भारत में स्त्री – प्रश्नों पर चिंतन के संदर्भ में कई रचनाकारों का नाम लिया जाता है जिन्होंने अपने – अपने समय में स्त्री की स्थिति के संदर्भ में कई महत्त्वपूर्ण कार्य एवं लेखन किया । एम.एन.रॉय ऐसे ही एक विचारक रहे हैं जिन्होंने भारतीय स्त्री के संबंध में अत्यंत क्रांतिकारी तरीके से चिंतन मनन किया । उनके विचारों में स्त्री की स्वतंत्र इयत्ता है जिसे परंपरागत सामाजिक मान्यताओं के परे जाना है ।
पेश है उनके स्त्री विषयक चिंतन पर आधारित सुप्रसिद्ध रचनाकार सुप्रिया पाठक का यह आलेख ।
– हरि भटनागर
स्त्रीवाद एक विचार है जो यह मानता है कि स्त्रियां भी मनुष्य हैं ।
भारत में अकादमिक जगत में स्त्रीवाद पर चिंतन के क्रम में उन दार्शनिकों एवं विदुषियों की चर्चा होती रही है जिन्होंने पाश्चात्य देशों में स्त्रीवादी चिंतन परंपरा के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । उनकी संकल्पना में एक ऐसे समतामूलक समाज का स्वप्न था जो स्त्रियों को बराबरी का दर्जा प्रदान कर उनके अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित कर सके। अर्थात ‘जहाँ स्त्रियाँ मनुष्य के रूप में गरिमामय जीवन जी सकें’। उन्होंने स्त्री शोषण एवं पराधीनता के वास्तविक कारणों को तलाशने का प्रयास किया । स्त्रीवाद एक राजनीतिक चिंतन एवं प्रतिबद्धता के रूप में विकसित हुआ जिसका यह मानना था कि थी कि समाज में विद्यमान लैंगिक पूर्वाग्रह स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को प्रभावित करते हैं जिससे स्त्रियों की सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक स्थिति का अवमूल्यन होता है । इन पूर्वाग्रहों से स्त्रियों की मुक्ति आवश्यक है ताकि समरसतापूर्ण समाज के निर्माण का स्वप्न साकार हो सके। स्त्रीवाद की भी विविध अभिव्यक्तियाँ थीं जो अपनी दृष्टि से स्त्री प्रश्नों के समाधान तलाश रही थीं,परंतु सभी विचारों का साध्य एक था ‘स्त्री मानवाधिकारों की रक्षा’।
वैश्विक स्तर पर स्त्री अधिकारों के लिए प्रारम्भ हुए इन विमर्शों एवं आंदोलनों का इतिहास अनेक उतार-चढ़ावों एवं उपलब्धियों से भरा रहा है। इससे कमोबेश हम सभी परिचित हैं,परंतु भारतीय स्त्रीवादी चिंतन परंपरा के बौद्धिक पहलुओं की हम जाने-अनजाने अनदेखी करते आए हैं क्योंकि उसके मूल्यांकन की कोई सम्यक कसौटी हमारे पास उपलब्ध नहीं है । परंतु यदि हम औपनिवेशिक काल के दौरान भारतीय चिंतकों द्वारा स्त्रियों के संदर्भ में दिए गए विचारों एवं उनकी स्वतंत्रता के लिए हुए प्रयासों के इतिहास की पड़ताल करें तो स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, महात्मा गाँधी,विनोबा भावे तथा मानवेंद्र नाथ राय के रूप में उन प्रतिनिधि स्वरों की गूंज सुनाई देती है जिन्होंने भारतीय स्त्रियों को ‘मनुष्य’ समझे जाने की तथा समाज में गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए सार्वजनिक जीवन में समान अवसर प्रदान करने का हर स्तर पर प्रयास किया । सभी चिंतकों का यह मानना था कि आदर्श समाज की कल्पना स्त्रियों की साझेदारी के बिना संभव नहीं है । स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व कर रहे महात्मा गाँधी के लिए ‘स्वराज’ की संकल्पना में स्त्रियां नेतृत्वकारी भूमिका में थीं । उनका मानना था कि स्त्री एवं पुरुष दो आंखों के समान है । इस समाज में दोनों लिंगों को समान अधिकार देना हमारा सामाजिक उत्तरदायित्व है क्योंकि अपने सत्य निष्ठा एवं अहिंसात्मक गुणों के कारण स्त्रियां ही आज़ादी के आंदोलन के नेतृत्व के गुरुत्तर दायित्व को संभाल सकती थीं । महात्मा गांधी से पूर्व के विचारकों ने स्त्रियों को अबला, सुधार करने योग्य एवं आधुनिक बनाने की आवश्यकता पर बल दिया ।
महात्मा वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने स्त्रियों की आंतरिक शक्ति को पहचान कर उनके अंदर आत्मविश्वास पैदा किया एवं सार्वजनिक जीवन में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की । उस दौर के लगभग सभी सुधारवादी एवं चिंतक अपनी दृष्टि से भारतीय समाज में स्त्री विषयक प्रश्नों को संबोधित करते हुए उसके लिए सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक एवं आर्थिक जीवन में अवसर प्रदान करने की आवश्यकता से अपने लेखन द्वारा लोगों को जागरुक करने का कार्य कर रहे थी । उन्हीं विचारकों में एक थे मानवेंद्र नाथ रॉय जिन्होंने मानवतावाद के दर्शन में स्त्रियों को शामिल करते हुए उनके संबंध में कई महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किया जो भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति में अवमूल्यन का कारण थे । उनका समाधान किए बिना ‘मानवतावाद ‘पर आधारित आदर्श समाज का स्वप्न संभव नहीं था । उन्होंने अपनी महत्वपूर्ण रचना ‘द आइडिया ऑफ इंडियन वुमेन्हुड’ में स्पष्ट रूप से हिंदू समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं स्त्री विरोधी प्रवृतियों को रेखांकित किया । उनके लिए समाज में स्त्रियों को समानता देने की प्रक्रिया में आर्थिक स्वतंत्रता को सबसे अधिक महत्व दिया ।
एम.एन.रॉय मानवतावाद दर्शन की स्थापना के अद्वितीय व्यक्ति थे जिन्होंने समर्पित क्रांतिकारी होने के साथ-साथ सामाजिक दार्शनिक के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की । उनका राजनीतिक जीवन तीन अलग-अलग चरणों से गुज़रा । अपने जीवन की शुरुआती दिनों में वह प्रबल राष्ट्रवादी थे, जिसके बाद वे साम्यवाद की तरफ आकर्षित हुए और जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने सक्रिय मानवतावादी के रूप में कार्य किया । एम एन.रॉय, जिनका पुरा नाम नरेंद्र नाथ भट्टाचार्य था, का जन्म 21 मार्च, 1887 को पश्चिम बंगाल के चौबीस परगना जिले में हुआ था । बारह साल की उम्र में उन्होंने श्री अरबिंदो घोष,जतिन मुखर्जी और अन्य के नेतृत्व में बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल होकर अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । प्रथम विश्व युद्ध के दौरान, उन्होंने भारत से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए हथियारों और गोला-बारूद की तलाश में इस देश को छोड़ दिया और जापान एवं चीन के रास्ते अमेरिका चले गए । वहाँ वे कुछ समय तक लाला लाजपत राय के साथ रहे । मार्क्सवाद में उनकी रुचि भी इसी दौरान विकसित हुई । वहाँ उन्हें ब्रिटिश सरकार के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया, जहाँ से वह भागने में सफल रहे और मैक्सिको की राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे । इसी दौरान वह बोरोडिन के संपर्क में आए। मेक्सिको में रॉय के कार्यों ने लेनिन का ध्यान आकर्षित किया । उन्होंने एम.एन.रॉय को 1920 में आयोजित होने वाले द्वितीय विश्व कांग्रेस में भाग लेने के लिए रूस आमंत्रित किया ।
1910 के दशक में एम.एन. रॉय की दोस्ती एम्मा गोल्डमैन से हुई । एम्मा गोल्डमैन और एम.एन. रॉय अपने समय के महान व्यक्तित्व थे, जिन्होंने अपने लिए राजनीतिक और साहित्यिक जीवन चुना था । दोनों लंबे समय से मार्क्सवादी दर्शन और राजनीतिक परंपरा का हिस्सा थे । दोनों रूस में हुई 1917 की बोल्शेविक क्रांति के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे और उसका समर्थन किया लेकिन अपनी स्वतंत्र, असहमतिपूर्ण और मौलिक सोच के कारण, वे दोनों ही समय के साथ बोल्शेविकवाद से अलग हो गए । सोवियत अभिलेखागार के कागजातों के आधार पर स्वतंत्र इतिहासकारों, जैसे ऐनी एप्पलबाम, डोनाल्ड रेफील्ड, और एमी नाइट के शोधों में हमें एम्मा गोल्डमैन और रॉय की गंभीर आपत्तियों के सूत्र मिलते हैं । 1930 के दिसंबर में रॉय भारत लौट आए, पर उन्हें जुलाई 1931 में कानपुर कम्युनिस्ट साजिश मामले में उनकी भूमिका के लिए गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया । उन्हें छह वर्ष कारावास की सजा सुनाई गई । हालांकि जब रॉय भारत लौटे तब तक वे पूर्ण रूप से कम्युनिस्ट थे, हालाँकि वे कॉमिन्टर्न से अलग हो चुके थे । भारत में कारावास के दौरान उन्हें व्यवस्थित रूप से अध्ययन और चिंतन के लिए पहले से अधिक समय मिला । जर्मनी में उनके दोस्त, विशेषकर उनकी भावी पत्नी, एलेन गॉट्सचॉक उन्हें वे सारी किताबें मुहैया कराती रही, जिन्हें वह पढ़ना चाहते थे। रॉय ने अपने जेल के वर्षों का उपयोग ‘आधुनिक विज्ञान के दार्शनिक परिणामों’(The philosophical consequences of modern science) का व्यवस्थित चिंतन एवं लेखन के लिए किया । पाँच साल की अवधि में यह नौ मोटे खंडों (लगभग 3000 से अधिक पंक्तिबद्ध) के रूप में सामने आया । ‘जेल पांडुलिपियाँ (Prison manuscripts)’ नाम से अपनी समग्रता में अप्रकाशित उसकी पांडुलिपियाँ वर्तमान में नई दिल्ली में नेहरू मेमोरियल संग्रहालय के अभिलेखागार में संरक्षित हैं।
