हरि भटनागर अपने कथा साहित्य के माध्यम से प्रेमचन्द और रेणु के कथासाहित्य की परम्परा की रचनात्मक ज़मीन पर खड़े होकर उसका विकास करने वाले अत्यंत महत्त्वपूर्ण कहानीकार और उपन्यासकार हैं।

वे हिंदी कथा-साहित्य के उन विरल रचनाकारों में हैं जो जीवन की कठोर सच्चाइयों को करुणा की गहराई से उकेरते हैं। सुल्तानपुर ,(उ.प्र.) में जन्मे और भोपाल को अपनी मुख्य कर्मभूमि बनाकर सतत रचनारत कहानीकार एवं उपन्यासकार हरि भाटनागर  ने अपनी कहानियों एवं उपन्यासों में  हाशिए के जीवन, शोषण, गरीबी और मानवीय संवेदनाओं को इतनी सूक्ष्मता से चित्रित किया है कि पाठक का मन विद्रोह और करुणा के बीच झूलने लगता है।

रूस का पुश्किन सम्मान, श्रीकांत वर्मा पुरस्कार, दुष्यंत कुमार सम्मान और वागीश्वरी पुरस्कार से सम्मानित उनकी रचनाएँ उर्दू, मलयालम, मराठी, पंजाबी, रूसी, अंग्रेजी और फ्रेंच में अनूदित हो चुकी हैं। रूस, अमेरिका, ब्रिटेन आदि की साहित्यिक यात्राएँ और विश्व हिंदी सम्मेलनों (2003-सूरीनाम, 2007-न्यूयॉर्क)  में उनकी सक्रिय भागीदारी ने हिंदी को वैश्विक मंच दिया है।  लगभग तीन दशकों तक ‘साक्षात्कार’ पत्रिका के उप-संपादक और वर्तमान में ‘रचना समय’ के संपादक के रूप में उन्होंने चेखव, सार्त्र, बोउवार, टेरी ईगल्टन, देरिदा, लुकाच, काफ्का जैसे वैश्विक चिंतकों एवं रचनाकारों पर विशेषांक प्रकाशित कर हिंदी को अंतरराष्ट्रीय संवाद का सेतु बनाया है । वे  अनुवाद को साहित्य की सीमाएँ तोड़ने वाला मानते हैं।  

आत्मप्रचार से कोसों दूर रहकर  हरि भटनागर ने जितना काम किया है उसकी वजह से वे हिन्दी साहित्य के गंभीर अध्येताओं के बीच चर्चित रहे हैं। अपनी रचनाओं में रोज़मर्रा के दृश्यों में असीम करुणा उभारनेऔर चेखव, मोपासां, कामू, मार्केज़ की परंपरा से जुड़े हरि भटनागर हिंदी के  एक अद्वितीय कथाकार हैं  ।  

रेमंड विलियम्स की अनुभूति की संरचना और अनुभूति की संस्कृति की रोशनी में उनकी रचनाएँ हमारे समय की जीवंत, संवेदनाओं का जीता-जागता दस्तावेज़ हैं। हरि भटनागर हिंदी गद्य को समृद्ध करने के साथ साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम भी बनाते हैं।

प्रस्तुत आलेख में हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक प्रोफ़ेसर रवि रंजन ने हरि भटनागर की कहानियों और विशेषकर उनके ‘आपत्ति’ कहानी संग्रह में संगृहीत सभी कहानियों का विधिवत समाजशास्त्रीय विश्लेषण किया है।
– नरेश अग्रवाल 

आलेख

रेमण्ड विलियम्स (1921-1988) ने ‘दी लॉन्ग रेवोल्यूशन’ (1961) और ‘मार्क्सिज्म एंड लिटरेचर’(1977) पुस्तकों में ‘अनुभूति की संरचना’(structure of feeling) पर विचार करते हुए लिखा है कि वह एक ऐसा जीवंत और साझा अनुभव है जो किसी ख़ास अवधि या पीढ़ी की संस्कृति का सबसे ताज़ा तथा जीवंत हिस्सा होता है। ‘अनुभूति की संरचना’ व्यक्तिगत होते हुए भी सामाजिक होती है। कोई एक व्यक्ति इसे महसूस करता है, पर यह एक पीढ़ी या वर्ग की साझा अनुभूति होती है। दूसरे शब्दों में ‘अनुभूति की संरचना’ वह व्यावहारिक चेतना (practical consciousness) है जिसे लोग अपने रोज़मर्रा के जीवन में महसूस करने के बावजूद पूरी तरह सैद्धांतिक रूप से व्यक्त नहीं कर पाते। विलियम्स ने 1840 के दशक के ब्रिटेन का उदाहरण देते हुए लिखा है कि उस दौर की आधिकारिक साहित्यिक छवि विक्टोरियन संयम, नैतिकता और स्थिरता की थी, पर कुछ साहित्यिक कृतियों में एक बेचैन, अलग-थलग, कुंठित ऊर्जा दिखती थी जो बीसवीं सदी की आधुनिकता की ओर इशारा करती थी। यही उस दौर की अनुभूति की संरचना थी – जो अभी पूरी तरह संज्ञा नहीं पा सकी थी, पर व्यापक रूप से महसूस की जा रही थी।
‘मार्क्सिज्म एंड लिटरेचर’ में रेमण्ड विलियम्स का कथन है : “मैं इसके लिए एक नया शब्द सुझा रहा हूँ – ‘अनुभूति की संरचना’।यह शब्द ‘संरचना’ जितना मज़बूत और पक्का है। फिर भी यह हमारे जीवन के सबसे नाज़ुक और छूने में मुश्किल हिस्सों पर काम करती है। सीधे-सादे शब्दों में कहें तो यही किसी ज़माने की असली संस्कृति होती है। यह पूरी व्यवस्था के सारे तत्त्वों का जीता-जागता, अभी-अभी महसूस होने वाला नतीज़ा है।(I have been trying to suggest a term for it: ‘structure of feeling’. It is as firm and definite as ‘structure’ suggests, yet it operates in the most delicate and least tangible parts of our activity. In one sense, this structure of feeling is the culture of a period: it is the particular living result of all the elements in the general organization.” Marxism and Literature, page.132, OUP)

