइजैक न्यूटन जैसे विचारकों के आने के बाद, प्रकृति को एक ‘मशीन’ (Machine) की तरह देखा जाने लगा। जब प्रकृति को निर्जीव मशीन मान लिया गया, तो उसे बेरोकटोक नष्ट करने और उसके संसाधनों का दोहन करने का नैतिक रास्ता साफ हो गया। कवि अशोक वाजपेयी की ‘पृथ्वी का मंगल हो’ कविता को याद करें तो उस भावबोध को चिन्तन का रूप देते हुए प्रोफ़ेसर मर्चेंट ने यह स्थापित किया कि महिलाओं और प्रकृति का दमन एक ही मानसिकता से जुड़ा है। प्राचीन काल में प्रकृति की ‘मातृत्व’ छवि ने उसके अंधाधुंध दोहन पर एक नैतिक अंकुश लगा रखा था (क्योंकि कोई अपनी माँ का सीना नहीं चीरता)। वैज्ञानिक क्रांति ने प्रकृति को एक ‘वश में की जाने वाली स्त्री’ के रूप में चित्रित किया। उन्होंने दिखाया कि कैसे ‘प्रकृति पर विजय’ पाने की भाषा और महिलाओं पर नियंत्रण पाने की पितृसत्तात्मक भाषा एक जैसी थी।मिशेल फूको का नामोल्लेख किये बगैर वे बताती हैं कि आधुनिक विज्ञान ने ज्ञान को ‘शक्ति’ (Power) के रूप में परिभाषित किया। इस युग में वैज्ञानिक प्रयोगों का लक्ष्य प्रकृति के रहस्यों को ‘उजागर’ करना और उसे मानव की सुख-सुविधाओं के लिए पालतू बनाना हो गया। मर्चेंट के अनुसार, इसी बदलाव ने आज के पर्यावरण संकट (Ecological Crisis) की नींव रखी। उनका सुझाव है कि हमें फिर से उस ‘जैविक’ (Organic) दृष्टिकोण की ओर लौटने की ज़रूरत है जहाँ हम खुद को प्रकृति का स्वामी नहीं, बल्कि उसका एक हिस्सा समझें। वे एक ऐसे समाज की कल्पना करती हैं जहाँ पारिस्थितिकी संतुलन और लैंगिक समानता दोनों साथ-साथ चलें। जहाँ नीत्से और व्हिटमैन शरीर और अस्तित्व की बात कर रहे थे, वहीं कैरोलिन मर्चेंट हमें चेतावनी देती हैं कि यदि हमने प्रकृति को केवल एक निर्जीव वस्तु (Body without Soul) माना, तो हम अपने स्वयं के अस्तित्व के आधार को ही नष्ट कर देंगे।
अशोक वाजपेयी की कवि-दृष्टि और प्रोफ़ेसर कैरोलिन मर्चेंट के दार्शनिक चिंतन के बीच एक गहरा पारिस्थितिकीय संवाद दिखाई देता है जो आधुनिक जगत की यांत्रिक दृष्टि को चुनौती देता है। मर्चेंट जहाँ अपनी शोधपूर्ण स्थापनाओं में यह तर्क देती हैं कि वैज्ञानिक क्रांति ने प्रकृति को एक सजीव अंगी से बदलकर एक निर्जीव मशीन बना दिया वहीं अशोक वाजपेयी की ‘आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न’ कविता वृक्ष को एक जीवित और अटूट शरीर के रूप में प्रतिष्ठित कर इसी जैविक बोध को पुनर्जीवित करती है। कवि जब कहता है कि वृक्ष पृथ्वी के शरीर से उगता हुआ और उससे अटूट है, तो वे वास्तव में उसी प्राचीन भारतीय वैदिक विश्व- दृष्टि की याद दिलाता प्रतीत होता है जिसका समर्थन मर्चेंट करती हैं जहाँ प्रकृति को खंडों में नहीं बल्कि एक अखंड चेतना के रूप में देखा जाता था। मर्चेंट का यह कहना कि आधुनिक विज्ञान ने प्रकृति और मनुष्य के बीच के जैविक संबंध को काट दिया है। कविता की पंक्तियों में प्रतिध्वनित होता है कि फूल और पत्तियाँ तभी तक अपने अस्तित्व में सार्थक हैं जब तक वे वृक्ष रूपी शरीर से जुड़ी हैं। यदि उन्हें अलग कर दिया जाए तो वे केवल मृत पदार्थ रह जाते हैं जो मर्चेंट के उस विचार की पुष्टि करता है जिसमें वे कहती हैं कि प्रकृति को यंत्र मान लेने से उसकी गरिमा और प्राणवत्ता समाप्त हो जाती है। विशेष रूप से कविता का अंतिम हिस्सा जहाँ ‘आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न देखती है’ कहा गया है वह मर्चेंट के इकोफेमिनिज्म और नीत्से के दैहिक विमर्श के बीच एक पुल का काम करता है। यहाँ आत्मा शरीर से परे कोई अलौकिक वस्तु नहीं, बल्कि वह शरीर की ही गहरी और सूक्ष्म आकांक्षा