20 नवंबर 1936 को जेल से रिहा होने के बाद रॉय अपने अनुयायियों के साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए । उन्होंने अपने अनुयायियों को लीग ऑफ़ रेडिकल कांग्रेसमेन नामक एक निकाय में संगठित किया । हालाँकि, दिसंबर 1940 में, रॉय और उनके अनुयायियों ने द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की भूमिका पर कांग्रेस नेतृत्व के साथ मतभेदों के कारण कांग्रेस की सदस्यता छोड़ दी, जिसके बाद, रॉय ने अपनी खुद की रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी बनाई । यह रॉय के जीवन के अंतिम चरण की शुरुआत का संकेत था जिसमें उन्होंने मानवतावाद के अपने दर्शन को विकसित किया । 1937 में उन्होंने एलेन गोत्शॉक से विवाह किया ।
रॉय की पांडुलिपि के कुछ चुनिंदा अंशों को 1930 और 1940 के दशक में अलग-अलग पुस्तकों के रूप में प्रकाशित भी किया गया था । इन लेखों से यह स्पष्ट पता चलता है कि रॉय ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की आर्थिक व्याख्या से संतुष्ट नहीं थे । उन्होंने पारंपरिक और समकालीन भारत में, इस्लाम के उदय और फासीवाद की घटना में सांस्कृतिक और वैचारिक कारकों की भूमिका का अध्ययन एवं आकलन करने का प्रयास किया । वह नव-हिंदू राष्ट्रवाद के रुढ़िवादी विचारों, रीति रीवाजों तथा प्रथाओं के प्रति विशेष रूप से गंभीर थे । उनका मानना था कि भारत में भौतिकवादी और तर्कवादी दृष्टिकोण के विकास के बिना न तो पुनर्जागरण और न ही लोकतांत्रिक क्रांति संभव है । मानवतावाद के दर्शन के सूत्र जिसे बाद में रॉय ने पूरी तरह से विकसित किया उनकी जेल डायरी के में पहले से स्पष्ट थे । भौतिकवाद (1940), विज्ञान और अंधविश्वास (1940), 20वीं सदी के पाखंड (1939), फासीवाद (1938), इस्लाम की ऐतिहासिक भूमिका (1939), भारतीय नारीत्व का आदर्श (1941), विज्ञान और दर्शन (1947) और भारत का संदेश (1950) उन पुस्तकों में से हैं जो इन हस्तलिखित नोटबुक से बनाई गई थीं। इनमें से भौतिकवाद और विज्ञान और दर्शन, रॉय की दर्शन की अवधारणा और भौतिकवाद पर उनके सूत्रों का अध्ययन करने के दृष्टिकोण से विशेष महत्व रखते हैं ।
एम.एन. रॉय शायद पहले भारतीय विचारक थे जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप उत्पन्न शक्तियों द्वारा साम्राज्यवाद के गढ़ में बड़ी सफलता के महत्व को स्पष्ट रूप से समझा । उनका मानना था कि पूरी ताकत से लड़े गए युद्ध के परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय फासीवाद की हार हुई । परंतु इसमें सफलता ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नहीं बल्कि ब्रिटिश लोकतंत्र की थी । इस युद्ध के परिणामस्वरूप भारत स्वतंत्रता प्राप्त करने के अपने लक्ष्य के और करीब पहुंच जाएगा । वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने कहा कि पूंजीवाद बनाम समाजवाद का मुद्दा लोकतंत्र बनाम अधिनायकवाद का रास्ता चुनने के लिए बाध्य है । रॉय उन लोगों में से थे जिन्होंने युद्ध के दौरान विकसित हुई विशाल विनाशकारी शक्ति के निहितार्थों और क्रांति के विचार और तकनीक पर इसके प्रभाव को पूरी तरह स्पष्ट रूप से पहचाना था ।
1946 में, उन्होंने देहरादून में भारतीय पुनर्जागरण संस्थान की स्थापना की । जिसका मुख्य उद्देश्य भारतीय पुनर्जागरण आंदोलन को विकसित और संगठित करना था । 1948 में, रॉय ने रीज़न, रोमांटिसिज्म एंड रेवोल्यूश नामक पुस्तक लिखी । उनके लिए पुनर्जागरण इस धरती पर भगवान और उसके नुमाइंदों के खिलाफ मनुष्य का विद्रोह था जिसने आधुनिक सभ्यता और स्वतंत्रता के दर्शन की शुरुआत की । उनका दृढ़ विश्वास था कि भारत को लोकतंत्र को साकार करने के लिए तर्कवाद और विश्वव्यापी मानवतावाद पर आधारित एक नए पुनर्जागरण की आवश्यकता थी । रॉय के अनुसार :
“भारत की सांस्कृतिक विरासत के रूप में जो कुछ भी संजोया गया है उसकी आलोचनात्मक जांच भारतीय लोगों को मृत अतीत की ठंडी पकड़ से छुटकारा पाने में सक्षम बनाएगी । यह उन्हें जीवित वर्तमान की बदसूरत वास्तविकताओं का सामना करने और बेहतर, उज्जवल और सुखद भविष्य की आशा करने के लिए प्रोत्साहित करेगा ।“
रॉय भारत की तथाकथित आध्यात्मिक विरासत के गैर-आलोचनात्मक और व्यर्थ महिमामंडनवादी रवैये के विरोधी थे । हालाँकि, वह प्राचीन भारतीय विचारों को पूरी तरह से अस्वीकार करने के पक्ष में भी नहीं थे । वे प्राचीन परंपराओं और विचारों के प्रति तर्कसंगत और आलोचनात्मक दृष्टिकोण के पक्षधर थे । उनका मानना था कि यूरोपीय पुनर्जागरण का उद्देश्य प्राचीन यूरोपीय सभ्यता के सकारात्मक योगदान को बचाना था, जो चर्च के प्रभुत्व के कारण मध्य युग में दफन हो गए थे । रॉय के मन में भारत को लेकर भी कुछ ऐसे ही विचार थे कि ब्राह्मणवादी समाज की खंडहर हो चुकी जर्जर परंपरा को गलती से भारतीय सभ्यता का आदर्श रूप मान लिया गया है। जिसका परिष्कार आवश्यक है । विशेष रूप से भारत में स्त्रियों की स्थिति के प्रति वे बहुत आलोचनात्मक थे । ‘द आइडिया ऑफ इंडियन वुमेनहुड’ के प्रथम संस्करण के प्रारंभ में एम.एन.रॉय लिखते हैं कि :
‘संभव है कि इस निबंध में संकलित कुछ आलेखों पर विवाद हो क्योंकि मैंने मैंने परंपरागत मूल्यों में क्रांति की ऐतिहासिक आवश्यक्ता को साबित करने का प्रयास किया है’ ।
उनके विचार सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता तक ही सीमित नहीं थे । उन्नीसवीं सदी के उस दशक तक शहरी भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग के विमर्श के केंद्र में पश्चिम का उदारवाद एवं रेडिकल दर्शन आ चुका था, जिसने औपनिवेशिक सत्ता के अधीन अंग्रेजी शिक्षा ग्रहण की थी । भारतीय पुनर्जागरण के दौरान इस बंगाली बुर्जुआ भद्रलोक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी । उस दौर के लगभग सभी बुद्धिजीवियों और समाज सुधारकों ने आलोचनात्मक चिंतन के माध्यम से भारतीय परंपरा एवं संस्कृति को समझने का प्रयास किया । उन्होंने महसूस किया कि भारतीय समाज स्त्रियों के प्रति असहिष्णु एवं भेदभावपूर्ण है । उनपर आरोपित समस्त प्रकार के सामाजिक-सांस्कृतिक बंधनों को तोड़े बिना स्त्रियों की स्थिति में सुधार संभव नहीं है । भारत में स्त्री-पुरुष संबंधों में व्याप्त लैंगिक असमानता की जड़ें रीति-रिवाजों एवं कष्टप्रद परंपराओं (सती प्रथा, वैधव्य, अशिक्षा, बेमेल विवाह, पर्दा प्रथा) में निहित हैं । राजाराम मोहन राय (‘यंग बंगाल’ आंदोलन के प्रणेता), ईश्वरचंद्र विद्यासागर, माइकल मधुसूदन दत्त जैसे लोगों ने स्त्रियों की स्थिति में सुधार के लिए कई सार्वजनिक अभियान चलाए । उस समय लगभग सभी बुद्धिजीवी स्त्री शिक्षा के पक्ष में चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा बने । हालांकि स्त्री शिक्षा के प्रति सबकी दृष्टि में भिन्नता थी । युवावस्था में एम.एन.रॉय पर बंकिम चंद्र की रचनाओं का विशेष प्रभाव था । अपनी पुस्तक साम्य में बंकिम चंद्र चटर्जी ने उस दौर के बंगाल में किसान के शोषण एवं हिंदु समाज में स्त्रियों के प्रति हो रहे क्रूर व्यवहार को अपना विषय बनाया एवं उसकी भर्त्सना की । इसके साथ ही, अक्षय कुमार दत्त, केशवचंद्र सेन, द्वारकानाथ गांगुली, उमेश चंद्र दत्त तथा शिवनाथ शास्त्री इत्यादि द्वारा ब्रम्ह समाज के माध्यम से प्रस्तुत किए जा रहे उदारवादी विचारों का भी एम.एन.रॉय पर व्यापक असर था ।