साहित्यालोचन एवं सांस्कृतिक अध्ययन के क्षेत्र में यह अवधारणा इसलिए क्रांतिकारी साबित हुई क्योंकि इसने मार्क्सवादी आधार-अधिरचना के मॉडल में एक जीवंत, गतिशील मध्य क्षेत्र पैदा किया। नई सामाजिक प्रक्रियाएँ पहले अर्थव्यवस्था में नहीं, बल्कि संवेदना के स्तर पर नए अर्थ और मूल्य पैदा करती हैं, और यही बाद में संस्थाओं और विचारधाराओं का रूप लेती हैं। आज सांस्कृतिक अध्ययन, साहित्यिक आलोचना, भाव-चेतना सिद्धांत (‘affect-theory’), क्वीयर अध्ययन, उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन सब जगह इस अवधारणा का इस्तेमाल होता है। जब हम कहते हैं कि आज का युवा एक ख़ास तरह की बेचैनी, डिजिटल अकेलापन, पर्यावरण-चिंता या वृद्ध-पूँजीवादी थकान (Late Capitalist Fatigue) महसूस कर रहा है जो अभी किसी सामाजिक-राजनीतिक घोषणापत्र या किसी महान साहित्यिक कृति में में पूरी तरह समेटा नहीं जा सका है – तब हम दरअसल रेमण्ड विलियम्स की भाषा में ही बोल रहे होते हैं।
कुलमिलाकर ‘अनुभूति की संरचना’ ऐतिहासिक विकास के किसी दौर का वह साझा भावनात्मक और पहचान से जुड़ा आयाम (‘affective-identity dimension ’) है, जो निर्माण की प्रक्रिया में है और जो सबसे ताज़ा, सबसे जीवंत और सबसे कठिनाई से पकड़ में आने वाला है – और जिसे समझ लेने का मतलब है इतिहास को बनते हुए महसूस करना । कहने की ज़रूरत नहीं कि ‘अनुभूति की संरचना’ को गतिशील अवस्था को समाजविज्ञान की तुलना में साहित्य सबसे पहले और कहीं ज़्यादा गहराई से पकड़ता है।
भारत के जानेमाने समाजशास्त्री प्रोफ़ेसर योगेन्द्र सिंह ने अपने एक व्याख्यान में कथा साहित्य और ख़ासकर ‘मैला आँचल’ में वर्णित कई प्रसंगों का हवाला देते हुए विस्तार से बताया है कि समाजविज्ञान में शोध-प्रक्रिया के दौरान आंकड़े जुटाने, उनका वर्गीकरण और विश्लेषण आदि करने के बाद जिस तरह से ठोस प्रमाणों के आधार पर अंतत: सैद्धांतिकी विकसित करने की चेष्टा की जाती है, उसमें कथा साहित्य की तरह सामाजिक स्थितियों और लोगों के मनोभावों को गतिशील अवस्था में पकड़ पाने की कोई गुंजाइश ही नहीं होती। ऐतिहासिक विकास की प्रक्रिया में किसी वर्ग या समुदाय के अंतर्मन में जो भावनात्मक आलोड़न –विलोड़न हो रहा होता है उसके आरंभिक स्पंदन का एहसास बड़े साहित्यकारों को सबसे पहले होता है ।
कथाकार हरि भटनागर की ‘अनुभूति की संरचना’ और ‘अनुभूति की संस्कृति’, दोनों ही उनके साहित्य की सामाजिक और अनुभवात्मक संरचना को समझने की अनिवार्य कुंजियाँ हैं। उनका कथाकार जब अपने अनुभवों को कलात्मक भाषा प्रदान करता है ,तो वह अपने समय की ‘जीवंत अनुभूति’ का रचनात्मक द्रष्टा बन जाता है।
‘अनुभूति की संस्कृति’(Culture of feeling) अपेक्षाकृत व्यापक और संस्थागत अर्थ की वाहक है और याद रहे कि समाजशास्त्रीय शब्दावली में साहित्य केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति भर नहीं है; यह एक सांस्कृतिक-सामाजिक व्यवस्था, एक सिग्निफिकेशन सिस्टम और एक ऐसा क्षेत्र (field) भी है जो नियम, परंपराएँ, विधाएँ, मूल्य, और वैधता की प्रक्रिया निर्मित करता है। साहित्यिक गतिविधि लेखक, पाठक, आलोचक, प्रकाशक, पाठ्यक्रम, पुरस्कार, पत्रिकाओं और अकादमिक संस्थानों की पूरी संरचना से संचालित होती है — यह पूरा तंत्र मिलकर साहित्य को एक सामाजिक संस्था का रूप देता है। वस्तुत: ‘अनुभूति की संस्कृति’ से यह निर्धारित होता है कि कौन-सी भावना किस रूप में व्यक्त की जाएगी, कौन-सी भावनाएँ स्वीकार्य हैं, कौन-सी नहीं , किन प्रवृत्तियों को उदीयमान माना जाएगा और किन्हें पतनशील। उदाहरण के लिए द्विज श्रेष्ठता, वर्णव्यवस्था, पितृसत्ता,आक्रामकता आदि को बरक़रार रखने की प्रवृत्ति पतनशील मानी जाती है और ‘जाति का विनाश’, समता, स्वतंत्रता, विनम्रता, संवेदनशीलता और हर तरह के ज़ुल्म के खिलाफ़ बग़ावत करते हुए इंसाफ़ के लिए पहलक़दमी को उदीयमान प्रवृत्ति से संचालित मानव व्यवहार स्वीकार किया जाता है । इस प्रकार ‘अनुभूति की संस्कृति’ से समाज के भावनात्मक नियमों और प्राथमिकताओं का ढाँचा बनता है। वस्तुत: अनुभूति की संस्कृति उसी भाव-क्षेत्र के भीतर ‘वास्तव में घटित हो रही अनुभूतियों’ का नाम है। लोग जिन अनुभवों, तनावों, आकांक्षाओं या टूटनों को जी रहे होते हैं, वे हमेशा उस मान्य भाव-संस्कृति (culture of feeling) से मेल नहीं खाते। कई बार लोग वह महसूस करते हैं जिसे वे व्यक्त नहीं कर सकते, क्योंकि समाज ने उसके लिए वैध भाषा तैयार नहीं की होती। इस प्रकार ‘अनुभूति की संस्कृति’ एक प्रकार का ‘सामाजिक ढाँचा’ है, जबकि ‘अनुभूति की संरचना’उस ढाँचे के भीतर की वास्तविक, जीवित अनुभूति। दोनों का संबंध इस द्वंद्व में निहित है कि ‘अनुभूति की संस्कृति’ अनुभूतियों को दिशा देती है, पर ‘अनुभूति की संरचना’ उन अनुभूतियों की जीवंत और कभी-कभी विरोधी धारा को प्रकट करती है। जब किसी युग में नई भावनाएँ जन्म लेने लगती हैं — जैसे नई राजनीतिक बेचैनियाँ, नए प्रकार का अकेलापन, नई प्रकार की चेतना या नई प्रकार की सामूहिक आशा — तो वे सबसे पहले अनुभूति की संरचना के स्तर पर दिखाई देती हैं। समय के साथ, जब यह नई अनुभूति सामाजिक स्वीकृति प्राप्त कर लेती है, तब वह ‘अनुभूति की संस्कृति’ का हिस्सा बन जाती है । ग़ौरतलब है कि दोनों के बीच संबंध रैखिक के बजाय परिवर्तनशील, अंतःप्रविष्ट और क्रियाशील है। दूसरे शब्दों में ‘अनुभूति की संस्कृति’ वह सांस्कृतिक मानचित्र है जिसकी सीमाओं के भीतर अधिकांश लोग चलते हैं और ‘अनुभूति की संरचना’ वह अनुभव-प्रवाह है जो कभी इन सीमाओं के भीतर बहता है और कभी उन्हें बदलने की चाहत भी रखता है। साहित्य, विशेषतः कथासाहित्य और कविता, इन दोनों के बीच इस तनाव को सबसे सूक्ष्मता के साथ पकड़ती है — एक ओर वह सामाजिक अनुभूति की संस्कृति को प्रतिबिंबित करती है, और दूसरी ओर कई बार वह उन जीवंत अनुभूतियों को स्वर देती है, जो भविष्य की अनुभूति की संस्कृति को जन्म देती हैं।
इस विमर्श की रोशनी में विचारने पर हरि भटनागर हिंदी साहित्य के उन दुर्लभ रचनाकारों में से एक प्रतीत होते हैं, जिनकी कथा संरचना में भविष्य की अनुभूति की संस्कृति को प्रेरित-प्रभावित करने का माद्दा हो न हो , पर उसमें हमारे समय की ‘अनुभूति की संरचना’ बहुत हद तक आत्मसात हुई है । अपने रचनात्मक लेखन एवं संपादकीय प्रतिभा से उन्होंने न केवल हिंदी गद्य को समृद्ध किया, बल्कि विश्व साहित्य को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और यथार्थवादी शैली में समाज में हाशिए की ज़िन्दगी जीने को अभिशप्त समुदायों की जीवनस्थितियों को चित्रित करने वाली कहानियाँ रची हैं , जो सामाजिक विसंगतियों पर व्यंग्य करती हुई गरीबी, शोषण और मानवीय संवेदनाओं के प्रति पाठक के दिल-ओ-दिमाग़ में गहन करुणा का मिश्रण प्रस्तुत करती हैं। उर्दू, मलयालम, मराठी, पंजाबी, रूसी, अंग्रेजी और फ्रेंच जैसी भाषाओं में अनूदित उनकी कृतियाँ वैश्विक अपील को दर्शाती हैं। पुश्किन सम्मान और श्रीकांत वर्मा पुरस्कार आदि से नवाजी गयी हरि भटनागर की रचनाएँ यथार्थ से आतंकित होकर मायूसी फैलाने के बजाय पाठक में मनुष्यता की विजय को लेकर विश्वास जगाती हैं । उन्हें जो सम्मान प्राप्त हुए हैं उनमें रूस का पुश्किन सम्मान, श्रीकांत वर्मा पुरस्कार, दुष्यंत कुमार सम्मान और वागीश्वरी पुरस्कार आदि शामिल हैं। वे रूस, अमेरिका, ब्रिटेन की साहित्यिक यात्राएँ कर चुके हैं और विश्व हिंदी सम्मेलन 2003 (सूरीनाम) तथा 2007 (न्यूयॉर्क) में भी उन्होंने सक्रिय भागीदारी की है।
हरि भटनागर की सृजनात्मक यात्रा मुख्य रूप से कहानी और उपन्यास विधा पर केंद्रित रही है। उनके ‘आपत्ति’ कहानी संग्रह को दया शंकर शरण ने ‘जानवर और इंसान की दुनिया को छूती बेजोड़ कहानी’ कहा, जबकि असग़र वजाहत ने इसे परिपक्व रचनाधर्मिता का प्रमाण माना है । ‘दो गज ज़मीन’ (2023) और ‘एक थी मैना एक था कुम्हार’ (2014) सरीखे उनके उपन्यास ग्रामीण जीवन की कठोर वास्तविकताओं को उकेरते हैं। उनकी ‘सेवड़ी रोटियाँ और जले आलू’ शीर्षक श्रेष्ठ कहानी अपने बेहद साधारण घरेलू दृश्य के भीतर एक गहरी सामाजिक और मानवीय सच्चाई को पकड़ती है। ‘सेवड़ी रोटियाँ और जले आलू’ जैसे मामूली विवरण पूरे परिवार की थकान, टूटन और जीवन-संघर्ष का प्रतीक बन जाते हैं। कहानी में पति-पत्नी के बीच फैला मौन उस घुटन को व्यक्त करता है जिसे शब्द व्यक्त नहीं कर पाते । घर की जर्जर वस्तुएँ पात्रों की आंतरिक स्थिति का सीधा संकेत बनती हैं। बाहर से आया अच्छा भोजन भी इस कठोर वास्तविकता में अपना अर्थ खो देता है और यही कहानी की सबसे करुण विडम्बना है। कहानी दिखाती है कि थकान और उपेक्षा इतनी गहरी हो सकती है कि इंसान के भीतर स्वाद, संवाद और ख़ुशी तक समाप्त हो जाएँ। इसमें कोई संघर्ष, समाधान या नाटकीय मोड़ नहीं है—सिर्फ़ जीवन का दबा हुआ, धीमा और साफ़ दिखाई देने वाला सच है। यही सादगी और चुप्पी इसे असाधारण बनाती है, क्योंकि यह उस पीड़ा को सामने लाती है जो अक्सर अनदेखी रह जाती है। इस तरह यह कहानी आधुनिक हिंदी साहित्य में साधारण मनुष्य की अनकही त्रासदी और उसकी अव्यक्त स्थिति का बेहद संवेदनशील दस्तावेज़ बन जाती है। उनकी अन्य कहानियाँ में सामाजिक हिंसा और विस्थापन पर तीखा प्रहार करती हैं । ये रचनाएँ यथार्थवाद की परंपरा को समृद्ध करने के साथ ही उसे इस तरह आगे बढ़ाती हैं कि कई बार उनमें ‘दो बैलों की कथा’ में निहित पशु-मानव संबंधों से बढ़कर संवेदना झलकती है।
हरि भटनागर मध्य प्रदेश साहित्य परिषद की पत्रिका ‘साक्षात्कार’ के संपादन से तकरीबन तीन दशकों तक जुड़े रहे, जहाँ वे उप-संपादक के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद के संस्कृति विभाग में उप-निदेशक के पद पर भी काम किया । वर्तमान में वे साहित्यिक पत्रिका ‘रचना समय’ के संपादक हैं ,जिसमें हमारे समय की महत्त्वपूर्ण रचना-आलोचना आदि के प्रकाशन के साथ ही चेख़व, सार्त्र, बोउवार, टेरी ईगल्टन, देरिदा, लुकाच और अभी हाल में काफ़्का पर केन्द्रित विशेषांक में दुर्लभ सामग्री प्रकाशित हुई है । ज़ाहिर है कि यह महत कार्य अनुवाद के बग़ैर असंभव था । उनका मानना है कि अनुवाद साहित्य की सीमाओं को तोड़ता है । यह योगदान हिंदी को वैश्विक भाषा बनाने की दिशा में एक सार्थक क़दम है, जहाँ साहित्य केवल राष्ट्रीय नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों का सेतु बनता है।
कुल मिलाकर, हरि भटनागर की रचनाएँ, उनकी संपादकीय कुशलता और अनुवाद कार्य आदि हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के साथ-साथ विश्व साहित्य के द्वार खोलते हैं। उनकी रचनाएँ सामाजिक यथार्थ को उजागर करती हैं, संपादन साहित्यिक बहस को जीवंत रखता है और अनुवाद सांस्कृतिक संवाद को मजबूत करता है। उनका जीवन और शब्द कर्म नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए एक प्रेरणा है, जो बताता है कि साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम भी हो सकता है।
हरि भटनागर की अनुभूति की संस्कृति में सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाओं, हाशिए के जीवन, स्त्री स्वाधीनता और शहरी व ग्रामीण जीवन की विडंबनाओं के सरल-सहज एवं प्रभावशाली चित्रण शामिल हैं। उनकी रचनाएँ आम आदमी की संघर्षपूर्ण ज़िंदगी, करुणा, अन्याय के विरुद्ध विद्रोह और मानवता की विजय का कलात्मक उद्घोष हैं। उनकी कहानी और उपन्यास में ‘मानवरूपीकरण’ (anthropomorphism) का ज़बरदस्त इस्तेमाल हुआ है । एक आवारा सूअरनी के माध्यम से सामाजिक बहिष्कार और करुणा की पड़ताल करती उनकी प्रसिद्ध कहानी ‘आपत्ति’ इसका ठोस उदाहरण है। उन्होंने हिंदी कथासाहित्य में शहरी जीवन की जटिलताओं और मानव-पशु संबंध, प्रशासनिक प्रताड़ना आदि को अपनी रचनाओं में स्थान दिया है । स्त्रीवादी, पर्यावरणवादी, मार्क्सवादी, संरचनावादी, उत्तर-संरचनावादी एवं उत्तर-उपनिवेशवादी साहित्य सिद्धांतों की रोशनी में उनकी रचनाओं को पढ़ते हुए किसी विचारधारा–विशेष को रचना का विवेचन-विश्लेषण में इस्तेमाल करने वालों को उनमें अपने अपने सच की अंतर्ध्वनि सुनाई पड़ सकती है । बावजूद इसके उनकी किसी रचना को केवल किसी एक विचारधारा के आलोक में पढ़ते हुए विचार में घटाकर देखना रचना के साथ गैर-रचनात्मक व्यवहार होगा, जिससे आलोचना-क्रम में बचना बेहद ज़रूरी है ।
हरि भटनागर हिंदी के उन लेखकों में से हैं ,जो ब्रेख्त की शब्दावली में कहें तो, ‘मूंगफली की तरह लोकप्रिय’ होने के बजाय गंभीर अध्येताओं के बीच चर्चित हैं। उनकी कहानियाँ उन विरल अनुभूति की संरचना की उपज हैं जो बिना दिखावे, बिना कोई सांकेतिक ढांचा इस्तेमाल किए सीधे-सीधे जीवन के कच्चे, अनगढ़, और कभी-कभी क्रूर सत्य को पकड़ती हैं । उनके पात्र नायक या खलनायक की श्रेणी में सिमट कर नहीं रह जाते; वे सामान्य मनुष्य हैं—कमज़ोर, इच्छुक, भयभीत, प्रेमी, द्वन्द्वग्रस्त—और यही उनकी कहानियों की सबसे बड़ी कलात्मक सामर्थ्य है। उनका कथ्य-आधार किसी सिद्धांत या सम्प्रेषण की बजाय अनुभूति की व्यापकता और गहराई के साथ ही भिन्न भिन्न तरह की परिस्थितियों पर निर्भर होता है। इसीलिए उनको समझने के लिए पहले उनके बनाए हुए छोटे-छोटे जीवनदृश्यों में उतरना आवश्यक है । उनकी भाषा, दृश्य-निर्माण और पात्र-सृजन में जो सूक्ष्मता है, वही उनकी कलात्मक पहचान बनाती है।उनकी कृतियों की भाषा सघन होने के बावजूद सरल है ; संवाद रोज़मर्रा की बोलचाल के मुताबिक हैं, पर अभिव्यक्ति बहुस्तरीय है। यही भाषा-शैली उन्हें चेख़व, मोपासां, कामू या मार्केज़ जैसे वैश्विक लेखकों की तरह संवादयोग्य बनाती है। वे मनुष्य की जटिलताओं को किसी एक वैचारिक पद्धति के भीतर नहीं बांधते । क्रान्ति के ढिंढोरची रचनाकारों से भिन्न उनकी कहानियाँ हमें रोज़मर्रा के दृश्य में उस असहाय करुणा को महसूस करवाने में समर्थ हैं जिसे भोंपू-सा उछालने वाला कोई नारा नहीं छू नहीं सकता । याद आ सकते हैं ग्राम्शी, जिन्होंने लिखा है कि सामाजिक यथार्थ को व्यक्त करनेवाले लेखकों में एक उसका प्रवक्ता होता है और दूसरी कलाकार ।
हरि भटनागर के कथा-संसार में —गली, नाला, तालाब, कस्बा, ऐशगाह जैसे भवन—कभी पृष्ठभूमि में नहीं होते; वे पात्रों के आंतरिक मानचित्र का विस्तार करते हैं। किसी रचना का पहला छोटा-सा वाक्य, कोई छोटा दृश्य, एक साधारण संवाद पाठक को भीतर तक झकझोर देता है —यही उनके फ़न का महवर है: वह दृश्य जो छोटा दिखते हुए भी मनुष्य के अस्तित्व पर भारी पड़ता है। उदाहरण के लिये ‘छाया’ कहानी की शुरुआत को लें ।इसके शुरू में ही एक वाक्य मिलता है —“नाले की दीवार पर दूर-दूर तक बैठे बच्चे झाड़ा फिर रहे थे। ”कहने की ज़रूरत नहीं कि यह अकेला दृश्य ही पूरे सामाजिक यथार्थ की ओर इंगित कर देता है।
उनकी कहानियों में भय, असुरक्षा और एक प्रकार का संयमित आक्रोश मिलता है । भय यहाँ काफ़्का जैसा अलौकिक नहीं होता; न ही वह केवल अस्तित्ववादी दर्शन के रूप में आता है । यह रोज़मर्रा का भय है। मनुष्य के भीतरी और बाहरी दोनों संघर्षों को समेटे ‘आपत्ति’ कहानी संग्रह की उनकी कहानियां बार-बार पठनीय हैं। ज़िंदगी की वास्तविकता हरि भटनागर के कुछ पात्रों को कामू के अस्तित्ववादी पात्रों से जोड़ती हैं —पर अंतर यह कि उनका मनुष्य कभी दार्शनिक शून्यता में खो नहीं जाता; वह उसी व्यवस्था में ज़िंदा रहता है जो उसे तोड़ भी देती है और उसका सहारा भी बनी रहती है। प्रेम और हिंसा का मिश्रण उनकी कई कहानियों की धुरी है। ‘किस्सा तोता बाई का’ में प्रेम बोलकर भी स्वामित्व की हठ-भूमि बन जाता है—“यह धमकी नहीं, सलाह है” जैसा सरल वाक्य मानवीय संबंध के भीतर वर्चस्व और स्वामित्व के साथ ही भय की जटिलता को उजागर कर देता है।
कथा-निर्माण के दौरान हरि भटनागर न तो विस्तृत मनोविश्लेषण का यत्न करते हैं और न ही कथ्य को किसी आख्यान में बदलते हैं; वे ज़्यादातर दृश्य रखते हैं और वही दृश्य प्रभाव पैदा कर देता है। स्मृति उनका एक ज़रूरी उपकरण है। स्मृति उनके साहित्य में तात्कालिकता नहीं, अस्तित्व की गहराई बनकर आती है—जिससे वर्तमान अपने आप संदर्भित हो जाता है। उनके पात्र अनेक बार अपने भीतर की कमज़ोरियों, असमर्थताओं और छुपे हुए दोषों के साथ खुल कर सामने आते हैं—वे आदर्श नहीं, यथार्थ का प्रतिनिधित्व करते हैं। यही कारण है कि वे पाठक के मन में लंबे समय तक टिकते हैं। वे दिखाते हैं कि किसी समाज के सबसे सामान्य तत्वों के भीतर कितनी विशाल मानवीयता और उसी के साथ कैसी-कैसी विडम्बना समाई रहती है। कहानीकार हमें यह याद दिलाता है कि साहित्य का उद्देश्य केवल दुनिया को सजाना नहीं, बल्कि उसके भीतर असहज सत्य को उभारना भी है।
‘आपत्ति’ कहानी-संग्रह में आपत्ति , छाया , टर्की , पटेलन की नींद , घोंसला , किस्सा तोता बाई का , उफ़, गुनाह , डामर पिघलती सड़क पर एक छाया,जीप उड़ाते परिंदे , मोहम्मद और अग्नि परीक्षा शीर्षक कहानियाँ शामिल हैं । विवेच्य संग्रह की ‘आपत्ति’ कहानी एक गैर-मामूली रचना है। इसे पढ़ते समय लगता है कि यह एक साधारण-सी गली की कहानी है, पर धीरे-धीरे यह हमारे भीतर बैठी उदासीनता, करुणा और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध विद्रोह को कुरेदने लगती है। कहानी का केंद्र है एक आवारा सूअरनी, जिसे लेखक “सुअरिया” कहता है। वह भोजन के रूप में गली में फेंकी जानेवाली उच्छिष्ट चीज़ें खाकर गन्दगी का बोझ कम करती है और एक दिन कथावाचक से टकरा जाती है। वह उसके बगल के खाली प्लॉट में शरण लेकर बच्चों को जन्म देती है। कुत्तों की धमकी, घरवालों का गुस्सा, उसका नशेड़ी मालिक राजू – सबके बीच वह बस जीने की जुगत भिड़ाती रहती है। कहानी ख़त्म होती है कुत्तों के हमले पर, जब सुअरिया खाना ढूंढने निकलती है । सबसे पहली जो उल्लेखनीय बात है वह यह कि बेहद सादगी से लिखी गई इस कहानी की भाषा में गजब की ताकत है। सुअरिया का मोटा पेट, चिकने पैर, लंबी थूथन, छोटी आँखें – ये सारे चित्र इतने जीवंत हैं कि पाठक उसे सचमुच देखने लगता है। जब वह बोलती है, तब भी भाषा बनावटी होने के बजाय बिल्कुल गली की है। उसकी हर बात में करुणा और मजबूरी एक साथ झलकती है। कहानी छोटी-छोटी घटनाओं से बनी है – कचरा फेंकना, टकराव, बच्चे जनना, कुत्तों का डर, राजू की हिंसा – पर ये सारी घटनाएँ एक-दूसरे से इस तरह जुड़ी हैं कि अंत तक आते-आते पाठक अश्रुपूरित हो जाता है।
उत्तर-उपनिवेशवादी नज़रिए से देखें तो ‘सुअरिया’ हमारे समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े समुदाय की उस औरत का अल्टर-ईगो है जिसे शहर ने ‘घुसपैठिया’ मान लिया है। गाय को बासी दाल दी जाती है, कुत्ते ब्रेड के टुकड़े छीन लेते हैं और ‘सुअरिया’ को सिर्फ़ उनसे बचा-खुचा जूठन मिलता है। यह ठीक वही पदानुक्रम है जो आज़ादी के बाद भी बना हुआ है। शहर का मध्यवर्ग खुद को ‘सभ्य’ मानता है, पर उसकी सभ्यता कचरे के ढेर पर टिकी है। सुअरिया जब कहानीकार के बगल के प्लॉट में घुसती है तो वह दरअसल शहर के ‘खाली’ दिखने वाले कोने पर अपना हक़ जताती है – ठीक वैसे ही जैसे अस्थायी बस्तियाँ बसाने वाले घुमंतू लोग करते हैं। कहानीकार का डर, उसकी पत्नी का गुस्सा, कुत्तों की हिंसा – ये सब मिलकर हमें याद दिलाते हैं कि ‘हमारा’ और ‘उनका’ फ़र्क़ आज भी कितना गहरा है।
मार्क्सवादी दृष्टि से देखें तो यह वर्ग-संघर्ष की छोटी-सी मिसाल है। उच्छिष्ट खाद्य भी यहाँ पूँजी है – जो सबसे कमज़ोर को आख़िर में मिलता है। कहानी का नैरेटर मध्यवर्ग का है, जो देखता तो बहुत कुछ है पर कुछ ख़ास नहीं करता । उसकी बेटी की परीक्षा है, इसलिए सुअरिया की चीख़ें ‘डिस्टर्बेंस’ बन जाती हैं। यानी मेहनतकश औरत की तकलीफ़ भी मध्यवर्ग के लिए सिर्फ़ शोर है।
स्त्रीवादी दृष्टि से ‘सुअरिया’ एक माँ है जो हर हाल में बच्चों को बचाने की कोशिश करती है। वह अपना सारा दूध, अपना सारा जीवन-रस बच्चों को दे देती है और खुद भूख से मरने को तैयार है। उसका तथाकथित मालिक (राजू) उसे पीटता है, बच्चे छीनता है, पर वह कोई मदद नहीं माँगती। वह अकेले ही सब सहती है। कहानीकार की पत्नी और बेटी शुरू में उससे नाराज़ हैं, पर अंत में वे ही हैं जो कहती हैं – ‘इसे भगाओ मत’। वजह यह कि स्त्रियाँ एक-दूसरे की तकलीफ़ को ज़्यादा जल्दी समझ जाती हैं।
अस्तित्ववादी नज़रिए से यह कहानी एक हद तक अल्बेयर कामू या सार्त्र की याद दिलाती है। सुअरिया बिना किसी बड़े मक़सद के सिर्फ़ जीने के लिए लड़ती है। उसका जीवन व्यर्थ प्रतीत होता है, पर उस व्यर्थता में भी वह मर्यादा बनाए रखती है। कहानीकार बीच-बीच में सोचता है कि वह कुछ करे, पर डरता है और असुविधापूर्ण स्थितियों को टालता है। अंत में जब वह कुत्तों से ‘सुअरिया’ को बचाने के लिए लाठी उठाता है, तो ख़ुद घायल हो जाता है – मानो कह रहा हो कि करुणा का रास्ता आसान नहीं होता।
कुल मिलाकर ‘आपत्ति’ एक बहुत छोटी कहानी है, पर उसमें शहर की सारी गंदगी, सारी उदासीनता, सारी करुणा और सारा अन्याय समा गया है। हरि भटनागर ने सूअरनी के बहाने समाज को आइना दिखाया है कि हममें से कितने लोग रोज़ अपने आसपास की ‘सुअरिया’ को देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। और, जब हम आख़िर में कुछ करना चाहते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। यह कहानी इसलिए बार-बार पढ़ी जाती है, क्योंकि यह सिर्फ़ एक सूअरनी की कहानी नहीं, हमारे अपने ख़ामोश अपराधबोध की कहानी है।
‘आपत्ति’ पढ़ते ही मन में एक साथ कई सवाल उमड़ आते हैं। यह कहानी दरअसल हाशिए पर जीने वालों की कहानी है। सुअरिया कोई साधारण सूअरनी नहीं, वह उन तमाम जीवों-इंसानों की प्रतिनिधि है जिन्हें शहर ने ‘गंदा’, ‘अनचाहा’ और ‘घुसपैठिया’ आदि मान लिया है। गली में उच्छिष्ट भोजन के बंटवारे में मध्यवर्ग का सामाजिक व्यवहार अभिव्यक्त हुआ है –सुअरिया को पूजनीय गाय और आक्रामक कुत्ते के बाद सिर्फ बचा-खुचा उच्छिष्ट मिलता है, क्योंकि वह सबसे नीचे है। यह वही पदानुक्रम है जो आज भी हमारे शहरों में गरीब, दलित, प्रवासी और हाशिए की अस्मिताओं के साथ चलता है।
यह कहानी करुणा और निजी स्वार्थ के बीच फंसे मध्यवर्गीय मन को भी खोलती है। कहानी का वाचक सुअरिया को देखकर द्रवित होता है, उससे टकराने पर डरता है, फिर भी उसे शरण देता है । पहले गुस्सा करने वाली उसकी पत्नी और बेटी अंत में कहती हैं – इसे भगाओ मत। यह बदलाव बहुत सूक्ष्म है और इससे स्पष्ट होता है कि करुणा किसी आक्रामक नारे के बजाय, छोटी-छोटी स्थितियों में पैदा होती है। यही कहानीकार की अनुभूति की संस्कृति की विशेषता है ।
मातृत्व का बलिदान यहाँ बहुत मार्मिक ढंग से उभरा है। सुअरिया प्रसव के दर्द से चीखती है, फिर भी बच्चों को अपना सारा दूध पिला देती है, खुद भूख से सूख जाती है और अंत में बच्चों को बचाने के लिए खुद ही बाहर निकल जाती है। उसका नशेड़ी मालिक राजू उसे पीटता है, बच्चों को बेचने की धमकी देता है – यह घरेलू हिंसा और निचले तबके की औरतों की मजबूरी का सटीक चित्र है। व्यंग्य भी कमाल का है। कुत्ते कहानीकार पर ‘नाइंसाफी’ का इल्ज़ाम लगाते हैं कि सुअरिया उनका हिस्सा चट कर रही है। यह ठीक वही तर्क है जो समाज में मज़बूत लोग कमज़ोरों के हक़ में आवाज़ उठाने वालों पर लगाते हैं।
इस रचना का यक्ष प्रश्न शीर्षक में ही छिपा है – ‘आपत्ति’। आपत्ति किस बात पर है? सुअरिया की चीखों पर, कुत्तों की हिंसा पर, राजू की क्रूरता पर, या हमारी अपनी ख़ामोशी पर ? प्रकारांतर से हरि भटनागर चुपचाप यही पूछते हैं कि हमारी असली आपत्ति कहाँ होनी चाहिए।
सुअरिया का कथन —“मैं यहाँ आ डटी हूँ। यह मेरा मुकम्मल ठीहा हो गया”—यह कथन हिन्दी में ‘गुलदाउदी’ शीर्षक से अनूदित जॉन स्टाइनबेक की प्रसिद्ध कहानी ‘The Chrysanthemums’ की नायिका एलिसा एलेन की याद दिलाता है, जो अपनी सीमित दुनिया में किसी ठौर की चाहत रखती है। पर स्टाइनबेक की एलिसा जहाँ भावात्मक परित्याग से टूट जाती है, वहीं हरि भटनागर की ‘सुअरिया’ के स्वभाव में अंत तक एक ज़बरदस्त निडरता और जीवट है। कहानीकार मनुष्य और पशु—दोनों के व्यवहार में एक समान तनाव, भय और जिजीविषा दिखाता है। यह वही दृष्टि है जो टॉलस्टॉय की कहानी ‘खोल्स्टोमर’ (Kholstomer) में दिखाई देती है, जहाँ घोड़ा मानव समाज पर टिप्पणी करता है । ‘आपत्ति’ का रचनाकार पशु-लोक को एक पैमाने की तरह रखता है, जिससे मानव–जीवन के विस्थापन की पीड़ा को अभिव्यक्ति मिलती है।
विवेच्य संग्रह की ‘छाया’ एक ऐसी कहानी है जो शहरी गरीबी, पारिवारिक टूटन और मानवीय कमजोरियों को बहुत ही संवेदनशील तरीके से उकेरती है। कहानी का केंद्र राम हरख नामक एक बुजुर्ग किसान है ,जो गांव छोड़कर शहर में बेटे नगीना के पास आता है, लेकिन बेटे की मौत के बाद बहू सितारा के साथ झुग्गी में रहने को मजबूर हो जाता है। कहानीकार यहाँ एक ‘स्लम’ की पृष्ठभूमि पर दुःख, शक और अनुचित इच्छाओं की छाया को चित्रित करता है, जो अंत में राम हरख की मौत के साथ ख़त्म होती है। यह कहानी हिंदी कहानी की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाती है, जिसमें सामाजिक हक़ीक़त को सामने लाया जाता है, लेकिन कहानीकार का अंदाज मनोवैज्ञानिक भी है। विभिन्न साहित्यिक सिद्धांतों के आलोक में इस रचना को परखने की कोशिश करने पर पता चलता है कि ‘छाया’ न सिर्फ सामाजिक आलोचना है, बल्कि मानवीय अस्तित्व की गहराइयों को भी छूती है, जिससे यह एक बहुआयामी रचना बनती है।
कहानी की संरचना बहुत सधी हुई है और हर घटना एक-दूसरे से जुड़कर भावनात्मक चरमोत्कर्ष तक पहुंचती है। रचना की भाषा सरल है, लेकिन विवरणों में गजब की गहराई है – जैसे स्लम का नक्शा, चांदनी रात में जुगनुओं का चमकना या राम हरख की आंखों में छिपी व्यथा- ये तत्त्व कहानी को जीवंत बनाते हैं और विभिन्न पात्रों (जैसे पानवाले की रहस्यमयी आंखें) की विचित्र हरकत की ओर पाठक को चौकन्नी निगाह डालने के लिए बाध्य करते हैं । कथानक का क्रम क्लासिक है: राम हरख का शहर आना (उत्थान), नगीना की मौत (संघर्ष), सितारा पर शक (चरम) और अंत में राम हरख की मौत (समापन)। लेकिन इस औपचारिक ढाँचे में कुछ कमियां भी नज़र आती हैं और कहानी कभी-कभी सोपओपेरा-सी लगती है। उदाहरण के लिए पानवाले के संवाद ज्यादा लंबे हैं, जो गति को थोड़ा धीमा कर देते हैं। फिर भी, अंतर्वस्तु और रूप का मेल कहानी को एकीकृत करता है और रचना का शीर्षक पूरे कथानक की छाया जैसी अनिश्चितता को दर्शाता है।
संरचनावादी नज़रिए से देखने पर ‘छाया’ कहानी में अन्तर्निहित द्वंद्व की ओर हमारा ध्यान जाता है- जहाँ अर्थ विरोधों से बनता है: गांव/शहर, बुढ़ापा/जवानी, करुणा/शक और पवित्रता/अनैतिकता। सितारा ‘अन्य’ का प्रतीक है – एक विधवा जो स्वतंत्र है, लेकिन समाज की नज़र में संदिग्ध। स्लम का वर्णन (नाला, कचरा, हैंडपंप) एक संरचनात्मक लघु ब्रह्माण्ड (‘माइक्रोकोसम’) है,जिनमें लेवी-स्ट्रॉस के मिथकों में आए वर्णन की तरह संसाधनों की कमी पदानुक्रम पैदा करती है। राम हरख का शक एक द्वंद्व है जो परिवार की संरचना को तोड़ता है और अंत में उसकी मौत कई द्वंद्वों का अस्पष्ट समाधान है। लेकिन कथा-संरचना यहाँ सीमित लगती है, क्योंकि मानवीकरण जटिल सामाजिक गतिशीलताओं को सरल बना देता है। हालांकि कहानीकार ने इसे यथार्थ से जोड़कर द्वंद्वों को जीवंत बनाया है।
मार्क्सवादी आलोचना के बुनियादी सिद्धांतों के तहत विचारने पर यह कहानी पूँजीवाद के अबाध विस्तार के फलस्वरूप महानगरों के विकास और उनमें बगैर बुनियादी सुविधाओं के कुकुरमुत्ते की तरह पैदा होने वाली झोपड़पट्टियों में रहनेवालों की दुर्दशा को चित्रित करती है। राम हरख और सितारा सर्वहारा वर्ग के प्रतिनिधि हैं। नगीना की मौत सेंट्रिंग के काम में होती है – जो श्रमिक शोषण का प्रतीक है, जिसके तहत गरीब मजदूर निर्माणाधीन ऊँची इमारतों से गिरकर मरते हैं। स्लम की हालत बदतर है , जहाँ कचरा भी जीविका का साधन है। राम हरख का शक वर्गीय अलगाव से उपजता है – वह बूढ़ा दूसरे पर निर्भर है, जबकि सितारा कमाती है, जो पारंपरिक शक्ति संतुलन को उलट देता है। कहानीकार यहां मध्यवर्गीय उदासीनता की आलोचना करता है, जैसे पास की मध्यवर्गीय कालोनी के लोग सितारा या उसकी तरह के लोगों को काम देते हैं ,लेकिन उसकी दुर्दशा से बेख़बर हैं। कहानी का शीर्षक ‘छाया’ पूँजीवादी विकास की छत्रछाया है, जिसमें में जीने को अभिशप्त दबे-कुचले ग़रीबों लोगों की अमानवीय जीवनस्थितियों को अलग से बयान करने की ज़रूरत नहीं है । लेकिन रचना में स्वभावत: समाधान नदारद है, जो प्रकारांतर से मिथ्या चेतना के प्रसार को उजागर करता है।
स्त्रीवादी दृष्टि से ‘छाया’ विधवा के शोषण की कहानी है। सितारा मजबूत है – वह काम करती है, राम हरख की देखभाल करती है और मनचले लोगों के अनुचित प्रस्तावों को ठुकराती है। लेकिन समाज (पानवाला, मोटरसाइकिल वाला, बूढ़ी औरत) उसे यौन-इच्छा की पूर्ति के साधन की तरह देखता है । राम हरख का शक पितृसत्तात्मक है, जो विधवा को संदिग्ध मानता है और अंत में भांग पीकर रखा गया उसका अपना प्रस्ताव और उसकी निजी चाहत स्त्रियों का वस्तूकरण (थिन्गीफिकेशन या रेइफिकेशन) दर्शाता है। इकोफ़ेमिनिज्म के तहत सितारा प्रकृति की तरह है – मजबूत लेकिन शोषित। समाजशास्त्रीय शब्दावली में कहें तो कहानी में एजेंसी की कमी है, क्योंकि सितारा की आवाज़ प्रतिक्रियाशील होने के बावजूद उसकी दृढ़ता पितृसत्ता की आलोचना करती है।
उत्तर-उपनिवेशवादी लेंस से यह कहानी भारत के शहरीकरण को औपनिवेशिक विरासत के रूप में देखती है, जहाँ गांव से शहर की यात्रा विस्थापन का रूपक है। राम हरख ‘सबाल्टर्न’ है – हाशिए पर है , जहां स्लम ‘अन्य’ का स्थान है। होमी भाभा की शब्दावली में कहें तो सितारा की स्वतंत्रता उपनिवेशवाद के बाद की ‘हाइब्रिडिटी’ दिखाती है, लेकिन शक की छाया औपनिवेशिक पदानुक्रम (शहर बनाम गांव) को बनाए रखती है। फ्रांसिस फैनन के मुहावरे में कहानीकार जाने-अनजाने उपनिवेशित मन की जांच करता है, जहाँ राम हरख का शक पहचान के संकट से उपजता प्रतीत होता है।
अस्तित्ववादी दृष्टि से ‘छाया’ व्यर्थता-बोध की कहानी है। राम हरख का अस्तित्व व्यर्थ है – बेटे की मौत के बाद वह असहाय है और शक उसकी ‘उबकाई’ जैसी पीड़ा है। सितारा स्वतंत्रता चुनती है, लेकिन राम हरख की मौत सार्त्रियन बुरे विश्वास (बैड फेथ) से है – वह जिम्मेदारी से भागता है। यह कहानी अल्बेयर कामू की तरह व्यर्थता को उजागर करती है, जहां मौत ही समाधान है।
कुल मिलाकर ‘छाया’ हिंदी साहित्य में एक प्रभावशाली रचना है, जो यथार्थवाद को मनोविज्ञान से जोड़ती है। हरि भटनागर की कलात्मक सूक्ष्मता विभिन्न सिद्धांतों के आलोक में कहानी को पढ़ने से उभरती है – औपचारिक एकता, संरचनात्मक द्वंद्व, सामाजिक-आर्थिक असमानता, पितृसत्तात्मक दमन, उपनिवेशोत्तर हाशिया और अस्तित्ववादी रिक्तता। कहानी की कमजोरी भावुकता की अधिकता है, लेकिन यह समाज की ही प्रतिच्छाया है और कहानीकार को मानवीय कमजोरियों का गहन पर्यवेक्षक कलाकार साबित करती है।
स्त्रीवादी सिद्धांतों के आलोक में इस कहानी को परखने से स्पष्ट होता है कि कहानीकार पितृसत्तात्मक समाज की क्रूरता को उजागर करता है जहाँ स्त्रियाँ—ख़ासकर विधवा —शोषण, संदेह और वस्तुकरण की शिकार होती है। लैंगिक असमानता की जड़ों को चुनौती देने वाले स्त्रीवादी सिद्धांत के अनुसार यहाँ सितारा के चरित्र के माध्यम से कहानीकार महिलाओं की एजेंसी, पितृसत्ता के दबाव में उत्पन्न हुई सामाजिक निर्मितियों की आलोचना प्रस्तुत करता है।
उदारवादी स्त्रीवाद की दृष्टि से ‘छाया’कहानी स्त्रियों के अधिकारों और स्वतंत्रता की कमी को उजागर करती है। सितारा एक विधवा है, जो नगीना की मौत के बाद घर चलाने के लिए कॉलोनी में झाड़ू-पोंछे और रोटी बनाने का काम करती है। यह उसकी आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक है । सितारा राम हरख की देखभाल करती है, घर संभालती है और लोगों के अनुचित प्रस्तावों (जैसे बूढ़ी औरत का रिश्ता या मोटरसाइकिल वाले की छेड़खानी) को ठुकराती है। वह कहती है, “मैं अब किसी पचड़े में पड़ने वाली नहीं। गृहस्थी बसाना गुलामी जैसा होगा।” यह उसकी एजेंसी को दर्शाता है, जहाँ वह पितृसत्ता के बंधनों से मुक्त होना चाहती है। लेकिन समाज—पानवाला, पड़ोसी और राम हरख—उसकी स्वतंत्रता को संदेह की नज़र से देखते हैं । राम हरख का शक (“कहीं सितारा किसी गलत मंशा के अंदर न फँस जाए”) विधवा स्त्रियों पर पितृसत्ता द्वारा थोपे जाने वाले नैतिक बंधनों का उदाहरण है और उदार स्त्रीवाद इसकी आलोचना करता है कि कानूनी समानता के बावजूद सामाजिक पूर्वाग्रह स्त्रियों को बंधन में रखते हैं। कहानीकार यहाँ दिखाता है कि सितारा की मेहनत (अनपेड और पेड श्रम) परिवार को चलाती है, लेकिन उसकी आज़ादी पर पितृसत्ता की ‘छाया’ मंडराती रहती है, जो तमाम तरह के विकास के बावजूद स्त्रियों के अधिकारों की अपूर्णता का द्योतक है।
रेडिकल स्त्रीवाद के लेंस से नज़र डालने पर यह कहानी पितृसत्ता को मूल समस्या के रूप में प्रस्तुत करती है, जहाँ स्त्रियों का शरीर और यौनिकता नियंत्रण का माध्यम बनता है। सिमोन द बोउवार की “द सेकेण्ड सेक्स”(The Second Sex) में विस्तार से बतलाया गया है कि पितृसत्ता स्त्रियों को कैसे ‘अन्य’ मानती है। विवेच्य कहानी में सितारा भी राम हरख की नज़र में ‘अन्य’ बन जाती है—पहले देखभाल करने वाली बहू, फिर संदिग्ध विधवा और अंत में इच्छा की वस्तु। राम हरख का शक पानवाले के संकेतों से शुरू होता है, जो समाज के पुरुष-केंद्रित नज़रिए का नमूना है: “आजकल के लौंडे बहुत हरामी हैं।” यह पुरुषों की एकजुटता है, जहां बेबस स्त्रियों को ‘पतंग’ की तरह उड़ाने की होड़ लगी है। राम हरख खुद सितारा के ‘चांदी के पांव’ देखकर आकर्षित होता है और भांग पीकर अनुचित प्रस्ताव करने की सोचता है। यह पितृसत्ता के अंतर्गत ससुर-बहू संबंधों में छिपी यौन हिंसा की संभावना को उजागर करता है। सितारा का प्रतिरोध (“मैं कहीं भटकने वाली नहीं। इतनी बेअकल नहीं हूं। मर जाऊंगी लेकिन अपना धर्म नहीं छोड़ूंगी”) रेडिकल स्त्रीवाद से जुड़ता है, जहां स्त्रियाँ पितृसत्ता से जूझती हुई अपना वक़ार और मर्यादा बचाने में लगी रहती हैं। लेकिन कहानी का अंत राम हरख की मौत से होता है, जहाँ सितारा रोती है—यह पितृसत्ता द्वारा अप्रत्यक्ष रूप में स्त्रियों पर थोपे गए भावनात्मक बोझ को दिखाता है, जो उन्हें शोषित रखता है। कहानीकार की आलोचना यहां तीखी है: पितृसत्ता न सिर्फ स्त्रियों को दबाती है, बल्कि पुरुषों को भी विकृत बनाती है, जैसा राम हरख और अन्य पुरुषों के चरित्र में दिखता है।
मार्क्सवादी स्त्रीवाद के अनुसार यह कहानी लैंगिक असमानता को वर्ग-शोषण से जोड़ती है। सितारा गरीब है, स्लम में रहती है, जहाँ उसका श्रम (घरेलू और बाहर का) पूँजीवादी व्यवस्था को बनाए रखने के मददगार है। एवलिन रीड की शब्दावली में यहां स्त्रियों का अनपेड श्रम (राम हरख की देखभाल) और पेड श्रम (कॉलोनी में काम) दोनों दिखाए गए हैं, जो वर्गीय असमानता को बढ़ाते हैं। नगीना की मौत सेंट्रिंग के काम में होती है, जो श्रमिकों के शोषण का प्रतीक है और सितारा को घर चलाने की जिम्मेदारी मिलती है। राम हरख निर्भर है (“दो रोटी देने की औकात हो तो कुछ कहने का हक भी बने”), जो विपरीत लिंगी की भूमिकाओं को दर्शाता है, लेकिन पितृसत्ता उसे शक करने का अधिकार देती है। स्लम की गरीबी (नाला, कचरा) स्त्रियों को ज्यादा प्रभावित करती है, जहाँ सितारा को छेड़खानी और संदेह का सामना करना पड़ता है। कहानीकार यहाँ दिखाता है कि पूँजीवाद स्त्रियों को ‘वर्गीय और लिंगीय’ दोहरे शोषण में फँसाता है और सितारा की स्वतंत्रता (काम करना) भी उसे संदिग्ध बनाती है। ज़ाहिर है कि मार्क्सवादी स्त्रीवाद के अनुसार आर्थिक आज़ादी एवं आत्मनिर्भरता के बिना सामाजिक बदलाव की कोई संभावना नहीं है।
अंतर्विषयक स्त्रीवाद(Intersectional Feminism) का तर्क यह है कि लिंग (gender) के साथ-साथ जाति, वर्ग, धर्म, यौनिकता (sexuality) और विकलांगता जैसी पहचान के विभिन्न पहलू कैसे मिलकर उत्पीड़न और भेदभाव के अलग-अलग अनुभव बनाते हैं और यह किसी एक पहचान का योग मात्र नहीं होता। यह दृष्टि कहानी में सितारा की स्थिति को लिंग, वर्ग, उम्र और विधवा होने के चौराहे पर देखती है। किम्बर्ले क्रेंशॉ जैसे विचारकों की अवधारणा के तहत कहा जा सकता है कि सितारा की दुर्दशा एकललिंगी असमानता नहीं, बल्कि बहुस्तरीय है: वह गरीब है (स्लम) विधवा है (संदेह की शिकार) और स्त्री है (शोषण का लक्ष्य)। बूढ़ी औरत का प्रस्ताव (“कब तक तू यूं छूछी बैठी रहेगी”) विधवाओं पर थोपे गए ‘शादी के दबाव’ को दिखाता है, जो वर्गीय जरूरतों से जुड़ा है। राम हरख का शक अंतर्विषयक है—वह खुद बुजुर्ग और परनिर्भर है, लेकिन पितृसत्ता उसे स्त्रियों पर नियंत्रण का अधिकार देती है। हरि भटनागर भारतीय संदर्भ में अमेरिकी स्त्रीवादी बेल हुक्स की तरह नस्ल/जाति को भी विमर्श का बिंदु बनाने की कोशिश करते हैं (हालांकि यह बिलकुल स्पष्ट नहीं है ), जहाँ स्लम की कामगार स्त्रियाँ बहुस्तरीय उत्पीड़न झेलती हैं। कहानी की ताक़त यह है कि सितारा इन स्थितियों में भी दृढ़ रहती है, लेकिन कमजोरी यह है कि उसकी एजेंसी सीमित है—वह राम हरख की मौत पर मातम करती है, जो उस पर पितृसत्ता द्वारा उसके अनजाने लादे गए भावनात्मक बोझ (इमोशनल बर्डन) को दर्शाता है। याद रहे कि सितारा का रुदन हमें शिद्दत से याद दिलाता है कि स्त्री होने के साथ ही बुनियादी रूप से प्रथमत: वह इंसान है ।इसलिए पतित मानसिकता वाले बूढ़े ससुर की मृत्यु के बाद उसका रोना इंसानियत की जीत है और यह महर्षि वाल्मीकि के एक सुविख्यात श्लोक का स्मरण कराता है जिसमें कहा गया है कि कि मृत्यु के साथ ही वैर भी समाप्त हो जाता है:
मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम् ।
क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ॥
(वाल्मीकि रामायण:युद्धकाण्ड -111-17)