है जो उसे अस्तित्व की समग्रता से जोड़ती है। जब तक मनुष्य प्रकृति के शरीर को साधे रहता है. यानी जब तक वह उसके प्रति संवेदनशील और उससे जुड़ा हुआ है तभी तक वह उस वैश्विक आत्मा या चेतना का हिस्सा बना रह सकता है। मर्चेंट की चिंता भी यही है कि जब हम प्रकृति के शरीर को एक निर्जीव संसाधन समझने लगते हैं तो हम वास्तव में उस आत्मा या उस स्वप्न को ही नष्ट कर देते हैं जो जीवन को अर्थ देता है। इस प्रकार अशोक वाजपेयी की कविता मर्चेंट के पारिस्थितिकी दर्शन का काव्यात्मक विस्तार और मर्चेंट का दार्शनिक मंतव्य विवेच्य कविता में निहित भावबोध का विश्लेषण प्रतीत होता है। यह कविता और दार्शनिक विचार ,दोनों मनुष्य को वापस पृथ्वी के उस विराट शरीर का हिस्सा बनने का आमंत्रण देते हैं जहाँ अलगाव नहीं, बल्कि कवि के शब्दों में ‘अटूट’ जुड़ाव ही जीवन का एकमात्र सत्य है।
दूसरे शब्दों में अशोक वाजपेयी का ‘अटूट’ संबंध वास्तव में उस ‘जैविक संविदा’ (Biological Contract) की याद दिलाता है जिसे आधुनिकता ने तोड़ दिया है। यहाँ ‘साधने’ की क्रिया— “जब तक तुम साधे हो उसके शरीर को”—विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह केरेन वॉरेन (Karen J. Warren, 1947–2020) के ‘केयर एथिक्स’ (Care Ethics) से जुड़ती है। वॉरेन ने नैतिकता के पारंपरिक सिद्धांतों (जो अक्सर नियमों और अधिकारों पर आधारित होते हैं) के विकल्प के रूप में ‘केयर एथिक्स’ (देखभाल की नैतिकता) को पर्यावरण दर्शन में शामिल किया है । वॉरेन का तर्क है कि समाज में एक ‘पदानुक्रम’ (Hierarchy) बना दिया गया है—जैसे पुरुष को स्त्री से ऊपर और संस्कृति को प्रकृति से ऊपर रखा गया है। ‘केयर एथिक्स’ इस ऊंच-नीच के ढांचे को तोड़कर ‘संबंधों’ पर जोर देती है।उनके अनुसार, मनुष्य कोई स्वतंत्र टापू नहीं है। हमारी पहचान हमारे संबंधों से बनती है—चाहे वे अन्य मनुष्यों के साथ हों या प्रकृति (वृक्षों, नदियों और मिट्टी) के साथ। केयर एथिक्स के तहत माना जाता है कि हमें प्रकृति के साथ ‘स्वामी’ की तरह नहीं, बल्कि एक ‘देखभाल करने वाले साथी’ की तरह व्यवहार करना चाहिए।पारंपरिक नैतिकता केवल तर्क (Logic) की बात करती है, लेकिन वॉरेन की ‘केयर एथिक्स’ में प्रेम, सहानुभूति, कृतज्ञता और विश्वास जैसी भावनाओं को नैतिक निर्णय लेने का आधार माना जाता है। उनके लिए प्रकृति की रक्षा केवल एक ‘क़ानूनी फ़र्ज़’ नहीं, बल्कि एक ‘भावनात्मक जुड़ाव’ का विषय है ।
केरेन वॉरेन का मानना था कि जब तक हम महिलाओं के प्रति समाज के नजरिए को नहीं बदलेंगे, तब तक हम पर्यावरण को भी नहीं बचा पाएंगे, क्योंकि दोनों का शोषण एक ही ‘पितृसत्तात्मक मानसिकता’ से होता है। उनका प्रसिद्ध उदाहरण एक पर्वतारोही का है जो वर्चस्व की मानसिकता के तहत पहाड़ को ‘जीतने’ के लिए चढ़ता है , जबकि ‘केयर एथिक्स’ का पालन करनेवाली एक पारिस्थितिकी स्त्रीवादी वह है जो पहाड़ के साथ ‘संबंध बनाने’ और उसकी सुंदरता को महसूस करने के लिए पहाड़ पर चढ़ता या चढ़ती है ।
अशोक वाजपेयी जब अपनी कविता में कहते हैं कि “जब तक तुम साधे हो उसके शरीर को/तभी तक/उसकी आत्मा भी तुमसे अटूट है”, तो यह वही ‘साधना’ है जिसे भिन्न शब्दावली में केरेन वॉरेन की ‘केयर’ कहती हैं । कविता की पंक्ति उस जुड़ाव की ओर संकेत करती प्रतीत होती है जो शरीर और आत्मा को अलग नहीं होने देता। ‘साध लेना’ यहाँ ‘अधिकार’ (Power) नहीं है, बल्कि ‘पोषण’ (Nurturance) है। यह कविता पुरुष-प्रधान वर्चस्ववादी दृष्टि के विपरीत एक ऐसी ‘कोमल नैतिकता’ का प्रस्ताव रखती है जहाँ अस्तित्व का सत्य परस्पर निर्भरता (Interdependence) में है।