रॉय ने तब तक संभवतः बेगम रुकैया हुसैन द्वारा 1904 में लिखित ऐतिहासिक निबंध ‘आमादेर अबनति’ (Our Decline) नहीं पढ़ा था जिसमें उन्होंने बहुत असाधारण साहस के साथ धार्मिक मान्यताओं एवं रीति रिवाजों को स्त्रियों की दुर्दशा का प्रमुख कारण बताया था । उनका मानना था कि पितृसत्तात्मक धर्मग्रंथों में स्त्री-पुरुष असमानता के समस्त तत्व मौजूद हैं जिसके जरीए समाज में स्त्रियों को कमतर एवं पुरुषों को श्रेष्ठतम स्थान दिया जाता है। पुरुषों द्वारा लिखित इन धर्मग्रंथों में उन्होंने स्वयं को ईश्वर के समतुल्य घोषित कर दिया था । उस समय किसी स्त्री द्वारा इस प्रकार का लेखन एक क्रांतिकारी कदम था । एम.एन. रॉय के पसंदीदा लेखक शरतचंद्र चटर्जी ने भी 1924 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘स्त्रीर मूल्य’ (Women’s Value) में परंपरागत हिंदु समाज में स्त्रियों के प्रति होने वाली हिंसा और समाज के दृष्टिकोण की गहन आलोचना करते हुए स्त्री-पुरुष संबंधों में समानता के विमर्श को अनिवार्य रूप से लागू करने की पैरवी की थी । 6 सितंबर 1931 को जेल से लिखे अपने अपने दूसरे पत्र में रॉय ने शरतचंद्र द्वारा लिखित उनके दूसरे अति विवादित उपन्यास ‘शेष प्रश्न’ के बारे में बहुत उत्साहपूर्वक लिखा था जिसमें कहानी की नायिका कमल न सिर्फ सबके समक्ष स्त्री मुक्ति की बात करती है बल्कि वैसा जीवन जीने का प्रयास भी करती है। बीसवीं सदी के प्रारम्भिक दौर में बंगाल के समाज में जहाँ स्त्री को बोलने की आज़ादी नहीं थी, उस परिवेश में जब कमल अलग-अलग मुद्दों पर अपने पति से प्रश्न करती है । उसे यह फूटी आँख नहीं भाता । स्वतन्त्र विचार वाली मुँहफट कमल का हर प्रश्न पुरुष के स्त्री के ऊपर स्वामित्व की नींव पर चोट पहुँचाता है । जैसे-जैसे कमल के प्रश्न बढ़ते हैं, उसके और उसके पति शिवनाथ, जिससे वह पूरे रीति-रिवाज़ से ब्याही भी नहीं है, के बीच टकराव और तनाव बढ़ता जाता है। और कमल अपने अलग रास्ते पर निकल जाती है । 1931 में लिखा शरतचन्द्र का यह उपन्यास आज भी उतना ही प्रासंगिक है, क्योंकि स्त्री जिन प्रश्नों के उत्तर तब तलाश रही थी वे आज भी अनुत्तरित हैं। 17 अक्तूबर 1931 को जेल से लिखे उनके पत्र में कमल के प्रसंग का जिक्र करते हुए वे लिखते हैं :
‘वह युगों से मान्य सभी पवित्र वस्तुओं, रीति-रिवाजों और परंपराओं को खत्म करती है और युवा भारत को अच्छी शिक्षा देती है जो टैगोर और गाँधी का पूरी निष्ठा से अनुसरण करता है’ ।
वे उस पुस्तक (शेष प्रश्न) का अनुवाद करने के लिए बहुत उत्साहित थे । उनकी दृष्टि में यह सही अर्थों में भारत का पुनर्जागरण था क्योंकि इसने बंगाली रूमानियत और रहस्यवादी भावुकता के शांत और रुग्ण वातावरण को उत्तेजित कर दिया था । साहस की वाहक के रूप में कमल ने सिर्फ विद्रोह ही नहीं किया था बल्कि क्रांति की शुरुआत की थी।
उनकी रचना द आडियल ऑफ इंडियन वुमेनहुड पुस्तक की पृष्ठभूमि में पुनर्जागरण के दौर में बंगाली समाज में राजा राममोहन राय तथा एच.एल.वी.डेरोजिओ जैसे पुरोधाओं द्वारा किए गए सुधार कार्यों के कारण स्त्रियों की स्थिति में आए परिवर्तन की झलक दिखती है । हालांकि, एम.एन. रॉय अपने समकालीन लोगों से सबसे अधिक प्रगतिशील थे । उनके विचारों एवं लेखन पर मार्क्स, फ्रायड, वाटरमार्क, फ्रेजर एवं पाश्चात्य के अन्य चिंतकों का असर था । उन्हें पितृसत्तात्मक रुढ़िवादी हिंदू परिवारों में स्त्रियों के प्रति दुर्व्यवहार तथा फासिज्म की विचारधारा के मध्य एक समानता नज़र आती थी । मार्क्स के लेखन से गुजरते हुए उन्होंने उनकी कुछ चुनिंदा रचनाओं में बुर्जुआ परिवारों में होने वाले स्त्रियों के शोषण एवं पराधीनता की स्थिति को महसूस किया था । मार्क्स ऑन वुमेन क्वेश्वचन (इंटरनेशनल, न्यूयार्क, 1970) तथा वुमेन इन कम्यूनिज्म (ग्रीनवुड, वेस्ट्पोर्ट, 1973) जैसी रचनाओं के साथ-साथ उनपर मार्क्सवादी चिंतक एवं लेखक फ्रेडरिक ऐंगल्स की प्रसिद्ध रचना ओरिजन ऑफ फैमिली प्राइवेट प्रोपर्टी एंड स्टेट (प्रथम संस्करण, 1884) का जबरदस्त असर था । हालांकि उन्होंने उन्नीसवीं सदी में प्रकाशित मेरी वुल्सटनक्राफ्ट की रचना विंडिकेशन ऑफ द राइट्स ऑफ वुमेन तथा जॉन स्टुअर्ट मिल की द सब्जेक्शन ऑफ वुमेन का जिक्र अपनी रचनाओं में नहीं किया जबकि भारत में उस समय ब्रिटेन से शिक्षा प्राप्त कर लौटे बुद्धिजीवियों, बंकिमचंद्र चटर्जी और ब्रम्ह समाज के युवाओं पर स्त्री विषयक इन रचनाओं का जबरदस्त प्रभाव था।
रॉय ने अगस्त बेवेल की पुस्तक वुमेन एंड सोशलिज्म का अध्ययन किया जो रोज़ा लक्ज़म्बर्ग की शिष्या थीं । 1920 के दौर में रोज़ा लक्ज़म्बर्ग तथा उनकी अन्य स्त्री मित्र एंजेलिका बलवेनॉफ, क्लारा जेटकिन, अलेक्जेंड्रा कोलंताई, रुथ फिशर इत्यादि कम्युनिस्ट इंटरनेशनल में नेतृत्वकारी भूमिका में थीं । उनकी पुस्तकों जैसे माई लाइफ एस ए रिबेल(1938), सोसाइटी एंड मदरहुड (1906), द सोशल बायसेस ऑफ वुमेन क्वेश्चन(1906), वुमेन एंड इकोनोमिक एवोल्यूशन (1921), द वुमेन वर्कर एंड द पिजेंट ऑफ सोवियत रशिया(1921) का प्रभाव भारतीय स्त्रियों के संबंध में लेखन करते समय एम.एन.रॉय के अवचेतन में बना रहा । पश्चिम-पूरब की सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियां ही भिन्न नहीं थीं बल्कि स्त्रियों के प्रति व्यवहार की दृष्टि से भारतीय समाज अत्यंत पिछड़ा हुआ था । यह प्रवृति आज भी बनी हुई है ।
हालांकि पश्चिम में साम्यवादी आंदोलन एवं स्टालिन के कार्यकाल तथा उसके बाद स्त्रियों के लिए वहाँ का समाज पितृसत्तात्मक रूप से उतना ही हिंसक एवं स्त्रियों को दोयम दर्जे का समाज बना रहा । आज भी रशिया और पूर्वी यूरोप में साम्यवादी दलों में बमुश्किल ही स्त्रियों को नेतृत्वकारी भूमिका दी गई है । जबकि इसके पूर्व में ऐसा नहीं था । अपने जेल प्रवास के दौरान रॉय ने इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए 20वीं सदी में भारत, रशिया एवं पूर्वी यूरोप में पुनर्जागरण के दौरान स्त्रियों की लगभग एक जैसी सामाजिक-राजनीतिक स्थिति को अपने लेखन का विषय बनाया । जिस समय वह लेखन कर रहे थे, उस वक्त पश्चिम में स्त्री आंदोलन अपनी प्रारम्भिक स्थिति में था । 1920 के आस-पास संयुक्त राज्य अमेरिका में स्त्रियों ने मतदान का अधिकार प्राप्त किया था । यूनाइटेड किंगडम में भी 1918 तक स्त्रियों को मताधिकार प्राप्त हुए तीस वर्ष ही हुए थे । 1927 में वर्जिनिया वुल्फ की सुप्रसिद्ध रचना ए रुम वन्स ओन प्रकाशित हुई परंतु स्त्रीवाद को वैश्विक स्तर पर पहचान 1949 में प्रकाशित सिमोन द बवुआर की फ्रेंच कृति द सेकेंड सेक्स के उपरांत ही मिल पाई । इन समस्त पुस्तकों से रुबरु होने और पाश्चात्य के दर्शन के प्रभाव के कारण भारत में बंगाल पुनर्जागरण के दौरान भी चिंतन एवं लेखन के स्तर पर एम.एन.रॉय अपने समय से बहुत आगे चल रहे थे ।
यद्यपि भारत में स्वतंत्रता के उपरांत स्त्रियों की स्थिति में बहुत हद तक बदलाव आए हैं । परंतु उनकी स्थिति एवं मुक्ति के संबंध में एम.एन.रॉय द्वारा लिखित द आइडियल ऑफ इंडियन वुमेनहुड आज भी प्रासंगिक है। इस पुस्तक में उन्होंने स्त्री जीवन से जुड़े विविध पहलूओं पर अपनी आलोचनात्मक दृष्टि का परिचय दिया है । परिवार, विवाह, यौन संबंध, स्त्री स्वतंत्रता एवं समाज में उन्हें सम्मान दिए जाने के संबंध में उनकी टिप्पणियां अत्यंत प्रासंगिक हैं एवं अपने समकालीन विचारकों से टकराती हैं जिनमें महात्मा गाँधी एवं विनोबा महत्वपूर्ण हैं। रॉय मिस मार्ग्रेट सेंगर एवं गाँधी जी के बीच गर्भ निरोध एवं ब्रम्हचर्य के संबंध में हुई लम्बी चर्चा का जिक्र करते हुए गाँधी की आलोचना करते हैं । वे लिखते हैं :