कुल मिलाकर, ‘छाया’ कहानी स्त्रीवादी सिद्धांतों की रोशनी में पितृसत्ता की ज़बरदस्त आलोचना प्रस्तुत करनेवाली समर्थ रचना प्रतीत होती है। कहानीकार सितारा को पीड़ित नहीं, बल्कि प्रतिरोधी बनाता है, जो स्त्रीवादी की वैचारिकी से जुड़ता है। लेकिन कहानी की सीमा यह है कि इसका अंत पुरुष-केंद्रित है (राम हरख की मौत पर सितारा का विलाप), जो एक सामाजिक वास्तविकता है और यह अबतक स्त्रियों को पितृसत्ता के शिकंजे से पूरी तरह आज़ाद नहीं होने दे रही है ।
“छाया” कहानी को इकोफेमिनिज़्म (Eco-feminism) के नज़रिए से पढ़ते ही पूरा परिदृश्य बदल जाता है। इकोफेमिनिज़्म वह स्त्रीवादी चिंतनधारा है जो मानती है कि जिस तरह पितृसत्ता ने औरतों को दबाया है, ठीक उसी तरह पूँजीवादी-औद्योगिक व्यवस्था ने प्रकृति को भी दबाया, शोषित किया और ‘अन्य’ बना दिया है। अमूमन औरत और प्रकृति—दोनों को उपभोग की वस्तु, प्रजनन की मशीन और ‘गंदा’ माना गया है। ‘छाया’ कहानी में यह संबंध बहुत स्पष्ट और दर्दनाक ढंग से उभरता है।
कहानी की पूरी पृष्ठभूमि ‘गंदी बस्ती’ है—नाला, कीचड़, ठहरा हुआ बदबूदार पानी, कचरे का ढेर, पीपल का अकेला पेड़, उल्लू आदि । यह कोई प्राकृतिक सुषमा से भरपूर क्षेत्र नहीं है; यह पूँजीवादी दोहन की शिकार , कचरे में डूबी, बदबू मारती बजबजाती प्रकृति है। ठीक वही स्थिति है जिसे इकोफेमिनिस्ट वंदना शिवा ‘विकास’ के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों की ज़मीनों, जंगलों और नदियों की दुर्दशा बताती हैं।
सितारा और यह बस्ती एक ही शरीर जैसे हैं। दोनों को ‘गंदा’ कहा जाता है, दोनों पर लोग कचरा फेंकते हैं, दोनों को ‘साफ़’ करने की ज़िम्मेदारी औरतों की ही है (सितारा झाड़ू लगाती है, नाले पर झुकती है)। जब सितारा काम पर जाती है तो कॉलोनियों की ‘साफ़-सुथरी’ दुनिया उसे इस्तेमाल करती है और वापस गंदी बस्ती में धकेल देती है—ठीक वैसे ही जैसे विकास प्रकृति को लूटकर कचरे का ढेर छोड़ जाता है।
फ्रांस्वा दॉबोन और ग्रेटा गार्ड सरीखे इकोफेमिनिस्ट विचारकों के अनुसार औरत का शरीर और पृथ्वी, एक ही तरह शोषित होते हैं—प्रजनन के लिए इस्तेमाल करो, दूध निकालो, फिर फेंक दो। नगीना की मौत के बाद सितारा अपना सारा शारीरिक और भावनात्मक श्रम राम हरख पर उड़ेल देती है। वह घर चलाती है, रोटी बनाती है, बुजुर्ग की सेवा करती है। लेकिन जैसे ही वह थोड़ी-सी स्वतंत्रता दिखाती है (काम पर जाना, हँसना, अपने पाँव खोलकर बैठना) वैसे ही समाज उसे ‘उपलब्ध’ मान लेता है। उसके ‘चाँदी जैसे चमकते पाँव’ देखकर राम हरख की आँखें ललचा उठती हैं—यह ठीक वही नज़र है जो जंगल को देखकर लकड़हारा या खनन कंपनी को ललचाती है। प्रकृति और सितारा दोनों ‘सुंदर’ होने की सज़ा भुगतते हैं।
भारतीय इकोफेमिनिज़्म में विधवा को अक्सर “बंजर ज़मीन” कहा जाता है—वह न प्रजनन कर सकती है, न उपजाऊ है, इसलिए उसका कोई मूल्य नहीं। कहानी में बूढ़ी औरत सितारा से कहती है: ‘कब तक तू यूँ छूछी बैठी रहेगी?’ यही भाषा किसान सूखी ज़मीन के लिए इस्तेमाल करते हैं—‘छूछी पड़ी है, कुछ बोया नहीं जा रहा।‘ सितारा का जवाब है: ‘गृहस्थी बसाना गुलामी जैसा होगा’। यह एक बहुत बड़ा इकोफेमिनिस्ट बयान है—प्रकृति भी कह रही है कि मुझे ज़बरदस्ती फिर से ‘उपजाऊ’ बनाने की कोशिश मत करो, मुझे मेरी स्वतंत्रता लौटा दो।
नाला इस कहानी में बार-बार आता है—वह ठहरा हुआ है, बदबूदार है, कीचड़ से भरा है। औरतें उसी नाले के किनारे कपड़े धोती हैं, बर्तन माँजती हैं, बच्चों को शौच के लिए भेजती हैं,नहलाती हैं। यह ठीक वही प्रतीक है जिसका इस्तेमाल मारिया माइज़ ने अपनी किताब ‘इकोफेमिनिज्म’( Ecofeminism) में किया है: दूषित नदियाँ और दूषित स्त्री-शरीर, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों को ‘साफ़ करने’ का बोझ औरत पर ही डाला जाता है।
इस नज़रिए से देखने पर राम हरख का भांग खाकर सितारा के सामने अनुचित प्रस्ताव रखने की कोशिश और नाले के किनारे गिर पड़ना, आँखें खुली रह जाना , आँसू निकलना , लेकिन बोल नहीं पाना आदि पितृसत्तात्मक-पूँजीवादी व्यवस्था का अंत है जो प्रकृति और औरत दोनों को एक साथ कुचलकर खुद भी मर जाती है। सितारा ज़ोरों से रोती है—यह रोना सिर्फ़ राम हरख के लिए नहीं, बल्कि उस पूरे तन्त्र के लिए है जो उसे जीने नहीं देता।
‘छाया’ कहानी में प्रकृति और औरत एक ही तरह की ‘छाया’ में जी रही हैं—दोनों को ‘गंदा’ कहा जाता है, दोनों को इस्तेमाल किया जाता है, दोनों पर संदेह किया जाता है और दोनों ही अंत में चुपचाप विलाप करती हैं। इकोफेमिनिस्ट दृष्टिकोण से यह कहानी सिर्फ़ एक विधवा की कहानी नहीं, बल्कि उस पूरी पृथ्वी की कहानी है जिसका ‘विकास’ के नाम पर घर्षण और दोहन किया जा रहा है। सितारा और नाला, राम हरख और कचरे का ढेर, पानवाला और मोटरसाइकिल वाला—सब मिलकर एक ही सभ्यता की तस्वीर बनाते हैं, जो प्रकृति और औरत दोनों को कुचलकर खड़ी हुई है। इसलिए जब सितारा अंत में रोती है, तो वह सिर्फ़ अपने ससुर के लिए नहीं रोती—वह उस जंगल के लिए रो रही है जो कट गया, उस नदी के लिए रो रही है जो सूख गई और अपनी उस देह के लिए रो रही है जो कभी उसकी अपनी नहीं रही। यही इकोफेमिनिज़्म का सबसे गहरा और सबसे दर्दभरा संदेश है जो कला के स्तर पर ‘छाया’ कहानी में भी समाहित है ।
इस कहानी को उत्तर-उपनिवेशवादी इकोफेमिनिज़्म (Postcolonial Ecofeminism) के नज़रिए से पढ़ना बेहद दिलचस्प अनुभव है। पोस्टकोलोनियल इकोफेमिनिज़्म वह सिद्धांत है जो उपनिवेशवाद की विरासत (जैसे अन्यीकरण, हाइब्रिडिटी और सांस्कृतिक वर्चस्व) को इकोफेमिनिज़्म के साथ जोड़ता है, जहां औरतों और प्रकृति के शोषण को एक ही सिक्के के दो पहलू माना जाता है। यह धारा वंदना शिवा और ग्रेटा गार्ड जैसी विचारकों से प्रेरित है और बताती है कि उपनिवेशवाद ने न सिर्फ़ भूमि और संसाधनों को लूटा, बल्कि औरतों को भी “प्रकृति” की तरह गुलाम बनाया—दोनों को “औपनिवेशित अन्य” (colonized other) के रूप में देखा गया। ‘छाया’ कहानी में यह सिद्धांत बहुत गहराई से उभरता है, जहाँ शहरी स्लम की पृष्ठभूमि पर ग्रामीण-शहरी विस्थापन, औरतों का शोषण और पर्यावरणीय गिरावट एक साथ जुड़ते हैं। कहानी राम हरख की है, जो गांव से शहर आता है, लेकिन बेटे की मौत के बाद बहू सितारा के साथ झुग्गी में फँस जाता है—यह उपनिवेशवाद के बाद के भारत की हक़ीक़त है, जहां ‘विकास’ के नाम पर ग्रामीण जीवन नष्ट होता है और स्त्रियाँ दोहरे शोषण की शिकार होती हैं।
‘पोस्टकोलोनियल इकोफेमिनिज़्म’ की मूल अवधारणा गायत्री स्पिवाक की “सबाल्टर्न” (subaltern) और वंदना शिवा की “मोनोकल्चर” से जुड़ती है, जहां हाशिए पर पड़े लोग (ख़ासकर स्त्रियाँ ) और भूमि दोनों, औपनिवेशिक ताकतों के शिकार हैं। ‘छाया’ कहानी में स्लम (‘गंदी बस्ती’) एक उपनिवेशित स्थान है—नाला, कीचड़, कचरे का ढेर—यह ठीक वैसी ही ‘बर्बाद भूमि’ है जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद के बाद के “विकास मॉडल” (जैसे शहरीकरण और औद्योगीकरण) ने पैदा की है। राम हरख गांव छोड़कर शहर आता है क्योंकि “खेती-बाड़ी संभलती न थी”— होमी के. भाभा की अवधारणा के तहत यह ग्रामीण भारत की ‘हाइब्रिडिटी’ है, जहां उपनिवेशी कृषि नीतियों ने भूमि को बंजर बना दिया और अब पूँजीवादी मॉडल पर विकसित महानगर इसे चूस रहे हैं । सितारा इस बस्ती की ‘प्रकृति’ है—वह झाड़ू लगाती है, बर्तन धोती है, रोटी बनाती है—उसका श्रम ठीक वैसा ही है जैसे आदिवासी औरतें जंगलों को बचाती हैं, लेकिन दोनों को “गंदा” माना जाता है। जब पानवाला कहता है “गंदी बस्ती”, तो यह उपनिवेशी नज़र है जो गरीब औरतों और प्रदूषित भूमि को एक साथ ‘अशुद्ध’ ठहराती है। सितारा की स्वतंत्रता (काम पर जाना) उसे संदिग्ध बनाती है, ठीक वैसे ही जैसे उपनिवेशवाद के बाद परंपरा और आधुनिकता के बीच फँससकर स्त्रियाँ ‘बदचलन’ करार दी जाती हैं।
कहानी में औरत और प्रकृति का शोषण एक साथ चलता है, जो ‘पोस्टकोलोनियल इकोफेमिनिज़्म’ की कुंजी है। सितारा विधवा है और समाज (राम हरख, पानवाला, मोटरसाइकिल वाला) उसे यौन-क्षुधा मिटाने के लिए ‘उपलब्ध’ मान लेता है—यह ठीक वैसा ही है जैसे उपनिवेशी शासक भूमि को ‘ख़ाली’ मानकर कब्जा करते थे। बूढ़ी औरत का प्रस्ताव (‘कब तक तू यूँ छूछी बैठी रहेगी’) विधवा को “बंजर ज़मीन” बनाता है, जो वंदना शिवा की ‘Staying Alive’ में वर्णित कृषि-उपनिवेशवाद से जुड़ता है—जहां औरतें और भूमि दोनों ‘उपजाऊ’ बनने के लिए दबाव में रहती हैं। सितारा का जवाब (‘एक के साथ जो सुख मिला, जरूरी नहीं दूसरा भी सुख दे’) प्रतिरोध है, जो उपनिवेशवाद के बाद की स्त्रियों की आवाज़ है—वे न तो पुरानी परंपरा मानती हैं, न नई पूँजीवादी गुलामी। लेकिन राम हरख का शक और अंत में भांग पीकर उसका सितारा के ‘चाँदी जैसे पाँव’ देखकर ललचाना पितृसत्ता और उपनिवेशी वर्चस्व का मेल है—वह सितारा को ‘ज़मीन’ की तरह कब्जाने की सोचता है, जैसे उपनिवेशक भूमि को कब्जाने के लिए तत्पर रहता है । नाला यहाँ प्रतीक है—ठहरा हुआ, बदबूदार, जो उपनिवेशी विकास ने पैदा किया है और सितारा उसी के किनारे ज़िन्दगी व्यतीत करती है – ठीक वैसी ही दूषित और शोषित ।
कुल मिलाकर, ‘छाया’ कहानी पोस्टकोलोनियल इकोफ़ेमिनिज़्म के लेंस से देखने पर एक सामर्थ्यवान रचना प्रतीत होती है, जो बताती है कि उपनिवेशवाद की छाया में औरतें और प्रकृति एक साथ कुचली जा रही हैं। कहानीकार स्लम को एक उपनिवेशित शरीर बनाता है, जहां सितारा की ज़द्दोजहद हमें सोचने पर मजबूर करती है कि असली मुक्ति कब आएगी—जब स्त्रियों और भूमि दोनों को ‘अन्य’ मानना बंद होगा। यह कहानी हिंदी साहित्य में पर्यावरण-संकट और लैंगिक असमानता के मुद्दे को कमोबेश उजागर करती हुई समानता और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकसम्मत इस्तेमाल (सस्टेनेबिलिटी) की अपील करती है।
हरि भटनागर की रचनाओं में ‘संकरता’(‘हाइब्रिडिटी’) एक ऐसी धुरी है जिस पर उनकी सारी दुनिया घूमती है। होमी भाभा ‘संकरता’ पर विचार करते हुए जिस तीसरे स्थान की बात करते हैं उसे हरि भटनागर सरीखे अनेक कथाकार बार-बार रचते हैं – वह स्थान जहाँ दो संस्कृतियाँ, दो पहचानें, दो समय आपस में टकराते हैं और न कुछ पूरी तरह पुराना रह जाता है, न कुछ पूरी तरह नया बन पाता है , बल्कि बीच में एक नई, असुविधाजनक, पर बेहद जीवंत जगह पैदा हो जाती है। इस संग्रह की कहानियों में यह ‘संकरता’ हर तरफ़ फैली हुई है। यहाँ ठीक यही तीसरी जगह बार-बार बनती है – ग्रामीण और शहरी, परंपरा और आधुनिकता, मानव और पशु, पुरुष और स्त्री, गरीब और मध्यवर्ग के बीच। इस संग्रह की कई रचनाओं में यह ‘संकरता’ अलग-अलग रूपों में मौजूद है।
‘छाया’ कहानी का रामहरख गांव का आदमी है, पर शहर की झुग्गी में फंस जाता है। वह न गांव लौट पाता है, न शहर का हो पाता है । सितारा भी उसी बीच की जगह में खड़ी है – गाँव की बहू, शहर की मज़दूरनी। उनकी भाषा, खान-पान, सोच सब ग्रामीण है, पर ज़िंदगी शहरी कचरे पर टिकी है। ‘आपत्ति’ में ‘सुअरिया’ न जंगल की रह गई, न घर की; वह शहर की गलियों में रहती है, जूठन पर जीती है, इंसानों से बात करती एक संकर प्राणी है । हरि भटनागर रचित ‘दो गज ज़मीन’ उपन्यास भी एक हद तक इसी ग्रामीण-शहरी विस्थापन की संकरता पर खड़ा है।
मानव और पशु के बीच की सीमा को कहानीकार बार-बार धुंधला कर देता है । ‘आपत्ति’ में सुअरिया माँ बनती है, बच्चों को स्कूल भेजने की बात करती है, बिल्ली और इंसान एक-दूसरे में घुलते दिखते हैं, कुत्ता, सूअर, गाय और इंसान एक ही कचरे के ढेर पर हक़ जताते हैं – कोई शुद्ध नहीं रहता। लिंग भी इन रचनाओं ‘संकर’ हो जाता है। सितारा कमाने वाली है, घर चलाने वाली है, पर विधवा होने की वजह से उपलब्ध मान ली जाती है – न पूरी माँ, न पत्नी, न स्वतंत्र औरत। राम हरख रोता है, डरता है, निर्भर हो जाता है – पुरुष में स्त्री जैसे गुण आते हैं। औरतें मज़बूत, कमाऊ, निर्णय लेने वाली बन जाती हैं। भाषा भी संकर है – खड़ी बोली में रचित कहानी में अवधी, बुन्देली, भोजपुरी आदि के शब्द, लय, मुहावरे घुलते रहते हैं। ‘आपत्ति’ में पशु जब बोलते हैं तो उनकी भाषा इंसानों से ज़्यादा सच्ची लगती है। यह भाषाई ‘संकरता’ पाठक को असुविधा में डाल देती है – हम तय नहीं कर पाते कि हँसें या रोएँ। समय भी उनके यहाँ एक साथ कई परतों में चलता है। गाँव का बुजुर्ग शहर में मरता है, परंपरागत औरत मज़दूरी करती है, पशु इंसानों की तरह सोचते हैं, जबकि इंसान कुछ मायने में पशुओं से बदतर हैं। इस संग्रह की रचनाएँ शुद्धता को ठेंगा दिखाती प्रतीत होती है। कोई जगह, प्राणी, भाषा, लिंग या समय पूरी तरह शुद्ध नहीं रहता। सब कुछ मिला-जुला, अधूरा और इसलिए बेहद जीवंत है।यही ‘संकरता’ उनकी सबसे बड़ी ताक़त है। इससे शिद्दत के साथ एहसास होता है कि आज के भारत में कोई शुद्ध ग्रामीण या शुद्ध शहरी, शुद्ध इंसान या शुद्ध पशु, शुद्ध औरत या शुद्ध मर्द नहीं रह गया। हम सब उस ‘तीसरे स्थान’ में जी रहे हैं, और उसी ‘तीसरे स्थान’ से साहित्य भी पैदा हो रहा है, जिसमें प्रतिरोध के साथ ही करुणा भी है । हरि भटनागर की कहानियाँ पढ़ते हुए हम अपने भीतर भी एक अजीब-सी ‘संकरता’ (हाईब्रिडीटी) महसूस करते हैं – और शायद यही कहानीकार सबसे बड़ी सफलता है।
इस संग्रह की ‘टर्की’ कहानी में चंदर का अपराधबोध एक ऐसी मनोवैज्ञानिक गुत्थी है जो पूरी कहानी को भावनात्मक और दार्शनिक गहराई देती है। फ्रायडियन नज़रिए से देखें तो चंदर का व्यक्तित्व इड, ईगो और सुपरईगो के बीच बुरी तरह फँसा हुआ है। उसका ‘इड’ सिर्फ़ एक ही चीख छोड़ता है – पत्नी को बचाना है, बच्चे की मौत के सदमे से उसे किसी भी कीमत पर निकालना है। लेकिन उसका ‘सुपरईगो’ ठीक उसी पल विद्रोह करता है जब वह सुंदरी का गला पकड़ता है। वजह यह कि लम्बे समय से उसके मन में यह धारणा बद्धमूल है कि “अगर कोई जानवर है तो वह इंसान से नीचे दर्जे का भला कैसे हो गया!”
“सुंदरी ने विनती की – मैं पेट से हूँ। मुझे बच्चों के खातिर छोड़ दे चंदर!… सच कहती हूँ चंदर भैया, मुझे बख्श दे। एक माँ की फरियाद सुन ले चंदर!” -यह आवाज चंदर के सुपरईगो को सीधे छलनी कर देती है। वह जानता है कि सुंदरी बोल रही है, माँ बनने वाली है, ठीक वही ममता जो कभी जमुनी में थी। पर ‘इड’ की पुकार इतनी प्रचंड है कि सुपरईगो दब जाता है। फ्रायड कहते हैं कि जब सुपरईगो आदमी के इड को पूरी तरह दबा नहीं पाता, तो अपराधबोध जन्म लेता है और व्यक्ति खुद को ही दंडित करने लगता है। यही ‘मेलान्कोलिया’ है। चंदर मारते वक्त भी सुन रहा है, पर सुन नहीं पाता। वह गड़ांसा उठाता है, पर उसकी उँगलियाँ काँप रही होती हैं – यह कँपकँपी अपराधबोध का पहला संकेत है, जो बाद में उसे भीतर से खा जाएगा।
फ्रांसीसी मनोविश्लेषक जैक्स लाकां (Jacques Lacan) की ‘अन्य’ (the Other) एक केंद्रीय अवधारणा है। लाकां इसे दो रूपों में विभाजित करते हैं: ‘छोटा अन्य’ (little other) और ‘बड़ा अन्य’(big Other)। ‘छोटा अन्य’ दूसरे व्यक्तियों या विषयों को संदर्भित करता है, जो व्यक्ति के सामाजिक जीवन में मिलते हैं। यह “दूसरे” की वह छवि है, जो व्यक्ति एक काल्पनिक (imaginary) स्तर पर अपने दर्पण चरण (mirror stage) में बनाता है जहां व्यक्ति खुद को दूसरे के माध्यम से देखता है। यह ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा या पहचान की भावना पैदा करता है, क्योंकि यह “मैं” की एक विकृत छवि है। उदाहरण के लिए, बच्चा दर्पण में अपनी छवि देखकर खुद को एक पूर्ण इकाई मानता है, लेकिन यह छवि वास्तव में “दूसरे” (अदर) पर आधारित होती है, जो कभी पूरी नहीं होती। ‘बड़ा अन्य’(big Other) अधिक अमूर्त और शक्तिशाली है, जो भाषा, समाज के नियम, कानून, संस्कृति और सामाजिक संरचना रूपी प्रतीकात्मक व्यवस्था (symbolic order) का प्रतिनिधित्व करता है। ‘बड़ा अन्य’ वह ‘दूसरा’ है जो व्यक्ति की इच्छाओं, विचारों और पहचान को आकार देता है। लाकां के अनुसार, भाषा ही ‘बड़ा अन्य’ है, क्योंकि हम जन्म से ही भाषा की दुनिया में फँस जाते हैं, जो हमारी सोच को नियंत्रित करती है। यह समाज की अपेक्षाएं, नैतिक नियम या ‘बड़ा भाई’ (Big Brother) की निगरानी जैसे एक काल्पनिक पर्यवेक्षक (fictitious observer) की तरह है, जिसकी आज्ञाओं का हम पालन करते हैं। ‘बड़ा अन्य’ हमारी इच्छा को ‘दूसरे की इच्छा’ निर्मित करता है, और यह कभी पूरी नहीं होती क्योंकि इसमें हमेशा एक “कमी” (lack) रह जाती है। उदाहरण के लिए, व्यक्ति सोचता है कि समाज या भाषा उसे पूर्णता देगी, लेकिन वास्तव में यह कमी ही इच्छा को जीवित रखती है। लाकां के अनुसार, “the Other” व्यक्ति की विषयता (subjectivity) का आधार है। नतीजतन हम अपनी पहचान ‘दूसरे’ के माध्यम से बनाते हैं, लेकिन यह पहचान हमेशा अपूर्ण और अलगावपूर्ण रहती है। यह फ्रायड के अवचेतन से प्रेरित है, लेकिन लाकां इसे भाषा और सामाजिक संरचना से जोड़ते हैं। कुल मिलाकर, ‘द अदर’ मानव मन की उस अन्यता (alterity) को दर्शाता है जो हमें दूसरों और समाज से जोड़ती है, लेकिन साथ ही अलग भी रखती है।