विवेच्य कविता का एक अत्यंत प्रभावशाली पक्ष कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के ‘अलगाव के सिद्धांत’ (Theory of Alienation) के साथ इसका संवाद है। मार्क्स के अनुसार, पूँजीवाद मनुष्य को चार स्तरों पर अलग करता है: अपने उत्पाद से, अपने श्रम की प्रक्रिया से, अपने साथी मनुष्यों से और अंततः अपनी ‘प्रजातिगत सत्ता’ (Species-being) से। अशोक वाजपेयी की कविता में फूल और पत्ती का वृक्ष से जुड़ाव इसी ‘अलगाव’ के विरुद्ध एक दार्शनिक ढाल है। “पत्तियाँ तभी तक पत्तियाँ जब तक वे वृक्ष से ही लगी हैं”—यह पंक्ति आधुनिक सर्वहारा और उस नागरिक की विडंबना को व्यक्त करती है जिसे उसकी जड़ों से उखाड़कर अपने गाँव-जवार से हजारों किलोमीटर दूर ‘श्रम बाज़ार’ का हिस्सा बना दिया गया है। अशोक वाजपेयी यहाँ द्वद्वात्मक भौतिकवाद को एक ‘आध्यात्मिक पारिस्थितिकी’ प्रदान करते प्रतीत होते हैं। अलगाव का विलोम यहाँ ‘अटूट’ होना है। यह ‘अटूट’ होना ही मनुष्य को उसकी प्रजातिगत गरिमा वापस दिला सकता है।