“इस बातचीत का सबसे रोचक पहलू यह है कि महात्मा गर्भ नियंत्रण को तो उचित मानते हैं परंतु उसके लिए गर्भ निरोध के प्रयोग से उन्हें परहेज है । उनका मानना है कि विवाहित दम्पत्ति को यदि बच्चों की आवश्यकता नहीं है तो उन्हें यौन संबंधों से दूर रहना चाहिए । ऐसा करते हुए वे वैवाहिक जीवन में आरोपित ब्रम्हचर्य के सम्भावित परिणामों को नज़रंदाज कर देते हैं । वे इस बात को स्वीकार नहीं करते हैं कि गर्भ नियंत्रण को जिस विधि के जरीए वह नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं, वह हाड़- मांस से बने किसी सामान्य इंसान के लिए शारीरिक रूप से असंभव है”।
गाँधी जी द्वारा वैवाहिक जीवन में ब्रम्हचर्य के माध्यम से गर्भ नियंत्रण के प्रस्ताव पर बहुत तल्ख टिप्पणी करते हुए रॉय भारतीय समाज में विवाह की आवश्यकता को ही प्रश्नान्कित करते हैं । साथ ही, वे महात्मा से भी यह प्रश्न करते हैं कि वे क्यों नहीं सामूहिक ब्रह्मचर्य का प्रस्ताव भारतीय जनता के समक्ष रखते हैं और हर घर को व्यावहारिक रूप से मठ में तब्दील कर देते हैं और प्रत्येक स्त्री और पुरुष को सन्यासी बनने का सुझाव दे देते हैं । वे अपना तर्क प्रस्तुत करते हैं कि :
“हिंदूओं के लिए विवाह एक धार्मिक कर्तव्य है लेकिन उसके साथ ही उसमें विरोधाभास भी अंतर्निहित है । हिंदू धर्म के अनुसार, विवाह का उद्देश्य बच्चे पैदा करना है । निःसंतान विवाह को दुर्भाग्य का प्रतीक माना जाता है । यदि पत्नी बच्चों को जन्म देने में विफल रहती है, तो पति दोबारा शादी करने का हकदार है । यदि हमें सख्त शास्त्रीय आदेशों द्वारा निर्देशित किया गया है, तो गाँधी की सलाह के अनुसार, जन्म नियंत्रण के वैध तरीके का अभ्यास नहीं किया जा सकता है । क्योंकि, वह शास्त्रोक्त नियमों और सामाजिक परंपराओं का उल्लंघन होगा । फिर भी, गाँधी इन्हीं आधारों पर अपना पक्ष रखते हैं । इस विवाद में दो प्रश्न शामिल हैं । पहला यौन संबंध के बारे में, कि क्या प्रजनन के लिए किए जाने वाले संभोग को छोड़कर अन्य संभोग पाप है ? क्या प्रजनन के कार्य के अतिरिक यह एक शारीरिक और भावनात्मक आवश्यकता नहीं है ? क्या यह आध्यात्मिक विकास के लिए हानिकारक है” ।
महात्मा गाँधी यह मानते थे कि पुरुषों और स्त्रियों दोनों को आत्मसंयम का पालन करना चाहिए और केवल संतानोत्पत्ति के लिए ही यौन संबंध बनाना चाहिए । वे कहते हैं कि :
“मुझे लगता है कि यह मानना अज्ञानता की पराकाष्ठा है कि यौन क्रिया एक स्वतंत्र कार्य है, जो सोने या खाने की तरह आवश्यक है । संसार अपने अस्तित्व के लिए अपनी अगली पीढ़ी पर निर्भर करता है । दुनिया भगवान के खेल का मैदान और उनकी महिमा का प्रतिबिंब है । दुनिया के विकास के लिए प्रत्येक पीढ़ी को स्वयं को नियंत्रित करना चाहिए । जो इसे समझ लेता है वह किसी भी कीमत पर अपनी वासना को वश में कर लेता है, अपनी संतान के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कल्याण के लिए आवश्यक ज्ञान से स्वयं को सुसज्जित कर लेता है और भावी पीढ़ी को उस ज्ञान का लाभ देता है”।
स्त्री आंदोलन के विरोध के बावजूद महात्मा गाँधी ने जन्म नियंत्रण के लिए गर्भ निरोधकों का विरोध किया । इसका अर्थ यह नहीं कि बार-बार बच्चे पैदा करने की स्त्रियों की पीड़ा के प्रति उनमें सहानुभूति नहीं थी । लेकिन क्योंकि वे उन्हें जीवन को उच्च मार्ग की ओर निर्देशित करना चाहते थे । उनका विश्वास था कि जननांगों का उपयोग केवल प्रजनन के लिए किया जाना चाहिए अन्य किसी भी तरह का उपयोग इसका दुरुपयोग है । आत्म-नियंत्रित रहना स्त्री और पुरुष दोनों का कर्तव्य है जो संतति निरोध का सबसे उपयुक्त विकल्प है । यंग इंडिया में वह लिखते हैं :
जन्म-नियंत्रण प्रविधि की आवश्यकता के बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती । लेकिन युगों से चली आ रही एकमात्र विधि आत्म-नियंत्रण या ब्रह्मचर्य है । यह एक अचूक, संप्रभु उपाय है जो उन लोगों का भला करता है जो इसका अभ्यास करते हैं । पुरुष मानव जाति का आभार हासिल करेंगे, यदि वे जन्म-नियंत्रण के कृत्रिम साधनों को ईजाद करने के बजाय आत्म-नियंत्रण के साधनों का पता लगा लेंगे । कृत्रिम तरीके पाप के समान हैं । वे स्त्री और पुरुष को लापरवाह बनाते हैं । इन तरीकों को अनावश्यक सम्मान दिया जा रहा है, उसे रोका जाना चाहिए । कृत्रिम तरीकों को अपनाने से मूढ़ता और स्नायविक शिथिलता का परिणाम प्राप्त होगा । यह कृत्रिम उपाय किसी रोग से अधिक भयावह होगा।
21 जनवरी 1906 को एलेन गॉट्सचॉक को लिखे अपने पत्र में, रॉय ने गाँधी के साथ मार्गरेट सेंगर के साक्षात्कार का उल्लेख किया, जिसके दौरान गाँधी ने कहा था कि हमारे लिए वैकल्पिक उपाय यह है कि विवाहित महिलाएं संभोग के आनंद से विमुख हो जाएं । रबींद्रनाथ टैगोर ने मार्गेट सेंगर का समर्थन करते हुए 5 सितंबर 1925 को बर्थ कंट्रोल रिव्यू में लिखा था कि:
‘जन्म नियंत्रण आंदोलन एक महान आंदोलन है, न केवल इसलिए कि यह महिलाओं को अवांछनीय मातृत्व बोझ से बचाएगा बल्कि यह शांति स्थापित करने के उद्देश्य में मदद करेगा । आज भी भोजन और रहने के लिए देश की अधिकतर आबादी संघर्ष कर रही है’।
हालांकि, गाँधी जी की विवाह संस्था में गहरी आस्था थी एवं वे इसे समाज की नैतिक व्यवस्था के लिए आवश्यक मानते थे परंतु उन्होंने स्त्रियों से इस बात की पुरजोर अपील की कि वे वैवाहिक संबंधों में स्वंय को कमजोर तथा यौन संबंधों के लिए प्रस्तुत नायिका के रूप में न देखें । पत्नी पति की दासी नहीं, बल्कि उसकी संगिनी, मित्र और सहकर्मी होती है । वैवाहिक व्यवस्था के अंदर उसे भी समान अधिकार प्राप्त हैं । उन्होंने भारतीय स्त्रियों को उनकी वर्तमान स्थिति के प्रति जागरुक होने, स्वतंत्रता आंदोलन में कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ने तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होने के लिए लगातार प्रेरित किया । हालांकि, भारतीय समाज की संरचना में स्त्रियां सदियों से घरों के अंदर रहती आई थीं । उनके स्वामी पिता, पति और पुत्र के रूप में घर के पुरुष थे जिनकी अनुमति के बिना सार्वजनिक की दुनिया में कदम रखना उन्होंने सीखा ही नहीं था। यह एक मानसिक चहारदिवारी थी जिससे स्त्रियां स्वयं बंधी हुई थीं ।
एम. एन. रॉय भारतीय समाज में विवाह संस्था की प्रासंगिकता एवं उसे अनिवार्य बनाए जाने के संबंध में गाँधी से भिन्न राय रखते हैं । उनका मानना है कि विवाह कोई साथी नहीं है । यह एक अविभाज्य बंधन है जो स्त्री को सभी प्रकार की स्वतंत्रता से वंचित करता है, उसे उसके स्वायत्त अस्तित्व के अधिकार से वंचित करता है । पत्नी स्वतंत्र नहीं है । उसे स्वेच्छा से नहीं, बल्कि एक अनम्य अनुशासन के तहत केवल कर्तव्यों का पालन करना है। अनुशासन का यह सिद्धांत विचार की स्वतंत्रता पर भी रोक लगाता है और व्यक्ति को एक स्वचालित मशीन में बदल देता है। एक ऐसा समाज, जो रोबोटों से बना है, जो सोचते नहीं हैं, बल्कि केवल आज्ञापालन करते हैं, यह एक जेल है। कानून तभी संप्रभु होते हैं जब वे आम सहमति से बनाये जाते हैं । सामाजिक और पारिवारिक संबंधों के इस निरंकुश सिद्धांत के लिए कोई भी बहाना हो सकता है । लेकिन मामला यह नहीं है। यह न तो तर्क का विषय है और न ही सिद्धांत का । यह सच है कि स्त्रियों के लिए विवाह जहाँ शास्त्र-विहित अनुशासन का एक पूर्ण बंधन है, वहीं पुरुषों के लिए यह महज औपचारिकता की बात है । दरअसल, सैद्धांतिक रूप से भी अनुशासन का बोझ समान रूप से सभी पर नहीं लादा जा सकता । पिता और पति के रूप में पुरुष अनुशासनप्रिय है, पर अनुशासन का भार स्त्री पर डाला जाता है । हिंदू विवाह साहचर्य का संबंध स्थापित नहीं करता है । यह स्त्रियों को पुरुष के संरक्षण में रखता है । स्त्री पर पुरुष का सामाजिक संरक्षण, राजनीतिक संरक्षण पारस्परिक लाभ के लिए अस्तित्व के लिए कोई सामान्य गठबंधन नहीं है । हिंदू धर्म केवल स्त्रियों के मामले में तलाक पर प्रतिबंध लगाता है, यह पुरुषों को सभी प्रकार के लाभ प्रदान करता है । विवाह का बंधन उसे बांधता है, पर पुरुषों को तलाक के अधिकार की आवश्यकता ही नहीं होती है । तलाक के लिए हिंदू समुदाय इस अलिखित सिद्धांत पर आधारित है कि स्त्री-पुरुष की सांसारिक संपत्ति का एक हिस्सा है । वह एक से अधिक पत्नियाँ रख सकता है लेकिन उसकी पत्नी के लिए यह यह स्वीकार्य नहीं है । किसी भी स्थिति में, संरक्षक का नियंत्रण असमानता का भयावह रूप है । अपनी पुस्तक में इस संबंध में वे लिखते है:
‘हिंदू विवाह स्त्रियों को कोई भी अधिकार नहीं देता है, यह केवल दायित्व थोपता है। ऐसी परिस्थितियों में अनुशासन स्वेच्छा से लिया गया प्रण नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों का निर्वहन करने की बाध्यता है । किसी जिम्मेदारी में कोई नैतिक बल नहीं होता जब तक उसे स्वेच्छा से स्वीकार न किया गया हो । कर्तव्य और उत्तरदायित्व की अवधारणाएँ समझौते की पूर्वकल्पना करती हैं । हमें धर्मग्रंथों में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि यदि स्त्रियां विवाह की पवित्रता को भूल गईं तो समाज टूट जाएगा।‘
एम.एन. रॉय भारतीय समाज में स्त्रियों की स्थिति के प्रति चिंता का भाव रखते थे । वे मानते थे कि हिन्दू समाज में स्त्रियों की श्रेष्ठ स्थिति के बारे में अनेक दंतकथाएँ एवं किंवदंतियाँ गढ़ी गई हैं । अपने आदर्श स्वरूप में हिंदू धर्म स्त्रियों को पूर्ण समानता प्रदान करता है। हमारे समाज में उन्हें देवी का दर्जा दिया गया है । वह इस तर्क में विश्वास करता है कि :
ईश्वरीय दर्जा प्राप्त हो जाने के पश्चात उन्हें सांसारिक अधिकारों और विशेषाधिकारों की लालसा क्यों होनी चाहिए ? ये क्षणभंगुर हैं, इसलिए हिंदू समाज में स्त्रियों को अलग से पूर्ण समानता हासिल नहीं हैं । उनका जीवन अपने पतियों के साथ अविभाज्य मिलन से सम्पूर्ण होता है। वे किसी भी व्यक्तिगत, सामाजिक या आध्यात्मिक अस्तित्व की इच्छा के स्वार्थ से ऊपर हैं । प्रेम उनके लिए वासना नहीं है जो दैहिक संबंधों के आधार पर टिका हुआ है । वे बदले में कुछ मांगे बिना देती हैं । उन्हें प्यार बांटने में आनंद मिलता है । हिंदू स्त्री निःस्वार्थता की प्रतिमूर्ति है। पुरुषों को उसके गुणों की सराहना करनी चाहिए और उसे अपने घर के मंदिर में स्थापित करना चाहिए, जहाँ उसे अनचाहे बच्चों को जन्म देने सहित अनगिनत विशेषाधिकार प्राप्त हैं । वह उसके लिए खेती करने के लिए एक खेत है जो स्वाभाविक रूप से उसके लिए बच्चे पैदा करने के लिए नियत की गई है । एक आदमी उतनी जमीन के भूखंडों का मालिक है जितना वह वहन कर सकता है । आध्यात्मिक मिलन की यह कल्पना दंपत्ति दासता की वीभत्स जंजीरों को दर्शाती है।
इसके विपरीत, गाँधी उस समय स्त्रियों को भिन्न अर्थों में परिभाषित कर रहे थे । गाँधीजी ने स्वतंत्रता आंदोलन का धार्मिक स्वरूप कायम रखते हुए उसे अहिंसात्मक बनाया जिसमें शामिल होने के लिए धैर्य, त्याग, पीड़ा, सत्य और अहिंसा इत्यादि गुण अनिवार्य थे । ये सभी आमतौर पर स्त्रियों के गुण माने जाते हैं । उन्होंने भारतीय स्त्रियों को यह विश्वास दिलाया कि देश को उनके नेतृत्व की आवश्यकता है एवं उनकी सक्रिय भागीदारी के बिना देश की स्वतंत्रता संभव नहीं है । उन्होंने स्त्रियों को सच्ची सत्याग्रही के रूप में देखा । वे स्त्रियों की स्थिति में सुधार के लिए अपने स्तर पर व्यापक जन समुदाय को जागरुक करने का कार्य कर रहे थे । उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा:
मैं स्त्रियों के अधिकारों के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं कर सकता हूँ । मेरे लिए उनके हित सर्वोपरि हैं । मैंने हमेशा स्त्रियों की सेवा की है । भारत आने के समय से ही मैं यह महसूस कर रहा हूं कि स्त्रियां मेरी तरफ बहुत उम्मीद से देखती हैं । मैं स्त्री मुक्ति के प्रति क्रांतिकारी विचार रखता हूँ । मैं यह मानता हूँ कि स्त्रियों की मुक्ति उन्हें उनके प्रयासों एवं संघर्षों से ही प्राप्त होगी ।
गाँधी जी ने स्त्रियों के उन गुणों पर सर्वाधिक बल दिया जो उनके राजनीतिक अभियान के लिए हितकारी थे । उन्होंने खादी बुनने एवं चरखा चलाने को आत्म-नियंत्रण के साधन के रूप में देखा । खादी कातने के कार्य को उन्होंने स्त्रियों के धर्म के साथ जोड़कर देखा, क्योंकि परिवार के भोजन एवं वस्त्र की व्यवस्था का दायित्व स्त्रियों का माना गया । गाँधीजी स्त्रियों को जीवन के व्यावहारिक सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र में पुरूषों के समान ही सक्रिय तथा प्रभावी देखना चाहते थे, बिल्कुल अपने नैसगिक गुणों के आधार पर । गाँधी मानते थे कि स्त्री-पुरूष की साथिन है, जिसकी बौद्धिक क्षमताएं पुरूष की बौद्धिक क्षमताओं से किसी तरह कम नहीं है । पुरूष की प्रवृत्तियों में, उन प्रवृत्तियों के प्रत्येक अंग और उपांग में भाग लेने का उसे अधिकार है, और आजादी तथा स्वाधीनता का उसे उतना ही अधिकार है, जितना पुरूष को है । यह तो हमारी सामाजिक व्यवस्था की सहज अवस्था ही होनी चाहिए । महज एक दूषित रूढ़ि और रिवाज के कारण बिल्कुल ही मूर्ख और नालायक पुरूष भी स्त्री अधिकारी माना गया हैं, वे स्त्रियों से बड़े माने जाते हैं, यद्यपि वे इस बड़प्पन के पात्र नहीं होते और न वह उन्हें इतना सम्मान मिलना चाहिए । हमारे कई आंदोलनों की प्रगति हमारे स्त्री-समाज की पिछड़ी हुई हालत के कारण बीच में ही रूक जाती है। इसी तरह हमारे किए हुए काम का जैसा और जितना फल आना चाहिए, वैसा और उतना नहीं आता । गाँधीजी स्त्रियों को जीवन के व्यावहारिक क्षेत्र में सभी प्रकार की स्वतंत्रता एवं समानता का अधिकार दिए जाने की वकालत करते हैं । स्त्रियों के सांकेतिक रूप से इस प्रकार के प्रतिनिधि छवियों ने राष्ट्रीय आंदोलन में स्त्रियों प्रवेश की स्थिति को और सुगम बनाया क्योंकि आंदोलन को एक बहुत बड़े धार्मिक यज्ञ के रूप में देखा गया और स्त्रियों को संस्कृति की रक्षक के रूप में उस यज्ञ में आहुति डालना स्वाभाविक था । हालांकि 20 मार्च 1936 को, दिल्ली स्त्री लीग के तत्वावधान में आयोजित एक बैठक में, हिंदू संस्कृति के आधिकारिक प्रतिपादक डॉ. भगवान दास ने आधुनिक स्त्रियों की मांग की निंदा करते हुए अपने भाषण में विवाह और परिवार के बारे में हिंदू सिद्धांत की व्याख्या की :
‘हमें स्त्री-पुरुष के बीच समानता के संदर्भ में बात नहीं करनी चाहिए । वे दोनों मानवता के बराबर साझीदार हैं । हमें समानता की बजाय साहचर्य की बात करनी चाहिए । स्त्री-पुरुष के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध के लिए समानता आवश्यक नहीं है। न ही विवाह कोई पिकनिक है । यह एक अनुशासन है जिसे लोगों को निभाना ही चाहिए । यदि पुरुष और स्त्रियां विवाह की पवित्रता को भूल जाएं और इसके बारे में अनाप-शनाप बातें करें तो समाज टूट जाएगा । भारत में, परिवार समाज की इकाई है, जबकि पश्चिम में व्यक्ति महत्वपूर्ण है । हमारी व्यवस्था निःसंदेह सर्वश्रेष्ठ है जिसे कई भारतीय नहीं मानते हैं’ ।
एम. एन. रॉय भगवान दास की व्याख्या से सहमत नहीं थे । उनका मानना था कि भारतीय संस्कृति के ऐसे संरक्षक, राजनेता के रूप में, ब्रिटिश साम्राज्य में भारत की साझेदारी के सिद्धांत की इस आधार पर आलोचना करते हैं कि सच्ची साझेदारी केवल समानता के आधार पर ही संभव है। स्त्री-पुरुष संबंधों के मामले में उनकी दृष्टि को क्या हो जाता है ? आधे बराबर का तात्पर्य अद्वितीय अंकगणित नहीं हैं! यदि स्त्रियां आधे भाग बराबर नहीं हैं, तो वे आधी नहीं हैं। वे लिखते हैं :