लाकां के नज़रिए से चंदर ‘दूसरे’ की इच्छा में फँसता चला जाता है। पहले सूअर परिवार उसका ‘छोटा अन्य’ था – उसकी नैतिकता का आईना, उसकी कल्पना का परिवार । लेकिन जैसे ही आसरे “टर्की” का नाम लेता है, चंदर का ‘बड़ा अन्य’ (Big Other) बदल जाता है – अब डॉक्टर का बेटा, पैसा, इलाज, समाज की सत्ता ‘बड़ा अन्य’ बन जाता है। वह उसकी इच्छा पूरी करने के लिए सूअरों को कुर्बान कर देता है। लाकां कहते हैं कि इच्छा अक्सर ‘दूसरे’ की इच्छा होती है और वह कभी पूरी नहीं होती – हमेशा एक कमी (lack) रह जाती है। जमुनी मर जाती है, इलाज़ बेकार जाता है और चंदर के पास बचता है सिर्फ़ एक ख़ालीपन। उसकी आख़िरी चीख और गड़ांसा का हाथ से छूटकर गिरना ठीक वही पल है जब उसे एहसास होता है कि उसने जिस ‘बड़े अन्य’ को चुना था, वह झूठा था। लाकां की ‘मिरर स्टेज’ की भाषा में कहें तो चंदर की पहचान पूरी तरह विखंडित (fragmented) हो चुकी है – वह न अपने पुराने ‘अन्य’ (सूअर परिवार) के साथ रह गया, न नए ‘बड़े अन्य’ ने उसे स्वीकार किया।
जुंग के नज़रिए से से सूअर परिवार चंदर का एनिमा और शैडो, दोनों है। सुंदरी उसका एनिमा है – करुणा, ममता, माँ बनने की कोमलता। बब्बर उसका शैडो है – चुपचाप सहने वाला, मजबूत, व्यावहारिक हिस्सा। जब वह सुंदरी को मारता है तो अपने भीतर की ममता को मारता है; जब बब्बर को ख़त्म करता है,तो अपनी सहनशक्ति की समाप्ति की ओर इंगित करता है । दोनों को खोकर वह अपने व्यक्तित्व के दो सबसे बड़े हिस्से खो देता है। जुंग की ‘व्यक्तिकरण’ (individuation) प्रक्रिया यहीं रुक जाती है।
ग़ौरतलब है कि भारतीय दर्शन में मोक्ष की अवधारणा से प्रेरित और प्रभावित ‘व्यक्तिकरण’ (Individuation) कार्ल जंग की एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा है, जो व्यक्ति के चेतन और अचेतन मन के विभिन्न हिस्सों को एकीकृत करके एक पूर्ण और संतुलित ‘स्व’ (self) की प्राप्ति की प्रक्रिया को संदर्भित करती है। यह एक आजीवन यात्रा है, जिसमें व्यक्ति अपनी छाया (shadow), एनिमा/एनिमस (anima/animus) जैसे आर्किटाइप्स को पहचानता और समाहित करता है, ताकि वह अपनी अनोखी पहचान विकसित कर सके। जब व्यक्ति अपने ‘शैडो’ और ‘एनिमा’ को समन्वित नहीं कर पाता तो सम्पूर्ण आत्म (सेल्फ ) का जन्म भी संभव नहीं हो पाता। जमुनी की लाश देखकर चंदर की चीख़ दरअसल अपने भीतर की मृत्यु की चीख़ है।
हालाँकि कहानी में एक कमी भी है। चंदर का अपराधबोध बहुत गहरा तो है, पर उसका बाहर आना बहुत अचानक और संक्षिप्त है। गड़ांसा गिर जाता है, वह चीखता है और कहानी ख़त्म हो जाती है । लेखक अगर चाहता तो अपराधबोध सालों तक चंदर को खाए चला जाता । लेखक ने अपराधबोध को इतनी बारीकी से गढ़ा है कि उसका इतनी जल्दी ‘ख़त्म’ हो जाना थोड़ा अस्वाभाविक और फ़िल्मी लगता है। फिर भी, यही कमी कहानी को और भयावह बना देती है ,क्योकि अपराधबोध बाहर नहीं निकलता, बस भीतर सड़ता रहता है। सबसे दर्दनाक बात यह है कि चंदर का अपराधबोध कभी शब्दों में व्यक्त नहीं होता । वह न रोता है, न किसी से कहता है, न पश्चाताप करता दिखाया जाता है। वह बस चुपचाप गड़ांसा गिरा देता है। फ्रायड इसे ही गहन ‘मेलान्कोलिया’ कहते हैं – जब अपराधबोध इतना भारी हो जाए कि व्यक्ति खुद को ही दंड देने लगे, और वह दंड कभी ख़त्म न हो। चंदर ने जो किया वह सिर्फ़ सूअरों के साथ धोखा नहीं था – वह अपने उस हिस्से के साथ धोखा था जो उसे इंसान बनाता था। कहानीकार इस अपराधबोध को इतनी महीन कारीगरी से उकेरता है कि पाठक भी चंदर के साथ अपराधी महसूस करने लग जाता है। ‘टर्की’ कहानी का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक सच मनुष्य का अपराधबोध है, जो उसे जीवित रहते हुए भी मार डालता है।
इस संग्रह की ‘पटेलन की नींद’ कहानी शहरी मध्यवर्ग की उन अनदेखी दरारों को खोलती है, जहाँ आर्थिक सुरक्षा के बावजूद मानसिक असुरक्षा, अकेलापन और अविश्वास व्यक्ति के भीतर घर कर जाते हैं। यह कहानी केवल एक स्त्री की नींद न आने की समस्या पर केन्द्रित होने के बजाय सामाजिक संरचना, वर्गीय संबंधों, श्रम-सम्बन्धों और पितृसत्ता द्वारा उपेक्षा के बीच घिरे स्त्री-मन की त्रासदी का जीवंत दस्तावेज़ है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह कहानी घरेलू स्पेस को एक ऐसी संघर्षभूमि के रूप में प्रस्तुत करती है,जिसमें सत्ता, भय और संदेह के बीच लगातार टकराहट होती रहती है।
कहानी में द्वंद्व सबसे पहले पति-पत्नी के संबंधों में उभरता है। पटेल एक व्यस्त, व्यावहारिक और पेशेवर आदमी है, जिसकी दुनिया काम के दबाव तक सीमित है। वहीं पटेलन शारीरिक बीमारी, निःसंतान होने और अकेलेपन से जूझती हुई एक ऐसी स्त्री है जिसकी भावनात्मक ज़रूरतों को कोई गंभीरता से नहीं लेता। पति द्वारा उसकी आशंकाओं को ‘भूलना’ या ‘भ्रम’ कहकर टाल देना पितृसत्तात्मक समाज की उस प्रवृत्ति को उजागर करता है, जहाँ स्त्री के मानसिक कष्ट को या तो कम महत्त्व दिया जाता है या बीमारी मानकर दबा दिया जाता है। यह उपेक्षा ही धीरे-धीरे पटेलन की मानसिक अस्थिरता की वजह बनती है।
घरेलू कामगार बाइयों के साथ पटेलन का संबंध तनाव और अविश्वास से भरा है। मध्यवर्गीय घर में काम करने वाली स्त्रियाँ यहाँ केवल श्रमिक नहीं हैं, बल्कि कई बार शक और डर की प्रतीक बन जाती हैं। कहानीकार यह स्पष्ट करता है कि चोरी के इल्ज़ाम का आधार कमजोर होने के बावजूद शक की सूई बार-बार घरेलू कामगारों पर अटक जाती है। यह उस बद्धमूल मध्यवर्गीय मानसिकता का परिचायक है जो निम्न वर्ग को सहज ही शक के दायरे में रखता है। पटेलन का आक्रामक व्यवहार, तिरस्कार और तलाशी की कोशिश जिस दम्भ का नतीज़ा हैं उसका स्पष्ट वर्गीय आधार है।यह दम्भ असुरक्षा की भावना के साथ मिलकर और भी विकृत रूप में सामने आता है ।
विवेच्य कहानी की सबसे बड़ी ख़ूबी मानव मन की गुत्थियों का चित्रण है। नींद न आना यहाँ केवल एक शारीरिक समस्या के बजाय डर, संदेह और स्मृति-भ्रंश का मिलाजुला संकेत है। घर में चीज़ों का इधर-उधर हो जाना, बाद में उनका मिल जाना और फिर भी चोरी हो जाने का अंदेशा बना रहना पटेलन की बीमार मानसिकता का परिचायक है। कहानीकार सूक्ष्मता से यह चित्रित करता है कि कैसे छोटी-छोटी घटनाएँ पटेलन के मन की एक बड़ी गुत्थी बन जाती हैं। कहानी में इन सबका चित्रण इतना सहज-स्वाभाविक है कि पाठक को कहीं भी अटपटा नहीं लगता ।
कहानी में कबाड़ीवाला प्रसंग यथार्थ को नया आयाम देता है। यहाँ एक ओर पटेलन की बदगुमानी और सौदेबाज़ी है, तो दूसरी ओर हाशिये पर खड़े लोग हैं, जिनके लिए तशद्दुद और लूट जीविका है। यह दृश्य समाज में बढ़ती असमानता और नैतिक विघटन को सामने लाता है। पटेलन की बेहोशी केवल शारीरिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस मानसिक तनाव का उत्कर्ष-बिंदु है जो लंबे समय से उसके भीतर जमा हो रहा था। यह घटना उसके डर की पुष्ट-पनाही करती है और पाठक के दिल-ओ-दिमाग़ में इस बात को लेकर हलचल पैदा करती है कि असल ख़तरा बाहर है या भीतर।
स्त्रीवादी सैद्धांतिकी की कसौटी पर इस कहानी को कसने पर यह सिर्फ़ ज़ेहनी कशमकश या मध्यवर्ग के खौफ़ की दास्तान के बजाय पितृसत्तात्मक व्यवस्था में फँसी एक स्त्री की अदृश्य पीड़ा, अस्वीकृत आवाज़ और क्रमिक विघटन की मार्मिक गाथा बनकर सामने आती है और अर्थ के कुछ नये स्तरों को उद्घाटित करती है। इस कहानी का ‘स्त्रीवादी पाठ’ पटेलन की नींद को सिर्फ़ जैविक समस्या के बजाय स्त्री की अस्तित्वगत बेचैनी के प्रतीक के रूप में पेश करती है। पितृसत्ता स्त्री से अपेक्षा करती है कि वह चुप रहे, हम आहंगी करे और अपने खौफ़ को नज़रंदाज़ करे । ‘पटेलन की नींद’ का उड़ना दरअसल उस ज़ुल्म के ख़िलाफ़ एक रद्द-ए-अमल है जिसे उसका ज़ेहन क़ुबूल नहीं कर पा रहा है । जिस क्षण वह सो नहीं पाती, उसी क्षण उसकी आशंका, डर और असुरक्षा सतह पर आने लगती हैं। इस तरह नींद का न आना स्त्री की ‘अस्वीकृत चेतना’ का रूप ले लेता है।
दूसरे स्तर पर, पति-पत्नी का संबंध स्त्रीवादी आलोचना में ‘भावनात्मक श्रम’ (emotional labour) की असमानता को उजागर करता है। पटेल का जीवन व्यावसायिक तर्क, दक्षता और बाहरी संसार से संचालित है, जबकि इसके ठीक उलट पटेलन की पूरी गतिविधि घर की सीमाओं में सिमट गयी है। उसकी बीमारी, बाँझपन और अकेलापन उसे और ज़्यादा मोहताज़ बना देते हैं। वह जो भी कहती है, उसे या तो ‘भूल’ कहकर टाल दिया जाता है या ‘ज़ेहनी बीमारी’ मानकर इलाज़ करने-करवाने की कोशिश की जाती है। पीटर कौनराड और ख़ासकर स्त्रीवादी लेखिका बारबरा एहरनेरिच (1941-2022) की शब्दावली में यह स्त्री के अनुभवों का ‘चिकित्साकरण’ (Medicalization of women’s experience) है, जिसमें सामाजिक पीड़ा को ‘ज़ाती मर्ज़’ कहा जाता है।
घरेलू कामगार स्त्रियों के प्रति पटेलन का व्यवहार इस कहानी के स्त्रीवादी पाठ में एक जटिल द्वंद्व पैदा करता है। वजह यह कि यहाँ स्त्री स्वयं शोषित होते हुए भी अन्य स्त्रियों के प्रति शोषक की भूमिका में दिखाई देती है। इससे ज़ाहिर होता है कि पितृसत्ता केवल पुरुषों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि वर्गीय और अन्य सामाजिक संरचनाओं के ज़रिए स्त्रियों के भीतर भी काम करती है। पटेलन का शक, गुस्सा और बेइज़्ज़ती दरअसल उस इख़्तियार का वहम है, जो उसे ज़िंदगी में कहीं और नहीं मिलता । इस तरह विवेच्य कहानी ‘स्त्री बनाम स्त्री’ का टकराव भी उजागर करती है, जहाँ असली वजह व्यवस्था है, लेकिन संघर्ष स्त्रियों के बीच घटित होता है।
कहानी में आए कबाड़ीवाले प्रसंग को अगर स्त्रीवादी नज़रिए से देखें तो यह सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बीच की दीवार को तोड़ता है। पटेलन अब घर के भीतर सुरक्षित नहीं रह पाती और बाहर निकलते ही हिंसा और अराजकता उसे घेर लेती है। यह स्त्री के लिए सार्वजनिक स्पेस में असुरक्षा के वातावरण का द्योतक है। उसकी बेहोशी सिर्फ़ डर के नतीज़े के बजाय उस समाजी हक़ीक़त का इक़रार है जिसमें स्त्री कहीं बेखौफ़ नहीं है—घर में दिमाग़ी तौर पर और बाहर जिस्मानी तौर पर।
आफ़ियत की बात यह है कि कहानी के अंत में पटेलन को ‘पागल’ या ‘गुमराह’ साबित करने का कोई फ़तवा जारी नहीं किया गया है। बावजूद इसके, ‘स्त्रीवादी पाठ’ के क्रम में कहानी का अंत समाज, पति और व्यवस्था पर एक ‘इल्ज़ाम’ बन जाता है। पटेलन का बाथरूम में बंद होना, मोबाइल साइलेंट पर होना और पति का बाहर से दरवाज़ा पीटना सरीखे दृश्य प्रतीकात्मक हैं। हरि भटनागर द्वारा पुनर्रचित इस स्त्री ने उस संवाद से ख़ुद को काट लिया है,जहाँ कभी उसकी किसी बात की कोई अहमियत ही नहीं थी। यह उसके भयजनित पलायन के बजाय मौन प्रतिरोध है ।
कुल मिलाकर स्त्रीवादी सैद्धांतिकी की कसौटी पर ‘पटेलन की नींद’ एक स्त्री के मानसिक पतन के बजाय उसके लगातार अनसुने रह जाने की कहानी बन जाती है। यह रचना दिखाती है कि जब स्त्री की आशंकाओं, अनुभवों और आवाज़ को बार-बार खारिज़ किया जाता है, तो वह धीरे-धीरे समाज की नज़र में ‘असामान्य’ घोषित कर दी जाती है। संभवत: यही इस कहानी की सबसे महत्वपूर्ण और समकालीन स्त्रीवादी व्याख्या है।
रचना-कौशल की दृष्टि से कहानीकार संवादों, छोटे-छोटे विवरणों और स्थितियों के माध्यम से पात्रों के मनोभावों को उभारता है। कहानी में मोबाइल फोन एक महत्त्वपूर्ण प्रतीक के रूप में उभरता है, जो पति-पत्नी के बीच संवाद का माध्यम होते हुए भी दूरी और ग़लतफ़हमी को कम नहीं कर पाता।
सच तो यह है कि ‘पटेलन की नींद’ समाज और मनोविज्ञान के जटिल रिश्ते की कहानी है। यह दिखाती है कि जब सामाजिक उपेक्षा, वर्गीय संदेह और पारिवारिक संवादहीनता एक साथ मिलते हैं, तो व्यक्ति का मानसिक संतुलन कैसे बिगड़ने लगता है। कहानी ने सामाजिक यथार्थ के साथ-साथ मानव मन की गहराइयों में उतरकर एक विलक्षण संवेदनशील कहानी रची है ।
‘निद्रा-विज्ञान’ (somnology ) के नज़रिए से ‘पटेलन की नींद’ कहानी पर विचार करने से इस रचना की आलोचनात्मक व्याख्या न केवल समृद्ध होती है, बल्कि कहानी के कई ऐसे अर्थस्तर खुलते हैं जो सामान्य साहित्यिक या समाजशास्त्रीय पाठ में पूरी तरह शुमार नहीं हो पाते। इस कसौटी पर कसने से यह कहानी ‘मानसिक विकार; या ‘सामाजिक भय’ के बजाय ‘नींद की कमी’ के ज़रिए सामाजिक विघटन और एक गहरे मनो-दैहिक संकट (Psycho-somatic crisis) की कथा बन जाती है।
गौरतलब है कि ‘निद्रा विज्ञान’ (Somnology) में नींद को केवल विश्राम के बजाय ‘मानसिक संतुलन, स्मृति-संयोजन और भावनात्मक नियमन’ की प्रक्रिया माना जाता है। पटेलन को नींद न आना इसी संतुलन के टूटने की त्रासदी है। कहानी में साफ़ है कि पहले उसे गहरी नींद आती थी, क्योंकि तब उसके भीतर मनोवैज्ञानिक सुरक्षा और भरोसे की कमी न थी। उसकी ज़िन्दगी में जैसे ही असुरक्षा, अकेलापन और अविश्वास बढ़ता है,उसकी नींद सबसे पहले प्रभावित होती है। इस तरह नींद का टूटना कारण नहीं, बल्कि ‘पहला लक्षण’ है।
निद्रा विज्ञान के तहत पटेलन की अवस्था क्रौनिक अनिद्रा (chronic insomnia) से आगे बढ़कर ‘अतिउत्तेजना’ (hyperarousal) की स्थिति प्रतीत होती है। उनका मस्तिष्क लगातार ‘ख़तरे’ की हालत में अतिसक्रिय है। नतीज़तन, हर आवाज़, हर व्यक्ति, हर वस्तु उसके लिए संभावित चोरी या साजिश का संकेत बन जाती है। यही कारण है कि वह रात में बार-बार पति को फ़ोन करती है, दिन में कामगारों पर नज़र रखती हैं और चीज़ों के इधर-उधर हो जाने को षड़यंत्र मानने लगती है । यह विचित्र स्थिति विवेच्य कहानी को ‘विभ्रम’ के बजाय ‘अनिद्रा’ से पैदा हुई ‘संज्ञानात्मक विकृति’ (Cognitive Distortion) के आख्यान के रूप में पेश करती है।
याद रहे कि ‘निद्रा-विज्ञान’ में मनुष्य की स्मृति पर नींद के प्रभाव को विशेष रूप से रेखांकित किया जाता है। पर्याप्त नींद न आने पर प्राणियों की ‘क्रियाशील स्मृति’ (working memory) के साथ ही ‘प्रासंगिक स्मृति’ (episodic memory) भी प्रभावित होती है।विवेच्य कहानी में चीज़ों को रखकर भूल जाना, फिर उनका मिल जाना, और फिर भी चोरी के अंदेशे का बना रहना—ये सब लक्षण नींद की कमी से उत्पन्न ‘मिथ्या स्मृति के निर्माण’ (false memory formation) की ओर संकेत करते हैं। इससे पाठक समझ पाता है कि पटेलन न तो झूठ बोल रही हैं, न पूरी तरह कल्पना कर रही हैं—उनका मस्तिष्क वास्तविकता को विकृत रूप (Distorted form) में ग्रहण कर रहा है।
‘निद्रा विज्ञान’ बताता है कि नींद की कमी इंसान के भावनात्मक नियंत्रण को भी कमजोर कर देती है। पटेलन का तीखापन, चिड़चिड़ापन, अचानक क्रोध और तर्कहीन व्यवहार इसी का नतीज़ा है। घरेलू कामगारों के प्रति उनका आक्रामक रुख को नैतिक पतन नहीं, बल्कि ‘नींद की कमी से उत्पन्न भावनात्मक असंतुलन’(sleep-deprived emotional dysregulation) के रूप में पढ़ा जाना चाहिए। इससे कहानी का नैतिक ढाँचा बदलेगा और पाठक फ़तवेबाज़ी से बचकर कहानी का हमदर्द फ़रीक़ बन जाएगा।
कहानी में ‘कबाड़ीवाला’ प्रसंग ‘निद्रा विज्ञान’ के संदर्भ में ‘तनाव के कारण अचानक होश या संतुलन खो बैठना’ (stress-triggered collapse) का उदाहरण है। लंबे समय से चली आ रही अनिद्रा, भय और सतर्कता अचानक असहनीय तनाव की चपेट में पटेलन की बेहोशी की वजह बनती है। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि देह और दिमाग़ को ख़बरदार करने की क़ुदरती कार्रवाई है । कहना यह है कि कहानी में पटेलन की बेहोशी को कथात्मक नाटकीयता के बजाय जैविक अनिवार्यता के रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए।
कहानी के अंत में पटेलन का बाथरूम में बंद होना और मोबाइल साइलेंट पर होना आदि ‘निद्रा विज्ञान’ (somnology) के स्तर पर विशेष अर्थ ग्रहण करता है। वैज्ञानिकों की शब्दावली में यह ‘संवेदी प्रत्याहार’(sensory withdrawal) की अवस्था है, जिसमें व्यक्ति बाहरी उत्तेजनाओं से स्वयं को काटकर मस्तिष्क को शांत करने की कोशिश करता है। यह आत्मरक्षा की जैविक प्रतिक्रिया है, न कि केवल भय या ज़िद। पति का दरवाज़ा पीटना उस दुनिया का प्रतीक बन जाता है जो अब भी उनके टूटते तंत्रिका तंत्र (Nervous breakdown) को समझने में असमर्थ है।
इस तरह ‘निद्रा विज्ञान’ (Somnology) के आलोक में ‘पटेलन की नींद’ कहानी प्रकारांतर से ‘नींद के टूटने से टूटते व्यक्तित्व’ की कहानी बन जाती है। जिन लेखक-आलोचक मित्रों को ऐसा कहने-लिखने में साहित्य को चिकित्सा-विज्ञान का उपनिवेश बनाने की अवांछनीय कोशिश नज़र नज़र आए उनसे निवेदन है कि हम इक्कीसवीं सदी में हैं और यह नज़रिया कहानी के पाठ को यांत्रिक नही, मानवीय बनाता है—क्योंकि इससे कोई पाठक पटेलन सदृश पात्र को दोषी बताने के बजाय संकटग्रस्त समझना शुरू करेगा । आम पाठक के लिए यह दृष्टिकोण कहानी को डर या सनक के आख्यान से उठाकर ‘संवेदनशील चेतावनी’ में बदल देता है कि नींद का अभाव केवल थकान नहीं, बल्कि इंसान की पूरी ज़िन्दगी की बनावट को झकझोर सकता है।
मोपांसा की ‘द पैरेट’ (The Parrot) कहानी से अप्रत्यक्ष रूप में प्रभावित प्रतीत होती विवेच्य संग्रह की ‘किस्सा तोता बाई का’ कहानी को अगर एक ही सिद्धांत के चश्मे से पढ़ना हो, तो वह स्त्रीवाद होगा। यह कहानी विधवा के दर्द की कहानी नहीं है; यह पितृसत्ता द्वारा स्त्री को “बेकार” घोषित कर देने और फिर उसकी ज़मीन, उसकी पहचान, उसकी आख़िरी साँस तक हड़प लेने की कहानी है। स्त्रीवादी नज़रिए से यह हिंदी में स्त्री जीवन के क्रूर यथार्थ को चित्रित करने वाली सबसे सटीक कहानियों में से एक है।
हमीदा बाई पति मरने के बाद भी ‘उपयोगी’ थीं, क्योंकि उनके पास बेटा था। बेटा था तो समाज ने उन्हें माँ की हैसियत दी। बेटा मर गया तो वह रातों-रात ‘बेकार’ हो गईं। स्त्रीवाद की शब्दावली इसे ‘पितृसत्तात्मक अर्थव्यवस्था’ कहती है जिसमें स्त्री का मूल्य सिर्फ़ उसकी प्रजनन क्षमता और मर्द वारिस पैदा करने की क्षमता से तय होता है। जैसे ही वह यह काम नहीं कर सकती, वह ‘अतिरिक्त बोझ’ बन जाती है। कहानी में बलेसर ठीक यही सोचता है – “अब यह बूढ़ी मर जाएगी, ज़मीन मेरी हो जाएगी।”
कहानी में मातृत्व का विकृत रूप भी चित्रित हुआ है। हमीदा बाई तोते को “हसन” कहकर पुकारती हैं, छाती से लगाती हैं। यह कोई पागलपन नहीं है। यह मातृत्व का सबसे दर्दनाक और सबसे सच्चा रूप है। पितृसत्ता ने उन्हें सिर्फ़ ‘माँ’ बनने की इजाज़त दी थी। जब असली बेटा मर गया तो उन्होंने एक तोते को बेटा बना लिया। यह वही प्रक्रिया है जिसे सिमोन द बोउवार ‘स्त्री का अन्यीकरण’ (Woman as Other) कहती हैं। यह अवधारणा उनके प्रसिद्ध ग्रंथ ‘द सेकेण्ड सेक्स (The Second Sex) में विस्तार से वर्णित है, जिसके अनुसार पुरुष को कर्ता (Subject) और स्त्री को ‘अन्य’ (Object/Other) माना जाता है, यानी पुरुष को पूर्ण और आवश्यक माना जाता है, जबकि स्त्री को उसके विपरीत अपूर्ण और गौण समझा जाता है। बोउआर बताती हैं कि कैसे समाज स्त्रियों को ‘अन्य’ बनाता है, जबकि स्त्री जन्म से पुरुष के समान होती और उसे अपनी स्वतंत्रता और पहचान खुद चुननी चाहिए । स्त्री का समाज द्वारा थोपी हुई पहचान से बंधकर रहना गुलामी की संरचना को आत्मसात कर लेना है।वजह यह कि समाज द्वारा उसे सिर्फ़ माँ,बहन या पत्नी के रूप पहचान देकर उसकी स्वतंत्र पहचान छीन ली जाती है। इस कहानी में भी तोता उड़ जाता है तो हमीदा बाई का आखिरी ‘बेटा’ भी छिन जाता है।
विवेच्य कहानी में स्त्री-शरीर पर नियंत्रण का चरम रूप भी दिखाई देता है। हमीदा बाई का घर, उसका आंगन, उसकी ज़मीन – सब कुछ उसका शरीर है। बलेसर उसे हड़पना चाहता है ; ठीक वैसे ही जैसे पितृसत्ता स्त्री के शरीर को हड़पती है। वह सालों से इंतज़ार कर रहा है कि यह औरत मर जाए या पागल हो जाए ताकि ज़मीन उसकी हो जाए। तोते का उड़ना सिर्फ़ एक बहाना है। असल में यह स्त्री के अंतिम सहारे को छीनने की साजिश है। जब हमीदा बाई घर लौटती हैं तो उसका घर ही ग़ायब है ,जो यह प्रतीकित करता है कि विधवा का अपना कोई ‘घर’ नहीं होता ।
रत्ना द्वारा पितृसत्ता के अंदर से प्रतिरोध का निदर्शन इस कहानी को विश्वसनीय बनाता है। रत्ना एकमात्र एक किरदार नहीं, पूरी कहानी में एकमात्र स्त्री-प्रतिरोध का मूर्त रूप है। वह बलेसर की पत्नी है, लेकिन उसके ख़िलाफ़ खड़ी होती है। वह हमीदा बाई को खाना देती है, उसके साथ हो रही साजिश को समझती है और बलेसर को डाँटती है – ‘मैं तेरी ब्याहता हूँ, तेरी तल्ली नहीं।‘ यह बहुत बड़ा फेमिनिस्ट बयान है। रत्ना अकेली है, लेकिन वह पितृसत्ता के अंदर से ही उसका मुकाबला कर रही है। वह कहानी का एकमात्र ‘सहारा’ है जो हमीदा बाई को मिलता है, पर वह भी सीमित है – क्योंकि वह खुद पिटती है, डरती है और अंत में बलेसर द्वारा मार डाली जाती है।
कहानी में तोते का उड़ना वस्तुत: स्त्री की आज़ादी का अंतिम सपना है – यह सबसे मार्मिक प्रतीक है । हमीदा बाई उसे पिंजरे में नहीं रखतीं – ‘बेटे को कहीं पिंजरे में रखा जा सकता है?’ – लेकिन जब सपने में तोता उड़ जाता है तो वह उसे पिंजरे में बंद कर देती हैं। यह स्त्री की आज़ादी का सबसे दुखद पहलू है। तुलसीदास ने कभी लिखा था –‘जिमि सुतंत्र भए बिगरहिं नारी’।
कहानी के अंत में हमीदा बाई सड़क पर सो जाती हैं और सपने में हसन (तोता) उन्हें ‘माई’ पुकारता है। यह मृत्यु है। लेकिन यह सिर्फ़ हमीदा बाई की नहीं – यह उस पूरे मातृत्व की मृत्यु है जिसे समाज स्त्री पर थोपता है। वह मरते दम तक भी माँ बनी रहती हैं। उसका घर छिन गया, उसकी ज़मीन छिन गई, उसकी पहचान छिन गई – सिर्फ़ इसलिए कि वह एक ‘विधवा’ थी। सच तो यह है कि कहानीकार ने एक तोते के ज़रिए पूरे पितृसत्तात्मक समाज को नंगा कर दिया है ।
हरि भटनागर की ‘उफ़’ कहानी को अगर मार्क्सवादी नज़रिए से पढ़ें तो यह हिंदी की सबसे तीखी, सबसे बेरहम और सर्वहारा जीवन की सबसे सटीक कहानी प्रतीत होती है। यह कोई रोमांटिक ग़रीबी की कहानी नहीं है, बल्कि पूँजीवाद की क्रूर मशीनरी की खुली शल्यचिकित्सा है। इसमें सुल्तान नामक गधे को बतौर उत्पादन का साधन (Means of Production) चित्रित किया गया है।जाहिर है कि सुल्तान सिर्फ़ एक गधा नहीं है, वह हयातुल्ला परिवार का एकमात्र उत्पादन साधन है। मार्क्स के अनुसार मज़दूर का जीवन उसके उत्पादन के साधनों पर निर्भर करता है। जब सरकारी नियम आता है कि तालाब में कपड़े धोना बंद हो , तो सारे धोबी अपना साधन (गधा) बेच देते हैं और मज़दूरों से भी नीचे गिर जाते हैं। सिर्फ़ हयातुल्ला टिका रहता है, क्योंकि वह सुल्तान को नहीं बेचता। लेकिन पूँजीवाद उसे भी नहीं छोड़ता। चाँद (पूँजी का एजेंट) आता है और कहता है – ‘जबरन बोझा लादे हो’। यही पूँजीवाद का मूल मंत्र है: जो चीज़ मुनाफ़ा नहीं दे रही, उसे बेच दो। सुल्तान जब बिक जाता है तो हयातुल्ला का पूरा परिवार उत्पादन साधन से वंचित हो जाता है – यह शुद्ध वर्गीय पतन है।
कहानी में चाँद कोई बड़ा पूँजीपति नहीं बताया गया है, वह सिर्फ़ एक छोटा दलाल है। छोटे-छोटे दलाल सबसे ख़तरनाक होते हैं , जो बड़े सिस्टम को चलाने का काम करते हैं । वह मुस्कुराता है, रोटी खाता है, हयातुल्ला की बेटी को एक रुपए की ईदी देता है और सुल्तान को ले जाता है। यह वही प्रक्रिया है जिसे मार्क्स ‘प्रारंभिक संचय’ (primitive accumulation) कहते हैं – ग़रीब का आखिरी साधन भी छीन लिया जाए, ताकि वह पूरी तरह मज़दूर बन जाए। चाँद कहता है ‘अच्छी रक़म मिल जाएगी’ – यह पूँजी का बयानिया है जो हमेशा ‘बेहतरी’ का लालच देता है।