बौद्ध दर्शन का ‘प्रतीत्य समुत्पाद’ (Dependent Origination) भी इस कविता के ‘अद्वैत’ को एक तार्किक आधार देता प्रतीत है। बुद्ध ने सिखाया कि “यदि यह है, तो वह है; इसके होने से वह होता है।” अशोक वाजपेयी की कविता इसी सह-अस्तित्व का काव्यात्मक साक्ष्य है। बौद्ध तंत्र और वज्रयान में देह को ‘बुद्धत्व’ का मंदिर माना गया है। विवेच्य कविता में यह सूत्र कि “आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न देखती है”, शून्यवादी दार्शनिक नागार्जुन के उस विचार के अत्यंत निकट है जहाँ ‘संसार’ और ‘निर्वाण’ के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। यदि शरीर नहीं होगा, तो स्वप्न (निर्वाण) कहाँ घटेगा? अतः शरीर वह ‘शून्य’ है जिसमें अनंत संभावनाएँ समाहित हैं।

समकालीन दार्शनिक एमानुएल लेविनास (Emmanuel Levinas) के साथ अशोक वाजपेयी की कविता का संबंध ‘नैतिकता’ के प्रश्न पर आकर गहराता है। लेविनास के लिए नैतिकता का अर्थ है—दूसरे के प्रति उत्तरदायी होना। विवेच्य कविता में वृक्ष, फूल और पृथ्वी केवल वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि वे ऐसी ‘अन्य’ (The Other) हैं जिनके प्रति हमारी जिम्मेदारी ‘अटूट’ है। लेविनास जहाँ ‘अन्य के चेहरे’ (The Face of the Other) की बात करते हैं, अशोक वाजपेयी इस कविता में ‘वृक्ष के शरीर’ का उल्लेख करते हैं। अशोक वाजपेयी की कवि-दृष्टि कहती है कि यदि हम प्रकृति (अन्य) के शरीर को नहीं साधेंगे, तो हमारी अपनी आत्मा का स्वप्न भी बिखर जाएगा। यह मनुष्य-केंद्रित नैतिकता (Anthropocentric Ethics) से ऊपर उठकर एक ‘जैव-केंद्रित नैतिकता’ (Biocentric Ethics) की पुकार है।
अशोक वाजपेयी की कविता ‘आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न’ से गुज़रते हुए स्पष्ट है कि कैसे यह टेक्स्ट उपनिषदों की ऋचाओं, हाइडेगर के अस्तित्ववाद, रिल्के की प्रार्थना, मार्क्स के द्वंद्व और वंदना शिवा की पारिस्थितिक चेतना को एक ही सूत्र में पिरोता है।यह कविता सभ्यता के उस दोराहे पर खड़ी है जहाँ एक ओर विनाशकारी अलगाव है और दूसरी ओर ‘अटूट’ जुड़ाव। याद रहे कि इस कविता के रचयिता का ‘स्वप्न’ पलायन नहीं है; वह उस यथार्थ को पाने की कोशिश है जहाँ पदार्थ और चेतना के बीच की दीवार गिर जाती है। कविता की यह व्याख्या से सिद्ध होता है कि शरीर और आत्मा का संबंध पूरकता का है: बिना शरीर (वृक्ष) के आत्मा (स्वप्न) का कोई आधार नहीं है। पारिस्थितिक चेतना ही परम सत्य है । पृथ्वी से अलग हमारा कोई अस्तित्व नहीं है और साध लेना जीवन-कौशल है। इतना ही नहीं, संबंधों को बनाए रखना एक नैतिक और दार्शनिक जिम्मेदारी है।
कुल मिलाकर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ‘आत्मा शरीर का स्वप्न’ कविता आधुनिक युग का एक ‘आध्यात्मिक मैनिफेस्टो’ है। यह रचना हमें एक ऐसी दुनिया की ओर ले जाती है जहाँ मनुष्य श्रेष्ठ होने का दंभ छोड़कर प्रकृति का एक विनम्र अंग होने में ही अपनी सार्थकता ढूँढता है। आत्मा शरीर का अनंत स्वप्न देखती रहे—इसके लिए यह अनिवार्य है कि यह पृथ्वी, यह शरीर और यह जुड़ाव अक्षुण्ण बना रहे। अशोक वाजपेयी ने इस कविता के माध्यम से जो ‘अटूट’ सत्य कहा है, वह विश्व-साहित्य की एक अमर धरोहर है।