‘वे गैर- मौजूदा संबंध को आदर्श बनाने का प्रयास कर रहे हैं ताकि समानता का निषेध प्रशंसनीय लगे । रहस्यमय गणित के इस सिद्धांत का परिणाम क्या है ? स्त्री-पुरुष के बीच साझेदारी बराबर नहीं होती । हमें सिखाया जाता है कि हिंदू विवाह संस्था दो आत्माओं को एकीकृत अस्तित्व में बांधती है यदि घटक समान नहीं हैं, तो स्पष्ट रूप से, एक दूसरे से अधिक है । श्रेष्ठ कौन सा है ? बेशक, आदमी। समानता को स्वाभाविक रूप स्वीकार करने से इनकार क्यों ? क्या स्त्रियों की कोई आत्मा नहीं होती ? आत्माओं को दिव्य प्रकाश की चिंगारी माना जाता है । स्त्रियों को समानता से वंचित करना हिंदू धर्म के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है ।
साथ ही, वह यह भी मानते थे कि राष्ट्रीय नेता उन धार्मिक विसंगतियों का बचाव कर रहे हैं, जो इस असमान व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह करता है, उसे झूठे आदर्शों से गुमराह करार देते हैं । उनमें से कमोबेश सभी अंधविश्वासी हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनके अज्ञान का आनंद लिया जाए । नए विचारों और आंदोलनों का विरोध जानबूझकर किया जाता है। वे धर्म द्वारा भारतीय जनता की भीड़ को गुलामी पर आधारित एक प्राचीन सामाजिक व्यवस्था के रक्षक के रूप में तब्दील कर रहे हैं। अपनी पुस्तक ‘द आइडियल ऑफ इंडियन वुमेनहुड’ में वह लिखते हैं :
“समानता और स्वतंत्रता के विचार भारत की आध्यात्मवादी परंपरा के लिए विदेशी हैं । अमूर्त आत्माओं की काल्पनिक समानता में आध्यात्मिक मुक्ति के सिद्धांत के साथ विश्वास, सामाजिक समानता और सांसारिक स्वतंत्रता को तुच्छ चीज़ों के रूप में खारिज कर देता है, जिसके बारे में चिंता नहीं की जानी चाहिए । मेरी आत्मा स्वतंत्र है, मैं गुलाम कैसे हो सकता हूं? सामाजिक गुलामी की कड़वी हकीकत एक स्वतंत्र आत्मा की कल्पना से धुंधली हो गई है।“
उनके अनुसार, भारत में शिक्षित स्त्रियों की संख्या लगातार बढ़ रही है जिन्होंने दंतकथाओं के बहकावे में आने से इनकार करना प्रारंभ कर दिया है । वे ‘आधुनिक ऋषियों’ के कुतर्क में फंसने से इनकार कर रही हैं । वे बदलती सामाजिक परिस्थितियों में स्वयं को बदल रही भारतीय स्त्री हैं । परिणामस्वरूप वह नए आदर्शों के संक्रमण से बच नहीं सकती हैं । समानता के आधार पर वास्तविक स्वतंत्रता और साझेदारी के नए आदर्शों से प्रेरित आधुनिक स्त्री ही भारत की पहचान है। कोई भी स्त्री जो सामंतवादी व्यवस्था के कठोर ढांचे के बाहर अपनी समस्याओं को हल करने का साहस करती है वह न सिर्फ विद्रोही माने जाने का जोखिम उठाती है, बल्कि एक असामान्य स्त्री करार कर दी जाती है । भारतीय जीवन की शांत सतह पर हल्की-सी हलचल तूफान का संकेत प्रतीत होने लगती है। एक ऐसी व्यवस्था के रक्षक जो अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए समाज के अधिकांश सदस्यों के साथ अन्याय करते हैं, स्वाभाविक रूप से अपने कैदियों की जंजीरों की हल्की सी खड़खड़ाहट से भयभीत हो जाते हैं । भारतीय स्त्रियों से अधिक किसी अन्य समुदाय को अधिक गुलाम नहीं बनाया गया है । यदि ये स्त्रियां बोलतीं तो भारतीय समाज को भीषण समस्या का सामना करना पड़ता । इस संबंध में मार्च 1936 में, आंध्र विश्वविद्यालय के छात्रों को संबोधित करते हुए डॉ. एस. राधाकृष्णन ने गंभीरता से इस विषय पर कहा कि :
‘धार्मिक कट्टरता, जो हमारे लाखों देशवासियों के साथ संवेदनहीन और अमानवीय व्यवहार करती है और देश की स्त्री जाति पर असहनीय विषमताएं और असुविधाएँ थोपती है, यह एक स्थायी ख़तरा है। यह आत्मा के स्तर पर किया जाने वाला भ्रष्टाचार है । जो लोग ऐसी अक्षमताओं को अन्य मनुष्यों पर थोपते हैं वे स्वयं अज्ञानता और अंधविश्वास के शिकार हैं’।
उनके समकालीन विनोबा भी स्त्री विषयक प्रश्नों एवं राष्ट्र निर्माण के संबंध में अपने विचारों से लगातार ‘स्त्री शक्ति’ जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक के माध्यम से भारतीय लोगों को जागरुक करने का प्रयास कर रहे थे । पुस्तक के प्रारंभ में ही विनोबा स्त्री के प्रति अपनी परमोदात्त मान्यता का उल्लेख करते हैं,‘‘स्त्री शब्द ‘स्तृ’ धातु से बना है। स्तृ का अर्थ हैं विस्तार करना, फैलाना । स्त्री यानी फैलाने वाली-प्रेम को दुनिया में फैलानेवाली । ‘स्त्री’ शब्द में ही स्त्री का स्वरूप प्रस्तुत किया गया है । स्त्री समाज का तारण करनेवाली, तारिणी-शक्ति है परन्तु यह एक विडम्बना ही है कि सांसरिक मोहपाश में फंसे हुए सामान्यजन तथा परमार्थ की बातें करनेवाले वैरागी जन दोनों ही स्त्री के प्रति अनुचित दृष्टिकोण रखते हैं । विनोबा के शब्दों में आज संसार और परमार्थ दोनों में स्त्री लक्ष्य बनी है । सांसारिकों के लिए वह भोग का लक्ष्य बनी है। सारा साहित्य, सारी कला, सारे रस उसी के इर्द-गिर्द घूमते रहते हैं दूसरी ओर परमार्थियों ने उसे वैराग्य का लक्ष्य बनाया। उसे बंधन में डालने वाली बताया और इसलिए उसके प्रति घृणा, तिरस्कार रखा । उसकी तरफ देखना भी गलत माना ।
स्त्री-पुरूष को लेकर समाज में प्रचलित भेदभाव से परे विनोबा दोनों को समान मानते हैं । स्त्री-पुरूष समानता को विनोबा भारत की प्राचीन मान्यता मानते हैं । उनके अनुसार,हमारे शास्त्रों के अनुसार स्त्री और पुरूष दोनों की आध्यात्मिक योग्यता समान है । हम भगवान का नाम लेते वक्त ‘सीता-राम’ कहते हैं, इसलिए कि हम स्त्री-पुरूष समता को मानते हैं इसीलिए हमारे देश में स्त्रियों को वोट का अधिकार प्राप्त करने के लिए कुछ भी नहीं करना पड़ा। इंग्लैण्ड में तो इसके लिए स्त्रियों को आंदोलन करना पड़ा । यहां तो स्त्री-पुरूष में समता प्राचीनकाल से कम से-कम तत्वतः(विचार से) तो मानी गई हैं, यद्यपि आचार में अभी नहीं है और उसमें सुधार की जरूरत है । यहां की हवा में आध्यात्मिक अधिकार समान होने की बात प्राचीन काल से हैं, प्राचीन काल में वह आचार में भी थी ।
स्त्री मुक्ति के संदर्भ में विनोबा की दृष्टि क्रांतिकारी है । वह मानते हैं कि स्त्री-मुक्ति तभी संभव है, जब स्त्रियों में कोई शंकराचार्य पैदा हो ।अर्थात् शंकराचार्य के समान प्रखर वैराग्य-संपन्न और ज्ञानी स्त्री ही स्त्री-मुक्ति का ध्वजावाहिका हो सकती है । वे ऐसी स्त्रियों से बगावत की अपील करते हैं । यहां वे ‘बगावत’ शब्द का प्रयोग भी विशिष्ट अर्थ में करते हैं । वे कहते हैं कि बगावत करने की वृत्ति को अविनयशील मानने की जरूरत नहीं । बगावत की वृत्ति और विनयशीलता में कोई विरोध नहीं है । विनयशीलता से तो बगावत बलवान बनती है । आज्ञा को न मानना बगावत है और वह विनयपूर्वक हो सकती है । इसी प्रकार स्त्री-शक्ति के लिए विनोबा ब्रह्मविद्या को आवश्यक मानते हैं । उनके अनुसार, स्त्रियों के सामाजिक, कौटुम्बिक, राजनैतिक अधिकार और कर्त्तव्य वे ही हैं, जो पुरूषों के हैं। दोनों में एक ही मानव-आत्मा है, इसलिए बाह्य भेद दिखाई देने पर भी उनको महत्व देने की जरूरत नहीं । दोनों में जो ब्रह्म भेद है, उसके कारण दोनों के कार्यक्षेत्र में कुछ थोड़ा फर्क होना स्वाभाविक है, लेकिन उसके आधार पर उस भेदभाव को ठीक नहीं कहा जा सकता जो आज समाज में मौजूद है’’।
उस समय तक भारत में स्त्रियों को संपत्ति में अधिकार दिए जाने का कोई प्रावधान नहीं था । स्वयं स्त्रियां ही संपति मानी जाती थीं । एम.एन.रॉय का मानना था कि देश के बड़े हिस्से में मौजूद हिंदू कानून के अनुसार, संयुक्त परिवार में केवल पुरुष सदस्य के रूप में स्वीकार्य हैं जिनकी पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी है स्त्री उसकी सह-साझीदार नहीं है, बल्कि केवल आश्रित है । संयुक्त संपत्ति में स्वामित्व का कोई अधिकार नहीं है । मनु और बाकी लोगों ने स्त्रियों के लिए बंधनकारी कानून बनाए जो पुरुष पूर्वाग्रह पर आधारित हैं । हो सकता है कि वे कानून अपने आप में अच्छे रहे हों, जो उस युग की सामाजिक व्यवस्था के लिए उपयोगी थे लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि वे हमेशा के लिए उपयोगी हैं । जब सामाजिक संस्थाएं अप्रासंगिक हो जाती हैं, तो उन्हें त्याग दिया जाना चाहिए । आज का प्रश्न यह है कि आधुनिक समाज में स्त्रियों को क्या स्थान दिया जाना चाहिए । आज हम मनु के युग में नहीं रह रहे हैं। भारतीय समाज का आधुनिकीकरण एक ऐतिहासिक आवश्यकता है । इस आवश्यकता के अनुरूप, क्या पारंपरिक विचारों को बनाए रखा जा सकता है ? प्रश्न का सही उत्तर देने के लिए हमें तथ्यों का सामना करना होगा तथा स्थिति पर यथार्थवादी होकर विचार करना होगा । ऐसा करने के बजाय आज के पारंपरावादी भारतीय स्त्रीत्व के रहस्यवादी आदर्शों की बात करते हैं । चूंकि हिंदू समाज में स्त्रियों की स्थिति को निर्विवाद तथ्यों के सामने उचित नहीं ठहराया जा सकता है, इसलिए काल्पनिक बातें गढ़ी जाती हैं । वे लिखते हैं :