रज़िया का बुखार वस्तुत: वर्गीय चेतना का जागना है । जब सुल्तान बिकता है तो वह बीमार पड़ जाती है । यह कोई साधारण बुखार नहीं है -यह सर्वहारा चेतना का जागना है। वह समझ जाती है कि सुल्तान उसका भाई है, उसका परिवार है। जब सुल्तान पर लाठी पड़ती है तो वह चीखती है – यह चीख़ लेनिन की ‘क्या करें?’ की तरह है। मार्क्सवादी दृष्टि से रचित अनेक कृतियों में बीमारी अक्सर वर्गीय जागरण का प्रतीक होती है। रज़िया का ठीक होना तब शुरू होता है जब सुल्तान वापस आता है – यह वर्गीय एकजुटता का प्रतीक है। हयातुल्ला का लाठी मारना वस्तुत: आतंरिककृत पूँजीवाद की प्रवृत्ति का निदर्शन है।सबसे मार्मिक दृश्य है जब सुल्तान भागकर लौटता है और हयातुल्ला उस पर लाठी बरसाते हुए कहता है – ‘बेच दिया तो वापस क्यों आया?’ यह मार्क्स की ‘मिथ्या चेतना’ (false consciousness) का सबसे दर्दनाक उदाहरण है। हयातुल्ला को लगता है कि सुल्तान को बेचना ‘ज़रूरी’ था, और उसका लौटना “ग़लत” है। वह अपने ही उत्पादन के साधन पर गुस्सा कर रहा है। यह वही मानसिकता है जो मज़दूर को अपने हक़ के लिए लड़ने की बजाय सिस्टम को सही ठहराने के लिए अनुकूलित कर देती है।
ज़ाहिर है कि ईद के रोज़ इस्लाम धर्मावलम्बी समुदाय के लोग सबसे ज़्यादा खुश होते हैं। लेकिन इस परिवार के लिए ईद का मतलब है सुल्तान को बेचना। लेखक बता रहा है कि कैसे पूँजीवाद ने त्योहार को भी पण्य (कमोडिटी) बना दिया है। ईद तब मनाई जाती है जब चाँद दिख जाता है । इस कहानी में चाँद नामक दलाल-सा आदमी भी ईद के दिन प्रकट होता है।उसे पता है कि गरीब परिवार सबसे कमज़ोर इसी दिन होता है – जब ‘खुशी’ दिखाना उसकी मजबूरी होती है। रनिया और रज़िया इस कहानी में दो तरह की स्त्री-चेतना की वाहक हैं । रनिया कहती है – ‘छत टपक रही है, सुल्तान बेच दो’। यह वह चेतना है जो पूँजीवाद के अंदर रहकर भी जीने की कोशिश करती है। रज़िया चुपचाप रोती है, सुल्तान को रोटी खिलाती है – यह वह चेतना है जो पूँजीवाद को नकारती है। अंत में रनिया भी टूट जाती है, लेकिन रज़िया का बुखार और सुल्तान का लौटना बताता है कि प्रतिरोध अभी ज़िंदा है।
‘उफ़’ मार्क्सवादी नज़रिए की एक परिपक्व कहानी ठहरती है, क्योंकि यह कोई नारा नहीं लगाती या किसी क्रांति का प्रदर्शन नहीं करती । यह सिर्फ़ दिखाती है कि पूँजीवाद कैसे एक परिवार के आखिरी सहारे को भी छीन लेता है और फिर भी वह परिवार ‘उफ़’ कहकर जीता रहता है। सुल्तान का वापस लौटना कोई जीत नहीं,बल्कि हार है – क्योंकि वह वापस आया तो है, लेकिन अब उसकी पीठ पर फिर बोझ होगा । यह कहानी बताती है कि सर्वहारा की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि वह हार जाता है – सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह हारकर भी लौट आता है और फिर से गुलाम बन जाता है।
‘उफ़’ कहानी को अगर स्त्रीवादी नज़रिए से पढ़ें तो यह एक ऐसी कहानी प्रतीत होती है जो पितृसत्ता और पूँजीवाद के दोहरे शोषण का सबसे सियाह और दिलकश तस्वीर खींचती है। यहाँ स्त्री सिर्फ़ एक क़िरदार नहीं है, वह पूरी कहानी का दर्द है । रज़िया सिर्फ़ एक बच्ची नहीं है । सुल्तान को रोटी खिलाना, उससे बात करना, उसे ‘भाई’ मानना – यह कोई बच्चे का खेल नहीं है। यह मातृत्व का सबसे दर्दनाक रूप है। पितृसत्ता ने उसे अभी से माँ बना दिया है – वह ठीक वैसे ही सुल्तान की देखभाल करती है जैसे एक विधवा माँ अपने आखिरी बच्चे की करती है। जब सुल्तान बिकता है तो वह बीमार पड़ जाती है – यह माँ का दर्द है। उसका बुखार कोई साधारण बुखार नहीं है – यह माँ के बच्चा छिन जाने से पैदा हुआ का बुखार है और जब सुल्तान लौटता है तो वह ठीक हो जाती है ।
रनिया पितृसत्ता के अंदर फँसी एक स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है। वह कहती है – ‘छत टपक रही है, सुल्तान बेच दो।’ यह वही आवाज़ है जो पितृसत्ता स्त्रियों के मुँह में डाल देती है। वह सुल्तान को ‘बोझ’ कहती है क्योंकि समाज ने उसे सिखाया है कि औरत का काम घर चलाना है, चाहे इसके लिए अपना बच्चा ही क्यों न बेचना पड़े। वह हयातुल्ला को डाँटती है, चाँद को पानी पिलाती है – यह पितृसत्ता का क्लासिक व्यवहार है जहाँ औरत खुद अपने शोषण का हिस्सा बन जाती है। लेकिन अंत में जब रज़िया बेहोश हो जाती है तो रनिया भी टूट जाती है – यह उसकी ममता है जो पितृसत्ता का अतिक्रमण करती है।
सुल्तान इस कहानी में कमाता है, बोझ ढोता है, परिवार को चलाता है – लेकिन उसका कोई हक़ नहीं है। जब कपड़े धोने पर पाबंदी के तहत वह “बेकार” हो जाता है , तो उसे बेच दिया जाता है। ठीक ऐसा ही औरत के साथ भी होता है – जब वह बूढ़ी हो जाती है, बच्चे पैदा नहीं कर सकती, या बीमार पड़ जाती है – उसे ‘बोझ’ मानकर हाशिए पर धकेल दिया जाता है। सुल्तान का लौटना और फिर लाठी खाना – यह औरत की ज़िंदगी है जो घर लौटती है तो बेइज़्ज़ती बर्दाश्त करती है और न लौटे तो मर जाती है।
इस रचना में चाँद को पितृसत्ता का एजेंट कहा जा सकता है ।चाँद मुस्कुराता है, रोटी खाता है, रज़िया को एक रुपए की ईदी देता है और सुल्तान को ले जाता है। यह वही पुरुष है जो जिस स्त्री की मेहनत पर जीता है, उसे ‘बोझ’ कहता है, और फिर उसे बेच देता है। वह रनिया को भी इस्तेमाल करता है – वह उससे पानी पीता है, उसकी बात मानकर सौदा पक्का करता है। यह पितृसत्ता का सबसे साधारण रूप है – जो औरत को ही औरत के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करती है।
सुलतान की पिटाई पितृसत्ता का सबसे क्रूर चेहरा है। पुरुष अपने ही परिवार की औरत (या औरत जैसे सुल्तान) को मारता है क्योंकि वह ‘आज़ाद’ होकर लौट आया है । यह वही मानसिकता है जो औरत को घर से भागने नहीं देती, और भागकर लौट आए तो मारती है। हयातुल्ला वस्तुत: सुल्तान पर नहीं, अपनी मजबूरी पर, अपनी औरत पर गुस्सा कर रहे हैं।
कहानी का शीर्षक ‘उफ़’ कोई साधारण शब्द नहीं है। यह रज़िया, रनिया समेत हर उस औरत की चीख़ है जिसका बच्चा, जिसका सहारा, जिसकी ज़िंदगी छिन जाती है और वह बस “उफ़” कहकर रह जाती है। यह चीख कोई सुनता नहीं – न अब्बा, न चाँद, न समाज। सच तो यह है कि ‘उफ़’ कहानी महसूस कराती है कि पितृसत्ता और पूँजीवाद मिलकर औरत को सिर्फ़ इस्तेमाल की चीज़ मानते हैं। जब वह उपयोगी नहीं रहती तो उसे बेच दिया जाता है, मार दिया जाता है, या भुला दिया जाता है। सुल्तान लौटता है, लेकिन वह लौटकर भी गुलाम ही रहता है। ठीक वैसे ही जैसे औरत लौटती है, लेकिन आज़ाद कभी नहीं होती। और उस “उफ़” में सारी औरतों की पीड़ा समाई है – जो उसे न मरने देती है, न जीने । याद आते हैं अमीर मीनाई :
ख़्वाब में आँखें जो तलवों से मलीं
बोले उफ़ उफ़ पाँव मेरा छिल गया।
पाठक को यह कहानी हँसाती नहीं, सिर्फ़ रुलाती है और रुलाकर भी चुप हो जाने के लिए मजबूर कर देती है – क्योंकि उसके बाद कहने को कुछ बचता ही नहीं। रज़िया का सुल्तान से बात करना, उसके सिर पर हाथ फेरना या उसके घायल शरीर को देखकर घबरा जाना —यह अपने आप में मनुष्य की करुणा का सबसे ईमानदार दृश्य है। यही करुण दृश्य मार्केज़, मोपासां और चेख़व की कहानियों की तरह पाठक के दिल में विष-बुझे तीर की तरह घुस जाता है।
‘घोंसला’ हिंदी की कुछ सबसे डरावनी कहानियों में से एक है। इसमें एक बच्चा गुस्से में कौवे का घोंसला तोड़ देता है। लेकिन उस एक पल से उसकी पूरी ज़िंदगी बदल जाती है। कौवा और उसका पूरा झुंड जीवनभर उसका पीछा करता है – बचपन से बुढ़ापे तक, नाना की मौत तक । चालीस साल बाद भी जब वह कौवा देखता है, उसकी धड़कनें बढ़ जाती हैं, हाथ से चाय का प्याला गिर जाता है और वह दौड़कर छिपने की जगह ढूंढने लगता है। यह अपराधबोध है जो कभी खत्म नहीं होता, जिसे फ्रायड की शब्दावली में सुपरईगो का आजीवन दंड कहा जाता है । बच्चा जानता है कि उसने ग़लत किया, लेकिन उस वक़्त गुस्से की आग इतनी तेज़ थी कि उसने घोंसला नष्ट कर दिया। कौवा उस सुपरईगो का बाहरी रूप बन जाता है – जो हर बार चोंच मारकर घर उजाड़ने की याद दिलाता । वह अकेला आने के बजाय सैकड़ों कौवे साथ लाता है – जैसे पूरी प्रकृति एकजुट होकर बदला ले रही हो।
‘पर्यावरण आलोचना’(Ecocriticism) के तहत यह कहानी प्रकृति के द्वारा प्रतिशोध की एक भयानक मिसाल का कलात्मक चित्रण साबित होती है। पूँजीवादी विकास के नाम पर वन्य प्रकृति, पर्यावरण संतुलन आदि को नष्ट करके जैसे मनुष्य बुरे नतीजे भोगने को अभिशप्त होता है, वैसे ही इस कहानी में घोंसला तोड़ना सिर्फ़ शरारत नहीं, हिंसा है जिसका जवाब प्रतिहिंसा के रूप में सामने आता है । कौवों का झुंड सामूहिक अचेतन का विद्रोह है। जुंग की शब्दावली में इसे ‘रिवेंज आर्कीटाइप’ कहा गया है ।
यहाँ रचनाकार का मक़सद यह बताना है कि साहित्य कैसे प्रकृति के “क्रोध” का उपयोग करके हमें स्थिरता (Sustainability) की ओर प्रेरित करता है। इससे गुज़रते हुए “Avenging Nature: The Role of Nature in Modern and Contemporary Art and Literature” (2020) पुस्तक में संकलित अनेक लेखकों के निबंधों की बेसाख्ता याद आती है जिनमें आधुनिक और समकालीन साहित्य से उदाहरण देकर दर्शाया गया है कि कैसे प्रकृति इंसानों के शोषण का बदला लेती है, ताकि पर्यावरण संरक्षण की चेतावनी दी जा सके। इसके एक अध्याय में फैंटसी जॉनर की चर्चा है, जहां प्रकृति को ‘राक्षसी’ दिखाया गया है (जैसे जंगल या जानवर इंसानों पर हमला करते हैं)। पॉपुलर फैंटसी और डिस्टोपियन साहित्य में प्रकृति के ‘डेमोनाइज़ेशन’ को विस्तार से इकोक्रिटिसिज़्म के नज़रिए से समझाते हुए इस पुस्तक के एक अध्याय में बताया गया है कि ऐसी कहानियां पर्यावरण संकट को प्रतिबिंबित करती हैं और इंसानों को अपनी ग़लतियों की सज़ा की चेतावनी देती हैं।
इस कहानी में नाना की चुप्पी सबसे भयानक है। वे गुस्सा दिखाते हैं, लेकिन अंदर से खुश हैं कि ‘सज़ा मिल गई’। यह मौन अपराधबोध को अगली पीढ़ी तक स्थानांतरित कर देता है। बच्चा नाना से माफ़ी मांगना चाहता है, पर मांग नहीं पाता। नाना की मौत पर भी वह उनका अंतिम दर्शन नहीं कर पाता – माफ़ी का मौक़ा तक नहीं मिलता। कहानी की भाषा सहज पर क्रूर सादगी वाली है ।
कुलमिलाकर ‘घोंसला’ एक बच्चे की शरारत के बजाय मानव सभ्यता के ‘मूल पाप’ की कहानी है। हमने जितने घोंसले तोड़े हैं, उनकी कांव-कांव आज भी हमारे कानों में गूँजती है। यहाँ कहानीकार कोई उपदेश नहीं देता। वह एक सवाल छोड़ देता है कि अगर सचमुच बदला लेने कोई आ जाए, तो हममें से कितने उसकी आँखों में आँख डाल कर अपने (कु)कृत्य का औचित्य सिद्ध कर पाएँगे? शायद कोई नहीं, क्योंकि उपभोक्तावाद के ‘मरीज़’ के तौर हम सब अपराधी हैं।
‘किस्सा तोता बाई का’ हरि भटनागर की शैली का एक और अद्भुत उदाहरण है। कहानी सतह पर हल्की है—एक तोते और एक लड़के की कहानी—पर उसके भीतर दबी हुई सामाजिक-सांस्कृतिक संरचनाएँ धीरे धीरे खुलती चली जाती हैं। यह कहानी हमें बताती है कि मनुष्य प्रेम को कई बार स्वामित्व में बदल देता है—और यह स्वामित्व प्रेम को प्राय: नष्ट कर देता है। यह सरल घटना एक गहरे सामाजिक मनोविज्ञान की ओर संकेत करती है—और इसीलिए ऐसी कहानियाँ छोटी होकर भी बड़ी होती हैं- ‘तेजवंत लघु गनिय न रानी।’
विवेच्य संग्रह में ‘घोंसला’, ‘डामर पिघलती सड़क पर एक छाया’, और ‘जीप उड़ाते परिंदे’ जैसी कहानियाँ अलग-अलग प्रकार की संवेदनाओं को उद्घाटित करती हैं, पर इनमें एक मूल धारा समान है जिसके अनुसार मनुष्य अपने परिवेश और स्मृति के बीच लगातार झूलता हुआ एक सहृदय प्राणी है। जीवन के साधारण क्षण—पेड़ों के बीच तालाब-सा गढ्ढा, पिघलता डामर, धूप में काँपता हुआ रास्ता, किसी पुराने प्रेम का एक धुँधला दृश्य—ये सब इन कहानियों में किसी प्रतीक की तरह नहीं आते, बल्कि मनुष्य के मनोभावों को समझने का रास्ता बन जाते हैं।
‘घोंसला’ में स्मृति और प्रकृति एक बीज की तरह पूरी कथा में फैलती जाती है। तालाब, पेड़, प्रवासी पंछी—ये सभी किसी दृश्य को सुन्दर बनाने के लिए नहीं हैं; वे मनुष्य की आंतरिक संरचना का हिस्सा हैं। यह कहानी दिखाती है कि मनुष्य कभी-कभी अपने भीतर बसे हुए घोंसले—यानी स्मृतियों—की ओर लौटना चाहता है, पर जीवन की परिस्थितियाँ उसे वहाँ वापस नहीं जाने देतीं। स्मृति कभी सुरक्षा का स्थान बनती है, कभी अपराध-बोध का और कभी-कभार प्रेम का। कहानीकार यहाँ मार्केज़ की कहानियों की तरह स्मृति को एक ऐसा आध्यात्मिक आयाम देता है कि वह वर्तमान को रोशन करती है और कई बार उसे अस्थिर भी बनाती है।
‘डामर पिघलती सड़क पर एक छाया’ में कहानीकार दिखाता है कि वातावरण मनुष्य के मन की प्रकृति के समान होता है—घुलता, फैलता, और कभी-कभी टूटता हुआ। पिघलती सड़क, धूप में उठती भाप, और एक चलता हुआ आदमी—ये सब मिलकर एक ऐसे मनोवैज्ञानिक संसार का निर्माण करते हैं जहाँ मनुष्य स्वयं से भागना भी चाहता है और स्वयं को बचाना भी। कहानीकार इस दृश्य को किसी दार्शनिक कथन में बदलने के बजाय उसे वैसा ही रहने देता है —मौन, बेचैन और बहुअर्थी । वस्तुत: यह रचना निम्नवर्गीय परिवार की दैनंदिन जद्दोजहद, लैंगिक असमानता, ग़रीबी और मानवीय संवेदना की कमी जैसे मुद्दों को उजागर करती है। ‘डामर पिघलती सड़क’ शीर्षक में आधुनिकता की कठोरता और ‘एक छाया’ में ग़रीबों की अदृश्यता प्रतीकित हो रही है। कहानी का कथानक सरल है, लेकिन इसमें छिपी विडंबना और समाजी बयानिया इसे गहराई प्रदान करता है।
कहानी का कथानक एक सामान्य सुबह की व्यस्तता पर आधारित है। अपंग वृद्धा काकी एक कचरा बीनने वाली गर्भवती औरत को सहजन के पेड़ के नीचे प्रसव पीड़ा में कराहते देखती है और पड़ोसन डुको को पुकारती है। डुको घरेलू कामों में उलझी है और वह काकी की पुकार अनसुनी कर देती है। महिला प्रसव के बाद चली जाती है। बाद में अपराधबोध से डुको पुराने कपड़ों की पोटली लेकर उस औरत को ढूंढती है, लेकिन वह डामर पिघलती सड़क पर दूर जाती एक छाया की तरह ओझल हो जाती है। यह कथानक दैनिक जीवन की छोटी-छोटी समस्याओं में छिपी बड़ी सामाजिक उदासीनता को दिखाता है। कहानी के पात्र यथार्थ की ज़मीन पर खड़े हैं। डुको मेहनती घरेलू स्त्री है, जो घरेलू बोझ तले दबी है। उसकी झुंझलाहट और चीखें उसकी असहायता दर्शाती हैं, लेकिन स्त्री के लिए अपराधबोध उसकी मानवीयता दिखाता है। नशे में डूबा और घरेलू दायित्वों से दूर पांडे आलसी पति है । वह कोरोना महामारी की सरकारी विफलता पर गुस्साता है, लेकिन ख़ुद कुछ नहीं करता। काकी उपेक्षित बुजुर्ग का प्रतिनिधित्व करती है, जो अपंग होने के बावजूद संवेदनशील है। कचरा बीनने वाली औरत कहानी का मूल है, जो ग़रीबी में मातृत्व की पीड़ा को चित्रित करती है। वह फेंके कपड़ों को नहीं उठाती, जो उसके वक़ार की पहचान है।
कहानी की भाषा बोलचाल के करीब है, जो पाठक से सीधा संवाद करती है। लोकशब्द जैसे ‘डुको’, ‘डुकरा’, ‘राड़’ उत्तर भारतीय परिवेश को जीवंत बनाते हैं और छोटे-छोटे वाक्य तनाव बढ़ाते हैं। पिघलती डामर ग़रीबों की ज़िदगी की अस्थिरता है और छाया उनकी अदृश्यता। पांडे का नशे के लिए ‘आचमन’ सरीखी धार्मिक शब्दावली का इस्तेमाल से व्यंग्य पैदा किया गया है ।
समाजशास्त्रीय दृष्टि से यह कहानी वर्गीय असमानता को उजागर करती है। डुको का परिवार निम्न मध्यमवर्ग है, जहाँ बुनियादी सुविधाओं की कमी है, लेकिन उसकी माली हालत कचरा बीनने वाली से ऊपर है। कोरोना का संदर्भ संस्थागत विफलता को रेखांकित करता है। कहानी में जेंडर की भूमिकाएँ प्रमुख हैं। डुको ‘अदृश्य श्रम’ की शिकार है, जबकि पुरुष उदासीन है। स्त्रीवादी नज़रिए से यह स्त्री का दोहन है। ग़रीब स्त्री की पीड़ा सिमोन द बोउवार के ‘अन्य लिंग’ को चित्रित करती है और काकी की अपंगता ‘एजिज्म’ दिखाती है।
यह कहानी शहरीकरण की विडंबना को भी उजागर करती है। डामर सड़क (पिच रोड) विकास का प्रतीक है, लेकिन डामर के पिघलने से पैदा होती गर्मी ग़रीबों की तकलीफ़ का सबब बनती है । इसे अमर्त्य सेन की ‘क्षमता’ की अवधारणा (Capability Approach) से जोड़कर देखा जा सकता है, जिसके तहत लोगों के कल्याण और विकास को मापने का एक ढाँचा प्रस्तुत करते हुए कहा गया है कि ज़िन्दगी में केवल संसाधन या आय के बजाय वास्तविक स्वतंत्रता और अवसर ज्यादा मानीखेज़ हुआ करते हैं । प्रोफ़ेसर सेन के अनुसार एक व्यक्ति कितना खुश है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके पास “कार्यशीलताएँ” (Functionings), जैसे पोषित होने, शिक्षित होने या स्वस्थ जीवन जीने की कितनी ‘क्षमताएँ’ हैं । यानी उसे उन कार्यों को करने की कितनी “स्वतंत्रता” है जिन्हें वह मनोनुकूल पाता है और जिससे उसका जीवन बेहतर बनता है । कुल मिलाकर, यह कहानी सामाजिक असमानताओं की आलोचना है जो पाठकों को शिद्दत के साथ यह एहसास कराती है कि तथाकथित ‘व्यस्तता’ में हम असहायों को कैसे अनदेखा कर देते हैं।
ऑस्कर वाइल्ड की छोटी कहानी ‘द नाइटिंगेल एंड द रोज़’ की याद दिलाती आलोच्य संग्रह की ‘जीप उड़ाते परिंदे’ दिल की गहराइयों से निकली विलक्षण कहानी है, जहां जीवन की कठोर वास्तविकताएँ और कल्पना की उड़ान एक-दूसरे में घुल-मिल गयी हैं। कहानीकार ने इसमें चालीस वर्षों की नौकरी के बाद सेवानिवृत्ति के कगार पर खड़े एक साधारण वन विभाग के कर्मचारी बलभद्दर चौधरी को केंद्र में रखा है । कहानी में एक पुराने रेस्ट हाउस में बरगद का विशाल वृक्ष और उसके नीचे का चबूतरा केवल स्थान के बजाय जीवन की उलझनों और मुक्ति के प्रतीक बन जाते हैं। बलभद्दर का जीवन पक्षियों के साथ इतना गुंथा हुआ है कि वह मानो खुद उड़ने को आतुर एक परिंदा बन गया हो, लेकिन वह जमीन की जंजीरों में बंधा हुआ है । इस कथा में शोषण, अलगाव की पीड़ा और प्रकृति से जुड़ाव की थीम्स इतनी सहजता से बुनी गई है कि वे पाठक के मन पर एक काव्यात्मक प्रतिध्वनि छोड़ जाती हैं । ऐसा लगता है मानो कोई पुरानी लोककथा आधुनिक जीवन की कटुता को छूकर गुजर रही हो ।
कहानी की शुरुआत रेस्ट हाउस के जीवंत वर्णन से होती है—डामर का सपाट रास्ता, बोगनवेलिया और मेहंदी की झाड़ियां, और वह हॉल जहां काउंटर के पीछे सोया बलभद्दर जागता है। यह वर्णन महज एक दृश्य नहीं , बल्कि एक माहौल का सृजन करता है जहाँ इंसान प्रकृति की जीवंतता से ऊर्जा प्राप्त करता है। साठ की उम्र में भी दुबला-पतला लेकिन मजबूत बलभद्दर कहानी में एक ऐसे चरित्र के रूप में उभरता है जो साहित्यिक परंपरा में अक्सर देखा जाता है—एक साधु-सा व्यक्ति, जो दुनिया की माया से विरक्त होकर पक्षियों की दुनिया में खो गया है। उसका नामकरण —पोस्टमैन कव्वा, पंडित तोता, मुनमुन गिलहरी—न केवल हास्य और करुणा का मिश्रण पैदा करता है, बल्कि यह दर्शाता है कि कैसे वह अपनी अलगाव की भावना को भरने के लिए प्रकृति का मानवीकरण करता है। यहाँ प्रकृति कथानायक की आत्मा का विस्तार बन जाती है। वाल्मीकि, व्यास, कालिदास से लेकर अंग्रेज़ी के वर्ड्सवर्थ, शेली. कीट्स या हिन्दी के पन्त, प्रसाद, निराला, केदारनाथ अग्रवाल और नागार्जुन आदि की कविताओं की तरह बलभद्दर को भी प्रकृति सांत्वना देती है और पक्षी उसके खोए हुए परिवार और सपनों का प्रतिस्थापन बनते हैं। लेकिन कर्ज के जाल में फँसे बलभद्दर की ज़मीन और घर हड़प लेने वाले सूदखोर बाबू से उसका जब पाला पड़ता है, तो भारतीय ग्रामीण जीवन की वह कुरूपता उजागर होती है जहाँ ग़रीब की मेहनत अमीर की जेब में चली जाती है। यह शोषण महज आर्थिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी है; पितृसत्ता और आर्थिक असमानता की दोहरी मार झेलती मजदूरी करती हुई बलभद्दर की पत्नी एक मूक पीड़िता के रूप में उभरती है।
कहानी में अलगाव की थीम गहराई से बुनी गई है, जिसका ठोस समाजशास्त्रीय सन्दर्भ है। गौरतलब है कि समाजशास्त्र के जनक खे जाने वाली फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खाइम ने ‘समाज में श्रम-विभाजन’ और ‘आत्महत्या’( ‘The Division of Labour in Society’ & ‘Suicide’) जैसी पुस्तकों में विस्तार से बताया है कि सामाजिक संबंध के कमजोर हो जाने पर लोगों के स्वार्थ जब आपस में टकराने लगते हैं और सामाजिक समन्वय(Social integration) के अभाव में जब व्यक्ति अलग-थलग पड़कर असंतुलित महसूस करने लग जाता है,तो यह अवस्था ‘अनोमी’ (anomie) कहलाती है—जो एक प्रकार के नैतिक भ्रम की स्थिति है । आदमी को पता नहीं चलता कि क्या सही है और क्या ग़लत। वह विचित्र विभ्रम का शिकार होता है । उनके अनुसार ऐसा अक्सर तीव्र सामाजिक-आर्थिक बदलावों के कारण होता है और इन बदलावों से लोगों में बेचैनी, निराशा और ज़िंदगी का मक़सद खो जाने जैसी भावना पैदा होने लगती है,जिसका भयावह परिणाम आत्महत्या की दर में वृद्धि के रूप में सामने आता है। दुर्खाइम का कहना है कि ‘अनोमी’ की स्थिति में समाज व्यक्तियों की इच्छाओं को ठीक से नियंत्रित नहीं कर पाता । इस समस्या का एकमात्र हल सामाजिक समन्वय (Social integration) को मजबूत करना है। उन्होंने बल देकर कहा है कि व्यक्ति समाज से पहले नहीं आता, समाज व्यक्ति से पहले आता है। समाज एक जीवित इकाई है, जिसके अपने नियम हैं।समाज को स्वस्थ रखने के लिए मजबूत सामाजिक बंधन और स्पष्ट नियम चाहिए,जिसके अभाव में आदमी संतुलन खोने लगता और आत्महत्या की ओर प्रवृत्त होता है।
विवेच्य कहानी में बलभद्दर का जीवन इसी ‘अनोमी’ का जीता-जागता उदाहरण है; वह नौकरी की वजह से परिवार से कट जाता है, गांव केवल अनाज लाने के लिए जाता है और अंत में अपनी घरवाली की भी कोई मदद भी नहीं कर पाता। आधुनिक समाज में हुए तेज बदलाव के तहत उसमें ‘अनोमी’ पैदा होती है । बलभद्दर का पक्षियों से जुड़ाव इसी अलगाव की भरपाई है, लेकिन यह भी एक करुण विडंबना है, क्योंकि वह मानवीय संबंधों से और अधिक दूर होता चला जाता है। मार्क्स-एंगेल्स ने लिखा है कि पूँजीवाद में मजदूर अपने श्रम, उत्पाद और साथी मनुष्यों से अलगाव महसूस करता है। मार्क्स के ‘इकोनॉमिक एंड फिलॉसॉफिकल मैनुस्क्रिप्ट्स ऑफ 1844’ में वर्णित यह अलगाव चार आयामों में बंटा है: श्रम की प्रक्रिया से, उत्पाद से, अपनी मानवीय क्षमता से और अन्य मजदूरों से। इस नज़रिए से देखें तो कहानी में बलभद्दर एक तृतीय श्रेणी कर्मचारी है, जो चालीस वर्षों तक पदोन्नति से वंचित रहता है और नौकरशाही की मशीनरी में पिसता रहता है। वह अपनी मेहनत से अलग हो जाता है—रेस्ट हाउस की जिम्मेदारी निभाता है, लेकिन कोई लाभ या पहचान नहीं पाता। सूदखोर बाबू द्वारा उसका शोषण होता है और वह अंतत: उत्पादन के साधनों से भी अलगाव महसूस करता हुआ कहानीकार के शब्दों में ‘ठनठन गोपाल’ बन जाता है। गौरतलब है कि दुर्खाइम का ‘अनोमी’ सिद्धांत सामाजिक-नैतिक स्तर पर समन्वय के अभाव पर बल देता है, जबकि मार्क्स के अनुसार श्रमिक वर्ग में ‘अलगाव’ आर्थिक संसाधन न मिल पाने से पैदा होता है। विवेच्य कहानी में बलभद्दर की पीड़ा दोहरी है जिसके नतीजे में वह नौकरी से मुक्त होने पर भी पक्षियों के साथ ही जीना चुनता है।