याद रहे कि व्यावहारिक आलोचना के दौरान बड़े से बड़े आचार्य एवं विद्वान-आलोचक से चूक हो सकती है और होती रही है । इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है। ‘कुमारसंभव’में कालिदास का एक छंद है:

स दक्षिणापाङ्ग-निविष्ट-मुष्टिं नतांसम्-आकुञ्चित-सव्य-पादम् ।
ददर्श चक्रीकृत-चारु-चापं प्रहर्तुम्-अभ्युद्यतम्-आत्मयोनिम् ॥
हरस्तु किंचित् परिवृत्तधैर्यः चन्द्रोदयारम्भ इव अम्बुराशिः।
उमामुखे बिम्बफलाधरोष्ठे व्यापारयामास विलोचनानि॥
(जैसे ही शिव ने अपनी समाधि से दृष्टि हटाई, उन्होंने आत्मयोनि (कामदेव) को देखा। कामदेव प्रहार करने के लिए पूरी तरह तैयार थे; उन्होंने अपने सुंदर धनुष को खींचकर गोलाकार (चक्रीकृत) कर लिया था, उनकी मुट्ठी दाहिने नेत्र के कोने तक खिंची हुई थी, कंधे झुके हुए थे और निशाना साधने के लिए बायाँ पैर थोड़ा मुड़ा हुआ था। कामदेव के उस सम्मोहन बाण और सामने खड़ी पार्वती के अद्भुत सौंदर्य के प्रभाव से महादेव का धैर्य थोड़ा विचलित हो गया। उनकी स्थिति ठीक वैसी ही हो गई जैसे चंद्रमा के उदय होने पर शांत समुद्र (अम्बुराशि) में लहरें उठने लगती हैं और वह अपनी मर्यादा छोड़ने लगता है। उस भाव के वशीभूत होकर शिवज ने अपने नेत्र पार्वती के उस मुख पर टिका दिए, जिसके नीचे के होंठ बिम्बफल की भांति लाल और कांतिमान थे।)
संस्कृत काव्यशास्त्र के विख्यात ग्रन्थ ‘ध्न्यालोक’ की प्रथम कारिका में आनंदवर्धन द्वारा ‘ध्वनि काव्य’को परिभाषित करते हुए कहा गया है :
यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थौ।
व्यङ्क्तः काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः॥

(“जहाँ वाच्यार्थ (सीधा-सादा अर्थ) की तुलना में व्यङ्ग्यार्थ (गहरा या छिपा हुआ अर्थ) अधिक चमत्कारिक, सुंदर और प्रधान होता है, उस काव्य को विद्वानों ने ‘ध्वनि काव्य’ कहा है और इसे ही ‘उत्तम काव्य’ माना गया है।”)
इसी बात को संक्षेप में आचार्य मम्मट ‘काव्यप्रकाश’ की ‘चौथी कारिका’ में कहते हैं : “इदमुत्तममितिशयिनि व्यङ्ग्ये वाच्याद्ध्वनिर्बुधैः कथितः॥” तात्पर्य यह कि जहाँ वाच्यार्थ (सीधा-सादा अर्थ) की तुलना में व्यङ्ग्यार्थ (गहरा या छिपा हुआ अर्थ) अधिक चमत्कारिक, सुंदर और प्रधान होता है, उस काव्य को विद्वानों ने ‘ध्वनि काव्य’ कहा है और इसे ही ‘उत्तम काव्य’ माना गया है।”