‘वास्तव में, जब मैं उनके द्वारा स्त्रियों के विरुद्ध बनाए गए कानूनों के बारे में सोचता हूं, तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी नाग ने काट लिया हो । उनका रवैया बेहद जहरीला है । ऐसा लगता है कि उनके कानून हमारे प्रति नफरत की सांस लेते हैं । उनका कानून जन्म से मृत्यु तक स्त्री को पराधीन बनाता है, उसे दबाता है । उनके मुँह से निकले हुए शब्द हमारा मज़ाक उड़ाते हैं ! एक स्त्री कैसे स्वतंत्र जी सकती है जब शुरू से ही वह किसी भी तरह की स्वतंत्रता से वंचित है ? उसे सबसे पहले उसे अपने पिता के सामने झुकना चाहिए, फिर अपने पति और उसके रिश्तेदारों के सामने झुकना चाहिए । क्या यह आपको उचित स्थिति लगती है ? क्या आप इसके वश में होकर उस कानून व्यवस्था के अधीन रहेंगे जो आपको अपनी आत्मा को अपनी आत्मा कहने की भी इजाजत नहीं देती ? वह सच्चा कानून है या सच्चा धर्म ? मैं मनु को दोष नहीं देता । हो सकता है कि उसने ईमानदारी से अपनी क्षमता के अनुसार अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया हो । लेकिन उसके द्वारा किए गए कृत्य बीसवीं सदी के भारत में कोलाहल पैदा करते हैं’ ।
उस समय का निंदनीय तथ्य यह भी था कि हमारे कई राजनीतिक नेताओं में उस आधुनिक स्त्री के लिए धैर्य एवं सहानुभूति नहीं थी जो आर्थिक अधिकारों, सामाजिक मुक्ति और यौन संबंध में स्व निर्णय की मांग करती थी । भारतीय स्त्रीत्व के रहस्यवादी आदर्श के पैरोकारों में ऐसे लोग बहुतायत थे जो उस आदर्श की वास्तविक स्थिति के संबंध में कोई शिकायत नहीं करते और स्त्री को उसका स्थान वास्तविक स्थान दिलाने का दावा करते थे। बेशक, वे अतीत के बुद्धिमान लोगों पर भरोसा करते थे । एम. एन. रॉय अपनी पुस्तक में उस दौर के कई सुधारवादियों एवं हिंदू धर्म के उन कट्टरपंथियों जैसे भूलाभाई देसाई जैसे लोगों को स्त्रियों के प्रति बरते जाने वाले दोहरे रैवैये के लिए प्रश्नांकित करते हैं जो जीवन के किसी भी क्षेत्र में समानता के पक्षधर नहीं थे । वे आधुनिक स्त्रियों के प्रति बहुत विद्वेषी भाव रखते थे । एक कट्टर राष्ट्रवादी अखबार ने उनके बारे में बताया कि उन्होंने अपने वकतव्य में उन स्त्रियों की बहुत भर्त्सना की थी, जो खुद को पश्चिम से आयातित आधुनिक विचारों से प्रभावित होने देती हैं और परिणामस्वरूप अतीत के आदर्शों से दूर हो जाती हैं । भारतीय समाज में स्त्रियां किसी भी तरह से पुरुषों के अधीन नहीं हैं । यह रिश्ता इतना न्यायसंगत और सामंजस्यपूर्ण है जिसमें किसी भी तरह के विरोध की संभावना नहीं है ।
उन्होंने कहा :
‘बदले की लड़ाई मत लड़ो । यह मत कहो कि मैं एक खिलौना हूं, एक प्रजनन मशीन हूँ । पुरुषों को रसोई में भेजने की कोशिश मत करो । आपका कार्य दुनिया का सबसे महान कार्य है जिसमें कोई आपके साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता है । उस चीज़ को अपनाने का प्रयास करने में कोई फायदा नहीं है जो आप नहीं हैं । उस क्षेत्र में प्रवेश न करें जो पुरुषों का है’ ।
एम.एन.रॉय मानते थे कि धर्म ने स्त्रियों की आर्थिक अधीनता को उचित ठहराने के लिए और घरेलू संपत्ति तथा प्रजनन मशीनों के रूप में उनकी स्थिति का महिमा मंडन करने के लिए पौराणिक कथाओं का सहारा लिया । इन कथाओं के माध्यम से स्त्रियों को उनके लिए निर्धारित आदर्शों में विश्वास करने के लिए आसानी से राजी किया जा सकता था । समय के साथ, पुरुष के प्रति उनकी अधीनता एवं उनके सामाजिक अवमूल्यन को स्त्रीत्व के कुछ रहस्यमय आदर्शों से प्रेरित होकर स्त्रियों ने स्वैच्छिक आत्म-त्याग के द्वारा धारण कर लिया। वह घरेलू सद्भाव और सामाजिक सद्भाव का स्वर्ण युग था जब आर्थिक-सामाजिक स्वतंत्रता की मांग करने वाली, कोई विकृत स्त्री नहीं थीं । सीता और सवित्री की किंवदंतियों से भ्रमित होकर, वे सभी ईमानदारी और कुशलता से अपने स्त्री धर्म का निर्वहन करने लगी थीं । धार्मिक होना (रूढ़िवादी सिद्धांतों के अनुसार), घर चलाना और पुरुष की खुशी के लिए संतान उत्पन्न करना यह सब रॉय के लिए स्वर्ण युग के अतीत की बातें थीं । उनका मानाना था कि इसकी नींव पितृसत्तात्मक परिवार के कारण पड़ी है, जिसे साफ किया जाना चाहिए ताकि इसके स्थान पर एक नई सामाजिक संरचना खड़ी की जा सके । स्त्रियों का एक बड़ा तबका अभी भी अज्ञानता के आनंद में फंसा हुआ है ।
उस दौर में जागृत हो रही स्त्री चेतना के प्रति रॉय बहुत सकारात्मक थे । पुनर्जागरण के प्रभाव में भारत में भी स्त्रियां अपने प्रश्नों के साथ उपस्थित हो रही थीं, यह भविष्य की दृष्टि से बहुत आशाजनक तस्वीर थी । उनका मानना था कि पुरुषों द्वारा किए गए अन्याय के विरुद्ध एक दिन स्त्रियां स्वयं चेतस होकर प्रतिरोध करेंगी । हालाँकि, आधुनिक स्त्रियों का विद्रोह पुरुषों के प्रति नहीं, बल्कि सामाजिक संहिताओं के प्रति है जो पुरुषों के प्रभुत्व को कम करता है। ‘यह एक युद्ध है’- यह एक बेतुका विचार है । दो लिंगों के बीच कोई विरोध नहीं हो सकता । स्त्रियां पुरुषों के बिना तथा पुरुष स्त्रियों के बिना कुछ भी नहीं कर सकते हैं । दरअसल असमानता की वास्तविक जड़ें सामाजिक इकाइयों के रूप में पुरुष और स्त्री के बीच विद्यमान है । आधुनिक प्रतिरोध अपने साथी के विरुद्ध स्त्री का विद्रोह नहीं है, बल्कि यह सामाजिक इकाइयों की एक श्रेणी और दमन करने वाले के विरुद्ध पराधीन समूह का विद्रोह है । स्त्री द्वारा अपने सामाजिक एवं घरेलू स्थितियों के प्रति विद्रोह है । एम.एन रॉय का यह मानना था कि आर्थिक स्वतंत्रता के अभाव में स्त्रियां घरेलू जीवन में भी पराधीन स्थिति में हैं । पूर्ण मताधिकार प्राप्त नागरिक के रूप में ही स्त्रियों की स्थिति संभवतः कुछ बेहतर हो सकती है । स्त्रीत्व के परंपरागत आदर्श आधुनिक स्त्री के आदर्शों के साथ मेल नहीं खाते हैं। । एक आदर्श घर की संकल्पना सिर्फ पुरुष के बल पर नहीं की जा सकती है । बदलती सामाजिक-आर्थिक स्थितियों में स्त्री-पुरुष के बीच समानता समय की आवश्यकता है । यह स्त्री-पुरुष के बीच सहयोग से ही संभव है । यदि आज के युवाओं को खुशहाल और स्वस्थ घर बनाना है, तो स्त्रियों के साथ उन्हें आर्थिक जिम्मेदारी साझा करनी होगी । उसी प्रकार स्त्रियों को भी घरेलू मसलों में पुरुषों का सहयोग लेना होगा । कानूनी औपचारिकता का अर्थ है जीवन के हर क्षेत्र में स्त्रियों की उपस्थिति को सुनिश्चित करना, उन तमाम रास्तों को स्त्रियों के लिए खोलना जो अब तक स्त्रियों के लिए बंद थे ।
एम.एन.रॉय परंपरागत भारतीय पुरुषों एवं समाज सुधारकों को यह भी बताना चाहते थे कि पश्चिमी देशों द्वारा सार्वजनिक आर्थिक क्षेत्रों को स्त्रियों के लिए खोल देने एवं उन्हें समान अकसर प्रदान करने के कारन उन देशों में न सिर्फ स्त्रियों की सार्वजनिक उपस्थिति में इजाफा हुआ बल्कि आर्थिक रूप से भी वे अधिक उत्पादक हुए । उन देशों में परिवार नामक व्यवस्था भी आर्थिक रूप से समृद्ध होने के कारण अपेक्षित रूप से अधिक जनतांत्रिक हुई । भारत में भी यदि स्त्रियों को शिक्षा प्रदान करते हुए आर्थिक क्षेत्रों में प्रवेश करने की अनुमति दी गई होती तो हजारों-हजार घर जो बेरोजगारी और गरीबी के कारण दम तोड़ रहे थे, उन्हें बचाया जा सकता था । उन्होंने पाश्चात्य देशों में यह देखा था कि किस प्रकार पुरुषों की बेरोजगारी के दिनों में घर के आर्थिक उत्तरदायित्व को स्त्रियों ने अपने कंधों पर उठाया था जिसके कारण श्रम के लैंगिक विभाजन की न सिर्फ परिभाषा बदली थी अपितु स्त्रियों की आर्थिक-राजनीतिक समानता के लिए संभावनाएं भी पैदा हुई थीं । रॉय का यह मानना था कि दाम्पत्य जीवन में पति-पत्नी के बीच वास्तविक साझेदारी तभी संभव है जब उनके बीच संरक्षक एवं संरक्षित का भाव न रह जाए ।