इस कहानी में वर्णित बरगद का पेड़, जो इतना विशाल है कि उसके नीचे खड़े होकर आसमान नहीं दिखता, बलभद्दर के जीवन की जटिलताओं का प्रतीक है—एक ऐसा जीवन जो प्रकृति की छांव में तो शरण पाता है, लेकिन सामाजिक जंजीरों से मुक्त नहीं हो पाता। पक्षियों का दाना न छूना उनकी उदासी का प्रतिबिंब है, मानो वे बलभद्दर की विदाई महसूस कर रहे हों। यह एक प्रकार की एंथ्रोपोमॉर्फिज्म है, जहां पशु को मानवीय भावनाएं दी जाती हैं और जॉर्ज ऑरवेल के एनिमल फार्म (Animal Farm) के साथ ही काफ़्का की कहानियों में ‘एंथ्रोपोमॉर्फिज्म’ (Anthropomorphism) के भरपूर इस्तेमाल की याद दिलाती है । याद रहे कि ‘आपत्ति’ कहानी में भी कहानीकार द्वारा जानवरों को इंसानी गुण, भावनाएँ और भाषा दी गई है जिससे वह कहानी भी एक व्यंग्यपूर्ण ‘पशु कथा’ (Beast Fable) बन गयी है।
विवेच्य कहानी में सूदखोर बाबू जब बलभद्दर की पत्नी का पल्लू थामता है,तो इसके द्वारा लेखक यौन शोषण और असुरक्षा की एक गहन छवि को बलभद्दर के स्वप्न के रूप में रचता है ,जो ग्रामीण महिलाओं की वास्तविक जीवनस्थितियों का भी स्पर्श करता है । जीप में बैठे बलभद्दर के साथ उड़ते पक्षी जादुई यथार्थवाद की झलक देते प्रतीत होते हैं। यह कहानी का चरमोत्कर्ष है , जो कुछ-कुछ मार्केज़ की शैली की याद दिलाता है जहाँ साधारण जीवन में असाधारण तत्त्व घुल जाते हैं। इस रचना में यह उड़ान मुक्ति के प्रतीक के साथ ही एक करुण विडंबना भी है। वजह यह कि बलभद्दर अब पक्षियों के साथ है, लेकिन उसका मानवीय जीवन बिखर चुका है। यह थीम मनुष्य के सामाजिक अलगाव को व्यक्त करती है, जहां ‘तेवारी’ जैसे अधिकारी के मेहमानों के लिए शराब की व्यवस्था करने के लिए मजबूर बलभद्दर नौकरशाही की मशीनरी में पिसता हुआ अंत में प्रकृति की शरण में चला जाता है ।
कहानी में बलभद्दर का चरित्र इस मायने में भी विशिष्ट है कि वह नायकत्व से पूरी तरह रहित है। वह न क्रांति करता है, न ही अपने दुखों से लड़ता है। वह बस उन दुखों में बना रहता है और धीरे-धीरे उनके आदी हो जाता है। उसकी यह आदत कहानी का गहरा मनोवैज्ञानिक आयाम है, जो ‘इन्सर्च ऑफ़ लॉस्ट टाइम’ जैसे विश्वविख्यात उपन्यास में सुप्रसिद्ध फ्रांसीसी उपन्यासकार और आलोचक मार्सेल प्रूस्ट(1871-1922) के एक कथन की याद दिलाता है कि “पीड़ा वस्तुतः हमारे पूरे अस्तित्व की वह आंतरिक आवश्यकता है, जिसके माध्यम से हम किसी नए और अस्थिर कर देने वाले जीवन-परिवर्तन से परिचित होते हैं और अपनी संवेदनशीलता को धीरे-धीरे उस अवस्था के अनुरूप ढाल लेते हैं।”(“Suffering is a kind of need felt by the organism to become aware of a new condition that troubles it, and to adjust its sensibility so that it corresponds to that condition.”) कहानी का अंत किसी समाधान या न्याय के साथ नहीं होता, बल्कि एक ऐसी अंतर्दशा के साथ समाप्त होता है जो मनुष्य की हार, असहायता और टूटन की अंतिम परिणति है। कहानी पाठक से किसी भी तरह की नैतिक प्रतिक्रिया नहीं माँगती; वह केवल जीवन की एक कड़ी, गहरी और कड़वी सच्चाई दिखाती है।
कहानी की ताकत उसकी भाषा और शिल्प में है। लेखक की वर्णन शैली इतनी जीवंत है कि रेस्ट हाउस का हर कोना पाठक की आँखों के सामने उभर आता है—टपरे में लटकी पैंट-कमीज, चूने से रंगी दीवारें, और पक्षियों की चहचहाहट आदि का वर्णन महज सजावटी नहीं, बल्कि कथा की संवेदनात्मक गहराई को बढ़ाता है। चरित्रों का विकास सूक्ष्म है—बलभद्दर की खुशी तंबाकू दबाकर गुनगुनाने में, उसकी उदासी आंसुओं में, और उसकी मुक्ति उड़ान में है । सूदखोर बाबू का हँसना और उसकी क्रूर मुस्कान विरोधाभासी चरित्र रचते हैं, जो समाज के द्वंद्व को दर्शाते हैं। बावजूद इसके बलभद्दर की पत्नी का चरित्र थोड़ा अस्पष्ट रह जाता है—वह केवल पीड़ा की छाया बनकर रह जाती है, जिससे कहानी में स्त्री-चेतना की कमी खलती है। कथानक कभी-कभी वर्णनों में इतना डूब जाता है कि गति धीमी पड़ जाती है, हालांकि कई बार यह धीमापन ही कहानी की करुणा को गहरा बनाता है।
कुल मिलाकर, ‘जीप उड़ाते परिंदे’ एक ऐसी रचना है जो सामाजिक गैरबराबरी को साहित्यिक कैनवास पर चित्रित करती है, जहां शोषण के अँधेरे के बीच प्रकृति की रोशनी चमकती है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जीवन की जड़ें कितनी गहरी हो सकती हैं—एक आदमी की साधारण जिंदगी में छिपी असाधारण भावनाएं हमें अपने आसपास की दुनिया को नए सिरे से देखने का नज़रिया देती हैं। बलभद्दर की कहानी महज एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन असंख्य लोगों की है जो समाज की चक्की में पिसते हुए भी उड़ने का सपना देखते हैं।
इस संग्रह की एक छोटी कहानी ‘मोहम्मद’ एक सामान्य शहरी जीवन की पृष्ठभूमि में बुनी गई है, जहाँ वाचक एक नई कॉलोनी में रहने जाता है और एक किराना दुकान से लगभग रोज़ाना ख़रीददारी करते हुए दुकानदार अग्निहोत्री और उनके दाढ़ी-मूंछ, तिलक और घुंघराले बालों वाले बेटे बजरंगी से उसकी मित्रता हो जाती है। कहानी सतही रूप से दैनिक जीवन, पास-पड़ोस और व्यापारिक संबंधों पर केंद्रित प्रतीत होती है, लेकिन इसका चरमोत्कर्ष एक हास्यास्पद घटना के रूप में सामने आता है। दूकान पर दूध लेने गया वाचक दूध का पैकेट डालने के लिए पन्नी फैलाते हुए मज़ाक में एक कव्वाली की पंक्ति दुहराता है – “भर दे झोली! भर दे झोली मेरे या…” (जो एक प्रसिद्ध कव्वाली ‘भर दो झोली मेरी या मुहम्मद’ का संदर्भ है), जिस पर बजरंगी क्रोधित हो जाता है और कहता है कि वह ‘वो’ (अर्थात मुहम्मद) नहीं है और न बनना चाहता है। कहानी अचानक समाप्त हो जाती है, लेकिन यह अंत भारतीय समाज में सांप्रदायिक पूर्वाग्रह की गहरी दरार को उजागर करता है। जो लोग इस्लाम के आख़िरी पैगम्बर मोहम्मद के बारे में हदीस के रूप में उपलब्ध आख्यानों का सामान्य ज्ञान भी रखते हैं, उन्हें कहानी का शीर्षक ‘मोहम्मद’ के इस्तेमाल का महत्त्व ज्यादा समझ में आएगा। दुकानदार के दुराग्रही बेटे बजरंगी की कट्टर मानसिकता के तहत मुस्लिम पहचान से जुड़े नाम पर उसकी आक्रामक प्रतिक्रिया बेहद हास्यास्पद ,पर ख़तरनाक है।
सतही तौर पर यह कहानी एक छोटी सी घटना का विवरण लगती है, लेकिन गहराई में यह भारतीय समाज में व्याप्त सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों, पहचान की राजनीति और देश के लिए हानिकारक सांप्रदायिक राजनीति को बेपर्द करती है। विभिन्न समाजशास्त्रीय सिद्धांतों के आलोक में और ख़ासकर ‘संघर्ष सिद्धांत’ (Conflict Theory) और ‘अन्यीकरण’ (Othering) जैसी अवधारणाओं के मद्देनज़र विचारने पर इस साहित्यिक पाठ की संरचना में अन्तर्निहित सामाजिक संरचना का हमारे समय में तेजी से बदलता समीकरण सामने आता है ।
कार्ल मार्क्स और मैक्स वेबर के ‘संघर्ष सिद्धांत’ के अनुसार समाज में संसाधनों, शक्ति और पहचान पर आधारित संघर्ष होते हैं, जो प्रमुख समूहों द्वारा अल्पसंख्यकों का दमन करते हैं। कहानी में बजरंगी का क्रोध ‘मुहम्मद’ नाम से जुड़ने पर उभरता है, जो हिंदू-मुस्लिम विभाजन की सांप्रदायिक राजनीति को दर्शाता है। आज़ादी के पहले से ही भारत में सांप्रदायिक राजनीति द्वारा धर्म-आधारित ध्रुवीकरण ने ‘अन्य’ (मुस्लिम) को खतरे के रूप में चित्रित किया है, जिससे मध्यवर्गीय हिंदू पहचान वाले लोग मुसलमानों से जुड़ने से हिचकते हैं। कहना न होगा कि मध्यकाल में नादिरशाह ,गोरी-ग़ज़नी, औरंज़ेब आदि कट्टर मुस्लिम बादशाहों की सल्तनत बिखर जाने के बाद अस्तित्व में आए हिन्दू रजवाड़ों के मुसलमान नवाबों से गहरे ताल्लुकात रहे हैं। इनके आलावा अंग्रेज़ी राज के दिनों से लेकर आज भी उच्च मध्यवर्ग के हिन्दू-मुस्लिम अभिजनों के बीच भी कोई ख़ास विवाद नहीं रहा है और आम मेहनतकश हिन्दू-मुस्लिम जनता के मन में एक-दूसरे के प्रति कोई ख़ास वितृष्णा नहीं पाई जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता को एडवर्ड सईद के ‘ओरिएंटलिज्म’ के तहत यह ‘अन्यीकरण’ (अदरनेस) के सिद्धांत की रोशनी में समझा जा सकता है , जिसके अनुसार किसी हिन्दू या पश्चिम में यहूदी एवं कट्टर इसाई के लिए के लिए मुस्लिम पहचान और मुसलमानों के लिए कोई गैर-मुस्लिम पहचान बदकिस्मती से ‘दूसरा’ या ‘शत्रु’ मान लिया जाता है।
‘मोहम्मद’ कहानी हमारे समाज और देश के लिए हानिकारक सांप्रदायिक राजनीति के विरुद्ध खड़ी है, क्योंकि यह दिखाती है कि कैसे दैनिक जीवन में सांप्रदायिक पूर्वाग्रह छिपे रहते हैं। बजरंगी का तिलक, दाढ़ी-मूंछ वाला हिन्दू स्वरूप मुस्लिम नाम से जुड़ने पर उसकी असुरक्षा उजागर करता है, जो सांप्रदायिक दंगों या ‘लव ज़िहाद’ या ‘घर वापसी’ सरीखे राजनीतिक प्रचार से उपजी है। अमर्त्य सेन ‘आइडेंटिटी एंड वायलेंस’ में साम्प्रदायिकता के विरुद्ध तर्क देते है कि सांप्रदायिक राजनीति सामाजिक सद्भाव को नष्ट करती है और ‘पहचान’ को एकांगी बनाकर हिंसा को जन्म देती है। इस कहानी का अंत विडंबनापूर्ण है, जो पाठक को सोचने पर मजबूर करता है कि सांप्रदायिकता कैसे मित्रता को विषैला बनाती है।
पहचान की राजनीति (Identity Politics) और धर्मनिरपेक्षता (Secularism) को लेकर फ्रांसिस फुकुयामा या चार्ल्स टेलर के सिद्धांत बताते हैं कि कैसे समुदाय-आधारित पहचान (धर्म, जाति) को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जिससे समाज लगातार विभाजित होता है। भारत में सांप्रदायिक राजनीति के तहत देश का विभाजन हुआ और पाकिस्तान में इस्लामी राष्ट्रवाद तथा उसकी प्रतिक्रया में भारत में हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा मिला, जिसके नतीजे में हिन्दू या मुस्लिम नाम या प्रतीक को दोनों देशों के कट्टर लोगों द्वारा ‘विदेशी’ या ‘ख़तरा’ माना जाता है।हाल में बंगलादेश में जामत-ए-इस्लामी के झण्डे तले वहाँ हिन्दू अल्पसंख्यकों के साथ जो ज्यादती हो रही है उसका असर दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों पर होना लाजिमी है। विवेच्य कहानी में बजरंगी की प्रतिक्रिया इसी भयावह राजनीति का परिणाम है – वह ‘मुहम्मद’ नाम से जुड़ने को अपमान मानता है, जो हिंदू-मुस्लिम द्वंद्व की सांप्रदायिक धारा को दर्शाता है।
इस संदर्भ में, अमर्त्य सेन की पुस्तक ‘आइडेंटिटी एंड वायलेंस: द इल्यूजन ऑफ डेस्टिनी’ (2006) में विस्तार से वर्णित ‘पहचान की राजनीति’ का सिद्धांत विशेष रूप से प्रासंगिक है । सेन तर्क देते हैं कि मानव पहचान बहुआयामी (मल्टीपल) होता है – एक व्यक्ति एक साथ धार्मिक, राष्ट्रीय, व्यावसायिक, सांस्कृतिक और सामाजिक पहचानों से जुड़ा होता है। हालांकि, सांप्रदायिक या पहचान-आधारित राजनीति इस बहुलता को नकारकर उसकी ‘एकल’ या ‘सॉलिटैरिस्ट’ पहचान (जैसे केवल ‘हिंदू’ या ‘मुस्लिम’) पर ज़ोर देती है, जो एक विभ्रम (इल्यूजन) है। यह भ्रम हिंसा को जन्म देता है, क्योंकि यह लोगों को ‘हम बनाम वे’ के द्वंद्व में बांट देता है। प्रोफ़ेसर सेन बताते हैं कि कैसे बोस्निया, रवांडा या न्यूयार्क में कुख्यात ‘ग्यारह सितम्बर’ जैसी घटनाओं के बाद ‘पहचान’ को एकांगी बनाकर दंगे भड़काए गए। भारत के संदर्भ में सेन की यह व्याख्या सांप्रदायिक राजनीति की आलोचना करती है, जहाँ भावनात्मक राजनीति (इमोशनल पॉलिटिक्स) लोगों की पहचान के मूल तत्त्व (‘क्विंटेसेंस’) को एकल धर्म पर सीमित कर हिंसा को बढ़ावा देती है। सेन का समाधान है कि बहुलता वाली पहचान को मान्यता देकर, हम शांति और समझ की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं – क्योंकि कोई व्यक्ति केवल ‘हिन्दू’ या ‘मुस्लिम’ नहीं, बल्कि एक व्यापारी, पड़ोसी या दोस्त भी होता है।‘मोहम्मद’ कहानी में बजरंगी की प्रतिक्रिया ठीक इसी ‘सॉलिटैरिस्ट विभ्रम’ का उदाहरण है: वह अपनी हिंदू पहचान को इतना प्रमुख मानता है कि ‘मुहम्मद’ नाम से जुड़ना उसके लिए अपमानजनक हो जाता है, जबकि कथावाचक के साथ उसकी मित्रता बहुलता वाली पहचान पर आधारित थी।
गांधी, लोहिया ,जवाहरलाल नेहरू, नरेन्द्रदेव, हसन सुरूर, अमर्त्य सेन, रामचन्द्र गांधी और राजीव भार्गव सरीखे विचारकों के धर्मनिरपेक्ष चिन्तन के लिए चुनौती खड़ी करनेवाली मानसिकता और स्थितियों को उजागर करती यह कहानी दिखाती है कि कैसे सांप्रदायिक राजनीति धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को कमजोर करती है। कहानी में वाचक और बजरंगी के बीच की मित्रता (जो एक ही धर्म के भीतर है) एक मज़ाक से टूट जाती है और यह राजनीतिक दुष्प्रचार द्वारा पैदा की गई घृणा को कला के स्तर पर उजागर करती है।
यह कहानी सांप्रदायिक राजनीति को हमारे समाज और देश के लिए हानिकारक बताते हुए साम्प्रदायिकता के विरुद्ध मजबूत रचनात्मक तर्क प्रस्तुत करती हुई यह दिखाती है कि कैसे राजनीतिक ध्रुवीकरण सामान्य नागरिकों में पूर्वाग्रह पैदा करता है। यदि बजरंगी मुस्लिम नाम से इतना क्रोधित होता है, तो यह भारत की बहुलतावादी संस्कृति के लिए ख़तरे की घंटी है। पहचान के निर्माण को चुनौती देने वाली पॉल रिकोयर की ‘नैरेटिव आइडेंटिटी’ की अवधारणा को इस कहानी में कला के स्तर पर पुनर्रचित करने का प्रयास है।
क्लिफर्ड गीर्ट्ज के प्रतीकवादी मानवशास्त्र में ‘प्रतीक’ (जैसे नाम, गीत) सांस्कृतिक अर्थ रखते हैं। कहानी में ‘मुहम्मद’ नाम एक प्रतीक है, जो मुस्लिम पहचान का प्रतिनिधित्व करता है, लेकिन बजरंगी के लिए यह घृणा का स्रोत बन जाता है। फ्रांज बोआज अपने ‘सांस्कृतिक सापेक्षवाद’ वाले सिद्धांत में इस बात पर बल देते हैं कि संस्कृतियों को उनके संदर्भ में समझना चाहिए, लेकिन यह कहानी दिखाती है कि सांप्रदायिक राजनीति इस सापेक्षवाद को नष्ट कर देती है । वजह यह कि यह एक संस्कृति (इस्लाम) को दूसरी (हिंदू) से नीचा दिखाती है। कॉलोनी की पृष्ठभूमि में आए नदी, जंगल, पुल आदि भी प्रतीकात्मक रूप से समाज में विभाजन को दर्शाते हैं ।
इस प्रकार यह रचना सांप्रदायिक राजनीति के विरुद्ध मानवशास्त्रीय दृष्टि से मजबूत है, क्योंकि यह दिखाती है कि कैसे प्रतीक (कव्वाली की पंक्ति) सामान्य बातचीत को हिंसक बना देते हैं ,जबकि आज भी इस कव्वाली को सुनकर सभी धर्मों के लोग आनन्दित होते हैं । प्रकारांतर से यह कहानी भारतीय समाज में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की आलोचना करती है, जहाँ हिंदू प्रतीक (बजरंगी का नाम, जो हनुमान से जुड़ा है) को श्रेष्ठ माना जाता है। इस रचना की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इसमें मुस्लिम समुदाय के नज़रिए का कोई खुलासा नहीं मिलता जिस वजह से यह इकहरी लगती है ।
गॉर्डन ऑलपोर्ट के ‘पूर्वाग्रह सिद्धांत’ (Prejudice and Group Psychology) के अनुसार मनुष्य में पूर्वाग्रह सामाजिक कारणों से पैदा होता है जो समूह-आधारित घृणा पैदा करता है। कहानी में बजरंगी का मुसलामानों के प्रति जो दुराग्रह दर्शाया गया है, वह एक हद तक मीडिया, सोशल मीडिया आदि के माध्यम से ‘इस्लामोफोबिया’ जैसे घातक राजनीतिक प्रचार से उपजा है। हेनरी ताजफेल ने अपने ‘सामाजिक पहचान सिद्धांत’ (Social Identity Theory) में बल देकर कहा है कि दुराग्रह से ग्रस्त लोग अपनी सामूहिक पहचान को मजबूत करने के लिए ‘अन्य’ समूहों को नीचा दिखाते हैं। दक्षिण एशिया के देशों का माहौल इसका पुख्ता सबूत पेश करता है ।
सांप्रदायिक राजनीति की आलोचना करने के बावजूद ‘मोहम्मद’ एक बेहद ज्वलंत प्रश्न को लेकर रचित कलात्मक दृष्टि से कमजोर कहानी है। इसका अपूर्ण अंत पाठक को चिंतन के लिए छोड़ देता है ।बावजूद इसके यह कहानी दक्षिण एशियाई देशों और ख़ासकर भारतीय समाज में जंगल में आग की तरह फैल रही सांप्रदायिकता की समस्या पर प्रहार करती है और याद दिलाती है कि ऐतिहासिक कारणों से धर्मंनिरपेक्षता भारतीय राष्ट्र-राज्य के अस्तित्व और कामयाबी के लिए विकल्प के बजाय अपरिहार्य है।
हरि भटनागर के पात्रों के संघर्ष किसी एक प्रकार के नहीं हैं। वे आर्थिक भी हैं, भावनात्मक भी, मनोवैज्ञानिक भी, स्मृतिगत भी और कभी-कभी अस्तित्वगत भी। वे टूटते हैं, फिर बनते हैं, फिर टूटते हैं। उनकी यह टूटन करुणा का नहीं, यथार्थ का परिणाम होती है। इसी टूटन में लेखक का सबसे बड़ा हस्तक्षेप दिखाई देता है—वह पात्रों को समझता है, उन्हें कोसता नहीं। यही समझ उनके साहित्य को मानवीयता के सबसे ऊँचे स्तर पर ले जाती है।
इस संग्रह की अंतिम कहानी ‘अग्नि परीक्षा’ है, जो समकालीन हिन्दी कथा-संसार में एक अद्वितीय स्थान रखती है। वजह यह कि यह कहानी मनुष्य की अंतरात्मा, अपराधबोध या निजी मनोव्याकुलता की कथा नहीं, बल्कि कला, सत्ता, सौंदर्य और सांस्कृतिक नियंत्रण की भयावह राजनीति का रूपक है। यह कहानी एक ऐसे संसार को रचती है जहाँ शिल्प और सौंदर्य की सभी चमक दरअसल दमन की चमक है, और जहाँ कविता केवल भाव नहीं, बल्कि अनुशासन, वर्चस्व और सत्ता के आदेशों से निर्मित एक वस्तु है।
ऐसा प्रतीत होता है कि एक जमाने में भारत की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले भोपाल में दशकों से रहते और मध्यप्रदेश शासन दवारा संचालित भारत भवन से लेकर अनेक साहित्य एवं कला अकादमियों में आते-जाते या काम करते हुए विभिन्न अवसरों पर वहाँ के सर्वेसर्वा उच्चाधिकारियों के साथ ही उनके दरबारियों के व्यवहार का कहानीकार के दिल-ओ-दिमाग़ पर जो असर हुआ , (मुक्तिबोध के शब्दों में जो कुछ ‘मनस्तत्त्व व्यवस्था का अंग बन गया’), वही इस कहानी की अंतर्वस्तु है। वजह यह कि उसकी झलक इस रचना की वैधानिक से लेकर भाषिक संरचना तक में अनुस्यूत है ।
कहानी आरंभ से ही अपने प्रतीक-संसार में पाठक को खींच लेती है। इसका पहला वाक्य ही अर्थगर्भित है —‘उस भवन का नाम ऐशगाह था।‘ यह ‘ऐशगाह’ कोई साधारण भवन नहीं; यह एक ऐसी जगह है जहाँ सौंदर्य, कला और मनुष्य की संवेदनाएँ विलासिता और वर्चस्व में बदल जाती हैं। कहानी में यह भवन कला का मंदिर कम और आस्वाद और सौंदर्य के बाज़ार का कारख़ाना ज्यादा है, जहाँ कवि और कविता दोनों किसी अदृश्य प्रणाली द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं। कहानी के प्रवेश-द्वार पर ही यह स्पष्ट हो जाता है कि हम एक ऐसे संसार में क़दम रख रहे हैं जहाँ कविता कवि की आत्मा की प्रतिध्वनि के बजाय किसी बाहरी सत्ता द्वारा निर्धारित नियमों से जन्म लेती है।
कहानी आगे बढ़ती है तो ‘ऐशगाह’ के भीतर की दुनिया अपनी पूरी भयावहता के साथ खुलती है—“काँच के दरवाज़े के पास वह खड़ा था। भीतर एक विशाल कक्ष था, रंग-बिरंगे पर्दों से भरा।” ऐशगाह का यह वैभव उसका बाहरी रूप है; भीतर उसका वास्तविक स्वरूप सत्ता-नियंत्रित सौंदर्य का शिविर है। यह शिविर कलाकारों को आकर्षित भी करता है और नष्ट भी । काँच के दरवाज़े का पारदर्शी परन्तु अपारगम्य स्वरूप यह संकेत देता है कि कला की स्वीकृति का मार्ग दिखता तो है, पर पहुँच केवल उन्हीं को मिलती है जिन्हें सत्ता स्वीकार करे।
कहानी में धूलदास का चरित्र इस प्रतीक-संसार का केंद्र है—एक ऐसा व्यक्ति जिसे ‘रस’ और ‘सौंदर्य’ का निर्णायक समझा जाता है, पर जिसकी दृष्टि में सौंदर्य कुछ और नहीं, मात्र आस्वाद है। कहानी में उसका परिचय जितनी सहजता से मिलता है, उतनी ही तीक्ष्णता से वह सत्ता और आस्वाद के गठजोड़ का प्रतिनिधि बनकर उभरता है। उसका पहला ही वक्तव्य पूरी कहानी के वैचारिक मेरुदण्ड को उजागर कर देता है—‘यहाँ कविता का विषय स्त्री-देह है—इसी की व्याख्या, इसी की स्तुति…. ।’
गौरतलब है कि उस ‘भवन’-विशेष में स्त्री देह केवल एक साहित्यिक विषय नहीं; यह सत्ता द्वारा सौंदर्य के एकतरफ़ा निर्माण का सबसे बड़ा संकेत है। इसमें स्त्री देह का सौंदर्य नहीं, सत्ता का नैतिक प्रतिमान छिपा है। सत्ता तय करती है कि कवि क्या देखेगा, कैसे देखेगा, किसे सुनेगा और किसे अनसुना कर देगा। कहानी में दिलचस्प तरीके से वर्णन है कि कैसे ऐशगाह में उपस्थित सात कवि इस संरचना के दास हैं; वे स्वतंत्र सृजनकर्ता नहीं, अनुशासन के पालनकर्ता हैं। उनका मौन इस बात का प्रमाण है कि कला का संसार यहाँ संवाद और रचनात्मकता पर नहीं, बल्कि आदेश और अनुशासन पर आधारित है। कहानी में धूलदास की एक विचित्र हिदायत का ज़िक्र है जो स्थिति को उजागर करता है—‘कवि एक-दूसरे से बात नहीं करेंगे। कोई हँसेगा नहीं। कविता बाहर नहीं ले जाई जाएगी।‘
यह सृजन का अनुशासन नहीं; यह सत्ता का अनुशासन है। यह कला को नियंत्रित करने की उस राजनीति की ओर संकेत करता है जहाँ विचार, भाषा और सौंदर्य को स्वतंत्र नहीं रहने दिया जाता, बल्कि उन्हें सत्ता के स्वाद के अनुसार ढाला जाता है। कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें लाभ-लोभ के व्याकरण से परिचालित कवि स्वयं भी इस दमन-संरचना का हिस्सा बन जाना चाहता है। वह अपनी स्वीकृति की राह में अपनी स्वतंत्रता, अपनी संवेदना और यहाँ तक कि अपनी कविता तक गिरवी रखने को तैयार दिखता है। कहानी के एक अंश में कवि का यह आंतरिक द्वंद्व बेहद तीव्र रूप में सामने आता है—‘मैंने सोचा, यदि भीतर प्रवेश मिल जाता तो शायद मैं भी उन सात में शामिल हो जाता।‘
यहाँ प्रवेश की इच्छा कोई उपलब्धि नहीं; यह आत्मविनाश का संकेत है। यह बताती है कि सत्ता-निर्मित सौंदर्य की चमक मोहक और भयावह दोनों हो सकती है। यही ‘अग्नि परीक्षा’ का सबसे बड़ा रूपक है—अग्नि वह नहीं जिसे पार कर नायक पवित्र होता है; वह ‘अग्नि’ आतंरिक है, जिसमें काव्य-सृजन की स्वतंत्रता और रचनात्मक संभावनाएं भस्म हो जाती हैं ।
कहानी का व्यंग्य सूक्ष्म , पर आवेगपूर्ण है । धूलदास का स्त्री देह के अवयवों में ‘रस’ खोजने का आग्रह, कवियों पर लगाए गए नियम और ऐशगाह का वैभव—ये सब मिलकर एक ऐसे संसार की तस्वीर बनाते हैं जहाँ कला की आत्मा को मारकर उसका उपभोग किया जाता है। यह उपभोग भौतिक भी है और वैचारिक भी।हरि भटनागर का व्यंग्य किसी चुटीलेपन या सतही कटाक्ष का व्यंग्य नहीं; यह संरचनात्मक व्यंग्य है—जिसमें सत्ता की ‘सौंदर्यशास्त्र की राजनीति’ (Politics of Aesthetics) पूरी तरह उघड़ जाती है।
याद रहे कि फ्रैंकफर्ट स्कूल (एडोर्नो, बेंजामिन, ब्रेख्त, लुकाच, ब्लोच) द्वारा तैयार किए गए एक प्रमुख ग्रंथ ‘सौंदर्यशास्त्र और राजनीति’ (Aesthetics and Politics) में पूँजीवाद के तहत कला की भूमिका की पड़ताल करते हुए ज़ोर देकर कहा गया है कि ‘बुर्जुआ’ कला में भी संभावित मुक्ति के तत्त्व होते हैं, जो कला में सरलीकृत राजनीतिक निर्देशों के ख़िलाफ़ और इसकी आलोचनात्मक शक्ति के लिए तर्क के साधन बनते हैं । एडोर्नो ने लिखा है कि उच्च कला और लोकप्रिय कला, दोनों ‘पूँजीवाद के कलंक’ को वहन करती है और दोनों में परिवर्तन के तत्त्व भी होते हैं।
बहरहाल, कहना यह है कि ‘अग्नि परीक्षा’ कहानी का अंत किसी मुक्ति की ओर नहीं ले जाता। उसमें न कोई प्रतिरोध है,न ही विद्रोह। मौन ही इसका सबसे बड़ा वक्तव्य है,जो यह बतलाता है कि कला की आज़ादी केवल कलाकार की इच्छाशक्ति का प्रश्न नहीं है; यह उन संरचनाओं का भी प्रश्न है जो कलाकार को घेरकर उसकी संवेदनाओं को वस्तु में और उसकी कविता को उत्पाद में बदल देती हैं।
प्रसंगवश याद आ सकते हैं मार्क्स-एंगेल्स, जिन्होंने लिखा है कि सच्चा कलाकार उसी तरह सृजन करता है जैसे रेशम का कीड़ा रेशम पैदा करता है । लेकिन साहित्य के वे सर्वहारा जो बाज़ार के दबाव में प्रकाशक की माँग पर साहित्य लिखते हैं वे सृजन के बजाय साहित्य के नाम पर किताबों का उत्पादन करते हैं ।