मम्मट ने कालिदास के इस छंद में व्यंजना को ‘अस्फुट’ मानते हुए इसे श्रेष्ठ ‘ध्वनि-काव्य’ का उदाहरण मानने से इनकार किया है । उनके अनुसार कालिदास के श्लोक में जो व्यंग्य है (शिव के मन में काम-विकार का उदय), वह इतना ‘अस्फुट’ (धुंधला या अस्पष्ट) नहीं है कि उसे खोजने के लिए बहुत गहराई में जाना पड़े, बल्कि वह लगभग शब्दों से ही साफ़ झलक रहा है। मम्मट के अनुसार, जब व्यंग्य बहुत आसानी से समझ आ जाय या वाच्यार्थ के पीछे दब जाए, तो वह ‘ध्वनि’ नहीं रह जाता। इसलिए उन्होंने इसे ‘गुणीभूतव्यङ्ग्य’ (मध्यम काव्य) की श्रेणी में रखा है। उनका मानना है कि ‘ध्वनि काव्य’ (उत्तम काव्य) वही है जहाँ व्यंग्यार्थ (Suggested meaning), वाच्यार्थ (Literal meaning) से स्पष्ट रूप से अधिक चमत्कारिक हो।
कहना न होगा कि मम्मट की दृष्टि में जो दोष है, वही कालिदास के इस छंद का सबसे बड़ा काव्यगुण है, क्योंकि वह पाठक की कल्पना और संवेदना को सक्रिय करता है। बावजूद इस विचलन के, मम्मट को कम करके आंकने की धृष्टता ‘चलइ जोंक जिमि बक्र गति जद्यपि सलिलु समान ॥’ का उदाहरण बनकर रह जाने को अभिशप्त होगी ।
हमारे समय में आलोचना को अशोक वाजपेयी की सलाह है कि “आलोचना को रचना के बरअक्स एक वैचारिक या बौद्धिक स्थापत्य खड़ा करना चाहिए जो उस रचना से जुदा हो पर अपने आप में उसकी कुछ मूल्यवत्ता हो ।…आलोचना को रचना पर आदर्श रूप में अर्थ की एक तह जमानी चाहिए। ऐसी कि फिर उस रचना को बिना उस तह के पढ़ा न जा सके”।
आगे उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा है : “हमारे यहाँ कितनी ऐसी आलोचना है ?…साहित्य आलोचना में जो काम कर रहे हैं वो नई भाषा ,नई स्थापनाएँ, नई अवधारणाएं विकसित नहीं कर पा रहे हैं। वहाँ इस तरह की भाषा है उसका आप तीन पेज पढ़िए तो मन ऊब जाए कि क्या कहा जा रहा है ?…हिन्दी आलोचना रामचन्द्र शुक्ल के साथ विश्वासघात करती आलोचना है ।…हमारी आज की आलोचना का बड़ा भारी दुर्गुण या कमजोर पक्ष यह है कि वह नितांत समसामयिकता से आक्रान्त है।” (तद्भव -51)
कहना न होगा कि यह केवल आलोचना के बजाय रचना का भी संकट है । क्या यह सच नहीं है कि कुछेक अपवादों को छोड़कर हमारे समय के अधिकतर रचनाकारों की कृतियों में वह अंतर्पाठीयता तथा अनुभूति की व्यापकता और गहराई सिरे से ग़ायब नहीं होती जा रही है, जो अशोक वाजपेयी और उनके ठीक बाद की पीढ़ी के रचनाकारों की कृतियों में कमोबेश मिलती है। वस्तुत: यह इकहरापन हमारे समय और समाज के लगातार सतही और सपाट (मैटर ऑफ़ फैक्ट) होते चले जाने से पैदा हुए संकट का द्योतक है। इत्यलम् ।

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प्रोफ़ेसर रवि रंजन

जन्म : 1962, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार ।
शिक्षा : पी-एच.डी.
रूचि के क्षेत्र : भक्तिकाव्य, आधुनिक हिन्दी कविता, आलोचना, साहित्य का समाजशास्त्र , सौंदर्यशास्त्र ।
प्रकाशित कृतियाँ : ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’, ‘सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन,दिल्ली (2011), ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’ (2012),वाणी प्रकाशन, ‘वारसा डायरी’(2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’,वाणी प्रकाशन ।
‘वारसा डायरी’ के लिए ‘जयपुर साहित्य सम्मान’(2023)
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में शताधिक शोध-पत्र एवं आलोचनात्मक निबन्ध प्रकाशित ।
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में निरंतर सक्रिय भागीदारी ।
प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय,बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड में ‘भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद्’ (ICCR) द्वारा स्थापित ‘पीठ’ (चेयर) पर विज़िटिंग प्रोफ़ेसर ।
सम्प्रति: प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद – 500 046
ई.मेल. : raviranjan@uohyd.ac.in मो.9000606742

 

 

 

 

 

 

 


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