भारत में भी स्त्रियां प्राचीन काल से ही शिकार से लेकर कृषक जीवन तक हर क्षेत्र में पुरुषों का सहयोग करती आई हैं । बावजूद इसके, उनके योगदान को कभी भी स्वीकार नहीं किया गया । इतिहास-लेखन की परंपरा में आखेट करती स्त्री एवं कृषि कार्यों में अधिकतम सहयोग करती स्त्री कभी शिकारी या किसान के रूप में नहीं जानी गईं । आज भी भारत के अधिकांश हिस्सों में जमीन का पट्टा घर के पुरुषों के नाम पर है, स्त्रियों के नाम पर नहीं । इसके लिए सत्तर के दशक में बोध-गया आंदोलन भी चलाया गया जिसमें छात्र युवा संघर्ष वाहिनी द्वारा जमीन के पट्टे पर स्त्रियों का नाम भी चढ़ाने की मांग जोर शोर से उठायी गई लेकिन उससे भी अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हुए । रॉय यह मानते थे कि भारत में जाति आधारित व्यवस्था के कारण भी स्त्रियों की स्थिति में बहुत गिरावट आई । हमारे समाज में उच्च वर्गीय एवं उच्च जाति की स्त्रियां तो फिर भी एक स्तर पर बेहतर जिंदगी जी रही थीं । ये और बात थी कि उनके जीवन परिस्थितियों में पराधीनता एवं शोषण के अन्य कई पहलू शामिल थे परंतु सौभाग्यवश वे जाति एवं वर्ग के दंश को झेलने के लिए दलित एवं कामगार वर्ग की स्त्रियों की तरह अभिशप्त नहीं थीं । जो तिहरे स्तर पर दमन एवं शोषण का शिकार थीं । उनके साथ जानवरों की तरह बर्ताव किया जाता था । भारतीय हिंदू राष्ट्रवाद ने जिस ‘आदर्श स्त्री’ की छवि अंग्रेजों द्वारा प्रस्तुत भारतीय स्त्री छवि के प्रतिक्रियास्वरूप निर्मिति की थी, उससे समाज के निचले तबके की स्त्रियों का कोई मेल नहीं था । एम.एन.रॉय इस समस्त बिंदूओं की तरफ हमारा ध्यान अपनी इस ऐतिहासिक रचना में आकर्षित कराते हैं ।
उसी समय दिल्ली में 8 नवंबर 1936 को स्त्री सम्मेलन की वार्षिक बैठक में श्रीमती बृजलाल नेहरू द्वारा अपने अध्यक्षीय भाषण में स्त्री आंदोलन के समर्थन में जो वक्तव्य दिया गया था, उस पर भी गौर किया जाना आवश्यक है । उन्होंने कहा था:
“सबसे आम गलतफहमी यह है कि यह आंदोलन यौन-प्रतिद्वंद्विता, यौन-प्रतिस्पर्धा और यौन-युद्ध की भावना लाकर पुरुषों और महिलाओं के बीच दरार पैदा करने वाला है । यह तर्क दिया गया कि दुनिया में शांति और सद्भाव लाने की बजाय स्त्रीवादी आंदोलन नए मुद्दों को जन्म दे रहा है जिससे मानवता के दो हिस्सों के बीच मतभेद पैदा होता है, जो एक साथ जीवन जीने के लिए नियत किए गए हैं और जिनके सहयोग के बिना दुनिया का अस्तित्व संभव नहीं है । आंदोलन को यह व्याख्या देना इसके उद्देश्य को नकारना है, हमारा उद्देश्य स्त्रियों को पुरुषों के खिलाफ खड़ा नहीं करना नहीं है, बल्कि दोनों के बीच शांति और सद्भाव और सच्चा सहयोग लाना है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि पुरुषों और महिलाओं ने पूरी दुनिया में हर समय एक साथ अपना जीवन बिताया है, लेकिन उन्होंने सच्चे साथी के रूप में एक साथ जीवन नहीं बिताया है । उनके रिश्ते में मृत शांति हमेशा बनी रहेगी क्योंकि यह जीवन की सच्ची शांति नहीं है । पुरुष और स्त्री के बीच संबंधों में श्रेष्ठता और हीनता की भावना, पुरुषों द्वारा स्त्रियों के शोषण की भावना अनादि काल से रही है। इस प्रकार की भावना हमारे देश के रीति-रिवाजों और कानूनों में प्रकट होती है । इसने दोनों के संबंधों को खराब किया है और अमानवीय विकास का कारण बनी है। स्त्री और पुरुष के बीच सच्ची शांति, सद्भाव और सच्चा साथी तभी मौजूद रह सकता है जब यह रिश्ता समानता और न्याय पर आधारित हो, जब तक पुरुषों के दिलों में श्रेष्ठ और निम्न एवं स्वामी और आश्रित का थोड़ा सा भी विचार मौजूद है तब तक स्त्री के लिए स्वतंत्रता का भाव हासिल नहीं किया जा सकता”।
अंत तक, एम.एन रॉय यह मानते रहे कि हिंदू परिवार में स्त्री आश्रित होती है । स्त्रीत्व का आदर्श नहीं बदलता । यह महज एक मिथक है । कानून और प्रथाएं सभी असमानता और अन्याय की भावना से भरे हुए हैं । आज भारत में बहुत कम संख्या में प्रतिष्ठित महिलाएं हैं जो समानता की मांग या यौन भेदभाव और शोषण के खिलाफ अपने अभियान में मुखर हैं । हालाँकि, बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के दौरान जिन कुछ लोगों ने भारतीय महिलाओं की स्थिति में सुधार करने का प्रयास किया वे ज्यादातर राममोहन, विद्यासागर, लोकलुरवाड़ी, ब्रह्म समाज, फुले जैसे प्रबुद्ध विचारधारा के पुरुष थे । बंगाली पत्रिका बामाबोधिनी (1863-1922), जो विशेष रूप से स्त्री शिक्षा और सुधार के लिए समर्पित थी, और जिसने महिलाओं को अपने आलेखों द्वारा योगदान करने के लिए प्रोत्साहित किया था, उसकी स्थापना और संचालन कुछ प्रगतिशील पुरुष सदस्यों द्वारा किया जाता था। पत्रिका के उन पन्नों में व्यक्त महिलाओं संबंधी विचार मुख्य रूप से ब्रम्ह समाज के तत्कालीन पुरुष सुधारकों के विचारों को प्रतिबिंबित करते थे ।
अपने पुस्तक के अंतिम विश्लेषण में रॉय पुरानी परंपरागत व्यवस्था को तोड़ने के लिए आर्थिक स्वतंत्रता की मांग करते हैं । उनके अनुसार, यही पुरानी व्यवस्था से उत्पन्न गतिरोध से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका है जो न्याय के साथ-साथ महिलाओं के लिए सामाजिक कल्याण और स्वतंत्रता की स्थापना की मांग करता है । अंत तक उनका यह मानना रहा कि वास्तव में, आधुनिक स्त्री द्वारा मांगी गई स्वतंत्रता एक आवश्यक सामाजिक संस्था के रूप में सदियों से स्थापित परिवार नामक संस्था के विघटन को रोक सकती है और सामाजिक अराजकता के खतरे को दूर कर सकती है । आधुनिक स्त्री सामाजिक अराजकता पैदा नहीं करना चाहती है, यह एक भ्रामक प्रचार है जो उसके प्रति समाज में नकारात्मक भाव पैदा करने के लिए बनाया गया है । वह केवल इससे बाहर निकलने की कोशिश कर रही है । उसके गले में बंधे भारतीय नारीत्व के काल्पनिक आदर्श का भार अब पत्थर के समान भारी हो चुका है । उससे उसे आज़ाद किया जाना आवाश्यक है, इससे पहले कि वह सामाजिक रूप से अपंग हो जाए।
इस प्रकार हम देखते हैं कि औपनिवेशिक काल में एम.एन.रॉय स्त्री विषयक जिन प्रश्नों पर गंभीरतापूर्वक चिंतन एवं लेखन कर रहे थे वह वास्तविक अर्थों में भारत में ‘स्त्री मुक्ति’ की अनिवार्य शर्त थी । अपने समकालीन चिंतक यथा महात्मा गाँधी के साथ कई मुद्दों पर असहमति के बावजूद वे लगातार उनके साथ संवाद करते हुए अपनी आपत्तियां जाहिर करते रहे । हालांकि एम.एन. रॉय के स्त्री विषयक लेखन पर अपेक्षित रूप से स्वयं स्त्रीवादी विमर्श ने न्यूनतम ध्यान दिया है जिसके कारण उनके विचारों के प्रति अनभिज्ञता बनी हुई है । वर्तमान दौर में स्त्रीवाद को अपनी ज्ञान परंपरा में उन्हें तरज़ीह देने की आवश्यकता है । भारतीय संदर्भों में स्त्रीवादी चिंतन परंपरा के देशज स्वरों को पहचानने एवं उन सभी की मुक्कमल तस्वीर बनाने के लिए ज्योतिबा फुले, रवींद्रनाथ टैगोर, गाँधी, विनोबा, पेरियार, भीमराव अंबेडकर के साथ-साथ एम.एन.रॉय को शामिल करना अनिवार्य है ।
डॉ सुप्रिया पाठक स्त्री विमर्श के सैद्धांतिक पक्ष, स्त्रीवादी साहित्य आलोचना, सिनेमा, दलित स्त्रीवाद पर लगातार गंभीर लेखन एवं शोध कर रही हैं. संप्रति : एसोसिएट प्रोफेसर, स्त्री अध्ययन विभाग, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय केंद्र प्रयागराज.
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