बहरहाल, ‘अग्नि परीक्षा’ इसीलिए एक बेहद प्रासंगिक कहानी सिद्ध होती है—क्योंकि यह साहित्य, सौंदर्य और सत्ता के उन जटिल संबंधों को उजागर करती है ,जिन्हें लोग तात्कालिक लाभ के लिए अक्सर अनदेखा करते हैं। इस कहानी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह कला के संसार को भावुकता में नहीं, बल्कि ‘संरचना और सत्ता की राजनीति’ में रखकर देखती है। यह न ‘व्यक्तिगत अपराध’ की कथा है, न ‘भीतरी आग’ की; यह उस बाहरी आग का आख्यान है जिसमें कला को तपाया नहीं, बल्कि भस्म किया जाता है। ‘ऐशगाह’ का चमकदार वैभव, कवियों की थमी हुई सांसें, धूलदास की ‘रस-सत्ता’, और कवि का भीतर प्रवेश की लालसा—इन सबके बीच जो आग जल रही है, वही इस कहानी में सच्ची ‘अग्नि परीक्षा’ है। यह परीक्षा कवि की नहीं; पूरी कला-व्यवस्था की है। यही इसकी शक्ति है, और यही इसे आधुनिक हिन्दी कथा-साहित्य में एक विशिष्ट, तीक्ष्ण और अविस्मरणीय स्थान प्रदान करती है।
‘अग्नि परीक्षा’ कहानी को यदि संरचनावाद, उत्तर-संरचनावाद, देरिदा के विखंडनवाद और उत्तर-उपनिवेशवाद सरीखे आधुनिक आलोचना-सिद्धांतों के आलोक में पढ़ा जाए ,तो यह रचना पाठक के अंतर्मन में एक अत्यंत जटिल, बहुस्तरीय और संकेत-समृद्ध संसार खोलती है। याद रहे कि किसी भी श्रेष्ठ रचना की तरह इस कहानी का पाठ भी स्वयं को किसी एक सिद्धांत ,एक अर्थ, एक व्याख्या या एक केंद्र में बाँधने नहीं देता; बल्कि वह उन संरचनाओं को उजागर करता है जिनमें कला, सत्ता और अर्थ का निर्माण होता है। कहानी की आरंभिक पंक्ति, ‘उस भवन का नाम ऐशगाह था’ , केवल एक भवन का परिचय नहीं; यह एक ऐसी संरचना का प्रवेश-बिंदु है जहाँ अर्थ, सौंदर्य और सत्ता एक-दूसरे को उत्पन्न और नियंत्रित करते हैं। इस पंक्ति का वजन केवल इस बात में नहीं कि ‘भवन का नाम ऐशगाह’ है, बल्कि इस बात में है कि वह एक ऐसे परिसर का परिचय है जहाँ कला अपनी स्वायत्तता नहीं, बल्कि अपना अनुशासन ग्रहण करती है।
संरचनावाद की दृष्टि से ‘ऐशगाह’ एक प्रकार का कोडित तंत्र है, एक संकेत-प्रणाली- जिसके भीतर सौंदर्य, रस, कविता, कलाकार, विषय और अनुशासन – सब कुछ पहले से निर्धारित और संरचित है। कहानी में सौंदर्य को एक विशिष्ट संरचना के भीतर बाँध दिया गया है; वह संरचना धूलदास द्वारा दी गई है, जिसके अनुसार “कविता का विषय स्त्री-देह ही होगा” । इस संरचना में स्त्री देह, कला का ‘स्वतंत्र विषय’ नहीं, बल्कि एक संकेत है; वह संकेत एक ऐसी सत्ता की ओर इंगित करता है जो अपने सौंदर्यशास्त्रीय मानकों को स्थिर कर चुकी है। यह स्थिरता ही संरचना है और कवि उसकी परिधि में स्थित एक तत्त्व । उसके लिए रस, सौंदर्य और विषय पहले से तय हैं। इस तरह कहानी एक ऐसे बंद तंत्र को रचती है जो संरचनावाद की उस अवधारणा को सत्यापित करता है कि अर्थ कभी व्यक्तिगत नहीं; वह संरचना द्वारा निर्मित होता है। लेकिन कहानी का पाठ वहीं ठहर नहीं जाता। उत्तर-संरचनावाद का आग्रह है कि कोई भी संरचना स्थिर नहीं होती; वह अपने भीतर ही अंतर्विरोध, बहुविकल्प और विचलन को जन्म देती है। ‘अग्नि परीक्षा’ में यही विचलन कवि के मन में प्रवेश की इच्छा और भय के बीच पैदा होता है। वह कहता है, “यदि भीतर प्रवेश मिल जाता तो शायद मैं भी उन सात में शामिल हो जाता” । यह प्रवेश की इच्छा दरअसल उस संरचना को स्वीकार करने की इच्छा है जिससे उसके भीतर भय भी है। कवि का यह संकोच और चाह दोनों यह दिखाते हैं कि संरचना कलाकार को परिभाषित करती है, पर कलाकार भी संरचना के भीतर अपनी अनिश्चितता और विचलन के माध्यम से अर्थ को अस्थिर करता है। धूलदास की सत्ता स्थिर दिखती है, पर उसके भीतर भी विघटन के बीज विद्यमान हैं। सात कवियों की निस्तब्धता भी एक प्रकार की विसंगति पैदा करती है और कहानी का पूरा संसार अपने भीतर से ही अपनी संरचना को चुनौती देता रहता है।
यहाँ देरिदा का विखंडनवाद अपनी पूरी शक्ति से कथा को खोलना शुरू करता है। देरिदा के अनुसार कोई भी पाठ ‘मौजूद’ अर्थ नहीं देता; वह अपने भीतर अर्थ के स्थगन, दोहरेपन, विरोधाभास और फिसलन को समेटे रहता है। ‘अग्नि परीक्षा’ में ऐशगाह का वैभव और अनुशासन जितना स्पष्ट लगता है, उतना ही वह भीतर से अस्थिर है। काँच का दरवाजा – जिसमें से कवि बाहर से भीतर को देख सकता है, पर प्रवेश नहीं कर सकता; स्वयं एक ऐसे द्वैध-संकेत की तरह उभरता है जो खुलापन और बंदिश दोनों को एक साथ व्यक्त करता है। यह ‘द्वैध’ देरिदा की उस अवधारणा की याद दिलाता है कि हर संकेत अपने उलट अर्थ को भी साथ लेकर चलता है। ‘ऐशगाह’ जितना आकर्षक है, उतना ही भयावह; जितना सौंदर्य का केंद्र है, उतना ही दमन का भी। कविता जितनी मुक्त दिखती है, उतनी ही नियंत्रित। स्त्री देह जितनी सौंदर्य का स्रोत मानी जाती है, उतनी ही सत्ता की वस्तु बन जाती है।
देरिदा के विखंडन में सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व है अर्थ की स्थिरता का टूटना। कहानी में धूलदास द्वारा प्रस्तुत तथाकथित सौंदर्य-दर्शन स्वयं अपने भीतर विखंडित है। वह एक ओर रस की बात करता है, दूसरी ओर कवियों की स्वतंत्रता को समाप्त करता है,जिसके बगैर भरत,आनंदवर्धन,अभिनवगुप्त से लेकर पंडितराज विश्वनाथ की शब्दावली में कहें तो वह ‘सत्वोद्रेक’ असंभव है जो रस परिपाक की बुनियाद है । कहानी में धूलदास की सत्ता जितनी स्पष्ट है, उतनी ही नाजुक भी; उसका ‘रस-ज्ञान’ जितना निर्णायक लगता है, उतना ही उसके अपने अहंकार और वर्चस्व पर टिका हुआ है।धूलदास नाम भी बेहद व्यंजक है, क्योंकि इसे विखंडित करने पर पता चलता है कि वह बड़े राजनेताओं के जूते की धूल रूपी ‘चरण रज’ अपने माथे पर लगाकर सांस्कृतिक साम्राज्य के शिखर पर आसीन है। अप्रत्यक्ष रूप में इस विखंडन से कहानी स्पष्ट करती है कि कोई भी सौंदर्यशास्त्र निरपेक्ष नहीं; वह सत्ता का उत्पाद भी है और उसका उपकरण भी। यही वह बिंदु है जहाँ कहानी केवल कला की राजनीति का आख्यान नहीं रहती; वह स्वयं पाठ की राजनीति का उदाहरण भी बन जाती है।
वस्तुत: ‘अग्नि परीक्षा’ कहानी जैक्स देरिदा के दार्शनिक ढांचे पर विचार के लिए बहुत उपयुक्त टेक्स्ट है। याद रहे कि विखंडन सिद्धांत (‘डिकंस्ट्रक्शन’) पाठों में स्थिर अर्थों, पदानुक्रमों और संरचनाओं को तोड़ता है। ऊपर अन्य कहानियों के विश्लेषण-क्रम में द्वंद्व विरोधों, ‘डिफरांस’ और ‘लोगोसेंट्रिज्म’ का जिक्र किया जा चुका है ,लेकिन पाठ की गहराई में उतरकर गोताखोरी करने पर समझ में आता है कि कहानीकार के अनजाने में ही यह कहानी देरिदा के अनेक अतिसूक्ष्म विचारों—ट्रेस, अपोरिया, सप्लीमेंट, फार्माकॉन और हॉंटोलॉजी—को कैसे अपनाए हुए है। ये अवधारणाएं कहानी में सांस्कृतिक संस्थाओं, सौंदर्यशास्त्र और सत्ता की आलोचना को उजागर करती हैं और रचना को एक स्थिर रूपक के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसे पाठ के रूप में प्रस्तुत करती हैं जो अपनी नींवों को लगातार कमजोर करता रहता है और कला और समाज में अर्थ की अस्थिरता को दर्शाता है।
देरिदा की ‘ट्रेस’ (Trace) की अवधारणा अनुपस्थित चीज़ों के बचे हुए निशान को संदर्भित करती है, जहां अर्थ कभी पूरी तरह उपस्थित नहीं होता,बल्कि हमेशा पहले के संकेतकों के अवशेषों से स्थगित होता रहता है। ‘अग्नि परीक्षा’ में कविता के अनिवार्य विषय के तौर पर स्त्री का शरीर—पितृसत्तात्मक और संस्थागत नियंत्रण का ‘ट्रेस’ है। यह रस (सौंदर्य सार) के केंद्र के रूप में कथित तौर पर ‘उपस्थित’ है , लेकिन यह एक अनुपस्थिति का ट्रेस है,क्योंकि कहानी के ‘आला अफ़सर’ की हिदायतनुमा सलाह के तहत स्त्री की स्वायत्तता, आवाज और वास्तविक अनुभव मिटा दिए जाते हैं और इसे केवल वस्तुबद्ध प्रशंसा तक सीमित कर दिया जाता है। धूलदास के नियम (“कविता का विषय स्त्री-शरीर की व्याख्या और उसकी प्रशंसा आदि) भारतीय काव्यशास्त्रीय मान्यताओं का अन्याथाकरण करते हैं, लेकिन ट्रेस एक फिसलन दिखाता है—शरीर प्रामाणिक सुंदरता का नहीं बल्कि सत्ता के थोपे जाने के भूत का संकेत करता है, जो प्रकारांतर से उत्तर-औपनिवेशिक भारत में औपनिवेशिक या कुलीन पदानुक्रमों को गूंज सिद्ध होता है। इतना ही नहीं, कहानी में ‘यश:प्रार्थी’ कवि का अनकहा आंतरिक संघर्ष प्रतिरोध का ‘ट्रेस’ छोड़ता है। ऐशगाह में प्रवेश करने की उसकी तमन्ना और पूरी तरह शामिल न होने की हिचक (‘मैंने सोचा, अगर प्रवेश मिल जाए तो शायद मैं भी उन सात में शामिल हो जाऊं’) एक अनुपस्थित विद्रोह का ट्रेस है, जो कहानी को अनकहा के माध्यम से विखंडित करता है। यह देरिदा के ‘ऑफ ग्रामेटोलॉजी’(1967) में व्यक्त विचार से मेल खाता है कि लेखन ट्रेसों की एक प्रणाली है, जहां उपस्थिति (संस्थागत स्वीकृति) अनुपस्थित (रचनात्मक स्वतंत्रता) से कमजोर होती है। कहानी के अंत में मौन इसकी पुष्टि करता है, जिसके तहत कोई समाधान नहीं होने से कलात्मक मुक्ति का लगातार स्थगन ट्रेस होता है, जो विलासी संस्कृतिकर्मियों दवारा ‘ऐशगाह’ के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली सांस्कृतिक अकादमियों में कला को वस्तु बनाने की आलोचना करता है।
देरिदा के लिए ‘अपोरिया’(aporia) एक अघुलनशील गतिरोध या विरोधाभास है जो तर्क और अर्थ की सीमाओं को उजागर करता है। ‘अग्नि परीक्षा’ कहानी सौंदर्यशास्त्र की राजनीति में अपोरियाओं के आसपास संरचित है। मुख्य अपोरिया अग्नि परीक्षा में ही है जहाँ कथित ‘ऐशगाह’ में प्रवेश कला के माध्यम से शुद्धिकरण और ऊंचाई का वादा करता है, लेकिन इसके लिए हँसी, संवाद और भवन से बाहर कविता को ले जाने पर पर बंदिश के रूप में आत्म-दहन की मांग करता है । यह गतिरोध समावेशन या बहिष्कार के द्वंद्व को तोड़ता है ।
कवि समावेशन चाहता है ,लेकिन ऐसे विचित्र माहौल में सच्ची रचनात्मकता के फलने फूलने की कोई संभावना न होने की वजह से वह एक ऐसी स्थिति का का सामना करता है जो अनुरूपता थोपती है। देरिदा’ अपोरियाज’ (1993) में ऐसे विरोधाभासी वातावरण की आलोचना करते हैं जहाँ कलात्मक ‘जीवन’ (रस) के लिए स्वायत्तता की ‘मृत्यु’ जरूरी हो । ‘अग्नि परीक्षा’ कहानी भारतीय सांस्कृतिक संस्थाओं में सामाजिक अपोरियाओं को दर्शाता है जहां संरक्षण (जैसे राज्य-प्रायोजित अकादमियां) अभिव्यक्ति को सक्षम करता है, लेकिन असहमति को दबाता है।
थोड़ी और गहराई से देखने पर ‘अपोरिया’ लैंगिक प्रतिनिधित्व तक प्रसरित प्रतीत होती है। कहानी में धूलदास दवारा स्त्री-शरीर को सुंदरता का परम संकेतक बनाया जाता है, लेकिन इसकी थोपी गई केंद्रीयता एक गतिरोध पैदा करती है। वजह यह कि किसी की अतिशय प्रशंसा उसका वस्तुकरण करती है और वैकल्पिक विषयों (जैसे सामाजिक न्याय या ‘संकर’(हाइब्रिड) पहचानें, जैसा कि हरि भटनागर की अन्य कहानियों में भी है ) को बाहर करती है। यह देरिदा की ‘फैलोगोसेंट्रिज्म’ की आलोचना को प्रतिध्वनित करता है (पुरुष-केंद्रित लोगोस का विशेषाधिकार), जहां पाठ का गतिरोध पाठक को व्यग्र करता है कि क्या कला बिना खुद नष्ट हुए कभी सत्ता के चंगुल से बच सकती है? कहानी का अचानक मौन अंत इस अपोरिया को अपनाता है, समापन से इनकार करता है और पाठकों को व्याख्यात्मक अनिर्णय में धकेलता है।
देरिदा द्वारा ‘ऑफ ग्रामेटोलॉजी’ में बहुविध विवेचित ‘सप्लीमेंट’ एक ऐसी चीज़ है जो कथित पूर्णता को पूरा करने के लिए जोड़ी जाती है, लेकिन यह मूल की अंतर्निहित कमी को उजागर करती है। ‘अग्नि परीक्षा’ में ऐशगाह खुद ‘प्रामाणिक’ कला का सप्लीमेंट है: इसके शानदार पर्दे और कांच के दरवाजे कवियों की रचनात्मकता को सप्लीमेंट करते हैं, पूर्णता (संस्थागत मान्यता) का वादा करते हैं लेकिन लेखकीय स्वाधीनता की कमी उजागर करते हैं जिसके के बिना कारयित्री सत्वोद्रेक और भावयित्री भावोद्रेक असंभव है । धूलदास के नियम शास्त्रीय सौंदर्यशास्त्र को सप्लीमेंट करते हैं, लेकिन यह जोड़ मूल (जैसे रस-निष्पत्ति में भावनात्मक तीव्रता) को कमजोर करता है और दिखाता है कि ‘सप्लीमेंट’ ख़तरनाक ढंग से उस चीज़ को प्रतिस्थापित कर देते हैं जिसे वे बढ़ाने का दावा करते हैं।
इस धारणा का गहरा अनुप्रयोग दिखाता है कि कवि प्रणाली का सप्लीमेंट है। उसका संभावित प्रवेश सात कवियों को के बजाय उसे ‘पूर्ण’ करेगा, लेकिन यह कथित ‘ऐशगाह’ की उस बहुत बड़ी कमी उजागर करता है जिसके तहत बिना बाहर से आने वालों के समावेशन की लालसा रखनेवाली संस्था की सत्ता का अर्थ खो जाता है। यह पदानुक्रमों को उलट देता है—परिधि (महत्वाकांक्षी कवि) केंद्र (धूलदास) को सप्लीमेंट करती है और उसके अधिकार को ‘डिकंस्ट्रक्ट’ करती है। ‘अग्नि परीक्षा’ का पाठ(टेक्स्ट) रचते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में कहानीकार इसका इस्तेमाल भारतीय साहित्य में पुरस्कार या संरक्षण जैसे सप्लीमेंटों की आलोचना के लिए करता है जो रचनात्मक पारिस्थितिकी में खालीपन को भरने का दावा करने के बावजूद कुलीनता को बनाए रखते हैं। विवेच्य कहानी के भोपाल-प्रेरित सेटिंग पर गौर करने से यह आंतरिक सच उजागर हुए बिना नहीं रहता। कुल मिलाकर ‘सप्लीमेंट’ इस प्रकार कहानी में सत्ता-संरचना के अनुकूलन के तहत कला की लगातार अपूर्णता को उजागर करता है।
देरिदा का ‘फार्माकॉन’ एक ऐसी चीज है जो औषधि और विष दोनों है। यह अच्छा/बुरा जैसे द्वंद्व को अस्थिर करती है। “अग्नि परीक्षा” में ऐशगाह के भीतर कविता फार्माकॉन है: यह कलात्मक हाशिए की “बीमारी” का इलाज करती है (प्रतिष्ठा देती है) लेकिन स्त्री-शरीर के वस्तुकरण और कवियों के दहशत भरे मौन से रचनात्मकता को ज़हर देती है । स्त्री-शरीर विषय के रूप में फार्माकॉन है—रस जगाने में यह उत्प्रेरक है , लेकिन पितृसत्तात्मक नज़रिया के कारण विषैला है ।यह सुंदरता सामाजिक विखंडन के लिए औषधि का काम करती करती है लेकिन लैंगिक समानता को विष देती है।
वस्तुत: धूलदास ख़ुद सत्ता के ‘फार्माकॉन’ हैं: उनका ‘रस-ज्ञान’ सौंदर्य अनिश्चितता का इलाज़ करता है लेकिन विविधता को ज़हर देता है। कहानी में धूलदास के मौखिक आदेश लिखित कविता के प्रसार को दबाते हैं, लेकिन यह पदानुक्रम ढह जाता है और ‘फार्माकॉन’ अंतत: लेखन (कविता) की विध्वंसक क्षमता उजागर करता है, क्योंकि उसकी क़ैद बाहरी लालसा का ‘ट्रेस’ है। समाजशास्त्रीय रूप से ‘अग्नि परीक्षा’ में यह भारतीय सांस्कृतिक राजनीति की आलोचना करता है, जहां साहित्य अकादमी जैसी संस्थाएं फार्माकॉन हैं जिसके तहत वे साहित्य को बढ़ावा देती हैं, लेकिन सत्ताधारी दल की विचारधारा से सेंसर भी करती हैं।
‘मार्क्स के प्रेत’ (1993) में देरिडा की ‘हॉंटोलॉजी’ (ऑंटोलॉजी की तर्ज़ पर खिलन्दरे अंदाज़ में निर्मित एक शब्द ) कहती है कि वर्तमान को अनुपस्थित भविष्यों के साथ ही अतीत भी सताता है, जहां स्थगित न्याय भूतिया रूप से लौटता है। ‘अग्नि परीक्ष’ कहानी भी एक हद तक हॉंटोलॉजिकल है जिसमें कथित ‘ऐशगाह’ स्वतंत्र कला के प्रेत से आतंकित है, जो अनुपस्थित लेकिन कवि की इच्छा और सातों के मौन पर जोर देती है। इस कहानी का शीर्षक हर भारतीय भाषा में मौजूद रामोपाख्यान में सीता की अग्नि परीक्षा का स्मरण कराते हुए रचना को पौराणिक ‘ट्रेस’ से सताता है—आधुनिक समय में कला में ‘शुद्धता’ की शर्ते प्राचीन दमन को प्रतिध्वनित करती हुई लिंग और सत्ता के अनसुलझे अन्यायों का भूतिया अनुस्मारक प्रतीत होती हैं ।
‘अग्नि परीक्षा’ में हॉंटोलॉजी कोई बाहरी चश्मा नहीं, बल्कि कहानी की साँस, उसकी धड़कन और टूटे हुए समय की खुद उसकी रगें हैं। कहानी उन भूतों से लबालब है जो न मिटते हैं, न पूरी तरह उभरते—वे बस सताते रहते हैं, जिससे वर्तमान हर पल देरिदा के शब्दों-सा ‘जोड़ से उतरा’ लगता है। ‘जोड़ से उतरा’ (या ‘time is out of joint’) देरिदा के हॉंटोलॉजी के सबसे महत्वपूर्ण और बार-बार दोहराए जाने वाले वाक्यांशों में से एक है। यह वाक्य शेक्सपियर के नाटक हैमलेट से लिया गया है, जहाँ हैमलेट अपने पिता के भूत से मिलने के बाद कहता है:
“The time is out of joint. O cursed spite, That ever I was born to set it right!”
हिन्दी में इसका सबसे सहज और सटीक अनुवाद यही है: ‘समय जोड़ से उतर आया है’ या ‘वक्त टेढ़ा-मेढ़ा हो गया है’।
इसका गहरा अर्थ है कि समय अब सीधा नहीं चल रहा। सामान्य रूप से हम समय को एक सीधी रेखा मानते हैं: अतीत → वर्तमान → भविष्य। सब कुछ क्रम से, व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ता है। लेकिन जब कोई भूत (specter) लौट आता है—कोई पुरानी घटना, कोई अधूरी न्याय की माँग, कोई दबाया गया सच—तो यह क्रम टूट जाता है। अतीत अचानक वर्तमान में घुस आता है। भविष्य का वादा भी पीछे से सताने लगता है। समय अब ‘जोड़ से उतरा’ हो जाता है—जैसे कोई मशीन का पुर्जा अपनी जगह से खिसक गया हो।देरिदा कहते हैं कि वर्तमान कभी पूरा नहीं होता। उनके अनुसार कोई भी ‘अभी’ (present moment) कभी पूरी तरह मौजूद नहीं होता। वह हमेशा किसी न किसी भूत से सताया जाता है। ‘जोड़ से उतरा’ होने का मतलब है कि वर्तमान में एक दरार है, एक खाली जगह, जहाँ से अतीत और भविष्य दोनों झाँकते हैं। यह दरार कभी नहीं भरती—यह वही जगह है जहाँ से नैतिकता और जिम्मेदारी की पुकार आती है।‘अग्नि परीक्षा’ कहानी में समय ‘जोड़ से उतरा’ इसलिए है क्योंकि रामायण का प्राचीन अग्नि परीक्षा का दृश्य (सीता की परीक्षा) आज की सांस्कृतिक अकादमी में बिना नाम लिए, लेकिन पूरी तरह सक्रिय रूप से लौट आया है।पुरानी पितृसत्तात्मक हिंसा (शुद्धता की परीक्षा के नाम पर स्त्री-देह को वस्तु बनाना) आधुनिक संस्था में फिर से जीवित हो उठी है।दबाई गई स्वतंत्र कला, हाशिए की आवाजें (प्रगतिशील, दलित, आदिवासी, स्त्रीवादी) बार-बार लौटती हैं—काँच के दरवाजे के पार से झाँकती हैं, बाहर वाले की तड़प बनकर, सात कवियों की चुप्पी में गूँजती हैं।संस्था सोचती है कि उसने सौंदर्य और रस का फैसला कर लिया है, लेकिन वह फैसला कभी पूरा नहीं होता—क्योंकि भूत लौटते रहते हैं। इसलिए कहानी में वर्तमान कभी स्थिर, कभी शांत नहीं रह पाता। वह हर पल उन भूतों से सताया जाता है जो कहते हैं: “तुमने हमें दफनाया था, पर हम अभी जीवित हैं। तुमने हमें खत्म किया था, पर हम अभी बाकी हैं।” इसलिए ‘जोड़ से उतरा’ यानी समय अब टेढ़ा हो गया है—न अतीत पीछे रह गया, न भविष्य आगे है। सब कुछ एक साथ, उलझा हुआ, सताता हुआ, पुकारता हुआ मौजूद है। यही हॉंटोलॉजी का मूल भाव है, और यही ‘अग्नि परीक्षा’ कहानी के रच्नास्न्सार को बनाता और हिलाता है।
कहानी के ठीक बीच में वह अनकही, बेकाबू रचनात्मकता का भूत बसता है—वह कविता जो खून-मांस के अनुभव से जन्म लेती है, न कि किसी कागजी हुक्म से। यह भूत ‘ऐशगाह’ की दीवारों में छिपकर साँस लेता है, पर कभी उसके भीतर साकार नहीं होता। सात कवि जबरन थमी चुप्पी में डूबे बैठे हैं; बाहर खड़ा कवि काँच के दरवाजे पर ठिठका है—अंदर झाँक सकता है, पर पार नहीं कर सकता। जो वह देखता है वह सच्ची मौजूदगी नहीं—खोखली चमक है: रंग-बिरंगे पर्दे, वैभव की चकाचौंध, विषय का फरमान (‘केवल स्त्री-देह’), हँसी पर पाबंदी, बातचीत पर रोक , कविता को बाहर ले जाने पर सख्त मनाही। असली सृजन—अनुमान से परे, संवाद से भरा, बगावत से सजा—इस जगह का न हुआ और अभी न होने वाला सपना है। इसे मरा हुआ घोषित कर दिया गया—प्रबंधित ‘रस’ और मंजूर तारीफों से बदल दिया गया—फिर भी यह बाहर वाले की तड़प और दुविधा बनकर लौटता रहता है। हर बार धूलदास जब ‘रस’ का नाम लेता है, वह इस भूत को भगाने की कोशिश करता है; हर बार जब संस्था सौंदर्य को नियमों में कैद करती है, वह उसी को फिर जगा देती है जो कभी दबाया गया था।
यह हॉंटोलॉजिकल सत्य का सबसे सच्चा चेहरा है: जितना जोर से कोई व्यवस्था किसी विकल्प की कब्र खोदती है—यहाँ स्वतंत्र कला की—उतना ही वह विकल्प उस व्यवस्था के आत्म-मुग्ध वर्तमान को सताने लौट आता है।
‘अग्नि परीक्षा’ शीर्षक खुद एक भूतिया लौटना है। रामायण में सीता अग्नि से गुजरती है—अपनी पवित्रता साबित करने, न्याय के नाम पर—पर वह आग पितृसत्ता की हिंसा का भी गहरा रूपक है। कहानी इस प्राचीन दृश्य को बिना नाम लिए आज की सांस्कृतिक अकादमी में उतार लाती है। आग अब लपटें नहीं—सृजन की स्वतंत्रता को धीरे-धीरे राख करने वाली संस्थागत ज्वाला है, कविता को पहले से तय विषय पर झुकने और अनुशासन की जंजीरें पहनने की माँग।
यह पुराना भूत उद्धरण या संकेत बनकर नहीं आता; वह कहानी की हड्डियों में बस जाता है, संरचना में साँस लेता है। अकादमी का वर्तमान उस प्राचीन परीक्षा के साये से थर-थर काँपता है। समय जोड़ से उतर आया है: लिंग-आधारित कष्ट का महाकाव्य अतीत आकर कथित आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष संस्था को अपनी मुट्ठी में ले लेता है। सीता का भूत न उद्धार माँगता है, न प्रतिशोध; वह बस देखा जाना चाहता है—हर शुद्धता-परीक्षा में छिपी हिंसा की अधूरी कहानी को मान्यता देना, न कि नए मुखौटे में दोहराना।
धूलदास वह है जो भूत भगाने का दावा करता है। वह फरमान जारी करता है: विषय, शैली, चुप्पी, कैद। वह संस्था को खुद से पूर्ण, बिना किसी कमी के सौंदर्य का स्वर्ग बनाने की कोशिश करता है। पर उसके फरमानों की कठोरता ही उसकी घबराहट चीख-चीखकर बताती है। जितना जोर शुद्धता और अनुशासन पर, उतनी ही कमी उजागर होती है: संवाद की कमी, हँसी की कमी, दीवारों से बाहर जाकर जीने वाली कविता की कमी।
हॉंटोलॉजिकल नजरिए से धूलदास वह है जो भूत को हमेशा के लिए मरा हुआ घोषित करना चाहता है। पर हर मौत का ऐलान एक बुलावा बन जाता है। भूत लौटता है—बाहर वाले की हिचकिचाहट में (‘अगर अंदर जाने दिया जाता तो शायद मैं भी उन सात में शामिल हो जाता’), पाठक की बेचैनी में, कहानी के अचानक रुकावट में—कोई टकराव नहीं, कोई मुक्ति नहीं, कोई राहत नहीं। अंत की चुप्पी समापन नहीं; वह वह खालीपन है जहाँ भूत धीरे-धीरे बुदबुदाता रहता है।
काँच का दरवाजा हॉंटोलॉजिकल प्रतीक का सबसे सटीक चेहरा है: इतना पारदर्शी कि बाहर वाले को देखा जा सके (और प्रबंधित किया जा सके), इतना अपारगम्य कि वे दहलीज पार न कर सकें। इन हाशिए की परंपराओं का भूत द्वार तोड़कर नहीं घुसता; वह बस दबाव बनकर रहता है—बाहर वाले की तड़प में, सात की थमी साँसों में, पाठक की उस टीस में कि कुछ अनमोल गायब है। देरिदा कहते हैं—न्याय हमेशा ‘आने वाला’ होता है; वह कभी पूरा मौजूद नहीं हो सकता, क्योंकि उसे दूसरे के लिए खुला रहना पड़ता है। ‘अग्नि परीक्षा’ हमें ठीक उसी खुलापन में छोड़ जाती है—एक असहज, अनसुलझी खुली जगह, जहाँ अधिक बहुल, कम बंधी-बंधाई साहित्यिक संस्कृति की पुकार उस संस्था को सताती रहती है जो सोचती है कि सौंदर्य का फैसला हो चुका है।
अंत में यह पाठ खुद हॉंटोलॉजिकल है—स्थिर रूपक या पूरी आलोचना बनने से इनकार करता है। यह अकादमी की निंदा सीधी नहीं करता; वह भूत को खामोशी, खालीपन और हिचकिचाहट के जरिए बोलने देता है। अचानक रुक जाना—कोई टकराव नहीं, कोई मुक्ति नहीं, कोई नैतिक संदेश नहीं—हॉंटोलॉजिकल का निशान है: भूत कथानक को सुलझाता नहीं, उसे टुकड़ों में बिखेर देता है, समय को जोड़ से उतारा छोड़ देता है, न्याय को सदा टाला हुआ रखता है।

इसलिए ‘अग्नि परीक्षा’ देरिदा के विचार को सिर्फ नहीं दिखाती—वह उसे जीती है। यह वह पाठ है जो अपने भूतों के साथ जीना सीख चुका है—भारतीय साहित्यिक संस्कृति के उन भूतों के साथ जो कभी थे, जो हो सकते थे, और जो अभी भी हो सकते हैं—और पाठक को भी यही सिखाती है: आजाद, बगावती कला के भूत को भगाने की कोशिश छोड़ दो; उसके बार-बार लौटने के साथ जिम्मेदारी से जीना सीखो।
कहानी आग से खत्म नहीं होती जो अशुद्धता को भस्म कर दे; वह एक शांत, लगातार जलती ज्वाला से खत्म होती है जो बुझने से इनकार करती है—वह धीमी, भूतिया आग सब उसकी जो कभी ‘तुम खत्म हो गए’ कहकर दफनाया गया था, पर जो फिर भी, फिर भी लौटता रहता है।
‘अग्नि परीक्षा’ कहानी प्रकारांतर से समकालीन भारत को औपनिवेशिकता और नवउदारवाद के प्रेतों से ग्रस्त बताती हुई आम जनता से प्राप्त कर के पैसे से परिचालित सरकारी अकादमियों में हाशिए की आवाजों (जैसे प्रगतिशील, स्त्रीवादी, अम्बेडकरवादी /दलित,आदिवासी साहित्य) को दबाने की रणनीति का पर्दाफ़ाश करती है । ऐसी संस्थाएँ समावेशन (इंटीग्रेशन) का वादा करती हैं, लेकिन न्याय स्थगित रखती हैं। कहानी के अंत का मौन हॉंटोलॉजिकल है—विद्रोह की अनुपस्थिति भविष्य के प्रतिरोध को भूतिया रूप से बुलाती हुई कला में दूरगामी प्रगति को डिकंस्ट्रक्ट करती है। विवेच्य कहानी संग्रहमें ‘अग्नि परीक्षा’ शीर्षक यह बहुअर्थी पाठ इस प्रकार एक भूतिया अभिलेख बन जाता है, जहां देरिदा का ‘मसीहाई’ न्याय (दूसरे के लिए खुलापन) एक स्थगित संभावना के रूप में बना रहता है।
कहानी आज के भारत के ठोस, राजनीतिक भूतों से भी सताई गई है: प्रगतिशील, स्त्रीवादी, आंबेडकरवादी/दलित, आदिवासी आवाजें—जिन्हें सरकारी फंड वाली संस्थाएँ ‘शामिल’ करने का नाटक करती हैं, पर व्यवस्थित रूप से हाशिए पर धकेलती हैं। ये आवाजें भारतीय साहित्यिक संस्कृति का वह भविष्य हैं जो अभी नहीं आया—लोकतंत्र और विविधता की बातों से वादा किया गया, पर गेटकीपिंग, विषय की पुलिसिंग और सौंदर्य की एकरसता से सदा टाला गया।
कहना न होगा कि ‘अग्नि परीक्षा’कहानी लेखक के अनजाने ही देरिदा के दर्शन को अनुप्रयुक्त सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि जीवंत पाठकीय अस्थिरता के रूप में धारण किए हुए है। ये गहरे विचार कहानी के गहन अनिर्णय को उजागर करते हैं कि कला न तो पूरी तरह दमनकारी है न मुक्तिदायी, बल्कि अंतहीन स्थगन का स्थान है, जो पाठकों को सांस्कृतिक पदानुक्रमों में अपनी सहभागिता को ‘डिकंस्ट्रक्ट’ करने की चुनौती देता है। हरि भटनागर की सूक्ष्मता इसे एक उत्कृष्ट ‘डिकंस्ट्रक्टिव’ पाठ बनाती है।
उत्तर-उपनिवेशवादी आलोचना-दृष्टि से भी ‘अग्नि परीक्षा’ कहानी की संरचना अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती है। कहानी में वर्णित कथित ‘ऐशगाह’ एक छोटा-सा सांस्कृतिक साम्राज्य है, जहाँ सौंदर्य का ‘मानक’ उस व्यक्ति द्वारा तय होता है जो सत्ता का केंद्र है। यह केंद्र एक प्रकार से उपनिवेशवादी केंद्र की तरह काम करता है। धूलदास अपने ‘स्वाद’ को सार्वभौमिक बनाता है; उसकी दृष्टि में अन्य सभी स्वाद, संवेदनाएँ और काव्यगत विविधताएँ अस्पृश्य या अवमान्य हैं। उसने एक प्रकार का सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित कर रखा है, जहाँ कवियों की भाषा, भाव, विषय और शैली सब कुछ उस ‘केंद्रित सत्ता’ के अनुसार ढलना आवश्यक है। यह स्थिति औपनिवेशिक केंद्र और परिधि के संबंधों का सटीक रूपक बन जाती है। कवि परिधि में हैं; धूलदास केंद्र में। केंद्र अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए अनुशासन, आकर्षण और नियंत्रित सौंदर्य—इन तीन हथियारों का प्रयोग करता है। ऐशगाह का वैभव इसी वर्चस्व की चमक है, जिससे कवि प्रभावित भी होता है और भयभीत भी। उत्तर-उपनिवेशवादी दृष्टि यह भी कहती है कि उपनिवेश में सबसे बड़ी चोट भाषा और सौंदर्य-बोध पर लगती है। ‘अग्नि परीक्षा’ में भी यही होता है। धूलदास काव्य का विषय तय करता है, उसकी शैली तय करता है, उसका भाव-संसार तय करता है। नतीज़तन,कलाकार अपने स्वयं के अनुभव से नहीं लिखता, बल्कि अपने आक़ा से सलाह की शक्ल में प्राप्त होने वाले हुक्म के अनुसार क़लम घसीटता है । यह दृश्य उपनिवेशित मानसिकता का प्रतीक है, जहाँ व्यक्ति अपने अनुभव को कमतर और सत्ता के अनुभव को श्रेष्ठ मान लेता है।
कहानी की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह इन सभी आलोचना पद्धतियों को अपने भीतर स्वाभाविक रूप से समाहित किए हुए है। यह न तो किसी एक अर्थ की कथा है, न किसी एक दृष्टि की विजय। कहानी का मूल पाठ अपने भीतर कई परतें बनाता है—संरचना की, विखंडन की, सत्ता की, इच्छा की, भय की, सौंदर्य की, दमन की। इन सभी परतों के बीच अर्थ लगातार फिसलता रहता है। देरिदा के शब्दों में कहें तो यह अर्थ का स्थगन है, जहाँ कोई अंतिम अर्थ नहीं; केवल उसका निर्माण और विघटन जारी रहता है।दूसरे शब्दों में, ‘अग्नि परीक्षा’ एक ऐसी कहानी है जिसे पूरी तरह किसी एक पद्धति में नहीं बाँधा जा सकता, क्योंकि वह स्वयं पद्धतियों को विखंडित करती है। वह दिखाती है कि कला का संसार कभी स्थिर नहीं होता; उसके भीतर सत्ता की आग भी है, सौंदर्य का आह्वान भी और संरचना का विघटन भी। कहानी का मौन, उसका व्यंग्य, उसका रूपक और उसका दमन-संसार—सब मिलकर यह प्रमाणित करते हैं कि ‘अग्नि परीक्षा’ केवल एक कथानक नहीं; यह कला, सत्ता और अर्थ की राजनीति का एक जीवंत पाठ है, जो पढ़ते समय पाठक को भी बनता और टूटता हुआ महसूस कराता है।
हरि भटनागर के कहानीकार की सबसे बड़ी ताक़त है—मनुष्य की कमज़ोरी को करुणा से देखना और उसकी करुणा को जीवन के सत्य के रूप में स्वीकार करना। वह जीवन की सच्चाइयों को सजाने या छुपाने के बजाय अपनी रचनाओं में गहरी अनुभूति को सरल भाषा में व्यक्त करते हैं । इसी संवेदनशीलता के कारण उनका साहित्य वैश्विक स्तर पर तुलनीय है—मोपासां की करुणा, चेख़व की मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता, कामू की अस्तित्वगत बेचैनी और मार्केज़ की स्मृतियों की लय—इन सबकी थोड़ी-बहुत झलकियाँ इन कहानियों में भी यथास्थान अलग-अलग रूपों में दिखाई देती हैं। उनकी कहानियाँ पाठक को इस बात का शिद्दत के साथ एहसास कराती हैं कि मनुष्य को अगर समझना है, तो उसके अति सामान्य व्यवहार पर ग़ौर करना होगा—उसका हाथ जोड़ना,उसकी चालाकियाँ, उसकी चुप्पी, उसकी पस्ती, उसका भय, उसका क्रोध, उसकी स्मृति, उसका प्रेम, उसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया,उसका ओछापन आदि कलाकार को प्रामाणिक सामग्री मुहैया कराते हैं ।याद रहे कि गोगोल ने ‘तस्वीर’ कहानी में कला की दुनिया में सक्रिय ‘महान’ कहे जाने वाले कलाकारों के भीतर व्याप्त परस्पर घृणा,राग-द्वेष आदि भी ज़बरदस्त चित्रण किया है। मनुष्य को समझने के लिए ज्ञान के किसी भी अनुशासन से उत्पन्न कोई भी बड़ा विचार या दर्शन मनुष्य की इस सरलता से बड़ा स्रोत नहीं हो सकता । संतोष की बात है कि ‘आपत्ति’ कहानी संग्रह की रचनाएँ हमें दुनिया को समझने का कोई दार्शनिक सूत्र या नारा देने के बजाय इसके भीतर झाँकने की दृष्टि देती हैं। यही कारण है कि हरि भटनागर हमारे समय के उन पठनीय एवं विचारणीय कथाकारों में परिगणित होते हैं जिनकी रचनाएँ आने वाले समय में और अधिक व्यापकता और गहराई से पढ़ी जाएँगी—क्योंकि वे मनुष्य को उसी रूप में स्वीकार करते हैं जिस रूप में वह है: आधा-अधूरा, दुखी, ईर्ष्यालु, घृणित, ओछा, भयभीत, प्रेमपूर्ण और अनोखा ।
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(हरि भटनागर, आपत्ति (कहानी संग्रह), राजपाल एंड सन्ज़, दिल्ली,(2025), मूल्य: ₹265, कुल पृष्ठ.142)



प्रोफ़ेसर रवि रंजन

जन्म : 1962, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार
शिक्षा : पी-एच.डी.
रूचि के क्षेत्र : भक्तिकाव्य, आधुनिक हिन्दी कविता, आलोचना, साहित्य का समाजशास्त्र.
प्रकाशित कृतियाँ : ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’, ‘सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन,दिल्ली (2011), ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’ (2012),वाणी प्रकाशन, ‘वारसा डायरी’(2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’ (वाणी प्रकाशन,दिल्ली )
विभिन्न साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेज़ी में सौ से अधिक आलेख प्रकाशित.
राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में सक्रियभागीदारी.
‘वारसा डायरी’ के लिए ‘जयपुर साहित्य सम्मान’ (2023)
प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय,बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा विज़िटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में प्रतिनियुक्त.
सम्प्रति: प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद – 500 046
ई.मेल. : raviranjan@uohyd.ac.in मो.9000606742

 


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